कुण्डलिनी भी आत्महत्या के लिए प्रेरित कर सकती है?

सहलेखक: डा० भीष्म शर्मा {पशु चिकित्सक, हि. प्र. राज्य}

सह संपादक: मास्टर विनोद शर्मा {अध्यापक, हि. प्र. राज्य}

Photo by Vanderlei Longo from Pexels

अभी कुछ दिन पहले बौलीवुड के मशहूर सितारे सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या का मामला सामने आया। सबसे पहले हम उनकी आत्मा की शान्ति की कामना करते हैं। वह बुलंदियों पर था। बुलंदियां कुण्डलिनी से हासिल होती हैं। तो क्या कुण्डलिनी भी आत्महत्या की वजह बन सकती है? इस पोस्ट में हम इसका विश्लेषण करेंगे।

अवसाद एक छुआछूत वाले रोग की तरह है, जिसे कुंडलिनी योग की सहायता से दूर भगाया जा सकता है: एक अदभुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान

एक ब्लयू व्हेल नाम की वीडियोगेम आई थी, जिसे खेलते हुए बहुत से बच्चों ने आत्महत्या की थी। सुशान्त ने एक आत्महत्यारे की पेंटिंग अपनी सोशल मीडिया वाल पर कई दिनों से लगाई हुई थी। उनकी छिछोरे फिल्म में वह अपने बेटे को इस रोग से बचने के लिए पूरी फिल्म में समझाते रहे। इसी तरह, एक खबर के अनुसार एक बिहार राज्य का लड़का देर रात तक अकेले में सुशांत की खुदकुशी की खबरें देखता रहा औऱ सुबह को वह भी लटका हुआ मिला। यह सब मन का खेल है। ऐसे आत्महत्या से संबंधित चिंतन से विशुद्धि चक्र पर एक कसाव सा पैदा होता है। गला दबा हुआ सा लगता है, और गले पर एक घुटन सी महसूस होती है। कुंडलिनी योगी को तो विशुद्धि चक्र पर ध्यान करने की पहले से ही आदत होती है। वह बार-2 वहां कुंडलिनी को फोकस करता है। उससे गले को जीवनी शक्ति मिलती है, और कुंडलिनी भी मजबूत होती है। गले की घुटन में गेस्ट्राइटिस का भी रोल हो सकता है। तनावपूर्ण और अनहेल्थी जीवनशैली से गेस्ट्राइटिस होती है। आजकल इसके इलाज के लिए सुरक्षित दवाई मौजूद है। ऐसी दवाइयां योग अभ्यास करने वाले लोगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए इनका आधा डोज खाकर उनका अपने ऊपर असर परख लेना चाहिए। अवसाद-रोधी दवाएं तो बहुत से लोगों का अवसाद बढ़ा भी सकती हैं, क्योंकि उनसे आदमी की स्मरणशक्ति व कार्यक्षमता काफी घट जाती है। वे दवाईयां लम्बे समय से बनी हुई कुण्डलिनी को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे उससे जुड़े सभी काम दुष्प्रभावित हो सकते हैं। अगर किस्मत अच्छी हो, और परिश्रम किया जाए, तो उससे नए कुण्डलिनी-चित्र के निर्माण का और उसे जागृत करने का सुअवसर भी प्राप्त होता है। नई कुंडलिनी से एडजस्ट होने में समय लगता है। सूत्रों के अनुसार, सुशांत भी लम्बे अरसे से अवसाद रोधी दवाएं खा रहे थे, हालांकि कुछ समय से उन्होंने उन्हें खाना छोड़ा हुआ था। जितना हो सके मौन रहना चाहिए औऱ जीभ को तालु के साथ टाईटली जोड़कर रखना चाहिए ताकि मस्तिष्क की कुंडलिनी या विचार आसानी से नीचे बह सके। जिसने आत्महत्या की भावनाओं के बीच में रहते हुए भी उसे दबा दिया, वह असली योगी है।

सुशांत सिंह राजपूत कई बार अपनी स्वर्गवासिनी माँ की याद में खोकर भावुक हो जाते थे

वह अपनी माँ से सर्वाधिक प्रेम करते थे। यह बहुत अच्छी बात है, और बड़ों-बुजुर्गों से प्यार होना ही चाहिए। उनकी आखिरी सोशल मीडिया पोस्ट भी अपनी माँ की याद की थी। ऐसा हमें मीडिया से सुनने को मिला। सर्वाधिक प्रिय वस्तु ही मन में निरंतर बस कर कुण्डलिनी बन जाती है। इसका अर्थ है कि उनके मन में अपनी माँ की छवि कुण्डलिनी के रूप में बसी हुई हो सकती है। इसीसे उन्हें निरंतर सफलताएं मिलती गईं। वैसे तो पूर्वजों व पारिवारिक लोगों या बुजुर्गों से संबंधित शुद्ध कुंडलिनी हमेशा शांत औऱ कल्याणकारी ही होती है। परंतु कई बार वैसी कुंडलिनी का सहारा लेकर इश्क-मोहब्बत वाली कुंडलिनी मन पर हावी हो जाती है। वह बहुत भड़कीली होती है औऱ कई बार खतरनाक हो सकती है। सुशांत का कुछ स्टार लड़कियों से प्यार और ब्रेकअप भी सुनने में आया। कुंडलिनी को सकारात्मक व सही दिशा देने के लिए एक स्थिर दाम्पत्य जीवन बहुत जरूरी होता है। हालांकि सिने जगत में ऐसा चलता रहता है, पर सभी एक जैसे नहीं होते, और ऐसा सभी को सूट भी नहीं करता। इश्क-मुहब्बत के चक्कर में हुई आत्महत्याएं इसी कुदरती कुण्डलिनी से सम्बंधित होती हैं। डॉक्टर के अनुसार वह बाईपोलर डिसीस से पीड़ित थे। यह कुण्डलिनी-अवसाद का ही एक दूसरा रूप है। इसमें तीव्र उत्तेजना के दौर के बाद तीव्र अवसाद का दौर आता है।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था।अगर ढंग से किया जाए, तो कुंडलिनी योग ही बाइपोलर रोग का सबसे बढ़िया इलाज है। कथित कलाकार ने थोड़े दिनों के लिए उसे इलाज के लिए किया था, फिर छोड़ दिया था। कुंडलिनी मन के विकारों को बाहर निकाल रही होती है। वास्तव में विकार ही अवसाद पैदा कर सकते हैं, कुंडलिनी नहीं।कुंडलिनी अवसाद से बचने के लिए हर समय काम में व्यस्त रहना चाहिए। कथित कलाकार कई दिनों से कामधाम छोड़कर कमरे में बंद हो गए थे।

किसीसे बिछुड़ने का गम भी कुंडलिनी अवसाद का ही एक प्रकार है। उस गम को खुशी में बदलने के लिए बिछुड़े हुए व्यक्ति के मानसिक चित्र को कुंडलिनी बनाकर कुंडलिनी योग साधना शुरु कर देनी चाहिए।

कुण्डलिनी से उस सिने कलाकार की आध्यात्मिक प्रगति भी तीव्रता से हो रही थी

प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि वे अध्यात्मिक रुझान वाले व बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे। उनकी कम उम्र के शरीर में एक बुजुर्ग का दिमाग था। ऐसे गुण कुण्डलिनी से ही उत्पन्न होते हैं।

कुण्डलिनी आदमी को जीवन के प्रति लापरवाह बना सकती है

कुण्डलिनी के कारण आदमी अद्वैत से भर जाता है। इसका मतलब है कि उसे रात-दिन, जीवन-मृत्यु, दोस्त-दुश्मन, सुख-दुःख आदि सभी विपरीत चीजें एकसमान जैसी लगने लगती हैं। इससे यह अर्थ निकलता है कि आदमी को किसी चीज से डर नहीं लगता। जब कोई आदमी अपनी मौत से नहीं डरेगा, तब वह अपनी जिंदगी के प्रति लापरवाह हो जाएगा। वही लापरवाही जब सीमा पार कर जाती है, तब वह आत्महत्या का रूप ले लेती है। वास्तव में तो अद्वैत से सतर्कता बढ़ती है, लापरवाही नहीं। पर कई लोग अद्वैत को गलत तरीके से ग्रहण करते हैं।

कुण्डलिनी को संभालने के लिए बाहरी सहारे की आवश्यकता होती है

उपरोक्त स्थिति में आदमी को बाहरी सहारा मिलना चाहिए। लोगों से मेल-जोल जारी रहना चाहिए। परिवार व दोस्तों के साथ खूब समय बिताना चाहिए। घूमना-फिरना चाहिए। सामाजिक समारोहों व कार्यों में शामिल होते रहना चाहिए। इससे कुण्डलिनी योगी को लोगों के मन में जीवन के प्रति लगाव नजर आएगा। लोगों के मन में अनहोनी का डर नजर आएगा। इससे उसे सही ढंग से जीवन जीने की प्रेरणा मिलेगी। आजकल के कोरोना लौकडाऊन ने बहुत सारे लोगों से यह सामाजिक सहारा छीन लिया है।

गुरु कुण्डलिनी के लिए सर्वोत्तम सहारा है

गुरु कुण्डलिनी के दौर से पहले ही गुजर चुका होता है। इसलिए उसे सब कुछ पता होता है। इसलिए वह नए-२ कुण्डलिनी योगी को अकेला ही पूरे समाज की शक्ति दे सकता है।

कुण्डलिनी अवसाद ही समुद्रमंथन से निकला हुआ विष है

समुद्रमंथन का वर्णन हिन्दू पुराणों में मिलता है। मंदराचल पर्वत कुण्डलिनी है। कुण्डलिनी-ध्यान वासुकी नाग है। मन समुद्र है। उससे निकली हुई अच्छी चीजें अच्छे विचार हैं, जो आदमी को देवता बनाते हैं। उससे निकली हुई गन्दी चीजें गंदे विचार हैं, जो आदमी को राक्षस बनाते हैं। मन के देवताओं और राक्षसों के परिश्रम व सहयोग से मंथन चलता रहता है। अंत के करीब जो विष निकलता है, वह कुण्डलिनी से पैदा हुआ अवसाद है। उसे पीने वाले शिव गुरु हैं। वे उसे गले में धारण करते हैं। इसका मतलब है कि वे शिष्य का अवसाद हर लेते हैं, पर स्वयं उससे प्रभावित नहीं होते। उसके बाद जो अमृत निकलता है, वह कुण्डलिनी से मिलने वाला आनंद है। समुद्र मंथन से जो लक्ष्मी मिलती है, उसका अर्थ तांत्रिक प्रतीत होता है। वह भगवान् नारायण तक ले जाती है।

कुण्डलिनी योग से सम्बंधित मेरा अपना अनुभव

जो मैंने इस पोस्ट में लिखा, वह मेरा अपना ही कुण्डलिनी अवसाद का, और उससे बाहर निकलने का अनुभव है। खुशकिस्मती से मुझे एक पड़ौसी सज्जन का सहारा मिल गया था, जिनके घर मैं बिना पूछे और खुलकर आ-जा सकता था, तथा जिनके साथ जितना चाहे समय बिता सकता था। दूसरे अधिकाँश लोग तो मुझे मंगल ग्रह से आए हुए प्राणी की तरह ट्रीट करते थे। अच्छा जोक कर दिया।

कुण्डलिनी मेडिटेशन की अवस्था ज्ञान की चरम अवस्था होती है, अवसाद तो वह दूसरे लोगों को लगती है

कुण्डलिनी अवसाद सापेक्ष होता है। स्वयं कुण्डलिनी योगी को वह ज्ञान की शीर्ष अवस्था लगती है। कुण्डलिनी के अन्य जानकारों को भी यह ऐसी ही लगती है। कुण्डलिनी से अनजान लोगों को ही वह अवसाद लगती है। इसलिए वैसे लोग कुण्डलिनी योगी की आलोचना करते रहते हैं, और उसे अवसाद से भर देते हैं। लोग तो उसके भले के लिए उसकी आलोचना करते हैं ताकि वह कुंडलिनी के बिना जीना सीख सके, पर वह इस बात को अक्सर समझ नहीं पाता। अवसाद उसे कुंडलिनी को मन से हटाने से होता है, क्योंकि उसे कुंडलिनी के नशे की लत लग जाती है। कुंडलिनी प्रकाश के सामने तो अवसाद का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। इसीलिए या तो कुंडलिनी को किसी हालत में नहीं छोड़ना चाहिए या फिर कुंडलिनी से आसक्ति नहीं होनी चाहिए और उसके बिना जीने की आदत भी बनी रहनी चाहिए। नहीं तो वैसा ही अवसाद पैदा होने की संभावना है, जैसा नशेड़ी में एकदम से नशा छोड़कर पैदा होता है। जितनी ज्यादा रौशनी होगी, जब वह बुझेगी तब उतना ही ज्यादा अंधेरा भी होगा। कुंडलिनी शरीर औऱ मन की शक्ति को खींचती है। उससे पैदा हुई कमजोरी ही अवसाद की वजह बन सकती है। इसीलिए तंत्र में उस कमजोरी से बचने के लिए पंचमकारों के सेवन का प्रावधान है।इसीलिए अच्छी संगति को अपनाने पर जोर दिया गया है। अच्छा हो, यदि औरों के रास्ते में फूल न बो सको, तो कांटे भी नहीं बोने चाहिए। इससे फूल खुद उग आएँगे। महात्मा बुद्ध ने भी ऐसा ही कहा है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि कुंडलिनी अवसाद प्राकृतिक तौर से उभरी कुंडलिनी से ज्यादा होता है। यद्यपि प्राकृतिक कुंडलिनी बहुत तेजी से आध्यात्मिक विकास करती है। इसलिए प्राकृतिक कुंडलिनी के इस खतरे से बचे रहने के लिए कृत्रिम कुंडलिनी योग करते रहना चाहिए।

एक पुस्तक जिससे मुझे कुण्डलिनी अवसाद से पूरी तरह से बाहर आने में मदद मिली

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन”। उसका पूरा विवरण निम्नलिखित लिंक पर उपलब्ध है।

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कुण्डलिनी ही तांत्रिक सैक्सुअल योग के माध्यम से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियों; चक्रों, और अद्वैत को उत्पन्न करती है।

सभी मित्रों को शिवरात्रि पर्व की बहुत-2 बधाइयां । यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगवान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पुरजोर खिलाफत करते हैं।

कुण्डलिनी ही सबकुछ है। उसी का ध्यान जब शरीर के विशेष बिन्दुओं पर किया जाता है, तब वे बिंदु चक्र कहलाते हैं। उसी को गति देने से जब काल्पनिक मार्ग  बनते हैं, तब वे भी नाड़ियाँ कहलाते  हैं। उसी का ध्यान करने से अद्वैत स्वयं उत्पन्न होता है। इसी तरह अद्वैत का ध्यान करने से कुण्डलिनी स्वयं ही मन में प्रकट हो जाती है।

हमारी रीढ़ की हड्डी में दो आपस में गुंथे हुए सांप बहुत से धर्मों में दिखाए गए हैं। बीच में एक सीधी नाड़ी होती है।

आपस में गुंथे हुए दो नाग यब-युम आसन में जुड़े हुए दो तांत्रिक प्रेमी हैं

जैसा कि आप नीचे दिए गए चित्रों में देख पा रहे हैं। एक नाग पुरुष है, और दूसरा नाग स्त्री है। यह पहले भी हमने बताया है कि मनुष्य का समग्र रूप उसके तंत्रिका तंत्र में ही है, और वह फण उठाए हुए नाग की शक्ल से मिलता-जुलता है। हमारे तंत्रिका  तंत्र का मुख्य भाग मस्तिष्क समेत पीठ (मेरुदंड) में  होता है। इसीलिए हमारी पीठ फण उठाए नाग की तरह दिखती है। क्योंकि कुण्डलिनी (संवेदना) इसी नाग के शरीर (तंत्रिका तंत्र) पर चलती है, इसलिए जिस किसी और रास्ते से भी जब  कुण्डलिनी चलती है, तो अधिकांशतः उस रास्ते को भी नाग का रूप दिया जाता है। वास्तव में  एक नाग एक तांत्रिक प्रेमी की पीठ को रिप्रेसेन्ट करता है, और दूसरा नाग दूसरे तांत्रिक प्रेमी की पीठ को। पुरुष प्रेमी स्त्री के मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी का ध्यान शुरू करता है।  फिर वह कुण्डलिनी को सीधा पीछे लाकर अपने मूलाधार पर स्थापित करता है। इस तरह से दोनों  प्रेमियों के मूलाधार आपस में जुड़ जाते हैं, और एक केन्द्रीय नाड़ी का शाक्तिशाली मूलाधार चक्र बनता है, जिसे चित्र में क्रोस के चिन्ह से मार्क किया गया है। वह केन्द्रीय नाड़ी बीच वाले सीधे दंड के रूप में  दिखाई  गई है, जिसे सुषुम्ना कहते हैं। पुरुष नाग को पिंगला, व स्त्री नाग को इड़ा कहा गया है। फिर पुरुष प्रेमी कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ा कर  अपने स्वाधिष्ठान चक्र पर स्थापित करता है। वहां  से वह उसे सीधा आगे ले जाकर स्त्री के स्वाधिष्ठान पर स्थापित करता है। इस तरह से सुषुम्ना का स्वाधिष्ठान भी क्रियाशील  हो जाता है। फिर वह उसे स्त्री के स्वाधिष्ठान से ऊपर चढ़ा कर उसीके मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे इड़ा का मणिपुर सक्रिय हो जाता है। वहां से उसे सीधा पीछे ले जाकर अपने मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे पिंगला का मणिपुर भी सक्रिय हो जाता है। दोनों नाड़ियों के मणिपुर चक्रों के एकसाथ क्रियाशील होने से सुषुम्ना का मणिपुर चक्र स्वयं ही क्रियाशील हो जाता है। इस तरह से यह क्रिया ऐसी ही सहस्रार चक्र तक चलती है। स्त्री प्रेमी भी इसी तरह कुण्डलिनी को चलाती है। इस तरह से दो नाग आपस में गुंथे हुए और ऊपर की ओर जाते हुए प्रतीत होते हैं, तथा सुषुम्ना के माध्यम से सहस्रार तक पहुँच जाते हैं।

कैड्यूसियस का चिन्ह (symbol of caduceus) भी तांत्रिक यौनयोग को ही रेखांकित करता है

इस चिन्ह में दो सांप आपस में इसी तरह गुंथे हुए होते हैं। उनके बीच में एक सीधा स्तम्भ होता है, जिसके शीर्ष पर पंख लगे होते हैं। वास्तव में वे पंख कुण्डलिनी के सहस्रार की तरफ जाने का इशारा करते हैं। वैसे भी जागरण के समय कुण्डलिनी फरफराहट के साथ व ऊपर की ओर भारी दबाव के साथ उड़ती हुई महसूस होती है। वह स्तम्भ नीचे की तरफ टेपर करता है। इसका अर्थ है कि ऊपर चढ़ते हुए कुण्डलिनी  अधिक शक्तिशाली होती जाती है।

अपने ही शरीर में दो लिपटे हुए नाग अपने ही शरीर के तंत्रिका तंत्र के सिम्पैथेटिक व पैरासिम्पैथेटिक भागों की संतुलित हिस्सेदारी को भी इंगित करते हैं

इड़ा को पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह ल्यूनर, शांत, पेसिव, व फैमिनाइन है। पिंगला नाड़ी को सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह सोलर, भड़कीला, एक्टिव, व मैस्कुलाइन है। जब दोनों सिस्टम बराबर मात्रा में आपस में मिले हुए होते हैं, तब जीवन में संतुलन व अद्वैत छा जाता है। वैसी स्थिति में भी कुण्डलिनी विकसित होने लगती है, क्योंकि हमने पहले भी कहा है कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी हमेशा ही रहती है। 

(केवल प्रतीकात्मक चित्र)
(केवल प्रतीकात्मक चित्र)

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कुण्डलिनी एक नाग की तरह

मित्रो, कुछ हफ्ते पहले मुझे एक प्राचीन नाग-मंदिर में सपरिवार जाने का मौक़ा मिला। वह काफी मशहूर है, और वहां पूरे श्रावण के महीने भर मेला लगता है। उस के गर्भगृह में मूर्तियों आदि के बारे में तो याद नहीं, पर वहां पर नाग का विशाल, रंगीन व दीवार पर पेंट किया गया चित्र दिल को छूने वाला था। वह शेषनाग की तरह था, जिस पर भगवान् नारायण शयन करते हैं। उसके बहुत से फण थे। मुझे वह कुछ जानी-पहचानी आकृति लग रही थी। वहां पर मेरी कुण्डलिनी भी तेजी से चमकने लगी, जिससे मुझे आनंद आने लगा। वह मुझे कुछ रहस्यात्मक पहेली लग रही थी, जिसे मेरा मन अनायास ही सुलझाने का प्रयास करने लगा।

नाग अन्धकार का प्रतीक  

मेरा पहला विश्लेषण यह था कि नारायण (भगवान) आम आदमी को अन्धकार स्वरूप दिखते हैं। माया के भ्रम के कारण उन्हें उनका प्रकाश नजर नहीं आता। इसीलिए अन्धकार के प्रतीक स्वारूप नाग को उनके साथ दिखाया गया है। फिर भी इस विश्लेषण से मैं पूरा संतुष्ट नहीं हुआ।

नाग कुण्डलिनी के प्रतीक के रूप में

मैं योगाइंडियाडॉटकोम की एक पोस्ट पढ़ रहा था। उसमें कुछ लिखा था, जिसका आशय मैंने यह समझा कि मूलाधार पर नाग साढे तीन चक्र/वलय लगाकर स्थित होता है। वह अपनी पूंछ को मुंह से दबा कर रखता है। जब कुण्डलिनी शक्ति उन वलयों से गुजारी जाती है, तब वह सीधा ऊपर उठकर मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक पहुँच जाता है। उसके साथ कुंडलिनी शक्ति भी होती है।

मैंने इससे निष्कर्ष निकाला कि हमारा नाड़ी तंत्र एक फण फैला कर उठे हुए नाग की तरह दिखता है, और उसी की तरह काम करता है। वैज्ञानिक तौर पर, नाड़ियों में संवेदना भी नाग की तरह लहरदार ढंग से ट्रेवल करती है। वज्र उस नाग की पूंछ है। उसे आधा वलय भी कह सकते हैं। अंडकोष वाला क्षेत्र पहला वलय/कुंडल है। उसके बाहर दूसरा घेरा मांस व तंतुओं का है। तीसरा घेरा हड्डी का है, जो मेरुदंड से जुड़ा होता है। जैसे ऊपर उठे हुए नाग की पीठ के निचले हिस्से में अन्दर की दिशा में एक बैंड/मोड़ होता है, वैसे ही हमारी पीठ के निचले हिस्से (नाभि के बिलकुल अपोजिट) में होता है। उसके बाद दोनों बाहर की ओर उभरते जाते हैं, और फिर दोनों में सिर का मोड़ आता है, जो लगभग एकसमान होता है। नाग के कई सिर इसलिए दिखाए गए हैं, क्योंकि हमारा सिर मेरुदंड से कई गुना चौड़ा व मोटा होता है, तुलनात्मक रूप से।

हमारा नाड़ी तंत्र एक नाग की तरह

रीढ़ की हड्डी के अन्दर नाड़ी को भी हम नाग की तरह अनुभव कर सकते हैं। दोनों में समानता मिलेगी। नाड़ियाँ भी  नाग की तरह या रस्सी की  तरह ही होती हैं। वज्र की नाड़ी को नाग की पूंछ समझो। वाही आधा चक्र भी हुई। स्वाधिष्ठान चक्र का सम्वेदना क्षेत्र (जहाँ कुण्डलिनी का ध्यान होता है) नाग का पहला चक्र/कुंडल/घेरा है। आसपास के क्षेत्र की नाड़ियाँ भी वहां जुड़ती हैं, वही नाग का पहला घेरा है। दूसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ वह नाड़ी सैक्रल प्लेक्सस/नाड़ियों के जाल से जुड़ती है। तीसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ सैक्रल प्लेक्सस स्पाईनल कोर्ड से मिलती है। वहां पर वह नाग/स्पाईनल कोर्ड ऊपर को खड़ा हो जाता है, और मोटा भी हो जाता है। पीठ के लम्बर क्षेत्र में उसमें पेट की तरफ गड्ढे वाला एक मोड़ आता है। अगला मोड़ ऊपर आता है, सिर के नजदीक। सिर के अन्दर का नाड़ी-पुंज उस सांप के अनेक फण हैं, जो कि स्पाईनल कोर्ड/नाग-शरीर से जुड़े होते हैं।

हमारे शरीर के कुण्डलिनी चक्र भगवान शेषनाग के शरीर के मुख्य बिंदु

इतना गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। सीधी सी बात है कि पूरा सैक्रल/सेक्सुअल एरिया नाग के चौड़ की तरह मोटा, गोलाकार व परतदार होता है। इसकी सारी संवेदना वज्र/पूंछ की संवेदना के साथ मिलकर ऊपर चली जाती है। जो नाग के मुख्य उभार बिंदु हैं, वे ही शरीर के सात चक्र हैं। वहीँ पर ध्यान के दौरान कुण्डलिनी ज्यादा चमकती रहती है। मूलाधार चक्र पर वज्र की शिखा जुड़ी होती है। आगे के स्वाधिष्ठान चक्र (वज्र के मूल) पर नाग की पूंछ (वज्र) कुंडलाकार रूप में गुथे हुए नाग के उस मुख्य शरीर से जुड़ी होती है, जो जमीन पर होता है। पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र पर नाग के ऊपर उठने से लगभग 90 डिग्री का कोण बनता है। पीछे के नाभि चक्र पर नाग के शरीर के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। पीछे के अनाहत चक्र पर नाग के शरीर में उभार आता है। पीछे के विशुद्धि चक्र में नाग के फण के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। उसके ऊपर पीछे के आज्ञा चक्र पर फिर से नाग के सिर/फण का उभार आता है। इसके ऊपर पूरा मस्तिष्क/ मस्तिष्क का सबसे ऊपरी स्थान जहाँ एक कुण्डलिनी संवेदना होती है (सिर के ऊपरी सतह के सबसे आगे वाले व सबसे पीछे वाले भाग के बीचोंबीच; यहाँ एक गड्ढा जैसा महसूस होता है, इसीलिए इसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं) नाग के एक हजार फणों के रूप में होता है। तभी तो उसे सहस्रार (एक हजार भाग वाला) कहते हैं। बीच वाले मुख्य फण पर कुण्डलिनी विद्यमान होती है।

ध्यान के दौरान नाग के साथ कुण्डलिनी-अनुभव

इसी ऊहापोह में मैं एक दिन तांत्रिक  विधि से ध्यान कर रहा था। मैं उपरोक्त तरीकों से नाग का ध्यान करने लगा। मुझे उसकी पूंछ/वज्र-शिखा पर कुंडलिनी उभरती हुई और सांप की तरह सरसराहट के साथ उसके फण/मेरे मस्तिष्क तक जाते हुए महसूस होने लगी। मस्तिष्क में वह काफी तेज, शांत व भगवान नारायण की तरह थी। ऐसा लगा कि जैसे भगवान नारायण ही कुंडलिनी के रूप में शेषनाग के ऊपर विलास कर रहे थे। साथ में मुझे उपरोक्त नाग-मंदिर के जैसी अनुभूति मिली। फिर मैं अध्यात्म में नाग के महत्त्व को समझ सका।

नाग का पूजन

लगभग सभी धर्मों में नाग को पवित्र व पूज्य माना जाता है। नारायण नाग पर शयन करते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर भी नाग विराजमान है। कई धर्मों में दो नाग आपस में लिपटे हुए दिखाए गए हैं। वे संभवतः यब-युम आसन में बंधे हुए दो तांत्रिक जोड़ीदार हैं।

नाग कुण्डलिनी नहीं है

मैंने कुंडलिनी को नाग के रूप में सुन रखा था। पर वह नाग नहीं है। वह नाग के शरीर/तंत्रिका तंत्र/नर्वस सिस्टम पर नाग की तरह चलती है। वैसे ही, जैसे विष्णु भगवान् नाग नहीं हैं, पर वे नाग के ऊपर विहार करते हैं।

नाग कुण्डलिनी को अतीरिक्त बल देता है

जरूरी नहीं कि कुण्डलिनी जागरण नाग के ध्यान से ही हो। प्रेमयोगी वज्र ने  तो नाग का ध्यान नहीं किया था। उसने एकबार कुण्डलिनी को अपने शरीर के अन्दर सीधा ऊपर उठते हुए अनुभव किया था, जैसे एक हैलीकोप्टर हवा में सीधा ऊपर उठता है। नाग के ध्यान से तो केवल उसे उठने के लिए अतिरिक्त बल ही मिलता है। इसीलिए तो अधिकांश बड़े देवी-देवताओं के साथ नाग दिखाया गया होता है।

शेषनाग के सिर पर पृथ्वी

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि शेषनाग/मल्टी हूडिड सर्पेंट ने अपने सिर पर सारी धरती को धारण किया हुआ है। वास्तव में यह शेषनाग हमारा अपना उपरोक्त तंत्रिका तंत्र ही है। सारी धरती हमारे इसी तंत्रिका तंत्र/मस्तिष्क में अनुभव के रूप में ही है। वास्तव में स्थूल और बाहर तो कुछ भी नहीं है। यही अंतिम वाक्य अध्यात्म का मूल मन्त्र है।

संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी का आरोपण

हरेक शारीरिक संवेदना नाड़ी से होकर मस्तिष्क को जाती है। जब उस पर कुण्डलिनी/एक विशेष मानसिक चित्र का आरोपण किया जाता है, तब वह भी उसके साथ मस्तिष्क में पहुँच जाती है। शरीर की सर्वाधिक तीव्र व आनंदप्रद संवेदना वज्र-शिखा की है। इसलिए उसपर आरोपित कुण्डलिनी मस्तिष्क में जीवंत हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में शयन करती है। वास्तव में मूलाधार चक्र में वज्र-शिखा को ही दर्शाया गया है, दोनों एक काल्पनिक रेखा से जुड़ते हुए। उसे ही नाग की पूंछ कहते हैं। आम आदमी में वहां पर कुण्डलिनी सोई हुई होती है। इसका अर्थ है कि वहां पर कुण्डलिनी जागृत नहीं हो सकती। जागरण के लिए उसे मस्तिष्क में ले जाना पड़ता है। नाग ने अपनी पूंछ को मुंह में दबाया होता है। इसका अर्थ है कि कुण्डलिनी वज्र से शुरू होकर वीर्यपात के रूप में वज्र पर ही वापिस आ जाती है, और वहां से बाहर बर्बाद हो जाती है। अपने कुंडल खोलकर नाग के सीधे खड़े होने का मतलब है कि कुण्डलिनी को सीधी दिशा में वज्र शिखा से मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक ले जाया जाता है, बार-2 सैक्सुअल क्षेत्र में घुमाया नहीं जाता। ऐसी भावना की जा सकती है कि पूरे यौन क्षेत्र (जो एक फण उठाए हुए बड़े नाग के जमीनी ढेर/घड़े जैसी आकृति का है) में चारों तरफ से डूबी/सरोबार कुण्डलिनी उससे शक्ति लेकर सीधी ऊपर फण तक चली जाती है। फण/मस्तिष्क पर कुण्डलिनी को मजबूत किया जाता है, और उसे वीर्यपात के रूप में वज्र तक वापिस नहीं उतारा जाता। हालांकि, कुंडलिनी को धीरे-धीरे सामने/आगे के चक्रों के माध्यम से नीचे ले जाया जा सकता है, जिससे वे मजबूत हो जाते हैं। संस्कृत शब्द कुण्डलिनी का अर्थ है, कुंडल/कोइल वाली। अर्थात एक मानसिक आकृति जो कुंडल/नाग पर विराजमान है।

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कुण्डलिनी से यौन-हिंसा पर रोकथाम

यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगववान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम बलात्कार पीड़िताओं के साथ सम्वेदना प्रकट करते हैं।

आजकल हर जगह यौन हिंसा की ख़बरें सुनने को मिल रही हैं। यह पूरी दुनिया में हो रहा है। कोई भी क्षेत्र इस मामले में अपवाद नहीं है। अभी हाल ही में हैदराबाद में घटित डा० प्रियंका रेड्डी यौन हत्याकांड इसका सबसे ताजा उदाहरण है। दूसरा ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के उन्नाव का है, जहां एक बलात्कार से पीड़ित बाला को ज़िंदा जलाया गया। आओ, हम इन मामलों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व तांत्रिक पहलुओं के सम्बन्ध में विचार करते हैं।

यौन हिंसा के मुख्य कारण

यौनहिंसा का मुख्य कारण सार्वजनिक स्थानों पर परोसी जाने वाली, अश्लीलता, भौंडेपन, व्यभिचार एवं पोर्न से भरी हुई ऑडियोविजुअल सामग्रियां हैं। हालांकि, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये यौन-अनुशासित और तांत्रिक व्यक्ति को शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से नुकसान पहुंचाने के बजाय लाभ पहुंचा सकती हैं। इसलिए, इस मामले में मानसिक दृष्टिकोण का प्रकार अधिक महत्वपूर्ण कारक है।

यौन हिंसा का दूसरा मुख्य कारण समाज में समुचित यौन शिक्षा का अभाव है। कई जगह जो यौन शिक्षा दी जाती है, वह तंत्र के अनुसार नहीं होती, इसलिए वह पूरी तरह से कारगर नहीं हो पाती। वास्तविक यौन शिक्षा तो तांत्रिक यौन शिक्षा ही है। तंत्र ही यौनाचार का विज्ञान है। आजकल जब भौतिक यौन शिक्षा को हर जगह फैलाया जा रहा है, तब भी यौन हिंसा बढ़ने की क्या वजह है? इसकी वजह यही है कि उसमें तंत्र की आध्यात्मिकता को शामिल नहीं किया जा रहा है। भौतिक यौन शिक्षा तो कई बार लाभ की बजाय हानि भी पहुंचाती है, तथा वास्तविक यौन सुख से भी वंचित रखती है। यह तांत्रिक यौन शिक्षा ही है, जो वास्तविक यौन सुख को उपलब्ध करवाते हुए आदमी को शारीरिक, मानसिक, व आध्यात्मिक रूप से भी उन्नत करती है।

यौन हिंसा का तीसरा मुख्य कारण समाज में बढ़ती अव्यवस्था, व बेरोजगारी है। इससे असुरक्षा की भावना बढ़ती है, जो यौन हिंसा को जन्म देती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। जिस आदमी के पास काम और आमदनी नहीं होते, उसे ऊटपटांग ही सूझता है।

यौन हिंसा का चौथा कारण वास्तविक आध्यात्मिकता की कमी है। आध्यात्मिकता खाली दिमाग को भी नियंत्रण में रखती है। तभी तो खाली बैठे हुए जोगी-फकीर कभी गलत काम नहीं करते।

यौन हिंसा का पांचवां प्रमुख कारण न्यायिक कारण है। न्याय प्रणाली भी अपने तरीके से सही काम कर रही है। यद्यपि यह अपराधी मानसिकता के मन में पर्याप्त डर या शर्म पैदा नहीं कर पा रही है। अपराध या तो डर से रुकते हैं, या शर्म से। इसमें शर्म पैदा करने वाला तरीका ज्यादा मानवतापूर्ण है। एक कटु सत्य यह भी है कि ज्यादातर मामलों में अपराधी सजा के भय से ही बलात्कार-पीड़िता की ह्त्या करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा सबूत मिटाए जा सके। यह भी यह भी सच्चाई है कि अधिकांशतः तेज दिमाग वाले लोग ही अपराधी बनते हैं। यदि ऐसे लोगों को समुचित दिशा-निर्देशन मिलता रहे, तो वे अपराध की बजाय समाज के अन्य बहुत से महत्त्वपूर्ण काम कर सकते हैं।

तांत्रिक आचार को अपनाने से यौन हिंसा पर रोकथाम

बेशक तंत्र बाहर से देखने पर यौन-सनकी शास्त्र की तरह लगता हो, परन्तु ऐसा नहीं है। तंत्र पोर्न या बलात्कार के बिलकुल विपरीत है। इसमें यौन साथी को पूर्णतः अपने समान समझ कर उससे प्रेम किया जाता है। इसमें परस्पर रजामंदी होती है। इसमें यौन-स्वास्थ्य व यौन अनुशासन पर बहुत ध्यान दिया जाता है। सच्चाई तो यह है कि अनुशासित तंत्र के सामने तो सर्वसाधारण व पारिवारिक प्रणय सम्बन्ध भी बलात्कार की तरह प्रतीत होते हैं। तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी को यौन साथी नहीं बनाया जाता। इससे किसी की भावनात्मक संपत्ति को नुक्सान नहीं पहुंचता। तंत्र में बहुत लम्बे समय तक यौन साथी के साथ अन्तरंग सम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। उसे कई वर्षों तक बदला नहीं जा सकता। उसे मझधार में भी नहीं छोड़ा जा सकता। इससे भी बलात्कार जैसे क्षणिक वासना पूर्ति के कामों पर रोक लगती है। तंत्र में एकपत्नीव्रत को सर्वश्रेष्ठ आचार माना गया है, तथा पत्नी को ही सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक साथी माना गया है। भगवान शिव-पार्वती की जोड़ी इसका अच्छा उदाहरण है।

कुण्डलिनी शक्ति के बहिर्गमन को रोकने से यौन हिंसा की रोकथाम

वैसे तो जितना संभव हो सके, तांत्रिक विधि से वीर्यपात को रोककर उसकी शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति में रूपांतरित कर देना चाहिए। फिर भी मासिक चक्र के गर्भाधान से सुरक्षित काल (मासिक चक्र के प्रथम 7 और अंतिम 7 दिन, यद्यपि कोई भी समय शत-प्रतिशत सुरक्षित नहीं हो सकता है) में किए गए वीर्यपात के बाद सम्भोग बंद नहीं करना चाहिए, बल्कि वीर्य-रक्षण के साथ जारी रखना चाहिए। वीर्यपात से शक्ति बहिर्मुख होकर नष्ट हो जाती है। इससे यौन साथी के प्रति द्वेष पैदा होता है, जो यौन हिंसा में बदल सकता है। इससे एक प्रकार से शक्ति का मुंह बाहर की तरफ खुल जाता है, और लम्बे समय तक वैसा ही बना रहता है। कुछ दिनों के बाद जब बाहर की और शक्ति (नागिन) का मुंह बंद हो जाता है, तब आदत से मजबूर मूढ़ मनुष्य फिर से वीर्यपात करके उसे खोल देता है। इससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति निरंतर बाहर की और बर्बाद होती रहती है। उससे आदमी बाहरी दुनिया की मोहमाया में बुरी तरह से फँस जाता है, और उसके अन्दर बहुत से दुर्गुण पैदा हो जाते हैं। उस शक्ति को जितना हो सके, वीर्यपात के बाद उतना शीघ्र ऊपर (मस्तिष्क) की ओर चढ़ा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि एक बार भी वीर्य के संरक्षण और उसके ऊर्ध्व-चालन के साथ किया गया तांत्रिक यौनयोग बहुत सुन्दर फल देता है, बेशक उसके बाद लम्बे समय तक सेक्स न किया जाए। उससे शक्ति की बहिर्मुखता (नागिन का मुंह नीचे की ओर होना) से उत्पन्न नकारात्मकता एकदम से यू टर्न लेकर ऊर्ध्वमुखता (नागिन का मुंह ऊपर की तरफ उठना) से उत्पन्न सकारात्मकता का रूप ले लेती है। इससे यौन साथी से भी प्रेम बढ़ता है, जिससे यौन हिंसा पर लगाम लगती है। जैसे-२ वीर्य बढ़ता जाता है, वैसे-२ ही मस्तिष्क में कुण्डलिनी शक्ति का स्तर भी बढ़ता जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमने यौन योग से वीर्य की शक्ति को मस्तिष्क की ओर जाने के लिए निर्दिष्ट किया होता है। उसके साथ कुण्डलिनी स्वयं ही मस्तिष्क की तरफ विकास करती है, क्योंकि यौन योग से हमने कुण्डलिनी को उस वीर्य-शक्ति के ऊपर आरोपित किया होता है।

कुण्डलिनी योग से यौन हिंसा पर लगाम

यह मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से सत्य है कि प्रत्येक जीव अपनी कुण्डलिनी के विकास के लिए ही यौन सम्बन्ध बनाता है। महान तंत्र गुरु ओशो ने भी यह बात कही है कि सम्भोग से समाधि की प्राप्ति सबसे आसान व व्यावहारिक है। समाधि का अर्थ यहाँ निरंतर का कुण्डलिनी-ध्यान या कुण्डलिनी-जागरण ही है। इस परिपेक्ष्य से, यदि कुण्डलिनी के विकास के लिए कुण्डलिनी-योग की सहायता ली जाए, तो सम्भोग की आवश्यकता ही न पड़े। इसी वजह से तो ऋषि-मुनि व महान योगीजन आजीवन विवाह के बिना ही पूर्ण संतुष्ट जीवन जी पाते थे।

इतिहास गवाह है कि जब से भारत की वैदिक संस्कृति का अन्य संस्कृतियों के द्वारा अतिक्रमण हुआ है, तभी से यौन-हिंसा के मामले बढ़े हैं, और वीभत्स हुए हैं। इसलिए यौन-हिंसा से बचने के लिए कुण्डलिनी योग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

तांत्रिक यौन-शिक्षा को सर्वसुलभ करवाने वाली निम्नलिखित पुस्तकें अनुमोदित की जाती हैं

1) शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

2) कुण्डलिनी रहस्योद्घाटित- प्रेमयोगी वज्र क्या कहता है

3) कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान     

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शिव-अराधना से सर्वधर्मसमभाव- Love and brotherhood between all religions through Shiva-worship

पावन शिवरात्रि के अवसर पर सभी मित्रों को बहुत-२ शुभकामनाएं। (please browse down or click here to view this post in English)

आशुतोष शंकर बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि उनके द्वारा उपदिष्ट तंत्र-साधना अतिशीघ्र मुक्ति प्रदान करती है। तंत्रसाधना हमारे दैनिक जीवन की गतिविधियों को आध्यात्मिक रूप देकर ही बनी है। उदाहरण के लिए निपुण तंत्रयोगियों का शरीर स्वयं ही मुड़ता, सिकुड़ता, फैलता व ऊपर की ओर उठता हुआ सा रहता है। ऐसा कुण्डलिनी को चक्रों पर स्थापित करने के लिए स्वयं ही होता रहता है। जब थकान होती है या कन्फ्यूजन होता है, तब भी ऐसा होता है, जिससे कुण्डलिनी मस्तिष्क-चक्र पर स्वयं ही प्रतिष्ठित हो जाती है। उससे एकदम चैन के साथ एक लम्बी सांस शरीर के अन्दर स्वयं ही प्रविष्ट होती है। नींद आने पर या बोरियत होने पर शरीर के उठने जैसे (अंगड़ाई) के साथ जम्हाई आने के पीछे भी यही रहस्य छिपा हुआ है।

शिव की मूर्ति मानवाकार होती है। इसका अर्थ है कि उस मूर्ति के अन्दर की कोशिकाएं (देहपुरुष) भी वैसी ही होती हैं, जैसी हमारे अपने शरीर के अन्दर की। इसका अर्थ है कि शिवमूर्ति की पूजा के समय हम उसमें स्थित देहपुरुष की ही पूजा कर रहे होते हैं। उस अद्वैतस्वरूप देहपुरुष को हमने अपनी मानसिक कुण्डलिनी का रूप दिया होता है। सीधा सा अर्थ है कि शिव-पूजन से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है। कुण्डलिनी-रूपी मानसिक चित्र किसी की व्यक्तिगत रुचि के अनुसार शिव का रूप लिए हुए भी हो सकता है, गुरु का रूप लिए भी हो सकता है, या प्रेमी / प्रेमिका का रूप लिए भी हो सकता है। कई बार तो कुण्डलिनी-चित्र शिव के जैसी वेशभूषा में भी अनुभव होता है, जैसे की बैल पर सवार, गले में सर्प की माला के साथ व डमरू के साथ, एक औघड़ तांत्रिक की तरह आदि-2। ऐसा शिव-पूजन के प्रभाव से होता है।

भगवान शिव दुनिया के सभी लोगों व धर्मों के आराध्य हैं। शिव-पूजन से दुनिया में सर्वधर्मसमभाव स्थापित हो सकता है। इससे धार्मिक उन्माद, कट्टरपंथ, व आतंकवाद पर रोक लग सकती है। सभी धर्म व दर्शन शिव से ही निकले हैं। इसका प्रमाण है कि भगवान शिव खान-पान के मामले में, पूजा के विधि-विधान के मामले में किसी से भेदभाव नहीं करते। उन्हें भूत-प्रेतों जैसे लोग भी उतने ही प्रिय हैं, जितने देवता जैसे लोग। वे सभी को प्रेम से व समान भाव से स्वीकार करते हैं, चाहे कोई किसी भी धर्म आदि का क्यों न हो। उनके द्वारा प्रदत्त तांत्रिक-साधना से यह स्पष्ट हो जाता है। शिवप्रदत्त तांत्रिक साधना ही सर्वाधिक वैज्ञानिक, प्रासंगिक, आधुनिक, सामाजिक, कर्मठतापूर्ण व मानवतापूर्ण है।

शिव-शक्ति अवधारणा सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में मानी जाती है। जो सत्य है, वह शिव है। वही पूर्ण है। उसमें सभी भाव-अभाव हैं। उसमें स्त्रीभाव व पुरुषभाव, दोनों एकसाथ विद्यमान हैं। एक प्रकार से शिव का स्वरूप मनुष्य के उस रूप के करीब है, जिसमें वह समाधि में स्थित रहता है। यह सभी जानते हैं कि सर्वाधिक मजबूत समाधि तांत्रिक यौनसंबंध के साथ ही लगती है। अतः एक ही भगवान शिव को शिव-पार्वती के रूप में काल्पनिक रूप से विभक्त किया गया है, ताकि समझने में आसानी हो। वास्तव में शिव-पार्वती सदैव एकाकार ही हैं, इससे यह भी कल्पित हो जाता है कि शिव-पार्वती सदैव पूर्णरूप से तांत्रिक-साधना में लीन रहते हैं। शिवलिंग इस साधना का प्रतीक है।

रशिया में भी इसी तरह की एक लोककथा प्रचलित है कि आदमी कभी पूर्ण हुआ करता था। उससे देवताओं का राजा डर गया और उसने आदमी को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्सा पुरुष बना, और एक हिस्सा स्त्री बना। तभी से लेकर दोनों हिस्से एकाकार होने के लिए व्याकुल होते रहते हैं, ताकि पुनः पूर्ण होकर देवताओं पर राज कर सकें।

कई लोगों को शंका हो सकती है कि शिव तो हमेशा ही तांत्रिक साधना में लीन रहते हैं, फिर उन्हें कामारि, यह नाम क्यों दिया गया है? वास्तव में, एक तांत्रिक ही यौन-दुर्भावना को जीत सकता है। यौनता से दूर भागने वाला आदमी यौन-दुर्भावना को नहीं जीत सकता। उसके अन्दर यौनता के प्रति इच्छा बहुत बलवान होती है, बेशक वह बाहर से उससे अछूता होने का दिखावा करता रहे। काम को वही जीत सकता है, जो काम के रहस्य को समझता हो। काम के रहस्य को एक सच्चे तांत्रिक से अधिक कोई नहीं समझ सकता।

भगवान शिव को भूतनाथ भी इसीलिए कहते हैं, क्योंकि वह उन तांत्रिकों का नाथ भी होता है, जो बाहर के आचारों-विचारों से भूत-प्रेत की तरह ही प्रतीत होते हैं। यद्यपि अन्दर से वे शिव की तरह ही पूर्ण होते हैं।

भगवान शिव को भोला इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह अपनी नित्य तांत्रिक-साधना के बल से पूर्ण अद्वैत-भाव में स्थित रहते हैं। अर्थात वे एक बच्चे की तरह होते हैं। उनके लिए काष्ठ, लोष्ठ व स्वर्ण आदि सब कुछ एकसमान है। यद्यपि वे जीवन-व्यवहार के लिए ही बाहर से भेदभाव का प्रदर्शन करते हैं, अन्दर से नहीं।

मुझे एक बार भगवान स्शिव स्वप्न में दिखे थे। वे एक ऊंचे चबूतरे जैसी जगह पर बैठे हुए थे। वे कुछ गंभीर यद्यपि शांत लग रहे थे, एक औघड़ व अर्धवृद्ध तांत्रिक की तरह। साथ में वे मस्त-मौले जैसे भी लग रहे थे। फिर भी, उनका पहरावा शिव के जैसा लग रहा था। उनके चारों तरफ बहुत से भूत-प्रेत धूम-धड़ाके व जोर के हो-हल्ले के साथ नाच-गा रहे थे। वह आवाज जोर की व स्पष्ट थी। वह विशेष, रोमांचकारी, व संगीतमयी आवाज (खासकर ढोल की डिगडिगाहट) मुझे आजतक कुछ याद सी आ जाती है। उन भूत-प्रेतों से तनिक भी डर नहीं लग रहा था, अपितु बहुत आनंद आ रहा था। ऐसा लगा कि मेरे कुछ जानने में आने वाले व दिवंगत लोग भी उस भूत-प्रेतों के टोले में शामिल हो गए थे। उस स्वापनिक घटना से मेरी कुण्डलिनी को बहुत शक्ति मिली, और उसके लगभग डेढ़ से दो वर्षों के बाद वह जागृत भी हो गई।

इसी तरह, लगभग 30 वर्ष पूर्व मैं अपने चाचा की बरात के साथ जा रहा था। एक बड़े पहाड़ के नीचे से गुजरते हुए मुझे भगवान शिव एक अर्धवृद्ध के रूप में शांति से एक बड़ी सी चट्टान पर पालथी लगा कर बैठे हुए दिखे। वहां पर लोग फूल-पत्ते चढ़ा रहे थे, क्योंकि उसके थोड़ा ऊपर व पेड़ों के पीछे एक शिव-पार्वती का मंदिर था, जो वहां से दिखाई नहीं देता था। मैंने भी पत्ते चढ़ाए, तो मुझे उन्होंने प्रसाद के रूप में कुछ दिया, शायद चावल के कुछ दाने थे, या वहीँ से कुछ पत्ते उठाकर दे दिए थे। मुझे पूरी तरह से याद नहीं है। वे मुस्कुराते हुए, कुछ गंभीर जैसे, साधारण वेशभूषा में, व एक औघड़-गुरु के जैसे लग रहे थे। फिर भी वे एक साधारण मनुष्य ही लग रहे थे। तभी तो शायद मैंने उनसे बात नहीं की। वैसे भी, तंग पगडंडी पर लोगों की लम्बी पंक्ति में जल्दी-२ चलते हुए बात करने का समय ही नहीं था।

भगवान शिव की महिमा का कोई अंत नहीं है, पर निष्कर्ष के रूप में यही कह सकते हैं, शिव है तो सब कुछ है; शिव नहीं है तो कुछ नहीं है।

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Best wishes to all friends on the occasion of holy Shivratri.

Ashutosh Shankar becomes happy very easily. It means that the tantra-oriented technique provided by him gives liberation very quickly. The tantric techniques are made of the simple activities of our daily lives by giving those a spiritual shape. For example, the body of skilled tantric turns, shrinks, spreads and remains rising upward (tucking) itself. Such happen for kundalini to be installed on the chakras itself. When there is fatigue or confusion, this happens, due to which the Kundalini becomes distinguished itself on the cerebral chakra. With this, a long breath is drawn inside the body itself with a sudden relief. This secret is hidden behind the yawning with the body’s rise (body tucking up), when it comes to relieve of sleep or boredom.

Shiva’s idol is a human-form. It means that the cells (dehpurush) inside the body of that idol are also similar, as those in the inside of our own body. It means that while worshiping Shiva-idol, we are worshiping the non-dual dehpurush inside it. We have given the form of our mental Kundalini to that  dehpurush having non-dual attitude. It means straightforward that the Kundalini becomes strong even from Shiva-worship. Kundalini (mental image) can be having a form of Shiva according to somebody’s personal interest, can also be the form of a guru, or the form of boyfriend / girlfriend too. Many times, Kundalini-image is also experienced in Shiva-like costumes, such as one riding a bull, with a snake’s necklace and with a damroo (special drum), like a soft tantric etc. This happens with the influence of Shiva-Pooja (worship).

Lord Shiva is adorable of all people and religions of the world. Shiva-poojan can establish universal harmony in the world. It can prevent religious mania, fundamentalism, and terrorism. All religions and philosophies have come from Shiva. Its proof is that Lord Shiva does not discriminate against anyone in the case of eating-drinking and in the case of law and order of worship. He loves the people who are like the ghosts just equal to those people who are like God. He accepts all with love and with the same emotion, no matter how religious one is or what type the religion one has. It is clear from the tantric-sadhana given by him. Shiva-provided Tantric Sadhana is the most scientific, relevant, modern, social, productive, and humanistic.

Shiva-Shakti concept is considered in some form in all religions. That which is truth that is Shiva. That is the whole thing. There are all emotions in it. In it, both femininity and maleness are present together. In a sense, the nature of Shiva is close to that form of man, in which he lives in Samadhi. All of us know that the strongest Samadhi (meditation) seems to be accompanied by tantric sexual intercourse. Therefore, the only Lord Shiva has been conceptually divisible in the form of Shiva-Parvati that is easy to understand. In fact, Shiva-Parvati is always united as one, but it is also assumed that Shiva-Parvati are always completely absorbed in tantric-sadhana. Shiva lingam is a symbol of this sadhana.

In Russia, a similar folktale is prevalent that a man used to be perfect. From him the king of the gods was scared and he divided the man into two halves. One part is made of man, and one part becomes a woman. From then on, both sides are anxious to be united, so that they can rule over the gods once they are completed again.

Many people may doubt that Shiva is always absorbed in Tantric meditation, then why he has been given this name as kamari? In fact, only a tantric can conquer sex-malice. A man escaping sexuality cannot win sexually ill thought. His desire for sex in him is very strong, of course, he pretends to be untouched from the outside. Only one can win the sexuality, who understands its secret. Nobody can understand the secret of sexuality more than a true tantric.

Bhootnath (lord of ghosts) is also a name given to Lord Shiva, because he is also the master of those tantrics, who seem to be like ghosts from outside. Although from inside they are fulfilled just like Shiva.

Lord Shiva is also called as Bhola (innocent), because he is situated in full Advaita Bhava (non-dual attitude) with the force of his daily Tantric-Sadhana. That is, he is like a child. For him wood, lumber, and gold etc. everything is the same. Although he demonstrates discrimination from outside to live a mundane life-style, not having it inwardly.

I once saw Lord Shiva in my dream. He was sitting at a place like a table-type rock. He looked somewhat quiet though, like a soft, and semi-old Tantric. Together he seemed like a mast man (easy going). Even so, his dress looked like Shiva. Around him, many of the ghosts were dancing, singing with loud, and mast sound. That voice was loud and clear. That particular exhilarating musical voice (especially low pitch beats of the drum) makes me remember that a little today. I was not feeling frightened at all from those ghosts, but I was feeling very happy and a bliss. It seemed that the people who came to know me and were the departed ones also joined the group of those ghosts. My Kundalini got very much power from that automatic incident, and after about one and half a year to two years, she became awakened too.

Likewise, about 30 years ago, I was going with my uncle’s marriage procession. Passing under a big mountain, I saw Lord Shiva sitting in squatting posture in peace on a big rock in the form of a half-old man. There people were offering flowers and leaves, because there was a Shiva-Parvati temple behind the trees and a little above that place, which was not visible from there. I also offered him the leaves, then he gave me something in the form of a gift maybe that was in the form of some grains of rice or he picked up some leaves. I do not remember completely. He was smiling, looking like something serious, in ordinary costumes, and like a softhearted guru. Yet he seemed to be an ordinary man. Then maybe I did not talk to him. Anyway, there was no time to talk about while moving in the long line of people on the tight footpath for early running.

There is no end to the glory of Lord Shiva, but in the form of conclusions it can be said, Shiva is everything; if there is no Shiva, then there is nothing.

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