कुण्डलिनीयोग आत्मरूप को पाने की कुदरती चेष्ठा के तरीके को सीधा करता है

कई बार आदमी मन-पतंग में इतना डूब जाता है कि उसे यह एहसास ही नहीं रहता कि वह उसके शरीर से जुड़ी है। न धागा दिखता है, न उसको खींचने वाला, सिर्फ पतंग दिखती है। सम्भवतः यही अज्ञान है। इसमें ऐसा लगता है कि मन के दृश्यों का अपना पृथक अस्तित्व है, और हम उन्हें बनावटी भूत बनाकर उनसे डरने लगते हैं। वैसे तो कुण्डलिनीयोग में भी ध्यानचित्र ही दिखता है, पर वह एक ही होता है, और उसे अपने रूप में और अपने शरीर के अंदर देखा जाता है। साथ में, ज्यादातर मामलों में उसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता या उसके भौतिक अस्तित्व को नकार दिया जाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई देवता, पूर्वज, दिवंगत या पूर्णतः बिछड़ा प्रेमी ध्यान चित्र के रूप में है, तब तो उसके प्रति भौतिक सत्यता की बुद्धि खुद ही नहीं होगी। पर अगर कुण्डलिनी चित्र किसी जीवित प्रेमी, गुरु या अन्य भौतिक वस्तु के रूप में है, तो उसके भौतिक रूप से अनासक्ति रखनी पड़ती है, और उसके साथ अद्वैतमय व्यवहार रखना पड़ता है। वैसे ऐसा स्वभाव व व्यवहार कुण्डलिनी योग से खुद ही बनने लगता है। जैसा कि मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था कि कुण्डलिनी योग से कैसे महसूस होता है कि अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष सब आपस में जुड़े हैं। इससे यह विश्वास पक्का बना रहता है कि कुण्डलिनी चित्र अपने मन के ही अंदर है, अपने ही देहसंघात का हिस्सा है, अपना ही स्वरूप है, कोई बाहरी पृथक भौतिक वस्तु नहीं। यह स्वयं आदमी की अनासक्ति और अद्वैत की प्रकृति को बढ़ाता है। क्योंकि अपने आप से किसी को आसक्ति नहीं हो सकती है, और न ही अपने आप में किसीको द्वैत महसूस हो सकता है। किसी को नहीँ लगता कि वह एक आदमी नहीं बल्कि दो आदमियों का मिश्रण है। अपने कर्म का फल उसी अकेले आदमी को भोगना पड़ता है, कोई दूसरा नहीं आता। अगर कोई दिनरात भी आईने में बनता-ठनता रहे तो भी वह किसी दूसरे के या ईश्वर के प्रेम में पड़कर करता है, अपने लिए नहीं। प्रेम के लिए दो का होना जरूरी है। अकेले में प्रेम नहीं होता। आसक्ति और प्रेम में सैद्धांतिक अंतर नहीं है केवल स्तर, व्यवहार व दृष्टिकोण का ही अंतर है। इसी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार कुण्डलिनी चित्र के प्रति स्वयं ही हो रही आत्मभावना से आत्मा शुद्ध होती रहती है। मतलब कि कुण्डलिनी चित्र को अपने पूर्ण आत्मरूप को जानने के लिए सहारे के रूप में अपनाया जाता है। मुझे तो लगता है कि जब कुंडलिनी ध्यान एक विशेष महत्वपूर्ण या शीर्ष बिंदु तक पहुँचता है, तब यह आत्मा को अस्तित्वगत स्व-अभिव्यक्ति की इतनी अधिक शक्ति देता है कि वह उस बिंदु से परे अव्यक्त रहने में अस्मर्थ हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप कुंडलिनी जागरण होता है। सम्भवतः आत्मरूप को जानने की कुदरती चेष्ठा के रूप में ही मन में विचार आते हैं। पर उन विचारों को समझने का और अपनाने का तरीका उल्टा होता है। हम उन्हें अपना आत्मरूप न समझकर बाहरी,  पराया, स्थूल और भौतिक समझने लगते हैं। इससे उन विचारों से आत्मरूप को शक्ति मिलने की बजाय उनसे संसार की उलझनें और भी आगे से आगे बढ़ती रहती हैं। मतलब कि आत्मा शुद्ध होने की बजाय ज्यादा से ज्यादा अशुद्ध होता जाता है। सम्भवतः यही मोहमाया है। कुण्डलिनी योग इस तरीके को सीधा करने की कोशिश करता है। इससे आदमी का रोजाना का व्यवहार भी सकारात्मक रूप से रूपान्तरित होने लगता है। उसके जीवन में अनासक्ति और अद्वैत का प्रभाव बढ़ने लगता है। इससे स्वाभाविक है कि उसके मन की उलझनें सुलझने लगती हैं। मन स्वस्थ रहने से शरीर भी स्वस्थ रहने लगता है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य से सामाजिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। सामाजिक स्वास्थ्य से समाज के सभी लोग भी अपने अच्छे स्वास्थ्य को महसूस करते हैं। इस तरह समाज से व्यक्ति में और व्यक्ति से समाज में सुधार एक चेन रिएक्शन की तरह आगे से आगे बढ़ता हुआ पूरे विश्व में फैल जाता है, जिसे युग परिवर्तन भी कहते हैं।

कुण्डलिनीयोगानुसार शरीर कभी भी नहीँ मरता, कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में

सभी मित्रों को होली की शुभकामनाएं

मित्रों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे मन की गतिशीलता पतंग की उड़ान की तरह है। ऐसा लगता है कि प्राणायाम पतंग की डोरी को नियंत्रित गति देने की तरह है, जिससे पतंगरूपी मन अच्छे से और आत्मविकासरूपी आनंद पैदा करते हुए उड़ सके। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि जो आनंद यौनक्रीड़ा के दौरान आता है, उसमें भी अनाच्छादित अर्थात नग्न शरीर के सम्पूर्ण उद्घाटन का काफी योगदान है। उसमें तो अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर दोनों एकसाथ उच्चतम अभिव्यक्ति के करीब होते हैं। कई लोग बोलते हैं कि असली प्यार मन से होता है, शरीर से नहीं। ये क्या बात हुई। सीधे कोई कैसे बाहरी तहखानों को लांघे बिना ही सबसे अंदरूनी तहखाने में पहुंच सकता है। जब लड़की के शरीर से हल्की यौन छेड़छाड़ होती है, बेशक अप्रत्यक्ष या मानसिक रूप में ही, तब लड़की का अन्नमय कोष सक्रिय हो जाता है। होली पर इसका अच्छा मौका मिलता है, उसे गवाएं नहीँ। हाहा। उसे पहली बार अपने शरीर की सबसे गहरी पहचान महसूस होती है। वह शरीर से ज्यादा ही सक्रिय व क्रियाशील होने लगती है। उसके मुख पर लाली और मुस्कान छा जाती है। इससे उसका प्राणमय कोष भी सक्रिय हो जाता है। प्राणों से उपलब्ध शक्ति को पाकर उसका मन रंगीनियों में बहुत दौड़ता है। वह हसीन सपने देखती है। सपनों में विभिन्न लोकों और परलोकों का भ्रमण करती है। इससे उसका मनोमय शरीर भी सक्रिय हो जाता है। क्योंकि यौन आकर्षण के कारण उसका ध्यान हर समय अपने शरीर और प्राणों पर भी बना रहता है, इसलिए उसका विज्ञानमय कोष भी खुद ही सक्रिय बना रहता है। उससे स्वाभाविक है, आनंदमय शरीर भी सक्रिय ही रहेगा। यह सब चेन रिएक्शन की तरह ही है। यही तो प्रेमानन्द है। यह आनंदमय कोष लम्बे समय तक सक्रिय बना रहता है। उसके पूरा खुल जाने के बाद तो आत्मा ही बचता है पाने को। वह भी विवाह के बाद तांत्रिक कुण्डलिनीयोग आधारित सम्भोगयोग से मिल ही जाता है। ऐसा नहीं कि यह स्त्री के साथ ही होता है। पुरुष के साथ भी ऐसा ही होता है। मुझे तो लगता है कि स्त्री की लावण्यमयी भावभंगिमा को देखकर जो पुरुष का तन और मन उससे देहसंबंध बनाने को उछालें मारने लगता है, वही उसके प्राणों का क्रियाशील होना है। यह अलग बात है कि कोई उस प्राणशक्ति का सदुपयोग करता है, तो कोई दुरुपयोग। कोई उसे आध्यात्मिक विकास में लगाता है, कोई भौतिक विकास में, और कोई संतुलित रुप से दोनों में।

थोड़ा मन की पतंग को उड़ने दें, एकदम न उतारें। हल्की सी तिरछी सी यह भावना रखें कि यह जुड़ी है। फिर थोड़ी देर बाद पतंग खुद आराम से लैंड करेगी। कोई झटका नहीँ लगेगा। मजा भी आएगा। लैंड होके उसे वापस भी जाने दें इच्छानुसार। खुद वापिस आएगी। अगर पतंग तूफानी जोर से ऊपर जा रही हो, और आप उसे जबरदस्ती नीचे खींचोगे, तो या तो पतंग फट सकती है, या धागा टूट सकता है। दोनों कमजोर तो पड़ेंगे ही, और उन पर दबाव भी बनेगा। ऐसा ही मन के साथ भी जबरदस्ती कर के होता है।

जिस समय दिमाग में थकान, दबाव या सिरदर्द जैसी हो रही हो, उस समय कपालभाति जैसी साँस खुद चलती है। उससे बाहर निकलती साँस पर ध्यान जाता है, जिससे कुण्डलिनी नीचे उतरती है। मतलब बाहर निकलती साँस धागे को नीचे खींचने मतलब खींच की तरह है, जिससे उड़ती हुई मनरूपी पतंग नीचे आती है, और दिमागी थकान रूपी तेज तूफ़ान से फटने से बचती है ।

विचारों के प्रकाश में ही नहीं, उनके अभाव के अंधकार में भी अनुभव शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि कुछ न कुछ मस्तिष्क की हलचल उसमें भी रहती ही है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का जो विशेष रूप में अनुभव होता है, वह भी शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि वह शरीर से ही निर्मित हुआ है। इसका मतलब है कि शरीर कभी भी नहीँ मरता। कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में।

कुण्डलिनी योग से मनोमय कोष रूपी पतंग प्राणमय कोष और अन्नमय कोष रूपी माँझे और चकरी से जुड़कर विज्ञानमय कोष रूपी उड़ान भरकर आनंदमय कोष रूपी मजा देती है

होता क्या है कि जब योग करते समय अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर के क्रियाशील होते ही मनोमय शरीर क्रियाशील होता रहता है, तब यह विश्वास पक्का होता रहता है कि मनोमय शरीर बेशक बाहरी और अनंत अंतरिक्ष में फैला महसूस होए, पर वह हमारे शरीर से जुड़ा हमारा ही स्वरूप है। हालांकि दुनियादारी के सभी कामों, खेलों, व व्यायामों के दौरान भी अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और मनोमय कोष एकसाथ सक्रिय हो जाते है, पर वे इतनी तेजी से सक्रिय होते हैं कि उनकी आपस में एकत्व भावना करने का मौका ही नहीं मिलता। साथ में आदमी का ध्यान काम की पेचीदगी, उससे जुड़ी तकनीक, उससे जुड़े फल पर और अन्य लौकिक दुनियादारी पर भी रहता है, जिससे भी एकत्व की भावना की तरफ ध्यान नहीं जाता। वैसे भी एकत्व की भावना द्वैत से भरी दुनियादारी की विरोधी है। दो विरोधी चीजें साथ नहीं रह सकतीं। जल और अग्नि साथ नहीं रह सकते। मनोमय शरीर के प्रति इसी आत्मभावना से विज्ञानमय शरीर भी क्रियाशील हो जाता है। दुनियादारी का हर किस्म का ज्ञान साधारण ज्ञान की श्रेणी में आता है। किसी को डॉक्टरी का ज्ञान है, किसी को दर्जी का, किसी को नाई का, किसी को अध्यापन का, किसी को उपदेश देने का, किसी को यज्ञ या कर्मकांड करने या अन्य धार्मिक परम्परा निभाने का है। सब साधारण ज्ञान में आते हैं क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए और लौकिक व्यवहार के लिए हैं। विशेष ज्ञान या विज्ञान इन सबसे हटकर व अकेला है, जो न तो जीविकोपार्जन के लिए है, और न ही लौकिक व्यवहार की सिद्धि के लिए है, बल्कि केवल आत्मा की पूर्ण व प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए है। विज्ञानमय शरीर का मतलब ही विशेष ज्ञान वाला शरीर है। इसमें स्थित होने पर साधक को ऐसा महसूस होता है कि वह स्थूल शरीर, प्राण, और मन का मिलाजुला रूप माने संघातमात्र है। जैसा मैंने पिछली पोस्ट में भी पतंग के उदाहरण से स्पष्ट किया था। अगर भटकते मन को अपना आत्मरूप न भी समझ सको तो यह तो समझ ही सकते हैं कि वह शरीर से साँस के माध्यम से ऐसे ही जुड़ा है जैसे एक पतंग मांझे के माध्यम से गट्टू या चकरी से जुड़ी होती है। पतंग उड़ाने का बहुत मजा आएगा। कभी बादलों के ऊपर, कभी दूर देश, कभी दूर ग्रह या तारे पर, कभी दूसरे ब्रह्माण्ड में, कभी परलोक में, तो कभी बिल्कुल पास में या चकरी में लिपटी हुई, कभी आँखों से ओझल होगी और सिर्फ चकरी और धागा ही नजर आएगा, फिर एकदम कहीं प्रकट हो जाएगी, कभी तूफ़ान में जैसी फँसी हुई बेढंगी उड़ेगी और बेढंगी दिखेगी, इस तरह अनंत आकाश में वह हर जगह उड़ेगी, पर हमेशा जुड़ी रहेगी शरीर के चक्रोँ के साथ। शायद चकरी से ही चक्र नाम पड़ा हो। हाहा। अब मनोवैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर के साथ एक चांदी के धागे से जुड़ा होता है। यह धागा नाभि से जुड़ा होता है। जैसे मांझा चकरी से बँधा होता है, वैसे ही योगा सांस नाभि से ही चलती है। सीधी सी बात है, अनुभव रूपी पतंग हमेशा अपने से अर्थात आत्मा से अर्थात अपने शरीर से जुड़ी हुई है। सम्भवतः इसीलिए नाभि चक्र को आदमी के शरीर का केंद्र बिंदु कहते हैं। नाभि पर एक अंदर की तरफ भिंचाव सा महसूस भी होता है, जब सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर का ध्यान भी किया जाता है। सम्भवतः नाभि चक्र से ही पतंग की चकरी का नाम पड़ा हो। उससे भौतिक दुनिया का प्रकाश आत्मा को मिलेगा ही, क्योंकि आत्मभावना जुड़ी है सबके साथ। फिर पूर्वोक्तानुसार आनंद भी पैदा होगा ही और कुण्डलिनी भी अभिव्यक्त होगी ही, क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही ऐसी भौतिक वस्तु है, जो ध्यान के माध्यम से आत्मा से सबसे ज्यादा जुड़ी होती है। मतलब कुण्डलिनी आत्मा से भौतिक दुनिया के जुड़ाव की प्रतिनिधि है। विशेष ज्ञान या विज्ञान के विपरीत साधारण ज्ञान दुनियादारी के मामले में होता है। ज्ञान जल्दी ही अज्ञान में परिवर्तित हो जाता है अगर उसे विज्ञान का साथ प्राप्त न हो। यह साइंस वाला विज्ञान नहीं है। प्राणमय शरीर का मतलब साँस पर ही ध्यान नहीं है, पर साँस से उत्पन्न शरीर की गति और शरीर के अन्य हिलने-डुलने पर ध्यान भी है। इस मामले में पैदल चलना एक सर्वोत्तम अध्यात्मवैज्ञानिक व्यायाम लगता है। इसमें पूरे शरीर पर, उसकी गति पर, उसकी संवेदनाओं पर और सांसों पर अच्छे से ध्यान जाता है। साथ में मन में भी सात्विकता के साथ विचारों की क्रियाशीलता भी काफी अच्छी होती है।

कुण्डलिनीयोग एक अध्यात्मवैज्ञानिक मशीन के रूप में

मनोमय शरीर भी आदमी खुद ही होता है। वह कोई और नहीं होता। वह बहुत विस्तृत होता। जब उसे अपने आप के रूप में अनुभव किया जाता है, तब वह क्षीण होने लगता है, और कुण्डलिनी छवि का रूप लेने लगता है। खालीपन, हल्कापन और आनंद सा भी महसूस होता है। इसी तरह, दरअसल ज्ञान आत्मा का होता है। पर विज्ञान मतलब विशेष ज्ञान तब होता है, जब आत्मा के साथ मन मतलब मनोमय शरीर भी जुड़ जाता है। मन आत्मा का ही विशेष रूप है। इसलिए मन का ज्ञान जब आत्मा के विशेष ज्ञान के रूप में किया जाता है, तब यही विज्ञानमय कोष है। मन का साधारण व पराई वस्तु के रूप में ज्ञान तो मनोमय कोष है। पर जब उसे ही अपना रूप समझा जाता है, तब यही विज्ञानमय कोष है। यह भी शरीर से जुड़ा हमारा ही भाग या कोष है, पर लगता है जैसे बाहर अनंत दिशाओं और दूरियों में फैला है। दरअसल आदमी एक उड़ती हुई पतंग की तरह है। मन उड़ने वाला रंगीन कागज है, इसके शरीर से जुड़े होने की भावना डोर है, और शरीर उस डोर को पकड़ने वाला है। जब तक डोर है, तभी तक पतंग सलामत है, नहीँ तो भटक कर नष्ट हो जाएगी। एक जगह मैंने बस के डेशबोर्ड पर लिखा हुआ पढ़ा था कि मन एक पैराशूट की तरह है, यह तभी अच्छे से काम करता है, जब यह खुला हुआ होता है। शायद इसका भी यही अर्थ है। शास्त्रों में इसे ऐसे कहा है कि मन को दृष्य रूप न समझकर द्रष्टा रूप समझना है। साक्षीभाव भी यही है, बल्कि इसका ही हल्का और आसान तरीका है। जब आत्मा मन को चुपचाप साक्षी बनकर देखता है, तब भी मन की ध्यान छवि अभिव्यक्त होने लगती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि मन आत्मा का ही विशेष रूप है, मतलब मन विज्ञान रूप है। मन तभी तक है, जब तक इसे बाहरी या पराया समझा जाए। जब इसे अपना आत्मरूप समझा जाता है, तब यह हल्का पड़ने लगता है। घर की मुर्गी दाल बराबर। महत्त्वबुद्धि बाहरी या पराई चीज के लिए होती है, अपनी चीज या अपने लिए नहीं। इसमें मन नष्ट नहीँ होता, बल्कि महत्त्वहीन सा होकर धीमा पड़ जाता है। इससे आनंद पैदा होता है। पहले की भटकी हुई अवस्था में मन ने जो अतिरिक्त शक्ति ली हुई थी, वह कुण्डलिनी छवि को मिल जाती है। इससे आनंद में और इजाफा होता है, क्योंकि कुण्डलिनी छवि लम्बे समय तक बने रहकर बिना आदमी के दार्शनिक प्रयास के खुद ही भटकते मन की अतिरिक्त चर्बी उतारकर चूसती रहती है, जिससे आनंद लम्बे समय तक, और पहुंचे हुए कुण्डलिनी योगियों में तो स्थायी ही बना रहता है। मन की हल्की वृत्ति सत्त्वगुणरूप है। इसलिए मन के  क्षीण होने से जो मनमिश्रित अंधेरा जैसा पैदा होता है, उसे सतोगुणी अविद्या कहते हैं, जैसा पिछली पोस्ट में बताया गया था। इसी से इसमें आनंद होता है। यही आनंदमय कोष है। इसके विपरीत मन का बिल्कुल नष्ट होना तमोगुणरूप है, और मन का पूरे वेग में होने से उसका वास्तविक जैसा लगना रजोगुणरूप है। इनके साथ जुड़ा अविद्यारूपी अंधेरा क्रमशः तमोगुणी अविद्या और रजोगुणी अविद्या है। पहली अवस्था में दुःख और दूसरी अवस्था में सुख होता है, आनंद नहीँ। सुख और दुःख एकदूसरे से जिन्दा रहते हैं। आनंद सुख व दुःख से परे है, और हमेशा एक जैसा बना रहता है। आनंद को सुख और दुःख का मिश्रित रूप भी कह सकते हैं, क्योंकि इसमें मन और अंधेरा दोनों बराबर संतुलन में एकसाथ रहते हैं। रजोगुण में मन बहुत भड़कीला होता है, जिसके साथ अंधेरा बिल्कुल नहीँ रहता, इसलिए यह सुख है। जब मन थककर बैठ जाता है, तब पूरी तरह से बेजान सा हो जाता है, जिससे मस्तिष्क में घुप्प अंधेरा छा जाता है। यह दुःख है। यही घोर तमोगुण भी है। सुख और दुःख का चक्र चलता रहता है, जिससे आत्मा की सफाई नहीं होती। मुझे अपनी प्रारम्भिक पुस्तक के समय इसका इतना गहरा विश्लेषण पता नहीं था, हालांकि ऐसा व्यावहारिक अनुभव जरूर था। उसमें मैंने इसे ऐसे लिखा है कि अनासक्ति से ही आनंद पैदा होता है। बात सही भी है। अनासक्ति से मन धीमे और संतुलित चलता है। वैसे आसक्ति औरों के प्रति ही होती है, अपने प्रति नहीँ। इसलिए मन को आत्मा समझने से अनासक्ति खुद पैदा होती है। मैंने अनासक्ति सिद्धांत के बहुत से उदाहरण दिए थे। जैसे कि आनंद मदिरा से नहीं बल्कि उससे मन के धीमा होने से होता है, जो अनासक्ति व सत्त्वगुण का लक्षण है। इसी तरह आनंद मांसभक्षण से नहीं बल्कि उससे उत्पन्न जीवन के प्रति नश्वर बुद्धि से पैदा वैराग्य से उत्पन्न अनासक्ति से पैदा होता है। ऐसे बहुत से उदाहरण दिए थे।

कुण्डलिनी योग से यही प्रभाव पैदा होता है। अनासक्ति अर्थात अद्वैत और कुण्डलिनी साथसाथ रहते हैं। इसलिए कुण्डलीनियोग से कुण्डलिनी छवि के मन में रहने पर आनंद पैदा होता है। अतः कुण्डलीनियोग एक अध्यात्मवैज्ञानिक मशीन या तकनीक या ट्रिक की तरह है, जो अनासक्ति के दार्शनिक झमेले से बचाते हुए स्वचालित रूप से अनासक्ति का प्रभाव पैदा करता है। इसका उदाहरण मैं अपने से देता हूँ। मैंने बहुत पैसा खर्च करके कुछ विकासात्मक काम किए थे। पर कुछ अटल कारणों से उनमें से कुछ चीजें छूट गईं और कुछ में घाटा हुआ। मुझे पछतावा भी हुआ और नहीं भी, क्योंकि चलना ही जीवन है। जब आदमी बाहर नजर घुमाए रखता है तब वह अपनी चीज से संतुष्ट नहीँ होता। उससे उसका अपना आनंद भी गायब हो जाता है। मैं डिस्टर्ब सा रहने लगा। मैंने कहीं से कुण्डलिनी योग सीखा और सोचा कि सब ठीक हो जाएगा। योग से मेरा खोया हुआ आनंद लौट आया, वह भी सूद समेत। मैंने आध्यात्मिक उन्नति भी बहुत की। उस समय तो इसके आधारभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का पता नहीं था, पर आज इसका पता चला है। कुण्डलिनी एक चमत्कारिक मानसिक ध्यान छवि है, जो एक स्वचालित यंत्र की तरह हर प्रकार से लाभ करती है। हुआ क्या कि कुण्डलिनी ने मेरे भटके हुए मन की शक्ति हर ली। इससे कुण्डलिनी की सहायता से अनायास ही मेरा मनोमय कोष विज्ञानमय कोष में बदल गया। विज्ञानमय कोष आनंदमय कोष में तब्दील हो गया। उक्त विकासात्मक दुनियादारी से मेरे प्रारम्भिक तीनों कोष बहुत विकसित हो गए थे। वैसे तो अद्वैत की सहायता से विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष को भी मैं इनके साथ विकसित कर रहा था, पर अंतिम दो कोशोँ को रॉकेट गति कुण्डलिनी योग से ही मिली जिससे कुण्डलिनी जागरण की तथाकथित मामुली सी झलक भी मिली थी।

कुण्डलिनी योग से एक ही अनंत अंतरिक्ष सभी ब्लैक होलों, ब्रह्माण्डों, और जीवों के रूप में दिखाई देता है

एक जीव मरने के बाद कहाँ गया कुछ पता नहीं चलता। इसी तरह एक गलेक्सी ब्लेक होल से निकलकर कौन से ब्रह्माण्ड में गई पता नहीं चलता। जैसे एक ही अनंत अंतरिक्ष में अनगिनत जीवों के रूप में अनगिनत सूक्ष्म ब्रह्माण्ड हैं, उसी तरह एक ही अनंत अंतरिक्ष में अनगिनत स्थूल ब्रह्माण्ड भी तो हो सकते हैं। अनंत अंतरिक्ष की जितनी मर्जी कॉपीयां निकाल लो। हरेक कॉपी मूल की तरह सम्पूर्ण होती है, डुप्लीकेट नहीं, क्योंकि एक से ज्यादा अनंत अंतरिक्ष संभव ही नहीं। इसी तरह एकमात्र अनुभवरूप अनंत अंतरिक्ष के इलावा किसी की स्वतंत्र सत्ता या अस्तित्व ही नहीं है। लहर, कण आदि जो कुछ भी अनंत आकाश में आभासी रूप में महसूस होता है, वह अपने आधार अनंत-आकाश के साथ ही सत्तावान महसूस होता है, स्वतंत्र रूप से नहीं। या ऐसा कह लो कि अनंत अंतरिक्ष को वह अपनी आभासी लहरों के रूप में अपने में ही महसूस होता है। अगर उन आभासी कलाकृतियों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता, तब तो हरेक जड़ वस्तु जैसे कि कुर्सी, पत्थर, चित्र, मूर्ति आदि जीवित होती, जैसा कि कई एनिमेशन फिल्मों में दिखाया जाता है। जगत, विचार आदि तो उस आकाश-आत्मा में आभासी तरंगें हैं, जो दरअसल हैं ही नहीं। इसलिए एक ही चारा बचता है कि एक ही अनंत अंतरिक्ष को ही सभी जीवों और ब्रह्माण्डों के रूप में दिखाया जाए। यह शास्त्रों में एक श्लोक के द्वारा समझाया गया है, “ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदम पूर्णात पूर्णमुदुच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते”। इसका मतलब है कि ‘वह’ मतलब ॐ नाम वाला परम तत्त्व पूर्ण है, मतलब अनंत अंतरिक्षरूप है, ‘यह’ मतलब जीव भी अनंत अंतरिक्ष है, ‘उस’ अनंत अंतरिक्ष से ‘इस’ अनंत अंतरिक्ष के निकल जाने के बाद भी ‘वह’ अनंत अंतरिक्ष ही बचा रहता है, उसमें कोई कमी नहीं आती। शून्यरूप अनंत अंतरिक्ष से कोई कुछ निकाल ही कैसे सकता है। क्योंकि सभी अनंत अंतरिक्ष एक ही हैं, इसलिए सभी जीव भी एक ही हैं। जैसे भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थित जीवों के मानसिक ब्रह्माण्ड ‘एक अंतरिक्ष रूप‘ ही हैं, उसी तरह भिन्नभिन्न स्थानों पर स्थित स्थूल ब्रह्माण्ड एक ही अंतरिक्ष में दिखते हुए भी, अलग-अलग स्वतंत्र सत्ता रखते हुए भी, अलग-अलग स्थानीय रूप रखते हुए भी, अलग-अलग अनंत अंतरिक्ष की सत्ता साथ में समेटे हुए हैं। इससे मल्टीवर्स की बात खुद ही सिद्ध हो जाती है। जैसे जीवों के रूप में सूक्ष्म ब्रह्माण्ड अनगिनत हैं, वैसे ही स्थूल ब्रह्माण्ड भी अनगिनत हैं। हालांकि सबके साथ अपना अनंत अंतरिक्ष है, इसलिए सब एक अनंत अंतरिक्ष रूप ही हैं, और कभी उसमें जाके मिल जाएंगे। वैसे तो हमेशा मिले हुए ही हैं पर वर्चुअली मिलते दिखेंगे। इस तरह से जैसे जीव के रूप में सूक्ष्म ब्रह्माण्ड की मुक्ति होती है, उसी तरह स्थूल ब्रह्माण्ड के रूप में भी जरूर होती होगी। यह अलग बात है कि स्थूल ब्रह्माण्ड का अभिमानी आत्मा अर्थात ब्रह्मा पहले से ही अनासक्त, अद्वैतपूर्ण और जीवनमुक्त है, जैसा शास्त्रों में कहा गया है। शास्त्र खुद मल्टीवर्स को मानते हैं। वे कहते हैं कि अनगिनत जीवों की तरह ब्रह्मा भी अनगिनत हैं। सम्भवतः उनका कहना है कि हरेक जीव विकास के उत्तरोत्तर क्रम को लाँघते हुए जीवनयात्रा के अंतिम पड़ाव के निकट ब्रह्मा भी जरूर बनता है। इसी संदर्भ में गीता में आता है कि आत्मा न तो कभी पैदा होती है, और न नष्ट होती है। मतलब कि आदमी कभी नहीं मरता। यही तो उपरोक्त वैज्ञानिक तथ्यों से भी सिद्ध हो रहा है कि अनंत व शून्य आकाश को न तो बनाया जा सकता है, और न ही नष्ट किया जा सकता है। हाँ यह जरूर है कि जीव-आत्मा रूपी भ्रमित अनंताकाश कुण्डलिनी योग से अपने अज्ञानरूपी आभासी भ्रम को दूर करके ओरिजनल अनंताकाश अर्थात परमात्मा के साथ एकाकार हो सकता है। एकाकार पहले से ही है, बस आभासी भ्रम का बादल हटाना है।

कुण्डलिनी योग ड्यूल नेचर ऑफ़ मैटर से कण प्रकृति को कुंठित करके तरंग प्रकृति को बढ़ाता है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि ब्लैक होल ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म शरीर होता है। गेलेक्सी को आप उसका स्थूल शरीर मान लो, और उसके केंद्र में स्थित ब्लैक होल उसका सूक्ष्म शरीर है। हरेक जीव एक आसमान है, और उसमें एक अलग ब्रह्माण्ड है। सब स्वतंत्र हैं और एकदूसरे को नष्ट नहीं कर सकते। हो सकता है कि इसी तरह एक ही आसमान में अनगिनत स्वतंत्र ब्रह्माण्ड भी हों।

आदमी कभी नहीं मरता

ये मैं ही नहीं कह रहा हूँ बल्कि वैज्ञानिक भी इस बात की आशंका जता रहे हैं कि आदमी दरअसल मरता नहीं है, पर मरने के बाद ब्लैक होल में चला जाता है और वहाँ से होकर किसी दूसरे ब्रह्माण्ड में पहुंच जाता है। यह वही बात है जो शास्त्र कहते हैं कि आदमी मरने के बाद सूक्ष्म शरीर बन जाता है और नया जन्म ले लेता है। नया जन्म नया ब्रह्माण्ड ही है, क्योंकि जितने जीव उतने ब्रह्माण्ड। हरेक जीव एक अनंत अंतरिक्ष है, और उसमें विचारों व अनुभवों का समूह ही भरापूरा ब्रह्माण्ड है। रोचक बात यह है कि स्थूल ब्रह्माण्ड की तरह सूक्ष्म मानसिक ब्रह्माण्ड भी अनंत अंतरिक्ष में ही बनता है, जीव के शरीर या मस्तिष्क में नहीं, जैसा कि अक्सर माना जाता है। मस्तिष्क तो केवल अंतरिक्ष में उन आभासी तरंगों को पैदा करने वाली मशीन भर है, जिन्हें वह अंतरिक्ष अपने अंदर महसूस कर सकता है। योगवासिष्ठ जैसे शास्त्रों में इसे ऐसे समझाया गया है कि आसमान में लटकते घड़े के अंदर कैद आसमान ही जीव है। वह भ्रम से ही अलग प्रतीत होता है, असलियत में वह एक ही अनंत आसमान से अभिन्न है। घड़े के अंदर के आसमान में आभासी तरंगें बनती रहती हैं, जिनसे जीव मोहित हुआ रहता है। मैं पिछली पोस्ट के संदर्भ में बता दूँ कि अनंत आकाश के छोटे से हिस्से में आसक्ति के साथ तरंगों को आत्म-आकाश से अलग अनुभव करने से पूरे चमकीले आत्म-आकाश को अपने में अंधेरा महसूस होता है। दरअसल यह भ्रम होता है। इससे मृत्यु के बाद भी उन तरंगों से बनी क्वांटम फ्लकचूएशन्स पर आसक्ति बनी रहती है, जिससे वह भ्रमजनित अंधेरा बना रहता है, जैसा सम्भवतः मैंने सूक्ष्मशरीर में अनुभव किया था। यह ऐसे ही है, जैसे क्वांटम फिसिक्स में मूल तत्त्वों को कण रूप में देखने पर वे अपने तरंग जैसे अनंत रूप को त्याग कर सीमित कणों के रूप में व्यवहार करते हैं। मतलब अनंत ऊर्जा एक कण के रूप में सीमित हो जाती है। इसको ऐसे समझ लो कि अनंत अंतरिक्ष की लाइट ऑफ़ हो जाती है, और केवल कणों के रूप में ही सीमित प्रकाश बचा रहता है। अँधेरे आसमान में चमकते हुए कण। जब हम उन्हें अपने असली ‘अनंत आसमान की तरंग‘ के रूप में देखते हैं, तब वे वैसे ही अंतरिक्ष की तरंग के रूप में व्यवहार करते हैं। मतलब वो तरंग इसीलिए प्रकाशमान है, क्योंकि वह जिस अंतरिक्ष में बनी है, वो खुद प्रकाशमान है। मतलब तरंग के साथ पूरे अनंत अंतरिक्ष की लाइट ऑन रहती है। जल में बनी तरंग तभी रंगीन हो सकती है, अगर वह जल भी रंगीन हो। अगर जल काला हो, तो उससे बनने वाली तरंग रंगीन हो ही नहीं सकती। जबकि तरंग को कण के रूप में मतलब जल से अलग स्वतंत्र रूप में तभी महसूस कर सकते हैं, अगर आधारभूत जल का रंग खत्म कर दिया जाए, पर तरंग का रंग रहने दिया जाए। पर ऐसा संभव नहीं है। इसलिए आधाररूपी तरंग-माध्यम का रंग आभासी रूप में अर्थात झूठमूठ में अर्थात भ्रम पैदा करके गायब करना पड़ता है, जादूगर की भ्रम पैदा करने वाली ट्रिक की तरह। इसलिए पदार्थ का असली रूप तरंग होते हुए भी वे आसक्ति और द्वैत से उत्पन्न भ्रम से कणरूप जान पड़ते हैं। सिंपल सी बात है। मतलब कि आध्यात्मिक अज्ञान क्वांटम फिसिक्स के अज्ञान पर आधारित प्रतीत होता है।

कुण्डलिनी योग से ही ब्रह्माण्ड एक देवता या विशालकाय एलियन बनता है

शून्य में विद्युत्चुंबकीय तरंग

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि विद्युत्चुंबकीय क्षेत्र या तरंग से मानसिक दुनिया बनती है। तो फिर यह क्यों न मान लिया जाए कि बाहर का भौतिक संसार भी इन्हीं तरंगों से बनता है। यही अंतर है कि मानसिक संसार में ये तरंगें अस्थिर होती हैं, और आँखों आदि इन्द्रियों के माध्यम से बाहर से लाई जा रही सूचनाओं के अनुसार लगातार बदलती रहती हैं, पर बाहर के स्थूल जगत में ये किसी बल से स्थिरता पाकर स्थायी मूलकणों की तरह व्यवहार करने लगती हैं, जिनसे दुनिया आगे से आगे बढ़ती जाती है। दिमाग़ में तो विद्युत्चुंबकीय तरंग मूलाधार से आ रही ऊर्जा से बनती है, पर बाहर शून्य अंतरिक्ष में यह ऊर्जा कहाँ से आती है, यह खोज का विषय है।

फील्ड से कण और कण से फील्ड का उदय

क्वांटम फील्ड थ्योरी सबसे आधुनिक और स्वीकृत है। इसके अनुसार हरेक कण और बल की एक सर्वव्यापी फील्ड मौजूद होती है। फील्ड मतलब प्रभाव क्षेत्र, कण की फील्ड मतलब कण का प्रभाव क्षेत्र। अंतरिक्ष शून्य नहीं बल्कि इन फील्डों से भरा होता है। फील्ड मतलब पोटेंशल, तरंग व कण बनाने की योग्यता। यह फील्ड एक सबसे हल्के स्तर की लहर होती है। मुझे लगता है यह ऐसे है कि जब एक कंकड़ एक जल-सरोवर में गिराया जाता है तो एक मुख्य लहर के साथ छोटी लहरों के झुंड के रूप में विक्षोभ पैदा होता है। मुख्य बड़ी तरंग कण के समान है और छोटी तरंगें उसके क्षेत्र या फील्ड के समान हैं। जिस क्षेत्र तक इन सूक्ष्म तरंगों का अनुभव होता है, वह कण के रूप में स्थित उस मुख्य तरंग का फील्ड का दायरा होता है। जब इलेक्ट्रोन की फील्ड में किसी पॉइंट को एनर्जी मिलती है तो वहां फील्डरूपी छोटी लहर का एम्प्लीचूड या आयाम बढ़ जाता है, और वहाँ एक कण का उदगम होता है। वह इलेक्ट्रोन है। ये आधारभूत फील्ड सबसे छोटे कण क्वार्क से भी सूक्ष्म होती हैं। इसी तरह इलेक्ट्रोन के चारों तरफ भी एक फील्ड बनती है। मतलब इलेक्ट्रोन रूपी बड़ी लहर के चारों तरफ भी एक सूक्ष्म लहरों का क्षेत्र बन जाता है। वह प्रोटोन से भी इसी इलेक्ट्रोमेग्नेटीक फील्ड से ही दूर से आकर्षित होकर उससे जुड़ जाता है। इस आकर्षण की फील्ड तरंगों से भी विशेष सूक्ष्म कण सम्भवतः फोटोन पैदा होता है, जो इस आकर्षण को क़ायम करता है। इस तरह फील्ड से कण और कण से फील्ड पैदा होकर बाहर की स्थूल संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।

अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त का उदय

मन भी तो क्वांटम फील्ड की तरह होता है। इसमें हरेक किस्म का संकल्प अदृष्य रूप अर्थात अदृष्य लहर के रूप में रहता है। इसे सांख्य दर्शन के अनुसार अव्यक्त कहते हैं। जब इसे मूलाधार से एनर्जी मिलती है, तब इस मानसिक क्वांटम फील्ड की लहरें बड़ी होने लगती हैं, जो स्थूलकण रूपी चित्रविचित्र संसार पैदा करती हैं। उससे और फील्ड पैदा होती है, जिससे और विचार पैदा होते हैं। इस तरह यह सिलसिला चलता रहता है और आदमी के विचार रुकने में ही नहीं आते। अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त पैदा होकर भीतरी मानसिक संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।

क्वांटम भौतिक विज्ञान और आध्यात्मिक मनोविज्ञान के बीच समानता

प्रकृति या अव्यक्त ही वह हल्के स्तर की आधारभूत लहर है। अव्यक्त व्यक्त से ही बना है, अव्यक्त मतलब हल्के स्तर का व्यक्त। हालांकि उसके मूल में भी निश्चेष्ट या अवर्णनीय पुरुष ही है। अंत के पैराग्राफ में बताऊंगा कि निश्चेष्ट या गतिहीन पुरुष क्यों कुछ काम नहीं कर पाता। क्यों उसे मूक दर्शक की तरह माना जाता है, जो अपनी उपस्थिति मात्र से प्रकृति की मदद तो करता है, पर खुद कुछ नहीं करता। सारा काम प्रकृति ही करती है। पुरुष अर्थात शुद्ध आत्मा एक चुंबक की तरह है जिसकी तरफ खिंच कर ही प्रकृति से सब काम अनायास ही खुद ही होते रहते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जो भगवान के सहारे है, उसका जीवन खुद ही अच्छे से कट जाता है। पर भगवान असली और अच्छी तरह से समझा हुआ होना चाहिए, जो कुण्डलिनी योग से ही संभव है। जैसे हमारा हरेक कर्म और विचार संस्कार रूप से पहले से ही सूक्ष्म रूप में हमारी अव्यक्त प्रकृति के रूप में मौजूद होता है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं, उसी तरह हरेक क्वांटम कण भी अपनी क्वांटम फील्ड के रूप में पहले से ही मौजूद होता है। व्यष्टि मूलाधार मतलब शारीरिक मूलाधार से मिल रही शक्ति से व्यष्टि अव्यक्त मतलब शरीरबद्ध अव्यक्त या व्यष्टि फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे विभिन्न लहरों के रूप में विचारों मतलब व्यष्टि मूलकणों का उदय होता है। इसी तरह समष्टि मूलाधार अर्थात ब्रह्माण्डव्याप्त मूलाधार अर्थात मूल प्रकृति से उत्पन्न शक्ति से समष्टि क्वांटम फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे समष्टि मूलकण पैदा होते हैं। पर समष्टि जगत में ये शक्ति कहाँ से आती है? दार्शनिक तौर पर तो मूल प्रकृति को समष्टि मूलाधार मान सकते हैं, क्योंकि दोनों में मूल शब्द जुड़ा है, और दोनों ही सब सांसारिक रचनाओं के मूल आधार या नींव के पहले पत्थर हैं हैं, पर इसे वैज्ञानिक रूप से कैसे सिद्ध करेंगे? व्यष्टि के मूलाधार की तरह समष्टि मूलाधार में भी कोई सम्भोग क्रिया और उससे उत्पन्न सम्भोग-शक्ति होनी चाहिए। तो उसे पुरुष और प्रकृति के बीच सम्भोग क्यों न माना जाए, जिसका इशारा शास्त्रों में किया गया है।

संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया तांत्रिक कुण्डलिनी योग का भौतिक मार्ग ही है

दरअसल जीवों का जो अव्यक्तरूप सूक्ष्म शरीर है, वह मरने के बाद और भी सूक्ष्म हो जाता है, क्योंकि उस समय उसे स्थूल शरीर से बिल्कुल भी ऊर्जा नहीं मिल रही होती है। वह एक घने अँधेरे आत्माकाश की तरह हो जाता है, जिसका अंधेरा उसमें छिपे हुए अव्यक्त जगत के अनुसार होता है। वह अव्यक्त जगत भी व्यक्त जगत के अनुसार ही होता है। इसीलिए सब जीवों के सूक्ष्म शरीर उनके स्थूल स्वभाव के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इस तरह से बहुत से जीवों के अव्यक्त आत्माकाश जब समष्टि अव्यक्ताकाश मतलब मूल प्रकृति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक निश्चित सीमा से ज्यादा अव्यक्त भाव अर्थात अंधकारमय आकाश बना देते हैं, तब वहाँ से एक शक्ति की लहर पुरुष की तरफ छलांग लगाती है। इसी से क्वांटम फील्ड में लहरों का एम्प्लीच्युड आदि बढ़ने से मूलकणों का उदय और सृष्टि का विस्तार शुरु होता है। यह ऐसे ही है जैसे कभी कोई आदमी अपनी सहन-सीमा से ज्यादा ही गम या अवसाद के अँधेरे में डूबने लग जाए, तो वह सम्भोग की सहायता से अपने मूलाधार के अँधेरे में डूबे अपने अव्यक्त मानसिक जगत को ऊपर चढ़ती हुई शक्ति के साथ सहस्रार की तरफ भेजने की कोशिश करता है, ताकि उसके विचारों का मानसिक संसार पुनः प्रकाशित होने लगे। शक्ति तो खुद एक वाहक या बल है, जो अव्यक्त जगत को व्यक्त बनाने में मदद करती है। शास्त्रों में भी यही कहा है कि जब जीवों के कर्म, फल देने को उन्मुख हो जाते हैं, अर्थात जब जीव अंधकार से ऊबने जैसे लगते हैं, तब वे प्रलय के बाद पुनः सृष्टि को प्रारम्भ करने की प्रेरणा देते हैं। यह सामूहिक अर्थात समष्टि सृष्टि और प्रलय है। व्यक्तिगत सृष्टि और प्रलय तो हरेक जीव के जन्म और मरण के साथ चली ही रहती है। सहज व प्राकृतिक मृत्यु के बाद कुछ समय तो जीव चैन की बंसी बजाता हुआ अव्यक्त में आराम करता है, फिर जल्दी ही उससे ऊब जाता है। इसलिए उस अव्यक्तरूप जीव को व्यक्त करने के लिए शक्ति पुरुष की तरफ बढ़ने की कोशिश करना चाहती है। देखा जाए तो शक्ति जाती कहीं नहीं है, क्योंकि पुरुष, प्रकृति और शक्ति तीनों व्यष्टि मूल प्रकृति में साथ-साथ ही रहते हैं। ऐसे ही जैसे अव्यक्त, व्यक्त और उनको बनाने वाली शक्ति मस्तिष्क में ही रहते हैं, पर अव्यक्त जगत मूलाधार से ऊपर चढ़ता हुआ महसूस होता है, क्योंकि पुरुष या मस्तिष्क की शक्ति को प्रेरित करने वाला विशेष सेकसुअल बल मूलाधार से ऊपर चढ़ता है। उसके लिए सम्भोग के माध्यम से एक आदमी और एक औरत का आपसी मिलन जरूरी होता है। संयोगवश उस मृत जीव की जीवात्मा किसी सम्भोगरत आदमी और औरत के जोड़े के मिश्रित मूलाधार में स्थित अव्यक्त जगत से मेल खाती है। दोनों का मिश्रित अव्यक्त जगत संभोग-शक्ति के माध्यम से ऊपर उठते हुए दोनों के हरेक चक्रोँ में दबी हुई भावनाओं व छिपे हुए विचारों को अपने साथ ले जाकर सहस्रार में आनंद के साथ व्यक्त हो जाता है, और एकदूसरे के सहस्रार चक्रोँ में आपस में मिश्रित ही बना रहता है। आदमी के सहस्रार से वह मिश्रित जगत आगे के चैनल से शक्ति के साथ नीचे उतरकर वीर्य में रूपांतरित होकर औरत के गर्भ में प्रविष्ट होकर एक बालक का निर्माण करता है। इसीलिए बालक में माता और पिता दोनों के गुण मिश्रित होते हैं। इसीलिए मांबाप के व्यवहार का बच्चों पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि तीनों की एनर्जी आपस में जुड़ी होती है। इसीलिए व्यवहार में देखा जाता है कि सम्भोग सुख के साथ प्रेम से रमण करने के आदी दम्पत्ति की संतानेँ बहुत तरक्की करती हैं, भौतिक रूप से भी और आध्यात्मिक रूप से भी। इसके विपरीत आपस में अजनबी जैसे रहने वाले दंपत्तियों के बच्चे अक्सर कुंठित से रहते हैं। यह अलग बात है कि कई अच्छी किस्मत वाले लोग इधरउधर से गुजारा कर लेते हैं। हाहा। अनुभवी तंत्रयोगी सम्भोग की, जगत को व्यक्त करने वाली कुण्डलिनी शक्ति को अपने सहस्रार में केवल एक ही ध्यानचित्र पर फोकस करते हैं, और उसे वीर्य रूपी बीज में नीचे न उतारकर लम्बे समय तक वहीं रोककर रखते हैं, जिससे वह मानसिक चित्र जागृत हो जाता है। इसे ही तांत्रिक कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

पूरा ब्रह्माण्ड ही एक एलियन

इन उपरोक्त तथ्यों का मतलब है कि ब्रह्माण्ड भी एक विशालकाय जीव या मनुष्य की तरह व्यवहार करता है। इससे वैदिक उक्ति, “यत्पिंडे तत् ब्रह्मान्डे” यहाँ भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो जाती है। इसका मतलब है कि जो कुछ भी छोटी चीज जैसे शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में भी है, अन्य कुछ नहीं। पिंड यहाँ शरीर को ही कहा है, अन्य किसी चीज को नहीं, क्योंकि किसीकी मृत्यु के बाद जब उसे श्राद्ध आदि के द्वारा खाने-पीने की चीजें दी जाती हैं, उसे पिंडदान कहते हैं। क्योंकि अगर हरेक छोटी चीज के बारे में कहना होता तो अंडे, खंडे आदि दूसरे शब्द ज्यादा बेहतर होते, पिंडे नहीं। दूसरा, पंजाबी भाषा में वह स्थान जहाँ लोग सामूहिक रूप से एकसाथ रहते हैं, जिसे गाँव कहते हैं, वह पिंड कहलाता है। मूल प्रकृति ब्रह्माण्ड का मूलाधार है, और चेतन पुरुष या परमात्मा इसका सहस्रार या उसमें कुण्डलिनी जागरण है। चित्रविचित्र संसारों की रचना के रूप में ही इसका जीवनयापन या कर्मयोग या इसका कुण्डलिनी जागरण की तरफ बढ़ना है। ऐसा यह अद्वैत के साथ करता है। शास्त्रों में ऐसा ही लिखा है कि ब्रह्मा खुद कहते हैं कि वे अद्वैतभाव के साथ सृष्टि की रचना करते हैं, जिससे वे जन्ममरण के बंधन में नहीं पड़ते। इसलिए यही इसका कुण्डलिनी योग है। अद्वैत और कुण्डलिनी योग आपस में जुड़े हुए हैं। सृष्टि का संपूर्ण निर्माण ही इसका कुण्डलिनी जागरण है। जैसे कुण्डलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने सबकुछ कर लिया, इसी तरह सबकुछ कर लेने के बाद ब्रह्मा को कुण्डलिनी जागरण होता है, यह इसका मतलब है। इसके बाद सृष्टि निर्माण से उपरत होकर इसका संन्यास लेना ही सृष्टि विस्तार का धीमा पड़ना और रुक जाना है। देहांत के बाद इसका परम तत्त्व में मिल जाना ही प्रलय है। शास्त्रों में इसीलिए देव ब्रह्मा की कल्पना की गई है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही जिसका शरीर है। आजकल विज्ञान भी इस अवधारणा पर विश्वास करने लग गया है। इसीलिए एक वैज्ञानिक थ्योरी यह भी सामने आ रही है कि हो सकता है कि पूरा ब्रह्माण्ड ही एक विशालकाय एलियन हो।

जिसे हम अंधेरनुमा शून्य या अव्यक्त कहते हैं, वह भी खाली नहीं बल्कि सीमित उतार-चढ़ाव वाली जगतरूपी तरंगों से भरा होता है

अगर चैतन्यमय आत्माकाश या परमात्मा में कोई बहुत ज्यादा स्थित हो जाए या लगातार आत्माकाश में ही स्थित रहने लगे तो वह कुछ काम भी नहीं कर सकता। वह पराश्रित व नादान सा रहता है संन्यासी की तरह। इसका मतलब है कि उस समय उसमें व्यक्त दुनिया अव्यक्त आकाश के रूप में नहीं रहती। मतलब वह शुद्ध आत्माकाश बन जाता है। मतलब उसके आत्माकाश में क्वांटम फील्ड नाम की बिल्कुल भी वाइब्रेशनस नहीं रहतीं। वह पूर्ण चिदाकाश बन जाता है। इसी वजह से स्थूल ब्रह्माण्ड में भी उस जगह आकाश खाली होता है, जहाँ वाइब्रेशन नहीं होतीं। अन्य स्थान ग्रहों-सितारों से भरे होते हैं। वर्चुअल पार्टिकल तो बनते रहते हैं थोड़ी-बहुत वाइब्रेशन से। मतलब थोड़ा-बहुत काम-वाम तो वे संन्यासी भी कर लेते हैं, पर कोई निर्णायक कार्य-अभियान या व्यापार-धंधा नहीं चला पाते। हाँ, एक बीच वाला हरफनमौला तरीका भी है कि तांत्रिक योग से आत्माकाश में लगातार कंपन बनाते भी रहो और मिटाते भी रहो, और सबकुछ करते हुए भी उससे अछूते बने रहो।

कुण्डलिनी योग भी एक लहर ही है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में एक विचार-प्रयोग के माध्यम से बता रहा था कि सृष्टि के अंत में कैसे गुरुत्वाकर्षण सभी चीजों को निगल जाएगा। कई वैज्ञानिक भी ऐसा ही अंदाजा जता रहे हैं, जिसे बिग क्रन्च नाम दिया गया है।

साथ में मूलकण के तरंग स्वभाव के बारे में भी बात चली थी। हवा, पानी आदि भौतिक तरंगों के मामले में देखने में आता है कि क्रेस्ट और ट्रफ एकसाथ नहीं बन सकते। जब क्रेस्ट बनाने के लिए जल सतह से ऊपर की तरफ उठेगा, तो उसी समय उसी जगह पर वह ट्रफ के रूप में सतह के नीचे नहीं डूब सकता। पर आकाश की तरंग के मामले में ऐसा हो सकता है, क्योंकि यह आभासी है, और इसके लिए किसी भौतिक वस्तु या माध्यम की जरूरत नहीं है। इसीलिए एकसाथ त्रिआयामी क्रेस्ट और ट्रफ बनने से मूलतरंग मूलकण की तरह भी दिखती है, और उसके जैसा व्यवहार भी करती है, जैसा कि पिछली पोस्ट में चित्रोक्त किया गया है। मूलकण रूपी तरंग ऐसे ही क्रेस्ट और ट्रफ बनाते हुए आगे से आगे बढ़ती रहती है, क्योंकि प्रकृति और पुरुष हर जगह विद्यमान हैं, और प्रकृति से पुरुष की तरफ दौड़ हर जगह चली रहती है। इसीलिए मूलकण कई जगह एकसाथ दिखाई देते हैं। पिछले क्रेस्ट से अगला ट्रफ बनता है, और पिछले ट्रफ से अगला क्रेस्ट, क्योंकि प्रकृति को सीमेट्री प्यारी है। इस तरह अनगिनत तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में अनगिनत सूक्ष्म लूप बन जाते हैं। मतलब पूरा आकाश लूपों में बंटा हुआ सा लगता है। क्वांटम लूप थ्योरी भी यही कहती है कि अंतरिक्ष सपाट न होकर सूक्ष्मतम टुकड़ों में बंटा है। उससे छोटे टुकड़े नहीं हो सकते। पर अगर सिद्धांत से देखा जाए तो हरेक चीज टूटते हुए सबसे छोटी जरूर बनेगी। वह विशेषता से रहित शून्य आसमान ही है। जिसे अंतरिक्ष का क्वांटम लूप कहा गया है, वह दरअसल शून्य अंतरिक्ष का अपना स्वाभाविक रूप नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष में आभासी मूलकण है। इससे इन सभी बातों का उत्तर मिल जाता है कि तरंग कण के जैसे क्यों व्यवहार करती है, स्टैंडिंग वेव और प्रॉपेगेटिंग वेव कैसे बनती है आदि। कोई भी लहर वास्तव में ध्यानरूप ही है, जैसा पिछली पोस्ट में बताया गया है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ लहर के रूप में ही चलती हैं। लहर में कोई चीज आगे नहीं बढ़ती, लहर बनाने वाली चीज केवल अपने स्थान पर आगे-पीछे या ऊपर-नीचे कांप कर अपनी पूर्ववत जगह पर आ जाती है। केवल लहर आगे बढ़ती है। वैसे भी शून्य जैसे अंतरिक्ष में कोई चीज है ही नहीं प्रकट होने को। इसलिए एकमात्र लहर का ही विकल्प बचता है। वहाँ तो अपनी जगह पर कांपने के लिए भी कोई चीज नहीं है। इसलिए झूठमूठ में ही कंपन दिखाया जाता है। यह नहीं पता कि कैसे। प्रकाश जिसको ईश्वररूप या दैवरूप माना जाता है, लहर के रूप में ही चलता है। इसी तरह अग्नि भी।

नाड़ी की गति भी लहर के रूप में ही होती है

नाड़ी में संवेदना लहर के रूप में आगे बढ़ती है। इसमें सोडियम-पोटाशियम पम्प काम करता है। सोडियम और पोटाशियम आयन अपनी ही जगह पर नाड़ी की दीवार से अंदर-बाहर आते-जाते रहते हैं, और संवेदना की लहर आगे बढ़ती रहती है।

लहर सूचना को आगे ले जाती है

तालाब में कहीं पर कंकड़ मारने से उसके पानी पर लहर पैदा होकर चारों तरफ फैल जाती है। उससे जलीय जंतु संभावित खतरे से सतर्क हो जाते हैं। जमीन पर चलने से उस पर एक लहर पैदा हो जाती है, जिसे सांप आदि जंतु पकड़कर सतर्क हो जाते हैं या भाग जाते हैं। वायु से आवाज के रूप में सूचना संप्रेषण के बारे में तो सभी जानते हैं। मूलाधार से संवेदना की लहर सहस्रार तक जाती है, जिससे सहस्रार सतर्क अर्थात क्रियाशील हो जाता है। सतर्क कालरूपी शत्रु से होता है, जो हर समय मौत के रूप में आदमी के सामने मुंह बाँए खड़ा रहता है। इसलिए सहस्रार अद्वैत के साथ सांसारिक अनुभूतियों के रूप में जागृति या आध्यात्मिक जीवनयापन के लिए प्रयास करता है। वैसे दुनियादारी में सफलता भी सहस्रार से ही मिलती है, क्योंकि वही अनुभूति का केंद्र है।

जीवात्मा विद्युतचुंबकीय तरंगों की सहायता से अपने अंदर आभासी संसार को महसूस करता है

नाड़ी में चार्जड पार्टिकलस की गति से आसपास के आकाश में विद्युत्चुंबकीय तरंग बनती है। उस तरंग से सहस्रार के आत्म-आकाश में आभासी तरंगें बनती महसूस होती हैं। इसीलिए कहते हैं कि आत्मा का स्थान सहस्रार है। यह आश्चर्य की बात है कि अनगिनत स्थानों पर विद्युत्चुंबकीय तरंगों से आकाश में अनगिनत आभासी कलाकृतियाँ बनती रहती हैं, पर वे केवल जीवों के मस्तिष्क के सहस्रार में ही आत्मा को महसूस होती हैं। अगर उसकी बनावट व उसकी कार्यप्रणाली की सही जानकारी मिल जाए तो हो सकता है कि कृत्रिम जीवकृत्रिम मस्तिष्क का निर्माण भी विज्ञान कर पाए।

कुण्डलिनी योग विज्ञान ही क्वांटम यांत्रिकी, अंतरिक्ष विज्ञान, खगोल-भौतिकी और ब्रह्माण्ड विज्ञान का शिखरबिंदु है

कुण्डलिनी जागरण ही सिद्ध करता है कि अभावात्मक शून्य का अस्तित्व ही नहीं है

दोस्तों, मैं हाल ही में अपने जागृति के अनुभवों को विज्ञानवादियों को प्रेषित करने बारे विचार कर रहा था, ताकि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्य को सुलझाया जा सके, जिस पर वे बुरी तरह से अटके हुए हैं। पर मुझे उनकी साइटों पर न तो कमेंट बॉक्स मिला और न ही उनकी तरफ से इस तरह की कोई अपील ही गूगल पर मिली। एक-दो का एड्रेस मिलने पर उनसे जीमेल पर कंटेक्ट किया भी पर कोई जवाब नहीं मिला। आपको ऐसा कोई मंच पता हो तो कृपया जरूर शेयर करना।

अध्यात्म विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान आपस में जुड़े हुए हैं, और एकदूसरे के बिना अधूरे हैं। इसीलिए सनातन वैदिक दर्शन के साथ ज्योतिष विज्ञान भी सम्मिलित किया गया था, और इसे एक विशिष्ट सम्मानजनक स्थान प्राप्त था।

शून्यवाद ही सभी समस्याओं की जड़ है

शून्यवाद सबसे बड़ा द्वैतकारी अज्ञान है। विज्ञान अगर शून्यवाद का सहारा न लेता तो आज प्रकृति और मानवता का विनाश न हो रहा होता। इससे आज चारों तरफ युद्ध, प्राकृतिक आपदा आदि के रूप में हायतौबा न मच रही होती। फिर विज्ञान और अद्वैतरूपी अध्यात्म एकसाथ आगे बढ़ रहे होते और मानवमात्र का सम्पूर्ण व सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो रहा होता। प्राचीन भारत से बुद्ध धर्म इसी वजह से लगभग बाहर कर दिया गया था, क्योंकि उसने शून्यवाद का सहारा लिया। हालांकि बुद्धिस्ट बहुत तर्क देते हैं कि उनका उपास्य शून्य नहीं पर चेतन ब्रह्म है, यह सत्य भी है, पर बौद्ध धर्म के बाहरी आचारविचार से तो वह शून्य ही प्रतीत होता है। आम जनमानस तो ऊपर से ही देखते हैं, गहरी बात नहीं समझ पाते।

लगता है कि दुनिया की सबसे अधिक शून्य-विरोधी संस्कृति हिंदु सनातन संस्कृति ही है। इसमें मिट्टी-पत्थर आदि जड़ वस्तुओं के साथसाथ अंधेरा काला आसमान भी पूजा जाता है। उदाहरण के लिए शनि देव और काली माता

जागृति के अनुभव के आधार पर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उसकी आधारभूत संरचना

जिसे हम शून्य या अंधकारनुमा या आनंदहीन आकाश समझते हैं, और अपनी आत्मा के रूप में महसूस भी करते हैं, वह जागृति के समय वैसा महसूस नहीं होता, अर्थात वह अशून्य या प्रकाश या आनंदमय जैसा आकाश महसूस होता है। अशून्य इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि वह भरे-पूरे भौतिक संसार के जैसा ही लगता है। प्रत्यक्ष भौतिक संसार व उससे बने मानसिक चित्र या विचार उसमें तरंगों की तरह महसूस होते हैं। वैसे ही जैसे सागर में तरंगें होती हैं। विभिन्न धर्मशास्त्रों में भी ऐसा ही वर्णन किया गया है। तो क्या विज्ञान इस बात को अनदेखा कर रहा है।

अपने मूल रूप में अंतरिक्ष ही आत्मा है

सारा संसार आभासी व अवास्तविक है

मूल मत ओरिजिनल माने वास्तविक अर्थात निर्विकार रूप में। आइंस्टिन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से यह काफी पहले ही जाहिर हो गया था, पर इस आध्यात्मिक रूप में किसी ने समझा नहीं था। आइंस्टिन बहुत महान व्यक्ति थे पर ऐसा लगता है कि उनका सामना किसी असली जागृत व्यक्ति से नहीं हुआ था। हाहा। आइंस्टिन ने सिद्ध किया कि स्पेसटाईम किसी त्रिआयामी चादर की तरह मुड़ सकता है, उसमें गड्ढे पड़ सकते हैं। वैसे जो पहले ही खाली गड्ढे की तरह है, उसमें एक और खाली गड्ढा कैसे बन सकता है। मतलब साफ है कि अंतरिक्ष वैसा शून्य नहीं है, जैसा आम आदमी समझते हैं। वह एकसाथ शून्य भी है और नहीं भी, वह भावरूप शून्य है, वह आत्मा है, वह परमात्मा है। यह ऐसे ही है, जैसे तलाब के पानी में किश्ती से गड्ढा बनता है। तरंग भी तो इसी तरह गड्ढा बनाते हुए चलती है। मतलब अंतरिक्ष में तरंग बन सकती है। फिर वह शून्य कैसे हुआ। कई लोग यह भी कह सकते हैं कि वह ऐसा शून्य है, जिसमें झूठमूठ वाली माने वर्चुअल तरंग बन सकती है। ऋषिमुनि भी आत्मा का ऐसा ही अनुभव बताते हैं। मतलब वह ऐसी तरंग नहीं होती जो आत्मा को असल में विकृत कर सके। यहाँ तक कि पानी भी तरंग से थोड़ी देर के लिए ही विकृत लगता है, तरंग गुजर जाने के बाद उसकी सतह भी बिल्कुल सीधी और पहले जैसी हो जाती है। हवा के साथ भी ऐसा ही होता है। फिर अंतरिक्ष या आकाश तो उनसे भी सूक्ष्म है, वह कैसे विकृत हो सकता है। वह तो थोड़ी देर के लिए भी विकृत नहीं हो सकता, क्योंकि विकृत होकर जाएगा कहाँ। क्योंकि हर जगह आकाश है। पानी और हवा तो खाली स्थान को खिसक जाते हैं, पर अंतरिक्ष कहाँ को खिसकेगा। इसका मतलब है कि अंतरिक्ष की तरंग पानी और हवा की तरंग से भी ज्यादा आभासी है। मतलब तरंग कहीं नहीं चलती, सिर्फ प्रतीत होती है। है न आश्चर्यजनक तथ्य। गजब का शून्य है भाई। सम्भवतः यही परमात्मा की वह जादूगरी या माया है जो न होते हुए भी सबकुछ दिखा देती है।

शास्त्रीय प्रमाण के रूप में, महाभारत जितने आकार वाले प्रसिद्ध योगवासिष्ठ उपनामित महारामायण ग्रंथ में बारम्बार और हर जगह भावपूर्ण शून्य आकाश या अंतरिक्ष को ही परमात्मा कहा गया है। उसमें हर जगह संसार को असत्य व आभासी कहा गया है।

शून्य में अगर सारी दुनिया विद्यमान है तो वह शून्य दुनिया के जैसे गुणों वाला होना चाहिए

अब हम उपरोक्त वैज्ञानिक विश्लेषण को थोड़ा तर्क की धार देते हैं। अंतरिक्ष रूपी शून्य में वह सभी क्रियाकलाप होते हैं, जो भौतिक संसार में होते हैं, जैसा कि हमने ऊपर कहा। इसका मतलब है कि शून्य का स्वभाव दुनिया के जैसा होना चाहिए। यह तभी संभव है अगर उस शून्य में सत्त्व गुण, रजो गुण और तमोगुण, प्रकृति के ये तीनों गुण एकसाथ विद्यमान हों, क्योंकि भौतिक संसार इन्हीं तीनों गुणों से बना है, जैसा कि शास्त्रों में कहा गया है। इसीलिए उस शून्य आत्मा को त्रिगुणातीत मतलब तीनों गुणों से परे कहा गया है, क्योंकि तीनों गुण एकसमान मात्रा में होने से एकदूसरे के प्रभाव को कैंसल कर देते हैं, हालांकि रहते तीनों गुण हैं। इसीलिए अध्यात्म शास्त्रों में परमात्मा को अनिर्वचनीय भी कहते हैं, मतलब उसमें तीनों गुण हैं भी, नहीं भी हैं, ये दोनों बातें भी हैं और दोनों भी नहीं हैं। शून्य में ये गुण एक दूसरे से कम ज्यादा नहीं हो सकते, क्योंकि समय के साथ भौतिक वस्तु के परिवर्तन से गुण कम या ज्यादा होते रहते हैं। पर शून्य परिवर्तित नहीं हो सकता। इसका मतलब है कि शून्य आत्मा एक ही समय में सत्त्व रूपी प्रकाश, रज रूपी क्रियाशीलता (आभासी तरंग के रूप में, यद्यपि यह नहीं भी है) और तम रूपी अंधकार एकसाथ विद्यमान हैं। यह सब शास्त्रों के इस कथन को सिद्ध करता है कि वास्तविक व सर्वव्यापी अंतरिक्ष जो परम-आत्मा है, वह सभी सांसारिक जीवों की तुलना में कहीं बेहतर तरीके से चेतन है, और वह प्राप्त किया जा सकता है।

शून्य अंतरिक्ष भी भौतिक पदार्थों की तरह व्यवहार करता है

हालांकि सिर्फ यह अंतर है कि जिसे शून्य अंतरिक्ष आभासिक या वर्चुअल रूप में करता है, उसे भौतिक पदार्थ सत्य रूप में करता है। इसलिए शास्त्रों में कहा है कि परमात्मा सबसे बड़ा नटखट, नाटककार और जादूगर है। उदाहरण के लिए समुद्र के पानी से पानी छोटे-छोटे टुकड़ों में बाहर उछलकर वास्तविक बुँदे बनाता है। पर शून्य अंतरिक्ष रूपी सागर में पहली बात, शून्य टुकड़ा बन कर नहीं उछल सकता, दूसरा ऐसी किसी खाली जगह का अस्तित्व ही नहीं है, जो शून्य आकाश के रूप में न हो। इसलिए एक ही रास्ता बचता है कि झूठमूठ की अर्थात दिखावे की अर्थात वर्चुअल बुँदे बनाई जाए। उन्हें ही विज्ञान के अनुसार हम मूल कण अर्थात एलिमेंट्री पार्टिकल्स कहते हैं, जो लगातार शून्य अंतरिक्ष में पॉप होते रहते हैं अर्थात प्रकट होते रहते हैं और उसीमें विलीन भी होते रहते हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे समुद्र से जल की बुँदे बाहर निकलती रहती हैं, और उसीमें विलीन होती रहती हैं। फिर आत्मजागृति का यह अनुभव विज्ञानसम्मत व सही क्यों न मान लिया जाए कि सारी सृष्टि आत्मा के अंदर आभासी तरंग है। दिक्क़त यही है कि उस अनुभव को किसी और को नहीं दिखाया जा सकता और कोई मशीन भी उसे वेरिफाई नहीं कर सकती। इसे खुद अनुभव करना पड़ता है।

विज्ञान-युग का योग-युग में रूपान्तरण

धर्मग्रंथों में यह प्रचुरता से लिखा गया है कि शून्य से जगत की उत्पत्ति नहीं हो सकती। बहुत पहले से ऋषियों को आत्मानुभव से ज्ञात था कि स्वयंप्रकाश आकाशरूप आत्मा से ही इस जगत की उत्पत्ति हुई है, किसी अँधेरेनुमा शून्य अंतरिक्ष से नहीं। इसके लिए बहुत से विज्ञाननुमा तर्क दिए जाते थे, जिससे भी यही सिद्ध होता था। आत्मजागृत अर्थात कुण्डलिनी-जागृत व्यक्ति भी ऐसा ही अनुभव बताते हैं। वह आत्मा भौतिक इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आ सकता, केवल अपने स्वयं के असली स्वरूप के रूप में अनुभव होता है। इसलिए एक बात तो साफ है कि विज्ञान से बेशक उसका अंदाजा लग जाए, पर दिखेगा वह केवल योग से ही। विज्ञान उसका अंदाजा लगाकर शांत हो जाएगा, और फिर उसको अनुभव करने के लिए योग की तरफ बढ़ेगा। सारे वैज्ञानिक योगी बन जाएंगे, और विज्ञान-युग योग-युग में रूपान्तरित हो जाएगा।

बाहर के और भीतर के ब्रह्माण्ड में कोई अंतर नहीं है

अगर मन का ब्रह्माण्ड आत्मा के अंदर अनुभव होता है, तो बाहर का भौतिक ब्रह्माण्ड भी, क्योंकि उसे हम मानसिक ब्रह्माण्ड से ही अंदाजन जान सकते हैं, सीधे व असली रूप में कभी नहीं। पर इतना तय है कि बाहरी ब्रह्माण्ड का असली रूप भी मनोरूप ब्रह्माण्ड की तरह ही है। बस इतना सा अंतर है कि बाहरी ब्रह्माण्ड को भीतरी ब्रह्माण्ड से ज्यादा स्थिरता मिली हुई है, इसीलिए हजारों सालों तक सभी को वह लगभग एक जैसा ही दिखता है, पर मानसिक ब्रह्माण्ड विचारों और अनुभवों के साथ प्रतिपल बदलता रहता है।

विज्ञान के कई गहन रहस्य कुण्डलिनी जागरण से सुलझ सकते हैं

उदाहरण के लिए ब्रह्माण्ड के सबसे गहरे मूल में क्या है, क्वांटम एन्टेन्गलमेंट का सिद्धांत क्या है, विद्युत्चुंबकीय तरंग क्या है व कैसे चलती है, वेक्यूम एनर्जी, क्वांटम फलकचुएशन, डार्क एनर्जी, महाविस्फोट, ब्रह्माण्ड का विस्तार, ब्लैक होल, मल्टीवर्स, पैरालेल यूनिवर्स, एंटी यूनिवर्स, फोर्थ डाईमेंशन, स्पेसटाईम ट्रेवल, टेलीपोर्टेशन, एलियन हंटिंग आदि, और अन्य भी बहुत कुछ। कालेब शार्फ, एक अंतरिक्ष विज्ञानी कहते हैं कि पूरा ब्रह्माण्ड ही एक देत्याकार एलियन हो सकता है। आइंस्टिन की नजर में समय एक भ्रम है। ऐसी सभी सोचें और थ्योरियाँ ज्ञानी ऋषियों और दार्शनिकों के चिंतन से मेल खाती हैं। इसलिए विज्ञानवादियों को एकांगी भौतिक सोच छोड़कर योग और अध्यात्म को भी अपने अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए, तभी दुनिया के सारे रहस्यों से पर्दा उठ सकता है। कई क्वांटम थ्योरियाँ योग विज्ञान से समझ में आ सकती हैं, जैसे कि वेव पार्टिकल ड्यूल नेचर ऑफ़ मैटर, स्टैंडिंग वेव, डबल स्लिट एकस्पेरीमेंट, डी ब्रॉगली सिद्धांत, केसीमिर इफेक्ट, आदि बहुत सी। जिस थ्योरी ऑफ़ एव्रीथिंग के लिए वैज्ञानिक लम्बे समय से प्रयास कर रहे हैं, वह लगता है कि योग विज्ञान से मिल सकती है। कुछ वैज्ञानिक सत्य की तरफ बढ़ भी रहे हैं, जैसे कि स्टीफेन हॉकिंग की स्ट्रिंग थ्योरी, रोबर्ट लैंजा की बायोसेंटरिज्म थ्योरी, हरेक वस्तु के रूप में एलियन के छुपे होने की थ्योरी, एडम फ्रैंक की धरती को एक जीवित प्राणी समझने वाली थ्योरी, धरती को अपराधियों के लिए जेल और चन्द्रमा को जेल निगरानी केंद्र मानने वाली थ्योरी आदि,और अन्य भी कई सारी। हालांकि यह सब वैज्ञानिक अंदाजे ही हैं, जैसे मैंने ऊपर कहा। इनको सिद्ध करने के लिए उन लोगों को साथ में लेने की जरूरत है, जिन्होंने योग से कुण्डलिनी जागरण को प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया है। आजकल ऐसी अबूझ किस्म की विज्ञान पहेलियों पर हर जगह चर्चा का माहौल गरमाया हुआ है। लोहा गर्म है, और वैज्ञानिकों को हथोड़ा चलाने में संकोच नहीं करना चाहिए। अगर आप भी इन पहेलियों को सुलझाने में योगदान देना चाहते हैं, तो कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

कुंडलिनी योग ही सभी धर्मों की रीढ़ है, इसपर आधारित इनका वैज्ञानिक विश्लेषण इनके बीच बढ़ रहे अविश्वास पर रोक लगा सकता है

आक्रमणकारियों से शास्त्रों की रक्षा करने में ब्राह्मणों की मुख्य भूमिका थी

कई बार कट्टर किस्म के लोग छोटीछोटी विरोधभरी बातों का बड़ा बवाल बना देते हैं। अभी हाल ही में दिल्ली के जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की दीवारों पर लिखे ब्राह्मण विरोधी लेख इसका ताज़ा उदाहरण है। यह सबको पता है कि यह तथाकथित पिछड़े वर्णों ने नहीं लिखा होगा। हिंदु समुदाय के बीच दरार पैदा करने के लिए यह तथाकथित निहित स्वार्थ वाले बाहरी लोगों की साजिश लगती है। ऐसा सैंकड़ों सालों से होता चला आ रहा है। दरअसल यह सामाजिक कर्मविभाजन था, जिसे वर्ण व्यवस्था कहते थे। इसमें सभी बराबर होते थे, केवल यही विशेष बात होती थी कि वंश परम्परा से चले आए काम को करना ही अच्छा समझा जाता था, जैसे व्यापारी का बेटा भी अपने पिता के व्यापार को संभालता है। जबरदस्ती कोई नहीं थी, क्योंकि शूद्र वर्ण के बाल्मीकि ने रामायण लिखी है, विश्वामित्र क्षत्रिय से ब्राह्मण बन गए थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। हालांकि ज्यादातर लोग अपने ही वर्ण का काम सँभालने में ज्यादा गौरव, सम्मान और गुणवत्तापूर्णता महसूस करते थे। जैसे वर्णमाला के वर्ण अपना अलग-अलग विशिष्ट रूप-आकार लिए होते हैं, वैसे ही समाज के लोग भी अलग-अलग रूपाकार के कर्म करते हैं। अगर कर्म के अनुसार ही किसी का स्वभाव बन जाता हो, तो यह अलग बात है, पर ऐसा कभी नहीं हुआ कि सबको पंक्ति में खड़ा किया गया और शरीर के रंगरूप के अनुसार विभिन्न किस्म के समूह बनाए गए। वर्ण या वर्णभेद से मतलब रंग या रंगभेद बिल्कुल नहीं है, क्योंकि हरेक वर्ण के लोगों में हरेक किस्म के त्वचा-रंग के लोग मिलेंगे। इसी तरह यह परम्परा विदेशी कास्ट या जाति परम्परा की तरह भी नहीं है। यह नाम भी इसको गलतफहमी से दिया गया लगता है। रही बात ब्राह्मणों की तो यह बता दूँ कि सबसे कठिन जीवन उन्हीं का होता था। उनको विलासिता भरे जीवन से अपने को कोसों दूर रखना पड़ता था। फिर धनसम्पत्ति किस काम की अगर उसे भोग ही न सको। अधिकांशतः उनकी कमाई संपत्ति औरों के या परमार्थ के काम ही आती थी। दुनिया में ठगों की कमी न आज है, न पुराने समय में थी। पहली बात तो उनके पास सम्पत्ति होती ही नहीं थी। भिक्षाजीवी की तरह वे दक्षिणा में मिले मामुली से मेहनताने से अपना और अपने परिवार का गुजारा मुश्किल से चलाते थे। फिर बोलते कि राजा उन्हें बहुत सारी धनसंपत्ति दान में दिया करते थे। राजा भी कितनों को देंगे। कर वसूलने वाले इतनी आसानी से दान दिया करते तो आज कोई गरीब न होता। कुछेक ब्राह्मणों को अगर मुहमाँगा दिया गया होगा तो उसको हमेशा गिनते हुए सब पर तो लागू नहीं करना चाहिए। मुफ्त में तो राजा भी नहीं देते थे। जब उन्हें ब्राह्मण से कोई बड़ा ज्ञान प्राप्त होता था, तभी वे अपने आध्यात्मिक कल्याण के लिए दान देते थे। कहावत भी है कि फ्री लंच का अस्तित्व ही नहीं है। मैं ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि मुझे पता है। मेरे दादा खुद एक आदर्श हिंदु पुरोहित थे, जो लोगों के घरों में पूजापाठ किया करते थे। मैंने उनके साथ काम करते हुए खुद महसूस किया है कि आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना और उसे दुनिया में बाँटना कितना मुश्किल और आभारहीन माने थैंकलेस काम है। ये काम ही ऐसा है, इसमें लोगों की गल्ती नहीं है। ये बातें अधिकांश लोगों को अब पुनः समझ में आने लग गई हैं। इसीका परिणाम है कि ब्राह्मणों के खिलाफ उक्त भड़काऊ लेखन के विरोध में सोशल मीडिया में “हैशटैग ब्राह्मण लाइफ मैटर्स” ट्रैण्ड किया। इसी तरह “हैशटैग मैं भी ब्राह्मण हूँ” भी ट्विटर पर काफी ट्रैण्ड रहा, जब क्रिकेटर सुरेश रैना के अपने आप को ब्राह्मण कहने का बहुत से वामपंथी किस्म के लोगों ने विरोध किया था। हम ये नहीं कह रहे कि सभी ब्राह्मण आदर्श हैं। पर इससे ब्राह्मणवाद को गलत नहीं ठहरा सकते। ब्राह्मणवाद ज्ञानवाद, बुद्धिवाद या अध्यात्मवाद का पर्याय है। अगर कहीं पर चिकित्सक निपुण नहीं हैं, तो उससे चिकित्सा विज्ञान झूठा नहीं हो जाता। आज जो हम इस ब्लॉग पर आध्यात्मिक ज्ञान से भरी जिन रहस्यवादी कथाओं के विश्लेषण का आनंद लेते हैं, वे अधिकांशतः ब्राह्मणों ने ही बनाई हैं। इन्हें आजतक सुरक्षित भी इन्होंने ही रखा है। अगर ब्राह्मण हमलावरों के आगे झुक जाते तो न तो हिंदु धर्म का नामोनिशान रहता और न ही इस धर्म के रहस्यमयी ग्रंथों का। क्षत्रिय भी किसके लिए लड़ते, अगर ब्राह्मण ही डर के मारे धर्म बदल देते। किसी पर मनगढंत इल्जाम लगाना आसान है, पर अपने अहंकार को नीचे रखकर सच्ची प्रशंसा करना मुश्किल। फिर कहते हैं कि ब्राह्मण विदेशों से यहाँ आकर बसे। एक तो इसके स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं, हमला करके आने के तो बिल्कुल भी नहीं, और अगर मान लो कि वे आए ही थे, तो यहाँ प्रेम से घुलमिलकर यहाँ की सरजमीं के सबसे बड़े रखवाले और हितैषी सिद्ध हुए। इसमें बुरा क्या है। हाँ, यह जरूर है कि जिस कुंडलिनी योग के आधार पर बने शास्त्रों और उनकी परम्पराओं का वे निर्वहन करते हैं, उसे वे समझें, प्रोत्साहित करें और हठधर्मिता छोड़कर उसके खिलाफ जाने से बचें।

विश्व के सभी धर्म और सम्प्रदाय कुंडलिनी योग पर ही आधारित हैं

शिवपुराण में भगवान शिव कहते हैं कि वे विभिन्न युगों में विभिन्न योगियों का अवतार लेकर उन-उन युगों के वेदव्यासों की वेद-पुराणों की रचना में सहायता करते हैं। वे लगभग 5-6 पृष्ठ के दो अध्यायों में यही वर्णन करते हैं कि किस युग में कौन वेद व्यास हुए, उन्होंने किस योगी के रूप में अवतार लेकर उनकी सहायता की और उनके कौन-कौन से शिष्य हुए। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ध्यान योग माने कुंडलिनी योग ही सनातन धर्म की रीढ़ है। मुझे तो अन्य सारे धर्म सबसे प्राचीन सनातन धर्म की नकल करते हुए जैसे ही लगते हैं। इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि सभी धर्म योग पर ही आधारित हैं, और योग को सरल, लोकप्रिय व व्यावहारिक बनाने का काम करते हैं। जब सबसे योग ही हासिल होता है, तो क्यों न सीधे योग ही किया जाए। अन्य धर्म भी यदि साथ में चलते रहे, तो भी कोई बुराई नहीं है, बल्कि योग के लिए फायदेमंद ही है।

ध्यान ही सबकुछ है

साथ में महादेव शिव कहते हैं कि ध्यान के बिना कुछ भी संभव नहीं है। वे कहते हैं कि केवल ध्यान से ही मोक्ष मिल सकता है, यदि ध्यान न किया तो सारे शास्त्र और वेदपुराण निष्फल हैं।

नए धर्म व नए योग स्टाइल बदलते दौर के साथ अध्यात्म को ढालने के प्रयास से पैदा होते रहते हैं

जमाने के अनुसार सुधार धर्म में भी होते रहने चाहिए। मतलब सुधार का मौका मिलता रहना चाहिए, यह जनता पर निर्भर करता है कि सुधार को स्वीकार करती है या नहीं। हालांकि इसके साथ षड्यंत्र से भी बचना जरूरी होगा, क्योंकि कई लोग दुष्प्रचार आदि तिकड़में लगाकर किसी घटिया सी रचना को भी बहुत मशहूर कर देते हैं। इसके लिए कोई निष्पक्ष संस्था होनी चाहिए जो रचनाओं की सही समीक्षा करके जनता को अवगत करवाती रहे। कट्टर बनकर यदि सुधार का मौका ही नहीं दोगे, तो धर्म जमाने के साथ कंधा से कंधा मिला कर कैसे चल पाएगा। सुधार का मतलब यह नहीं है कि पुरानी रचनाओं को नष्ट किया जाए। सम्भवतः इसी डर से सुधार नहीं होने देते कि इससे पुरानी रचना नष्ट हो जाएगी। पर यह सोच मिथ्या और भ्रमपूर्ण है। नए सुधारों से दरअसल पुरानी रचनाओं को बल मिलता है क्योंकि इनसे वे बाप का दर्जा हासिल करती हैं। आइंस्टीन के गुरुत्वाकर्षण के नए सिद्धांत से न्यूटन का पुराना सिद्धांत नष्ट तो नहीं हुआ। गुरुत्वाकर्षण तो वही है, बस उसको समझने के दो अलगलग तरीके हैं। इसी तरह ध्यान व अद्वैत को अध्यात्म की मूल विषयवस्तु मान लो। इसको प्राप्त कराने के लिए ही विभिन्न पुराण, मंत्र व पूजा पद्धतियाँ बनी हैं। हो सकता है कि इनमें सुधार कर के जमाने के अनुसार नई रचनाएं बन जाएं, जो इनसे भी ज्यादा प्रभावशाली हों, और ज्यादा लोगों के द्वारा स्वीकार्य हों। शरीरविज्ञान दर्शन भी एक ऐसा ही छोटा सा प्रयास है, हालांकि उसमें भी विकास की गुंजाईश है। मेरा व्यक्तिगत अनुभवरूपी शोध इसके साथ जुड़ा है। मतलब यह ऐसा दर्शन नहीं कि मन में आया और बना दिया। जब मुझे इसकी मदद से जागृति का अनुभव हुआ, तभी इस पर प्रमाणिकता की मुहर लगी। यह अलग बात है कि साथ में उस सनातन धर्म वाली सांस्कृतिक जीवनचर्या का भी योगदान रहा होगा, जिसमें मैं बचपन से पला-बढ़ा हूँ। पर इतना जरूर लगता है कि कम से कम पचास प्रतिशत योगदान शरीरविज्ञान दर्शन का रहा ही होगा। अब आम जीवन में इतना शुद्ध शोध तो कहाँ हो सकता है कि अन्य सभी सहकारी कारणों को ठुकरा कर केवल एक ही कारण के असर को परखा जाए। दरअसल एक मेरे जैसे आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि ऐसे सुधारों और विकास के लिए विस्तृत शोध किया जाए। जैसे ज्ञानविज्ञान के अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ व अनुभवशाली शोध-वैज्ञानिकों की सेवा ली जाती है, वैसी ही अध्यात्म के क्षेत्र में भी ली जा सकती है। इसमें बुरा क्या है। पर समस्या यह है कि समर्पित शोधार्थी से ज्यादा पार्ट टाइम या हॉबी शोधार्थी ज्यादा अच्छा काम कर सकते हैं। मतलब कि अध्यात्म रोजाना के व्यवहार से ज्यादा जुड़ा होता है। एकाकीपन के शोध से व्यावहारिक नतीजे नहीं निकलते। यह भी समस्या है कि शोध के लिए जागृत व्यक्ति कहाँ से लाए। परीक्षा लेने वाले भी जागृत ही चाहिए। जागृत व्यक्ति को ही असली लक्ष्य का पता होता है। जिसको लक्ष्य की ही पहचान नहीं है, वह उसके लिए शोध कैसे करेगा। आज तक कोई मशीन नहीं बनी जो किसी की जागृति का पता लगा सके। अध्ययन के बल पर कुछ टोटके तो कोई भी ईजाद कर सकता है, पर ज्यादा असली व प्रामाणिक तो जागृत व्यक्ति का शोध ही माना जाएगा।

पुराण व अन्य धर्म संबंधित लौकिक साहित्य शहद के साथ मिश्रित की हुई कड़वी दवाई की तरह काम करते हैं

पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि कैसे राजा भागीरथ गंगा नदी के प्रवाह में आई रुकावटों को हटा रहा था। हमारे दादा उस बात को शास्त्रों का हवाला देते हुए ऐसे कहा करते थे कि भागीरथ हाथ में कुदाली को लेकर गंगा के आगे-आगे चलता रहा और उसके जलप्रवाह के लिए जमीन खोद कर रास्ता बनाता रहा, जैसे कोई किसान सिंचाई की कूहल के लिए रास्ता मतलब चैनल बनाता है। मत भूलो, शरीर में शक्ति संचालन मार्ग को भी अंग्रेजी में चैनल ही कहते हैं। शब्दावली में भी कितनी समानता है। वे खुद एक छोटे से किसान भी थे। वैसे तो आलोचक विज्ञानवादी को यह बात अजीब लग सकती है, पर इसमें एक गहरा मनोवैज्ञानिक सबक छिपा हुआ है। यह बात मनोरंजक और हौसला बढ़ाने वाली है। साथ में यह अध्यात्मवैज्ञानिक रूप से बिल्कुल सत्य भी है, जैसा कि पिछली पोस्ट में दिखाया गया है। बेशक यह बात हमें स्थूल रूप में समझ नहीं आती थी, पर हमारे अवचेतन मन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ती थी। उसी का परिणाम है कि कालांतर में हमारे को खुद ही यह रहस्य अनुभव रूप में समझ आया। पौराणिक ऋषि बहुत बड़े व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक होते थे। वे जानते थे कि अनपढ़ और बाह्यमुखी जनता को सीधे तौर पर गहन आध्यात्मिक तकनीकें नहीं समझाई जा सकतीं, इसीलिए वे उन तकनीकों को व्यावहारिक, रहस्यात्मक और मनोरंजक तरीके से प्रकट करते थे, ताकि वे अवचेतन मन पर गहरा असर डालती रहें, जिससे आदमी धीरेधीरे उनकी तरफ बढ़ता रहे। सहज पके सो मीठा होय। एकदम से पकाया हुआ फल मीठा नहीं होता। ऐसी मिथकीय कथाओं पर लोगों की अटूट आस्था का ही परिणाम है कि वे आज तक समाज में प्रचलित हैं। किसीसे अगर पूछो कि उसे इन कथाओं से क्या लाभ मिला, तो वह पुख्ता तौर पर कुछ नहीं बता पाएगा, पर उन्हें पूजनीय व अवश्य पढ़ने योग्य जरूर कहेगा। कई कथाएं ऋषियों ने जानबूझ कर ऐसी बनाई हैं कि उनका रहस्योद्घाटन नहीं किया जा सकता। अगर सभी कुछ का पता चल गया तो विश्वास करने के लिए बचेगा क्या। ऋषि विश्वास और सस्पेंस की शक्ति को पहचानते थे। होता क्या है कि जब कुछ कथाओं के रहस्य से परदा उठता है, तो अन्य कथाओं की सत्यता पर भी विश्वास हो जाता है। वैसे गैरजरूरी कथाओं को उजागर करना ही नामुमकिन लगता है। जो कथा-रहस्य जितना ज्यादा जरूरी है, उसे उजागर करना उतना ही आसान है। वैसे धर्म के बारे ज्यादा कहने का मुझे बिल्कुल शौक नहीं है, पर कई बारे सीमित रूप में कहना पड़ता है, क्यकि अध्यात्म को धर्म के साथ बहुत पक्के से जोड़ा गया है, और कई बारे इनको अलग करना मुश्किल हो जाता है।आज जब विभिन्न धर्मों के बीच इतना अविश्वास बढ़ गया है, तो यह जरूरी हो गया है कि उनका आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप में वर्णन करके विरोधियों की शंका दूर कर दी जाए।