कुंडलिनी ऊर्जा और चक्र नदी के जल प्रवाह और पनचक्की के टरबाइन की तरह हैं

क्या हठयोग को राजयोग पर्यंत ही करना चाहिए

मैं पिछली पोस्ट में हठयोग प्रदीपिका की एक भाषा टीका पुस्तक व अपने आध्यात्मिक अनुभव के बीच के लघु अंतर के बारे में बात कर रहा था। उसमें आता है कि हठयोग की साधना राजयोग की प्राप्ति-पर्यंत ही करें। यह भी लिखा है कि यदि सिद्धासन सिद्ध हो जाए तो अन्य आसनों पर समय बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं। पुस्तक निर्माण के समय आध्यात्मिक संस्कृति का ही बोलबाला होता था। भौतिकता की तरफ लोगों की रुचि नहीं होती थी। जीवन क्षणभंगुर होता था। क्या पता कब महामारी फैल जाए या रोग लग जाए। युद्ध आदि होते रहते थे। इसलिए लोग जल्दी से जल्दी कुंडलिनी जागरण और मोक्ष प्राप्त करना चाहते थे। हालांकि खुद हठयोग प्रदीपिका में लिखा है कि विभिन्न आसनों से विभिन्न रोगों से सुरक्षा मिलती है। पर लोगों को स्वास्थ्य की चिंता कम, पर जागृति की चिंता ज्यादा हुआ करती थी। पर आज के वैज्ञानिक युग में जीवन अवधि लंबी हो गई है, और जीवनस्तर भी सुधर गया है, इसलिए लोग जागृतिके लिए लंबी प्रतीक्षा कर सकते हैं। क्योंकि आजकल जानलेवा बीमारियों का डर लगभग न के बराबर है, इसलिए लोगों में अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ रखने का उत्साह पहले से कहीं ज्यादा है। इसलिए मेरा विचार है कि यदि राजयोग की उपलब्धि भी हो जाए, तो भी हठयोग करते रहना चाहिए। एक मामले में योगी स्वात्माराम ठीक भी कह रहे हैं। यदि किसी के मन में पहले से ही कुंडलिनी बनी हो, तो हठयोग के अतिरिक्त या अनावश्यक प्रयास से उसे क्यों नुकसान पहुंचने दिया जाए। मेरे साथ भी तो ऐसा ही होता था। मेरे घर के आध्यात्मिक माहौल के कारण मेरे मन में हमेशा कुंडलिनी बनी रहती थी। मुझे लगता है कि यदि मैं उसे बढ़ाने के लिए बलपूर्वक प्रयास करता, तो शायद वह नाराज हो जाती। क्योंकि कुंडलिनी बहुत नाजुक, सूक्ष्म और शर्मीली होती है। कई प्रकार की कुंडलिनी हठयोग को पसंद भी नहीं करती, जैसे कि जीवित प्रेमी-प्रेमिका या मित्र के रूप से निर्मित कुंडलिनी। हठयोग के लिए सबसे ज्यादा खुश तो गुरु या देवता के रूप से निर्मित कुंडलिनी ही रहती है। कई बार आध्यात्मिक व कर्मठ सामाजिक जीवन से ही कुंडलिनी को सबसे ज्यादा बल मिलता है। कर्मयोग से भी बहुत बल मिलता है। ऐसे में यदि हठयोग किया, तो समय की बर्बादी ही होगी। स्वास्थ्य यदि हठयोग से दुरस्त रहता है, तो संतुलित रूप के मानसिक और शारीरिक काम से भी दुरस्त रहता है। हठयोग तो ज्यादातर अति भौतिक समाज या फिर वनों-आश्रमों के लिए ज्यादा उपयोगी है। संतुलन भी बना सकते हैं, हठयोग, राजयोग व कर्मयोग के बीच में। सब समय और परिस्थिति पर निर्भर करता है। ऐसा न हो कि कहीं मन में जमी कुंडलिनी को छोड़कर दूसरी ही कुंडलिनी को जगाने के चक्कर में पड़ जाओ, क्योंकि कुंडलिनी चित्र के क्षणिक जागरण से ज्यादा अहमियत कुंडलिनी चित्र के निरंतर मन में बने रहने की है। हो सकता है कि योगी स्वात्माराम का यह कथन प्रतिदिन के योग के लिए हो। जब प्रतिदिन की साधना के दौरान हठयोग से मन में कुंडलिनी का ध्यान अच्छी तरह से जम जाए, तब राजयोग वाली पद्धति से ध्यान करो। यह स्वाभाविक है कि दिनभर की काम की उलझन से आदमी का मन फिर से अस्थिर हो जाएगा। इससे वह अगले दिन सीधे ही राजयोग से नियंत्रित नहीं हो पाएगा। इसलिए अगले दिन उसे फिर से पहले हठयोग से वश में करना पड़ेगा। ऐसा क्रम प्रतिदिन चलेगा। ऐसा भी हो सकता है कि योगीराज ने यह उनके लिए लिखा हो, जिन्हें दुनियादारी की उलझनें न हों, और एकांत में रहते हुए योग के प्रति समर्पित हों। उनका मन जब लम्बे समय के हठयोग के अभ्यास से वश में हो जाए, तब वे उसे छोड़कर सिर्फ राजयोग करें। संसार की उलझनें न होने से उनका मन फिर से अस्थिर नहीं हो पाएगा। यदि थोड़ा बहुत अस्थिर होगा भी, तो भी राजयोग से वश में आ जाएगा।

हठयोग की शुरुआत प्राण ऊर्जा से और राजयोग की शुरुआत ध्यान चित्र से होती है

कुंडलिनी के बारे में भी विस्तार से नहीं बताया गया है। यही लिखा है कि फलाँ आसन को या फलाँ प्राणायाम को करने से कुंडलिनी जाग जाती है, या मूलाधार से ऊपर चढ़कर सहस्रार में पहुंच जाती है। इसी तरह व्याख्या में कहा गया है कि जब प्राण और अपान आपस में मणिपुर चक्र में टकराते हैं तो वहाँ एक ऊर्जा विस्फोट जैसा होता है, जिसकी ऊर्जा सुषुम्ना से चढ़ती हुई सीधी सहस्रार में जा पहुंचती है। इसका मतलब है कि प्राण ऊर्जा को ही वहाँ कुंडलिनी कहा गया है। क्योंकि यह ऊर्जा मूलाधार के कुंड में सोई हुई रहती है, इसलिए इसे कुंडलिनी कहते हैं। जब यह प्राण ऊर्जा या कुंडलिनी मस्तिष्क में जागेगी, तब इसके साथ मन का कोई चित्र भी जाग जाएगा। इसका मतलब है कि हठयोग में प्राण ऊर्जा को पहले जगाया जाता है, पर राजयोग में मन के चित्र को पहले जगाया जाता है। हठयोग में प्राण ऊर्जा के जागरण से मन का चित्र जागृत होता है, पर राजयोग में मन के चित्र के जागृत होने से प्राण ऊर्जा जागृत होती है। मतलब कि राजयोग में जागता हुआ मन का चित्र अपनी ऊर्जा की आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से प्राण ऊर्जा की नदी को पीठ से होकर ऊपर खींचता है। इसका मतलब है कि एकप्रकार से कुंडलिनी और प्राण ऊर्जा पर्यायवाची की तरह ही हैं। जिसे मैं कुंडलिनी कहता हूँ, वह हठयोग के प्राण और राजयोग के ध्यान-चित्र का मिश्रित रूप ही है। वास्तव में यही परिभाषा सबसे सटीक और व्यावहारिक है, क्योंकि हठयोग और राजयोग का मिश्रित रूप ही सबसे अधिक व्यावहारिक और फलदायक है। मुझे भी इसी मिश्रण से कुंडलिनी जागरण की अल्पकालिक अनुभूति मिली थी। यदि केवल राजयोग के ध्यान चित्र या मेडिटेशन ऑब्जेक्ट को लें, तब उसमें ऊर्जा की कमी रहने से वह क्रियाशील या जागृत नहीं हो पाएगा। इसी तरह, यदि केवल हठयोग की प्राण ऊर्जा को लिया जाए, तो उसमें चेतनता की कमी रह जाएगी। शायद इसीको मद्देनजर रखकर योगी स्वात्माराम ने कहा है कि राजयोग की उपलब्धि हो जाने पर हठयोग को छोड़ दो। उनका हठयोग को छोड़ने से अभिप्राय हठयोग को एकाँगी रूप में अलग से न कर के उसे राजयोग के साथ जोड़कर अभ्यास करने का रहा होगा। हठयोग के प्रारंभिक अभ्यास में तो मन के सर्वाधिक प्रभावी चित्र या ध्यान चित्र का ठीक ढंग से पता ही नहीं चलता। अभ्यास पूर्ण होने पर ही इसका पूरी तरह से पता चलता है। लगभग 2-3 महीनों में या अधिकतम 1 साल के अंदर यह हो जाता है। तब राजयोग शुरु हो जाता है। हालाँकि राजयोग के साथ जुड़ा रहकर हठयोग फिर भी चलता रहता है, पर इसमें राजयोग ज्यादा प्रभावी होने के कारण इसे राजयोग ही कहेंगे। मैं उस मानसिक चित्र और मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली ऊर्जा के मिश्रण को कुंडलिनी बता कर एक योग जिज्ञासु को शुरु में ही बता रहा हूँ कि बाद में ऐसा होगा, ताकि उसे साधना में कोई दिक्कत न आए। मानसिक चित्र तो पहले ही जागा हुआ अर्थात चेतन है। उस चित्र के सहयोग से जागती तो मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा ही है, जो आम अवस्था में सोई हुई या चेतनाहीन रहती है। इसलिए यह भी ठीक है कि उस ऊर्जा को कुंडलिनी कहा गया है। कुंडलिनी तो सिर्फ जागती है, पर ध्यान चित्र तो परम जागृत हो जाता है, क्योंकि वह आत्मा से एकाकार हो जाता है। मतलब ध्यान चित्र प्राण ऊर्जा से ज्यादा जागता है। इसलिए क्यों न उस ध्यान चित्र को ही कुंडलिनी कहा जाए। वैसे ध्यान चित्र और ऊर्जा का मिश्रण ही कुंडलिनी है, हालांकि उसमें ध्यान चित्र का महत्त्व ज्यादा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ध्यान चित्र राजयोग व हठयोग में समान रूप से अहमियत रखता है। ऊर्जा को अभिव्यक्ति ध्यान चित्र ही देता है। ऊर्जा को अनुभव ही नहीं किया जा सकता। ध्यान चित्र के रूप में ही तो ऊर्जा अनुभव होती है। अधिकांश लोग मानते हैं कि हठयोग केवल शारीरिक स्वास्थ्य से ही जुड़ा हुआ है, इसमें ध्यान का कोई स्थान नहीं है। मैं भी पहले कुछ-कुछ ऐसा ही समझता था। पर लोग वे 2-3 सूत्र नहीँ देखते, जिसमें इसे राजयोग के प्रारम्भिक सहयोगी के रूप में दिखाया गया है, और कहा गया है कि हठयोग की परिणति राजयोग में ही होती है। ध्यान योग का काम तो उसने राजयोग के पास ही रहने दिया है। वह दूसरे की नकल करके श्रेय क्यों लेता। इसका मतलब है कि उस समय भी कॉपीराइट प्रकार का सामाजिक बोध लोगों में था, आज से भी कहीं ज्यादा। तो क्यों न हम हठयोग प्रदीपिका को पतंजलि कृत राजयोग का प्रथम भाग मान लें। सच्चाई भी यही है।  योगी स्वात्माराम ऐसा ही जोर देकर करते अगर उन्हें पता होता कि आगे आने वाली पीढ़ी इस तरह से भ्रमित होगी।

ध्यान चित्र ही कुंडलिनी है

इसका प्रमाण मैं हठयोग की उस उक्ति से दूंगा, जिसके अनुसार कुंडलिनी सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर की ओर बहती है। यदि आसनों व प्राणायामों के दौरान किसी चक्र पर ध्यान न किया जाए, तो मस्तिष्क में केवल एक थ्रिल या घरघराहट सी ही महसूस होगी, उसके साथ कोई मानसिक चित्र नहीं होगा। वह थ्रिल मस्तिष्क के दाएं, बाएं आदि किसी भी भाग में महसूस हो सकती है। पर जैसे ही उस थ्रिल के साथ आज्ञा चक्र, मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि चक्रों पर ध्यान लगाया जाता है, उसी समय सहस्रार चक्र में ध्यान किया जाने वाला मानसिक चित्र प्रकट हो जाता है। साथ में थ्रिल भी मस्तिष्क की लम्बवत केंद्रीय रेखा में आ जाती है। दरअसल आज्ञा आदि चक्रों पर ध्यान लगाने से कुंडलिनी ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सुषुम्ना में बहने लगती है, जिससे उसके साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। ऐसा दरअसल दाएं और बाएं मस्तिष्क के मिश्रित होने से उत्पन्न अद्वैत के सिद्धांत से होता है। थ्रिल के2रूप में मस्तिष्क को जाती ऊर्जा तो हर हाल में लाभदायक ही है, चाहे उसके साथ कुंडलिनी हो या न हो। उससे दिमाग तरोताजा हो जाता है। पर सम्पूर्ण लाभ तो कुंडलिनी के साथ ही मिलता है।

भगवान कृष्ण के द्वारा अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन कराना दरअसल कुंडलिनी जागरण ही था

इसे सम्भवतः श्री कृष्ण ने शक्तिपात से करवाया था। इसीलिए अर्जुन श्रीकृष्ण को कहता है कि उसे वे अनन्त रूप लग रहे हैं। इसका मतलब है कि उनका प्रियतम रूप अर्जुन की आत्मा से एकाकार हो गया था, अर्थात वे अखण्ड ऊर्जा(एनर्जी कँटीन्यूवम) से जुड़ गए थे। समाधि या कुंडलिनी जागरण ऐसा ही होता है। मैं तो एक मामुली सा इंसान हूँ। मुझे तो सिर्फ दस सेकंड की ही झलक मिली थी, इसीलिए ज्यादा नहीं बोलता, पर श्रीकृष्ण की शक्ति से वह पूर्ण समाधि का अनुभव अर्जुन में काफी देर तक बना रहा।

शरीर में नीचे जाते हुए चक्रों की आवृति घटती जाती है

चक्र पर चेतना शक्ति और प्राण शक्ति का मिलन होता है। नीचे वाले चक्र कम आवृति पर घूमते हैं। ऊपर की ओर जाते हुए, चक्रों की आवृति बढ़ती जाती है। आवृति का मतलब यहाँ आगे वाले चक्र से पीछे वाले चक्र तक और वहाँ से फिर आगे वाले चक्र तक कुंडलिनी ऊर्जा के पहुंचने की रप्तार है, अर्थात एक सेकंड में ऐसा कितनी बार होता है। विज्ञान में भी आवृति या फ्रेकवेंसी की यही परिभाषा है। यह तो मैं पिछली एक पोस्ट में बता भी रहा था कि यदि मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी है, तो अद्वैत का ध्यान करने पर कुंडलिनी चित्र नीचे के चक्रों पर बनता है, मतलब नीचे के कम ऊर्जा वाले चक्र क्रियाशील हो जाते हैं। साथ में बता रहा था कि अविकसित छोटे जीवों की कुंडलिनी नीचे के चक्रों में बसती है। इसका मतलब है कि उनके मस्तिष्क में चेतनामयी ऊर्जा की कमी होती है। जैसे-जैसे मस्तिष्क का विकास होता है, वैसे-वैसे कुंडलिनी ऊपर की ओर चढ़ती जाती है।

चक्र नाड़ी में बहने वाले प्राण से वैसे ही घूमते हैं, जैसे नदी में बहने वाले पानी से पनचक्की के चरखे घूमते हैं

सम्भवतः चक्र इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जैसे पानी की छोटी नदी या नाली के बीचोंबीच आटा पीसने वाली पनचक्की की पानी से घूमने वाली चरखी घूमती है, उसी तरह सुषुम्ना नाड़ी के बीच में चक्र घूमते हैं। नाड़ी शब्द नदी से ही बना है। ये चक्र भी सुषुम्ना में ऊपर चढ़ रही ऊर्जा से टरबाइन की तरह पीछे से आगे की तरफ घूमते हैं। आज्ञा चक्र से नीचे जाने वाली नाड़ी के प्रवाह से वह फिर पीछे की तरफ घूमते हैं। पीछे से फिर आगे की ओर, आगे से फिर पीछे की ओर, इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। आपको विशुद्धि चक्र का उदाहरण देकर समझाता हूँ। गर्दन के बीचोंबीच वह चक्ररूपी टरबाइन है। समझ लो कि इसमें नाड़ी के ऊर्जा प्रवाह को अपनी घूर्णन गति में बदलने के लिए प्रोपैलर जैसे ब्लेड लगे हैं। जब इस चक्र के साथ मूलाधार का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के पिछले भाग के बीच में कुंडलिनी चित्र बनता है। इसका मतलब है कि वहां प्रोपैलर ब्लेड पर दबाव पड़ता है। फिर जब उसके साथ आज्ञा चक्र का ध्यान किया जाता है, तो गर्दन के अगले भाग के बीचोंबीच एक सिकुड़न के साथ वह कुंडलिनी चित्र बनता है। मतलब कि पीछे से प्रोपैलर ब्लेड घूम कर आगे पहुंच गया, जिस पर आज्ञा चक्र से नीचे जा रहे ऊर्जा प्रवाह का अगला दबाव लगता है। फिर मूलाधार का ध्यान करने से वह फिर से गर्दन के पिछले वाले भाग में पहली स्थिति पर आ जाता है। आज्ञा चक्र के ध्यान से वह फिर आगे आ जाता है। इस तरह यह चक्र चलता रहता है। आप यह मान सकते हो कि उसमें एक ही प्रोपैलर ब्लेड लगा है, जो घूमते हुए आगे पीछे जाता रहता है। यह भी मान सकते हैं कि उस टरबाइन में बहुत सारे ब्लेड हैं, जैसे कि अक्सर होते हैं। यह कुछ-कुछ दार्शनिक जुगाली भी है। विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और मूलाधार चक्र का एकसाथ ध्यान करने से विशुद्धि चक्र तेजी से घूमने लगता है। हालांकि इसमें कुछ अभ्यास की आवश्यकता लगती है। आप समझ सकते हो कि नीचे से प्राण ऊर्जा उस चक्र को घुमाती है, और ऊपर से मनस ऊर्जा। चक्र पर दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का अच्छा मिश्रण हो जाता है। चक्र पर जो सिकुड़न महसूस होती है, वह एकप्रकार से प्राण ऊर्जा से चक्र को लगने वाला धक्का है। चक्र पर जो कुंडलिनी चित्र महसूस होता है, वह चक्र पर मनस ऊर्जा से लगने वाला धक्का है। दरअसल आगे के चक्रों पर धक्का लगाने वाली शक्ति भी प्राण शक्ति ही है, मनस शक्ति नहीं। मनस शक्ति तो प्राण शक्ति के साथ तब मिश्रित होती है, जब वह मस्तिष्क से गुजर रही होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे किसी नदी के एक बगीचे के बीच से गुजरते समय उसके पानी में फूलों की सुगंध मिश्रित हो जाती है। अगले चक्रों में वह सुगन्धि या कुंडलिनी चित्र ज्यादा मजबूत होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि आगे की नाड़ी में ऊर्जा नीचे जाते समय अपनी ज्यादातर खुशबू गवां देती है। मूलाधार से मुड़कर जब वह पीठ से ऊपर चढ़ती है, तब उसमें बहुत कम कुंडलिनी सुगन्धि बची होती है। मस्तिष्क में पहुंचते ही उसमें फिर से कुंडलिनी सुगंधि मिश्रित हो जाती है। वह फिर आगे से नीचे उतरते हुए चक्रों के माध्यम से चारों ओर कुंडलिनी सुगन्धि फैला देती है। इस तरह से यह चक्र चलता रहता है। सम्भवतः महामृत्युंजय मंत्र का “सुगंधिम पुष्टिम वर्धनम” इसी कुंडलिनी सुगंधि को इंगित करता है। एक पिछली पोस्ट में भी इसी तरह का अपना अनुभव साझा कर रहा था कि यदि सहस्रार को ऊपर वाले त्रिभुज का शिखर मान लिया जाए, आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़ने वाली रेखा को त्रिभुज का आधार मान लिया जाए, उससे निचली उल्टी त्रिभुज का आधार जुड़ा हो, जिसका शिखर मूलाधार चक्र हो, तो बीच वाले चक्रों पर बड़ा अच्छा ध्यान लगता है। अब मैं अपने ही उस अनुभव को वैज्ञानिक रूप से समझ पा रहा हूँ कि ऐसा आखिर क्यों होता है। दरअसल ऊपर के त्रिभुज से मनस ऊर्जा ऊपर से नीचे आती है, और नीचे के त्रिभुज से प्राण ऊर्जा ऊपर जाती है। वे दोनों आधार रेखा पर स्थित चक्रों पर आपस में टकराकर एक ऊर्जा विस्फोट सा पैदा करती हैं, जिससे चक्र तेजी से घूमता है और कुंडलिनी जीवंत जैसी हो जाती है। पिरामिड आकृति में जो ऊर्जा का घनीभूत संग्रह होता है, वह इसी त्रिभुज सिद्धांत से होता है। जो यह कहा जाता है कि शरीर के चक्र शरीर के ऊर्जा केंद्र हैं, उसका मतलब यही है कि उन पर कुंडलिनी चित्र मजबूत होता है। वह कुंडलिनी चित्र आदमी के जीवन में बहुत काम आता है। उसी से कुंडलिनी रोमांस सम्भव होता है। उसी से अनासक्ति और अद्वैत की प्राप्ति होती है, जिसे प्राप्त करके आदमी काम करते हुए थकता ही नहीं। दरअसल आदमी के विकास के लिए सिर्फ शारीरिक और मानसिक शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। यदि ऐसा होता तो समृद्ध घर के रचे-पचे लोग ही दुनिया में तरक्की का परचम लहराया करते। पर हम देखते हैं कि अधिकांश मामलों में बुलंदियों को छूने वाले लोग गरीबी और समस्याओं से ऊपर उठे होते हैं। दरअसल सबसे ज़्यादा जरूरी आध्यात्मिक शक्ति होती है, जो कुंडलिनी से प्राप्त होती है। इससे आदमी अहंकार रूपी उस अंधेरे से बचा रहता है, जो काम करने से पैदा होता है, और तरक्की को रोकता है। एक बार मैं डॉक्टरों और हस्पतालों के चक्कर इसलिए लगाने लग गया था, क्योंकि मैं काम से थकता ही नहीं था। आम लोग तो इसलिए हॉस्पिटल जाते हैं क्योंकि वे काम से जल्दी थक जाते हैं। पर मेरे साथ उल्टा हो रहा था। कुंडलिनी मेरे ऊपर भूत बनकर सवार थी। कुंडलिनी शायद वह भूत है, जिसका वर्णन एक कहानी में आता है कि वह कभी खाली नहीं बैठता था, और पलक झपकते ही सब काम कर लेता था। जब उसे काम नहीं मिला तो वह आदमी को ही परेशान करने लगा। फिर किसी की सलाह से उसने उसे खम्बे को लगातार गाड़ते और उखाड़ते रहने का काम दिया। मतलब आदमी लगातार किसी न किसी काम में व्यस्त रहा। वैसे तो कुंडलिनी भली शक्ति है, कभी बुरा नहीं करती, होली घोस्ट की तरह। शायद होली घोस्ट नाम इसीसे पड़ा हो। फिर भी कुंडलिनी को हैंडल करना आना चाहिए। मुझे तो लगता है कि आजकल जो अंधी भौतिक तरक्की हो रही है, उसके लिए अनियंत्रित व मिसगाइडिड कुंडलिनी ही है।

अद्वैत का चिंतन कब करना चाहिए

किसी चक्र पर ध्यान देते हुए यदि अद्वैत की अवचेतन भावना भी की जाए, तो आनन्द व संकुचन के साथ कुंडलिनी उस चक्र पर प्रकट हो जाती है। यदि मस्तिष्क के विचारों या मस्तिष्क के प्रति ध्यान देते समय अद्वैत का ध्यान किया जाए, तो मस्तिष्क में दबाव व आनन्द के साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। इससे मस्तिष्क जल्दी ही थक जाता है।

योग में आसनों व प्राणायाम का क्रम

फिर कहते हैं कि पहले आसन करने चाहिए। उसके बाद प्राणायाम करना चाहिए। अंत में कुंडलिनी ध्यान करना चाहिए। प्राणायाम में भी सबसे पहले कपालभाति किया जाता है। मैं भी अपने अनुभव से बिल्कुल इसी क्रम में करता हूँ। आसनों से थोड़ा नाड़ियां खुल जाती हैं। इसलिए प्राणायाम से उनमें आसानी से कुंडलिनी ऊर्जा का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है। कपालभाति से भी नाड़ियों को खोलने के लिए भरपूर ताकत मिलती है, क्योंकि इसमें झटके से श्वास-प्रश्वास चलता है। लगभग 25-30 आसान हैं हठयोग प्रदीपिका में। कुछ मेरे द्वारा किए जाने वाले आसनों से मेल खाते हैं, कुछ नहीं। इससे फर्क नहीं पड़ता। ऐसे आसनों का मिश्रण होना चाहिए, जिससे लगभग पूरे शरीर का व्यायाम हो जाता हो। विशेष ध्यान पीठ और उसमें चलने वाली तीन मुख्य नाड़ियों पर होना चाहिए। मैं भी अपने हिसाब के 15-20 प्रकार के आसन कर ही लेता हूँ। मैं कुर्सी पर ही प्राणायाम करता हूँ। सिद्धासन आदि में ज्यादा देर बैठने से घुटने थक जाते हैं। कुर्सी में आर्म रेस्ट न हो तो अच्छा है, क्योंकि वे ढंग से नहीं बैठने देते। कुर्सी पर गद्दी भी रख सकते हैं। कुर्सी उचित ऊंचाई की होनी चाहिए।

नाड़ीशोधन प्राणायाम मूल प्राणायाम के बीच में खुद ही होता रहता है

प्राणायाम में कपालभाति के बाद कुछ देर बाएं नाक से सांस भरना और दाएं नाक से छोड़ना और फिर साँसों की घुटन दूर करने के लिए नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब हर सांस के साथ नथुने को बदलते रहना जैसे कि बाएं नाक से सांस लेना और दाएं से छोड़ना, फिर दाएं से लेना और बाएं से छोड़ना, और इसी तरह कुछ देर के लिए करना जब तक थकान दूर नहीँ हो जाती। फिर कुछ देर विपरीत क्रम में साँसे लेना, और विपरीत क्रम में नाड़ी शोधन प्राणायाम करना मतलब दाएं नथुने से शुरु करना। फिर दोनों नाकों से एकसाथ सांसें लेना और छोड़ना। फिर से साँसों की घुटन दूर करने के लिए कुछ देर एक तरफ से और कुछ देर दूसरी तरफ से नाड़ी शोधन प्राणायाम शुरु करना। इसी तरह, कुंडलिनी ध्यान करते समय जब साँसों को रोका जाता है, उससे साँस फूलने पर भी नाड़ी शोधन प्राणायाम करते रहना चाहिए। इस तरह से नाड़ी शोधन प्राणायाम खुद ही होता रहता है। अलग से उसके लिए समय देने की जरूरत नहीं।

कुंडलिनी योग में लेखन का महत्त्व

दोस्तो, पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी प्रेम की भूखी होती है। आध्यात्मिक शास्त्रों में भगवान भी तो प्रेम के ही भूखे बताए जाते हैं। दरअसल भगवान वहाँ कुंडलिनी को ही कहा गया है। साथ में मैं बता रहा था कि कैसे आजकल की पीढ़ी असंतुलित होती जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक वीडियोस, सोशल मीडिया और गेम्स के लिए उनके पास समय भी बहुत है, और संसाधन भी। पर इलेक्ट्रॉनिक बुक्स, वैबपोस्टस और चर्चाओं के लिए न तो समय है, और न ही संसाधन। इनके भौतिक या कागजी रूपों की बात तो छोड़ो, क्योंकि वे भी अपनी जगह पर जरूरी हैं। यदि ये आध्यात्मिक प्रकार के हैं, तब तो बिल्कुल भी नहीं। एकबार एक जानेमाने पुस्तक विक्रेता की दुकान पर उसके मालिक से मेरी इस बात पर संयोगवश चर्चा चल पड़ी थी। बेचारे कह रहे थे कि इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स ने उनकी दुकान पर पुस्तकों की बिक्री बहुत कम कर दी है। फिर भी उनके संतोष व उनकी सहनशीलता को दाद देनी पड़ेगी जो कह रहे थे कि बच्चों को बड़े प्यार से ही मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गेजेट्स से दूर रखना चाहिए, डांट कर नहीं। डांट से वे कुण्ठा औऱ हीनता से भर जाएंगे। डांटने से अच्छा तो उनको इनका प्रयोग करने दो, वे खुद सीखेंगे। यहाँ हम किसी चीज को ऊंचा या नीचा नहीं दिखा रहे हैं। हम तो यही कह रहे हैं कि संतुलित मात्रा में सभी मानवीय चीजों की जरूरत है। संतुलन ही योग है, संतुलन ही अध्यात्म है।

असली लेखक अपने लिए लिखता है

मैं हमेशा अपने बौद्धिक विकास के लिए लिखने की कोशिश करता रहता हूँ। जो असली लेखक होता है, वह औरों के लिए नहीं, अपने लिए लिखता है। लेखन से दिमाग को एकप्रकार से एक्सटर्नल हार्ड डिस्क मिल जाती है, डेटा को स्टोर करने के लिए। इससे दिमाग का बोझ कम हो जाने से वह ज्यादा अच्छे से सोच-समझ सकता है। आपको तो पता ही है कि कुंडलिनी योग के लिए चिंतन शक्ति की कितनी अधिक जरूरत है। केंद्रित या फोकस्ड चिंतन ही तो कुंडलिनी है। उस लेखन को कोई पढ़े तो भी ठीक, यदि न पढ़े तो भी ठीक। अपने जिस लेखन से आदमी खुद ही लाभ नहीं उठा सकता, उससे दूसरे लोग क्या लाभ उठाएंगे। अपने फायदे के साथ यदि दुनिया का भी फायदा हो, तो उससे बढ़िया क्या बात हो सकती है। आप मान सकते हो कि मेरे आध्यात्मिक अनुभवों में मेरे लेखन का अप्रतिम योगदान है। कई बार तो लगता है कि यदि मुझे लेखन की आदत न होती, तो वे अनुभव होते ही न। आजकल ईबुक्स की कीमतें बढ़ा-चढ़ा कर रखने का रिवाज सा चला है। पर सच्चाई यह है कि उन पर लेखक के भौतिक संसाधन खर्च नहीं होते, जैसे कि कागज, पैन आदि। सैल्फ पब्लिशिंग से पब्लिशिंग भी निःशुल्क उपलब्ध होती है। केवल लेखक की बुद्धि ही खर्च होती है। पर बुद्धि तो खर्च होने से बढ़ती है। किताब की कीमत तो बुद्धि व अनुभव के रूप में अपनेआप मिल ही जाती है, तब पैसे की कीमत किस बात की। कहते भी हैं कि विद्या खर्च करने से बढ़ती है। इसीलिए पुराने जमाने में आध्यात्मिक सेवाएं निःशुल्क या नो प्रोफिट नो लॉस पर प्रदान की जाती थीं। सशुल्क ईबुक्स को बहुत कम पाठक मिलते हैं। निःशुल्क पुस्तकों को खरीदने व बेचने के लिए गूगल प्ले बुक्स और पीडीएफ ड्राइव डॉट नेट बहुत अच्छे प्लेटफॉर्म हैं। पिछले एक साल के अंदर गूगल प्ले बुक्स पर मेरी नौ हजार पुस्तकें शून्य मूल्य पर बिक गई हैं। इन पुस्तकों में भी सबसे ज्यादा बिक्री इस वेबसाइट की सभी ब्लॉग पोस्टस को इकट्ठा करके बनाई गई पुस्तकों की हुई है। यदि उनकी कीमत रखी होती तो शायद नौ भी न बिकतीं। यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक अन्य प्लेटफार्म पर इन पुस्तकों के पेड वेरशन्स (न्यूनतम मूल्य पर) भी हैं, वहाँ तो लगभग नौ ही बिकी हैं। गूगल प्ले बुक्स पर भी एक बार पुस्तकों का न्यूनतम मूल्य रखकर प्रयोग किया था, तब भी दो या तीन महीनों में केवल 4-5 प्रतियां ही बिक पाई थीं। अपने लेखन के प्रति पाठकों की रुचि से जो संतोष प्राप्त होता है, वह पैसे से प्राप्त नहीं होता। 

इड़ा औऱ पिंगला नाड़ी अर्धनारीश्वर को इंगित करते हैं

अपने पिछले लेखन से मैंने इस हफ्ते यह बात सीखी कि क्यों न अपने आध्यात्मिक अनुभवों का सार्वभौमिक प्रमाण आध्यात्मिक शास्त्रों में भी ढूंढा जाए। इसलिए मैंने स्वामी मुक्तिबोधानन्द की हठयोग प्रदीपिका को पढ़ना शुरु किया। दो दिनों में ही 15% से ज्यादा पुस्तक को पढ़ लिया। इतना जल्दी इसलिए पढ़ पाया क्योंकि जो मैं अपने अनुभवों से लिखता आया हूँ, कमोबेश वही तो था लिखा हुआ। साथ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टी होने के कारण पर्याप्त समय भी मिल गया। सिर्फ दो-चार विचारों में अंतर जरूर था। यदि मैं वह अंतर बताऊंगा, तो यह माना जा सकता है कि आपने भी वह पुस्तक पढ़ ली होगी, क्योंकि आप मेरी पोस्टस शुरु से पढ़ते आ रहे हैं। मैं वह अंतर आने वाली पोस्टों में भी बताता रहूँगा।
उस पुस्तक में लिखा है कि इड़ा नाड़ी पीठ के बाएं भाग से ऊपर चढ़ती है, पर ऊपर जाकर दाईं ओर मुड़कर मस्तिष्क के दाएं गोलार्ध को कवर करती है। पर मुझे तो वह बाएँ मस्तिष्क में ही जाते हुए अनुभव होती है। इसी तरह पिंगला नाड़ी को निचले शरीर के दाएं भाग और मस्तिष्क के बाएं भाग को कवर करते हुए दर्शाया गया है। पर मुझे तो वह दाएं मस्तिष्क में ही जाते हुए दिखती है। अर्धनारीश्वर के चित्र में भी ऐसा ही, मेरे अनुभव के अनुरूप ही दिखाया जाता है। वहाँ तो ऐसा नहीं दिखाया जाता कि शरीर का निचला बायाँ भाग स्त्री का और ऊपरी बायाँ भाग पुरुष का है। हो सकता है कि इसमें कुछ और दार्शनिक या अनुभवात्मक पेच हो।

आध्यात्मिक सिद्धियां बताने से बढ़ती भी हैं

एक अन्य मतभेद यह था कि उस पुस्तक में सिद्धियों को गुप्त रखने की बात कही गई थी। मैं भी यही मानता हूँ कि एक स्तर तक तो गोपनीयता ठीक है, पर उसके आगे नहीं। जब मन जागृति से भर जाए और आदमी क्षणिक जागृति के और अनुभव प्राप्त न करना चाहे, तब अपनी जागृति को सार्वजनिक करना ही बेहतर है। इससे जिज्ञासु लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। ऐसा दरअसल खुद ही होता है। जिस आदमी के पास कम पैसा होता है, और पैसों से मन नहीं भरा होता है, वह उसे छिपाता है, ताकि दूसरे लोग न मांग ले। पर जब आदमी के पास असीमित पैसा होता है, और पैसों से उसका मन भर चुका होता है, तब वह उसके बारे में खुलकर बताता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसे पता होता है कि कोई कितना भी ले ले, पर उसका पैसा खत्म नहीं होने वाला। यदि कोई उसका सारा पैसा ले भी ले, तब भी उसे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उसका मन तो पैसे से पहले ही भर चुका होता है। बल्कि उसे तो फायदा ही लगता है, क्योंकि जो चीज उसे चाहिए ही नहीँ, उससे उसका पीछा छूट जाता है। वैसे आजकल के वैज्ञानिक व बुद्धिजीवी समाज में आध्यात्मिक सिद्धियां बताने से बढ़ती भी हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आजकल के पढ़े-लिखे लोग एक-दूसरे की जानकारियों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं। मुझे तो लगता है कि यदि मैं अपने प्रथम आध्यात्मिक अनुभव की खुली चर्चा सोशल मीडिया में न करता, तो मुझे जागृति का दूसरा अनुभव न मिलता। पुराने समय के आदिम युग में अनपढ़ता व अज्ञान के कारण सम्भवतः लोग एक-दूसरे से ईर्ष्या व घृणा करते होंगे। इससे वे एक-दूसरे के ज्ञान से प्रेरणा न लेकर एक-दूसरे की टांग खींचकर आपस में एक-दूसरे को गिराते होंगे, तभी उस समय सिद्धियों को छिपाने का बोलबाला रहा होगा। कुंडलिनी के बारे में भी मुझे अधूरी सी जानकारी लगी। इस बारे अगली पोस्ट में बताऊंगा। 

कुंडलिनी इंजिन के ईंधन और ऊर्जा स्पार्क प्लग की चिंगारी की तरह है, जो जागृति-विस्फोट पैदा करते हैं

इन कुंडलिनी-विस्फोट घटकों के लिए ध्यान, शिवबिन्दु, मानवरूप देवमूर्ति, शिवलिंग, ज्योतिर्लिंग, साँस रोकने, मस्तिष्क दबाव, स्वयं शिक्षा, सकारात्मक सोच,अनवरत अभ्यास, निष्कामता, लगन, धैर्य, व व्यवस्थित दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है।

मित्रो, पिछली पोस्ट में मैं कुंडलिनी जागरण और उसमें अनुभव होने वाले जुड़ाव के बारे में बात कर रहा था। वह जुड़ाव कुंडलिनी से शुरु होना चाहिये। इसका अर्थ है कि आदमी को सर्वप्रथम कुंडलिनी के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस होना चाहिए, पूर्ण आनन्द व अद्वैत के साथ। उस पैदा हुए अद्वैत से तो फिर सभी चीजों के साथ अपना जुड़ाव महसूस होगा। हालाँकि यह जुड़ाव सेकंडरी होगा, प्राथमिक तो कुंडलिनी के साथ ही माना जाएगा। ऐसा होने से ही कुंडलिनी चित्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन पाएगा, और स्थाई तौर पर क्रियाशील रहेगा। इसका मतलब आप यह समझो कि ऊर्जा साधना/चक्र साधना/नाड़ी साधना आप करते रहो, क्योंकि ये साधनाएं वक्त पड़ने पर कुंडलिनी के काम आएँगी। पर जगाने का प्रयास मानवरूप कुंडलिनी का ही करो। ऊर्जा को कुंडलिनी के पीछे चलना चाहिए, कुंडलिनी को ऊर्जा के पीछे नहीं। इस बारे में मैं अपना अनुभव बताता हूँ। मैं प्रतिदिन कुंडलिनी ध्यान के साथ ऊर्जा साधना करता था। एकदिन अच्छा अवसर मिलते ही मुझे एकदम से अचानक ही कुंडलिनी की बहुत तेज याद आई, और मैं उसमें खोने लगा। तभी मेरी ऊर्जा भी कुंडलिनी का साथ देने के लिए मूलाधार से पीठ से होकर ऊपर चढ़ी और मस्तिष्क में पहुंच गई। मुझे ऐसा लगा क्योंकि मेरा मूलाधार क्षेत्र पूरी तरह से शिथिल हो गया था, हालांकि वह ऊर्जा इतनी तेजी से ऊपर चढ़ी कि उसे महसूस करने का मौका ही नहीं मिला। इसलिए भी मैं ऊर्जा के पीठ से ऊपर चढ़ने का अंदाजा लगा रहा हूँ, क्योंकि मैं लगभग एक महीने से तांत्रिक विधि से कुंडलिनी को पीठ से ऊपर चढ़ाने का अच्छा अभ्यास कर रहा था। इसलिए भी क्योंकि उस समय वहाँ पर महिलाओं का नाच गाना हो रहा था। उससे भी मूलाधार की ऊर्जा उद्दीप्त हुई। यौन माध्यम से उद्दीप्त ऊर्जा पीठ से ही ऊपर चढ़ती है। वह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुंच कर कुंडलिनी से जुड़ गई जिससे कुंडलिनी जागरण हो गया। बोलने का मतलब है कि कुंडलिनी तो खुद ही जागृत होने जा रही थी। उसे केवल ऊर्जा की अतिरिक्त आपूर्ति चाहिए थी। यह इसी तरह है जैसे कि गैस इंजन में पहुंच गई थी, बस उसे धमाका करने के लिए स्पार्क प्लग से एक चिंगारी की जरूरत थी। यदि चिंगारी न मिले तो इंजन में शक्ति का धमाका न होए। इसी तरह, यदि मैं ऊर्जा साधना न कर रहा होता तो कुंडलिनी को ऊर्जा न मिलती, और वह बिना जागृत हुए ही मस्तिष्क से नीचे लौट आती। ऐसा कुंडलिनी का ऊपर-नीचे आने-जाने का चक्र सबके अंदर चलता रहता है, बस ऊर्जा की चिंगारी नहीं दे पाते अधिकांश लोग। कइयों के साथ ऐसा होता है कि ऊर्जा की नदी तो मस्तिष्क में पहुंच जाती है, पर वहाँ कुंडलिनी नहीं होती। उससे मन में बहुत स्पष्टता के साथ चित्र कौंधते हैं, पर जागते नहीं। यह ऐसे ही है कि इंजन में गैस नहीं है, पर स्पार्क लगातार मिल रहे हैं। उससे चिंगारी की थोड़ी चमक तो पैदा होएगी, पर धमाके जितनी विशाल चमक नहीं। इसलिए मुख्य लक्ष्य कुंडलिनी को ही बनाओ, पर ऊर्जा साधना भी करते रहो। यह ऐसा है कि आपने कुंडलिनी की इतनी गहरी याद पैदा करनी है कि आप उसमें कुछ पलों के लिए खो जाओ। यही कुंडलिनी जागरण है। ऐसा समझो कि गुरु या देवता की याद इतनी गहरी पैदा करनी है, जितनी गहरी एक प्रणय प्रेम में डूबे हुए एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका की खुद ही पैदा हो जाती है। पर गुरु या देवता की गहरी याद आपके अंदर खुद पैदा नहीं होगी, क्योंकि वहां पर यौन आकर्षण नहीं है। इसलिए आपको यौन आकर्षण जैसा मजबूत आकर्षण पैदा करने के लिए तांत्रिक तकनीकों का सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए उपरोक्त ऊर्जा साधनाएं आपके काम आएँगी। फिर आप कहेंगे कि फिर यौन प्रेमी को ही क्यों न कुंडलिनी बना लिया जाए। पर यह श्रेष्ठ तरीका नहीं है। पहली बात, यौन विकार के कारण यौन कुंडलिनी को जगाना असम्भव के समान है। दूसरी बात, कोई नहीं चाहेगा कि अगला जन्म स्त्री का मिले, क्योंकि स्त्री को पुरुष से ज्यादा कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। आदमी जैसा सोचता है, वह अगले जन्म में वैसा ही बन सकता है। यह अलग बात है कि आजकल के वैज्ञानिक युग में स्त्री व पुरुष समान हैं, बल्कि कई जगह तो स्त्री पुरुष से ज्यादा मजे में है। पर ऐसा युग हमेशा नहीं रहेगा। आज के जैसी वैज्ञानिक सुविधाओं का युग तो असीमित काल का मात्र एक नगण्य जैसा अंश प्रतीत होता है। ये सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं होतीं। ये दृश्य सत्य पर आधारित मेरे अपने अनुभवात्मक विचार हैं, इसमें लैंगिक भेदभाव वाली कोई बात नहीं है, और न होनी चाहिए। ये पर्सनल ब्लॉग है, ख्याति या पैसे के लिए नहीं। वैसे भी, दुनिया में नजर भी आता है और तंत्र सम्प्रदायों में भी यह मान्यता है कि स्त्री केवल पुरुष की सहायता ही कर सकती है कुन्डलिनी जागरण में, स्वयं जागृत नहीं हो सकती। यदि वह यह सहायता करती है, तो अगले जन्म में वह पुरुष बन कर जागृत हो जाती है। वैसे तो तन्त्र सम्प्रदायों में भी बहुत सी महान तांत्रिक महिलाएं हुई हैं, जिन्होनें अपने पुरुष साथी को भी जागृत किया है, और वे खुद भी जागृत हुई हैं। विशेष प्रयास करने वाले अपवाद के मामले तो हर जगह ही मिल जाते हैं। देवी माता का ध्यान तो बहुत से योगी करते ही आए हैं। योगी रामकृष्ण परमहंस माँ काली के उपासक थे। उन्हें ध्यान में काली माता स्पष्ट भौतिक रूप में दिखती थीं। वे उनसे खेलते, बातें करते। पर एक साधारण स्त्री और देवी स्त्री में फर्क है। शायद इसीलिए स्त्री को गुरु बनाए जाने के बारे में शास्त्रों में बहुत कम बताया गया है। वैसे परिवर्तन व विभिन्नता संसार का नियम है। आदमी को जैसे भी उपयुक्त लगे, वैसे ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। साथ में कहा था कि संयोगवश या शक्तिपात आदि से जो बिना प्रयासों के जागृति प्राप्त होती है, वह अल्प व अस्थायी होती है। अल्प का मतलब कि उससे पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती। ऐसा मन करता है कि एकबार और जागृति मिल जाए। उससे बना कुण्डलिनी चित्र भी कुछ वर्षों के बाद मिटने लगता है। हालांकि ऐसी जागृति आदमी को पूर्ण जागृति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। इससे आदमी योग अभ्यास करने लगता है।

बिंदु शक्ति मूलाधार से सहस्रार की तरफ निर्देशित की जाती है

कुंडलिनी को बिंदु की शक्ति मूलाधार से स्वयं ही मिलती है। यदि किसी को बिंदु नाम से कुंडलिनी का अपमान लगे, तो शिवबिन्दु व ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग नाम से ध्यान किया जा सकता है। इससे कुंडलिनी का अपमान भी नहीं होगा, और आदमी को शिव का स्वरूप भी मिलेगा। एकसाथ दो लाभ। एक और बढ़िया तरीका है कि अद्वैत के चिंतन को ही शिवबिंदु का नाम दे दो। इससे जैसे ही कुंडलिनी मन में आएगी, उसे एकदम से बिंदु की शक्ति मिल जाएगी। वैसे भी इस अद्वैतपूर्ण शरीर का मालिक शिव ही है। आदमी तो झूठमूठ का अहंकार करके इसका मालिक बन जाता है। इस तथ्य को शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। कुंडलिनी चक्रों पर शिवबिन्दु के ध्यान से सभी 12 चक्र शिव के बारह ज्योतिर्लिंग बन जाते हैं। ज्योतिर्लिंग शब्द में ज्योति का अर्थ कुंडलिनी की चमक से है। यही 12 ज्योतिर्लिंगों का आध्यात्मिक रहस्य है। इसीलिए मूलाधार को संकुचित करते रहने व वहाँ सिद्धासन में पैर की ऐड़ी का दबाव देने को कहते हैं। दरअसल बिंदु शक्ति को ले जाने वाली वज्र नाड़ी स्वाधिष्ठान चक्र व मूलाधार चक्र से होकर पीठ के बीचोंबीच ऊपर चढ़ती है। वह जननांग से शुरु होती है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है कि कैसे उस कुन्डलिनी नाड़ी को कुंडली लगाए नागिन की तरह दिखाया गया है, और कैसे वह कुन्डली खोलकर खड़ी हो जाती है। दरअसल कुन्डलिनी नागिन के आकार में नहीं है, जैसा कई लोग समझते हैं। यह कुन्डलिनी शक्ति को ले जाने वाली नाड़ी है। कुन्डलिनी नाम इसलिये पड़ा है, क्योंकि वह कुंडली लगाई हुई नागिन के जैसी नाड़ी में कैद रहती है। यह संस्कृत शब्द है। मूलाधार पर दबाव से वह नाड़ी क्रियाशील हो जाती है। इससे जाहिर है कि मूलाधार में जो शक्ति का निवास बताया गया है, वह बिंदु रूप में ही है। उसी बिंदु शक्ति को सहस्रार तक ले जाना होता है जागरण के लिए। वह धीरे धीरे करके रास्ते के सभी चक्रों को जागृत करते हुए भी वहाँ पहुंच सकती है, और सीधी भी। यह अभ्यास के प्रकार पर निर्भर करता है। साधारण अभ्यास से वह धीरे धीरे ऊपर पहुंचती है, पर तांत्रिक अभ्यास से एकदम सीधी सहस्रार में। उस बिंदु शक्ति को केवल आदमी ही ऊपर चढ़ा सकता है, अन्य जीव नहीं। क्योंकि केवल आदमी ही योगाभ्यास कर सकता है। साथ में, विशाल बिंदु शक्ति को झेलने लायक मस्तिष्क केवल आदमी के पास ही है, अन्य जीवों के पास नहीं।

साँस रोकने के बहुत से लाभ हैं

योगा वाली साँसों पर भी पिछली पोस्ट में व्यावहारिक चर्चा कर रहा था। दरअसल जो ड्रैगन को साँसों की आग उगलते हुए दिखाया गया है, वह कुंडलिनी की आग का ही प्रतीक है। उस साँस से जो कुंडलिनी नाड़ी लूप में घूमते हुए चमकती है, उसीको रहस्यात्मक आग के रूप में दर्शाया गया है। आदमी का वास्तविक आकार भी एक ड्रैगन के रूप जैसा ही है। यदि हम रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क को लें, तो एक नाग या ड्रैगन जैसा आकार बनता है। आदमी का असली रूप रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में ही समाया हुआ है। बाहर के अन्य अंग तो मात्र बाहरी छिलकों की तरह है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया था। यह मैंने कहीं पढ़ा नहीं और न ही इसका प्रमाण है मेरे पास, जो नीचे लिखा है। ऐसा लगता है कि साँस रोकने से रक्त वाहिनियों की दीवारों का लचीलापन बढ़ता है। क्योंकि उनकी मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। खुद भी महसूस होता है, जब साँस रोकने से दिमाग की नसों में भारीपन व कड़ापन सा महसूस होता है। पर ऐसा सावधानी से करना चाहिए। बहुत ज्यादा या बहुत देर तक नहीँ। इसीलिए जिन आसनों में पेट अंदर को दबता है, उन्हें साँस बाहर निकालकर रोककर करने को कहते हैं। जैसे कि शीर्षासन, सर्वांगासन, हलासन, नौकासन आदि। जिनमें पेट बाहर को फूलता है, उनमें साँस अंदर भरकर रोकने को कहते हैं। जैसे कि शलभासन, मकरासन, भुजंगासन आदि। वैसे नियंत्रित अवस्था में तो किसी भी आसन में सांस को भरकर या बाहर निकालकर अपनी रुचि के अनुसार रोककर रख सकते हैं। शीर्षासन, सर्वांगासन व हलासन में विशेष ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि उनमें मस्तिष्क में बहुत दबाव पैदा होता है। अगर साँस रोकने से विशेषकर योग के दौरान खून की नसों का लचीलापन बढ़ता है, तो इससे जाहिर है कि इससे स्ट्रोक, व दिल के रोगों से कुछ राहत मिल सकती है। जब तक रिसर्च से प्रूव नहीं होता, तब तक ऐसा विश्वास करके श्वास रोककर योग करते रहने में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी यह तो वैज्ञानिक प्रयोगों से स्पष्ट हो चुका है कि साँस रोकने से दिमाग में ऑक्सीजन का स्तर बदलता रहता है। इसका सीधा सा मतलब है कि खून की नसें सिकुड़ती और फैलती रहती हैं। जाहिर है कि उनके सिकुड़ने से ऑक्सीजन का स्तर घटेगा, और फैलने से बढ़ेगा। कुंडलिनी जागरण के समय मस्तिष्क में काफी दबाव महसूस होता है। उस दबाव को सहने के लिए भी इससे दिमाग की नसें तैयार रहती हैं।

सिर का दबाव ऐसा लगता है कि माथे के किनारों वाली दिमाग की नसें फूली हुई हैं। ऐसे आसन जिसमें सिर शरीर से नीचे हो, उनमें ऐसा ज्यादा लगता है। अभी हाल ही में मेरे एक रिश्तेदार लड़के की ब्रेन हेमरेज से मृत्यु हुई। वह सिर्फ 30 साल का था। अंतर्मुखी, लाडला, परिवार पर ज्यादा ही निर्भर और परिवार के इलावा दूसरों से कम घुलने-मिलने वाला था। कुछ दिनों से उसके सिर में हल्का सा दर्द रह रहा था, और खून की उल्टी के साथ बेहोशी से आधा घण्टे पहले वह सिर की नसों को छूकर बता रहा था कि उसे लग रहा था कि उसकी दिमाग की नसें फूल रही थीं। उसकी माँ को तो हाथ से छूने पर वैसा कुछ नहीं लगा। इसलिए उसे सोकर आराम करने को कहा। आईसीयू में डॉक्टरों ने उसके बचने के सिर्फ 5% चांस बताए। उसका मस्तिष्क बहते और जमे खून के दबाव से पत्थर की तरह सख्त हो गया था। वह सिर्फ डेढ़ दिन ही आईसीयू में जिंदा रह सका। उसे 5 दिन पहले कोरोना वैक्सीन, एस्ट्रोजेनिका आधारित कोविशील्ड भी लगा था। डॉक्टरों ने कहा कि उसे ज्यादा ही इम्मयूनिटी पैदा हो गई थी। इससे डरने की जरूरत नहीं। इससे डरकर वैक्सीन लगाना बन्द नहीं करना चाहिए, जब तक कोई बेहतर वैक्सीन नहीं आ जाती। इससे बहुत सी जानें बची हैं। इसकी तुलना में तो साईड इफेक्ट नगण्य ही हैं। हाँ, सावधान रहकर हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर साइड इफेक्ट लगे, तो डॉक्टर से सम्पर्क में रहना चाहिए। ऐसे जीवनघातक दुष्प्रभाव की संभावना लाखों में केवल 1-2 को ही होती है। अब तो यह भी सामने आया है कि यदि गलती से इंजेक्शन माँस की बजाय खून की नस में लगे, तो भी खून में क्लॉट बन सकते हैं। मैं यह इसलिए बता रहा हूँ कि अगर योग, व्यायाम आदि से उसके दिमाग की नसों में ज्यादा फुलाव को झेलने की शक्ति होती, तो शायद रक्तस्राव न होता या कम रक्तस्राव होता, या एमरजेंसी ट्रीटमेंट से जान बच जाती।

बिंदु का अर्थ एक सुई की नोक जितना स्थान भी होता है

इसे अंग्रेजी में पॉइंट कहते हैं। यह पैन को एक स्थान पर रखकर उसकी स्याही का निशान लगाने से बनता है। पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि बिंदु का अर्थ बूँद होता है। पर इसका दूसरा अर्थ पॉइंट भी होता है। कुंडलिनी भी वास्तव में असीमित क्षेत्र के मन का एक सूक्ष्म स्थान होता है। यदि कागज के एक पृष्ठ या पूरी पुस्तक पर लिखे लेख को मन मान लिया जाए, तो कुंडलिनी सिर्फ एक पॉइंट जितने स्थान में आ जाएगी। एक पॉइंट से पूरे लेख के बारे में जानकारी मिल जाती है कि कौन सा पैन इस्तेमाल हुआ है, और कौन सी स्याही। यहाँ तक भी पता चल सकता है कि लेखक का हस्तलेख कैसा है। इसी तरह एक कुंडलिनी से पूरे मन के स्वभाव का अनुमान लग जाता है। जैसे एक बिंदु के पूर्ण ज्ञान से पूरा लेख नियंत्रित किया जा सकता है, इसी तरह एक कुंडलिनी के संपूर्ण ज्ञान से पूरा मन नियंत्रित हो जाता है। मैं यह उपमा दोनों के बीच में बाहरी सादृश्यता को देखकर दे रहा हूँ, भीतरी को नहीं।

योग सीखने की चीज नहीं, अभ्यास की चीज है

मुझे कई लोग बोलते हैं कि मुझे योग सिखा दो। जिसे 20 सालों को करते हुए मैं थोड़ा सा सीखा हूँ, उसे किसीको एकदम से कैसे सिखा सकता हूँ। योग वास्तव में कोई एक विशेष क्षेत्र की विद्या नहीं है, जिसे एकदम से सिखाया जा सके। यह एक विचारधारा है, एक जीवन दर्शन है, एक लाइफस्टाइल है। यह मन की एक अद्वैतमयी सोच है। इसे आप सकारात्मक सोच भी कह सकते हैं। उस सोच को बना कर रखने और बढ़ाने के लिए आप जो मर्जी तरीका चुन सकते हैं। बहुत से तरीकों का भी एकसाथ इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए पहले सोच पैदा करना जरूरी है। जिसके अंदर सोच ही नहीं है, वह उसे बना के क्या रखेगा, और उसे बढ़ाएगा क्या। सोच तो आदमी के अपने वश में है। इसीलिए प्रकृति ने आदमी को फ्री विल उन्मुक्त चिंतन शक्ति दी है। योग कोई सोच जबरदस्ती नहीं पैदा कर सकता। योग का सहारा उस सोच को बढ़ाने के लिए लिया जा सकता है। जिसके अंदर यह सोच है, उसे कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं। सोच अपना रास्ता खुद ढूंढती है। उन्हें सोच बनाने के लिए मैं शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक पढ़ने को कहता हूँ। उसके बाद उनकी तरफ से कोई संदेश ही नहीं आता। यदि संदेश आता, तो मैं उन्हें कहता कि अब इस सोच को पक्का करने के लिए कुछ सालों तक इस सोच के साथ कर्मयोग के रास्ते पर चलो। सोच को आप कुंडलिनी भी मान सकते हो, क्योंकि दोनों ही मन के विचार हैं। फिर जब कुछ वर्षों के बाद उनका संदेश आता तो मैं उन्हें कुंडलिनी योग के बारे में बताता, व उसके बारे में व्यावहारिक पुस्तकें सुझाता, बेशक वे मेरी लिखी हुई ही हों। यही असली तरीका है योग सीखने का। मैं भी ऐसे ही सीखा हूँ। यदि कोई व्यायाम की तरह का शारीरिक योग ही सीखना चाहे, तो उसके लिए आज बहुत से साधन हर जगह उपलब्ध हैं, ऑनलाइन भी और ऑफलाइन भी। असली योग सीखने में समय लगता है, पूरी उम्र भी लग सकती है। 

आर्यसभ्यता की देवमूर्ति परम्परा से कुन्डलिनी साधना

आर्यन सभ्यता की रीति रिवाजों को देखकर उस समय की महान आध्यात्मिक वैज्ञानिकता वाली सोच का पता चलता है। शिव, गणेश आदि देवता बिल्कुल स्थाई व अजर अमर बना दिए गए थे। मूर्ति कला अपने चरम पर थी। इतनी जीवंत व आकर्षक मूर्तियां बनती थीं, जिनके आगे असली आदमी लज्जित हो जाते थे। असली आदमी, गुरु या प्रेमी से अधिक आसान तो देव मूर्तियों पर ध्यान लगाना होता था। उदाहरण के लिए यदि किसी के मन में शिव मूर्ति का रूप जागृत हो जाए, तो वह कभी नहीं भूल सकता था। वह इसलिए क्योंकि वह मूर्ति विशेष सहेज कर मन्दिर में हमेशा के लिए रखी जाती थी। वैसे भी देश के हरेक स्थान पर शिव मंदिर होने से शिव रूपी कुंडलिनी का कभी विस्मरण नहीं होता था। असली आदमी का तो सीमित जीवन होता है, पर ये देवमूर्तियाँ तो धर्म परंपरा से जुड़कर शाश्वत हो गई हैं। असली आदमी का तो वियोग भी हो सकता है। फिर ध्यान कैसे लगाए। देवमूर्तियां तो हर जगह और हर समय विद्यमान हैं। इसीलिए इनको बहुत सुंदर बनाया जाता था। स्वर्णमूर्ति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। क्योंकि वह सबसे आकर्षक, चमकदार और दीर्घजीवी होती थी। मैंने कई इतनी सुंदर मूर्तियां इतने जीवंत और सुंदर रूप में देखी हैं, कि आजतक मेरे मन में जीवंत हो जाती हैं। सोचो, जब एक बार देखने पर ही वे मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ सकती हैं, तो बार बार उनका ध्यान करने से वे क्यों मन में जागृत नहीं होएंगी। यदि न भी जागृत होए, तो भी वे आदमी को अनासक्ति व अद्वैत के साथ जीना सिखाती हैं। वे हर हाल में फायदा ही करती हैं। वैसे  भी देव मूर्ति तभी अस्तित्व में आई जब किसीने सबसे पहले उसको मन में जागृत किया और उसे दुनिया के सामने रखा।

कुंडलिनी वाला भला केवल मानसिक कुन्डलिनी ही कर सकती है, कोई स्थूल भौतिक रूप नहीं

आदमी का भला करना तो कुंडलिनी का स्वभाव है, चाहे वह पत्थर के रूप वाली ही क्यों न हो। इसीलिए यह कहावत बनी है कि मानो तो पत्थर में भी भगवान मिल जाते हैं। पर इसका श्रेय कुंडलिनी को न दिया जाकर देवता को दिया जाने लगा। इससे लोगों के मन में देवताओं के प्रति विश्वास बढ़ता गया, जो आज तक है। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर मानव भलाई के सारे काम कुंडलिनी कर रही थी। देवताओं को श्रेय दिया जाना उचित भी है, क्योंकि वे वैसे भी भौतिक रूप से भी लोगों का भला करते रहते हैं। जैसे सूर्यदेव रौशनी देते हैं, और जलदेव पानी। हालांकि कुंडलिनी वाला भला तो कुंडलिनी ही कर रही है, देवता नहीं। दोनों प्रकार की भलाई को अपने अपने असली रूप में देखना चाहिए, इकट्ठे जोड़कर नहीं, तभी कुंडलिनी के बारे में भ्रम दूर होगा। इसी तरह, एक आदमी का भला प्रेमी के रूप से बनी उसके मन की कुंडलिनी करती है, उसका प्रेमी नहीं। अगर प्रेमी ही भला कर रहा होता, तो शादी के बाद परस्पर आकर्षण खत्म या कम न होकर बढ़ता। पर होता उल्टा है। दरअसल शादी के बाद जब प्रेमी का भौतिक रूप हर वक्त उपलब्ध हो जाता है, तब मन में उसके रूप की बनी हुई कुंडलिनी मिटने लगती है। इससे कुंडलिनी वाले लाभ खत्म हो जाते हैं। पर आदमी दोष देता है प्रेमी को। प्रेमी तो जैसा पहले था, वैसा ही होता है। इसीलिए भगवान कृष्ण कहते हैं कि राधा उनकी सबसे प्रिय है। राधा से विवाह नहीं, सिर्फ उनका प्रेम ही होता है। बात स्पष्ट है कि कृष्ण के मन में राधा के रूप से बनी शाश्वत कुंडलिनी के कारण ही कृष्ण को राधा सबसे प्रिय है। यदि दोनों का विवाह हो जाता, तो शायद वैसा न होता। क्योंकि भौतिक रूप से तो उनकी पत्नी रुक्मिणी सबसे सुंदर हैं। दरअसल असली और सच्चा प्यार सिर्फ और सिर्फ कुंडलिनी से ही होता है, किसी भौतिक वस्तु से नहीं। “किसीकी याद के सहारे जीना” भी इसी कुंडलिनी के द्वारा किए जाने वाले भले का उदाहरण है। भला सुखी जीवन से बड़ा भला और क्या हो सकता है। शिव का दूसरा रूप पर्वत भी है, जो मैंने एक कविता पोस्ट में सिद्ध किया है। पर्वत आदमी का बहुत भला करते हैं। ये पानी, हवा, ठंडक, फल आदि देते हैं। इसलिए लोगों का देवताओं पर आसानी से ध्यान जम जाता है। इसीलिए ज्यादातर मामलों में देवताओं को ध्यान कुंडलिनी बनाया जाता था। इससे संसार में मानवता भी पनपी रहती थी। वैसे भी कुंडलिनी ही भगवान तक ले जाती है। भगवान तक पहुंचने के लिए सीधी उड़ान सेवा नहीं दिखाई देती। लगता यह अजीब है, पर यह सत्य है। यह मूर्ति विज्ञान है, जिसे जो नहीं समझेगा, वह तो दुष्प्रचार करेगा ही।

स्कूल चले हम

घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

खेल नहीं अब सकते हम
स्कू-ल के मैदान में।
कूद नहीं अब सकते हम
खेलों के जहान में।।
अब तो मजे करेंगे हम
खेत पर खलिहान में।
बूढ़ी अम्मा के संग-संग
बतियाएंगे हम हरदम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

ऑनलाइन से पढ़ेंगे हम
ऑलराउंडर बनेंगे हम।
फालतू मीडिया छोड़कर
नॉलेज ही चुनेंगे हम।।
घर में योग करेंगे हम
इंडोर खेल करेंगे हम।
प्रातः जल्दी उठ करके
वॉकिंग भी करेंगे हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने घर को चले हम।
को-रो-ना से डर हरदम
अपने-अपने घर चले हम।।
घर को चले हम, घर को चले हम
स्कूल से अपने-घर को चले हम।

स्कूल तो अपने जाएंगे
वैक्सी-नेशन के बाद।
फिर तो हम हो जाएंगे
जेल से जैसे हों आजाद।।
फिर तो नहीं करेंगे हम
व्यर्थ समय यूँ ही बरबाद।
पढ़-लिख कर व खेल कर
हम होंगे बड़े आबाद।।
शिक्षार्थ स्कूल जाएं हम
सेवार्थ हो आएं हरदम।
स्कूल का नाम रौशन करके
देश को रौशन करदें हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने- स्कूल चले हम।
हरा के उस को-रो-ना को
अपने-अपने स्कूल चले हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।

बीच का बंदर खेलेंगे
स्टप्पू भी अब खेलेंगे।
लुक्का-छुप्पी खेलेंगे
चोर-सिपाही खेलेंगे।।
इक-दूजे संग दौड़ें हम
प्रेम के धागे जोड़ें हम।
मिलजुल रहना सीखें हम
कदम से सबके मिला कदम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।
हरा के उस को-रो-ना को
अपने-अपने स्कूल चले हम।।
स्कूल चले हम, स्कूल चले हम
घर से अपने-स्कूल चले हम।
-हृदयेश बाल

कुंडलिनी के लिए वामपंथी तंत्र के यौगिक पंचमकारों की संभावित अहमियत, जिनसे प्रकृति के तीनों गुण संतुलित रहते हैं

मित्रो, पिछले हफ्ते हमने पंचमकार और उनसे उत्पन्न तमोगुण के बारे में बताया था। पंचमकारों का वर्णन हमने पुरानी पोस्टों में भी किया है। दरअसल पंचमकार वामपंथी तांत्रिक के प्रमुख हथियार हैं, कुंडलिनी का शिकार करने के लिए। ये पांच चीजें हैं, जिनके नाम अक्षर म से शुरु होते हैं। ये हैं, मैथुन, माँस, मद्य, मत्स्य एवं मुद्रा। पांचवा पंचमकार, मुद्रा वास्तव में कुंडलिनी योग ही है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि पंचमकार को लेकर इन भौतिक चीजों या भावनाओं के सांसारिक रूपों के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए। ये केवल तभी पंचमकार बनती हैं, जब ये पूरी तरह से एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक भावना व साधना के साथ होती हैं, और अधिकतम आध्यात्मिक लाभ के लिए न्यूनतम राशि में उपयोग की जाती हैं। ऐसा नहीं करने पर, पंचमकार हानिकारक भी हो सकते हैं। पंचमकार शुरू में द्वंद्व या द्वैत पैदा करते हैं। फिर इसे विभिन्न ध्यान तकनीकों और वेदों-पुराणों या शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतमयी दर्शन-सिद्धांतों के साथ अद्वैत में परिवर्तित किया जा सकता है। दरअसल, अद्वैत का अपना अलग अस्तित्व नहीं है। यह केवल द्वैत का निषेध है। यह द्वैत है, जिसका अपना अस्तित्व है। इसलिए, हम सांसारिक भागीदारी के माध्यम से केवल द्वैत को ही पैदा कर सकते हैं। हम अद्वैत का उत्पादन सीधे नहीं कर सकते हैं, लेकिन केवल द्वैत के निषेध के माध्यम से ही कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, द्वैत सबसे पहले प्राप्त होने वाली आधार वस्तु है। यदि हमारे पास द्वैत नहीं है, तो हम नकारात्मक शब्द ‘अ’ को उस पर कैसे लागू करेंगे। अद्वैत के संबंध में व्यापक गलतफहमी दिखाई देती है। हम द्वैत की पूर्ण उपेक्षा करते हुए अद्वैतमयी नहीं बने रह सकते हैं। ये दोनों भावनाएँ साथ-साथ चलती हैं। हम इस पोस्ट में किसी चीज या जीवन के किसी  विशेष तौर-तरीके की वकालत नहीं कर रहे हैं। हम केवल वैज्ञानिक सत्य को पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

दुनिया की नजरों में पंचमकारों को पापपूर्ण माना जाता है

इसका एक कारण यही है, जो पिछली पोस्ट में बताया था। ये तमोगुण पैदा करते हैं। दूसरा कारण यह है कि इसमें हिंसा कर्म छुपा होता है। कर्म का फल तो मिलता ही है। पर वह कर्म के हिसाब से ही मिलता है, मनमर्जी से नहीँ। शास्त्रीय मिथक कथाओं के अनुसार अधिकांश लोग समझ लेते हैं कि उससे मृत्युदंड मिल जाएगा अथवा भयानक नरकों में घोर यातनाएं झेलनी पड़ेंगी, क्योंकि सभी पाप या हिंसाएं बराबर हैं। पर ऐसा नहीं होता। ये सिर्फ आध्यात्मिक उक्ति ही है, भौतिक या व्यावहारिक नहीं। छुटपुट पापकर्म के छुटपुट फल मिलते रहते हैं, जो आम प्रगतिशील या मेहनतकश जनजीवन में वैसे भी देखे जाते हैं, जैसे बीमार होना, पैर फिसलना, मोच आना, हादसे की संभावना बढ़ जाना आदि। पर ज्यादातर मामलों में बचाव हो जाता है। पंचमकारों से मिली शक्ति से आदमी दुनियादारी के कामों में ज्यादा निमग्न रहने लगता है। इससे स्वाभाविक रूप से जो छुटपुट बीमारियाँ, शारीरिक कष्ट व मानसिक कष्ट पैदा होते हैं, वे ही उनके पाप के फल के रूप में होते हैं। उनसे पंचमकारों का पाप नष्ट होता रहता है, और दुनिया के काम धंधे भी तरक्की करते रहते हैं। इसलिए ऊर्जा का अधिक से अधिक सदुपयोग इस तरह से करना चाहिए कि उसके लिए कम से कम पाप करना पड़े। यही कर्म प्रबंधन है। यही योग है।

आजकल पंचमकारों के बिना कुंडलिनी योग करना मुश्किल प्रतीत होता है

मैं एक ब्लॉग में एक युवक के योग अनुभव के बारे में पढ़ रहा था। वह उसके लिए शुद्ध शाकाहारी बन गया था। एक बार संभवतः वह ऐमजॉन के जंगल में अपने किसी जाने पहचाने व्यक्ति के पास रहने लगता है। वहाँ वह मछली से परहेज करके चावल की ढेरी में एक गड्ढा सा बनाकर उसमें डालने के लिए दाल की मांग करता है। उसके परिचित की हंसी रुकने का नाम ही नहीं लेती। इससे शर्मिंदा होकर वह नॉनवेज योगी बन जाता है। इसका मतलब है कि जैसा देश, वैसा भेष। संतुलित आहार लेना योगी के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि योग के लिए ऊर्जा की सख्त जरूरत होती है। योग का दूसरा नाम संतुलन या संतुलित जीवन भी है। इससे जीवन में संतुलित आहार की अहमियत का पता चलता है। हम भोजन के संतुलन को केवल पोषक तत्त्वों के संतुलन तक ही सीमित समझते हैं। पर वास्तव में यह संतुलन भोजन की प्रकृति के गुणों तक भी एक्सटेंड होना चाहिए। एक आदमी को शाकाहार से सभी जरूरी पोषक तत्त्व मिल सकते हैं, पर उसे प्रकृति का तमोगुण मांसाहार से ही मिलेगा। कोई चाहे तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए बिना सीमित मदिरा का प्रयोग भी आवश्यक तमोगुण की प्राप्ति के लिए कर सकता है। यह सभी को मालूम है और जैसा कि इस ब्लॉग की पिछली पोस्टों में सिद्ध किया गया है कि जीवन के संतुलन के लिए मन के अंदर प्रकृति के तीनों गुण संतुलन में होने चाहिए। ये गुण एक दूसरे के पूरक तभी बनते हैं, जब संतुलन में होते हैं, अन्यथा ये एक दूसरे के अवरोधक बन जाते हैं। ये सभी जानते हैं कि आहार से ही मन बनता है। एक प्रसिद्ध लोकोक्ति भी है कि “जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन”। इससे आहार में प्रकृति के तीनों गुणों के संतुलित मात्रा में होने की अहमियत का पता चलता है। तभी कहते हैं कि बिन खाए भजन न हो गोपाला। आयुर्वेद के वात, पित्त और कफ भी प्रकृति के क्रमशः सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हैं। इनके संतुलन से स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है। पतंजलि ने यम और नियम में जो अहिंसा शब्द डाला है, उसका मतलब है कि बिना उच्च प्रयोजन के हिंसा न हो। यदि शरीर को पुष्ट व नीरोग रखने के लिए हल्की-फुल्की हिंसा के रूप में हल्का-फुल्का हेल्दी नॉनवेज जैसे कि मछली, अंडा न लिया जाए तो यह भी शरीर के प्रति हिंसा होगी। उससे भी योग का यम और नियम कहाँ सिद्ध हो पाएगा। मानव शरीर के प्रति हिंसा तो सबसे बड़ी हिंसा होती है। पतंजलि बहुत लम्बी सोच रखते थे, इसलिए शाकाहार-मांसाहार के झमेले में पड़ने की बजाय उन्होंने अहिंसा शब्द जोड़ दिया। समझने वालों के लिए यह बहुत है। अब यदि विज्ञान के हिसाब से शरीर की जरूरत को आंका जाए तो एक आदमी को हफ्ते में केवल दो ही दिन और एक दिन में करीब 70-100 ग्राम मांस की जरूरत होती है। इससे ज्यादा हानिकारक हो सकता है। इससे कम से शरीर को हानि पहुंच सकती है। मैंने बहुत से योगी लोग देखे हैं, जिन्हें 15 दिन बाद, कइयों को 1 महीने बाद, तो कइयों को 3 महीने बाद जरूरत महसूस होती है। कईयों को तो छः महीने के अंतराल पर नानवेज की जरूरत महसूस होती है। अब बताइए कि इससे पोषक तत्त्वों की क्या कमी पूरी होगी। इससे जाहिर है कि उससे आदमी के मन के तमोगुण की कमी पूरी होती है। इससे, अपने अंधकार प्रकार के आंतरिक स्वभाव से उसे भरपूर व ताजगी प्रदान करने वाली नींद भी आती है, जिससे उसके शरीर व मन की अच्छी मुरम्मत हो जाती है, और उससे वह स्वस्थ हो जाता है। शरीर अपनी जरूरत खुद बताता है। इसकी जरूरत होने पर योग में ध्यान कम लगने लगता है, चुस्ती कम हो जाती है, भूख घट जाती है, पाचन प्रणाली गड़बड़ाने लगती है, शरीर में कम्पन पैदा होने लगते हैं। व्यवहार में गुस्सा व चिड़चिड़ापन आ जाता है, अद्वैतभाव बना कर रखना मुश्किल हो जाता है, मन द्वैत के भंवर के अंदर भटकने लगता है, अवसाद जैसा हो जाता है, शरीर रोगी होने लगता है, डर सा लगने लगता है, सेक्स के प्रति रुचि नहीं रहती आदि बहुत से लक्षण पैदा हो जाते हैं। मन में सही तरीके से अद्वैत भाव बनाए रखने के लिए प्रकृति के तीनों गुणों का संतुलन बहुत जरूरी है। फिर यह सबको पता है कि जहां अद्वैत है, वहाँ कुंडलिनी भी है। वास्तव में आहार की कमी से शरीर और मन के हरेक हिस्से में कुछ न कुछ दुष्प्रभाव जरूर पैदा होता है। बहुत से लोग इन्हें नजरन्दाज करते हैं और बहुत से लोगों को इसका आभास ही नहीँ होता। नॉनवेज की खुराक पूरी होने से ये सभी खराब लक्षण एकदम से गायब हो जाते हैं। वैसे भी मछ्ली को सर्वश्रेष्ठ आमिष आहार माना गया है, क्योंकि इसमें बहुत से स्वास्थ्यवर्धक गुण हैं, और इसके कोई दुष्प्रभाव भी नहीँ हैं। तभी तो इसे पंचमकारों में विशेष रूप से शामिल किया गया है। इसके सेवन से पापकर्म भी बहुत कम होता है। वैज्ञानिक शोध से भी यह बात सामने आई है कि मछली को दर्द नहीं होता। यह उन्हें जालिम कुदरत से बचने के लिए कुदरत का ही दिया तोहफा है। वैसे तो सभी चीजों व भावों में प्रकृति के तीनों गुण विद्यमान होते हैं, पर किसी विशेष चीज में कोई विशेष गुण ज्यादा बलवान होता है। पंचमकारों को ही लें, तो मैथुन व मत्स्य में रजोगुण, मांस व मदिरा में तमोगुण, और मुद्रा में सतोगुण की अधिकता होती है। आजकल के प्रदूषण और अति भौतिकता के युग में शरीर की ऊर्जा की मांग बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। ऐसे में सम्भवतः यौगिक पंचमकार ही मानव जाति का सही दिशानिर्देशन कर सकते हैं।

कुंडलिनी स्विच

मित्रों, इस बार मैं योग की साधारण सी तकनीक का वर्णन करूंगा। यह है, जीभ की निचली सतह को नरम तालु से टच करने की। वैसे इसके बारे में मैंने पहले भी लिखा था। परंतु इस बार मैं तकनीक का व्यवहारिक रूप दिखाऊँगा। अभी भी मैंने कुंडलिनी को जीभ के माध्यम से फ्रंट चैनेल से उतारा। योग के निरन्तर अभ्यास से मेरी इस तकनीक में लगातार निखार आ रहा है। इसके बारे में मैं नित नई बातें सीख रहा हूँ। 

मस्तिष्क के विचारों और जीभ -तालु के स्पर्श का एकसाथ ध्यान करना चाहिए

ऐसा करने से विचारों की शक्ति खुद ही फ्रंट चैनेल से होते हुए नीचे उतर जाती है। 

जीभ तालु पर जितना पीछे कांटेक्ट में रहे, उतना ही अच्छा है

तालु का पीछे वाला भाग नरम, मखमली, नम व फिसलन से भरा होता है। वहाँ पर स्पर्श की संवेदना भी ज्यादा मजबूत व आनन्द से भरी होती है। कुंडलिनी जितने अधिक ऊपर वाले चक्रों में होती है, जीभ-तालु के आपसी स्पर्श की अनुभूति भी उतनी ही जल्दी और तेज होती है। स्पर्श की अनुभूति यदि पलभर के लिए भी हो जाए, तो भी कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे दो तारों के क्षणभर के संपर्क से ही करेंट प्रवाहित हो जाता है। कई बार यह अनुभूति जीभ को तालु पर रब करके भी पैदा की जाती है।

साँसें भी जीभ-तालु के आपसी स्पर्श को बनाने और मिटाने का काम करती हैं

इसीलिए जीभ-तालु के कांटेक्ट पॉइंट को कुंडलिनी स्विच भी बोलते हैं। साँस भरते समय यह कांटेक्ट पॉइंट कुछ लूस पड़ जाता है। वास्तव में यहाँ पर अवेयरनेस घट जाती है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी स्विच ऑफ़ हो जाता है, और चैनेल का लूप सर्किट ब्रेक हो जाता है। इससे कुंडलिनी एनर्जी मस्तिष्क में जमा हो जाती है। पेट से साँसें भरने से ऐसा ज्यादा अच्छी तरह से होता है। इसी तरह, बैक चैनेल का फन उठाए नाग के रूप में ध्यान करने से भी कुण्डलिनी को बैक चैनेल में ऊपर चढ़ने में मदद मिलती है। मस्तिष्क में कुण्डलिनी एनर्जी के जमा होने से जीभ-तालु के स्पर्श को अनुभव करना भी आसान हो जाता है, जैसा ऊपर बताया गया है। फिर साँस छोड़ते हुए यह और आसान हो जाता है, क्योंकि उस समय पूरे फ्रंट चैनेल पर नीचे की तरफ दबाव पड़ता है। इस तरह से एक स्वचालित यंत्र के पुर्जों की तरह ये सभी तकनीकी बिंदु एक-दूसरे की मदद करते रहते हैं, और कुण्डलिनी चक्र लगातार चलने लगता है। इससे शरीर और मन दोनों रिफ्रेश हो जाते हैं। वैसे भी, कभी भी जीभ को तालु से स्पर्श कराने पर मस्तिष्क का अतिरिक्त बोझ नीचे उतर जाता है। मस्तिष्क के खाली हो जाने से उसमें एकदम से कुण्डलिनी स्वयं ही प्रकट हो जाती है। सिर्फ स्पर्श से कुछ नहीं होता, वहाँ पर अवेयरनेस भी पहुंचनी चाहिए। स्पर्श की संवेदना को गौर से अनुभव करने से वहाँ अवेयरनेस खुद ही पहुंच जाती है। उसके परिणामस्वरूप फ्रंट चैनेल में विशेषकर फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र में एक गहरी मांसपेशियों की सिकुड़न की अनुभूति होती है, और साथ में साँस की एक गहरी गैसप के साथ नियमित व गहरी सांसें चलने लगती हैं। यही कुण्डलिनी एनर्जी का चलना है। 

जीभ के पिछले हिस्से के केन्द्र से फ्रंट चैनल गुजरती है, जो सभी फ्रंट चक्रों को बेधते हुए मूलाधार तक जाती है। उससे कुंडलिनी एनर्जी के गुजरते समय पूरे फ्रंट चैनल एरिया में सनसनी के साथ ऐंठन महसूस होती है।

कई बार कुंडलिनी एनेर्जी पतली और केंद्रीय लाइन पर महसूस होती है, कभी बिना रेखा के ही

जरूरी नहीं कि हमेशा ही जीभ को तालु पर बहुत पीछे ले जाना पड़े। कई बार तालु के अगले भाग में ही अच्छी अनुभूति मिल जाती है। सामान्य पोजिशन में सीधी जीभ की तालु के साथ स्पर्श-संवेदना को भी अनुभव किया जा सकता है। जैसा ठीक लगे, वैसा करना चाहिए। कई बार कुण्डलिनी पतली रेखा में चलती महसूस होती है। ऐसा तब होता है, जब ध्यान तेज होता है, और मन शांत होता है। कई बार कुंडलिनी शक्ति केवल एक चक्र से दूसरे चक्र को स्थान बदलते दिखती है, चक्रों को जोड़ने वाली चैनल लाइन नहीं दिखाई देती।  अभ्यास के साथ खुद ही अनुभूतियाँ विकसित होती रहती हैं। इसलिए औरों की अनुभूतियों की नकल न करते हुए सही अभ्यास में लगे रहना चाहिए। इसी तरह, कई बार कुंडलिनी के चलने से संबंधित क्षेत्र की मांसपेशियों का संकुचन और ढीलापन ही महसूस होता है, बेशक कुंडलिनी का पता नहीं चलता। ऐसा सही तकनीक को लागू करने से होता है। यह कुण्डलिनी के प्रभाव को दिखाता है। कई बार ऐसा महसूस भी नहीं होता, खासकर जब मांसपेशियां थकी हों।

कुंडलिनी के साथ चक्र-संतुलन संतुलित जीवन की कुंजी है, जिससे तनाव खुद ही घट जाता है

दोस्तों, आजकल जीवन बहुत संघर्षपूर्ण व स्पर्धात्मक हो गया है। रिश्तों की पेचीदगियां भी आजकल बहुत बढ़ गई हैं। ऐसे में दिमाग में बोझ का बढ़ जाना स्वाभाविक ही है। आज हम इस पर और कुंडलिनी की सहायता से इससे बचाव के ऊपर चर्चा करेंगे।

दिमाग का अनियंत्रित बोझ ही अधिकांश समस्याओं का मूल कारण है

दिमाग के अनियंत्रित बोझ से आदमी में बहुत से व्यावहारिक परिवर्तन आते हैं। वह चिड़चिड़ा व गुस्सैल बन जाता है। इससे उसका तनाव बढ़ जाता है। तनाव बढ़ने से उसकी कार्य करने की क्षमता घट जाती है, और वह विभिन्न रोगों का शिकार होने लग जाता है। इन सभी से उसका पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन गड़बड़ाने लग जाता है। उसकी साँसें भी रुकने सी लगती हैं, और अनियमित भी हो जाती हैं। इससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी भी होने लगती है। 

चक्र साधना तनाव को कम करने में सहायक

सभी चक्रों का समान रूप से उपयोग न होने से प्राणशक्ति सभी चक्रों के बीच में बराबर मात्रा में विभक्त नहीँ हो पाती। इससे जिन चक्रों को जरूरत से ज्यादा प्राणशक्ति मिलती है, वे काम के बोझ से दुष्प्रभावित हो जाते हैं; और जिन चक्रों को जरूरत से कम प्राणशक्ति मिलती है, वे भी पर्याप्त काम न मिलने से दुष्प्रभावित हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि योग से स्वास्थ्य लाभ मिलता है। वास्तव में सही ढंग से किए जाने वाले कुंडलिनी योग से सभी चक्र स्वस्थ व क्रियाशील बने रहते हैं। इससे जीवन संयमित व संतुलित बन जाता है। हमने अक्सर देखा है कि प्रकृति के बीच में काम करने वाले बुद्धिजीवी लोग आकर्षक व्यक्तित्व वाले होते हैं। उनकी जीवनशैली संतुलित होती है। इसका यही कारण है कि दिमाग के काम से उनके मस्तिष्क के चक्र स्वस्थ रहते हैं, और शारीरिक कार्यों से शरीर के अन्य चक्र। यदि वैसे लोग भी कुंडलिनी योग करेंगे तो उन्हें भी लाभ होगा, फिर आलस्यपूर्ण जीवनशैली वाले शहरी लोगों को भला क्योंकर नहीं होगा।

कुंडलिनी प्राणशक्ति के वाहक के रूप में काम करती है

प्राणशक्ति तो अदृश्य होती है। उसे तो हम आसानी से अनुभव भी नहीं कर सकते। फिर उसे चक्रों पर कैसे घुमाया जाएगा। वास्तव में, कुंडलिनी प्राणशक्ति के लिए एक हैन्डल का काम करती है। जहाँ भी कुंडलिनी जाती है, प्राणशक्ति वहाँ खुद चली जाती है। इसीलिए चक्रों पर केवल कुंडलिनी को ही घुमाया जाता है।

दिमाग के अनावश्यक बोझ को एकदम से कम करने वाला एक व्यावहारिक नुस्खा

जीभ को तालु के साथ सटा कर रखा जाता है। जीभ और तालु के संपर्क को ध्यान में रखा जाता है। मस्तिष्क में विचारों की हलचलों को यथावत चलने दें, और उन पर भी ध्यान बना कर रखें। शरीर के फ्रंट चैनल और बैक चैनल पर भी ध्यान बना कर रखें। यदि संभव हो तो सभी पर एकसाथ ध्यान बनाएं, अन्यथा ध्यान को एक-दूसरे पर शिफ्ट करते रहें। ऐसा करने पर कुंडलिनी अचानक मस्तिष्क में प्रकट हो जाएगी, और अन्य फालतू विचार धीमे पड़ जाएंगे। कुंडलिनी सभी चक्रों पर घूमते हुए आनन्द के साथ लगातार मस्तिष्क में बनी रहेगी, और मस्तिष्क का अनावश्यक बोझ भी कम हो जाएगा। बैक चैनल की कल्पना एक फन उठाए हुए शेषनाग के रूप में कर सकते हैं, जिसकी केंद्रीय रेखा पर कुंडलिनी चलती है। पेट से लंबे और गहरे साँस लेने से भी कुंडलिनी को चैनेल में चलने की शक्ति प्राप्त होती है। सीधे भी कुंडलिनी ध्यान को किसी विशेष चक्र पर केंद्रित किया जा सकता है, और साथ में यह भी ध्यान में रखा जा सकता है कि मस्तिष्क से उस चक्र तक फ्रंट चैनल के माध्यम से प्राणशक्ति स्वयं नीचे उतर जाएगी। इससे थोड़ी देर में ही मस्तिष्क की प्राणशक्ति भी उस चक्र पर पहुंच जाती है। उससे चक्र पर ऐंठन के साथ और आनन्द के साथ कुंडलिनी तेजी से चमकने लगती है। मस्तिष्क का बोझ एकदम से हल्का हो जाता है। यह ऐसे ही होता है जैसे कि इलेक्ट्रिक करेंट विद्युतचुम्बकीय तरँग के रूप में एकदम से लक्ष्य पर पहुंच जाता है, जबकि इलेक्ट्रॉनों को पहुंचने में ज्यादा समय लगता है।

चाय पीकर भूख को बढ़ाना

अक्सर देखा जाता है कि चाय पीकर भूख घट जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चाय से प्राणशक्ति मस्तिष्क को चली जाती है। तभी तो चाय पीने के बाद दिमाग में रंग-बिरंगे विचार उमड़ने लगते हैं। इससे पाचनतंत्र में प्राणशक्ति की कमी हो जाती है। कई बार मैंने चाय से दिमाग में बढ़ी हुई प्राणशक्ति को कुंडलिनी योग के माध्यम से नीचे उतारा, और उसे विशेषकर नाभि चक्र पर स्थापित किया। उससे मेरी भूख अचानक से बढ़ गई। इसी तरह प्राणशक्ति को अन्य चक्रों पर भी केंद्रित किया जा सकता है। इसे हम चाय योगा कह सकते हैं। इससे सिद्ध होता है कि हम कुण्डलिनी योग के माध्यम से अपने शरीर की बहुत सी चयापचय क्रियाओं को नियंत्रित कर सकते हैं।

कुण्डलिनी की चमक को कम करने के लिए ही कुंडली-ग्रह किसी आदमी के लिए अपनी चमक कम करते हैं, जिससे पाप का अंधेरा हावी होकर अपना बुरा असर दिखाता है

दोस्तों, हाल ही में मुझे कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का सामना करना पड़ा। वैसी घटनाओं की रोकथाम के लिए मेरे परिचितों द्वारा मेरी जन्मपत्री कई प्रकार के ज्योतिषविदों से परीक्षित करवाई गई। कुछ ज्योतिषविदों की ऑनलाइन रॉय ली गई, तो कुछ की ऑफलाइन। सभी ने मेरी ग्रह-दशा को बहुत खराब बताया। एकदम से मेरा तुलादान करवाया गया। हनुमान चालीसा, दुर्गा रक्षा स्तोत्र, व गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र पढ़ने को कहा गया। महामृत्युंजय मन्त्र-जाप करने को कहा गया। मैं इन्हीं बातों से जुड़े हुए अपने कुण्डलिनी-अनुभव व इससे जुड़े मनोवैज्ञानिक सिद्धांत इस पोस्ट में साझा करूँगा।

बुरा समय आने पर कुण्डलिनी धीमी पड़ने लगती है

पूर्ववत नियमित योग करने पर भी मेरे मन की कुण्डलिनी धीमी पड़ती जा रही थी। मुझे उसका कारण समझ नहीं आ रहा था। हालांकि बहुत पहले भी मेरे साथ ऐसा होता था, पर उसकी वजह याद नहीं आ रही थी। उससे उस समय भी मैं इसी तरह से दुर्भाग्य के साए में आ जाता था।

धार्मिक कृत्यों से कुण्डलिनी चमकने लगती है, जो हर प्रकार से कल्याण करती है

वास्तव में सभी धार्मिक कृत्य कुण्डलिनी के माध्यम से ही लाभ पहुंचाते हैं। उनसे कुण्डलिनी एकदम से पुष्ट हो जाती है। वह कुंडलिनी फिर हर प्रकार से आदमी की भलाई में जुट जाती है। कुंडलिनी ही आदमी को विपदाओं से बचाती है। तुलादान कराते वक्त ही मुझे अहसास हुआ कि मेरे पाप या यूं कहो कि मन का बोझ मेरे कंधे से उतरकर दूसरे पलड़े पर रखे हुए अनाज के साथ नीचे उतर गया था। उससे मैं हल्का हो गया और मेरे अंदर जैसे काफी खाली जगह बन गई। उस खाली जगह को भरते हुए मेरी कुंडलिनी एकदम से कौंधने लग गई। उससे मैंने फीलगुड महसूस किया और उसके बाद मैं हर समय कुंडलिनी के आनंद में मस्त रहने लगा। कुण्डलिनी से जुड़े अन्य सारे आध्यात्मिक गुण भी पुनः मेरे अंदर प्रकट हो गए। उससे मेरा जीवन भी सुधर गया। व्रत-उपवास, जप-पाठ आदि धार्मिक कृत्यों से भी मुझे अपनी कुंडलिनी सुदृढ़ होती हुई महसूस हुई। विशेष ग्रह-दशा में विशेष धार्मिक कृत्य इसीलिए बताए जाते हैं, क्योंकि वे ही कुंडलिनी को सबसे ज्यादा उजागर करते हैं।

आकाशीय पिंड कुंडलिनी को प्रभावित करते हैं, क्योंकि दोनों ही चमकीले होते हैं

पाप मन के बोझ के रूप में प्रकट होते हैं। वे कुंडलिनी को दबाने की कोशिश करते हैं। इसी तरह, बुरी ग्रह दशा भी कुंडलिनी को दबा कर अपना प्रभाव दिखाती है। कुंडलिनी के दबने से पुराने पाप मन के बोझ के रूप में प्रकट हो जाते हैं। आदमी के लिए बुरी ग्रह दशा का मतलब यहाँ उसके लिए ग्रहों की चमक का कम होना है। उससे कुंडलिनी की चमक भी कम हो जाती है। जिन लोगों के मन में कुंडलिनी नहीं बनी होती है, उनकी सामान्य मानसिकता की चमक को प्रभावित करके ग्रह अपना असर दिखाते हैं।

ग्रह अपना असर कैसे दिखाते हैं

इसे हम एक साधारण से उदाहरण से समझ सकते हैं। सूर्य को सबसे बड़ा व चमकीला ग्रह माना जाता है, और उसका प्रभाव भी सबसे ज्यादा दिखाई देता है। जिस दिन चमकदार धूप हो, उस दिन मन आनंद व उमंग से भरपूर होता है। जिस दिन सूर्य की रौशनी बादलों से ढकी हो, उस दिन मन में अवसाद जैसा छाया रहता है। ऐसा ही प्रभाव अन्य ग्रह भी दिखाते हैं, जिसे ज्योतिष शास्त्र से समझा जाता है। जैसे रेडियो सिग्नल हर जगह हैं, पर वे उनसे प्रोपर ट्यूनिंग करने वालों को ही प्राप्त होते हैं; उसी प्रकार ग्रहों की चमक हर जगह है, पर वह समुचित जन्मकुंडली-योग वाले आदमी को ही प्राप्त होती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कई लोगों को सूर्य का प्रकाश भी आनंदित नहीं कर पाता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्होंने सूर्य व उसके प्रकाश के साथ ट्यूनिंग नहीं की होती। शायद इसी ट्यूनिंग को बनाने के लिए ही सुबह के समय सूर्य को अर्घ्य देने की धार्मिक परम्परा है। इसी तरह नवग्रह पूजन से उन सभी ग्रहों के साथ ट्यूनिंग हो जाती है।

कोरोना काल में ज्योतिष शास्त्र अतिरिक्त सहायता प्रदान कर सकता है

जिन बीमारियों का इलाज है, उनके मामलों में तो कोई आध्यात्मिक मनोविज्ञान की बात ही नहीं करता। सफलता के लिए हर कोई आसान शॉर्टकट अपनाना चाहता है, बेशक वह टिकाऊ न हो।  पर कोरोना में तो यह विशेष लाभ पहुंचा सकता है, क्योंकि उसका इलाज ही नहीं। जब मन का बोझ कम होगा, तो स्वाभाविक है कि शरीर की इम्यूनिटी बढ़ेगी, जिससे कोरोना से लड़ने में मदद मिलेगी। यह तो वैज्ञानिक प्रयोगों से पहले से ही सिद्ध हो चुका है कि कुंडलिनी ध्यान से शरीर की इम्यूनिटी बढ़ती है।

ज्योतिष शास्त्र अपने आप में सम्पूर्ण विज्ञान है, जिसे गहन वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता है

मैंने गूगल पर बहुत सर्च किया कि कहीं डीमिस्टीफाईंग ज्योतिष आदि के नाम से या अन्य कोई सरलीकृत वैबसाइट मिल जाए, पर कहीं नहीं मिली। ज्योतिष से संबंधित विद्वान पाठकों से अपेक्षा है कि वे इस क्षेत्र में पहल करें और ज्योतिष को पूर्ण सरलता से आम लोगों तक पहुंचाएं।

कुण्डलिनी सर्ज (लहर) के लिए बाई-साईकलिंग (बाईकिंग) योग

भीष्म एवं हृदयेश

लोग सोचते हैं कि रोजाना की व्यस्त जीवनशैली से कुण्डलिनी साधना में बाधा पहुँचती है। पर ऐसा नहीं होता। व्यस्त काम-काज से कुण्डलिनी बहुत तेजी से ऊपर चढ़ती है। योग से रोजाना के कामकाज को करने की शक्ति भी मिलती है। कामकाज और योग, दोनों एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। 3 दिन की साईकलिंग से मेरी कुण्डलिनी मूलाधार से मस्तिष्क तक पहुँच गई। भारी गर्मी के बीच, एकदम से इतना ज्यादा बाईसाईकल मैं इसलिए चला सका, क्योंकि मेरा मन और शरीर रोजाना के कुण्डलिनी योगाभ्यास से फिट व तंदरुस्त थे।

मेरा बाई-साईकलिंग योग का अनुभव

इस हफ्ते आंशिक कोरोना-लौकडाऊन की वजह से मैंने साईकल पर ही अपने दफ्तर को आना-जाना शुरू किया। एक दिन का कुल 20 किलोमीटर का सफर हो जाता था। पहले दिन मैंने नोटिस किया कि मेरे मूलाधार पर बड़ी तेज व दबाव से भरी हुई संवेदना थी। वह संवेदना वैसी ही थी, जैसी सीमेन रिटेंशन से महसूस होती है। ऐसा लगता था जैसे कि मेरे मूलाधार चक्र पर किसी ने आगे से नुकीले चमड़े के जूते से गहरी किक मार दी हो, और उसके बाद मीठा व गहरा दर्द हो रहा हो। उससे मैं दिन के समय कुछ हल्का सा बेचैन रहने लगा। योग करते समय वह संवेदना फिर बढ़ जाती थी। मैं उस संवेदना को बार-२ पीठ से ऊपर चढ़ाने की कोशिश करता था। प्राणायाम के साथ पीठ के शेषनाग का चिंतन करने से वह संवेदना कुछ ऊपर जाती हुई लगती थी। इस प्राणायाम का वर्णन मैंने “बैकवार्ड फ्लो” व ‘शेषनाग’ वाली पुरानी पोस्ट में किया है। जब वह दर्द जैसी संवेदना ऊपर चढ़ती थी, तब पीठ में जगह-२ ऐंठन जैसी मीठी दर्द महसूस होती थी। उसी पर ही कुन्डलिनि चित्र भी प्रकट हो जाता था। दो दिन तक ऐसे ही चलता रहा। तीसरे दिन वह संवेदना मेरे पिछले अनाहत चक्र पर आ गई। ऐसा लगने लगा कि जैसे किसी ने चमड़े के पैने जूते से मेरे पिछले अनाहत चक्र पर गहरी किक मारी है, जिसके बाद उस पर मीठी व गहरी दर्द पैदा हो रही है। उससे मूलाधार का दबाव और वहां की संवेदना गायब हो गई। मणिपुर चक्र को संवेदना ने बायपास किया। इसका मतलब था कि मणिपुर चक्र ब्लोक नहीं था। जो चक्र ब्लॉक होता है, उसी पर वह मीठा दर्द महसूस होता है। एक दिन के बाद वह संवेदना गर्दन से होकर ऊपर चढ़ने लगी। फिर वह मीठी दर्द व अकड़न गर्दन के पिछले भाग के केंद्र (विशुद्धि चक्र) में महसूस होने लगी। उसी दिन मेरे मूलाधार को बाहर से किसी वजह से और संवेदना मिली। संवेदना आसानी से ऊपर चढ़ गई, क्योंकि मूलाधार पिछले फ्लो से अनब्लौक हो गया था। वह गर्दन की संवेदना से मिल गई और उसे मजबूत बना दिया। अनाहत चक्र की संवेदना गायब हो गई। अगले दिन, गर्दन से वह संवेदना मस्तिष्क में पहुँचने लगी, जिससे सिर हल्का परन्तु एनर्जी सर्ज के समय भारी लगने लगा। मैं दिन के समय कुर्सी पर बैठा था, और मुझे नींद की 4-5 मिनट की झपकी आ गई। जब मैं ऊपर उठा तो एनर्जी सर्ज पूरे वेग से पूरे मस्तिष्क में छा रही थी। दिमाग भारी व दबावयुक्त था। ऐसा लग रहा था कि उसमें मधुमक्खी के झुण्ड उड़ रहे हैं। यद्यपि आनंद भी आ रहा था। उससे कामकाज में दखलंदाजी न हो, इसके लिए मैंने उलटी जीभ को तालु से छुआ दिया। उससे एकदम से वह संवेदना की सर्ज आगे से नीचे उतर कर मेरे अगले अनाहत चक्र पर आ गई। उससे मेरा दिमाग एकदम से शांत हो गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। हृदय में कुण्डलिनी मजबूती से प्रकट हो गई, और वह आनंद से प्रफुल्लित हो गया। मस्तिष्क में केवल एनर्जी थी, कुण्डलिनी तो दिल में ही प्रकट हुई। इससे सिद्ध हुआ कि प्रेम दिल में ही बसता है। यह कोई आश्चर्य वाली चमत्कारिक घटना नहीं है, अपितु शरीर की सामान्य सी शरीरविज्ञान से जुडी हुई घटना है। इस प्रकार का कुण्डलिनी प्रवाह योगी के जीवन में इसी तरह से जीवनभर चलता रहता है। कुण्डलिनी जागरण तभी होता है, जब उसके लिए बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ हों, और चक्र ब्लॉक न हों। जिस समय एनर्जी सर्ज मेरे दिमाग में छा रही थी, यदि उस समय मुझे किसी भी कारण से कुण्डलिनी की गहरी याद आ गई होती, तो पुनः कुण्डलिनी जागरण के लिए यह एक अनुकूल परिस्थिति होती। वास्तव में, मस्तिष्क में वह प्राणों का सर्ज था, क्योंकि उसमें कुण्डलिनी नहीं थी। विपरीत रूप से, कुण्डलिनी से भी प्राणों का सर्ज पैदा हो सकता है। वैसे में कुण्डलिनी की गहरी याद दिमाग में खुद ही प्राणों का सर्ज पैदा करती है। उसके साथ कुण्डलिनी खुद ही जुडी होती है, क्योंकि कुण्डलिनी ने ही तो वह प्राणों का सर्ज (महान लहर/जमघट) पैदा किया हुआ होता है। वैसी स्थिति में कुण्डलिनी जागरण हो जाता है। ऐसा ही कुण्डलिनी जागरण मुझे लगभग 3 साल पहले हुआ था, जिसका वर्णन मैंने इस वैबसाईट के होमपेज पर किया है।

बाईकिंग या साईकलिंग योग डायाफ्रागमैटिक साँसों को उत्तेजित करता है

मुझे लगता है कि साईकल चलाते समय पेट से गहरे सांस लेने से मेरा मूलाधार चक्र ज्यादा ही उत्तेजित हो गया था। स्पोर्ट्स बाईक में पीठ का पोस्चर अपनी प्राकृतिक अवस्था में होता है, और उसकी पतली सीट के दबाव से मूलाधार चक्र भी उत्तेजित होता रहता है। साथ में, पीठ में सांस लेते व छोड़ते हुए शेषनाग के चिंतन से मेरे मूलाधार को और अधिक शक्ति मिली। उससे मूलाधार में वीर्य शक्ति संचित होने लगी। उससे बैकवार्ड फ्लो भी चालू हो गया, जिससे मूलाधार में संचित एनर्जी पीठ में ऊपर चढ़ने लगी। मूलाधार की संवेदना वैसी ही थी, जैसी यौन-ऊर्जा के रक्षण से पैदा होती है। साथ में, वह संवेदना यौनसंबंध के लिए भी प्रेरित कर रही थी। शायद यही वजह है कि कामकाज में एक्टिव लोग सेक्सुअल रूप से भी एक्टिव होते हैं। मैं मुंह और जीभ को कस कर बंद रखता था, और जीभ की अधिकाँश सतह को तालु से कसकर चिपका कर रखता था। मैं उसका चिंतन एक पिलर के टॉप की स्लैब से करता था जिससे मस्तिष्क फ्रंट पिलर या एनर्जी चैनल से जुड़ा होता था। उससे साईकलिंग के समय उमड़ने वाले दिमाग के फालतू विचार नीचे उतरकर शरीर को एनर्जी देते रहते थे। उससे मन भी शांत रहता था, और थकावट भी नहीं होती थी।

अगले दिन मेरी कुण्डलिनी एनर्जी मणिपुर चक्र तक लौट आई थी

अगले दिन मेरी गहरी व मीठी दर्द पीछे के मणिपुर चक्र पर आ गई। संभवतः वह आगे के अनाहत चक्र से आगे के मणिपुर चक्र तक नीचे उतरी थी। आगे से वह पीछे के मणिपुर चक्र तक आ गई थी। वास्तव में इसी मीठी दर्द को एनर्जी कहते हैं। यही नाड़ी लूप में घूमती है। जब इस दर्द के साथ सबसे मजबूत व पसंदीदा मानसिक चित्र मिश्रित हो जाता है, तब वही एनेर्जी कुण्डलिनी कहलाती है। मुझे ऐसा भी लगा कि पीछे के चक्रों पर खाली एनेर्जी ज्यादा प्रभावी रहती है, जबकि आगे के चक्रों पर कुण्डलिनी ज्यादा प्रभावी रहती है। पीठ में जगह-२ बनने वाले मोड़ या बैंड उस एनेर्जी का निर्माण करते हैं, जिसके साथ कुण्डलिनी चित्र मिश्रित किया जाता रहता है।

कुण्डलिनी जागरण आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यावश्यक नहीं है

कुण्डलिनी जागरण का योगदान यही है कि यह साधक के मन में कुण्डलिनी योगसाधना के प्रति अटूट विशवास पैदा करता है। उससे साधक प्रतिदिन के तौर पर हमेशा ही कुण्डलिनी योगसाधना करता रहता है। इस प्रकार से, यदि कोई व्यक्ति हमेशा ही सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना करता रहे, तो एक प्रकार से उसकी कुण्डलिनी जागृत ही मानी जाएगी। हालांकि सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना सीखने के लिए उसे योग्य गुरु की जरूरत पड़ेगी। एक प्रकार से, यह वैबसाईट भी एक गुरु (ई-गुरु) का ही काम कर रही है।    

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कुंडलिनी स्विच; कुंडलिनी योग (खेचरी मुद्रा) और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट का तुलनात्मक अध्ययन

योग संसार में अक्सर कहा जाता है कि योग करते समय जीभ की शिखा को मुंह के अंदर पीछे वाले नरम तालु से छुआ कर रखना चाहिए। यह प्राचीन तकनीक आज के कोरोना (कोविड-19) काल में भारी तनाव के बोझ को दूर करने के लिए अद्भुत साबित हो सकती है। आज हम इसके मनोवैज्ञानिक और शरीर वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करेंगे।

जीभ को तालु से छुआने से कुंडलिनी स्विच ऑन हो जाता है, जिससे कुंडलिनी परिपथ पूरा हो जाता है

मुझे पहले ऐसा विशेष महसूस नहीं होता था। परन्तु जब मुझे कुंडलिनी योग करते हुए 2-3 साल बीत गए, तब मुझे इसके महत्व का पूरा अनुभव हुआ। जब मेरी जीभ ऊपर और पीछे को मुड़कर सॉफ्ट पेलेट की मालिश करती थी, तब मुझे ऐसा लगता था कि वह मेरे दिमाग को नीचे की तरफ चूस रही थी। सॉफ्ट पेलेट एक फिसलन भरे नरम गद्दे की तरह लगा, जिस पर जीभ को उरे-परे फिसलाने से बड़ी सुखद अनुभूति हुई। फिर दिमाग के रस के साथ मेरी कुण्डलिनी भी जीभ के पीछे से होती हुई नीचे गले तक उतर गई। वहां से अनाहत चक्र, फिर मणिपुर चक्र, और अंत में स्वाधिस्ठानचक्र-मूलाधार चक्र पर पहुंच कर सांसों की शक्ति से पीछे से ऊपर की ओर चली गयी। रीढ़ की हड्डी से होते हुए सभी चक्रों को भेदते हुए वह फिर मस्तिष्क तक पहुंच गई। वहां से फिर जीभ से होकर नीचे आ गई। इस तरह से कुंडलिनी परिपथ चालू हो गया, और कुंडलिनी पूरे शरीर में गोल-गोल घूमने लगी। इस प्रक्रिया में शरीर की सेंटरिंग (केन्द्रीकरण) का भी योगदान होता है, जिसका जिक्र हम आने वाली पोस्टों में करेंगे।

कुण्डलिनी स्विच के ऑन होने से दिमाग में हल्कापन महसूस होता है

जैसे ही कुंडलिनी स्विच से होकर मेरे दिमाग का रस या बोझ (कुंडलिनी) नीचे उतरा, वैसे ही मेरा दिमाग एकदम हल्का व शांत हो गया। जब कुंडलिनी पीछे से चढ़कर दिमाग तक पहुंची, दिमाग फिर भारी हो गया।इस तरह वह भारी-हल्का होता रहा और शक्ति पूरे शरीर में घूमने लगी।

खेचरी मुद्रा और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में जीभ को तालु से छुआया जाता है

बहुत से लोग सोचते हैं कि माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में ही कुंडलिनी स्विच का वर्णन है, तथा उसने ही कुंडलिनी योग को पूर्ण किया। उससे पहले कुंडलिनी योग से कुण्डलिनी दिमाग में अटकी रहती थी और दिमागी परेशानियां पैदा करती थी। वास्तव में योग की खेचरी मुद्रा में कुंडलिनी स्विच का विस्तार से वर्णन है। उसमें तो जीभ के जोड़ को काटकर जीभ को इतना लंबा कर दिया जाता है कि वह पीछे मुड़कर नाक को जाने वाले सुराख में घुस जाती है। उससे कुंडलिनी स्विच परमानेंटली ऑन हो जाता है, जिससे योगी हमेशा कुंडलिनी के आनंद में झूमने लगता है। यद्यपि इस तरीके को करने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि इससे स्वास्थ्य व जीवन शैली को भारी जोखिम उठाना पड़ सकता है।

माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट व कुंडलिनी योग भिन्न-2 परिस्थितियों के लिए हैं

कुंडलिनी जागरण दिमाग में ही होता है, अन्य चक्रों में नहीं। इसलिए यह सिद्ध है कि कुंडलिनी योगी को जल्दी कुंडलिनी जागरण होता था। प्राचीन भारत में बहुत शांतिपूर्ण और आरामदायक जीवनशैली होती थी। वातावरण व जलवायु भी विश्व में सर्वोत्तम होते थे। इसलिए वहां के योगी अपने दिमाग में कुंडलिनी का बोझ अच्छी तरह से झेल लेते थे। अधिकांश योगियों को कुंडलिनी स्विच की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। मुझे भी कुंडलिनी जागरण के लिए इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।पर आज मैं इसकी जरूरत महसूस करता हूँ, क्योंकि अब मेरे दिमाग में दूसरे कामों का बोझ बढ़ गया है।

कुंडलिनी स्विच से बहुत से स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं

सुबह-2 जब कई बार मेरा बॉवेल प्रेशर नहीँ बनता, तब मैं कुंडलिनी योग के बाद कुंडलिनी स्विच को ऑन करता हूँ। मैं कुंडलिनी का परिपथ नाभि चक्र तक बनाता हूँ। कुंडलिनी आगे के नाभि चक्र से पीछे घुसती है और पीछे वाले नाभि चक्र से होकर ऊपर चढ़ जाती है। जल्दी ही मेरी अंतड़ियों में हलचल शुरु हो जाती है, और मेरा पेट साफ हो जाता है।

कुण्डलिनी स्विच के पीछे छिपा हुआ शरीर विज्ञान

खाना खाते समय हमारी जीभ बार-2 तालु को छूती है। उससे दिमाग की ऊर्जा जीभ के रास्ते से होकर नाभि चक्र तक पहुंच कर खाना पचाने में मदद करती है। इसीलिए खाना खाने के बाद रक्तचाप भी कम हो जाता है, और आदमी दिमाग में हल्कापन महसूस करता है।

एम्ब्रोसिया, नेक्टर, अमृत, एलिकसिर ऑफ़ गॉड, लव पोशन, सीएसएफ आदि नाम कुण्डलिनी स्विच से जुड़े हैं

कुछ अभ्यास के बाद मैंने सॉफ्ट पेलेट से एक मीठा-नमकीन व जैली जैसा रस चखा। वह आनंद के साथ दिमाग का बोझ घटने से पैदा होता है। उसे उपरोक्त नामों से भी जाना जाता है।