कुंडलिनी योग से डार्क मैटर डार्क एनर्जी के रूप में व्यवहार करने लगता है

दोस्तों, स्थूल जगत और उसका अभाव दोनों का ही अस्तित्व नहीं है। आदमी दोनों को अस्तित्व प्रदान करता है। जगतभाव पुरुष का अविभाजित अंश है। इसलिए जगतअभाव भी पुरुष का अंश ही सिद्ध हुआ। बेशक भाव की अपेक्षा बहुत छोटा। अगर जगत भाव को हम पुरुष का अविभाजित अंश कहते हैं तो अभाव को प्रकृति का अविभाजित अंश कहने में कोई समस्या नहीं है। ज्ञान और साधना से आदमी पूर्ण पुरुष तो बन सकता है पर पूर्ण प्रकृति कैसे बनेगा। पूर्ण पुरुष का अस्तित्व है पर पूर्ण प्रकृति का तो अस्तित्व ही नहीं है। वैसे अस्तित्व तो संपूर्ण जगतभाव का भी नहीं है। मतलब आंशिक जगतभाव का अस्तित्व ही संभव है। यह इसलिए क्योंकि जगतभाव को अस्तित्व जीवों के अनुभव से मिलता है। और ऐसा कोई जीव नहीं है जो संपूर्ण जगतभाव को एक साथ अनुभव कर सके। सृष्टि के सभी जीव मिलकर भी ऐसा नहीं कर सकते। इसी तरह संपूर्ण जगतअभाव अर्थात प्रकृति का भी अस्तित्व संभव नहीं है। मतलब यह है कि बेशक समग्र जगतभाव का और समस्त जगतअभाव का भौतिक अस्तित्व है पर उनमें आत्मा नहीं है, और उन्हें कोई जीवात्मा भी अनुभव नहीं करता।

क्योंकि पुरुष तो कभी नष्ट नहीं होता इसलिए उसका अभाव नहीं होता। मतलब पुरुष की छाया बन ही नहीं सकती। छाया वास्तव में अभाव को ही कहते हैं। पेड़ की छाया वस्तुतः पेड़ की नहीं होती बल्कि प्रकाश किरणों की होती है। जिस क्षेत्र पर प्रकाश किरणों का अभाव हो गया, उस क्षेत्र में पेड़ की छाया पड़ी हुई मानी जाती है। इसी तरह से जगत से जो छाया बनती है, वह पुरुष के अभाव से बनती है। मतलब जगत एक पेड़ की तरह है, और पुरुष सूर्य की तरह है। इसी तरह समग्र सृष्टि की छाया ही मूल प्रकृति है, पुरुष का इससे कुछ लेना देना नहीं। समग्र जगत के अभाव को मूल प्रकृति कहेंगे। क्योंकि समग्र जगत भी पुरुष का ही अविभाजित अंश है, इसलिए व्यवहार में मूल प्रकृति को पुरुष की छाया कहा जाता है। लघु मतलब व्यष्टि या व्यक्तिगत जगत के द्वारा पैदा किए गए छायानुमा अभाव को लघु या व्यष्टि या व्यक्तिगत प्रकृति कहेंगे। मतलब व्यष्टि जगत को ही अनुभवात्मक सत्ता मिलती है, समष्टि जगत को नहीं। हालांकि भौतिक अस्तित्व दोनों का होता है।

प्रकृति सीधी पुरुष तक नहीं जा सकती। उसे पुरुष अंशों से होकर ही क्रमवार ऊपर चढ़ना पड़ता है। इसलिए यह पुरुष के अविभाजित अंश को धीरे-धीरे बढ़ाती रहती है। सबसे छोटे जीव जैसे कि जीवाणु आदि में जरा भी पुरुष अंश नहीं होता। पर यह पुरुष अंश पैदा करने वाली शरीररूपी सीढ़ी का पहला पायदान होता है। फिर मेंढक, मछली आदि जीवो में प्रकृति बनी जीवात्मा को पुरुष अंश महसूस होने लगता है। कुत्ता, बंदर जैसे प्राणियों में यह अंश काफी बढ़ जाता है। आदमी में यह अंश सर्वोच्च स्तर पर होता है। इस स्तर से प्रकृति कुंडलिनी योग से सीधे ही पुरुष तक छलांग लगा सकती है। मतलब मनुष्य शरीर से ज्यादा विकसित शरीर की जरूरत नहीं पड़ती। महामानव आदि तो मिथकीय परिकल्पना ही लगती हैं इस मामले में, जिनका कोई विशेष उद्देश्य नहीं दिखता।

हम स्थूल जगत को कभी सीधे तौर पर अनुभव नहीं कर सकते, न इसके भाव को और न इसके अभाव को। स्थूल जगत का जो सूक्ष्म चित्र हमारी आत्मा पर बनता है, हम उसे ही महसूस कर सकते हैं। स्थूल जगत के भाव का चित्र तो हमें पहाड़, नदी, सूर्य आदि विविध पदार्थों के रूप में महसूस होता है। इन पदार्थों के अभाव का चित्र हमें अंधेरे के रूप में महसूस होता है। वह तो अंधेरे का सूक्ष्म रूप है। पर उसका स्थूल रूप भी बाहर मौजूद होता है, उसी तरह जैसे आत्मा में अनुभव हो रहे सूक्ष्म जगत का स्थूल रूप बाहर के स्थूल जगत के रूप में होता है। उस स्थूल अंधेरे को ही शायद डार्क एनर्जी, डार्क मैटर आदि कहते हैं।

भौतिक शरीर की तरह भौतिक जगत की भी एक जीवन सीमा है। जैसे शरीर उस सीमा को छू लेने पर मर जाता है, उसी तरह जगत भी अपनी आयु पूरी होने पर नष्ट हो जाता है। स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर रूपी व्यष्टि प्रकृति में समा जाता है। स्थूल जगत डार्क एनर्जी एंड डार्क मैटर जैसे नाम वाली समष्टि प्रकृति अर्थात मूल प्रकृति में समा जाता है। उस सूक्ष्म शरीर से नया शरीर फिर से जन्म ले लेता है। उसी तरह मूल प्रकृति से भी नया जगत पैदा हो जाता है। यह सिलसिला चक्रवत चलता रहता है।

कई लोग बोलते हैं कि इस जगत की उत्पत्ति परमात्मा से हुई है। वास्तव में पुरुष से कुछ पैदा नहीं होता। वह बिल्कुल असंग है। वह आश्चर्यमय और अद्वितीय है। हां, उसकी निकटता से जगत को अनुभवात्मक सत्ता मिलती है। जगत तो पुरुष की तरह ही अनादि, अनंत है। यहां यह अंतर है कि पुरुष हमेशा पूर्ण और एकसमान रहता है, जबकि जगत बदलता रहता है। जगत कभी भाव रूप में होता है तो कभी अभाव रुप में। इसके भाव रूप में अभिव्यक्ति के भी अनगिनत स्तर हैं और अभाव रुप में अभियुक्ति के भी अनगिनत स्तर हैं। इसी जगत को प्रकृति कहते हैं। जब इसे पुरुष की समीपता मिलती है, तब यह अनुभव के दायरे में आता है, अन्यथा बिना अनुभव के ही चलायमान रहता है, जैसे कि कोई नर्तकी अंधेरे में नाच रही हो। इसीलिए कहते हैं कि अनुभव में आने वाला समस्त संसार प्रकृति और पुरुष के सहयोग से बना है।

इसी तरह से लोग कहते हैं कि बच्चे परमात्मा से आते हैं इसलिए परमात्मा का साक्षात रुप है। आदमी के जन्म के साथ ही वह अपने मस्तिष्क में जगत के चित्र महसूस करने लगता है। मस्तिष्क में वे तभी महसूस हो सकते हैं, अगर वे बच्चे के सूक्ष्म शरीर में पहले से मौजूद हों, अन्यथा वे चित्र बनेंगे तो जरूर पर किसी को महसूस ही नहीं होंगे। बोलने का मतलब है कि अंधेरा रूपी सूक्ष्मशरीर पर ही वे प्रकाशमान चित्र बन सकते हैं। अगर बच्चों की आत्मा अंधेरे सूक्ष्म शरीर की बजाय प्रकाशमान पुरुष के रूप में हो तब उस पर प्रकाशमान चित्र कैसे बन सकते हैं। प्रकाशमान दीवार पर प्रकाश से रेखाचित्र तो नहीं बन सकते। पहले दीवार को काला या अंधेरानुमा करना होगा। हां यह जरूर है कि बच्चे परमात्मा के सबसे निकट होते हैं, क्योंकि उनमें अहंकार भाव बहुत कम होता है।

प्रकृति व्यक्त और अव्यक्त होती रहती है। यह शाश्वत चक्र है। इसमें पुरुष का कोई लेना देना नहीं है। वह स्थिर, शाश्वत और चेतन तत्व है। उसकी समीपता से प्रकृति को ऐसे ही शक्ति और गति मिलती रहती है, जैसे चुंबक की समीपता से लोहे को। अव्यक्त प्रकृति को डार्क मैटर कह सकते हैं। डार्क मैटर में सिर्फ गुरुत्व होता है, अन्य कुछ नहीं। मतलब डार्क मैटर का अस्तित्व है भी और नहीं भी है। इसलिए “नहीं है”, क्योंकि इसमें अस्तित्ववान वस्तु की कोई विशेषता नहीं है। इसे न देख सकते हैं, न सुन सकते हैं, न छू सकते हैं। यह इंद्रियों की पहुंच में नहीं है। यह “है” इसलिए है, क्योंकि इसमें गुरुत्व बल है। गुरुत्व बल भी सत्ता का या होने का ही सामान्य या छोटा सा लक्षण है। तभी तो कहते हैं कि फलां की बातों में वजन या गुरुत्व है। मतलब फलां की बातों का व्यावहारिक अस्तित्व है। डार्क एनर्जी भी मूल प्रकृति हो सकती है। यह भी डार्क मैटर और मूल प्रकृति की तरह अनिर्वचनीय ही है। यह “नहीं है”, क्योंकि इसमें भौतिक वस्तु का कोई भी लक्षण नहीं है। यह “है”, क्योंकि यह ऊर्जा के जैसा प्रभाव पैदा करती है। इसलिए हो सकता है कि दोनों एक ही चीज हों। किसी चीज के अस्तित्व के साथ उसका प्रभाव भी जुड़ा होता है। प्रभाव के बिना अस्तित्व अधूरा है। यदि एक कठोर चट्टान चोट न पहुंचा सके, तो उस चट्टान के होने का कोई मतलब नहीं रह जाता। डार्क मेटर उसी कठोर चट्टान की तरह है, और डार्क एनर्जी उसके द्वारा लगाई गई चोट है, जो ब्रह्मांड को बाहर की ओर धकेल रही है। जैसे नदी में पड़ी चट्टान किसी बहते आदमी को रोक भी सकती है, और किसी आदमी को अपने साथ बहा भी सकती है, उसी तरह मूल प्रकृति डार्क मैटर की तरह व्यवहार करके सभी अंतरिक्षीय पिंडों को गुरुत्व बल से आपस में बांध भी सकती है, और डार्क एनर्जी की तरह व्यवहार करके उन्हें एक दूसरे से दूर भी धकेल सकती है। आम आदमी के मन का अंधेरा डार्क मैटर जैसा होता है, जो उसके जगत को अपने में खींच कर और बांध कर रखता है। पर कुंडलिनी योगी के मन का अंधेरा डार्क एनर्जी की तरह व्यवहार करता है, जो उसके जगत को अपने से बाहर धकेलने की कोशिश करता रहता है। वह जगत फिर बाहर निकल कर उसके मन में पुनः उभरता रहता है, और प्रकाशमान आत्मा में विलीन होता रहता है। एक संतुलित व्यक्ति में डार्क एनर्जी और डार्क मैटर एक संतुलित अनुपात में रहते हैं, वैसे ही जैसे बाहर के भौतिक ब्रह्मांड में होते हैं।

इस लिहाज से तो आदमी के मस्तिष्क की सृष्टि भी व्यक्त और अव्यक्त के बीच झूलने वाली होनी चाहिए, अनादि काल से। मतलब आदमी का बंधन अनादि होना चाहिए। इसका विश्लेषण हम अगली पोस्ट में करेंगे।

कुंडलिनी जागरण सांख्य दर्शन का आधारभूत सिद्धांत प्रस्तुत करता है

दोस्तों पुरुष से ही आभासी प्रकृति को अनुभवात्मक अस्तित्व मिला। अनुभवात्मक मस्तिष्क बनने से पहले प्रकृति छाया की तरह आभासी होते हुए भी सृष्टि को चला रही थी। मतलब उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं था, पेड़ की छाया की तरह। जब पहला अनुभवात्मक मस्तिष्क बना तो उसके नाड़ी स्पंदनों से पुरुष के अंदर तरंगें पैदा हुई। वह पुलिस को महसूस हुई जिससे पुरुष के अपने अनंत प्रकाशरूप आत्मस्वरूप में अंधेरा छा गया। मतलब पुरुष प्रकृति बन गया। हालांकि जो मस्तिष्क में विचाररूपी नाड़ी स्पंदन उभरते रहे, वे उसे पुरुष की तरह प्रकाशमान और चेतन महसूस होते रहे। मतलब प्रकृतिपुरुष युग्म की उत्पत्ति हुई। यह ऐसे ही है जैसे एक पेड़ तूफान से टूट कर अपनी छांव के ऊपर गिर गया और छांव की तरह अस्तित्वहीन हो गया। पहले, तूफान से पेड़ के हिलने से उसकी छाया पर उसके रेखाचित्र बन और मिट रहे थे। पर उस पेड़ के ठूंठ से नई कोंपल निकलने से पुनः नया पेड़ बन गया। अब उस नए पेड़ के छायाचित्र उस पुराने गिरे हुए पेड़ पर बनने लगे। मतलब पेड़ की छाया भी अस्तित्व में आ गई थी और उस पर पड़ने वाले पेड़ के रेखाचित्र भी उसे असली पेड़ की तरह महसूस होने लगे। पुरुष के साथ भी ऐसा ही हुआ। बेशक प्रकाशरूप पुरुष अपनी तरंगों को महसूस करके अंधकार रूप प्रकृति बन गया। पर एक मूल पुरुष भी था जो कभी भी अपने सिवाय मतलब अपनी शुद्ध आत्मा के सिवाय कुछ भी महसूस नहीं करता, अपने अंदर बनने वाली अपनी तरंगों को भी नहीं। इसलिए वह कभी भी आत्मच्युत होकर प्रकृति नहीं बन सकता। उसे शास्त्रोक्त पुरुषोत्तम कह सकते हैं। पुरुष आसमान की तरह ही है। एक आसमान से चाहे जितने मर्जी आसमान बना लो।

उपरोक्त तथ्य का प्रमाण कुंडलिनी जागरण से मिलता है। कुंडलिनी जागरण के दौरान आत्मा पूर्ण प्रकाशरूप महसूस होती है, और उसमें समस्त सृष्टि तरंगों के रूप में महसूस होती है। पर जैसे ही आदमी उन सृष्टिरूपी तरंगों के प्रति आसक्त होने लगता है, वैसे ही आत्मा का अनंत प्रकाश ओझल हो जाता है। मतलब पुरुष की छाया अस्तित्व में आ जाती है। दरअसल भौतिक अस्तित्त्व में तो वह पहले भी थी, इससे तो अनुभवात्मक अर्थात आत्मिक सत्ता मिली। मतलब अब छाया अपने को महसूस करने लगी कि वह है। पहले तो वह मिट्टी पत्थर की तरह थी जैसे वे भी अपने को आत्मिक रूप में महसूस नहीं करते कि वे हैं, पर वे भौतिक रूप से होते हैं। आदमी फिर से पहले की तरह अपनी आत्मा को अंधकारमय प्रकृति के रूप में और उसमें उमड़ रहे मानसिक विचारों को प्रकाशमान पुरुषतरंगों के रूप में महसूस करने लगता है। पुरुषतरंगें तभी बन रही हैं न जब बैकग्राउंड में एक पुरुष अर्थात पुरषोत्तम बैठा है। नहीं तो तरंगें कहां से आएंगी? इस तरह से कई बार तो मुझे कुंडलिनी जागरण ही सांख्य दर्शन का आधारभूत सिद्धांत लगता है।

कुंडलिनी जागरण से ही बीज भरा पूरा वृक्ष बनता है

दोस्तो, सृष्टि के रहस्य को सिर्फ सांख्य दर्शन ने ही सबसे अच्छी तरह से समझाया है। प्रकृतिपुरुष युग्म के बारे में शायद शास्त्रों का यह मतलब है कि अगर शुरु में प्रकृति ने भी सृष्टि बनाई तो भी प्रकृतिपुरुष युग्म ने ही बनाई, क्योंकि पुरुष से मिलन की संभावना से प्रेरित होकर ही प्रकृति ने सृष्टि बनाई। जो पुराने समय में समय की कमी के कारण बुद्ध ने जिज्ञासु शिष्य को नहीं समझाया था कि जीवनमरण रूपी रोग की शुरुआत कहां से हुई उसे सांख्य दर्शन से समझा जा सकता है। आदमी हमेशा से भी इस बंधन रोग से ग्रस्त है और नहीं भी है। जब पहला अनुभवात्मक मस्तिष्क बना तभी बंधन की शुरुआत हुई। मतलब तभी जीवात्मा अस्तित्व में आई। पर जिस प्रकृति के ऊपर पुरुष से प्रकाशमय रेखाचित्र बना, वह प्रकृति तो अनादि है। इसका मतलब है कि जीवात्मा अनादिकाल से प्रकृति के रूप में थी।

मतलब जीवात्मा अनादिकाल से बंधन में था पर ऐसा भी नहीं है, क्योंकि प्रकृति छाया की तरह है जिसका अस्तित्व ही नहीं है। जो चीज अनादि है उसका अंत हो ही नहीं सकता। शास्त्रों में कई जगह लिखी यह बात मुझे समझ नहीं आती जिसमें कहा गया है कि बंधन अनादि है, पर उसका अंत हो सकता है। ऐसा होना असंभव है। अंत उसीका हो सकता है जिसकी कभी शुरुआत हुई हो। शायद वे ठीक कह रहे हैं पर हम गलत समझते हैं। ऐसा कहने का उनका एक प्रयोजन बंधन से डराना और उसे कमजोर न समझने की भूल न करना है। दूसरा प्रयोजन यह बताना है कि पुरुष कभी बंधन में नहीं पड़ सकता। अगर ऐसा होता तो लोग बंधन को मिटाने के लिए ज्यादा प्रयास न करते क्योंकि उन्हें फिर बंधन में पड़ने का डर बना रहता। शायद उनका बंधन अनादि कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति अनादि है, यह नहीं कि जीवात्मा अनादि है। शायद उनका कहने का यह मतलब है कि यह बंधन परंपरा अनादि है और एक आदमी के मुक्त होने से खत्म नहीं हो जाती। साथ में परमात्मा इतना निर्दयी नहीं हो सकता कि उसने सभी जीवों को अनादिकाल से बंधन में जकड़ कर रखा हो। अंतिम प्रयोजन यह लगता है कि लोग गूढ़ दर्शन के झमेले से बचकर सिर्फ साधना पर ध्यान दे। वैसे कई जगह शास्त्रों में ऐसा भी कहा गया है कि फलां आदमी एक ही मनुष्य जन्म में मुक्त हो गया या हो जाता है, फलां को दस जन्म लेने पड़े, फलां को सौ आदि। इस्का यह मतलब हुआ कि बंधन की कभी शुरुआत हुई और वह अनादि नहीं है।

दरअसल प्रकृति का अस्तित्व है भी और नहीं भी। इसीलिए इसे शास्त्रों में अनिर्वचनीय कहा है। पेड़ की छाया भी अनिर्वचनीय ही होती है। वह होती है इसीलिए दिखती है, पर असल में होती भी नहीं।मतलब जीव या आदमी का बंधन अनादि भी है और अनादि नहीं भी है। सैद्धांतिक रूप से तो यह अनादि है पर अनुभवात्मक रूप से इसकी शुरुआत हुई थी।  जब जीवात्मा बन ही गया तब इसका विलय पुरुष में ही संभव है, नहीं तो वह अस्तित्वहीन होकर भी सुख-दुख अनुभव करता हुआ भटकता ही रहेगा। यह आश्चर्य ही है कि जीवात्मा का अस्तित्व न होते हुए भी वह कैसे बन जाता है? यह प्रकृतिपुरुष का ही खेल है। जीवात्मा एक भ्रममात्र ही है। मतलब जीवात्मा की उत्पत्ति नहीं होती बल्कि भ्रम की उत्पत्ति होती है। भ्रम खत्म तो बंधन खत्म।

प्रकृति भूमि है तो पुरुष पेड़ है। जब पेड़ का बीज जमीन पर गिरता है तो वह बढ़ने लगता है और बढ़ते बढ़ते पेड़ ही बन जाता है। जैसे जैसे पेड़ बढ़ता है वैसे वैसे भूमि दिखनी कम होती रहती है, और पेड़ दिखना बढ़ता रहता है। अंत में पेड़ इतना फैल जाता है कि उसके पत्तों के झुरमुटों के शिखर से भूमि बिल्कुल नहीं दिखती। ऐसा लगता है कि भूमि और बीज दोनों वृक्ष बन गए हैं। पर दरअसल बीज ही वृक्ष बना होता है। भूमि तो पहले के जैसी ही होती है। एक बीज के पेड़ बनने से भूमि नष्ट नहीं हो जाती, पर दूसरे बीजों को भी पेड़ बनाने के लिए वैसी ही बनी रहती है। इसी तरह प्रकृति भी है जो न होते हुए भी आभासी भूमि की तरह है।

भूमि सबसे नीचे थी। वह आकाश की ऊंचाइयों को छूना चाहती थी। आकाश न सही, पेड़ की ऊंचाई तक ही सही। पर सीधे तौर पर वह ऐसा नहीं कर सकती थी। इसलिए उसने पेड़ की मदद ली। पेड़ के बीज को उसने बढ़ाया और फैलाया और उसे ऊंचा उठा दिया। भूमि बेशक खुद ऊंची नहीं उठ सकी पर उसे पेड़ों को ऊंचा उठाने का श्रेय मिला, जो उसे तसल्ली देने के लिए काफी था। इसी तरह पुरुष की छाया मतलब प्रकृति भी पुरुष जैसा महान बनना चाहती थी। वह सीधे तौर पर ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि पेड़ की छाया कभी पेड़ नहीं बन सकती और न पेड़ से मिल ही सकती है। इसलिए उसने पुरुष के बीज की मदद ली। उसने पुरुषबीज मतलब जीवात्मा को बढ़ाना शुरु किया और उसे कुंडलिनी जागरण करा के पुरुष जितना ऊंचा उठा दिया। प्रकृति बेशक खुद पुरुष नहीं बन सकी, पर उसे जीवात्माओं को ऊंचा उठाने का श्रेय मिला, जो उसे तसल्ली देने के लिए काफी था। मां भी लगभग ऐसी ही होती है, इसीलिए प्रकृति और धरती को मां भी कहा गया है।

कुंडलिनी शक्ति से मूल प्रकृति में स्थित ध्यान चित्र जागृत होकर पुरुष बन जाता है

दोस्तों, यह बहुत छोटी पर बहुत सारगर्भित पोस्ट है। मूलाधार क्या मूल प्रकृति को ही कहा गया है। यह विचार मेरे मन में आया था। क्यों न इसका विश्लेषण कर लिया जाए। आदमी का आधार है व्यष्टि प्रकृति अर्थात जीवात्मा। यह सभी जीवों के लिए अलग-अलग है। आधार पर इमारत की गुणवत्ता, आकार, ऊंचाई आदि सभी निर्भर करते हैं। मतलब आधार में भावी इमारत की सारी सूचनाएं दर्ज रहती हैं। इसी तरह से आदमी की जीवात्मा में आदमी की सारी भावी सूचना दर्ज होती है, जैसे कि उसके जन्म, गुण, कर्म, फल आदि।

आधार तो हर एक जीव के लिए अलग और विशेष है, पर मूलाधार तो सबका एक ही है। आधार को प्रकृति का और मूल आधार को मूल प्रकृति का पर्यायवाची शब्द समझना चाहिए। कहते भी हैं कि अमुक आदमी की प्रकृति कैसी है। अर्थात स्वभाव कैसा है? मूलाधार से ही सभी आधार बनते हैं। आधार पहले मूलाधार में बदलना चाहिए। तभी कुंडलिनी योग की असली शुरुआत होगी। कर्म योग से आदमी की आत्मा में दबी हुई सूचनाएं अनासक्ति से उभर कर नष्ट हो जाएंगी। जब आत्मा का बक्सा लगभग खाली हो जाएगा तब वह मूलाधार बनेगा। मतलब उसमें सांसारिक सूचनाएं नहीं दबी होंगी। यह पुरुष की तरह ही होता है। सिर्फ यही अंतर है कि यह पुरुष के विपरीत अंधेरनुमा होगा। मतलब यह पुरुष की आभासी परछाई की तरह ही होगा। जब आदमी के अर्थात आदमी की जीवात्मा के मूल आधार अवस्था में स्थित होने पर गुरु आदि रूप के मानसिक चित्र का ध्यान किया जाता है, तब ध्यान आसानी से लगता है। यह इसलिए क्योंकि आत्मा में कोई दूसरा दबा हुआ कचरा होता ही नहीं जो ध्यान की शक्ति को सोखकर शक्तिशाली हो सके या अभिव्यक्त हो सके। जब तांत्रिक कुंडलिनी योग से उस ध्यान चित्र को कुंडलिनी शक्ति भी दी जाती है, तब तो है आग के शोले की तरह भड़कने लगता है। इससे वह जल्दी ही जागृत हो जाता है।

कुंडलिनी योग प्रकृति को पुरुष की तरफ धकेलता है

दोस्तों! मिथक कल्पनाओं का आकर्षण हमेशा से रहा है। यह मानव मनोविज्ञान है जो मिथकों से बड़ा प्रभावित होता है। पुराने युग में भी विद्वान लोगों को छोड़कर आम लोग सीधे तौर पर दर्शन को ज्यादा महत्व नहीं देते थे। दर्शन उन्हें उबाऊ लगते थे। इसीलिए ऋषियों ने सत्य दर्शन पर आधारित मिथक कथाओं की रचना की जिनसे वेद पुराण भरे पड़े हैं। आज भी लोग टाइम ट्रेवल, स्पेस ट्रैवल आदि वैज्ञानिक सिद्धांतों से जुड़ी मिथक कथाओं के दीवाने हैं। इनसे मीडिया भरा पड़ा है। युग बदलता है पर मानव मनोविज्ञान वही रहता है। इसलिए सत्य को जगत में फैलाने के लिए दो किस्म के लोगों का परस्पर सहयोग अपेक्षित होता है। एक वह जो प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर सिद्धांत को प्रस्तुत करता है, और दूसरा वह जो उस पर आधारित मिथक कथाएं बनाता है। हो सकता है कि इस वेबसाइट के शास्त्र आधारित अध्यात्मवैज्ञानिक सिद्धांत भी कभी युगानुरूप मिथक कथाओं के रूप में उभरें।

आजकल के सुविधापूर्ण और वैज्ञानिक युग में लोगों के पास किसी भी विषय को विस्तार से समझने के लिए पर्याप्त समय और बल उपलब्ध है। पहले ऐसा नहीं था। एक बार महात्मा बुद्ध के एक शिष्य ने उनसे पूछा कि यह सांसारिक जन्ममरण रूपी दुख शुरु कैसे होता है। तो महात्मा बुद्ध ने कहा कि इसको जानने में समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। बस इतना समझो कि इस दुख का अंत किया जा सकता है और उसके लिए प्रयास करो। आजकल लोगों के पास ब्लैकहोल और टाइम मशीन को समझने के लिए तो पर्याप्त समय है, पर उस आध्यात्मिक दर्शन को समझने के लिए नहीं है, जो मानव जीवन के मुख्य लक्ष्य से जुड़ा हुआ है। यह एक विडंबना ही है।

मित्रो, हम जिस चर्चा को छेड़े हुए हैं, वह पूरी तरह से शास्त्र सम्मत है। इसलिए यह प्रामाणिक भी मानी जा सकती है। यह कोई ख्याली पुलाव नहीं है। वैदिक सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति और पुरुष दो अजर अमर और सर्वव्यापी तत्त्व हैं। शुद्ध पुरुष तो कभी सृष्टि को चला ही नहीं सकता क्योंकि वह तो पूर्ण परमात्मा है। उसकी संसार में प्रवृत्ति ही नहीं होती। लोक में भी अक्सर देखा जाता है कि जो संत पूर्ण समाधि में स्थित होता है, उसकी संसार में कोई प्रवृत्ति नहीं होती। बेशक उसमें प्रेरक शक्ति होती है। लोग उससे प्रेरणा लेकर या कहो उसकी तरह पूर्ण बनने के लिए बड़े-बड़े और अच्छे-अच्छे सांसारिक काम और आचरण करते हैं। परमात्मा के मामले में भी ऐसा ही होता है। उससे प्रकृति को विकास करने की अर्थात उसके जैसा पूर्ण बनने की प्रेरणा मिलती रहती है। इसी से सृष्टि के सभी काम चलायमान रहते हैं। काम करने वाली तो प्रकृति होती है। सृष्टि से काम कराने वाली प्रकृति है, तो शरीर से काम करवाने वाला अहंकार या जीवात्मा है।

लोग बोलते हैं कि सृष्टि के सभी काम अंधेरे में हो रहे हैं, मतलब उन्हें करने वाली कोई प्रकाशमय चेतना शक्ति नहीं है। बात सही भी है और गलत भी। देखा जाए तो वही अंधेरा तो काम करवा रहा है। पर इसमें प्रकाश का अप्रत्यक्ष योगदान भी होता है। अंधेरा किसके लिए काम करवा रहा है। अंधेरा प्रकाश के लिए काम करवा रहा है। प्रकृति पुरुष के लिए काम करवा रही है। पुरुष ही प्रकृति को खींच रहा है। अहंकार निरंकार के लिए काम करवा रहा है। जीवात्मा परमात्मा के लिए काम करवा रहा है। परमात्मा ही जीवात्मा को खींच रहा है। जीवात्मा तो कभी परमात्मा बन जाएगा। तो क्या प्रकृति भी कभी पुरुष बनेगी। अगर एक जीवात्मा परमात्मा बनेगा तो दूसरा जीवात्मा फिर पैदा हो जाएगा। अगर प्रकृति पुरुष बनेगी तो दूसरी प्रकृति कहां से आएगी क्योंकि प्रकृति तो एक ही है। जीवात्मा अनेक हैं। जब नई प्रकृति नहीं बनेगी तो सृष्टि भी थम जाएगी। जीवात्मा भी प्रकृति से ही बनते रहते हैं।

जीवात्मा प्रकृति और पुरुष का मिश्रण है। अगर प्रकृति पुरुष बन गई तो नए जीव भी पैदा नहीं हो पाएंगे, क्योंकि जीवात्मा ही नहीं बनेगी। मतलब प्रकृति कभी पुरुष में नहीं मिलती। या अगर मिलती है तो नई प्रकृति फिर से बन कर तैयार हो जाती है। कुंडलिनी योग तो है ही प्रकृति को पुरुष की तरफ अंतिम और निर्णायक धक्का देने के लिए। पर बनेगी कैसे। इसका हम अगली पोस्ट में विस्तार से विश्लेषण करेंगे।

कुंडलिनी जागरण केवल मनुष्य के सूक्ष्म शरीर से ही संभव है

दोस्तों, अंत में बात हट फिर के सूक्ष्म शरीर पर ही आती है। पिछली चर्चाओं से स्पष्ट है कि जगत सिकुड़ता हुआ अहंकार तक पहुंच जाता है। मतलब पारलौकिक सूक्ष्म शरीर के रूप में अहंकार ही बचता है। बेशक लौकिक सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, मन, प्राण और इंद्रियां भी आती हैं। कई जगह यह केवल अहंकार, बुद्धि और मन से बना बताया गया है। कई जगह इसमें पंच तन्मात्राएं और पंचमहाभूत भी जोड़ दिए गए हैं। लौकिक सूक्ष्म शरीर के लिए तो यह सब ठीक है पर पारलौकिक सूक्ष्म शरीर में तो ये सब नहीं होने चाहिए। उसमें तो सिर्फ अहंकार होना चाहिए। कई जगह इस अहंकार को कारणशरीर के रूप में माना गया है। इसमें कर्म और संस्कार छिपे होते हैं, जो अगले जन्म का निर्धारण करते हैं। मान लो, परलोकिक सूक्ष्मशरीर मन, बुद्धि और अहंकार से बना होता है। पर वह स्थूल शरीर के बिना सोच-विचार कैसे कर सकता है। अगर नहीं कर सकता तो उसमें मन बुद्धि को मानने की क्या जरूरत है। यह एक जटिल विषय है।

चलो हम एक कोशिकीय जीवाणु को लेते हैं। यह सबसे सूक्ष्म जीवित प्राणी है, जिसे नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता। मान लेते हैं कि उसकी आत्मा या उसका अपने आप का स्वरूप एक पारलौकिक सूक्ष्म शरीर है। यह इसलिए क्योंकि उसके इतने छोटे स्थूल शरीर में अनुभव करने वाला मस्तिष्क नहीं हो सकता। वैज्ञानिकों को भी अभी तक इसका कोई सुराग नहीं मिला है। वह जीवाणु आदमी जैसे विकसित मस्तिष्क वाले प्राणी के जैसे ही आम जीवनचर्या के सभी काम करता है। वह चलता है, खाता है, पीता है, शिकार करता है, डरता है, भागता है, संभोग करता है, बच्चे पैदा करता है, लड़ाई झगड़े करता है, दोस्ती दुश्मनी समझता है, और निभाता है, आदि-आदि। सूचि बहुत लंबी है। समझ लो, वह सभी काम करता है। कई जगह तो आदमी से ज्यादा भी करता। इसका मतलब है कि उसमें आत्मा के साथ अहंकार, बुद्धि, मन, प्राण, पंच ज्ञानेंद्रियां, पंच  तन्मात्राएं और पंचमहाभूत सब कुछ हैं। पर यह सब उसको तो महसूस होते नहीं। तो क्या इन सबके होने के लिए इन सब को महसूस करना जरूरी है। बिल्कुल नहीं। मतलब आत्मा खुद सूक्ष्म शरीर की तरह व्यवहार करती है। मान लिया कि जीवात्मा ऐसा व्यवहार करती है। वह इसलिए क्योंकि जीवात्मा अज्ञान के अंधेरे में फंसी होती है। उसने विकास करना होता है। वह विकास शरीर से ही हो सकता है। पर परमात्मा क्यों सूक्ष्मजीव की तरह व्यवहार करता है, वह तो पूर्ण विकसित है। निर्जीव सृष्टि भी प्राणी की तरह ही व्यवहार करती है। उदाहरण के लिए तारे भी पैदा होते हैं, बढ़ते हैं, लड़ते हैं, प्रजनन कार्य करते हैं, खाते हैं, उगलते हैं, शिकार करते हैं, लड़ाई झगड़ा करते हैं, भागते हैं, दोस्ती और दुश्मनी निभाते हैं, आदि आदि। तो क्या निर्जीव पदार्थों में भी जीवात्मा है। जरूर है। सांख्य दर्शन भी कहता है कि प्रकृति भी पुरुष अर्थात परमात्मा की तरह अनादि, अनंत और सर्वव्यापक है। मतलब यह प्रकृति भी जीवात्मा ही है। एक विशाल, सर्वव्यापक, वैश्विक या समष्टि जीवात्मा। इसे ब्रह्मा का सूक्ष्म शरीर भी कह सकते हैं। ब्रह्मा भी तो इसे महसूस नहीं करता। फिर भी सूक्ष्मशरीर होता है, और काम करता है। एक प्रकार से जीवात्मा के विकास के लिए अहंकार, बुद्धि, मन, प्राण, दस इंद्रियां, पांच तन्मात्राएं, और पंचमहाभूत होना जरूरी है। खैर अहंकार तो खुद ही जीवात्मा के रूप में है। क्योंकि ये सभी जरूरी हैं, इसीलिए ये सभी तत्व इकट्ठे हो गए। इनके इकट्ठा होने से एक शरीर बन गया। उसके साथ जीवात्मा का जुड़ाव हो गया। जीवात्मा तो प्रकृति के रूप में पहले से ही हर जगह और हर समय मौजूद था। समझ लो कि उसका एक कल्पित अंश नवनिर्मित शरीर से बंध गया। वही पहला जीवात्मा हुआ। वह पहला शरीर जीवाणु का था। फिर जीवाणु का शरीर विकसित होकर कीड़ों मकोड़ों का शरीर बना। फिर मछली मेंढक का, फिर बड़े जंतुओं का, बंदरों का और अंत में मनुष्य का। सूक्ष्म शरीर तो सब में एक जैसा ही है। सूक्ष्म शरीर में कोई विकास नहीं हुआ। वही इंद्रियां, वही प्राण, वही मन, वही बुद्धि आदि। मतलब जीवात्मा के विकास के लिए सूक्ष्म शरीर के अलावा अन्य कोई अन्य कुछ तत्व जरूरी नहीं। यह जरूर हुआ कि बड़े जीवों और मनुष्यों में सूक्ष्म शरीर का दायरा बढ़ गया। इसलिए जीवात्मा का विकास भी तेज हुआ। पर सूक्ष्म शरीर तो वही पौराणिक था। मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में जो एक चीज विशेष हुई, जो किसी अन्य जीव के शरीर में नहीं है, वह है कुंडलिनी योग साधना की योग्यता। इससे आदमी अपने सूक्ष्म शरीर को इतना ऊंचा उठा लेता है कि उससे कुंडलिनी जागरण हो जाता है।

कुंडलिनी योग के लिए दूरदर्शन फिल्म व सिनेमा मूवी देखना जरूरी है

दोस्तों, इंद्रियों के भ्रम को हम एक और उदाहरण से समझ सकते हैं। जब हम दूर रखे टेलीविजन की आवाज ब्लूटूथ इयरबड्स से सुनते हैं, तो हमें लगता है कि वह आवाज टेलीविजन में पैदा हो रही है, जबकि वह हमारे कानों में पैदा हो रही होती है। हम टेलीविजन के जिस दृष्य के प्रति जितना ज्यादा आसक्त होते हैं, वह दृष्य हमें उतना ही ज्यादा टेलीविजन के अंदर महसूस करते हैं। जब हम अनासक्त होकर देखने लगते हैं या ऊब जाते हैं, या कान थक जाते हैं, तो वह आवाज हमें अपने कानों के अंदर महसूस होती है। मतलब कानों में पैदा हो रही आवाजों ने और आंखों में बन रहे चित्रों ने मिलकर टेलीविजन में दिख रहे दृष्यों में स्थित पंचमहाभूतों का निर्माण कर दिया था। जब हम ऊब गए या थक गए तो टीवी के नजारों पर ज्यादा ध्यान नहीं गया, जिससे सिर्फ आवाजें और चित्र ही बचे रहे, जैसे मानो पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। जब कान में बन रही आवाजों और आँखों में बन रहे चित्रों से भी ऊब गए तो उन पर भी ध्यान नहीं जाने लगा। कान और आंख थके हुए थे, इसलिए उनकी थकान महसूस हो रही थी। या कह लो नींद आ गई या टीवी को बंद कर दिया। इससे तन्मात्राएं भी नहीं रहीं, और बस कान और आँखें ही रही। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। जागने के बाद इंद्रियां तरोताजा हो गईं पर उनमें वे आवाजें और दृष्य नहीं रहे। इंद्रियों में एकदम से काम शुरु करने की शक्ति नहीं रही, क्योंकि वे अभी भी अपनी क्षतिपूर्ति ही कर रही थीं। इंद्रियां शांत होने से प्राणवायु अच्छे से चलने लगी। जिस समय इंद्रियां टीवी देखने में व्यस्त थीं, उस समय सांसों से ध्यान हट कर टीवी पर लगा हुआ था। आपने देखा भी होगा कि जब हम टीवी पर मनोरंजक कार्यक्रम देख रहे होते हैं, उस समय सांसें अटक सी जाते हैं। अगर उस समय हम सांसों पर ध्यान देते हुए लंबी लंबी और नियमित सांस लेने की कोशिश करें तो टीवी देखने का मजा ही नहीं आता और उसे बंद करने का मन करता है। इससे अंतर्मुखी बनने के लिए सांसों और प्राणायाम का महत्त्व खुद ही सिद्ध हो जाता है। इससे यह संदेश भी मिलता है कि जब इंद्रियां थकी हुई हों, तो प्राणायाम कर लेना चाहिए। इससे इंद्रियों को भी सुकून मिलता है, और मन के क्रियाशील होने से जीवन में आनंद और प्रकाश भी बना रहता है। हां, तो इंद्रियां शांत होने से जो उनसे संवेदनाओं की अनुभूतियां हो रही थीं, वे प्राण में विलीन हो गईं। प्राण सांस ही है और उसमें वे अनुभूतियां ज्यादा समय तक नहीं रह सकतीं। प्राण एक प्रकार से संवेदनाओं को इंद्रियों से लेकर मन तक पहुंचाता है। यह उन अनुभूतियों को महसूस नहीं करता। इसे हम डाकिए की तरह समझ सकते हैं, जो चिट्ठियां इधर से उधर ले जाता है, पर खुद चिट्ठियां नहीं पढ़ता। प्राणों से मन हरकत में आ जाता है। उसमें इंद्रियों द्वारा महसूस की गई संवेदनाएं उमड़ने लगती हैं, हालांकि अब मन के रूप में, क्योंकि अब उन संवेदनाओं के निर्माण में सहायक टीवी के दृष्य तो नहीं रहे। यह एक प्रकार से याद आने की तरह ही है। फिर उन अनुभूतियों के साथ मन में अन्य विविध विचार भी उमड़ने लगते हैं। यह प्राणों का मन में विलीन होना है। फिर कुछ समय तक ऐसे विचारों की स्वप्निल दुनिया में खोने के बाद आदमी को होश आता है कि कुछ दुनियादारी के काम भी करने चाहिए। मतलब बुद्धि क्रियाशील हो जाती है। मन नष्ट नहीं होता पर बुद्धि के रूप में रूपांतरित होने लगता है या बुद्धि में विलीन होने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसी तरीके से काम करने लगेगी, जैसा उसका मन था। तभी तो कहते हैं कि अगर मन को अच्छा रखेंगे, तभी काम भी अच्छे होंगे। आजकल के बच्चे जो रातदिन भरपूर और भयानक हिंसा से भरी वीडियो गेमों को देखते और खेलते रहते हैं, वे आगे चलकर कैसे अच्छे काम कर पाएंगे। उन्हें यह पोस्ट जरूर पढ़ानी और समझानी चाहिए। अच्छी बुद्धि से वह कुछ दिनों तक अच्छी दुनियादारी निभाता है, और अच्छी तरक्की भी करता है। फिर वह थक सा जाता है, और दुनियादारी से ऊब सा भी जाता है। इससे उसकी बुद्धि शांत होने लगती है, जिससे उसकी आत्मा के अंदर अंधेरा सा बढ़ने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसके अहंकार के रूप में रूपांतरित हो जाती है। फिर कोई कुंडलिनी योगी अगर चाहे तो इसके आगे आत्मा को प्राप्त कर सकता है। पर आम आदमी यहां से वापिस लौट आता है। थोड़े दिन अहंकार के अंधेरे में आराम से बिताने के बाद दुनियादारी में लौट आता है, और बुद्धि के सहयोग से पुनः अपनी पैठ जमाता है। फिर कुछ तरक्की करके सैकड़ों इच्छाएं पालकर मन की शरण में पहुंचता है। मतलब बुद्धि मन में विलीन हो जाती है। फिर मन के उकसावे में आकर मूवी देखने सिनेमा थिएटर चला जाता है। वह वैसी ही मूवी देखना पसंद करेगा जैसी उसकी बुद्धि और दुनियादारी थी, क्योंकि बुद्धि ही मन के रूप में बन कर सामने आई। सिनेमा हॉल घर से जितना दूर होता है, उतना ही मजा आता है, क्योंकि मन को प्राणों के रूप में रूपांतरित होने के लिए भी समय चाहिए होता है। सिनेमा जाने के रास्ते में उसकी बड़ी अच्छी, लंबी, नियमित और आनंददायी सांसें चलती हैं, क्योंकि मन की सिनेमा देखने की इच्छा खत्म हो रही होती है मतलब मन खत्म हो रहा होता है, और उसकी शक्ति प्राणों को मिल रही होती है। फिर भी मन की सूक्ष्म सोच प्राणों में भी कायम रहती है, क्योंकि कारण कभी नष्ट नहीं होता, पर कार्य के रूप में मौजूद रहता है। मूवी देखना शुरु करते ही उसकी सांसें थम सी जाती हैं, और वह अपनी आंखों और अपने कानों में मधुर संवेदनाओं का आनंद लेने लगता है। मतलब उसके प्राण इंद्रियों में रूपांतरित हो जाते हैं। जब तक पर्दे पर विज्ञापन चलते हैं, तब तक वह उन दृष्यों का गहराई से अवलोकन नहीं करता। मतलब उसे संवेदनाएं आंखों और कानों में ही महसूस हो रही होती हैं, कहीं बाहर से आती हुई प्रतीत नहीं होतीं। यह इंद्रियों की अभिव्यक्ति की अवस्था ही होती है। थोड़ी देर बाद जब मूवी शुरु होने के बाद उसे मूवी कुछ समझ में आने लगती है, तो उसे वे अनुभूतियां सिनेमा के पर्दे से मिलती हुई महसूस होती हैं। मतलब उसकी इंद्रियां तन्मात्राओं में विलीन हो जाती हैं। बाद में फिल्म में गहरे डूबने पर उसे पर्दे पर दिख रहे पहाड़, महल आदि असली लगने लगते हैं। मतलब तन्मात्राएं पंचमहाभूतों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। मतलब उसकी सृष्टि की रचना पूर्ण हो गई।

अब फिल्म खत्म होती है। सारे दृष्य खत्म। मतलब उसके व्यक्तिगत सूक्ष्म ब्रह्मांड की प्रलय शुरु हो जाती है। पर्दे पर विज्ञापन आने लगते हैं। अब उसे उन विज्ञापनों में दिखाए गए पहाड़ और महल असली नहीं लगते, क्योंकि वह उन्हें ध्यान से नहीं देखता। उसे बस आंख से कुछ दिख रहा होता है और कान से सुनाई दे रहा होता है। आदमी को उन्हें थोड़ी देर देखना अच्छा लगता है। क्योंकि सभी को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर क्रमवार आना और जाना जाना अच्छा लगता है। मतलब पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। फिर आदमी थोड़ी देर बाद उन संवेदनाओं को अपनी इन्द्रियों में ही महसूस करने लगता है, बाहर नहीं। उससे भी ऊबकर और अपनी आंखों और अपने कानों की थकान को महसूस करते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। वह थोड़ा चायपानी करके तरोताजा होता है। फिर उसकी सांसें अच्छी, गहरी और नियमित चलने लगती हैं। जब आंखों और कानों को मलने से उन पर ध्यान जाता है, तो उन्हें शक्ति देने के लिए सांस खुद ही चलने लगती है। हालांकि उससे वे तरोताजा ही हो सकती हैं, पुनः काम नहीं कर सकती। क्योंकि वे इतना ज्यादा काम करने के बाद अपनी क्षतिपूर्ति कर रही होती हैं। फिर सांसों की अतिरिक्त शक्ति मन को लगती है। मतलब इंद्रियां प्राण में विलीन हो गईं और प्राण मन में। फिर प्राण या सांस की शक्ति से मन भागने लगता है। मन को भगा कर सांस फिर उथली और अनियमित हो जाती है। मतलब प्राण मन में रूपांतरित हो गया। उस मन की चहलपहल से प्रेरित होकर वह शोपिंग माल में घुस जाता है। वहां विभिन्न चीजों की गुणवत्ता और उनका मोलभाव जांचते हुए उसकी बुद्धि क्रियाशील हो जाती है और मन सुस्त पड़ जाता है। मतलब मन बुद्धि में रूपांतरित हो गया। बुद्धि के भी थकने से जब उसकी आत्मा में अहंकार का अंधेरा काफी बढ़ने लगता है, तब वह परिवारसहित गाड़ी में बैठकर घर को चल देता है। मतलब बुद्धि अहंकार में रूपांतरित हो गई। उस अहंकार में उसके पूरे दिवस के क्रियाकलापों का खाका सूक्ष्म रूप में दर्ज हो जाता है। घर आकर वह तांत्रिक कुंडलिनी योग से आत्मा के अंधकार को कुंडलिनी ध्यान से रौशन कर देता है। मतलब अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है। बेशक पूर्ण आत्मा न सही, उसका कुछ अंश ही सही। अगले दिन फिर उसे न चाहते हुए भी आत्मा से क्रमवार नीचे गिरना पड़ता है, ताकि वह पुनः दुनियादारी को अच्छे से निभा सके। यह सिलसिला ऐसे ही चक्रवत चलता रहता है। यह सभी किस्म की अनुभूतियों, सभी किस्म के क्रियाकलापों, सभी किस्म की सांसारिकताओं, सभी किस्म के लोगों, सभी इंद्रियों और सभी किस्म के शरीरों के साथ ऐसा ही होता है। यह एक सामान्य सिद्धांत है। शास्त्रों में ऐसे अनेकों सिद्धांत बड़ी सूक्ष्मता व गहराई से वर्णित किए गए हैं, जहां तक मुझे लगता है आज भी आधुनिक मनोविज्ञान नहीं पहुंच सका है। उपरोक्त चलचित्र या दूरदर्शन वाला उदाहरण तो समझाने के लिए एक छोटा सा बिंदु है। आदमी जो कुछ भी करता है, उसे अपने स्वभाव अर्थात अहंकार के वशीभूत होकर ही करता है, बेशक उसे लगे कि वह स्वतंत्रता से करता है। यही अहंकार है, यही स्वभाव है, यही अवचेतन मन है, यही संस्कार है। यह सब शब्दों का खेल है। चीज एक ही है। जिसने अहंकार को नहीं जीता है, वह हमेशा उसी के वश में रहता है। पूर्ण स्वतंत्रता तो केवल योगी को ही प्राप्त होती है।

कुंडलिनी तंत्र ही अहंकार से बचा कर रखता है

दोस्तों, जागृति के बाद आदमी की बुद्धि का नाश सा हो जाता है। इसे द्वैतपूर्ण भौतिक बुद्धि का नाश कहो तो ज्यादा अच्छा होगा। आध्यात्मिक प्रगति तो वह करता ही रहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भौतिक बुद्धि अहंकार से पैदा होती है। पर जागृति के तुरंत बाद अहंकार खत्म सा हो जाता है। आदमी में हर समय एक समान प्रकाश सा छाया रहता है। नींद की बात नहीं कर रहा। नींद में तो सब को अंधेरा ही महसूस होता है, पर फिर भी जागते हुए एक जैसा प्रकाश रहने के कारण नींद का अंधेरा भी नहीं अखरता। वह भी आनंददायक सा हो जाता है। अहंकार अंधेरे का ही तो नाम है। यह अज्ञान का ही अंधेरा होता है। कई भाग्यशाली लोगों को इस अहंकारविहीन स्थिति में लंबे समय रहने का मौका मिलता है। पर कईयों को दुनिया से परेशानी या अभाव महसूस होने के कारण वे जल्दी ही अहंकार को धारण करने लगते हैं। कई लोग, जो शरीर से पूरी तरह से स्वस्थ होते हैं, वे उन्नत तांत्रिक कुंडलिनी योग के अभ्यास से उस दुनियावी परेशानी के बीच में भी अहंकार से बचे रहते हैं। वे कामचलाऊ बुद्धि को भी धारण करके रखते हैं, और अहंकार को भी अपने पैर नहीं जमाने देते। पर जब शारीरिक दुर्बलता या रोग से सही से तांत्रिक कुंडलिनी योग नहीं कर पाते तो वे भी अहंकार के चंगुल में फंसने लगते हैं। अहंकार की गिरफ्त में आते ही उनकी बुद्धि बुलेट ट्रेन की तरह भागने लगती है। यह भी करना, वह भी करना। यह जिम्मेदारी, वह परेशानी। इस तरह से बुद्धि सैकड़ों कल्पित बहाने बनाते हुए अपने को पूरी तरह से स्थापित कर लेती है। जब अंदर ही अंधेरा बस जाए तो बाहर भी हर जगह अंधेरा ही दिखता रहेगा और आदमी उससे बचने के लिए छटपटाता ही रहेगा। अगर अंदर का अंधेरा मिटा दिया जाए तो बाहर खुद ही मिट जाएगा और आदमी शांति से बैठ पाएगा। काला चश्मा लगाकर बाहर सबकुछ काला ही दिखता है। चश्मा हटा दो तो सबकुछ साफ दिखने लगता है। फिर बुद्धि के भागते ही मन भी कहां पीछे रहने वाला। जब बुद्धि ने अच्छी सी आमदनी पैदा कर दी, तब मन उसे भोगने के लिए ललचाएगा ही। कभी सिनेमा जाने का ख्वाब देखेगा तो कभी पिकनिक का। कभी पहाड़ पर भ्रमण को तो कभी खाने पीने का। कभी यह करने का तो कभी वह करने का। इन ख्वाबों के साथ अन्य और भी अनगिनत विचार उमड़ने लगते हैं। इस तरह मन में पूरा संसार तैयार हो जाता है।

जब आदमी मन के सोचे हुए पर चलने लगता है तो सांसें तो तेज चलेंगी ही। परिश्रम जो लगता है। मतलब आदमी प्राण के स्तर पर पहुंच जाता है। उन सांसो से इंद्रियों में भोगों को भोगने की और उनसे काम करने की शक्ति आ जाती है। पहले पहले उसे भोगों का आनंद इंद्रियों में महसूस होता है, बाहर नहीं। बाद में जब वह भोगी जाने वाली वस्तु पर ज्यादा ध्यान देने लगता है, तब उसे महसूस होता है कि उनसे कुछ सूक्ष्म चीजें निकल कर उसकी इंद्रियों के संपर्क में आती हैं, जिन्हें वे महसूस करती हैं। वे तन्मात्रा ही हैं। फिर भोगी जाने वाली वस्तुओं के ज्यादा ही कसीदे पढ़ने से उसे महसूस होने लगता है कि यह आनंद का अनुभव भोग पदार्थों में ही है। इससे उसका उन पदार्थों से लगाव बढ़ता है, जिससे वह उन पदार्थों का गहराई से अध्ययन करने लगता है। मतलब पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हो जाती है।

हम यहां यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम इस वेबसाइट पर कहीं भी ऐसा नहीं कह रहे हैं कि ऐसा करना चाहिए या ऐसा नहीं करना चाहिए। सबकी अपनी अपनी व्यक्तिगत समस्या और जरूरत होती है, जिसके अनुसार सबको चलना ही पड़ता है। अगर आदमी समझबूझ से खुद कोई फैंसला ले तो ज्यादा अच्छा रहता है बजाय इसके कि उस पर जबरदस्ती थोपा जाए। हमारी संस्कृति में शायद ऐसा होने लग गया था, इसीलिए सैद्धांतिक और वैज्ञानिक ज्ञानविज्ञान का ह्रास हुआ। हम तो केवल सिद्धांत पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। सच्चाई का तो पता होना ही चाहिए, उस पर चलना या न चलना व्यक्ति के अपने चुनाव पर निर्भर है। महात्मा बुद्ध कहते हैं कि जिंदगी में उठना गिरना चलता रहता है। पर बुराई इस चीज में है जब आदमी गिरा हुआ हो और यह न समझे कि वह गिरा हुआ है। जिसको अपने गिरे होने का अहसास है वह मौका मिलने पर उठने का प्रयास जरूर करेगा। पर जिसको अपने गिरे होने का अंदाजा ही नहीं है, वह अपनी अवस्था को सामान्य अवस्था या उठी हुई अवस्था मानने के भ्रम में जीता रहेगा और मौका मिलने पर भी उठने का प्रयास नहीं कर पाएगा।

शास्त्रों में ऐसा सब कुछ विशद वर्णन है, पर आजकल उनके बारे में लोगों की समझ विकृत सी हो गई है। एक बार कहीं लिखा हुआ पढ़ा था कि आदरणीय महेश योगी जी भी लगभग ऐसा ही कहते थे। विदेशों में उनकी अच्छी पैठ है। वैसे तो उनके विरोधियों की तरफ से उन पर कुछ आरोप भी लगते रहे हैं। उस लेख के अनुसार भारत में प्राचीन हिंदु संस्कृत विकृत सी हो गई है। मतलब लगता है कि इन वैज्ञानिक तथ्यों को अवैज्ञानिकता, लाचारी, गुलामी, दरिद्रता, रूढ़िवादिता, मूर्खता और कट्टरता जैसे दोषों ने ढक लिया है। वैसे यह अहसास किसी चीज को देखने के नजरिए, आध्यात्मिक और भौतिक विकास के स्तर, सांस्कृतिक परिवेश, देश और काल आदि विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। एक आदमी को एक चीज बुरी लग सकती है, तो दूसरे आदमी को वही चीज अच्छी भी लग सकती है। जिस अहसास की तरफ ज्यादा लोगों का या ज्यादा सत्ता का रुझान होता है, वही समाज या दुनिया में मान्य समझा जाता है। फिर भी इन तथ्यों को इन दोषों से बाहर निकालने की जरूरत है। समय के साथ हर एक संस्कृति के ऊपर दोषारोपण होने लगते हैं। विश्व की अनेकों संस्कृतियां इस वजह से इतिहास बन गई हैं, पर हिंदू संस्कृति पुरानतम संस्कृतियों में होने के बावजूद भी आज तक इसीलिए बच पाई है, क्योंकि समय-समय पर विभिन्न दार्शनिक और समाज सुधारक इस पर लगे दोषारोपण को बाहर निकालने का प्रयास करते आए हैं। आज तो यह दोषारोपण चरम पर लगता है। इसलिए इसको बाहर निकालने के लिए भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले व सकारात्मक बुद्धिजीवियों को आगे आना होगा। वैसे हम यह बता देना चाहते हैं कि हम किसी धर्म वगैरह के साथ नहीं बल्कि सच्चाई के साथ हैं।

कुंडलिनी रूपी द्वारपाल ही आत्मा के अनंत साम्राज्य में प्रवेष की अनुमति देता है

दोस्तों, कई लोग सोचते होंगे कि अगर अहंकार तक पहुंच गए तो आत्मा तक खुद ही पहुंच जाएंगे। पर ऐसा नहीं है। अपने आप कुछ नहीं होता। आत्मा के लिए प्रयास तो अंत तक करना होगा। मन, बुद्धि, अहंकार आदि तो आत्मा तक पहुंचने के विभिन्न स्तर मात्र हैं। जो प्रयास नहीं करेंगे, वे जल्दी ही अहंकार से भी वापस लौट जाएंगे। अहंकार से बुद्धि के स्तर तक आएंगे। फिर मन के स्तर तक, फिर प्राणों के, फिर इंद्रियों के, फिर तन्मात्राओं के और फिर महाभूतों मतलब पूर्ण भौतिकता के स्तर तक। यह सिलसिला चलता रहता है। अहंकार से आत्मा तक तो योगी लोग ही पहुंचते हैं। वैसे तो आत्मा को किसी भी तरीके से प्राप्त कर सकते हैं। पर हर चीज की तरह आत्मा को प्राप्त करने का भी एक सबसे आसान और वैज्ञानिक तरीका होता है। वह यही है कि पहले पंचमहाभूतों के स्तर पर कर्म योगी की तरह व्यवहार किया जाए। कर्म योग से आत्मा तक पहुंचने की आधारशिला तैयार होती है। फिर समय के फेर से या कुछ सालों तक इस स्तर पर मेहनत करने के बाद आदमी को खुद महसूस होता है कि वह रूपांतरित हो रहा है। वह खुद ही पंचतन्मात्रा के उच्चतर स्तर में प्रविष्ट हो जाता है। मतलब जब वह किसी चीज को देखता है तो उसे लगता है कि वह रूप को महसूस कर रहा है। उसे विभिन्न वस्तुओं को देखते हुए सर्वसामान्य रूप के इलावा कुछ भी अलग अलग महसूस नहीं होता। यह अद्वैत जैसा ही भाव होता है। उसी तरह उसे विभिन्न प्रकार की आवाजें सुनते हुए एक सामान्य शब्द का ही एहसास होता है। उन शब्दों के बीच का अंतर उसे ज्यादा महसूस नहीं होता। विभिन्न प्रकार के स्वाद को अनुभव करते हुए भी उसे केवल सामान्य रस भाव का ही अनुभव होता है। अलग-अलग उसे नजर नहीं आता। विभिन्न प्रकार का स्पर्श महसूस करते हुए उसे अलग-अलग पदार्थ महसूस नहीं होते। बस एकमात्र स्पर्श संवेदना की अनुभूति होती है, जो कभी ज्यादा तो कभी कम, कभी किसी तरह की तो कभी किसी तरह की। मतलब उसे पदार्थों का अंतर महसूस नहीं होता, बल्कि संवेदना में उतार-चढ़ाव महसूस होता है। फिर भी होती तो है एकमात्र संवेदना ही है। विभिन्न प्रकार के गंधयुक्त पदार्थ भी उसे अलग-अलग ना दिख कर सब में केवल गंध तन्मात्रा ही विभिन्न आभासी रूपों में महसूस होती है। अगर वह कर्मयोग और अद्वैत भाव को बनाकर रखता है तो उसका पंचतन्मात्रा के स्तर से पंचकर्मेंद्रियों और पंचज्ञानेंद्रियों के उच्चतर स्तर में प्रवेश हो जाता है। मतलब अब उसे यह पांचों ज्ञानेंद्रियों की संवेदनाएं और पांचों कर्मेंद्रियों की संवेदनाएं बाहरी पदार्थों में महसूस नहीं होतीं बल्कि अपनी इंद्रियों में महसूस होती हैं। मतलब उसे लगता है कि ये संवेदनाएं बाहर नहीं बल्कि उसकी इंद्रियों में पैदा हो रही हैं। फिर अपने शरीर की इंद्रियों के प्रति कैसा आकर्षण। इसलिए वह उन संवेदनाओं से मोहित ना होकर स्वतः ही आगे बढ़ने लगता है। हालांकि अगर वह आध्यात्मिक प्रयास छोड़ देता है तो इस स्तर से नीचे गिर कर फिर से पंचतन्मात्रा और पंचमहाभूत के स्तर तक भी गिर सकता है।

यदि वह कर्म योग और अद्वैत भाव बनाकर रखता है, तो प्राण के स्तर तक स्तरोन्नत हो जाता है। इसमें बीच-बीच में उसकी सांस लंबी और गहरी आने लगती है। देखा जाए तो प्रत्येक स्तर लंबे लंबे समय तक भी रहता है और सभी स्तर एकसाथ भी चलते रहते हैं। खासकर शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त कर्मयोग से यह सभी स्तर एक साथ भी चलते रहते हैं। हां, फिर अपने आप एक लंबी और गहरी सांस चलने से ही मन क्रियाशील हो जाता है। आदमी जब कुंडलिनी योग से इस लंबी सांस को लंबे समय तक लेता है तब और ज्यादा लाभ मिलता है। यह भी लगता है कि प्राण के स्तर तक पहुंचने पर कुंडलिनी योग से ज्यादा लाभ मिलता है। वैसे तो इसे इससे पहले भी कर सकते हैं। मन पर भी जब शरीर विज्ञान दर्शन और कुंडलिनी योग से लगाम लगने लगती है तब आदमी बुद्धि वाले स्तर तक पहुंच जाता है। बुद्धि भी तभी आत्मा की खोज में लगेगी, अगर उसे जानबूझ कर निर्देशित किया जाता रहे। बुद्धि पर भी जब कुंडलिनी योग से अंकुश लगेगा तो वह अहंकार में विलीन हो जाएगी। अहंकार में सभी कुछ अंधेरी आत्मा के रूप में छुपा होगा। इसीलिए इस अवस्था में कुंडलिनी चित्र मन में हरदम छाया रहता है। यह इसीलिए क्योंकि मस्तिष्क की उर्जा ने कहीं ना कहीं तो खर्च होना ही है। अगर कुंडलिनी चित्र को बल पूर्वक हटाया जाएगा तो वह ऊर्जा पुनः दुनिया की तरफ भाग सकती है। इसलिए आत्मा तक पहुंचने के लिए कुंडलिनी का सहारा तो लेना ही पड़ेगा। इस स्तर पर अगर तीव्र और तांत्रिक कुंडलिनी साधना की गई तो कुंडलिनी जागृत होने से अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है। अगर नहीं किया गया तो अहंकार से आदमी फिर क्रमवार बाहर भी लौट कर आ सकता है। मतलब कुंडलिनी ही आत्मा के दिव्य महल के बाहर खड़े द्वारपाल के रूप में है। अगर इसका सम्मान किया गया तो ही आत्मा के अनंत महल में प्रवेश मिलेगा, नहीं तो बाहर के जगतरूपी जंगल में ही भटकते रहना पड़ेगा।

कुंडलिनी जागरण सच्चाई के बाहर होने की बजाय भीतर होने की पुष्टि करता है

दोस्तों शास्त्रों के अनुसार फिर पंचज्ञानेंद्रियों से पंचतन्मात्राओं की रचना होती है। तन्मात्राएं महाभूतों का सूक्ष्म रूप हैं, जो इंद्रियों के अनुभव में आता है। यह अविभक्त अनुभव होता है, जैसे कि रूप तन्मात्रा सभी किस्म के पदार्थों का दिखने में आने वाला सामान्य रूप है। यह पत्थर, पानी, पेड़ आदि सब चीजों के लिए सामान्य है। मतलब कि जल और पृथ्वी दो अलग-अलग महाभूत हैं पर उनकी रूप तन्मात्रा एक ही है। ये दोनों इसी रूप तन्मात्रा के कारण दिखते हैं। आंखें इंद्रियां इन दोनों की केवल रूप तन्मात्रा को ग्रहण करती हैं, अन्य कुछ नहीं। यह रूप तन्मात्रा प्रकाश की किरणों के माध्यम से आंख तक पहुंचती है। इसी तरह नासिका इंद्रिय गंध तन्मात्रा को ग्रहण करती है। कान शब्द तन्मात्रा को और चमड़ी स्पर्श तन्मात्रा को ग्रहण करती है। जीभ इंद्रिय रस तन्मात्रा को ग्रहण करती है। ये तन्मात्राएं इंद्रियों को अनुभव देने का और पंचमहाभूतों का एहसास कराने का काम करती हैं। इसी को ऐसा कहा गया है कि तन्मात्राओं से महाभूतों का निर्माण होता है। जब हम पत्थर की रूप तन्मात्रा को ग्रहण करते हैं तो हमें किसी चीज के उपस्थित होने का आभास होता है। जब हम उसकी स्पर्श तन्मात्रा को भी अनुभव करते हैं, तब हमें उसके कठोर होने का आभास होता है। जब हम उसकी गंध तन्मात्रा को और रस तन्मात्रा को भी ग्रहण करते हैं, तब हमें उसके भोजन ना होने का पता चलता है। जब उसकी शब्द तन्मात्रा को भी ग्रहण करते हैं, तो पता चलता है कि वह कोई अटूट धातु नहीं है, पर एक टूटने वाला पत्थर है। इस तरह से पांचों तन्मात्राओं से हमें किसी भी पदार्थ की सभी विशेषताओं का पता चलता है। फिर ऐसा क्यों कहा गया है कि गंध तन्मात्रा से पृथ्वी की, रस तन्मात्रा से जल की, रूप तन्मात्रा से अग्नि की, स्पर्श तन्मात्रा से वायु की, और शब्द तन्मात्रा से आकाश की उत्पत्ति होती है। यह इसीलिए क्योंकि इन सभी तन्मात्राओं में से एक तन्मात्रा ही किसी एक महाभूत में मुख्य होती है। बाकि तन्मात्राएं तो सामान्य होती हैं, या दूसरे महाभूतों के मिश्रित होने से बनी होती हैं। शुद्ध जल गंधहीन होता है। इसलिए उसमें गंध तन्मात्रा की उपस्थिति नहीं मानी जाती। पर अगर उसमें कठोर दाल पकी हो तो गंध आएगी। इसीलिए पृथ्वी मतलब कठोर वस्तु को गंध का मुख्य गुण दिया गया। हम जो कुछ भी स्वाद ले पाते हैं, तभी ले पाते हैं जब भोजन हमारे मुंह के लार द्रव से मिश्रित होता है। यह द्रव जल जैसा ही होता है। अगर भूख ना होने से मुंह सूखा हो तो कुछ भी स्वाद नहीं आता। इसीलिए जल महाभूत को रस नामक मुख्य गुण दिया गया है। रस का मतलब स्वाद भी होता है, और तरल पदार्थ भी। जब सूरज चमकता है या दीपक जलता है, तभी हमें सभी रूपों का आभास होता है। इसीलिए अग्नि को रूप का मुख्य गुण दिया गया है। सबसे संवेदनात्मक, अच्छा और सुखद स्पर्श वायु से ही मिलता है। इसीलिए वायु को स्पर्श तन्मात्रा से उत्पन्न माना गया है। दो लोगों के बीच अगर दीवार या पहाड़ हो तो उनकी आवाज एक दूसरे तक नहीं पहुंचती। मतलब आवाज या शब्द को ले जाने के लिए खुला आकाश होना चाहिए। इसीलिए आकाश को शब्द तन्मात्रा से निर्मित बताया गया है। मतलब अगर हम पंचमहाभूतों को महसूस न करें, तो उनका अस्तित्व ही नहीं माना जाएगा। अंधेरे में महल होने का क्या महत्त्व हो सकता है। सारे महाभूत और उनसे बना सारा जगत अंधेरे में ही हैं, अगर उन्हें कोई भी महसूस न कर पाए। फिर तो वे न होने के बराबर ही हैं। तन्मात्राओं से ही हमें वे महसूस होते हैं। मतलब सूक्ष्म तन्मात्राओं से ही उनकी उत्पत्ति हुई। यह अंदर से बाहर की ओर की अप्रोच है। यही अध्यात्म है। यही सत्य एप्रोच है। बाहर से अंदर की ओर एप्रोच भौतिक विज्ञान है। यह आध्यात्मिक रूप से असत्य अप्रोच है। हां, भौतिक रूप से सत्य हो सकती है। पर भोतिकता खुद भी असत्य ही है, बेशक व्यवहार के लिए उसे कामचलाउ सत्य मानना पड़ता है।

सच्चाई अंदर है, बाहर नहीं। यही वास्तविकता है। कुंडलिनी जागरण के दौरान इस वास्तविकता का साक्षात अनुभव होता है, जब सारा जगत अपनी उस अंतरात्मा में महसूस होता है, जो हृदय की गहराईयों में सबसे भीतर स्थित रहती है, और सामान्य तौर पर अहंकाररूपी अंधेरे के रूप में महसूस होती है।

पंचमहाभूत के तन्मात्रा में विलीन होने का यह मतलब नहीं कि जल, वायु आदि पंचमहाभूत नष्ट हो गए। इसका मतलब है कि इंद्रियों से वे पंचमहाभूत स्पष्ट या पृथक वस्तुओं के रूप में या अलग-अलग रूप में महसूस नहीं हुए। बल्कि वे तन्मात्राओं के रूप में महसूस हुए। समुद्र पृथक व सत्य वस्तु के रूप में महसूस नहीं हुआ। पर वह रूप तन्मात्रा, रस तन्मात्रा, स्पर्श तन्मात्रा, गंध तन्मात्रा और शब्द तन्मात्रा के मिश्रण के रूप में महसूस हुआ। यह ऐसे ही है कि कंप्यूटर अलग वस्तु के रूप में महसूस नहीं हुआ पर सीपीयू, हार्ड डिस्क, मदर बोर्ड आदि के मिश्रण के रूप में महसूस हुआ। मतलब एक प्रकार से कंप्यूटर नष्ट न होकर वैसा ही बना रहा, पर अपने घटकों में विलीन हो गया। वैसे भी अद्वैत दर्शन कहता है कि घटक ही सत्य हैं, घटक से निर्मित वस्तु नहीं। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि रूप तन्मात्रा से सभी चीजों का रूप और आकार तो महसूस हुआ पर आंख उन चीजों का गहराई से अवलोकन नहीं कर सकी। मतलब सिर्फ सामान्य रूप का ही पता चला, रूपों में विभिन्नताओं का नहीं। यह सामान्य रूप ही रूप तन्मात्रा है। इसमें विभिन्नता महसूस होने से यह सामान्य रूप विभिन्न वस्तुओं के रूप में दिखने लगता है। मतलब रूप तन्मात्रा से अग्नि महाभूत की उत्पत्ति हो जाती है। इस अग्नि महाभूत की मात्रा सभी वस्तुओं में भिन्न भिन्न है। ऐसा ही सभी महाभूतों के साथ होता है।