द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019

सभी मित्रों को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019 की बहुत-2 हार्दिक शुभकामनाएं।

योग-साधकों के लिए कुछ जरूरी व व्यावहारिक सुझाव-

1) योग प्रतिदिन करना चाहिए। यदि किसी दिन व्यस्तता और थकान अधिक भी हो, तो भी योगसाधना के नियम को नहीं तोड़ना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वैसे व्यस्त व थकान से भरे दिन योग-साधक एक नई व प्रभावकारी योगक्रिया स्वतः ही आसानी से सीख जाता है। साथ में, उस दिन एक नई अंतर्दृष्टि विकसित होती है।यदि उस दिन योग न किया जाए, तो साधक उस नई तकनीक या अंतर्दृष्टि से लम्बे समय तक वंचित रह सकता है।

यदि समय की बहुत ही अधिक कमी हो, तो ही योग साधना को कुछ संक्षिप्त करना चाहिए, अन्यथा पहले की तरह पूरे विस्तार के साथ योग करना चाहिए। उदाहरण के लिए, मैं आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़कर, एकसाथ दोनों का ध्यान करने की कला ऐसे ही व्यस्त समय में सीखा था। पहले मैं आगे के चक्र पर अलग से व पीछे के चक्र पर अलग से कुण्डलिनी का ध्यान करता था। पहले दौरे में मैं ऊपर से लेकर नीचे तक सभी आगे वाले चक्रों का ध्यान करता था। दूसरे दौरे में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी मेरुदंड वाले चक्रों का ध्यान बारी-२ से करता था। एक व्यस्तता से भरे हुए दिन के दौरान मैंने दोनों चक्रों को एक मनोवैज्ञानिक, काल्पनिक व अनुभवात्मक रेखा के माध्यम से जोड़कर, दोनों पर एकसाथ ध्यान लगाने का प्रयास किया। बहुत आनंद व कुण्डलिनी की तीव्र चमक के साथ वे दोनों चक्र मुझे अनुभव हुए। उनको आपस में जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा पर कुण्डलिनी आगे-पीछे जा रही थी। वह कभी एक चक्र पर स्थित हो जाती थी, तो कभी दूसरे चक्र पर। कभी वह रेखा के बीचों-बीच स्थित हो जाती थी, और वहां पर दोनों चक्रों का प्रतिनिधित्व करती थी।

2) प्राणायाम करते समय शिथिल (रिलेक्स्ड) रहें। अन्दर-बाहर आती-जाती साँसों पर भरपूर ध्यान दें। उससे कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। यदि अन्य विचार भी उठें, तो वे भी शुद्ध हो जाते हैं, क्योंकि आराम व तनावहीनता की अवस्था में सभी मानसिक विचार साक्षीभाव के साथ प्रकट होते हैं। तनाव व क्रोध आदि मानसिक दोषों की अवस्था में उठने वाले मानसिक विचार अशुद्ध व बंधनकारी होते हैं। इसलिए सदैव शांत, तनावरहित, व मानसिक दोषों से रहित बने रहने का प्रयत्न करें। शरीरविज्ञान दर्शन से इसमें बहुत मदद मिलती है।

प्रेमयोगी वज्र क्षणिक आत्मज्ञान के बाद बिलकुल तनावरहित बन गया था। उसने उत्तेजित व अशांत लोगों की घटिया मानसिकता को बहुत समय तक शांति के साथ झेला। एक दिन उसके मन में क्रोध उत्पन्न हो गया, और उसने एक सिरफिरे आदमी की पिटाई कर दी। यद्यपि ऐसा उसने अपने बचाव में किया। बाद में पता चला कि वह नशे में था। उसी दिन से उसे अपने मन के विचारों से अपना बंधन महसूस होने लगा, और वह बढ़ता ही गया। उसकी अशांति व उसका तनाव दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा, और साथ में उसका आत्मबंधन भी। वह डरा हुआ सा रहता था। दोनों प्रकार के भाव एक-दूसरे को बढ़ाने लगे। जिस प्रकार आत्मबंधन से भय उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भय से आत्मा बद्ध हो जाती है। दरअसल, यह एक प्रकार की चेन रिएक्शन है, और जब यह शुरू हो जाती है, तो यह अपने आप बढ़ती चली जाती है। इस प्रकार से वह अपने आत्मज्ञान को शीघ्रता से विस्मृत करने लगा।  उसे आश्चर्य हुआ कि कैसे एक बार का किया हुआ क्रोध भी आदमी को योगभ्रष्ट कर सकता है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि वह व्यक्ति मुझे सबसे प्रिय है, जिसकी किसी के भी साथ शत्रुता नहीं है।

अतः सिद्ध होता है कि योग से ही विश्व में वास्तविक प्रेम व सौहार्द बना रह सकता है।

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इसाई धर्म में कुण्डलिनी

पवित्र आत्मा के साथ बैपटिस्म का अर्थ है कुंडलिनी सक्रियण

कुण्डलिनी और होली स्पिरिट एक ही वस्तु-विशेष के दो नाम हैं। इसाई धर्म में होली स्पिरिट के साथ बैप्टिस्म का वर्णन आता है। इसी तरह हिन्दू धर्म में कुण्डलिनी की क्रियाशीलता व जागरण का वर्णन आता है। मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों एक ही चीज को दर्शा रहे हैं। इस बात को हम निम्नलिखित वैज्ञानिक तर्कों से भी सिद्ध कर सकते हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों भगवान की क्रिया शक्ति हैं

होली स्पिरिट को ईश्वर की चलायमान शक्ति कहा गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी जीवनी शक्ति कहा गया है। जैसे ईश्वर अपनी शक्ति को होली स्पिरिट के रूप में किसी भी स्थान पर प्रोजेक्ट करके उस शक्ति से अपनी इच्छा पूरी करवाता है, उसी तरह वह कुण्डलिनी के माध्यम से भी अपनी शुभ इच्छा पूरी करवाता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों के नाम समान हैं

जैसे होली स्पिरिट को सांस, हवा, जीवन-धारियों में सबसे महत्त्वपूर्ण या प्राणशक्ति, देवता या फरिश्ते के रूप में पर्सोनीफाईड आदि नाम दिए गए हैं; उसी तरह से कुण्डलिनी को भी ये सभी नाम दिए गए हैं। जिस तरह होली स्पिरिट को गॉड का हाथ या अंगुली कहा गया है, उसी तरह कुण्डलिनी शक्ति को भी भगवान् शिव का क्रियात्मक अंश या आधा शरीर कहा गया है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों को समान रूप प्रदान किया गया है

इसाई धर्म में कहा गया है कि गॉड अपनी होली स्पिरिट की सहायता से बहुत से महान कार्य करता व करवाता है। उदाहरण के लिए, सृष्टि का निर्माण, बाईबल की रचना, पुराने समय के महान लोगों व उपदेशकों के द्वारा किए गए आश्चर्यजनक काम। इसी तरह से कुण्डलिनी भी महान कार्य करती व करवाती है। इसी धर्म के अनुसार होली स्पिरिट किसी मानव-रूप में नहीं है, परन्तु उसे अन्य चीजों की तरह मानवीकृत किया गया है। इसी तरह कुण्डलिनी को भी एक देवी या सर्पिणी का रूप दिया गया है, हालांकि इसका कोई भौतिक रूप नहीं है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों मानसिक छवि के रूप में हैं

होली स्पिरिट एक सहायक है, जिसे क्रिस्ट के नाम से भेजा गया है, जो क्रिस्ट के फोलोवर्स को सभी चीजें सिखाएगी, और उन्हें क्रिस्ट की टीचिंग्स की याद दिलाएगी। इसका अर्थ है कि क्रिस्ट का नाम जपने से मन में क्रिस्ट की छवि बस जाएगी, जो होली स्पिरिट बन जाएगी। कुण्डलिनी भी तो इसी तरह गुरु, देवता आदि के ध्यान से विकसित होती है।

Holy spirit and Kundalini, both teach us the same thing

होली स्पिरिट सिखाती है कि क्रिस्ट वास्तव में कौन है। अर्थात होली स्पिरिट अद्वैत का साक्षात्कार करवाती है। क्रिस्ट का रूप भी अद्वैतवान ही है। ऐसा ही अद्वैत कुण्डलिनी से भी तो उत्पन्न होता है।

होली स्पिरिट बाईबल को समझना आसान कर देती है। होली स्पिरिट वही सिखाती है, जो बाईबल में है। होली स्पिरिट बाईबल का स्मरण करवाती है। इसी तरह का काम कुण्डलिनी से भी होता है, व उसको जान लेने से भी सभी धार्मिक ग्रन्थ स्वयं ही, बिना पढ़े ही जाने हुए बन जाते हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों एक आदमी में समान गुण पैदा करते हैं

होली स्पिरिट पापों से लड़ने की शक्ति देती है। इसी तरह, कुण्डलिनी भी पुराने पापों को नष्ट करती है, और नए पापों को पनपने नहीं देती। होली स्पिरिट को प्राप्त करने वाला आदमी स्पिरिट में ही स्थित रहता है, और माँसमय शरीर की लिप्सा को पूरा नहीं करता। इसका मतलब है कि वह ननड्यूल व अनासक्त हो जाता है। कुण्डलिनी भी आदमी को अद्वैतशील व अनासक्त बना देती है। होली स्पिरिट भी कुण्डलिनी की तरह ही हमारे दिल में रहना चाहती है। इसका अर्थ है कि दोनों से ही बहुत गहरा प्यार हो जाता है, क्योंकि दोनों की याद निरंतर बनी रहती है। होली स्पिरिट व कुण्डलिनी, दोनों ही हमारा मार्गदर्शन करती हैं।

होली स्पिरिट या कुण्डलिनी बहुत बड़े बोझ व प्रतिकूलता को भी सहने की शक्ति देती है। दोनों ही नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं, तथा दोनों से पड़ौसी खुश रहते हैं। हिन्दू-ग्रंथों में भी आता है कि कुण्डलिनी-योगी के सभी लोग प्रेमी मित्र बन जाते हैं, कोई उसका शत्रु नहीं रहता। वाक इन स्पिरिट का अर्थ है कि डैविल द्वारा आप मिसगाईड न किए जाएं, और हमेशा होली स्पिरिट के आज्ञाकारी बने रहें। इसी तरह कुण्डलिनी-योगी के लिए भी निरंतर कुण्डलिनी-ध्यान करना जरूरी माना गया है।

होली स्पिरिट में चलते रहने के वही लाभ मिलते हैं, जो कुण्डलिनी से उत्पन्न रूपांतरण से मिलते हैं। गॉड ने हमें डर की स्पिरिट (सामान्य द्वैतपूर्ण सोच) नहीं दी है, अपितु शक्ति, प्रेम, व स्वस्थ मन (अद्वैतपूर्ण व अनासक्त भाव) की स्पिरिट दी है। कुण्डलिनीयोग भी यही कहता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों एक आदमी में समान रहस्यमय अनुभव पैदा करते हैं

होली स्पिरिट के प्रवेश का अनुभव भी कुण्डलिनी-जागरण के अनुभव के सामान हो सकता है। दोनों के अनुभव रहस्यात्मक हैं। उदाहरण के लिए, पूरे शरीर में एक करंट के या सुनहरे जल के दौड़ने के साथ अनंत ख़ुशी का अनुभव। गिफ्ट ऑफ़ टंग भी प्राप्त हो सकता है। यह कुण्डलिनीयोग की वाक्-सिद्धि की तरह ही है, जिसमें कही गई बात सच हो जाती है। कुण्डलिनी के एक्टिवेशन की तरह ही होली स्पिरिट का एक्टिवेशन साईलेंट रूप में भी हो सकता है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों समान कारणों के कारण सक्रिय होते हैं

अब होली स्पिरिट के बैप्टिस्म व कुण्डलिनी जागरण के लिए जिम्मेदार कारणों के बीच समानता पर विचार करते हैं। जब कोई अपने अपराध पर पश्चाताप करता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग के अनुसार भी जब कोई आदमी अपने बीते जीवन को अपनी यादों में बार-२ साक्षीभाव के साथ उजागर करता है, तब स्वयं ही अच्छा पश्चाताप हो जाता है। उससे कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है। जब कोई अपने को गॉड या क्रिस्ट के समर्पित कर देता है, तब होली स्पिरिट एक्टिवेट हो जाती है। योग में भी ईश्वर-समर्पण व कुण्डलिनी के प्रति समर्पण को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।

यहां तक कि भगवान या देवता को याद करने से भी होली स्पिरिट या कुंडलिनी सक्रिय हो जाती है। मैंने हमेशा खुद इसको स्पष्ट रूप से अनुभव किया है। जब भी मैंने शरीरविज्ञान दर्शन की मदद से अद्वैतवादी होने की कोशिश की है, तब-2 मुझे कुंडलिनी का अनुभव हुआ है। ईश्वर अद्वैत का ही एक आधिकारिक नाम है। दोनों नाम एक ही चीज को दर्शाते हैं। मैं पहले से ही अनुभवात्मक रूप से साबित कर चुका हूं कि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ-2 रहते हैं। यह वह इसाई धर्म-सम्मत बिंदु है, जहां से ईश्वर और पवित्र आत्मा (होली स्पिरिट/कुण्डलिनी) के बीच संबंध उपजा है। इसके अतिरिक्त, मैंने खुद भी अनुभव किया है कि अगर किसी भी चीज को बार-बार याद किया जाता है, तो वह चीज कुंडलिनी बन जाती है। उसी आधार पर, ईसा मसीह और बाइबल को बार-बार याद करने से वे पवित्र आत्मा / होली स्पिरिट के रूप में उपलब्ध हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि पवित्र आत्मा वही सिखाती है, जैसा कि ईसा मसीह और बाइबल ने सिखाया है, क्योंकि ये तीनों एकसमान ही हैं। उसी प्रकार, गुरु, देवता, या वेद-पुराणों का स्मरण करने से वे कुंडलिनी के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

होली स्पिरिट को प्राप्त करने के लिए नया जन्म लेना पड़ता है। इसी तरह कुण्डलिनी को क्रियाशील करने के लिए योग-साधना के द्वारा रूपांतरित होना पड़ता है। नया जन्म क्रिस्ट से सम्बंधित होना चाहिए। इसका मतलब यह है कि योग के अनुसार रूपांतरण सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नहीं। इसका यह अर्थ भी है कि घर में शुरू से लेकर आध्यात्मिक माहौल होना चाहिए। वैसे भी कुण्डलिनी-जागरण के बाद पुनर्जन्म की तरह रूपांतरण होता है। ब्रेन में नए सरकट बनते हैं।

होली स्पिरिट की आज्ञा को मानना चाहिए। यह कुण्डलिनी योग के महत्त्व को रेखांकित करता है। जो योगी कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी का बारम्बार स्मरण कर रहा है, वह उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए हरदम तैयार ही तो है। होली स्पिरिट की प्राप्ति के लिए बिलीव करना अति आवश्यक है। कुण्डलिनीयोग के माध्यम से कुण्डलिनी के निरंतर स्मरण का मतलब ही यह है कि योगी का कुण्डलिनी के प्रति अपार विश्वास है।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी, दोनों हमेशा उपलब्धियां प्रदान नहीं करती हैं

होली स्पिरिट में बैप्टिस्म या सैल्वेशन के प्रत्येक मामले में ‘स्पीकिंग ऑफ़ टंग’ की प्राप्ति नहीं होती। यह ऐसा ही है, जैसे कि कुण्डलिनी जागरण व मोक्ष के लिए सिद्धियाँ जरूरी नहीं हैं।

पवित्र आत्मा और कुंडलिनी के बीच संघर्ष गलतफहमी के कारण दिखाई देता है

अब हम कुण्डलिनी व होली स्पिरिट की एकरूपता का विरोध करने वाली बातों पर विचार करते हैं। होली स्पिरिट बाहर से आती है, परन्तु कुण्डलिनी शरीर के अन्दर ही होती है। ऐसा इसलिए है ताकि क्रिश्चियनिटी में योग के प्रसार पर रोक लग सके। योग का दुरुपयोग हो सकता है, जिस कारण उससे कर्महीनता व आलस्य का प्रसार हो सकता है। यह भी संभव है कि आत्मज्ञान व उस जैसे अनुभव को ही होली स्पिरिट का प्रवेश कहा गया हो। आत्मज्ञान बाहर से अर्थात ईश्वर से आता है, जबकि कुण्डलिनी-जागरण अपने अन्दर के प्रयास से उपलब्ध होता है। आत्मज्ञान के बाद कुण्डलिनी या होली स्पिरिट स्वयं ही विकसित हो जाती है, और निरंतर बनी रहती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी ऐसा ही हुआ था। इसी तरह, ईश्वर से प्रार्थना व उसके प्रति समर्पण से कई प्रकार के अलौकिक अनुभव होते हैं, जैसे कि पूर्वोक्तानुसार शरीर में बहते हुए करंट या प्रकाश की नदी का अनुभव। ऐसे अनुभवों से भी कुण्डलिनी या होली स्पिरिट क्रियाशील हो जाती है।

मानवीय कर्म व प्रेम से कुण्डलिनी या होली स्पिरिट शरीर के अन्दर प्रविष्ट होती है। तभी तो इसाई धर्म में मानवता व प्रेम पर सर्वाधिक बल दिया गया है।

साथ में, ईसाई धर्म में 12 फलों वाले जीवन-वृक्ष का उल्लेख है। यह फ्रक्टिफाइड ट्री 7-12 चक्रों के साथ रीढ़ की हड्डी ही है।

एक ही उद्देश्य के साथ ईसाई और हिंदू धर्म दोनों में द्वैतवाद है

क्रिश्चियनिटी में गॉड व सृष्टि के बीच में द्वैत का भाव है। ऐसा केवल इसलिए है ताकि गॉड को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके, जिससे उसमें मजबूत विश्वास पैदा हो जाए। हिंदू धर्म भी यह कहता है कि भगवान इस दुनिया के समान है, और साथ ही अलग भी है। वास्तव में अद्वैत ही सत्य है। क्योंकि जो अच्छी आदतें होली स्पिरिट के बैप्टिस्म के बाद विकसित होती हैं, वे केवल अद्वैत से ही उत्पन्न होती हैं।

ईसाई धर्म और हिंदू धर्म, दोनों में बुरी आत्मा है

कई लोग सोचते हैं कि योग में क्रिश्चियनीटी की तरह इविल स्पिरिट नहीं है। परन्तु यह सत्य नहीं है, क्योंकि योग में भी ‘माया’ नाम से इविल स्पिरिट को स्वीकार किया गया है, जो योगी को साधना व शुभ प्रयासों से विचलित करती रहती है।

सभी धर्म मूल रूप से समान हैं

वास्तव में चीज एक ही है, जिसे हम ऑब्जेक्ट ऑफ़ मेडिटेशन या ध्येय वस्तु कहते हैं। इसाई धर्म में इसे प्राकृतिक, सांसारिक व साधारण-संक्षिप्त रूप में बखान किया गया है; जबकि हिन्दू धर्म में त्यागपूर्णता, कृत्रिमता व दार्शनिक साज-सज्जा के साथ। परन्तु दुर्भाग्य से बहुत से लोग इस दार्शनिक विस्तार में असली, व्यावहारिक, व मूल वस्तु को भूल जाते हैं। इससे धर्मों में विभिन्नता प्रतीत होती है, परन्तु वास्तव में सभी धर्म मूल रूप से एकसमान हैं, और सभी मानवता व प्रेम के पक्ष में हैं।

ईसाई धर्म और हिंदू धर्म का मिश्रण आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करने के लिए सबसे तेज है

अब मैं इसाई धर्म व हिंदु धर्म के मिश्रण के बारे में बात करता हूँ। पहले आदमी इसाई धर्म की नीति के अनुसार कर्मयोग से अपनी कुण्डलिनी को विकसित करे। फिर जब उसकी उम्र बढ़ जाए, वह मानवीय रूप से संसार को समृद्ध कर ले, तथा कुण्डलिनी में निपुण हो जाए; तब उसकी पदोन्नति कुण्डलिनीयोग में हो जाए। तब वह समर्पित व बैठकपूर्ण कुण्डलिनीयोग पर अधिक ध्यान दे, ताकि उसकी कुण्डलिनी और अधिक परिपक्व होकर जागृत हो जाए। प्रेमयोगी वज्र ने भी ईश्वरीय प्रेरणा से ऐसा ही किया था, जिससे उसे अतिशीघ्र कुण्डलिनीजागरण का अनुभव हो सका था। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सभी धर्मों में वह सभी कुछ है, जो अन्य धर्मों में भी है। कई धर्मों में उनका संकेतों में वर्णन है, तो कई धर्मों में विस्तार से।

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देवपूजा में कुंडलिनी

सभी धार्मिक गतिविधियाँ कुण्डलिनी में वैसे ही समा जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में। जब हम किसी देवी-देवता की पूजा कर रहे होते हैं, तब हम अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी की ही पूजा कर रहे होते हैं। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार देवता की मूर्ति, चित्र आदि के रूप में स्थित मानव-देह में अद्वैतशाली देहपुरुष विद्यमान होते हैं। अतः देवता की पूजा से उनकी पूजा स्वतः ही हो जाती है। उससे पूजा करने वाले व्यक्ति के मन में अद्वैतभाव पुष्ट हो जाता है। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सिद्धांत है कि कुण्डलिनी व अद्वैत साथ-२ रहते हैं। अतः देवपूजन से कुण्डलिनी-पूजन स्वयं ही हो जाता है, जिससे कुण्डलिनी क्रियाशील होकर विकसित होती रहती है, और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों को पाकर जागृत भी हो सकती है।

यदि हम देव-मूर्ति में देहपुरुषों की सत्ता को न भी मानें, तब भी कोई बात नहीं। क्योंकि प्रकृति की सभी चीजें जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वे जड़ (निर्जीव) नहीं, अपितु अद्वैतभाव के साथ चेतन (सजीव) होती हैं। प्रकृति के सभी अणु-परमाणु या मूलकण मूर्ति में भी विद्यमान होते हैं। अतः देव-मूर्ति के पूजन से सम्पूर्ण अद्वैतमयी प्रकृति की पूजा स्वयं ही हो जाती है। देहपुरुष की सत्ता की वैज्ञानिक कल्पना तो सम्पूर्ण प्रकृति व मानवाकार मूर्ति के बीच में पूर्ण समानता को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई है। इससे अद्वैतभाव की प्रचंडता भी बढ़ जाती है।

जैसे ही मूर्ति-पूजन के साथ कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है, तथा पूजन व कुण्डलिनी के बीच के सम्बन्ध का तनिक विचार कर लिया जाता है, वैसे ही पूजन पर ध्यान देने से वह ध्यान कुण्डलिनी को स्वयं ही लगता रहता है। उससे कुण्डलिनी उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उदाहरण के लिए, देव-मूर्ति के सामने घंटी बजाने से व घंटी की आवाज पर ध्यान लगाने से, व ऐसा समझने से कि वह आवाज देवमूर्ति में स्थित कुण्डलिनी की सेवा कर रही है, स्वयं ही बीच-२ में कुण्डलिनी पर ध्यान लगता रहता है। ऐसा ही तब भी होता है, जब पितरों का पूजन किया जा रहा होता है। क्योंकि पितरों की देह भी देवता या प्रकृति की तरह शुद्ध, निर्विकार व अद्वैतवान होती है।

इसका अर्थ है कि जिसे कुण्डलिनी का ज्ञान नहीं है, उसे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। एक कुण्डलिनी-योगी ही उत्तम प्रकार का पुजारी सिद्ध हो सकता है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी नहीं बनी हुई है, तो उसके द्वारा की गई पूजा उलटी भी पड़ सकती है। पूजा से उसके मन में चित्र-विचित्र प्रकार के विचार उठेंगे, क्योंकि पूजा से शान्ति व मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। इससे पूजा की शक्ति घटिया किस्म के विचारों को भी मिल सकती है, जो हानि पहुंचा सकते हैं। जो पूजा-शक्ति कुण्डलिनी-रूपी एकाकी व लाभदायक विचार को पुष्ट कर सकती है, वह विचारों के हानिकारक झमेले को भी पुष्ट कर सकती है। इसीलिए कहते हैं कि पुजारी या गुरु का योग्य होना बहुत जरूरी है।

मैं अपने दादा के साथ लोगों के घरों में वैदिक पूजा-पाठ कराने जाया करता था। उस पूजा से मेरी पहले से विद्यमान तांत्रिक कुण्डलिनी बहुत अधिक बलवान हो जाया करती थी। उससे मुझे बहुत अधिक आनंद के साथ भरपूर सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती थी। वह शक्ति वैसी ही यजमान को भी प्राप्त हो जाया करती थी, क्योंकि वे मेरे दादा के साथ मेरे प्रति भी प्रेमभाव सहित आदर-बुद्धि व सेवाभाव रख रहे होते थे।

इसी तरह प्रत्येक कर्म भी बड़ी आसानी से पूजा बन सकता है, यदि शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सत्य सिद्धांत समझा जाए कि प्रत्येक कर्म अद्वैतशाली देहपुरुष की प्रसन्नता के लिए ही किया जाता है।

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कुण्डलिनी व साँसों पर ध्यान के बीच में संबंध

कुण्डलिनी-ध्यान में साँसों का बहुत महत्त्व है। कुण्डलिनी के ध्यान से साँसें भी खुलकर चलने लगती हैं, व शरीर का मैटाबोलिजम भी सुधर जाता है। इसी तरह, गहरी व नियमित साँसों पर (उससे गति कर रहे शरीर के साथ) ध्यान देने से शरीर के चक्रों पर (विशेषकर अनाहत व मणिपुर चक्र पर), व नासिकाग्र पर कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। नासिकाग्र पर विशेषतः तब प्रकट होती है, जब नासिकाग्र का स्पर्श करती हुई साँसों की हवा का ध्यान किया जाता है। यही बात गीता में भी लिखी है। उसमें “नासिकाग्र पर ध्यान” नामक एक विषय आता है। कई विद्वान इसे भौहों के बीच का आज्ञाचक्र मानते हैं, अर्थात वे नासिका के शुरू के भाग को आज्ञाचक्र बताते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में नाक वहां से शुरू होती है। पर वास्तव में नासिका का अग्र होठों के साथ लगा होता है, जहां से नाक शुरू होती है। मैं इसे प्रमाण के साथ कह सकता हूँ। मैं जब सुबह की सैर पर जाता हूँ, और नाक के शुरू के संवेदनशील भाग का स्पर्श सुबह की ठंडी हवा के साथ अनुभव करता हूँ, तो मेरे नासिकाग्र पर, नाक की शिखा (टिप) पर या उसके थोड़ा बाहर मेरी कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है। जब मैं उस सांस के ध्यान के साथ पांच बार पूरी सांस (अन्दर व बाहर दोनों तरफ की) को एक से पांच तक की गिनती के साथ गिनता हूँ (अधिकाँश तौर पर कदमों को भी साँसों के साथ मिलाकर), तथा पांच बार सांस बिना गिनती के लेता हूँ, और इस तरह के क्रम को बार-२ दोहराता हूँ, तब कुण्डलिनी और भी अधिक स्थिर व स्पष्ट हो जाती है।

इसी प्रकार, साँसों के ध्यान के साथ “सोSहम” का भी मन में उच्चारण कर सकते हैं। इससे ॐ की शक्ति भी प्राप्त हो जाती है। संस्कृत शब्द “सो” का उच्चारण सांस भरते समय, व “हम” का उच्चारण सांस छोड़ते समय करें। “सो / सः” का अर्थ है, “वह (ईश्वर)”। संस्कृत शब्द “हम / अहम्” का अर्थ है, मैं। अर्थात मैं ही वह ईश्वर / ब्रम्ह हूँ। योग में हर प्रकार की साँसों का महत्त्व है। यदि साँसें उथली हो, तो नासिकाग पर उनका ध्यान आसान होता है। कुछ अधिक गहरी होने पर विशुद्धि चक्र पर, उससे अधिक गहरी होने पर अनाहत चक्र पर, उससे भी अधिक गहरी होने पर मणिपुर चक्र पर व सर्वाधिक गहरी होने पर स्वाधिष्ठान-मूलाधार चक्र पर उन साँसों का ध्यान करना आसान होता है। पेट से सांस लेते हुए, नाभि चक्र पर साँसों का ध्यान करना सर्वाधिक आसान व प्रभावशाली प्रतीत होता है।

देहपुरुष की तरह अद्वैतभाव को धारण करने से कुण्डलिनी भी उजागर हो जाती है, तथा साँसें (मैटाबोलिजम के साथ) सुधर जाती हैं। साँसें नियमित व गहरी हो जाती हैं। साँसों की हवा मीठी लगने लगती है, व उससे संतुष्टि महसूस होने लगती है। तनाव समाप्त होने लगता है। शरीर की कार्यप्रणालियाँ तनावमुक्त हो जाती हैं। हृदय की गति सुधर जाती है। हृदय का बोझ कम हो जाता है। मन में एक शान्ति सी छा जाती है, आनंद के साथ।

दोहरा तरीका भी अपनाया जा सकता है। इसमें अद्वैतभाव (मुख्यतः शरीरविज्ञान दर्शन की सहायता से) को धारण करके साँसों को किंचित गहरा व नियमित किया जाता है। फिर उन साँसों पर ध्यान देते हुए, और अधिक लाभ प्राप्त किया जाता है। अद्वैतभाव के अतिरिक्त कुण्डलिनी के सीधे ध्यान से भी साँसों को सुधारा जा सकता है। अद्वैतभाव व कुण्डलिनी-ध्यान, दोनों की एक साथ सहायता भी ली जा सकती है। अद्वैतभाव से तो कुण्डलिनी वैसे भी प्रकट हो ही जाती है। उस उजागर हुई कुण्डलिनी पर अतिरिक्त ध्यान भी दिया जा सकता है। फिर लम्बे समय तक साँसों पर ध्यान देने से कुण्डलिनी, ध्यान के अंतर्गत स्थिर व स्पष्ट जैसी हो जाती है। वह कुण्डलिनी फिर पूरे शरीर को तरोताजा, तनावमुक्त, व रोगमुक्त कर देती है।

साँसों पर ध्यान देते हुए, सांस से गति करते हुए शरीर के भागों पर स्वयं ही ध्यान चला जाता है। शरीर के लगभग सभी मुख्य भाग सांस के साथ गति करते हैं। इस तरह से पूरा शरीर ही ध्यान में आ जाता है। पूरा शरीर अद्वैतपूर्ण पुरुषों से भरा हुआ है। अतः उनके अप्रत्यक्ष ध्यान से मन स्वयं ही अद्वैतभाव से भर जाता है। “शरीरविज्ञान दर्शन” के अनुसार ये देहपुरुष शरीर की कोशिकाओं, व शरीर के जैव-रसायनों के रूप में विद्यमान हैं। ये देहपुरुष प्राणियों की तरह ही समस्त व्यवहार करते हैं। क्योंकि अद्वैतभाव रखने वाला कोई प्राणी एक मनुष्य ही हो सकता है, अन्य जीव नहीं। अन्य जीवों में तो भावों की भी न्यूनता होती है, द्वैत-अद्वैत का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए देहपुरुष के ऊपर एक मनुष्य का रूप आरोपित होने लगता है। क्योंकि एक योगी ने एक मनुष्य (गुरु या प्रेमी) को अपनी कुण्डलिनी बनाया हुआ होता है, इसलिए वह उसी मनुष्य के रूप का सर्वाधिक अभ्यस्त होता है। इससे उस विशेष मनुष्य का रूप अर्थात उस ध्यान करने वाले योगी की कुण्डलिनी देहपुरुष के ऊपर आरोपित हो जाती है। योग-प्राणायाम के अभ्यास से भी साँसें कुण्डलिनी के साथ जुड़ जाती हैं। इससे भी साँसों के ध्यान से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। इस तरह से, विभिन्न प्रयासों से कुण्डलिनी लगातार पुष्ट होती रहती है, जिससे मन व शरीर, दोनों हृष्ट-पुष्ट बने रहते हैं। कालान्तर में कुण्डलिनी जागृत भी हो सकती है। इन सभी प्रयासों में शरीरविज्ञान दर्शन की एक अहम भूमिका होती है।

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कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता- mutual relationship between Kundalini and love affair

कुण्डलिनी व प्रेम सम्बन्ध के बीच में आपसी रिश्ता (please browse down or click here to view this post in English)

कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। समाज में यादों के सहारे जीने की जो बात चलती है, वह कुण्डलिनी के सहारे जीने की ही बात है। इसी तरह, प्रेमसंबंध भी कुण्डलिनी को पैदा करता है, जिससे विभिन्न कुण्डलिनी-लक्षण पैदा होते हैं। कुण्डलिनी प्राणों (साँसों सहित) को बल प्रदान करती है। कुण्डलिनी मानसिक विचार का ही पर्याय है। इस प्रकार से सभी मानसिक विचार प्राणों को पुष्ट करते हैं।

किसी व्यक्ति विशेष का लगातार यादों में, अर्थात मन में बने रहना ही कुण्डलिनी-क्रियाशीलता है। उससे उस व्यक्ति विशेष के रूप से बनी मानसिक छवि को ही कुण्डलिनी कहते हैं, तथा उस मानसिक छवि से एकाकार होने को ही कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

जब कोई व्यक्ति कहता है कि वह अपने प्रेमी के बिना जी नहीं सकता, तब वह उसके रूप से बनी अपनी मानसिक कुण्डलिनी के बिना न जी सकने की ही बात करता है। वास्तव में वह अपने प्रेमी के भौतिक रूप के बिना भी जी सकता है, यदि प्रेमी की छवि उसके मन में बस गई हो। तभी तो बहुत से प्रेमी जोड़े एक-दूसरे से अलग रहकर, एक-दूसरे की यादों के सहारे ही पूरा जीवन सुखपूर्वक बिता लेते हैं। उनके मन में बसी एक-दूसरे की वही छवि तो कुण्डलिनी है। वह उनके पूरे अस्तित्व को चलायमान रखती है। प्रेमी उसे नहीं छोड़ सकता। यदि वह जबरदस्ती उसे हटाने का प्रयत्न करता है, तो वह अँधेरे में जैसे डूबने लगता है, क्योंकि उसका सभी कुछ उस कुण्डलिनी के साथ जुड़ गया होता है। इसलिए वह मजबूरी में उसे बना कर रखता है। जब समय के साथ वह छवि मिटने लगती है, तब कोई नई छवि उसका स्थान लेने लगती है। इसी से पता चलता है कि कुण्डलिनी एक जीवनी शक्ति है। यौनसंबंध से उस मानसिक छवि को शक्ति मिलती है। ऐसा ही ओशो महाराज भी कहते हैं। तभी तो जगत में यौनसंबंध को सबसे बड़ा सुख माना जाता है। यदि वह सम्बन्ध तांत्रिक विधि से हो, तब तो और भी अधिक शक्ति मिलती है, जिससे वह जागृत भी हो सकती है।

अतः उपरोक्त बातों से स्वयंसिद्ध है कि अंतर्लैंगिक प्रेमसंबंध में भी कुण्डलिनी लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रेमी के रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी लगातार मन में बसी रहती है। उससे व्यक्ति यौनसंबंध बनाने के लिए या विवाह सम्बन्ध बनाने के लिए प्रोत्साहित होता है, ताकि वह कुण्डलिनी शांत हो सके। यद्यपि वह कुण्डलिनी लाभदायक होती है, पर व्यक्ति उसके अस्थायी दुष्प्रभावों से विचलित हो जाता है। वे दुष्प्रभाव निम्नलिखित प्रकार के हैं। वह उसकी शारीरिक व मानसिक शक्ति का कम या ज्यादा रूप में भक्षण करती रहती है। उससे उसका मन दुनियादारी में कम लगता है। वह एकांत को पसंद करने लगता है। वह लोगों को बुझा-बुझा सा दिखता है। अन्य वे सभी लक्षण उत्पन्न होते हैं, जो कुण्डलिनी के लिए सामान्य हैं, जैसे कि शरीर में, मुख्यतः हाथों में कम्पन, सिरदर्द के साथ सिर में भारीपन, भावुकता, उत्तेजना आदि। तभी तो कई प्रेमी अपने प्रेम के असफल होने पर घातक कदम भी उठा लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कुण्डलिनी उनका पीछा ही नहीं छोड़ेगी, और उन्हें बिलकुल नकारा कर देगी। परन्तु वास्तविकता यह है कि वह कुण्डलिनी उनके सारे पाप धोकर उन्हें आत्मज्ञान तक पहुंचा देती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ था, जो उसकी पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” में विस्तार से वर्णित है। फिर बाद में उसके गुरु के रूप की कुण्डलिनी उसके मन में जागृत हो गई थी, जिसने उसकी प्रेमिका की कुण्डलिनी का स्थान ले लिया था। इस तरह से, लगभग 20 सालों के बाद उसका पीछा उसकी प्रेमिका के रूप की कुण्डलिनी से छूट पाया था।

विडम्बना है कि प्रेम के सफल होने पर भी व्यक्ति को संतुष्टि नहीं मिलती। विवाह के बाद प्रेमी का आकर्षण समाप्त हो जाता है, जिससे उसके रूप की कुण्डलिनी भी गायब हो जाती है। वह जीवनी शक्ति के लिए तरसने लगता है। फिर वह पछताता है कि क्योंकर उसने प्रेमी की यादों (कुण्डलिनी) से घबरा कर प्रेम को परवान नहीं चढ़ने दिया। वह सोचता है कि प्रेमी के भौतिक रूप से अच्छी तो उसके रूप से निर्मित मानसिक कुण्डलिनी ही थी। यद्यपि फिर भी कुछ नहीं बिगड़ा होता है, यदि वह मौके की नजाकत को समझे। क्योंकि वैसी पछतावे वाली स्थिति में वह संदर्भित तंत्र / अप्रत्यक्ष तंत्र का सहारा ले सकता है, जिसमें वह अपने जीवनसाथी-प्रेमी की सहायता से गुरु, देवता , इष्ट आदि के रूप की कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है। इस तरह के समस्त तथ्य उपरोक्त पुस्तक में सविस्तार वर्णित हैं।

वैसे तो मन के सभी विचार जीवनी शक्ति देते हैं। एक बहिर्मुखी आदमी में ये विचार निरंतर जारी रहते हैं, इसलिए उसकी जीवनी शक्ति निरंतर बनी रहती है। जब उसका शरीर किसी कारणवश क्षीण हो जाता है, तब उसकी बहिर्मुखता भी क्षीण हो जाती है। इससे वह निर्विचार सा होकर जीवनी शक्ति के लिए तरस जाता है। फिर वह अकेली मानसिक छवि को योग से पुष्ट करने लगता है, ताकि वह जीवनी शक्ति प्राप्त करता रह सके। बुद्धिमान व्यक्ति बहिर्मुखता के साथ योग या प्रेम से या दोनों से कुण्डलिनी को भी पुष्ट करता रहता है, ताकि वह संकट के समय काम आवे। भाग्यहीन व्यक्ति न तो बदलते विचारों का पूरा लाभ उठाता है, और न ही कुण्डलिनी-रूपी अकेले यौगिक विचार का। इसलिए जीवनी शक्ति के अभाव के कारण उसका जीवन संकट में पड़ा रहता है।

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Mutual relationship between Kundalini and love affair

Kundalini is a Life force. What is the matter of living in the society with the help of memories; it is only a matter of living with the help of Kundalini. Likewise, love affair also produces Kundalini, which causes various Kundalini-symptoms. Kundalini gives strength to pranas / subtle breath-power (including breaths). Kundalini is a synonym for mental thought. In this way, all mental thoughts affirm life.

A continuous memory of a particular person, that is to remain in the mind, is the Kundalini-activation. From that, the mental image created from the physical form of a particular person is called Kundalini, and Kundalini awakening is to be united with that mental image.

When a person says that he cannot live without his lover, then he talks about not living without the Kundalini. In fact, he can live without the physical nature of his lover, if the image of the lover has settled in his mind. Only then, many lover couples spend their whole life happily, living apart from each other, with the help of each other’s memories. The same image in the mind of lover is Kundalini. She keeps his whole existence moving. He cannot leave her. If he forcefully tries to remove her, then he starts drowning in the darkness, because his everything has gone attached with that image. That is why he maintains her in compulsion. When the image begins to dissolve over time, then a new image begins to take its place. This shows that Kundalini is a life force. Sexual mood gives strength to that mental image. Similar are also the words of Osho Maharaja. Only then, sexual relations are considered the greatest happiness in the world. If that relation is with the Tantric method, then kundalini gets even more power, so that she can also be awakened.

Therefore, there is axiom by the above things that kundalini symptoms arise in romantic love affair also. The mental kundalini built from the physical form of a lover constantly resides in the mind. The person is encouraged to make sexual relation or to create a marriage relationship, so that the Kundalini can calm down. Although the Kundalini is beneficial, the person gets distracted by its temporary side effects. These are the following types of side effects. She uses less or more of his physical and mental powers. His mind wants to be less in the world. He seems to like seclusion. It looks to people as if he has gone extinguished. Other all those symptoms are common, which are normal for the Kundalini, such as subtle tremors in the body, mainly vibrations in the hands, heaviness in the head with headache, emotionalism, excitement etc. Only then do many lovers take fatal steps when their love fails, because they think that Kundalini will not leave them normal, and will make them rejected altogether. However, the reality is that the Kundalini, by washing all their sins, leads them to enlightenment. This was the case with Premyogi Vajra, which is described in detail in his book (in Hindi) “shareervigyan darshan- ek adhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha); Physiology philosophy – A Modern Kundalini tantra (The Love Story of a Yogi)”, and “love story of a yogi- what Patanjali says”. Both of these are also available on “shop” page of this website. Later, his Kundalini made of his Guru’s form had awakened in his mind, who had replaced his girlfriend’s Kundalini. In this way, after twenty years of pursuing it, he was exempted from the kundalini made of his girlfriend’s form.

Ironically, even after the success of love, the person does not get satisfaction. After marriage, the attraction of the lover ends, so that the Kundalini of her form also disappears. He seems longing for the force of life. Then he regrets why he did not allow love to go to peak out of fear of lover’s memories (the Kundalini). He thinks that the lover’s physical form is worse than the mental kundalini built from her that physical form. Although nothing is non repairable then too, if he understands the potential of the spot. Because in such a situation, he can resort to the contextual Tantra / indirect Tantra in which he can awaken the Kundalini of the form of Guru, God, favorite etc. with the help of loving life partner. All such facts are described in detail in the above book.

By the way, all thoughts of the mind give the force to life. These thoughts continue in an extroverted man, so his life force continues to be sustained. When his body gets impaired for some reason, then his extrovert nature also becomes impaired. This leads to a bit of gross thoughtlessness and yearns for life. Then he starts to consolidate the single mental image with the yoga, so that he can get the life force. The wise person keeps on strengthening the Kundalini along with his extrovert nature with help of yoga / meditation or love or both, so that she will work in times of crisis. An ill fated one does not take full advantage of changing thoughts, nor of the yogic thought alone, that is named as kundalini. Therefore, due to the absence of life force, his life remains in crisis.

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सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष 2019 की बहुत-2 शुभकामनाएं- Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them

सभी मित्रों के बीते वर्ष को सहर्ष विदाई व उनको नववर्ष की बहुत-2 शुभकामनाएं (please browse down to view this post in English)।

मेरा बीता वर्ष, 2018 निम्न प्रकार का रहा-

अपनी टाटा टियागो कार में लगभग 3000 किलोमीटर का सपरिवार सफ़र तय किया, जिसमें से अधिकाँश उन्नत उच्चमार्गों का सफर था। पीवीआर सिनेमा में 4 हिंदी फिल्में सपरिवार देखीं, 102 नोट आऊट, संजू, हनुमान वर्सस अहिरावना (थ्री डी एनीमेशन) व सिम्बा। मेरे माता-पिता तीर्थधाम यात्रा का जल चढ़ाने कन्याकुमारी / रामेश्वरम गए। अपने पुराने घर का नवीनीकरण करवाया गया। श्री मद्भागवत सप्ताह श्रवण यज्ञ का अनुष्ठान अपने घर में करवाया गया। मेरी पूज्य व वृद्ध पितामही जी का स्वर्गवास हुआ। मेरे बेटे को पहली कक्षा में ए-1 रहने पर पारितोषिक दिया गया। मेरी पत्नी के द्वारा नए सिलाई के प्रशिक्षण-कोर्स का प्रारम्भ किया गया। मुझे क्वोरा टॉप राईटर (क्वोरा शीर्ष लेखक)- 2018 का सम्मान मिला। मेरे द्वारा कुण्डलिनीयोग का प्रतिदिन का 1 घंटे का सुबह का व एक घंटे का सांय का अभ्यास एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ा गया। इसके कारण मेरा वर्ष 2017 का कुण्डलिनीजागरण का अनुभव जारी रहा, महान आनंद के साथ। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से इस मेजबानी वेबसाईट (https://demystifyingkundalini.com/home-3/) को पूर्णतः विकसित किया। इस वेबसाईट के लिए 139 शेयर, 30 लाईक्स, 4772 वियूस, 3099 विसिटर व 46 फोलोवर मिले। इस वेबसाईट के लिए मैंने लगभग 31 पोस्टें लिखीं व प्रकाशित कीं। प्रेमयोगी वज्र की सहायता से “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक पुस्तक लिखी। उसके लिए 13 सशुल्क डाऊनलोड व 80 निःशुल्क डाऊनलोड प्राप्त हुए। उसके लिए अमेजन पर एक सर्वोत्तम रिव्यू / समीक्षा (5 स्टार) भी प्राप्त हुआ। साथ में, उसे गूगल बुक पर भी दो उत्तम व 5 स्टार रिव्यू प्राप्त हुए। दूरदर्शन के कार्यक्रमों में तेनालीरामा, तारक मेहता का उल्टा चश्मा, मैं मायके चली जाऊंगी, रियल्टी शोज व जी न्यूज (मुख्यतः डीएनए) का आनंद उठाया। अपने पोर्टेबल मिनी जेबीएल स्पीकर पर गाना एप के माध्यम से लगभग 2000 मधुर ओनलाईन गाने सुने। काटगढ़ मंदिर व टीला मंदिर के सपरिवार दर्शन किए। अपने किन्डल ई-रीडर पर 3 पुस्तकें पढ़ीं। पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

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Nice farewell to all the friends’ last year and many New Year wishes for them.

My last year, 2018 was of the following type:

Travelled around 3,000 km in my Tata Tiago car with family, most of which were the journey of advanced highways. In PVR cinema saw 4 Hindi films with family, 102 Not out, Sanju, Hanuman Versus Ahiravana (Three D Animation) and Simmba. My parents went to Kanyakumari / Rameshwaram for carrying water for pilgrimage. My old home was renovated. Shreemad Bhaagvat Shravan Yagna’s week long ritual was performed in my house. My devoted and old grandmother went to heaven. My son was rewarded for being A1 in the first grade. New sewing training-course was started by my wife. I got the Quora Top Writer- the honour of 2018. I did not leave the Kundalini Yoga practice for 1 hour of morning and one hour of evening everyday even for one day. Due to this my experience of KundaliniJagran of 2017 continued, with great bliss. With the help of Premyogi Vajra, this hosted website (https://demystifyingkundalini.com/) was fully developed. For this website, 139 shares, 30 likes, 3099 visitors, 46 followers and 4772 views were obtained. I wrote and published about 31 posts for this website. With the help of Premyogi Vajra, I wrote a book called “Shareervigyaan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)”. For that 13 paid downloads and 80 free downloads were received. For that, a great review (5 stars) was also received on Amazon. Along with, two good and 5 star reviews were also obtained on Google book for that. In Doordarshan’s programs, Tenalirama, Tarak Mehta ka Ulta Chashma, main maayake chali jaaoongee, realty shows and Zee news (mainly DNA) were enjoyed well. Two thousands of melodious online songs have been heard through Gaana App on my portable mini JBL speaker. Visiting the Katgarh Temple and the Tila Temple with family by me. Read 3 books on my Kindle e-Reader. Thanks for reading.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

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