कुंडलिनी उच्च रक्तचाप के खिलाफ- तनाव को रोकने और उसे दूर करने के लिए एक रहस्यमय कुंजी; भोजन योग

शरीर में कुंडलिनी प्रवाह के लिए दो प्रमुख चैनल्स होते हैं। एक शरीर के आगे के भाग में है। दूसरा शरीर के पिछले भाग में है। दोनों शरीर के बीचोंबीच गुजरकर शरीर को दो बराबर व सिमेट्रिक जैसे भागों में बांटती हुई नजर आती हैं। एक हिस्सा बायां भाग (स्त्री या यिन) है, और दूसरा दायाँ(पुरुष या यांग) है। इसीसे अर्धनारीश्वर भगवान की अवधारणा हुई है। उस शिव भगवान का बायां भाग स्त्री रूप व दायाँ भाग पुरुष रूप दिखाया गया है। दोनों चैनल्स सभी चक्रों को बीचोंबीच काटते हैं। दोनों सभी चक्रों पर आपस में जुड़े हैं, जिससे बहुत से लूप बनते हैं। सबसे बड़ा लूप तब बनता है जब दोनों चैनल्स मूलाधार और मस्तिष्क चक्र पर आपस में जुड़े होते हैं। वह लूप सभी चक्रों को कवर करता है। कुण्डलिनी लूप पर भ्रमण करती है। और भी बहुत सी नाड़ियाँ इन दो मुख्य चैनल्स से निकलती हैं, जो पूरे शरीर में फैली हुई हैं। हठयोग व ताओवाद में इनका विस्तार से वर्णन है।

शरीर के आगे के भाग का चैनेल

मतिष्क प्यार का उत्पादक और दिल प्यार का एम्पलीफायर

प्यार मस्तिष्क में पैदा होता है। वह खाना खाते समय दिल तक उतर जाता है। तभी तो कहा जाता है कि साथ मिलकर खाने से प्यार बढ़ता है। यह भी कहा जाता है कि दिमाग का रास्ता पेट से होकर गुजरता है। जब स्कूल के दिनों में मेरे दोस्त मेरी काल्पनिक गर्लफ्रैंड का टिफिन दिखाकर मुझे मजाक में खाना खाने के लिए तैयार होने के लिए कहते थे, तब मुझे प्यार की बड़ी तेज व आनन्दमयी अनुभूति होती थी। आनंद तो दिल में ही पैदा होता है, दिमाग में तो बोझ महसूस होता है। कुंडलिनी जागरण व आत्मज्ञान भी तभी होता है जब दिल दिमाग से जुड़ता है। केवल दिमाग में कुंडलिनी जागरण नहीं बल्कि पागलपन ही पैदा हो सकता है। इसीलिए जीभ को तालु से छुआकर कुण्डलिनी को दिमाग से उतारकर दिल तक लाने के लिए कहा जाता है। बेशक उसे दिल से ही लूप बनाकर दिमाग तक ऊपर नीचे घुमाया जाता रहे। इससे दिल और दिमाग आपस में जुड़ जाते हैं। तभी तो कहते हैं कि उसके हुस्न का नशा मेरे दिलोदिमाग पर छा गया, मतलब कि बहुत मजा आया।  

कुंडलिनी भोजन के साथ मुंह से नीचे उतरती है

सीधा सा मतलब है कि टिफिन के खयाल से मेरे मुंह के रस के साथ मेरी कुंडलिनी मेरे दिल तक उतर जाती थी। वह रस या भोजन के कण एक कंडक्टर ज्वाइंट-ग्रीस की तरह दोनों जबड़ों को जोड़ देते थे। उससे होकर कुंडलिनी दिल तक उतरती थी और आनंद व प्यार पैदा करती थी। वहां से कुंडलिनी नाभि चक्र तक उतरती थी, जो वहां खाना पचाकर मुझे शक्ति का एहसास देती थी। तभी तो कहते कि नाभि में गट्स होता है। मैं तो पानी घूंट से मुंह को पूरा भरकर मस्तिष्क व शरीर के बीच बने सबसे मजबूत जोड़ को अनुभव करता हूँ, और वह पानी की घूंट मुझे अमृत के समान लगती है।

भरपेट खाना खाने के बाद यौनसंबंध या सैक्स बनाने की इच्छा

अक्सर देखा जाता है कि ज्यादा खाना खा लेने के बाद सैक्स के लिए मन करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आगे वाले चैनेल से होती हुई कुंडलिनी नाभि चक्र से स्वाधिष्ठान चक्र तक उतर जाती है। कुंडलिनी वहीँ से पीछे मुड़कर ऊपर चढ़ जाती है। मूलाधार तो शरीर को बीचोंबीच विभाजित करने के लिए रखा गया है, ताकि कुंडलिनी चैनेल शरीर के बीचोंबीच सीधी रेखा में खुले। इसीलिए इसका ध्यान भी जरूरी है। हालांकि यह कुंडलिनी को पीछे से ऊपर मोड़ने का काम भी करता है। यह चक्र मलोत्सर्ग से भी जुड़ा है। तभी तो सेक्स के बाद हाजत की अनुभूति होती है और पेट साफ हो जाता है। वास्तव में कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र से नीचे उतरकर मूलाधार चक्र पर आ जाती है। दूसरे तरीके से, यदि मूलाधार पर वज्र शिखा का ध्यान किया जाए जो कि वास्तविकता है, तब दोनों सेक्सुअल चक्रों का ध्यान एक साथ हो जाता है और कुंडलिनी भी अच्छी तरह से पीछे मुड़ती है। कई लोग यह भी कहते हैं कि कुंडलिनी आज्ञा चक्र से ही पीछे मुड़कर नीचे उतर जाती है और सहस्रार तो मूलाधार की तरह सेंटरिंग व ध्यान करने के लिए ही है। पर मुझे तो कुंडलिनी को सहस्रार तक ले जाना अधिक आसान और कारगर लगता है। इसी तरह नाक के शिखर, आज्ञा चक्र और सिर पर बालों की चोटी रखने के स्थान से भी शरीर की सेंटरिंग होती है। इसी सेंटरिंग के लिए हिन्दुधर्म में सिर के पिछले भाग में दोनों तरफ के बीचोंबीच एक लंबे बालों की चोटी (शिखा) रखी जाती है।

विज्ञान फ्रंट चैनेल को ढंग से परिभाषित नहीं कर पाया है

मुझे लगता है कि फ्रंट चैनेल परस्पर स्पर्ष की संवेदना से बना है। यह स्पर्श की संवेदना सेल से सेल के कान्टेक्ट से आगे बढ़ती है। वैसे भी खाने का निवाला निगलते समय वह पहले गले के विशुद्धि चक्र में संवेदना पैदा करता है। फिर हृदय के अनाहत चक्र में और पेट में पहुंचने पर नाभि चक्र में संवेदना पैदा करता है। जब ज्यादा खाने से पेट नीचे लटक जाता है तब वह नीचे की ओर दबाव डालकर जननांग क्षेत्र को उत्तेजित करता है जिससे सैक्सुअल स्वाधिष्ठान चक्र क्रियाशील हो जाता है।

शरीर का मेरुदंड वाला चैनेल

सैक्स में सबसे ज्यादा आनंद होता है। जननांगों में सबसे तेज संवेदना पैदा होती है। यह भी सत्य है कि आनंद मस्तिष्क और दिल में एकसाथ तेज अनुभूति से पैदा होता है। इसका मतलब है कि जननांगों से संवेदना एकदम से मस्तिष्क व दिल तक जाती है। पहले वह सीधी मस्तिष्क तक जाती है। दिल तक तो उसे जीभ से उतारना पड़ता है। तांत्रिक संभोग के समय मुंह में भरपूर लार रस बनने से कुंडलिनी चालन/शक्ति चालन को अतिरिक्त सहायता प्राप्त होती है। इससे मस्तिष्क को भी कम थकान होती है। जननांगो से मस्तिष्क तक संवेदना को भेजने का रास्ता मेरुदंड ही है। विज्ञान से भी यह सिद्ध है कि मेरुदंड की नाड़ी जननांगों से सीधी मस्तिष्क तक जुड़ी होती है। विज्ञान के ही अनुसार , प्रत्येक चक्र भी मेरुदंड के माध्यम से ही मस्तिष्क से जुड़ा होता है।

संवेदना का बार-बार नाड़ी लूप में घूमना

जहाँ पहले से नाड़ी विद्यमान है, वहां पर संवेदना नाड़ी से चलती है। अन्य स्थानों पर सेल से सेल के कान्टेक्ट के थ्रू चलती है। मुझे तो लगता है मेरुदंड वाली संवेदना भी शुरु में स्पर्श के अनुभव से ही ऊपर चढ़ती है। इस तरह से नाड़ी लूप में कुण्डलिनी घूमने लगती है। यह नाड़ी लूप ताओवाद के माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट और कुण्डलिनी योग में एकसमान है।

यह नाड़ी लूप अनुभव के दायरे से विलुप्त हो गया, पर कुण्डलिनी अभ्यास से पुनः जागृत हो सकता है

आदमी केवल उन्हीं संवेदनाओं को अनुभव करने लगा , जिनकी उसे भौतिक रूप से सर्वाइव करने के लिए जरूरत थी। शरीर की अन्य संवेदनाओं को वह नजरअंदाज करने लगा। यह आध्यात्मिक नाड़ी लूप भी उन संवेदनाओं में शामिल था। इसलिए समय के साथ यह नाड़ी लूप अदृश्य हो गया। हालांकि अच्छी बात यह है कि लगातार के कुंडलिनी योग के अभ्यास से इस नाड़ी लूप को पुनः जागृत किया जा सकता है।

उलटी जीभ को पेलेट से छुआने पर काम आदि के बोझ से बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर एकदम से घट जाता है

यह मैंने पिछली पोस्ट में भी बताया था। मैं इस तकनीक की कारीगरी को कई बार आजमा चुका हूँ। अब इसका मैं उचित तरीका बताता हूँ। उलटी जीभ का तालु के साथ जितना पीछे हो सके, उतना पीछे फ्लैट और टाइट कांटेक्ट बनाएं। बेशक बहुत पीछे मोड़कर जीभ को परेशान न करें। बिल्कुल दांत के पीछे भी यदि जरा सी उल्टी जीभ लग जाए तो बहुत अच्छा कान्टेक्ट पॉइंट बनता है। इस उल्टे स्पर्श के कारण काउंटर करेंट सिस्टम चालू हो जाता है और कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह काउंटर करेंट सिस्टम ऐसे ही है जैसे गर्म दूध के गिलास को ठंडे पानी में चारों ओर घुमाओ और ठंडे पानी को विपरीत दिशा में घुमाओ तो दूध एकदम से ठंडा हो जाता है। दूध की गर्मी पानी में एकदम चली जाती है। ऐसा लगता है कि मस्तिष्क पूरे शरीर में फ़ैल गया है। एकबार मुझे गुस्सा आ रहा था। उसी समय मैंने अपनी जीभ तालु से लगाई। मेरा मस्तिष्क शांत हो गया और उसकी एनर्जी हृदय चक्र तक उतर कर दोनों बाजुओं में फैल गई। मेरी बाजुएं लड़ाई के लिए तैयार हो गईं डिफेंसिव मोड में ही, क्योंकि मेरा मस्तिष्क शान्त था और लड़ाई शुरु नहीं करना चाहता था। इसीलिए सच्चे योगी व कुंफू विद्वान डिफेंसिव होते हैं, ऑफेंसिव नहीं। ऐसा उपरोक्त बाजू वाला ब्रांचिंग नाड़ी सिस्टम आगे वाले चैनेल से निकलकर पूरे शरीर में फैला है। ऐसी कल्पना करें कि दिमाग जीभ के माध्यम से गले से जुड़ गया है। वैसे भी गले में अकड़न सी पैदा होगी। मस्तिष्क के बोझ के नीचे उतरने से वह अकड़न विशुद्धि चक्र पर ज्यादा बढ़ जाएगी। थोड़ी देर बाद वह बोझ हृदय चक्र तक पहुंच जाएगा। थोड़ी अधिक देर बाद वह नाभि चक्र तक पहुंच जाता है। ऐसा साफ महसूस होता है कि कोई लहर जैसी दिमाग से नीचे उतरकर नाभि में विलीन हो गई। उसके साथ ही मन एकदम से खाली और हल्का हो जाता है। क्रोध आदि मन के विकार भी शांत हो जाते हैं, क्योंकि ये मन के बोझ से ही पैदा होते हैं। रक्तचाप भी एकदम से घटा हुआ महसूस होता है। कुंडलिनी भी आनंद के साथ नाभि चक्र पर चमकने लगती है। इसीलिए नाभि को सिंक या समुद्र भी कहते हैं, क्योंकि यह आदमी का सारा बोझ सोख लेती है।

जीभ के पिछले हिस्से पर टिप से शुरु होकर जीभ के बीचोंबीच जाती हुई गले के बीच में उतरकर आगे के सभी चक्रों को कवर करने वाली एक पतली नस जैसी महसूस होती है। उसके ऊपर कुंडलिनी चलती है। वह नस ही नरम तालु से टच होने पर कुंडलिनी या अन्य संवेदनाओं या बोझ को दिमाग से नीचे उतारती है। माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में कुंडलिनी को नहीं अपितु सीधे एनर्जी या संवेदना या बोझ को नाड़ी चैनलों में घुमाया जाता है।

तालाबंदी लोकडाऊन का उल्लंघन करके पलायन कर रहे लोगों का कुंडलिनी से सम्बंध

भोजन के बिना आदमी कई दिनों तक जिंदा रह सकता है। वैसे भी एक बार में ही यदि बहुत सारा खाना खा लिया जाए, तो दो दिन तक दुबारा खाना खाने की जरूरत न पड़े। मेरे एक जाने-पहचाने शख्स थे जो अक्सर एक बार में ही 5 आदमियों का खाना खा लेते थे। विशेषकर वह ऐसा शादी आदि समारोहों में करते थे, जहाँ अच्छा और तला भुना खाना बनता था। फिर वे 5 दिन तक बिना कुछ खाए ही कमरे में सोए रहते थे, और बार-2 पानी पीते रहते थे। वे हंसते भी बहुत थे और पूरा खुलकर हँसते थे। साथ में वे पूरी तरह से मस्त रहते थे। इससे उन्हें खाना पचाने में मदद मिलती थी। इसी तरह, लोकडाऊन की वजह से काम न करने से तो तीन दिन तक एक भारी भोजन से गुजारा चल सकता है। पर भोजन से शरीर के लिए केवल पोषक तत्त्व ही नहीं मिलते, बल्कि मन के बोझ को कम करने वाला व आनन्द प्रदान करने वाला कुंडलिनी लाभ भी मिलता है। इसी कुंडलिनी लाभ के लिए लोग खासकर मजदूर नॉवेल कोरोना (कोविड-19) वायरस लोकडाऊन का उल्लंघन करके घर भाग रहे हैं, भूख से नहीं। वैसे भी अधिकांश मामलों में कैम्पों में मुफ्त का खाना मिल ही रहा है। यदि भोजन केवल शरीर बनाने के लिए चाहिए होता, तब तो मोटे आदमी कई-2 दिनों तक खाना न खाया करते।

कुंडलिनी दोनों दिशाओं में प्रवाहित हो सकती है

सीखने के समय ताओवाद में आगे के फ्रंट चैनल में कुंडलिनी को ऊपर की तरफ चलाया जाता है। मैंने भी एकबार तांत्रिक प्रक्रिया के दौरान फ्रंट चैनेल से ऊपर जाते हुए महसूस किया था। वह एक हेलीकॉप्टर की तरह बड़े सुंदर ढंग से और स्पष्ट रूप से ऊपर उठी थी। उसने सेक्सुअल चक्रों से मस्तिष्क तक पहुंचने में लगभग 5-10 सेकंड का समय लिया था। कुंडलिनी संवेदना एक तरंग की तरह ऊपर उठी। वह जिस क्षेत्र से गुजरी, उस क्षेत्र को प्रफुल्लित करते गई। निचले वाला क्षेत्र सिकुड़ता गया। मतलब कि जैसे ही वह जननांगों से ऊपर उठी, वे एकदम से सिकुड़ गए। पहले वे पूरी तरह से प्रसारित थे।

यद्यपि सबसे सुंदर अनुभूति तब होती है जब कुंडलिनी फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है और मूलाधार से वापिस मुड़कर बैक चैनल से ऊपर चढ़ती है। जब एनर्जी मस्तिष्क में पहुंचती है, तब चेहरे की त्वचा पर ऊपर की तरफ खिंचाव लगता है और आंखें भिंच जाती हैं। कानों से ऊपर मस्तिष्क में घुसती हुई सरसराहट या गशिंग फ्लो के जैसी अनुभूति होती है। हो सकता है कि वह खिंचाव के दबाव में रक्त प्रवाह हो। फिर उस गशिंग से भरे दबाव को जीभ से नीचे उतारा जाता है। नीचे आते हुए वह गशिंग कुंडलिनी में बदल जाती हो। मूलाधार से वह फिर ऊपर मुड़ जाती है। रीढ़ की हड्डी का एक फन फैलाए शेषनाग के अनुभव से वह कुंडलिनी संवेदना मस्तिष्क तक पहुंच जाती है। नाग और जीभ का वैसे भी आपस में गहरा अंतरसंबंध है। फिर वही गशिंग और फिर वही प्रोसेस बार बार चलता रहता है।

कुंडलिनी के लिए यौनयोग के विकल्प के रूप में श्वास की विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड या कुंडलिनी पंप); कोरोना काल में तो सही ढंग की व भरपूर साँसें ली ही जानी चाहिए, क्योंकि किसको पता कि कोरोना कब किसकी साँसें छीन ले 

योग में श्वास-प्रश्वास का सर्वाधिक महत्त्व है। सही ढंग से श्वास लेने पर ही योग का अधिकांश सफर तय हो जाता है। तभी तो कहते हैं कि साँस को जीतने से मन पर भी विजय मिल जाती है। सही तरीके की साँस के साथ-2 कुंडलिनी खुद ही चलती रहती है। इसलिए साँस को चक्रों पर घुमाने से कुंडलिनी स्वयं ही घूमने लगती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि ही श्वासयोग का मुख्य भाग है

विपरीतक्रम श्वास विधि को सीखने के लिए सबसे पहले पेट से साँस लेना सीखा जाता है। इसे डायाफ्रेगमेटिक डीप ब्रीथिंग भी कहते हैं। इसमें साँस अंदर भरने पर पेट बाहर की तरफ फूलता है। सांस बाहर छोड़ने पर पेट अंदर की ओर सिकुड़ता है। यदि इससे विपरीत क्रम में पेट की गति हो, तो वह साँस छाती से मानी जाती है। छाती से ली गई साँस से मन चंचल रहता है, और शरीर को भरपूर ऑक्सीजन भी नहीं मिलती।

विपरीतक्रम श्वास विधि में साँस शरीर से बाहर नहीं छोड़ी जाती

भौतिक रूप से यह बात अजीब लग सकती है, क्योंकि साँस तो बाहर निकलेगी ही। परंतु आध्यात्मिक रूप से यह सत्य है। बाहर जाने वाली साँस की सूक्ष्म ध्यानमयी शक्ति को पेट से नीचे की ओर धकेला जाता है। उससे नाभि के नीचे व स्वाधिष्ठान चक्र के आसपास एक संवेदना जैसी पैदा होती है। वह संवेदना वीर्य-निर्माण की प्रक्रिया को उत्तेजित करती है।

अंदर भरी जाने वाली साँस वास्तव में रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ाई जाती है

बाहर जाने वाली साँस से स्वाधिष्ठान चक्र पर वीर्य-संवेदना का बिंदु बनता है। वह संवेदना बाहर छोड़ी गई साँस से पीठ वाले स्वाधिष्ठान चक्र से होती हुई रीढ़ की हड्डी में ऊपर की तरफ चढ़ती है। वह सभी चक्रों से होते हुए सहस्रार तक पहुंच जाती है। उस संवेदना के साथ वीर्य की सूक्ष्म  शक्ति व कुंडलिनी भी होती है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि वास्तव में शरीर के अंदर नीचे की तरफ जाने वाली हवा ऊपर की तरफ जाती है, और ऊपर की तरफ जाने वाली हवा नीचे की तरफ जाती है। इसीलिए इसे विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड) कहते हैं।

मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक फैले हुए शेषनाग के ध्यान से विपरीत-क्रम श्वास विधि आसान हो जाती है

शेषनाग वाली मेरी पिछली पोस्टों के अनुसार शेषनाग ने मूलाधार व स्वाधिष्ठान के ऊपर अपनी कुंडली लगाई हुई है। वह रीढ़ की हड्डी से होकर ऊपर उठा हुआ है, और मस्तिष्क में उसके एक हजार फन हैं। जब हम पेट से साँस भरते हैं, तो वह पीछे की ओर तन कर सीधा व कड़ा हो जाता है, तथा फन उठा लेता है। इसका अर्थ है कि उसके शरीर में साँस ऊपर की ओर चढ़ कर उसके फन तक पहुंची। इससे पूर्वोक्त संवेदना की शक्ति ऊपर की तरफ चली जाती है। जब हम साँस छोड़ते हैं, तब वह आगे की ओर ढीला हो जाता है, और अपना फन नीचे झुका लेता है। ऐसा लगता है कि उसने फुफकार के साथ साँस नीचे की तरफ छोड़ी। साथ में पेट भी अंदर की ओर सिकुड़ कर नीचे की ओर दबाव डालता है। इन सबसे पूर्वोक्त स्वाधिष्ठान बिंदु पर संवेदना बनती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि यौनयोग का सर्वोत्तम विकल्प है

कई लोग विभिन्न शारीरिक और मानसिक बाधाओं के कारण यौनयोग नहीं कर पाते। उनके लिए यह विधि सर्वोत्तम है। संन्यासी योगी भी इसी विधि का प्रयोग करते थे। इससे वीर्य की शक्ति मस्तिष्क को आसानी से मिल जाती है।

कुण्डलिनी ही तांत्रिक सैक्सुअल योग के माध्यम से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियों; चक्रों, और अद्वैत को उत्पन्न करती है।

सभी मित्रों को शिवरात्रि पर्व की बहुत-2 बधाइयां । यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगवान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पुरजोर खिलाफत करते हैं।

कुण्डलिनी ही सबकुछ है। उसी का ध्यान जब शरीर के विशेष बिन्दुओं पर किया जाता है, तब वे बिंदु चक्र कहलाते हैं। उसी को गति देने से जब काल्पनिक मार्ग  बनते हैं, तब वे भी नाड़ियाँ कहलाते  हैं। उसी का ध्यान करने से अद्वैत स्वयं उत्पन्न होता है। इसी तरह अद्वैत का ध्यान करने से कुण्डलिनी स्वयं ही मन में प्रकट हो जाती है।

हमारी रीढ़ की हड्डी में दो आपस में गुंथे हुए सांप बहुत से धर्मों में दिखाए गए हैं। बीच में एक सीधी नाड़ी होती है।

आपस में गुंथे हुए दो नाग यब-युम आसन में जुड़े हुए दो तांत्रिक प्रेमी हैं

जैसा कि आप नीचे दिए गए चित्रों में देख पा रहे हैं। एक नाग पुरुष है, और दूसरा नाग स्त्री है। यह पहले भी हमने बताया है कि मनुष्य का समग्र रूप उसके तंत्रिका तंत्र में ही है, और वह फण उठाए हुए नाग की शक्ल से मिलता-जुलता है। हमारे तंत्रिका  तंत्र का मुख्य भाग मस्तिष्क समेत पीठ (मेरुदंड) में  होता है। इसीलिए हमारी पीठ फण उठाए नाग की तरह दिखती है। क्योंकि कुण्डलिनी (संवेदना) इसी नाग के शरीर (तंत्रिका तंत्र) पर चलती है, इसलिए जिस किसी और रास्ते से भी जब  कुण्डलिनी चलती है, तो अधिकांशतः उस रास्ते को भी नाग का रूप दिया जाता है। वास्तव में  एक नाग एक तांत्रिक प्रेमी की पीठ को रिप्रेसेन्ट करता है, और दूसरा नाग दूसरे तांत्रिक प्रेमी की पीठ को। पुरुष प्रेमी स्त्री के मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी का ध्यान शुरू करता है।  फिर वह कुण्डलिनी को सीधा पीछे लाकर अपने मूलाधार पर स्थापित करता है। इस तरह से दोनों  प्रेमियों के मूलाधार आपस में जुड़ जाते हैं, और एक केन्द्रीय नाड़ी का शाक्तिशाली मूलाधार चक्र बनता है, जिसे चित्र में क्रोस के चिन्ह से मार्क किया गया है। वह केन्द्रीय नाड़ी बीच वाले सीधे दंड के रूप में  दिखाई  गई है, जिसे सुषुम्ना कहते हैं। पुरुष नाग को पिंगला, व स्त्री नाग को इड़ा कहा गया है। फिर पुरुष प्रेमी कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ा कर  अपने स्वाधिष्ठान चक्र पर स्थापित करता है। वहां  से वह उसे सीधा आगे ले जाकर स्त्री के स्वाधिष्ठान पर स्थापित करता है। इस तरह से सुषुम्ना का स्वाधिष्ठान भी क्रियाशील  हो जाता है। फिर वह उसे स्त्री के स्वाधिष्ठान से ऊपर चढ़ा कर उसीके मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे इड़ा का मणिपुर सक्रिय हो जाता है। वहां से उसे सीधा पीछे ले जाकर अपने मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे पिंगला का मणिपुर भी सक्रिय हो जाता है। दोनों नाड़ियों के मणिपुर चक्रों के एकसाथ क्रियाशील होने से सुषुम्ना का मणिपुर चक्र स्वयं ही क्रियाशील हो जाता है। इस तरह से यह क्रिया ऐसी ही सहस्रार चक्र तक चलती है। स्त्री प्रेमी भी इसी तरह कुण्डलिनी को चलाती है। इस तरह से दो नाग आपस में गुंथे हुए और ऊपर की ओर जाते हुए प्रतीत होते हैं, तथा सुषुम्ना के माध्यम से सहस्रार तक पहुँच जाते हैं।

कैड्यूसियस का चिन्ह (symbol of caduceus) भी तांत्रिक यौनयोग को ही रेखांकित करता है

इस चिन्ह में दो सांप आपस में इसी तरह गुंथे हुए होते हैं। उनके बीच में एक सीधा स्तम्भ होता है, जिसके शीर्ष पर पंख लगे होते हैं। वास्तव में वे पंख कुण्डलिनी के सहस्रार की तरफ जाने का इशारा करते हैं। वैसे भी जागरण के समय कुण्डलिनी फरफराहट के साथ व ऊपर की ओर भारी दबाव के साथ उड़ती हुई महसूस होती है। वह स्तम्भ नीचे की तरफ टेपर करता है। इसका अर्थ है कि ऊपर चढ़ते हुए कुण्डलिनी  अधिक शक्तिशाली होती जाती है।

अपने ही शरीर में दो लिपटे हुए नाग अपने ही शरीर के तंत्रिका तंत्र के सिम्पैथेटिक व पैरासिम्पैथेटिक भागों की संतुलित हिस्सेदारी को भी इंगित करते हैं

इड़ा को पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह ल्यूनर, शांत, पेसिव, व फैमिनाइन है। पिंगला नाड़ी को सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह सोलर, भड़कीला, एक्टिव, व मैस्कुलाइन है। जब दोनों सिस्टम बराबर मात्रा में आपस में मिले हुए होते हैं, तब जीवन में संतुलन व अद्वैत छा जाता है। वैसी स्थिति में भी कुण्डलिनी विकसित होने लगती है, क्योंकि हमने पहले भी कहा है कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी हमेशा ही रहती है। 

(केवल प्रतीकात्मक चित्र)
(केवल प्रतीकात्मक चित्र)

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कुण्डलिनी जागरण केवल तांत्रिक सैक्सुअल योगा/यौनयोग-सहायित कुण्डलिनी योग से ही सभी के लिए प्राप्त करना संभव है

यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगववान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पीड़िताओं के साथ गहरी सम्वेदना प्रकट करते हैं।

मित्रो, इस पोस्ट समेत पिछली दोनों पोस्टें कुण्डलिनी विषय की आत्मा हैं। ये तीनों पोस्टें यदि क्रमवार पढ़ी जाएं, तो कुण्डलिनी विषय का विशेषज्ञ बना जा सकता है। अगर तीनों पर अमल भी किया जाए, तब तो कुण्डलिनी जागरण भी प्राप्त किया जा सकता है। इस पोस्ट में मैं यह बताने की कोशिश करूंगा कि कुण्डलिनी जागरण का सबसे आसान, कारगर और शीघ्र फलदायी तरीका क्या है? यौनयोग-सहायित कुण्डलिनी योग ही वह तरीका है।

पिछली पोस्ट में मैंने बताया कि वे छः महत्त्वपूर्ण कारक कौन से हैं, जिनके एकसाथ इकट्ठा होने से कुण्डलिनी जागरण होता है। इस पोस्ट में मैं यह बताऊंगा कि यौनयोग से वे छः कारक कैसे प्रवर्धित/बूस्ट होकर अति शीघ्रता से व आसानी से कुण्डलिनी को जागृत करते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से कुण्डलिनी ध्यान को बल

सैक्सुअल योगा के समय वज्र प्रसारण अपने चरम पर होता है। वज्र में भरपूर रक्त प्रवाहित हो रहा होता है। इससे वज्र-शिखा की संवेदना अपने चरम पर होती है। वज्र-शिखा ही तो वह मूलाधार चक्र है, जिस पर कुण्डलिनी शक्ति का निवास बताया गया है। वास्तव में जब वज्र शिथिल होकर नीचे लटका होता है, तब वज्र शिखा उस बिंदु को छू रही होती है, जिसे मूलाधार चक्र का स्थान बताया गया है। वह स्थान वज्र के आधार व मलद्वार को जोड़ने वाली रेखा के केंद्र में बताया गया है। फिर वज्र-शिखा की तीव्र संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी-छवि का आरोपण किया जाता है। दोनों तांत्रिक प्रेमियों के यब-युम/yab-yum में जुड़े होने पर वह वज्र संवेदना लोटस के अन्दर ब्लोक हो जाती है, जिससे वह वीर्यपात के रूप में बाहर नहीं भाग पाती। दोनों एक-दूसरे के शरीर पर आगे और पीछे के चक्रों को हाथों से क्रमवार स्पर्श करके उन पर कुण्डलिनी का ध्यान करते हैं। उसके बाद सम्भोग क्रीड़ा के दौरान वज्र-संवेदना को चरम तक पहुँचाया जाता है। फिर योग-बंधों से उसे ऊपर उठाया जाता है। उससे संवेदना के साथ कुण्डलिनी एकदम से मस्तिष्क को कूद जाती है, और वहां तेजी से जगमगाने लगती है। साथ में वज्र शिथिल हो जाता है। उससे वीर्यपात भी रुक जाता है। ऐसा बार-२ करने से मस्तिष्क में कुण्डलिनी जीवंत जैसी हो जाती है। इसे प्राणोत्थान या कुण्डलिनी-उत्थान भी कहते हैं। इसी तरह, मिस्र वाली अन्खिंग विधि का भी प्रयोग किया जा सकता है। महिला में वज्र का काम क्लाईटोरिस करता है, क्योंकि वहीं पर सबसे बड़ी यौन-संवेदना पैदा होती है। बाकि अन्य काम महिला में पुरुष के समान ही किया जाता है। महिला में भी क्लाईटोरिस की संवेदना को चरम तक पहुंचा कर ऊपर चढ़ाया जाता है। उससे संवेदना के ऊपर आरोपित कुण्डलिनी भी ऊपर चढ़ जाती है। उससे रजोपात भी रुक जाता है, और पूर्ण यौन तृप्ति भी मिल जाती है।

तांत्रिक सैक्सुअल योग (यौनयोग) से प्राणों को बल

यह पहले से ही सिद्ध है कि कुण्डलिनी के साथ प्राण भी विद्यमान रहते हैं। यौनयोग से जब वज्र पर कुण्डलिनी प्रचंड हो जाती है, तब वहां प्राण भी खुद ही प्रचंड हो जाते हैं। जब उस कुण्डलिनी को सभी चक्रों तक ले जाया जाता है, तब प्राण भी खुद ही सभी चक्रों तक चले जाते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से इन्द्रियों की अंतर्मुखता को बल

सैक्सुअल योगा से पूरे शरीर में प्राणों का संचार हो जाता है। इससे शरीर व मन, दोनों स्वस्थ हो जाते हैं। इससे स्वस्थ विचार पैदा होते हैं, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। इससे आदमी अपने तन-मन से ही संतुष्ट रहता हुआ बाहरी जगत के प्रति अनासक्त हो जाता है। इसी अनासक्ति को ही तो अंतर्मुखता कहते हैं। वह जरूरत के हिसाब से दुनियादारी चलाता तो है, पर उसमें उसके प्रति फालतू की छटपटाहट/क्रेविंग नहीं रहती। साथ में, यौनयोग से प्रचंड बने हुए उसके प्राण भी उसे दुनिया में निर्लिप्त रहने में मदद करते हैं।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से वीर्यशक्ति को बल

यदि सम्भोग ही नहीं किया जाए, तो वीर्य कैसे उत्पन्न होगा। यदि वीर्य ही उत्पन्न न होए, तो उसकी शक्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है। इसका अर्थ है कि केवल सैक्सुअल योग से ही वीर्यशक्ति पैदा होती है, और वह कुण्डलिनी को प्राप्त होती है। साधारण सम्भोग से तो वीर्यशक्ति की बर्बादी होती है, और सम्भोग ही न करने से वीर्यशक्ति पैदा ही नहीं होती।

तांत्रिक सैक्सुअल योगा (यौनयोग) से ट्रिगर को बल

सैक्सुअल योगा से ट्रिगर के लिए संवेदनात्मकता/सेंसिटिविटी बहुत बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि सैक्सुअल योगा से मस्तिष्क में कुण्डलिनी पहले से ही बहुत मजबूत बनी होती है। उसे मामूली सी ट्रिगर चाहिए होती है। इसलिए हलकी सी व साधारण सी ट्रिगर भी काम कर जाती है।

उपरोक्त सभी छह कारकों के एकसाथ इकट्ठा होने से उत्पन्न कुण्डलिनी-जागरण (जिन्हें यौनयोग/सैक्सुअल योगा से प्रवृद्ध किया गया) के वास्तविक समय के अनुभव को पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

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कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए आवश्यक छह महत्त्वपूर्ण कारक- आध्यात्मिक जागरण सभी के लिए संभव है!

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था कि कुण्डलिनी जागरण को अपनी इच्छा से प्राप्त नहीं किया जा सकता। परन्तु ऐसा भी नहीं है। यदि दृढ़ निश्चय से व सही ढंग से प्रयास किया जाए, तो उसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण एक अजीबोगरीब घटना है। यह सबसे साधारण भी है, और साथ में सबसे जटिल भी। इसे अपनी इच्छा से भी प्राप्त किया जा सकता है, और नहीं भी। इसे अपने प्रयास से प्राप्त भी किया जा सकता है, और नहीं भी। परिस्थिति के अनुसार इसमें विभिन्न विरोधी भावों का समावेश प्रतीत होता है।

आज हम बताएंगे कि कुण्डलिनी जागरण के लिए किन पांच चीजों का एकसाथ इकट्ठा होना जरुरी है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए कुण्डलिनी ध्यान का महत्त्व

कुण्डलिनी ध्यान कुण्डलिनी जागरण के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। कुण्डलिनी चित्र मन में स्पष्टता, आनंद, और अद्वैत के साथ बना होना चाहिए। वास्तव में कुण्डलिनी से आदमी में सभी मानवीय या आध्यात्मिक गुण स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं। इन गुणों का आकलन करके भी यह पता लगाया जा सकता है कि कुण्डलिनी ध्यान कितना मजबूत है। ऐसा भी नहीं है कि योगसाधना से ही कुण्डलिनी का ध्यान होता हो। वास्तव में अद्वैत भावना (कर्मयोग) से पैदा होने वाला कुण्डलिनी ध्यान ज्यादा व्यावहारिक, ज्यादा मजबूत और ज्यादा मानवीय होता है।

अलग-२ चक्रों पर कुण्डलिनी-ध्यान करने से सभी चक्र भी मजबूत हो जाते हैं। फिर जब तांत्रिक प्रक्रिया से कुण्डलिनी को सभी चक्रों से गुजारते हुए मस्तिष्क तक उठाया जाता है, तब चक्रों की शक्ति भी स्वयं ही मस्तिष्क में पहुँच जाती है। इस तरह से हम कह सकते हैं कि चक्रों की शक्ति कुण्डलिनी जागरण के लिए छटा महत्त्वपूर्ण कारक है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणों का महत्त्व

प्राण शक्ति (शारीरिक व मानसिक शक्ति) का ही पर्यायवाची रूप है। जैसे शक्ति के बिना कोई भौतिक कार्य संभव नहीं होता है, उसी तरह कुण्डलिनी जागरण भी प्राणों की मजबूती के बिना संभव नहीं है। कमजोर, सुस्त व बीमार आदमी को कुण्डलिनी जागरण की प्राप्ति नहीं हो सकती।

कुण्डलिनी और प्राण साथ-साथ रहते हैं। जब योग साधना से कुण्डलिनी को शरीर के निचले चक्रों से मस्तिष्क को चढ़ाया जाता है, तब उसके साथ प्राण भी अपने आप ऊपर चढ़ जाते हैं। यदि शरीर में प्राणों की कमी होगी, तो मस्तिष्क में पहुँच कर भी कुण्डलिनी कमजोर जैसी बनी रहेगी, और जागृत नहीं हो पाएगी।

कई लोग मानते हैं कि आराम से बैठकर, और खा-पी कर हमारे शरीर में प्राण शक्ति इकट्ठी हो जाएगी। परन्तु ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता, तो सभी बड़े-२ सेठ कब के कुण्डलिनी जागरण प्राप्त कर चुके होते। प्राण वास्तव में शरीर और मन की क्रियाशीलता, सामाजिकता, अद्वैत व मानवता से ही संचित होते हैं। इसीलिए तो पुराने समय में राजा लोग कई वर्षों तक सर्वोत्तम विधि से राज-काज चलाने के बाद एकदम से वनवास को चले जाया करते थे। उससे उनकी पुरानी क्रियाशीलता से मजबूत बने हुए प्राण उनकी कुण्डलिनी को शीघ्र ही जागृत कर दिया करते थे।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। उपरोक्त प्रकार की भरपूर दुनियादारी के बाद वह योग साधना करने के लिए एकांत में चला गया। वहां उसकी संचित प्राण शक्ति उसकी कुण्डलिनी को लग गई, और वह जागृत हो गई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए इन्द्रियों की अंतर्मुखता का महत्त्व

यदि इन्द्रियों का मुंह बाहर की ओर खुला रहेगा, तो संचित प्राण बाहर निकल जाएंगे। इससे वे कुण्डलिनी को जागृत नहीं कर पाएंगे। अंतर्मुखता का मतलब गूंगे-बहरे बनना नहीं है। इसका अर्थ तो बाहरी दुनिया में कम से कम उलझना है।

प्रेमयोगी वज्र भी जब दुनियादारी से दूर होकर एकांत में योग साधना करने लगा, तब वह अपने गुजारे लायक ही बहिर्मुखी रहने लगा, जरूरत से ज्यादा नहीं। वैसे तंत्र ने भी उसकी काफी सहायता की। उसकी जो शक्ति दुनियादारी में बर्बाद हो जाती थी, वह उसकी तांत्रिक जीवन पद्धति से पूरी हो जाती थी। अपनी उस तंत्र-संवर्धित प्राण शक्ति से वह कुण्डलिनी व योग के बारे में गहरा अध्ययन करता था, योग करता था, हलके-फुल्के भ्रमण करता था, और हलके-फुल्के काम करता था। फिर भी उसमें काफी प्राण शक्ति शेष बची रहती थी, जो उसकी कुण्डलिनी को जगाने में काम आई।

कुण्डलिनी जागरण के लिए वीर्य शक्ति का महत्त्व

वीर्य शक्ति तंत्र का प्रमुख आधार है। वीर्य शक्ति के बिना कुण्डलिनी को जागरण के लिए अपेक्षित मुक्तिगामी वेग (escape velocity) प्राप्त नहीं होता। तांत्रिक साधना के माध्यम से वीर्य शक्ति को आधार चक्रों से ऊपर उठाकर मस्तिष्क तक पहुँचाया जाता है। वीर्यशक्ति के साथ प्राण भी ऊपर चला जाता है। वीर्य शक्ति के नाश के साथ बहुत सा प्राण भी नष्ट हो जाता है। वीर्य शक्ति के बचाव से प्राण का बचाव हो जाता है, जो तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क स्थित कुण्डलिनी को प्रदान कर दिया जाता है।

कुण्डलिनी जागरण के लिए एक ट्रिगर का महत्त्व

यदि उपरोक्त सभी अनुकूल परिस्थितियाँ मस्तिष्क में मौजूद हों, पर साथ में यदि एक मानसिक झटका/ट्रिगर न मिले, तो भी कुण्डलिनी जागरण नहीं होता। मैं उस ट्रिगर को एक उदाहरण से समझाता हूँ। मान लो कि दो गुरुभाई कुण्डलिनी योगी हों, और दोनों अलग-२ जगहों पर अपने गुरु के रूप की कुण्डलिनी का ध्यान कर रहे हों। फिर वे वर्षों बाद अचानक किसी मेले/समारोह आदि में आपस में प्यार से मिलें, तो वह मुलाक़ात उन दोनों के लिए एक ट्रिगर का काम करेगी। उससे उन दोनों का ध्यान अपने गुरु पर जाएगा, जिससे पहले से उनके मन में बसी हुई गुरु के रूप की कुण्डलिनी प्रचंड होकर एकदम से जागृत हो जाएगी। यदि उस ट्रिगर में सैक्सुअल अंश भी हो, तो वह और ज्यादा मजबूत बन जाती है।

उपर चडकर हरेक चक्र क्रमवाईझ पांच से छे मास की अंतराल पे एक-एक चक्र का वेधन करते करते मस्तक मे एकठी हो जाएगी अब ये टाईम पे मस्तक मे कुल तीन प्रकार की एकरुप होती है. (1):- प्राण-अपान की उर्जा, (2):- दशेय ईन्द्रियाकी शक्ति की उर्जा, (3):- कुंडलीनी शक्ति की उर्जा .ये तीनो शक्तियां की उर्जा जब मस्तक मे एकरुप एकत्रित होकर बहती है तब मानव को गाढ ध्यान लग जाता है…….

कुण्डलिनी जागरण भाग-4

उपरोक्त सभी छह कारकों के एकसाथ इकट्ठा होने से उत्पन्न कुण्डलिनी-जागरण के वास्तविक समय के अनुभव को पढ़ने के लिए निम्नलिखित लिंक पर जाएं।

प्रेमयोगी वज्र अपनी उस समाधि(कुण्डलिनीजागरण/KUNDALINI AWAKENING) का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार करता है

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कुण्डलिनी से यौन-हिंसा पर रोकथाम

यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगववान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम बलात्कार पीड़िताओं के साथ सम्वेदना प्रकट करते हैं।

आजकल हर जगह यौन हिंसा की ख़बरें सुनने को मिल रही हैं। यह पूरी दुनिया में हो रहा है। कोई भी क्षेत्र इस मामले में अपवाद नहीं है। अभी हाल ही में हैदराबाद में घटित डा० प्रियंका रेड्डी यौन हत्याकांड इसका सबसे ताजा उदाहरण है। दूसरा ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश के उन्नाव का है, जहां एक बलात्कार से पीड़ित बाला को ज़िंदा जलाया गया। आओ, हम इन मामलों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व तांत्रिक पहलुओं के सम्बन्ध में विचार करते हैं।

यौन हिंसा के मुख्य कारण

यौनहिंसा का मुख्य कारण सार्वजनिक स्थानों पर परोसी जाने वाली, अश्लीलता, भौंडेपन, व्यभिचार एवं पोर्न से भरी हुई ऑडियोविजुअल सामग्रियां हैं। हालांकि, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये यौन-अनुशासित और तांत्रिक व्यक्ति को शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से नुकसान पहुंचाने के बजाय लाभ पहुंचा सकती हैं। इसलिए, इस मामले में मानसिक दृष्टिकोण का प्रकार अधिक महत्वपूर्ण कारक है।

यौन हिंसा का दूसरा मुख्य कारण समाज में समुचित यौन शिक्षा का अभाव है। कई जगह जो यौन शिक्षा दी जाती है, वह तंत्र के अनुसार नहीं होती, इसलिए वह पूरी तरह से कारगर नहीं हो पाती। वास्तविक यौन शिक्षा तो तांत्रिक यौन शिक्षा ही है। तंत्र ही यौनाचार का विज्ञान है। आजकल जब भौतिक यौन शिक्षा को हर जगह फैलाया जा रहा है, तब भी यौन हिंसा बढ़ने की क्या वजह है? इसकी वजह यही है कि उसमें तंत्र की आध्यात्मिकता को शामिल नहीं किया जा रहा है। भौतिक यौन शिक्षा तो कई बार लाभ की बजाय हानि भी पहुंचाती है, तथा वास्तविक यौन सुख से भी वंचित रखती है। यह तांत्रिक यौन शिक्षा ही है, जो वास्तविक यौन सुख को उपलब्ध करवाते हुए आदमी को शारीरिक, मानसिक, व आध्यात्मिक रूप से भी उन्नत करती है।

यौन हिंसा का तीसरा मुख्य कारण समाज में बढ़ती अव्यवस्था, व बेरोजगारी है। इससे असुरक्षा की भावना बढ़ती है, जो यौन हिंसा को जन्म देती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है। जिस आदमी के पास काम और आमदनी नहीं होते, उसे ऊटपटांग ही सूझता है।

यौन हिंसा का चौथा कारण वास्तविक आध्यात्मिकता की कमी है। आध्यात्मिकता खाली दिमाग को भी नियंत्रण में रखती है। तभी तो खाली बैठे हुए जोगी-फकीर कभी गलत काम नहीं करते।

यौन हिंसा का पांचवां प्रमुख कारण न्यायिक कारण है। न्याय प्रणाली भी अपने तरीके से सही काम कर रही है। यद्यपि यह अपराधी मानसिकता के मन में पर्याप्त डर या शर्म पैदा नहीं कर पा रही है। अपराध या तो डर से रुकते हैं, या शर्म से। इसमें शर्म पैदा करने वाला तरीका ज्यादा मानवतापूर्ण है। एक कटु सत्य यह भी है कि ज्यादातर मामलों में अपराधी सजा के भय से ही बलात्कार-पीड़िता की ह्त्या करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा सबूत मिटाए जा सके। यह भी यह भी सच्चाई है कि अधिकांशतः तेज दिमाग वाले लोग ही अपराधी बनते हैं। यदि ऐसे लोगों को समुचित दिशा-निर्देशन मिलता रहे, तो वे अपराध की बजाय समाज के अन्य बहुत से महत्त्वपूर्ण काम कर सकते हैं।

तांत्रिक आचार को अपनाने से यौन हिंसा पर रोकथाम

बेशक तंत्र बाहर से देखने पर यौन-सनकी शास्त्र की तरह लगता हो, परन्तु ऐसा नहीं है। तंत्र पोर्न या बलात्कार के बिलकुल विपरीत है। इसमें यौन साथी को पूर्णतः अपने समान समझ कर उससे प्रेम किया जाता है। इसमें परस्पर रजामंदी होती है। इसमें यौन-स्वास्थ्य व यौन अनुशासन पर बहुत ध्यान दिया जाता है। सच्चाई तो यह है कि अनुशासित तंत्र के सामने तो सर्वसाधारण व पारिवारिक प्रणय सम्बन्ध भी बलात्कार की तरह प्रतीत होते हैं। तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी को यौन साथी नहीं बनाया जाता। इससे किसी की भावनात्मक संपत्ति को नुक्सान नहीं पहुंचता। तंत्र में बहुत लम्बे समय तक यौन साथी के साथ अन्तरंग सम्बन्ध बना कर रखना पड़ता है। उसे कई वर्षों तक बदला नहीं जा सकता। उसे मझधार में भी नहीं छोड़ा जा सकता। इससे भी बलात्कार जैसे क्षणिक वासना पूर्ति के कामों पर रोक लगती है। तंत्र में एकपत्नीव्रत को सर्वश्रेष्ठ आचार माना गया है, तथा पत्नी को ही सर्वश्रेष्ठ तांत्रिक साथी माना गया है। भगवान शिव-पार्वती की जोड़ी इसका अच्छा उदाहरण है।

कुण्डलिनी शक्ति के बहिर्गमन को रोकने से यौन हिंसा की रोकथाम

वैसे तो जितना संभव हो सके, तांत्रिक विधि से वीर्यपात को रोककर उसकी शक्ति को कुण्डलिनी शक्ति में रूपांतरित कर देना चाहिए। फिर भी मासिक चक्र के गर्भाधान से सुरक्षित काल (मासिक चक्र के प्रथम 7 और अंतिम 7 दिन, यद्यपि कोई भी समय शत-प्रतिशत सुरक्षित नहीं हो सकता है) में किए गए वीर्यपात के बाद सम्भोग बंद नहीं करना चाहिए, बल्कि वीर्य-रक्षण के साथ जारी रखना चाहिए। वीर्यपात से शक्ति बहिर्मुख होकर नष्ट हो जाती है। इससे यौन साथी के प्रति द्वेष पैदा होता है, जो यौन हिंसा में बदल सकता है। इससे एक प्रकार से शक्ति का मुंह बाहर की तरफ खुल जाता है, और लम्बे समय तक वैसा ही बना रहता है। कुछ दिनों के बाद जब बाहर की और शक्ति (नागिन) का मुंह बंद हो जाता है, तब आदत से मजबूर मूढ़ मनुष्य फिर से वीर्यपात करके उसे खोल देता है। इससे उसकी कुण्डलिनी शक्ति निरंतर बाहर की और बर्बाद होती रहती है। उससे आदमी बाहरी दुनिया की मोहमाया में बुरी तरह से फँस जाता है, और उसके अन्दर बहुत से दुर्गुण पैदा हो जाते हैं। उस शक्ति को जितना हो सके, वीर्यपात के बाद उतना शीघ्र ऊपर (मस्तिष्क) की ओर चढ़ा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि एक बार भी वीर्य के संरक्षण और उसके ऊर्ध्व-चालन के साथ किया गया तांत्रिक यौनयोग बहुत सुन्दर फल देता है, बेशक उसके बाद लम्बे समय तक सेक्स न किया जाए। उससे शक्ति की बहिर्मुखता (नागिन का मुंह नीचे की ओर होना) से उत्पन्न नकारात्मकता एकदम से यू टर्न लेकर ऊर्ध्वमुखता (नागिन का मुंह ऊपर की तरफ उठना) से उत्पन्न सकारात्मकता का रूप ले लेती है। इससे यौन साथी से भी प्रेम बढ़ता है, जिससे यौन हिंसा पर लगाम लगती है। जैसे-२ वीर्य बढ़ता जाता है, वैसे-२ ही मस्तिष्क में कुण्डलिनी शक्ति का स्तर भी बढ़ता जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमने यौन योग से वीर्य की शक्ति को मस्तिष्क की ओर जाने के लिए निर्दिष्ट किया होता है। उसके साथ कुण्डलिनी स्वयं ही मस्तिष्क की तरफ विकास करती है, क्योंकि यौन योग से हमने कुण्डलिनी को उस वीर्य-शक्ति के ऊपर आरोपित किया होता है।

कुण्डलिनी योग से यौन हिंसा पर लगाम

यह मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक रूप से सत्य है कि प्रत्येक जीव अपनी कुण्डलिनी के विकास के लिए ही यौन सम्बन्ध बनाता है। महान तंत्र गुरु ओशो ने भी यह बात कही है कि सम्भोग से समाधि की प्राप्ति सबसे आसान व व्यावहारिक है। समाधि का अर्थ यहाँ निरंतर का कुण्डलिनी-ध्यान या कुण्डलिनी-जागरण ही है। इस परिपेक्ष्य से, यदि कुण्डलिनी के विकास के लिए कुण्डलिनी-योग की सहायता ली जाए, तो सम्भोग की आवश्यकता ही न पड़े। इसी वजह से तो ऋषि-मुनि व महान योगीजन आजीवन विवाह के बिना ही पूर्ण संतुष्ट जीवन जी पाते थे।

इतिहास गवाह है कि जब से भारत की वैदिक संस्कृति का अन्य संस्कृतियों के द्वारा अतिक्रमण हुआ है, तभी से यौन-हिंसा के मामले बढ़े हैं, और वीभत्स हुए हैं। इसलिए यौन-हिंसा से बचने के लिए कुण्डलिनी योग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

तांत्रिक यौन-शिक्षा को सर्वसुलभ करवाने वाली निम्नलिखित पुस्तकें अनुमोदित की जाती हैं

1) शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

2) कुण्डलिनी रहस्योद्घाटित- प्रेमयोगी वज्र क्या कहता है

3) कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान     

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कुण्डलिनी के साथ संगीत

संगीत के लाभदायक प्रभाव सभी जानते हैं। भौतिक रूप से तो संगीत लाभदायक है ही, आध्यात्मिक रूप से भी इसका प्रमुख योगदान है। कुण्डलिनी और संगीत का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है।

संगीत से साक्षीभाव का विकास

संगीत से हमारे मन में चित्र-विचित्र व नए-पुराने विचार चित्रों के रूप में मन में उभरने लगते हैं। इसमें विशेष बात यह है कि उन चित्रों के साथ साक्षीभाव या अनासक्ति का भाव विद्यमान रहता है। वे कुछ-२ स्पष्ट व सुखपूर्ण स्वप्न के चित्रों की तरह प्रतीत होते हैं। इससे मन की निर्मलता में इजाफा होता है, और साथ में आनंद भी प्राप्त होता है। संगीत से आनंद मिलने की मुख्य वजह यही है। वास्तव में, संगीत प्रत्यक्ष रूप से आनंद नहीं देता, अपितु उन चित्रों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से ही देता है। एक बात और है। जो संगीत हमें अधिक रोचक लगता है, वह हमें अधिक आनंद प्रदान करता है। वास्तव में, वह संगीत अधिक मात्रा में स्पष्ट मानसिक चित्र उत्पन्न करता है, और उनमें अधिक मात्रा में साक्षीभाव भी पैदा करता है। तभी तो किसी एक को उबाऊ लगने वाला संगीत किसी दूसरे को बहुत रोचक लगता है। यदि आनंद संगीत में होता, तब तो कोई भी संगीत हर किसी को रोचक लगा करता। ऐसा भी होता है कि कभी कोई संगीत रोचक लगता है, तो कभी कोई दूसरा। मन की भावावस्था के अनुसार ही संगीत के प्रति पसंद भी बदलती रहती है। इसका यही अर्थ है कि संगीत में अपना आनंद नहीं होता, अपितु यह मन के भावों से ही आनंद उपलब्ध करवाता है। यह सभी को पता है कि अनासक्ति या साक्षीभाव के साथ ही मन के भावों से आनंद पैदा होता है।

संगीत से कुण्डलिनी का विकास

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि संगीत से साक्षीभाव पैदा होता है। साक्षीभाव अद्वैत का ही दूसरा नाम है। यह भी अक्सर अनुभव में आता ही रहता है कि अद्वैत व कुण्डलिनी साथ-२ रहने का प्रयास करते हैं। अद्वैतभाव से कुण्डलिनी मानसपटल पर उभर आती है, तथा कुण्डलिनी के विचार से अद्वैत उत्पन्न हो जाता है। इससे स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि संगीत से कुण्डलिनी का विकास होता है। जब संगीत से कुण्डलिनी बारम्बार मानसपटल पर आती रहेगी, तब उससे उसका निरंतर विकास तो होगा ही।

कुण्डलिनी के बारे में प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

उसके घर में रेडियो, कैसेट प्लेयर आदि का संगीत अक्सर बजता ही रहता था। आते-जाते, बस के अन्दर भी गाने सुनने को मिलते रहते थे। उन गानों से उसके मन में चमकती हुई स्पष्ट कुण्डलिनी प्रकट हो जाया करती थी। रोमांटिक गानों से उसके मन में तांत्रिक प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी उमड़ा करती थी, जबकि गंभीर व आध्यात्मिक गानों से गुरु के रूप की। ज्यादातर समय प्रेमिका की कुण्डलिनी ही बलवान रहती थी, क्योंकि उसमें यौनाकर्षण विद्यमान होता था, और वह स्वयं भरी जवानी में भी था। इसकी दूसरी वजह यह थी कि उस समय उसके मन में गुरु के रूप की कुण्डलिनी जागृत नहीं हुई थी।

कई वर्षों के बाद, जब उसके मन में गुरु के रूप की कुण्डलिनी जागृत हुई, तब वह ज्यादा प्रभावशाली बनने लगी। फिर उसके सामने प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी गौण पड़ने लगी। उससे हर प्रकार के संगीत के समय उसके मन में गुरु की ही कुण्डलिनी प्रकट होती थी। देवीरानी के रूप की कुण्डलिनी भी कभी-कभार प्रकट हो जाती थी, यद्यपि बहुत हलके रूप में। यह सिलसिला यूं ही चलता रहा, और गुरु के रूप की कुण्डलिनी उत्तरोत्तर बलवान होती गई। इसका कारण यह भी है कि वह प्रतिदिन की सुबह-शाम की एक-२ घंटे की कुण्डलिनीयोग साधना में गुरु के रूप की कुण्डलिनी का ध्यान करता था। इससे उत्साहित होकर वह दिन-रात ब्लूटुथ पोर्टेबल स्पीकर पर इंटरनेट के माध्यम से रंग-बिरंगे गाने सुनता रहता था। इससे उसे और भी बहुत से लाभ मिलते थे। ध्यान रहे कि लगातार लम्बे समय तक ऊंची आवाज में संगीत सुनना कानों के लिए नुकसानदायक है।

संगीत के विभिन्न स्वरों से विभिन्न चक्र जागृत होते हैं

ऐसा योग चर्चा में अक्सर कहा जाता है, और यह स्वाभाविक भी है। प्रत्येक स्वर एक भाव को पैदा करता है। किसी स्वर से उत्पन्न भाव मूलाधार चक्र के भाव से मेल खाते हैं, तो किसी से उत्पन्न भाव स्वाधिष्ठान से या ह्रदय चक्र से आदि। बच्चों के गानों से सबसे अधिक प्रभाव हृदय पर पड़ता है, तो रोमांटिक गानों का सर्वाधिक प्रभाव यौनचक्रों पर पड़ता है। वास्तव में, कुण्डलिनी तो मन में ही बन रही होती है, चाहे कोई भी चक्र क्रियाशील हो रहा हो। इसीलिए तो कहते हैं कि हर प्रकार का संगीत लाभदायक ही होता है। इसी तरह, सृष्टि की प्रत्येक ध्वनी में संगीत है, क्योंकि सभी प्रकार की ध्वनियाँ कुण्डलिनी को उत्तेजित करती हैं।

प्रत्येक संवेदना विचारों के प्रति साक्षीभाव के साथ अपने ऊपर कुंडलिनी को व्यक्त करने में मदद करती है। श्रवण सबसे शुद्ध और शक्तिशाली संवेदनाओं में से एक है।

कुण्डलिनी योग के साथ संगीत सुनना एक अद्भुत अनुभव है। उदाहरण के लिए, ऊपर वाले भाग की अन्य संवेदनाओं के साथ श्रवण की संवेदना भी हृदय चक्र पर केन्द्रित हो जाती है। बंधों के माध्यम से नीचे वाली संवेदनाएं/प्राण भी ऊपर आती हुई, ह्रदय चक्र पर केन्द्रित हो जाती हैं। ऊपर व नीचे वाली संवेदनाएं आपस में टकरा कर सूक्ष्म विस्फोट पैदा करती हैं, जिससे हृदय चक्र पर कुण्डलिनी चमकने-दमकने लगती है, और आनंद पैदा करते हुए बहुत स्पष्ट हो जाती है। इसी तरह, सहस्रार चक्र के लिए, नीचे से ऊपर जाती हुई संवेदनाएं/प्राण श्रवण संवेदना को भी ऊपर ले जाती हैं, तथा सहस्रार पर कुण्डलिनी को चमकाती हैं। इसी तरह अन्य चक्रों के मामले में भी समझना चाहिए।

वास्तव में हमने संगीत को कभी समझा ही नहीं, भंवरे की गुंजन भी एक प्रकार से संगीत ही हैं  जिसे रोज सुना जाये तो आदमी धीरे धीरे विचार शून्य हो जाता हैं ।

संगीत से हो सकता है कुंडलिनी जागरण

जिस प्रकार आतशी कांच द्वारा एक-दो इंच जगह की सूर्य किरणें एकत्र कर देने से अग्नि उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार आहत नाद पर ध्यान एकाग्र होने से मन की बिखरी शक्तियां एकाग्र होकर साधक को सिद्धावस्था में ले जाती हैं

यौगिक चक्र एवं संगीत- डॉ. मृत्युंजय शर्मा तथा भूपेश ठाकुर

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