कुंडलिनी योग दर्शन को दर्शाती कार्टून फ़िल्म राया एंड द लास्ट ड्रेगन

सभी को श्री गुरु नानकदेव के प्रकाश पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं

दोस्तों, मैं पिछली पोस्टों में ड्रेगन के कुंडलिनी प्रभावों के बारे में बात कर रहा था। इसी कड़ी में मुझे एनीमेशन मूवी राया एंड द लास्ट ड्रेगन देखने का मौका मिला। इसमें मुझे एक सम्पूर्ण योगदर्शन नजर आया। अब यह पता नहीं कि क्या इस फ़िल्म को बनाते समय योगदर्शन की भी किसी न किसी रूप में मदद ली गई या मुझे ही इसमें नजर आया है। जहाँ तक मैंने गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि दक्षिण पूर्वी एशियाई (थाईलैंड आदि देश) जनजीवन से इसके लिए प्रेरणा ली गई है, किसी योग वगैरह से नहीं। थाईलैंड में वैसे भी योग काफी लोकप्रिय हो गया है। इसमें एक ड्रेगन शेप की नदी या दुनिया होती है। उसमें एक हर्ट नामक कुमान्द्रा लैंड होती है। वहाँ सब मिलजुल कर रहते हैं। हर जगह ड्रेगन्स का बोलबाला होता है। ड्रेगन सबको ड्रन अर्थात बवंडर नामक पापी राक्षस से बचाती है। ड्रन लोगों की आत्मा को चूसकर उन्हें निर्जीव पत्थर बना देते हैं। ड्रेगन उन ड्रन राक्षसों से लड़ते हुए नष्ट हो जाती हैं। फिर पांच सौ साल बाद वे ड्रन फिर से हमला कर देते हैं। हर्ट लैंड के पास ड्रेगन का बनाया हुआ रत्न होता है, जो ड्रन से बचाता है। वह पत्थर बने आदमी को तो जिन्दा कर सकता है, पर पत्थर बनी ड्रेगनस को नहीं। दूरपार के कबीले उस रत्न की प्राप्ति के लिए हर्ट लैंड के कबीले से अलग होकर नदी के विभिन्न भागों में बस जाते हैं। उन कबीलों के नाम होते हैं, टेल, टेलन, स्पाइन और फैंग। टेलन ट्राइब ने तो ड्रन से बचने के लिए अपने घर नदी पे बनाए होते हैं। दरअसल पानी में ड्रेगन का असर नहीं होता है, जिससे ड्रन वहाँ नहीं पहुंच पाता। हर्ट कबीले का मुखिया बैंज चाहता है कि सभी कबीले इकट्ठे होकर समझौता कर के फिर से कुमान्द्रा बना ले, जिसमें सभी मिलजुल कर ड्रन से सुरक्षित रहें। इसलिए वह समारोह का आयोजन करता है जिसमें वह सभी कबीलों को बुलाता है। वहाँ फैंग कबीले का एक बच्चा बैंज की बेटी राया को धोखा देकर सभी कबीलों के लोगों को रत्न तक पहुंचा देती है। वे सभी रत्न के लिए आपस में लड़ने लगते हैं। इससे रत्न पांच टुकड़ों में टूट जाता है। हरेक कबीले के हाथ एक-एक टुकड़ा लगता है। रत्न के टूटने से ड्रन सब पर हमला कर देता है। सब जान बचाने को इधर-उधर भागते हैं। बैंज भी पुल पर खड़े होकर रत्न का टुकड़ा अपनी बेटी को देकर यह कहते हुए उसे नदी में धक्का देता है कि वह कुमान्द्रा बना ले और वह खुद ड्रन के हमले से पत्थर बन जाता है। छः सालों बाद राया नदी का किनारा ढूंढने किश्ती में जा रही होती है ताकि अंतिम ड्रेगन सिसू कहीं मिल जाए। उसे वह रेगिस्तान जैसे टेल कबीले के नजदीक अचानक मिलती है। सिसू उसे बताती है कि वह रत्न उसके भाई बहिनों ने बनाकर उसे सौम्पा था, उसपर विश्वास करके। वह पाती है कि जब वह एक टुकड़ा रखती है तो वह अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकती है। हरेक टुकड़ा उसकी अलग किस्म की शक्ति को क्रियाशील करता है। वह सिसू की मदद से वहाँ के मंदिर में रत्न का दूसरा टुकड़ा ढूंढ लेती है। इससे सिसू ड्रेगन को आदमी के रूप में आने की शक्ति मिल जाती है। फिर फैंग कबीले से बचते हुए वे स्पाइन कबीले में पहुंचते हैं। इस यात्रा में राया को पांच छः दोस्त भी मिल जाते हैं, जिनमें कोई तो बच्चे की तरह तो कोई बंदर की तरह और कोई मूर्ख जैसा होता है, हालांकि सभी ताकतवर होते हैं। शक्तिशाली फैंग कबीले की राजकुमारी नमारी से सिसू लड़ना नहीं चाहती, और उसे तोहफा देकर समझाना चाहती है। जब सिसू उसे रत्न के टुकड़े दिखा रही होती है, तब नमारी धोखे से उसपर तीरकमान साध लेती है। डर के मारे राया उसपर जैसे ही तलवार से हमला करने लगती है, वह वैसे ही तीर चला देती है, जिससे सिसू मरकर नदी में गिर जाती है। सारा पानी सूखने लगता है और ड्रन के हमले एकदम से बढ़ जाते हैं। राया के सभी दोस्त और नमारी भी अपने-अपने रत्न के टुकड़े से ड्रन को भगाने लगते हैं, पर कब तक। वे टुकड़े भाप में गायब हो रहे होते हैं। तभी राया को सिसू की बात याद आती है कि रत्न के टुकड़े जोड़ने के लिए विश्वास भी जरूरी है। इसलिए वह नमारी को रत्न का टुकड़ा थमाती है, और खुद पत्थर बन जाती है। राया को देखकर उसके दोस्त भी नमारी को टुकड़े सौम्प कर खुद पत्थर बन जाते हैं। अंत में नमारी भी अपना टुकड़ा उनमें जोड़कर खुद भी पत्थर बन जाती है। रत्न पूरा होने पर चारों ओर प्रकाश छा जाता है, राया के पिता बैंज समेत सभी पत्थर बने लोग जिन्दा हो जाते हैं। सभी पत्थर बनी ड्रेगन्स भी जिन्दा हो जाती हैं। कुमान्द्रा वापिस लौट आता है, और सभी लोग फिर से मिलजुल कर रहने लगते हैं।

राया एन्ड द लास्ट ड्रेगन का कुंडलिनी-आधारित स्पष्टीकरण

यह चाइनीस ड्रेगन कम और कुंडलिनी तंत्र वाला नाग ज्यादा है। यही सुषुम्ना नाड़ी है। मैं पिछली एक पोस्ट में बता रहा था कि दोनों एक ही हैं, और कुंडलिनी शक्ति को रूपांकित करते हैं। वह रीढ़ की हड्डी जैसे आकार का है, और पानी में मतलब स्पाइनल कॉर्ड के सेरेबरोस्पाइनल फ्लूड में रहता है। मेरुदण्ड में कुंडलिनी शक्ति के प्रवाह से ड्रन-रूपी या पापरूपी बुरे विचार दूर रहते हैं। कुमान्द्रा वह देह-देश है, जिसमें सभी किस्म के भाव अर्थात लोग मिलजुल कर रहते हैं। विभिन्न चक्र ही विभिन्न कबालई क्षेत्र हैं, और उन चक्रोँ पर स्थित विभिन्न मानसिक भाव व विचार ही विभिन्न कबालई लोग हैँ। कुमान्द्रा दरअसल कुंडलिनी योग की अवस्था है, जिसमें सभी चक्रोँ पर कुंडलिनी शक्ति अर्थात ड्रेगन को एकसाथ घुमाया जाता है। हरेक चक्र के योगदान से इस कुंडलिनी शक्ति से एक कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र चमकने लगता है। यह कभी किसी चक्र पर तो कभी किसी दूसरे चक्र पर प्रकट होता रहता है। यही वह रत्न है जो द्वैत रूपी ड्रन से बचाता है। आदमी ने उस कुंडलिनी चित्र को केवल अपने हृदय में धारण किया हुआ था। मतलब आदमी साधारण राजयोगी की तरह था, तांत्रिक कुंडलिनी योगी की तरह नहीं। इससे हर्ट लैंड के लोग मतलब हृदय की कोशिकाएं तो शक्ति से भरी थीं, पर अन्य चक्रोँ से संबंधित अंग शक्ति की कमी से जूझ रहे थे। इसलिए स्वाभाविक है कि वे हर्ट कबीले से शक्तिस्रोत रत्न को चुराने का प्रयास कर रहे थे। एकबार हर्टलैंड के मुखिया बैंज मतलब जीवात्मा ने सभी लोगों को दावत पे बुलाया मतलब सभी चक्रोँ का सच्चे मन से ध्यान किया। पर उन्होंने मिलजुल कर रहने की अपेक्षा छीनाझपटी की और रत्न को तोड़ दिया, मतलब कि आदमी ने निरंतर के तांत्रिक कुंडलिनी योग के अभ्यास से सभी चक्रोँ को एकसाथ कुंडलिनी शक्ति नहीं दी, सिर्फ एकबार ध्यान किया या सिर्फ साधारण अर्थात अल्पप्रभावी कुंडलिनी योग किया। इससे स्वाभाविक है कि शक्ति तो चक्रोँ के बीच में बंट गई, पर कुंडलिनी चित्र गायब हो गया, मतलब वह निराकार शक्ति के रूप में सभी पांचोँ मुख्य चक्रोँ पर स्थित हो गया अर्थात रत्न पांच टुकड़ों में टूट गया और एक टुकड़ा हरेक कबीले के पास चला गया। इस शक्ति से सभी चक्रोँ के लोग जिन्दा तो रह सके थे, पर अज्ञान रूपी ड्रन से पूरी तरह से सुरक्षित नहीं थे, क्योंकि रत्न रूपी सम्पूर्ण कुंडलिनी चित्र नहीं था। अज्ञान से तो ध्यान-चित्र रूपी रत्न ही बचाता है। ध्यान-चित्र अर्थात रत्न के छिन जाने से बैंज नामक आत्मा तो अज्ञान के अँधेरे में डूब गई मतलब वह मर गया, पर उसने बेटी राया मतलब बुद्धि को बचीखुची कुंडलिनी शक्ति का प्रकाश मतलब रत्न का टुकड़ा देकर कहा कि वह शरीर-रूपी दुनिया में पुनः कुमान्द्रा मतलब अद्वैतवाद अर्थात मेलजोल स्थापित करे। राया मतलब बुद्धि फिर पानी मतलब सेरेबरोस्पाइनल फ्लूड या मेरुदण्ड के ध्यान में छलांग लगा देती है, जहाँ कुंडलिनी शक्ति मतलब सिसू ड्रेगन के प्रभाव से वह ड्रन से बच जाती है। दरअसल चक्रोँ के ध्यान को ही ध्यान कहते हैं। चक्र पर ध्यान को आसान बनाने के लिए बाएं हाथ से चक्र को स्पर्ष कर के रखा जा सकता है, क्योंकि दायां हाथ तो प्राणायाम के लिए नाक को स्पर्ष किए होता है। इससे खुद ही कुंडलिनी चित्र का ध्यान हो जाता है। यही हठयोग की विशिष्टता है। राजयोग में ध्यान-चित्र का ध्यान जबरदस्ती और मस्तिष्क पर बोझ डालकर करना पड़ता है, जो कठिन लगता है। जैसे चक्र का ध्यान करने से खुद ही ध्यानचित्र का ध्यान होने लगता है, उसी तरह मेरुदण्ड में स्थित नागरूपी सुषुम्ना नाड़ी का ध्यान करने से भी कुंडलिनी चित्र का ध्यान खुद ही होने लगता है। स्पर्ष में बड़ी शक्ति है। सुषुम्ना का स्पर्ष पीठ की मालिश करवाने से होता है। ऐसे बहुत से आसन हैं, जिनसे सुषुम्ना पर दबाव का स्पर्ष महसूस होता है। जो कुर्सी पूरी पीठ को अच्छे से स्पर्ष करके भरपूर सहारा देती है, वह इसीलिए आनंददायी लगती है, क्योंकि उस पर सुषुम्ना क्रियाशील रहती है। जो मैं ओरोबोरस सांप वाली पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे एकदूसरे के सहयोग से पुरुष और स्त्री दोनों ही अपने शरीर के आगे वाले चैनल में स्थित चक्रोँ के रूप में अपने शरीर के स्त्री रूप वाले आधे भाग को क्रियाशील करते हैं, वह सब स्पर्श का ही कमाल है। राया को उस नदी अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में ड्रेगन रूपी शक्ति का आभास होता है, इसलिए वह उसकी खोज में लग जाती है। उसे वह टेल आईलैंड में छुपी हुई मतलब उसे शक्ति मूलाधार चक्र में निद्रावस्था में मिल जाती है। उस ड्रेगन रूपी कुंडलिनी शक्ति की मदद से वह रत्न के टुकड़ों को मतलब कुंडलिनी चित्र को उपरोक्त टापुओं पर मतलब शक्ति के अड्डों पर मतलब चक्रोँ पर ढूंढने लगती है। एक टुकड़ा तो उसके पास दिल या मन या आत्मा या सहस्रार रूपी बैंज का दिया हुआ है ही, सदप्रेरणा के रूप में। आत्मा दिल या मन में ही निवास करती है। दूसरा टुकड़ा उसे टेल आईलैंड के मंदिर मतलब मूलाधार चक्र पर मिल जाता है। इससे ड्रेगन मानव रूप में आ सकती है, मतलब वीर्यबल से कुंडलिनी शक्ति पूरी सुषुम्ना नाड़ी में फैल गई, जो एक फण उठाए नाग या मानव की आकृति की है। टेलन द्वीप के लोग पानी के ऊपर रहते हैं, मतलब फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र के बॉडी सेल्स तरल वीर्य से भरे प्रॉस्टेट के ऊपर स्थित होते हैं। फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र एक पुल जैसे नाड़ी कनेक्शन से रियर स्वाधिष्ठान चक्र से जुड़ा होता है। इसे ही टेलन द्वीप के लोगों का नदी के बीच में बने प्लेटफॉर्म आदि पर घर बना कर रहना बताया गया है। इसी नदी जल रूपी तरल वीर्य की शक्ति से इस द्वीप रूपी चक्र पर ड्रन रूपी अज्ञान या निकम्मेपन का प्रभाव नहीं पड़ता। पुल से गुजरात राज्य के मोरबी का पुल हादसा याद आ गया। हाल ही में एक लोकप्रिय हिंदु मंदिर से जुड़े उस झूलते पुल के टूटने से सौ से ज्यादा लोग नदी में डूब कर मर गए। उनमें ज्यादातर बच्चे थे। सबसे कम आयु का बच्चा दो साल का बताया जा रहा है। टीवी पत्रकार एक ऐसे छोटे बच्चे के जूते दिखा रहे थे, जो नदी में डूब गया था। जूते बिल्कुल नए थे, और उन पर हँसते हुए जोकर का चित्र था। बच्चा अपने नए जूते की खुशी में पुल पर आनंद में खोया हुआ कूद रहा होगा, और तभी उसे मौत ने अपने आगोश में ले लिया होगा। मौत इसी तरह दबे पाँव आती है। इसीलिए कहते हैं कि मौत को और ईश्वर को हमेशा याद रखना चाहिए। दिल को छूने वाला दृश्य है। जो ऐसे हादसों में बच जाते हैं, वे भी अधिकांशतः तथाकथित मानसिक रूप से अपंग से हो जाते हैं। मैं जब सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ता था, तब हमें अंग्रेजी विषय पढ़ाने एक नए अध्यापक आए। वे शांत, गंभीर, चुपचाप, आसक्ति-रहित, और अद्वैतशील जैसे रहते थे। कुछ इंटेलिजेंट बच्चों को तो उनके पढ़ाने का तरीका धीमा और पिछड़ा हुआ लगा पहले वाले अध्यापक की अपेक्षा, पर मुझे बहुत अच्छा लगा। सम्भवतः मैं उनके तथाकथित आध्यात्मिक गुणों से प्रभावित था। प्यार से देखते थे, पर हँसते नहीं थे। कई बार कुछ सोचते हुए कहा करते थे कि कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए, इस जीवन में क्या रखा है आदि। बाद में सुनने में आया कि जब वे अपने पिछले स्कूल में स्कूल का कैश लेके जा रहे थे, तब कुछ बदमाशों ने उनसे पैसे छीनकर उन्हें स्कूटर समेत सड़क के पुल से नीचे धकेल दिया था। वहाँ वे बेहोश पड़े रहे जब उनकी पत्नि ने उन्हें ढूंढते हुए वहाँ से अस्पताल पहुंचाया। डरे हुए और मजबूर आदमी के तरक्की के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, यहाँ तक कि उसकी पहले की की हुई तरक्की भी नष्ट होने लगती है। बेशक वह पिछली तरक्की के बल पर आध्यात्मिक तरक्की जरूर कर ले। पर पिछली तरक्की का बल भी कब तक रहेगा। हिन्दुओं को पहले इस्लामिक हमलावरों ने डराया, अब पाकिस्तान पोषित इस्लामिक आतंकवाद डरा रहा है। तथाकथित ख़ालिस्तानी आतंकवाद भी इनमें एक है। जिस धर्म के लोगों और गुरुओं ने मुग़ल हमलावरों से हिंदु धर्म की रक्षा के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे, आज उन्हींके कुछ मुट्ठी भर लोग तथाकथित हिंदुविरोधी खालिस्तान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, बाकि अधिकांश लोग भय आदि के कारण चुप रहते हैं, क्योंकि बहुत से बोलने वालों को या तो जबरन चुप करवा दिया गया या मरवा दिया गया। अगर विरोध में थोड़ा-थोड़ा सब स्वतंत्र रूप से बोलें, तो आतंकवादी किस किस को मारेंगे। सूत्रों के अनुसार कनाडा उनका मुख्य अड्डा बना हुआ है। अभी हाल ही में हिन्दूवादी शिवसेना के नेता सुधीर सूरी की तब गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वे देव मूर्तियों को कूड़े में फ़ेंके जाने का विरोध करने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार इसके तार भी पाक-समर्थित खालिस्तान से जुड़े बताए जा रहे हैं। तथाकथित हिंदु विचारधारा वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता गगनेजा हो या रवीन्द्र गोसाईं, इस अंतर्राष्ट्रीय साजिश के शिकार लोगों की सूचि लंबी है। गहराई से देखने पर तो यह लगता है कि हिंदु ही हिंदु से लड़ रहे हैं, उकसाने और साजिश रचने वाले तथाकथित बाहर वाले होते हैं। हाँ, अब पोस्ट के मूल विषय पर लौटते हैं। आपने भी देखा ही होगा कि कोई चाहे कैसा ही क्यों न हो, किसी न किसी बहाने सम्भोग की तरफ आकर्षित हो ही जाता है, ताकि अपनी ऊर्जा को बढ़ा सके, मतलब यहाँ निकम्मापन नहीं पनपता। तीसरा टुकड़ा उसे स्पाइन ट्राईब अर्थात मेरुदण्ड में मिला, सुषुम्ना में उठ रही संवेदना के रूप में। मेरुदण्ड स्थित कुंडलिनी शक्ति अर्थात सिसू ड्रेगन को कुंडलिनी चित्र चक्रोँ से मिला होता है, जैसा कि शिवपुराण में आता है कि ऋषिपत्नियों (चक्रोँ) ने अपने वीर्य तेज को हिमालय (मेरुदण्ड) को दिया। इसीको सिसू कहती है कि उसे रत्न के टुकड़े उसके भाई-बहिनों ने दिए, जो इन विभिन्न टापुओं पर रहते थे। हरेक चक्र से मिली कुंडलिनी चित्र रूपी चिंतन शक्ति से सिसू रूपी कुंडलिनी शक्ति मजबूती प्राप्त करती है, और अपने मस्तिष्क में अर्थात आदमी के मस्तिष्क में (क्योंकि फन उठाए नाग का मस्तिष्क ही आदमी का मस्तिष्क है) एक विशेष शक्ति और उससे एक नया सकारात्मक रूपांतरण महसूस करती है। इसको उपरोक्त मिथक कथा में ऐसे कहा है कि हरेक रत्न का टुकड़ा प्राप्त करने से वह एक विशेष नई शक्ति प्राप्त करती है। राया और सिसू फैंग कबीले से बचते हुए स्पाइन कबीले में पहुंचते हैं, मतलब अवेयरनेस या बुद्धि और कुंडलिनी शक्ति आगे के चक्रोँ से ऊपर नहीं चढ़ती, अपितु पीछे स्थित रीढ़ की हड्डी से ऊपर चढ़ती है। यह इसलिए कहा गया है क्योंकि फैंग मतलब मुंह का नुकीला दाँत आगे के चक्रोँ के रास्ते में ही आता है। इस यात्रा में उसे चार-पांच मददगार दोस्त मिल जाते हैं, मतलब पाँच प्राण और मांसपेशियों की ताकत जो कि कुंडलिनी शक्ति को घुमाने में मदद करते हैं। फैंग आईलैंड में वे पीछे से मतलब पीछे के विशुद्धि चक्र से प्रविष्ट होती हैं। वह इसलिए क्योंकि कुंडलिनी शक्ति को विशुद्धि चक्र से ऊपर चढ़ाना सबसे कठिन है, इसलिए वह आगे की तरफ फ़िसलती है। वहाँ राजकुमारी निमारी मतलब बीमारी मतलब कमजोरी या अंधभौतिकता उसे मार देती है, मतलब उसे वापिस हटने पर मजबूर करती है, और वह नदी में गिर जाती है, मतलब मेरुदण्ड के फ्लूड में बहती हुई वापिस नीचे चली जाती है। उससे बवंडर ताकतवर होकर लोगों को मारने लगते हैं, मतलब चक्रोँ में फँसी भावनाओं को बाहर निकलने का मौका न देकर वहीं उन्हें पत्थर अर्थात शून्य अर्थात बेजान बनाने लगते हैं। चक्र भी बवंडर की तरह गोलाकार होते हैं। सिसू नमारी से लड़ना नहीं चाहती मतलब जब कुंडलिनी शक्ति विशुद्धि चक्र को लांघ कर ऊपर चढ़ने लगती है, तब मन की लड़ाई-झगड़े वाली सोच नष्ट हो जाती है। मन का सतोगुण बढ़ा हुआ होता है। वह नमारी को तोहफा देना चाहती है मतलब उसे कुछ मिष्ठान्न आदि खिलाकर। वैसे भी मुंह में कुछ होने पर कुंडलिनी सर्कट कम्प्लीट हो जाता है, जिससे कुंडलिनी आसानी से घूमने लगती है। पर हुआ उल्टा। उस तोहफे से कुंडलिनी की मदद करने की बजाय वह दुनियादारी के दोषों जैसे गुस्से, लड़ाई व अति भौतिकता आदि को बढ़ाने लगी। इससे तो कुंडलिनी शक्ति नष्ट होगी ही। इसको ऐसे दिखाया गया है कि सिसू तीर लगने से मरकर नदी में गिर जाती है, मतलब शक्ति फिर सेरेबरोस्पाइनल द्रव से होती हुई मेरुदण्ड में वापिस नीचे चली जाती है। इससे फिर से ड्रन के हमले शुरु हो जाते हैं। इससे शक्ति की कमी से टुकड़ों में बंटे कुंडलिनीचित्र रूपी रत्न से वे बवंडर से बचने की कोशिश करते हैं, पर शक्ति के बिना कब तक कुंडलिनी चित्र बचा पाएगा। कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र को शक्ति से ही जान और चमक मिलती है, और शक्ति को कुंडलिनी चित्र से। दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। इससे वह मेडिटेशन चित्र भी धूमिल पड़ने लगता है। इससे राया मतलब बुद्धि को याद आता है कि आपसी सौहार्द और विश्वास से ही सीसू मतलब शक्ति ने वह कुंडलिनी रत्न प्राप्त किया था। इसलिए वह अपना रत्न भाग नमारी मतलब दुनियादारी या भौतिकता को दे देती है। सभी अंग और प्राण बुद्धि का ही अनुगमन करते हैं, इसलिए उसके सभी दोस्त मतलब प्राण भी जिन्होंने विभिन्न चक्रोँ से कुंडलिनी भागों को कैपचर किया है, वे भी अपनेअपने रत्नभाग नमारी को दे देते हैं। नमारी भी अपना टुकड़ा उसमें जोड़ देती है, मतलब वह भी पूरी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए दुनियादारी में अनासक्ति और अद्वैत के साथ व्यवहार करने लगती है। इससे वह रत्न पूरा जुड़ जाता है मतलब अद्वैत की शक्ति से कुंडलिनी चित्र आनंद और शांति के साथ पूरा चमकने लगता है। इससे चक्रोँ में दबी हुई भावनाएँ फिर से प्रकट होकर आत्मा के आनंद में विलीन होने लगती हैं, मतलब बवंडर द्वारा पत्थर बनाए लोग फिर से जिन्दा होकर आनंद मनाने लगते हैं। सुषुम्ना की शक्ति भी उस चित्र की मदद से जागने लगती है। सुषुम्ना नाड़ी के साथ ही शरीर की अन्य सभी नाड़ियों में भी अवेयरनेस दौड़ने लगती है, मतलब उनमें दौड़ती हुई शक्ति की सरसराहट आनंद के साथ महसूस होने लगती है। इसको ऐसे कहा गया है कि फिर पत्थर बनी सभी ड्रेगन भी जिन्दा हो जाती हैं। वे ड्रेगन पूरे कुमान्द्रा में खुशहाली और समृद्धि वापिस ले आती है। क्योंकि शरीर भी एक विशाल देश की तरह ही है, जिसमें शक्ति ही सबकुछ करती है। हरेक नाड़ी में आनंदमय शक्ति के दौड़ने से पूरा शरीर खुशहाल, हट्टाकट्टा और तंदुरस्त तो बनेगा ही। इससे पहले रत्न के टुकड़े पत्थर बने लोगों को तो जिन्दा कर पा रहे थे पर पत्थर बनी ड्रेगनों को नहीं। इसका मतलब है कि धुंधले कुंडलिनी चित्र से चक्रोँ में दबी भावनाएँ तो उभरने लगती हैं, पर उससे सरसराहट के साथ चलने वाली शक्ति महसूस नहीं होती। शक्तिशाली नाग के रूप में सरसराहट करने वाली कुण्डलिनी शक्ति मानसिक कुंडलिनी छवि का ही अनुसरण करती है। इसके और आगे, तांत्रिक यौन योग इस शक्ति को और ज्यादा मजबूती प्रदान करता है। महाराज ओशो भी यही कहते हैं। मतलब कि शक्ति चक्रोँ पर विशेषकर मूलाधार चक्र में सोई हुई अवस्था में रहती है। इसका प्रमाण यह भी है कि यदि आप मन में नींद-नींद का उच्चारण करने लगो, तो कुंडलिनी शक्ति के साथ कुंडलिनी चित्र स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर महसूस होने लगेगा, नाभि चक्र में भी अंदर की ओर सिकुड़न महसूस होगी। साथ में रिलेक्स फील भी होता है, असंयमित विचारों की बाढ़ शांत हो जाती है, मस्तिष्क में दबाव एकदम से कम होता हुआ महसूस होता है, और सिरदर्द से भी राहत मिलती है। यह तकनीक उनके लिए बहुत फायदेमंद है जिनको नींद कम आती हो या जो तनाव में रहते हैं।

निद्रा देवी ही नींद की अधिष्ठात्री है। “श्री निद्रा है” मंत्र मैंने डिज़ाइन किया है। श्री से शरीरविज्ञान दर्शन का अद्वैत अनुभव होता है, जिससे कुंडलिनी मस्तिष्क में कुछ दबाव बढ़ाती है, निद्रा से वह कुंडलिनी दबाव के साथ निचले चक्रोँ में उतर जाती है, है से आदमी सामान्य स्थिति में लौट आता है। अगर योग करते हुए मस्तिष्क में दबाव बढ़ने लगे, तब भी यह उपाय बहुत कारगर है। दरअसल योग के लिए नींद भी बहुत जरूरी है। जागृति नींद के सापेक्ष ही है, इसलिए नींद से ही मिल सकती है। जो जबरदस्ती ही हमेशा ही सतोगुण को बढ़ा के रखकर जागे रहने का प्रयास करता है, वह कई बार मुझे ढोंग लगता है, और उससे आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होने में मुझे संदेह है। इसी तरह किताब में पढ़ते समय मुझे लगता था कि शाम्भवी मुद्रा पता नहीं कितनी बड़ी चमत्कारिक विद्या है, क्योंकि लिखा ही ऐसा होता था। लेखन इसलिए होता है ताकि कठिन चीज सरल बन सके, न कि उल्टा। सब कुछ सरल है यदि व्यावहारिक ढंग से समझा जाए। नाक पर या नासिकाग्र पर नजर रखना कुंडलिनी शक्ति को केंद्रीकृत कर के घुमाने के लिए एक आम व साधारण सी प्रेक्टिस है। एकसाथ दोनों आँखों से बराबर देखने से आज्ञा चक्र पर भी ध्यान चला जाता है, यह भी साधारण अभ्यास है। जीभ को तालू से ज्यादा से ज्यादा पीछे छुआ कर रखना भी एक साधारण योग टेक्टिक है। इन तीनों तकनीकों को एकसाथ मिलाने से शाम्भवी मुद्रा बन जाती है, जिससे तीनों के लाभ एकसाथ और प्रभावी रूप से मिलते हैं। इसीलिए जीवन संतुलित होना चाहिए ताकि उसमें पूरे शरीर का बराबर योगदान बना रहे, और शरीर कुमान्द्रा अर्थात संतुलित बना रहे। संतुलन ही योग है। इसी तरह रत्न के टुकड़े लोगों का ड्रन से स्थायी बचाव नहीं कर पा रहे थे। यह राजयोग वाला उपाय है, जिसमें केवल मन या दिल में कुंडलिनी चित्र का ध्यान किया जाता है, हठयोग के योगासन व प्राणायाम आदि के रूप में पूरी योगसाधना नहीं की जाती। इसलिए जबतक कुंडलिनी चित्र का ध्यान किया जाता है तब तक तो वह बना रहता है, पर जैसे ही ध्यान हटाया जाता है, वैसे ही वह एकदम से धूमिल पड़ जाता है। यही बैंज कबीले वाला स्थानीय उपाय है। इससे मन या हृदय में तो ड्रन से बचाव होता है, पर अन्य चक्रोँ पर लोगों के पत्थर बनने के रूप में भावनाएँ दबती रहती हैं। इसलिए सम्पूर्ण, सार्वकालिक व सार्वभौमिक उपाय हठयोग के साथ यथोचित दुनियादारी ही है, राजयोग मतलब खाली बैठकर केवल ध्यान लगाना नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि हठयोग में पूरे शरीर का और बाहरी संसार का यथोचित इस्तेमाल होता है। संसार में भी पूरे शरीर का इस्तेमाल होता है, केवल मन व दिल का ही नहीं। हालांकि प्रारम्भिक तौर पर पूर्ण सात्विक राजयोग ही कुंडलिनी चित्र को तैयार करता है, और उसे संभाल कर रखता है। यह ऐसे ही है, जैसे बैंज कबीले के मुखिया ने रत्न को संभाल कर रखा हुआ था। कई लोग हठयोग के आसनों को देखकर बोलते हैं कि यह तो शारीरिक व्यायाम है, असली योग तो मन में ध्यान से होता है। उनका कहने का मतलब है कि मन रूपी चिड़िया बिना किसी आधार के खाली अंतरिक्ष में उड़ती रहती है। पर सच्चाई यह है कि मन रूपी चिड़िया शरीर रूपी पेड़ पर निवास करती है। पेड़ जितना ज्यादा स्वस्थ और फलवान होगा, चिड़िया उतनी ही ज्यादा खुश रहेगी।

कुंडलिनी ही वह औरोबोरस सांप है जो अपने मुंह में अपनी पूँछ दबाकर यब-युम जैसा लूप बनाता है

श अक्षर दिल का अक्षर है~ श्री बीजमंत्र

दोस्तों, जैसा कि पिछली पोस्ट में विषय चल रहा था कि स या श अक्षर इसलिए भी कुंडलिनी प्रभाव को पैदा करता है, क्योंकि नाग की आवाज भी हिसिंग या स जैसी ही होती है। इसी तरह श्री में भी सर्प की सर सर चलने का शब्द भी समाहित है। श व स शब्द से ही श्री शब्द या श्रीं बीजमंत्र बना है, जो देवी का मुख्य बीज मंत्र है। इसमें शं, रं, और ह्रीं तीनों बीजमन्त्रों की सम्मिलित शक्ति होती है। सम्भवतः अंग्रेजी का शी शब्द इसी श्री से बना है। मुझे तो श अक्षर से शक्ति हृदय चक्र को उतरी हुई महसूस होती है। श से ही शंकर और शम्भु शब्द बने हैं। शं का अर्थ ही शांति होता है। पुरुष में भी श अक्षर मुख्य है। मुझे तो श अक्षर भावनाओं का और दिल का अक्षर लगता है। बीजमंत्र का ध्यान करते समय मन के विचारों को रोकना नहीं चाहिए, तभी उनकी शक्ति कुंडलिनी को लगती है। यदि विचारों को बलपूर्वक रोक दिया जाए, तब उनकी शक्ति खत्म हो जाएगी, फिर वो कुंडलिनी को कैसे लग पाएगी।

अंधेरा अल्प अवधि का होता है, जबकि प्रकाश चिर अवधि तक रहता है~ नॉनवेज और ड्रिंक

फिर मैं बता रहा था कि कैसे हिंसक जीव शिकार के समय खूंखार हो जाते हैं। शिकार को मारकर उसे भोजन के तौर पर खाते समय तो शेर आदमखोर भी हो जाता है, जैसा हम बड़े बुजुर्गों से सुना करते थे। दरअसल ननवेज में शक्ति तो होती है पर उसे पचाने के लिए भी बहुत शक्ति लगती है। यह ऐसे ही है जैसे गढ़े हुए पत्थर से बनी इमारत शक्तिशाली या मजबूत तो होती है, पर पत्थर गढ़ने के लिए भी ज्यादा शक्ति लगती है, साथ में गढ़े हुए बड़ेबड़े पत्थरों को इमारत तक ढोने और उन्हें सही जगह पर फिट करने में भी ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है। ननवेज आदि का बेवजह उपयोग करने वाले का हाल उस कृपण सेठ की तरह होता है, जो अपना कीमती और दुर्लभ जीवन बेवजह धन सम्पत्ति इकट्ठा करने में बर्बाद कर देता है, पर वह कुछ भी उसके उपयोग में नहीं आती। या कह लो कि यह ऐसे ही है जैसे कोई सिरफिरा व्यक्ति अपना घर बन जाने के बाद भी सारी उमर पत्थर ही गढ़ता रहे। शिकारभोज के समय तेन्दुए की शक्ति पेट को चली जाती है, और मस्तिष्क में शक्ति की कमी से सोचने समझने की शक्ति नहीं रहती, जिससे वह अपने नजदीक हर किसी को उकसावा समझकर उस पर हमला बोल देता है, जवाबी हमले की परवाह किए बगैर। यह अलग बात है कि आदमी का व्यवहार उससे भी गिरा हुआ प्रतीत होता है क्योंकि उसने बिना उकसावे के ही चीते का इतना शिकार किया कि वे देश से विलुप्त ही हो गए, इसीलिए उन्हें पुनः बढ़ावा देने के लिए नामीबिया से आठ चीते विशेष विमान से यहाँ पहुंचा दिए गए हैं। सम्भवतः इसीलिए किसी भोजन करते हुए से मिलने या बात करने से मना किया जाता है। एकबार मैं बचपन में अपनी खाना खाती हुई मुख्याध्यापिका के कक्ष में प्रविष्ट होकर किसी काम के सिलसिले में बात करने लगा। मुझे वे उस समय एक शेरनी की तरह लगीं और मैं एकदम बाहर दौड़ आया। हमेशा के लिए अच्छी सीख भी मिल गई थी। मेरा एक दोस्त था। जिस दिन वह बाजार से ननवेज खाकर या ड्रिंक करके आता था, सीधा बिस्तर में जाकर सो जाता था, और किसीसे भी बात नहीं करता था, अगले दिन तक। सम्भवतः उसे एहसास था कि ऐसे समय में थोड़ी सी कहासुनी से बात बढ़ जाती, क्योंकि मस्तिष्क में शक्ति की कमी से अंधेरा होने से भले-बुरे का भान नहीं रहता। सम्भवतः इस वजह से भी यह धार्मिक मान्यता बनी हो कि ननवेज से मन में अंधेरा छाता है, और पाप लगता है।

रूपान्तरण ही जीव की नियति है जो उसे परम तक ले जाती है~ क्या योग ज़ेलेंस्की और पुतिन की मदद कर सकता है

रूपान्तरण धीरेधीरे होता है। इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि जब दो लोग बहुत वर्षों बाद मिलते हैं, तो आपसी दुश्मनी भूलकर दोस्त बन जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अलगाव के दिनों में उन्होंने बहुत कुछ नया सीख लिया होता है, जिससे पुरानी भावनाएं कमजोर पड़ जाती हैं। यह ऐसे ही है जैसे यदि लिखे हुए ब्लैकबोर्ड पर आप जितना ज्यादा नया लिखेंगे, पुराने लिखे शब्द उतने ही मिटते जाएंगे। रूपान्तरण की यह रप्तार योग से इसलिए बहुत तेज हो जाती है क्योंकि इससे मन का कचरा बहुत जल्दी साफ हो जाता है। योग को आप मन रूपी ब्लैकबोर्ड का डस्टर कह सकते हैं। जैसे डस्टर के प्रयोग से पुराना लेख ज्यादा मिटता है, और नया लेख ज्यादा स्पष्ट हो जाता है, उसी तरह योग के प्रभाव से पुरानी भावनाएँ ज्यादा मिटती हैं, और नई स्वस्थ भावनाएँ ज्यादा स्पष्ट हो जाती हैं। यदि जैलेंस्की और पुतिन अगले जन्म में मिले तो सम्भवतःआपस में दुश्मनी बिल्कुल न रखें, पर यदि एक-दो महीने भी ढंग से योगाभ्यास कर लें, तो सम्भवतः तुरंत ही दुश्मनी भूलकर लड़ना बंद कर दें।

सभी धार्मिक गतिविधियां योग धारणा को बढ़ावा देने के कारण योग की प्राथमिक सीढ़ी की तरह हैं~ जब ध्यान शुरू होता है

जितनी भी धार्मिक गतिविधियां हैं, वे इसी योग धारणा को बनाए रखने के लिए है, जो मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था। इससे स्पष्ट होता है कि सभी धर्म योग विज्ञान के अंतर्गत ही आते हैं। धारणा से ही ध्यान की शुरुआत होती है, और ध्यान से ही समाधि अर्थात कुंडलिनी जागरण की।

धमाके में चेतना का आनंद ढूंढती आधुनिक मानव संस्कृति~ महा विस्फोट (big bang) इतना आध्यात्मिक है

बम का धमाका भी कुंडलिनी जागरण का तुच्छ और पापपूर्ण और अमानवीय विकल्प लगता है मुझे। इसमें वैसी ही प्रकाश, गर्मी, चेतनता और आनंद की अनुभूति होती है, जैसी कुंडलिनी जागरण में, हालांकि उससे बहुत कम और क्षणिक रूप में। समारोह, त्यौहार आदि में चलाए जाने वाले पटाखे इसका अच्छा उदाहरण है। हालांकि यह मानवीय है अगर सीमा में रहे। सम्भवतः इसीलिए कई सिरफिरे चेतना की इसी क्षुद्र झलक की प्राप्ति के लिए युद्धाभ्यास के नाम पर धमाके करने लग जाते हैं। इससे जाहिर होता है कि योग से इस पर लगाम लग सकती है।

गंगास्नान से जो पाप धुलते हैं, वे योग से ही धुलते हैं~ सहस्रार के लिए एक अद्भुत मार्ग

गंगा में स्नान करने से पाप धुलते हैं, ऐसा कहा जाता है। दरअसल ऐसा कुंडलिनी शक्ति के मूलाधार से सहस्रार की तरफ चढ़ने से होता है। कहते हैं कि उन पापों को वहाँ आने वाले ऋषिमुनि ग्रहण कर लेते हैं। इसका मतलब है कि जब मस्तिष्क में शक्ति के पहुंचने से वह बहुत शक्तिशाली हो जाता है, तब उसमें किसी देवता या गुरु का जो चित्र कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र के रूप में उभरता है, उसमें उन तपस्वी लोगों का बहुत ज्यादा योगदान होता है। वही कुंडलिनी चित्र पापों को जलाता है, सीधा गंगास्नान नहीं। मतलब कि पापों का नाश गंगास्नान से हो रहे योग से ही होता है। यदि ध्यान चित्र नहीं बनेगा, तब मस्तिष्क की बेकाबू शक्ति अमानवीय कामों या लड़ाईझगड़े की तरफ भी जा सकती है। पुतिन बर्फीले पानी में आराम से नहा लेते हैं, पर कुंडलिनी जागरण के लिए नहीं, लड़ने के लिए। इसलिए योग के साथ ध्यान भी जरूरी है। मैं यह भी बता रहा था कि यदि कमजोरी या ठंड महसूस होए तो ठंडे पानी से नहीं नहाना चाहिए। इसी तरह यदि समय की कमी हो तो भी ठंडे पानी से नहीं नहाना चाहिए। कम से कम आधा घंटा तो चाहिए ही शीतजल स्नान के लिए। नहाते समय बीचबीच में मांसपेशियों की सिकुड़न के साथ कुंडलिनी शक्ति को घुमाते रहना पड़ता है, ताकि उससे गर्मी पैदा होती रहे और ठंड का असर कम होए। स्नान के एकदम बाद योग व व्यायाम कर लेना चाहिए ताकि जल्दी से जल्दी शरीर को पर्याप्त गर्मी मिल सके। शाम के समय अतिरिक्त समय भी ज्यादा होता है, और दिनभर की क्रियाशीलता से गर्मी भी चढ़ी होती है, इसलिए शाम को नहाया जा सकता है।

दिल दा मामला है~ इसे बहुत ठंड से बचाएं

सबसे ज्यादा ठंड का प्रभाव दिल पर पड़ता है। इसलिए दिल पर विशेष रूप से कुंडलिनी चित्र का ध्यान करते रहो, ताकि पूरे शरीर की शक्ति वहाँ विशेष रूप से केंद्रित होती रहे। इससे हृदय क्षेत्र की मांसपेशियों में सिकुड़न होगी जिससे वहाँ गर्मी बढ़ेगी और रक्तसंचार बढ़ेगा। साथ में शक्ति को घुमाते भी रहें माइक्रोकोस्मिक औरबिट में। वैसे भी दिल शरीर के बीच में ही प्रतीत होता है, अगर सभी चक्रोँ को लेकर चलें तो। नाभि चक्र तो तब शरीर के केंद्र में महसूस होता है, जैसा कि कहा भी जाता है, यदि टांगों को भी चक्रोँ के साथ जोड़ा जाए। दिल से ही शक्ति को शक्ति मिलती है, और शक्ति ही दिल को भी शक्ति देती है। हिसाब बराबर। इसीलिए दिल केंद्र में है। जब शीर्ष चक्र को शक्ति चढ़ने से दिल कुछ थक सा जाता है, तब उस शक्ति का कुछ हिस्सा दिल की ओर वापिस मुड़कर उसे भी शक्ति देता है।इससे जुड़ा मैं दो तीन साल पुराना एक वाकया सुनाता हूँ। एकबार मैं किसी समारोह दावत आदि से घर आ रहा था। ठंड का मौसम था। दावतकक्ष में तो गर्मी के सारे इंतजाम थे, जिससे मेरी स्किन की रक्तवाहिनियाँ खुली हुई थीं। पर रात को एक जंगली घाटी से गुजरते हुए मोटरसाइकल पर मुझे बहुत ठंड लगी। ठंड का मौसम शुरु ही हुआ था इसलिए मैंने गर्म कपड़े भी नहीं पहने थे। चलती बाईक पर तो ठंडी हवा के थपेड़े ज्यादा ही लगते हैं। आसपास घर भी नहीं थे जहाँ रुक जाता। जानवरों से भरा हुआ रात का डरावना जंगल ही था चारों तरफ। तभी मुझे दिल में अजीब सी धड़कनेँ महसूस हुईं। ऐसा लगा जैसे मेरी छाती का दौड़ता हुआ घोड़ा कभी छलांगें लगा रहा है, और कभी रुक रहा है। कुदरती चेष्टा से मैंने बाइक रोकी और मैं घुटनों को बाजुओं से घेरकर बैठ गया ताकि हृदय को गर्मी और राहत मिल सके। फिर दिल सामान्य हो गया। जैसे ही मैं उठने लगा, वैसे ही मेरा दिल फिर वैसे ही नखरे करने लगा। मैं फिर से दिल को ढक कर बैठ गया। मैंने उसी हालत मैं जेब से फोन निकाला और एक दोस्त को कार लेकर आने को कहा। वो खुद ही मुझे सहारा देकर कार के अंदर ले गए। उन्होंने मेरी बाइक खुद ही सही जगह पर लगा दी क्योंकि मैं कुछ नहीं कर पा रहा था। जैसे ही मैं जरा सा भी अपने को खुला छोड़कर ठंडी हवा के सम्पर्क में आता था वैसे ही दिल वैसी ही हरकत शुरु कर देता था। मैंने अपने आपको ऐसे पैक किया हुआ था कि कम से कम हवा के सम्पर्क में आऊं। उन्होंने कार का हीटर चलाया जिससे मैं एकदम सामान्य हो गया। फिर वो कहने लगे कि डॉक्टर को दिखा लो, चेकअप करा लो आदि। मैंने कहा वह घटना बिमारी से नही, ठंड से थी, इसलिए अल्पकालिक थी, क्योंकि मैं फिर अपने को पहले से भी ज्यादा स्वस्थ महसूस कर रहा था। ठंड के मौसम में लेट नाइट दावतों से बचना चाहिए। उनमें ड्रिंक का प्रयोग तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। इससे चमड़ी की रक्तवाहिनियाँ और ज्यादा खुल जाती हैं। इससे दो नुकसान होते हैं। एक तो आदमी को बाहर की ठंड का अहसास ही नहीं होता, क्योंकि चमड़ी में झूठी गर्मी बनी रहती है। दूसरा, इससे शरीर की बहुत सारी गर्मी बाहर निकल जाती है। मेरे मामा के एक प्रोढ़ उम्र के चचेरे भाई को ड्रिंक करने की आदत थी। वे सर्दियों के मौसम में एक सुनसान जैसे रास्ते पर मृत मिले। दरअसल वे ड्रिंक करके देर रात की ठंड में अकेले रास्ते से गुजर रहे थे। वहाँ ठंड लगने से वे गिर पड़े होंगे। नशे की हालत में अपने को गर्मी देने के उनके सारे प्रयास विफल रहे होंगे। देर रात होने की वजह से उन्हें किसी की सहायता भी नहीं मिली होगी।

योग-साँसों से वीर्यशक्ति ऊपर चढ़ती है~ नासिकाग्र (nose tip) टिप ध्यान का आसान तरीका

गहरे और धीमे सांस योगविधि से पेट से लेने से और नाक से आतीजाती हवा पर ध्यान देने से जो योगलाभ मिलता है, वह दरअसल वीर्य शक्ति के मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रोँ से ऊपर चढ़ने से ही मिलता है। इसमें सांसों का कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं लगता मुझे। कोई ऑक्सीजन वगैरह का रोल भी नहीं लगता ज्यादा। सम्भोगयोग के समय भी अधिकांशतः इन्हीं सांसों के बल पर ही वीर्यशक्ति के आधोगमन को रोकते हुए उसे ऊपर चढ़ाया जाता है। नाकों से आतीजाती सांसों पर ध्यान देने से नाक या नासिका शिखा पर खुद ही ध्यान चला जाता है, जो शरीर के ठीक बीचोंबीच है। इससे बीच वाली नाड़ी सुषुम्ना के क्रियाशील होने से वीर्यशक्ति के रूपान्तरण से बनने वाली प्राणशक्ति शरीर के बीचोंबीच चारों तरफ ज्यादा अच्छे से घूमने लगती है।

शक्ति को प्रेरित करने वाला चेतन आत्मा ही है और हम सभी औरोबोरस सांप जैसे हैं~ कुंडलिनी शक्ति मूलाधार में क्यों रहती है

योग का जो जलंधर बंध होता है, वह इसलिए लगाया जाता है ताकि मस्तिष्क तक चढ़ी हुई कुंडलिनी शक्ति आगे के चैनल से नीचे उतर सके और इस तरह एक बंद लूप में गोलगोल घूमती हुई सभी चक्रोँ को एकसाथ शक्ति देती रह सके। ठंडे पानी से नहाते समय सिर खुद ही आगे को नीचे झुक जाता है। इससे स्वाधिष्ठान चक्र का दबाव भी कम हो जाता है। यह ऐसे ही है जैसे एक विशालकाय और अनेक फनों वाला नाग अपनी दुखती पूँछ को मुंह से पकड़ने के लिए आगे को झुक जाता है और उसे अपने केंद्रीय फन से पकड़ने का प्रयास करता है।  मिस्र और यूनान का Ouroboros अर्थात औरोबोरस सांप भी इसीको दर्शाता है। लगता तो है कि पुराने समय में गंगास्नान करते हुए जब आध्यात्मिक लोगों को इन स्वयं होने वाली शरीरवैज्ञानिक प्रक्रियायों का बोध हुआ, तो उन्होंने इनके आधार पर कृत्रिम हठयोग का निर्माण कर दिया होगा। वैसे भी शक्ति को मूलाधार में स्थित बताया जाता है। उस शक्ति को दिमाग तक पहुंचाना होता है, क्योंकि मस्तिष्क ही पूरे शरीर और मन का मुखिया है। अगर मस्तिष्क में शक्ति है, तो पूरे तनमन में खुद ही शक्ति रहेगी। औरोबोरस की पूंछ उसके मुंह में होने का मतलब है कि योगी तांत्रिक कुंडलिनी योग से शक्ति को मुलाधार से मस्तिष्क तक पहुंचा रहा है। पर ऐसा भी नहीं है कि मूलाधार के इलावा कहीं शक्ति नहीं है। अगर ऐसा होता तो नपुंसक या बच्चे बिल्कुल शक्तिहीन होते। पर ऐसा नहीं है। सामान्य शक्ति तो उनमें भी होती है। इसका सीधा सा मतलब है कि मूलाधार में अतिरिक्त शक्ति होती है, जो मस्तिष्क को प्राप्त हो सकती है। वही अतिरिक्त शक्ति कुंडलिनी के लिए बहुत जरूरी होती है, क्योंकि सामान्य शक्ति से वह ढंग से क्रियाशील नहीं हो पाती, जागरण तो दूर की बात है। सम्भवतः कुंडलिनी शक्ति को ही मुलाधार में रहने वाली बताया गया है, सामान्य शक्ति को नहीं। हालांकि अपवाद तो हर जगह है। मूलाधार शक्ति के बिना भी कुंडलिनी जागृत हो सकती है, बेशक विरले मामलों में ही।

यब-युम जैसा यौनक्रीड़ामय आसन ही औरोबोरस सांप है~ सूक्ष्म ब्रह्मांडीय कक्षा (microcosmic orbit) का सबसे आसान तरीका

इसमें वैसे ज्यादा विस्तार से जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इस पैराग्राफ की हैडिंग से ही बात स्पष्ट है। फिर भी इससे जुड़ा वैज्ञानिक सिद्धांत तो डिस्कस कर ही सकते हैं। क्योंकि सांप की पूँछ पूरा झुकने पर भी काफी नीचे रह जाती है, जिससे वह उसे अपने मुंह में नहीं ले सकता, इसलिए वह सर्वोपयुक्त चीज को अपनी पूँछ से जोड़कर उसे इतना लम्बा करता है, ताकि वह उसके मुंह तक आसानी से पहुंच सके। इससे सांप का ऊर्जा चक्र पूर्ण हो जाता है, जिससे वह आनंद के साथ अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करता है। उस रूपकात्मक नर सांप की पूँछ में जोड़ने के लिए सर्वोत्तम चीज क्या हो सकती है, यह सबको ही पता है। मादा सांप के जुड़ने से यिन-यांग भी आपस में जुड़ जाते हैं, इससे अद्वैत और कुंडलिनी अभिव्यक्त होने से और अतिरिक्त आनंद प्राप्त होता है, और आध्यात्मिक विकास भी होता है, जिसका चरम कुंडलिनी जागरण है। हैरतङ्गेज सृष्टि रचने वाले से बढ़कर बुद्धिमान भला कौन हो सकता है। इसका अनुभव के अतिरिक्त एक और प्रमाण है, कई जगह इस सांप को यिन-यांग के रूप में दिखाना। इसके लिए सांप का ऊपर वाला हिस्सा काले और नीचे वाला आधा हिस्सा सफेद रंग का दिखाया जाता है। इससे तो काफी स्पष्ट हो जाता है कि यब-युम को ही ओरोबोरस सांप के रूप में दिखाया गया है, क्योंकि इसी आसन में काला रंग मतलब यिन मतलब स्त्री भाग ऊपर होता है, और श्वेत रंग मतलब यांग मतलब पुरुष भाग निचली साइड होता है। कुछ सांप हकीकत में विरले मामले में अपनी पूँछ को खाते हैं, खासकर तब जब वे बाहरी वातावरण की बहुत ज्यादा गर्मी से और भूख से परेशान होते हैं। हो सकता है कि वे किसी कुशल तांत्रिक की तरह ही मूलाधार से ऊर्जा लेते हों, और उसे गोलगोल घुमाते हों, ताकि शरीर की ऊर्जा की कमी को पूरा कर के स्थिर हो सकें। पर दिमाग़ की कमी से वे मजबूरन पूँछ को निगल ही जाते हैं, और आगे बढ़ते हुए खुद को भी। सम्भवतः सर्प की यह ऊर्जा-ट्रिक भी विभिन्न धर्मों में उसका महत्त्व बनाने में जिम्मेदार हो।

अध्यात्मवैज्ञानिक खोजों और अविष्कारों का युग शुरु हो गया है~ यौन उपकरण ज्यादा बन रहे हैं

लगता है कि अति आदर्शवादी मध्ययुग और आधुनिक युग में उपरोक्त यब-युम जोड़े से यब भाग गायब सा हो गया, और युम ही बचा रहा। उसकी जगह पर साधारण कुंडलिनी योग का प्रचलन बढ़ा, जिसमें यब की कमी को कुंडलिनी को आगे के चक्रोँ से नीचे उतार कर किया गया। हालांकि यब के साथ भी कुंडलिनी ऐसे ही उतरती थी, यद्यपि यब से इस प्रक्रिया को बहुत बल मिलता था, और जीवंतता मिलती थी। आदर्शवादी योग में यम के अंदर ही यब को कल्पित कर दिया गया। एक ही व्यक्ति में यब को यम के साथ स्थायी तौर पर जोड़ दिया गया, असरदारी की कीमत पर। फिर यब-युम गठजोड़ का असर बढ़ाने वाले अन्य बहुत से कृत्रिम उपायों का सहारा लिया गया हो, जैसे कि दोनों हाथों को एकसाथ जोड़कर नमस्कार मुद्रा बनाना, ऊर्धव-त्रिपुण्ड लगाना, जनेऊ धारण करना आदि। हो सकता है कि वैज्ञानिक इस पोस्ट को पढ़कर इस कमी का फायदा उठाकर यब अर्थात यिन की कृत्रिम डम्मी बना कर बाजार में पेश कर दे। विज्ञान आज व्यवसाय से जुड़ा है, और पैसा कमाने का कोई भी तरीका नहीं छोड़ना चाहता। आज अधिकांश भौतिक खोजें हो चुकी हैं। अधिकांश वैज्ञानिकों के पास अतिरिक्त समय है। वे भौतिक खोजों से ऊब भी चुके हैं, विशेषकर इनके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों से तंग आकर। इसीलिए आज अध्यात्मवैज्ञानिक खोजें बहुत हो रही हैं। कोई कुंडलिनी को घुमाने वाली मशीन बना रहा है, तो कोई मूलाधार की संवेदना बढ़ाने वाले विशेष और यौन प्रकार के यंत्र या औजार बना रहा है।

हरेक व्यक्ति के अंदर पुरुष और स्त्री दोनों भाग समाहित हैं~ चार बराबर हिस्सों से एक पूरा शरीर बनता है

दरअसल हम सब यब-युम जोड़े के रूप में ही हैं, पर उसे भूल चुके हैं। उसे याद दिलाने के लिए ही पुरुष और स्त्री की अलगअलग रचना हुई है। पुरुष स्त्री का आलिंगन करना चाहता है, अपने शरीर के यब हिस्से को जगाने के लिए। उसके शरीर का केवल युम हिस्सा ही क्रियाशील होता है। हमारे शरीर का पीठ वाला भाग युम है। वह युम या पुरुष भाग वज्र नाड़ी से शुरु होकर, सुषुम्ना के रूप में मेरुदण्ड से होता हुआ सहस्रार चक्र पर समाप्त होता है। यब या स्त्री भाग भी वज्र नाड़ी को घेरने वाली लिंग संरचना से शुरु होकर शरीर के आगे के चक्रोँ से ऊपर होता हुआ सहसरार चक्र पर खत्म होता है। पुरुष और स्त्री भाग वज्र शिखा पर, जिसे प्रकारान्तर से मूलाधार चक्र भी कह सकते हैं, और सहस्रार चक्र पर पूरी तरह से आपस में जुड़े होते हैं, यह मान के चल सकते हैं। बाकि चक्रोँ पर भी ये आपस में जुड़ने की कोशिश करते हैं। चित्रों में भी ऐसा ही दिखाया जाता है। वहाँ आगे और पीछे के चक्र आपस में एक रेखा से जुड़े दिखाए जाते हैं। चित्रों में तो शरीर के बाएं और दाएं भाग में इड़ा और पिंगला दिखाए जाते हैं। ये भी सही है। इड़ा यब है, और पिंगला युम है। सुषुम्ना मेरुदण्ड के बीच में है। पर सम्भोग योग से तो शक्ति सीधी ही सुषुम्ना से होते हुए सहस्रार में ली जाती है। मेरे को लगता है कि इड़ा और पिंगला वाले टोटके तो साधारण किस्म के योगों में होते हैं। तांत्रिक सम्भोग योग तो शोर्टेस्ट रूट है, क्योंकि इसमें इड़ा और पिंगला आती ही नहीं, शक्ति सीधी सहस्रार में पहुंच जाती है। कमजोरी की अवस्था में कई बार इड़ा और पिंगला की वजह से व्यवधान आ तो सकता है, पर वह हल्का होता है, और आसानी से काबू में आ जाता है। इसीलिए तो सम्भोग के प्रति दुनिया में सबसे ज्यादा आकर्षण दिखाई देता है। पर आम आदमी इसकी अध्यात्मवैज्ञानिकता को समझ नहीं पाता। वह इसीमें उलझा रहकर अपना जीवन समाप्त कर लेता है। पर योगी इससे योग-लाभ उठाकर अपने शरीर में ही यब-युम को पूरी तरह से अभिव्यक्त करके उभयलिंगी अर्थात अर्धनारीश्वर बन जाते हैं, और पृथक स्त्री अर्थात यब के आकर्षण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। इसका यह मतलब नहीं कि वे फिर सम्भोग योग नहीं करते। वे करते हैं, पर उन्हें इसकी कम जरूरत पड़ती है। उससे वे अपने स्वसम्भोग योग अर्थात एकलिंगी सम्भोग योग को बल देते रहते हैं। कई तो इतने अभ्यस्त, कार्यकुशल और निपुण हो जाते हैं कि वे कभी भी मूलाधार स्थित वीर्यशक्ति को नहीं गिराते, और हमेशा उसे ऊपर चढ़ाकर अपने शरीर में आत्मसात कर लेते हैं। उपरोक्त चर्चा से यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि जैसे शरीर का बायां और दायां भाग यब और युम है, उसी तरह से शरीर का आगे और पीछे का भाग भी यब और युम ही है। मतलब कि पूरा शरीर चारों तरफ से दो विपरीत टुकड़ों को जोड़कर बना है। सम्भवतः त्रिआयामी स्वस्तिक चिह्न का यही मतलब हो। सम्भवतः शक्ति को स्त्री के रूप में इसीलिए दिखाया जाता है, क्योंकि शरीर का आगे का भाग जो स्त्रीरूप है, वही आकर्षक है, और उसीकी शक्ति इकट्ठी होकर और नीचे जाकर मूलाधार क्षेत्र में स्थित हो जाती है, जहाँ से वह पीठ से होते हुए ऊपर चढ़ने का प्रयास करती है।

शीतजल स्नान से यबयुम जनित कुंडलिनी लाभ कैसे मिलता है~ मांस शरीर तंत्रिका शरीर पर मढ़ा हुआ

जब पूरे शरीर पर ठंडा जल गिरता है, तो उसकी संवेदना नाड़ियों के द्वारा ग्रहण कर ली जाती है, क्योंकि पूरे शरीर में नाड़ियों का जाल है। इससे नरम बाहरी शरीर और सख्त आंतरिक शरीर आपस में जुड़ जाते हैं, मतलब यब और युम एक हो जाते हैं। इससे अद्वैत भाव और उससे कुंडलिनी शक्ति क्रियाशील हो जाती है, कुंडलिनी चित्र के साथ। प्रत्येक संवेदना समान प्रभाव डालती है, इसलिए किसी भी दर्द की अनुभूति के बाद अद्वैत के साथ आनंद की अनुभूति होती है।

प्रकृति स्त्री-रूप है और आत्मा पुरुष-रूप है~ दो महत्वपूर्ण कोष या शरीर

नाड़ी संरचना पुरुष है और उस पर मृदु व सुंदर पेशीय संरचना नारी है। बेसिक नर्वस स्ट्रक्चर सेंसिटिव लाइफ पाने के लिए सॉफ्ट बाहरी स्ट्रक्चर को आकर्षित करता है। अंत में, आत्मा ही पुरुष है क्योंकि यही तंत्रिका तंत्र की सभी संवेदनाओं का आनंद लेती है। सारा दृश्यमय जगत स्त्री या प्रकृति रूप है, क्योंकि यह पुरुष को संवेदना प्रदान करता है। सांख्य दर्शन में भी ऐसा ही कहा गया है। इसमें प्रकृति को भोग्या और पुरुष को भोक्ता कहा गया है। क्यों न इन दो मुख्य आवरणों को ही दो मुख्य कोष न मान लें, जटिल पांच कोशों के विपरीत।

हिंदू स्वस्तिक चिह्न का अध्यात्मवैज्ञानिक रहस्य~ स्वस्तिक का केंद्रीय बिंदु एक पूर्ण और संतुलित इंसान का प्रतिनिधित्व करता है

त्रिआयामी स्वस्तिक चिह्न में आगे की तरफ की छोटी डंडी यम है, और पीछे की तरफ की छोटी डंडी यब है। दोनों डंडियां सीधी खड़ी लम्बी डंडी से जुड़ी हैं, मतलब यब और युम एक होकर बढ़ी हुई जागृति का निर्माण कर रहे हैं। इसी तरह दो छोटी डांडियां शरीर के बाएं भाग के यब और शरीर के दाएं भाग के युम को दर्शाती हैं, क्योंकि वे दोनों इसी दिशा में थोड़ी लम्बी व तिरछी डंडी से आपस में जुड़ी हैं। यह भी बढ़ी हुई जागृति दिखाती है। फिर खड़ी और तिरछी दोनों लम्बी डंडीयां केंद्र में एक बिंदु पर आपस में जुड़ी हैं। इसको दोनों तरफ के यब-युम जोड़ों की बराबर शक्ति मिल रही है, इसलिए यह बिंदु सबसे शक्तिशाली है। इसका मतलब है कि अपने शरीर के अंदर के दाएं-बाएं भाग के यब-युम को संतुलित करने के साथ ही स्त्री-पुरुष जोड़े वाला अर्थात शरीर के आगे-पीछे के भागों वाला यब-युम भी संतुलित होना चाहिए। और दोनों किस्म के यब-युम जोड़े भी आपस में संतुलित होने चाहिए। यह अलग बात है कि क्या कोई अपने शरीर के अंदर ही स्त्री-पुरुष जोड़ा ढूंढ लेता है, तो कोई बाहर से किसी यौन साथी की सहायता लेता है।

पुरुष के लिए स्त्री स्त्री है और स्त्री के लिए पुरुष स्त्री है~ यौन भेदभाव भ्रमपूर्ण और सापेक्ष है, सत्य और निरपेक्ष नहीं है

दरअसल स्त्री का अस्तित्व ही नहीं है। हर जगह पुरुष ही पुरुष है। स्त्री हमें भ्रम से दिखाई देती है। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि सम्भोग योग के समय स्त्री भी अपनी रज शक्ति को इसी तरह अपनी पीठ से ऊपर खींचती है जिस तरह पुरुष वीर्य शक्ति को अपनी पीठ से ऊपर खींचता है। मेरुदण्ड ही दरअसल पुरुष है, जो पुरुष और स्त्री में एकसमान है। इसी तरह आत्मा ही पुरुष है जो दोनों में एकसमान है। इसी तरह शरीर का अगला हिस्सा ही स्त्री है, और वह भी दोनों में एकसमान है। जो स्त्री सम्भोग योग के लिए पहल करती है, वह पुरुष की तरह लगती है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह यौन योग से अपनी मूलाधारनिवासिनी शक्ति को ऊपर खींचना चाहती है। जो पुरुष सम्भोग योग से शर्माए, वह स्त्री की तरह प्रतीत होता है। वह इसलिए क्योंकि वह इसलिए सम्भोग योग से दूर भाग रहा है, क्योंकि वह शक्ति को ऊपर नहीं खींच पाएगा, और उसे नीचे की ओर गिरा देगा, शरीर के स्त्रीरूप अगले भाग की तरह। इसलिए स्त्री को स्त्रीरूप समझना मुझे ऐतिहासिक साजिश लगती है, जिसके अनुसार स्त्री अपनी शक्ति गिराती रहे, और पुरुष अपनी शक्ति उठाता रहे। पर तंत्र में ऐसा नहीं है। तंत्र में अपनी शक्ति उठाने का दोनों को समान अधिकार है। इसीलिए तंत्र में स्त्री पुरुष दोनों बराबर हैं। हालांकि यह अलग मामला है कि पुरुष को यौन शक्ति के संरक्षण की ज्यादा आवश्यकता है, क्योंकि तुलनात्मक रूप में उससे स्त्री साथी से कहीं ज्यादा शक्ति की बर्बादी होती है।

स्त्रीपुरुष का जोड़ा जितना बराबर उतना अच्छा, हालांकि बेमेल जोड़ यिन-यांग गठबंधन को बढ़ावा देते हैं

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि एकसमान कद-काठी होने से पूरे शरीर में व्याप्त यिन और यांग आपस में ज्यादा अच्छे से घुलमिल जाते हैं, जिससे ज्यादा अच्छा अद्वैत भाव पैदा होता है। इससे ज्यादा कुंडलिनी लाभ मिलता है। वैसे तो पुरुष और स्त्री दोनों अपने एक ही शरीर में होते हैं, पर उसे पाने के लिए बाहर से मदद लेनी ही पड़ती है। देखा जाए तो यौन शक्ति के आध्यात्मिक रूपान्तरण के लिए दो-चार इंच का क्षेत्र ही काफी होता है, पर यिन-यांग के गठजोड़ के लिए तो भरापूरा और विपरीतता के साथ मिलताजुलता शरीर चाहिए होता है। इससे अतिरिक्त लाभ मिलता है। लगता है कि पुराने जमाने में इसपर ज्यादा गौर नहीं किया जाता था, इसीलिए विवाह से पहले शरीर मिलाने की बजाय नवग्रह-जन्मपत्री मिलाई जाती थी। पता नहीं इसमें क्या विज्ञान है कि प्रत्यक्ष को नजरन्दाज करके अनुमान पर भरोसा किया जाए। सम्भवतः यह नियम सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए भी था, ताकि सभी मर्द चंद खूबसूरत औरतों पर ही न टूट पड़ते, और कुरूप औरतें अविवाहित ही न रह जातीं या उन्हें निम्न दर्जे के मर्द से ही संतुष्ट न होना पड़ता। दरअसल व्यवहार में होता क्या है कि यदि यिन-यांग अच्छे से मैच हो जाए, तो कदकाठी मैच नहीं करते, और यदि कदकाठी अच्छे से मैच हो जाए, तो यिनयांग अच्छे से मैच नहीं होते। इसलिए समझौता करना पड़ता है। यदि दोनों गुण सर्वोत्तम रीति से मैच हो जाए, तो सर्वोत्तम जोड़ी मानी जाए। मेरे साथ भी ऐसा ही होता था। यिनयांग बहुत जबरदस्त ढंग से मैच होता था, पर कदकाठी जरा भी मैच नहीं होते थे। अंततः जन्मपत्री के ऊपर ही सभी कुछ छोड़ना पड़ा। इससे सब ठीक ही रहा। बोलने का मतलब है कि यदि प्रत्यक्ष से काम न बने, तभी पूरी तरह से अदृश्य के सहारे होना चाहिए। वैसे कुल मिलाकर यह निष्कर्ष भी निकलता है कि छोटी कद-काठी यिन है, और बड़ी कद-काठी यांग होता है। इसलिए लम्बू-छोटू जोड़ी बनना भी स्वाभाविक और योगानुसार ही है।

चाइनीज यिन सुस्त और यांग चुस्त है, जबकि तांत्रिक यिन चुस्त और यांग सुस्त है~ दो प्रकार के यौन तंत्र

इसका मतलब है कि चाइनीज सिस्टम में विषमवाही तंत्र को ज्यादा मान्यता है, जबकि भारतीय तंत्र में समवाही तंत्र को। विषमवाही तंत्र मतलब औरत को एक तांत्रिक मशीन समझा जाता है। उसकी इससे ज्यादा अपनी कोई अहमियत नहीं। इसलिए वह सुस्त और दबी हुई सी रहती है। उसकी सहायता से प्रकाश अर्थात कुंडलिनी को घुमाया जाता है। उस कुंडलिनी के रूप में कोई भी मानसिक चित्र हो सकता है, पर वह स्त्री नहीं। इसके विपरीत समवाही तंत्र में स्त्री को कुंडलिनी अर्थात देवी का रूप दिया जाता है। इससे वह अपनी मनमोहक छटाएं प्रदर्शित करती है। इससे स्त्री को भरपूर सम्मान मिलता है। उसे पुरुष के बराबर या उससे भी बढ़कर माना जाता है। आपने देखा होगा कि कैसे भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी की, भगवान शिव देवी पार्वती की और भगवान ब्रह्मा देवी सरस्वती की सेवा में लगे रहते हैं। बाकि अपवाद तो हर सिस्टम में ही देखे जाते हैं।

क्या हम स्वाधिष्ठान चक्र के जागरण को बिमारी तो नहीं मान रहे? प्रोस्टेट संभोग शिश्न संभोग से बेहतर है

यहाँ पर बेनाइन प्रॉस्टेट हाइपरट्रॉफी मतलब बीएचपी या प्रॉस्टेट की जलन अर्थात इन्फलेमेशन का जिक्र हो रहा है। परमात्मा शिव ने पूर्वोक्त कार्तिकेय जन्म की कथा में कबूतर बने अग्निदेव को कहा था कि तेरी जलन ठंडे जल से स्नान करने वाली ऋषिपत्नियां हर लेंगी। उस जलन को ही विज्ञान की भाषा में प्रॉस्टेट इंफ्लेमेशन अर्थात प्रॉस्टेटाइटिस या बीएचपी नामक रोग कहते हैं। कहीं यही स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण तो नहीं, जिसे शीतजल स्नान से व कुंडलिनी योग से ठीक किया जा सकता हो। वैसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि ज्यादातर प्रॉस्टेट प्रॉब्लम चिंता या अवसाद से होती है, जिसे दूर करने के लिए योग एक रामबाण उपाय है। बात कुल मिलाकर वही है। ठंडे जल के स्पर्ष से वह जलन दूसरे चक्रोँ पर चली जाती है, मतलब वे जागृत हो जाते हैं। इसमें सबसे ज्यादा सम्भावना मणिपुर चक्र के जागृत होने की होती है, क्योंकि चक्र क्रमवार ही जागृत होते हैं। पर ऐसा भी नहीं हमेशा। यह जलन सीधी विशुद्धि चक्र और अनाहत चक्र को भी जा सकती है। उक्त कथा के अनुसार महादेव एक हजार वर्षों तक देवी पार्वती के साथ एक गुफा में विहार करते रहे, और अंततः उनका मूलाधार चक्र और फिर स्वाधिष्ठान चक्र जागृत हो गया। जब स्वाधिष्ठान चक्र जागृत हुआ, तब वे गुफा से बाहर आए मतलब आध्यात्मिक कामक्रीड़ा से विरत हुए। मेरे बोलने का मतलब है कि स्वाधिष्ठान चक्र के जागरण के रूप में जो कुदरत का तोहफा मिलता है, लोग उसे दूर करने के लिए इलाज करवाने भागते हों या उससे परेशान होते हैं, जबकि उसकी ऊर्जा अन्य चक्रोँ को देकर कुंडलिनी लाभ भी मिलता हो, और वह शांत भी रहता हो। ये मैं इसलिए भी कह रहा हूँ क्योंकि आजकल प्रॉस्टेट की उत्तेजना या जलन से प्राप्त प्रॉस्टेट आर्गेस्म प्राप्त करने की होड़ सी लगी है। बहुत से यंत्र और तकनीकें विकसित हो रही हैं इसके लिए। अनुभवी लोग बताते हैं कि पेनाइल आर्गेस्म के विपरीत प्रॉस्टेट आर्गेस्म बहुत ज्यादा चिरस्थायी होता है, और आनंद भी ज़्यादा देता है। पेनाईल आर्गेस्म तो स्खलन के कुछ क्षणों तक ही मौजूद रहता है। इसमें वाकई अध्यात्मवैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

यौन संयम क्यों न अपनाया जाए~ वामपंथी और दक्षिणपंथी जीवन शैली के बीच एक स्वस्थ संतुलन

जैसा कि शिवपुराण में रहस्यात्मक रूप में कहा गया है कि वीर्यपात-अवरोधी सम्भोग से प्रॉस्टेट में स्थायी जलन अर्थात इन्फलेमेशन हो सकती है, हालांकि उसे दूर करने का उपाय भी बताया गया है, तब क्यों न यह मान लिया जाए कि वैष्णवों का दक्षिणाचार ही अच्छा है। या कम से कम यह मान लो कि मध्यमार्ग अच्छा है, जिसमें पुरुष-स्त्री के बीच में असीम सात्विक प्रेम होता है, पर शारीरिक संबंध नहीं होता। इससे यब-युम लाभ मिलने से कुंडलिनी भी घूमेगी, और स्वास्थ्य समस्या भी पैदा नहीं होगी। मतलब हर तरफ लाभ ही लाभ। तो मेरा मानना है कि विवाह न होने तक ऐसा ही परहेज रखना चाहिए। इससे स्वस्थ सामाजिकता भी बनी रहेगी और कुंडलिनी भी बनी रहेगी। विवाह के बाद तो प्रेम के साथ ज्यादा संयम रखना मुश्किल हो जाता है। साथ में, मुझे यह भी लगता है कि कुंडलिनी जागरण को प्राप्त करने के लिए बहुत शक्ति की जरूरत होती है, इसलिए भगवान शिव की तरह अविरत सम्भोग योग जरूरी है। जब एक-दो महीने के भीतर जागरण हो जाए, तो स्वास्थ्य सुरक्षा को देखते हुए सम्भोग कम कर दे। यदि जागरण न होए, तो भी 1-2 महीने ही प्रयास करे, क्योंकि इसका मतलब है कि व्यक्ति जागरण के लिए परिपक्व नहीं है, और अतिरिक्त प्रयास अधिकांशतः विफल ही जाएगा, व स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा करेगा। फिर कुछ वर्षों तक साधारण तांत्रिक कुंडलिनी योग का अभ्यास करते हुए जागरण के लिए पात्र बनाने वाला लाइफस्टाइल अपनाए, और उचित समय और अवसर और एकांत मिलने पर जैसे कि शांति, तनाव व काम के बोझ में कमी महसूस होने पर और शक्ति का अहसास होने पर फिर 1-2 महीने के लिए अविरत व समर्पित सम्भोग योग करे। इस तरह करता रहे। या दूसरा तरीका यह अपनाए कि भगवान शिव की तरह सर्व-आनंदमयी सम्भोग योग में सालों तक अर्थात तब तक दिनरात इच्छानुसार लगा रहे, जब तक कि प्रॉस्टेट में जलन न होने लगे अर्थात जब तक स्वाधिष्ठान चक्र जागृत न हो जाए, और उससे खुद ही सम्भोग से मन न ऊबने लगे। उस अवस्था के बाद आदमी उभयलिंगी सा बनकर अपने साथ ही संभोग योग करने लगता है। कामकाज के बोझ से उसके आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर जलन के रूप में शक्ति इकठ्ठा होती रहती है, जिसे वह योग व शीतजल स्नान की सहायता से पीठ से ऊपर चढ़ाता रहता है। यह चक्र चलता रहता है। इससे वह अंततः धीरेधीरे क्रमवार चक्रोँ को जागृत करते हुए सहस्रार को जागृत करके पूर्ण जागृति प्राप्त कर लेता है, उपरोक्त प्रथम उपाय की तरह एक-दो महीने के ताबड़तोड़ सम्भोग योग से एकदम से जागृति प्राप्त नहीं करता। इस पर भी मनोवैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

शक्ति का प्रवाह नाड़ियों के माध्यम से होता है, जिसे विज्ञान की भाषा में नर्व कहते हैं~ कैसे शिव तक पहुँचती है शक्ति

कोई भी काम शक्ति से ही होता है। यदि सड़क पर गाड़ी चल रही है तो कहेंगे कि इंजन शक्ति से गाड़ी चली। अगर टांगा चल रहा है तो कहेंगे कि यह अश्व शक्ति से या संक्षेप में शक्ति से चल रहा है। शक्ति का भी कोई प्रेरक जरूर होता है। इंजन शक्ति और अश्व शक्ति, दोनों का प्रेरक ईंधन या अग्नि है। हमारा शरीर भी नाड़ी शक्ति या सिर्फ शक्ति से चलता है। यदि नाड़ी शक्ति न हो, तो हट्टाकट्टा शरीर भी किसी काम का नहीं है। आपने देखा होगा कि पक्षाघात के बाद कैसे बाजू या टांग काम करना बंद कर देती है। वैज्ञानिक रूप से शक्ति या नाड़ी शक्ति नर्व फाइबर्स की क्रियात्मक उत्तेजना के रूप में ही होती है। शरीर की इसी नाड़ी शक्ति को ही संक्षेप में शक्ति कहते हैं। क्या आपने कभी सोचा कि इस शक्ति को प्रेरित करने वाली क्या चीज है? दार्शनिकों ने ऐसा सोचा भी और लिखा भी, जो धर्मशास्त्रों में पढ़ने को मिल जाता है। इंजन की गति रूपी नाड़ी शक्ति को भोजन रूपी ईंधन के सहयोग से प्रेरित करने वाला तत्त्व अग्नि-चिंगारी रूपी चेतन आत्मा ही है। मूलाधार में जो आनंदपूर्ण संवेदना महसूस होती है, वही इस शक्ति को प्रेरित करती है। अर्थात यह सबसे बड़ी मात्रा वाली शक्ति को प्रेरित करती है, जिसे हम कुंडलिनी शक्ति कहते हैं। जब इसे प्राण वायु का विशेष बल भी साथ में मिले, तब इसे ही प्राण शक्ति भी कहते हैं। वैसे तो हर प्रकार का चेतन अनुभव हमारी शक्ति को प्रेरित करता रहता है, जिससे हम जीवित बने रहते हैं, पर क्योंकि मूलाधार की अनुभूति सबसे अधिक आनंददायक और चेतना से भरी है, इसीलिए इसे ही शक्ति या कुंडलिनी शक्ति या प्राण शक्ति का स्रोत कहा जाता है। मुझे आज यह बात समझ में आई कि शास्त्रों में ऐसा क्यों कहा गया है कि परमात्मा अर्थात चेतना ही शक्ति का मूल स्रोत है। शास्त्रों में वैज्ञानिक रूप से ज्यादा विस्तार नहीं लगता मुझे तथ्यों का, सम्भवतः इसीलिए क्योंकि पुराने युग में तथ्य विश्वास के आधार पर समझे या माने जाते थे, वैज्ञानिक जाँचपड़ताल के आधार पर नहीं। चेतना के इसी शक्तिप्रेरक योगदान के कारण ही डोपामीन अर्थात रिवार्ड कैमिकल काम करता है। जो चढ़दी कला में होते हैं, उनके आगे सफलता के द्वार एक के बाद एक खुलते जाते हैं। पर कई बार ज्यादा ही चढ़दी कला से उच्च रक्तचाप और तनाव आदि से संबंधित समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं। यह ऐसे ही होता है जैसे बिजली की जरूरत से ज्यादा वोल्टेज से बल्ब ही फ्यूज हो जाता है। मूलाधार की संवेदना पर पैदा हुई शक्ति तो चढ़ेगी ही चक्र तक, क्योंकि उसके साथ चक्र पर चेतन कुंडलिनी का ध्यान किया जा रहा होता है। जिस रास्ते से शक्ति गुजरती है, उसे नाड़ी या चैनल कहते हैं। चक्र पर वह शक्ति ज्यादा प्रभाव पैदा करती है, क्योंकि वहाँ जड़ जैसी संवेदना के साथ चेतन कुंडलिनी चित्र का भी ध्यान होता है। इसीलिए कहते हैं कि शक्ति शिव की ओर गमन करती है। कई लोग कुंडलिनी योग से तृप्त नहीं होते। इसकी मुख्य वजह है कि उनके मूलाधार पर शक्ति ही पैदा नहीं हुई होती है। मूलाधार को हम शक्ति उत्पादक यंत्र कह सकते हैं। वे चक्रोँ पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान भी करते हैं, पर फिर भी प्यासे से बने रहते हैं। शक्ति की प्यास को तो मूलाधार ही बुझा सकता है। प्रजनन से सृष्टि के विस्तार के लिए ही मूलाधार को विशेष शक्ति दी गई है। होता तो सब नर्व फाइबर से ही। मतलब कि मूलाधार में यह उत्तम गुणवत्ता का है। यह तो मुर्गी और अंडे के जैसी कहानी है। पहले मूलाधार में नर्व फाइबर की उत्तेजना से शक्ति पैदा होती है, फिर वह शक्ति मेरुदण्ड से होकर मस्तिष्क तक जाती है, और उससे मस्तिष्क में आनंदमयी संवेदना महसूस होती है, फिर वह आनंदमयी संवेदना भी नर्व फाइबरस को उत्तेजित करती है, जिससे और शक्ति पैदा होती है। मस्तिष्क से वह शक्ति नाड़ीजालों के माध्यम से पूरे शरीर में और मूलाधार तक फैल जाती है। मतलब शक्ति एक बंद लूप जैसा बनाती है। शक्ति का लूप में घूमना ही माईक्रोकोस्मिक औरबिट के आधार में है। यही बंद लूप ही औरोबोरस सांप है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे रिफ़लेक्स आर्क कहते हैं। यदि उस समय हम किसी विशेष चक्र पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करें, तो शरीर के अन्य हिस्सों की अपेक्षा शक्ति उसी चक्र पर ज्यादा पहुंचती है, जिससे वहाँ कुंडलिनी चित्र और अधिक चमकने लगता है। मतलब कि शक्ति मानसिक चित्र को ज्यादा से ज्यादा चमकाने की कोशिश करती है, ताकि वह जागृत होकर शिव बन सके। यही शक्ति का शिव की तरफ गमन है। कुंडलिनी चित्र का मतलब किसी के ऊपर प्रेम न्योछावर करना नहीं है, बल्कि उसकी मदद से शक्ति को काबू करना है। कहीं ज़ख्म वगैरह हो जाए तो वहाँ दर्द और लाली पैदा हो जाती है। दर्द वह चेतन संवेदना है जो लाल रंग की शक्ति को अपनी ओर खींचती है। फिर कहेंगे कि जिन अंगों की दर्द महसूस नहीं होती, वहाँ शक्ति कैसे पहुंचती है और उनकी हीलिंग कैसे होती है। इसमें चेतना द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से काम होता है। जब दर्द वाले हिस्से से नाड़ी ऊर्जा मस्तिष्क को पहुंचती है, तो मस्तिष्क के अनुभव न होने वाले हिस्से में संवेदना पैदा करती है। इससे वहाँ बहुत सी नाड़ी ऊर्जा और उससे जुड़े रसायनों की खपत हो जाती है। इससे मस्तिष्क के चेतन अनुभव पैदा करने वाले हिस्से में नाड़ी ऊर्जा की कमी हो जाती है। इससे आदमी आनंदहीन सा रहने लगता है। इसलिए चेतना के आनंद को पैदा करने के लिए यही रास्ता बचता है कि शरीर की गहराई में दबे ज़ख्म को जल्दी से जल्दी भरा जाए। इसके लिए नाड़ी ऊर्जा उस ज़ख्म पर केंद्रित होने लगती है। दरअसल रक्त प्रवाह के आधार में यही नाड़ी ऊर्जा होती है। रक्त प्रवाह अगर गाड़ी है, तो उसे नियंत्रित करने वाली नाड़ी ऊर्जा उसका चालक है। चेतन आत्मा को आप स्टेशन मास्टर कह सकते हैं। जब हम नाड़ी ऊर्जा को मूलाधार से मेरुदण्ड के रास्ते ऊपर चूसते हैं, तब रक्त प्रवाह भी खुद ही ऊपर चला जाता है। इससे ही मूलाधार के आसपास का दबाव घटा हुआ महसूस होता है। रक्त तो मेरुदण्ड से ऊपर नहीं चढ़ सकता, क्योंकि उसमें नर्व फाइबर की एक रस्सी है, कोई रक्त की नलिका नहीं है। इसलिए कुंडलिनी योग का साधारण सा सिद्धांत है कि गाड़ी चालक को नियंत्रित करो, गाड़ी खुद नियंत्रित हो जाएगी।

नाड़ियों का जाल ही शिव पर लिपटे सर्प हैं~ नागों से भरा मानव शरीर

भगवान शिव पर लिपटे सर्प आदि को देखकर पार्वती की मां मैना डर गई थीं। दरअसल शिव एक महा योगी थे। उनके शरीर की हरेक नाड़ी जागृत थी, केवल सुषुम्ना ही नहीं। इससे वे हरेक नाड़ी में सरसराहट के साथ कुंडलिनी को महसूस करते रहते थे हमेशा। स्वाभाविक है कि उन सरसराहटों को अनुभव करते हुए उनके अंगों का स्वभाव व उनकी चाल भी सर्प की तरह हो गई हो, जिसे मैना महसूस कर पा रही हो। शायद योगी गोपीकृष्ण के साथ भी ऐसा ही होता था। उन्हें अपने शरीर की हरेक नाड़ी की गति महसूस होती थी। इससे वे परेशान भी हो गए थे। फिर वे उसके अनुसार ढल भी गए थे। इसी पर आधारित सुंदर रचना है शिवपुराण में, त्रिपुरासुर वध की, जो मैं निचले पैराग्राफ में लिख रहा हूँ, संक्षेप में।

त्रिपुरासुर राक्षस प्रकृति के तीन गुण हैं, और कुंडलिनी जागरण ही उनको मारना है~ एक शिव पुराण कथा का रहस्योद्घाटन

एक राक्षस का पुर सोने का, एक का चांदी का और एक का लोहे का था। ये क्रमशः सत्त्व, रजस और तमो गुण के प्रतीक हैं। राक्षस मतलब इन गुणों के साथ उठने वाली आसक्तिपूर्ण भावनाएँ। इनको मारने के लिए शिव मतलब आत्मा ने शरीर रूपी रथ बनाया, मंन्द्राचल मतलब मेरुदण्ड को धनुष बनाया, और वासुकि नाग मतलब सुषुम्ना नाड़ी को बाण बनाया। राक्षसों से युद्ध किया मतलब मूलाधार से कुंडलिनी शक्ति को योगसाधना से सुषुम्ना के रास्ते ऊपर चढ़ाया और उसे सहस्रार में जागृत किया। उससे प्रकृति के तीनों गुणों के प्रति सारी आसक्ति खत्म हो गई मतलब त्रिपुरारि राक्षस मर गए। इससे शरीर में बसने वाले देवता खुश हो गए क्योंकि वे शरीर के बंधन से मुक्त हो गए। कभी समय लगा तो इस पर और प्रकाश डालूंगा, पर मूल चीज यही है।

उज्जैन का महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग

उज्जैन में महाकाल मंदिर में यह त्रिपुरासुर वाली घटना घटी थी, ऐसा कहते हैं। इसीलिए अभी हाल ही में निर्मित भव्य महाकाल कोरिडोर में इसको दर्शाती मूर्तियां और कलाकृतियाँ प्रमुखता से सबसे मुख्य स्थान पर लगाई गई हैं। त्रिपुरासुरों को मारने के कारण ही महादेव शिव को त्रिपुरारि भी कहते हैं।

शक्ति का गमन बिना सीधी नाड़ी के भी होता है~ मन एक विद्युत चुम्बकीय तरंग के रूप में और कुंडलिनी छवि एक इलेक्ट्रॉन के रूप में तंत्रिका रूपी विद्युत तार में यात्रा करती है

वैसे शक्ति का गमन बिना सीधी नाड़ी के भी होता है, हालांकि लगता है कि पीठ की सुषुमना नाड़ी से ही सबसे ज्यादा शक्ति का गमन होता है, जिससे कुंडलिनी जागरण होता है। शरीर के आगे के भाग के चैनल में तो पीठ की तरह सीधी नाड़ी होती ही नहीं। वहाँ तो कुंडलिनी चित्र की मदद से ही स्टेप बाय स्टेप चक्रोँ से होते हुए गमन होता है। अगर आप फ्रंट आज्ञा चक्र पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करो तो आपका पेट अंदर की ओर सिकुड़ेगा, मतलब शक्ति फ्रंट आज्ञा चक्र से फ्रंट मणिपुर चक्र तक पहुंच गई। यह एकदम कैसे हुआ जबकि दोनों चक्रोँ को जोड़ने वाली कोई सीधी नाड़ी नहीं है। दरअसल योगाभ्यास में हम ऊपर से नीचे तक बारीबारी से सभी चक्रोँ पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करते हैं। जिस चक्र पर कुंडलिनी चित्र होता है, वहाँ शक्ति क्रियाशील हो जाती है, क्योंकि चेतन शिव शक्ति को नचाता है अर्थात उसे क्रियाशील करता है, और शक्ति फिर बदले में शिव को भी नचाती है मतलब उसे ज्यादा अभिव्यक्त करती है। इससे वहाँ सिकुड़न सी महसूस होती है, और कुंडलिनी चित्र भी ज्यादा चमकने लगता है। शक्ति तो पहले भी वहाँ होती है, पर वह सोई जैसी अवस्था में होती है। विज्ञान की भाषा में इसे ऐसे कह सकते हैं कि वहाँ नाड़ी चलाने वाले कैमिकल अर्थात न्यूरोट्रान्समिटर तो मौजूद हैं, पर क्रियाशील अवस्था में नहीं हैं। बिल्कुल विद्युत तरंग की तरह काम होता है। जैसे वास्तव में इलेक्ट्रोन तो बहुत धीमी गति से चलते हैं, एक घंटे में कुछ मीटर ही, पर उन इलेक्ट्रोनों को धक्का देने वाली विद्युतचुम्बकीय तरंग प्रकाश की गति से चलती है, इसलिए धरती के एक छोर पर स्विच ऑन करने पर धरती के दूसरे छोर पर उसी क्षण विद्युत करेंट पहुंच जाता है। उसी तरह नाड़ी चलाने वाले रसायन तो घूम फिर कर निचले चक्र पर पहुंचने में कुछ सेकंड लगा सकते हैं, क्योंकि सभी नर्व फाइबर्स आपस में कहीं न कहीं से जुड़े हैं, बेशक अगले चक्रोँ को कोई सीधी नाड़ी आपस में नहीं जोड़ती, पर मन से सोचा गया कुंडलिनी चित्र एक क्षण में ही निचले चक्र पर पहुंच जाता है। वह कुंडलिनी चित्र ही वहाँ की स्थानीय नाड़ियों को क्रियाशील करके वहाँ चमक के साथ संकुचन पैदा करता है। यह ऐसे ही है जैसे विद्युतचुंबकीय तरंग अपने दायरे में आने वाले इलेक्ट्रोनों को गति देते हुए एक क्षण में ही हजारों किलोमीटर लम्बी विद्युत तार में फैल जाती है। इसलिए हम मन की तुलना विद्युतचुम्बकीय तरंग से कर सकते हैं।

कुंडलिनी योग बनाम परमाणु विश्वयुद्ध

कुंडलिनी ऊर्जा ही नीलकंठ शिव महादेव के हलाहल विष को नष्ट करती है

दोस्तों, मैं हाल ही में एक स्थानीय मेले में गया। वहाँ मैं ड्रेगन ट्रेन को निहारने लगा। उसका खुले दांतों वाला मुंह दिखते ही मेरे अंदर ऊर्जा मुलाधार से ऊपर उठकर घूमने जैसी लग जाती थी। हालांकि यह हल्का आभास था, पर आनंद पैदा करने वाला था, लगभग वैसा ही जैसा शिवलिंगम के दर्शन से महसूस होता है। स्थानीय संस्कृति के अनुसार बाहरी अभिव्यक्ति के तरीके बदलते रहते हैं, पर मूल चीज एक ही रहती है। इसी के संबंध में मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे गुस्से आदि से कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क से नीचे उतरकर यौद्धा अंगों को चली जाती है। इससे मस्तिष्क में स्मरण शक्ति और भावनाएं क्षीण हो जाती हैं। भावनाएँ बहुत सारी ऊर्जा को खाती हैं। इसीलिए तो तीखी भावनाओं या भावनात्मक आघात के बाद आदमी अक्सर बीमार पड़ जाता है। आपने सुना होगा कि फलां आदमी अपने किसी प्रिय परिचित को खोने के बाद बीमार पड़ गया या चल बसा। गहरे तनाव के दौरान दिल का दौरा पड़ना तो आजकल आम ही हो गया है। शरीरविज्ञान दर्शन से अनियंत्रित भावनाओं पर लगाम लगती है। उपरोक्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ड्रेगन के ध्यान से या उसको अपने शरीर पर आरोपित करने से कुंडलिनी शक्ति विभिन्न चक्रोँ पर उजागर होने लगती है। सम्भवतः बुद्धिस्टों के रैथफुल डाइटि भी इसी सिद्धांत से कुंडलिनी की मदद करते हैं। दरअसल विभिन्न धर्मशास्त्रों में जो आचार शिक्षा दी जाती है, उसके पीछे यही कुंडलिनी विज्ञान छुपा है। सत्य बोलो, चोरी न करो, क्रोध न करो, मीठा बोलो, हमेशा प्रसन्न व हँसमुख रहो, आसक्ति न करो आदि वचन हमें अवैज्ञानिक लगते हैं, पर इनके पीछे की वजह बहुमूल्य ऊर्जा को बचा कर उसे कुंडलिनी को उपलब्ध कराना ही है, ताकि वह जल्दी से जल्दी जागृत हो सके। कइयों को इसमें केवल स्वास्थ्य विज्ञान ही दिखता है, पर इसमें आध्यात्मिक विज्ञान भी छुपा होता है। ड्रेगन, शेर आदि हिंसक जीवों की ऊर्जा जब मस्तिष्क से नीचे उतरती है, तब सबसे पहले चेहरे, जबड़े और गर्दन पर आती है। इसीलिए तो क्रोध भरे मुख से गुर्राते हुए ये जबड़े और गर्दन की कलाबाजी पूर्ण गतियों से शिकार के ऊपर टूट पड़ते हैं। फिर कुछ अतिरिक्त ऊर्जा आगे की टांगों पर भी आ जाती है, जिससे ये शिकार को कस कर पकड़ लेते हैं। जब इन क्रियाओं से दिल थक जाता है, तब अतिरिक्त ऊर्जा दिल को भी मिलती है। उसके बाद ऊर्जा पेट को पहुंचती है, जिससे भूख बढ़ती है। इससे वह और हमलावर हो जाता है, क्योंकि वहाँ से ऊर्जा बैक चैनल से वापिस ऊपर लौटने लगती है, और टॉप पर पहुंचकर एकदम से जबड़े को उतर जाती है। जब इतनी मेहनत के बाद भी शिकार काबू में न आकर भागने लगता है, तो ऊर्जा टांगों में पहुंच कर शिकारी को उसके पीछे भगाने लगती है। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा मस्तिष्क को वापिस चली जाती है, और शिकारी पशु थक कर बैठ जाता है। फिर वह अपनी ऊर्जा को नीचे उतारने के लिए चेहरे को विकृत नहीं करता क्योंकि तब उसे पता लग जाता है कि इससे कोई फायदा नहीं होने वाला। वह इतना थक जाता है कि उसके पास ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा नहीं बची होती। ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा चाहिए होती है। इसीलिए उस समय वह गाय की तरह शांत, दयावान, अहिंसक और सदगुणों से भरा लगता है, उसकी स्मरणशक्ति और शुभ भावनाएँ लौट आती हैं, क्योंकि उस समय उसका मस्तिष्क ऊर्जा से भरा होता है। यह अलग बात है कि मस्तिष्क से नीचे उतरी हुई ऊर्जा उसे अंधकार के रूप में महसूस होती है, कुंडलिनी चित्र के रूप में नहीं, क्योंकि निम्न जीव होने से उसमें दिमाग़ भी कम है, और वह कुंडलिनी योगी भी नहीं है। दरअसल जो शिव ने विष ग्रहण करके उसे गले में फँसा कर रखा था, वह आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त ऊर्जा ही है। विष का पान किया, मतलब आम दुनिया की बुरी बातें और बुरे दृश्य नकारात्मक ऊर्जा के रूप में कानों और आँखों आदि से अंदर प्रविष्ट हो गए। वह नकारात्मक ऊर्जा जब विशुद्धि चक्र पर पहुंचती है, तब वह कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित होकर वहाँ लम्बे समय तक फंसी रहती है। इसकी वजह है गर्दन की स्थिति और बनावट। गर्दन सिर और धड़ के जोड़ की तरह है, जो सबसे ज्यादा गतिशील है। जैसे पाईप आदि के बीच में स्थित लचीले और मुलायम जोड़ों पर पानी या उसमें मौजूद मिट्टी आदि जम कर फंस जाते हैं, उसी तरह गर्दन में ऊर्जा फंसी रह जाती है। इसीलिए तो भगवान शिव से वह विष न तो उगलते बना और न ही निगलते, वह गले में ही फंसा रह गया, इसीलिए शिव नीलकंठ कहलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जिसने विशुद्धि चक्र को सिद्ध कर दिया, उसने बहुत कुछ सिद्ध कर लिया। दरअसल अगर कुंडलिनी शक्ति को गले से नीचे के किसी चक्र पर उतारा जाए, तो वह एकदम से घूम कर दुबारा मस्तिष्क में पहुंच जाती है, और वहाँ तनाव के दबाव को बढ़ाती है। हालांकि फिर ज्यादातर मामलों में वह सकारात्मक या अद्वैतात्मक कुंडलिनी ऊर्जा के रूप में महसूस होती है, नकारात्मक या द्वैतात्मक ऊर्जा के रूप में नहीं। हृदय चक्र पर भी काफी देर तक स्थिर रहती है, नाभि चक्र और उसके नीचे के चक्रोँ से तो पेट की सिकुड़न के साथ एकदम वापिस मुड़ने लगती है। यद्यपि फिर यह सकारात्मक कुंडलिनी ऊर्जा है, लेकिन मस्तिष्क में इसके वापस बुरे विचारों में परिवर्तित होने की संभावना तब भी बनी ही रहती है। वह ऊर्जा योद्धा अंगों से उठापटक भी करवा सकती है। इसीलिए उसे गले के विशुद्धि चक्र पर रोककर रखा जाता है। मतलब कि अगर भगवान शिव तनाव रूपी जहर को गले से नीचे उतारकर पी जाए, तो वे विनाशकारी तांडव नृत्य से दुनिया में तबाही भी मचा सकते हैं, या वह रूपांतरित जहर उनके पेट से चूस लिया जाएगा, और वह रक्त में मिलकर पुनः मस्तिष्क में पहुंच जाएगा। मस्तिष्क में  जहर पहुंचने का अर्थ है, अज्ञानरूपी या मनोदोष रूपी अंधकार के रूप में मृत्यु की सम्भावना। मनोदोषों से दुनिया में फिर से तबाही का खतरा पैदा हो जाएगा। सम्भवतः कुंडलिनी शक्ति भोजन के साथ पेट में पहुंचती है, और वहाँ से इसी तरह मस्तिष्क में पहुंच जाती है। हालांकि, तथाकथित विकृत ऊर्जा रूपी जहर पीने के बाद, मस्तिष्क में पुन: अवशोषण के साथ, थोड़े अतिरिक्त विचारशील प्रयास के साथ लंबे समय तक इसके कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित बने रहने की अधिकतम संभावना होती है। शिव जहर को उगल भी नहीं सकते, क्योंकि अगर वे उसे बाहर उगलते हैं तो भी उससे जीवों का विनाश हो सकता है। आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाएं यदि बदजुबानी, गुस्से, बुरी नजर या मारपीट आदि के रूप में बाहर निकल जाएं, तो स्वाभाविक रूप से वे अन्य लोगों और जीवजंतुओं का अहित ही करेंगी। उससे समाज में आपसी वैमनस्य और हिंसा आदि दोष फैलेंगे। इसीलिए लोग कहते हैं कि फलां आदमी को गुस्सा तो बहुत आया पर वह उसे पी गया। दरअसल गुस्सा पीआ नहीं जाता, उसे गले में अटकाकर रखा जाता है, पीने से तो वह फिर से दिमाग़ में पहुंच जाएगा। इसीलिए कई लोगों को आपने परेशान होकर कहते हुए सुना होगा, मेरे तो गले तक आ गई। दरअसल कमजोर वर्ग के लोग ऐसा ज्यादा कहते हैं, क्योंकि न तो वे परेशानी को निगल सकते हैं, और न ही उगल सकते हैं, लोगों के द्वारा बदले में सताए जाने के डर से। दरअसल वे सबसे खुश होते हैं भोले शंकर की तरह, परेशानी को गले में फँसाए रखने के कारण। वे परेशान नहीं होते, परेशानी का उचित प्रबंधन करने के कारण। परेशान वे औरों को लगते हैं, क्योंकि उन्हें परेशानी को प्रबंधित करना नहीं आता। बहुत से लोगों को नीले गले वाले शिव बेचारे लग सकते हैं, पर बेचारे तो वे लोग खुद हैं, जो उन्हें समझ नहीं पाते। शिव किसीके डर की वजह से विष को गले में धारण नहीं करते, बल्कि अपने पुत्र समान सभी जीवों के प्रति दया के कारण ऐसा करते हैं। भगवान शिव सारी सृष्टि को बनाते और उसका पूरा कार्यभार सँभालते हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि उनका दिमाग़ भी तनाव और अवसाद से भर जाता होगा। वह तनाव गुस्से के रूप में दुनिया के ऊपर न निकले, इसीलिए वे तनाव रूपी विष को अपने गले में धारण करके रखते हैं। क्योंकि रक्त का रंग भी लाल-नीला ही होता है, जो शक्ति का परिचायक है, इसीलिए उनका गला नीला पड़ जाता है। वे एक महान योगी की तरह व्यवहार करते हैं।

समुद्र मंथन या पृथ्वी-दोहन मानसिक दोषों के रूप में विष उत्पन्न करता है, जिसे शिव जैसे महापुरुषों द्वारा पचाया या नष्ट किया जाता है

कहते हैं कि वह हलाहल विष समुद्रमंथन के दौरान निकला था। उसमें और भी बहुत सी ऐश्वर्यमय चीजें निकली थीं। समुद्र का मतलब संसार अर्थात पृथ्वी है, मंथन का मतलब दोहन है, ऐश्वर्यशाली चीजें आप देख ही रहे हैं, जैसे कि मोटरगाड़ियां, कम्प्यूटर, हवाई जहाज, परमाणु रिएक्टर आदि अनगिनत मशीनें। आज भी ऐसा ही महान मंथन चल रहा है। अनगिनत नेता, राष्ट्रॉध्यक्ष, वैश्विक संस्थाएं, वैज्ञानिक और तकनीशियन समुद्रमंथन के देवताओं और राक्षसों की तरह है। इस आधुनिक समुद्रमंथन से पैदा क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार आदि मन के दोषों के रूप में पैदा होने वाले विष को पीने की हिम्मत किसी में नहीं है। दुनिया दो धड़ों में बंट गई है। एकतरफ तथाकथित राक्षस या तानाशाह लोग हैं, तो दूसरी तरफ तथाकथित देवता या लोकतान्त्रिक लोग हैं। इसीलिए पूरी दुनिया आज परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। सभी को इंतजार है कि किसी महापुरुष के रूप में शिव आएंगे और इस विष को पीकर दुनिया को नष्ट होने से बचाएंगे।

आज के समय में जिम व्यायाम के साथ योग बहुत जरूरी है

बहुत सी खबरें सुनने को मिल रही हैं कि फलां कलाकार या सेलिब्रिटी या कोई अन्य जिम व्यायाम करते हुए दिल के दौरे का शिकार होकर मर गया। मुझे लगता है कि वे पहले ही तनाव से भरे जीवन से गुजर रहे होते हैं। इससे उनके दिल पर पहले ही बहुत बोझ होता है। फिर बंद कमरे जैसे घुटन भरे स्थान पर भारी व्यायाम से वह बोझ और बढ़ जाता है, जिससे अचानक दिल का दौरा पड़ जाता है। पहले योग से तनाव को कम कर लेना चाहिए। उसके बाद ही भौतिक व्यायाम करना चाहिए, अगर जरूरत हो तो, और जितनी झेलने की क्षमता हो। योग से नाड़ियों में ऊर्जा घूमने लगती है। जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के सहयोग से वह आसानी से मस्तिष्क से गले को या नीचे के अन्य चक्र को उतरती है, विशेषकर जब साथ में शरीरविज्ञान दर्शन की भी मन में भावना हो। शरीरविज्ञान दर्शन से मानसिक कुंडलिनी चित्र प्रकट होता है, और इसके साथ तालु-जीभ के परस्पर स्पर्ष के ध्यान से कुंडलिनी ऊर्जा अपने साथ ले जाता हुआ वह चित्र मस्तिष्क के दबाव को न बढ़ाता हुआ आगे के चैनल से होता हुआ किसी भी अनुकूल चक्र पर चमकने लगता है। इससे कुंडलिनी ऊर्जा व्यर्थ की बातचीत में बर्बाद न होकर विशुद्धि चक्र को भी पुष्ट करती है।

मस्तिष्क की ऊर्जा के सिंक या अवशोषक के रूप में विशुद्धि चक्र

ठंडे जल से नहाते समय जब नीचे से चढ़ती हुई ऊर्जा से मस्तिष्क का दबाव बढ़ जाता है या सिरदर्द जैसा होने लगता है, तब नीचे से आ रही ऊर्जा विशुद्धि चक्र पर कुंडलिनी प्रकाश और सिकुड़न के साथ घनीभूत होने लगती है। ऐसा लगता है कि नीचे का शरीर आटा चक्की का निचला पाट है, मस्तिष्क ऊपर वाला पाट है और विशुद्धि चक्र वह बीच वाला छोटा स्थान है, जिस पर दाना पिस रहा होता है। या ऊर्जा सीधी भी विशुद्धि चक्र को चढ़ सकती है, मस्तिष्क में अनुभव के बिना ही। जिसे ताउम्र प्रतिदिन गंगास्नान का अवसर प्राप्त होता था, उसे सबसे अधिक भाग्यवान, पुण्यवान और महान माना जाता था। “पंचस्नानी महाज्ञानी” कहावत भी शीतजल स्नान की महत्ता को दर्शाती है। गंगा के बर्फीले ठन्डे पानी में साल के सबसे ठंडे जनवरी (माघ) महीने के लगातार पांच पवित्र दिनों तक हरिद्वार के भिन्न-भिन्न पवित्र घाटों पर स्नान करना आसान नहीं है। आदमी में काफी योग शक्ति होनी चाहिए। पर यह जरूर है कि जिसने ये कर लिए, उसकी कुंडलिनी क्रियाशील होने की काफी सम्भावना है। इसीलिए कहते हैं कि ऐसे स्नान करने वाले को लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं, मुक्ति भी नहीं। ठंडे पानी से नहाने वाले व ठंडे स्थानों में रहने वाले लोग इसके विशुद्धि चक्र प्रभाव की वजह से बहुत ओजस्वी और बातचीत में माहिर लगते हैं। यह ध्यान रहे कि ठंडे पानी का अभ्यास भी अन्य योगाभ्यासों की तरह धीरेधीरे ही बढ़ाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य को कोई हानि न पहुंचे। जिस दिन मन न करे, उस दिन नहीं नहाना चाहिए। अभ्यास और सहजता का नाम ही योग है। यकायक और जबरदस्ती योग नहीं है। अगर किसी दिन ज्यादा थकान हो तो न करने से अच्छा योगाभ्यास धीरे और आराम से करना चाहिए। इससे आदमी सहज़ योगी बनना सीखता है। किसी दिन कमजोरी लगे या मन न करे तो उस दिन अन्य धार्मिक गतिविधियों को छोड़ा भी जा सकता है, मूलभूत हठ योगाभ्यास को नहीं, क्योंकि योग सांसों या प्राणों से जुड़ा होने के कारण जीवन का मूल आधार ही है, जबकि अन्य गतिविधियां ऐड ऑन अर्थात अतिरिक्त हैं। होता क्या है कि बातचीत के समय मन में उमड़ रही भावनाएं और विचार विशुद्धि चक्र पर कैद जैसे हो जाते हैं, क्योंकि उस समय विशुद्धि चक्र क्रियाशील होता है। जब योग आदि से पुनः विशुद्धि चक्र को क्रियाशील किया जाता है, तब वे वहाँ दबे विचार व भावनाएँ बाहर निकल कर नष्ट हो जाती हैं, जिससे शांति महसूस होती है, और आदमी आगे की नई कार्यवाही के लिए तरोताज़ा हो जाता है। यह ऐसे ही है, जैसे खाली ऑडियो रिकॉर्डर में ऑडियो कैसेट को घुमाने से उस पर आवाज दर्ज हो जाती है। जब उस लोडिड कैसेट को पुनः उसी तरह घुमाया जाता है, तो वह दबी हुई आवाज गाने के रूप में बाहर आ जाती है, जिसे हम सब सुनते हैं। इसी तरह सभी चक्रोँ पर होता है। यह मुझे बहुत बड़ा चक्र रहस्य लगता है, जिसके बारे में एक पुरानी पोस्ट में भी बात कर रहा था।

श्री शब्द एक महामंत्र के रूप में (धारणा और ध्यान में अंतर)

जिंदगी की भागदौड़ में यदि शरीरविज्ञान दर्शन शब्द का मन में उच्चारण न कर सको, तो श्रीविज्ञान या शिवविज्ञान या शिव या शविद या केवल श्री का ही उच्चारण कर लो, कुंडलिनी आनंद और शांति के साथ क्रियाशील हो जाएगी। श्री शब्द में बहुत शक्ति है, इसी तरह श्री यंत्र में भी। सम्भवतः यह शक्ति शरीरविज्ञान दर्शन से ही आती है, क्योंकि श्री शब्द शरीर से निकला हुआ शब्द और उसका संक्षिप्त रूप लगता है। श्री शब्द सबसे बड़ा मंत्र लगता है मुझे, क्योंकि यह बोलने में सुगम है और एक ऐसा दबाव पैदा करता है, जिससे कुंडलिनी क्रियाशील होने लगती है। सम्भवतः इसीलिए किसी को नाम से सम्बोधित करने से पहले उसके साथ श्री लगाते हैं। इसी तरह धार्मिक अवसरों व क्रियाकलापों को श्री शब्द से शुरु किया जाता है। इसी तरह शिव भी शरीर से मिलता जुलता शब्द है, शव भी। इसीलिए शक्तिहीन शिव को शव भी कहते हैं। अति व्यस्तता या शक्तिहीनता की अवस्था में केवल “श” शब्द का स्मरण भी धारणा को बनाए रखने के लिए काफी है। मन की भावनात्मक अवस्था में इसके स्मरण से विशेष लाभ मिलता है। “श” व “स” अक्षर में बहुत शक्ति है। इसीलिए श अक्षर से शांति शब्द बना है। श अक्षर के स्मरण से भी शांति मिलती है और कुंडलिनी से भी। श अक्षर से कुंडलिनी मस्तिष्क के नीचे के चक्रोँ मुख्यतः हृदय चक्र पर क्रियाशील होने लगती है। इससे आनंद के साथ शांति भी मिलती है, और मस्तिष्क का बोझ हल्का हो जाने से काम, क्रोध आदि मन के जंगी दोष भी शांत हो जाते हैं। इसी तरह श अक्षर से ही शक्ति शब्द बना है, जो कुंडलिनी का पर्याय है। यह संस्कृत भाषा का विज्ञान है। आपने संस्कृत मंत्र स्वस्तिवाचन के बाद चारों ओर शांति का माहौल महसूस किया ही होगा। यह सामूहिक रूप में गाया जाता है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि की मंगलकामना की जाती है। ज्ञान होने पर भी उसका लाभ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम ज्ञान की धारणा बना कर नहीं रखते। मैं ध्यान करने को नहीं बोल रहा। व्यस्त जीवन के दौरान ध्यान कर भी नहीं सकते। धारणा तो बना सकते हैं। धारणा और ध्यान में अंतर है। ध्यान का मतलब है उसको लगातार सोचना। इससे ऊर्जा का व्यय होता है। धारणा का मतलब है उस पर विश्वास या आस्था या उस तरफ सोच का झुकाव रखना। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। जब उपयुक्त समय कभी जिंदगी में प्राप्त होता है, तो धारणा एकदम से ध्यान में बदल जाती है और तनिक योगाभ्यास से समाधि तक ले जाती है। धारणा जितनी मजबूती से होगी और जितने लम्बे समय तक होगी, ध्यान उतना ही मजबूत और जल्दी लगेगा। पतंजलि ने भी अपने सूत्रों में धारणा से ध्यान स्तर का प्राप्त होना बताया है। मेरे साथ भी ठीक ऐसे ही हुआ। मैं शरीरविज्ञान दर्शन नामक अद्वैत दर्शन पर धारणा बना कर रखता था पर समय और ऊर्जा की कमी से ध्यान नहीं कर पाता था। इनकी उपलब्धता पर वह धारणा ध्यान में बदल गई और ====बाकि का सफर आपको पता ही है (कि क्या होता है )। अद्वैत की धारणा अप्रत्यक्ष रूप में कुंडलिनी की धारणा ही होती है, क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी साथसाथ रहने की कोशिश करते हैं। ध्यान प्रत्यक्ष रूप में, मतलब जानबूझकर कुंडलिनी का किया जाता है, जिसमे कुंडलिनी जागरण प्राप्त होता है।

रूपान्तरण से आदमी पुरानी चीजों को भूलता नहीं हैं, अपितु उन्हें सकारात्मकता के साथ अपनाता है

योग खुद कोई रूपान्तरण नहीं करता। यह अप्रत्यक्ष रूप से खुद होता है। योग से मन का कचरा बाहर निकलने से मन खाली और तरोताज़ा हो जाता है। इससे मन नई चीजों को ग्रहण करता है। नई चीजों में भी अच्छी चीजें और आदतें ही ग्रहण करता है, क्योंकि योग से सतोगुण बढ़ता है, जो अच्छी चीजों को ही आकर्षित करता है। कई लोगों को लगता होगा कि योग से रूपान्तरण के बाद आदमी इतना बदल जाता है कि उसके पुराने दोस्त व परिचित उससे बिछड़ जाते हैं, उसके मन में पुरानी यादें मिट जाती हैं, वह अकेला पड़ जाता है वगैरह वगैरह। पर दरअसल बिल्कुल ऐसा नहीं होता। रहता उसमें सबकुछ है, पर उसे उनके लिए वह क्रेविंग या छटपटाहाट महसूस नहीं होती, जो कि रूपान्तरण से पहले होती है। उनके लिए उसके मन में विकार नहीं होते, जैसे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर। इसका मतलब है कि फिर पुराने दुश्मन भी उसे दोस्त लगने लगते हैं। अगर ऐसा रूपान्तरण सभी के साथ हो जाए, तो दुनिया से लड़ाई-झगड़े ही खत्म हो जाएं। अगर ऐसा ही रूपान्तरण सभी देशों या राष्ट्रध्यक्ष लोगों के साथ हो जाए, तो युद्ध वगैरह कथा-कहानियों तक ही सीमित रह जाएंगे।

कुंडलिनी शक्ति ही ड्रेगन है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में स्नान-योग अर्थात शीतजल स्नान और गंगास्नान से प्राप्त कुंडलिनी लाभ के बारे में बात कर रहा था। शीतजल स्नान अपने आप में एक संपूर्ण योग है। इसमें मूल बंध, जलंधर बंध और उड्डीयान बंध, योग के तीनों मुख्य बंध एकसाथ लगते हैं। हालांकि आजकल गंगा में प्रदूषण भी काफी बढ़ गया है, और लोगों में इतनी योगशक्ति भी नहीं रही कि वे ठंडे पानी को ज्यादा झेल सकें। मेरे एक अधेड़ उम्र के रिश्तेदार थे, जो परिवार के साथ गंगास्नान करने गए, और गंगा में अपने हरेक सगे संबंधी के नाम की एक-एक पवित्र डुबकी लम्बे समय तक लगाते रहे। घर वापिस आने पर उन्हें फेफड़ों का संक्रमण हो गया, जिससे उनकी जान ही चली गई। हो सकता है कि और भी वजहें रही हों। बिना वैज्ञानिक जाँच के तो पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, पर इतना जरूर है कि जिस पानी में इतने सारे लोग एकसाथ नहा रहे हों, और जिसमें बिना जले या अधजले शव फ़ेंके जाते हों, साथ में मानव बस्तियों व उद्योगों का अपशिष्ट जल डाला जाता हो, उसमें संक्रमण फैलाने वाले कीटाणु मौजूद हो सकते हैं। पहले ऐसा नहीं था या कम होता था, और साथ में योगशक्ति आदि से लोगों की इम्युनिटी मजबूत होती थी।

मैं जागृति की जाँच के संबंध में भी बात कर रहा था। मैं इस पैराग्राफ में कुछ दार्शनिक गहराई में जा रहा हुँ। पाठकों को यह उबाऊ लग सकती है इसलिए वे चाहें तो आगे भी निकल सकते हैं। जागृति की जाँच से यह फायदा होगा कि जागृत व्यक्ति को यथासम्भव भरपूर सुखसुविधाओं का हकदार बनाया जा सकता है। जागृति के बाद भरपूर सुखसुविधाएं भी जब उसे मोहित नहीं कर पाएंगी, तभी तो वह जागृति की असली कीमत पहचानेगा न। दुनिया से संन्यास लेने से उसे जागृति के महत्त्व का कैसे पता चलेगा। उसके लिए तो महत्त्व उन्हीं दुनियावी सुखों का बना रहेगा, जिनका लालसा भरा चिंतन वह मन ही मन करता रहेगा। चीनी का महत्त्व आदमी तभी समझेगा न जब वह चीनी खाने के एकदम बाद मिष्ठान्न खाएगा और उसे उसमें मिठास नहीं लगेगी। अगर वह चीनी खाने के एकदम बाद मिष्ठान्न नहीं खाएगा, तब तो वह मिष्ठान्न का ही गुणगान गाता रहेगा, और चीनी को बेकार समझेगा। इसलिए मेरा मानना है कि जागृति के एकदम बाद आदमी के जीवन में दुनियावी सुखसुविधाओं की बाढ़ आ जानी चाहिए, ताकि वह इनकी निरर्थकता को दिल से महसूस कर सके और फिर प्रवचनादि से अन्य लोगों को भी महसूस करवा सके, केवल सुनीसुनाई बातों के सहारे न बैठा रहे। इसीलिए तो पुराने समय में राजा लोग वन में ज्ञानप्राप्ति के बाद अपने राज्य को लौट आया करते थे, और पूर्ववत सभी सुखसुविधाओं के साथ अपना आगामी जीवन सुखपूर्वक बिताते थे, वन में ही दुबके नहीं रहते थे। सम्भवतः इस सत्य को दिल से महसूस करके ही आदमी आत्मविकास के शिखर तक पहुंचता है, केवल सुनने भर से नहीं। सम्भवतः ओशो महाराज का क्रियादर्शन भी यही था। मैं भी उनकी तरह कई बार बनी-बनाई रूढ़िवादी धारणाओं से बिल्कुल उल्टा चलता हूँ, अब चाहे कोई मुझे क्रन्तिकारी कहे या सत्याग्रही। ज्यादा उपयुक्त शब्द ‘स्वतंत्र विचारक’ लगता है, क्योंकि स्वतंत्र विचार को किसी पर थोपा नहीं जाता और न ही उसके लिए भीड़ इकट्ठा की जाती है, अच्छा लगने पर लोग खुद उसे चुनते हैं। यह लोकतान्त्रिक और शान्तिपरक होता है, क्रांति के ठीक विपरीत। ओशो महाराज ने यह अंतर बहुत अच्छे से समझाया है, जिस पर उनकी एक पुस्तक भी है। बेशक जिसने पहले कभी मिष्ठान्न खाया हुआ हो, तो वह चीनी खाने के बाद मिष्ठान्न के स्वाद को याद कर के यह अंदाजा लगा सकता है कि चीनी की मिठास मिष्ठान्न से ज्यादा है, पर मिष्ठान्न की नीरसता का पूरा पता तो उसे चीनी खाने के बाद मिष्ठान्न खा कर ही चलेगा। इसी तरह जागृति के बाद आदमी यह अंदाजा लगा सकता है कि जागृति सभी भौतिक सुखों से बढ़कर है, पर भौतिक सुखों की नीरसता का प्रत्यक्ष अनुभव तो उसे जागृति के एकदम बाद सुखसुविधाओं में डूबने से होगा। जैसे अगर दुबारा चीनी का मिलना असम्भव हो, तो आदमी मिष्ठान्न खाकर चीनी की मिठास को पुनः याद कर सकता है, और कोई चारा नहीं, उसी तरह आदमी सुखसुविधाओं को भोगते हुए उनसे अपनी जागृति को पुनः याद करते हुए उससे लाभ उठा सकता है, और कोई चारा नहीं। तो ये आसमान में फूल की तरह संन्यास कहाँ से आ गया। मुझे लगता है कि संन्यास उसके लिए है, जो परवैराग्य में स्थित हो गया है, मतलब जागृति के बाद सारी सुखसुविधाओं को भरपूर भोग लेने के बाद उनकी नीरसता का प्रत्यक्ष अनुभव कर चुका है, और उनसे भी पूरी तरह विमुख हो गया है। उसको जागृति की तमन्ना भी नहीं रही है, क्योंकि सुख़सुविधाओं की तरह जागृति भी दुनियावी ही है, और दोनों एकदूसरे की याद दिलाते रहते हैं। पर यहाँ बहुत सावधानी की आवश्यकता है, क्योंकि जगत के प्रति जरा भी महत्त्वबुद्धि रहने से वह योगभ्रष्ट बन सकता है, मतलब  लौकिक और पारलौकिक दोनों लाभोँ से एकसाथ वँचित रह सकता है। इसलिए सबसे अच्छा व सुरक्षित तरीका गृहस्थ आश्रम का कर्मयोग ही है, जिसमें किसी भी हालत में खतरा नहीं है। जागृति के एकदम बाद के साधारण वैराग्य में संन्यास लेने से वह सुखभोगों की पुरानी यादों से काम चला सकता है, पर यह प्रत्यक्ष सुखभोगों की तरह कारगर नहीं हो पाता, और योगी की सुखभोगों के प्रति महत्त्वबुद्धि बनी रहती है।

सुखसुविधाएं तो दूर, कई लोग तो यहाँ तो कहते हैं कि आदमी को विशेषकर जागृत व्यक्ति को भोजन की जरूरत ही नहीं, उसके लिए तो हवापानी ही काफी है। ऐसा कैसे चलेगा। भौतिक सत्य को समझना पड़ेगा। दरअसल मोटापा अधिक भोजन से नहीं, अपितु असंतुलित भोजन से पनपता है। शरीर के मैटाबोलिज़्म को सुचारु रूप से चलाने के लिए सभी आवश्यक तत्त्व उचित मात्रा में चाहिए होते हैं। किसी की भी कमी से चयापचय गड़बड़ा जाता है, जिससे शरीर में भोजन ढंग से जल नहीं पाता, और इकट्ठा जमा होकर मोटापा पैदा करता है। शरीर ही चूल्हा है। यह जितना तेजी से जलेगा, जीवन उतना ही ज्यादा चमकेगा। बहुत से लोगों के लिए आज हिन्दू धर्म का मतलब कुछ बाहरी दिखावा ही रह गया है। उसे खान-पान के और रहन-सहन के विशेष और लगभग आभासिक जैसे अवैज्ञानिक (क्योंकि उसके पीछे का विज्ञान नहीं समझ रहे) तरीके तक सीमित समझ लिया गया है। कुछ लोगों के लिए मांस-मदिरा का प्रयोग न करने वाले हिन्दू हैं, तो कुछ के लिए संभोग से दूरी बना कर रखने वाले हिन्दू हैं। कुछ लोगों के लिए हिंदु धर्म पालयनवादी है। इसी तरह कई लोगों की यह धारणा है कि जो जितना ज्यादा अहिंसक है, गाय की तरह, वह उतना ही ज्यादा हिंदूवादी है। योग और जागृति गए तेल लेने। यहाँ तक कि अधिकांश लोग कुंडलिनी का अर्थ भी नहीं समझते। वे इसे ज्योतिष वाली कुंडली पत्री समझते हैं। हालांकि यह भी सत्य है कि पलायनवाद और शराफत से ही दुनिया बच सकती है, क्योंकि मानव की अति क्रियाशीलता के कारण यह धरती नष्ट होने की कगार पर है। इस तरह का बाहरी दिखावा हर धर्म में है, पर क्योंकि हिन्दू धर्म में यह जरूरत से ज्यादा उदारता व सहनशीलता से भरा है, इसलिए यह कमजोरी बन जाता है, जिससे दूसरे धर्मों को बेवजह हावी होने का मिलता है। अगर आप अपनी दुकान से गायब रहोगे, तो दूसरे लोग तो आएंगे ही उसमें बैठने। हालांकि यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि मशहूर योगी गोपी कृष्ण ने अपनी किताब में लिखा है कि जागृति के बाद उन्हें इतनी ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती थी कि कुछ मांसाहार के बिना उनका गुजारा ही नहीं चलता था। यह भी हो सकता है कि भिन्नभिन्न प्रकार के लोगों की भिन्नभिन्न प्रकार की जरूरतें हों। मैं फेसबुक पर एक मित्र की पोस्ट पढ़ रहा था, जो लिख रहा था कि अपने धर्म को दोष देने की, उसे बदनाम करने की और उसे छोटीछोटी बातों पर आसानी से छोड़ने की या धर्म बदलने की या धर्मनिरपेक्ष बनने की आदत हिन्दुओं की ही है, दूसरे धर्म के लोगों की नहीं। दूसरे धर्म के लोग किसी भी हालत में अपने धर्म को दोष नहीं देते, अपितु उसके प्रति गलत समझ और गलत व्यवस्था को दोष देते हैं। इसीलिए बहुत से लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि हिंदु धर्म को दूसरे धर्म के लोगों से ज्यादा अपने धर्म के लोगों से खतरा है। वैसे इस वैबसाईट का लक्ष्य धर्म की विवेचना करना नहीं है, यह तो प्रसंगवश बात चल पड़ी थी। यह तो मानना ही पड़ेगा का हिंदु धर्म की उदारता और सहनशीलता के महान गुण के कारण ही आज सबसे ज्यादा वैज्ञानिक शोध इसी धर्म पर हो रहे हैं। कई बार दिल की बात को बोलना-लिखना मुश्किल हो जाता है, जिससे गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं। किसी के गुणों को उस पर स्थायी रूप से चिपकाने से भी गलतफहमी पैदा होती है। होता क्या है कि गुण बदलते रहते हैं। यह हो सकता है कि किसी में कोई विशेष गुण ज्यादा दिखता हो या और गुणों की अपेक्षा ज्यादा बार आता-जाता हो। ऐसा ही मैंने हिंदु धर्म के कुछ उपरोक्त गुणों के बारे में कहा है कि वे ज्यादा नजर आते हैँ कई बार, हमेशा नहीं। काल गणना भी जरूरी है, वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने के लिए। ऐसा भी हो सकता है कि विशेष गुणों को धर्म के कुछ लोग ही अपनाएं, अन्य नहीं। इसलिए धर्म के साथ उसके घटक दलों पर नजर रखना भी जरूरी है। इसी तरह क्षेत्र विशेष पर भी निर्भर करता है। कहीं पर किसी धर्म के साथ कोई एक विशेष गुण ज्यादा प्रभावी हो सकता है, तो किसी अन्य जगह पर पर कोई अन्य विशेष गुण। सभी धर्मों में सभी गुण मौजूद हैं, कभी कोई ज्यादा दिखता है, तो कभी कोई दूसरा। पर जो गुण औसत से ज्यादा नजर दिखता है, वह उस धर्म के साथ स्थायी तौर पर चिपका दिया जाता है, और उस गुण के साथ उस धर्म की पहचान जोड़ दी जाती है, जिससे धार्मिक वैमनस्य पैदा होता है। इसीलिए कहते हैं कि बुराई से लड़ो, धर्म से नहीं; बुराई से लड़ो, बुरे से नहीं। कंडीशन्स लागू हो सकती हैं। अगर कोई मुझे मेरे अपने जायज हक के लिए तनिक गुस्से में देख ले, और मेरे प्रति स्थायी धारणा फैला दे कि मैं गुस्सैल किस्म का आदमी हूँ, तो मुझे तो बुरा लगेगा ही। आजकल के दौर में मुझे सभी धर्म असंतुलित नजर आते हैं, मतलब औसत रूप में। किसी धर्म में जरूरत से ज्यादा सतोगुण, तो किसी में रजोगुण, और किसी में तमोगुण है। कोई वामपंथियों की तरह उत्तर की तरफ जा रहा है, तो कोई दक्षिणपांथियों की तरह दक्षिण की तरफ, बीच में कोई नहीं। यह मैं औसत नजरिये को बता रहा हुँ, या जैसे विभिन्न धर्मगुरु दुनिया के सामने अपने धर्म को अभिव्यक्त करते हैं, असल में तो सभी धर्मों के अंदर बढ़चढ़ कर महान लोग हैं। अगर सभी धर्म मित्रतापूर्वक मिलजुल कर रहने लगें, तो यह औसत असंतुलन भी खत्म हो जाएगा, और पूरी दुनिया में पूर्ण संतुलन क़ायम हो जाएगा। संतुलन ही योग है।

उदाहरण के लिए चायना के ड्रेगन को ही लें। कहते हैँ कि ड्रेगन को मानने वाला चीनी होता है। पर हम सभी ड्रेगन को मानते हैं। यह किसी विशेष देश विशेष से नहीं जुड़ा है। ठंडे जल से स्नान के समय जब सिर को चढ़ी हुई कुंडलिनी आगे से नीचे उतारी जाती है, तो तेजी से गर्म साँसें चलती है, विशेष रूप से झटके के साथ बाहर की तरफ, जैसे कि ड्रेगन आग उगल रही हो। प्रेम प्रसंगों में भी ‘गर्म सांसें’ शब्द काफी मशहूर हैं।ड्रेगन या शेर की तरह मुंह चौड़ा खुल जाता है, सारे दाँत बाहर को दिखाई देते हैँ, नाक व कपोल ऊपर की तरह खिंचता है, जिससे आँखें थोड़ा भिंच सी जाती हैं, शरीर का आकार भी ड्रेगन की तरह हो जाता है, पेट अंदर को भिंचा हुआ, और सांसों से फैलती और सिकुड़ती छाती। शरीर का हिलना डुलना भी ड्रेगन की तरह लगता है। ड्रैगन को उड़ने वाला इसलिए दिखाया जाता है क्योंकि क्योंकि कुंडलिनी भी पलभर में ही ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में पहुंच जाती है। शरीर ब्रह्माण्ड तो ही है, मिनी ब्रह्माण्ड। ड्रेगन के द्वारा आदमी को मारने का मतलब है कुंडलिनी शक्ति द्वारा आदमी के अहंकार को नष्ट कर के उसे अपने नियंत्रण में लेना है। फिल्मों में, विशेषकर एनीमेशन फिल्मों में जो दिखाया जाता है कि आदमी ने कैसे ड्रेगन को जीतकर और उसको वश में करके उससे बहुत से काम लिए, उस पर बैठकर हवाई यात्राएं कीं, और अपने दुश्मनों से बदला लिया आदि, यह कुंडलिनी को वश में करने और उससे विभिन्न लौकिक सिद्धियों को हासिल करने को ही दर्शाता है। कहीं खूंखार जानवरों की शक्ति के पीछे कुंडलिनी शक्ति ही तो नहीं, यह मनोवैज्ञानिक शोध का विषय है। सम्भवतः गुस्से के समय जो चेहरा विकृत और डरावना हो जाता है, उसके पीछे भी यही वजह हो। दरअसल मांसपेशियों के संकुचन से उत्पन्न गर्मी ही गर्म सांसों के रूप में बाहर निकलती है। अब आप कहोगे कि मस्तिष्क से कुंडलिनी को नीचे कैसे उतारना है। इसमें कोई रॉकेट साईंस नहीं है। मस्तिष्क को बच्चे या गूंगे बहरे की तरह ढीला छोड़ दें, बस कुंडलिनी एक झटके वाली गहरी बाहर की ओर सांस और पेट की अंदर की ओर सिकुड़न के साथ नीचे आ जाएगी। हालांकि जल्दी ऊपर चढ़ जाती है फिर से। कुंडलिनी को लगातार नीचे रखने के लिए अभ्यास करना पड़ता है।

आदमी के चेहरे के आकलन से उसके व्यक्तित्व का आकलन हो जाता है

आदमी के चेहरे के आकलन से उसके व्यक्तित्व का आकलन हो जाता है। सीधी सी कॉमन सेंस की बात है। किसी का शारीरिक मुकाबला करने के लिए बाजुओं और टांगों को शक्ति की जरूरत होती है। शरीर की कुल शक्ति सीमित और निर्धारित है। उसे एकदम से नहीं बढ़ाया जा सकता। इसलिए यही तरीका बचता है कि शरीर के दूसरे भाग की शक्ति इन्हें दी जाए। आप किसी भी अंग की क्रियाशीलता को ज्यादा कम नहीं कर सकते, क्योंकि सभी अंग एकदूसरे से जुड़े हैं। शक्ति की नोटिसेबल या निर्णायक कमी आप मस्तिष्क में ही कर सकते हैं, क्योंकि इसमें फालतू विचारों और भावनाओं के रूप बहुत सी अतिरिक्त शक्ति जमा हुई रहती है। इसीलिए गुस्से और लड़ाई के समय चेहरे विकृत हो जाते हैं, क्योंकि उससे ऊर्जा नीचे उतर रही होती है। लड़ाई शुरु करने से पहले भी आदमी इसीलिए गालीगलौज या फालतू बहस करते हैं, ताकि उससे विचार और भावनाएं और दिमाग़ की सोचने की शक्ति बाधित हो जाए और चेहरा विकृत होने से वह शक्ति नीचे आकर बाजुओं आदि यौद्धा अंगों को मिले। तभी तो देखा जाता है कि हल्की सी मुस्कान भी गंभीर झगड़ों से चमत्कारिक रूप में बचा लेती है। मुस्कुराहट से शक्ति पुनः मस्तिष्क की तरफ लौटने लगती है, जिससे सोचने-विचारने की शक्ति बढ़ने से और यौद्धा अंगों को शक्ति की कमी होने से लड़ाई टल जाती है। इसीलिए मुस्कुराती और शांत शख्ससियत से हर कोई मित्रता करना चाहता है, चाहे कोई झूठमूठ में ही मुस्कुराता रहे, और जलेभुने व टेंस आदमी से हरकोई दूर भागता है।

कुंडलिनी जागरण से आत्मा की पारलौकिक परमावस्था का पता नहीं चलता 

मित्रो, मैं कुछ दिन पहले रिलेक्स होने के लिए इस कड़ी गर्मी में दिन की धूप में छतरी लेकर बाहर निकला। चारों तरफ गलियों की सड़कों का जाल था, पर छायादार पेड़ कम थे। जहाँ थे, वहाँ उनके नीचे चबूतरे नहीं बने थे बैठने के लिए। पूरी कॉलोनी में तीन-चार जगह  चबूतरे वाले पेड़ थे। मैं बारी-बारी से हर चबूतरे पर बैठता रहा, और आसपास से आ रही कोयल की संगीतमयी आवाज का आनंद लेता रहा। गाय और बैल मेरे पास आ-जा रहे थे, क्योंकि उनको पता था कि मैं उनके लिए आटे की पिन्नियां लाया था। अच्छा है, अगर सैरसपाटे के साथ कुछ गौसेवा भी होती रहे। एक छोटे चबूतरे पर पेड़ से सटा हुआ एक पत्थर था। मैं उसपे बैठा तो मेरा खुद ही एक ऐसा आसन लग गया, जिसमें मेरा स्वाधिष्ठान चक्र पेड़ को मजबूती से छू रहा था, और पीठ पेड़ के साथ सीधी और छाती के पीछे पीठ की हड्डी पेड़ से सटी हुई थी। इससे मेरे मन में वर्षों पुरानी रंगबिरंगी भावनाएं उमड़ने लगीं। बेशक पुरानी घटनाओं के दृश्य मेरे सामने नहीं थे, पर उनसे जुड़ी भावनाएँ बिल्कुल जीवंत और ताज़ा थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कि वे भावनाएं सत्य हों और उस अनुभव के समय वर्तमान में ही बनी हों। यहाँ तक कि अपने असली घटनाकाल में भी वे भावनाएँ उतनी सूक्ष्म और प्रत्यक्ष रूप में अनुभव नहीं हुई थीं, जितनी उस स्मरणकाल में अनुभव हो रही थीं। भावनाओं के साथ आनंद तो रहता ही है। असल में भावनाएँ ही घटनाओं का सार या चेतन आत्मा होती है। भावना के बिना तो घटना निष्प्राण और निर्जीव होती है। सम्भवतः स्वाधिष्ठान चक्र को इसीलिए इमोशनल बेगेज या भावनाओं का थैला भी कहते हैं। वैसे तो सभी चक्रोँ के साथ विचारात्मक भावनाएँ जुड़ी होती हैं। स्वाधिष्ठान चक्र से इसलिए ज्यादा जुड़ी होती हैं, क्योंकि सम्भोग सबसे बड़ा अनुभव है, और उसी अनुभव के लिए आदमी अन्य सभी अनुभव हासिल करता है। मतलब कि सम्भोग का अनुभव हरेक अनुभव पर हावी होता है। विज्ञान भी इस बात को मानता है कि सम्भोग ही जीवन के हरेक पहलू के विकास के लिए मूल प्रेरक शक्ति है। क्योंकि स्वाधिष्ठान चक्र सम्भोग का केंद्र है, इसलिए स्वाभाविक है कि उससे सभी भावनाएं जुड़ी होंगी। 

किसी भी चीज में रहस्य इसलिए लगता है, क्योंकि हम उसे समझ नहीं पाते, नहीं तो कुछ भी रहस्य नहीं है। जो कुछ समझ आ जाता है, वह विज्ञान ही लगता है। पूरी सृष्टि हाथ पे रखे आंवले की तरह सरल और प्रत्यक्ष है, यदि लोग योग विज्ञान के नजरिए से इसे समझें, अन्यथा इसके झमेलों का कोई अंत नहीं है।

मूलाधार को ग्राउंडिंग चक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि वह मस्तिष्क को ऐसे ही अपने से जोड़ता है, जैसे पेड़ की जड़ पेड़ को अपने से जोड़कर रखती है। मूल का शाब्दिक अर्थ ही जड़ होता है। जैसे जड़ मिट्टी के सहयोग से अपनी ऊर्जा पैदा करके पेड़ को पोषण भी देती है और खुद भी पेड़ के पत्तों से अतिरिक्त ऊर्जा को अपनी ओर नीचे खींचकर खुद भी मजबूत बनती है, उसी तरह मूलाधार भी सम्भोग से अपनी ऊर्जा पैदा करके मस्तिष्क को ऊर्जा की आपूर्ति भी करता है, और मस्तिष्क में निर्मित फालतू विचारों की ऊर्जा को अपनी तरफ नीचे खींचकर खुद भी ताकतवर बनता है।

फिर एक दिन मैं फिर से उसी पुरानी झील के किनारे गया। एक पेड़ की छाँव में बैठ गया। मुझे अपनी सेहत भी ठीक नहीं लग रही थी, और मैं थका हुआ सा महसूस कर रहा था। लग रहा था कि जुकाम के वायरस का हमला हो रहा था मेरे ऊपर, क्योंकि एकदम से मौसम बदला था। अचानक भारी बारिश से भीषण गर्मी के बीच में एकदम से कड़ाके की ठंड पड़ी थी। उससे स्वाभाविक है कि मन भी कुछ बोझिल सा था। सोचा कि वहाँ शांति मिल जाए। गंगापुत्र भीष्म पितामह भी इसी तरह गंगा नदी के किनारे जाया करते थे शांति के लिए। मुझे तो लगता है कि यह एक रूपक कथा है। क्योंकि भीष्म पितामह आजीवन ब्रह्मचारी थे, इसलिए स्वाभाविक है कि उनकी यौन ऊर्जा बाहर की ओर बर्बाद न होकर पीठ की सुषुम्ना नाड़ी से ऊपर चढ़ती थी। इसे ही ही भीष्म पितामह का बारम्बार गंगा के पास जाना कहा गया है। गंगा नदी सुषुम्ना नाड़ी को कहा जाता है। क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी अपनी ऊर्जा रूपी दुग्ध से बालक रूपी कुंडलिनी-मन का पोषण-विकास करती है, इसीलिए गंगारूपी सुषुम्ना को माँ कहा गया है। थोड़ी देर बाद मैं मीठी और ताज़ा हवा की लम्बी सांस लेते हुए उस पर ध्यान देने लगा। इससे पुराने भावनात्मक विचार मन में ऐसे उमड़ने लगे, जैसे तेज हवा चलने पर आसमान में धूल उमड़ आती है। अगर आदमी धूल को देखने लगे, तो उसका दम जैसा घुटता है, और मन उदास हो जाता है। यदि उस पर ध्यान न देकर केवल हवा को महसूस करे, तो वह प्रसन्नचित हो जाता है। मैंने भी उन विचारों की धूल पर ध्यान देना बंद कर दिया, और सांसों पर ध्यान देने लगा। विचार तो तब भी थे, पर तब परेशान नहीं कर रहे थे। सांस और विचार हमेशा साथ रहते हैं। आप उन्हें अलग नहीं कर सकते, ऐसे ही जैसे हवा और धूल साथ रहते हैं। हवा है, तो धूल भी है, और धूल है तो हवा भी है। अगर आप धूल हटाने के लिए दीवार आदि लगा दो, तो वहाँ हवा भी नहीं आएगी। इसी तरह यदि आप बलपूर्वक विचारों को दबाएंगे, तो सांस भी दब जाएगी। और ये आप जानते ही हैँ कि सांस ही जीवन है। इसलिए विचारों को दबाना नहीं है, उनसे ध्यान हटाकर सांसों पर केंद्रित करना है। विचारों को आतेजाते रहने दो। जैसे धूल के कण थोड़ी देर उड़ने के बाद एकदूसरे से जुड़कर या नमी आदि से भारी होकर नीचे बैठने लगते हैँ, उसी तरह विचार भी श्रृंखलाबद्ध होकर मन के धरातल में गायब हो जाते हैं। बस यह करना है कि उन विचारों की धूल को ध्यान रूपी छेड़ा नहीं देना है। बाहर के विविध दृश्य नजारे और आवाजें मन के धरातल को मजबूत करते हैँ, जिससे फालतू विचार उसपे लैंड करते रह सकें। इसीलिए लोग ऐसे कुदरती नजारों की तरफ भागते हैं। जैसे धूल का कुछ हिस्सा आसमान में दूर गायब हो जाता है और बाकि ज्यादातर हिस्सा फिर से उसी जमीं पर बैठता है, इसी तरह विचारों के उमड़ने से उनका थोड़ा हिस्सा ही गायब होता है, बाकि बड़ा हिस्सा पुनः उसी मन के धरातल पर बैठ जाता है। इसीलिए तो एक ही किस्म के विचार लम्बे समय तक बारबार उमड़ते रहते हैं, बहुत समय बाद ही पूरी तरह गायब हो पाते हैं। बारीक़ धूल जैसे हल्के विचार जल्दी गायब हो जाते हैं, पर मोटी धूल जैसे आसक्ति से भरे स्थूल विचार ज्यादा समय लेते हैं। इसीलिए यह नहीं समझना चाहिए कि एकबार के साक्षीभाव से विचार गायब होकर मन निर्मल हो जाएगा। लम्बे समय तक साधना करनी पड़ती है। आसान खेल नहीं है। इसलिए जिसे जल्दी हो और जो इंतजार न कर सके, उसे  साधना करने से पहले सोच लेना चाहिए। वैसे भी मुझे लगता है कि यह दुनिया से कुछ दूरी बनाने वाली साधना उन्हीं लोगों के लिए योग्य है, जो अपनी कुंडलिनी को जागृत कर चुके हैं, या जो दुनिया के लगभग सभी अनुभवों को हासिल कर चुके हैं। आम लोग तो इससे गुमराह भी हो सकते हैं। आम लोगों के लिए तो व्यावहारिक कर्मयोग ही सर्वोत्तम है। हालांकि जो लोग एकसाथ विविध साधना मार्गों पर चलने की सामर्थ्य और योग्यता रखते हैं, उनके लिए ऐसी कोई पाबंदी नहीं। थोड़ी ही देर में मेरा शरीर खुद ही भिन्न-भिन्न सिटिंग पोज बनाने लगा, ताकि कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार चक्र से ऊपर चढ़ने में आसानी हो। स्वतोभूत योगासनों को मैंने पहली बार ढंग से महसूस किया, हालांकि घर में बिस्तर पर रिलेक्स होते हुए मेरे आसन लगते ही रहते हैं, ख़ासकर शाम के 5-6 बजे के बीच। सम्भवतः ऐसा दिनभर की थकान को दूर करने के लिए होता है, संध्या का ऊर्जावर्धक प्रभाव भी होता है साथ में। तो लगभग सुबह के थकानरहित समय में झील के निकट मेरी कुंडलिनी ऊर्जा का उछालें मारने का मतलब था कि मेरी थकान काम के बोझ से नहीं हुई थी, बल्कि किसी आसन्न रोग की वजह से थी। वह उसका एडवांस में इलाज करने के लिए आई थी। कुंडलिनी ऊर्जा इंटेलिजेंट होती है, इसलिए सब समझती है। विचारों के प्रति साक्षीभाव के साथ कुछ देर तक लम्बी और गहरी साँसे लेने से कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने वाला दबाव तैयार हो गया था। जूते के सोल की पिछली नोक की हल्की चुभन से मूलाधार चक्र आर्गेस्मिक आनंदमयी संवेदना के साथ बहुत उत्तेजित हुआ, जिससे कुंडलिनी ऊर्जा उफनती नदी की तरह ऊपर चढ़ने लगी। विभिन्न चक्रोँ के साथ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना  नाड़ियों में आर्गेस्मिक आनंदमयी संवेदना महसूस होने लगी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कुंडलिनी ऊर्जा से पूरा शरीर रिचार्ज हो रहा था। साँसें भी आर्गेस्मिक आनंद से भर गई थीं। कुंडलिनी के साथ आगे के आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और वज्र शिखा के संयुक्त ध्यान से ऊर्जा आगे से नीचे के हिस्से में उतरकर सभी चक्रोँ के साथ पूरे शरीर को शक्तियुक्त कर रही थी। दरअसल आमधारणा के विपरीत मूलाधार चक्र में अपनी ऊर्जा नहीं होती, बल्कि उसे संभोग से ऊर्जा मिलती है। मूलाधार को रिचार्ज किए बगैर ही अधिकांश लोग वहाँ से ऊर्जा उठाने का प्रयास उम्रभर करते रहते हैं, पर कम ही सफल हो पाते हैं। सूखे कुएँ में टुलु पम्प चलाने से क्या लाभ। मूलाधार के पूरी तरह डिस्चार्ज होने के बाद यौन अंगों, विशेषकर प्रॉस्टेट का दबाव बहुत कम या गायब हो जाता है। उससे फिर से मन सम्भोग की तरफ आकर्षित हो जाता है, जिससे मूलाधार फिर से रिचार्ज हो जाता है। वैसे तो योग आधारित साँसों से भी मूलाधार चक्र शक्ति से आवेशित हो जाता है, जो संन्यासियों के लिए एक वरदान की तरह ही है। चाय से प्रॉस्टेट समस्या बढ़ती है, ऐसा कहते हैं। दरअसल चाय से मस्तिष्क में रक्तसंचार का दबाव बढ़ जाता है, इसीलिए तो चाय पीने से सुहाने विचारों के साथ फील गुड महसूस होता है। इसका मतलब है कि फिर यौन अंगों से ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने वाला चुसाव नहीं बनेगा। इससे कुंडलिनी ऊर्जा घूमेगी नहीं, जिससे यौन अंगों समेत पूरे शरीर के रोगी होने की सम्भावना बढ़ेगी। उच्च रक्तचाप से भी ऐसी ही सैद्धांतिक वजह से प्रॉस्टेट की समस्या बढ़ती है। ऐसा भी लगता है कि प्रॉस्टेट की इन्फेलेमेशन या उत्तेजना भी इसके बढ़ने की वजह हो सकती है। स्वास्थ्य वैज्ञानिक भी ऐसा ही अंदेशा जता रहे हैं। जरूरत से ज्यादा तांत्रिक सम्भोग से प्रॉस्टेट उत्तेजित हो सकती है। तांत्रिक वीर्यरोधन से एक चुसाव भी पैदा हो सकता है जिससे संक्रमित योनि का गंदा स्राव प्रॉस्टेट तक भी पहुंच सकता है, जिससे प्रोस्टेट में इन्फेलेमेशन और संक्रमण पैदा हो सकता है। इसे एंटीबायोटिक से ठीक करना भी थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इसीलिए खूब पानी पीने को कहा जाता है, ताकि गंदा स्राव मूत्रनाल से बाहर धुल जाए। योनि-स्वास्थ्य का भी भरपूर ध्यान रखा जाना चाहिए। वैसे आजकल प्रोस्टेट की हर समस्या का इलाज है, प्रोस्टेट कैंसर का भी, यदि समय रहते जाँच में लाया जाए। क्योंकि पुराने जमाने में ऐसी सुविधाएं नहीं थीं, इसीलिए तंत्र विद्या को गुप्त रखा जाता था। इस ब्लॉग की एक पुरानी पोस्ट में कबूतर बने अग्निदेव को दिए माता पार्वती के श्राप को जो दिखाया गया है, जिसमें वे उसे उसके द्वारा किए घृणित कार्य की सजा के रूप में उसे लगातार जलन महसूस करने का शाप देती हैं, वह सम्भवतः प्रॉस्टेट के संबंध में ही है। योगी इस जलन की ऊर्जा को कुंडलिनी को देने के लिए पूर्ण सिद्धासन लगाते हैं। इसमें एक पाँव की एड़ी से मूलाधार पर दबाव लगता है, और दूसरे पाँव की एड़ी से आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर। इसलिए यह अर्ध सिद्धासन से बेहतर है क्योंकि अर्धसिद्धासन में दूसरा पैर भी जमीन पर होने से स्वाधिष्ठान पर नुकीला जैसा संवेदनात्मक और आर्गेस्मिक दबाव नहीं लगता। इससे स्वाधिष्ठान की ऊर्जा बाहर नहीं निकल पाती। कुंडलिनी ऊर्जा के घूमते रहने से यह यौनता-आधारित सिलसिला चलता रहता है, और आदमी का विकास होता रहता है। हालांकि यह सिलसिला साधारण आदमी में भी चलता है, पर उसमें इसका मुख्य लक्ष्य द्वैतपूर्ण दुनियादारी से संबंधित ही होता है। जबकि कुंडलिनी योगी का लक्ष्य कुंडलिनी युक्त अद्वैतपूर्ण जीवनयापन होता है। साधारण आदमी में बिना किसी प्रयास के ऊर्जा चढ़ती है, इसलिए यह प्रक्रिया धीमी और हल्की होती है। जबकि कुंडलिनी योगी अपनी इच्छानुसार ऊर्जा को चढ़ा सकता है, क्योंकि अभ्यास से उसे ऊर्जा नाड़ियों का और उन्हें नियंत्रित करने का अच्छा ज्ञान होता है, जिससे शक्ति उसके वश में आ जाती है। तांत्रिक योगी तो इससे भी एक कदम आगे होता है। इसीलिए तांत्रिकों पर सामूहिक यौन शोषण के आरोप भी लगते रहते हैं। वे कठोर तांत्रिक साधना से शक्ति को इतना ज्यादा वश में कर लेते हैं कि वे कभी सम्भोग से थकते ही नहीं। ऐसा ही मामला एक मेरे सुनने में भी आया था कि एक हिमालयी क्षेत्र में मैदानी भूभाग से आए तांत्रिक के पास असली यौन आनंद की प्राप्ति के लिए महिलाओं की पंक्ति लगी होती थी। कुछ लोगों ने हकीकत जानकर उसे पीटा भी, फिर पता नहीं क्या हुआ। तांत्रिकों के साथ यह बहुत बड़ा धोखा होता है। आम लोग उनके कुंडलिनी अनुभव को नहीं देखते, बल्कि उनकी साधना के अंगभूत घृणित खानपान और आचार-विचार को देखते हैं। वे आम नहीं खाते, पेड़ गिनते हैं। इससे वे उनका अपमान कर बैठते हैं, जिससे उनकी तांत्रिक कुंडलिनी वैसे लोगों के पीछे पड़ जाती है, और उनका नुकसान करती है। इसी को देवता का खोट लगना, श्राप लगना, बुरी नजर लगना आदि कहा जाता है। इसीलिए तांत्रिक साधना को, विशेषकर उससे जुड़े तथाकथित कुत्सित आचारों-विचारों को गुप्त रखा जाता था। साधारण लोक परिस्थिति में भी तो लोग तांत्रिक विधियों का प्रयोग करते ही हैं, पर वे साधारण सम्भोग चाहते हैं, यौन योग नहीं। शराब से शबाब हासिल करना हो या मांसभक्षण से यौनसुख को बढ़ाना हो, सब में यही सिद्धांत काम करता है। ऐसी चीजों से दिमाग़ के विचार शांत होने से दिमाग़ में एक वैक्यूम पैदा हो जाता है, जो मूलाधार से ऊर्जा को ऊपर चूसता है। इससे आगे के चैनल से ऊर्जा नीचे आ जाती है। इससे ऊर्जा घूमने लगती है, जिससे सभी अंगों के साथ मूलाधार से जुड़े अंग भी पुनः सक्रिय और क्रियाशील हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि बीयर पीने से जो पेशाब खुल कर आता है, वह इससे यौनांगों का दबाव कम होने से ही आता है, न कि इसमें मौजूद पानी से, जैसा अधिकांश लोग समझते हैं। सीधे पानी पीने से तो पेशाब इतना नहीं खुलता, चाहे जितना मर्जी पानी पी लो। अल्कोहल का प्रभाव मिटने पर पुनः दबाव बन जाए, यह अलग बात है। अब कोई यह न समझ ले कि अल्कोहल से कुंडलिनी ऊर्जा को घूमने में मदद मिलती है, इसलिए यह स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। हाहाहा। टेस्टॉस्टिरोन होर्मोन ब्लॉकर से इसलिए प्रॉस्टेट दबाव कम होता है, क्योंकि उससे इस होर्मोन की यौनाँग प्रेरक शक्ति क्षीण हो जाती है। इसके विपरीत, बहुत से आदर्शवादी पुरुष अपनी स्त्री को संतुष्ट नहीं कर पाते। मुझे मेरा एक दोस्त बता रहा था कि एक आदर्शवादी और संत प्रकार के उच्च सरकारी प्रोफेसर की पत्नि जो खुद भी एक सरकारी उच्च अधिकारी थी, उसने अपने कार्यालय से संबंधित एक बहुत मामूली से अविवाहित नवयुवक कर्मचारी से अवैध संबंध बना रखे थे। जब उन्हें इस बात का पता पुख्ता तौर पर चला, तो उनको इतना ज्यादा भावनात्मक सदमा लगा कि वे बेचारे सब कुछ यहीं छोड़कर विदेश चले गए, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि एक औरत को जब अश्लीलता का चस्का लग जाए तो उसे उससे पीछे हटाना बहुत मुश्किल है, हालांकि असम्भव नहीं है। हालांकि एक औरत के लिए व उसके अवैध प्रेमी के लिए ऐसा करना बहुत नुकसानदायक हो सकता है, विशेषकर यदि उसका असली प्रेमी या पति सिद्ध प्रेमयोगी हो। शिवपुराण के अनुसार जब शिव और पार्वती का विवाह हो रहा था, तो ब्रह्मा उस विवाह में पुरोहित की भूमिका निभा रहे थे। शिवपार्वती से पूजन करवाते समय ब्रह्मा की नजर पार्वती के पैर के नख पर पड़ गई। उसे वे मोहित होकर देखते ही रहे और पार्वती पर कमासक्त हो गए। इससे उनका वीर्यपात हो गया। शिव को इस बात का पता चल गया। इससे शिव इतने ज्यादा क्रोधित हुए कि प्रलय मचाने को तैयार हो गए। बड़ी मुश्किल से देवताओं ने उन्हें मनाया, फिर भी उन्होंने ब्रह्मा को भयंकर श्राप दे ही दिया। प्रलय तो टल गई पर ब्रह्मा की बहुत बड़ी दुर्गति हुई। यदि पार्वती के मन में भी विकार पैदा हुआ होता, और वह ब्रह्मा के ऊपर कमासक्त हुई होती, तो उसे भी शिव की कुंडलिनी शक्ति दंड देती। यदि वह शिव की अतिनिकट संगति के कारण उस दंड से अप्रभावित रहती, तो उस दंड का प्रभाव उससे जुड़े कमजोर मन वाले उसके नजदीकी संबंधियों पर पड़ता, जैसे उसकी होने वाली संतानेँ आदि। ऐसा सब शिव की इच्छा के बिना होता, क्योंकि कौन अपनी पत्नि को दंड देना चाहता है। दरअसल कुंडलिनी खुद ही सबकुछ करती है। यदि ऐसा कुत्सित कुकर्म अनजाने में हो जाए तो इसका प्रायश्चित यही है कि दोनों अवैध प्रेमी मन से एकदूसरे को भाई-बहिन समझें और यदि कभी अपनेआप मुलाक़ात हो जाए, तो एक दूसरे को भाई-बहिन कह कर सम्बोधित करें, और सच्चे मन से कुंडलिनी से माफी मांगे, ऐसा मुझे लगता है। जो हुआ, सो हुआ, उसे भूल जाएं। आगे के लिए सुधार किया जा सकता है। मेरे उपरोक्त ऊर्जा-उफान से मुझे ये लाभ मिला कि एकदम से मुझे छीकें शुरु हो गईं, और नाक से पानी बहने लगा, जिससे जुकाम का वायरस दो दिन में ही गायब हो गया। गले तक तो वह लगभग पहुंच ही नहीं पाया। दरअसल वह कुंडलिनी ऊर्जा वायरस के खिलाफ इसी सुरक्षा चक्र को मजबूती देने के लिए उमड़ रही थी। इसी तरह एकबार कई दिनों से मैं किसी कारणवश भावनात्मक रूप से चोटिल अवस्था में था। शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से कुंडलिनी मुझे स्वस्थ भी कर रही थी, पर कामचलाऊ रूप में ही। फिर एक दिन तांत्रिक कुंडलिनी योग की शक्ति से कुंडलिनी ऊर्जा लगातार मेरे दिल पर गिरने लगी। मैं मूलाधार, स्वाधिष्ठान और आज्ञा चक्र और नासिकाग्र के साथ छाती के बाईं ओर स्थित दिल पर भी ध्यान करने लगा। इससे दोनों कुंडलिनी चैनल भी महसूस हो रहे थे, और साथ में उससे दिल की ओर जाती हुई ऊर्जा भी और फिर पुनः नीचे उसी केंद्रीय चैनल में उसे जुड़ते हुए महसूस कर रहा था। यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा, जिससे मेरी यौन कुंडलिनी ऊर्जा से मेरा दिल बिल्कुल स्वस्थ हो गया। बाद में यह मेरे व्यवहार में एकाएक परिवर्तन से और लोगों के मेरे प्रति सकारात्मक व्यवहार से भी सिद्ध हो गया।

चलो, फिर से अध्यात्म की तरफ लौटते हैं। वैसे अध्यात्म भी दुनियादारी के बीच ही पल्लवित-पुष्पित होता है, उससे अलग रहकर नहीं, ऐसे ही जैसे सुंदर फूल काँटों के बीच ही उगते हैं। कांटे ही फूलों की शत्रुओं से रक्षा करते हैं। मैं पिछली पोस्ट में जो प्रकृति-पुरुष विवेक के बारे में बात कर रहा था, उसे अपने समझने के लिए थोड़ा विस्तार दे रहा हूँ, क्योंकि कई बार मैं यहाँ अटक जाता हूँ। चाहें तो पाठक भी इसे समझ कर फायदा उठा सकते हैं। वैसे है यह पूरी थ्योरी ही, प्रेक्टिकल से बिल्कुल अलग। हाँ, थ्योरी को समझ कर आदमी प्रेक्टिकल की ओर प्रेरित हो सकता है। जब कुछ क्षणों के लिए मुझे कुंडलिनी-पुरुष अपनी आत्मा से पूर्णतः जुड़ा हुआ महसूस हुआ, मतलब कि जब मैं प्रकृति से मुक्त पुरुष बन गया था, तब ऐसा नहीं था कि उस समय प्रकृति रूपी विचार और दृश्य अनुभव नहीं हो रहे थे। वे अनुभव हो रहे थे, और साथ में कुंडलिनी चित्र भी, क्योंकि वह भी तो एक विचार ही तो है। पर वे मुझे मुझ पुरुष के अंदर और उससे अविभक्त ऐसे महसूस हो रहे थे, जैसे समुद्र में लहरें होती हैं। इसका मतलब है कि वे उस समय प्रकृति रूप नहीं थे, क्योंकि उनकी पुरुष रूप आत्मा से अलग अपनी कोई सत्ता नहीं थी। आम साधारण जीवन में तो प्रकृति की अपनी अलग सत्ता महसूस होती है, हालांकि ऐसा मिथ्या होता है पर भ्रम से सत्य लगता है। दुनियादारी झूठ और भ्रम पर ही टिकी है। दरअसल कुंडलिनी चित्र अर्थात मन पुरुष और प्रकृति के मेल से बना होता है। जब वह निरंतर ध्यान से अज्ञानावृत आत्मा से एकाकार हो जाता है, तब वह शुद्ध अर्थात पूर्ण पुरुष बन पाता है। मतलब कि तब ही वह प्रकृति के बंधन से छूट पाता है। पूर्ण और शुद्ध पुरुष का असली अनुभव परमानंद स्वरूप जैसा होता है। इससे स्वाभाविक है कि उसके पूर्ण अनुभव के साथ भी तो मन के विचार चित्र तो उभरेंगे ही। पर तब वे ऐसे मिथ्या या आभासी महसूस होंगें जैसे चूने के ढेर में खींची लकीरें। मतलब उनकी सत्ता नहीं होगी, केवल पुरुष की सत्ता होगी। इसीलिए तो उस कुंडलिनी जागरण के चंद क्षणों में परमानंद के साथ सब कुछ पूरी तरह एक सा ही महसूस होता है, सबकुछ अद्वैत। जीवित मनुष्य में आनंद के साथ मन के विचार बंधे होते हैं। आनंद के साथ विचार आएंगे ही आएंगे। इस तरह से पूर्ण निर्विचार अवस्था के साथ आत्मरूप का अनुभव असम्भव के समान ही है जीवित अवस्था में। वैसे साधना की वह सर्वोच्च अवस्था होती है। वहाँ तक असंख्य आत्मज्ञानियों में केवल एक-आध ही पहुंच पाता है। उसीके पारलौकिक अनुभव को वेदों में लिखा गया है, जिसे आप्तवचन कहते हैं। उस पर विश्वास करने के इलावा पूर्ण मुक्त आत्मा की पारलौकिक अवस्था को जानने का कोई तरीका नहीं है। ऐसा नहीं है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी इस परमावस्था को प्राप्त नहीं कर सकता। वह कर सकता है, पर जानबूझकर नहीं करता। इसकी मुख्य वजह है परमावस्था का अव्यवहारिक होना। यह अवस्था संन्यास की तरह होती है। इस अवस्था में आदमी प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में भौतिक रूप से पिछड़ जाता है। यहाँ तक कि खाने के भी लाले पड़ सकते हैं। अभी मानव समाज इतना विकसित नहीं हुआ है कि इस अवस्था के योग्य उम्मीदवारों के भरणपोषण और सुरक्षा का उत्तरदायित्व संभाल सके। सम्भवतः प्राचीन भारत में कोई ऐसी कार्यप्रणाली विकसित कर ली गई थी, तभी तो उस समय संन्यासी बाबाओं का बोलबाला हुआ करता था। पर आज के तथाकथित आधुनिक भारत में ऐसे बाबाओं की हालत बहुत दयनीय प्रतीत होती है। प्राचीन भारत में समाज का, विशेषकर समाज के उच्च वर्ग का पूरा जोर कुंडलिनी जागरण के ऊपर होता था। यह सही भी है, क्योंकि कुंडलिनी ही जीवविकास की अंतिम और सर्वोत्तम ऊंचाई है। हिन्दुओं की अनेकों कुंडलिनी योग आधारित परम्पराओं में उपनयन संस्कार में पहनाए जाने वाले जनेऊ अर्थात यग्योपवीत के पीछे भी कुंडलिनी सिद्धांत ही काम करता है। इसे ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसका मतलब है ब्रह्म अर्थात कुंडलिनी की याद दिलाने वाला धागा। कई लोग कहते हैं कि यह बाईं बाजू की तरफ फिसल कर काम के बीच में अजीब सा व्यवधान पैदा करता है। सम्भवतः यह अंधे कर्मवाद से बचाने का एक तरीका हो। यह भी लगता है कि इससे यह शरीर के बाएं भाग को अतिरिक्त बल देकर इड़ा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित करता है, क्योंकि बिना जनेऊ की साधारण परिस्थिति में आदमी का ज्यादा झुकाव दाईं तरफ ही होता है। इसे शौच के समय तब तक दाएं कान पर लटका कर रखा जाता है, जब तक आदमी शौच से निवृत होकर जल से पवित्र न हो जाए। इसके दो मुख्य लाभ हैं। एक तो यह कि शौच-स्नान आदि के समय क्रियाशील रहने वाले मूलाधार चक्र की शक्तिशाली ऊर्जा कुंडलिनी को लगती रहती है, और दूसरा यह कि आदमी की अपवित्र अवस्था का पता अन्य लोगों को लगता रहता है। इससे एक फायदा यह होता है कि इससे शौच के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोगों से बचाव होता है, और दूसरा यह कि शौच जाने वाले आदमी की शक्तिशाली कुंडलिनी ऊर्जा का लाभ उसके साथ उसके नजदीकी लोगों को भी मिलता है, क्योंकि इससे वे उस ऊर्जा का गलत मतलब निकालने से होने वाले अपने नुकसान से बचे रह कर कुंडलिनी लाभ प्राप्त करते हैं। इसी तरह कमर के आसपास बाँधी जाने वाली मेखला से नाभि चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र स्वस्थ रहते हैं, जिससे पाचन सामान्य बना रहता है, और प्रॉस्टेट जैसी समस्याओं से भी बचाव होता है। यह अलग बात है कि क्रूर और अत्याचारी मुगल हमलावर औरंगजेब जनेऊ के कुंडलिनी विज्ञान को न समझते हुए प्रतिदिन तब खाना खाता था, जब तथाकथित काफ़िर लोगों के गले से सवा मन जनेऊ उतरवा लेता था। अफ़सोस की बात कि आज के वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक युग में भी विशेष वर्ग के लोग उसे अपना रोल मॉडल समझते हैं।

कुंडलिनी ऊर्जा और चक्र नदी के जल प्रवाह और पनचक्की के टरबाइन की तरह हैं

क्या हठयोग को राजयोग पर्यंत ही करना चाहिए

मैं पिछली पोस्ट में हठयोग प्रदीपिका की एक भाषा टीका पुस्तक व अपने आध्यात्मिक अनुभव के बीच के लघु अंतर के बारे में बात कर रहा था। उसमें आता है कि हठयोग की साधना राजयोग की प्राप्ति-पर्यंत ही करें। यह भी लिखा है कि यदि सिद्धासन सिद्ध हो जाए तो अन्य आसनों पर समय बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। पुस्तक निर्माण के समय आध्यात्मिक संस्कृति का ही बोलबाला होता था। भौतिकता की तरफ लोगों की रुचि नहीं होती थी। जीवन क्षणभंगुर होता था। क्या पता कब महामारी फैल जाए या रोग लग जाए। युद्ध आदि होते रहते थे। इसलिए लोग जल्दी से जल्दी कुंडलिनी जागरण और मोक्ष प्राप्त करना चाहते थे। हालांकि खुद हठयोग प्रदीपिका में लिखा है कि विभिन्न आसनों से विभिन्न रोगों से सुरक्षा मिलती है। पर लोगों को स्वास्थ्य की चिंता कम, पर जागृति की चिंता ज्यादा हुआ करती थी। पर आज के वैज्ञानिक युग में जीवन अवधि लंबी हो गई है, और जीवनस्तर भी सुधर गया है, इसलिए लोग जागृतिके लिए लंबी प्रतीक्षा कर सकते हैं। क्योंकि आजकल जानलेवा बीमारियों का डर लगभग न के बराबर है, इसलिए लोगों में अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ रखने का उत्साह पहले से कहीं ज्यादा है। इसलिए मेरा विचार है कि यदि राजयोग की उपलब्धि भी हो जाए, तो भी हठयोग करते रहना चाहिए। एक मामले में योगी स्वात्माराम ठीक भी कह रहे हैं। यदि किसी के मन में पहले से ही कुंडलिनी बनी हो, तो हठयोग के अतिरिक्त या अनावश्यक प्रयास से उसे क्यों नुकसान पहुंचने दिया जाए। मेरे साथ भी तो ऐसा ही होता था। मेरे घर के आध्यात्मिक माहौल के कारण मेरे मन में हमेशा कुंडलिनी बनी रहती थी। मुझे लगता है कि यदि मैं उसे बढ़ाने के लिए बलपूर्वक प्रयास करता, तो शायद वह नाराज हो जाती। क्योंकि कुंडलिनी बहुत नाजुक, सूक्ष्म और शर्मीली होती है। कई प्रकार की कुंडलिनी हठयोग को पसंद भी नहीं करती, जैसे कि जीवित प्रेमी-प्रेमिका या मित्र के रूप से निर्मित कुंडलिनी। हठयोग के लिए सबसे ज्यादा खुश तो गुरु या देवता के रूप से निर्मित कुंडलिनी ही रहती है। कई बार आध्यात्मिक व कर्मठ सामाजिक जीवन से ही कुंडलिनी को सबसे ज्यादा बल मिलता है। कर्मयोग से भी बहुत बल मिलता है। ऐसे में यदि हठयोग किया, तो समय की बर्बादी ही होगी। स्वास्थ्य यदि हठयोग से दुरस्त रहता है, तो संतुलित रूप के मानसिक और शारीरिक काम से भी दुरस्त रहता है। हठयोग तो ज्यादातर अति भौतिक समाज या फिर वनों-आश्रमों के लिए ज्यादा उपयोगी है। संतुलन भी बना सकते हैं, हठयोग, राजयोग व कर्मयोग के बीच में। सब समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है। ऐसा न हो कि कहीं मन में जमी कुंडलिनी को छोड़कर दूसरी ही कुंडलिनी को जगाने के चक्कर में पड़ जाओ, क्योंकि कुंडलिनी चित्र के क्षणिक जागरण से ज्यादा अहमियत कुंडलिनी चित्र के निरंतर मन में बने रहने की है। हो सकता है कि योगी स्वात्माराम का यह कथन प्रतिदिन के योग के लिए हो। जब प्रतिदिन की साधना के दौरान हठयोग से मन में कुंडलिनी का ध्यान अच्छी तरह से जम जाए, तब राजयोग वाली पद्धति से ध्यान करो। यह स्वाभाविक है कि दिनभर की काम की उलझन से आदमी का मन फिर से अस्थिर हो जाएगा। इससे वह अगले दिन सीधे ही राजयोग से नियंत्रित नहीं हो पाएगा। इसलिए अगले दिन उसे फिर से पहले हठयोग से वश में करना पड़ेगा। ऐसा क्रम प्रतिदिन चलेगा। ऐसा भी हो सकता है कि योगीराज ने यह उनके लिए लिखा हो, जिन्हें दुनियादारी की उलझनें न हों, और एकांत में रहते हुए योग के प्रति समर्पित हों। उनका मन जब लम्बे समय के हठयोग के अभ्यास से वश में हो जाए, तब वे उसे छोड़कर सिर्फ राजयोग करें। संसार की उलझनें न होने से उनका मन फिर से अस्थिर नहीं हो पाएगा। यदि थोड़ा बहुत अस्थिर होगा भी, तो भी राजयोग से वश में आ जाएगा।

हठयोग की शुरुआत प्राण ऊर्जा से और राजयोग की शुरुआत ध्यान चित्र से होती है

कुंडलिनी के बारे में भी विस्तार से नहीं बताया गया है। यही लिखा है कि फलाँ आसन को या फलाँ प्राणायाम को करने से कुंडलिनी जाग जाती है, या मूलाधार से ऊपर चढ़कर सहस्रार में पहुंच जाती है। इसी तरह व्याख्या में कहा गया है कि जब प्राण और अपान आपस में मणिपुर चक्र में टकराते हैं तो वहाँ एक ऊर्जा विस्फोट जैसा होता है, जिसकी ऊर्जा सुषुम्ना से चढ़ती हुई सीधी सहस्रार में जा पहुंचती है। इसका मतलब है कि प्राण ऊर्जा को ही वहाँ कुंडलिनी कहा गया है। क्योंकि यह ऊर्जा मूलाधार के कुंड में सोई हुई रहती है, इसलिए इसे कुंडलिनी कहते हैं। जब यह प्राण ऊर्जा या कुंडलिनी मस्तिष्क में जागेगी, तब इसके साथ मन का कोई चित्र भी जाग जाएगा। इसका मतलब है कि हठयोग में प्राण ऊर्जा को पहले जगाया जाता है, पर राजयोग में मन के चित्र को पहले जगाया जाता है। हठयोग में प्राण ऊर्जा के जागरण से मन का चित्र जागृत होता है, पर राजयोग में मन के चित्र के जागृत होने से प्राण ऊर्जा जागृत होती है। मतलब कि राजयोग में जागता हुआ मन का चित्र अपनी ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से प्राण ऊर्जा की नदी को पीठ से होकर ऊपर खींचता है। इसका मतलब है कि एकप्रकार से कुंडलिनी और प्राण ऊर्जा पर्यायवाची की तरह ही हैं। जिसे मैं कुंडलिनी कहता हूँ, वह हठयोग के प्राण और राजयोग के ध्यान-चित्र का मिश्रित रूप ही है। वास्तव में यही परिभाषा सबसे सटीक और व्यावहारिक है, क्योंकि हठयोग और राजयोग का मिश्रित रूप ही सबसे अधिक व्यावहारिक और फलदायक है। मुझे भी इसी मिश्रण से कुंडलिनी जागरण की अल्पकालिक अनुभूति मिली थी। यदि केवल राजयोग के ध्यान चित्र या मेडिटेशन ऑब्जेक्ट को लें, तब उसमें ऊर्जा की कमी रहने से वह क्रियाशील या जागृत नहीं हो पाएगा। इसी तरह, यदि केवल हठयोग की प्राण ऊर्जा को लिया जाए, तो उसमें चेतनता की कमी रह जाएगी। शायद इसीको मद्देनजर रखकर योगी स्वात्माराम ने कहा है कि राजयोग की उपलब्धि हो जाने पर हठयोग को छोड़ दो। उनका हठयोग को छोड़ने से अभिप्राय हठयोग को एकाँगी रूप में अलग से न कर के उसे राजयोग के साथ जोड़कर अभ्यास करने का रहा होगा। हठयोग के प्रारंभिक अभ्यास में तो मन के सर्वाधिक प्रभावी चित्र या ध्यान चित्र का ठीक ढंग से पता ही नहीं चलता। अभ्यास पूर्ण होने पर ही इसका पूरी तरह से पता चलता है। लगभग 2-3 महीनों में या अधिकतम 1 साल के अंदर यह हो जाता है। तब राजयोग शुरु हो जाता है। हालाँकि राजयोग के साथ जुड़ा रहकर हठयोग फिर भी चलता रहता है, पर इसमें राजयोग ज्यादा प्रभावी होने के कारण इसे राजयोग ही कहेंगे। मैं उस मानसिक चित्र और मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली ऊर्जा के मिश्रण को कुंडलिनी बता कर एक योग जिज्ञासु को शुरु में ही बता रहा हूँ कि बाद में ऐसा होगा, ताकि उसे साधना में कोई दिक्कत न आए। मानसिक चित्र तो पहले ही जागा हुआ अर्थात चेतन है। उस चित्र के सहयोग से जागती तो मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा ही है, जो आम अवस्था में सोई हुई या चेतनाहीन रहती है। इसलिए यह भी ठीक है कि उस ऊर्जा को कुंडलिनी कहा गया है। कुंडलिनी तो सिर्फ जागती है, पर ध्यान चित्र तो परम जागृत हो जाता है, क्योंकि वह आत्मा से एकाकार हो जाता है। मतलब ध्यान चित्र प्राण ऊर्जा से ज्यादा जागता है। इसलिए क्यों न उस ध्यान चित्र को ही कुंडलिनी कहा जाए। वैसे ध्यान चित्र और ऊर्जा का मिश्रण ही कुंडलिनी है, हालांकि उसमें ध्यान चित्र का महत्त्व ज्यादा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ध्यान चित्र राजयोग व हठयोग में समान रूप से अहमियत रखता है। ऊर्जा को अभिव्यक्ति ध्यान चित्र ही देता है। ऊर्जा को अनुभव ही नहीं किया जा सकता। ध्यान चित्र के रूप में ही तो ऊर्जा अनुभव होती है। अधिकांश लोग मानते हैं कि हठयोग केवल शारीरिक स्वास्थ्य से ही जुड़ा हुआ है, इसमें ध्यान का कोई स्थान नहीं है। मैं भी पहले कुछ-कुछ ऐसा ही समझता था। पर लोग वे 2-3 सूत्र नहीँ देखते, जिसमें इसे राजयोग के प्रारम्भिक सहयोगी के रूप में दिखाया गया है, और कहा गया है कि हठयोग की परिणति राजयोग में ही होती है। ध्यान योग का काम तो उसने राजयोग के पास ही रहने दिया है। वह दूसरे की नकल करके श्रेय क्यों लेता। इसका मतलब है कि उस समय भी कॉपीराइट प्रकार का सामाजिक बोध लोगों में था, आज से भी कहीं ज्यादा। तो क्यों न हम हठयोग प्रदीपिका को पतंजलि कृत राजयोग का प्रथम भाग मान लें। सच्चाई भी यही है।  योगी स्वात्माराम ऐसा ही जोर देकर करते अगर उन्हें पता होता कि आगे आने वाली पीढ़ी इस तरह से भ्रमित होगी।

ध्यान चित्र ही कुंडलिनी है

इसका प्रमाण मैं हठयोग की उस उक्ति से दूंगा, जिसके अनुसार कुंडलिनी सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर की ओर बहती है। यदि आसनों व प्राणायामों के दौरान किसी चक्र पर ध्यान न किया जाए, तो मस्तिष्क में केवल एक थ्रिल या घरघराहट सी ही महसूस होगी, उसके साथ कोई मानसिक चित्र नहीं होगा। वह थ्रिल मस्तिष्क के दाएं, बाएं आदि किसी भी भाग में महसूस हो सकती है। पर जैसे ही उस थ्रिल के साथ आज्ञा चक्र, मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि चक्रों पर ध्यान लगाया जाता है, उसी समय सहस्रार चक्र में ध्यान किया जाने वाला मानसिक चित्र प्रकट हो जाता है। साथ में थ्रिल भी मस्तिष्क की लम्बवत केंद्रीय रेखा में आ जाती है। दरअसल आज्ञा आदि चक्रों पर ध्यान लगाने से कुंडलिनी ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सुषुम्ना में बहने लगती है, जिससे उसके साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। ऐसा दरअसल दाएं और बाएं मस्तिष्क के मिश्रित होने से उत्पन्न अद्वैत के सिद्धांत से होता है। थ्रिल के2रूप में मस्तिष्क को जाती ऊर्जा तो हर हाल में लाभदायक ही है, चाहे उसके साथ कुंडलिनी हो या न हो। उससे दिमाग तरोताजा हो जाता है। पर सम्पूर्ण लाभ तो कुंडलिनी के साथ ही मिलता है।

भगवान कृष्ण के द्वारा अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन कराना दरअसल कुंडलिनी जागरण ही था

इसे सम्भवतः श्री कृष्ण ने शक्तिपात से करवाया था। इसीलिए अर्जुन श्रीकृष्ण को कहता है कि उसे वे अनन्त रूप लग रहे हैं। इसका मतलब है कि उनका प्रियतम रूप अर्जुन की आत्मा से एकाकार हो गया था, अर्थात वे अखण्ड ऊर्जा(एनर्जी कँटीन्यूवम) से जुड़ गए थे। समाधि या कुंडलिनी जागरण ऐसा ही होता है। मैं तो एक मामुली सा इंसान हूँ। मुझे तो सिर्फ दस सेकंड की ही झलक मिली थी, इसीलिए ज्यादा नहीं बोलता, पर श्रीकृष्ण की शक्ति से वह पूर्ण समाधि का अनुभव अर्जुन में काफी देर तक बना रहा।

शरीर में नीचे जाते हुए चक्रों की आवृति घटती जाती है

चक्र पर चेतना शक्ति और प्राण शक्ति का मिलन होता है। नीचे वाले चक्र कम आवृति पर घूमते हैं। ऊपर की ओर जाते हुए, चक्रों की आवृति बढ़ती जाती है। आवृति का मतलब यहाँ आगे वाले चक्र से पीछे वाले चक्र तक और वहाँ से फिर आगे वाले चक्र तक कुंडलिनी ऊर्जा के पहुंचने की रप्तार है, अर्थात एक सेकंड में ऐसा कितनी बार होता है। विज्ञान में भी आवृति या फ्रेकवेंसी की यही परिभाषा है। यह तो मैं पिछली एक पोस्ट में बता भी रहा था कि यदि मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी है, तो अद्वैत का ध्यान करने पर कुंडलिनी चित्र नीचे के चक्रों पर बनता है, मतलब नीचे के कम ऊर्जा वाले चक्र क्रियाशील हो जाते हैं। साथ में बता रहा था कि अविकसित छोटे जीवों की कुंडलिनी नीचे के चक्रों में बसती है। इसका मतलब है कि उनके मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी होती है। जैसे-जैसे मस्तिष्क का विकास होता है, वैसे-वैसे कुंडलिनी ऊपर की ओर चढ़ती जाती है।

चक्र नाड़ी में बहने वाले प्राण से वैसे ही घूमते हैं, जैसे नदी में बहने वाले पानी से पनचक्की के चरखे घूमते हैं

सम्भवतः चक्र इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जैसे पानी की छोटी नदी या नाली के बीचोंबीच आटा पीसने वाली पनचक्की की पानी से घूमने वाली चरखी घूमती है, उसी तरह सुषुम्ना नाड़ी के बीच में चक्र घूमते हैं। नाड़ी शब्द नदी से ही बना है। ये चक्र भी सुषुम्ना में ऊपर चढ़ रही ऊर्जा से टरबाइन की तरह पीछे से आगे की तरफ घूमते हैं। आज्ञा चक्र से नीचे जाने वाली नाड़ी के प्रवाह से वह फिर पीछे की तरफ घूमते हैं। पीछे से फिर आगे की ओर, आगे से फिर पीछे की ओर, इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। आपको विशुद्धि चक्र का उदाहरण देकर समझाता हूँ। गर्दन के बीचोंबीच वह चक्ररूपी टरबाइन है। समझ लो कि इसमें नाड़ी के ऊर्जा प्रवाह को अपनी घूर्णन गति में बदलने के लिए प्रोपैलर जैसे ब्लेड लगे हैं। जब इस चक्र के साथ मूलाधार का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के पिछले भाग के बीच में कुंडलिनी चित्र बनता है। इसका मतलब है कि वहां प्रोपैलर ब्लेड पर दबाव पड़ता है। फिर जब उसके साथ आज्ञा चक्र का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के अगले भाग के बीचोंबीच एक सिकुड़न के साथ वह कुंडलिनी चित्र बनता है। मतलब कि पीछे से प्रोपैलर ब्लेड घूम कर आगे पहुंच गया, जिस पर आज्ञा चक्र से नीचे जा रहे ऊर्जा प्रवाह का अगला दबाव लगता है। फिर मूलाधार का ध्यान करने से वह फिर से गर्दन के पिछले वाले भाग में पहली स्थिति पर आ जाता है। आज्ञा चक्र के ध्यान से वह फिर आगे आ जाता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है। आप यह मान सकते हो कि उसमें एक ही प्रोपैलर ब्लेड लगा है, जो घूमते हुए आगे पीछे जाता रहता है। यह भी मान सकते हैं कि उस टरबाइन में बहुत सारे ब्लेड हैं, जैसे कि अक्सर होते हैं। यह कुछ-कुछ दार्शनिक जुगाली भी है। विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और मूलाधार चक्र का एकसाथ ध्यान करने से विशुद्धि चक्र तेजी से घूमने लगता है। हालांकि इसमें कुछ अभ्यास की आवश्यकता लगती है। आप समझ सकते हो कि नीचे से प्राण ऊर्जा उस चक्र को घुमाती है, और ऊपर से मनस ऊर्जा। चक्र पर दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का अच्छा मिश्रण हो जाता है। चक्र पर जो सिकुड़न महसूस होती है, वह एकप्रकार से प्राण ऊर्जा से चक्र को लगने वाला धक्का है। चक्र पर जो कुंडलिनी चित्र महसूस होता है, वह चक्र पर मनस ऊर्जा से लगने वाला धक्का है। दरअसल आगे के चक्रों पर धक्का लगाने वाली शक्ति भी प्राण शक्ति ही है, मनस शक्ति नहीं। मनस शक्ति तो प्राण शक्ति के साथ तब मिश्रित होती है, जब वह मस्तिष्क से गुजर रही होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे किसी नदी के एक बगीचे के बीच से गुजरते समय उसके पानी में फूलों की सुगंध मिश्रित हो जाती है। अगले चक्रों में वह सुगन्धि या कुंडलिनी चित्र ज्यादा मजबूत होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि आगे की नाड़ी में ऊर्जा नीचे जाते समय अपनी ज्यादातर खुशबू गवां देती है। मूलाधार से मुड़कर जब वह पीठ से ऊपर चढ़ती है, तब उसमें बहुत कम कुंडलिनी सुगन्धि बची होती है। मस्तिष्क में पहुंचते ही उसमें फिर से कुंडलिनी सुगंधि मिश्रित हो जाती है। वह फिर आगे से नीचे उतरते हुए चक्रों के माध्यम से चारों ओर कुंडलिनी सुगन्धि फैला देती है। इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। सम्भवतः महामृत्युंजय मंत्र का “सुगंधिम पुष्टिम वर्धनम” इसी कुंडलिनी सुगंधि को इंगित करता है। एक पिछली पोस्ट में भी इसी तरह का अपना अनुभव साझा कर रहा था कि यदि सहस्रार को ऊपर वाले त्रिभुज का शिखर मान लिया जाए, आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़ने वाली रेखा को त्रिभुज का आधार मान लिया जाए, उससे निचली उल्टी त्रिभुज का आधार जुड़ा हो, जिसका शिखर मूलाधार चक्र हो, तो बीच वाले चक्रों पर बड़ा अच्छा ध्यान लगता है। अब मैं अपने ही उस अनुभव को वैज्ञानिक रूप से समझ पा रहा हूँ कि ऐसा आखिर क्यों होता है। दरअसल ऊपर के त्रिभुज से मनस ऊर्जा ऊपर से नीचे आती है, और नीचे के त्रिभुज से प्राण ऊर्जा ऊपर जाती है। वे दोनों आधार रेखा पर स्थित चक्रों पर आपस में टकराकर एक ऊर्जा विस्फोट सा पैदा करती हैं, जिससे चक्र तेजी से घूमता है और कुंडलिनी जीवंत जैसी हो जाती है। पिरामिड आकृति में जो ऊर्जा का घनीभूत संग्रह होता है, वह इसी त्रिभुज सिद्धांत से होता है। जो यह कहा जाता है कि शरीर के चक्र शरीर के ऊर्जा केंद्र हैं, उसका मतलब यही है कि उन पर कुंडलिनी चित्र मजबूत होता है। वह कुंडलिनी चित्र आदमी के जीवन में बहुत काम आता है। उसी से कुंडलिनी रोमांस सम्भव होता है। उसी से अनासक्ति और अद्वैत की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करके आदमी काम करते हुए थकता ही नहीं। दरअसल आदमी के विकास के लिए सिर्फ शारीरिक और मानसिक शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। यदि ऐसा होता तो समृद्ध घर के रचे-पचे लोग ही दुनिया में तरक्की का परचम लहराया करते। पर हम देखते हैं कि अधिकांश मामलों में बुलंदियों को छूने वाले लोग गरीबी और समस्याओं से ऊपर उठे होते हैं। दरअसल सबसे ज़्यादा जरूरी आध्यात्मिक शक्ति होती है, जो कुंडलिनी से प्राप्त होती है। इससे आदमी अहंकार रूपी उस अंधेरे से बचा रहता है, जो काम करने से पैदा होता है, और तरक्की को रोकता है। एक बार मैं डॉक्टरों और हस्पतालों के चक्कर इसलिए लगाने लग गया था, क्योंकि मैं काम से थकता ही नहीं था। आम लोग तो इसलिए हॉस्पिटल जाते हैं क्योंकि वे काम से जल्दी थक जाते हैं। पर मेरे साथ उल्टा हो रहा था। कुंडलिनी मेरे ऊपर भूत बनकर सवार थी। कुंडलिनी शायद वह भूत है, जिसका वर्णन एक कहानी में आता है कि वह कभी खाली नहीं बैठता था, और पलक झपकते ही सब काम कर लेता था। जब उसे काम नहीं मिला तो वह आदमी को ही परेशान करने लगा। फिर किसी की सलाह से उसने उसे खम्बे को लगातार गाड़ते और उखाड़ते रहने का काम दिया। मतलब आदमी लगातार किसी न किसी काम में व्यस्त रहा। वैसे तो कुंडलिनी भली शक्ति है, कभी बुरा नहीं करती, होली घोस्ट की तरह। शायद होली घोस्ट नाम इसीसे पड़ा हो। फिर भी कुंडलिनी को हैंडल करना आना चाहिए। मुझे तो लगता है कि आजकल जो अंधी भौतिक तरक्की हो रही है, उसके लिए अनियंत्रित व मिसगाइडिड कुंडलिनी ही है।

अद्वैत का चिंतन कब करना चाहिए

किसी चक्र पर ध्यान देते हुए यदि अद्वैत की अवचेतन भावना भी की जाए, तो आनन्द व संकुचन के साथ कुंडलिनी उस चक्र पर प्रकट हो जाती है। यदि मस्तिष्क के विचारों या मस्तिष्क के प्रति ध्यान देते समय अद्वैत का ध्यान किया जाए, तो मस्तिष्क में दबाव व आनन्द के साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। इससे मस्तिष्क जल्दी ही थक जाता है।

योग में आसनों व प्राणायाम का क्रम

फिर कहते हैं कि पहले आसन करने चाहिए। उसके बाद प्राणायाम करना चाहिए। अंत में कुंडलिनी ध्यान करना चाहिए। प्राणायाम में भी सबसे पहले कपालभाति किया जाता है। मैं भी अपने अनुभव से बिल्कुल इसी क्रम में करता हूँ। आसनों से थोड़ा नाड़ियां खुल जाती हैं। इसलिए प्राणायाम से उनमें आसानी से कुंडलिनी ऊर्जा का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है। कपालभाति से भी नाड़ियों को खोलने के लिए भरपूर ताकत मिलती है, क्योंकि इसमें झटके से श्वास-प्रश्वास चलता है। लगभग 25-30 आसान हैं हठयोग प्रदीपिका में। कुछ मेरे द्वारा किए जाने वाले आसनों से मेल खाते हैं, कुछ नहीं। इससे फर्क नहीं पड़ता। ऐसे आसनों का मिश्रण होना चाहिए, जिससे लगभग पूरे शरीर का व्यायाम हो जाता हो। विशेष ध्यान पीठ और उसमें चलने वाली तीन मुख्य नाड़ियों पर होना चाहिए। मैं भी अपने हिसाब के 15-20 प्रकार के आसन कर ही लेता हूँ। मैं कुर्सी पर ही प्राणायाम करता हूँ। सिद्धासन आदि में ज्यादा देर बैठने से घुटने थक जाते हैं। कुर्सी में आर्म रेस्ट न हो तो अच्छा है, क्योंकि वे ढंग से नहीं बैठने देते। कुर्सी पर गद्दी भी रख सकते हैं। कुर्सी उचित ऊंचाई की होनी चाहिए।

नाड़ीशोधन प्राणायाम मूल प्राणायाम के बीच में खुद ही होता रहता है

प्राणायाम में कपालभाति के बाद कुछ देर बाएं नाक से सांस भरना और दाएं नाक से छोड़ना और फिर साँसों की घुटन दूर करने के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब हर सांस के साथ नथुने को बदलते रहना जैसे कि बाएं नाक से सांस लेना और दाएं से छोड़ना, फिर दाएं से लेना और बाएं से छोड़ना, और इसी तरह कुछ देर के लिए करना जब तक थकान दूर नहीँ हो जाती। फिर कुछ देर विपरीत क्रम में साँसे लेना, और विपरीत क्रम में नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब दाएं नथुने से शुरु करना। फिर दोनों नाकों से एकसाथ सांसें लेना और छोड़ना। फिर से साँसों की घुटन दूर करने के लिए कुछ देर एक तरफ से और कुछ देर दूसरी तरफ से नाड़ी शोधन प्राणायाम शुरु करना। इसी तरह, कुंडलिनी ध्यान करते समय जब साँसों को रोका जाता है, उससे साँस फूलने पर भी नाड़ी शोधन प्राणायाम करते रहना चाहिए। इस तरह से नाड़ी शोधन प्राणायाम खुद ही होता रहता है। अलग से उसके लिए समय देने की जरूरत नहीं।

कुंडलिनी योग में लेखन का महत्त्व

दोस्तो, पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी प्रेम की भूखी होती है। आध्यात्मिक शास्त्रों में भगवान भी तो प्रेम के ही भूखे बताए जाते हैं। दरअसल भगवान वहाँ कुंडलिनी को ही कहा गया है। साथ में मैं बता रहा था कि कैसे आजकल की पीढ़ी असंतुलित होती जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक वीडियोस, सोशल मीडिया और गेम्स के लिए उनके पास समय भी बहुत है, और संसाधन भी। पर इलेक्ट्रॉनिक बुक्स, वैबपोस्टस और चर्चाओं के लिए न तो समय है, और न ही संसाधन। इनके भौतिक या कागजी रूपों की बात तो छोड़ो, क्योंकि वे भी अपनी जगह पर जरूरी हैं। यदि ये आध्यात्मिक प्रकार के हैं, तब तो बिल्कुल भी नहीं। एकबार एक जानेमाने पुस्तक विक्रेता की दुकान पर उसके मालिक से मेरी इस बात पर संयोगवश चर्चा चल पड़ी थी। बेचारे कह रहे थे कि इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स ने उनकी दुकान पर पुस्तकों की बिक्री बहुत कम कर दी है। फिर भी उनके संतोष व उनकी सहनशीलता को दाद देनी पड़ेगी जो कह रहे थे कि बच्चों को बड़े प्यार से ही मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स से दूर रखना चाहिए, डांट कर नहीं। डांट से वे कुण्ठा औऱ हीनता से भर जाएंगे। डांटने से अच्छा तो उनको इनका प्रयोग करने दो, वे खुद सीखेंगे। यहाँ हम किसी चीज को ऊंचा या नीचा नहीं दिखा रहे हैं। हम तो यही कह रहे हैं कि संतुलित मात्रा में सभी मानवीय चीजों की जरूरत है। संतुलन ही योग है, संतुलन ही अध्यात्म है।

असली लेखक अपने लिए लिखता है

मैं हमेशा अपने बौद्धिक विकास के लिए लिखने की कोशिश करता रहता हूँ। जो असली लेखक होता है, वह औरों के लिए नहीं, अपने लिए लिखता है। लेखन से दिमाग को एकप्रकार से एक्सटर्नल हार्ड डिस्क मिल जाती है, डेटा को स्टोर करने के लिए। इससे दिमाग का बोझ कम हो जाने से वह ज्यादा अच्छे से सोच-समझ सकता है। आपको तो पता ही है कि कुंडलिनी योग के लिए चिंतन शक्ति की कितनी अधिक जरूरत है। केंद्रित या फोकस्ड चिंतन ही तो कुंडलिनी है। उस लेखन को कोई पढ़े तो भी ठीक, यदि न पढ़े तो भी ठीक। अपने जिस लेखन से आदमी खुद ही लाभ नहीं उठा सकता, उससे दूसरे लोग क्या लाभ उठाएंगे। अपने फायदे के साथ यदि दुनिया का भी फायदा हो, तो उससे बढ़िया क्या बात हो सकती है। आप मान सकते हो कि मेरे आध्यात्मिक अनुभवों में मेरे लेखन का अप्रतिम योगदान है। कई बार तो लगता है कि यदि मुझे लेखन की आदत न होती, तो वे अनुभव होते ही न। आजकल ईबुक्स की कीमतें बढ़ा-चढ़ा कर रखने का रिवाज सा चला है। पर सच्चाई यह है कि उन पर लेखक के भौतिक संसाधन खर्च नहीं होते, जैसे कि कागज, पैन आदि। सैल्फ पब्लिशिंग से पब्लिशिंग भी निःशुल्क उपलब्ध होती है। केवल लेखक की बुद्धि ही खर्च होती है। पर बुद्धि तो खर्च होने से बढ़ती है। किताब की कीमत तो बुद्धि व अनुभव के रूप में अपनेआप मिल ही जाती है, तब पैसे की कीमत किस बात की। कहते भी हैं कि विद्या खर्च करने से बढ़ती है। इसीलिए पुराने जमाने में आध्यात्मिक सेवाएं निःशुल्क या नो प्रोफिट नो लॉस पर प्रदान की जाती थीं। सशुल्क ईबुक्स को बहुत कम पाठक मिलते हैं। निःशुल्क पुस्तकों को खरीदने व बेचने के लिए गूगल प्ले बुक्स और पीडीएफ ड्राइव डॉट नेट बहुत अच्छे प्लेटफॉर्म हैं। पिछले एक साल के अंदर गूगल प्ले बुक्स पर मेरी नौ हजार पुस्तकें शून्य मूल्य पर बिक गई हैं। इन पुस्तकों में भी सबसे ज्यादा बिक्री इस वेबसाइट की सभी ब्लॉग पोस्टस को इकट्ठा करके बनाई गई पुस्तकों की हुई है। यदि उनकी कीमत रखी होती तो शायद नौ भी न बिकतीं। यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक अन्य प्लेटफार्म पर इन पुस्तकों के पेड वेरशन्स (न्यूनतम मूल्य पर) भी हैं, वहाँ तो लगभग नौ ही बिकी हैं। गूगल प्ले बुक्स पर भी एक बार पुस्तकों का न्यूनतम मूल्य रखकर प्रयोग किया था, तब भी दो या तीन महीनों में केवल 4-5 प्रतियां ही बिक पाई थीं। अपने लेखन के प्रति पाठकों की रुचि से जो संतोष प्राप्त होता है, वह पैसे से प्राप्त नहीं होता। 

इड़ा औऱ पिंगला नाड़ी अर्धनारीश्वर को इंगित करते हैं

अपने पिछले लेखन से मैंने इस हफ्ते यह बात सीखी कि क्यों न अपने आध्यात्मिक अनुभवों का सार्वभौमिक प्रमाण आध्यात्मिक शास्त्रों में भी ढूंढा जाए। इसलिए मैंने स्वामी मुक्तिबोधानन्द की हठयोग प्रदीपिका को पढ़ना शुरु किया। दो दिनों में ही 15% से ज्यादा पुस्तक को पढ़ लिया। इतना जल्दी इसलिए पढ़ पाया क्योंकि जो मैं अपने अनुभवों से लिखता आया हूँ, कमोबेश वही तो था लिखा हुआ। साथ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी होने के कारण पर्याप्त समय भी मिल गया। सिर्फ दो-चार विचारों में अंतर जरूर था। यदि मैं वह अंतर बताऊंगा, तो यह माना जा सकता है कि आपने भी वह पुस्तक पढ़ ली होगी, क्योंकि आप मेरी पोस्टस शुरु से पढ़ते आ रहे हैं। मैं वह अंतर आने वाली पोस्टों में भी बताता रहूँगा।
उस पुस्तक में लिखा है कि इड़ा नाड़ी पीठ के बाएं भाग से ऊपर चढ़ती है, पर ऊपर जाकर दाईं ओर मुड़कर मस्तिष्क के दाएं गोलार्ध को कवर करती है। पर मुझे तो वह बाएँ मस्तिष्क में ही जाते हुए अनुभव होती है। इसी तरह पिंगला नाड़ी को निचले शरीर के दाएं भाग और मस्तिष्क के बाएं भाग को कवर करते हुए दर्शाया गया है। पर मुझे तो वह दाएं मस्तिष्क में ही जाते हुए दिखती है। अर्धनारीश्वर के चित्र में भी ऐसा ही, मेरे अनुभव के अनुरूप ही दिखाया जाता है। वहाँ तो ऐसा नहीं दिखाया जाता कि शरीर का निचला बायाँ भाग स्त्री का और ऊपरी बायाँ भाग पुरुष का है। हो सकता है कि इसमें कुछ और दार्शनिक या अनुभवात्मक पेच हो।

आध्यात्मिक सिद्धियां बताने से बढ़ती भी हैं

एक अन्य मतभेद यह था कि उस पुस्तक में सिद्धियों को गुप्त रखने की बात कही गई थी। मैं भी यही मानता हूँ कि एक स्तर तक तो गोपनीयता ठीक है, पर उसके आगे नहीं। जब मन जागृति से भर जाए और आदमी क्षणिक जागृति के और अनुभव प्राप्त न करना चाहे, तब अपनी जागृति को सार्वजनिक करना ही बेहतर है। इससे जिज्ञासु लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। ऐसा दरअसल खुद ही होता है। जिस आदमी के पास कम पैसा होता है, और पैसों से मन नहीं भरा होता है, वह उसे छिपाता है, ताकि दूसरे लोग न मांग ले। पर जब आदमी के पास असीमित पैसा होता है, और पैसों से उसका मन भर चुका होता है, तब वह उसके बारे में खुलकर बताता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसे पता होता है कि कोई कितना भी ले ले, पर उसका पैसा खत्म नहीं होने वाला। यदि कोई उसका सारा पैसा ले भी ले, तब भी उसे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उसका मन तो पैसे से पहले ही भर चुका होता है। बल्कि उसे तो फायदा ही लगता है, क्योंकि जो चीज उसे चाहिए ही नहीँ, उससे उसका पीछा छूट जाता है। वैसे आजकल के वैज्ञानिक व बुद्धिजीवी समाज में आध्यात्मिक सिद्धियां बताने से बढ़ती भी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आजकल के पढ़े-लिखे लोग एक-दूसरे की जानकारियों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं। मुझे तो लगता है कि यदि मैं अपने प्रथम आध्यात्मिक अनुभव की खुली चर्चा सोशल मीडिया में न करता, तो मुझे जागृति का दूसरा अनुभव न मिलता। पुराने समय के आदिम युग में अनपढ़ता व अज्ञान के कारण सम्भवतः लोग एक-दूसरे से ईर्ष्या व घृणा करते होंगे। इससे वे एक-दूसरे के ज्ञान से प्रेरणा न लेकर एक-दूसरे की टांग खींचकर आपस में एक-दूसरे को गिराते होंगे, तभी उस समय सिद्धियों को छिपाने का बोलबाला रहा होगा। कुंडलिनी के बारे में भी मुझे अधूरी सी जानकारी लगी। इस बारे अगली पोस्ट में बताऊंगा। 

कुंडलिनी इंजिन के ईंधन और ऊर्जा स्पार्क प्लग की चिंगारी की तरह है, जो जागृति-विस्फोट पैदा करते हैं

इन कुंडलिनी-विस्फोट घटकों के लिए ध्यान, शिवबिन्दु, मानवरूप देवमूर्ति, शिवलिंग, ज्योतिर्लिंग, साँस रोकने, मस्तिष्क दबाव, स्वयं शिक्षा, सकारात्मक सोच,अनवरत अभ्यास, निष्कामता, लगन, धैर्य, व व्यवस्थित दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है।

मित्रो, पिछली पोस्ट में मैं कुंडलिनी जागरण और उसमें अनुभव होने वाले जुड़ाव के बारे में बात कर रहा था। वह जुड़ाव कुंडलिनी से शुरु होना चाहिये। इसका अर्थ है कि आदमी को सर्वप्रथम कुंडलिनी के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस होना चाहिए, पूर्ण आनन्द व अद्वैत के साथ। उस पैदा हुए अद्वैत से तो फिर सभी चीजों के साथ अपना जुड़ाव महसूस होगा। हालाँकि यह जुड़ाव सेकंडरी होगा, प्राथमिक तो कुंडलिनी के साथ ही माना जाएगा। ऐसा होने से ही कुंडलिनी चित्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन पाएगा, और स्थाई तौर पर क्रियाशील रहेगा। इसका मतलब आप यह समझो कि ऊर्जा साधना/चक्र साधना/नाड़ी साधना आप करते रहो, क्योंकि ये साधनाएं वक्त पड़ने पर कुंडलिनी के काम आएँगी। पर जगाने का प्रयास मानवरूप कुंडलिनी का ही करो। ऊर्जा को कुंडलिनी के पीछे चलना चाहिए, कुंडलिनी को ऊर्जा के पीछे नहीं। इस बारे में मैं अपना अनुभव बताता हूँ। मैं प्रतिदिन कुंडलिनी ध्यान के साथ ऊर्जा साधना करता था। एकदिन अच्छा अवसर मिलते ही मुझे एकदम से अचानक ही कुंडलिनी की बहुत तेज याद आई, और मैं उसमें खोने लगा। तभी मेरी ऊर्जा भी कुंडलिनी का साथ देने के लिए मूलाधार से पीठ से होकर ऊपर चढ़ी और मस्तिष्क में पहुंच गई। मुझे ऐसा लगा क्योंकि मेरा मूलाधार क्षेत्र पूरी तरह से शिथिल हो गया था, हालांकि वह ऊर्जा इतनी तेजी से ऊपर चढ़ी कि उसे महसूस करने का मौका ही नहीं मिला। इसलिए भी मैं ऊर्जा के पीठ से ऊपर चढ़ने का अंदाजा लगा रहा हूँ, क्योंकि मैं लगभग एक महीने से तांत्रिक विधि से कुंडलिनी को पीठ से ऊपर चढ़ाने का अच्छा अभ्यास कर रहा था। इसलिए भी क्योंकि उस समय वहाँ पर महिलाओं का नाच गाना हो रहा था। उससे भी मूलाधार की ऊर्जा उद्दीप्त हुई। यौन माध्यम से उद्दीप्त ऊर्जा पीठ से ही ऊपर चढ़ती है। वह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुंच कर कुंडलिनी से जुड़ गई जिससे कुंडलिनी जागरण हो गया। बोलने का मतलब है कि कुंडलिनी तो खुद ही जागृत होने जा रही थी। उसे केवल ऊर्जा की अतिरिक्त आपूर्ति चाहिए थी। यह इसी तरह है जैसे कि गैस इंजन में पहुंच गई थी, बस उसे धमाका करने के लिए स्पार्क प्लग से एक चिंगारी की जरूरत थी। यदि चिंगारी न मिले तो इंजन में शक्ति का धमाका न होए। इसी तरह, यदि मैं ऊर्जा साधना न कर रहा होता तो कुंडलिनी को ऊर्जा न मिलती, और वह बिना जागृत हुए ही मस्तिष्क से नीचे लौट आती। ऐसा कुंडलिनी का ऊपर-नीचे आने-जाने का चक्र सबके अंदर चलता रहता है, बस ऊर्जा की चिंगारी नहीं दे पाते अधिकांश लोग। कइयों के साथ ऐसा होता है कि ऊर्जा की नदी तो मस्तिष्क में पहुंच जाती है, पर वहाँ कुंडलिनी नहीं होती। उससे मन में बहुत स्पष्टता के साथ चित्र कौंधते हैं, पर जागते नहीं। यह ऐसे ही है कि इंजन में गैस नहीं है, पर स्पार्क लगातार मिल रहे हैं। उससे चिंगारी की थोड़ी चमक तो पैदा होएगी, पर धमाके जितनी विशाल चमक नहीं। इसलिए मुख्य लक्ष्य कुंडलिनी को ही बनाओ, पर ऊर्जा साधना भी करते रहो। यह ऐसा है कि आपने कुंडलिनी की इतनी गहरी याद पैदा करनी है कि आप उसमें कुछ पलों के लिए खो जाओ। यही कुंडलिनी जागरण है। ऐसा समझो कि गुरु या देवता की याद इतनी गहरी पैदा करनी है, जितनी गहरी एक प्रणय प्रेम में डूबे हुए एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका की खुद ही पैदा हो जाती है। पर गुरु या देवता की गहरी याद आपके अंदर खुद पैदा नहीं होगी, क्योंकि वहां पर यौन आकर्षण नहीं है। इसलिए आपको यौन आकर्षण जैसा मजबूत आकर्षण पैदा करने के लिए तांत्रिक तकनीकों का सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए उपरोक्त ऊर्जा साधनाएं आपके काम आएँगी। फिर आप कहेंगे कि फिर यौन प्रेमी को ही क्यों न कुंडलिनी बना लिया जाए। पर यह श्रेष्ठ तरीका नहीं है। पहली बात, यौन विकार के कारण यौन कुंडलिनी को जगाना असम्भव के समान है। दूसरी बात, कोई नहीं चाहेगा कि अगला जन्म स्त्री का मिले, क्योंकि स्त्री को पुरुष से ज्यादा कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। आदमी जैसा सोचता है, वह अगले जन्म में वैसा ही बन सकता है। यह अलग बात है कि आजकल के वैज्ञानिक युग में स्त्री व पुरुष समान हैं, बल्कि कई जगह तो स्त्री पुरुष से ज्यादा मजे में है। पर ऐसा युग हमेशा नहीं रहेगा। आज के जैसी वैज्ञानिक सुविधाओं का युग तो असीमित काल का मात्र एक नगण्य जैसा अंश प्रतीत होता है। ये सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं होतीं। ये दृश्य सत्य पर आधारित मेरे अपने अनुभवात्मक विचार हैं, इसमें लैंगिक भेदभाव वाली कोई बात नहीं है, और न होनी चाहिए। ये पर्सनल ब्लॉग है, ख्याति या पैसे के लिए नहीं। वैसे भी, दुनिया में नजर भी आता है और तंत्र सम्प्रदायों में भी यह मान्यता है कि स्त्री केवल पुरुष की सहायता ही कर सकती है कुन्डलिनी जागरण में, स्वयं जागृत नहीं हो सकती। यदि वह यह सहायता करती है, तो अगले जन्म में वह पुरुष बन कर जागृत हो जाती है। वैसे तो तन्त्र सम्प्रदायों में भी बहुत सी महान तांत्रिक महिलाएं हुई हैं, जिन्होनें अपने पुरुष साथी को भी जागृत किया है, और वे खुद भी जागृत हुई हैं। विशेष प्रयास करने वाले अपवाद के मामले तो हर जगह ही मिल जाते हैं। देवी माता का ध्यान तो बहुत से योगी करते ही आए हैं। योगी रामकृष्ण परमहंस माँ काली के उपासक थे। उन्हें ध्यान में काली माता स्पष्ट भौतिक रूप में दिखती थीं। वे उनसे खेलते, बातें करते। पर एक साधारण स्त्री और देवी स्त्री में फर्क है। शायद इसीलिए स्त्री को गुरु बनाए जाने के बारे में शास्त्रों में बहुत कम बताया गया है। वैसे परिवर्तन व विभिन्नता संसार का नियम है। आदमी को जैसे भी उपयुक्त लगे, वैसे ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। साथ में कहा था कि संयोगवश या शक्तिपात आदि से जो बिना प्रयासों के जागृति प्राप्त होती है, वह अल्प व अस्थायी होती है। अल्प का मतलब कि उससे पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती। ऐसा मन करता है कि एकबार और जागृति मिल जाए। उससे बना कुण्डलिनी चित्र भी कुछ वर्षों के बाद मिटने लगता है। हालांकि ऐसी जागृति आदमी को पूर्ण जागृति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। इससे आदमी योग अभ्यास करने लगता है।

बिंदु शक्ति मूलाधार से सहस्रार की तरफ निर्देशित की जाती है

कुंडलिनी को बिंदु की शक्ति मूलाधार से स्वयं ही मिलती है। यदि किसी को बिंदु नाम से कुंडलिनी का अपमान लगे, तो शिवबिन्दु व ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग नाम से ध्यान किया जा सकता है। इससे कुंडलिनी का अपमान भी नहीं होगा, और आदमी को शिव का स्वरूप भी मिलेगा। एकसाथ दो लाभ। एक और बढ़िया तरीका है कि अद्वैत के चिंतन को ही शिवबिंदु का नाम दे दो। इससे जैसे ही कुंडलिनी मन में आएगी, उसे एकदम से बिंदु की शक्ति मिल जाएगी। वैसे भी इस अद्वैतपूर्ण शरीर का मालिक शिव ही है। आदमी तो झूठमूठ का अहंकार करके इसका मालिक बन जाता है। इस तथ्य को शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। कुंडलिनी चक्रों पर शिवबिन्दु के ध्यान से सभी 12 चक्र शिव के बारह ज्योतिर्लिंग बन जाते हैं। ज्योतिर्लिंग शब्द में ज्योति का अर्थ कुंडलिनी की चमक से है। यही 12 ज्योतिर्लिंगों का आध्यात्मिक रहस्य है। इसीलिए मूलाधार को संकुचित करते रहने व वहाँ सिद्धासन में पैर की ऐड़ी का दबाव देने को कहते हैं। दरअसल बिंदु शक्ति को ले जाने वाली वज्र नाड़ी स्वाधिष्ठान चक्र व मूलाधार चक्र से होकर पीठ के बीचोंबीच ऊपर चढ़ती है। वह जननांग से शुरु होती है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है कि कैसे उस कुन्डलिनी नाड़ी को कुंडली लगाए नागिन की तरह दिखाया गया है, और कैसे वह कुन्डली खोलकर खड़ी हो जाती है। दरअसल कुन्डलिनी नागिन के आकार में नहीं है, जैसा कई लोग समझते हैं। यह कुन्डलिनी शक्ति को ले जाने वाली नाड़ी है। कुन्डलिनी नाम इसलिये पड़ा है, क्योंकि वह कुंडली लगाई हुई नागिन के जैसी नाड़ी में कैद रहती है। यह संस्कृत शब्द है। मूलाधार पर दबाव से वह नाड़ी क्रियाशील हो जाती है। इससे जाहिर है कि मूलाधार में जो शक्ति का निवास बताया गया है, वह बिंदु रूप में ही है। उसी बिंदु शक्ति को सहस्रार तक ले जाना होता है जागरण के लिए। वह धीरे धीरे करके रास्ते के सभी चक्रों को जागृत करते हुए भी वहाँ पहुंच सकती है, और सीधी भी। यह अभ्यास के प्रकार पर निर्भर करता है। साधारण अभ्यास से वह धीरे धीरे ऊपर पहुंचती है, पर तांत्रिक अभ्यास से एकदम सीधी सहस्रार में। उस बिंदु शक्ति को केवल आदमी ही ऊपर चढ़ा सकता है, अन्य जीव नहीं। क्योंकि केवल आदमी ही योगाभ्यास कर सकता है। साथ में, विशाल बिंदु शक्ति को झेलने लायक मस्तिष्क केवल आदमी के पास ही है, अन्य जीवों के पास नहीं।

साँस रोकने के बहुत से लाभ हैं

योगा वाली साँसों पर भी पिछली पोस्ट में व्यावहारिक चर्चा कर रहा था। दरअसल जो ड्रैगन को साँसों की आग उगलते हुए दिखाया गया है, वह कुंडलिनी की आग का ही प्रतीक है। उस साँस से जो कुंडलिनी नाड़ी लूप में घूमते हुए चमकती है, उसीको रहस्यात्मक आग के रूप में दर्शाया गया है। आदमी का वास्तविक आकार भी एक ड्रैगन के रूप जैसा ही है। यदि हम रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क को लें, तो एक नाग या ड्रैगन जैसा आकार बनता है। आदमी का असली रूप रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में ही समाया हुआ है। बाहर के अन्य अंग तो मात्र बाहरी छिलकों की तरह है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया था। यह मैंने कहीं पढ़ा नहीं और न ही इसका प्रमाण है मेरे पास, जो नीचे लिखा है। ऐसा लगता है कि साँस रोकने से रक्त वाहिनियों की दीवारों का लचीलापन बढ़ता है। क्योंकि उनकी मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। खुद भी महसूस होता है, जब साँस रोकने से दिमाग की नसों में भारीपन व कड़ापन सा महसूस होता है। पर ऐसा सावधानी से करना चाहिए। बहुत ज्यादा या बहुत देर तक नहीँ। इसीलिए जिन आसनों में पेट अंदर को दबता है, उन्हें साँस बाहर निकालकर रोककर करने को कहते हैं। जैसे कि शीर्षासन, सर्वांगासन, हलासन, नौकासन आदि। जिनमें पेट बाहर को फूलता है, उनमें साँस अंदर भरकर रोकने को कहते हैं। जैसे कि शलभासन, मकरासन, भुजंगासन आदि। वैसे नियंत्रित अवस्था में तो किसी भी आसन में सांस को भरकर या बाहर निकालकर अपनी रुचि के अनुसार रोककर रख सकते हैं। शीर्षासन, सर्वांगासन व हलासन में विशेष ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि उनमें मस्तिष्क में बहुत दबाव पैदा होता है। अगर साँस रोकने से विशेषकर योग के दौरान खून की नसों का लचीलापन बढ़ता है, तो इससे जाहिर है कि इससे स्ट्रोक, व दिल के रोगों से कुछ राहत मिल सकती है। जब तक रिसर्च से प्रूव नहीं होता, तब तक ऐसा विश्वास करके श्वास रोककर योग करते रहने में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी यह तो वैज्ञानिक प्रयोगों से स्पष्ट हो चुका है कि साँस रोकने से दिमाग में ऑक्सीजन का स्तर बदलता रहता है। इसका सीधा सा मतलब है कि खून की नसें सिकुड़ती और फैलती रहती हैं। जाहिर है कि उनके सिकुड़ने से ऑक्सीजन का स्तर घटेगा, और फैलने से बढ़ेगा। कुंडलिनी जागरण के समय मस्तिष्क में काफी दबाव महसूस होता है। उस दबाव को सहने के लिए भी इससे दिमाग की नसें तैयार रहती हैं।

सिर का दबाव ऐसा लगता है कि माथे के किनारों वाली दिमाग की नसें फूली हुई हैं। ऐसे आसन जिसमें सिर शरीर से नीचे हो, उनमें ऐसा ज्यादा लगता है। अभी हाल ही में मेरे एक रिश्तेदार लड़के की ब्रेन हेमरेज से मृत्यु हुई। वह सिर्फ 30 साल का था। अंतर्मुखी, लाडला, परिवार पर ज्यादा ही निर्भर और परिवार के इलावा दूसरों से कम घुलने-मिलने वाला था। कुछ दिनों से उसके सिर में हल्का सा दर्द रह रहा था, और खून की उल्टी के साथ बेहोशी से आधा घण्टे पहले वह सिर की नसों को छूकर बता रहा था कि उसे लग रहा था कि उसकी दिमाग की नसें फूल रही थीं। उसकी माँ को तो हाथ से छूने पर वैसा कुछ नहीं लगा। इसलिए उसे सोकर आराम करने को कहा। आईसीयू में डॉक्टरों ने उसके बचने के सिर्फ 5% चांस बताए। उसका मस्तिष्क बहते और जमे खून के दबाव से पत्थर की तरह सख्त हो गया था। वह सिर्फ डेढ़ दिन ही आईसीयू में जिंदा रह सका। उसे 5 दिन पहले कोरोना वैक्सीन, एस्ट्रोजेनिका आधारित कोविशील्ड भी लगा था। डॉक्टरों ने कहा कि उसे ज्यादा ही इम्मयूनिटी पैदा हो गई थी। इससे डरने की जरूरत नहीं। इससे डरकर वैक्सीन लगाना बन्द नहीं करना चाहिए, जब तक कोई बेहतर वैक्सीन नहीं आ जाती। इससे बहुत सी जानें बची हैं। इसकी तुलना में तो साईड इफेक्ट नगण्य ही हैं। हाँ, सावधान रहकर हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर साइड इफेक्ट लगे, तो डॉक्टर से सम्पर्क में रहना चाहिए। ऐसे जीवनघातक दुष्प्रभाव की संभावना लाखों में केवल 1-2 को ही होती है। अब तो यह भी सामने आया है कि यदि गलती से इंजेक्शन माँस की बजाय खून की नस में लगे, तो भी खून में क्लॉट बन सकते हैं। मैं यह इसलिए बता रहा हूँ कि अगर योग, व्यायाम आदि से उसके दिमाग की नसों में ज्यादा फुलाव को झेलने की शक्ति होती, तो शायद रक्तस्राव न होता या कम रक्तस्राव होता, या एमरजेंसी ट्रीटमेंट से जान बच जाती।

बिंदु का अर्थ एक सुई की नोक जितना स्थान भी होता है

इसे अंग्रेजी में पॉइंट कहते हैं। यह पैन को एक स्थान पर रखकर उसकी स्याही का निशान लगाने से बनता है। पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि बिंदु का अर्थ बूँद होता है। पर इसका दूसरा अर्थ पॉइंट भी होता है। कुंडलिनी भी वास्तव में असीमित क्षेत्र के मन का एक सूक्ष्म स्थान होता है। यदि कागज के एक पृष्ठ या पूरी पुस्तक पर लिखे लेख को मन मान लिया जाए, तो कुंडलिनी सिर्फ एक पॉइंट जितने स्थान में आ जाएगी। एक पॉइंट से पूरे लेख के बारे में जानकारी मिल जाती है कि कौन सा पैन इस्तेमाल हुआ है, और कौन सी स्याही। यहाँ तक भी पता चल सकता है कि लेखक का हस्तलेख कैसा है। इसी तरह एक कुंडलिनी से पूरे मन के स्वभाव का अनुमान लग जाता है। जैसे एक बिंदु के पूर्ण ज्ञान से पूरा लेख नियंत्रित किया जा सकता है, इसी तरह एक कुंडलिनी के संपूर्ण ज्ञान से पूरा मन नियंत्रित हो जाता है। मैं यह उपमा दोनों के बीच में बाहरी सादृश्यता को देखकर दे रहा हूँ, भीतरी को नहीं।

योग सीखने की चीज नहीं, अभ्यास की चीज है

मुझे कई लोग बोलते हैं कि मुझे योग सिखा दो। जिसे 20 सालों को करते हुए मैं थोड़ा सा सीखा हूँ, उसे किसीको एकदम से कैसे सिखा सकता हूँ। योग वास्तव में कोई एक विशेष क्षेत्र की विद्या नहीं है, जिसे एकदम से सिखाया जा सके। यह एक विचारधारा है, एक जीवन दर्शन है, एक लाइफस्टाइल है। यह मन की एक अद्वैतमयी सोच है। इसे आप सकारात्मक सोच भी कह सकते हैं। उस सोच को बना कर रखने और बढ़ाने के लिए आप जो मर्जी तरीका चुन सकते हैं। बहुत से तरीकों का भी एकसाथ इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए पहले सोच पैदा करना जरूरी है। जिसके अंदर सोच ही नहीं है, वह उसे बना के क्या रखेगा, और उसे बढ़ाएगा क्या। सोच तो आदमी के अपने वश में है। इसीलिए प्रकृति ने आदमी को फ्री विल उन्मुक्त चिंतन शक्ति दी है। योग कोई सोच जबरदस्ती नहीं पैदा कर सकता। योग का सहारा उस सोच को बढ़ाने के लिए लिया जा सकता है। जिसके अंदर यह सोच है, उसे कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं। सोच अपना रास्ता खुद ढूंढती है। उन्हें सोच बनाने के लिए मैं शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक पढ़ने को कहता हूँ। उसके बाद उनकी तरफ से कोई संदेश ही नहीं आता। यदि संदेश आता, तो मैं उन्हें कहता कि अब इस सोच को पक्का करने के लिए कुछ सालों तक इस सोच के साथ कर्मयोग के रास्ते पर चलो। सोच को आप कुंडलिनी भी मान सकते हो, क्योंकि दोनों ही मन के विचार हैं। फिर जब कुछ वर्षों के बाद उनका संदेश आता तो मैं उन्हें कुंडलिनी योग के बारे में बताता, व उसके बारे में व्यावहारिक पुस्तकें सुझाता, बेशक वे मेरी लिखी हुई ही हों। यही असली तरीका है योग सीखने का। मैं भी ऐसे ही सीखा हूँ। यदि कोई व्यायाम की तरह का शारीरिक योग ही सीखना चाहे, तो उसके लिए आज बहुत से साधन हर जगह उपलब्ध हैं, ऑनलाइन भी और ऑफलाइन भी। असली योग सीखने में समय लगता है, पूरी उम्र भी लग सकती है। 

आर्यसभ्यता की देवमूर्ति परम्परा से कुन्डलिनी साधना

आर्यन सभ्यता की रीति रिवाजों को देखकर उस समय की महान आध्यात्मिक वैज्ञानिकता वाली सोच का पता चलता है। शिव, गणेश आदि देवता बिल्कुल स्थाई व अजर अमर बना दिए गए थे। मूर्ति कला अपने चरम पर थी। इतनी जीवंत व आकर्षक मूर्तियां बनती थीं, जिनके आगे असली आदमी लज्जित हो जाते थे। असली आदमी, गुरु या प्रेमी से अधिक आसान तो देव मूर्तियों पर ध्यान लगाना होता था। उदाहरण के लिए यदि किसी के मन में शिव मूर्ति का रूप जागृत हो जाए, तो वह कभी नहीं भूल सकता था। वह इसलिए क्योंकि वह मूर्ति विशेष सहेज कर मन्दिर में हमेशा के लिए रखी जाती थी। वैसे भी देश के हरेक स्थान पर शिव मंदिर होने से शिव रूपी कुंडलिनी का कभी विस्मरण नहीं होता था। असली आदमी का तो सीमित जीवन होता है, पर ये देवमूर्तियाँ तो धर्म परंपरा से जुड़कर शाश्वत हो गई हैं। असली आदमी का तो वियोग भी हो सकता है। फिर ध्यान कैसे लगाए। देवमूर्तियां तो हर जगह और हर समय विद्यमान हैं। इसीलिए इनको बहुत सुंदर बनाया जाता था। स्वर्णमूर्ति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। क्योंकि वह सबसे आकर्षक, चमकदार और दीर्घजीवी होती थी। मैंने कई इतनी सुंदर मूर्तियां इतने जीवंत और सुंदर रूप में देखी हैं, कि आजतक मेरे मन में जीवंत हो जाती हैं। सोचो, जब एक बार देखने पर ही वे मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ सकती हैं, तो बार बार उनका ध्यान करने से वे क्यों मन में जागृत नहीं होएंगी। यदि न भी जागृत होए, तो भी वे आदमी को अनासक्ति व अद्वैत के साथ जीना सिखाती हैं। वे हर हाल में फायदा ही करती हैं। वैसे  भी देव मूर्ति तभी अस्तित्व में आई जब किसीने सबसे पहले उसको मन में जागृत किया और उसे दुनिया के सामने रखा।

कुंडलिनी वाला भला केवल मानसिक कुन्डलिनी ही कर सकती है, कोई स्थूल भौतिक रूप नहीं

आदमी का भला करना तो कुंडलिनी का स्वभाव है, चाहे वह पत्थर के रूप वाली ही क्यों न हो। इसीलिए यह कहावत बनी है कि मानो तो पत्थर में भी भगवान मिल जाते हैं। पर इसका श्रेय कुंडलिनी को न दिया जाकर देवता को दिया जाने लगा। इससे लोगों के मन में देवताओं के प्रति विश्वास बढ़ता गया, जो आज तक है। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर मानव भलाई के सारे काम कुंडलिनी कर रही थी। देवताओं को श्रेय दिया जाना उचित भी है, क्योंकि वे वैसे भी भौतिक रूप से भी लोगों का भला करते रहते हैं। जैसे सूर्यदेव रौशनी देते हैं, और जलदेव पानी। हालांकि कुंडलिनी वाला भला तो कुंडलिनी ही कर रही है, देवता नहीं। दोनों प्रकार की भलाई को अपने अपने असली रूप में देखना चाहिए, इकट्ठे जोड़कर नहीं, तभी कुंडलिनी के बारे में भ्रम दूर होगा। इसी तरह, एक आदमी का भला प्रेमी के रूप से बनी उसके मन की कुंडलिनी करती है, उसका प्रेमी नहीं। अगर प्रेमी ही भला कर रहा होता, तो शादी के बाद परस्पर आकर्षण खत्म या कम न होकर बढ़ता। पर होता उल्टा है। दरअसल शादी के बाद जब प्रेमी का भौतिक रूप हर वक्त उपलब्ध हो जाता है, तब मन में उसके रूप की बनी हुई कुंडलिनी मिटने लगती है। इससे कुंडलिनी वाले लाभ खत्म हो जाते हैं। पर आदमी दोष देता है प्रेमी को। प्रेमी तो जैसा पहले था, वैसा ही होता है। इसीलिए भगवान कृष्ण कहते हैं कि राधा उनकी सबसे प्रिय है। राधा से विवाह नहीं, सिर्फ उनका प्रेम ही होता है। बात स्पष्ट है कि कृष्ण के मन में राधा के रूप से बनी शाश्वत कुंडलिनी के कारण ही कृष्ण को राधा सबसे प्रिय है। यदि दोनों का विवाह हो जाता, तो शायद वैसा न होता। क्योंकि भौतिक रूप से तो उनकी पत्नी रुक्मिणी सबसे सुंदर हैं। दरअसल असली और सच्चा प्यार सिर्फ और सिर्फ कुंडलिनी से ही होता है, किसी भौतिक वस्तु से नहीं। “किसीकी याद के सहारे जीना” भी इसी कुंडलिनी के द्वारा किए जाने वाले भले का उदाहरण है। भला सुखी जीवन से बड़ा भला और क्या हो सकता है। शिव का दूसरा रूप पर्वत भी है, जो मैंने एक कविता पोस्ट में सिद्ध किया है। पर्वत आदमी का बहुत भला करते हैं। ये पानी, हवा, ठंडक, फल आदि देते हैं। इसलिए लोगों का देवताओं पर आसानी से ध्यान जम जाता है। इसीलिए ज्यादातर मामलों में देवताओं को ध्यान कुंडलिनी बनाया जाता था। इससे संसार में मानवता भी पनपी रहती थी। वैसे भी कुंडलिनी ही भगवान तक ले जाती है। भगवान तक पहुंचने के लिए सीधी उड़ान सेवा नहीं दिखाई देती। लगता यह अजीब है, पर यह सत्य है। यह मूर्ति विज्ञान है, जिसे जो नहीं समझेगा, वह तो दुष्प्रचार करेगा ही।

स्कूल चले हम

घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

खेल नहीं अब सकते हम
स्कू-ल के मैदान में।
कूद नहीं अब सकते हम
खेलों के जहान में।।
अब तो मजे करेंगे हम
खेत पर खलिहान में।
बूढ़ी अम्मा के संग-संग
बतियाएंगे हम हरदम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

ऑनलाइन से पढ़ेंगे हम
ऑलराउंडर बनेंगे हम।
फालतू मीडिया छोड़कर
नॉलेज ही चुनेंगे हम।।
घर में योग करेंगे हम
इंडोर खेल करेंगे हम।
प्रातः जल्दी उठ करके
वॉकिंग भी करेंगे हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

स्कूल तो अपने जाएंगे
वैक्सी-नेशन के बाद।
फिर तो हम हो जाएंगे
जेल से जैसे हों आजाद।।
फिर तो नहीं करेंगे हम
व्यर्थ समय यूँ ही बरबाद।
पढ़-लिख कर व खेल कर
हम होंगे बड़े आबाद।।
शिक्षार्थ स्कूल जाएं हम
सेवार्थ हो आएं हरदम।
स्कूल का नाम रौशन करके
देश को रौशन करदें हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने- स्कूल चले हम।
हरा के उस को-रो-ना को
अपने-अपने स्कूल चले हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।

बीच का बंदर खेलेंगे
स्टप्पू भी अब खेलेंगे।
लुक्का-छुप्पी खेलेंगे
चोर-सिपाही खेलेंगे।।
इक-दूजे संग दौड़ें हम
प्रेम के धागे जोड़ें हम।
मिलजुल रहना सीखें हम
कदम से सबके मिला कदम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।
हरा के उस को-रो-ना को
अपने-अपने स्कूल चले हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।
-हृदयेश बाल

कुंडलिनी के लिए वामपंथी तंत्र के यौगिक पंचमकारों की संभावित अहमियत, जिनसे प्रकृति के तीनों गुण संतुलित रहते हैं

मित्रो, पिछले हफ्ते हमने पंचमकार और उनसे उत्पन्न तमोगुण के बारे में बताया था। पंचमकारों का वर्णन हमने पुरानी पोस्टों में भी किया है। दरअसल पंचमकार वामपंथी तांत्रिक के प्रमुख हथियार हैं, कुंडलिनी का शिकार करने के लिए। ये पांच चीजें हैं, जिनके नाम अक्षर म से शुरु होते हैं। ये हैं, मैथुन, माँस, मद्य, मत्स्य एवं मुद्रा। पांचवा पंचमकार, मुद्रा वास्तव में कुंडलिनी योग ही है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पंचमकार को लेकर इन भौतिक चीजों या भावनाओं के सांसारिक रूपों के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए। ये केवल तभी पंचमकार बनती हैं, जब ये पूरी तरह से एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक भावना व साधना के साथ होती हैं, और अधिकतम आध्यात्मिक लाभ के लिए न्यूनतम राशि में उपयोग की जाती हैं। ऐसा नहीं करने पर, पंचमकार हानिकारक भी हो सकते हैं। पंचमकार शुरू में द्वंद्व या द्वैत पैदा करते हैं। फिर इसे विभिन्न ध्यान तकनीकों और वेदों-पुराणों या शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतमयी दर्शन-सिद्धांतों के साथ अद्वैत में परिवर्तित किया जा सकता है। दरअसल, अद्वैत का अपना अलग अस्तित्व नहीं है। यह केवल द्वैत का निषेध है। यह द्वैत है, जिसका अपना अस्तित्व है। इसलिए, हम सांसारिक भागीदारी के माध्यम से केवल द्वैत को ही पैदा कर सकते हैं। हम अद्वैत का उत्पादन सीधे नहीं कर सकते हैं, लेकिन केवल द्वैत के निषेध के माध्यम से ही कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, द्वैत सबसे पहले प्राप्त होने वाली आधार वस्तु है। यदि हमारे पास द्वैत नहीं है, तो हम नकारात्मक शब्द ‘अ’ को उस पर कैसे लागू करेंगे। अद्वैत के संबंध में व्यापक गलतफहमी दिखाई देती है। हम द्वैत की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अद्वैतमयी नहीं बने रह सकते हैं। ये दोनों भावनाएँ साथ-साथ चलती हैं। हम इस पोस्ट में किसी चीज या जीवन के किसी  विशेष तौर-तरीके की वकालत नहीं कर रहे हैं। हम केवल वैज्ञानिक सत्य को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

दुनिया की नजरों में पंचमकारों को पापपूर्ण माना जाता है

इसका एक कारण यही है, जो पिछली पोस्ट में बताया था। ये तमोगुण पैदा करते हैं। दूसरा कारण यह है कि इसमें हिंसा कर्म छुपा होता है। कर्म का फल तो मिलता ही है। पर वह कर्म के हिसाब से ही मिलता है, मनमर्जी से नहीँ। शास्त्रीय मिथक कथाओं के अनुसार अधिकांश लोग समझ लेते हैं कि उससे मृत्युदंड मिल जाएगा अथवा भयानक नरकों में घोर यातनाएं झेलनी पड़ेंगी, क्योंकि सभी पाप या हिंसाएं बराबर हैं। पर ऐसा नहीं होता। ये सिर्फ आध्यात्मिक उक्ति ही है, भौतिक या व्यावहारिक नहीं। छुटपुट पापकर्म के छुटपुट फल मिलते रहते हैं, जो आम प्रगतिशील या मेहनतकश जनजीवन में वैसे भी देखे जाते हैं, जैसे बीमार होना, पैर फिसलना, मोच आना, हादसे की संभावना बढ़ जाना आदि। पर ज्यादातर मामलों में बचाव हो जाता है। पंचमकारों से मिली शक्ति से आदमी दुनियादारी के कामों में ज्यादा निमग्न रहने लगता है। इससे स्वाभाविक रूप से जो छुटपुट बीमारियाँ, शारीरिक कष्ट व मानसिक कष्ट पैदा होते हैं, वे ही उनके पाप के फल के रूप में होते हैं। उनसे पंचमकारों का पाप नष्ट होता रहता है, और दुनिया के काम धंधे भी तरक्की करते रहते हैं। इसलिए ऊर्जा का अधिक से अधिक सदुपयोग इस तरह से करना चाहिए कि उसके लिए कम से कम पाप करना पड़े। यही कर्म प्रबंधन है। यही योग है।

आजकल पंचमकारों के बिना कुंडलिनी योग करना मुश्किल प्रतीत होता है

मैं एक ब्लॉग में एक युवक के योग अनुभव के बारे में पढ़ रहा था। वह उसके लिए शुद्ध शाकाहारी बन गया था। एक बार संभवतः वह ऐमजॉन के जंगल में अपने किसी जाने पहचाने व्यक्ति के पास रहने लगता है। वहाँ वह मछली से परहेज करके चावल की ढेरी में एक गड्ढा सा बनाकर उसमें डालने के लिए दाल की मांग करता है। उसके परिचित की हंसी रुकने का नाम ही नहीं लेती। इससे शर्मिंदा होकर वह नॉनवेज योगी बन जाता है। इसका मतलब है कि जैसा देश, वैसा भेष। संतुलित आहार लेना योगी के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि योग के लिए ऊर्जा की सख्त जरूरत होती है। योग का दूसरा नाम संतुलन या संतुलित जीवन भी है। इससे जीवन में संतुलित आहार की अहमियत का पता चलता है। हम भोजन के संतुलन को केवल पोषक तत्त्वों के संतुलन तक ही सीमित समझते हैं। पर वास्तव में यह संतुलन भोजन की प्रकृति के गुणों तक भी एक्सटेंड होना चाहिए। एक आदमी को शाकाहार से सभी जरूरी पोषक तत्त्व मिल सकते हैं, पर उसे प्रकृति का तमोगुण मांसाहार से ही मिलेगा। कोई चाहे तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए बिना सीमित मदिरा का प्रयोग भी आवश्यक तमोगुण की प्राप्ति के लिए कर सकता है। यह सभी को मालूम है और जैसा कि इस ब्लॉग की पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि जीवन के संतुलन के लिए मन के अंदर प्रकृति के तीनों गुण संतुलन में होने चाहिए। ये गुण एक दूसरे के पूरक तभी बनते हैं, जब संतुलन में होते हैं, अन्यथा ये एक दूसरे के अवरोधक बन जाते हैं। ये सभी जानते हैं कि आहार से ही मन बनता है। एक प्रसिद्ध लोकोक्ति भी है कि “जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन”। इससे आहार में प्रकृति के तीनों गुणों के संतुलित मात्रा में होने की अहमियत का पता चलता है। तभी कहते हैं कि बिन खाए भजन न हो गोपाला। आयुर्वेद के वात, पित्त और कफ भी प्रकृति के क्रमशः सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। इनके संतुलन से स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। पतंजलि ने यम और नियम में जो अहिंसा शब्द डाला है, उसका मतलब है कि बिना उच्च प्रयोजन के हिंसा न हो। यदि शरीर को पुष्ट व नीरोग रखने के लिए हल्की-फुल्की हिंसा के रूप में हल्का-फुल्का हेल्दी नॉनवेज जैसे कि मछली, अंडा न लिया जाए तो यह भी शरीर के प्रति हिंसा होगी। उससे भी योग का यम और नियम कहाँ सिद्ध हो पाएगा। मानव शरीर के प्रति हिंसा तो सबसे बड़ी हिंसा होती है। पतंजलि बहुत लम्बी सोच रखते थे, इसलिए शाकाहार-मांसाहार के झमेले में पड़ने की बजाय उन्होंने अहिंसा शब्द जोड़ दिया। समझने वालों के लिए यह बहुत है। अब यदि विज्ञान के हिसाब से शरीर की जरूरत को आंका जाए तो एक आदमी को हफ्ते में केवल दो ही दिन और एक दिन में करीब 70-100 ग्राम मांस की जरूरत होती है। इससे ज्यादा हानिकारक हो सकता है। इससे कम से शरीर को हानि पहुंच सकती है। मैंने बहुत से योगी लोग देखे हैं, जिन्हें 15 दिन बाद, कइयों को 1 महीने बाद, तो कइयों को 3 महीने बाद जरूरत महसूस होती है। कईयों को तो छः महीने के अंतराल पर नानवेज की जरूरत महसूस होती है। अब बताइए कि इससे पोषक तत्त्वों की क्या कमी पूरी होगी। इससे जाहिर है कि उससे आदमी के मन के तमोगुण की कमी पूरी होती है। इससे, अपने अंधकार प्रकार के आंतरिक स्वभाव से उसे भरपूर व ताजगी प्रदान करने वाली नींद भी आती है, जिससे उसके शरीर व मन की अच्छी मुरम्मत हो जाती है, और उससे वह स्वस्थ हो जाता है। शरीर अपनी जरूरत खुद बताता है। इसकी जरूरत होने पर योग में ध्यान कम लगने लगता है, चुस्ती कम हो जाती है, भूख घट जाती है, पाचन प्रणाली गड़बड़ाने लगती है, शरीर में कम्पन पैदा होने लगते हैं। व्यवहार में गुस्सा व चिड़चिड़ापन आ जाता है, अद्वैतभाव बना कर रखना मुश्किल हो जाता है, मन द्वैत के भंवर के अंदर भटकने लगता है, अवसाद जैसा हो जाता है, शरीर रोगी होने लगता है, डर सा लगने लगता है, सेक्स के प्रति रुचि नहीं रहती आदि बहुत से लक्षण पैदा हो जाते हैं। मन में सही तरीके से अद्वैत भाव बनाए रखने के लिए प्रकृति के तीनों गुणों का संतुलन बहुत जरूरी है। फिर यह सबको पता है कि जहां अद्वैत है, वहाँ कुंडलिनी भी है। वास्तव में आहार की कमी से शरीर और मन के हरेक हिस्से में कुछ न कुछ दुष्प्रभाव जरूर पैदा होता है। बहुत से लोग इन्हें नजरन्दाज करते हैं और बहुत से लोगों को इसका आभास ही नहीँ होता। नॉनवेज की खुराक पूरी होने से ये सभी खराब लक्षण एकदम से गायब हो जाते हैं। वैसे भी मछ्ली को सर्वश्रेष्ठ आमिष आहार माना गया है, क्योंकि इसमें बहुत से स्वास्थ्यवर्धक गुण हैं, और इसके कोई दुष्प्रभाव भी नहीँ हैं। तभी तो इसे पंचमकारों में विशेष रूप से शामिल किया गया है। इसके सेवन से पापकर्म भी बहुत कम होता है। वैज्ञानिक शोध से भी यह बात सामने आई है कि मछली को दर्द नहीं होता। यह उन्हें जालिम कुदरत से बचने के लिए कुदरत का ही दिया तोहफा है। वैसे तो सभी चीजों व भावों में प्रकृति के तीनों गुण विद्यमान होते हैं, पर किसी विशेष चीज में कोई विशेष गुण ज्यादा बलवान होता है। पंचमकारों को ही लें, तो मैथुन व मत्स्य में रजोगुण, मांस व मदिरा में तमोगुण, और मुद्रा में सतोगुण की अधिकता होती है। आजकल के प्रदूषण और अति भौतिकता के युग में शरीर की ऊर्जा की मांग बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। ऐसे में सम्भवतः यौगिक पंचमकार ही मानव जाति का सही दिशानिर्देशन कर सकते हैं।