कुंडलिनी योग खरपतवार को नर्सरी में ही नष्ट कर देता है

दोस्तों, बुलेट ट्रेन रुक सकती है, पर लेखनी अगर एक बार चल पड़े तो नहीं रुक सकती। मेरे मन में एक विचार आया कि शास्त्रों में अहंकार को ही सूक्ष्म शरीर कहा गया है। वैसे तो सूक्ष्म शरीर को बताया गया है कि वह आत्मा, अहंकार, बुद्धि, मन, पांच प्राण, पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों से मिलकर बना है। पर साथ में यह भी कहा गया है आदमी द्वारा किए गए सभी कर्म और भोगे गए सभी फल उसकी इंद्रियों में विलीन हो जाते हैं। इंद्रियां प्राण में विलीन हो जाती हैं। प्राण मन में विलीन हो जाते हैं। मन बुद्धि में विलीन हो जाता है, और बुद्धि अहंकार में विलीन हो जाती है। तो इसे ऐसा क्यों न समझा जाए कि मृत्यु के बाद सिर्फ अहंकार ही बचा रहता है। मतलब आदमी का पूरा जीवन उसके अहंकार में दर्ज हो जाता है। इसीलिए कहावत भी है कि रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई। मतलब शरीर नष्ट हो जाता है पर उससे जुड़ा अहंकार नष्ट नहीं होता। वह केवल मोक्ष मिलने पर ही नष्ट होता है। ऋषि दुष्टों और राक्षसों से अक्सर कहते हैं कि अरे दुष्ट, तेरा अनकार जल्दी ही नष्ट हो जाएगा। मतलब आदमी का अहंकार हमेशा नहीं रहता। इसका यही मतलब है कि ज्ञान हो जाएगा। अहंकार आत्मा की तरह शाश्वत नहीं है। यह जगत की परछाई होने के कारण उसी की तरह झूठा है। कभी न कभी तो इसने नष्ट होना ही है। तभी कहते हैं कि राम नाम सत्य है। मतलब आत्मा ही सत्य है जो कभी नष्ट नहीं होती।

कर्मों और फलों के इंद्रियों में विलीन होने का मतलब है कि उनसे जुड़े अनुभव शरीर के चक्रों में सूक्ष्मरूप में दर्ज हो गए। योगी लोग इन्हें कुंडलिनी योग से बाहर निकालकर खत्म कर देते हैं, जिससे ये अहंकार तक नहीं पहुंच पाते और उन्हें कर्मफल के बंधन में नहीं डाल पाते। इंद्रियों के प्राणों में विलीन होने का यह मतलब नहीं कि इंद्रियां नष्ट हो गई। इसका मतलब है कि शरीर की क्रियाशीलता कम होने से इंद्रियां क्षीण हो गईं। इससे उनको मिलने वाली शरीर की जीवनी शक्ति की बचत हो गई। वह अतिरिक्त शक्ति प्राण शक्ति के रूप में शरीर को उपलब्ध हो गई। उस अतिरिक्त प्राण की शक्ति मन को लगने लगी। इसीलिए तो बैठे-बिठाए आदमी का मन बहुत भागता है। साक्षीभाव साधना का अभ्यास करने वाले या राजयोगी इन मन के विचारों के प्रति उदासीन रहकर इन्हें क्षीण करते हैं। इससे वे भी कर्मफल के बंधन में नहीं पड़ते। पर चक्रों पर ही विचारों को कुचलने का कुंडलिनी योग का तरीका ज्यादा आसान और प्रभावशाली है। अगर आप खरपतवार को नर्सरी में ही नष्ट कर दो तो ज्यादा अच्छा है, क्योंकि खेत में पहुंचने के बाद तो यह बहुत ज्यादा बढ़कर बहुत ज्यादा दायरे में फैल जाता है। जब योग से मन को भी काबू किया गया तो उसकी शक्ति बुद्धि को लग गई। इसीलिए तो जो मन पर काबू पा लेता है वह बहुत से रचनात्मक कार्य जैसे कि लेखन, गायन, कविता निर्माण, चित्रकारी आदि में निपुण होकर दुनिया को श्रेष्ठ रचनाएं प्रदान करता है। ये सब काम बुद्धिरूपी एकाग्र मन से ही होते हैं, भटकते मन रूपी साधारण मन से नहीं। फिर जब योग से बुद्धि पर भी लगाम लगा दी जाती है तब बुद्धि की शक्ति अहंकार को लगती है। मतलब बुद्धि नष्ट नहीं होती पर अहंकार में समा जाती है। इसीलिए तो अपनी बुद्धि से दुनिया में झंडे गाड़ने वाले का अहंकार बहुत बढ़ जाता है। लोग उसे ताने मारने लगते हैं कि उसका घमंड बहुत बढ़ गया है। लोग उससे जलने लगते हैं। जब आदमी कुंडलिनी योग से अहंकार को भी काबू में कर लेता है, तब उसकी शक्ति आत्मा को लगने लगती है। अहंकार के बाद पाने को आत्मा ही तो बचता है। वैसे तो अहंकारी आदमी दुनिया में अपना डंका बजाते हुए दौड़ता भागता रहता है। पर जब वह कुंडलिनी योग में लग जाता है तो अहंकार खुद ही आत्मा या कुंडलिनी जागरण के अनुभव में रूपांतरित होने लगता है। यह इसलिए क्योंकि अहंकार से महान और व्यापक केवल आत्मा ही है। अहंकार को महतत्त्व इसीलिए कहते हैं क्योंकि यह सबसे महान तत्त्व है। जिन चीजों से दुनिया बनी है, उन्हें तत्त्व कहते हैं। अहंकार इनमें सबसे बड़ा है। यह अकाश की तरह ही व्यापक है। बेशक यह आत्मा जैसा परम चेतन नहीं है। आत्मा दुनिया के सभी तत्त्वों से परे है। अहंकार की इसी विशालता और व्यापकता के कारण ही शरीर छोड़कर गई आत्मा में कई अलौकिक जैसी शक्तियां होती हैं। कई तांत्रिक उन आत्माओं को सिद्ध करके उन शक्तियों को प्राप्त करते हैं। इन सब बातों से साफ है कि अहंकार पूरे सूक्ष्म शरीर को अपने अंदर समेटे होता है। हालांकि होता वह काजल के जैसे चमकीले और अंधेरे आसमान के जैसा ही।

आत्मज्ञान के बाद यह प्रक्रिया उल्टी भी चलती है। खासकर जब योगी दुनियादारी में प्रवेश करने लगता है। उसकी आत्मा तनिक मलिन होकर अहंकार के रूप में बन जाती है। अहंकार बुद्धि के रूप में आ जाता है। बुद्धि मन के रूप में, मन प्राणों के रूप में और प्राण इंद्रियों के रूप में स्थूल हो जाते हैं। इसलिए देखा गया है कि अच्छे विचारों से अच्छी साँसें बहने लगती हैं। साथ ही, अच्छी साँसों से इन्द्रियाँ पर्याप्त रूप से सक्रिय हो जाती हैं और अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित होती हैं। फिर इंद्रियां विभिन्न कर्मों और फलों के रूप में पूरे जगत में फैल कर उस आदमी के अपने व्यक्तिगत और सीमित संसार का निर्माण करती हैं। हालांकि फिर वह राजा जनक की तरह कर्मयोगी बनता है, और बंधन में कम ही पड़ता है।

कुंडलिनी जागरण से ही अहंकार की सही से पहचान होती है और इसका सही से निवारण होता है

दोस्तों, शास्त्रों में कही गई बातों के गहरे मतलब होते हैं। जैसे कि हम चर्चा कर रहे थे कि योग स्थूलता से सूक्ष्मता की तरफ जाता है। मृत्यु या प्रलय को भी स्थूलता से सूक्ष्मता की तरफ जाने को ही कहते हैं। फिर योग में और मृत्यु में क्या अंतर है, इसे जरा गहराई से समझते हैं। मृत्यु वाली सूक्ष्मता अहंकार पर रुक जाती है। पर योग वाली सूक्ष्मता आत्मा तक पहुंच जाती है। आत्मा सूक्ष्मता की अंतिम सीमा है। आत्मा से सूक्ष्म अन्य कुछ नहीं है। इसमें ब्लैक होल के जैसा आकर्षण भी  है। जो इसको पा लेता है, वह फिर कभी भौतिक दुनिया में वापस नहीं लौटता। फिर हमेशा के लिए आत्मा की सूक्ष्म और अनंत दुनिया ही उसकी दुनिया बन जाती है। दूसरी तरफ मृत्यु वाली सूक्ष्मता अहंकार पर पहुंचकर रुक जाती है। आदमी का अहंकार बेशक सूक्ष्म है, और उसमें आदमी के सारे पिछले क्रियाकलाप सूक्ष्म कोडों के रूप में दर्ज हैं। पर फिर भी यह परमसूक्ष्म आत्मा के सामने पहाड़ जैसा स्थूल है। आत्मा में जगत का बिल्कुल भी नामोनिशान नहीं है, सूक्ष्म या कोड रूप में भी नहीं।

कई लोग इसी अहंकार को जीवात्मा कहते हैं। कई लोग इसी को अवचेतन मन कहते हैं। कई इसी को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। यह सब शब्दों का जाल है। चीज एक ही है। इसे अहंकार इसलिए कहते हैं क्योंकि यह सभी लोगों को अपने आप के रूप में दिखता है, पराए रूप में नहीं। पर दरअसल में यह अपना रूप नहीं होता। इसीलिए शास्त्रों में अहंकार को झूठा और धोखा कहा जाता है। संस्कृत शब्द “अहम” का मतलब ही “मैं” होता है। जिस दुनिया से आदमी व्यवहार करता है, वह पराए रूप में होती है। जैसे आदमी बोलता है कि उसने गाड़ी चलाई। वह ऐसे तो नहीं बोलता कि उसने अपने को चलाया। पर उसे पता ही नहीं चलता कि वे दुनिया की पराई चीजें ही सूक्ष्म रूप होकर उसके अपने आप के स्वरूप वाले अहंकार को बनाती हैं और बढ़ाती हैं।

उपरोक्तानुसार आदमी के अहंकार अर्थात अवचेतन मन में सभी पराई चीजें भरी होती हैं। पर आदमी उन्हें कभी पराया नहीं समझता। वह इसलिए क्योंकि वे बहुत सूक्ष्म रूप में होती हैं। वे आत्मा से इतनी नजदीकी से चिपकी होती हैं कि मरने पर भी नहीं छूटती। वे हमेशा आदमी की आत्मा के साथ जन्म जन्मांतरों में और लोक लोकांतरों में भ्रमण करती रहती हैं। इसीलिए वे आत्मा को अपना स्वरूप लगती हैं। एक प्रकार से आदमी पूरी दुनिया को अपने साथ घुमाए फिरता रहता है। बोलते हैं कि फलां की उम्र पूरी हो गई और उसने दुनिया को छोड़ दिया। पर दुनिया उसे कहां छोड़ती है। वह तो उसके अहंकार के रूप में उसी के साथ हो लेती है।

प्रत्येक पराई वस्तु या पराए विचार की छाया आदमी की आत्मा में अहंकार के रूप में दर्ज होती रहती है। कई दुनियादारी में निपुण लोग बड़ा दावा या नाटक करते हैं कि उनमें अहंकार नहीं है, पर ऐसा होना असंभव है। कई महान अहंकारी तो आत्मज्ञानी बनकर घूमते फिरते हैं। मैं यह किसी धर्म के अधिष्ठाता के बारे में नहीं बोल रहा। दुनिया की छाया तो आत्मा पर बनेगी ही, चाहे आदमी अपना जितना मर्जी बचाव कर ले। हां, अगर वह साथ में कुंडलिनी योग भी प्रतिदिन करता रहे, तब वह छांव कमजोर बनेगी और बनी हुई छांव मिटने लगेगी। फिर हम कह सकते हैं कि अमुक आदमी में बहुत कम अहंकार है। मतलब साफ है कि कुंडलिनी योग ही किसी के अहंकार का पैमाना है, दुनियादारी नहीं।

या तो आदमी स्थूल जगत को भी सूक्ष्म जगत की तरह अपना स्वरूप समझे या किसी को भी अपना स्वरूप ना समझे। गड़बड़ वहां होती है, जब स्थूल जगत को पराया रूप समझा जाता है, और सूक्ष्म जगत को अपना रूप समझा जाता है। जब आदमी अपने अहंकार की तरह ही स्थूल जगत को भी अपना रूप समझेगा तो उसके प्रति उसकी आसक्ति कम हो जाएगी। अपने से भला कौन आसक्ति करता है। इससे आत्मा पर उसकी कम गहरी छाया बनेगी। इससे अहंकार भी खुद ही कम हो जाएगा। अगर आदमी जगत के साथ अहंकार को भी पराया समझेगा तो वह कुंडलिनी योग साधना की तरफ झुकेगा और उसकी मदद से अपनी शुद्ध आत्मा से चिपकी पराई और गंदी चीज को बाहर निकालना चाहेगा।

आम आदमी को अपनी शुद्ध आत्मा का पता ही नहीं होता। इसलिए वह अहंकार को ही अपनी आत्मा समझे रखता है। पर कुंडलिनी जागरण से आदमी को अपनी शुद्ध आत्मा का अनुभव होता है। बेशक कुंडलिनी जागरण का अनुभव और उससे जुड़ा आत्मा का अनुभव कुछ ही क्षणों के लिए होता है। इससे अहंकार स्पष्ट रूप से पराया और अज्ञान की वजह से शुद्ध आत्मा से चिपका हुआ सा नजर आने लगता है। यह अज्ञान आत्मा का अज्ञान ही है, जिसे शास्त्रों में ज्ञान से मतलब आत्मा के ज्ञान से खत्म करने की सलाह हर जगह दी गई है। मतलब परोक्ष रूप से कुंडलिनी जागरण की सलाह दी गई है, क्योंकि उसी से आत्मा का ज्ञान अर्थात आत्मा का अनुभव होगा। आत्मा का ज्ञान कोई किताबी ज्ञान की तरह नहीं है कि पढ़ा और हो गया, जैसा कई लोग समझते हैं। बल्कि यह आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव है। वैसे भी पढ़ा तो किसी दूसरी चीज के बारे में ही जा सकता है। अपने को कोई कैसे पढ़ेगा। अपने को तो केवल प्रत्यक्ष रूप में महसूस ही किया जा सकता है। इसलिए जागृत अर्थात आत्मज्ञानी आदमी कुंडलिनी योग समेत विभिन्न प्रकार की साधनाओं से उस विषबेल रूपी अहंकार को परे हटाने का प्रयास भी करता रहता है। शायद दार्शनिक शैली में अहंकार को ही विषबेल कहा गया है, क्योंकि दोनों लिपटते हैं, और जिससे लिपटते हैं, उसे मार देते हैं। इसी तरह अहंकार को ही आकाशबेल कहा गया है। आकाशबेल मतलब ऐसी बेल जो आकाश से लिपटती है। आत्मा आकाश की तरह स्वच्छ और शून्य है। अहंकार ही इससे लिपट सकता है, अन्य तो कुछ भी आकाश से नहीं चिपक सकता। यह भी आश्चर्य ही है कि अहंकार शून्य आकाश को भी नहीं छोड़ता।

मतलब साफ है कि कुंडली जागरण कोई स्थाई उपलब्धि नहीं है। पर इसका महत्त्व इसी में है कि यह आदमी को योग की तरफ प्रेरित करता रहता है। हां, सबको तो कुंडली जागरण मिलता नहीं है। इसीलिए जागृत व्यक्ति की संगत करने को कहा जाता है। जैसे स्वर्ण का जानकार पूरी दुनिया को स्वर्ण की पहचान बताता है। उसी तरह एक जागृत व्यक्ति ही पूरे समाज को आत्मा और अहंकार की सही पहचान बता सकता है। इसीलिए शास्त्रों में कुंडलिनी जागरण को बहुत महत्व दिया गया है। आजकल के सत्संगों आदि में बेशक मुख्य प्रवचक आदि लोग जागृत नहीं होते, पर वे शास्त्रों में लिखे जागृत लोगों के वचनों की पुनरावृत्ति करते हैं। इससे भी काम चल पड़ता है। इसीलिए व्यास या कथावाचक को भी बहुत महत्त्व व सम्मान दिया जाता है। बेशक वे जागृत नहीं होते पर जागृत लोगों के वचनों को अपनी दार्शनिक चतुराई और वाकपटुता से श्रोता गणों को अच्छे से समझाते हैं। हम भी इस वेबसाइट पर लगभग यही करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि हम शास्त्रों के ही आध्यात्मिक तथ्यों को आधुनिक, वैज्ञानिक और तार्किक रूप में समझने की और दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश करते रहते हैं।

कुंडलिनी योग से जगत इन्द्रियों में, इंद्रियां मन में, मन बुद्धि में, बुद्धि अहंकार में और अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है

दोस्तों, सूक्ष्म शरीर पर यह चर्चा बढ़ती ही जा रही है। मैं चाहता था कि कोई नई चर्चा शुरू होए, पर यह क्या है न कि चर्चा एक सृष्टि की विकास प्रक्रिया की तरह ही चरणों से गुजरती है। यह शुरू होती है, बढ़ती है, और निष्कर्ष पैदा करके खत्म हो जाती है। इस पर किसी की लगाम नहीं लगती। यह पोस्ट भी मुझे निष्कर्ष वाली लग रही है। पर फिर भी पता नहीं आगे कहां तक जाए।

हम बात कर रहे थे कि शरीररहित आत्मा अपने को ही सूक्ष्म शरीर के रूप में अनुभव करती है। आत्मा के अंदर उसके पिछले सभी जन्मों के किस्से सूक्ष्म रूप में मौजूद होते हैं। वह उन्हीं को सूक्ष्म शरीर के रूप में महसूस करती है। यह तो सब ठीक है पर स्थूल शरीर के बिना वह दूसरों के साथ कैसे संपर्क करेगी? और उसका विकास भी कैसे होगा? देखो, पिछले जन्मों का कभी उसे कोई हिस्सा ज्यादा महसूस होता होगा तो कभी कोई दूसरा। यह ऐसे ही है जैसे शरीरयुक्त आत्मा के मन में कभी कोई विचार उठता है, तो कभी कोई। पहले वह विचार भी सूक्ष्म अनुभव के रूप में आत्मा में महसूस होता है। उसके बाद वह अनुभव मन की तरंगों के माध्यम से उस अनुभव वाले विचार के रूप में स्थूलता ग्रहण करता है। वह विचार फिर मुख से बोल के रूप में निकलकर और ज्यादा स्थूल हो जाता है। उस बोल से जब उसके जैसा काम होता है तब वह काम के प्रभाव या जगत के रूप में और ज्यादा स्थूल हो जाता है। इस तरह से स्थूलता बढ़ती ही रहती है। इस तरह से आत्मा का विस्तार पूरे जगत में हो जाता है। अंत में यह जगत सिकुड़ कर फिर से आत्मा में समा जाता है। फिर सारी प्रक्रिया उल्टी चलने लगती है। जगत के स्थूल पदार्थ सूक्ष्म होकर कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों में समा जाते हैं। यह ऐसे ही है कि जगत चक्रों में समा जाता है। इसीलिए कुंडलिनी योग में चक्र साधना सबसे मुख्य अंग है। चक्र में ध्यान लगाने से उनसे अर्थात उनके या इंद्रियों के द्वारा पैदा हुए कर्मों और फलों से जुड़ी स्मृतियां मन में आ जाती है। वैसे भी कहते ही हैं कि सातों चक्र शरीर की सभी इंद्रियों से जुड़े होते हैं। इसको ऐसे कहा गया है कि इंद्रियां मन में समा जाती है। मन फिर और ज्यादा सूक्ष्म होकर बुद्धि में समा जाता है। मतलब मन के विचारों का लय होने से बुद्धि तेज हो जाती है, क्योंकि मस्तिष्क की जिस ऊर्जा को मन खा रहा था, वह अब बुद्धि को मिलती है। बुद्धि फिर और ज्यादा सूक्ष्म होकर अहंकार में समा जाती है। मतलब जब बुद्धि को लगने वाली ऊर्जा भी दुनियादारी में बर्बाद नहीं होती तो वह भी अहंकार में विलीन हो जाती है। अहंकार मतलब अंधेरा। जब आदमी सब कुछ ठुकरा देगा तो अंधेरा ही बचेगा। इसी अंधेरे में जब आदमी कुंडलिनी योग से कुंडलिनी की लौ जलाता है, तो वह जागृत होती हुई अवस्था में अहंकार को आत्मा में विलीन कर देती है, मतलब कुंडलिनी जागरण के रूप में कुछ क्षणों के लिए आत्मा का अनुभव प्राप्त होता है। यह सारा खेल शक्ति का ही है। जब वह बहिर्मुखी थी, तो दुनिया के रूप में बाहर ही बाहर फैलती गई। जब यह अंतर्मुखी हुई तो अंदर ही अंदर सिकुड़ती गई और अंत में कुंडलिनी योग के माध्यम से कुंडलिनी को लग गई और वह उस शक्ति से आत्मा में विलीन हो गई।

यह अहंकार आत्मा जैसा ही है पर उसमें आत्मा से कम चेतना होती है। इसे जीवात्मा कह लो क्योंकि इसमें आदमी का पिछला सारा इतिहास सूक्ष्म कोडों के रूप में छुपा होता है। अंत में शरीर छूटने से अहंकार भी आत्मा में समा जाता है। शरीर छूटने से अहंकार आत्मा में तो नहीं पर जीवात्मा में समा जाता है। आत्मा में समाने के लिए उसे कुंडली जागरण का अनुभव प्राप्त करना होगा। कुंडली जागरण के कुछ क्षणों के अनुभव के दौरान वह अहंकार अर्थात आदमी का अपना मूलभूत जीवात्मा वाला रूप आत्मा में समाया होता है। हालांकि उस अनुभव के बाद अहंकार पुनः वापिस आ जाता है क्योंकि अहंकार के बिना कोई जीवन जी ही नहीं सकता। उसके बिना या पूर्ण आत्मा के रूप में आदमी होगा तो पूर्ण पर होगा लकड़ी के ठूंठ की तरह। दुनिया के प्रति उसकी कोई प्रतिक्रिया शेष नहीं रह जाएगी। खैर, अहंकार की ऊर्जा जब बाहर नहीं भागती तो वह ऊर्जा कुंडलिनी जागरण को पैदा करती है। होता यह सब कुंडलिनी योग से ही है। ये सभी तत्त्व आत्मा में सूक्ष्म रूप में रहते हैं। कभी आत्मा से बाहर निकलते हैं, कभी उसमें समा जाते हैं। शास्त्रों में सृष्टि और प्रलय का और जीवन और मृत्यु का बिल्कुल ऐसा ही वर्णन मिलता है। यहां तक कि योग साधना से अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाने का अर्थात बंधन से मुक्ति की तरफ जाने का जो सफर है, उसका वर्णन भी इसी तरह का आता है। दरअसल, ये सब प्रक्रियाएं एकसमान ही हैं। सिर्फ मानसिकता, उद्देश्य, और प्रक्रिया के तरीकों में ही फर्क है। यहां किसी चीज के किसी चीज में समाने का यह मतलब नहीं है कि वह चीज खत्म हो जाती है। बल्कि इसका यह मतलब है कि वह सूक्ष्म होकर अर्थात ऊर्जा के रूप में रूपांतरित होकर किसी मिलतेजुलते अन्य रूप में प्रकट हो जाती है। यह ऐसे ही है जैसे कहते हैं कि गागर में सागर समाना। शास्त्रों में इसे ऐसे कहा गया है कि आत्मा इस संसार को अपने अंदर से ऐसे ही फैलाता और अपने अंदर ऐसे ही समेटता रहता है, जैसे एक कछुआ अपने अंगों को अपने कवच से बाहर निकालता है और अपने कवच के अंदर को समेटता भी रहता है। दूसरा उदाहरण ऐसा दिया जाता है कि जिस तरह मकड़ी अपने मुंह से अपना जाला बुनती है और फिर उस जाले को अपने मुंह में ही निगल जाती है, उसी तरह परमात्मा भी सारे संसार को अपने आप से पैदा करता है, और अंत में अपने आप में ही विलीन भी कर लेता है।

कुंडलिनी योग ही सूक्ष्म शरीर को पूरी तरह से डिकोड कर सकता है

दोस्तों हम बात कर रहे थे कि क्रिया और प्रभाव आपस में जुड़े होते हैं। इस परस्पर प्रभाव को शास्त्रीय दर्शनों में अक्सर कार्य कारण संबंध परंपरा कहा जाता है। जीवात्मा क्रिया से प्रभाव पैदा करती है और परमात्मा प्रभाव से क्रिया पैदा करते हैं। इसको ऐसे समझते हैं। जीव अपने शरीर की क्रियाशीलता से चेतना का आनंद प्राप्त करता है। पर परमात्मा पहले ही चेतना से भरपूर है इसलिए उससे शरीर की क्रिया खुद ही होती रहती है। आम शरीर वाली क्रिया नहीं पर सृष्टि रूपी विराट शरीर वाली क्रिया। क्योंकि परमात्मा की चेतना अनंत है इसलिए उसके कारण क्रिया करने वाला उनका शरीर भी अनंत ही होगा। उनकी सांस के रूप में अनंत वायु बहती है। उनकी आंख के रूप में असंख्य सूरज चमकते हैं। उनकी भुजा के रूप में सृष्टि के असंख्य काम होते हैं। उनके पैरों के रूप में सृष्टि के सभी काम एक दूसरे से जुड़े हैं। जैसे आदमी पैरों से चलकर घर से खेत और खेत से घर जाता है। इसलिए उसके घर के और खेत के काम आपस में जुड़े हैं। क्योंकि सारी सृष्टि की सभी क्रियाएं आपस में जुड़ी हैं। इससे यही माना जाएगा कि परमात्मा के असंख्य पैर हैं, जिससे वह हर जगह हर क्षण जा सकते हैं। इसी तरह अगर हम परमात्मा के सारे गुणों का वर्णन करने लग जाएं, तो एक क्या अनगिनत पुस्तकें छप जाएंगी? यह शास्त्रों में पहले से ही बहुत है। यहां मुख्य प्रश्न है कि शरीर रहित जीवात्मा या सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर वाले सभी काम कैसे करता है?

बेशक सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म रूप में सभी काम करता है पर करता कैसे हैं? यहां भी शायद क्रिया प्रभाव वाली कहानी ही जमेगी। एक अमुक शरीर ने शुरु से लेकर जो जो क्रियाएं की होती हैं, वे सभी उसकी आत्मा पर अंधकार की छांव के रूप में दर्ज हो जाती हैं। मतलब उसकी उन क्रियाओं का प्रभाव उसके जीवन काल में उसे चेतना के रूप में मिलता गया। पर मृत्यु के बाद वह उसकी आत्मा में अचेतनता के रूप में दर्ज होता गया। चेतनता और अचेतनता दोनों एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जीव में ये दोनों एक दूसरे से जुड़े होते हैं। पर परमात्मा में निरपेक्ष चेतना होती है, क्योंकि वह किसी भौतिक पदार्थ के आश्रित नहीं होती। जीव की चेतना उसके भौतिक शरीर के आश्रित होती है। इससे जब उसका शरीर नष्ट होता है तब उसकी चेतना भी नष्ट हो जाती है। वैसे चेतना कभी नष्ट नहीं होती बल्कि वह उसके सूक्ष्म शरीर में अचेतनता के रूप में एनकोडिड अर्थात दर्ज होती रहती है। इसका मतलब है कि उसका सूक्ष्म शरीर अचेतनता से बना है। हालांकि यह अचेतनता उतनी ही है जितनी उसकी चेतनता होती थी। उसकी चेतनता का सारा डाटा उसकी अचेतनता में दर्ज रहता है। शायद कर्म फल इसी वजह से मिलता है। जैसे रात से दिन और दिन से रात बनते रहते हैं, वैसे ही जीवात्मा की चेतनता और अचेतनता एक दूसरे को क्रमवार बनाते रहते हैं।

अब हम क्रिया और प्रभाव के परस्पर संबंध पर पुनः चलते हैं। जीवात्मा में परमात्मा की तरह चेतना रूपी प्रभाव असीमित नहीं है। जीवात्मा में यह प्रभाव सीमित होता है, इसलिए इससे क्रिया भी सीमित ही होगी। क्योंकि शरीर रहित जीवात्मा में प्रभाव शरीर युक्त जीवात्मा का उल्टा होगा इसलिए किया अभी उलट ही होगी। उलट का मतलब यह नहीं कि उलटे काम होते रहेंगे बल्कि यह कि वे काम छाप या सूक्ष्म रूप में होंगे। इसलिए स्थूल रूप में शरीर युक्त आत्मा जो कुछ सोचता था उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना उसकी आत्मा में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे अपनी शरीररहित अवस्था में अपने द्वारा सोचने का अनुभव होगा। हालांकि वैसा अनुभव नहीं जैसा जीवित शरीर करता था बल्कि सूक्ष्म व तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। यह उसके सूक्ष्म शरीर का मन हो गया। जीव आत्मा शरीर में रहते हुए जो बुद्धि से निर्णय लेता था, उनसे भी उसकी चेतना बढ़ी। वह भी उसकी आत्मा में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे मृत्यु के बाद अपने द्वारा निर्णय लेने का अनुभव होगा। हालांकि वैसा नहीं जैसा उसका जीवित शरीर करता था बल्कि सूक्ष्म व तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप का अनुभव। यह उसके सूक्ष्म शरीर की बुद्धि होगी। शरीर युक्त आत्मा जो अहम भाव अनुभव करता था, उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज होगी अर्थात समकक्ष अचेतनता के रूप में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे अपने अहम भाव का अनुभव होगा। हालांकि वैसा अनुभव नहीं जैसा उसका जीवित शरीर करता था, बल्कि सूक्ष्म या तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। जब शरीर नहीं है, तब तरंग तो बन ही नहीं सकती। शरीरयुक्त आत्मा जो कर्मेंद्रियों के द्वारा किए गए कामों को अनुभव करता था, उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह जितनी थी उतनी ही उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज हो गई। उस दर्ज सूचना से उसे अपनी कर्मेंद्रियों वाला अनुभव मिलेगा। हालांकि वैसा अनुभव नहीं जैसा उसका जीवित शरीर करता था, बल्कि सूक्ष्म और तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। शरीरयुक्त आत्मा जो ज्ञानेंद्रियों के द्वारा किए गए कामों को अनुभव करता था, उनसे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज होगी। उस दर्ज सूचना से उसे अपनी ज्ञानेंद्रियों वाला अनुभव मिलेगा। हालांकि वैसा नहीं जैसा उसका जीवित शेर करता था बल्कि सूक्ष्म और तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। शरीरयुक्त आत्मा जो अपने अंदर पांचों प्राणों को अनुभव करता था, उससे उसकी चेतना बढ़ी। वह चेतना भी उसकी आत्मा में सूक्ष्म रूप में दर्ज हो गई। उस दर्ज सूचना से उसे अपने प्राणों वाला या सांस लेने वाला अनुभव मिलेगा। हालांकि वैसा नहीं जैसा उसका जीवित शरीर अनुभव करता था, बल्कि सूक्ष्म और तरंगरहित या अपरिवर्तनीय रूप में। इस तरह से जीवात्मा का पूरा सूक्ष्म शरीर बन जाता है। यह पूरी तरह से उसके सबसे नजदीकी स्थूल शरीर के जैसा ही होता है, क्योंकि उसका प्रभाव सबसे ज्यादा होता है। वैसे तो जीव आत्मा ने अनगिनत योनियों में जन्म लिया होता है। इसीलिए आत्मा को मरने के बाद भी अपने परिवर्तनरहित और तरंगरहित अंधेरे में अपने सबसे नजदीकी शरीर का अनुभव होता रहता है। उसे लगता ही नहीं कि वह नष्ट हो गया है या उसकी मृत्यु हो गई है। इस सूक्ष्म शरीर को पूरी तरह से डिकोड करने का तरीका केवल कुंडलिनी योग ही है।

कुंडलिनी योग से एक कलाकार अपने फिल्मी किरदार वाले नकली रूप के चंगुल से छूट कर अपने असली रूप को पहचान लेता है

दोस्तों दुनिया के सारे अनुभव आत्मा को ही होते हैं। आत्मा ही मन की लहरों की तरह बनकर अपने आप को लहरों के रूप में महसूस करती है। मतलब आत्मा एक नकलची बंदर की तरह है। यह मन की नकल करती रहती है। आत्मा किसी भी दूसरी चीज को महसूस नहीं कर सकती। यह सिर्फ अपने आप को महसूस कर सकती है। अपने से अन्य को महसूस करने के लिए यह अन्य का रूप धारण करके अपने आप को ही महसूस करती है। सीधे तौर पर किसी अन्य को नहीं। इसका मतलब है कि अगर यह अन्य के जैसी ना बन कर अपने मूल रूप या असली रूप में ही रहे तो भी यह अपने को तो महसूस करती ही रहेगी। एक कलाकार जोकर का रूप बनाकर अपने को जोकर के रूप में महसूस करता है। अगर वह जोकर न भी बने तो भी वह अपने को अपने मूल कलाकार के रूप में भी तो महसूस करेगा ही। कभी वह खलनायक का रूप बन कर अपने को खलनायक के रूप में महसूस करता है, तो कभी नायक के रूप में। पर उसका अपना मूल कलाकार का रूप तो एकमात्र वही अपरिवर्तित रहता है। एक जोकर भी खाना खाता है, खलनायक भी खाना खाता है। नायक भी खाना खाता है, और मूल कलाकार भी खाना खाता है। मतलब मूल कलाकार के सभी रूप सभी एक जैसे मूलभूत काम करते हैं। केवल वे बाहर से ही अलग अलग दिखते हैं। इसी तरह मूल आत्मा भी सभी काम करती है। वह मनुष्य के रूप में भी सभी काम करती है, और पशु के रूप में भी सभी जीवन के मूलभूत काम करती है। केवल बाहर बाहर से देखने पर ही सभी रूप अलग-अलग दिखते हैं। कई कलाकार ऐसे होते हैं जो अपने नकली रूपों में ऐसे डूब जाते हैं कि उन्हें अपने असली रूप का ध्यान ही नहीं रहता। कहते हैं कि दिग्गज सिने कलाकार राजेश खन्ना भी एक ऐसे ही कलाकार थे। वह बहुत उम्दा ढंग से अपने किरदार के रोल को निभाते थे। वह अपने किरदार में जान डाल देते थे। तो स्वाभाविक ही है कि आदमी के लिए उस किरदार से वापस निकलना मुश्किल होगा ही। इससे वे अपनी असली जिंदगी में अवसाद में आ जाते थे, और अपनी कलाकारी के नकली रूपों की यादों और भावनाओं में अक्सर खोए रहते थे।

आत्मा के साथ भी लगभग ऐसा ही होता है। वह अपने किस्म किस्म के शरीरों के रूपों की यादों में खुश हुई रहती है और अपने असली मूल रूप को लगभग भूल ही जाती है। शायद जो लोग बहुत-बहुत भौतिकता और गुणवत्ता के साथ या लगन के साथ या आसक्ति के साथ दुनिया में काम करते हैं, उनके साथ ऐसा ज्यादा होता है। हालांकि वे जल्दी ही इस समस्या को समझकर इससे बाहर भी निकल जाते हैं। जो ऐसे ही ईजी गोइंग वे या आरामफरोशी में जिंदगी गुजार देते हैं, उन्हें इस समस्या का पता ताउम्र नहीं चल पाता, जिससे वे इससे बाहर भी नहीं निकल पाते। यह एक पेचीदा मामला है।

शास्त्र कहते हैं कि आत्मा चेतना से भरपूर है। इसको लेखन के माध्यम से सरल करने की जरूरत है। आत्मा में चेतनता का मतलब यह होता है कि आत्मा चेतन मनुष्य के जैसे सभी काम करती है और सभी फल भोगती भी है। अब अगर आत्मा मनुष्य की तरह सभी कर्म करेगी तो उसके अंदर सभी कर्मेंद्रियों की उपस्थिति खुद ही सिद्ध हो गई। मतलब आत्मा के अंदर विभिन्न काम करने वाली हाथ, पैर, वाक, उपस्थेंद्रिय, और जननेंद्रिय, ये पांचो कर्मेंद्रियां विद्यमान हैं। इसी तरह अगर आत्मा मनुष्य की तरह सभी फल भोगती है तो उसके अंदर सभी ज्ञानेंद्रियों की उपस्थिति खुद ही सिद्ध हो गई। मतलब आत्मा में फल या ज्ञान भोगने वाली आंख, कान, त्वचा, नाक और जीभ, ये पांचों ज्ञानेंद्रियां विद्यमान है। देखो, थोड़ा समझने की जरूरत है। हमने तरीका नहीं बल्कि प्रभाव पकड़ना है। चेतना को दर्शाने वाला मुख्य प्रभाव आनन्द है। सभी कर्मेंद्रियां और ज्ञानेंद्रियां इस आनन्द प्रभाव को प्रकट करती हैं, मतलब चेतना को प्रकट करती हैं। क्योंकि मूल आत्मा परमानंद स्वरूप है, इसलिए चेतना का प्रभाव अनंत होने से परम चेतना भी उसमें अनंत ही मानी जाएगी। जब उसमें प्रभाव अनंत हो गया, तब उस प्रभाव को पैदा करने वाले तरीके अपने आप ही अनंत सिद्ध हो गए। मतलब आत्मा में सभी कर्मेंद्रियां और ज्ञानेंद्रियां अनंत रूप में मौजूद हैं। यही गीता में विराट रूप का वर्णन है, जिसमें उनके सहस्र हाथ, सहस्र पैर, सहस्र मुख आदि बताए गए हैं।

जब आत्मा मनुष्य शरीर के रूप में जन्म लेती है तो वह एक सीमित चेतना वाले व्यक्ति के रूप में अभिनय कर रही होती है। यह ऐसे ही है जैसे एक अरबपति कलाकार फिल्म में एक भिखारी का अभिनय कर रहा होता है। भिखारी के रूप में होने से उसकी चेतना बहुत घट जाती है। उसकी कर्मेंद्रियां कमजोर होती हैं और उनसे कर्म भी बहुत कम होते हैं। इसी तरह उसकी ज्ञानेंद्रियां भी कमजोर होती हैं और वे बहुत थोड़े फलों का ही अनुभव करती हैं। हो सकता है कि कोई अरबपति कलाकार अपने असली रूप को भूलकर पूरी उम्र के लिए भिखारी के रूप में ही फंसा रह जाए। ज्यादातर आत्माओं के साथ तो ऐसा ही होता है। वे अपने परम चेतन रूप को भूलकर सीमित चेतना वाले मनुष्य आदि शरीरों के रूप में ही बंध कर रह जाती हैं। शायद ऐसा आसक्ति से ही होता है। कुंडलिनी योग से जब आसक्ति मिटती है तब आत्मा अपने शुद्ध मूल रूप को जागृति के रूप में पहचान लेती है। पहचानना अलग चीज है और उसे प्राप्त करना अलग। हां, यह जरूर है कि किसी चीज को पहचान कर उसे प्राप्त करना आसान हो जाता है। मेरे स्वप्नकालिक आत्मा के साक्षात्कार से ऐसा लगता है कि आत्मा बेस लेवल पर संबंधित शरीर के सारे काम कर सकती है। अनुभव का आधार तो आत्मा ही है। शरीर की सहायता से उस अनुभव को ज्यादा स्थूलता, तरंगता और परिवर्तनशीलता मिलती है। पर आदमी इस तड़क-भड़क में आकर आत्मा के मूल अनुभवों को भूल ही जाता है।

कुंडलिनी योग से आत्मा की चेतनता बढ़ने से वह स्वर्ग को जाती है

दोस्तों मृत्यु के बाद आत्मा की अवस्था को जानना एक बहुत पेचीदा काम है। कठोपनिषद के नचिकेता को यमराज ने वर देने के वचन के पालन की मजबूरी से ही यह रहस्य बताया था। यमराज ने कहा था कि इसका पूरा रहस्य उनके सिवा देवता आदि भी कोई नहीं जानते। आत्मा सूक्ष्म शरीर से युक्त होती है। मतलब आत्मा जीवित प्राणी द्वारा किए जाने वाले सभी काम कर सकती है। तो फिर क्या परमात्मा भी सूक्ष्म शरीर से युक्त होता है? शास्त्र कहते हैं कि परमात्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों से परे हैं। पर तब आत्मा की तरह परमात्मा की चेतनता कैसे सिद्ध होगी। चेतना तो शरीर से और उससे किए जाने वाले कामों से ही सिद्ध होती है।

शास्त्रों में कहा गया है कि प्रलय का समय खत्म होने पर परमात्मा ने इच्छा जाहिर की कि वह अकेला ऊब रहा है, इसलिए वह एक से अनेक रूप हो जाए। इससे सृष्टि का विकास शुरू हुआ। इच्छा मन से होती है, और निर्णय बुद्धि से होता है। अपने आप का अहम तो परमात्मा में है ही। यह शुद्ध अहम है, विकृत अहंकार नहीं। फिर जो कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों से होने वाले सृष्टि निर्माण और विकास के काम निरंतर हो रहे थे, उन्हें एक प्रकार से परमात्मा ही कर रहे थे। आज भी वही कर रहे हैं। उन इंद्रियों को चलाने वाले प्राण भी परमात्मा के अंदर ही थे। मतलब चेतनता के सारे अंग या गुण मूल रूप में परमात्मा के ही हैं। गीता में भी भगवान के विराट शरीरयुक्त रूप का वर्णन किया गया है।  इस रूप में भगवान की अनगिनत विशेषताएँ हैं, जैसे कि उनके अनेक मुख, अनेक आँखें, अनेक बाहें, और अनेक पैर हैं। बाद में ये चेतना को अभिव्यक्त करने वाले सारे गुण और अंग साधारण जीव या मानव शरीर में निर्मित हुए, जिसमें आत्मा का वास होने लगा। आत्मा भी परमात्मा का ही अंश है। वह शरीर में आकर अपने मूल परमात्मा की अनंत चेतना को भूल गया और शरीर की सीमित चेतना से बंध गया। फिर जितनी शरीर की चेतनता होती थी, उतनी ही उसमें भी रहने लगी। शरीर के मरने के बाद शरीर वाली चेतना उसमें सूक्ष्म शरीर के रूप में समा जाती थी। इसीलिए पशुओं की आत्मा की चेतनता कम होती है। इसीलिए पशु की आत्मा किसी से मिलने नहीं आती और ना किसी से बात कर पाती है, क्योंकि पशु खुद भी बात नहीं कर पाते। परमात्मा को जो तीनों शरीरों से परे बताया गया है, इसका मतलब यही लगता है कि हैं तो परमात्मा के भी यह तीनों शरीर पर वह इनसे बंधा नहीं है, और अपने पूर्ण सच्चिदानंद स्वरूप से जरा भी नहीं डगमगाता। यह तो आश्चर्य ही है? यह उच्चतम कोटि की अनासक्ति ही है। कुल मिलाकर अनासक्ति से बढ़कर कोई धर्म नहीं लगता। मुझे इसी में सारे धर्म और नियम समाए हुए लगते हैं। मानवता, जो धर्म का सबसे मूलभूत आधार है, वह भी अनासक्ति से ही जुड़ा हुआ है।

हां, तो हम कह रहे थे कि आदमी की चेतनता उसके मरने के बाद उसके सूक्ष्म शरीर में चली जाती है। मेरी इस बात के लिए शास्त्र भी प्रमाण हैं। शास्त्रों में आता है कि अच्छे कर्म करने से स्वर्ग मिलता है। अच्छे कर्म से आदमी का स्वभाव व दृष्टिकोण भी अच्छा हो जाता है। इससे उसका सूक्ष्म शरीर भी अच्छा हो जाता है। अच्छे सूक्ष्म शरीर को ही स्वर्ग का मिलना कहा गया है। स्थूल शरीर तो स्वर्ग जा नहीं सकता। कहावत भी है कि मरे बगैर स्वर्ग नहीं जाया जाता। मतलब आदमी के अच्छे कर्म से जो उसके सूक्ष्म शरीर की चेतनता बढ़ती है, वही उसे मरने के बाद स्वर्ग का सुख प्रदान करती है। चेतनता ही आनंद है, चेतनता ही ज्ञान है, चेतनता ही सुख है। स्वर्ग ही आनंद है, स्वर्ग ही ज्ञान है, स्वर्ग ही सुख है। इसी तरह शास्त्र कहते हैं कि बुरे कर्म करने से नरक मिलता है। बुरे कर्म करने से आदमी का स्वभाव व दृष्टिकोण भी बुरा हो जाता है। इससे उसका सूक्ष्म शरीर भी बुरा हो जाता है। बुरे सूक्ष्म शरीर को ही नर्क का मिलना कहा गया है। मतलब आदमी के बुरे कर्म से जो उसके सूक्ष्म शरीर की चेतनता घटती है अर्थात उसकी जड़ता बढ़ती है, वही उसे मरने के बाद नर्क का दुख प्रदान करती है। जड़ता ही अज्ञान है, जड़ता ही दुःख है। नर्क ही अज्ञान है, नर्क ही दुख है।

इन बातों से स्पष्ट है कि कुंडलिनी योग से आत्मा की चेतनता बढ़ती है। आत्मा यहां जीवात्मा का ही पर्याय है। शुद्ध आत्मा को तो परमात्मा ही कहना चाहिए। वह तो पहले से ही परम चेतन है। उसकी चेतनता कैसे बढ़ सकती है। कई जगह आत्मा और जीवात्मा का भेद बता कर भ्रम पैदा किया जाता है। वैसे ऐसा भी नहीं है। वे विस्तार से समझा रहे होते हैं। वैसे अगर जीवात्मा और परमात्मा दोनों के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग किया जाए तब भी विषय के अनुसार शब्द का भाव समझ में आ जाना चाहिए। पर सभी लोगों को बुद्धि स्तर एक जैसा नहीं होता। कुंडलिनी योग से सूक्ष्म शरीर में भरा हुआ विचारों का कचरा साफ हो जाता है। इससे आदमी में काम करने की और ज्ञान को ग्रहण करने की शक्ति आ जाती है। इसे वह अनासक्ति से करता है क्योंकि योग से उसका ऐसा ही स्वभाव बन जाता है। अनासक्ति से उसकी ताकत की व्यर्थ बर्बादी रुकने से ताकत की बचत भी होती है। काम वह अच्छे ही करता है क्योंकि अनासक्ति से ज्यादातर अच्छे ही काम होते हैं।

कुंडलिनी योग के लिए ही आत्मा शरीर ग्रहण करती है

दोस्तों, अंधेरे में किसी का पूरा व्यक्तित्व कैसे दिख सकता है? मतलब पूरा जीवित व्यक्ति उसकी आत्मा के अंधेरे में कैसे महसूस हो सकता है। ऐसा तभी हो सकता है अगर उसके द्वारा उसके जीवन काल में कही गई व सोची गई सभी बातें, किए गए सभी व्यवहार व किए गए सभी काम उस अंधेरे में दर्ज हों। उस अंधेरे में सभी कुछ अलग अलग दर्ज होना चाहिए। अगर सब से एक ही अंधेरा कम या ज्यादा होता रहा, तब तो वह अंधेरा आम भौतिक अंधेरे जैसा होने से जड़ माना जाएगा। जैसे किस्म किस्म की वस्तुओं के रूप में किस्म किस्म का प्रकाश खत्म होकर रात के एक ही अंधेरे को बढ़ाता रहता है। अंधेरे को देखने से यह पता नहीं चलता कि इसमें कौन-कौन सी किस्म की वस्तुओं के रूप में कौन कौन से किस्म का प्रकाश समाया हुआ है। पर किसी आदमी की आत्मा के अंधेरे को महसूस करते हुए हमें उस आदमी के मन में विद्यमान किस्म किस्म की वस्तुओं के रूप में किस्म किस्म के प्रकाश समाए हुए लगते हैं। हालांकि फिर भी एक ही अविभाजित अंधेरा महसूस होता है। यह आश्चर्य ही है। शायद ब्लैकहोल में भी ऐसा ही होता हो। है तो उसमें एक ही अविभाजित अंधेरा, पर अगर कोई उसे योग आदि से गहराई से महसूस करे तो शायद उसमें उसके सभी निगले हुए पदार्थ महसूस होए, बेशक सूक्ष्मरूप में ही। विज्ञान भी कहता है कि सूचना कभी नष्ट नहीं होती। हो सकता है कि ब्लैकहोल में भी सभी पृथक पृथक पदार्थों की सूचना पृथक पृथक रूप में दर्ज या एनकोडिड हो। फिर जब उस ब्लैकहोल से नया ब्रह्मांड या तारा बनता हो तो वह सूचना फिर से पहले के जैसे स्थूल रूप में प्रकट हो जाती हो। हालांकि विज्ञान इसे नहीं मानता। इसलिए इसे एक विचारप्रयोग ही समझ लो। वैसे भी बहुत से क्षेत्र हैं, जो आधुनिक विज्ञान की समझ से परे है। अध्यात्म भी इनमें से एक है। इसीलिए कहते हैं कि आत्मा चेतन है। मतलब इसमें वह सबकुछ है जो जीवित प्राणी के मन में विविध प्रकार से है। बेशक मन में वह स्थूल रूप में होता है और आत्मा में सूक्ष्म रूप में। पर यह सिर्फ कहने की बात है और यह सापेक्ष है। आत्मा को महसूस करते हुए हमें स्थूल सूक्ष्म का जरा भी अंतर महसूस नहीं होता। हमें पूरा जीवित व्यक्ति उस अंधकारमय आत्मा के रूप में महसूस होता है। यहां तक कि स्वयं आत्मा को भी ऐसा लगता है कि वह तो पहले की तरह पूर्ण जीवित है। पता तो उसे होता है कि अब वह शरीर के बंधन से छूट गई है, पर उसे वह कोई अपने में बदलाव नहीं दिखता। मतलब वही पुराना व्यक्तित्व पर कुछ नए रूप में जैसे कि उसमें व्यापकता, अनश्वरता जैसे अतिरिक्त गुण आ जाते हैं, बेशक परमात्मा की तरह पूर्णतः नहीं पर सापेक्ष रूप में। मतलब शास्त्रों में जिसे सूक्ष्म शरीर कहा गया है उसके रूप में स्वयं आत्मा ही होती है।

शास्त्रों का सूक्ष्म शरीर आत्मा ही है। थोड़ा शब्दों को श्रृंगार देने के लिए ही सूक्ष्म शरीर का विस्तार से वर्णन है। सूक्ष्म शरीर आत्मा, बुद्धि, मन, अहंकार, पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों और पांच प्राणों से युक्त कहा गया है। इसका मतलब है कि आत्मा सोच सकती है, निर्णय ले सकती है, अपने अहम को महसूस कर सकती है, सुन सकती है, बोल सकती है, सूंघ सकती है, स्पर्श को महसूस कर सकती है, देख सकती है, हाथ से काम कर सकती है, पैर से चल सकती है, जीभ से चख सकती है, जननेंद्रिय और उपस्थेंद्रिय का कर्म कर सकती है। फिर आत्मा शरीर को क्यों धारण करती है। शायद इसीलिए ताकि उसे लहरें मिल सके। और इसलिए भी ताकि वह विकास कर के परमात्मा तक पहुंच सके। शास्त्रों में कहते हैं कि प्रेम की प्राप्ति के लिए ही आत्मा जन्म ग्रहण करती है। बात एक ही है। मन की लहरों से ही तो प्रेम बनता है। सीधे शब्दों में यही क्यों न कहें कि आत्मा कुंडलिनी योग के लिए ही शरीर ग्रहण करती है, क्योंकि कुंडलिनी योग से ही प्रेम बढ़ता है और इसी से आत्मा की मलिनता दूर होने से आत्मा का विकास भी होता है।

तो मैं वही कह रहा हूं कि आत्मा ने मेरे साथ बात की थी। अगर बात की तो उसने सोचा भी होगा। सोचा होगा तो निर्णय भी लिया होगा। अगर मेरे से बात की तो मुझे देखा भी होगा और मेरी बात भी सुनी होगी। अपने को या अपने अहंकार को तो वह महसूस करेगी ही, तभी बात कर पाएगी। मतलब उसमें सभी ज्ञानेंद्रियां थी। वाणी मतलब वाक एक कर्मेंद्रिय मानी जाती है। मतलब उसमें कर्मेंद्रिय भी थी। साथ में वह मुझे एक दूर जगह पर चल रही उस विशेष क्रियाशीलता के बारे में बता रही थी जिससे मैं प्रभावित हो सकता था। मतलब वह पैरों से चलकर वहां गई। उसके बारे में पता किया और मुझे उसकी सूचना दी। पैर भी एक कर्मेंद्रिय है। अपने शरीर वाली अवस्था के समय उस आत्मा को उस क्रियाशीलता के बारे में कुछ पता नहीं था। शरीर को इतने सारे काम करने के लिए प्राणों की और प्राणवायु की आवश्यकता होती है। बिना वायु के तो पत्ता भी नहीं हिलता। मतलब आत्मा बिना प्राणवायु ग्रहण किए या बिना सांस लिए ही प्राणों का काम भी कर रही थी। प्रकारांतर से या समझाने के लिए ऋषियों ने ऐसा लिखा है कि सूक्ष्म शरीर अर्थात जीवात्मा में पांच प्राण भी होते हैं, जो सूक्ष्मशरीर के विभिन्न काम करने में मदद करते हैं। आत्मा तो सूक्ष्म शरीर का आधार होने से उसमें सबसे प्रमुख तत्व है ही। बाकि शेष सारे तत्व तो आत्मा के ऊपर आधारित होने से आधेय ही हैं।

कुंडलिनी योग विचार-लहर के अंधेरे को मिटाता है

दोस्तों, इस पोस्ट में हम थोड़ा गहरे दर्शन की तरफ जा रहे हैं। अगर कोई ज्यादा गहराई में ना जाना चाहे तो वे इस पोस्ट को स्किप भी कर सकते हैं। आओ, पहले हम आत्मा में लहर बनने की शुरुआत को समझते हैं। सबसे पहले आत्मा पूरी तरह शुद्ध था। वह परमात्मा जैसा ही था। फिर वह किसी शरीर के साथ जुड़ गया। मस्तिष्क ने उस आत्मा में एक आभासी हलचल या लहर पैदा की। वह जो लहर बनी उसने आत्मा के प्रकाश को ढक दिया। कितना ढका? उतना ही जितना एक लहर का प्रभाव था। फिर दूसरी लहर से आत्मा का अंधेरा और बढ़ गया। तीसरी से और, चौथी से और। यह सिलसिला चलता गया। यह ऐसे ही है जैसे पेड़ पर कम पत्ते से उसकी जमीन पर कम घनी छाया बनती है। जैसे-जैसे पत्तों की संख्या बढ़ती जाती है, वैसे वैसे ही छाया की सघनता भी बढ़ती जाती है। एक प्रकार से ज्यादा घने पत्तों की छाया में उससे कम घने पत्तों के हर एक स्तर की सूचना दर्ज है। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी चीज की ज्यादा मात्रा के अंदर उस चीज की सभी कम मात्राएं खुद ही शामिल होती हैं। आत्मा के साथ वैसा ही होता है। उसकी ज्यादा लहरों से बनने वाले अंधकार के अंदर उसकी कम लहरों के हर एक स्तर से बनने वाले अंधकार खुद ही शामिल रहते हैं। या यूं कहो कि हर एक किस्म की लहर ने उसी विशेष किस्म का अंधकार आत्मा में पैदा किया। मतलब कि आज तक जितनी लहरें बनी, उतने ही और वैसे ही अंधकार आत्मा में बने। मतलब हर एक विचार रूपी लहर उसके जैसे विशेष अंधकार के रूप में आत्मा में दर्ज है। बेशक सतही तौर पर हमें आत्मा में वे अंधकार अलग-अलग महसूस न होएं। यह ऐसे ही है कि एक पेड़ के हर एक किस्म की मात्रा के पत्तों की सूचना उस पेड़ की छाया में उसके अपने समय में दर्ज हुई थी। पत्तों के नए स्तर की छाया बनने पर पत्तों के पुराने स्तर की छाया मिट जाती है। पर आत्मा में नई लहर से नए अंधकार के बनने पर पुरानी लहरों से बने पुराने सभी अंधकार दर्ज रहते हैं, वे मिटते नहीं है। इसीलिए पेड़ की छांव को देखने से केवल एक ही छांव महसूस होती है और पुरानी अन्य छांवों का अनुभव नहीं होता। पर आत्मा के अंधेरे को महसूस करने पर ऐसा महसूस होता है कि वह अंधेरा तो एक ही है, पर उसमें उसकी अनगिनत शरीरों वाली अनगिनत जीवित अवस्थाओं की विभिन्न व सभी सूचनाएं दर्ज हैं। हालांकि यह बहुत सूक्ष्म आभास होता है, और अभिन्न जैसा ही लगता है। ऐसा तभी हो सकता है, अगर हर एक सूचना अलग अंधेरे के रूप में मौजूद हो। अगर पेड़ की छांव की तरह ही आत्मा के बड़े अंधकार के अंदर उसके पुराने अन्य सभी छोटे अंधकार मिट जाया करते या दब जाया करते तो सभी आत्माएं एक जैसी हुआ करतीं। और फिर कर्म फल का सिद्धांत भी लागू ना होता। मतलब कि किसी भी कर्म की सूचना आत्मा में ना रहने से उसका फल भी ना मिला करता। पर ऐसा तो कुछ भी नहीं होता?

यहां यह बात गौर करने लायक है कि परमात्मा ने किसी को जबरदस्ती बंधन में नहीं डाला। जीवात्मा को तो उसने बस कुदरत दिखाई ही थी। अगर जीवात्मा चाहता तो उसे नकार भी सकता था। पर उसने अपने शाश्वत रूप को छोड़कर उसको चुना। इससे वह बंध गया। मतलब परमात्मा तो उसे कुदरत का अतिरिक्त आनंद देना चाहता था। पर जीवात्मा की आसक्ति से उलटा हो गया, मतलब जो अपना शाश्वत आनंद था, वह भी चला गया।

पेड़ की घनी छांव के बाद यदि कुछ पत्ते गिर जाएं, तो वह पुरानी घनी छांव खुद ही मिट जाती है। पर गहरी लहरों के बाद आत्मा में अगर हल्की लहर बने, तो पुरानी गहरी लहर से बना अंधेरा खुद से नहीं मिटता। बेशक नई और हल्की या अनासक्ति वाली विचार रूपी लहर से नया और हल्का अंधकार आत्मा में जुड़ जाए। पेड़ की छांव जमीन से नहीं चिपकी रहती, पर छांव बनाने वाले पत्तों के हटने के साथ ही एकदम से हट जाती है। पर आत्मा का अंधेरा आत्मा से चिपका रहता है। बेशक उस अंधेरे को बनाने वाली विचार लहर हट जाए, पर अंधेरा नहीं हटता। शायद वह उस विचार लहर के नियमित रूप से बारबार के स्मरण से धीरे धीरे हटता है। शायद कुंडलिनी योग से ऐसा ही होता है।

कुंडलिनी योग से आत्मा पर पड़ी अंधेरे की छाप मिटती है

मन में लहर बनने को सतोगुण कहते हैं। लहर मिटने को तमोगुण कहते हैं। लहर बनने, मिटने के बीच के बदलाव की गतिशील अवस्था को रजोगुण कहते हैं। जब कोई विचार बनता है तो वह सतोगुण की लहर होती है और जब मिटता है तो तमोगुण का अंधेरा छा जाता है। होती वह भी लहर ही है पर अंधेरा होने से दिखती नहीं। जितनी लहर ऊपर को उठती है, नीचे भी उतनी ही डूबती है, मतलब पाताल या गर्त या अंधेरे की तरफ जाती है। वैसे देखा जाए तो शुरुआती आभासिक अस्तित्व सतोगुण का ही है। तमोगुण तो आत्मा पर उसकी आभासी छाप है जो अंधेरे के रूप में होती है। हैं तो दोनों गुण झूठे या आभासी ही, पर सबसे पहले निर्गुण आत्मा में सतोगुण की लहर पैदा हुई। फिर उससे तमोगुण बना, उससे फिर सतोगुण, उससे फिर तमोगुण, फिर सतोगुण और ऐसा यह सिलसिला अनादिकाल से चलता आ रहा है। निर्गुण आत्मा भी सतोगुण की तरह ही है, जैसे कि यह प्रकाशमान है, आनंद से भरी हुई है, और अस्तित्व से भरपूर है, पर उसमें आभासी लहरें नहीं हैं। शरीर के द्वारा उसमें आभासी लहरें बनने से वह सतोगुण से युक्त जीवात्मा बन गया। हालांकि मूल परमात्मा हमेशा वैसा ही निर्गुण बना रहता है। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर जब एक बार जीवात्मा में एक बार सतोगुण बन गया, तब तो उपरोक्तानुसार गुणों का सिलसिला चलना ही था। पेड़ से बीज और बीज से पेड़ बनता रहता है। यही जन्म मरण का खेल या रोग, जो कुछ भी कह लो है। यह मैं नहीं शास्त्र कह रहे हैं। आदमी या कोई भी जीव मरने से भी इसीलिए डरता है क्योंकि उसे अंदेशा होता है कि उसे फिर से कष्टों से भरे हुए नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। यह अंदेशा उसे इसलिए होता है क्योंकि वह प्रतिदिन अपने जीवन में गुणों का चक्रवत परिवर्तन देखता रहता है। अंधेरे को अनुभव करने के बाद उसे प्रकाश को भी अनुभव करना पड़ता है। वह लगातार अंधेरे में नहीं रह सकता। क्योंकि दोनों एकदूसरे के सापेक्ष हैं। इसीलिए उसे मृत्यु रूपी अंधेरे से जन्म रूपी प्रकाश की तरफ़ जाने का अवचेतन मन में आभास होता है। अगर लगातार मृत्यु बनी रहती तब तो वह सभी कष्टों से रहित मुक्ति ही होती। तब तो उससे कोई न डरा करता।

अंधेरे में विचाररूपी प्रकाशमान लहर की सारी सूचना दर्ज होती है। जलरूप जीव की बीच वाली समान सतह आत्मा है। मैने जीव को जलरूप इसलिए कहा क्योंकि उसमें भी जल की तरह तरंगें उठती रहती हैं। शायद जल को इसीलिए देवता कहा जाता है। जब नीचे दबी हुई या नीचे डूबी हुई लहर खत्म होकर सतह के स्तर तक पहुंचती है, तब आत्मा को अपनी शांत अवस्था महसूस होने लगती है। वह पूरी तरह से महसूस होए, उससे पहले ही नई लहर फिर से ऊपर उठ जाती है, और वही प्रक्रिया दोहराई जाती है। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। इस तरह से आदमी आत्मा की शांति को प्राप्त नहीं कर पाता। हालांकि आत्मा सतोगुण की ऊंची लहर और तमोगुण की नीची लहर के बीच की शांत अवस्था है। पर ऐसा कहते हैं कि कुंडलिनी जागरण के रूप में उसका अनुभव सतोगुण के चरम पर होने पर ही होता है। यह सतोगुण का चरम कुंडलिनी योग की ध्यान साधना से ही प्राप्त होता है। मुझे लगता है कि बौद्ध लोग परिवर्तनशील आत्मा को इसी कारण से सत्य मानते हैं, क्योंकि गुणों के बदलने से परिवर्तनशील आत्मा को अपरिवर्तनशील आत्मा की अपेक्षा कुण्डलिनी जागरण के रूप में सतोगुण के शिखर को छूने का अधिक अवसर मिलता है। यह सतोगुण का चरम कुंडलिनी योग की ध्यान साधना से ही प्राप्त होता है। वैसे जिस बीच वाली अवस्था को हम आत्मा कह रहे हैं, वह शुद्ध आत्मा नहीं बल्कि जीवात्मा है जिसमें प्रकृति के तीनों गुण साम्यावस्था में हैं। जो कुंडलिनी जागरण से अनुभव होती है, वह शुद्ध आत्मा है, जो निर्गुण या गुणातीत है, मलिन जीवात्मा नहीं। इसलिए यहां कोई विरोधाभास नहीं है।

इस तरह से हम देख सकते हैं कि आत्मा प्रकृति के तीनों गुणों को अपने ऊपर आरोपित करके महसूस करती है। मतलब आत्मा प्रकृति का ही रूप धारण कर लेती है। मतलब कि आभासी प्रकृति के तीनों गुणों का रूप धारण कर लेती है। जब प्रकृति ही अस्तित्वहीन है तो उसके तीनों गुणों का अस्तित्व भी कैसे हो सकता है। इसी को भ्रमपूर्ण संसार कहते हैं। इसका मतलब सभी बदलाव झूठे हैं, पर बुद्धिस्ट लोग क्षणिकवाद मतलब परिवर्तनवाद को सत्य मानते हैं। शायद उन्होंने पुरुष और प्रकृति के संयोग को ही शुद्ध आत्मा समझा है। या कुछ और भी हो सकता है। इसी को शास्त्रों में ऐसा कहा है कि दुनिया प्रकृति और पुरुष के संयोग से बनी है। असल में प्रकृति का अस्तित्व ही नहीं है। कंप्यूटर गेम की तरह यह आभासी है पर आत्मा इस आभासी प्रकृति के रूप को धारण करके उसे अस्तित्व या सत्ता दे देता है। असली अस्तित्व तो सिर्फ आत्मा का ही है। तभी तो अद्वैत वेदांत में कहा है कि आत्मा ही सब कुछ है। इसके अलावा कुछ नहीं।

पर बेशक प्रकृति आभासी ही है पर व्यवहार में यह अपना असर तो छोड़ती ही है, जो आत्मा के ऊपर दृष्टिगोचर होता है। इसलिए सांख्य दर्शन के प्रकृतिपुरुषवाद रूपी द्विसत्तात्मक दर्शन को ज्यादा व्यावहारिक दर्शन कहते हैं। वैसे तो सभी दर्शनों में एक दूसरे की छाप दिखती है। पूर्व मीमांसा दर्शन के अपूर्ववाद को ही देख लो। यह दर्शन कहता है कि किसी भी कर्म से आत्मा में अपूर्व पैदा होता है। वह अपूर्व उस कर्म का फल मिलने पर ही नष्ट होता है। वह अपूर्व उस कर्म के द्वारा आत्मा पर पड़ने वाली अंधेरे की छाप ही है, जिसमें कर्म की सारी सूचना दबी होती है। जब यह छाप स्थूल रूप में किसी घटना के रूप में सामने आती है तो उसे ही हम उस कर्म का फल मिलना कहते हैं। क्योंकि बाहर निकलने से अपूर्व की ऊर्जा क्षीण या नष्ट हो गई। इसलिए आत्मा पर दर्ज अंधेरे की छाप भी मिट जाती है। शायद योग से इसी तरह कर्म क्षीण होते हैं। कुंडलिनी योग से कर्म संबंधी विचार मन में उमड़ते रहते हैं जिससे आत्मा पर उन से बनी अंधेरे की छांव मिटती रहती है। बेशक फल मिलने की अपेक्षा वह धीरे-धीरे मिटती है, पर मिटती तो है। इसीलिए कहते हैं कि योग से पाप नष्ट होते हैं। आत्मा पर आदमी की हरेक क्रियाशीलता दर्ज हो जाती है। चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक। चाहे उस क्रियाशीलता को कितनी ही चालाकी से या अनासक्ति से क्यों न अंजाम दिया गया हो। शायद इसीलिए कहते हैं कि परमात्मा से कोई बात नहीं छुपती। आत्मा पर दर्ज छाप को ही हम संस्कार या अवचेतन मन कहते हैं। हम जो कुछ भी सीखते हैं या पढ़ते हैं, वह सब कुछ तो हमें याद नहीं रहता। पर उससे हमें अपने अंदर एक रूपांतरण सा महसूस होता है। यह उनसे आत्मा पे पड़ी छाप से ही महसूस होता है। इसी से मुझे लगता है कि पुरानी यादें आत्मा में भंडारित रहती हैं। मस्तिष्क तो सिर्फ उन्हें तरंगों के स्थूल रूप में अभिव्यक्त करने का काम करता है। आत्मा को सूक्ष्म तरंग मान लो। पुरानी यादों को इसके ऊपर आरोपित ऑडियो विजुअल के सूक्ष्म सिग्नल मान लो। मस्तिष्क को डिकोडर और एंप्लीफायर मान लो, जो आत्मा पर मौजूद सूक्ष्म सिग्नल को पुनः ऑडियो विजुअल के स्थूल विचारों में रूपांतरित और प्रवर्धित कर देता है। इसका प्रमाण है, बहुत से लोगों को उनके पिछ्ले जन्मों की घटनाओं का सही रूप में याद रहना। पिछ्ले जन्म के उनके शरीर, मस्तिष्क, मन आदि सब कुछ जलकर खाक हो गए थे। फिर वे यादें अगल जन्म को कैसे गईं। वे आत्मा के ऊपर रहकर ही जा सकती हैं, अन्य तो कोई तरीका नहीं है।

दोस्तो, मुझे लगता है कि मैं पिछ्ले जन्म में संगीत से जुड़ा हुआ था। सपने में मैं स्पष्ट और मधुर और भावपूर्ण धुनों में गाने, अकेले या जुलूस की भीड़ में उत्साहपूर्वक, विशेषकर देवी माता के भक्तिपूर्ण भजनों को अक्सर गाता हूं। कई गानों को तो मैंने उसी समय नींद से जागकर रिकॉर्ड भी कर लिया है। मैं अपने एक परिचित को जानता हूं जो कंप्यूटर से ही पूरा गाना तैयार कर लेता है। संगीत वगैरह सबकुछ सॉफ्टवेयर से एड हो जाता है। अगर माता की कृपा रही तो संभव है कि जल्दी ही मेरे सपने के भजनों की एक एलबम ही आ जाए।

कुंडलिनी योग से सतोगुण और तमोगुण के बीच का रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है

आदमी चाह कर भी अपने गुणों की हलचल को नहीं रोक सकता। प्राणवायु गुणों में ऐसे ही लहरें पैदा करती रहती है, जैसे वायु समुद्र में तूफान पैदा करती है। हालांकि जिन योगियों ने प्राणायाम आदि से प्राणवायु को वश में कर लिया होता है, वे काफी हद तक इन लहरों को नियंत्रित कर के अपने असली व गुणों के आधारभूत स्तर वाले जीवात्म स्वरूप को जान भी लेते हैं। एक आदमी को लें जिसने हमेशा तूफान वाला समुद्र ही देखा है, और कभी भी शांत और निश्चल समुद्र नहीं देखा है। वह समझेगा कि समुद्र हमेशा ऐसा ही होता है और वही उसका असली स्वरूप है। उसे समुद्र के, बिना लहर वाले, असली व आधारभूत रूप के जैसे निश्चल जीवात्मा रूप का कोई ज्ञान नहीं होगा। उसे अगर उसकी जगह कभी बिल्कुल शांत समुद्र दिख गया या मान लो कि पोलर रीजन का ठंड से जमा हुआ समुद्र दिख गया, तो वह कहेगा कि समुद्र सूख गया या खत्म हो गया। ऐसे ही जिंदा आदमी को मरा हुआ देखने पर लोग कहते हैं कि वह तो मर गया, पर आदमी कभी नहीं मरता। यहां यह उल्लेखनीय है कि यह शरीर के प्रति लापरवाही जैसे कि स्वयं को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति या आत्महत्या आदि का सकारात्मक मूल्यांकन नहीं है। शरीर तो मरता ही है। फिर पता नहीं कब नया शरीर मिले, कैसा जैसा मिले, क्या पता कितनी कठिनाइयों के साथ मिले, मिलने के बाद भी पता नहीं कितने समय जिंदा रहे, किसको पता। इसलिए शरीर का भलीभांति ख्याल तो रखना ही चाहिए। इस बात का असली मतलब यह है कि आदमी की आत्मा कभी नहीं मरती, क्योंकि आत्मा ही आदमी का असली रूप है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी ने हमेशा मन की लहरों के रूप वाले अर्थात बदलते गुणों वाले अपने स्वरूप को ही महसूस किया है। उसे पता ही नहीं है कि यह लहरों वाला स्वरूप उसका आधारभूत स्वरूप नहीं है। उसने कभी योग, ध्यान आदि से मन को शांत नहीं किया। तूफान वाले सभी समुद्र एक जैसे ही लगते हैं, क्योंकि उनमें पानी ढंग से नजर नहीं आता। पर जब तूफान शांत हो जाता है, तब किसी का पानी नीला तो किसी का हरा नजर आता है। किसी का पानी कम तो किसी का ज्यादा नमकीन होता है। किसी में शैवाल आदि समुद्री वनस्पति कम होती है तो किसी में ज्यादा। किसी में किसी किस्म के समुद्री जलचर होंगे तो किसी में किसी अन्य किस्म के। इसी तरह ताबड़तोड़ मानसिक तूफान वाले आदमी भी एक जैसे लगते हैं। जैसे ही हम उनके किसी गुण पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं, वह गुण उसी पल बदल जाता है। इसी वजह से तो मृत्यु के बाद की आत्मा के साक्षात्कार से ही उसके आधारभूत गुणों वाले स्वरूप के बारे में सही और विस्तृत सूचना मिल सकती है। हालांकि ऐसा नहीं कि टीवी की तरह सबकुछ दिखता है, पर उसके औसत सूक्ष्म स्वरूप का अनुभव होता है। बेशक वह रूप हमें कुछ घुटन भरा लग सकता है, क्योंकि हमें उसकी आदत नहीं है। पर उस जीवात्मा को तो ऐसा नहीं लगेगा क्योंकि वह तो अपने उस स्वरूप की अभ्यस्त हो चुकी होगी।

सृष्टि में जितनी जीवात्माएं हैं, समुद्र भी उतने ही हैं

यह बहुत रोचक विषय है और लिखते रहने से नई से नई गुत्थियां सुलझती रहती हैं। और अगर साथ में थोड़ा बहुत अनुभव भी हो तब तो कहने ही क्या। ऊंची उठी लहर को सुख या सतोगुण मान लो और समुद्र की सामान्य सतह से नीचे गिरी हुई लहर को दुख या तमोगुण मान लो। जीवन भर मन में ऐसा ही चलता रहता है। मरने के बाद मन या आत्मा समुद्र की सामान्य सतह जैसा हो जाता है। न लहर ऊपर को और न नीचे को। न सुख, न दुख। पर ऐसा नहीं है, क्योंकि अगर गुण हैं तो सुख और दुख तो साथ रहेंगे ही। यह तो त्रिगुणातीत परमात्मा ही है जिसमें न सुख है न दुख, सिर्फ़ निरपेक्ष आनंद है। ऐसा समझ लो कि इसमें सतोगुण और तमोगुण दोनों ही हैं। हालांकि दोनों कम मात्रा में हैं क्योंकि उनको उठाने या गिराने वाला अर्थात उनमें लहरें पैदा करने वाला शरीर नहीं है। यही गुणों की साम्यावस्था है। मतलब सतोगुण भी एक बराबर और तमोगुण भी एक बराबर। कोई कहेगा कि फिर सभी लोगों में तीनों गुणों की मात्रा अलग अलग कैसे होगी। देखो, जिसमें मृत्यु के समय ज्यादा सतोगुण होगा, वह मृत्यु के बाद वहीं फिक्स हो जाएगा मतलब बाद में भी ज्यादा बना रहेगा। यह ऐसे ही कि अगर ध्रुवीय समुद्र के जमते समय उसकी लहर ऊपर को उठी होगी तो वह जमने के बाद भी उतनी ही ऊपर उठी रहेगी, वहां से बदलेगी नहीं। यह भी सत्य है कि मृत्यु के समय अक्सर गुण वैसे ही रहते हैं जैसे उसके पिछले सारे गुणों और कर्मों का औसत रूप होता है। मतलब सब लोगों की आत्मा में अंधेरे की अलग अलग मात्रा होगी। चाहे दो व्यक्ति आपस में कितने ही ज्यादा नजदीकी क्यों न हों, दोनों की आत्माओं में अंधेरे की मात्रा एकसमान हो ही नहीं सकती। यह असंभव है। कुछ न कुछ फर्क तो रहेगा ही। इसीलिए तो कभी आत्मा के मामले में धोखा नहीं होता कि फलां की आत्मा गलती से फलां के शरीर में चली गई। जो कथा कहानियों में होता है, वो शिक्षात्मक रूपक ही लगता है। जब किसी के शरीर पर प्रेत आदि का कब्जा होता है तो वह साफ बताता है कि वह प्रेत है। इसीलिए उसे तांत्रिक आदि से भगाया जाता है। अगर किसी की आत्मा की फोटोकॉपी बनने की किसी में ताकत होती तो प्रेत भी बन जाता। फिर किसी को पता न चलता और उसे दूसरे के शरीर से कोई भगाता भी न। पर ऐसा नहीं होता। इसीलिए कहते हैं कि मृत्यु के समय की मानसिक स्थिति मृत्यु के बाद की गति को निर्धारित करती है। इसीलिए कई लोग मरने के लिए काशी जैसे तीर्थों में जाते हैं, कई मृत्यु के समय गीता आदि आध्यात्मिक ग्रंथ सुनते हैं। यहां पर एक पेच और खुलता है। बेशक मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा के जैसा परिवर्तनरहित और हलचल से रहित, शांत और व्यापक बन जाता है, पर दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। जीवात्मा निर्गुण जैसा लगता हुआ भी तीनों गुणों से बंधा होता है, पर परमात्मा असली निर्गुण अर्थात गुणातीत होता है। इसीलिए वह जीवात्मा से भी ज्यादा और यूं कहो कि परम सूक्ष्म, परम व्यापक, परम परिवर्तनरहित, परम शांत, और परम सच्चिदानंद रूप होता है। यह खासकर उन लोगों को समझना चाहिए जो परमात्मा और जीवात्मा को करीब एकजैसा मानने के धोखे में पड़े होते हैं। कई दफनाए हुए मृत शरीर आदि की पूजा करते हैं। कई ऐसा समझते हैं कि मरने के बाद उनका जन्नत का टिकट कटा हुआ है।

कुंडलिनी योग कामयाब संभोग में मदद करता है

कुंडलिनी योग सेक्स का एक अभिन्न अंग है

एक और रहस्यपूर्ण तथ्य जो मैं आपको बताता हूँ, वह यह है कि यौन संपर्क के दौरान भी यह मूल स्तर की आत्मा का संपर्क सबसे गहरा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सेक्स के समय व्यक्ति दो यौन साथियों को छोड़कर पूरी तरह से अकेला रहना चाहता है। न दुनिया की और न ही दुनियावी विचारों की दखलंदाजी चाहता है। यह प्रवृत्ति ही यौन मामलों में शर्मीलेपन की उत्पत्ति करती है। कोई भी सार्वजनिक रूप से सेक्स नहीं करना चाहता क्योंकि तब वह सेक्स नहीं बल्कि केवल एक नाटक होता है। यहाँ तक कि कोई भी अपने वास्तविक यौन अनुभव के बारे में बात नहीं करना चाहता, धोखेबाज़ों द्वारा प्रचारित यौन नाटक की तो बात ही छोड़िए। तो सोचो कि सांसारिक अराजकता से पूरी तरह से दूर मूल आत्मा के रूप से अधिक अकेलापन क्या हो सकता है। यहाँ तक कि संभोग के समय यौन ऊर्जा भी इतनी अधिक होती है कि यह उस अल्पकालिक मूल आत्मा के संपर्क के समय पर्याप्त से अधिक आनंद प्रदान करती है। इस तरह प्रेम भी बढ़ता है। यह आम तौर पर देखा जाता है कि दिवंगत आत्मा का संपर्क अक्सर तांत्रिक मिश्रित यौन वातावरण में होता है। इसका कारण एक ही है कि तंत्र की तीव्र यौन ऊर्जा उस अल्पकालिक घुटन भरे आत्मिक संपर्क को झेलने के लिए पर्याप्त शक्ति प्रदान करती है। साधारण सेक्स पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि इसमें मन पर कम नियंत्रण होता है और साथ ही, यह कम अवधि का होता है। कुंडलिनी योग आधारित तंत्र यौन अनुभव को बढ़ाता है क्योंकि यह कुंडलिनी ध्यान की मदद से अकेलेपन के स्तर को और ज्यादा बढ़ाता है जो आनंदमय और सफल सेक्स के लिए आवश्यक है। कुंडलिनी ध्यान एक मानसिक कुंडलिनी छवि को छोड़कर हर सांसारिक अराजकता को खत्म कर देता है। यह आवश्यक भी है क्योंकि हम मानसिक शक्ति को रोक कर नहीं रख सकते हैं, और ऐसा करते समय यह घुटन भरा होता है और आनंद भी रुक सा जाता है। फिर आनंद के बिना सेक्स कैसा। लेकिन कुंडलिनी छवि को ध्यान में रखते हुए, यह गहन आनंद का स्रोत बन जाता है। यह पूरी तरह से अकेलेपन के समान है क्योंकि मानसिक कुंडलिनी छवि कुछ भी भौतिक नहीं बल्कि केवल एक मानसिक रचना है। इसीलिए कहते हैं कि असली प्रेम एकबार में एक से ही हो सकता है, दो से नहीं। तंत्र भी लंबे समय तक एक ही साथी के साथ रहने की वकालत करता है। हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण और दिलचस्प है कि एक व्यक्ति जिसे कई साथियों द्वारा बुरी तरह से फटकार लगाई जाती है, वही केवल एक ही साथी के साथ पूर्ण शांति में रहना चाहता है। शायद संभोग में आनंद भी इसीलिए है क्योंकि यह आत्मा की सर्वाधिक गहराई तक जाने का प्रयास करता है, और आत्मा तो आनंद का खजाना है ही। वास्तव में सेक्स विज्ञान जितना जाना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा और विशाल है जैसा कि ओशो महाराज ने सच ही कहा है।

आत्मा और जगत प्रकाश और अंधकार का परस्पर खेल है

मुझे तो लगता है कि जिसे हम सतोगुण समझते हैं, वही नेपथ्य में तमोगुण बन रहा होता है। यह ऐसे है जैसे धूप से ही छांव बनती है। इसका मतलब है कि जीवात्मा ने शुरु से जो कुछ भी अनुभव किया है, वह सभी कुछ उसमें तमोगुण अर्थात अंधेरे के रूप में मौजूद है। आगे भी वह जो महसूस करती रहेगी, वह भी अंधेरे के रूप में दर्ज होता रहेगा। यह ऐसे ही है जैसे जितनी अधिक और जैसी धूप होगी, छांव भी उतनी ही ज्यादा और वैसी ही बनेगी। वृक्ष की जैसी पत्तियां होंगी, छांव भी वैसी ही बनेगी। अर्थात जैसा शरीर या मन या मस्तिष्क होगा, तमोगुण रूपी छांव भी उसकी वैसी ही बनेगी। मतलब कि छांव में उसको बनाने वाली धूप या रौशनी या उसकी पत्तियों से छनकर आई हुई धूप के बारे में पूरी सूचना दर्ज है। सतोगुण तो आत्मा का अपना शुद्ध रूप है ही। वह तो रहेगा ही। वह तो मिट नहीं सकता। यह हो सकता है कि तमोगुण की मात्रा के अनुसार वह कम या ज्यादा महसूस होए। अगर तमोगुण ज्यादा होगा तो सतोगुण कम होगा और अगर तमोगुण कम होगा तो सतोगुण ज्यादा होगा। रजोगुण भी आत्मा की उस स्वाभाविक चेष्टा के रूप में होगा जिसके तहत वह तमोगुण से सतोगुण की तरफ जाना चाहती है। इसका मतलब है कि हम अगर दुनिया को महसूस न करें, तो वह आत्मा में तमोगुण के रूप में दर्ज नहीं होगी। पर दुनिया से किनारा कर पाना भी संभव नहीं है। तमोगुण की बात तो बाद में आएगी, पहले भूखे मरने की नौबत आ सकती है। बीच वाला मध्य मार्ग है अनासक्ति का। मतलब दुनियादारी को बिना आसक्ति के अनुभव करना है। इससे दुनियादारी भी चलती रहेगी और उसकी छांव भी आत्मा पर नहीं जम पाएगी या कम जमेगी। ऐसा योग से आसानी से संभव है। शास्त्रों में आसक्तिरहित सात्त्विक तरीकों को अपनाने के लिए इसलिए बोला जाता है ताकि इसके सात्त्विक संस्कार मन में पड़ते रहें। सात्विक संस्कारों को मन से निकालने में कम मेहनत लगती है जिससे मुक्ति की संभावना बढ़ जाती है। यदि इनको मन में न डाला जाए तो ऊटपटांग संस्कार मन में पड़ते रहेंगे क्योंकि मन खाली नहीं रह सकता। इन्हें बाहर निकालना बहुत मुश्किल होता है जिससे मुक्ति की संभावना काफी घट जाती है। पर इसी से बात नहीं बनेगी। पिछ्ले अनगिनत जन्मों की दुनियादारी की छाप की कालिख जो आत्मा पर जमी है, उसे भी साफ करना पड़ेगा। वह भी कुंडलिनी योग से ही होगा, खासकर एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से। इससे आत्मा में सतोगुण बढ़ेगा और तमोगुण और रजोगुण कम हो जाएगा। रजोगुण इसलिए कम होगा क्योंकि अब नाममात्र के तमोगुण में इतना पोटेंशल नहीं है कि वह तेज गति से सतोगुण की तरफ जा सके। यह लेटेंट रजोगुण भी बिजली के दो विपरीत ध्रुवों के बीच के विभवांतर की तरह होता है। जितना ज्यादा अंतर उनके विपरीत आवेश के बीच में होगा, उतनी ही रफ्तार और अधिकता से विद्युत प्रवाह उनको जोड़ने वाले परिपथ में दौड़ेगा। शुद्ध आत्मा का सतोगुण तो सर्वोच्च और निश्चित निर्धारित है। बद्ध जीवात्मा के तमोगुण की मात्रा ही निर्धारित करेगी कि उनके बीच में रजोगुण रूपी विभवांतर कम होगा या ज्यादा। देखो, दोनों के बीच परिपथ तो तभी जुड़ेगा जब जीवात्मा को शरीर मिलेगा। फिर उनके बीच में मानसिक विचारों के रूप में खूब विद्युत प्रवाह बहेगा। वह जीवात्मा के तमोगुण के अनुसार कम ज्यादा होता रहेगा। इसीलिए तो पार्टी आदि में ड्रिंक आदि करने के बाद लोग तरोताजा होकर नई उमंग और जोश से अपने काम धंधे में पहले से भी ज्यादा लग जाते हैं। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है और अध्यात्म के मामले में हानिकारक भी हो सकता है। कई लोग लंबे समय तक अकेलापन बिताने के बाद नई और बढ़ी हुई शक्ति के साथ दुनियादारी में उतरते हैं। यह अकेलेपन की तमोगुण की ही शक्ति होती है। कुंडलिनी योग से तमोगुण घट जाता है। इससे सतोगुण और तमोगुण के बीच रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है। इसीलिए योगी का व्यवहार इंपलसिव या तुनकमिजाजी या अंध प्रगतिशील नहीं होता, बल्कि धीर, गंभीर और व्यवस्थाशील होता है। कई बार तंत्रयोगी देशकाल की मांग के अनुसार अस्थायी इंपलसिव व्यवहार प्राप्त करने के लिए अस्थाई रूप से तमोगुण को स्वीकार भी कर सकते हैं। बिना शरीर की जीवात्मा में यह रजोगुण लेटेंट विभवांतर के रूप में रहता है। मतलब अंधेरे से प्रकाश की तरफ जाने का बल तो लग रहा होता है, पर शरीररूपी विद्युत परिपथ न होने के कारण अंधकार प्रकाश तक जा नहीं पाता। मतलब तमोगुण सतोगुण नहीं बन पाता।