कुंडलिनी-ध्यानचित्र का वाममार्गी तांत्रिक यौनयोग में महत्त्व

मित्रो, मैं इस पोस्ट में शिवपुराण में वर्णित राक्षस अंधकासुर, दैत्यगुरु शुक्राचार्य, देवासुर संग्राम और शिव के द्वारा देवताओं की सहायता का रहस्योदघाटन करूंगा।

शिवपुराणोक्त अन्धकासुर कथा

एक बार भगवान शिव पार्वती के साथ काशी से निकलकर कैलाश पहुंचते हैं, और वहाँ भ्रमण करने लगते हैं। एकदिन शिव ध्यान में होते हैं कि तभी देवी पार्वती पीछे से आकर उनके मस्तक पर हाथ रखती हैं, जिससे शिव के माथे की गर्मी से उनकी अंगुली से एक पसीने की बूंद जमीन पर गिर जाती है। उससे एक बालक का जन्म होता है, जो बहुत कुरूप, रोने वाला और अंधा होता है। इसलिए उसका नाम अंधकासुर रखा जाता है। उधर राक्षस हिरण्याक्ष पुत्र न होने से बहुत दुखी रहता है। वह शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तप करता है, और उनसे पुत्र-प्राप्ति का वर मांगता है। शिव अंधक को उसे सौंप देते हैं। वह शिवपुत्र अंधक की प्राप्ति से अति प्रसन्न और उत्साहित होकर स्वर्ग पर चढ़ाई कर देता है, जिससे देवता स्वर्ग से भागकर धरती पर छिप कर रहने लगते हैं। वह धरती को समुद्र में डुबोकर पाताल लोक में छुपा देता है। फिर भगवान विष्णु देवताओं की सहायता करने के लिए वाराह के रूप में अवतार लेकर हिरण्याक्ष को मार देते हैं और धरती को अपने दाँतों पर रखकर पाताल से ऊपर उठाकर पूर्ववत यथास्थान रख देते हैं। उधर बालक अंधक जब अपने भाई प्रह्लाद आदि अन्य राक्षस बालकों के साथ खेल रहा होता है, तो वे उसे यह कह कर चिढ़ाते हैं कि वह अंधा और कुरूप है इसलिए वह अपने पिता हिरण्याक्ष की जगह राजगद्दी नहीं संभाल सकता। इससे अन्धक दुखी होकर भगवान शिव को खुश करने के लिए घोर तप करने लगता है। वह धुएं वाली अग्नि को पीता है, अपने मांस को काटकाट कर हवनकुण्ड में हवन करता है। इससे वह हड्डी का कंकाल मात्र बच जाता है। शिवजी उससे प्रसन्न होकर उसके मांगे वर के अनुसार उसे बिल्कुल स्वस्थ व आँखों वाला कर देते हैं, और कहते हैं कि वह केवल तभी मरेगा जब किसी महान योगी की पतिव्रता स्त्री को अपनी स्त्री बनाने का प्रयास करेगा। वर से खुश और दंभित होकर अन्धक उग्र भोगविलास में डूब जाता है, अनेकों कामिनियों के साथ विभिन्न रतिवर्धक स्थानों में रमण करता है, और अपनी आयु का दुरुपयोग करता है। वह साधुओं और देवताओं पर भी बहुत अत्याचार करता है। वे सब इकट्ठे होकर भगवान शिव के पास जाते हैं। शिव उनकी मदद करने के लिए कैलाश पर पार्वती के साथ विहार करने लगते हैं। एकदिन अन्धक के सेवक की नजर देवी पार्वती पर पड़ती है, और वह यह बात अन्धक को बताता है। अंधक पार्वती पर आसक्त होकर शिव को गंदा तपस्वी, जटाधारी आदि कह कर उनका अपमान करता है और कहता है कि उतनी सुंदर नारी उसी के योग्य है, न कि किसी तपस्वी के। फिर वह सेना के साथ शिव से युद्ध करने चला जाता है। उसे शिव का गण वीरक अकेले ही युद्ध में हरा कर भगा देता है, और उसे शिवगुफा के अंदर प्रविष्ट नहीं होने देता। फिर शिव पाशुपत मंत्र प्राप्त करने के लिए दूर तप करने चले जाते हैं। मौका देखकर अंधक फिर हमला करता है। पार्वती अकेली होती है गुफा में। उसे वीरक भी नहीं रोक पा रहा होता है। डर के मारे पार्वती सभी देवताओं को सहायता के लिए बुलाती है, जो फिर स्त्री रूप में अस्त्रशस्त्र लेकर पहुंच जाते हैं। स्त्री रूप इसलिए क्योंकि देवी के कक्ष में पुरुष रूप में जाना उन्हें अच्छा नहीं लगता। घोर युद्ध होता है। अंधक का सैनिक विघस सूर्य चन्द्रमा आदि देवताओं को निगल जाता है। चारों ओर अंधेरा छा जाता है। हालांकि वे किसी दिव्य मंत्र के जाप से उसके मुंह में घूँसे मारकर बाहर भी निकल आते हैं। तभी शिव भी वहाँ पहुँच जाते हैं। उससे उत्साहित गण राक्षसों को मारने लगते हैं। पर राक्षस गुरु शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से सभी मृत राक्षसों को पुनर्जीवित कर देते हैं। शिव को यह बात शिवगण बता देते हैं कि शुक्राचार्य उनकी दी हुई विद्या का कैसे दुरूपयोग कर रहा है। इससे नाराज होकर शिव उसे पकड़ कर लाने के लिए नंदी बैल को भेजते हैं। नंदी राक्षसों को मारकर उसे पकड़कर ले आता है। शिव शुक्राचार्य को निगल जाते हैं। वह शिव के उदर में बाहर निकलने का छेद न पाकर चारों तरफ ऐसे घूमता है, जैसे वायु के वेग से घूम रहा हो। वह वहाँ से निकलने का वर्षों तक प्रयास करता है, पर निकल नहीं पाता। फिर शिव उसे शुक्र अर्थात वीर्य रूप में अपने लिंग से बाहर निकालते हैं। इसीलिए उनका नाम शुक्राचार्य पड़ा।

दरअसल संजीवनी विद्या उन्हें एक बहुत पुराने समय में शिव ने दी होती है। वह एक बहुत सुंदर स्थान पर शिव का लिंग स्थापित करते हैं। उस पर वे शिव की कठिन अराधना करते हैं। अग्निधूम को पीते हैं, और कठिन तप करते हैं। उससे शिव लिंग से प्रकट होकर उन्हें संजीवनी विद्या देते हैं, और वर देते हैं कि वे भविष्य में उनके उदर में प्रविष्ट होकर उनके वीर्य रूप में जन्म लेंगे। वे लिंग का नाम शुक्रेश और उनके द्वारा स्थापित कुएँ का नाम शुक्रकूप रख देते हैं। वे भक्तों द्वारा उस कूप में स्नान करने का अमित फल बताते हैं।

अंधकासुर कथा का कुंडलिनी-आधारित विश्लेषण

शुक्र मतलब ऊर्जा या तेज। शुक्र, ऊर्जा और तेज तीनों एकदूसरे के पर्याय हैं। शुक्राचार्य को निगल गए, मतलब योगी शिव ने खेचरी मुद्रा में जिह्वा तालु से लगाकर कुंडलिनी ऊर्जा को आगे के नाड़ी चैनल से नीचे उतारा, जिससे वीर्यशक्ति के रूपान्तरण से निर्मित कुंडलिनी ऊर्जा मूलाधार चक्र से पीठ की सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए ऊपर चढ़ गई। वायु के वेग से वे इधरउधर भटकने लगे, मतलब साँसों की गति से कुंडलिनी ऊर्जा माइक्रोकोस्मिक औरबिट लूप में गोल-गोल घूमने लगी। शुक्राचार्य को बहुत समय तक घुमाने के बाद योगी शिव ने उन्हें वीर्य मार्ग से बाहर निकाल दिया, मतलब बहुत समय तक शक्ति को चक्रोँ में घुमाते हुए व उससे चक्रोँ पर इष्ट देव या गुरु आदि के रूप में कुंडलिनी चित्र का ध्यान करने के बाद जब वह शक्ति क्षीण होने लगी मतलब शुक्राचार्य शिथिल पड़ने लगे, तब उसे वीर्यरूप में बाहर निकाल दिया। उन्हें योगी शिव ने पुत्र रूप में स्वीकार किया, मतलब कि जिसे ओशो महाराज कहते हैं, ‘संभोग से समाधि’, वह तरीका अपनाया। इस यौनतंत्र में सहस्रार चक्र के समाधि चित्र को स्खलन-संवेदना के ऊपर आरोपित किया जाता है। इससे वही बात हुई जैसी एक पिछली पोस्ट में लिखी गई है कि गंगा नदी के किनारे पर उगी सरकंडे की घास पर शिववीर्य से बालक कार्तिकेय का जन्म हुआ, मतलब शुक्राचार्य ने कार्तिकेय के रूप में शिवपुत्रत्व प्राप्त किया। उपरोक्त कथा के ही अनुसार सबसे प्रसिद्ध, प्रिय व शक्तिशाली लिंग शुक्रलिंग ही माना जाएगा, क्योंकि यह पूरी तरह से असली है, अन्य तो प्रतीतात्मक ज्यादा हैं, जैसे कोई पाषाणलिंग होता है, कोई पारदलिंग, तो कोई हिमलिंग आदि। शुक्रकूप आसपास में एक ठंडे जल का कुआँ है, जो संभोगतंत्र में सहयोगी है, क्योंकि जैसा एक पिछली पोस्ट में दिखाया गया है कि कैसे ठंडे जल से स्नान यौनऊर्जा को गतिशील व कार्यशील बनाने का काम करता है।

शुक्राचार्य जो राक्षसों को जिन्दा कर रहे थे, उसका यही मतलब है कि वीर्यशक्ति बाह्यगामी होने के कारण संसारमार्गी मानसिक दोषों, आसक्तिपूर्ण भावनाओं और विचारों को बढ़ावा दे रही थी। शिव ने नंदी को शुक्राचार्य को पकड़ कर लाने को कहा, इसका मतलब है कि नंदी अद्वैत भाव का परिचायक है क्योंकि वह एक ऐसा शिवगण है जिसमें बैल के रूप में पशु और गण के रूप में मनुष्य एक साथ विद्यमान है। वह एक यिन-यांग मिश्रण है। अद्वैत से कुंडलिनी शक्ति को मूलाधार से ऊपर चढ़ने में मदद मिलती है।

देवी पार्वती ने महादेव शिव की आँखें बंद कीं, इससे वे अंधे जैसे हो गए। इसको यह समझाने के लिए कहा गया है कि कोई भावी योगी अज्ञान वाली अवस्था में था, न तो उसे लौकिक व्यवहार का ज्ञान था, और न ही आध्यात्मिक ज्ञान। फिर वह इश्कविश्क़ के चक्कर में पड़ गया। उससे उसकी शक्ति तो घूमने लगी, पर वह बिना कुंडलिनी चित्र के थी। कुंडलिनी चित्र माने ध्यान चित्र आध्यात्मिक ज्ञान की उच्चावस्था में बनता है। आध्यात्मिक ज्ञान लौकिक ज्ञान व अनुभव के उत्कर्ष से प्राप्त होता है। ऐसा होने में जीवन का लम्बा समय बीत जाता है। ज्ञानविज्ञानरहित प्यार-मोहब्बत से क्या होता है कि आदमी यौन शक्ति को ढंग से रूपान्तरित और निर्देशित नहीं कर सकता, जिससे उसका क्षरण या दुरुपयोग होता है। वही दुरुपयोग अंधक नाम वाला पुत्र है। इसका सीधा सा अर्थ है कि अमुक भावी योगी ने शक्ति को घुमाया तो जरूर। ऐसा उक्त कथानक की इस बात से सिद्ध होता है कि पार्वती ने दोनों नेत्रों को एकसाथ बंद किया, मतलब यिन-यांग संतुलित हो गए। पर परिपक्वता की कमी से इस संतुलन से किंचित चमक रहे कुंडलिनी चित्र को समझ नहीं पाया और उसे जानबूझकर व्यर्थ समझ कर त्याग दिया। चमक बुझने से स्वाभाविक है कि अंधेरा छा गया, जिसे आँखों को बंद करने के रूप में दिखाया गया है। क्योंकि शक्ति से मस्तिष्क में जो उच्च स्पष्टता के साथ छवि बनती है, उसे ही पुत्र कहा जाता है, जैसे कि इस ब्लॉग की एक पोस्ट में सिद्ध भी किया गया था। बिना किसी भौतिक सहवास के असली या भौतिक पुत्र तो पैदा हो ही नहीं सकता, वह भी मिट्टी-पत्थर से भरी जमीन के ऊपर या सरकंडों के ऊपर। क्योंकि इस पोस्ट के भावी योगी के मस्तिष्क में उस शक्ति से अंधेरा ही घनीभूत हुआ, इसलिए उसे पुत्र अंधक के रूप में दिखाया गया। चूंकि अँधेरे से भरा व्यक्ति किसी को प्रिय व कार्यक्षम नहीं लगता, इसलिए इसे ऐसा दिखाया गया है कि वह अंधकासुर सबको अप्रिय था और उसके बालमित्र उसे राजगद्दी के अयोग्य बताकर उसका मजाक उड़ाते थे। स्वाभाविक है कि भावी योगी दुनिया में सम्मान, सुखसमृद्धि और यहाँ तक कि जागृति के रूप में सम्पूर्णता को प्राप्त करने के लिए भरपूर प्रयास करता है, क्योंकि उसमें बहुत शक्ति होती है, केवल स्थिर ध्यानचित्र की ही कमी होती है। उसे दुनिया में ठोकरें खाने के बाद इस कमी का अप्रत्यक्ष अहसास हो ही जाता है, इसलिए वह कुंडलिनी ध्यानयोग के लिए एकांत में चला जाता है। इसे ही ऐसे दिखाया गया है कि अंधक फिर वन में जाकर शिव या ब्रह्मा का ध्यान करते हुए घोर तप करता है। अपने मांस को टुकड़ों में काटकाट कर वह उन्हें अग्नि में होम करता रहता है। साथ में अग्निधूम का पान करता है। इसका मतलब है कि भावी योगी कठिन हठयोग करता है, जिससे उसकी अतिरिक्त चर्बी तो घुलती ही है, साथ में मांसल शरीर भी योगाग्नि से जलकर दुबला हो जाता है। इस दहन से जो कार्बन डायक्साइड गैस निकलती है, उसे ही धुआँ कहा है। क्योंकि योग में अक्सर सांस को अंदर रोक कर रखा जाता है, इसलिए उसे ही धुएं को पीना कहा गया है। जब वह इतना कमजोर हो जाता है कि वह हड्डी का ढांचा जैसा दिखने लगता है, तब भगवान शिव उसे दर्शन दे देते हैं। इसका मतलब है कि जब हठयोगाभ्यास करते हुए काफी समय हो जाता है, जिससे योगी को अपने सहस्रार चक्र में बढ़ी हुई सात्विकता के कारण अपना शरीर अस्थिपंजर की तरह हल्का लगने लगता है, तब कुंडलिनी जागृत हो जाती है। मतलब अदृश्य या सुप्त कुंडलिनी शक्ति मानसिक शिवचित्र के रूप में जागृत हो जाती है। अब शिव अंधक को बिल्कुल स्वस्थ व सुंदर बना देते हैं। ठीक है, कुंडलिनी जागरण से ऐसा ही अकस्मात और सकारात्मक रूपान्तरण होता है। अब वह शिव से वर मांगता है कि वह कभी न मरे। शिव कहते हैं कि ऐसा सम्भव नहीं। विश्व की रक्षा के लिए भी यह जरूरी है। अमरता पाकर तो कोई भी अत्याचारी बनकर दुनिया को तबाह कर सकता है, क्योंकि उसे रोकने व डराने वाला कोई नहीं होगा। इसलिए ब्रह्मा उससे कोई न कोई मौत का कारण चुनने को कहते हैं, बेशक वह असम्भव सा ही क्यों न लगे। इस पर ब्रह्मा कहते हैं कि जब वह माँ के समान आदरणीय महिला को पत्नि बनाना चाहेगा, वह तब मरेगा। अब ये तंत्र की गूढ़ बातें हैं, जिनके यदि रहस्य से पर्दा उठाया जाए, तो आम जनमानस को अजीब लग सकता है। तिब्बतन यौनतंत्र में गुरु की यौनसाथी उनकी अनुमति से उनके शिष्यों को तांत्रिक यौनकला प्रयोगात्मक रूप में सिखाती है। गुरुपत्नि को माँ के समान माना गया है। मतलब कि तांत्रिक यौनयोग सीखने के बाद अंधक अंधी दुनियादारी से उपरत होकर अपनी आत्मा या अपने आप में शांत हो जाएगा, मतलब वह एक प्रकार से मर जाएगा। बाद में हुआ भी वैसा ही, मरने के बाद उसे शिव ने अपना गण बना लिया, मतलब वह मुक्त हो गया। आम मृत्यु के बाद तो कोई मुक्त नहीं होता। इसका एक मतलब यह भी है कि जब विवाह या सम्भोग के अयोग्य सम्मानित नारी से प्यार होता है, तब उसका रूप बारबार मन में आने लगता है, जिससे वह समाधि का रूप ले लेता है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था। ब्रह्मा के वर को पाकर अन्धक राजा बन गया, और बहुत अय्याश हो गया। सुंदर व सुडोल शरीर तो उसे मिला ही था, इसलिए वह अनगिनत कामिनियों के साथ विभिन्न मनोहर स्थानों में रमण करते हुए अपना बहुमूल्य समय नष्ट करने लगा। इस यौन शक्ति के बल से वह बहुत पाप भी करने लगा। देवताओं को स्वर्ग से भगा कर वहाँ खुद राज करने लगा। जब कोई बुरे काम करेगा तो शरीर रूपी स्वर्ग में स्थित देवता दुखी होकर भागेंगे ही, क्योंकि देवताओं का मुख्य उद्देश्य है शरीर से अच्छे काम करवाना। अब मैं इससे जुड़ी हाल की घटना बताता हूँ और फिर पोस्ट को खत्म करता हूँ क्योंकि नहीं तो यह बहुत लंबी होकर पढ़ने में मुश्किल हो जाएगी। अगले हफ्ते तक शेष कथा के रहस्य को उजागर करने की कोशिश करूंगा, क्योंकि अभी मैं लगभग इतना ही समझ सका हूँ। हो सकता है कि आप मेरे से पहले उजागर कर दें, यदि ऐसा है तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखना।

आफताब-श्रद्धा से जुड़ा बहुचर्चित लवजिहाद काण्ड

आजकल बहुचर्चित आफताब पूनावाला से संबंधित मर्डर मिस्ट्री उपरोक्त अंधक कथा से बहुत मेल खा रही है। सूत्रों के अनुसार वह मुस्लिम युवक श्रद्धा नामक हिंदु लड़की के साथ लिव इन रिलेशनशिप में था। वह डेटिंग ऐप के माध्यम से अपना घरपरिवार छोड़कर उसके साथ लम्बे अरसे से रह रही थी। कई मकान मालिकों को तो वह उसे अपनी पत्नि तक बता कर साथ रखता था, क्योंकि यहाँ के परिवेश में लिव इन रिलेशनशिप को अच्छा नहीं समझा जाता। चोरी छुपे उसके 20 अन्य हिंदु लड़कियों के साथ भी प्रेमसंबंध थे। श्रद्धा को शायद यह बात पता चली होगी और वह उसे ऐसा करने से रोककर उससे शादी करना चाहती होगी। इसको लेकर झगड़े भी हुए और मारपीट भी। अंततः उसने उसका गला दबाकर हत्या कर दी और बिना अफ़सोस के उसके पेंतीस टुकड़े करके उन्हें फ्रिज में पैक कर दिया। धीरेधीरे करके वह उन्हें निकट के जंगल में फ़ेंकता रहा। छः महीने बाद श्रद्धा के पिता द्वारा लिखी शिकायत के बाद पुलिस उसे पकड़ सकी। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि आज की तथाकथित आधुनिक महिलाओं को प्रसन्न करने के लिए कैसे आफताब की तरह शातिर, बेईमान, नशेड़ी, धूम्रपानी, मांसभक्षी, हिंसक और धोखेबाज बनना पड़ता है, हालाँकि ऐसे अतिवाद को कोई सभ्य व पढ़ालिखा समाज कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता, जिसमें मानवता का हनन होता हो। दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि बहुत से हिन्दुओं द्वारा शिवपुराण का कहीं गलत अर्थ तो नहीं निकला जा रहा, या बिना जानेबूझे कहीं वैसी विकृत सोच अवचेतन मन में तो नहीं बैठी हुई है। पुराण से प्राप्त आम धारणा के अनुसार महादेव शिव बिना कुलपरम्परा वाले एक भूतिया किस्म के आदमी थे, जिनको पति रूप में पाने के लिए पार्वती कई जन्मों तक घरपरिवार को छोड़कर भटकती रही। पति-पत्नि के परस्पर प्रेम को परवान चढ़ाने के लिए कुछ हद तक ऐसा पागलपन ठीक भी है, पर वह भी कुछ जरूरी शर्तों के साथ ही पूरा सफल होता है, और वैसे भी अति तो कहीं भी अच्छी नहीं है, ख़ासकर उस कौम के व्यक्ति के साथ तो बिल्कुल भी संबंध अच्छा नहीं है, जिनके तथाकथित लवजिहाद से जुड़े जालिमपने और जाहिलियत के उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं। सब पता होते हुए भी बारम्बार गलती करना तो ऐसा लगता है कि या तो परिवार में बच्चों को सही व संस्कारपूर्ण शिक्षा नहीं दी जा रही या ऐसी लड़कियों के ऊपर जादूटोना कर दिया गया है, या यह हिन्दुओं के पवित्र और ज्ञानविज्ञान से भरे शास्त्रों और पुराणों को बदनाम करने की एक सोचीसमझी और बहुत बड़ी साजिश चल रही है। कई लोग सख्त कानून की कमी को भी मुख्य वजह बता रहे हैं। कुछ लोग विकृत दूरदर्शन, ऑनलाइन व बॉलीवुड कल्चर को भी बड़ी वजह मानते हैं। कई लोग लिव इन रिलेशनशिप और डेटिंग एप्स को दोष दे रहे हैं। इससे हिंदु पुरुषों को भी शिक्षा लेनी चाहिए और महिलाओं की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए। जिसके अंदर ध्यान-कुंडलिनी चित्र नहीं है, यदि वह भी यौनतंत्र का अभ्यास करे, तो उसका हाल भी अंधक जैसा हो सकता है, जैसा आपने ऊपर पढ़ा, फिर यदि जिसको यौनतंत्र का कखग भी पता नहीं, यदि वह यौनसंबंधों के मामले में मनमर्जी करे, तो उसका उससे भी कितना बुरा हाल हो सकता है, यह उपरोक्त हाल की घटना से प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है।

प्रेमरोग से बचने का बेजोड़ उपाय

दोस्तों, इस समस्या का हल भी है। सौभाग्य से आज “शरीरविज्ञान दर्शन~एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र(एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से उपलब्ध है। यह ईबुक के रूप में भी और प्रिंट पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है। इसमें ऐसा लगता है कि शिवपुराण का विवेचन आधुनिक शैली में किया गया है, जो हर किसी को समझ आ जाए, और उसके बारे में गलतफहमी दूर हो जाए। यह सत्य जीवनी और सत्य घटनाओं पर आधारित है। इसमें आधारभूत यौनयोग पर सामाजिकता के साथ प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक में स्त्री-पुरुष संबंधों का आधारभूत सिद्धांत भी छिपा हुआ है। यदि कोई प्रेमामृत का पान करना चाहता है, तो इस पुस्तक से बढ़िया कोई भी उपाय प्रतीत नहीं होता। इस पुस्तक में प्रेमयोगी वज्र ने अपने अद्वितीय आध्यात्मिक व तांत्रिक अनुभवों के साथ अपनी सम्बन्धित जीवनी पर भी थोड़ा प्रकाश डाला है। इस उपरोक्त “शरीरविज्ञान दर्शन” पुस्तक को एमाजोन डॉट इन पर एक गुणवत्तापूर्ण व निष्पक्षतापूर्ण समीक्षा में पांच सितारा, सर्वश्रेष्ठ, सबके द्वारा अवश्य पढ़ी जाने योग्य व अति उत्तम (एक्सेलेंट} पुस्तक के रूप में समीक्षित किया गया है। गूगल प्ले बुक की समीक्षा में भी इसे फाईव स्टार व शांतिदायक (कूल) आंका गया है। कुछ गुणग्राही पाठक तो यहाँ तक कहते हैं कि अगर इस पुस्तक को पढ़ लिया तो मानो जैसे सबकुछ पढ़ लिया। आशा है कि पुस्तक पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी।

कुंडलिनी योग बनाम परमाणु विश्वयुद्ध

कुंडलिनी ऊर्जा ही नीलकंठ शिव महादेव के हलाहल विष को नष्ट करती है

दोस्तों, मैं हाल ही में एक स्थानीय मेले में गया। वहाँ मैं ड्रेगन ट्रेन को निहारने लगा। उसका खुले दांतों वाला मुंह दिखते ही मेरे अंदर ऊर्जा मुलाधार से ऊपर उठकर घूमने जैसी लग जाती थी। हालांकि यह हल्का आभास था, पर आनंद पैदा करने वाला था, लगभग वैसा ही जैसा शिवलिंगम के दर्शन से महसूस होता है। स्थानीय संस्कृति के अनुसार बाहरी अभिव्यक्ति के तरीके बदलते रहते हैं, पर मूल चीज एक ही रहती है। इसी के संबंध में मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे गुस्से आदि से कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क से नीचे उतरकर यौद्धा अंगों को चली जाती है। इससे मस्तिष्क में स्मरण शक्ति और भावनाएं क्षीण हो जाती हैं। भावनाएँ बहुत सारी ऊर्जा को खाती हैं। इसीलिए तो तीखी भावनाओं या भावनात्मक आघात के बाद आदमी अक्सर बीमार पड़ जाता है। आपने सुना होगा कि फलां आदमी अपने किसी प्रिय परिचित को खोने के बाद बीमार पड़ गया या चल बसा। गहरे तनाव के दौरान दिल का दौरा पड़ना तो आजकल आम ही हो गया है। शरीरविज्ञान दर्शन से अनियंत्रित भावनाओं पर लगाम लगती है। उपरोक्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ड्रेगन के ध्यान से या उसको अपने शरीर पर आरोपित करने से कुंडलिनी शक्ति विभिन्न चक्रोँ पर उजागर होने लगती है। सम्भवतः बुद्धिस्टों के रैथफुल डाइटि भी इसी सिद्धांत से कुंडलिनी की मदद करते हैं। दरअसल विभिन्न धर्मशास्त्रों में जो आचार शिक्षा दी जाती है, उसके पीछे यही कुंडलिनी विज्ञान छुपा है। सत्य बोलो, चोरी न करो, क्रोध न करो, मीठा बोलो, हमेशा प्रसन्न व हँसमुख रहो, आसक्ति न करो आदि वचन हमें अवैज्ञानिक लगते हैं, पर इनके पीछे की वजह बहुमूल्य ऊर्जा को बचा कर उसे कुंडलिनी को उपलब्ध कराना ही है, ताकि वह जल्दी से जल्दी जागृत हो सके। कइयों को इसमें केवल स्वास्थ्य विज्ञान ही दिखता है, पर इसमें आध्यात्मिक विज्ञान भी छुपा होता है। ड्रेगन, शेर आदि हिंसक जीवों की ऊर्जा जब मस्तिष्क से नीचे उतरती है, तब सबसे पहले चेहरे, जबड़े और गर्दन पर आती है। इसीलिए तो क्रोध भरे मुख से गुर्राते हुए ये जबड़े और गर्दन की कलाबाजी पूर्ण गतियों से शिकार के ऊपर टूट पड़ते हैं। फिर कुछ अतिरिक्त ऊर्जा आगे की टांगों पर भी आ जाती है, जिससे ये शिकार को कस कर पकड़ लेते हैं। जब इन क्रियाओं से दिल थक जाता है, तब अतिरिक्त ऊर्जा दिल को भी मिलती है। उसके बाद ऊर्जा पेट को पहुंचती है, जिससे भूख बढ़ती है। इससे वह और हमलावर हो जाता है, क्योंकि वहाँ से ऊर्जा बैक चैनल से वापिस ऊपर लौटने लगती है, और टॉप पर पहुंचकर एकदम से जबड़े को उतर जाती है। जब इतनी मेहनत के बाद भी शिकार काबू में न आकर भागने लगता है, तो ऊर्जा टांगों में पहुंच कर शिकारी को उसके पीछे भगाने लगती है। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा मस्तिष्क को वापिस चली जाती है, और शिकारी पशु थक कर बैठ जाता है। फिर वह अपनी ऊर्जा को नीचे उतारने के लिए चेहरे को विकृत नहीं करता क्योंकि तब उसे पता लग जाता है कि इससे कोई फायदा नहीं होने वाला। वह इतना थक जाता है कि उसके पास ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा नहीं बची होती। ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा चाहिए होती है। इसीलिए उस समय वह गाय की तरह शांत, दयावान, अहिंसक और सदगुणों से भरा लगता है, उसकी स्मरणशक्ति और शुभ भावनाएँ लौट आती हैं, क्योंकि उस समय उसका मस्तिष्क ऊर्जा से भरा होता है। यह अलग बात है कि मस्तिष्क से नीचे उतरी हुई ऊर्जा उसे अंधकार के रूप में महसूस होती है, कुंडलिनी चित्र के रूप में नहीं, क्योंकि निम्न जीव होने से उसमें दिमाग़ भी कम है, और वह कुंडलिनी योगी भी नहीं है। दरअसल जो शिव ने विष ग्रहण करके उसे गले में फँसा कर रखा था, वह आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त ऊर्जा ही है। विष का पान किया, मतलब आम दुनिया की बुरी बातें और बुरे दृश्य नकारात्मक ऊर्जा के रूप में कानों और आँखों आदि से अंदर प्रविष्ट हो गए। वह नकारात्मक ऊर्जा जब विशुद्धि चक्र पर पहुंचती है, तब वह कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित होकर वहाँ लम्बे समय तक फंसी रहती है। इसकी वजह है गर्दन की स्थिति और बनावट। गर्दन सिर और धड़ के जोड़ की तरह है, जो सबसे ज्यादा गतिशील है। जैसे पाईप आदि के बीच में स्थित लचीले और मुलायम जोड़ों पर पानी या उसमें मौजूद मिट्टी आदि जम कर फंस जाते हैं, उसी तरह गर्दन में ऊर्जा फंसी रह जाती है। इसीलिए तो भगवान शिव से वह विष न तो उगलते बना और न ही निगलते, वह गले में ही फंसा रह गया, इसीलिए शिव नीलकंठ कहलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जिसने विशुद्धि चक्र को सिद्ध कर दिया, उसने बहुत कुछ सिद्ध कर लिया। दरअसल अगर कुंडलिनी शक्ति को गले से नीचे के किसी चक्र पर उतारा जाए, तो वह एकदम से घूम कर दुबारा मस्तिष्क में पहुंच जाती है, और वहाँ तनाव के दबाव को बढ़ाती है। हालांकि फिर ज्यादातर मामलों में वह सकारात्मक या अद्वैतात्मक कुंडलिनी ऊर्जा के रूप में महसूस होती है, नकारात्मक या द्वैतात्मक ऊर्जा के रूप में नहीं। हृदय चक्र पर भी काफी देर तक स्थिर रहती है, नाभि चक्र और उसके नीचे के चक्रोँ से तो पेट की सिकुड़न के साथ एकदम वापिस मुड़ने लगती है। यद्यपि फिर यह सकारात्मक कुंडलिनी ऊर्जा है, लेकिन मस्तिष्क में इसके वापस बुरे विचारों में परिवर्तित होने की संभावना तब भी बनी ही रहती है। वह ऊर्जा योद्धा अंगों से उठापटक भी करवा सकती है। इसीलिए उसे गले के विशुद्धि चक्र पर रोककर रखा जाता है। मतलब कि अगर भगवान शिव तनाव रूपी जहर को गले से नीचे उतारकर पी जाए, तो वे विनाशकारी तांडव नृत्य से दुनिया में तबाही भी मचा सकते हैं, या वह रूपांतरित जहर उनके पेट से चूस लिया जाएगा, और वह रक्त में मिलकर पुनः मस्तिष्क में पहुंच जाएगा। मस्तिष्क में  जहर पहुंचने का अर्थ है, अज्ञानरूपी या मनोदोष रूपी अंधकार के रूप में मृत्यु की सम्भावना। मनोदोषों से दुनिया में फिर से तबाही का खतरा पैदा हो जाएगा। सम्भवतः कुंडलिनी शक्ति भोजन के साथ पेट में पहुंचती है, और वहाँ से इसी तरह मस्तिष्क में पहुंच जाती है। हालांकि, तथाकथित विकृत ऊर्जा रूपी जहर पीने के बाद, मस्तिष्क में पुन: अवशोषण के साथ, थोड़े अतिरिक्त विचारशील प्रयास के साथ लंबे समय तक इसके कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित बने रहने की अधिकतम संभावना होती है। शिव जहर को उगल भी नहीं सकते, क्योंकि अगर वे उसे बाहर उगलते हैं तो भी उससे जीवों का विनाश हो सकता है। आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाएं यदि बदजुबानी, गुस्से, बुरी नजर या मारपीट आदि के रूप में बाहर निकल जाएं, तो स्वाभाविक रूप से वे अन्य लोगों और जीवजंतुओं का अहित ही करेंगी। उससे समाज में आपसी वैमनस्य और हिंसा आदि दोष फैलेंगे। इसीलिए लोग कहते हैं कि फलां आदमी को गुस्सा तो बहुत आया पर वह उसे पी गया। दरअसल गुस्सा पीआ नहीं जाता, उसे गले में अटकाकर रखा जाता है, पीने से तो वह फिर से दिमाग़ में पहुंच जाएगा। इसीलिए कई लोगों को आपने परेशान होकर कहते हुए सुना होगा, मेरे तो गले तक आ गई। दरअसल कमजोर वर्ग के लोग ऐसा ज्यादा कहते हैं, क्योंकि न तो वे परेशानी को निगल सकते हैं, और न ही उगल सकते हैं, लोगों के द्वारा बदले में सताए जाने के डर से। दरअसल वे सबसे खुश होते हैं भोले शंकर की तरह, परेशानी को गले में फँसाए रखने के कारण। वे परेशान नहीं होते, परेशानी का उचित प्रबंधन करने के कारण। परेशान वे औरों को लगते हैं, क्योंकि उन्हें परेशानी को प्रबंधित करना नहीं आता। बहुत से लोगों को नीले गले वाले शिव बेचारे लग सकते हैं, पर बेचारे तो वे लोग खुद हैं, जो उन्हें समझ नहीं पाते। शिव किसीके डर की वजह से विष को गले में धारण नहीं करते, बल्कि अपने पुत्र समान सभी जीवों के प्रति दया के कारण ऐसा करते हैं। भगवान शिव सारी सृष्टि को बनाते और उसका पूरा कार्यभार सँभालते हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि उनका दिमाग़ भी तनाव और अवसाद से भर जाता होगा। वह तनाव गुस्से के रूप में दुनिया के ऊपर न निकले, इसीलिए वे तनाव रूपी विष को अपने गले में धारण करके रखते हैं। क्योंकि रक्त का रंग भी लाल-नीला ही होता है, जो शक्ति का परिचायक है, इसीलिए उनका गला नीला पड़ जाता है। वे एक महान योगी की तरह व्यवहार करते हैं।

समुद्र मंथन या पृथ्वी-दोहन मानसिक दोषों के रूप में विष उत्पन्न करता है, जिसे शिव जैसे महापुरुषों द्वारा पचाया या नष्ट किया जाता है

कहते हैं कि वह हलाहल विष समुद्रमंथन के दौरान निकला था। उसमें और भी बहुत सी ऐश्वर्यमय चीजें निकली थीं। समुद्र का मतलब संसार अर्थात पृथ्वी है, मंथन का मतलब दोहन है, ऐश्वर्यशाली चीजें आप देख ही रहे हैं, जैसे कि मोटरगाड़ियां, कम्प्यूटर, हवाई जहाज, परमाणु रिएक्टर आदि अनगिनत मशीनें। आज भी ऐसा ही महान मंथन चल रहा है। अनगिनत नेता, राष्ट्रॉध्यक्ष, वैश्विक संस्थाएं, वैज्ञानिक और तकनीशियन समुद्रमंथन के देवताओं और राक्षसों की तरह है। इस आधुनिक समुद्रमंथन से पैदा क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार आदि मन के दोषों के रूप में पैदा होने वाले विष को पीने की हिम्मत किसी में नहीं है। दुनिया दो धड़ों में बंट गई है। एकतरफ तथाकथित राक्षस या तानाशाह लोग हैं, तो दूसरी तरफ तथाकथित देवता या लोकतान्त्रिक लोग हैं। इसीलिए पूरी दुनिया आज परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। सभी को इंतजार है कि किसी महापुरुष के रूप में शिव आएंगे और इस विष को पीकर दुनिया को नष्ट होने से बचाएंगे।

आज के समय में जिम व्यायाम के साथ योग बहुत जरूरी है

बहुत सी खबरें सुनने को मिल रही हैं कि फलां कलाकार या सेलिब्रिटी या कोई अन्य जिम व्यायाम करते हुए दिल के दौरे का शिकार होकर मर गया। मुझे लगता है कि वे पहले ही तनाव से भरे जीवन से गुजर रहे होते हैं। इससे उनके दिल पर पहले ही बहुत बोझ होता है। फिर बंद कमरे जैसे घुटन भरे स्थान पर भारी व्यायाम से वह बोझ और बढ़ जाता है, जिससे अचानक दिल का दौरा पड़ जाता है। पहले योग से तनाव को कम कर लेना चाहिए। उसके बाद ही भौतिक व्यायाम करना चाहिए, अगर जरूरत हो तो, और जितनी झेलने की क्षमता हो। योग से नाड़ियों में ऊर्जा घूमने लगती है। जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के सहयोग से वह आसानी से मस्तिष्क से गले को या नीचे के अन्य चक्र को उतरती है, विशेषकर जब साथ में शरीरविज्ञान दर्शन की भी मन में भावना हो। शरीरविज्ञान दर्शन से मानसिक कुंडलिनी चित्र प्रकट होता है, और इसके साथ तालु-जीभ के परस्पर स्पर्ष के ध्यान से कुंडलिनी ऊर्जा अपने साथ ले जाता हुआ वह चित्र मस्तिष्क के दबाव को न बढ़ाता हुआ आगे के चैनल से होता हुआ किसी भी अनुकूल चक्र पर चमकने लगता है। इससे कुंडलिनी ऊर्जा व्यर्थ की बातचीत में बर्बाद न होकर विशुद्धि चक्र को भी पुष्ट करती है।

मस्तिष्क की ऊर्जा के सिंक या अवशोषक के रूप में विशुद्धि चक्र

ठंडे जल से नहाते समय जब नीचे से चढ़ती हुई ऊर्जा से मस्तिष्क का दबाव बढ़ जाता है या सिरदर्द जैसा होने लगता है, तब नीचे से आ रही ऊर्जा विशुद्धि चक्र पर कुंडलिनी प्रकाश और सिकुड़न के साथ घनीभूत होने लगती है। ऐसा लगता है कि नीचे का शरीर आटा चक्की का निचला पाट है, मस्तिष्क ऊपर वाला पाट है और विशुद्धि चक्र वह बीच वाला छोटा स्थान है, जिस पर दाना पिस रहा होता है। या ऊर्जा सीधी भी विशुद्धि चक्र को चढ़ सकती है, मस्तिष्क में अनुभव के बिना ही। जिसे ताउम्र प्रतिदिन गंगास्नान का अवसर प्राप्त होता था, उसे सबसे अधिक भाग्यवान, पुण्यवान और महान माना जाता था। “पंचस्नानी महाज्ञानी” कहावत भी शीतजल स्नान की महत्ता को दर्शाती है। गंगा के बर्फीले ठन्डे पानी में साल के सबसे ठंडे जनवरी (माघ) महीने के लगातार पांच पवित्र दिनों तक हरिद्वार के भिन्न-भिन्न पवित्र घाटों पर स्नान करना आसान नहीं है। आदमी में काफी योग शक्ति होनी चाहिए। पर यह जरूर है कि जिसने ये कर लिए, उसकी कुंडलिनी क्रियाशील होने की काफी सम्भावना है। इसीलिए कहते हैं कि ऐसे स्नान करने वाले को लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं, मुक्ति भी नहीं। ठंडे पानी से नहाने वाले व ठंडे स्थानों में रहने वाले लोग इसके विशुद्धि चक्र प्रभाव की वजह से बहुत ओजस्वी और बातचीत में माहिर लगते हैं। यह ध्यान रहे कि ठंडे पानी का अभ्यास भी अन्य योगाभ्यासों की तरह धीरेधीरे ही बढ़ाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य को कोई हानि न पहुंचे। जिस दिन मन न करे, उस दिन नहीं नहाना चाहिए। अभ्यास और सहजता का नाम ही योग है। यकायक और जबरदस्ती योग नहीं है। अगर किसी दिन ज्यादा थकान हो तो न करने से अच्छा योगाभ्यास धीरे और आराम से करना चाहिए। इससे आदमी सहज़ योगी बनना सीखता है। किसी दिन कमजोरी लगे या मन न करे तो उस दिन अन्य धार्मिक गतिविधियों को छोड़ा भी जा सकता है, मूलभूत हठ योगाभ्यास को नहीं, क्योंकि योग सांसों या प्राणों से जुड़ा होने के कारण जीवन का मूल आधार ही है, जबकि अन्य गतिविधियां ऐड ऑन अर्थात अतिरिक्त हैं। होता क्या है कि बातचीत के समय मन में उमड़ रही भावनाएं और विचार विशुद्धि चक्र पर कैद जैसे हो जाते हैं, क्योंकि उस समय विशुद्धि चक्र क्रियाशील होता है। जब योग आदि से पुनः विशुद्धि चक्र को क्रियाशील किया जाता है, तब वे वहाँ दबे विचार व भावनाएँ बाहर निकल कर नष्ट हो जाती हैं, जिससे शांति महसूस होती है, और आदमी आगे की नई कार्यवाही के लिए तरोताज़ा हो जाता है। यह ऐसे ही है, जैसे खाली ऑडियो रिकॉर्डर में ऑडियो कैसेट को घुमाने से उस पर आवाज दर्ज हो जाती है। जब उस लोडिड कैसेट को पुनः उसी तरह घुमाया जाता है, तो वह दबी हुई आवाज गाने के रूप में बाहर आ जाती है, जिसे हम सब सुनते हैं। इसी तरह सभी चक्रोँ पर होता है। यह मुझे बहुत बड़ा चक्र रहस्य लगता है, जिसके बारे में एक पुरानी पोस्ट में भी बात कर रहा था।

श्री शब्द एक महामंत्र के रूप में (धारणा और ध्यान में अंतर)

जिंदगी की भागदौड़ में यदि शरीरविज्ञान दर्शन शब्द का मन में उच्चारण न कर सको, तो श्रीविज्ञान या शिवविज्ञान या शिव या शविद या केवल श्री का ही उच्चारण कर लो, कुंडलिनी आनंद और शांति के साथ क्रियाशील हो जाएगी। श्री शब्द में बहुत शक्ति है, इसी तरह श्री यंत्र में भी। सम्भवतः यह शक्ति शरीरविज्ञान दर्शन से ही आती है, क्योंकि श्री शब्द शरीर से निकला हुआ शब्द और उसका संक्षिप्त रूप लगता है। श्री शब्द सबसे बड़ा मंत्र लगता है मुझे, क्योंकि यह बोलने में सुगम है और एक ऐसा दबाव पैदा करता है, जिससे कुंडलिनी क्रियाशील होने लगती है। सम्भवतः इसीलिए किसी को नाम से सम्बोधित करने से पहले उसके साथ श्री लगाते हैं। इसी तरह धार्मिक अवसरों व क्रियाकलापों को श्री शब्द से शुरु किया जाता है। इसी तरह शिव भी शरीर से मिलता जुलता शब्द है, शव भी। इसीलिए शक्तिहीन शिव को शव भी कहते हैं। अति व्यस्तता या शक्तिहीनता की अवस्था में केवल “श” शब्द का स्मरण भी धारणा को बनाए रखने के लिए काफी है। मन की भावनात्मक अवस्था में इसके स्मरण से विशेष लाभ मिलता है। “श” व “स” अक्षर में बहुत शक्ति है। इसीलिए श अक्षर से शांति शब्द बना है। श अक्षर के स्मरण से भी शांति मिलती है और कुंडलिनी से भी। श अक्षर से कुंडलिनी मस्तिष्क के नीचे के चक्रोँ मुख्यतः हृदय चक्र पर क्रियाशील होने लगती है। इससे आनंद के साथ शांति भी मिलती है, और मस्तिष्क का बोझ हल्का हो जाने से काम, क्रोध आदि मन के जंगी दोष भी शांत हो जाते हैं। इसी तरह श अक्षर से ही शक्ति शब्द बना है, जो कुंडलिनी का पर्याय है। यह संस्कृत भाषा का विज्ञान है। आपने संस्कृत मंत्र स्वस्तिवाचन के बाद चारों ओर शांति का माहौल महसूस किया ही होगा। यह सामूहिक रूप में गाया जाता है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि की मंगलकामना की जाती है। ज्ञान होने पर भी उसका लाभ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम ज्ञान की धारणा बना कर नहीं रखते। मैं ध्यान करने को नहीं बोल रहा। व्यस्त जीवन के दौरान ध्यान कर भी नहीं सकते। धारणा तो बना सकते हैं। धारणा और ध्यान में अंतर है। ध्यान का मतलब है उसको लगातार सोचना। इससे ऊर्जा का व्यय होता है। धारणा का मतलब है उस पर विश्वास या आस्था या उस तरफ सोच का झुकाव रखना। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। जब उपयुक्त समय कभी जिंदगी में प्राप्त होता है, तो धारणा एकदम से ध्यान में बदल जाती है और तनिक योगाभ्यास से समाधि तक ले जाती है। धारणा जितनी मजबूती से होगी और जितने लम्बे समय तक होगी, ध्यान उतना ही मजबूत और जल्दी लगेगा। पतंजलि ने भी अपने सूत्रों में धारणा से ध्यान स्तर का प्राप्त होना बताया है। मेरे साथ भी ठीक ऐसे ही हुआ। मैं शरीरविज्ञान दर्शन नामक अद्वैत दर्शन पर धारणा बना कर रखता था पर समय और ऊर्जा की कमी से ध्यान नहीं कर पाता था। इनकी उपलब्धता पर वह धारणा ध्यान में बदल गई और ====बाकि का सफर आपको पता ही है (कि क्या होता है )। अद्वैत की धारणा अप्रत्यक्ष रूप में कुंडलिनी की धारणा ही होती है, क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी साथसाथ रहने की कोशिश करते हैं। ध्यान प्रत्यक्ष रूप में, मतलब जानबूझकर कुंडलिनी का किया जाता है, जिसमे कुंडलिनी जागरण प्राप्त होता है।

रूपान्तरण से आदमी पुरानी चीजों को भूलता नहीं हैं, अपितु उन्हें सकारात्मकता के साथ अपनाता है

योग खुद कोई रूपान्तरण नहीं करता। यह अप्रत्यक्ष रूप से खुद होता है। योग से मन का कचरा बाहर निकलने से मन खाली और तरोताज़ा हो जाता है। इससे मन नई चीजों को ग्रहण करता है। नई चीजों में भी अच्छी चीजें और आदतें ही ग्रहण करता है, क्योंकि योग से सतोगुण बढ़ता है, जो अच्छी चीजों को ही आकर्षित करता है। कई लोगों को लगता होगा कि योग से रूपान्तरण के बाद आदमी इतना बदल जाता है कि उसके पुराने दोस्त व परिचित उससे बिछड़ जाते हैं, उसके मन में पुरानी यादें मिट जाती हैं, वह अकेला पड़ जाता है वगैरह वगैरह। पर दरअसल बिल्कुल ऐसा नहीं होता। रहता उसमें सबकुछ है, पर उसे उनके लिए वह क्रेविंग या छटपटाहाट महसूस नहीं होती, जो कि रूपान्तरण से पहले होती है। उनके लिए उसके मन में विकार नहीं होते, जैसे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर। इसका मतलब है कि फिर पुराने दुश्मन भी उसे दोस्त लगने लगते हैं। अगर ऐसा रूपान्तरण सभी के साथ हो जाए, तो दुनिया से लड़ाई-झगड़े ही खत्म हो जाएं। अगर ऐसा ही रूपान्तरण सभी देशों या राष्ट्रध्यक्ष लोगों के साथ हो जाए, तो युद्ध वगैरह कथा-कहानियों तक ही सीमित रह जाएंगे।

कुंडलिनी साहित्य के रूप में संस्कृत साहित्य एक आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक, अत्याधुनिक, और सदाबहार साहित्य है

संस्कृत साहित्य कुंडलिनी आधारित साहित्य होने के कारण ही एक अनुपम साहित्य है

दोस्तो, मैं संस्कृत साहित्य का जन्मजात शौकीन हूँ। संस्कृत साहित्य बहुत मनोरम, सजीव, जीवंत व चेतना से भरा हुआ है। एक सज्जन संस्कृत विद्वान ने बहुत वर्षों पहले ‘संस्कृत साहित्य परिचायिका’ नाम से एक सुंदर, संक्षिप्त व ज्ञान से भरपूर पुस्तक लिखी थी। उस समय ऑनलाइन पुस्तकों का युग नहीं आया था। इससे वह आजतक गुमनामी में पड़ी रही। मेरी इच्छा उसको ऑनलाइन करने की हुई। कम्प्यूटर पर टाइपिंग में समस्या आई, क्योंकि अधिकांश शब्द संस्कृत के थे, और टाइप करने में कठिन थे। भला हो एंड्रॉयड में गूगल के इंटेलिजेंट कीबोर्ड का। उससे अधिकांश टाइपिंग खुद ही होने लगी। मैं तो शुरु के कुछ ही वर्ण टाइप करता हूँ, बाकी वह खुद प्रेडिक्ट कर लेता है। आधे से ज्यादा टाइप हो गई। अधिकांश पब्लिशिंग प्लेटफोरमों पर तो मैंने इसे ऑनलाइन भी कर दिया है। शेष स्थानों पर भी मैं इसे जल्दी ही ऑनलाइन करूँगा। निःशुल्क पीडीएफ बुक के रूप में यह इस वेबसाइट के शॉप पेज पर दिए गए निःशुल्क पुस्तकों के लिंक पर भी उपलब्ध है। यह सभी साहित्यप्रेमियों के पढ़ने लायक है। आजकल किसी भी विषय का आधारभूत परिचय ही काफी है। बोलने का तात्पर्य है कि विषय की हिंट ही काफी है। उसके बारे में बाकि विस्तार तो गूगल पर व अन्य साधनों से मिल जाता है। केवल साहित्य से जुड़े हुए प्रारम्भिक संस्कार को बनाने की आवश्यकता होती है, जिसे यह पुस्तक बखूबी बना देती है। संस्कृत साहित्य का भरपूर आनंद लेने के लिए इस पुस्तक का कोई सानी नहीं है। यह छोटी जरूर है, पर गागर में सागर की तरह है। इसी पुस्तक से निर्देशित होकर मैं कालीदासकृत कुमारसम्भव काव्य की खोज गूगल पर करने लगा। मुझे पता चला कि इसमें शिव-पार्वती के प्रेम, उससे भगवान कार्तिकेय के जन्मादि की कथा का वर्णन है। कुमार मतलब लड़का या बच्चा, सम्भव मतलब उत्पत्ति। कहते हैं कि शिव और पार्वती के संभोग का वर्णन करने के पाप के कारण कवि कालीदास को कुष्ठरोग हो गया था। इसलिए वहां पर उन्होंने उसे अधूरा छोड़ दिया। बाद में उसे पूरा किया गया। कुछ लोग कहते हैं कि आम जनमानस ने शिव-पार्वती के प्रति भक्तिभावना के कारण उनके संभोग-वर्णन को स्वीकार नहीं किया। इसलिए उन्हें उसे रोकना पड़ा। पहली संभावना यद्यपि विरली पर तथ्यात्मक भी लगती है, क्योंकि वह आम संभोग नहीं है। उसका लौकिक तरीके से वर्णन नहीं किया जा सकता। वह एक तंत्रसाधना के रूप में है, और रूपकात्मक है, जैसा कि पिछली पोस्ट में दिखाया गया है। लौकिक हास्यविनोद व मनोरंजन का उसमें कोई स्थान नहीं है। इस संभावना के पीछे मनोविज्ञान तथ्य भी है। क्योंकि देवताओं के साथ बहुत से लोगों की मान्यताएं और आस्थाएँ जुड़ी होती हैं, इसलिए उनके अपमान से उनकी अभिव्यक्त बददुआ या नाराजगी की दुर्भावना तो लग ही सकती है, पर अनभिव्यक्त अर्थात अवचेतनात्मक रूप में भी लग सकती है। इस तरह से अवलोकन करने पर पता चलता है कि सारा संस्कृत साहित्य हिंदु वेदों और पुराणों की कथाओं और आख्यानों के आधार पर ही बना है। अधिकाँश साहित्यप्रेमी और लेखक वेदों या पुराणों से किसी मनपसंद विषय को उठा लेते हैं, और उसे विस्तार देते हुए एक नए साहित्य की रचना कर लेते हैं। क्योंकि वेदों और पुराणों के सभी विषय कुण्डलिनी पर आधारित होने के कारण वैज्ञानिक हैं, इसलिए संस्कृत साहित्य भी कुण्डलिनीपरक और वैज्ञानिक ही सिद्ध होता है।

विभिन्न धर्मों की मिथकीय आध्यात्मिक कथाओं के रहस्योद्घाटन को सार्वजनिक करना आज के आधुनिक, वैज्ञानिक, व भौतिकवादी युग की मूलभूत मांग प्रतीत होती है

मुझे यह भी लगता है कि आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करने से समाज को बहुत लाभ भी प्राप्त हो सकता  है। मैं यह तो नहीं कहता कि हर जगह रहस्य को उजागर किया जाए, क्योंकि ऐसा करने से रहस्यात्मक कथाओं का आनन्द समाप्त ही हो जाएगा। पर कम से कम एक स्थान पर तो उन रहस्यों को उजागर करने वाली रचना उपलब्ध होनी चाहिए। कहते हैं कि आध्यात्मिक सिद्धांतों व तकनीकों को इसलिए रहस्यमयी बनाया गया था, ताकि आदमी आध्यात्मिक परिपक्वता से पहले उनको आजमाकर पथभ्रष्ट न होता। पर कई बार ऐसा भी होता है कि अगर आध्यात्मिक परिपक्वता से पहले ही आदमी को रहस्य की सच्चाई पता चल जाए, तब भी वह उससे तभी लाभ उठा पाएगा जब उसमें परिपक्वता आएगी। रहस्य को समझ कर उसे यह लाभ अवश्य मिलेगा कि वह उससे प्रेरित होकर जल्दी से जल्दी आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने की कोशिश करके आध्यात्मिक परिपक्वता को हासिल करेगा, ताकि उस रहस्य से लाभ उठा सके। साथ में, तब तक वह योग साधना के रहस्यों व सिद्धांतों से भलीभांति परिचित हुआ रहेगा। उसे जरूरत पड़ने पर वे नए और अटपटे नहीं लगेंगे। कहते भी हैं कि अगर कोई आदमी अपने पास लम्बे समय तक चाय की दुकान का सामान संभाल कर रखे तो वह एकदिन चाय की दुकान जरूर खोलेगा, और कामयाब उद्योगपति बनेगा। पहले की अपेक्षा आज के युग में आध्यात्मिक रहस्योद्घाटन को सार्वजनिक करना इसलिए भी जरूरी लगता है क्योंकि आजकल ईमानदार, व निपुण आध्यात्मिक गुरु विरले ही मिलते हैं, और जो होते हैं वे भी अधिकांशतः आम जनमानस की पहुंच से दूर होते हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। उस समय अध्यात्म का बोलबाला होता था। आजकल तो भौतिकता का बोलबाला ज्यादा है। अगर आजकल कोई आध्यात्मिक रूप से परिपक्व हो जाए, और उसे उसकी जरूरत के अनुसार सही मार्गदर्शन न मिले, तो उसे तो बड़ी आध्यात्मिक हानि उठानी पड़ सकती है। एक अन्य लाभ यह भी मिलेगा कि जब सभी धर्मों का रहस्योद्घाटन हो जाएगा, तब सबको कुंडलिनी तत्त्व अर्थात अद्वैत तत्त्व ही अध्यात्म के मूल तत्त्व के रूप में नजर आएगा। इससे सभी धर्मों के बीच में आपसी कटुता समाप्त हो जाएगी और असल रूप में सर्वधर्मसमभाव स्थापित हो पाएगा। इससे दुनिया के अधिकांश झगड़े समाप्त हो जाएंगे।

इड़ा नाड़ी को ही ऋषिपत्नी अरुन्धती कहा गया है

अब पिछली पोस्ट में वर्णित रूपकात्मक कथा को आगे बढ़ाते हैं। उसमें जिस अरुंधति नामक ऋषिपत्नी का वर्णन है, वह दरअसल इड़ा नाड़ी है। इड़ा नाड़ी अर्धनारीश्वर के स्त्री भाग का प्रतिनिधित्व करती है। कई बार हठयोग का अभ्यास करते समय प्राण इड़ा नाड़ी में ज्यादा प्रवाहित होने लगता है। इसका मतलब है कि वह प्राण को सुषुम्ना में जाने से रोकती है। सुषुम्ना से होता हुआ ही प्राण चक्रों पर अच्छी तरह स्थापित होता है। प्राण के साथ वीर्यतेज भी होता है। इसको यह कह कर बताया गया है कि अरुंधति ने ऋषिपत्नियों को अग्नि देव के निकट जाने से रोका। पर योगी ने आज्ञाचक्र के ध्यान से प्राण के साथ वीर्यतेज को सुषुम्ना से प्रवाहित करते हुए चक्रों पर उड़ेल दिया। इसको ऐसे दिखाया गया है कि ऋषिपत्नियों ने अरुंधती की बात नहीं मानी, पर भगवान शिव के इशारे को समझा। आज्ञाचक्र शिव का प्रतीक भी है, क्योंकि वहीँ पर उनका तीसरा नेत्र है।

कुंडलिनी जागरण और कुंडलिनी योग के बीच में केवल अनुभव की मात्रा को लेकर ही भिन्नता है, अनुभव की प्रकृति को लेकर नहीं

कई जगह सहस्रार को आठवां चक्र माना जाता है। सहस्रार तक वीर्यतेज पहुंचाना अन्य चक्रों से मुश्किल होता है। जबरदस्ती ऐसा करने से सिरदर्द होने लग सकता है। इसलिए नीचे के सात चक्रों पर ही वीर्य को स्थापित किया जाता है। इसीको रूपक में ऐसा कहा गया है कि आठ में से सात ऋषिपत्नियाँ ही अग्निदेव के पास जाकर आग सेंकने लगीं। आई तो आठवी भी, पर उसने आग की तपिश नहीं ली। मतलब कि थोड़ा सा वीर्यतेज तो सहस्रार तक भी जाता है, पर वह नगण्यतुल्य ही होता है। सहस्रार तक वीर्यतेज तो मुख्यतः सुषुम्ना के ज्यादा क्रियाशील होने से उससे होकर ही जाता है। इसीको रूपक में यह कहा गया है कि गंगानदी ने शिव के वीर्य को सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि प्राण या वीर्यतेज या ऊर्जा या शक्ति के साथ कुंडलिनी चित्र तो रहता ही है। ये सभी नाम आपस में पर्यायवाची की तरह हैं, अर्थात सभी शक्तिपर्याय हैं। वीर्यतेज से सर्वप्रथम व सबसे ज्यादा जलन आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर महसूस होती है। यह उसी जननांग से जुड़ा है, जिसे पिछले लेख में कबूतर कहा गया है। उसके साथ जब चक्रों पर बारी-बारी से कुंडलिनी का भी ध्यान किया जाता है, तब वह तेज चक्रों पर आने लगता है। फिर वह चक्रों से रीढ़ की हड्डी में जाता हुआ महसूस होता है। सम्भवतः यह आगे के चक्र से पीछे के चक्र को रिस जाता है। इसीलिए आगे-पीछे के दोनों चक्र आपस में एक पतले एनर्जी चैनल से जुड़े हुए बताए जाते हैं। इसीको मिथक कथा में यह कह कर बताया गया है कि ऋषिपत्नियों ने वह वीर्य तेज हिमालय को दिया, क्योंकि पीछे वाले चक्र रीढ़ की हड्डी में ही होते हैं। पुराण बहुत बारीकी से लिखे गए होते हैं। उनके हरेक शब्द का बहुत बड़ा और गहरा अर्थ होता है। इस तेज-स्थानांतरण का आभास पीठ के मध्य भाग में नीचे से ऊपर तक चलने वाली सिकुड़न के साथ आनन्द की व नीचे के बोझ के कम होने की अनुभूति से होता है। फिर थोड़ी देर बाद उस सिकुड़न की सहायता से वह तेज सुषुम्ना में प्रविष्ट होता हुआ महसूस होता है। यह अनुभूति बहुत हल्की होती है, और खारिश की या किसी संवेदना की या यौन उन्माद या ऑर्गेज्म की एक आनन्दमयी लाइन प्रतीत होती है। यह ऐसा लगता है कि पीठ के मेरुदंड की सीध में एक मांसपेशी की सिकुड़न की रेखा एकसाथ नीचे से ऊपर तक बनती है और ऑर्गेज्म या यौन-उन्माद के आनन्द के साथ कुछ देर तक लगातार बनी रहती है। ऐसा लगता है कि वह नाड़ी सहस्रार में कुछ उड़ेल रही है। इसके साथ ही कुंडलिनी चित्र सहस्रार में महसूस होता है। अभ्यास के साथ तो हर प्रकार की अनुभूति बढ़ती रहती है। इसीको रूपक में ऐसे कहा गया है कि अग्निदेव ने वह तेज सात ऋषिपत्नियों को दिया, ऋषिपत्नियों ने हिमालय को दिया, हिमालय ने गंगानदी को, और गंगानदी ने सरकंडे की घास को दिया। इसका सीधा सा मतलब है कि कुंडलिनी क्रमवार ही सहस्रार तक चढ़ती है, सीधी नहीं। योग में अक्सर ऐसा ही बोला जाता है। हालाँकि तांत्रिक योग से सीधी भी सहस्रार में जा सकती है। किसीकी कुंडलिनी मूलाधार में बताई जाती है, किसी की स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ी हुई, किसीकी मणिपुर चक्र तक, किसीकी अनाहत चक्र तक, किसीकी विशुद्धि तक, किसी की आज्ञाचक्र तक और किसीकी सहस्रार तक चढ़ी हुई बताई जाती है। हालांकि इन सातों चक्रों में तो कुण्डलिनी प्रतिदिन के योगाभ्यास में चढ़ती औऱ उतरती रहती है, पर कुंडलिनी को लम्बे समय तक एक चक्र पर स्थित रखने के लिए काफी अभ्यास की जरूरत होती है। आपकी कुंडलिनी प्रतिदिन सहस्रार में भी जाएगी, पर यह योगाभ्यास के दौरान सहस्रार पर ध्यान लगाने के समय जितने समय तक ही सहस्रार में रहेगी। जब कुण्डलिनी लगातार, पूरे दिनभर, कई दिनों तक और बिना किसी योगाभ्यास के भी सहस्रार में रहने लगेगी, तभी वह सहस्रार तक चढ़ी हुई मानी जाएगी। इसे ही प्राणोत्थान भी कहते हैं। इसमें आदमी दैवीय गुणों से भरा होता है। पशुओं को आदमी की इस अवस्था का भान हो जाता है। मैं जब इस अवस्था के करीब होता हूँ, तो पशु मुझे विचित्र प्रकार से सूंघने और अन्य प्रतिक्रियाएं दिखाने लगते हैं। इसमें ही कुंडलिनी जागरण की सबसे अधिक संभावना होती है। इसके लिए सेक्सुअल योग से बड़ी मदद मिलती है। ये जरूरी नहीं कि ये सभी अनुभव तभी हों, जब कुंडलिनी जागरण हो। हरेक कुंडलिनी योगी को ये अनुभव हमेशा होते रहते हैं। कई इन्हें समझ नहीं पाते, कई ठीक ढंग से महसूस नहीं कर पाते, और कई दूसरे छोटे-मोटे अनुभवों से इन्हें अलग नहीं कर पाते। सम्भवतः ऐसा तब होता है, जब कुंडलिनी योग का अभ्यास हमेशा या लंबे समय तक नित्य प्रतिदिन नहीं किया जाता। अभ्यास छोड़ने पर कुण्डलिनी से जुड़ीं अनुभूतियां शुरु के सामान्य स्तर पर पहुंच जाती हैं। मैं एक उदाहरण देता हूँ। नहाते समय चाहे शरीर के किसी भी हिस्से में पानी के स्पर्श की अनुभूति ध्यान के साथ की जाए, वह अनुभूति एक सिकुड़न के साथ पीठ से होते हुए सहस्रार तक जाती हुई महसूस होती है। इससे जाहिर होता है कि मेरुदण्ड में ही सुषुम्ना नाड़ी है, क्योंकि वही शरीर की सभी संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुंचाती है। कुंडलिनी जागरण और कुंडलिनी योग के बीच में केवल अनुभव की मात्रा को लेकर ही भिन्नता है, अनुभव की प्रकृति को लेकर नहीं। कुंडलिनी जागरण में कुंडलिनी अनुभव उच्चतम स्तर तक पहुंच जाता है, व इससे सम्बंधित अन्य अनुभव भी शीर्षतम स्तर तक पहुंच सकते हैं। कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी फिर से एक साधारण कुंडलिनी योगी बन जाता है, ज्यादा कुछ नहीं।

मेडिटेशन एट टिप अर्थात शिखर पर ध्यान

यह एक वज्रोली क्रिया का छोटा रूप ही है। इसमें वीर्य को बाहर नहीं गिराया जाता पर पेनिस टिप या वज्रशिखा पर उसे ले जाकर वापिस ऊपर चढ़ाया जाता है। यह ऐसा ही है कि वीर्य स्खलन के बिना ही उसकी चरम अनुभूति के करीब तक संवेदना को बढ़ाया जाता है, और फिर संभोग को रोक दिया जाता है। यह ऐसा ही है कि यदि उस अंतिम सीमाबिन्दु के बाद थोड़ा सा संभोग भी किया जाए, तो वीर्य का वेग अनियंत्रित होने से वीर्यस्खलन हो जाता है। यह तकनीक ही आजकल के तांत्रिकों विशेषकर बुद्धिस्ट तांत्रिकों में लोकप्रिय है। यह बहुत प्रभावशाली भी है। यह तकनीक पिछले लेख में वर्णित अग्निदेव के कबूतर बनने की शिवपुराण कथा से ही आई है। यह ज्यादा सुरक्षित भी है, क्योंकि इसमें पूर्ण वज्रोली की तरह ज्यादा दक्षता की जरूरत नहीं, और न ही संक्रमण आदि का भय ही रहता है। दरअसल शिवपुराण में रूपकों के रूप में लिखित रहस्यात्मक कथाएं ही तंत्र का मूल आधार हैं। 

शरीर व उसके अंगों का देवता के रूप में सम्मान करना चाहिए

तंत्र शास्त्रों में आता है कि योनि में सभी देवताओं का निवास है। इसीलिए कामाख्या मंदिर में योनि की पूजा की जाती है। इससे सभी देवताओं की पूजा स्वयं ही हो जाती है। दरअसल ऐसा मूलाधार की प्रचण्ड ऊर्जा के कारण ही होता है। वास्तव में यही मूलाधार को ऊर्जा देती है। उससे वहाँ कुंडलिनी चित्र का अनुभव होता है। क्योंकि मन में सभी देवताओं का समावेश है, और कुंडलिनी मन का सारभूत तत्त्व या प्रतिनिधि है, इसीलिए ऐसा कहा जाता है। इसलिए पिछले लेख में वर्णित रूपक के कुछ यौन अंशों को अन्यथा नहीं लेना चाहिए। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार शरीर के सभी अंग भगवदस्वरूप हैं। पुराणों के अनुसार भी शरीर के सभी अंग देवस्वरूप हैं। शरीर में सभी 33 करोड़ देवताओं का वास है। इसका मतलब तो यह हुआ कि शरीर का हरेक सेल या कोशिका देवस्वरूप ही है। इससे यह अर्थ भी निकलता है कि शरीर की सेवा और देखभाल करना सभी देवताओं की पूजा करने के समान ही है। पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में यह सभी कुछ तथ्यों के साथ सिद्ध किया गया है। यह शरीर सभी पुराणों का और शरीरविज्ञान दर्शन का सार है। पुराण पुराने समय में लिखे गए थे, पर शरीरविज्ञान दर्शन आधुनिक है। इसलिए शरीर के किसी भी अंग का अपमान नहीं करना चाहिए। शारीरिक अंगों का अपमान करने से देवताओं का अपमान होता है। ऐसा करने पर देवता तारकासुर रूपी अज्ञान को नष्ट करने में मदद नहीं करते, जिससे आदमी की मुक्ति में अकारण विलंब हो जाता है। कई लोग धर्म के नाम पर इसलिए नाराज हो जाते हैं कि किसी देवता की तुलना शरीर के अंग से क्यों कर दी। इसका मतलब तो भगवदस्वरूप शरीर और उसके अंगों को तुच्छ व हीन समझना हुआ। एक तरफ वे देवता को खुश कर रहे होते हैं, पर दूसरी तरफ भगवान को नाराज कर रहे होते हैं।

कुंडलिनी ध्यान के लिए तप को ही शिव या इष्ट ध्यान के लिए तप कहा जाता है, मोटे तौर पर

कुंडलिनी एक लज्जा से भरी स्त्री की तरह अपने प्रियतम शिव से मिलने से शर्माती है, और असंख्य युगों और जन्मों तक अविवाहित रहकर ही उसकी अव्यवस्थित खोज में पागलों की तरह भटकती रहती है

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में शिवपुराण का हवाला देकर बता रहा था कि पार्वती शिव से मिलते हुए शरमा कर पीछे भी हट रही थी, पर साथ में आनन्द से मुस्कुरा भी रही थी। दरअसल कुंडलिनी या जीव के साथ भी ऐसा ही होता है। कुंडलिनी जैसे ही शिव से एक होने लगती है, वैसे ही वह घबराकर और शरमा कर पीछे हट जाती है। हालांकि उसे आनन्द भी बहुत आता है, और बाद में वह पछताती भी है कि वह क्यों पीछे हटी। यही क्षणिक कुंडलिनी जागरण है, जैसा शिवकृपा से व गुरुकृपा से संभवतः मुझे भी हुआ था। अब तो मुझे वह अनुभव याद भी नहीं। इतना सा लगता है कि वह हुआ था कुछ और मैं पूरी तरह से खुल जैसा गया था उस समय। बहुत संभव है कि इसी कुंडलिनी कथा को ही इस शिवकथा के रूप में लिखा हो। न भी लिखा हो, तब भी कोई बात नहीं, क्योंकि जैसा स्थूल जगत में होता है, वैसा ही सूक्ष्म जगत में भी होता है। कोई फर्क नहीं। यतपिण्डे तत्ब्रह्मांडे। शिव ने जब कामदेव को भस्म कर दिया, तब वे खुद भी अंतर्धान हो गए। इससे पार्वती विरह से अत्यंत व्याकुल हो गई। हर समय वह शिव की याद में खोई रहती थी। उसे कहीं पर भी आनन्द नहीं मिल पा रहा था। उसका जीवन नीरस सा हो गया था। उसकी यह दशा देखकर पर्वतराज हिमाचल भी दुखी हो गए। उन्होंने अपनी बेटी पार्वती को अपनी गोद में बिठाकर उसे प्यार से सांत्वना दी। एकदिन नारद मुनि पार्वती से मिलने आए और पार्वती को समझाया कि उसने अपना अहंकार नष्ट नहीं किया था, इसीलिए शिव अंतर्धान हुए। फिर उससे और कहा कि शिव उसकी भलाई के लिए उसका अहंकार खत्म करना चाहते हैं, इसीलिए उससे दूर हुए हैं। नारद ने पार्वती को अहंकार खत्म करने के लिए तपस्या करने को कहा। जब पार्वती ने तपस्या के लिए नारद से मंत्र मांगा, तो नारद ने उसे शिव पंचाक्षर मन्त्र दिया। यह “ॐ नमः शिवाय” ही है।

उपरोक्त रूपात्मक कथा का रहस्योद्घाटन

ऐसा घटनाक्रम बहुत से प्रेम प्रसंगों में दृष्टिगोचर होता है। एकबार जब मानसिक यौनसंबंध बन जाता है, उसके बाद एकदूसरे के प्रति बेहिसाब आकर्षण पैदा हो जाता है। पुरुष लगातार अपनी प्रेमिका की परीक्षा लेता है। वह उसे अपने प्रेम में दीवाना देखना चाहता है। वह उसे अपने प्रति पूरी तरह से निष्ठावान और समर्पित देखना चाहता है। कई संयमित मन वाले पुरुष तो यहाँ तक चाहते हैं कि स्त्री उसे स्वयं प्रोपोज़ करे औऱ यहाँ तक कि वह अपनी डोली लेकर भी खुद ही उसके घर आए। यह जोक नहीं, एक मनोवैज्ञानिक वास्तविकता है। यह कुंडलिनी से प्रेरित ही है। वे ऐसा न होने पर स्त्री को त्यागने से भी परहेज नहीं करते। शिव के जैसे उच्च आध्यात्मिक पुरुष तो स्त्री के अत्यंत निकट आ जाने पर भी अपने को संयमित करके अपने को गलत काम से बचा लेते हैं। वे स्त्री से बात भी नहीं करते और जीवन में अपना अलग रास्ता पकड़ लेते हैं। यह शिव के अंतर्धान होने की तरह ही है। इससे स्त्री, प्रेमी पुरुष की याद में बिन पानी मछली की तरह तड़पती है। पार्वती के साथ भी वैसा ही हुआ था। पुरुष भी उसकी याद को अपने मन में बसा कर अपने काम में लग जाता है। यह शिव के ध्यान की अवस्था में चले जाने की तरह ही है। अधिकांशतः पुरुष तो पहले से ही शिव की तरह अहंकार से रहित होता है। ज्यादातर मामलों में, रूप, गुण और संपत्ति का अहंकार तो स्त्री को ही ज्यादा होता है। इसी वजह से पुरुष उससे दूर चला जाता है, क्योंकि आग और पानी का मेल कहाँ। मैं यहाँ लैंगिक पक्षपात नहीँ कर रहा हूँ, बल्कि प्रकृति की अद्भुत सच्चाई बयान कर रहा हूँ। अपवाद तो हर जगह हैं, कहीं ज्यादा तो कहीं कम। कालांतर में जब दुनियादारी के थपेड़े खाकर स्त्री का अहंकार नष्ट होता है, तब फिर उस प्रेमी पुरुष से उसकी मुलाकात होती है। हालाँकि अधिकांश स्त्रियों ने अपनी अलग गृहस्थी बसा ली होती है। पार्वती के जैसी तो बिरली ही होती है जो ताउम्र शिव की प्रतीक्षा करती रहती हो। फिर भी स्त्री, अपने सच्चे प्रेमी पुरुष से भावनात्मक लाभ तो प्राप्त करती ही है, बहिन, मित्र आदि किसी भी सम्बन्ध से। उन दोनों की मिश्रित मानसिक शक्ति स्वयँ ही उनकी संतानों को प्राप्त हो जाती है। यही शिव पार्वती का लौकिक मिलन, और मानसिक शक्ति के रूप में भगवान कार्तिकेय का जन्म है।

हिमालय का गंगावतरण वाला स्थान ही सहस्रार है

पार्वती उसी गंगावतरण वाले स्थान पर तप करती है, जहाँ उसने शिव के साथ प्रेमालाप किया था। वह स्थान सहस्रार चक्र ही है। “प्रेम की गंगा” छंद भी लोकप्रसिद्ध है। दरअसल प्रणय प्रेम से पीठ में सुषुम्ना से होकर चढ़ने वाली ऊर्जा ही वह प्रेम की गंगा है। कुंडलिनी सहस्रार चक्र पर आरूढ़ हो गई, और अद्वैत के आनन्द का अनुभव करने लगी। इसको ऐसे लिखा गया है कि पार्वती सहस्रार में तप करने लगी। तप का मतलब सहस्रार में कुंडलिनी का ध्यान ही है। यही शिव का ध्यान भी है, क्योंकि सहस्रार में कुंडलिनी से मिलने शिव देरसवेर जरूर आते हैं, मतलब कुंडलिनी जागरण जरूर होता है। तप ध्यान के लिए ही किया जाता है। इसलिए तप को ध्यान योग या कुंडलिनी योग भी कह सकते हैं। यदि तप से ध्यान न लगे, तो वह तप नहीं, मात्र दिखावा है। हालाँकि तप कुंडलिनी के ध्यान के लिए होता है, पर इसे मोटे तौर पर शिव के ध्यान के लिए बताया जाता है, क्योंकि कुंडलिनी से अंततः शिव की ही तो प्राप्ति होती है। यह इस ब्लॉग के इस मुख्य बिंदु को फिर से प्रमाणित करता है कि कुंडलिनी ध्यान या कुंडलिनी योग ही सबकुछ है। अपनी बेटी को मनाने और तप से रोकने के लिए उसके पिता हिमाचल और माता मेनका अपने पुत्रों और प्रसिद्ध पर्वतों के साथ वहाँ पहुंचते हैं। वे उसके कष्ट से दुखी हो जाते हैं। वे उसे कहते हैं कि कामदेव को भस्म करने वाले वैरागी शिव उसे नहीं मिलने आने वाले। वैसे भी भगवान को किसी की परवाह नहीं। वह अपने आप में पूर्ण है। वह अपनेआप में ही मस्त रहता है। ऐसे परम मस्तमौला को मना कर अपने वश में करना आसान काम नहीं है। पर पार्वती जैसे हठी भक्त लोग उसे मना लेते हैं। पार्वती को भक्ति की शक्ति का पूरा पता था, इसलिए वह नहीं मानती और तप करती रहती है। दरअसल मस्तिष्क ही हिमाचल राजा है। उससे ऐसे रसायन निकलते हैं, जो तपस्या से हटाते हैं। यही हिमाचल के द्वारा पार्वती को समझाना है। यह कुंडलिनी से ध्यान हटाकर जीव को बाहरी दुनियादारी में उलझाकर रखना चाहता है। विभिन्न पर्वत शिखर मस्तिष्क की अखरोट जैसी आकृति के उभार हैं, जो शरीर के विभिन्न भागों को नियंत्रित करते हैं। ये सभी पर्वतराज हिमाचल के अंदर ही हैं। मस्तिष्क को अपनी सत्ता के खोने का डर बना रहता है। उसके तप की आग की तपिश से सारा ब्रह्मांड जलने लगता है। इससे परेशान होकर ब्रह्मा को साथ लेकर सभी देवता और पर्वत उसे मनाने और तप से रोकने के लिए उसके पास जाते हैं। दरअसल यह शरीर ही संपूर्ण ब्रह्मांड है। इसमें सभी देवताओं का वास है। तप के क्लेश से यह शरीर तो दुष्प्रभावित होगा ही। यह स्वाभाविक ही है। ब्रह्मा सुमेरु पर्वत पर रहते हैं। सुमेरु पर्वत मस्तिष्क को ही कहते हैं। जैसे ब्रह्मा से ही सृष्टि का विकास होता है, वैसे ही मस्तिष्क से शरीर का विकास होता है, अपनी कल्पनाशीलता से। वैसे तो मस्तिष्क में सभी देवताओं का निवास है, पर मस्तिष्क के सर्वप्रमुख अभिमानी देवता को ही ब्रह्मा कहते हैं। सभी देवता मस्तिष्क के साथ पूरे शरीर में व्याप्त रहते हैं, पर ब्रह्मा मस्तिष्क में ही रहता है। इसीलिए ब्रह्मा का निवास सुमेरु में बताया गया है। इसलिए तप से ये ही शरीरस्थ देवता और इस शरीर रूपी ब्रह्मांड में रहने वाले असंख्य कोशिका रूपी जीव ही भूखे-प्यासे रहकर व्याकुल होते हैं। वास्तव में कुंडलिनी के साथ शरीर के प्राण भी सहस्रार को चले जाते हैं। इससे शरीर शक्तिहीन सा होकर अपंग जैसा या लाचार जैसा या पराश्रित जैसा हो जाता है। इससे स्वाभाविक ही है कि शरीर तो भौतिक रूप से पिछड़ेगा ही। बाहर के स्थूल ब्रह्मांड में कुछ नहीं होता। अगर बाहर के स्थूल जीवों और देवताओं को कष्ट हुआ करता, तो आज तक कोई भी नहीँ बचा होता, क्योंकि ध्यान योग के रूप में प्रतिदिन लाखों लोग तप करते हैं। कई योगी तो वनों-पर्वतों में भी घोर तप करते हैं।

कुंडलिनी विभिन्न देवताओं, शिव ब्रह्मरूप अखंड ऊर्जा, सहस्रार चक्र वटवृक्ष और मस्तिष्क कैलाश पर्वत के रूप में दर्शाए गए हैं

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि ‘चक्र’ नाम कैसे पड़ा है। दरअसल चक्र का शाब्दिक अर्थ भी पहिया ही होता है। उदाहरण के लिए रथचक्र, जलचक्र आदि। यह भी बताया कि चक्र को ऊर्जा का केंद्र क्यों कहा गया है। चक्र के बारे में ऐसा तो हर जगह लिखा होता है, पर यह साबित नहीं किया होता है कि ऐसा क्यों कहा गया है। इससे रहस्यात्मकता की बू आती है। मैंने इसे वैज्ञानिक व अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया कि ऐसा क्यों कहा जाता है। इसीलिए इस वेबसाइट का नाम “कुंडलिनी रहस्योद्घाटन” है। यह भी मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के मिश्रण से कुंडलिनी कैसे बनती है। दरअसल प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के इसी मिश्रित रूप को ही कुंडलिनी कहते हैं। यह कुंडलिनी की सबसे छोटी परिभाषा है। इसे ही टाईम-स्पेस मिश्रण भी कहते हैं। प्राण ऊर्जा टाईम का प्रतिनिधित्व करती है, और मनस ऊर्जा स्पेस का प्रतिनिधित्व करती है। इस पोस्ट में मैं बताऊंगा कि सहस्रार चक्र को शिव के निवास स्थान या कैलाश के वटवृक्ष के रूप में कैसे निरूपित किया गया है।

दक्षयज्ञ से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं द्वारा कैलाश गमन

भगवान विष्णु दक्ष से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं सहित कैलाश पर्वत पर गए। वह कैलाश पर्वत मनुष्यों के इलावा किन्नरों, अप्सराओं और योगसिद्ध महात्माओं से सेवित था। वह बहुत ऊंचा था। वह चारों ओर से मणिमय शिखरों से सुशोभित था। वह अनेक प्रकार की धातुओं से विचित्र जान पड़ता था। वह अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं से भरा था। वह अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों व झरनों से परिव्याप्त था। उसके शिखर पर सिद्धांगनाएँ अपने-अपने पतियों के साथ विहार करती थीं। वह अनेक प्रकार की कन्दराओं, शिखरों तथा अनेक प्रकार के वृक्षों की जातियों से सुशोभित था। उसकी कांति चांदी के समान श्वेतवर्ण की थी। वह पर्वत बड़े-बड़े व्याघ्र आदि जंतुओं से युक्त, भयानकता से रहित, सम्पूर्ण शोभा से सम्पन्न, दिव्य तथा अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न करने वाला था। वह पर्वत पवित्र गंगा नदी से घिरा हुआ और अत्यंत निर्मल था। उस कैलाश पर्वत के निकट शिव के मित्र कुबेर की अलका नाम की दिव्य नगरी थी। उसी पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक दिव्य वन था, जो दिव्य वृक्षों से शोभित था, और जहाँ पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। उस पर्वत के बाहर से नन्दा और अलकनन्दा नामक दिव्य व पावन सरिताएं बह रही थीं, जो दर्शन मात्र से ही पापों का नाश करती हैं। देव स्त्रियां प्रतिदिन अपने लोक से आकर उन नदियों का जल पीतीं हैं, और स्नान करके रति से आकृष्ट होकर पुरुषों के साथ विहार करती हैं। फिर उस अलकापुरी और सौगंधिक वन को पीछे छोड़कर, आगे की ओर जाते हुए उन देवताओं ने समीप में ही शंकर जी के वट वृक्ष को देखा। वह वटवृक्ष उस पर्वत के चारों ओर छाया फैलाए हुए था। उसकी शाखाएं तीन ओर फैली हुई थीं। उसका घेरा सौ योजन ऊंचा था। वह घौंसलों से रहित और ताप से वर्जित था। उसका दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। वह अत्यंत रमणीय, परम पावन, शिवजी का योग स्थल, दिव्य, योगियों के द्वारा सेवन या निवास योग्य, तथा अति उत्तम था। महायोगमयी व मुमुक्षु लोगों को शरण देने वाले उस वटवृक्ष के नीचे बैठे शिवजी को देवताओं ने देखा। शिवभक्ति में लीन, शांत तन-मन वाले, व महासिद्ध जो ब्रह्मा के पुत्र सनक आदि हैं, वे प्रसन्नता के साथ उन शिव की उपासना कर रहे थे। उनके मित्र कुबेर, जो गुह्यकों व राक्षसों के पति हैं, वे अपने परिवार व सेवकों के साथ उनकी विशेष रूप से सेवा कर रहे थे। वे परमेश्वर शिव तपस्वियों के मनपसंद सत्यरूप को धारण किए हुए थे। वे वात्सल्य भाव से विश्वभर के मित्र लग रहे थे, और भस्म आदि से सुसज्जित थे। वे कुशासन पर बैठे हुए थे, और नारद आदि के पूछने पर सभी श्रोता सज्जनों को ज्ञान का उपदेश दे रहे थे। वे अपना बायाँ चरण अपनी दाईं जांघ पर, और बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर रखी कलाई में रुद्राक्ष की माला डाले हुए सत्य-सुंदर तर्क मुद्रा में विराजमान थे।  वे सर्वोच्च ज्ञान की बात बताते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति कर्म से नहीं, अपितु ज्ञान से होती है। इसलिए अद्वैत ज्ञान के साथ कर्म करना चाहिए, मतलब कि कर्मयोग करना चाहिए। जो लोग उनमें, ब्रह्मा और विष्णु में भेद करते हैं, वे नरक को जाते हैं। मतलब कि भगवान शिव भेददृष्टि को नकारते हैं।

कैलाश पर्वत व मस्तिष्क की परस्पर समकक्षता

कैलाश पर्वत मस्तिष्क है। वहाँ पर आम लोग-बाग, अप्सराएं और नाच-गाना करने वाले कलाकार तो भोगविलास करते ही हैं, ऋषि-मुनि भी वहीँ पर ध्यान का आनंद प्राप्त करते हैं। यह मानव शरीर में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। मणिमय शिखरों का मतलब इसकी अखरोट के जैसी आकृति से बने अनेकों रिज या उभार हैं, जो मन के चमकीले विचारों व संकल्पों से चमकते रहते हैं। अनेक प्रकार की धातुओं का मतलब इसके किस्म-किस्म की संरचनाओं व रँगों वाले भाग हैं, जैसे कि खोपड़ी की हड्डी, उसके नीचे व्हाईट मैटर, उसके नीचे ग्रे मैटर, तरलता-पूर्ण नरम आंखें, कान, नाक, दांत आदि। मस्तिष्क का अंदरूनी भाग भी किस्म-किस्म के आकारों व रंगों में बंटा है, जैसे कि पॉन्स, हिप्पोकैम्पस, पिनियल ग्लैंड आदि। अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं का मतलब विभिन्न प्रकार के बाल हैं, जैसे कि सिर के बाल, दाढ़ी के बाल, मूँछ के बाल, कान के बाल, नाक के बाल आदि। यहाँ तक कि मस्तिष्क के अंदर भी रेशेदार माँस होता है, जिसे नर्व फाइबर कहते हैं। इससे लगता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि मानव शरीर की एनाटोमी का भी अच्छा ज्ञान रखते थे। इसका विशद वर्णन आयुर्वेद में है। अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों का मतलब बालों में पाए जाने वाले सूक्ष्म परजीवी ही हैं। अनेक प्रकार के झरनों का मतलब आँखों, कानों व मुंह आदि की ग्रन्थियों से निकलने वाला जैविक स्राव ही है। इसके शिखरों पर सिद्धांगनाओं के विहार करने का मतलब तंत्र योगिनियों के द्वारा तांत्रिक रोमांस करना ही है, जिससे वे महान आनन्द प्राप्त करती हैं। आनन्द का स्थान तो मस्तिष्क ही है। अनेक प्रकार की कन्दराएँ मस्तिष्क के आसपास अनेक प्रकार के छिद्र हैं, जैसे कि आँख, नाक, कान आदि। शिखरों व वृक्षों के बारे में तो ऊपर बता ही दिया है। उस पर्वत के चांदी की तरह होने का मतलब मस्तिष्क के चेतना से भरे चमकीले विचार ही हैं। व्याघ्र जैसे जंतुओं का मतलब जू, पिस्सू की तरह सूक्ष्म मांसाहारी परजीवी ही हैं, जो बालों की नमी में छिपे रह सकते हैं। ‘भयानकता से रहित’ मतलब उन जंतुओं से भय नहीँ लगता था। दिव्यता तो मस्तिष्क में है ही। सभी दिव्य भाव मस्तिष्क की क्रियाशीलता के साथ ही हैं। कुंडलिनी जागरण सबसे दिव्य है, इसीलिए उसमें मस्तिष्क की क्रियाशीलता चरम पर होती है। इसी तरह मस्तिष्क आश्चर्य का नमूना भी है। इसमें जीवन या चेतना की उत्पत्ति होती है। वैज्ञानिक आज तक इस पहेली को नहीं सुलझा सके हैं। गँगा नदी यहाँ सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है। क्योंकि वह सहस्रार को सिंचित करती है, जिससे पूरा मस्तिष्क जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसे पूरे पर्वत को घेरने वाली कहा है। यह पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा से निर्मल कर देती है। शिव के मित्र कुबेर की नगरी अलकापुरी आज्ञा चक्र को कहा गया है। “अलका” शब्द संस्कृत के अलक्षित व हिंदी के अलख शब्दों से बना है। इस चक्र से अदृश्य कुंडलिनी के दर्शन होते हैं। इसीलिए इसे तीसरी आंख भी कहते हैं। दरअसल जब आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाया जाता है, तो सहस्रार पर कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। क्योंकि शिवपुराण में शिव ही कुंडलिनी के रूप में हैं, इसीलिए आज्ञाचक्र के अभिमानी देवता कुबेर को शिव का मित्र बताया गया है। अगर यहाँ अखण्ड ऊर्जा को ही शिव माना गया है, तब भी कुबेर शिव के मित्र सिद्ध होते हैं, क्योंकि कुंडलिनी से ही अखण्ड ऊर्जा प्राप्त होती है।आज्ञाचक्र बुद्धि का प्रतीक है। इसलिए स्वाभाविक है कि आज्ञाचक्र धनसंपदा से जुड़ा है, क्योंकि बुद्धि से ही संपदा अर्जित होती है। इसीलिए इसके देवता कुबेर सृष्टि में सबसे धनी हैं। उस पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक वन है। क्योंकि इसका वर्णन अलकापुरी के एकदम बाद हो रहा है, इसका मतलब है कि वह वन उसके निकट ही है। वह तो नाक ही है। उसके अंदर ही सुगंधिका अनुभव होता है, इसलिए माना गया है कि सुगंधि की उत्पत्ति उसीमें हो रही है। क्योंकि सुगंधि वृक्षों और पुष्पों से ही उत्पन्न होती है, इसलिए नाक को वन का रूप दिया गया है। उस वन को दिव्य इसलिए कहा है, क्योंकि वह आकार में इतना छोटा होकर भी दुनिया भर की सभी दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराता है। साधारण वन तो ऐसा नहीं कर सकता। उसमें स्थित रोमों को ही दिव्य वृक्ष माना जा सकता है। इन्हें दिव्य इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि आकार में इतना छोटा और कम संख्या में होने पर भी वे दुनिया भर की दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। वे गंध-ग्राही कोशिकाओं को सुरक्षा देते हैं। हो सकता है कि पौराणिक युग में नासिका-रोम को ही सुगन्धि के लिए एकमात्र जिम्मेदार माना जाता हो। उस वन में पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। वह ध्वनि दरअसल श्वास-प्रश्वास की धीमी आवाज ही है। इसे मीठी आवाज तो नहीं कही जा सकती। इसीलिए इसे अद्भुत कहा है। उस पर्वत के बाहर नन्दा और अलकनन्दा नामक दो नदियां इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही हैं। मस्तिष्क के साथ रीढ़ की हड्डी जुड़ी होती है। रीढ़ की हड्डी को यदि नीचे के पर्वत कहेंगे, तो मस्तिष्क शीर्ष के पर्वत शिखर से बना है। उसमें सुषुम्ना बहती है। उसे गंगा कहा गया है। इड़ा नाड़ी रीढ़ की हड्डी के बाहर बाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी दुनियादारी का भौतिक, सीमित, तार्किक या लॉजिकल व जजमेंटल या नुक्ताचीनी वाला आनन्द लेता है। इसीलिए इसका नाम नन्दा है। दूसरी नाड़ी जो पिंगला है, वह मेरुदंड रूपी पर्वत के दाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी आध्यात्मिक जैसा, शून्य या स्पेस या आकाश जैसा, अंधेरे जैसा, तर्कहीन या इलॉजिकल जैसा, असीमित जैसा, ननजजमेंटल जैसा आनन्द लेता है। इसका नाम अलकनन्दा है। जैसा ऊपर बताया, अलक शब्द अलख या अलक्षित का सूचक है। क्योंकि आकाश अनन्त होने से अलक्षित ही है, इसीलिए इसका नाम अलकनन्दा है, मतलब अलक्षित का आनन्द। दोनों नदियों के दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं। अकेली नदी की बात नहीं हो रही, बल्कि दोनों नदियों की एकसाथ बात हो रही है। इसका मतलब है कि बाएं और दाएं मस्तिष्क के एकसाथ क्रियाशील होने से अद्वैत उत्पन्न होता है, जो निष्पापता रूप ही है। द्वैत ही सबसे बड़ा पाप है, और अद्वैत ही सबसे बड़ी निष्पापता। देव-स्त्रियों से मतलब यहाँ अच्छे व संस्कारवान घर की कुलीन स्त्रियां हैं। क्योंकि वे संपन्न होती हैं, इसलिए वे दुनियादारी के झमेले में ज्यादा नहीं फँसती। इससे वे अद्वैत के आनन्द में डूबी रहती हैं। इसी अद्वैत के आनन्द को उनके द्वारा दोनों नदियों के जल को पीने के रूप में दर्शाया गया है। वे सुंदर व सुडौल शरीर वाली होती हैं। नहाते समय कुंडलिनी ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती है, जैसा मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था। ऐसा ही उन देव स्त्रियों के साथ भी होता है। मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ने से उनका मूलाधार ऊर्जाहीन सा हो जाता है। मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही वे रति की ओर आकर्षित होती हैं, और पुरुषों के साथ विहार करती हैं। एक अन्य रूपक के अनुसार, देवस्त्रियाँ सुंदर व मानवीय विचारों की प्रतीक हैं। ऐसे विचार अद्वैत भाव के साथ होते हैं, मतलब इनके साथ इड़ा और पिंगला, दोनों नाड़ियाँ बहती हैं। जब ये दोनों नाड़ियाँ बहुत तेजी से बहती हैं, तभी दिव्य कामभाव जागृत होता है। ऐसा मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही होता है, क्योंकि अद्वैत से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ती रहती है। अद्वैत भाव से मस्तिष्क में अभौतिक कुंडलिनी चित्र का विकास होने लगता है। उसके लिए बहुत ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इंद्रियों की पहुंच से बाहर होने के कारण, आम मानसिक चित्रों की तरह इसको मजबूत करने के लिए शारीरिक इंद्रियों का सहयोग नहीं मिलता। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। उस स्थिति में की गई रति क्रीड़ा बहुत आनन्ददायक व आत्मा का विकास करने वाली होती है, मतलब कि इससे ऊर्जा सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर सहस्रार में पहुंच जाती है। इस अतिरिक्त ऊर्जा से कुंडलिनी के साथ मस्तिष्क का भी अच्छा विकास होता है। इसीलिए कहते हैं कि मानव जाति के त्वरित विकास के लिए कुंडलिनी बहुत जरूरी है। उपरोक्त कुण्डलिनीपरक रतिक्रिया को तांत्रिक रतिक्रीड़ा भी कह सकते हैं। जब आदमी दुनियादारी से दूर हो, और ऊर्जा की कम खपत के कारण उसकी ऊर्जा की संचित मात्रा पर्याप्त हो, और वह पहले से ही सुषुम्ना में बह रही हो, वह तो साधु वाली स्थिति होती है। उसमें रतिक्रीड़ा के प्रति ज्यादा मन नहीं करता। देवलोक से वे स्त्रियां आती हैं, मतलब मस्तिष्क से वे मानवीय विचार बाहर आते हैं, और अद्वैत भाव के साथ दुनियादारी के काम निभाने लगते हैं। इसे ही देवस्त्रियों द्वारा नन्दा और अलकनन्दा नदियों में स्नान करना कहा गया है। देवता व देवियाँ वैसे भी अद्वैत भाव के प्रतीक होते हैं। साधारण लोगों में यह ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रभाव कम होता है। इसलिए उनकी कामुक भावना क्षणिक सुखदायी ही होती है, जिसे कामवासना कहते हैं। उनमें द्वैत भाव होने के कारण उनके मन में कुंडलिनी नहीं होती। इसलिए ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता न होने से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर नहीँ चढ़ती। इसीलिए इसमें मूलाधार की ऊर्जा का रक्षण नहीं बल्कि क्षरण होता है। मस्तिष्क में ही दिव्यता होती है।  सौगंधिक वन और अलकापुरी को लाँघ कर आगे बढ़ने पर वे सभी देवता एक वटवृक्ष के पास पहुंचते हैं, जिसकी शाखाएं पूरे पर्वत पर फैल कर छाया पहुंचाए हुए थीं। दरअसल कुंडलिनी को ही उन सभी देवताओं के रूप में दर्शाया गया है। मन में पूरी सृष्टि बसी हुई है। इसका मतलब है कि मन में सभी देवता बसे हुए हैं, क्योंकि देवता ही सृष्टि को चलाते हैं, और पूरी सृष्टि के रूप में भी हैं। एकमात्र कुंडलिनी चित्र या ध्यान चित्र के अंदर पूरा मन ऐसे ही समाया हुआ होता है, जैसे एक चीनी के दाने में चीनी की पूरी बोरी या गन्ने का पूरा खेत समाया होता है। किसी को अगर चीनी के दर्शन कराने हो, तो हम पूरी बोरी चीनी न उठाकर एक दाना चीनी का ले जाते हैं। इससे काम काफी आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से चीनी की बोरी को एक फुट ऊंचा उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से एक चीनी के दाने को हजारों फुट ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम चीनी की बोरी से होगा, वही काम चीनी के एक दाने से भी हो जाएगा। इसी तरह यदि शिव से मिलाने के लिए सहस्रार तक मन को ले जाना हो, तो हम मन की पूरी दुनिया को न ले जाकर केवल कुंडलिनी को ले जाते हैं। इससे शिव-मन या शिव-जीव के मिलाप का काम बेहद आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से पूरे मन को मूलाधार से स्वाधिष्ठान चक्र तक भी ऊंचा नहीं उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से कुंडलिनी को सहस्रार तक ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम असंख्य चित्रों के ढेर को समेटे मन से होगा, वही काम उस ढेर में से छांटे गए एकमात्र कुंडलिनी चित्र से भी हो जाएगा। कुंडलिनी के स्थान पर बहुत सारे देवता इसलिए दिखाए गए हैं, ताकि इससे इस मनोवैज्ञानिक आख्यान को रोचकता व रहस्यात्मकता मिल सके। वटवृक्ष ही सहस्रार है, क्योंकि सहस्रार पूरे मस्तिष्क से नाड़ियों के माध्यम से जुड़ा है। उन नाड़ियों को सहस्रार चक्र रूपी वृक्ष की शाखाएं कह सकते हैं। उसकी शाखाएँ तीन ओर फैली हुई थीं, इसका मतलब है कि सहस्रार से बाएं मस्तिष्क, दाएँ मस्तिष्क और आगे व फिर नीचे फ्रंट चैनल, तीन दिशाओं में ऊर्जा प्रसारित होती है। पीछे व वहाँ के नीचे स्थित बैक चैनल से तो उसे ऊर्जा मिल रही है। यह चौथी दिशा में है, जिसे हम उस वृक्ष का तना या जड़ कह सकते हैं। ऊर्जा हमेशा जड़ से शाखाओं की तरफ ही बहती है। उसका ऊपरी विस्तार 100 योजन ऊँचा बताया गया है, जो लगभग एक हजार मील की दूरी है। यह बहुत ऊँचाई है, जो बाहरी अंतरिक्ष तक फैली है। दरअसल इसका मतलब है कि सहस्रार चक्र उस अखंड ऊर्जा से जुड़ा हुआ है, जो अनन्त आकाश में फैली हुई है। सहस्रार का शाब्दिक अर्थ भी एक हजार शाखाओं वाला है, सम्भवतः इसीलिए यह संख्या ली गई हो। वह घोंसलों से वर्जित है, मतलब वहाँ कोई सामान्य जीव नहीं पहुंच सकता। वह ताप से वर्जित है, मतलब अत्यंत शांत सहस्रार चक्र है। जिस द्वैत से ताप पैदा होता है, वह वहाँ था ही नहीं। वह अत्यंत रमणीय था। इसका मतलब है कि सभी स्थानों की रमणीयता सहस्रार के कारण ही होती है। रमणीय स्थानों पर ऊर्जा सहस्रार में घनीभूत हो जाती है, इसीलिए वे स्थान रमणीय लगते हैं। तभी तो आपने देखा होगा कि रमणीय स्थान पर घूमने के बाद शरीर में थकावट होने से कुछ समय काम करने को ज्यादा मन नहीं करता। यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर की अधिकांश ऊर्जा सहस्रार को चली गई होती है। रमणीय स्थान पर घूमने के बाद आदमी तरोताजा व निर्मल सा हो जाता है। ऐसा लगता है कि पापों का पुराना बोझ हट गया है।इसीलिए दुनियादारी में पर्यटन का इतना ज्यादा क्रेज होता है। विभिन्न तीर्थ स्थल भी इसी रमणीयता के आध्यात्मिक गुण का फायदा उठाते हैं। ऐसा सब सहस्रार चक्र के कारण ही होता है। इसीलिए इसे परम पावन कहा है। उस वृक्ष का दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं। अनुभव से भी यह साफ विदित होता है कि हिंसा आदि कर्मों से कुंडलिनी चेतना नीचे गिरती है, और मानवता रूपी पुण्य कर्मों से ऊपर चढ़ती है। वह दिव्य था। सारी दिव्यता सहस्रार चक्र में ही तो होती है। दिव्य शब्द दिवा या प्रकाश से बना है। प्रकाश का मूल सहस्रार और उससे जुड़ी अखंड ऊर्जा ही है। वह योगमयी था तथा योगियों व शिव का प्रिय निवास स्थान था। शिव भी तो योगी ही हैं। ब्रह्म या एनेर्जी कँटीन्यूवम से जुड़ाव या योग सहस्रार में ही सम्भव होता है। जाहिर है कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु लोग वहीँ जाएंगे, क्योंकि सहस्रार में ही सीमित चेतना से छुटकारा सम्भव है। उस वृक्ष के मूल में शिव बैठे थे। ब्रह्म या अखंड ऊर्जा या एनर्जी कँटीन्यूवम को भी यहाँ शिव ही कहा है। वे तपस्वियों को प्रिय लगने वाले वेष में थे। मतलब कि वे अद्वैत रूप अखण्ड ऊर्जा के रूप में थे, जो तपस्वियों को अच्छी लगती है। द्वैत में डूबे साधारण लोग कहाँ उसे पसंद करने लगे। ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार आदि ऋषि जो हमेशा ब्रह्मध्यान में लीन रहते हैं, उन्हें शिव की उपासना करते हुए इसलिए बताया गया है, क्योंकि शिव सृष्टि के सबसे बड़े तन्त्रयोगी भी हैं। आज्ञा चक्र व मूलाधार पर ध्यान केंद्रित करने से मस्तिष्क की ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सहस्रार में आ जाती है। इसे ही कुबेर द्वारा अपने गुह्यक सेवकों और परिवारजनों के साथ शिव की सेवा करना बताया गया है। गुह्यक यहाँ मूलाधार का प्रतीक हैं, क्योंकि मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में जुड़े होते हैं। गुह्यक भी मूलाधार की तरह ही डार्क तमोगुणी जैसे होते हैं। कुबेर के परिवारजन मस्तिष्क में चारों ओर बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा के प्रतीक हैं। परिवारजन परिवार के मुखिया के ही वश में होते हैं। वात्सल्य भाव तो शिव में होगा ही। अनन्त चेतना के स्वामी शिव को हमारे जैसे सीमित चेतना वाले प्राणी बच्चे ही लगेंगे। वे भस्म लगाए हुए थे। भस्म वैराग्य, सार और निष्ठा का प्रतीक है। सारे विश्व का निचोड़ भस्म में निहित है। अखण्ड ऊर्जा में रमण करने वाले शिव को जगत नामक सीमित ऊर्जा कहाँ रास आएगी। अनेक लोग शिव से ही तंत्रयोग की प्रेरणा लेते हैं और कुंडलिनी जागरण प्राप्त करते हैं। इसे ही शिव के द्वारा ज्ञानोपदेश के रूप में दर्शाया गया है।

कुंडलिनी के बिना विपश्यना या साक्षीभाव साधना या संन्यास योग करना कठिन व अव्यवहारिक प्रतीत होता है

कर्मयोग

दोस्तों, आजकल मेरे मानस पटल पर गीता के बारे में नित नए रहस्य उजागर हो रहे हैं। दरअसल पूरी गीता एक कुंडलिनी शास्त्र ही है। इसे युद्ध के मैदान में सुनाया गया था, इसीलिए इसमें विस्तार न होकर प्रेक्टिकल बिंदु ही हैं। व्यावहारिकता के कारण ही इसमें एक ही बात कई बार और कई तरीकों से बताई लगती है। मेरा शरीरविज्ञान दर्शन अब मुझे पूरी तरह गीता पर आधारित लगता है। हालांकि मैंने इसे स्वतंत्र रूप से, बिना किसी की नकल किए और अपने अनुभव से बनाया था। 

कुंडलिनी ही सभी प्रकार की योग साधनाओं व सिद्धियों के मूल में स्थित है

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥५-७॥
अपने मन को वश में करने वाला, जितेन्द्रिय, विशुद्ध अन्तःकरण वाला और सभी प्राणियों को अपना आत्मरूप मानने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता है॥7॥
उपरोक्त सभी गुण अद्वैत के साथ स्वयं ही रहते हैं। अद्वैत कुंडलिनी के साथ रहता है। इसलिए इस श्लोक के मूल में कुंडलिनी ही है।

आजकल के वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण युग में हरेक आध्यात्मिक उक्ति का वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण दार्शनिक आधार होना जरूरी है

नैव किंचित्करोमीतियुक्तो मन्येत तत्त्ववित्।पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥५-८॥
तत्व को जानने वाला यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ । देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूँघते हुए, खाते हुए, चलते हुए, सोते हुए, साँस लेते हुए ॥8॥
सीधे तौर पर ऐसा मानना आसान नहीं है कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। ऐसा मानने के लिए कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक आधार तो होना ही चाहिये। ऐसा ही उत्तम आधार शरीरविज्ञान दर्शन ने प्रदान किया है। किसी दिव्य प्रेरणा से इसे बनाने की नींव मैंने तब डाली थी, जब क्षणिक व स्वप्नकालीन आत्मज्ञान के बहकावे में आकर मैं अपने काम से जी चुराने लग गया था। मैं अनायास ही संन्यास योग की तरफ बढ़ा जा रहा था। इससे मैं आसपास के संबंधित लोगों से भौतिक रूप से पिछड़ने लग गया था। इस दर्शन ने मुझे दुनियादारी की तरफ धकेला और मेरे कर्मयोग को सफल किया। इसमें वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध किया गया है कि जो कुछ भी आदमी कर रहा है, वह सब हमारे शरीर में भी वैसा ही हो रहा है। जब हमारे शरीर में रहने वाले देहपुरुष अपने को कर्ता नहीं मानते तो हम अपने को कर्ता क्यों मानें। आदमी अपने अवचेतन मन के दायरे में समझे कि उस दार्शनिक पुस्तक के सूक्ष्म रूप की वर्षा हर समय उस पर हो रही है। अवचेतन मन से मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि प्रत्यक्ष या चेतन मन तो दुनियादारी के काम में व्यस्त रहता है, उसे क्यों परेशान करना। उससे त्वरित व चमत्कारिक लाभ होते मैंने स्वयं देखा है। ऐसा चिंतन करते ही आनन्द के साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है, और आदमी रिलेक्स फील करता है। इसका मतलब है कि इस श्लोक के आधार में भी कुंडलिनी ही है। इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि दरअसल आदमी के मन की कुंडलिनी ही कर्ता और भोक्ता है, आदमी खुद नहीँ। 

यदि शरीरविज्ञान दर्शन के ऐसे चिंतन से मस्तिष्क में दबाव व जड़त्व सा लगे, तो दूसरा तरीका आजमाना चाहिए। इसमें शरीरविज्ञान दर्शन की ओर जरा सा ध्यान दिया जाता है, फिर समयानुसार हरेक परिस्थिति को इसका आशीर्वाद समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए, और प्रसन्न रहना चाहिए।।

सांख्ययोग या संन्यास योग विपासना या विटनेसिंग के समकक्ष है और कर्मयोग कुंडलिनी योग के समकक्ष

संन्यासः कर्मयोगश्चनिःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥५-२॥

श्री कृष्ण भगवान कहते हैं- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के कराने वाले हैं, पर इन दोनों में भी कर्मयोग कर्म-संन्यास से (करने में सुगम होने के कारण) श्रेष्ठ है॥2॥
कर्मयोग व कुंडलिनी योग, दोनों में कुंडलिनी अधिक प्रभावी होती है। इसमें संसार में परिस्थितियों के अनुसार प्रवृत्त रहते हुए कुंडलिनी को ज्यादा अहमियत दी जाती है। यह श्रेष्ठ है, क्योंकि इससे दुनियादारी भी अच्छे से चलती है। बहुत से सर्वोत्तम प्रकार के राजा व प्रशासक कर्मयोगी हुए हैं। संन्यास योग में विचारों के प्रति साक्षीभाव रखकर उन्हें विलीन किया जाता है। अधिकांशतः बुद्धिस्ट लोग इसी तरीके को अपनाते हैं, इसीलिए वे दुनिया से दूर रहकर मठों आदि में अपना ज्यादातर समय बिताते हैं। कई आधुनिक लोग भी अपनी थकान मिटाने के लिए इस तरीके का अल्पकालिक प्रयोग करते हैं।

यह श्लोक अर्जुन जैसे उन लोगों को देखते हुए बना था, जो अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को छोड़कर साक्षीभाव साधना के नाम पर अकर्मक बनना चाहते थे। इस श्लोक ने ऐसे लोगों की आंख खोल दी। उन्हें इस श्लोक के माध्यम से बताया कि सबसे ज्यादा आध्यात्मिक लाभ कर्म करने से प्राप्त होता है, ज्ञानसाधना के नाम पर कर्म छोड़ने से नहीं। ज्ञानसाधना इतनी आसान नहीँ है। हर कोई बुद्ध नहीं बन सकता। यदि ज्ञानसाधना असफल हो जाए तो नरकप्राप्ति की जो बात शास्त्रों में कही गई है, वह सत्य प्रतीत होती है। वैसे तो कर्मयोग असफल नहीं होता। पर यदि किसी कुचक्र से विरले मामले में हो भी जाए तो भी कम से कम स्वर्ग मिलने की संभावना तो है ही, क्योंकि इसमें आदमी ने अच्छे कर्म किए होते हैं।

जो आध्यात्मिक लाभ विटनेसिंग साधना से प्राप्त होता है, वही कुंडलिनी साधना से भी प्राप्त होता है

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानंतद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति॥५-५॥
ज्ञानयोगियों द्वारा जो गति प्राप्त की जाती है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त की जाती है इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को (फल से) एक देखता है, वही ठीक देखता है॥5॥
इस श्लोक का मतलब है कि जो मुक्ति संन्यास योग या विपश्यना से मिलती है, वही कर्मयोग या कुंडलिनी योग से भी मिलती है। मुक्ति से यहाँ तात्पर्य बन्धनकारी विचारों से मुक्ति है। केवल यही आभासिक अंतर है कि विपश्यना या विटनेसिंग से वह मुक्ति ज्यादा प्रतीत होती है। क्योंकि विपश्यना-योगी के अंदर व बाहर, कहीं भी विचारों का तूफान नहीं होता, एक शांत झील की तरह। जबकि कर्मयोगी, समुद्र की तरह बाहर से तूफानी, पर अंदर से शांत होते हैं। यह श्लोक गीता का सर्वोत्तम श्लोक है। अध्यात्म का सम्पूर्ण रहस्य इसमें छिपा है। इसे मैंने खुद अनुभव किया है। कर्मयोग से ही मैं सांख्ययोग तक पहुंचा। यह अलग बात है कि मैं अब भी कर्मयोग को ही महत्त्व देता हूँ। साधारण लोगों को दोनों प्रकार के योग अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर दोनों अंदर से एकसमान है, और एकसमान फल प्रदान करते हैं। कर्मयोग ज्यादा प्रभावी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो विचारों की आनन्दमयी शून्यता संन्यास योग से प्राप्त होती है, वही कर्मयोग से भी प्राप्त होती है। इन दोनों में कर्मयोग की अतिरिक्त विशेषता यह है कि बेशक इसमें अंदर से मन की आनंदमयी व कुंडलिनीमयी शून्यता हो, पर बाहर से दुनियादारी के सभी काम सर्वोत्तम ढंग से होते रहते हैं। यह समुद्र की प्रकृति से मेल खाता है, बाहर से तूफानी, जबकि अंदर से शांत।

कई लोग कर्मयोग और संन्यास योग, दोनों के मिश्रण का प्रयोग करते हैं। वे काम के मौकों पर कर्मयोग पर ज्यादा ध्यान देते हैं, और काम के अभाव में संन्यास योग पर। मैंने भी इस तरीके को आजमाया था। पर मुझे लगता है कि पूर्ण कर्मयोग ही सर्वश्रेष्ठ है। वास्तव में काम की कमी कभी हो ही नहीँ सकती।

दुनियादारी में उलझे व्यक्ति के लिए विटनेसिंग साधना के बजाय कुंडलिनी साधना करना अधिक आसान है

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्मनचिरेणाधिगच्छति॥५-६॥

परन्तु हे वीर अर्जुन! कर्मयोग के बिना (कर्म-) संन्यास कठिन है और कर्मयोग में स्थित मुनि परब्रह्म को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है॥6॥
इस श्लोक का अभिप्राय है कि जब कर्मयोग या कुंडलिनी योग से कुंडलिनी जागरण हो जाता है, तभी हम विचारों का असली संन्यास कर सकते हैं। यदि कुन्डलिनी क्रियाशील भी बनी रहे, तो भी काम चल सकता है। कुंडलिनी जागरण दुनियादारी का उच्चतम स्तर है। इससे मन दुनिया से पूरी तरह तृप्त और संतुष्ट हो जाता है। इसलिए इसके बाद विचारों का त्याग करना बहुत आसान या यूँ कह सकते हैं कि स्वचालित या स्वाभाविक ही हो जाता है। इसके बिना, मन दुनिया में ही रमा रहना चाहता है, क्योंकि उसे इसका पूर्ण रस नहीँ मिला होता है। इसीलिए तो बहुत से बौद्ध भिक्षु व अन्य धर्मों के संन्यासी दुनिया से दूर रहकर एकांत में साधना करना अधिक पसंद करते हैं। इसीसे वे अपने मन को दुनिया के प्रलोभन से बचाकर रख पाते हैं। इससे विपश्यना या विटनेसिंग या संन्यास योग या सांख्ययोग के लिए कुंडलिनी क्रियाशीलता व कुंडलिनी जागरण के महत्त्व का साफ पता चलता है। विपासना, विपश्यना, विटनेसिंग, साक्षीभाव, संन्यास योग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग, ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं

श्रीमद्भागवत गीता की विस्मयकारी व्यावहारिकता

मुझे लगता है कि गीता के आध्यात्मिक सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से अपने दैनिक जीवन में लागू किया जाना चाहिए, अन्यथा मात्र इसे पढ़ने या इसके दैनिक जप करने से कोई विशेष फायदा प्रतीत नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति कर्मयोग के रहस्य को व्यावहारिक रूप से समझता है, तो उसे बहुत ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं है।

कुंडलिनी ही आध्यात्मिक मुक्ति के लिए पर्याप्त प्रतीत होती है

श्रीमद्भागवत गीता

मित्रों, मैंने पिछ्ली पोस्ट में ऑनलाइन गीता से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण पोस्ट डाली थी। उसमें कुंडलिनी योग का पूरा रहस्य किस तरह गीता के दो श्लोकों में छिपा हुआ है, यह बताया गया था। आज मैं इस पोस्ट में गीता में छिपा दूसरा योग रहस्य साझा कर रहा हूँ। 

गीता के पांचवें अध्याय के 18वें व 19वें श्लोक में आध्यात्मिक मुक्ति का रहस्य छिपा हुआ है

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥५-१८॥
ऐसे ज्ञानी जन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान देखते हैं॥18॥

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥५-१९॥
जिनका मन सम भाव में स्थित है, उनके द्वारा यहाँ संसार में ही लय(मुक्ति) को प्राप्त कर लिया गया है; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं॥19॥

उपरोक्त दोनों श्लोकों से स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए न तो कुंडलिनी जागरण की आवश्यकता है और न ही आत्मज्ञान की। मुक्ति तो केवल समदर्शिता या अद्वैत से ही मिलती है। तो फिर लोग अद्वैत को छोड़कर आध्यात्मिक जागृति की तरफ ही क्यों भागते हैं। यह इसलिए क्योंकि जागृति के बाद अद्वैतभाव को बना कर रखना थोड़ा आसान हो जाता है। पर ऐसा थोड़े समय, लगभग 3-4 सालों तक ही होता है। उसके बाद आदमी अपने आध्यात्मिक जागरण को काफी भूलने लग जाता है। यदि विभिन्न आध्यात्मिक तरीकों से उच्च कोटि के अद्वैत को निरंतर बना कर रखा जाए, तो वह जागरण के तुल्य ही है। विभिन्न कुंडलिनी साधनाओं से यदि कुंडलिनी को क्रियाशील रखा जाए तो अद्वैत भाव निरंतर बना रहता है, क्योंकि जहाँ कुंडलिनी होती है, वहाँ अद्वैत रहता ही है। कुंडलिनी जागरण के समय पूर्ण अद्वैत भाव व आनन्द की अनुभूति भी यही सिद्ध करती है कि जहाँ कुंडलिनी है, वहाँ अद्वैत या समदर्शिता और आनन्द भी है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बेशक गीता में कुंडलिनी का नाम न लिया गया हो, पर गीता एक कुंडलिनीपरक शास्त्र ही है।

कुंडलिनी या कुंडलिनी जागरण में से किसको ज्यादा अहमियत देनी चाहिए

कुंडलिनी को ही ज्यादा अहमियत देनी चाहिए। क्योंकि यदि कुंडलिनी क्रियाशील बनी रहती है, तो कुंडलिनी जागरण की ज्यादा आवश्यकता नहीँ। यदि वह हो जाए तो भी अच्छा, और यदि न होए तो भी अच्छा। वैसे भी समय आने पर कुंडलिनी जागरण अपने आप हो ही जाता है, यदि कुंडलिनी साधना निरंतर बना कर रखी जाए। पर यदि आदमी कुंडलिनी साधना को छोड़कर दिग्भ्रमित हो जाए, और कुंडलिनी जागरण के चित्र-विचित्र क्रियाओं के पीछे भागने लगे, तो इसकी पूरी संभावना है कि उसे न तो कुंडलिनी मिलेगी और न ही कुंडलिनी जागरण। वैसे भी, कुंडलिनी जागरण के बाद भी कुंडलिनी साधना को निरंतर रूप से जारी रखना ही पड़ता है। तो फिर क्यों न जागरण से पहले भी उसे निरन्तर जारी रखा जाए। इससे जाहिर होता है कि असली शक्ति तो कुंडलिनी क्रियाशीलता में ही है। कुंडलिनी क्रियाशीलता मतलब कुंडलिनी भाव के साथ आदमी की जगत में पूर्ण व्यावहारिक व मानवीय क्रियाशीलता बनी रहना। जागरण तो केवल कुंडलिनी साधना के प्रति अटूट विश्वास पैदा करता है, और निरन्तर उसे बनाकर रखवाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुंडलिनी जागरण कुंडलिनी की आध्यात्मिक शक्ति का साक्षात वैज्ञानिक प्रमाण है। कुंडलिनी जागरण की दूसरी कमी यह है कि उसे प्राप्त करने के लिए आदमी का स्वस्थ व जवान होना बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी जागरण के लिए बहुत अधिक प्राणशक्ति की आवश्यकता पड़ती है। इसका मतलब है कि दुनियादारी में डूबे हुए, वृद्ध और बीमार लोगों को कुंडलिनी जागरण होने की संभावना बहुत कम होती है। पर वे कुंडलिनी साधना का लाभ उठा सकते हैं। एक तथ्य और है कि कुंडलिनी जागरण उस समय होता है, जिस समय आदमी को न तो उसे प्राप्त करने की इच्छा हो, औऱ न ही उसके प्राप्त होने की उम्मीद हो। इसलिए कुंडलिनी साधना से कुंडलिनी क्रियाशीलता बनाए रखना ही पर्याप्त है। उपरोक्त सभी तथ्यों व सिद्धांतों को शरीरविज्ञान दर्शन नामक पुस्तक में वैज्ञानिक, व्यावहारिक व अनुभवात्मक तौर पर समझाया गया है।

कुंडलिनी विज्ञान ही अधिकांश धार्मिक मान्यताओं की रीढ़ है


इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी-मार्ग

मित्रो, कुंडलिनी विज्ञान सभी धर्मों की रीढ़ है। सभी धार्मिक मान्यताएं इस पर आधारित है। आज मैं हिन्दू धर्म की कुछ परंपरागत मान्यताओं का उदाहरण देकर इस सिद्धान्त को स्पष्ट करूंगा। साथ में, कुंडलिनी योग के कुछ व्यावहारिक बिंदुओं पर भी प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा। हालांकि ये मान्यताएं तुच्छ लगती हैं, पर ये कुंडलिनी योग का बहुत बड़ा व व्यावहारिक संदेश देती हैं।

दोनों पैरों की ठोकर से कुंडलिनी को केंद्रीकृत करना

इस मान्यता के अनुसार यदि किसी आदमी के पैर की ऐड़ी को पीछे से किसी अन्य आदमी के पैर से ठोकर लग जाए तो दूसरे पैर को भी उसी तरह ठोकर मारनी पड़ती है। उससे दोनों लोगों का शुभ होता है। दरअसल एक तरफ के पैर की ठोकर से कुंडलिनी शरीर के उस तरफ अधिक क्रियाशील हो जाती है, क्योंकि कुंडलिनी संवेदना का पीछा करती है। जब शरीर के दूसरी तरफ के पैर में भी वैसी ही संवेदना पैदा होती है, तब कुंडलिनी दूसरी तरफ जाने लगती है। इससे वह शरीर के केंद्र अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में आ जाती है। इससे आदमी संतुलित हो जाता है, जिससे उसका हर प्रकार से शुभ होता है। दूसरे आदमी को भी इस प्रभाव का लाभ मिलता है, क्योंकि जैसा कर्म, वैसा फल। मैंने यह खुद होते देखा है।

एक या ऑड छींक अशुभ, पर दो या ईवन छींकें शुभ मानी जाती हैं

इसके पीछे भी यही कुंडलिनी सिद्धांत काम करता है। एक छींक की संवेदना से दिमाग का एक ही तरफ का हिस्सा क्रियाशील होता है। कल्पना करो कि बायाँ हिस्सा क्रियाशील हुआ। इसका मतलब है कि उस समय आदमी की सोच सीमित, लीनियर या लॉजिकल थी। क्योंकि दिमाग के दोनों हिस्से आपस में लगातार कंम्यूनिकेट करते रहते हैं, इसलिए यह पक्का है कि वह दाएँ हिस्से को सतर्क कर देगा। जब दूसरी छींक आती है, तो उससे दिमाग का दायाँ हिस्सा क्रियाशील हो जाता है। उससे आदमी की सोच असीमित या इलॉजिकल हो जाती है। इससे कुंडलिनी या अवेयरनेस दिमाग के दोनों हिस्सों में घूमकर दिमाग के बीच में केंद्रित हो जाती है। इसी केंद्रीय रेखा पर सहस्रार और आज्ञा चक्र विद्यमान हैं। इससे पूर्णता, संतुलन और आनन्द का अनुभव होता है। 

मस्तिष्क में अंदरूनी विवाह ही अर्धनारीश्वर का रूप या शिवविवाह है

मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ भाग बारी-2 से काम करते रहते हैं। ऐसा उनके बीच के स्थाई संपर्क मार्ग से होता है। इस न्यूरोनल या नाड़ी मार्ग को कॉर्प्स कॉलोसम कहते हैं। जिनमें किसी रोग आदि के कारण नहीं होता, वे लगातार मस्तिष्क के एक ही हिस्से से बड़ी देर तक काम करते रहते हैं। उनमें आपसी तालमेल न होने के कारण वे अपने काम ढंग से नहीं कर पाते। सामान्य व्यक्ति में कुछ देर तक बायाँ मस्तिष्क काम करता है। वह तर्कपूर्ण, सीमित, व व्यावहारिक दायरे में रहकर कुशलता से रोजमर्रा के काम करवाता है। थोड़ी देर में ही वह विचारों की चकाचौंध से थक जाता है। फिर शरीर दाएँ मस्तिष्क के नियंत्रण में आ जाता है। उसकी कार्यशैली आकाश की तरह असीमित, तर्कहीन, व खोजी स्वभाव की होती है। क्योंकि इसमें आदमी को सीमित दायरे में बांधने वाले विचारों की चकाचौंध नहीं होती, इसलिए यह अंधकार लिए होता है। इसमें रहकर जैसे ही आदमी की विचारों की पुरानी थकान खत्म होती है, वैसे ही यह हिस्सा बन्द हो जाता है, और बायाँ हिस्सा फिर से चालू हो जाता है। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। कार्य के आधिपत्य को आपस में परिवर्तित करने का समय अंतराल आदमी की सतर्कता और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के अनुसार बदलता रह सकता है। अब बात आती है, मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को एकसाथ समान रूप से क्रियाशील करने की। यही कुंडलिनी का केंद्रीय रेखा या सुषुम्ना में आना है। इससे कुंडलिनी शक्ति मतलब प्राण शक्ति दोनों हिस्सों में बराबर बंट जाती है, और पूरे मस्तिष्क को क्रियाशील कर देती है। ऐसा ही कुंडलिनी जागरण के समय भी महसूस होता है, जब किसी विशेष क्षेत्र की बजाय पूरा मस्तिष्क समान रूप में चेतन, क्रियाशील और कम्पायमान हो जाता है। इसे हम अर्धनारीश्वर का आंतरिक मिलन या शिवविवाह भी कह सकते हैं। यह भी कह सकते हैं, शरीर के बाएँ भाग का विवाह दाएँ भाग से हो गया है। हिंदु धर्म में अर्धनारीश्वर नामक शिव के बाएं भाग को स्त्री और आधे दाएँ भाग को पुरुष के रूप में दिखाया गया है। कुंडलिनी चित्र बाएँ मस्तिष्क में रहने का ज्यादा प्रयास करता है, इसीलिए कुंडलिनी को स्त्री रूप दिया गया है। आप खुद देखिए, हर किसी के मन में चकाचौंध से भरे विचारों के पूल के अंदर हमेशा डूबे रहने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को दाएँ मस्तिष्क के खाली आकाश में जागरूकता को स्थानांतरित करने के नियमित अभ्यास के माध्यम से दूर किया जाना ही लक्ष्य है। कुंडलिनी योग के माध्यम से इसे केंद्र में लाने की कोशिश की जाती है। कुंडलिनी के केन्द्रीभूत होने से ही एक आदमी पूर्ण मानव बनता है। इससे उसमें तार्किक व्यावहारिकता भी रहती है, और साथ में अतार्किक भावप्रधानता व खोजीपना भी। इसका अर्थ है कि वहाँ अद्वैत उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के बिना दो विरोधी गुणों का साथ रहना सम्भव ही नहीं है। इसी तरह, सीधे तौर पर शरीरविज्ञान दर्शन या पुराणों से अद्वैत भाव बना कर रखने से मन में कुंडलिनी की स्पष्टता बढ़ जाती है। मन में दो विरोधी गुणों को एकसाथ बना कर रखने के लिए या कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बना कर रखने के लिए बहुत अधिक प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसीलिए मैंने पिछ्ली पोस्ट में योग के लिए संतुलित आहार व संतुलित जीवन पर बहुत जोर दिया है। शुरु-2 में मैं कुंडलिनी योग करते समय मस्तिष्क में सहस्रार चक्र व आज्ञा चक्र के स्तर पर कुंडलिनी को सिर में चारों ओर ऐसे घुमाता था, जैसे एक किसान गोलाकार खेत में हल चला रहा हो। उससे मेरा पूरा मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता था, और आनन्द के साथ कुंडलिनी केन्द्रीभूत हो जाती थी। मैंने यह भी देखा कि एक नाक से जल खींचकर दूसरे नाक से निकालने पर भी कुंडलिनी को केन्द्रीभूत होने में मदद मिलती है। इसे जलनेती कहते हैं। इसके लिए जल गुनगुना गर्म और हल्का नमकीन होना चाहिए, नहीं तो सादा और ठंडा जल नाक की म्यूकस झिल्ली में बहुत चुभता है। 

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ ही कुंडलिनी जागरण के लिए मूलभूत नाड़ियाँ हैं

कुंडलिनी योग के अभ्यास के दौरान पीठ में तीन नाड़ियों की अनुभूति होती है। नाड़ियाँ वास्तव में सूक्ष्म संवेदना मार्ग हैं, जो केवल अनुभव ही की जा सकती हैं। भौतिक रूप में तो मुझे ये शरीर में नजर आती नहीं। हो सकता है कि ये भौतिक रूप में भी हों। यह एक रिसर्च का विषय है। एक नाड़ी पीठ के बाएं हिस्से से होकर ऊपर चढ़ती है, और बाएँ मस्तिष्क से होते हुए आज्ञा चक्र पर समाप्त हो जाती है। दूसरी नाड़ी भी इसी तरह पीठ के व मस्तिष्क के दाएँ हिस्से से गुजरते हुए आज्ञा चक्र पर ही पूर्ण हो जाती है। एक इसमें इड़ा और दूसरी पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के बिल्कुल बीच में और ठीक रीढ़ की हड्डी के बीच में से तीसरी नाड़ी पीठ व मस्तिष्क के बीचोंबीच होती हुई सहस्रार तक जाती है। यह सुषुम्ना नाड़ी है। सामान्य आरेखों के विपरीत, मुझे इड़ा और पिंगला पीठ में अधिक किनारों पर मिलती हैं। यह एक कम अभ्यास का प्रभाव हो सकता है। दरअसल, योग में दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा भावना या अनुभव मायने रखता है। कुंडलिनी जागरण इसी नाड़ी से चढ़ती हुई कुंडलिनी से होता है। यदि कुंडलिनी इड़ा या पिंगला नाड़ी से होकर भी ऊपर चढ़ रही हो, तब भी उसे रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी हर हालत में फायदेमंद ही होती है। उसे जबरदस्ती सुषुम्ना में धकेलने का भी प्रयास करना चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी जबरदस्ती को ज्यादा पसंद नहीं करती। कुंडलिनी अपने प्रति समर्पण से खुश होती है। जब वह इड़ा या पिंगला से चढ़ रही हो, तब उसके ध्यान के साथ मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र व आज्ञा चक्र का भी एकसाथ ध्यान करना चाहिए। इससे वह एकदम सुषुम्ना में आ जाती है, या थोड़ी देर के लिए पीठ के दूसरे किनारे की नाड़ी में चढ़ने के बाद सुषुम्ना में चढ़ने लगती है। इससे कुंडलिनी सहस्रार में प्रकाशित होने लगती है। इसके साथ, शरीर व मन के संतुलन के साथ आनन्द की प्राप्ति भी होती है। कुंडलिनी को सहस्रार से नीचे आज्ञा चक्र को नहीं उतारा जाता, इसीलिए सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में चित्रित किया जाता है। वास्तव में कुंडलिनी को सहस्रार में रखना व उधर जागृत करना ही कुंडलिनी योग का सर्वप्रमुख ध्येय है। इसीसे सभी आध्यात्मिक गुण प्रकट होते हैं। सहस्रार चक्र पिंड को ब्रह्मांड से जोड़ता है। यह सबसे अधिक आध्यात्मिक चक्र है, जो एक तरफ आत्मा से जुड़ा होता है, और दूसरी तरफ परमात्मा से। सहस्रार में कुंडलिनी के दबाव को झेलने की बहुत क्षमता होती है। ऐसा लगता है कि कुंडलिनी से सहस्रार की खारिश मिट रही है, और मजा आ रहा है। फिर भी यदि वहां असहनीय दबाव लगे, तो कुंडलिनी को आज्ञा चक्र तक व आगे की नाड़ी से शरीर में नीचे उतार सकते हैं। हालांकि, यह इडा या पिंगला के माध्यम से नीचे लाने की तुलना में अधिक कठिन और गड़बड़ वाला दिखाई देता है। हालाँकि उल्टी जीभ को नरम तालु से छुआ कर रखने से इसमें मदद मिलती है। इसीलिए इड़ा और पिंगला का अंत आज्ञा चक्र में चित्रित किया गया है, पर सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में दिखाया गया है। यदि आप मूलाधार और आज्ञा चक्र पर एकसाथ ध्यान लगाओ, तो कुंडलिनी का संचार इड़ा नाड़ी से होता है। यदि आप स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र का एकसाथ ध्यान करो, तो कुंडलिनी का संचरण पिंगला नाड़ी से होता है। चित्र में भी ऐसा ही दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र, तीनों का एकसाथ ध्यान करने से कुंडलिनी का संचरण सुषुम्ना नाड़ी से ही होगा या वह सीधी ही सहस्रार तक पहुंच जाएगी। ऐसा चित्र में दिखाया भी गया है। आप देख सकते हैं कि सुषुम्ना नाड़ी की भागीदारी के बिना ही कुंडलिनी सहस्रार चक्र तक पहुंच गई है। इड़ा और पिंगला से कुंडलिनी एकसाथ आज्ञा चक्र तक आई। वहाँ से वह बाएँ और दाएँ मस्तिष्क से ऊपर चढ़ कर सहस्रार पर इकट्ठी हो जाती है। ऐसा महसूस भी होता है। दोनों तरफ के मस्तिष्क में दबाव से भरी मोटी लहर ऊपर जाती और सहस्रार में जुड़ती महसूस होती है। तभी चित्र में इन दोनों लघु नाड़ियों को मोटी पट्टी के रूप में दिखाया गया है। जब कुंडलिनी को आगे की नाड़ी से नीचे उतारना होता है, तब इन्हीं पट्टीनुमा नाड़ियों से इसे सहस्रार से आज्ञा चक्र तक उतारा जाता है, और वहाँ से नीचे। आपने भी देखा होगा, जब आदमी मानसिक रूप से थका होता है, तो वह अपने माथे को मलता है, और अपनी आँखों को भींचता है। इससे उसे माथे के दोनों किनारों से गशिंग या उफनते हुए द्रव की पट्टी महसूस होती है। उससे वह मानसिक रूप से पुनः तरोताजा हो जाता है। ये इन्हीं नाड़ियों की क्रियाशीलता से अनुभव होता है। आप इसे अभी भी करके अनुभव कर सकते हो। वास्तविक व त्वरित दैनिक अभ्यास के दौरान कोई नाड़ी महसूस नहीं होती। केवल ये चार चक्र महसूस होते हैं, और कुंडलिनी सहस्रार चक्र में महसूस होती है। इड़ा नाड़ी अर्धनारीश्वर देव के स्त्री भाग का प्रतिनिधित्व करती है। पिंगला नाड़ी उनके आधे और पुरुष भाग का प्रतिनिधित्व करती है। सुषुम्ना नाड़ी दोनों भागों के मिलन या विवाह का द्योतक है। मूलाधार से मस्तिष्क तक सबसे ज्यादा ऊर्जा का वहन सुषुम्ना नाड़ी करती है। तभी तो तांत्रिक योग के समय सहस्रार का ध्यान करने से मूलाधार एकदम से संकुचित और शिथिल हो जाता है। दैनिक लोकव्यवहार में आपने भी महसूस किया होगा कि जब मस्तिष्क किसी और ही काम में व्यस्त हो जाता है, तो कामोत्तेजना एकदम से शांत हो जाती है। बेशक वह ऊर्जा सुषुम्ना से गुजरते हुए नहीं दिखती, पर सहस्रार तक उसके गुजरने का रास्ता सुषुम्ना से होकर ही है। सुषुम्ना से ऊर्जा का प्रवाह तो यौगिक साँसों के विशेष और लम्बे अभ्यास से अनुभव होता है। वह भी केवल कुछ क्षणों तक ही अनुभव होता है, जैसा आसमानी बिजली गिरने का अनुभव क्षणिक होता है। पर इसको अनुभव करने की आवश्यकता भी नहीं। महत्त्वपूर्ण तो कुंडलिनी जागरण है, जो इसके अनुभव के बिना ही होता है। यदि आप सीधे ही फल तक पहुंच पा रहे हो, तो पेड़ को देखने की क्या जरूरत है। सम्भवतः इसी से यह कहावत बनी हो, “आम खाओ, पेड़ गिनने से क्या लाभ”। इड़ा और पिंगला से भी ऊर्जा आज्ञा चक्र तक ऊपर चढ़ती है, पर सुषुम्ना जितनी नहीं।

कुंडलिनी एक पक्षी की तरह है जो खाली और खुले आसमान में उड़ना पसंद करता है

मित्रो, योग या अध्यात्म को उड़ान के साथ संबद्ध करके दिखाया गया है। आध्यात्मिक शास्त्रों में विमानों का वर्णन अनेक स्थानों पर आता है। कई जगहों पर योगियों को आसमान में उड़ते हुए दिखाया गया है। आत्मा को पंछी की उपमा दी गई है। आज हम इस पर वैज्ञानिक चर्चा करेंगे।
आत्मा और आकाश में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है
दोनों ही त्रिआयामी हैं। दोनों ही सर्वव्यापी हैं। आत्मजागृति के दिव्य अनुभव के दौरान आदमी अपने को प्रकाशमयी आनंदमयी, सर्वव्यापक, व चेतनापूर्ण आकाश के रूप में अनुभव करता है। इसी तरह, मृतात्मा से साक्षात्कार के समय भी आदमी अपने को आकाश की तरह अनुभव करता है। हालाँकि उसमें प्रकाश, चेतना व आनन्द के गुण बहुत कम होते हैं। इसलिए वह रूप चमकते काजल की तरह प्रतीत होता है। फिर भी वह रूप सर्वव्यापक होता है।

 आदमी का मन हमेशा से ही आसमान में उड़ने को ललचाता रहा है

इसका कारण यही है कि आत्मा आकाश जैसे रूप वाली होती है। हर कोई अपने जैसे गुण स्वभाव वाले से मैत्री करना चाहता है। इसीलिए हरेक आदमी आकाश में भ्रमण करना चाहता है। यही कारण है कि वायुयान में बैठकर आनन्द मिलता है। जब मैं विमान में बैठा था, तो मेरे मन में आनंद के साथ कुंडलिनी क्रियाशील हो गई थी। इसी तरह, मैं एकदिन परिवार के साथ पतंग का मजा लेने एक खाली मैदान में चला गया। बच्चे ऊंचे आसमान में पतंग उड़ा रहे थे, और मैं जमीन पर दरी बिछा कर उस पर लेट गया, ताकि बिना गर्दन मोड़े पतंग को लगातार देख पाता। मैं लगभग डेढ़ घंटे तक पतंग को बिना थके देखता रहा। उस दौरान मेरे मन में आनन्द से भरे शांत विचारों के साथ कुंडलिनी क्रियाशील बनी रही। कई बार तो ऐसा लगा कि मैं खुद ही पतंग पर बैठ कर ऊंचे आसमान में उड़े जा रहा हूँ। कई दिन तक वह आनन्द मेरे मन में बना रहा, और साथ में उमंग भी छाई रही। काम-काज में भी अच्छा मन लगा रहा। इसी तरह, पहाड़ों में भी कुंडलिनी आनंद बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहाड़ भी आकाश की तरह थ्री डायमेंशनल हैं, हालाँकि उससे थोड़ा कम हैं। पहाड़ों में भी आदमी हर प्रकार से गति कर सकता है। वह आगे-पीछे भी जा सकता है, और ऊपर नीचे भी चढ़ सकता है।

आत्मारूपी आकाश के उपलब्ध होते ही कुंडलिनी पक्षी उसमें उड़ान भरने लग जाता है

शरीरविज्ञान दर्शन या अन्य अद्वैतशास्त्र से जब मन में आकाश जैसी शून्यता छाने लगती है, तब कुंडलिनी उसमें एक उड़ते हुए पक्षी की तरह अनुभव होने लगती है। साथ में आकाश में उड़ने के जैसा आनन्द तो होता ही है। उस समय आत्मा तो बैकग्राउंड के अंधकारमयी व शून्य आकाश की तरह होती है, केवल कुंडलिनी ही प्रकाशरूप पक्षी की तरह अभिव्यक्त होती है। इसलिए शास्त्रों में कुंडलिनी को आत्मा या पक्षी के रूप में माना गया है। कुंडलिनी आत्मा का संपीडित या लघु रूप है। जैसे साँप कुंडलिनी मार कर छोटा हो जाता है, उसी तरह आत्मा भी। इसीलिए इसे कुंडलिनी कहते हैं। जब कुंडलिनी आत्मा से जुड़कर सर्वव्यापक हो जाती है, तब उसे ही सांप का कुंडलिनी खोलकर अपने असली और विस्तृत रूप में आना कहते हैं। इसी तरह, आकाश से संबंध होने पर भी मन में आकाश जैसी अद्वैतमयी शून्यता खुद ही छाने लगती है। उससे भी वही कुंडलिनी प्रभाव पैदा होता है, जिससे मन उसी तरह आनन्द से भर जाता है। इसीलिए उपरोक्तानुसार, शास्त्रों में योगियों को आसमान में उड़ते हुए दिखाया गया है, तथा विमानों का बहुतायत में वर्णन किया गया है। 

कुंडलिनी ही भ्रमित आत्मा का दीपक है

अद्वैत के ध्यान से मन आकाश की तरह शून्य व निश्चल तो बन जाता है, पर उसका आंनद व प्रकाश गायब हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आनन्द व प्रकाश मन के विचारों के साथ होते है। ये विचारों के साथ ही गायब हो जाते हैं। इन्हीं की भरपाई करने के लिए ही एकाकी चित्र रूपी कुंडलिनी मन में क्रियाशील हो जाती है। यह दीपक की तरह काम करती है, और विचारशून्य मन या आत्मा को आनंदपूर्ण प्रकाश से भर देती है। लम्बे समय के कुंडलिनी योग अभ्यास से एक समय ऐसा भी आता है जब आत्मा का अपना खुद का नैसर्गिक प्रकाश पैदा हो जाता है। फिर तो वहाँ कुंडलिनी दीपक की रौशनी भी फीकी पड़ जाती है। पर ऐसा साधना के सबसे ऊंचे व अंतिम स्तर पर ही होता है। इसे ही असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं।

कुंडलिनी ही आत्मा की भौतिक प्रतिनिधि है

आत्मा तो आकाश की तरह शून्य होती ही, पर उसके विपरीत चेतनापूर्ण होती है, पर दुनियादारी में रहने से उस पर माया या भ्रम का दुष्प्रभाव पड़ता है। इससे उसका चेतन प्रकाश गायब हो जाता है। जब आदमी अद्वैत भावना से आत्मा में लौटने का प्रयास करता है, तो वहाँ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत से उत्पन्न निर्विचार अवस्था से मस्तिष्क में न्यूरोनल एनर्जी इकट्ठी हो जाती है, जो आमतौर के विचारों को बनाती है। उस न्यूरोनल एनर्जी को बाहर निकलने का आसान रास्ता कुंडलिनी के रूप में ही नजर आता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके लिए मस्तिष्क को निश्चय नहीं करना पड़ता है कि कुंडलिनी चित्र कैसा है, क्या इसके बारे में विचार करना चाहिए, इसको विचारने के क्या परिणाम होंगे आदि। इसकी वजह है, कुंडलिनी चित्र से लम्बे समय से संबंध बना होना। यह संबंध प्रेम आदि के रूप में प्राकृतिक भी हो सकता है, और योग आदि के रूप में बनावटी भी। वही कुंडलिनी चित्र आत्मा को उसके प्रकाश, चेतना आदि के स्वाभाविक गुण प्रदान करता है। उस समय यिन के रूप में आत्मा होती है, और यांग के रूप में कुंडलिनी। हालांकि ऐसा हमें सांसारिक भ्रम के कारण लगता है। असल में तो यिन के रूप में कुंडलिनी और यांग के रूप में आत्मा होती है। इन दोनों का जुड़ाव ही शिवविवाह है। जब यह पूरा हो जाता है, तो यही कुंडलिनी जागरण या आत्मसाक्षात्कार कहलाता है। उस समय कुंडलिनी की चेतना पूरे आत्म-आकाश में छा जाती है, और दोनों पूरी तरह एक-दूसरे में घुले-मिले प्रतीत होते हैं। कुंडलिनी को आत्मा का भौतिक प्रतिनिधि इसीलिए कहा जा रहा है, क्योंकि वह बेशक एक सीमित व एकाकी चित्र के रूप में है, और भौतिक बाध्यताओं से बंधी है, पर उसमें आत्मा के सभी चेतनामयी गुण विद्यमान हैं। वही आत्मा को उसके अपने असली चेतनामयी गुणों की याद दिलाती है। पर ऐसा अभ्यास से होता है। इसीलिए कुंडलिनी को योग, प्रेम आदि से हमेशा बना कर रखा जाता है।

कुंडलिनी ही शिव को भीतर से सत्त्वगुणी बनाती है, बेशक वे बाहर से तमोगुणी प्रतीत होते हों


दोस्तो, भगवान शिव के बारे में सुना जाता है कि वे तमोगुणी हैं। तमोगुण मतलब अंधेरे वाला गुण। शिव भूतों के साथ श्मशान में रमण करते हैं। अपने ऊपर उन्होंने चिता की भस्म को मला होता है। साथ में यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव परम सतोगुण स्वरूप हैं। सतोगुण मतलब प्रकाश वाला गुण। इस तरह दोनों विरोधी गुण शिव के अंदर दिखाए जाते हैं। फिर इसको जस्टिफाई करने के लिए कहा जाता है कि शिव बाहर से तमोगुणी हैं, पर भीतर से सतोगुणी हैं। आज हम इसे तांत्रिक कुंडलिनी योग के माध्यम से स्पष्ट करेंगे।

कुंडलिनी ही शिव के सत्त्वगुण का मूल स्रोत है

दरअसल शिव तन्त्र के अधिष्ठाता देव हैं। उन्हें हम सृष्टि के पहले तांत्रिक भी कह सकते हैं। यदि हम तांत्रिक योगी के आचरण का बारीकी से अध्ययन करें, तो शिव के संबंध में उठ रही शंका भी निर्मूल हो जाएगी। वामपंथी तांत्रिक को ही आमतौर पर असली तांत्रिक माना जाता है। वे पाँच मकारों का सेवन भी करते हैं। बेशक शिव पंचमकारी नहीँ हैं, पर तमोगुण तो उनके साथ वैसे ही रहता है, जैसे पंचमकारी तांत्रिक के साथ। दुनिया के आम आदमी के अंदर इनके सेवन से तमोगुण उत्पन्न होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे इससे उत्पन्न ऊर्जा को संभाल नहीं पाते और उसके आवेश में गलत काम कर बैठते हैं। वे गलत काम तमोगुण को और अधिक बढ़ा देते हैं। पंचमकार खुद भी गुणों में तेज हलचल पैदा करते हैं, जिससे स्वाभाविक तौर पर तमोगुण भी उत्पन्न हो जाता है, आम दुनिया के अधिकांश लोग जिसके प्रभाव में आकर निम्न हरकत कर बैठते हैं। परन्तु एक तंत्रयोगी गुणों की हलचल को अपने कुंडलिनी योग की बदौलत हासिल अद्वैत भाव से शांत कर देते हैं। इससे उन्हें बहुत अधिक कुंडलिनी लाभ मिलता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी अक्सर रहती ही है। इससे कुंडलिनी तेजी से चमकने लगती है। तमोगुण से दबी हुई प्राण शक्ति और नाड़ी शक्ति जब कुंडलिनी को लगती है, तो वह जीवंत होने लगती है। यह वैसे ही होता है जैसे अंधेरे में दीपक या चिंगारी अच्छे से चमकते हैं। तभी तो भगवान शिव की तरह श्मशान में किया गया कुंडलिनी योगाभ्यास शीघ्रता से फलीभूत होता है। वैसे भी देखने में आता है कि तमोगुण की अधिकता में मस्तिष्क में विचारों की हलचल रुक सी जाती है। ऐसा किसी भय से, उदासी से, हादसे के नजदीक गुजरने से, तनाव से, अवसाद से, नशे से, तमोगुणी आमिषादि भोजन से, काम आदि से मन व शरीर की थकान से, आदि अनेक कारणों से हो सकता है। ऐसे समय में मस्तिष्क में न्यूरोनल एनर्जी का संग्रहण हो रहा होता है। इसमें जो बीच-बीच में इक्का-दुक्का विचार उठते हैं, वे बहुत शक्तिशाली और चमकीले होते हैं, क्योंकि उन्हें घनीभूत न्यूरोनल एनर्जी मिल रही होती है। योगी लोग इन्हीं विचारों को कुंडलिनी विचार में तब्दील करते रहते हैं। इससे सारी न्यूरोनल एनर्जी कुंडलिनी को मिलती रहती है। बुरे समय में भगवान या कुंडलिनी को याद करने से उत्पन्न महान लाभ के पीछे यही सिद्धांत काम करता है। इस तमोगुण के दौर के बाद सतोगुण व रजोगुण का दौर आता है। यह विचारों के प्रकाश से भरा होता है। दरअसल संग्रहीत न्यूरोनल एनर्जी बाहर निकल रही होती है। इसमें चमकीले विचारों की बाढ़ सी आती है। आम आदमी तो इनमें न्यूरोनल एनर्जी को बर्बाद कर देता है, पर योगी उन विचारों को कुंडलिनी मेँ तब्दील करके सारी एनर्जी कुंडलिनी को दे रहा होता है। योगी ऐसा करने के लिए अक्सर किसी अद्वैत शास्त्र की मदद लेता है। अद्वैत शास्त्रों में देवता संबंधी दार्शनिक पुस्तकें होती हैं, जैसे कि पुराण, स्तोत्र आदि। शरीरविज्ञान दर्शन भी एक उत्तम कोटि का आधुनिक अद्वैत शास्त्र है। वह अद्वैतशास्त्र को अपनी वर्तमान गुणों से भरपूर अवस्था के ऊपर पिरोता रहता है। वह इस सच्चाई को समझता रहता है कि उसके जैसी सभी अवस्थाएँ हर जगह व हर किसी में विद्यमान हैं। इससे शान्ति और आनन्द के साथ कुंडलिनी चमकने लगती है। वह कुंडलिनी, योग के माध्यम से सभी चक्रों पर भ्रमण करते हुए सभी को स्वस्थ और मजबूत करती है। पूरा तन और मन आनन्द व प्रकाश से भर जाता है। इस प्रकार जिन चीजों से आम आदमी के भीतर तमोगुण उत्पन्न होता है, उनसे तन्त्रयोगी के भीतर सतोगुण उत्पन्न हो जाता है। सम्भवतः यही वजह है कि दुनिया वालों को भगवान शिव बाहर से तमोगुणी दिखते हैं, पर असल में वे भीतर से सतोगुणी होते हैं। इससे यिन और यांग का मिलन भी हो जाता है, जिससे ज्ञान पैदा होता है। यिन तमोगुण है, और यांग सतोगुण।