सविकल्प से निर्विकल्प तक: परमानंद से परे परम मुक्ति का मार्ग

निर्विकल्प समाधि सीधे उत्पन्न हो सकती है, जैसे कि केवल कुंभक, गहरी नींद जैसी अवस्था या अचानक अनुग्रह या शक्तिपात जैसे दुर्लभ मामलों में सविकल्प को दरकिनार करते हुए। जबकि पारंपरिक मार्ग क्रमिक अवशोषण पर जोर देते हैं, कुछ जागृति इस चरण को पूरी तरह से छोड़ देती है, मतलब सीधे निराकार में डूब जाती है। केवल कुंभक के साथ मेरा अनुभव इस संभावना की पुष्टि करता है, जहाँ किसी संरचित या संक्रमित प्रयास की आवश्यकता नहीं थी। हालाँकि, स्थिरीकरण महत्वपूर्ण है, चाहे कोई क्रमिक का या प्रत्यक्ष मार्ग का अनुसरण करे।

लेकिन मेरी निर्विकल्प समाधि की झलक में मेरी सविकल्प समाधि और उससे जुड़ी जागृति झलक के समान अनंत आनंद और प्रकाश क्यों नहीं था?

मेरी सविकल्प समाधि में मुख्यतः जागृति की झलक में अनंत या परम या सुपर सेक्स या परम यौन प्रकार का आनंद था, वह परम प्रकाश था जो अनुभवात्मक है, और भौतिक चकाचौंध से बिल्कुल अलग था, और पूर्ण एकता या अद्वैत- जो शब्दों से परे एक दिव्य अनुभव था। यह मुझे चेतना के अस्तित्व के शिखर की तरह महसूस हुआ, अर्थात अनंत के साथ पूर्ण विलय की तरह। पर फिर भी कुछ पाने की कसक बाकी थी। शायद यह निर्विकल्प समाधि को पाने की ही कसक थी। इसके विपरीत, केवल कुंभक द्वारा लगाई गई क्षणभंगुर निर्विकल्प समाधि में न तो प्रकाश था, न अंधकार, न परमानंद था, न शून्यता। यह शब्दों से परे कुछ था। ऐसा लग रहा था जैसे मैं गहरी नींद में था और बीच-बीच में स्वप्न जैसे क्षणभंगुर विचार आ रहे थे। लेकिन एक खास बात यह थी कि मैं इस अवस्था के प्रति सजग या जागरूक था। यह सिर्फ अपने बारे में शुद्ध जागरूकता थी, अन्य किसी के बारे में नहीं, मन के बारे में भी नहीं। अगर जागरूकता थी तो यह अपने आप में स्पष्ट है कि इसमें आनंद था। क्योंकि जागरूकता या सत्ता के साथ आनंद तो रहता ही है। और जहां सत्ता और आनंद होते हैं, वहां ज्ञान भी अवश्य रहता है। आज के सूचना के युग में भी देखा जाता है कि ज्ञान प्राप्ति से आदमी को सत्ता यानि उपलब्धि भी मिलती है और आनंद भी। इसीलिए परमात्मा को सच्चिदानंद भी कहते हैं। लेकिन मुझे उसमें सविकल्प समाधि की तरह प्रकाश और आनंद से भरा कोई अनुभव या सांसारिक, भौतिक या मानसिक अनुभवों का चरम नहीं मिला। हालाँकि इसमें संतुष्टि थी। संतुष्टि का मतलब ही है कि इसमें सब कुछ समाहित है। इसका मतलब है कि यह निर्विकल्प समाधि थी जो धीरे-धीरे विकसित हो रही थी। गहरी नींद में, आत्म जागरूकता भी नहीं रहती। अब मुझे इसका कारण समझ में आया। सविकल्प में, अभी भी एक सूक्ष्म पर्यवेक्षक है, एक परिष्कृत धारणा है जो आनंद और चमक को प्रकट करने में मदद करती है। साथ ही एक परिष्कृत न्यूरोकेमिस्ट्री है जो आनंद पैदा करने वाले रसायनों को छोड़ सकती है। इसका मतलब यह है कि यह पूरी तरह से शुद्ध आत्मा का आनंद नहीं हो सकता, बल्कि आत्मा की स्वयंजागरूकता के साथ न्यूरोकेमिकल्स का खेल हो सकता है। निर्विकल्प में वह खेल भी विलीन हो जाता है। केवल कुंभक की प्राणहीन अवस्था में मन न रहने से आनंद को बनाने वाले रसायन भी मस्तिष्क में नहीं बन पाते। तब केवल आत्मा और उसका स्वाभाविक आत्मबोध और आनंद ही बचता है। साक्षी होने वाला और साक्षी करने वाला कोई नहीं रहता, कोई द्वैत नहीं रहता, केवल शुद्ध अस्तित्व ही बचता है। केवल मानसिक रचना या अहंकार ही साक्षी बनने और साक्षी करने का काम कर सकता है। शुद्ध आत्मा शून्य है जो अपने अलावा किसी और चीज का साक्षी नहीं बन सकता और न ही साक्षी कर सकता है, यानी खुद को ही सीधे जानना इसका एकमात्र धर्म है। यह कोई अनुपस्थिति नहीं है, न ही यह कुछ ऐसा है जिसे वर्णित किया जा सके – यह बस है।

फिर भी, अजीब बात है कि इसका बाद का प्रभाव गहरा है। सविकल्प का आनंद फीका पड़ जाता है, लेकिन निर्विकल्प एक मौन उपस्थिति छोड़ जाता है जो आती या जाती नहीं है, बस रहती है। एक अजीब सा अहसास हमेशा और जन्म जन्मांतरों तक या जब तक इसमें पूर्ण स्थिति नहीं हो जाती रहता है कि कुछ चैन से भरा हुआ शून्य सा है जो हर तरह से मेरी मदद कर रहा है और मुझे अपनी तरफ खींच रहा है। मुझे यह अहसास जन्म से लेकर ही था। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि मुझे पहले किसी जन्म में निर्विकल्प समाधि की झलक मिली हो पर उसकी पूर्ण प्राप्ति न हुई हो। आत्मा की सुंदरता देखने की चीज नहीं है, यह जीने या महसूस करने की चीज है।

बहुत से लोग कहते हैं कि सविकल्प प्राप्त करने के बाद, निर्विकल्प प्राप्त करने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रयास गौण है। बल्कि इसका अर्थ यह है कि सविकल्प समाधि के बाद व्यक्ति अपने आप ही निर्विकल्प समाधि की ओर अग्रसर हो जाता है, क्योंकि सब कुछ प्राप्त कर लेने या संसार के शिखर को छू लेने के बाद संसार के प्रति चाहत या आसक्ति अपने आप ही समाप्त होने लगती है। लेकिन इसमें बहुत समय लग सकता है, कई जन्म भी लग सकते हैं। इसलिए इस प्राकृतिक प्रक्रिया को तेज करने के लिए निर्विकल्प के लिए भी प्रयास करना पड़ता है। साधना के रूप में जितना प्रयास करेंगे, उतनी ही जल्दी उसे प्राप्त करेंगे। निर्विकल्प के बाद भी मुक्ति के अंतिम द्वार सहज समाधि को प्राप्त करने के लिए प्रयास करने पड़ते हैं। किसी भी क्षेत्र और किसी भी स्थिति में प्रयास का महत्व कम नहीं होता।

कुंडलिनी योग से सतोगुण और तमोगुण के बीच का रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है

आदमी चाह कर भी अपने गुणों की हलचल को नहीं रोक सकता। प्राणवायु गुणों में ऐसे ही लहरें पैदा करती रहती है, जैसे वायु समुद्र में तूफान पैदा करती है। हालांकि जिन योगियों ने प्राणायाम आदि से प्राणवायु को वश में कर लिया होता है, वे काफी हद तक इन लहरों को नियंत्रित कर के अपने असली व गुणों के आधारभूत स्तर वाले जीवात्म स्वरूप को जान भी लेते हैं। एक आदमी को लें जिसने हमेशा तूफान वाला समुद्र ही देखा है, और कभी भी शांत और निश्चल समुद्र नहीं देखा है। वह समझेगा कि समुद्र हमेशा ऐसा ही होता है और वही उसका असली स्वरूप है। उसे समुद्र के, बिना लहर वाले, असली व आधारभूत रूप के जैसे निश्चल जीवात्मा रूप का कोई ज्ञान नहीं होगा। उसे अगर उसकी जगह कभी बिल्कुल शांत समुद्र दिख गया या मान लो कि पोलर रीजन का ठंड से जमा हुआ समुद्र दिख गया, तो वह कहेगा कि समुद्र सूख गया या खत्म हो गया। ऐसे ही जिंदा आदमी को मरा हुआ देखने पर लोग कहते हैं कि वह तो मर गया, पर आदमी कभी नहीं मरता। यहां यह उल्लेखनीय है कि यह शरीर के प्रति लापरवाही जैसे कि स्वयं को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति या आत्महत्या आदि का सकारात्मक मूल्यांकन नहीं है। शरीर तो मरता ही है। फिर पता नहीं कब नया शरीर मिले, कैसा जैसा मिले, क्या पता कितनी कठिनाइयों के साथ मिले, मिलने के बाद भी पता नहीं कितने समय जिंदा रहे, किसको पता। इसलिए शरीर का भलीभांति ख्याल तो रखना ही चाहिए। इस बात का असली मतलब यह है कि आदमी की आत्मा कभी नहीं मरती, क्योंकि आत्मा ही आदमी का असली रूप है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी ने हमेशा मन की लहरों के रूप वाले अर्थात बदलते गुणों वाले अपने स्वरूप को ही महसूस किया है। उसे पता ही नहीं है कि यह लहरों वाला स्वरूप उसका आधारभूत स्वरूप नहीं है। उसने कभी योग, ध्यान आदि से मन को शांत नहीं किया। तूफान वाले सभी समुद्र एक जैसे ही लगते हैं, क्योंकि उनमें पानी ढंग से नजर नहीं आता। पर जब तूफान शांत हो जाता है, तब किसी का पानी नीला तो किसी का हरा नजर आता है। किसी का पानी कम तो किसी का ज्यादा नमकीन होता है। किसी में शैवाल आदि समुद्री वनस्पति कम होती है तो किसी में ज्यादा। किसी में किसी किस्म के समुद्री जलचर होंगे तो किसी में किसी अन्य किस्म के। इसी तरह ताबड़तोड़ मानसिक तूफान वाले आदमी भी एक जैसे लगते हैं। जैसे ही हम उनके किसी गुण पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं, वह गुण उसी पल बदल जाता है। इसी वजह से तो मृत्यु के बाद की आत्मा के साक्षात्कार से ही उसके आधारभूत गुणों वाले स्वरूप के बारे में सही और विस्तृत सूचना मिल सकती है। हालांकि ऐसा नहीं कि टीवी की तरह सबकुछ दिखता है, पर उसके औसत सूक्ष्म स्वरूप का अनुभव होता है। बेशक वह रूप हमें कुछ घुटन भरा लग सकता है, क्योंकि हमें उसकी आदत नहीं है। पर उस जीवात्मा को तो ऐसा नहीं लगेगा क्योंकि वह तो अपने उस स्वरूप की अभ्यस्त हो चुकी होगी।

सृष्टि में जितनी जीवात्माएं हैं, समुद्र भी उतने ही हैं

यह बहुत रोचक विषय है और लिखते रहने से नई से नई गुत्थियां सुलझती रहती हैं। और अगर साथ में थोड़ा बहुत अनुभव भी हो तब तो कहने ही क्या। ऊंची उठी लहर को सुख या सतोगुण मान लो और समुद्र की सामान्य सतह से नीचे गिरी हुई लहर को दुख या तमोगुण मान लो। जीवन भर मन में ऐसा ही चलता रहता है। मरने के बाद मन या आत्मा समुद्र की सामान्य सतह जैसा हो जाता है। न लहर ऊपर को और न नीचे को। न सुख, न दुख। पर ऐसा नहीं है, क्योंकि अगर गुण हैं तो सुख और दुख तो साथ रहेंगे ही। यह तो त्रिगुणातीत परमात्मा ही है जिसमें न सुख है न दुख, सिर्फ़ निरपेक्ष आनंद है। ऐसा समझ लो कि इसमें सतोगुण और तमोगुण दोनों ही हैं। हालांकि दोनों कम मात्रा में हैं क्योंकि उनको उठाने या गिराने वाला अर्थात उनमें लहरें पैदा करने वाला शरीर नहीं है। यही गुणों की साम्यावस्था है। मतलब सतोगुण भी एक बराबर और तमोगुण भी एक बराबर। कोई कहेगा कि फिर सभी लोगों में तीनों गुणों की मात्रा अलग अलग कैसे होगी। देखो, जिसमें मृत्यु के समय ज्यादा सतोगुण होगा, वह मृत्यु के बाद वहीं फिक्स हो जाएगा मतलब बाद में भी ज्यादा बना रहेगा। यह ऐसे ही कि अगर ध्रुवीय समुद्र के जमते समय उसकी लहर ऊपर को उठी होगी तो वह जमने के बाद भी उतनी ही ऊपर उठी रहेगी, वहां से बदलेगी नहीं। यह भी सत्य है कि मृत्यु के समय अक्सर गुण वैसे ही रहते हैं जैसे उसके पिछले सारे गुणों और कर्मों का औसत रूप होता है। मतलब सब लोगों की आत्मा में अंधेरे की अलग अलग मात्रा होगी। चाहे दो व्यक्ति आपस में कितने ही ज्यादा नजदीकी क्यों न हों, दोनों की आत्माओं में अंधेरे की मात्रा एकसमान हो ही नहीं सकती। यह असंभव है। कुछ न कुछ फर्क तो रहेगा ही। इसीलिए तो कभी आत्मा के मामले में धोखा नहीं होता कि फलां की आत्मा गलती से फलां के शरीर में चली गई। जो कथा कहानियों में होता है, वो शिक्षात्मक रूपक ही लगता है। जब किसी के शरीर पर प्रेत आदि का कब्जा होता है तो वह साफ बताता है कि वह प्रेत है। इसीलिए उसे तांत्रिक आदि से भगाया जाता है। अगर किसी की आत्मा की फोटोकॉपी बनने की किसी में ताकत होती तो प्रेत भी बन जाता। फिर किसी को पता न चलता और उसे दूसरे के शरीर से कोई भगाता भी न। पर ऐसा नहीं होता। इसीलिए कहते हैं कि मृत्यु के समय की मानसिक स्थिति मृत्यु के बाद की गति को निर्धारित करती है। इसीलिए कई लोग मरने के लिए काशी जैसे तीर्थों में जाते हैं, कई मृत्यु के समय गीता आदि आध्यात्मिक ग्रंथ सुनते हैं। यहां पर एक पेच और खुलता है। बेशक मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा के जैसा परिवर्तनरहित और हलचल से रहित, शांत और व्यापक बन जाता है, पर दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। जीवात्मा निर्गुण जैसा लगता हुआ भी तीनों गुणों से बंधा होता है, पर परमात्मा असली निर्गुण अर्थात गुणातीत होता है। इसीलिए वह जीवात्मा से भी ज्यादा और यूं कहो कि परम सूक्ष्म, परम व्यापक, परम परिवर्तनरहित, परम शांत, और परम सच्चिदानंद रूप होता है। यह खासकर उन लोगों को समझना चाहिए जो परमात्मा और जीवात्मा को करीब एकजैसा मानने के धोखे में पड़े होते हैं। कई दफनाए हुए मृत शरीर आदि की पूजा करते हैं। कई ऐसा समझते हैं कि मरने के बाद उनका जन्नत का टिकट कटा हुआ है।

कुंडलिनी योग कामयाब संभोग में मदद करता है

कुंडलिनी योग सेक्स का एक अभिन्न अंग है

एक और रहस्यपूर्ण तथ्य जो मैं आपको बताता हूँ, वह यह है कि यौन संपर्क के दौरान भी यह मूल स्तर की आत्मा का संपर्क सबसे गहरा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सेक्स के समय व्यक्ति दो यौन साथियों को छोड़कर पूरी तरह से अकेला रहना चाहता है। न दुनिया की और न ही दुनियावी विचारों की दखलंदाजी चाहता है। यह प्रवृत्ति ही यौन मामलों में शर्मीलेपन की उत्पत्ति करती है। कोई भी सार्वजनिक रूप से सेक्स नहीं करना चाहता क्योंकि तब वह सेक्स नहीं बल्कि केवल एक नाटक होता है। यहाँ तक कि कोई भी अपने वास्तविक यौन अनुभव के बारे में बात नहीं करना चाहता, धोखेबाज़ों द्वारा प्रचारित यौन नाटक की तो बात ही छोड़िए। तो सोचो कि सांसारिक अराजकता से पूरी तरह से दूर मूल आत्मा के रूप से अधिक अकेलापन क्या हो सकता है। यहाँ तक कि संभोग के समय यौन ऊर्जा भी इतनी अधिक होती है कि यह उस अल्पकालिक मूल आत्मा के संपर्क के समय पर्याप्त से अधिक आनंद प्रदान करती है। इस तरह प्रेम भी बढ़ता है। यह आम तौर पर देखा जाता है कि दिवंगत आत्मा का संपर्क अक्सर तांत्रिक मिश्रित यौन वातावरण में होता है। इसका कारण एक ही है कि तंत्र की तीव्र यौन ऊर्जा उस अल्पकालिक घुटन भरे आत्मिक संपर्क को झेलने के लिए पर्याप्त शक्ति प्रदान करती है। साधारण सेक्स पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि इसमें मन पर कम नियंत्रण होता है और साथ ही, यह कम अवधि का होता है। कुंडलिनी योग आधारित तंत्र यौन अनुभव को बढ़ाता है क्योंकि यह कुंडलिनी ध्यान की मदद से अकेलेपन के स्तर को और ज्यादा बढ़ाता है जो आनंदमय और सफल सेक्स के लिए आवश्यक है। कुंडलिनी ध्यान एक मानसिक कुंडलिनी छवि को छोड़कर हर सांसारिक अराजकता को खत्म कर देता है। यह आवश्यक भी है क्योंकि हम मानसिक शक्ति को रोक कर नहीं रख सकते हैं, और ऐसा करते समय यह घुटन भरा होता है और आनंद भी रुक सा जाता है। फिर आनंद के बिना सेक्स कैसा। लेकिन कुंडलिनी छवि को ध्यान में रखते हुए, यह गहन आनंद का स्रोत बन जाता है। यह पूरी तरह से अकेलेपन के समान है क्योंकि मानसिक कुंडलिनी छवि कुछ भी भौतिक नहीं बल्कि केवल एक मानसिक रचना है। इसीलिए कहते हैं कि असली प्रेम एकबार में एक से ही हो सकता है, दो से नहीं। तंत्र भी लंबे समय तक एक ही साथी के साथ रहने की वकालत करता है। हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण और दिलचस्प है कि एक व्यक्ति जिसे कई साथियों द्वारा बुरी तरह से फटकार लगाई जाती है, वही केवल एक ही साथी के साथ पूर्ण शांति में रहना चाहता है। शायद संभोग में आनंद भी इसीलिए है क्योंकि यह आत्मा की सर्वाधिक गहराई तक जाने का प्रयास करता है, और आत्मा तो आनंद का खजाना है ही। वास्तव में सेक्स विज्ञान जितना जाना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा और विशाल है जैसा कि ओशो महाराज ने सच ही कहा है।

आत्मा और जगत प्रकाश और अंधकार का परस्पर खेल है

मुझे तो लगता है कि जिसे हम सतोगुण समझते हैं, वही नेपथ्य में तमोगुण बन रहा होता है। यह ऐसे है जैसे धूप से ही छांव बनती है। इसका मतलब है कि जीवात्मा ने शुरु से जो कुछ भी अनुभव किया है, वह सभी कुछ उसमें तमोगुण अर्थात अंधेरे के रूप में मौजूद है। आगे भी वह जो महसूस करती रहेगी, वह भी अंधेरे के रूप में दर्ज होता रहेगा। यह ऐसे ही है जैसे जितनी अधिक और जैसी धूप होगी, छांव भी उतनी ही ज्यादा और वैसी ही बनेगी। वृक्ष की जैसी पत्तियां होंगी, छांव भी वैसी ही बनेगी। अर्थात जैसा शरीर या मन या मस्तिष्क होगा, तमोगुण रूपी छांव भी उसकी वैसी ही बनेगी। मतलब कि छांव में उसको बनाने वाली धूप या रौशनी या उसकी पत्तियों से छनकर आई हुई धूप के बारे में पूरी सूचना दर्ज है। सतोगुण तो आत्मा का अपना शुद्ध रूप है ही। वह तो रहेगा ही। वह तो मिट नहीं सकता। यह हो सकता है कि तमोगुण की मात्रा के अनुसार वह कम या ज्यादा महसूस होए। अगर तमोगुण ज्यादा होगा तो सतोगुण कम होगा और अगर तमोगुण कम होगा तो सतोगुण ज्यादा होगा। रजोगुण भी आत्मा की उस स्वाभाविक चेष्टा के रूप में होगा जिसके तहत वह तमोगुण से सतोगुण की तरफ जाना चाहती है। इसका मतलब है कि हम अगर दुनिया को महसूस न करें, तो वह आत्मा में तमोगुण के रूप में दर्ज नहीं होगी। पर दुनिया से किनारा कर पाना भी संभव नहीं है। तमोगुण की बात तो बाद में आएगी, पहले भूखे मरने की नौबत आ सकती है। बीच वाला मध्य मार्ग है अनासक्ति का। मतलब दुनियादारी को बिना आसक्ति के अनुभव करना है। इससे दुनियादारी भी चलती रहेगी और उसकी छांव भी आत्मा पर नहीं जम पाएगी या कम जमेगी। ऐसा योग से आसानी से संभव है। शास्त्रों में आसक्तिरहित सात्त्विक तरीकों को अपनाने के लिए इसलिए बोला जाता है ताकि इसके सात्त्विक संस्कार मन में पड़ते रहें। सात्विक संस्कारों को मन से निकालने में कम मेहनत लगती है जिससे मुक्ति की संभावना बढ़ जाती है। यदि इनको मन में न डाला जाए तो ऊटपटांग संस्कार मन में पड़ते रहेंगे क्योंकि मन खाली नहीं रह सकता। इन्हें बाहर निकालना बहुत मुश्किल होता है जिससे मुक्ति की संभावना काफी घट जाती है। पर इसी से बात नहीं बनेगी। पिछ्ले अनगिनत जन्मों की दुनियादारी की छाप की कालिख जो आत्मा पर जमी है, उसे भी साफ करना पड़ेगा। वह भी कुंडलिनी योग से ही होगा, खासकर एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से। इससे आत्मा में सतोगुण बढ़ेगा और तमोगुण और रजोगुण कम हो जाएगा। रजोगुण इसलिए कम होगा क्योंकि अब नाममात्र के तमोगुण में इतना पोटेंशल नहीं है कि वह तेज गति से सतोगुण की तरफ जा सके। यह लेटेंट रजोगुण भी बिजली के दो विपरीत ध्रुवों के बीच के विभवांतर की तरह होता है। जितना ज्यादा अंतर उनके विपरीत आवेश के बीच में होगा, उतनी ही रफ्तार और अधिकता से विद्युत प्रवाह उनको जोड़ने वाले परिपथ में दौड़ेगा। शुद्ध आत्मा का सतोगुण तो सर्वोच्च और निश्चित निर्धारित है। बद्ध जीवात्मा के तमोगुण की मात्रा ही निर्धारित करेगी कि उनके बीच में रजोगुण रूपी विभवांतर कम होगा या ज्यादा। देखो, दोनों के बीच परिपथ तो तभी जुड़ेगा जब जीवात्मा को शरीर मिलेगा। फिर उनके बीच में मानसिक विचारों के रूप में खूब विद्युत प्रवाह बहेगा। वह जीवात्मा के तमोगुण के अनुसार कम ज्यादा होता रहेगा। इसीलिए तो पार्टी आदि में ड्रिंक आदि करने के बाद लोग तरोताजा होकर नई उमंग और जोश से अपने काम धंधे में पहले से भी ज्यादा लग जाते हैं। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है और अध्यात्म के मामले में हानिकारक भी हो सकता है। कई लोग लंबे समय तक अकेलापन बिताने के बाद नई और बढ़ी हुई शक्ति के साथ दुनियादारी में उतरते हैं। यह अकेलेपन की तमोगुण की ही शक्ति होती है। कुंडलिनी योग से तमोगुण घट जाता है। इससे सतोगुण और तमोगुण के बीच रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है। इसीलिए योगी का व्यवहार इंपलसिव या तुनकमिजाजी या अंध प्रगतिशील नहीं होता, बल्कि धीर, गंभीर और व्यवस्थाशील होता है। कई बार तंत्रयोगी देशकाल की मांग के अनुसार अस्थायी इंपलसिव व्यवहार प्राप्त करने के लिए अस्थाई रूप से तमोगुण को स्वीकार भी कर सकते हैं। बिना शरीर की जीवात्मा में यह रजोगुण लेटेंट विभवांतर के रूप में रहता है। मतलब अंधेरे से प्रकाश की तरफ जाने का बल तो लग रहा होता है, पर शरीररूपी विद्युत परिपथ न होने के कारण अंधकार प्रकाश तक जा नहीं पाता। मतलब तमोगुण सतोगुण नहीं बन पाता।

कुंडलिनी योग सबसे बड़े झूठ का पर्दाफाश करता है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में सीमेंट के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव बारे बात हो रही थी। वो तो वो, पर जो इसका इस्तेमाल भी करते हैं, वे भी ढंग से कहां करते हैं। सबसे ज्यादा ढिलाई इसमें पानी की सिंचाई रूपी उस क्योरिंग की रखी जाती है, विशेषकर सरकारी और ठेकेदारी कामों में, जो इसकी मजबूती के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। इससे संसाधन बर्बाद होते हैं, और हादसों से जानमाल के भारी नुकसान का अंदेशा बना रहता है। खैर, हम इन तकनीकी मामलों में न जाकर मूल विषय से भटकना नहीं चाहते। इस पर मेरी एक अन्य पुस्तक है, “बहुतकनीकी जैविक खेती एवम वर्षाजल संग्रहण के मूलभूत आधारस्तम्भ”। इस पोस्ट में हम सबसे बड़े झूठ पर चर्चा करेंगे।

विचारों का शांतिपूर्वक अवलोकन करने का अर्थ है कि हम उनकी सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। यथार्थ सत्ता को। सूक्ष्म सत्ता को। आध्यात्मिक सत्ता को। मानसिक सत्ता को। अस्वतंत्र सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। किसी पर आधारित सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। अपूर्ण सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। बुझे मन से उनकी सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। इससे जब विचार गायब होगा, तो हमें अभाव का अंधेरा महसूस नहीं होगा या कम महसूस होगा। साथ में अप्रत्यक्ष रूप से यह भी सिद्ध या विश्वास हो जाएगा कि जिस अभाव को हम अंधेरा समझते हैं, वह प्रकाश है, क्योंकि वहीं से ये विचार पैदा होकर उसी में विलीन होते रहते हैं। इससे आत्मा धीरेधीरे साफ होकर मुक्ति की तरफ़ चली जाएगी। अगर हम उनके वेग में बह जाएं, तो उसका मतलब होगा कि हम उनकी अयथार्थ सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। भौतिक सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। स्थूल सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। शारीरिक सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। पूर्ण सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। इससे जब विचार गायब होगा, तो हमें अंधेरा सा महसूस होगा। अगर हम उन्हें नकारने या हटाने की कोशिश करें, तो उसका मतलब होगा कि हम उनकी सत्ता को नकार रहे हैं। इसका भी अप्रत्यक्ष मतलब यह बनेगा कि हम अंधेरे की सत्ता को स्वीकार कर रहे हैं। इससे जीवन अंधेरे की ओर जाएगा ही।  मतलब साक्षीभाव सबसे बड़ी अध्यात्मवैज्ञानिक साधना है। यह बौद्धों का सर्वोत्तम मध्यमार्ग है। साक्षीभाव में इसीलिए आत्मा से आंनद प्राप्त होता है। विचारों को भगा कर भी नुकसान और गले लगाकर भी नुकसान। इसलिए अपनी सांसों और अपने शरीर पर ध्यान देते रहो, और विचारों को आतेजाते रहने दो।
बोलने की बात है कि साक्षीभाव ही सबकुछ है, योग आदि कुछ और करने की जरूरत नहीं। यह तो ऐसे कहना हुआ कि फल ही सबकुछ है, पेड़ आदि की कोई जरूरत नहीं। असली साक्षीभाव साधना तो योगसाधना के दौरान ही होती है। उस समय विचार मस्तिष्क में आ रहे होते हैं, और ध्यान और दृष्टि मूलाधार आदि शरीर के निचले हिस्सों या चक्रों पर होते हैं। इससे दो काम एकसाथ होते हैं। एक तो यिन मतलब निचला हिस्सा और यांग मतलब मस्तिष्क वाला हिस्सा आपस में जुड़ते हैं, और दूसरा यह कि मस्तिष्क के विचार आते हुए भी नजरंदाज से रहते हैं, जिससे उत्तम साक्षीभाव होता है। विचारों का बिनबुलाए मेहमानों की तरह स्वागत किया करो। जैसे हम बिन बुलाए मेहमान का स्वागत करते हुऐ भी उससे तटस्थ से रहते हैं, ऐसे ही विचारों के प्रति भी रहना चाहिए। मेन बात यह है कि आदमी 4के सिग्नल से बने दृष्यों को देखना ही पसंद करते हैं, एसडी के सिग्नल वाले दृष्यों को नहीं। योग के दौरान मस्तिष्क में बनने वाले सिग्नल को 4k वाला समझो, और आम दुनियादारी में एसडी वाला या ज्यादा से ज्यादा एचडी वाला। इसीलिए योग के दौरान सबसे ज्यादा साक्षीभाव अर्थात मूकदर्शक भाव पैदा होता है। आम दुनियावी हालत में तो हम मानसिक दृष्यों के अनुरूप प्रतिक्रिया भी दे सकते हैं, पर योग के दौरान कैसे देंगे, क्योंकि मानसिक दृष्य के इलावा स्थूल रूप में कुछ भी नहीं होता। इसलिए मजबूरन शान्त होकर नजारा देखते रहना पड़ता है। इसीलिए कई लोग दूरदर्शन को भी अच्छा साक्षीभाव साधक कहते हैं, क्योंकि उसके लिए भी हम कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सकते। इसीलिए काल्पनिक सी फिल्में सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों से भी ज्यादा मजा देती हैं। क्योंकि जहां ऐसे दृष्यों के प्रति सत्यत्व बुद्धि जागी, वहां आत्म आनंद में खलल तो पड़ेगा ही।

साक्षीभाव साधना मतलब योगसधना दिन में तीन बार की जा सकती है। दिन में तो लगता है सबसे जरूरी है शायद। उस समय शरीर की ऊर्जा शिखर पर होती है, जिससे दबे विचार खूब उभर सकते हैं, जिन पे अच्छे से साक्षीभाव हो सकता है। अगर जगह आदि की कमी हो तो कम से कम प्राणायाम तो किया ही जा सकता है। अगर बैठने की भी दिक्कत हो तो यह तो कुर्सी पर भी किया जा सकता है। चक्रों पर सांसें रोककर गहरा कुंडलिनी ध्यान लगाने से सिरदर्द भी हो सकता है, इसलिए दिन में प्राणायाम ही काफी है। सुबह और शाम की संध्या के समय जब मस्तिष्क को मूलाधार से अतिरिक्त शक्ति मिलती है, वह समय ध्यान के लिए सर्वोत्तम है। उस समय दुनियावी कामों का बोझ भी कुछ हटा जैसा होता है। शायद इसीलिए पुराने समय में त्रिकाल संध्या का काफी प्रचलन था। हर कोई तो हर समय आत्मजागरूकता में नहीं रह सकता, क्योंकि कइयों का काम विचित्र और जटिल सा होता है। जिनको लंबा अभ्यास है या जिन्हें सत्संग सुलभ है, वे रह भी लेते हैं। कर्मयोगी भी हर समय आत्मजागरूक रहता है, पर कर्मयोग भी आसान नहीं है। इसीलिए आम आदमी के लाभ के लिए दिन में केवल तीन बार साधना का प्रावधान है, बाकि समय यथेच्छ व्यावहारिक काम करते रहो, साधना को रखो मेज पर।

समस्या तब होती है जब आदमी यथार्थ नहीं देखता। सत्य नहीं देखता। देखने में बुराई नहीं है। सच्ची चीज देखने में कोई बुराई नहीं है। बुराई है झूठी चीज देखने में। विचारो को सूक्ष्म रूप में देखना सत्यदर्शन है, पर उन्हें स्थूल और भौतिक रूप में देखना असत्यदर्शन है। विचारों को अपने शरीर या मन के अंदर देखना सत्यदर्शन है, पर उन्हें अपने से बाहर देखना असत्यदर्शन है। विचारो को अपने रूप में मतलब अद्वैतरूप व आत्मरूप में देखना सत्यदर्शन है, पर उन्हें पराए रूप में मतलब द्वैतरूप व अनात्मरूप में देखना असत्यदर्शन है। ऐसा नहीं कि ये सिर्फ दार्शनिक बातें हैं। यह वैज्ञानिक सत्य है। दरअसल दुनियादारी पूरी तरह झूठ पर टिकी हुई है। सूक्ष्म विचारों को झूठा स्थूल रूप दिया जाता है। आध्यात्मिक (चिदाकाश आत्मरूप) विचारों को झूठा भौतिक (आत्मा के बिल्कुल उल्टा) रूप दिया जाता है। शरीर के अंदर स्थित विचारों को झूठमूठ में शरीर के बाहर समझा जाता है। अगर हम विचारों को उनके सच्चे रूप में मानें तो दुनिया गायब और हर जगह आत्मा ही आत्मा है। बड़ी बात है कि योग करते समय बिना प्रयत्न के यह दृष्टि बनी रहती है, क्योंकि उस समय शरीर और सांस के रूप में प्राण की क्रियाशीलता के अनुसार विचारों की क्रियाशीलता भी तेजी से बदलती रहती है, जिससे इन सबके आपस में जुड़े होने का विश्वास खुद ही, अवचेतन में ही बना रहता है। मन या मस्तिष्क की बजाय शरीर इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि विभिन्न विचार अलग अलग ऊर्जा स्तर को लिए होते हैं, इसलिए शरीर के अलग अलग चक्रों पर फिट बैठते हैं। ज्यादा उर्जा वाले विचार सहस्रार की तरफ होते हैं तो कम ऊर्जा वाले मूलाधार की तरफ़। विचारों की ऊर्जा से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए, नहीं तो मस्तिष्क पर बोझ बढ़ेगा जिससे सिरदर्द भी हो सकती है। इसीलिए आदमी का असली रूप कोई मन या मस्तिष्क नहीं है, जैसा आमतौर पर समझा जाता है, पर सहस्रार चक्र से लेकर मूलाधार चक्र तक का फ्रंट चैनल दंड और उसपर स्थित चक्रों का समूह है। ऐसा समझ लो कि यह सात गांठों वाला बांस का डंडा है। जरूरी नहीं कि वे विचार चक्रों से ही चिपके हों, वे चक्रों की उंचाई के स्तर पर किसी भी लंबी दूरी तक महसूस हो सकते हैं। शायद सहस्रार के विचार आकाश की तरफ़ की सारी दूरी कवर करते हैं, और मूलाधार के विचार पाताल की ओर की सारी दूरी। जहां भी विचार महसूस होए, वहीं उनका स्वागत करना चाहिए, पर उनके असली सूक्ष्म व आध्यात्मिक रूप में, झूठे स्थूल व भौतिक रूप में नहीं। साथ में योग के दौरान विचारों को उनके सच्चे रूप में देखने से वे एकदम से गायब नहीं होते आम दुनियावी अवस्था की तरह, बल्कि आत्मा को आनन्द प्रदान करते हुए आराम से गायब होते हैं, क्योंकि योग करते समय ऊर्जा का स्तर ऊंचा होता है। साथ में सांसों के स्तंभन आदि विभिन्न तकनीकी प्रयोगों अर्थात प्रणायामों से योग के समय मन की चंचलता भी कम हो जाती है। इससे आत्मा भलीभांति तृप्त होते हुए महसूस होती है। आम अवस्था में वे आत्मा को समुचित आंनद मुहैया कराने से पहले ही गायब हो जाते हैं, क्योंकि ऊर्जा का स्तर नीचा होता है, जिससे आत्मा प्यासी सी ही बनी रहती है। अगर हम विचारों को उनके झूठे रूप में मानें तो आत्मा गायब और हर जगह दुनिया ही दुनिया है। सीधी सी बात है कि योग से विचार इतना ज्यादा स्पष्ट बनते हैं, जितने आम भौतिक दुनियादारी की हालत में भी नहीं बनते। इससे उनका सच्चा सूक्ष्म स्वरूप अपनेआप सामने आ जाता है। मतलब कुंडलिनी योग ही सबसे बड़े झूठ का सबसे बड़ा पर्दाफाश करता है। वैसे भी आत्मा को उजागर होने के लिए इसी पर्दाफाश से बल मिलता है। अगर झूठ नहीं होगा, तो पर्दाफाश भी नहीं होगा। इसका मतलब यह है कि झूठ और उसका पर्दाफाश साथसाथ चलता रहना चाहिए। मतलब कि भौतकवाद और अध्यात्मवाद संतुलित रूप में साथसाथ चलते रहने चाहिए। संतुलित का मतलब यह है कि इतनी भौतिकता भी नहीं होनी चाहिए कि आदमी की जान पर ही बन आए या जीवनदायिनी धरती ही नष्ट होने लगे। पशु में झूठ भी कम होता है, इसलिए उसके पर्दाफाश की संभावना भी कम होती है, जिससे उसका आत्मविकास भी बहुत कम या धीमा होता है। इसी सबसे बड़े झूठ को अध्यात्म की भाषा में अज्ञान कहते हैं, और इसके पर्दाफाश को ज्ञान। जो अध्यात्म के साथ दुनियादारी जोड़ते हुए पैसे ऐंठने की कोशिश करे तो उनसे सावधान, क्योंकि जिस समय वे पैसे वाले दुनियावी मोड में होते हैं, उस समय आध्यात्मिक मोड नहीं रहता। योगी व लेखक श्री ओम स्वामी का कहना ठीक है कि योगी आर्थिक रूप से स्वावलंबी तो होना ही चाहिए, साथ में उद्योगपति भी होना चाहिए जो समाज को भी आर्थिक सहारा दे सके। वह भी क्या योगी जो अपने लिए भी मांगता फिरे।

मुझे तो लगता है कि शुरुआती कुछ साधना ही समूह आदि में ज्यादा अच्छी तरह से कर सकते हैं, संभवतः ज्यादातर मामलों में बाद की उच्च अवस्था की साधना तो एकांत में ही फलीभूत होती है, भीड़ में नहीं। वैसे भी भीड़ में करने योग्य साधना कर्मयोग ही होता है, नाक पकड़कर योग करना नहीं। चलो, कोई बात नहीं, जमाने के साथ बहते चलो। इसमें कोई जबरदस्ती नहीं। जिसको अच्छा व अपने लिए उपयुक्त लगे, वह करे। यह प्रचार उनके लिए है जो इसके हकदार हैं, पर संकोच आदि विभिन्न वजहों से इसकी आदत न डाल पा रहे हों। किसी फिल्म के प्रचार का यह मतलब नहीं होता कि उसे सब देख लें, पर यह कि जिज्ञासु और जरूरतमंद आदमी तक उसकी पहुंच बन पाए। वेलेंटाइन डे का ये मतलब नहीं कि इस दिन सभी लोग जोड़ा बनाकर आपस में प्यार करने लग जाएं, पर यह कि जिसको इसकी जरूरत और गुंजाईश लगती है, पर संकोच आदि से न कर पा रहा हो, उसे करने का मौका मिले। सभी को विश्व योग दिवस सप्ताह की हार्दिक शुभकामनाएं।

कुंडलिनी वामन भगवान बनके शुक्राचार्य की द्वैतरूपी आंख फोड़ती है

दोस्तों, पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए, वह बलिरूपी अहंकार वामन को मजबूरन आने देता है, और उसे अंदेशा भी हो जाता है कि वह कुंडलिनी जागरण के बाद बच नहीं सकता। वैसे महिमा ऐसे गाई गई है कि राजा बलि सबसे बड़ा दानवीर था, जिसने अपना भावी नाश जानते हुए भी वामन को तीन पग जमीन दान में दी। हरेक जीव राजा बलि की तरह परम दानवीर होता है। वह यह जानकर कि कुंडलिनी योग से उसका अहंकार नष्ट हो जाएगा, उसका असीमित भौतिक संसार नष्ट हो जाएगा, फिर भी वह कभी न कभी जरूर कुंडलिनी साधना करता है। जब आदमी राजा बलि की तरह अच्छे कर्मों में लगा होता है, तब कभी न कभी भगवान विष्णु उसका भला करने एक ध्यानचित्र के रूप में उसके पास आते हैं। वे मित्र, प्रेमी, गुरु या देवता किसी भी रूप में हो सकते हैं। गुरु को भी तो भगवान का ही रूप समझा जाता है। वैसे भी हर किसी के लिए अपना प्रेमी भगवान ही होता है। उदाहरण के लिए मान लो कि किसी पुरुष की जिंदगी में एक स्त्री का प्रवेश होता है। पुरुष के बीसों कारोबार होते हैं, और सैंकड़ों रिश्ते। उनके कारण उसके मन में अनगिनत विचारचित्र बने होते हैं। इसलिए वह उस स्त्री को हल्के में ले लेता है, और सोचता है कि उसके विस्तृत भौतिक संसार के सामने एक स्त्री कुछ भी नहीं है। वह उसे अपने मन में जगह बनाने देता है, मतलब वह उससे जुड़े भाव या सत्त्वगुणरूपी पहले कदम, गति या रजोगुणरूपी दूसरे कदम, और अंधकार या तमोगुणरूपी तीसरे कदम को अपने मनरूपी साम्राज्य में पड़ने देता है। पर धीरेधीरे उसका उसके प्रति प्यार बढ़ता रहता है, और समय के साथ वह उसके मन में ज्यादा से ज्यादा जगह घेरती रहती है। आखिर में वह उसके पूरे साम्राज्य में फैल जाती है, और फिर जागृत होकर आदमी के राजाबलिरूपी अहंकार को खत्म ही कर देती है। कुंडलिनी योग में भी ऐसा ही होता है। इसका मतलब है कि योग और प्रेम के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। राजा बलि भी बहुत बड़ा यज्ञ मतलब अच्छा काम ही कर रहा था। आदमी को पता चल जाता है कि वह ध्यानचित्र के चक्कर में पड़कर बावला प्रेमी या योगी या प्रेमयोगी या प्रेमरोगी बन जाएगा, फिर भी वह उसे अपनाता है, और आगे बढ़ाता है। उसने कुण्डलिनी जागरण के माध्यम से एक कदम से मतलब सत्वगुण से सारा स्वर्ग कब्जे में कर लिया। स्वर्ग सतोगुण प्रधान होता है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण के समय तीनों गुण अनंत हो जाते हैं, इसीलिए कहा गया है कि कुंडलिनी या वामन से तीनों लोक पूरी तरह से व्याप्त हो गए मतलब भर गए। दूसरे कदम मतलब रजोगुण से कुण्डलिनी चित्र पूरी धरती में फैल गया, क्योंकि धरती रजोगुणप्रधान है। तमोगुणरूपी तीसरे कदम से अहंकार व उससे जुड़े कर्मविचार मूलाधार के अँधेरे अवचेतन अर्थात पाताल में चले जाते हैं। क्योंकि तमोगुण किसी को मारकर या नष्ट करके ही बनता है, इसलिए वह अहंकार और उससे पोषित मानसिक सृष्टि को नष्ट करने से बनता है। पाताल लोक के द्वारपाल के रूप में भगवान विष्णु के स्थित हो जाने का मतलब है कि ध्यानचित्र कुंडलिनीयोग के माध्यम से उन राक्षसों को अर्थात अवचेतन में दबे विचारों को ऊपर अर्थात मस्तिष्क या स्वर्ग की तरफ जाने देकर शुद्ध करता रहता है, ताकि सब देवता ही बन जाएं। साथ में, विष्णुस्वरूप ध्यानचित्र को कुंडलिनी योग से स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्रों पर केंद्रित किया जाता रहता है, जिससे उनमें दबी हुई राक्षसरूपी भावनाएं उजागर होकर उसके संपर्क में आने से शुद्ध बनी रहती हैं, जिससे वे योगी को बंधन में नहीं डाल पातीं, मतलब राक्षस देवताओं को परेशान नहीं कर पाते, क्योंकि शरीर में ही सभी देवता बसे हुए हैं। वैसे भी स्वाधिष्ठान चक्र को इमोशनल बैगेज मतलब भावनाओं की गठरी कहते हैं।
यज्ञ में बलि के पुरोहित बने हुए राक्षसगुरु शुक्र आचार्य पहले बलि को बहुत समझाते हैं कि वह वामन पर भरोसा न करे क्योंकि वह तीन कदमों में ही उसका सबकुछ छीन लेंगे। पर जब बलि नहीं मानता तो शुक्राचार्य संकल्पजल गिरा रहे शंख के सुराख़ में घुस जाते हैं, पर वामन उसमें कुशा डालकर उसकी आंख फोड़ देते हैं? एक बात और, क्योंकि शंख भी जीव की पीठ पर होता है, और रीढ़ की हड्डी की तरह ही उसे सुरक्षा देता है, इससे भी पक्का हो जाता है कि सुषुम्ना नाड़ी को ही शंख कहा गया है। साथ में, शंख का आकार भी एक फन उठाए नाग या ड्रेगन के जैसा ही होता है, जिसकी समानता मेरुदंड व उसमें स्थित सुषुम्ना के साथ की जाती है। एक अनुभवी कुलपुरोहित कभी भी अपने यजमान को अध्यात्म के बीहड़ में नहीं खोने देना चाहता, बेशक उससे यजमान का फायदा ही क्यों न हो। उसे पता होता है कि अगर यजमान को सत्य का पता चल गया तो उसे ठगकर उससे यज्ञ आदि कर्मकांड के नाम पर पैसा ऐंठना आसान नहीं रहेगा। हालांकि अपनी जगह पर कर्मकाण्ड सही है और जागरण के लिए महत्त्वपूर्ण सीढ़ी है, पर मंजिल मिलने पर कौन सीढ़ी की परवाह करता है। वैसे भी वह भौतिकवादी गुरु है। शुक्राचार्य अर्थात भौतिक विज्ञानवादी व्यक्ति या गुरु द्वारा शुक्र अर्थात वीर्य को बाहर बहा कर सुषुम्ना के शक्ति प्रवाह को ब्लॉक करना ही शंख में घुसना है। वामन का उसको कुशा डंडी द्वारा खोलना ही योगी द्वारा कुण्डलिनी ध्यानचित्र के माध्यम से मूलाधार से शक्ति को ऊपर चढ़ाना है। यह मूलाधार से लेकर सहस्रार तक फैली हुई संवेदना की रेखा जैसी होती है जो रीढ़ की हड्डी में होती है। यह झाड़ू या कुशा की सींक जैसी पतली फील होती है। यही सुषुम्ना जागरण है। अगर संभोग से पहले पीठ की विशेषकर मेरुदंड की ढंग से मालिश करवा ली जाए, तो यह संवेदना रेखा आसानी से और आनंद के साथ महसूस होती है। फिर वीर्य शक्ति आसानी से ऊपर चढ़ती है, जिससे संभोग बहुत आनंदमय और आध्यात्मिक बन जाता है। यौनांगों का दबाव भी एकदम से खत्म हो जाता है। आदमी अक्सर ऐसा कुंडलिनीजनित आनंद के लालच से प्रेरित होकर करता है, इसीलिए मिथक कथा में कहा गया है कि वामन ने ऐसा किया। इससे शुक्राचार्य की आंख फूटना मतलब कुण्डलिनी के प्रभाव से  वीर्यशक्ति की द्वैत दृष्टि अर्थात दोगली नजर नष्ट होना है। जब वीर्यशक्ति द्वैत से भरे संसार की तरफ न बहकर अद्वैत से भरी आत्मा की तरफ बहेगी, तो स्वाभाविक है कि वीर्यशक्ति की दोगली नजर नष्ट होगी ही। बलि या अहंकार पाताल को चला जाता है, मतलब कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी व्यक्त अर्थात प्रकाशमान जगत का अहंकार नहीं कर सकता क्योंकि उसने सबसे अधिक प्रकाशमान कुंडलिनी जागरण का अनुभव कर लिया है। इसलिए वह स्थूल जगत से उपरत सा होकर अपने सूक्ष्म शरीर के रूप में अव्यक्त अन्धकार सा बन जाता है। यही उसका पातालगमन है। हालांकि सूक्ष्म शरीर के धीरे-धीरे स्वच्छ होने से स्वच्छ होता रहता है। इसे ही ऐसे कहा गया है कि भगवान विष्णु उसके द्वारपाल के रूप में पहरा देते हैं।

कुंडलिनीपरक संभोग योग ही मस्तिष्क को जागरण के लिए तैयार करती है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में कुंडलिनी ध्यान और मनोरोग के बीच तुलनात्मक अध्ययन के बारे में बात हो रही थी। उसी कड़ी में ऐसा भी लगता है कि ऐसे मनोरोगियों का इलाज प्रेमचिकत्सा से भी हो सकता है। इसलिए अक्सर यह कहावत आम है कि प्यार व्यक्ति को नशामुक्ति में मदद करता है। प्यार एक सुपरटोनिक है। मानसिक रोग हमेशा ही बुरे नहीं होते, जैसी कि आम मान्यता है, पर एक गॉडगिफ्ट भी हो सकते हैं। संभवतः हिंदु धर्म में इसीलिए मानसिक रोगियों को विशेष दैवीय नजरिए से देखा जाता है, सम्मान से देखा जाता है। यहां उन्हें मानसिक हस्पताल कम ही भेजा जाता है, जब तक कोई गंभीर खतरा ही पैदा न हो जाए। वे मनोरंजन का मुख्य स्रोत होते हैं, और समारोह आदि में आकर्षण का मुख्य बिंदु होते हैं। फिर भी ज्यादातर उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है, और उन्हें पीड़ा नहीं पहुंचाई जाती। उन्हें समाज पर बड़ा बोझ भी नहीं समझा जाता।
मुझे लगता है कि मूलाधारवासिनी कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क को दबाव झेलने में सक्षम बनाती है। यह शायद रक्तवाहिनियों का लचीलापन बढ़ाकर उन्हें ज्यादा और बिना दबाव के रक्त प्रवाह बढ़ाने में मदद करती है। विचित्र सा लगता था जब ध्यान के नाम से ही आम लोग सिर पकड़कर बैठ जाते थे, पर मेरे मस्तिष्क में हर समय ध्यान–समाधि लगी होती थी, यौनयोग के बल से। जब मुझे क्षणिक कुंडलिनी जागरण हुआ था, उस समय मैं तांत्रिक यौनयोग के पूरे प्रभाव में था। नहीं तो वह मुझे होता ही न। शरीर को पता होता है कि अपने साथ कब क्या करना है। इसने तभी जागृति के लिए बैक चैनल पूरी तरह से खोली, जब मस्तिष्क दो तीन महीनों से लगातार यौनयोग की कुंडलिनी शाक्ति के प्रभाव में रहकर ज्यादा से ज्यादा दबाव झेलने में सक्षम बन गया था। मैंने अनजाने में कुंडलिनी को इसलिए नीचे नहीं उतारा कि मैं उसका दबाव सहन नहीं कर पा रहा था, बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे यह भय था कि कहीं मैं भौतिक रूप से पिछड़ न जाऊं। क्योंकि ऐसा ही मेरा एक पुराना अनुभव भी था। यह ऑर्गेज्मिक शक्ति पता नहीं क्या जादू करती है। यह एक आन्नदमयी शक्ति है।
सेक्सुअल यिनयांग एकदूसरे के प्रति समर्पण से बढ़ता है। इसीलिए समर्पण भाव पर बहुत जोर दिया जाता है। होता क्या है कि एकदूसरे के प्रति पूरे समर्पण से ही यिन और यांग आपस में एकदूसरे से पूरी तरह से मिश्रित हो पाते हैं। यौन समर्पण से बड़ा भला कौनसा समर्पण हो सकता है। यिनयांग तो हरेक वस्तु में होता है, पर समर्पण केवल पुरुष और स्त्री के ही बीच में होता है। जितना निकटता और अंतर्संबंध एक प्रेमी पुरुष और स्त्री के जोड़े के बीच बनता है, उतना किसी और के बीच में नहीं बनता। इसीलिए प्रेमसंबंध और समर्पण से भरा हुआ संभोग ही सर्वोत्तम यिनयांग एकत्व का भंडार है। इसलिए स्वाभाविक है कि यही भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का भी सर्वोत्तम आधार है। यिनयांग ही पूर्णता है, कुंडलिनी जागरण ही पूर्णता है, ईश्वरत्व ही पूर्णता है। भौतिक संसार भी इसी पूर्णता के अंतर्गत आता है, इससे अलग नहीं है।

कुंडलिनी ध्यान व मानसिक रोग के बीच तांत्रिक यौन ऊर्जा की एक पतली दीवार होती है

पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए, केवल प्रह्लाद ही हिरण्यकशिपु को मनाने गया, क्योंकि वह किसी भी देवता के मनाने से नहीं मान रहा था। जागृति के बाद अक्सर ऐसा ही होता है। इसे ऐसे समझ लो कि अनंत चेतना से गिरा हुआ आदमी बहुत तेजतर्रार और क्रियाशील होता है। वह बाकि लोगों को भी रास्ते पर लाने की कोशिश करेगा क्योंकि कोई भी आदमी समाज के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। वैसे ऐसा ज्यादातर तभी होता है, जब आदमी को जागृति उस समय मिलती है, जब वह स्वस्थ ऊर्जा से भरा होता है, जैसे किशोरावस्था और यौनावस्था। एक बीमार, कमजोर और बूढ़ा व्यक्ति समाज को कैसे बदल सकता है, वह तो अपने को भी बदल ले, तो भी काफी है। जब प्रह्लाद को जागृति मिली, उस समय वह ऊर्जावान बचपन की अवस्था में था। ऐसी अवस्था में उससे लोग ईर्ष्या करेंगे, उसपर क्रोध करेंगे, उसको सता भी सकते हैं, जैसा यीशु के साथ भी हुआ था। इससे समाज को पाप लग सकता है, जिससे उसमें रह रहे लोगों की दुर्गति हो सकती है। मतलब अपनी तरफ से तो लोग जागृति को शांत करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि लोगों के विभिन्न अंगों के रूप में देवता उनके शरीर में ही स्थित हैं। देवता कभी नहीं चाहते कि कोई भी साधु जैसा बन जाए, क्योंकि वे तो जगत को भड़काने और विस्तार देने का काम करते हैं। पर साधु जगत को शांत करता है। इसलिए लोग उसे कुंडलिनी योग करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह खुद भी होता है, जब लोग उसे बहिष्कृत सा कर देते हैं। फिर अकेलेपन के उबाऊ माहौल में जागृत व्यक्ति कुंडलिनी ध्यान नहीं करेगा, तो क्या करेगा। दूसरों को तो ध्यानचित्र दिखता नहीं है। वे तो अंदाजा लगाते हैं कि वह डरावना भूत है। जैसा देवताओं ने शेररूप नरसिंह कल्पित कर लिया। पर प्रह्लाद तो उसे जानता था कि वह तो परम प्रेमी व हितैषी है, कोई काल्पनिक भूत वगैरह नहीं। शायद लोग पागलपन या हैलूसिनेशन या भूतप्रेतबाधा या अवसाद या नशे आदि की अवस्थाओं से भी ध्यानसाधना की तुलना करते हैं, बेशक अनजाने में ही, अवचेतन मन में सदियों से पले हुए भ्रम के कारण। और हां, प्यार में धोखा खाया हुआ आदमी भी तो इसी तरह एक भ्रष्ट ध्यानयोगी की तरह अपने प्रेमी की याद में पगलाया जैसा रहता है। सम्भवतः इसीलिए जल्दी से कहीं उसकी शादी कराने पर जोर दिया जाता है, ताकि उसे तांत्रिक यौनबल से कुछ सहारा मिल सके। अधिकांश फिल्में इसी मामले पे तो बनी होती हैं। अजीब लोचा है भाई। कहीं एकबार मैने गलती से तंबाकू खा ली थी, एकबार भांग, और एकबार गुस्सा कम करने की दवाई। तीनों ही स्थितियों में मेरे मस्तिष्क में ध्यानचित्र छलांगें लगा रहा था। हैलुसिनेशन की हद तक असली आदमी की तरह स्पष्ट लग रहा था। पर यह डलनेस और मूर्खता के साथ था। आनंद भी कम था। कुछ अवसाद जैसा भी था। किसी से बात न करने अपनी ही पागल जैसी मस्ती में रहने को मन करता था। सिर में दबाव के साथ कुछ थकान व बेचैनी भी थी। योग में शारीरिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने पर भी इसीलिए जोर दिया जाता है। मुझे लगता है कि ध्यानचित्र के आनंद में मूलाधार की सम्भोगीय संवेदना का बहुत बड़ा योगदान है। यह ध्यानचित्र से जुड़े तथाकथित नकारात्मक और अवसादीय लक्षणों को खत्म करके आदमी को सामान्य से भी ज्यादा सही ढंग से सामान्य अर्थात स्वस्थ बना देती है। शायद यह यिनयांग से ही पैदा होती है, क्योंकि बिना जोड़े के संवेदना का कोई अर्थ जैसा नहीं रह जाता। यही संवेदना मस्तिष्क को कुंडलिनी जागरण का दबाव सहने में सक्षम बनाती है, क्योंकि दोनों का स्वभाव एकजैसा ही है। अर्थात आनंदरूप। जहां भ्रम रूप में चीजों के दिखने के पीछे मानसिक रोग या मानसिक थकान या मानसिक रसायनों की गड़बड़ी या अन्य मानसिक अनियमितता आदि मुख्य रूप में वजह होते हैं, वहीं ध्यान या कुंडलिनी जागरण की अवस्था में मन बिल्कुल स्वस्थ व तरोताजा होता है, यहां तक कि एक आम तंदुरुस्त आदमी से भी ज्यादा। जहां मानसिक रोग की हालत में आदमी काम करने में अक्षम जैसा होता है, वहीं दूसरी ओर ध्यान की अवस्था में पूरी तरह से सक्षम होता है, यहां तक कि एक आम इंसान से भी ज्यादा। जहां ध्यान की अवस्था में आदमी को दुनियावी कामों और संकल्पों के प्रति साक्षीभाव के कारण आनंद मिलता है, वहीं मानसिक रोगी को नहीं। इसीलिए वह उद्विग्न और मुरझाया सा दिखता है। साक्षीभाव तो वह तब करेगा न जब उसके लिए उसके मस्तिष्क में दुनियावी कामों के तंदुरुस्त संकल्प बनेंगे। पर अक्सर ऐसा होता नहीं है। सच्चाई यही है कि एक स्वस्थ आदमी ही स्वस्थ ध्यान कर सकता है। जब योगी कुंडलिनी ध्यान में आनन्दमग्न रहने लगता है, तब लोग उसके तथाकथित पागलपन से छुटकारा पाकर अपनेअपने कामधंधों में पूर्ववत आसक्ति और जोशखरोश से लग जाते हैं, जिससे देवता खुश हो जाते हैं। इसीको ऐसे कहा गया है कि प्रह्लाद ने नृसिंह भगवान को स्तुति से प्रसन्न किया। इससे क्रोध छोड़कर वे शांत हो गए, जिससे देवता और संसार नष्ट होने से बच गए।

कुण्डलिनीयोग दुनिया ठुकराने की बात नहीं करता

दोस्तों, लिखने को बहुत है, शब्द थोड़े हैं। बहुत अजीब हैं अध्यात्म की पहेलियां, बिन बूझे जो लिख दी गई हैं, कोई माने तो कैसे माने, सबको तो यकीन होता नहीँ। ये जो कहा गया है कि बाहर मत दौड़ो, अपने अंदर महसूस करो, यह एक दोगली तलवार की तरह है। अगर कोई बिल्कुल आंख बंद करके बैठ गया, वह तो मरा, पर यदि कोई आंख खोलकर भी बंद रखने का नाटक कर गया, वह तरा। अब मैं तो प्रेमयोगी वज्र ठहरा। मेरे पास अपने बारे में छुपाने के लिए कुछ नहीं है। मैंने हर किस्म के अनगिनत खूबसूरत नजारे देखे हैं। पर मैंने उन नजारों से दूरी बनाए रखी। यहाँ तक कि कइयों से एक लफज़ बात भी नहीँ की, पर मन की आँखों से उन्हें पी ही लिया। यह मेरे पारिवारिक आध्यात्मिक परिवेश से भी हुआ, और अन्य भी कई अनुकूल परिस्थितियाँ रही होंगी पिछले जन्मों के प्रभाव से। पर सिद्धांत तो सिद्धांत ही होता है, यह जानबूझकर भी उतना ही लागू होता है जितना अनजाने में। हुआ क्या कि खूबसूरत नजारों की तरफ आसक्तिपूर्वक न भागने से सिद्धांत को यह लगा कि मैं सभी नजारे अपने अंदर, अपने मन के अंदर, अपने शरीर के अंदर या अपनी आत्मा के अंदर महसूस कर रहा हूँ। सच्चाई भी यही होती है। बाहर के नजारे तो अपने अंदर के नज़ारे को प्रकट करने का जरियाभर होते हैं। जैसा कि मैं शरीर के आनंदमय कोष की जड़ तक जाने की पिछली कई पोस्टों से कोशिश कर रहा हूँ। पता नहीं क्यों लगता है कि कुछ अधूरा है। शास्त्रीय वचनों को वैज्ञानिक व्याख्या की जरूरत है। योग वैज्ञानिक है ऐसा कहा जाता है। पर सिर्फ कहने से नहीं होता। आज इसको सिद्ध करने की जरूरत है। दुनियावी रंगीनियों व नजारों में यौनप्रेम शीर्ष पर है। अगर कोई यौनप्रेम के साथ भी उससे तठस्थ रह सके, तो उससे बड़ी अनासक्ति क्या हो सकती है। उससे तो आत्मा को चमत्कारिक बल मिलेगा और वह सबसे तेजी से जागृत हो जाएगी, सिर्फ एकदो साल के अंदर ही। भगवान शिव भी तो ऐसे ही थे। देवी पार्वती उनके ऊपर जान छिड़कती थीं, पर वे अपने ध्यान में डूबे अनासक्त रहते थे। देवी पार्वती से प्यार तो वे भी अतीव करते थे, पर तटस्थ रहने का अभिनय करते थे। इससे उपरोक्त मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार उनका सारा प्रेम उनकी आत्मा को खुद ही लग जाता था। फिर भला उनकी आत्मा क्यों हमेशा जागृत न रहती। इससे जाहिर होता है कि एक योगी विशेषकर तंत्रयोगी से बड़ा अभिनयकर्ता नहीँ हो सकता कोई। देव शिव से उल्टा अगर कोई कट्टर या आदर्शवादी या शास्त्रवादी वगैरह या नासमझ ही होता तो देवी पार्वती जैसी प्रेमिका को ठुकरा कर चला जाता या उस पर फूल पे भौरे की तरह आसक्त हो गया होता। आप समझ ही सकते हैं कि फिर क्या होता। मतलब साफ है कि शिव या बुद्धिस्ट वाला मध्यमार्ग ही श्रेष्ठ है। वैसे कहना आसान है, करना मुश्किल। शास्त्रों में अनासक्ति को ठुकराना इसलिए कहा है, क्योंकि वह अपनाने की बजाय ठुकराने के ज्यादा करीब होती है। शास्त्र भावप्रधान हैं। लोग उनके भावों को न समझकर उनका अंधानुकरण करने लगते हैं। अगर कोई आम आदमी महादेव शिव को देखता तो बोलता कि उन्होंने देवी पार्वती को ठुकराया हुआ है। विवाह तो उनका बाद में मतलब कहलो कि ज्ञानप्राप्ति के बाद हुआ। पहले तो वे कहीं और ध्यानमग्न रहते थे, और उनको ढूंढते हुए देवी पार्वती कहीं ओर। बेशक शिव ने पार्वती के रूप की ध्यानमूर्ति अपने मन में बसा ली थी और हमेशा उसके ध्यान में आनंदमग्न रहते थे। लोगों को वह उनकी तपस्या लगती होगी। उन्हें क्या पता कि मामला कुछ और ही है। मन में जाके किसने देखा। दरअसल असली अनासक्त आदमी ने पूरी दुनिया को अपनी आत्मा के रूप में अपनाया होता है। उसे नहीं लगता कि उसने दुनिया को ठुकराया हुआ है। पर दुनिया वालों को ऐसा लगता है। इसलिए कम समझ वाले आम आदमी उनकी देखादेखी दुनिया को ठुकराने की बातें करने लग जाते हैं। यहाँ तक कि प्रेमी को भी कई बार यह लगता है कि उसका प्रेमी उसे ठुकरा रहा है या नजरन्दाज कर रहा है। इसीलिए तो ऐसा होने पर शिव पार्वती को दिलासा देने के लिए कुछ क्षणों के लिए पार्वती के सामने प्रकट हो जाया करते थे, और फिर अंतर्धान हो जाया करते थे। यह बता दूँ कि आत्मा को कुण्डलिनी अर्थात ध्यानचित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति की शक्ति पहुंचती है। अगर आप बोलें कि अनासक्ति से मुझे ध्यान चित्र अभिव्यक्त होता महसूस होता है, कोई आत्मा वगैरह नहीं। शुद्ध आत्मा शून्य आकाश की तरह है, वह शरीर के रहते सीधी महसूस हो भी नहीं सकती, वह केवल ध्यानचित्र के रूप में ही महसूस हो सकती है। शिव ठहरे सबसे बड़े रासबिहारी। उनका कोई कैसे मुकाबला करे। आम आदमी को प्रेम से ज्ञान प्राप्त करने में अनेकों वर्ष लग जाते हैं। तब तक वह शिव की तरह प्रेमिका को दिलासा भी नहीं दें सकता। अगर देने लग जाए तो भावना में बह जाए और ज्ञान प्राप्ति से वँचित रह जाए। सांसारिक बंदिशें होती हैं सो अलग। सालों बाद सबकुछ बदल जाता है, प्रेमिका का मन भी। कई तो बेवफाई का आरोप लगाकर शुरु में ही किनारा कर लेती हैं। हाहा। वाह रे प्रभु शिव की किस्मत और लीला कि देवी पार्वती के प्रेम से पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति, फिर उनसे ही विवाह और उनसे ही विहार। प्रेम डगरिया में दूजा न कोई आए। ऐसा आम दुनियादारी में होने लग जाए तो स्वर्गों और अमृत की बौछार होती रहे। इसी तरह ईश्वर को बेवफा न समझकर उससे प्रेम करते रहना चाहिए। वे मनुष्य से बहुत प्रेम करते हैं, इसीलिए हवा, धूप, पानी आदि अनगिनत सुविधाएं आदमी पर लुटाते रहते हैं, बेशक पूरी तरह अनासक्त व दूर जैसे बने रहते हैं। कभी न कभी वे जरूर अपनाएंगे।

कुण्डलिनी चित्र विज्ञानमय कोष को विकसित करता है

शास्त्रों में ऐसा बहुत वर्णन है कि आनंद भीतर है अर्थात आत्मा में है, बाहर नहीँ। पर इसका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण मुझे कहीं नहीँ मिला। सम्भवतः आत्मा का स्वरूप सत्तामयी शून्य या आकाश की तरह है। अविद्या या अंधकार में आत्मा का एक गुण होता है, शून्य या आकाश या सत्ता वाला। प्रकाश का गुण इसमें गायब होता है। इसलिए उसमें आनंद काफी कम हो जाता है, क्योंकि आत्मा के सभी गुण एकदूसरे से जुड़े होते हैं। किसी भी रूप में जगत की अनुभूति से जो प्रकाश की अनुभूति होती है, वह आत्मा के प्रकाश की कमी को पूरा करने का प्रयास करती है। होता क्या है कि जब वह अनुभूति बहुत तेज, बदलती हुई अर्थात गतिशील जैसी या भड़कीली या वास्तविक जैसी हो, तब यह आत्मा से मिश्रित नहीँ हो पाती, क्योंकि आत्मा है तरंगरहित या परिवर्तनरहित आसमान के जैसे स्वभाव वाली पर इसके विपरीत तेज अनुभूतियाँ ताबड़तोड़ उतार-चढ़ाव की लहरों अर्थात परिवर्तन के स्वभाव वाली होती हैं। इनसे क्षणिक सुख तो मिलता है, जब तक ये रहती हैं, पर इनके हटते ही आत्मा का अंधेरा और भी ज्यादा घना होता हुआ महसूस होता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे रात को तेज रौशनी से बाहर निकलते ही आदमी थोड़ी देर के लिए अंधा जैसा हो जाता है। जब अनासक्ति या कुण्डलिनी आदि से वे प्रकाशमय अनुभूतियाँ मंद या कम गतिशील जैसी हो जाती हैं, तब वे शून्य आत्मा से मेल खाने लगती हैं। इससे वे आत्मा को अपना प्रकाश प्रदान करती हैं। इससे आत्मा की कमी पूरी होने से आनंद प्रकट होता है, क्योंकि उपरोक्त शास्त्रानुसार आत्मा में ही आनंद है, बाहर नहीं। इसे ही सतोगुणी अविद्या कहा गया है। सतोगुण प्रकाशप्रधान होता है। यह कोई आध्यात्मिक महत्त्व ही नहीँ बल्कि व्यावहारिक महत्त्व का विषय भी है। हर कोई ऐसे आदमी को पसंद करता है, जो शांत स्वभाव का हो, न कि भड़कीले स्वभाव वाले को। शांत स्वभाव वाले का मानसिक अंधेरा भी शांत होता है, जबकि भड़कीले स्वभाव वाले की मानसिक अँधेरे के रूप में रजोगुणी अविद्या भी भड़कीली, गहरी और दुखदाई होती है। सज्जन और दुष्ट में यह मुख्य अंतर होता है। साधु की अविद्या सत्त्वगुण से उत्पन्न होने के कारण सत्त्वगुण सम्पन्न होती है, जबकि दुष्ट की रजोगुणतमोगुण से उत्पन्न होने के कारण वैसी ही होती है।

जब रजोगुण के कारण विचार या मानसिक चित्र जल्दी जल्दी बदल रहे हों, तब अपने प्राणमय और अन्नमय कोष के साथ उनके एकरूप होने की भावना नहीं की जा सकती। मतलब उन्हें अपने एक ही मिलेजुले शरीरसंघात के साथ एकरूप मानना कठिन होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि मन की तुलना में शरीरसंघात के अन्य सभी भाग बहुत धीमी गति वाले या स्थिर जैसे होते हैं। साथ में आम दुनियादारी या जीविका से संबंधित मानसिक चित्र भौतिक होते हैं, क्योंकि वे तथाकथित भौतिक दुनिया से जुड़े होते हैं, पर आत्मा अभौतिक है, इसलिए भी इनका मिलान नहीं होता। स्थिर या धीमे जैसे व अभौतिक समझे गए मानसिक चित्र को इस संघात के साथ मिलाना आसान होता है। पंजाबी भाषा में और संस्कृत भाषा में धीमापन या घुमाव होता है, जिससे सतोगुण बढ़ता है। इसीलिए इन भाषाओं के प्रयोग से आनंद पैदा होता है। इनके माध्यम से दुनियादारी के दौरान जो अविद्या का अंधकार पैदा होता रहता है, वह सतोगुणी अविद्या रूप होता है। वह आनंदरूप होता है। इसी तरह साधु बाबा की तरह दाढ़ी रखने से भी आदमी का वर्ताव धीमा, चिंतनशील अर्थात सात्विक हो जाता है। इसी वजह से बाबा आनंद के नशे में मस्त रहते हैं।

जब कोई आदमी उच्च पद या वस्तु प्राप्त करता है, तो उसे घर के बड़े-बूढ़े लोग ज्यादा उछलने से रोककर शांत बनाए रखते हैं। हमें बचपन में हमारी माताजी किसी बड़ी उपलब्धि के बाद एकदम से आसमान से जमीन पर उतार दिया करती थीं। ज्यादातर मामले में तो हमें अहंकार के आसमान में उड़ने ही नहीँ देती थीं। वे अच्छे व वैदिक संस्कारों वाले परिवार के वंश से संबंध रखती थीं। किसी के दायरे में अगर बुजुर्गों और साधुओं का सम्पर्क न हो, तो वह उपलब्धियों से थोड़े समय तो उड़ता ही है। फिर उड़ान का नशा टूटने पर जब गिरकर पाताल के गर्त में डूबने लगता है, और दुनिया उसे क्रेजी या पागल जैसा समझने लगती है, तब उसे होश आता है। पर तब तक वह काफी आनंद को और आत्मा की उन्नति को गवां भी चुका होता है। इसलिए ऐसा नहीँ कि यह सत्त्वगुणी अविद्या वाला मनोवैज्ञानिक सिद्धांत अध्यात्म में ही लागू होता है। यह दुनियावी व्यवहार में भी उतना ही लागू होता है। शायद इसीलिए शास्त्रों में यह बहुतायत में आता है कि ज्ञानप्राप्ति के लिए कष्ट उठाना पड़ता है, या तप करना पड़ता है। तप के कष्टों से परेशान आदमी जरूर आत्मा में आनंद ढूंढेगा, ऐसा शास्त्रों का विश्वास है।

जब विचारों के साथ स्थूल शरीर की भी भावना की जाती है तब उनकी शक्ति शरीर को मिलती है और मस्तिष्क का बोझ कम होता है। मतलब जो शक्ति मस्तिष्क में दबाव पैदा कर रही थी, वह मांसपेशियों की सिकुड़न के रूप में तब्दील हो जाती है। विचार रहते हैं पर आनंद के साथ हल्के पड़ते हुए विभिन्न चक्रोँ पर आकर विलीन हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चक्रोँ पर बदलते विचारों की बाढ़ नहीँ उमड़ती जैसी मस्तिष्क या मन में उमड़ती है। क्योंकि चक्र विचारों के लिए समर्पित अंग नहीं हैं मस्तिष्क की तरह। चक्रोँ पर तो एक ही चित्र मुख्यतः कुण्डलिनी चित्र लम्बे समय तक बना रहता है। यह सतोगुण का प्रतीक है। इससे जो अविद्या पैदा होती है, वह सतोगुणी अविद्या है। यही आनंदमय कोष है। यह ऐसे है जैसे घुप्प और शांत अँधेरे में एक अभौतिक, शांत और हल्का, हालांकि अनौखा दिया जल रहा है। लम्बे समय तक स्थिर बना रहने वाला कुण्डलिनी चित्र ही सर्वोत्तम विज्ञानमय कोष बनाता है। वह आत्मा के जैसा स्थिर सत्ता का ज्ञान है, पर फिर भी विशेष ज्ञान है। मतलब न तो यह आत्मज्ञान है, और न साधारण लौकिक ज्ञान है, पर विशेष ज्ञान या विज्ञान है जो बेशक आत्मज्ञान के करीब है।

कुण्डलिनीयोग में कपालभाति प्राणायाम की अहम भूमिका है

बाएं और दाएं नथुने से बारीबारी साँस ली जाती है, और छोड़ी जाती है, ताकि इड़ा और पिंगला, दोनों साइड की नाड़ियों में कुण्डलिनी शक्ति झूलती रहे, और धीरे-धीरे बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर चढ़ती रहे। पतंग भी इसी तरह उड़ती है। डोरी को ढील देने पर कभी वह बहती हवा के थपेड़े से दाईं तरफ के आकाश में फैल जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर चढ़ती है। कभी विपरीत दिशा में हवा बहने से वह बाईं तरफ के आकाश में पसर जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर उठती है। दोनों साइड को झूलने से वह बहुत ऊँचाई में पहुंच जाने पर भी आदमी के सिर के ऊपर सीधी बनी होती है। यह सीधाई ही सुषुम्ना नाड़ी के समकक्ष है। कुण्डलिनी योग के समय भी, जब शरीर के बाएं हिस्से में प्राण की कमी होती है, और शरीर को ढीला छोड़ा जाता है, तो कुण्डलिनी शरीर के बाएं हिस्से मतलब इड़ा नाड़ी में बहने लगती है। इसी तरह जब शरीर के दाएं भाग में प्राणों की कमी हो जाती है, तो कुण्डलिनी दाएं भाग अर्थात पिंगला नाड़ी में बहती महसूस होती है। ऐसा लगता है कि जैसे आनंदमयी जैसी हलचल हो रही है, कोई करेंट वाली पतली तार जैसी नाड़ी मुझे तो महसूस होती नहीं। हो सकता है कि यह अव्यवहारिक किताबी बातें हों या उच्च स्तर के अभ्यास में महसूस होती हो। मुझे तो साधारण अनुभव से ही काफ़ी शक्ति महसूस होती है। आकाश में भी उस हिस्से की तरफ हवा चलती है, जिस हिस्से में वायु का दबाव कम हो जाता है, मतलब प्राण कम हो जाता है, क्योंकि वायु ही प्राण है। इससे स्वाभाविक है कि प्राण या हवा के बहाव के साथ कुण्डलिनी या मन या पतंग उसी तरफ चली जाती है। फिर जब वहाँ हवा या प्राण ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह थोड़ा उल्टी दिशा की तरफ वापिस भागता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी उसके साथ बह जाती है, और मान लो सीधी सिर के ऊपर या सुषुम्ना में आ जाती है। क्षणभर वहाँ रुक के वायु या प्राण दाएं आसमान में या पिंगला में पहुंच जाता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी होती है। वहाँ से फिर बाईं ओर का सफर शुरु होता है। कुण्डलिनीरूपी मन या पतंग का इस तरह का पेंडुलम के जैसा दोलन चलता रहता है, और वह सुषुम्ना में या आसमान में ऊपर उठती रहती है।

जब पतंग बहुत ऊपर उठ जाती है, तब डोर पर खींच लगाकर उसे नीचे उतारते हैं। इसी तरह जब कुण्डलिनी काफी ऊँचाई तक उठकर दिमाग़ में दबाव, थकान, और सिरदर्द पैदा करती है, तब निःश्वास झटके के साथ चलने लगते हैं। ऐसा कपालभाती प्राणायाम में होता है, जहाँ बाहर जाती सांस झटके और दबाव से चलती है, पर अंदर जाती साँस इतनी शांति से व धीरे चलती है कि उसका पता ही नहीँ चलता। इससे निःश्वास पर ज्यादा अवेयरनेस रहती है। साथ में, इसमें शरीर की मांसपेशियां भी नीचे की तरफ धक्का लगाती हैं। इन दोनों बातों से कुण्डलिनी शक्ति फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है, जिससे मस्तिष्क का दबाव कम होने से आदमी पुनः तरोताज़ा होकर फिर से दिमागी काम के लिए तैयार हो जाता है। चमत्कारी प्रभाव पैदा करता है कपालभाती। इसलिए काम के दबाव व समय की कमी के दौरान केवल इसी तरह की साँस ली जाए, तो बहुत लाभ प्रदान करती है। यहाँ एक बात बता दें कि मन-पतंग स्थायी तौर पर नीचे नहीं रहती, यह फिर बैक चैनल से ऊपर चढ़ जाती है। यह लगातार उपरनीचे घूमती रहती है। यह ऐसे ही है जैसे पतंग को हल्की खींच या तुनका लगाया जाता है, तो वह और ऊपर उठती है। साँसें तो यथार्थ में ही मन की डोर हैं, जैसा अक्सर कहा भी जाता है कि फलां की सांसों की डोर लंबी खिंच गई मतलब कोई जिन्दा बचगया, या सांसों की डोर टूट गई मतलब कोई मर गया। श्रीमदभागवत गीता में जब अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि भगवन, मन को वश में करना तो बहुत कठिन है, वायु को वश में करने से भी कठिन है, तब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कौन्तेय, मन अभ्यास से वश में आ जाता है, विशेषकर प्राणायाम के अभ्यास से।

ठंडे पानी से नहाते समय साँस तेजी से और झटकों से बाहर की ओर चलने लगती है। अधिकांश समय मुंह भी पूरा खुला होता है, जिससे साँसें धौकनी की तरह बाहर निकलती हैं। इससे दिमाग़ का दबाव नीचे उतरता है जिससे सिरदर्द से बचाव होता है। सम्भवतः ब्रेन हीमोरेज का खतरा भी कम हो जाता है। इससे ठंडा पानी झेलने की क्षमता बढ़ती है और वह आनंद दायी लगने लगता है। इसी तरह खाना खाने के बाद वज्र-आसन से भी लगभग ऐसा ही होता है। इससे दिमाग़ की शक्ति पाचन अंगों तक उतरती है जिससे पाचन दुरस्त होता है। साँस का ये स्टाइल कपालभाती ही है।

कुण्डलिनीयोगानुसार शरीर कभी भी नहीँ मरता, कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में

सभी मित्रों को होली की शुभकामनाएं

मित्रों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे मन की गतिशीलता पतंग की उड़ान की तरह है। ऐसा लगता है कि प्राणायाम पतंग की डोरी को नियंत्रित गति देने की तरह है, जिससे पतंगरूपी मन अच्छे से और आत्मविकासरूपी आनंद पैदा करते हुए उड़ सके। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि जो आनंद यौनक्रीड़ा के दौरान आता है, उसमें भी अनाच्छादित अर्थात नग्न शरीर के सम्पूर्ण उद्घाटन का काफी योगदान है। उसमें तो अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर दोनों एकसाथ उच्चतम अभिव्यक्ति के करीब होते हैं। कई लोग बोलते हैं कि असली प्यार मन से होता है, शरीर से नहीं। ये क्या बात हुई। सीधे कोई कैसे बाहरी तहखानों को लांघे बिना ही सबसे अंदरूनी तहखाने में पहुंच सकता है। जब लड़की के शरीर से हल्की यौन छेड़छाड़ होती है, बेशक अप्रत्यक्ष या मानसिक रूप में ही, तब लड़की का अन्नमय कोष सक्रिय हो जाता है। होली पर इसका अच्छा मौका मिलता है, उसे गवाएं नहीँ। हाहा। उसे पहली बार अपने शरीर की सबसे गहरी पहचान महसूस होती है। वह शरीर से ज्यादा ही सक्रिय व क्रियाशील होने लगती है। उसके मुख पर लाली और मुस्कान छा जाती है। इससे उसका प्राणमय कोष भी सक्रिय हो जाता है। प्राणों से उपलब्ध शक्ति को पाकर उसका मन रंगीनियों में बहुत दौड़ता है। वह हसीन सपने देखती है। सपनों में विभिन्न लोकों और परलोकों का भ्रमण करती है। इससे उसका मनोमय शरीर भी सक्रिय हो जाता है। क्योंकि यौन आकर्षण के कारण उसका ध्यान हर समय अपने शरीर और प्राणों पर भी बना रहता है, इसलिए उसका विज्ञानमय कोष भी खुद ही सक्रिय बना रहता है। उससे स्वाभाविक है, आनंदमय शरीर भी सक्रिय ही रहेगा। यह सब चेन रिएक्शन की तरह ही है। यही तो प्रेमानन्द है। यह आनंदमय कोष लम्बे समय तक सक्रिय बना रहता है। उसके पूरा खुल जाने के बाद तो आत्मा ही बचता है पाने को। वह भी विवाह के बाद तांत्रिक कुण्डलिनीयोग आधारित सम्भोगयोग से मिल ही जाता है। ऐसा नहीं कि यह स्त्री के साथ ही होता है। पुरुष के साथ भी ऐसा ही होता है। मुझे तो लगता है कि स्त्री की लावण्यमयी भावभंगिमा को देखकर जो पुरुष का तन और मन उससे देहसंबंध बनाने को उछालें मारने लगता है, वही उसके प्राणों का क्रियाशील होना है। यह अलग बात है कि कोई उस प्राणशक्ति का सदुपयोग करता है, तो कोई दुरुपयोग। कोई उसे आध्यात्मिक विकास में लगाता है, कोई भौतिक विकास में, और कोई संतुलित रुप से दोनों में।

थोड़ा मन की पतंग को उड़ने दें, एकदम न उतारें। हल्की सी तिरछी सी यह भावना रखें कि यह जुड़ी है। फिर थोड़ी देर बाद पतंग खुद आराम से लैंड करेगी। कोई झटका नहीँ लगेगा। मजा भी आएगा। लैंड होके उसे वापस भी जाने दें इच्छानुसार। खुद वापिस आएगी। अगर पतंग तूफानी जोर से ऊपर जा रही हो, और आप उसे जबरदस्ती नीचे खींचोगे, तो या तो पतंग फट सकती है, या धागा टूट सकता है। दोनों कमजोर तो पड़ेंगे ही, और उन पर दबाव भी बनेगा। ऐसा ही मन के साथ भी जबरदस्ती कर के होता है।

जिस समय दिमाग में थकान, दबाव या सिरदर्द जैसी हो रही हो, उस समय कपालभाति जैसी साँस खुद चलती है। उससे बाहर निकलती साँस पर ध्यान जाता है, जिससे कुण्डलिनी नीचे उतरती है। मतलब बाहर निकलती साँस धागे को नीचे खींचने मतलब खींच की तरह है, जिससे उड़ती हुई मनरूपी पतंग नीचे आती है, और दिमागी थकान रूपी तेज तूफ़ान से फटने से बचती है ।

विचारों के प्रकाश में ही नहीं, उनके अभाव के अंधकार में भी अनुभव शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि कुछ न कुछ मस्तिष्क की हलचल उसमें भी रहती ही है। यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का जो विशेष रूप में अनुभव होता है, वह भी शरीर से ही जुड़ा होता है, क्योंकि वह शरीर से ही निर्मित हुआ है। इसका मतलब है कि शरीर कभी भी नहीँ मरता। कभी यह दिखता है, कभी नहीं दिखता, रहता हमेशा है, अनुभव के रूप में।