कूटस्थ के माध्यम से सीधी जागृति: मेरा अनुभव

बहुत लोग कहते हैं कि चक्रों और रीढ़ की साधना जरूरी है, लेकिन क्रिया योग गुरु मुखर्जी की बात मुझे गहराई से छू गई—केवल कूटस्थ (आज्ञा चक्र) पर ध्यान लगाने से ही मुक्ति मिलती है। उनका मानना था कि चक्रों पर ध्यान लगाने से अनगिनत जन्म भी व्यर्थ जा सकते हैं। अब मुझे समझ आ गया कि ऐसा क्यों है।

शुरुआत से ही मैंने तंत्र के सहारे ऊर्जा को सीधे कूटस्थ में प्रवाहित किया। या यूं कहो, सीधा मस्तिष्क में ध्यान किया। चक्रों का मुझे उस समय विशेष ज्ञान और अनुभव नहीं था। जागृति के बाद ही चक्रों पर थोड़ा ध्यान देना शुरु किया, लेकिन ऊर्जा को वहाँ रुकने नहीं दिया। इसका परिणाम हुआ—तेज़ जागृति। जहाँ पारंपरिक तरीके धीरे-धीरे ऊर्जा को ऊपर उठाते हैं, मेरा तरीका सीधे लक्ष्य तक पहुँच गया। जब ऊर्जा चक्रों या रीढ़ में नहीं उलझी, तो जागृति तुरंत हुई।

लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती आई—संतुलन बनाए रखना। मैं उस समय दुनियादारी से विरक्त सा हो गया था, गहरे और भारी काम मस्तिष्क में आनंद के साथ ध्यान चित्र को भड़का देते थे। उससे मस्तिष्क में दबाव बढ़ जाता था बेशक आनंद भी। हालांकि मुझे उसे काबू में करने के लिए वाममार्गी तंत्र (खासकर यिन यांग रूप वाला) से बहुत सहायता मिलती थी। अब ऊर्जा स्वतः ऊपर-नीचे चलती है, लेकिन स्थिर रहना ज़रूरी है। इसके लिए मैं रोज़ चक्र ध्यान करता हूँ। हर चक्र पर श्वास रोकता हूँ, उसके रंग, अनाज, बीज मंत्र और ध्यान चित्र के रूप में देवता की कल्पना करता हूँ, और ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता हूँ। बिना तंत्र के, स्थिर होने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन तंत्र से यह तुरंत हो जाता है।

बहुत सी ग्राउंडिंग तकनीकों के बारे में सुना, पर ज़रूरत नहीं पड़ी। मेरे लिए तंत्र और चक्र ध्यान ही पर्याप्त हैं। इस सीधी पद्धति ने मेरे लिए काम किया। असली रहस्य यह है—जागृति तभी होती है जब ऊर्जा पूरी तरह कूटस्थ में स्थिर हो जाए, अन्यत्र बिखरने न पाए।

अगर मुक्ति की सीधी राह चाहिए—कूटस्थ पर ध्यान दो, संतुलन के लिए चक्र ध्यान अपनाओ, और ज़रूरत पड़ने पर तंत्र का सहारा लो। जब राह सरल हो, तो उसे उलझाने की ज़रूरत नहीं।

कुंडलिनी योग से ही असली यज्ञ हवन संपन्न होता है

दोस्तों, ऐसा माना जाता है कि यज्ञ हवन से पर्यावरण शुद्ध होता है। कुछ भारतीय वैज्ञानिकों ने प्रयोगों से इसके जीवाणुनाशक गुण का पता लगाया है। पर यह अंतिम निष्कर्ष नहीं है। यह हवन के आसपास के कुछ सीमित दायरे में ही पाया गया। पर्यावरण पर इसके प्रभाव का कोई पता नहीं है। विस्तृत अनुसंधान इस पर अभी नहीं हुए हैं। यह तो है कि हवन सामग्री में डाले गए सुगंधित पदार्थ जैसे कपूर, गूगल आदि जलकर सुगंध फैलाते हैं, जिससे मन में आनंद और शक्ति महसूस होती है। यह अरोमा चिकित्सा की तरह है।

जैसे विचार अनेक प्रकार के हैं, उसी तरह अन्न भी अनेक प्रकार का है

कुछ किस्म के अन्न सत्त्वगुणी, कुछ रजोगुणी और कुछ तमोगुणी होते हैं। सत्त्वगुणी अन्न सत्त्वगुण से भरे विचारों को पैदा करते हैं। रजोगुणी अन्न रजोगुण किस्म के विचारों को और तमोगुणी अन्न तमोगुणी विचारों को पैदा करते हैं। कहते भी हैं कि जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन।

अक्सर देखने में भी आता है कि खट्टा, चटपटा और मिर्च-मसालेदार रजोगुणी भोजन खाने से स्वभाव चंचल सा हो जाता है। इसीलिए बच्चों को कुरकुरे, चिप्स जैसे चटपटे जंक फूड पसंद आते हैं, क्योंकि उनका स्वभाव ही चंचल होता है। व्रत के सादे और नरम भोजन खाने से मन में सात्विकता और भक्ति भाव बने रहते हैं।

मांस, अंडा, मदिरा आदि तमोगुणी सेवन से तमोगुणी विचार पैदा होते हैं। भूत, प्रेत आदि तमोगुणी होते हैं। इसीलिए उनको खुश करने के लिए वामपंथी तांत्रिकों के द्वारा इन चीजों का भोग लगाया जाता है। तमोगुण आत्मविकास की रफ्तार को धीमा कर देते हैं।

हवन का हविष्य और तीनों गुणों की भूमिका

हवन का हविष्य बनाने में कई किस्म के अन्न का प्रयोग होता है। इनमें काले तिल भी एक हैं। वे शायद तमोगुण के परिचायक हैं। सुगंधित व मीठे पदार्थ और गाय का देसी घी सत्त्वगुण के परिचायक हैं।

शक्कर और जौ आदि मोटे अनाज रजोगुण के परिचायक हैं। कई जगह अलग-अलग ग्रह या चक्र के हिसाब से सात प्रकार के अन्न डाले जाते हैं। इनमें भी तीनों गुण शामिल हो जाते हैं। मतलब हविष्य के रूप में तीनों गुणों वाले विचार विद्यमान होते हैं।

जब आदमी अन्न खाता है तो वह पेट में पचता है, जिससे आदमी शक्ति प्राप्त करके कर्म करता है। कर्म वह खाए हुए अन्न के हिसाब से ही करता है।

सत्त्वगुणी अन्न खा के वह हल्का काम करता है, जिससे सत्त्वगुणी विचार पैदा होते हैं।

रजोगुणी और चटपटा अन्न खा के वह चंचलता वाले कर्म करता है, जिससे रजोगुणी विचार पैदा होते हैं।

तमोगुणी और भारी भोजन करके वह भारी काम करता है, जिससे तमोगुणी विचार पैदा होते हैं।

पर जब वह हवन की आग में अन्न को डालता है, तो उससे शरीर को शक्ति नहीं मिलती, क्योंकि उसे पेट की आग ने नहीं बल्कि स्थूल, बाह्य व भौतिक आग ने पचाया या जलाया होता है। ऐसे में नए विचार नहीं बन सकते। क्योंकि नए विचार तो नए कर्म करते हुए बनते हैं।

हवन के अप्रत्यक्ष लाभ

अप्रत्यक्ष रूप से हवन पुराने दबे हुए विचारों को अभिव्यक्त करने का काम करता है। एक कहावत याद रखें, “यदि आप प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं कर सकते, तो उसे अप्रत्यक्ष रूप से करें।”

जलते हुए अनाज की प्रत्यक्ष रूप से नए विचार उत्पन्न करने में असमर्थता, उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से चक्रों में दबे पुराने विचारों को पुनः प्रकट करने के लिए बाध्य करती है। मतलब उस मिश्रित हविष्यान्न से सातों चक्रों में दबे विचार प्रकट होने लगते हैं, नई-पुरानी विभिन्न भावनामयी यादों के रूप में। मैंने खुद इसे यज्ञ करते हुए महसूस किया है। इससे मन में हल्कापन सा महसूस होता है, जैसे कोई बोझ कम हुआ।

विचारों का दहन और शुद्धि

हविष्य का जलना मन के विचारों के जलने का प्रतीक है। वह तभी जलेगा जब सूक्ष्म रूप में अभिव्यक्त होगा। मतलब जब बिना इंद्रियों के सहयोग के अपने आप ही अभिव्यक्त होगा। इसलिए हवन करते हुए ऐसा ही महसूस होता है।

हवन करते हुए जो विशेष देवता का विशेष मंत्र बोला जाता है, वह इसलिए ताकि हवन से खाली हो रहे मन में वह पक्की तरह से बैठ जाए, जिससे उस देवता से संबंधित सिद्धि मिल जाए।

कुंडलिनी योग और यज्ञ

कुंडलिनी योग से भी ऐसा ही होता है। पहले आसनों और प्राणायामों से मन और चक्रों का शोर शांत किया जाता है। फिर उसके बाद चक्रों पर किसी विशेष देवता आदि के ध्यान से वहां पर उस देवता की छवि अच्छे से बैठा दी जाती है।

निष्कर्ष

यज्ञ हवन से शरीर के भीतर का पर्यावरण अर्थात मन जरूर शुद्ध होता है। बाहर भी कुछ हद तक शुद्ध होता है।

कुंडलिनी तंत्र की अनियंत्रित शक्ति ही बांग्लादेश में मुस्लिम जिहादियों की भीड़ से अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार करवा रही है

सभी प्रिय पाठकों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई

दोस्तो, इस पोस्ट में बहुत से रहस्य छिपे हुए हैं। मुझे तो यह गागर में सागर की तरह लग रही है। मूलाधार चक्र सिर्फ मेरुदंड के आधार पर कोई स्थान विशेष नहीं है। यह आत्मा या मन की अवस्था भी है, जिसमें सांसारिकता का कचरा नगण्य सा बचा होता है। सहस्रार चक्र पर ज्ञान या सात्त्विकता से जुड़े अहंकार का कचरा होता है। आज्ञा चक्र पर बुद्धिमत्ता का कचरा होता है। विशुद्धि चक्र पर वाणी से संबंधित कचरा होता है। अनाहत चक्र पर भावनाओं से जुड़ा कचरा होता है। मणिपुर चक्र पर भोजन से संबंधित सांसारिक विचारों का कचरा होता है। स्वाधिष्ठान चक्र पर प्रजनन व यौनता से जुड़ा कचरा होता है। मूलाधार चक्र पर शौच से जुड़ा सांसारिक कचरा होता है। मतलब कि जब मन पर जमा हुआ संसार का सारा कचरा नष्ट हो जाता है, तब मन अपने असली पुरातन रूप में आ जाता है। मन का वह आदिम या आदिकालिक रूप मूल प्रकृति ही है। यही मूल आधार मतलब मूलाधार है। यह चेतना का सबसे निचला स्तर होता है। इसीलिए इसको शरीर का सबसे निचला स्थान दिया गया है। मूलाधार से अगर यह क्रमवार चक्रों से होकर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है, तब यह पुनः सांसारिक कचरा इकट्ठा करने लगता है। अक्सर आदमी के साथ ऐसा ही होता है। आपने सुना भी होगा। जैसे कि फलां आदमी बिल्कुल दिवालिया या कंगाल हो गया था या सड़क पर आ गया था। फिर उसने धीरे-धीरे तरक्की करते हुए अपार धन संपदा इकट्ठी कर ली। वह दरअसल मूलाधार में पहुंच गया था, सब कुछ खोकर। मूलाधार में अपार ध्यान शक्ति होती है। यह इसलिए क्योंकि वहां सांसारिक कचरे का व्यवधान नहीं होता। उस ध्यान शक्ति को उसने कुंडलिनी योग साधना में नहीं लगाया, पर प्रचुर धन संपत्ति इकट्ठा करने में लगाया। सब कुछ तो नहीं मिल सकता न। शक्ति की भी एक सीमा होती है। इधर लगाओगे, तो उधर के लिए नहीं बचेगी। उधर लगाओगे, तो इधर के लिए नहीं बचेगी। अगर थोड़ा थोड़ा दोनों तरफ लगाओगे, तो न इधर कुछ हासिल होगा, न उधर। ऐसा इसलिए, क्योंकि हर एक उपलब्धि के लिए एक मुक्तिगामी वेग अर्थात एस्केप वेलोसिटी की जरूरत होती है। यह अधिकतम शक्ति से ही हासिल होती है। कई लोग जानबूझकर कुंडलिनी साधना को ठुकराते हैं, क्योंकि उनकी मजबूरी होती है। पेट का भरण पोषण ज्यादा महत्वपूर्ण है, कुंडलिनी जागरण बाद में। कई लोग जीवन जीने का भरपूर गुजारा होते हुए भी धन के लालच में आकर इसे मूर्खतापूर्वक ठुकराते हैं। पर अधिकांश लोगों को तो कुंडलिनी साधना का ज्ञान ही नहीं होता। यह इसलिए क्योंकि इसे आदि काल से आम आदमी से छुपाया जाता रहा है। खासकर बालकों और किशोरों से तो पूरी तरह से छुपाया गया है। युवावस्था में वह काम धंधों की उलझनों में फंस कर इस बारे जानकारी हासिल नहीं कर पाता। जब वह परिपक्व और बूढ़ा होने लगता है, तब उसे इसकी जानकारी दी जाती है। पर तब शरीर की अशक्तता के कारण तांत्रिक कुंडलिनी साधना हो नहीं पाती। अपनी बूढ़ी उम्र में अगर आदमी मूलाधारवासिनी नागिन का मुंह हमेशा ऊपर की ओर मोड़ के रखेगा तो प्रोस्टेट तो बढ़ेगा ही। महाराज ओशो ने इसीलिए तांत्रिक संभोग से पर्दा उठा कर उसे सार्वजनिक किया। मैं उस काम के लिए उन्हें दाद देता हूं।

तांत्रिक कुंडलिनी योग को छिपाने की मुख्य वजह मुझे यह लगती है कि कई बार इससे मिलने वाली शक्ति को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। उससे आदमी हिंसक भी बन सकता है, पागल भी बन सकता है। बांग्लादेश में क्या हो रहा है? मुझे तो लगता है कि जिहादियों के पास वही अनियंत्रित कुंडलिनी शक्ति है, जो वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं को इसका निशाना बनाते हुए उनसे अनगिनत कुकर्म करवा रही है। इस्कॉन कृष्ण मंदिर का हाल ही देख लीजिए, सबकुछ टूटा फूटा हुआ और देव मूर्तियां तहस नहस। साथ में, उनका कुंडलिनी तंत्र को अपनाने का तरीका भी तो गलत और अधूरा जैसा ही है। लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। इसलिए हिंदुओं के वेदपुराण बने थे ताकि लोग उनके अनुसार प्रारंभिक जीवन जीते हुए आराम और सुरक्षा के साथ कुंडलिनी तंत्र तक पहुंचकर उसे अपनाते और बिना दुष्प्रभाव के उसमें सफल होते। पर ये क्या, जेहादी मानसिकता के लोग तो सीधे ही मतलब वेदों की सहायता लिए बिना ही साधना के अंतिम पायदान मतलब निराकार ब्रह्म तक पहुंच जाते हैं, वह भी तांत्रिक क्रियाओं जैसे कृत्यों के साथ। इससे नुकसान तो होगा ही। वेदपुराण न पढ़ने होते तो शरीरविज्ञान दर्शन ही पढ़ लेते, क्योंकि यह वेदपुराणों का आधुनिक और संक्षिप्त स्पष्टीकरण ही लगता है मुझे। आप ही सोचो कि क्या कोई आदमी एबीसी सीखे बिना ही अंग्रेजी में पीएचडी कर सकता है? करने लगेगा तो कन्फ्यूज या पागल तो होगा ही। मतलब कि छिपाने का प्रयास करते हुए भी यह विद्या छिपी कहां है, साथ में यह इसके सुपात्र लोगों को भी नहीं मिल पा रही है। ऐसे भी अतिवादी इसे गलत ढंग से भी तो सीख ही रहे हैं, यदि विद्वान इसे न छिपाते तो सही ढंग से तो सीखते। इससे अच्छा होता कि इसे नियंत्रण करने के तरीके खोजे जाते और सार्वजनिक किए जाते।

लोकतंत्र के अनेक लाभ हैं, पर यह बहुसंख्यक आबादी मुख्यतः कट्टरपंथी जिहादियों द्वारा किए जाने वाले जुल्मों पर लगाम नहीं लगा पा रहा है। शेख हसीना ने कोशिश की तो उसे जान बचा कर भागना पड़ा। अगर लगाम लगा भी देती तो बहुसंख्यक आबादी उसे चुनाव में हरा देती, और फिर विपक्ष पर दबाव डालकर आजीवन कारावास या मृत्युदंड दिलवा देती या साजिशन खुद ही मरवा देती। इसी डर से राष्ट्राध्यक्ष उग्र भीड़ से मनमानी भरा तांडव करने देते हैं। आखिर जान तो सबको प्यारी होती है।

मूलाधार पर कुंडलिनी साधना करने वाले भी दो किस्म के लोग होते हैं। पहले किस्म के लोग कुंडलिनी का हर एक चक्र पर लंबे समय तक या महीनों तक एक ही चक्र पर ध्यान करते हुए धीरे-धीरे ऊपर चढ़ाते हैं। लगता है, आजकल ऐसे लोग कामयाब नहीं हो सकते। आज के आपाधापी के युग में सालों तक शांत व व्यवधानरहित जीवन नसीब नहीं हो सकता। गनीमत है अगर एक दो महीना या एक दो साल भी मिल जाए। ऐसे में कुंडलिनी बीच के ही चक्रों में फंसी रह सकती है। दूसरे किस्म के लोग बुलेट ट्रेन की तरह होते हैं। वे एकदम से संभोग आधारित तांत्रिक कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को सीधे ही एकदम से मूलाधार से सहस्रार तक चढ़ा देते हैं। ऐसे लोगों के लिए तो एक महीने का समय भी काफी होता है। अगर एक दो साल का उपयुक्त जीवन मिल जाए, तब तो कहने ही क्या।

स्पष्ट है कि आम आदमी मूलाधार और सहस्रार के बीच झूलता रहता है, विभिन्न चक्रों से होते हुए, जागृति को पाए बिना ही। वह कभी मुक्त नहीं हो पाता। कुंडलिनी जागरण भी मुक्ति की गारंटी नहीं है। मुक्ति तो सन्यासी की तरह मन को पूरी तरह से त्यागने से मिलती है, जो कि व्यवहारिक जीवन में संभव नहीं है। यह अलग बात है कि किसी चमत्कारिक व अनजाने तरीके से मुक्ति खुद ही मिल जाती हो, बेशक इसके लिए प्रयास तो करना ही चाहिए। मूलाधार और मूल प्रकृति की समकक्षता को देखकर तो यही लगता है कि आदमी का सांसारिक बंधन अनादि है, बेशक इसका अंत हो सकता है।

कुंडलिनी योग खरपतवार को नर्सरी में ही नष्ट कर देता है

दोस्तों, बुलेट ट्रेन रुक सकती है, पर लेखनी अगर एक बार चल पड़े तो नहीं रुक सकती। मेरे मन में एक विचार आया कि शास्त्रों में अहंकार को ही सूक्ष्म शरीर कहा गया है। वैसे तो सूक्ष्म शरीर को बताया गया है कि वह आत्मा, अहंकार, बुद्धि, मन, पांच प्राण, पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों से मिलकर बना है। पर साथ में यह भी कहा गया है आदमी द्वारा किए गए सभी कर्म और भोगे गए सभी फल उसकी इंद्रियों में विलीन हो जाते हैं। इंद्रियां प्राण में विलीन हो जाती हैं। प्राण मन में विलीन हो जाते हैं। मन बुद्धि में विलीन हो जाता है, और बुद्धि अहंकार में विलीन हो जाती है। तो इसे ऐसा क्यों न समझा जाए कि मृत्यु के बाद सिर्फ अहंकार ही बचा रहता है। मतलब आदमी का पूरा जीवन उसके अहंकार में दर्ज हो जाता है। इसीलिए कहावत भी है कि रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई। मतलब शरीर नष्ट हो जाता है पर उससे जुड़ा अहंकार नष्ट नहीं होता। वह केवल मोक्ष मिलने पर ही नष्ट होता है। ऋषि दुष्टों और राक्षसों से अक्सर कहते हैं कि अरे दुष्ट, तेरा अनकार जल्दी ही नष्ट हो जाएगा। मतलब आदमी का अहंकार हमेशा नहीं रहता। इसका यही मतलब है कि ज्ञान हो जाएगा। अहंकार आत्मा की तरह शाश्वत नहीं है। यह जगत की परछाई होने के कारण उसी की तरह झूठा है। कभी न कभी तो इसने नष्ट होना ही है। तभी कहते हैं कि राम नाम सत्य है। मतलब आत्मा ही सत्य है जो कभी नष्ट नहीं होती।

कर्मों और फलों के इंद्रियों में विलीन होने का मतलब है कि उनसे जुड़े अनुभव शरीर के चक्रों में सूक्ष्मरूप में दर्ज हो गए। योगी लोग इन्हें कुंडलिनी योग से बाहर निकालकर खत्म कर देते हैं, जिससे ये अहंकार तक नहीं पहुंच पाते और उन्हें कर्मफल के बंधन में नहीं डाल पाते। इंद्रियों के प्राणों में विलीन होने का यह मतलब नहीं कि इंद्रियां नष्ट हो गई। इसका मतलब है कि शरीर की क्रियाशीलता कम होने से इंद्रियां क्षीण हो गईं। इससे उनको मिलने वाली शरीर की जीवनी शक्ति की बचत हो गई। वह अतिरिक्त शक्ति प्राण शक्ति के रूप में शरीर को उपलब्ध हो गई। उस अतिरिक्त प्राण की शक्ति मन को लगने लगी। इसीलिए तो बैठे-बिठाए आदमी का मन बहुत भागता है। साक्षीभाव साधना का अभ्यास करने वाले या राजयोगी इन मन के विचारों के प्रति उदासीन रहकर इन्हें क्षीण करते हैं। इससे वे भी कर्मफल के बंधन में नहीं पड़ते। पर चक्रों पर ही विचारों को कुचलने का कुंडलिनी योग का तरीका ज्यादा आसान और प्रभावशाली है। अगर आप खरपतवार को नर्सरी में ही नष्ट कर दो तो ज्यादा अच्छा है, क्योंकि खेत में पहुंचने के बाद तो यह बहुत ज्यादा बढ़कर बहुत ज्यादा दायरे में फैल जाता है। जब योग से मन को भी काबू किया गया तो उसकी शक्ति बुद्धि को लग गई। इसीलिए तो जो मन पर काबू पा लेता है वह बहुत से रचनात्मक कार्य जैसे कि लेखन, गायन, कविता निर्माण, चित्रकारी आदि में निपुण होकर दुनिया को श्रेष्ठ रचनाएं प्रदान करता है। ये सब काम बुद्धिरूपी एकाग्र मन से ही होते हैं, भटकते मन रूपी साधारण मन से नहीं। फिर जब योग से बुद्धि पर भी लगाम लगा दी जाती है तब बुद्धि की शक्ति अहंकार को लगती है। मतलब बुद्धि नष्ट नहीं होती पर अहंकार में समा जाती है। इसीलिए तो अपनी बुद्धि से दुनिया में झंडे गाड़ने वाले का अहंकार बहुत बढ़ जाता है। लोग उसे ताने मारने लगते हैं कि उसका घमंड बहुत बढ़ गया है। लोग उससे जलने लगते हैं। जब आदमी कुंडलिनी योग से अहंकार को भी काबू में कर लेता है, तब उसकी शक्ति आत्मा को लगने लगती है। अहंकार के बाद पाने को आत्मा ही तो बचता है। वैसे तो अहंकारी आदमी दुनिया में अपना डंका बजाते हुए दौड़ता भागता रहता है। पर जब वह कुंडलिनी योग में लग जाता है तो अहंकार खुद ही आत्मा या कुंडलिनी जागरण के अनुभव में रूपांतरित होने लगता है। यह इसलिए क्योंकि अहंकार से महान और व्यापक केवल आत्मा ही है। अहंकार को महतत्त्व इसीलिए कहते हैं क्योंकि यह सबसे महान तत्त्व है। जिन चीजों से दुनिया बनी है, उन्हें तत्त्व कहते हैं। अहंकार इनमें सबसे बड़ा है। यह अकाश की तरह ही व्यापक है। बेशक यह आत्मा जैसा परम चेतन नहीं है। आत्मा दुनिया के सभी तत्त्वों से परे है। अहंकार की इसी विशालता और व्यापकता के कारण ही शरीर छोड़कर गई आत्मा में कई अलौकिक जैसी शक्तियां होती हैं। कई तांत्रिक उन आत्माओं को सिद्ध करके उन शक्तियों को प्राप्त करते हैं। इन सब बातों से साफ है कि अहंकार पूरे सूक्ष्म शरीर को अपने अंदर समेटे होता है। हालांकि होता वह काजल के जैसे चमकीले और अंधेरे आसमान के जैसा ही।

आत्मज्ञान के बाद यह प्रक्रिया उल्टी भी चलती है। खासकर जब योगी दुनियादारी में प्रवेश करने लगता है। उसकी आत्मा तनिक मलिन होकर अहंकार के रूप में बन जाती है। अहंकार बुद्धि के रूप में आ जाता है। बुद्धि मन के रूप में, मन प्राणों के रूप में और प्राण इंद्रियों के रूप में स्थूल हो जाते हैं। इसलिए देखा गया है कि अच्छे विचारों से अच्छी साँसें बहने लगती हैं। साथ ही, अच्छी साँसों से इन्द्रियाँ पर्याप्त रूप से सक्रिय हो जाती हैं और अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित होती हैं। फिर इंद्रियां विभिन्न कर्मों और फलों के रूप में पूरे जगत में फैल कर उस आदमी के अपने व्यक्तिगत और सीमित संसार का निर्माण करती हैं। हालांकि फिर वह राजा जनक की तरह कर्मयोगी बनता है, और बंधन में कम ही पड़ता है।

कुंडलिनी योग से जगत इन्द्रियों में, इंद्रियां मन में, मन बुद्धि में, बुद्धि अहंकार में और अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है

दोस्तों, सूक्ष्म शरीर पर यह चर्चा बढ़ती ही जा रही है। मैं चाहता था कि कोई नई चर्चा शुरू होए, पर यह क्या है न कि चर्चा एक सृष्टि की विकास प्रक्रिया की तरह ही चरणों से गुजरती है। यह शुरू होती है, बढ़ती है, और निष्कर्ष पैदा करके खत्म हो जाती है। इस पर किसी की लगाम नहीं लगती। यह पोस्ट भी मुझे निष्कर्ष वाली लग रही है। पर फिर भी पता नहीं आगे कहां तक जाए।

हम बात कर रहे थे कि शरीररहित आत्मा अपने को ही सूक्ष्म शरीर के रूप में अनुभव करती है। आत्मा के अंदर उसके पिछले सभी जन्मों के किस्से सूक्ष्म रूप में मौजूद होते हैं। वह उन्हीं को सूक्ष्म शरीर के रूप में महसूस करती है। यह तो सब ठीक है पर स्थूल शरीर के बिना वह दूसरों के साथ कैसे संपर्क करेगी? और उसका विकास भी कैसे होगा? देखो, पिछले जन्मों का कभी उसे कोई हिस्सा ज्यादा महसूस होता होगा तो कभी कोई दूसरा। यह ऐसे ही है जैसे शरीरयुक्त आत्मा के मन में कभी कोई विचार उठता है, तो कभी कोई। पहले वह विचार भी सूक्ष्म अनुभव के रूप में आत्मा में महसूस होता है। उसके बाद वह अनुभव मन की तरंगों के माध्यम से उस अनुभव वाले विचार के रूप में स्थूलता ग्रहण करता है। वह विचार फिर मुख से बोल के रूप में निकलकर और ज्यादा स्थूल हो जाता है। उस बोल से जब उसके जैसा काम होता है तब वह काम के प्रभाव या जगत के रूप में और ज्यादा स्थूल हो जाता है। इस तरह से स्थूलता बढ़ती ही रहती है। इस तरह से आत्मा का विस्तार पूरे जगत में हो जाता है। अंत में यह जगत सिकुड़ कर फिर से आत्मा में समा जाता है। फिर सारी प्रक्रिया उल्टी चलने लगती है। जगत के स्थूल पदार्थ सूक्ष्म होकर कर्मेंद्रियों और ज्ञानेंद्रियों में समा जाते हैं। यह ऐसे ही है कि जगत चक्रों में समा जाता है। इसीलिए कुंडलिनी योग में चक्र साधना सबसे मुख्य अंग है। चक्र में ध्यान लगाने से उनसे अर्थात उनके या इंद्रियों के द्वारा पैदा हुए कर्मों और फलों से जुड़ी स्मृतियां मन में आ जाती है। वैसे भी कहते ही हैं कि सातों चक्र शरीर की सभी इंद्रियों से जुड़े होते हैं। इसको ऐसे कहा गया है कि इंद्रियां मन में समा जाती है। मन फिर और ज्यादा सूक्ष्म होकर बुद्धि में समा जाता है। मतलब मन के विचारों का लय होने से बुद्धि तेज हो जाती है, क्योंकि मस्तिष्क की जिस ऊर्जा को मन खा रहा था, वह अब बुद्धि को मिलती है। बुद्धि फिर और ज्यादा सूक्ष्म होकर अहंकार में समा जाती है। मतलब जब बुद्धि को लगने वाली ऊर्जा भी दुनियादारी में बर्बाद नहीं होती तो वह भी अहंकार में विलीन हो जाती है। अहंकार मतलब अंधेरा। जब आदमी सब कुछ ठुकरा देगा तो अंधेरा ही बचेगा। इसी अंधेरे में जब आदमी कुंडलिनी योग से कुंडलिनी की लौ जलाता है, तो वह जागृत होती हुई अवस्था में अहंकार को आत्मा में विलीन कर देती है, मतलब कुंडलिनी जागरण के रूप में कुछ क्षणों के लिए आत्मा का अनुभव प्राप्त होता है। यह सारा खेल शक्ति का ही है। जब वह बहिर्मुखी थी, तो दुनिया के रूप में बाहर ही बाहर फैलती गई। जब यह अंतर्मुखी हुई तो अंदर ही अंदर सिकुड़ती गई और अंत में कुंडलिनी योग के माध्यम से कुंडलिनी को लग गई और वह उस शक्ति से आत्मा में विलीन हो गई।

यह अहंकार आत्मा जैसा ही है पर उसमें आत्मा से कम चेतना होती है। इसे जीवात्मा कह लो क्योंकि इसमें आदमी का पिछला सारा इतिहास सूक्ष्म कोडों के रूप में छुपा होता है। अंत में शरीर छूटने से अहंकार भी आत्मा में समा जाता है। शरीर छूटने से अहंकार आत्मा में तो नहीं पर जीवात्मा में समा जाता है। आत्मा में समाने के लिए उसे कुंडली जागरण का अनुभव प्राप्त करना होगा। कुंडली जागरण के कुछ क्षणों के अनुभव के दौरान वह अहंकार अर्थात आदमी का अपना मूलभूत जीवात्मा वाला रूप आत्मा में समाया होता है। हालांकि उस अनुभव के बाद अहंकार पुनः वापिस आ जाता है क्योंकि अहंकार के बिना कोई जीवन जी ही नहीं सकता। उसके बिना या पूर्ण आत्मा के रूप में आदमी होगा तो पूर्ण पर होगा लकड़ी के ठूंठ की तरह। दुनिया के प्रति उसकी कोई प्रतिक्रिया शेष नहीं रह जाएगी। खैर, अहंकार की ऊर्जा जब बाहर नहीं भागती तो वह ऊर्जा कुंडलिनी जागरण को पैदा करती है। होता यह सब कुंडलिनी योग से ही है। ये सभी तत्त्व आत्मा में सूक्ष्म रूप में रहते हैं। कभी आत्मा से बाहर निकलते हैं, कभी उसमें समा जाते हैं। शास्त्रों में सृष्टि और प्रलय का और जीवन और मृत्यु का बिल्कुल ऐसा ही वर्णन मिलता है। यहां तक कि योग साधना से अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाने का अर्थात बंधन से मुक्ति की तरफ जाने का जो सफर है, उसका वर्णन भी इसी तरह का आता है। दरअसल, ये सब प्रक्रियाएं एकसमान ही हैं। सिर्फ मानसिकता, उद्देश्य, और प्रक्रिया के तरीकों में ही फर्क है। यहां किसी चीज के किसी चीज में समाने का यह मतलब नहीं है कि वह चीज खत्म हो जाती है। बल्कि इसका यह मतलब है कि वह सूक्ष्म होकर अर्थात ऊर्जा के रूप में रूपांतरित होकर किसी मिलतेजुलते अन्य रूप में प्रकट हो जाती है। यह ऐसे ही है जैसे कहते हैं कि गागर में सागर समाना। शास्त्रों में इसे ऐसे कहा गया है कि आत्मा इस संसार को अपने अंदर से ऐसे ही फैलाता और अपने अंदर ऐसे ही समेटता रहता है, जैसे एक कछुआ अपने अंगों को अपने कवच से बाहर निकालता है और अपने कवच के अंदर को समेटता भी रहता है। दूसरा उदाहरण ऐसा दिया जाता है कि जिस तरह मकड़ी अपने मुंह से अपना जाला बुनती है और फिर उस जाले को अपने मुंह में ही निगल जाती है, उसी तरह परमात्मा भी सारे संसार को अपने आप से पैदा करता है, और अंत में अपने आप में ही विलीन भी कर लेता है।

कुंडलिनी योग से आदमी में अदृश्य हो जाने की शक्ति पैदा हो जाती है

दोस्तों शिव पुराण में शिव पार्वती को काल को हराकर अमर और मुक्त होने का तरीका बताते हैं। वह कहते हैं कि तीन तरीके हैं ध्यान के। आकाश मतलब अनाहत नाद पर ध्यान, वायु पर ध्यान मतलब प्राणायाम और अग्नि पर ध्यान मतलब आज्ञा चक्र बिंदु पर सूर्य, प्रकाशमान देवचित्र आदि का ध्यान। यहां यह बात गौर करने लायक है कि यह वर्णन उस वर्णन के बाद आता है जिसमें तथाकथित अजीबोगरीब मृत्यु के लक्षण बताए गए हैं। जैसे कि बाया अंग कई दिन तक लगातार फड़कने से मृत्यु होना या गिद्धों के द्वारा हमला होने को मृत्यु का लक्षण आदि। हालांकि शिव ने यह भी साफ कहा है कि लोगों की भलाई के लिए और उनमें वैराग्य की वृद्धि के लिए ही वह ऐसा वर्णन कर रहे हैं। मतलब साफ है कि यह प्रयास मृत्यु का भय पैदा करने के लिए है ताकि लोग योग आदि का सहारा लेकर जल्दी से मृत्यु पर विजय पा सकें। इसके बाद जो योग का वर्णन है उसके फलस्वरूप तथाकथित पारलौकिक सिद्धियों का वर्णन भी योग के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए ही किया गया है। मतलब एक तरफ मृत्यु का काल्पनिक भय पैदा किया गया है तो दूसरी ओर योग की काल्पनिक उपलब्धियां दर्शाई गई हैं। काल्पनिक मतलब द्विअर्थी सी, कोरी काल्पनिक नहीं। उदाहरण के लिए योगी का अदृश्य हो जाना। ऐसा नहीं होता कि योगी का शरीर किसी को दिखता ही नहीं। इसका मतलब है कि वह कुंडलिनी योग से इतना शांत, निरपेक्ष और अपने आप में स्थित सा हो जाता है कि लोगों की भीड़ में भी उसकी तरफ ध्यान ही नहीं जाता। मेरा एक योगी मित्र है। वह दस सालों से एक अपरिचित से समाज के लोगों के बीच बसा हुआ था। पर उस समाज के लोगों को उसके बारे में पता ही नहीं था। गुप्तचर भी तो ऐसे ही होते हैं।

कुंडलिनी योग की इड़ा-पिंगला इरेक्टस स्पाइने मांसपेशी और सुषुम्ना नाड़ी मेरुदंड हो सकती है

मित्रों मुझे कई बार लगता है कि कुछ मुख्य चीज छुपाई जा रही है या उसकी खोज नहीं हो पा रही है। नाड़ियों को कहा जा रहा है कि वे सूक्ष्म मार्ग  हैं जिनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है, पर ऐसा होना संभव ही नहीं है। आप कोई भी अनुभव लो, उसका भौतिक अस्तित्व भी जरूर होता है। कोई भी भावना, व्यवहार, सोच, आदि चाहे कितने ही सूक्ष्म क्यों ना हो, मस्तिष्क या शरीर में उनका भौतिक प्रतिरूप भी जरूर होता ही है। बिना भौतिक अभिव्यक्ति के तो केवल शरीर रहित आत्मा ही है। हालांकि उसमें भी पिछले जन्मों के भौतिक अनुभवों का डाटा, सूक्ष्म रूप या अव्यक्त रूप में कोडिड होता है। फिर जब एक प्रकाश की रेखा सुषुम्ना में महसूस होती है तो उसका कोई भौतिक प्रतिरूप भी जरूर होता होगा, जिससे वह पैदा हो रही है। यह मेरुदंड के अंदर स्नायु रज्जु ही तो है, जिसे हम स्पाइनल कॉर्ड कहते हैं। मुझे लगता है कि जो इरेक्टस स्पाइने मांसपेशी सेकरम से स्कल तक, रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ जाती है, वही इड़ा और पिंगला को भौतिक अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं। हालांकि ऐसी रस्सी जैसी पेशी छूने पर ही महसूस होती है खासकर शरीर के निचले हिस्से में सैक्रम तक। सामान्यतः तो कुछ शरीर के बाएं या दाएं हिस्से में ऊर्जा या स्फूर्ति जैसी ऊपर चढ़ती महसूस होती है, जम्हाई लेने की तरह। ऐसा लगता है कि वह अज्ञाचक्र बिंदु रूपी सिंक में ओझल हो रही हो। जिस तरफ़ को उर्जा चल रही हो, उस तरफ़ के कपोल या चेहरे की चमड़ी उसी तरफ को खिंचती हुई लगती है। मुझे यह दोनों मसल टाइट रस्सी की तरह हाथ से छूने पर महसूस होते हैं। रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ कभी ये मसल बैंड टाइट जैसे हो जाते हैं, तो कभी लूज। जब टाइट होते हैं तो ऐसा लगता है कि कुछ आनंदात्मक संवेदना इससे ऊपर गई और उससे मूलाधार अंग का उर्जा दबाव कम हो गया। एनाटॉमी देखने पर यह पीठ में वैसे ही फैले हैं, जैसे मुझे महसूस होते हैं। यह सैक्रम के आसपास शुरू होते हैं। फिर थोड़े कम चौड़े होते हैं ऊपर जाते समय नाभि के स्तर पर कम फैले होते हैं और ह्रदय के स्तर पर ज्यादा चौड़े होते हैं और स्कल के बेस पर कम चौड़े होकर दोनों तरफ मुड़ कर स्कल से जुड़ जाते हैं। यह तो विज्ञान भी कहता है कि रासायनिक संवेदना जैसी नाड़ी में बहती है, वैसी ही मांसपेशी में भी बहती है। हो सकता है मांसपेशी में तेजी से बहती हो, इसीलिए मूलाधार की संवेदना मेरुदंड के स्नायु दंड से न जाकर इन दोनों मांसपेशियों से गुजरती है जिसे इड़ा और पिंगला कहा गया है। आप कल्पना करो कि तीन समानांतर पाइप हैं। इनमें बीच वाला पतला और इसके दोनों तरफ एक एक मोटा पाइप है। अगर आप बाएं पाइप को पूरा खुला छोड़ कर दाएं पाइप को पूरा बंद करते हैं तो सारा पानी बाएं पाइप से गुजरेगा। अगर आप दाएं को पूरा खुला छोड़कर बाएं को पूरा बंद करते हैं तो सारा पानी दाएं पाइप से गुजरेगा। अगर आप दोनों को आधा खुला छोड़ते हैं तो अतिरिक्त पानी दूसरी तरफ वाले पाइप की और भागेगा और इस दौरान बीच वाले पाइप से भी गुजरेगा। बाकी शेष पानी ही दूसरे पाइप तक पहुंचेगा। इड़ा और पिंगला के एक साथ क्रियाशील करने से भी शायद ऐसा ही होता है। मतलब संवेदना सुषुम्ना से भी प्रवाहित होने लगती है। दोनों पाइपों को इसलिए एक साथ पूरा खुला नहीं रख सकते क्योंकि इतना पानी ही नहीं होता। मतलब अगर एक नाड़ी को जितना बंद करेंगे, दूसरी नाड़ी उतना ही खुलेगी। मुझे महसूस होता है कि जब मूलाधार की संवेदना ऊपर चढ़ती है तो कभी बाईं तरफ वाली फैली हुई मांसपेशी तन कर रस्सी की तरह दंडवत हो जाती है तो कभी दाएं तरफ वाली। जब दोनों बराबर और हलके रूप में तनती हैं तब ऐसा लगता है कि कुछ संवेदना रीढ़ की हड्डी के अंदर से भी ऊपर गई। क्योंकि तब दोनों से अलग और विशेष सा संतुलित आनंद और तरोताजगी महसूस होते हैं।

कुंडलिनी शक्ति कभी नहीं सोती

शरीर में शक्ति गुप्त रहकर सब काम करती है। यह भोजन का पाचन करती है, दिल को धड़काती है, और भी शरीर के छोटे बड़े अनगिनत काम करती है। यह सोई हुई नहीं हो सकती। अगर यह सोई होती तो इतने काम कैसे करती। शायद हम उसे सोई हुई इसलिए कहते हैं क्योंकि आदमी का शरीर गहरी नींद में होने पर भी अनगिनत काम करता रहता है जीवन के, अन्यथा मर न जाता क्या। उससे एक ही काम नहीं होता बस, चेतन विचारों को पैदा करना। इसी तरह सोई हुई शक्ति का मतलब है कि उससे शरीर के सभी काम हो रहे हैं, पर जागृत विचार पैदा नहीं हो रहे। इसे अर्धसुशुप्त अवस्था कह सकते हैं क्योंकि साधारण या धुंधले विचार तो पैदा हो ही रहे हैं। हल्के विचार तो आदमी को नींद में भी आते हैं स्वप्न के रूप में। शक्ति को जगाने का मतलब है उसे सबसे ज्यादा अभिव्यक्त रूप में लाना और वह है कुंडलिनी जागरण। जैसे आदमी के जागने के अनगिनत स्तर हो सकते हैं पर असली जागृति वही है जिसमें वह सबसे ज्यादा अभिव्यक्त होता है, जो कुंडलिनी जागरण ही है। अन्य अवस्थाओं को सुषुप्ति भी कहा जा सकता है। शास्त्रों में अनेक जगह आता है कि यह दुनिया स्वप्न की तरह है। हम जो साधारण जीवन जी रहे हैं, वह स्वप्न ही है, मतलब हम नींद में हैं। असली जागना तो कुंडलिनी जागरण की अवस्था है। सहस्रार से नीचे सब कुंड ही है, मूलाधार सबसे बड़ा कुंड है। क्योंकि अन्य कुंडों से थोड़ा बहुत शक्ति का रिसाव सहस्रार को होता रहता है इसलिए वहां घुप्प अंधेरा नहीं होता। पर मूलाधार में कुंडलिनी होने पर सबसे ज्यादा अंधेरा होता है, क्योंकि यह सहस्रार से सबसे ज्यादा दूर है। आदमी में ही यह ऊर्जा का घूमना खास महत्त्व का है, क्योंकि वह खड़ा होकर चलता है, और मस्तिष्क तक रक्त को पहुंचाने के लिए विशेष ताकत चाहिए होती है। योग से या शारीरिक क्रियाशीलता से जब चक्र पर शक्ति पहुंचने से वहां मांसपेशियों का संकुचन सा होता है, तब वहां खुराक की खपत बढ़ जाती है, इससे वहां खुद ही रक्तसंचार बढ़ जाता है। इसीलिए कहते हैं कि शक्ति रक्तसंचार को नियंत्रित करती है। वैसे सीधे तौर पर वह मांसपेशियों के संकुचन और प्रसारण की गति को नियंत्रित करती है, जिससे रक्तसंचार खुद ही नियंत्रित हो जाता है। पशुओं में पीठ सीधी होने से ऐसा नहीं होता। क्योंकि बंदर, लंगूर , चिंपांजी आदि भी काफी सीधे हो जाते हैं, इसीलिए वे भी चंचल होते हैं ताकि शक्ति बहती रहे व पूरे शरीर में रक्तसंचार सुचारु रूप से चलता रहे।

शरीरविज्ञान के अनुसार शरीर को सिर्फ नर्व फाइबर ही नियंत्रित नहीं करते, बल्कि हार्मोन नामक जैवरसायन भी नियंत्रित करते हैं और अंगों का कुछ अपना स्थानीय नियंत्रण भी होता है। पर नाड़ियां तो पूरे शरीर को सुचारु कर देती हैं। ऐसा तो कभी नहीं सुना गया कि फलां योगी में नाड़ी चालन से कुछ अंग तो दुरस्त हो गए, पर कुछ अंगों पर विशेषकर हार्मोन से नियंत्रित होने वाले अंगों पर कोई असर नहीं पड़ा। इससे तो यह भी लगता है कि नर्व फाइबर को नाड़ियां नहीं कहा गया है। कहते हैं कि नर्व फाइबर में विद्युत ऊर्जा और नाड़ी में प्राण ऊर्जा या शक्ति प्रवाहित होती है। वैसे जब चक्र में हलचल होगी तो वहां हार्मोन बनाने वाले सेल्स भी सक्रिय होंगे और स्थानीय प्रणालियां भी सक्रिय होंगी ही।

शक्ति और ऊर्जा में काफी समानताएं हैं, पर दोनों अलग अलग हैं। ऊर्जा जड़ है, जबकि शक्ति शिव की सन्निधि से चेतन है। ऊर्जा तो किसी भी जड़ चीज या मशीन आदि में हो सकती है, पर शक्ति चेतन प्राणी में ही हो सकती है। कुंडलिनी योग से मूलाधार से ऊपर चढ़ने वाली संभोग आधारित ऊर्जा को इसलिए शक्ति कहा जाता है क्योंकि इससे समाधि जैसी लगती है। साफ शब्दों में कहें तो इससे समाधि चित्र या कुंडलिनी चित्र पुष्ट होता है। और साधारण शब्दों में कहें तो यह परमात्मा की तरफ ले जाती है। क्योंकि इससे दिमाग को ऊर्जा मिलती है, इसलिए अवचेतन मन में दबी ऊर्जा बाहर निकलकर या अभिव्यक्त होकर नष्ट हो जाती है। हालांकि ऐसा शारीरिक क्रियाशीलता से भी होता है, पर इससे भी शक्ति उसी रास्ते से चलती है। मतलब कि शारीरिक हलचल से मूलाधार पर शक्ति इकट्ठी होती रहती है और पीठ से ऊपर चढ़ती रहती है। इसीलिए शरीर से मेहनती लोगों के लिए भी कुंडलिनी योग बहुत फायदेमंद होता है।

कुंडलिनी शक्ति ही अंधेरे से संपूर्ण सृष्टि की रचना करती है

गुप्त कालचक्र मुझे अवचेतन मन का खेल लगता है। आदमी के हरेक अंग से संबंधित सूचना उससे संबंधित चक्र में छुपी होती है। ये पिछले अनगिनत जन्मों की सूचनाएं होती हैं, क्योंकि सभी जीवों के शरीर, उनके क्रियाकलाप, उनसे जुड़ी भावनाएं और चक्र सभी लगभग एकजैसे ही होते हैं, मात्रा में कम ज्यादा का या रूपाकार का अंतर हो सकता है। चक्रों पर ध्यान करने से वे सूचनाएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रकट होकर मिटती रहती हैं। जब स्थूल मन की सफाई हो जाती है, तब आदमी सूक्ष्म मन की सफाई के लिए खुद ही चक्रसाधना की ओर मुड़ता है। जैसे स्थूल मन की अवस्था समय के साथ प्रतिपल बदलती रहती है, वैसे ही सूक्ष्म अवचेतन मन की भी बदलती रहती है, क्योंकि सूक्ष्म मन भी स्थूल मन का ही प्रतिबिंब है, पर वह हमें नजर नहीं आता। इसीलिए इसे गुप्त कालचक्र कहते हैं। मतलब कि अगर अवचेतन मन पूरा साफ भी कर लिया तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि यह फिर गंदा नहीं होगा। सभी चक्रों का ऊर्जा स्तर बदलता महसूस होता रहेगा चक्रसाधक को। काल के थपेड़ों से कुछ नहीं बच सकता। इसलिए भलाई इसी में है कि जो है, उसे स्वीकार करते रहो हर स्थिति में बराबर और अप्रभावित से बने रहते हुए। यही वैकल्पिक कालचक्र है। यही गुप्तकालचक्र साधना का मुख्य उद्देश्य लगता है मुझे।

कुंडलिनी शक्ति सृष्टि का निर्माण करती है, जो यह कहा जाता है इसका यह अर्थ नहीं लगता कि वह अंतरिक्ष के ग्रह तारों आदि भौतिक और स्थूल पिंडों का निर्माण करती है। बल्कि ज्यादा युक्तियुक्त तो यह अर्थ लगता है कि वह प्रजनक संभोगशक्ति के जैसी है जो एक बच्चे को जन्म देती है और उसके शरीर और मनमस्तिष्क के रूप में संपूर्ण सृष्टि का निर्माण करती है। हालांकि पहले वाली उक्ति भी अप्रत्यक्ष रूप से सही हो सकती है, क्योंकि जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है, पर दूसरी उक्ति तो प्रत्यक्ष, व्यवहारिक व स्पष्ट रूप से सत्य दिखती है।

कई लोग बोल सकते हैं कि संभोग शक्ति तो वंश परंपरा को बढ़ाने के लिए है, उसमें कुंडलिनी कहां से आ गई। आदमी तो कुछ भी मायने निकाल सकता है उस शक्ति के। अगर उसका असली उद्देश्य जानना हो तो पशु को देखना चाहिए। ये अपनी सोच या लक्ष्य के हिसाब से नहीं बल्कि कुदरती प्रेरणा या इंस्टिंक्ट अर्थात स्वाभाविक प्रवृत्ति से ज्यादा चलते हैं। उनके मन में संतानोत्पत्ति का उद्देश्य नहीं होता संभोग को लेकर। वे तो अज्ञान के अंधेरे में संकुचित मन को विस्तार देने के लिए ही संभोग के लिए प्रेरित होते हैं, वह भी तब जब प्राकृतिक अनुकूल परिस्थितियां उन्हें इसके लिए प्रेरित करे, ऐसे तो इसके लिए भी अपनेआप उनमें लालसा पैदा नहीं होती। एक भैंस और भैंसा तभी इसके लिए प्रेरित होंगे जब भैंस मद में अर्थात हीट में होगी जो महीने में एक या दो दिन के लिए आती है। गर्मियों के मौसम में तो वह हीट आना भी बंद हो जाता है। अन्य समय तो दोनों साथ में रहते हुए भी संभोग नहीं करेंगे। पर जब मद में होती है तो जानकार मानते हैं कि भैंस पच्चीस किलोमीटर तक भैंसे को खोजते हुए अकेले निकल सकती है, बेशक वह रास्ते में मर ही क्यों न जाए। आदमी विकसित प्राणी है। वह कुदरती नियमों से लाभ लेना जानता है। तंत्रयोगी एक कदम और आगे है। वह अंधेरे में संकुचित मन की एक ध्यानचित्र के रूप में छोटी सी लौ जलाता है। फिर वह उसे संभोगसहायित योग से इतना ज्यादा बढ़ाता है कि वह जागृत हो जाती है। यही कुंडलिनी जागरण है। अब चाहे ध्यानचित्र के रूप में संकुचित मन को कुंडलिनी कहो या अंधेरे में संकुचित मन को। बात एक ही है क्योंकि वही अंधेरा ध्यानसाधना से विकसित होकर ध्यानचित्र बन जाता है। जो संभोग शक्ति उसे विकसित होने का बल देती है, वह मूलाधार मतलब अंधेरे कुंड में रहती है, इसीलिए इसका नाम कुंडलिनी है। मतलब ध्यानचित्र का कुंडलिनी नाम तभी पड़ा जब उसे संभोग शक्ति अर्थात वीर्यशक्ति का बल मिला। मतलब कुंडलिनी शब्द ही तांत्रिक है। आम आदमी अंधेरे में या अनगिनत क्षुद्र और हल्के विचारों में संकुचित मन के साथ सीधे ही संभोग करता है, जिससे अनगिनत विचारों में वह शक्ति बंट जाती है। इससे उसे दुनियावी विस्तार या तरक्की तो मिल सकती है, पर जागृति के लाभ कम ही मिलते हैं।

जब शक्ति मूलाधाररूपी कुंड के अंधेरे में घुसती है, तभी जीव संभोग की ओर आकृष्ट होता है। हमेशा पूर्ण ज्ञान के प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति का तो संभोग का मन ही नहीं करता। मेरे एक खानेपीने वाले एक वरिष्ठ अनुभवी मित्र थे जिन्होंने मुझे एकबार कहा था कि अगर मैं मांसाहार नहीं करूंगा तो संभोग कैसे कर पाऊंगा। मैं उस बात को मन से नहीं मान पाया था। आज मैं उनकी बात में छिपे तंत्र दर्शन को समझ पा रहा हूं। अंधेरा सिर्फ़ खानेपीने से ही पैदा नहीं होता। दुनियादारी में आसक्ति से कर्मशील रहते हुए भी पैदा होता है। मुझे लगता है कि शरीर की बनावट ही ऐसी है कि मस्तिष्क या मन का अंधेरा जैसे जैसे बढ़ता है, वैसे वैसे ही शक्ति नीचे जाती है। सबसे ज्यादा या घुप्प अंधेरे का मतलब है कि शक्ति मूलाधार पर इकट्ठी हो गई है। यह रक्तसंचार ही है जो कुदरतन नीचे की ओर इकट्ठा होता रहता है। मूलाधार तक पहुंचकर शक्ति फिर पीठ से होकर सीधी मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मूलाधार पर शक्ति के पहुंचने से स्वाभाविक है कि वहां के यौनांग क्रियाशील हो जाएंगे। कई संयम रखकर उस शक्ति को वापिस ऊपर जाने का मौका देते हैं। कई तांत्रिक विधि से उसे बढ़ा कर फिर बढ़ी हुई मात्रा को ऊपर चढ़ाते हैं, और कई गिरा देते हैं। शक्ति के गिरने से मूलाधार में शक्ति फिर इकट्ठी होने लगती है जिसमें पहले से ज्यादा समय लग जाता है। अच्छी खुराक से वह जल्दी इकट्ठी होती है पर उसमें पापकर्म भी शामिल हो सकता है। साथ में, भोजन को पचाने और उसे शरीर में लगाने में भी ऊर्जा खर्च होती है, मतलब कुल मिलाकर प्राण ऊर्जा की हानि ही होती है। फिर ऐसे ही होगा कि आगे दौड़ और पीछे चौड़। इन साधारण लोकोक्तियों के बड़े गहन अर्थ होते हैं। चौड़ मतलब कुंडलिनी सर्पिणी का कुंडल। मतलब शक्ति पाप के अंधेरे के रूप में सो जाती है, बेशक उसे उस अंधेरे की शक्ति से ही ऊपर चढ़ाया गया हो। पर मुझे लगता है कि उतना पाप खाने पीने से नहीं लगता जितना दुनिया में आसक्तिपूर्ण व्यवहार से लगता है। इसीलिए तो शिव भूतों की तरह खाने पीने वाले दिखते हुए भी मस्तमलंग, निस्संग और निष्पाप बने हुए विचरते रहते हैं। पर जब आदमी का मन या आत्मा इतना साफ हो जाएगा कि उसमें अंधेरा होगा ही नहीं बेशक शक्ति मूलाधार को गई हुई हो, तब क्या होगा। शायद तब बिना संभोग के उसकी शक्ति ऐसे ही घूमती रहेगी। उसे यौनोन्माद भी होगा, इरेक्शन भी होगा, पर वह भौतिक संभोग के प्रति ज्यादा प्रेरित नहीं होगा, क्योंकि उसे महसूस होगा कि उससे शक्ति की हानि है, बेशक कितनी ही सावधानी क्यों न बरती जाए। मुलाधार में शक्ति के समय उसके मन में किसी कामुक स्त्री का चित्र छा सकता है, और सहस्रार में शक्ति के समय किसी गुरु या आध्यात्मिक व्यक्ति या प्रेमी पुरुष का। पर वह दोनों से ही अनासक्त रहते हुए अपने काम में व्यस्त रहेगा, जिससे वह शक्ति उसमें झूलती रहेगी और वह हमेशा आनंद में डूबा रहेगा।

जब ऊर्जा मूलाधार को जाएगी तो मास्तिष्क में तो उसकी कमी पड़ेगी ही जैसे जब बारिश का पानी जमीन में रिसेगा, तो पानी से भरे गढ्ढे सूखेंगे ही। इससे मन में कुछ न कुछ अंधेरा तो छाएगा ही, बेशक आदमी कितना ही ज्यादा शुद्ध और सिद्ध क्यों न बन गया हो। विकारशील दुनिया में इतना सिद्ध कोई नहीं हो सकता जिसका मन मस्तिष्क हमेशा उजाले से भरा रहता हो। आम सांसारिक आदमी के मन का उजाला तो ऊर्जा के सहारे ही है। बिना भौतिक ऊर्जा के उजाला रखने वाला तो कोई अति विरला साधु संन्यासी ही हो सकता है। फिर भी पूरा उजाला तो पूर्ण मुक्ति की अवस्था में में ही होना संभव है, जो शरीर के रहते संभव नहीं है। विकारी शरीर के साथ जुड़े होने पर कोई पूरी तरह कैसे निर्विकार रह सकता है। बैलगाड़ी में बैठने वाला हिचकोलों से कैसे बच सकता है। जो बिना संभोग के ही मन में उजाला बना कर रखते हैं, उन्होंने संभोग से इतर सात्त्विक तकनीकों में महारत हासिल कर ली होती है, जिनसे मूलाधार की ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती रहती है। यह सांसों पर ध्यान, शरीर पर ध्यान, वर्तमान पर ध्यान, चक्रों पर साधारण या बीजमंत्रो के साथ ध्यान, विपश्यना, देवपुजा आदि ही हैं। उदाहरण के लिए चक्रों पर बीजमंत्रों के ध्यान से प्राण खुलते हैं, सांसें खुलती हैं, चेतना और उससे मन विचारों की चमक बढ़ती है, बुद्धि बढ़ती है, और मूलाधार पर ऊपर की तरफ संकुचन बल लगता है। चमक चाहे शरीर के भीतर हो या बाहर, ऊर्जा से ही आती है।

मानसिक अंधेरा भी दो किस्म का होता है। एक खाने पीने, शारीरिक श्रम, नींद, आराम आदि से उत्पन्न अंधेरा होता है। उसमें शरीर में ऊर्जा तो बहुत होती है, पर मन में उसकी कमी होती है, क्योंकि हिंसा, नशे आदि से और दुनियावी आसक्ति के भ्रम के बाद अकेलेपन से मन की चेतना दबी हुई होती है। मतलब साफ़ है कि जब मास्तिष्क में नहीं, तब वह मूलाधार के दायरे में केंद्रित होती है। शरीर के दो ही मुख्य दायरे हैं। एक सहस्रार का तो दूसरा मूलाधार का। ऊर्जा एक दायरे में नहीं तो स्वाभाविक है कि दूसरे दायरे में होगी। अगर सिक्के का हैड नहीं आया तो टेल ही आएगा, अन्य कोई विकल्प नहीं। ऐसी अवस्था में तांत्रिक संभोग से लाभ मिलता है। दूसरी किस्म का अंधेरा वह होता है जिसमें पूरे शरीर में ऊर्जा की कमी होती है। यह तो रोग जैसी या अवसाद जैसी या थकावट जैसी या कमजोरी जैसी अवस्था होती है। इसीलिए इसमें संभोग का मन नहीं करता। अगर करेगा तो बीमार पड़ सकता है, क्योंकि एक तो पहले ही शरीर में ऊर्जा की कमी होती है, दूसरा ऊपर से संभोग में भी ऊर्जा को व्यय कर रहा है। सबको पता है कि घर की छत की टंकी में पानी जीवन के कई काम संपन्न करवाता है। पर पानी को छत तक चढ़ाने के लिए भी ऊर्जा चाहिए और भूमिगत टैंक में भी पानी होना चाहिए। अगर सूखे टैंक में या कम वोल्टेज में पंप चलाएंगे, तो पंप तो खराब होगा ही। वैसे तो तांत्रिक संभोग का भी संत वाला शांत तरीका भी है, जिससे उसमें कम से कम ऊर्जा की खपत होती है, और ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। मस्तिष्क में ऊर्जा होना सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि वही पूरे शरीर को नियंत्रित करता है। नीचे के चक्रों में, विशेषकर सबसे नीचे के दो चक्रों में ऊर्जा कुछ कम भी रहे तो भी ज्यादा नुकसान नहीं।

कई लोग बोल सकते हैं कि शून्य अंधेरे से विचाररूपी सृष्टि कैसे बनती है। अंधेरे का मतलब ही सूक्ष्म या अव्यक्त या छुपी हुई सृष्टि है। अंधेरा वास्तव में शून्य नहीं होता जैसा अक्सर माना जाता है। असली शून्य तो बौद्धों का शून्य मतलब परब्रह्म परमात्मा ही होता है। सृष्टि बनने के लिए दो चीजें ही चाहिए, अंधेरा और शक्ति अर्थात ऊर्जा। अगर ऊर्जा नहीं है तो अंधेरा सृष्टि के रूप में व्यक्त नहीं हो पाएगा। जीवात्मा के रूप में जो अंधेरा होता है, उसी को सृष्टि के रूप में प्रकट करने के लिए ही उसे शरीर मिलता है, जिससे ऊर्जा मिलती है। यह अलग बात है कि वह योगसाधना से उस सृष्टि को शून्य कर पाएगा या उसी अंधेरे में छुपा देगा या उससे भी ज्यादा आसक्तिमय दुनियादारी से अपने को उससे भी ज्यादा अंधेरे में बदल देगा, जिसके लिए उसे फिर से नया जन्म और नया शरीर प्राप्त करना पड़ेगा। नया शरीर कर्मों के अनुसार मिलेगा। अच्छे कर्म हुए तो मनुष्य शरीर फिर मिल जाएगा जिससे सृष्टि को शून्य करने का मौका पुनः मिल जाएगा। अगर कर्म बुरे हुए तो किसी जानवर का शरीर मिलने से अंधेरे का बोझ कुछ कम तो हो जाएगा पर शून्य नहीं हो पाएगा, क्योंकि जानवर योग नहीं कर सकते। इस तरह पता नहीं फिर कब मौका मिलेगा। यही वेदवाणी कहती है।

वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध कर चुके हैं कि स्थूल भौतिक सृष्टि में भी ऐसा ही होता है। उन्होंने पाया कि अंतरिक्ष में हर जगह वे मूलभूत कण या तरंगें क्वांटम फ्लैकचुएशन के रूप में मौजूद हैं जिनसे सृष्टि का निर्माण होता है। क्योंकि वे बहुत सूक्ष्म और अव्यक्त जैसे हैं इसलिए पकड़ में न आने से अंधेरे के रूप में महसूस होते हैं। उदाहरण के लिए डार्क एनर्जी, डार्क मैटर यह सब अंधेरा ही तो है। जब कहीं से उन्हें ऊर्जा मिलती है तो उनका स्पंदन बढ़ने लगता है जिससे सृष्टि का या स्थूल पदार्थों का निर्माण शुरु हो जाता है। विचारों के लिए तो यह ऊर्जा शरीर से मिलती है पर स्थूल सृष्टि के लिए कहां से मिलती है। इसके बारे में अभी स्पष्टता और एकमतता नहीं दिखती। कुछ कहते हैं कि ब्लैकहोल आदि पिंडों के आपस में टकराने से जो गुरुत्वाकर्षण तरंगें आदि अंतरिक्ष में हलचलें पैदा होती हैं, उसीसे वह ऊर्जा मिलती है। जहां पर अंतरिक्ष में ज्यादा हलचल है, वहां ज्यादा तारों का निर्माण होता पाया गया है। पर सृष्टि की शुरुआत में अंतरिक्ष की सबसे पहली हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह पता नहीं है। शास्त्र तो कहते हैं कि ओम ॐ की आवाज निकली जिससे सृष्टि का निर्माण शुरु हुआ। ओम की ध्वनि एक अंतरिक्ष की तरंग या हलचल ही है। हो सकता है कि उसी ने आगे की हलचलों और निर्माणों का सिलसिला शुरु किया हो। ॐ ध्वनि रूपी हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह प्रश्न अनुत्तरित है। यह शायद परमात्मा की अपनी अचिंत्य शक्ति है, जिसका उत्तर योग के अतिरिक्त विज्ञान से मिल भी नहीं सकता। अगर शक्ति नहीं होगी तो शिव शव की तरह अंधेरा बना रहेगा, व्यष्टि शरीर के अंदर भी और समष्टि शरीर मतलब स्थूल भौतिक सृष्टि में भी।

कुंडलिनी योग ही बौद्ध धर्म का गुप्त कालचक्र है

किसी समय दैत्य महाबलवान हो गए थे। वे लोकों को पीड़ित करने और धर्म का लोप करने लगे। परेशान होकर देवताओं ने देवरक्षक विष्णु से अपना दुख कहा। देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए विष्णु कैलाशपर्वत के समीप जाकर स्वयं कुंड का निर्माण कर उसमें अग्निस्थापन कर उसी के समक्ष तप करने लगे। वे पार्थिव विधि से अनेक प्रकार के मंत्रों एवं स्तोत्रों द्वारा मानसरोवर में उत्पन्न हुए कमलों से प्रसन्नता के साथ शिवजी का पूजन करते रहे। वे हरि स्वयं आसन लगाकर स्थित रहे और विचलित नहीं हुए। बहुत समय तक भी शिव प्रकट नहीं हुए। इस पर विष्णु ने हैरान होकर शिव के सहस्रनाम का जाप शुरु कर दिया। वे एक एक नाममंत्र का उच्चारण कर उन्हें एक एक कमल अर्पित करते हुए शंभु की पूजा करने लगे। उस समय शिव ने विष्णु की भक्तिपरीक्षा के लिए उन सहस्र कमलों में से एक कमल का अपहरण कर लिया। विष्णु शिव की माया को न समझकर एक कमल को ढूंढने में लग गए। विष्णु ने उस कमल के लिए पूरी पृथ्वी का भ्रमण किया। उसके प्राप्त न होने पर उन्होंने उसकी जगह अपना एक नेत्र ही अर्पित कर दिया, बेशक शिव ने उन्हें अपना नेत्र निकालने से रोक दिया। तभी शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और विष्णु को वर देने के लिए तैयार हो गए। पूछने पर विष्णु ने बताया कि उनका आयुध दैत्यों को मारने में सक्षम नहीं हो रहा है। विष्णु का यह वचन सुनकर शिव ने उन्हें अपना महातेजस्वी सुदर्शन चक्र प्रदान किया। उसे प्राप्त कर विष्णु ने बिना परिश्रम के शीघ्र ही उन महाबली राक्षसों को विनष्ट कर दिया। इस प्रकार संसार में शांति हुई। देवता सुखी हुए और सुंदर सुदर्शन चक्र प्राप्त कर अति प्रसन्न विष्णु भी परम सुखी हो गए।

कथा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

विष्णु या विष्णु अवतार शरीर को संचालित करने वाला जीवात्मा है, और परब्रह्म विष्णु वह अनिर्वचनीय परमात्मा है जिससे वह अवतरित होता है। वही शरीर के रूप में तीनों लोकों का पोषण करता है और विभिन्न देवताओं से भी करवाता है। इसी तरह शिव अवतार रुद्र मृत्यु के निकट शरीर को नष्ट करने वाली उसी जीवात्मा की अवस्था है। ब्रह्मा भी उसी जीवात्मा की मनरूपी सृष्टि का निमार्ण करने बाली अवस्था है। ब्रह्मा का कोई परब्रह्म रूप नहीं, क्योंकि वह विष्णु रूपी जीवात्मा से उत्पन्न मन ही है। इसीलिए कहा जाता है कि ब्रह्मा का जन्म विष्णु की नाभि से होता है। देवताओं से संचालित शरीर तो बहुत कोशिश करता है अज्ञानरूपी दुर्दांत राक्षसों के चंगुल से निकलने के लिए, पर सफल नहीं हो पाता। अंतिम सहारा जीवात्मारूपी विष्णु ही होता है। वह इसके लिए तांत्रिक विधि से शिवसाधना करता है। कैलाश सहस्रार चक्र है जहां परब्रह्म शिव का निवास है। उसके समीप मूलाधार चक्र है जो कुंड की तरह है। दोनों चक्रों को एकदूसरे के करीब इसलिए कहा है क्योंकि दोनों सीधे नाड़ी के माध्यम से आपस में जुड़े हुए होते हैं बेशक भौतिक दूरी अन्य चक्रों के बजाए मूलाधार की अधिक है। कुंड शब्द शिवपुराण में गड्ढे या कुंड के लिए बहुत प्रयुक्त किया गया है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी शब्द इसी कुंड से बना है। कुंड में सर्प कुंडली लगाकर बैठता है। कुंडल या कुण्डली वाला सर्प कुंडलिन हुआ और सर्पिणी कुंडलिनी हुई। वैसे ही जैसे धनिन का मतलब है धन वाला और धनिनी का मतलब है धन वाली। कुंडल कान में पहने जाने वाले छल्ले को कहते हैं। इसलिए कुंडलिन का अर्थ हुआ कान की बाली या छल्ले जैसी आकृति वाला। और कुंडलिनी का अर्थ हुआ कान की बाली या छल्ले जैसी आकृति वाली। कुंडल और कान के गड्ढे या कुंड के बीच संबंध है। इसी तरह कुंडलिनी और मूलाधार रूपी गड्ढे या कुंड के बीच भी संबंध है। कुंड में अग्नि स्थापन मतलब मूलाधार चक्र को प्राणवायु से क्रियाशील करना। उस कुंड में शिवसाधना मतलब मूलाधार चक्र पर इष्ट ध्यान। पार्थिव विधि से शिवपूजन किया मतलब मिट्टी का शिवलिंग बनाया। मनुष्य के शरीर को भी पार्थिव देह कहा जाता है। तो उसके अंग पार्थिव अंग हुए। मानसरोवर के फूल मतलब मन के या ध्यान के फूल। उन्होंने एक हज़ार फूल चढ़ाए मतलब हज़ार बार चक्रों की ऊर्जा को मूलाधार पर स्थापित किया और उसके साथ इष्ट ध्यान किया। मतलब ऊर्जा के एक हजार बार चक्कर लगाए। फूल यहां चक्र को कहा है। हजारवां फूल शिव ने चुरा लिया मतलब सहस्रार चक्र तक ऊर्जा नहीं जा पा रही थी। इससे विष्णु ने अपना नेत्र मतलब तीसरा नेत्र मतलब आज्ञा चक्र खोला और उसके ध्यान से अर्थात उस पर शांभवी मुद्रा में ध्यान देने से ऊर्जा सेंट्रल हुई। वह ऊर्जा पहले मूलाधार में पहुंची, वहां उससे प्रगाढ़ शिवध्यान लगा और फिर शिवध्यानचित्र के साथ सहस्रार में चली गई जहां उन्हें शिव के साक्षात दर्शन प्राप्त हुए मतलब उन्हें जागृति प्राप्त हो गई।

उपरोक्त कथा को दूसरे तरीके से भी समझ सकते हैं। एक पंखुड़ी को एक फूल कह सकते हैं क्योंकि कर्मकांड की पूजा के दौरान फूल की कुछ पंखुड़ियां चढ़ाना ही पूरा फूल चढ़ाना समझा जाता है। इससे फूलों की भी बचत होती है और एक ही फूल से बहुत से देवताओं का पूजन भी हो जाता है। सहस्रारचक्ररूपी कमलपुष्प में एक हजार पंखुड़ियां होती हैं। शिव के नाम से एक पुष्प चढ़ाने से मतलब शिव के ध्यान की किसी निश्चित मात्रा से सहस्रार की एक पंखुड़ी खिल रही थी। दरअसल जागृति पाने के लिए सभी चक्रों की पूरी ऊर्जा सहस्रार को अर्पित करनी होती है। जब सहस्रार एक पुष्प है और वह ध्यान से खिलता है तो स्वाभाविक है कि ध्यान भी एक पुष्प ही है। जैसे जल से भरे किसी बर्तन में जल डालने से उसका जल बढ़ता है, वैसे ही सहस्रार रूपी पुष्प में पुष्प जोड़ने से वह पुष्प बढ़ेगा ही। सहस्रार पूरा खिलने वाला था मतलब जागृति होने वाली थी पर उसकी अंतिम पंखुड़ी नहीं खिल पा रही थी। आज्ञाचक्ररूपी ध्यानपुष्प से वह भी खिल गई। कर्मकांड पूजा में ध्यान करते समय पुष्प को नमस्कार मुद्रा में बंद हाथों के अंदर रखा जाता है। ध्यान को देवता को समर्पित करने के रूप में उस अंजलिस्थित पुष्प को देवता के चरणों में अर्पित किया जाता है। सहस्रार को जब सभी चक्रों की समस्त ऊर्जा एकसाथ मिलती है, तभी यह जागृति के स्तर तक पहुंचता है। ऊर्जा को सीधे सहस्रार तक पहुंचाना कठिन है, इसलिए इसे मूलाधार तक लाने का व्यावहारिक तरीका सामने लाया गया है, जहां से यह आसानी से सीधे सहस्रार तक पहुंच जाती है।

यह लेख पिछले और अगले लेख से जुड़ा है। उसमें कालचक्र के ऊपर भी अच्छी अनुसंधानात्मक चर्चा है। बाह्य कालचक्र में अद्वैत भाव आंतरिक कालचक्र के ध्यान की सहायता से बनता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आंतरिक कालचक्र के अंदर कहीं भी असक्तिजनित और द्वैतजनित बंधन नहीं दिखता। सभी देवता, कर्मकाण्ड आदि सब आंतरिक कालचक्र के ही अंग है। हरेक बाह्य पदार्थ में उनके अधिष्ठातृ देवताओं के रूप में मानवशरीरधारी देवताओं का ध्यान करना आंतरिक कालचक्र का ध्यान करना ही है। इससे आदमी धीरे धीरे पवित्र होकर गुप्त कालचक्र मतलब कुंडलिनी योगसाधना की और बढ़ता है। शरीरविज्ञान दर्शन देवसाधना को और ज्यादा मजबूती देता है क्योंकि यह वैज्ञानिक रूप से दर्शाता है कि देवताओं और साथ में मनुष्यों सहित सभी जीवों के शरीर के अंदर पूरा ब्रह्मांड मतलब बाह्य कालचक्र मौजूद है।