बच्चों में कुण्डलिनी

कहते हैं कि बच्चे भगवान् का रूप होते हैं। इसके पीछे बहुत से कारण हैं। परन्तु सबसे प्रमुख व मूल कारण कुण्डलिनी से सम्बंधित है। कुण्डलिनी बच्चों का मूल स्वभाव है। वास्तव में, कुण्डलिनी की खोज बच्चों ने ही की है। बड़ों ने तो उस खोज को केवल कागज़ पर उकेरा ही है। बड़ों ने बच्चों के इस मूल स्वभाव की नक़ल करके बहुत सी मैडिटेशन तकनीकों को ईजाद किया है। बड़ों ने बच्चों के इस मूल स्वभाव की नक़ल करके बहुत सी योग-सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। परन्तु हैरानी की बात यह है कि बच्चों के इस मूल स्वभाव को बहुत कम श्रेय दिया जाता है। अहंकार के आश्रित अधिकाँश लोग सारा श्रेय स्वयं बटोरना चाहते हैं। आज हम इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से बच्चों को उनका असली हक़ दिलाने की कोशिश करेंगे।

बच्चे स्वभाव से ही अद्वैतवादी होते हैं

बच्चे केवल अनुभव करना जानते हैं। वे अनुभव का पूरा मजा लेते हैं। वे गहराई में नहीं जाते। वे जजमेंट नहीं करते। इसलिए उन्हें सभी कुछ एक जैसा ही प्रतीत होता है। उनकी नजर में लोहा, पत्थर व सोना एकसमान हैं। विपासना साधना के ये मूलभूत गुण हैं। इससे सिद्ध होता है कि बच्चों में स्वयं ही विपासना होती रहती है। विपासना उनका स्वभाव है।

बच्चे स्वभाव से ही कुण्डलिनी प्रेमी होते हैं

यह हम पहले भी विविध प्रमाणों से अनेक बार सिद्ध कर चुके हैं कि विपासना (साक्षी भाव)/अद्वैत व कुण्डलिनी साथ-२ रहते हैं। क्योंकि बच्चे स्वभाव से ही अद्वैतवादी होते हैं, अतः यह स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि बच्चे स्वभाव से ही कुण्डलिनी योगी होते हैं। इसी वजह से ही तो बच्चे किसी एक चीज के दीवाने हो जाते हैं। यदि वे किसी ख़ास खिलौने को पसंद करते हैं, तो रात-दिन उसी के पीछे लग जाते हैं। इसी तरह, यदि बच्चे किसी एक आदमी के दीवाने हो जाते हैं, तो उसी पर अपना सब कुछ लुटाने को तैयार हो जाते हैं। हालांकि इससे वे कई बार बड़ों के धोखे का शिकार भी बन जाते हैं। योग-ऋषि पतंजलि भी तो यही कहते हैं कि “यथाभिमतध्यानात् वा”; अर्थात अपनी किसी भी मनपसंद चीज के निरंतर ध्यान से योग सिद्ध होता है।

सर्वप्रिय वस्तु के रूप में कुण्डलिनी

यही सबसे पसंदीदा चीज ही तो कुण्डलिनी है, जो निरंतर मन में बसी रहती है। एक बात और है। जब बच्चा कोई नयी चीज पसंद करने लगता है, तब वह अपनी पुरानी पसंदीदा चीज को छोड़ देता है। फिर वह उसी एक नयी चीज का दीवाना बन जाता है। वह एक से अधिक चीजों या लोगों से एकसाथ प्यार नहीं कर पाता। कुण्डलिनी योगी का भी यही प्रमुख लक्षण है। योगी भी लम्बे समय तक, यहाँ तक कि जीवनभर भी एक ही चीज का ध्यान करते रहते हैं, जो उनकी कुण्डलिनी बन जाती है।

प्रेम कुण्डलिनी की खुराक के रूप में

प्रेम से कुण्डलिनी को बल मिलता रहता है। तभी तो देखने में आता है कि बच्चे प्रेम की ओर सर्वाधिक आकृष्ट होते हैं।

बच्चों का मोबाईल फोन-प्रेम भी कुण्डलिनी-प्रेम ही है

आजकल बच्चे हर समय मोबाईल फोन से चिपके रहते हैं। यह बच्चों का दोष नहीं है। यह उनका कुण्डलिनी-स्वभाव है, जो उन्हें एक चीज से चिपकाता है। उन्हें अच्छे-बुरे का भी अधिक ज्ञान नहीं होता। इसलिए बच्चों की भलाई के लिए समाज को ऐसी चीजें बनानी चाहिए, जो पूरी तरह से दुष्प्रभाव से मुक्त हों। एक उपाय यह भी है कि बच्चों को प्रेम से ऐसी चीजों के दुष्प्रभाव के बारे में बाताया जाए। उन्हें प्यार से समझाना चाहिए या अपने साथ दूसरे कामों/खेलों/घूमने-फिरने में मित्र की तरह व्यस्त रखना चाहिए। यदि बच्चों के सामने नफरत से भरा हुआ द्वैतभाव प्रकट किया जाएगा, तब तो उनका कुण्डलिनी-गुण नष्ट ही हो जाएगा, और साथ में उनका बचपन भी।

बच्चे मन के भावों को पढ़ लेते हैं

बड़े लोग चाहे जितना मर्जी छुपाने की कोशिश कर लें, बच्चे उनके मन के भाव को पढ़ ही लेते हैं। यह शक्ति कुदरत ने उन्हें आत्मरक्षा के लिए दी है। इसी शक्ति से तो वे किसी आदमी को अच्छी तरह से पहचान कर उसके जी-जान से दीवाने हो जाते हैं, जिससे कुण्डलिनी विकास होता है। वैसे भी बच्चों में कुण्डलिनी आसानी से बन जाती है, क्योंकि उनका दिमाग खाली होता है। तभी तो देखा जाता है कि कई बार अच्छे-खासे घर के बच्चे बिगड़ जाते हैं। वास्तव में, उस घर के लोग बाहर से तो अच्छे होते हैं, पर उनके मन के भाव अच्छे नहीं होते। बच्चे उन मनोभावों से गलत आदतें सीख लेते हैं। इसके उलट, कई बार बुरे घर के बच्चे बहुत अच्छे बनते हैं। वास्तव में, उस घर के लोग बाहर से बुरे प्रतीत होते हैं, पर उनके मन के भाव अच्छे होते हैं। सबसे बेहतर यह है कि मन के अन्दर व बाहर, दोनों स्थानों पर अच्छे बन कर रहा जाए। यदि अपने काम में उन्हें भी भागीदार बनाया जाए, तो वे स्वयं ही सीख जाते हैं। कई बार वे सीखने-सिखाने के नाम से ही चिढ़ जाते हैं।  

बच्चों में कुण्डलिनी सक्रिय होती है, पर वे उसे जागृत नहीं कर पाते

कुण्डलिनी को जागृत करने के लिए बच्चों को कम से कम किशोरावस्था का इन्तजार करना ही पड़ता है। उस आयु में शरीर को यौनशक्ति मिलनी शुरू हो जाती है। यदि उस यौनशक्ति का प्रबंधन सही ढंग से हो जाए, तो वह कुण्डलिनी को मिलने लग जाती है, जिससे कुण्डलिनी आसानी से जाग सकती है। कईयों को दिव्य व अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने से यह काम स्वयं हो जाता है, जैसा कि प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ। कईयों को विशेष प्रयास करना पड़ता है।

प्रेमयोगी वज्र का कुण्डलिनी अनुभव

बचपन में वह कुण्डलिनी के प्रति तो आम बच्चों की तरह ही आकृष्ट होता था। यद्यपि किशोरावस्था में उसे दिव्य व अनुकूल परिस्थितियाँ मिलीं, जिनसे उसकी यौनशक्ति उसकी कुण्डलिनी को मिलती रही। वह यौनशक्ति इतनी अधिक मजबूत थी कि उसकी कुण्डलिनी ने जागृत हुए बिना ही उसे क्षणिक आत्मज्ञान करा दिया। उसके बाद तो वह पूरी तरह से एक बच्चे के जैसा बन गया। हर समय उसके मन में कुण्डलिनी वैसे ही बसी रहती थी, जैसे कि एक बच्चे के मन में कोई खिलौना या विशेष प्रेमी। अधिकाँश लोग उसका मजाक जैसा बनाया करते थे। कई तो कभी-२ दुर्व्यवहार पर भी उतर आते थे। वास्तव में, सभी लोग अपने झूठे अहंकार पर लगी चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाते।

दूसरी बार उसने क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को कृत्रिम योग तकनीक से प्राप्त किया, कुछ यौनयोग की सहायता लेकर। यह सारा वृत्तांत हिंदी में बनी पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन” में, व अंग्रेजी में लिखी पुस्तक “love story of a Yogi” में वर्णित है, जो इस वैबसाईट के पेज “शॉप” पर उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, यदि कोई कुण्डलिनी प्रेमी इस वैबसाईट की सभी कुण्डलिनी से सम्बंधित ब्लॉग पोस्टों को किनडल ईबुक के रूप में आसानी से व एकसाथ पढ़ना चाहे, तो सभी का संग्रह भी पुस्तक रूप में इसी वैबपेज पर उपलब्ध है। उसके हिंदी-रूप का नाम “कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान” व अंग्रेजी-रूप का नाम “kundalini science- a spiritual psychology” है।

आदर्श बचपन तो केवल जीवन के साथ अपनाए जाने योग्य सही दृष्टिकोण के बारे में बताता है, न कि जीवन के वास्तविक अनुभवों को दर्शाता है। जीवन जीने का तरीका तो मानवीय रूप से सामाजिक जीवन को लम्बे समय तक जीने से प्राप्त व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से ही सीखने में आता है। इसलिए बड़े और बच्चे आपस में प्रेमपूर्ण व्यवहार से एक-दूसरे की मदद वैसे ही करते हैं, जैसे कि एक अँधा और एक लंगड़ा।

बच्चों में कोई बुराई नहीं होती है और वे बड़े होते हुए अपने आसपास से बुराई सीखते हैं।

रिसर्च में भी हुआ साबित, ‘भगवान का रूप’ होते हैं बच्चे

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पहाड़ों में कुण्डलिनी

मित्रो, पहाड़ों का अपना एक अलग ही आकर्षण है। वहां पर मन प्रफुल्लित, साफ, हल्का, शांत व आनंदित हो जाता है। पुराना जीवन रंग-बिरंगे विचारों के रूप में मस्तिष्क में उमड़ने लगता है, जिससे बड़ा ही आनंद महसूस होता है। चिंता, अवसाद व तनाव दूर होने लगते हैं। गत जीवन के मानसिक जख्म भरने लगते हैं। प्रेमयोगी वज्र को भी अपने व्यावसायिक उत्तरदायित्वों के कारण कुछ वर्षों तक ऊंचे पहाड़ों में रहने का मौक़ा मिला था। उसे वहां के लोगों से व प्राकृतिक परिवेश से भरपूर प्यार, सहयोग व सम्मान मिला।

पहाड़ों में अपने आप विपासना साधना होती रहती है

उपरोक्त तथ्यों से जाहिर है कि पहाड़ों में विपासना के लिए सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद होती हैं। यदि आदमी योग आदि के माध्यम से अपना बल भी लगाए, तब तो शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है। प्रेमयोगी वज्र को भी उपरोक्त मानसिक सद्प्रभावों का अनुभव पहाड़ों के इसी गुण के कारण हुआ।

कुण्डलिनी ही पहाड़ों में स्वयम्भूत विपासना को पैदा करती है

आश्चर्य की बात है कि प्रेमयोगी वज्र की मानसिक कुण्डलिनी, जो पहले दब जैसी गई थी, वह पहाड़ों में बहुत मजबूत हो गई थी। वह तांत्रिक कुण्डलिनी थी, और उसकी मानसिक प्रेमिका के रूप में थी। उसके साथ ही उसकी मानसिक गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी भी वहां पर ज्यादा चमकदार बन गई थी। पर उसने देखा कि पहाड़ों के लोग प्रेमिका के रूप वाली कुण्डलिनी को बहुत ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी की अपेक्षा। गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को वहां के पंडित वर्ग के आध्यात्मिक लोग ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, यद्यपि प्रेमिका की कुण्डलिनी के साथ ही, अकेली गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को नहीं। इसका कारण यह है कि पहाड़ मन के काम-रस या श्रृंगार-रस को उत्तेजित करते हैं। इसी वजह से तो काम शास्त्रों में ऊंचे पहाड़ों का सुन्दर वर्णन बहुतायत में पाया जाता है। उदाहरण के लिए विश्वप्रसिद्ध साहित्यिक रचना “मेघदूत”।

दूसरा प्रमाण यह है कि मैदानी भागों में कुण्डलिनी योग साधना के बाद जब प्रेमयोगी वज्र पर्वत-भ्रमण पर गया, तब पहाड़ों में उसकी कुण्डलिनी प्रचंड होकर जागृत हो गई, जैसा कि इस वैबसाईट के “गृह-2” वैबपेज पर वर्णित किया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान का अनुभव भी पहाड़ों में ही हुआ था, जो उसने इस वैबसाईट के “गृह-2” वेबपेज पर वर्णित किया है । इसी वजह से तो अनादिकाल से लेकर योग साधक शीघ्र सिद्धि के लिए मैदानों से पहाड़ों की तरफ पलायन करते आए हैं।

पहाड़ों में कुण्डलिनी क्यों चमकने लगती है?

वास्तव में, पहाड़ देवता की मूर्ति की तरह काम करते हैं। तभी तो कई धर्मों में पहाड़ को देवता माना गया है। एक प्रकार से देवता की मूर्ति पहाड़ के रूप में प्रतिक्षण आँखों के सामने विद्यमान रहती है। पहाड़ मैं विद्यमान अद्वैत तत्त्व आदमी के मन में भी अद्वैतभाव पैदा कर देता है। उस अद्वैत के प्रभाव से कुण्डलिनी मन-मंदिर में छा जाती है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी न भी हो, तो भी अद्वैतभाव से बहुत से आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। साथ में, उससे धीरे-२ कुण्डलिनी भी बनना शुरू हो जाती है।

यह बात इस वैबसाईट में पहले भी सिद्ध की जा चुकी है कि सृष्टि के कण-कण में अद्वैत तत्त्व विद्यमान है। वास्तव में, वही भगवान् है। इसे समझने के लिए सबसे बढ़िया पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन” है।

मौन, ध्यान एवं जप आदि कार्यों के लिए एकांत की जरूरत होती है और इसके लिए पहाड़ों से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता।

क्यों बनाए गए हैं ऊंचे पहाड़ों पर देवी नंदिर, आखिर क्या है इसका रहस्य?

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कुण्डलिनी के लिए संस्कृत का योगदान

मित्रो, संस्कृत सीखने के बारे में क्वोरा पर बहुत से प्रश्न मिलते रहते हैं। मेरे उत्तरों से भी कुछ लोगों को फायदा हुआ। फिर मैंने सोचा कि क्यों न मैं संस्कृत पर एक सुन्दर ब्लॉग पोस्ट बनाऊँ, जिससे बहुत से  लोगों को फायदा मिल सके। यह पोस्ट उसी सोच का परिणाम है।

संस्कृत के प्रति मेरा रुझान

मैं शुरू से ही संस्कृत-विद्वानों से भरे परिवार में पला बढ़ा हूँ। इससे संस्कृत मुझे विरासत में ही मिल गई थी। छवीं से दसवीं कक्षा तक संस्कृत विषय पढ़ना  अनिवार्य था, उससे भी मुझे कुछ सहयोग मिला। यदि पहली कक्षा से ही संस्कृत विषय लगा होता, तो और ज्यादा लाभ होता। खेद का विषय है कि भारत के बहुत से राज्य संस्कृत की बजाय अपनी क्षेत्रीय  भाषाओं को ज्यादा अहमियत देते हैं। कई राज्यों में तो संस्कृत भाषा को पढ़ाया ही नहीं जाता, जैसे कि पंजाब में। भारत में संस्कृत के पिछड़ने का एक मुख्य कारण यह भी है।

संस्कृत से कुण्डलिनी को बल मिलता है

यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी रहा है। जवानी के दिनों में, जब मैं भौतिकता से भरे हुए अपने व्यावसायिक कार्यों में उलझा हुआ रहता था, तब प्रतिदिन संस्कृत का कुछ अध्ययन कर लेता था। पुराणों की संस्कृत मुझे सर्वाधिक भाती थी। अधिक खाली समय मिलने पार संस्कृत में कुछ् लिख भी लिया करता था। कुछ ही सालों में उन संस्कृत-लेखों से एक छोटे आकार की पुस्तक तैयार हो गई, जो आपको नीचे दिए गए लिंक पर निःशुल्क रूप में उपलब्ध हो जाएगी। उस संस्कृत के प्रभाव से मेरी कुण्डलिनी मेरे मन में स्थायी रूप से बसी रहती थी। जब-२ मैं संस्कृत से दूर चला जाता था, तब-२ वह कुण्डलिनी मेरे मन से ओझल हो जाया करती थी।

संस्कृत से स्मरणशक्ति बढ़ती है

यह तथ्य वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने एक वैज्ञानिक शोध के द्वारा यह पता लगाया  है कि संस्कृत के प्रभाव से मस्तिष्क में संरचनात्मक परिवर्तन देखे गए। वे परिवर्तन मस्तिष्क की क्षमता कि वृद्धि को, मुख्यतया स्मरणशक्ति की वृद्धि को इन्गित कर रहे थे। यह बात तो हम सभी जानते हैं कि मस्तिष्क की कार्यक्षमता का मुख्य मापदंड स्मरणशक्ति ही तो है।

संस्कृत से ध्यान-शक्ति बढ़ती है

वास्तव में ध्यान-शक्ति व स्मरणशक्ति के बीच में कोई अंतर नहीं है। सर्वोच्च कोटि के स्मरण को ही ध्यान कहते हैं। तभी तो कुण्डलिनी-ध्यान के रूप में कुण्डलिनी के स्पष्ट रूप का, प्रचुर मात्रा में लगातार स्मरण होता  रहता है। यह भी कह सकते  हैं कि स्मरणशक्ति को कुण्डलिनी पर केन्द्रित करने से वह ध्यान-शक्ति बन जाती है। अतः स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि संस्कृत से कुण्डलिनी को शक्ति मिलती है। यदि वह संस्कृत लयबद्ध, सरल  व रोचक मन्त्रों के रूप में हों (जैसे कि पुराणों में हैं); तब तो कुण्डलिनी को और अधिक लाभ पहुंचता है।

हिंदु-पुराण संस्कृत के अनुपम भण्डार हैं

पुराणों की संस्कृत बहुत सरल, स्पष्ट, लयबद्ध, संगीतबद्ध, छंदबद्ध, रुचिकर व ज्ञानकर है। मेरे दादाजी प्रतिदिन मूल संस्कृत में व उसके हिंदी अनुवाद में पुराण पढ़ा करते थे। उसके प्रभाव से मेरी कुण्डलिनी मेरे मस्तिष्क में ही स्थायी रूप से रहती थी।

संस्कृत व अंग्रेजी के बीच में समानता

यह जानकारी मुझे किसी लेख आदि में नहीं मिली, पर यह मेरा अपना अनुभव है। जिसकी संस्कृत पर अच्छी पकड़ है, उसकी अंग्रेजी पर भी हो सकती है। दोनों ही भाषाओं में शब्दों के जोड़, शब्दों के संक्षिप्त रूप, अलंकार व व्याकरण की गहराई जैसे मूलभूत गुण एकसमान हैं। उदाहरण के लिए, unforgettable- अंग्रेजी, अविस्मरणीयः – संस्कृत, भुलाया न जा सकने वाला- हिंदी। यहाँ अंग्रेजी व संस्कृत की शब्द संरचना एक जैसी लगती है।

संस्कृत सीखने के जिज्ञासुओं के लिए कुछ सुझाव

बहुत से लोग संस्कृत सीखने के लिए वर्षों तक व्याकरण में उलझे रहते हैं। वे पुराणों की असली संस्कृत से वंचित रह जाते हैं। यदि पुराण नहीं पढ़े, तो संस्कृत से क्या लाभ? भाषा व्याकरण से नहीं, अपितु अभ्यास से आती है। इसलिए सीधे ही पुराणों को पढ़ना चाहिए। मैं वर्षों तक इसी ऊहापोह में रहा, और कभी भी अपने संस्कृतज्ञान के बारे में आश्वस्त नहीं हो सका। फिर किसी वृद्ध की सलाह से मैंने बॉम्बे प्रिंटिंग प्रेस से हिंदी-अनुवाद सहित मूल संस्कृत में लिखा गया योगवासिष्ठ ग्रन्थ मंगवाया। यह ग्रन्थ महाभारत जितने बड़े आकार का है। इसमें पुनरुक्तियाँ बहुत अधिक हैं। इसलिए मैं पूरी रप्तार से उसे पढ़ने लगा, बिना गहराई में जाकर। हिदी अनुवाद को तभी देखता था, जब बहुत ही जरूरी होता था। जो संस्कृत श्लोक समझ नहीं आता था, वह आगे स्पष्ट हो जाता था। मैंने एक अनुवाद की साधारण पुस्तक, एक संस्कृत से हिंदी शब्दकोष, एक शब्द रूपावली व एक धातु रूपावली को भी अपने पास सहायता के लिए रखा हुआ था। लगभग छः महीने में ही मैंने पूरा ग्रन्थ पढ़ लिया। उससे खुद ही मुझमें व्याकरण कि सैंस आने लगी।  मुझे विश्वास होने लगा कि मुझे संस्कृत आती थी। फिर तो मुझे संस्कृत का चस्का जैसा लग गया। उसके बाद भागवत पुराण व फिर 108 उपनिषदों को भी इसी तरह तनिक हिंदी अनुवाद की सहायता से मूल संस्कृत में पढ़ लिया। फिर जाकर संस्कृत से मेरा मन भरा। यदि खाली व्याकरण में उलझा रहता, तो कुछ न मिलता। आज भी प्रतिदिन संस्कृत में पुराण का १-२ पृष्ठ पढ़ लेता हूँ। यदि संस्कृत का रोज का अभ्यास बना रहे, तो बहुत अधिक लाभ मिलता है। अतः संस्कृत के जिज्ञासु भाई-बहिनों को सलाह दी जाती है कि वे इसी तरह के योजनाबद्ध रूप में संस्कृत को सीखें, जिससे जल्दी ही  कामयाबी मिल सके। वास्तव में जिनको शुद्ध हिंदी आती है, उनके लिए संस्कृत सीखना बेहद आसान है। हिंदी में संस्कृत के ही शब्द हैं। जब उन शब्दों में सही ढंग से वचन व विभक्तियाँ लगाई जाती हैं, तब वे ही हिंदी-शब्द संस्कृत-शब्द बन जाते हैं।

संस्कृत को बढ़ावा देने का एक अनुपम प्रयास

मैंने अपने आत्मीय मित्र प्रेमयोगी वज्र के अविस्मरणीय सहयोग से “शरीरविज्ञानदर्शनं” नामक एक लघु संस्कृतपुस्तिका को लिखकर संकलित किया। उस  निःशुल्क पुस्तिका का डाऊनलोड लिंक यहाँ दिया जा रहा है।  

   भारतवासियों को पता है कि संस्कृत हमारी प्राचीन भाषा है । हिन्दुओं के धर्मग्रंथ भी इसी भाषा में है । संस्कृत को हम देववाणी भी कहते है ।        

अमेरिका वैज्ञानिकों ने किया शोध, संस्कृत मंत्रों के उच्चारण से बढती है स्मरणशक्ति

नासा के वैज्ञानिकों ने भी यह माना है कि मंत्रों का हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है.

कितना ज़रूरी है मंत्रों का सही उच्चारण?

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कुण्डलिनी से विपासना या विपश्यना

विपश्यना क्या है

क्वोरा पर बहुत से लोग विपासना के बारे में प्रश्न पूछते रहते हैं। इसलिए सोचा कि क्यों न इस बार विपासना पर ही एक एक सुन्दर ब्लॉग-पोस्ट लिख लूं।

विपश्यना का अर्थ है विशेष पश्यना अर्थात एक विशेष प्रकार की नजर। सामान्य नजर तो वही बहिर्मुखी नजर है, जिससे हम-आप सभी लोग देखते हैं। विशेष नजर अंतर्मुखी नजर है, जिससे अपने अन्दर मौजूद विचारों-भावों को देखा जाता है। सामान्य नजर में द्रष्टा का साक्षी भाव नहीं होता, परन्तु विपश्यना में द्रष्टा का साक्षीभाव होता है। सामान्य नजर से बंधन होता है, जबकि विपश्यना से मुक्ति प्राप्त होती है। सामान्य नजर से असली सुख नहीं मिलता, जबकि विपश्यना से असली सुख मिलता है। सामान्य नजर से असली शान्ति नहीं मिलती, जबकि विपश्यना से असली शान्ति मिलती है। यद्यपि यह बात ध्यान रखने योग्य है की विपश्यना का आधार सामान्य नजर ही है, क्योंकि सामान्य नजर से ही मन में वह ढेर सारी सूक्ष्म सामग्री इकट्ठी हो पाती है, जिसके प्रति हम विपश्यना की विशेष नजर को केन्द्रित कर पाते हैं। इसलिए सामान्य नजर का भी अपना अलग महत्त्व है। तभी तो कहा जाता है कि विज्ञान के बिना अध्यात्म लंगड़ा है, तथा अध्यात्म के बिना विज्ञान अंधा है। इसलिए जीवन में विज्ञान व अध्यात्म, दोनों का समुचित मिश्रण होना चाहिए।

विपश्यना से साधना-लाभ कैसे मिलता है

जब हम मन के विचारों-भावों के प्रति अनासक्त हो जाते हैं, तब उससे यह अर्थ निकलता है कि जो कुछ विचारों-भावों से हासिल होता है, वह हमारे अपने पास पहले से ही तो है। अपने विचारों-भावों के इलावा हमारे पास अपना स्वयं का निरपेक्ष रूप/आत्मा ही तो है। अतः विचारों-भावों के सभी गुण आत्मा में उजागर होने लगते हैं, जैसे कि प्रकाश, आनंद, शान्ति आदि। वास्तव में, वे गुण आत्मा में पहले से ही विद्यमान होते हैं, परन्तु भौतिक व मानसिक दुनिया के प्रति आसक्ति के कारण दबे होते हैं। आत्मा के इसी शुद्धीकरण को “भ्रम के काले बादलों का छंटना” या “अज्ञान के काले परदे का हटना” आदि नामों से भी जाना जाता है।

आत्मा के ऊपर से अज्ञान के काले बादल का हटना

हालांकि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आत्मा धीरे-२ साफ हो रही है, जैसे कि रात का अँधेरा सुबह के साथ-२ धीरे-२ साफ होता है। नगण्य मात्रा में आत्मा की सफाई हो भी सकती है (जो प्रत्यक्ष तौर पर नजर नहीं आती), जिससे अद्वैत व शान्ति का अनुभव होता है, पर यह क्षणिक/अस्थायी होती है। सच्चाई यह है कि अचानक ही घुप अन्धकार से भरी आत्मा में प्रकाश छा जाता है, जैसे कि अँधेरे कमरे में प्रकाश बल्ब का स्विच ऑन करने से छा जाता है। वास्तव में सफाई तो मन की होती है, आत्मा की नहीं। आत्मा तो हमेशा साफ है। जब मन पूरी तरह से साफ हो जाता है, या यूं कहो कि मन विचारों के कचरे से रहित हो जाता है, तभी आत्मा के ऊपर पड़ा हुआ काला पर्दा अचानक से हट जाता है। आम आदमी यह देखकर हतोत्साहित हो जाता है कि उसकी आत्मा तो साफ ही नहीं हो रही है। इससे वह साधना के प्रयास को छोड़ देता है।

आम इंसान को एक अन्य गलतफहमी यह होती है कि व्यक्त रूप में ही मन के विचार आत्मा पर पर्दा डालते हैं, अव्यक्त या संस्कार रूप में नहीं। तभी तो अधिकाँश लोग अपने विचारों को बलपूर्वक दबाकर इस भ्रम में रहते हैं कि वे योगी हैं। वास्तव में मन के विचार (आसक्ति के साथ) बड़े दुष्ट होते हैं। ये अपनी सुप्त अवस्था में भी आत्मा को अँधेरे से ढक कर रखते हैं। तभी तो विभिन्न साधनाओं से इन दबे हुए विचारों को उघाड़ कर नष्ट करना पड़ता है। विपासना से यह काम सबसे आसानी से होता है। तभी तो सरल विपासना से सीधे ही, बिना किसी अन्य साधना के आत्मज्ञान हो सकता है, जैसे बुद्ध को हुआ। यह अलग आत है कि आम सांसारिक जीवन में कुण्डलिनी के बिना ऐसा होना संभव प्रतीत नहीं होता।

विपश्यना के प्रकार व उसके लिए सहयोगी कारक

विपश्यना दो प्रकार की है, ऐक्टिव (सक्रिय) और पैसिव (निष्क्रिय)। ऐक्टिव विपश्यना में मन को जिस मानसिक खूंटे (ऐंकर) से बांधा जाता है, वह बलपूर्वक निर्मित किया जाता है। उससे मन हर समय उस खूंटे से चिपका रहता है। उससे मन अपने अन्दर उमड़ने वाले विचारों-भावों की तरफ गहराई से ध्यान नहीं दे पाता, जिससे उसका उनके प्रति अनासक्ति के साथ साक्षीभाव बना रहता है। मन्त्र-जाप, माला-जाप, साँसें, कुण्डलिनी, जप-तप, उपवास, तथा अन्य सभी आध्यात्मिक गतिविधियाँ इसी खूंटे का काम करती हैं।

पैसिव विपश्यना में रोजमर्रा के क्रियाकलापों के दौरान स्वयं ही मन के लिए खूंटा निर्मित होता रहता है। उदाहरण के लिए, ड्राईविंग के दौरान मन सड़क पर लगा होता है, इसलिए उस दौरान उमड़ रहे विचारों-भावों के प्रति स्वयं ही विपश्यना होती रहती है। इसी तरह, अन्य साहसिक गतिविधियों, खेलों, स्पर्धाओं, कलाओं, विद्याओं आदि के दौरान भी होता है। इन गतिविधियों के साथ जितनी अधिक विपश्यना होती है, उतनी ही अधिक उनकी गुणवत्ता मानी जाती है। इनके साथ विपश्यना की मात्रा ही इनकी गुणवत्ता की मात्रा की सूचक हैं। प्रतिभागी की यह विपश्यना साथ रहने वाले लोगों, दर्शकों में भी इंडयूस होती रहती है।

कुण्डलिनी से विपश्यना

कुण्डलिनी (मन में स्थायी रूप से बसने वाली एकाकी छवि) विपश्यना के लिए सर्वोत्तम खूंटा है। यह मानसिक खूंटा ढीला होता रहता है, अतः प्रतिदिन के कुण्डलिनी-योग से इसे मजबूती देते रहना चाहिए।

कुण्डलिनी की सहायता से निष्क्रिय विपश्यना सर्वाधिक प्रभावशाली

प्रेमयोगी वज्र के अन्दर स्वयं ही तांत्रिक कुण्डलिनी चिपक गई थी। वह बहुत मजबूत व स्पष्ट थी। वह लगातार बनी रहती थी। वह एक आकर्षक मानसिक प्रेमिका (तांत्रिक गुरु की संगति में) के रूप में थी। वह मन के लिए एक सर्वाधिक शक्तिशाली खूंटा बनी। अपनी आकर्षकता के कारण, वह मानसिक खूंटे के साथ मानसिक वीडियो प्लेयर का काम भी कर रही थी। उससे प्रेमयोगी वज्र के मन में अपने पिछले जीवन की घटनाएं रंग-बिरंगे चित्रों के रूप में उमड़ रही थीं। सभी चित्र उस आकर्षक खूंटे के सामने फीके पड़ गए थे। सभी के प्रति स्वयं ही विपश्यना हो रही थी, जिससे वे तेजी से आत्मा में विलीन हो रहे थे। उससे उसका आत्मा बहुत तेजी से शुद्ध हो रहा था। अंततः दो साल के भीतर ही वह शून्य जैसा हो गया। अंत में, दिव्य परिस्थितियों के कारण उसका वह अंतिम विचार-रूपी मानसिक खूंटा भी उखड़ गया, जिससे उसे क्षणिक आत्मज्ञान की झलक मिली। इस घटना का विस्तृत वर्णन उसकी हिंदी में पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” व अंग्रेजी में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” में किया गया है।

इससे सिद्ध होता है कि मानसिक खूंटे का आकर्षक होना भी आवश्यक है, ताकि वह मन की गहराइयों में दबे पड़े विचारों-भावों के स्पष्ट चित्रों को उघाड़ता रहे, और वे सभी उसके आगे फीके पड़ने लगे। कुण्डलिनी (विशेषतः तांत्रिक कुण्डलिनी) सबसे अधिक आकर्षक होती है, इसलिए विपश्यना के लिए कुण्डलिनी एक सर्वोत्तम मानसिक खूंटा है। निरंतर ध्यान के साथ इसका आकर्षण बढ़ता ही जाता है। जब सभी कुछ शून्यप्राय हो जाता है, तब आत्मज्ञान के लिए अंतिम छलांग के रूप में उस अंतिम मानसिक खूंटे को भी त्यागना पड़ता है। इसी मूलभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर ही लाखों पुस्तकें व साधनाएं बनी हैं।

विपस्‍सना का अर्थ है: अपनी श्‍वास का निरीक्षण करना, श्‍वास को देखना।      

 
विपस्‍सना ध्‍यान की तीन विधियां: ओशो

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मानवतापूर्ण समस्याएँ भी कुण्डलिनी को क्रियाशील करती हैं

मानवतापूर्ण समस्याएँ क्या हैं

ऐसी समस्याएँ जो सतही या आभासिक होती हैं, तथा जिनसे अपना या औरों का कोई अहित नहीं होता है, वे मानवतापूर्ण समस्याएँ कहलाती हैं। उदाहरण के लिए, किसी को प्रेमसंबंध के टूटने की समस्या का आभास होता है। यद्यपि वास्तविकता यह होती है कि उसका प्रेमप्रसंग कभी चला ही नहीं होता है। ऐसा ही आश्चर्यजनक एहसास प्रेमयोगी वज्र को भी हुआ था, जिससे उसे क्षणिक आत्मजागरण की अनुभूति होने में मदद मिली थी।

अन्य उदाहरण हम उपवास का लेते हैं। वह हमें समस्या की तरह लगता है, जबकि वास्तव में वैसा होता नहीं है। उपवास से शरीर और मन के साथ कुण्डलिनी को भी ऊर्जा मिलती है।

मानवता के लिए समस्या झेलना भी मानवतापूर्ण समस्या है

जप, तप, योग आदि आध्यात्मिक गतिविधियाँ इसका अच्छा उदाहरण हैं। देश, समाज, मानवीय धर्म, परिवार आदि के लिए समस्या सहना मानवीय समस्या है। समस्या से जितनी अधिक सत्यता व शुद्धि के साथ जितने अधिक लोगों का भला होगा, उसकी मानवता उतनी ही अधिक होगी।

मानवतापूर्ण समस्या से क्या होता है

मानवतापूर्ण समस्या से आदमी मानवता से प्रेम करने लगता है। वह सभी मनुष्यों से प्रेम करने लगता है। उसके मन में एक विशेष मनुष्य (गुरु,मित्र,देव आदि) की छवि बस जाती है। समय के साथ वही फिर कुण्डलिनी बन जाती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ। शरीरविज्ञान दर्शन के प्रभाव से चल रही उसकी अति क्रियाशीलता के कारण उसके मन में उन वृद्धाध्यात्मिक पुरुष की छवि पुष्ट होती गई।

मानवीय समस्या से कुण्डलिनी कैसे विकसित होती है

जब कुण्डलिनी मन में काफी मजबूत हो जाती है, तब एक समय ऐसा आता है कि व्यक्ति काम के व कुण्डलिनी के दोहरे बोझ से टूट जैसा जाता है। वैसी स्थिति में जैसे ही कोई बड़ी आभासिक समस्या उसके रास्ते में आए, तो वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के समक्ष आत्मसमर्पण कर देता है, और कुण्डलिनी के आश्रित हो जाता है। इससे उसकी कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है।

क्रियाशील हो चुकी कुण्डलिनी फिर कैसे जागृत होती है

कुण्डलिनी के क्रियाशील हो जाने के बाद समस्याग्रस्त व्यक्ति का मानसिक अवसाद घट जाता है, और आनंद बढ़ जाता है। इससे कुण्डलिनी पर उसका विश्वास बढ़ जाता है, और उसे लगता है कि उसकी कुण्डलिनी से ही उसको सभी समस्याओं से सुरक्षा मिलती है। फिर वह कुण्डलिनी को जागृत करने वाले योग आदि शास्त्रों का अध्ययन और उनका अभ्यास करने लगता है। इससे उसका योग से सम्बंधित ज्ञान और अभ्यास आगे से आगे बढ़ता रहता है। अंततः उसकी कुण्डलिनी जागृत हो जाती है।

प्रेमयोगी वज्र को कैसे समस्या से कुण्डलिनी के लिए एस्केप विलोसिटी मिली

प्रेमयोगी वज्र शरीरविज्ञान दर्शन के प्रभाव से प्राप्त हो रहीं मानवीय समस्याओं, विभिन्न मानवीय कामों और कुण्डलिनी के बोझ से टूट जैसा गया था, शारीरिक रूप से। उसकी स्मरणशक्ति भी काफी घट गई थी। यद्यपि उसके मन में आनंद व शान्ति काफी बढ़ गए थे। फिर उसे घर से बहुत अधिक दूर सपरिवार शान्ति के साथ एक मनोरम स्थान पर रहने का मौक़ा मिला। घर से वहां तक आवागमन के लिए उसने अत्याधुनिक व बहुत महंगी गाड़ी खरीदी। उसको उसमें ड्राईवर सीट कम्फर्ट नहीं मिला। वह बहुत पछताया, पर जो होना था, वह हो चूका था। अपने को संभालने के लिए वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के सहारे होकर मन में उसका ध्यान करने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी चमकने लगी, और उसकी चिंता लगभग समाप्त ही हो गई। इससे आश्वस्त होकर वह ई-बुक्स, पेपर बुक्स, इंटरनेट व मित्रों की मदद से योग सीखने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी एक साल में ही बहुत मजबूत हो गई। उसके अंतिम एक महीने में यौनयोग की सहायता लेने पर वह जागृत हो गई। उसके बाद वह अपनी गाड़ी का अभ्यस्त हो गया, तथा उसे पता चला कि उसकी गाड़ी का कम्फर्ट दरअसल अन्य गाड़ियों से कहीं अधिक था। इसका अर्थ है कि उसकी समस्या असली नहीं बल्कि आभासिक थी, जो उसकी कुण्डलिनी को जगाने के लिए उसके अन्दर पैदा हुई थी।

कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है।

आभासिक समस्या सफलता के लिए भरपूर कोशिशों के बाद होनी चाहिए

यदि थोड़े से एफर्ट्स के बाद ही समस्या का सामना करना पड़े, तब आदमी का विश्वास विविधतापूर्ण दुनियादारी पर बना रहता है, और वह कुण्डलिनी के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण नहीं करता। परन्तु जब भरपूर प्रयास करने के बाद भी आदमी को हानि का ऐहसास होता है, तब दुनिया से उसका विश्वास उठ जाता है, और वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के सामने घुटने टेक देता है, ताकि बिना भौतिक मशक्कतों के ही उसे प्राण-रस या जीवन-रस मिलता रहे। यह सिद्धांत है कि भरपूर प्रयासों के बाद आने वाली समस्याएँ आभासिक या सकारात्मक ही होती हैं, वास्तविक या नकारात्मक नहीं।

इस कुंडलिनी उत्प्रेरक समस्या को भौतिक दुनियादारी के प्रति सकारात्मक और अस्थायी अविश्वास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है

इस कुंडलिनी उत्प्रेरक समस्या को बहुत से लोग भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक आघात / ट्रामा के रूप में परिभाषित करते हैं। हालांकि यह वास्तव में आघात नहीं है, क्योंकि आघात तो व्यक्ति को नीचे गिराता है, कुंडलिनी की असीमित ऊंचाइयों तक नहीं उठाता। वास्तव में इसे भौतिक दुनिया के प्रति विश्वास के सकारात्मक और अस्थायी रूप से क्षीण होने के रूप में कहा जाना चाहिए, जो कि व्यक्ति को कुंडलिनी {एकमात्र मानसिक छवि} की मानसिक दुनिया की ओर प्रेरित करता है।

तंत्र के अनुसार भौतिक दुनियादारी से मन भरने पर ही कुण्डलिनी आसानी से प्राप्त होती है

एक व्यक्ति को जीवन के हरेक क्षेत्र का अनुभव होना चाहिए {जैसा प्रेमयोगी वज्र को था}, नहीं तो भौतिक दुनिया के प्रति लालसा से उसका मन दुनिया में रमा रहेगा। वह पार्याप्त रूप से समृद्ध भी होना चाहिए {जैसा प्रेमयोगी वज्र था}, नहीं तो उसे कमाई की चिंता बनी रहेगी, जिससे उसका मन दुनिया से नहीं हटेगा। सीधी सी तंत्रसम्मत बात है कि जिसका मन भौतिक दुनिया की सकारात्मक, कर्मपूर्ण व मानवीय रंगीनियों से भर गया हो, उसे ही उससे ऊपर उठने का मौक़ा आसानी से मिलता है।

कुण्डलिनी के विलयन से आत्मज्ञान

योग-साधना करते-२ एक समय ऐसा आता है, जब कुण्डलिनी आत्मा में विलीन होने लगती है। तब व्यक्ति का विश्वास कुण्डलिनी से भी हटकर आत्मा पर केन्द्रित हो जाता है। उसके दौरान ही उसे क्षणिक आत्मज्ञान हो जाता है। ऐसा ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था, जिसका वर्णन उसने अपनी हिंदी में पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” तथा अंग्रेजी में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” में विस्तार के साथ किया है।

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मानवता से भरी हुई ख़ुशी ही असली व कुण्डलिनी से जुड़ी हुई ख़ुशी है

वैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि मानवता से भरी हुई ख़ुशी से ही मानव का विकास होता है। यही बात वैदिक संस्कृति में व विभिन्न धर्मों में शुरू से लेकर कही जा रही है। उन्होंने तीन प्रकार के लोगों के समूहों के जीनोम का अध्ययन किया। उन्होंने साधारण समूह के साधारण जीनोम को मापा। वह जीनोम साधारण था। फिर उन्होंने उसमें से दो समूह बनाए। एक समूह को मानवता से भरी  हुई ख़ुशी (Eudaimonic) अपनाने को कहा तो दूसरे समूह को स्वार्थ से भरी हुई ख़ुशी अपनाने को। जब उनके जीनोम को मापा गया, तो उन्होंने पाया कि मानवता वाले समूह का जीनोम तेज गति से अभिव्यक्त/विकसित हो रहा था, जबकि स्वार्थ से भरी हुई ख़ुशी (Hedonic) वाले समूह का जीनोम वैसा ही था।

तो क्या कुण्डलिनी से भी जीनोम विकसित होता है?

मानवता की भावना से भी जीनोम विकसित होता है, यद्यपि मानवता से भरे हुए कर्मों की अपेक्षा कम गति से। वास्तव में आदमी भावनामय ही है। कर्म से भी भावना ही निर्मित होती है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि मानवता से भरी हुई भावना प्रबल हो, तो उससे जीनोम का विकास मानवता से भरे हुए कर्मों से भी आधिक हो सकता है। कुण्डलिनी (मानव रूप/गुरु/देवता/प्रेमी की स्पष्ट व स्थिर मानसिक छवि) भी तो मानवता से भरी हुई प्रबल भावना ही है। इसके विपरीत, यदि मानवता से भरे हुए कर्मों से मानवता से भरी भावना का निर्माण न हो रहा हो, तो उस कर्म से जीनोम के लिए विशेष लाभ प्रतीत नहीं होता।

वैदिक संस्कृति में मानवता से भरी भावना पर जोर

इन्हीं उपरोक्त कारणों से संस्कृत मन्त्रों को भावनामय बनाया गया। वे एकदम से प्रबल मानवता की भावना को विकसित करते हैं। कई बार उनके सामने मानवता से भरे हुए कर्म भी बौने पड़ जाते हैं।

कुण्डलिनी व मानवता से भरी हुई भावना के बीच में सम्बन्ध

कुण्डलिनी परम प्रेम का प्रतीक है। प्रेम ही मानवता का सबसे प्रमुख मापदंड है। इसका अर्थ है कि कुण्डलिनी योग से भी जीनोम विकसित होता है। यह वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित है। मानवता से भरी हुई ख़ुशी से भी जीनोम धीरे-धीरे विकसित होता हुआ एक ऐसी आवस्था पर पहुँच जाता है, जो कुण्डलिनी को सक्रिय कर देता है। कुण्डलिनी जागरण से तो जीनोम के विकास को एकदम से पंख लग जाते हैं।

वैदिक संस्कृति में मानवता की भावना के कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण

यत्पिंडे तत्ब्रम्हांडे

इसका अर्थ है कि जो कुछ ब्रम्हांड में है, वह सभी कुछ हमारे अपने शरीर में भी है।

पुरुषसूक्त

इसमें ब्रम्हांडरूपी मानव शरीर का वर्णन किया गया है।

सर्वदेवमया धेनुः

इसका अर्थ है कि गाय के शरीर में सभी देवता विद्यमान हैं। इसलिए गाय आदि जीवों की सेवा करने से सभी देवताओं की अर्थात पूरी सृष्टि की सेवा हो जाती है। इससे परम मानवता से भरी भावना विकसित होती है।

शक्तिपीठ

देवी के बहुत से शक्तिपीठ हैं। जिस भूमि-स्थान पर देवी के शरीर का कोई विशेष अंग गिरा है, वह एक विशेष शक्तिपीठ के रूप में प्रख्यात हुआ है। नैनादेवी नामक शक्तिपीठ में देवी के नयन गिरे हैं। इसी तरह ज्वालाजी में देवी की जिह्वा गिरी है। इसी तरह और भी हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि जब एक विशेष भूमि-स्थान देवी के एक अंग के रूप में है, तब वहां रहने वाले सभी प्राणी विशेषकर मनुष्य उस अंग के घटक/देहपुरुष (कोशिकाएं, जैव-रसायन आदि) हैं। इसलिए सभी सेव्य हैं। यह दर्शन पूरी तरह से शरीरविज्ञान दर्शन से मेल खता है।

शरीरविज्ञान दर्शन सम्मत मन्त्र

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः, सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं। 
पूजा ते विषयोपभोग रचना, निद्रा समाधिः स्थितिः।।
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः, स्तोत्राणि सर्वौ गिरौ।
यत्यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनं।।

यह उपरोक्त मन्त्र भी शरीर को संपूर्ण सृष्टि के रूप में दिखा रहा है, तथा इसकी सेवाचर्या को ईश्वर की अराधना बता रहा है।

निष्कर्ष

उपरोक्तानुसार भावना करते रहने से अपने लिए स्वार्थपूर्ण ढंग से किए गए सभी काम भी पूरे ब्रम्हांड के लिए किए गए काम बन जाते हैं। प्रेमयोगी वज्र द्वारा रचित शरीरविज्ञान दर्शन में भी यह तथ्य वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया जा चुका है।

शरीरविज्ञान दर्शन से मानवता की भावना

इस दर्शन में वैज्ञानिक रूप से दिखाया गया है कि किस प्रकार हमारे अपने शरीर में सभी प्रकार के प्राणी, सभी प्रकार की संरचनाएं व सभी प्रकार के क्रियाकलाप मौजूद होते हैं। हमारे अपने शरीर में भी विविध प्रकार की विशाल पर्वतमालाएं, व जल-स्रोत हैं। बड़े-२ उद्योग हैं। व्यापक कृषिसंपन्न भूभाग हैं। घने जंगल हैं, जिनमें चित्र-विचित्र जंगली जानवर निवास करते हैं। लोगों की विकसित सभ्यता है। अनेक प्रकार के कार्यकारी विभाग हैं, जैसे कि जल-विभाग, संचार-विभाग आदि-२। इसमें हर समय देवासुर संग्राम चलता रहता है। अलौकिक प्रेम-प्रसंग भी देखने को मिलते रहते हैं। इस वैज्ञानिक दर्शन को भलीभांति समझ जाने पर आदमी सदा के लिए प्रसन्न व मानवतावादी बन जाता है। उसके द्वारा अपने शरीर की भलाई के लिए किए गए सारे क्रियाकलाप स्वयं ही पूरी सृष्टि की भलाई के लिए किए गए क्रियाकलाप बन जाते हैं। अगर तो शरीरविज्ञान दार्शनिक कर्म भी दूसरे जीवों की भलाई के लिए करने लगे, तब तो इस दर्शन से और भी अधिक लाभ मिलता है। इससे उसका जीनोम शीघ्र विकसित होकर उसकी कुण्डलिनी को सक्रिय कर देता है।  

Interestingly, molecular analysis of hedonic and eudaimonic individuals revealed quite different gene expression patterns. Individuals with high hedonic happiness showed increased pro-inflammatory gene expression and decreased expression of genes associated with antibody synthesis ——

Different Molecular Profiles of Eudaimonic and Hedonic Happiness

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अवसादरोधक दवा से कुण्डलिनी लाभ

अवसादरोधक दवा कैसे काम करती है

प्रेमयोगी वज्र प्रचंड दुनियादारी में उलझा हुआ व्यक्ति था। उससे उसका मन बहुत अशांत हो गया था। यद्यपि वह शरीरविज्ञान दर्शन की सहायता से उसे काफी हद तक काबू कर रहा था। परन्तु फिर भी वह पूरी तरह से काबू नहीं हो पा रहा था। एक बार वह गंभीर गैस्ट्राइटीस के वहम से एंडोस्कोपी करवाने गया। चिकित्सक ने उसकी मनोदशा को समझते हुए उसे डेढ़ महीने की अवसादरोधक व क्रोधनाशक दवा (नाम याद नहीं) प्रेस्क्राईब कर दी। उसे उसको खाते हुए अपने अवसाद व क्रोध में काफी कमी महसूस हो रही थी। उसने गूगल पर पढ़ लिया था कि एक महीने तक रोजाना खाने पर ही इस दवा का प्रभाव स्थाई बन पाता है। अतः वह दवा को खाता रहा। उसे लग रहा था कि जो काम आध्यात्मिक पुस्तक शरीरविज्ञान करती थी, वही काम वह दवा भी कर रही थी। यद्यपि दवा का काम कुछ ज्यादा ही जड़ता, उग्रता, स्मरणशक्ति की कमी, और कृत्रिमता से भरा हुआ था। उसे आत्मजागरण व कुण्डलिनीजागरण का अद्वैतकारक प्रभाव भी अवसादरोधी दवा के अद्वैतकारक प्रभाव से मिलता-जुलता लगा, यद्यपि शुद्धता और स्तर में अंतर के साथ। एकहार्ट टोल्ले ने भी लगभग ऐसा ही बयान किया है कि अवसादरोधी दवा का प्रभाव आत्मजागरण के प्रभाव जैसा होता है, यद्यपि तुलनात्मक रूप से बहुत निम्न दर्जे का और उग्रता के साथ।

वह लम्बी खांसी से परेशान था

उसने बहुत सी एंटीबायोटिक दवाइयां खाईं, पर खांसी ठीक नहीं हुई। वह समझ रहा था कि एंटीबायोटिक दवाइयाँ काम नहीं कर रही थीं, जीवाणुओं के प्रतिरोध के कारण। वास्तव में उसकी खांसी की वजह क्रोनिक गेस्ट्राइटीस थी। जब उसने 1 महीने तक पेंटोपराजोल और डॉमपेरिडोन दवाइयां खाईं तथा योग करने के साथ कुछ सावधानियां बरतीं; तब उसकी खांसी जड़ से ख़त्म हो गई। आजकल के तनाव भरे जीवन में यह समस्या विकराल हो गई है, जिस बारे में अधिकाँश लोग गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं।

I don’t see it as a road to true and lasting awakening, but it can give people a glimpse of freedom from the prison of their conceptual mind (a worth reading interview with Eckhart tolle)…………..

INTERVIEW WITH ECKHART TOLLE

मस्तिष्कप्रभावी दवाओं से रूपांतरण

शरीरविज्ञान दर्शन एक अद्वैतवादी सोच है। इससे सिद्ध होता है कि वह दवा अद्वैत को उत्पन्न कर रही थी। माईंड अल्टरिंग ड्रग्स भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए पावर ब्रेक की तरह काम करती है, जिससे मस्तिष्क के सॉफ्ट टिशू को नुक्सान पहुँच सकता है। उसे अपनी स्मरणशक्ति कम होती हुई महसूस हो रही थी। क्रोध के समय तो उसका मस्तिष्क जवाब देने लगता था, इसलिए वह क्रोध कर ही नहीं पाता था। क्रोध से उसका मस्तिष्क दबावयुक्त, भारी, सुस्त, और अंधकारमय सा हो जाता था। शारीरिक रूप से भी वह  शिथिल व कमजोर जैसा रहने लग गया था। उसकी कार्यक्षमता काफी घट गई थी। वह अपने अचानक  हुए परिवर्तन को देखकर हैरान था। इसलिए उसने 30-35 दिन के बाद वह दवा बंद कर दी, और बची हुई दवा कूड़ेदान में डाल दी। यद्यपि उसका रूपांतरण स्थायी रूप से हो गया था। वह पिछली अवस्था में कभी भी वापिस नहीं लौट पाया।

अवसादरोधक दवा आनंद व अद्वैत को कैसे उत्पन्न करती है?

इससे व्यक्ति किसी के भी बारे में गहराई से नहीं सोच पाता, और न ही ढंग से विश्लेषण या जजमेंट कर पाता है। इससे सभी वस्तु-विचारों के प्रति स्वयं ही साक्षीभाव पैदा हो जाता है। उससे आनंद पैदा होता है। साथ में, विश्लेषण व जजमेंट की कमी से सभी वस्तु-विचारों के बीच का अंतर मिटने लगता है, जिससे सभी कुछ एक जैसा लगने लगता है। यही तो अद्वैत है। यह सब ऐसे ही होता है, जैसे शराब के हल्के नशे में होता है। सीधा सा मतलब है कि मेडीटेशन बुद्धि-शक्ति को बढ़ा कर अद्वैतभाव को उत्पन्न करती है, जबकि मस्तिष्क-परिवर्तक दवाएं बुद्धि-शक्ति को घटा कर। फिर भी ये दवाएं आध्यात्मिक जागरण की झलक तो दिखा ही देती हैं। उस झलक का पीछा करते हुए आदमी वास्तविक आत्म-जागरण को भी प्राप्त कर सकता है।

मस्तिष्क-परिवर्तक दवाओं से ध्यान लगाने में कैसे सहायता मिलती है?

अपनी मानसिक गतिविधियों के अचानक ही बहुत धीमा पड़ने से प्रेमयोगी वज्र को आश्चर्य भी हुआ, और कुछ दुःख भी। वह अपनी पूर्ववत मानसिकता को प्राप्त करने के उपाय सोचने लगा। वह मानसिकता उसकी याददाश्त से जुड़ी हुई थी, जो ड्रग के प्रभाव से काफी कम हो गई थी। उसे कुछ समय के लिए एक ऐसे व्यक्ति की संगति मिल गई, जो नियमित रूप से योगासन करता था। उसे देखकर वह भी करने लगा। धीरे-२ उसे अभ्यास हो गया। वह इंटरनेट व पुस्तकों की मदद भी लेने लगा। उसमें मानसिक शक्ति तो पहले की तरह प्रचुर थी, परन्तु वह कहीं लग नहीं रही थी। इसका कारण यह था कि वह दवा के प्रभाव से उन पिछली बातों व घटनाओं को भूल गया था, जिनसे उसकी मानसिक शक्ति जुड़ कर क्षीण होती रहती थी। दवा से उसका पिछला संसार मिट जाने से उसकी प्रचंड मानसिक शक्ति उससे मुक्त हो गई थी। इसीलिए उसे महसूस नहीं हो रही थी। योग की सहायता से वह छुपी हुई व भरपूर मानसिक शक्ति उसकी कुण्डलिनी को स्वयं ही लगने लगी। इससे वह समय के साथ जागृत हो गई।

दुनियादारी की मानसिकता का कुण्डलिनी-मानसिकता के रूप में प्रकट होना

कुण्डलिनीयोग से उसे अपनी खोई हुई पुरानी मानसिकता प्राप्त हो गई। यद्यपि वह पहले की तरह अद्वैतपूर्ण दुनियादारी के रूप में नहीं थी, अपितु वह अकेली कुण्डलिनी के रूप में थी। समस्त मानसिक शक्ति एकमात्र कुण्डलिनी को लगने से वह जागृत हो गई।

प्रबल मानसिकता की प्राप्ति केवलमात्र अद्वैतभाव से संभव

यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रबल, अविरल व स्थायी मानसिकता केवल अद्वैतपूर्ण दुनियादारी से ही संभव है। द्वैतपूर्ण व्यवहार से मानसिकता चरम के निकट पहुँचने से पहले ही क्षीण होती रहती है। इससे सिद्ध होता है कि प्रेमयोगी वज्र का अद्वैतपूर्ण जीवन-व्यवहार (geetaa-ukt karmayoga)  भी उसके कुण्डलिनी-जागरण में सहायक बना।

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