कुंडलिनी कुंड से जागकर सुदर्शन चक्र रूपी वैकल्पिक कालचक्र को क्रियाशील कर देती है, जिसमें शरीरविज्ञान दर्शन एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र पुस्तक बहुत मदद करती है

कुंडलिनी शब्द को कहते हैं कि यह शास्त्रों में नहीं है। पर कुंड शब्द तो शिवपुराण में बहुत है। संस्कृत भाषा में कान के कुंडल या छल्ले जैसे आकार वाला पुलिंग पदार्थ कुंडली हुआ और ऐसे आकार वाली स्त्रीलिंग वस्तु कुंडलिनी कहलाई। शायद कुंडल शब्द भी कुंड शब्द से बना है। दोनों में संबंध तो साफ दिखता है। कुंड का शाब्दिक अर्थ गोल गढ्ढा है, और कुंडल का अर्थ गोल छल्ला है। दोनों में यही अंतर है कि गड्ढे में धरातल होता है, पर छल्ले में नहीं होता, बाकि तो दोनों समान ही हैं। जैसे हर्ष से हर्षिल बना है वैसे ही कुंड से कुंडल बना हो सकता है। हर्ष मतलब हर्ष से युक्त और कुंडल मतलब कुंड से युक्त। मेरे इस अनुमान की जांच तो कोई संस्कृत व्याकरण विद्वान ही कर सकते हैं, अगर यह लेख पढ़ रहे हैं। कुंड से कुंडल न भी बना हो तो भी कुंडल के जैसे आकार में ढलकर सर्प कुंड अर्थात गढ्ढे में छिप जाता है। इसीलिए कहते हैं कि सांप ने कुंडली लगाई हुई है। जिस गड्ढे में सर्प कुंडली मारकर छिप जाता है, उसे अगर कुंड कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मूलाधार रूपी अंधेरे कुंड में मन की शक्ति सिकुड़ कर ध्यानचित्र के रूप में छिप जाती है। इसीलिए उस शक्ति को कुंडलिनी कहा जाता है। यही सभी चक्रों से होकर ऊपर चढ़ते हुए, फन उठाए नाग के जैसे आकार वाली पीठ और मास्तिष्क की नाड़ी में फैल जाती है। विष्णु ने कुंड में शिवलिंग को स्थापित किया। धार्मिक आस्था से जुड़ा होने के कारण इस बारे ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि कुछ कट्टर हिंदु तो पुराणों की कथाओं को मिथकीय कहने वाले के हिंदु होने पर ही संदेह करने लगते हैं। वैसे अपनी सोच से वे भी सही ही कहते हैं, क्योंकि ये कथाएं मनगढ़ंत नहीं हैं। मिथक भी दो किस्म के होते हैं, एक मनगढ़ंत या निरर्थक किस्म के और एक वैज्ञानिक सत्य पर आधारित या सार्थक किस्म के। पुराणों के मिथक दूसरे किस्म के हैं, मतलब बेशक ये मिथक लगे पर पूरी तरह से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित हैं। इसीलिए हम इनके वैज्ञानिक सत्य को उजागर करते हैं ताकि इन्हें मनगढ़ंत मिथक न समझा जा कर इनका खोया सम्मान वापिस मिल सके। हालांकि आम लौकिक सोच से ऐसा समझ सकते हैं कि देव विष्णु की उपरोक्त शिवलिंग पुकार ऐसी ही है जैसे किसी कुशल तांत्रिक ने यबयुम आसन से उत्पन्न शिवध्यानयुक्त संभोगशक्ति मूलाधार को दी। लिंग पर शिव के ध्यान से ही वह पवित्र होकर शिवलिंग बनता है। देव विष्णु जैसे महान व आदर्श योगियों का तरीका बेशक उन्नत और सात्त्विक हो सकता है, पर सबका मकसद एक ही है, और वह है शक्ति को जागृत करना।

विष्णु एक हजार कमल पुष्पों से शिव की पूजा करने की कोशिश कर रहे थे मतलब सहस्रार चक्र तक शिवध्यानचित्र को मूलाधार से उठाने की कोशिश कर रहे थे मेरुदंड से। एक पुष्प शिव ने माया से छिपा लिया मतलब शिव की माया से मोहित होकर विष्णु अपने अंहकार को शिव को अर्पित नहीं कर पा रहे थे। विष्णु ने धरती पर उस आखिरी पुष्प को हर जगह ढूंढा पर वह नहीं मिला मतलब अंहकार भीतर होता है, बाहर नहीं। बाहर की सारी सृष्टि भी शिव को चढ़ा दें, तो भी चढ़ावा अधूरा ही रहेगा, क्योंकि मास्तिष्क के अंदर बसा अहंकार तो चढ़ाया ही नहीं। विष्णु ने फिर अपना नेत्र चढ़ाया मतलब तीसरे नेत्र मतलब आज्ञा चक्र को जागृत करके वे उसकी शक्ति को फ्रंट चैनल से नीचे उतारकर मूलाधार चक्र तक लाए। उससे वहां स्थित शिव उससे पूर्ण संतुष्ट होकर वहां से सहस्रार चक्र तक चढ़कर पूरी तरह से जागृत हो गए मतलब प्रसन्न होकर उन्होंने विष्णु को अपने दर्शन करा दिए। अंहकार का जंजाल बुद्धि के रूप में बसा हुआ होता है, और बुद्धि का प्रतीक आज्ञाचक्र है। मतलब जो मन की शक्ति बुद्धिवादी सांसारिकता के जंजाल में फंसी थी, वह मुक्त हो कर शिवध्यानचित्र अर्थात कुंडलिनी चित्र को लग गई, जिससे वह जाग गया। फिर शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया, मतलब जो अच्छे दर्शन या शिवदर्शन अर्थात जागृति के बाद सहस्रार चक्र बना, वही सुदर्शन चक्र है। वही दुष्टों व राक्षसों का वध मतलब बुरे विचारों का खात्मा करता है। कई जगह पर उसे दंड की तरह भी दिखाया जाता है, जो सुषुम्ना नाड़ी का द्योतक लगता है।

श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र पर ही गोवर्धन पर्वत को उठाया था मतलब ज्ञानरूप जागृत सहस्रार चक्र से ही स्थूल जगत को इतना हल्का, सूक्ष्म और आकाशरूप बना दिया कि वह ऊपर उठकर शून्य आसमान के बीच में आ गया। इससे ग्वालबाल मतलब इन्द्रियों के वशीभूत आम सांसारिक आदमी दुखों की अंधाधुंध वर्षा से बच सके थे, जो अंहकार रूपी इंद्र के कारण हो रही थी। गाय इंद्रिय को कहते हैं और गाय चराने वाला अर्थात इंद्रियों के संसर्ग से पीड़ित अज्ञानी मानव हुआ। यह ऐसा ही मामला लगता है जैसा रावण के द्वारा कैलाश पर्वत को भुजाओं पर उठाने का है। सुदर्शन चक्र का केवल इच्छामात्र से चलना और प्रहार करके खुद वापिस लौट आना और हमेशा घूमते रहना इसके दिव्य चक्र मतलब सहस्रार चक्र होने की ओर इशारा करता है। इसकी अरे मतलब स्पोकें, धुरी आदि ऋतुओं आदि का संकेत करती हैं। बौद्धों में कालचक्र भी शायद इसे ही कहते हैं। कालचक्र में भी सुदर्शन चक्र के बराबर ही अरे आदि होते हैं जो कि समय, ऋतु आदि की चाल को इंगित करते हैं। दोनों में ही वज्र और विद्युत होती है। यह सुषुम्ना में बहने वाली और जागृति देने वाली ऊर्जा ही है। कालचक्र को भी सुदर्शन चक्र की तरह विष्णु, कृष्ण, शिव आदि से जोड़ा जाता है। दोनों का ही वर्णन वेदशास्त्रों में है। हालांकि कालचक्र का उपयोग मुख्यतः बौद्धों में होता है।

कालचक्र के तीन प्रकार हैं, बाह्य, आभ्यंतर और गुप्त। बाह्य में बाहरी स्थूल ब्रह्मांड, आभ्यंतर में शरीर के अंदर का सूक्ष्म ब्रह्मांड और गुप्त में योग आदि रहस्यमय मुक्तिदायी विद्याएं आती हैं। मुझे लगता है कि एक का पूर्ण ज्ञान होने से तीनों का ज्ञान हो जाता है। बहिर्मुखी आदमी के लिए बाह्य कालचक्र की साधना है। अंतर्मुखी व्यक्ति के लिए आंतरिक कालचक्र और संन्यासी किस्म के व्यक्ति के लिए गुप्त कालचक्र बना है। तीनों से ही ज्ञान और मुक्ति मिलती है। प्रेमयोगी वज्र रचित शरीरविज्ञान दर्शन को एक प्रकार का आंतरिक कालचक्र कह सकते हैं, क्योंकि उसमें शरीर के अंदर के ब्रह्मांड का वर्णन किया गया है। कालचक्र एक मंडल होता है, जिसमें विभिन्न देवताओँ, चिह्नों और आकृतियों को प्रदर्शित किया जाता है। वास्तव में भी तीनों कालचक्रों में भी ऐसे ही विविध रूपरंग वाला संसार है। इसकी साधना से स्वाभाविक है कि सुषुम्ना, सहस्रार और कुंडलिनी आदि जागृत हो जाते हैं, जो फिर दुष्ट विचारों और स्वभावों रूपी राक्षसों का नाश करते हैं। इस मामले में भी कालचक्र और सुदर्शन चक्र एक ही हैं। यह कह सकते हैं कि कालचक्र आम आदमी को मिलता है जबकि विष्णु जैसे परम आदर्श मनुष्य को मिलने वाले कालचक्र को सुदर्शन चक्र कहा गया है। आम आदमी तो केवल अपने ही अज्ञान का नाश करता है जबकि विष्णु और राम, कृष्ण, बुद्ध आदि उनके अवतार अनगिनत भक्त लोगों का अज्ञान नष्ट करते हैं। इसीलिए सुदर्शन चक्र को विशिष्ट कालचक्र कह सकते हैं।

वामन पुराण में  भी इस चक्र को कालचक्र कहा गया है। इसकी बारह स्पोकें बारह महीनों और छः नाभियां छः ऋतुओं को इंगित करती हैं। यह भी कहा जाता है कि मंत्र सहस्रात हुम फट इसकी स्पोकों पर खुदा है। यह एक बौद्ध मंत्र लगता है। सिख भी चक्र को हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे, जिसे सीधे भी और फेंक कर भी चलाया जाता था। कई जगह यह भी आता है कि सुदर्शन चक्र का केंद्र वज्र से बना है। वज्र वही मेरूदंड है, जिससे होकर वज्र शक्ति सहस्रार तक गुजरती है। पूरी तरह से यह लेख अगले लेख को पढ़कर समझ आएगा क्योंकि उसमें शिवपुराण में वर्णित इसकी मूल कथा लिखी जाएगी।

ऋग्वेद में भी सुदर्शन चक्र को कालचक्र कहा गया है। तीनों कालचक्रों से अलग एक चौथा वैकल्पिक कालचक्र भी है, जिसमें मन को समय की चाल से प्रभावित नहीं होने दिया जाता। यही बुद्धत्व और आत्मज्ञान का कालचक्र है। यही अद्वैत है, यही द्वैताद्वैत मतलब द्वैत के बीच रहकर अद्वैत है। यही प्रेमयोगी वज्र कृत शरीरविज्ञान दर्शन नामक तंत्र दर्शन की अवधारणा है। विष्णु का दुष्टविनाशक सुदर्शन चक्र ये ही पूर्व के तीनों कालचक्र हैं, जो समय के थपेड़ों से आम आदमी के मन को द्वैत, अज्ञान और दुख में डालकर उसे बारंबार जन्म मृत्यु के चक्र में डालने वाले हैं। कृपा करने वाला सुदर्शन चक्र चौथा और अंतिम मतलब वैकल्पिक कालचक्र है, जो बेशक समय की रफ्तार से घूमता है, पर आदमी को उसके बीच अद्वैत से रहना सिखाकर उसे सुख समृद्धि और मुक्ति देता है। मारने वाला समय चक्र तो किसी के पास भी हो सकता है, पर बचाने वाला तो विष्णु जैसे आत्मज्ञानी के पास ही हो सकता है। वह तब मिलता है जब सहस्रार चक्र जागृत होता है। यह काल तो चक्र की तरह चलता ही रहता है, कभी नहीं रुकता। जन्म के बाद मृत्यु, मृत्यु के बाद जन्म और फिर मृत्यु। सृष्टि के बाद प्रलय, प्रलय के बाद सृष्टि और फिर प्रलय। ऋतुएं चक्रवत बदलती रहती हैं, सुख दुख चक्रवत आते जाते रहते हैं। इस चक्र से हम भाग नहीं सकते। चक्र को चक्र ही काटता है। वरदायी सुदर्शन या वैकल्पिक चक्र ही बचने का एकमात्र उपाय है। मतलब चक्र के साथ चलते रहो पर उससे अपनी अद्वैतमय शांति भंग न होने दो। यही सुदर्शन चक्र की स्तुति और पूजन है। 

शिशुपाल को सुदर्शन चक्र ने गले से काटा मतलब शिशुपाल के द्वैतपूर्ण व्यवहार से उसकी शक्ति विशुद्धि चक्र से ऊपर नहीं चढ़ी। क्योंकि आदमी गले के विशुद्धि चक्र की शक्ति से बोलता है, तो ऊपर चढ़ती शक्ति को गले ने रोककर गाली गलौज में खत्म कर दिया मतलब गले के पास शक्ति का रास्ता कट गया मतलब गला कट गया। शिशुपाल कृष्ण को बहुत गालियां निकाल रहा था। कुंडलिनी चक्र भी शायद इसीलिए चक्र कहलाते हैं क्योंकि इन पर भी शक्ति का स्तर चक्रवत बदलता रहता है। कभी शक्ति बढ़ते बढ़ते चरम पर पहुंच जाती है, जिसे चक्र का जागृत होना कहते हैं, और फिर घटते घटते न्यूनतम भी पहुंच जाती है। उदाहरण के लिए कभी दिल की भावनाएं उफान पर होती हैं और कभी वह भावशून्य सा हो जाता है। कुछ समय बाद दिल फिर भावनाओं से भर जाता है, जिससे कई बार अच्छी सी कविता का निर्माण भी हो जाता है। ऐसा चक्र चलता रहता है। चक्र जागृत हो गया तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा जागृत रहेगा। उसकी शक्ति घटती बढ़ती रहेगी। इससे घबराना नहीं है और न ही प्रभावित होना है। यही वैकल्पिक कालचक्र है, मतलब बुद्धवादी विकल्प अर्थात कल्पना या दर्शन से कालचक्र के दुष्प्रभाव को ख़त्म करके उससे सद्प्रभाव पैदा करना है। इसी तरह सहस्रार चक्र भी कभी चरम शक्ति पर होता है। उस समय यह पात्र व्यक्ति को ज्ञान या वरदान देकर भौतिक समृद्धि और मुक्ति भी दे सकता है, और पापी व्यक्ति को श्राप देकर उसे भौतिक हानि और बंधन में भी डाल सकता है। फिर सहस्रार चक्र निम्न शक्ति स्तर पर भी होता है, जिस समय श्रीकृष्ण एक आम आदमी की तरह व्यवहार करते थे। सहस्रार की चरम शक्ति की अवस्था होने पर ही वे अवतारी पुरुष की तरह व्यवहार करते थे, और जिस समय सहस्रार चक्र के बाह्य और स्थूल प्रतीक के रूप में उनकी अंगुली पर सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखाया जाता था। आम आदमी तो मन या मस्तिष्क में छिपे सूक्ष्म सहस्रार चक्र को महसूस नहीं कर सकते। जागृत सहस्रार चक्र मतलब सुदर्शन चक्र से ही दिव्यता है, परमात्मता है, पुरुषोत्तमता है।

आदमी बाह्य कालचक्र में ही पैदा होता है और उसमें लंबे समय तक रहते हुए बहुत कुछ सीखता है। यह शुरुवाती अभ्यास का कालचक्र है। फिर उससे उत्पन्न दुखों के थपेड़ों से परेशान होकर उसे आंतरिक कालचक्र के ऊपर अध्यारोपित करने लगता है। मतलब वह अपने मन को यह दिलासा देने लगता है कि जो कुछ विस्तृत ब्रह्मांड में है वही सबकुछ उसके अपने छोटे से शरीर में भी है। मतलब यत्पिंडे तत् ब्रह्माण्डे। ऐसा करना “शरीरविज्ञान दर्शन, एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र, एक योगी की प्रेमकथा” नामक पुस्तक से बहुत आसान हो जाता है। उससे उसे कुछ अद्वैत की अनुभूति होती है जिससे वह काल के थपेड़ों से थोड़ी सुरक्षा महसूस करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर के अंदर पूरा कालचक्र दौड़ता रहने के बावजूद उसका कोई भी घटक द्वैत के बंधन में नहीं पड़ता। लंबे समय तक उसमें स्थिर रहने के बाद जब वह काफी पवित्र हो जाता है, तब उसकी प्रवृत्ति खुद ही योगसाधना रूपी गुप्त कालचक्र की ओर झुक जाती है। योग करते हुए और आगे बढ़ते हुए वह खुद ही तांत्रिक कुंडलिनी योग की तरफ मुड़ जता है। तंत्र योग से उसकी कुंडलिनी सहस्रार चक्र में जागृत हो जाती है, मतलब वह वैकल्पिक कालचक्र या सुदर्शन चक्र का अधिकारी बन जाता है। फिर भी जब भी वह सहस्रार में ऊर्जा की कमी से इस सर्वोच्च कालचक्र से नीचे आता रहता है तब तांत्रिक ऊर्जा के थोड़े से धक्के से वह आसानी से उसमें पहुंचता रहता है।

अनंत विस्तृत बाह्य कालचक्र अद्वैत सूक्ष्म होता जाता है। पहले वह आंतरिक कालचक्र के स्तर पर पहुंचता है। फिर और सूक्ष्म होकर सात कुंडलिनी चक्रों तक सीमित होकर गुप्त कालचक्र बन जाता है। इसे गुप्त कालचक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि सभी इसे महसूस नहीं कर सकते, पर केवल कुंडलिनी योगी ही इसे महसूस करते हैं। फिर जागृति के बाद यह सहस्रार चक्र के बिंदु के स्तर तक सूक्ष्म बनकर वैकल्पिक कालचक्र बन जाता है। कालचक्र शुरु से लेकर अंत तक रहता है, पर पहले वह अज्ञान के बंधन में डालने वाला था, अंत में ज्ञान और मुक्ति देने वाला बन जाता है। यह बेहद कारगर और व्यवहारिक साधना है जिसे जरूर अपनाना चाहिए। सबसे साधारण शब्दों में बोलें तो यह ऐसा है कि भौतिक दुनियादारी के बीचबीच में अपने शरीर को भी अनुभव करते रहना चाहिए, उसके आगे के रास्ते खुद खुलते जाते हैं। योग इसकी आदत डालने के लिए ही बना है। योगासन करते समय प्राणों की क्रियाशीलता से दुनियावी विचार भी आते रहते हैं और साथ में शरीर के विशेष पोज और सांस पर भी ध्यान लगा होता है मतलब बाह्य कालचक्र आंतरिक कालचक्र में रूपांतरित होता रहता है।

कुंडलिनी योग एक लाभ अनेक

दोस्तों, अब समय आ गया है कि सभी धर्मों की वैज्ञानिक और मानवतावादी बातों को लेकर एक वैश्विक धर्म बनाया जाए। खैर, यह विषय इस ब्लॉग के विषय से हटकर है, इसलिए हम इसकी गहराई में नहीं जाना चाहते। अभी हाल ही में मैंने अपनी बेटी के लिए विश्वविद्यालय के किसी कार्यक्रम के लिए योग के ऊपर एक लघु लेख लिखा था, उसी को थोड़ा विस्तृत करके यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

योग सांस, शक्ति, गति, और ध्यान से मिलकर बना है। इन चारों का हम थोड़ा बारीकी से अध्ययन करेंगे।

सांस ही जीवन है, जीवन ही सांस है। मित्रो, सांसें ही मन समेत पूरे शरीर को नियंत्रित करती हैं। और योग सांस को नियंत्रित करता है। अमीर वह नहीं है, जो खाता है और पीता है, बल्कि अमीर वह है जो सांस लेता है। योग से सांसें शरीर के विभिन्न चक्रों पर केंद्रित की जाती हैं, जिससे उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है। असली सांस गहरी ही होती है जो पूरे शरीर को अच्छे से लगती है। उसे लेने का आनंद आता है। उससे तृप्ति जैसी महसूस होती है। उसके साथ शरीर की सिकुड़न जैसी हलचल भी जुड़ी होती है। थोड़ी देर सांस रोककर शरीर में ऐंठनें जैसी होने लगती हैं। पूरे शरीर पर ध्यान देते समय वह ज्यादा गहरी महसूस होती हैं, खासकर पेट में। जब सांस रोके रखना बर्दाश्त से बाहर सा हो जाए, उस समय ऐसी सांस निकलती है। थोड़ी देर के लिए यह सांसों को यौगिक सांसें बना कर रखता है। फिर वह क्रम दोहराना पड़ता है। सिर्फ तेज सांसों को कितना ही लेते रहो, पूरी तृप्ति नहीं होती, उल्टा थकान भी बढ़ती है और मन का भटकाव भी।

हमारा शरीर शक्ति से संचालित होता है। और शक्ति योग से नियंत्रित होती है। योग से हम शक्ति को जरूरत के हिसाब से शरीर के विभिन्न अंगों पर केंद्रित कर सकते हैं। इससे अंगों पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ता, जिससे वे स्वस्थ रहते हैं। सांस रोककर जब एक विशेष चक्र पर ध्यान लगाया जाता है, तब वहां आनंद के साथ एक ऐंठन सी महसूस होती है। शायद यही शक्ति है, जो चक्र को लग रही होती है। इसी को ऐसा कहते हैं कि सांस चक्र पर केंद्रित हो रही है। इसी को ही ऐसा भी कहा जाता है कि प्राण और अपान यहां आपस में जुड़ रहे हैं। प्राण शरीर के ऊपर वाले हिस्से की सांस को कहते हैं और अपान नीचे वाले हिस्से की सांस को। इसलिए चक्र को संगम स्थल भी कहा जाता है कई जगहों पर। संगम स्थल वह होता है जहां दो विपरीत बहने वाली नदियां आपस में मिलती हैं।

हमारा जीवन शरीर की गतिशीलता से भी प्रभावित होता है। जहां आवश्यक गतिशीलता फायदेमंद है, वहीं अनावश्यक गतिशीलता नुकसानदेह भी होती है। योगासन शरीर की गतिशीलता पर नियन्त्रण लगाते हुए शक्ति के दुरुपयोग को रोकता है।

हमारे जीवन में ध्यान का बहुत ज़्यादा महत्त्व है। ध्यान लगाकर काम करने से ही उसमें गुणवत्ता आती है। काम में दक्षता आने से आदमी तेजी के साथ चहुंमुखी विकास करने लगता है। इसीलिए हर काम के साथ ध्यान शब्द जोड़ा जाता है, जैसे ध्यान से चलना, ध्यान से पढ़ना, ध्यान से खेलना आदि। योग से ध्यान का अभ्यास विकसित होता है। मतलब कि योग से जीवन विकसित होता है।

दोस्तों, योग से उपरोक्त सभी लाभ मिलने से शरीर खुद ही स्वस्थ बना रहता है। सांसों से उसे पर्याप्त ऑक्सीजन अर्थात प्राणवायु मिलती है। शक्ति से उसके सभी अंग सही ढंग से काम करते हैं। आवश्यक गतिशीलता से शरीर में लचीलापन बना रहता है। ध्यान से शक्ति इधर उधर बिखरने की बजाय एक स्थान पर केंद्रित हो जाती है, जिससे वह ज्यादा असर दिखाती है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। मन स्वस्थ होने से हमारा स्वभाव संतुलित हो जाता है, जिसमें आध्यात्मिकता या धार्मिकता और भौतिकता या सांसारिकता, दोनों की समुचित भागीदारी होती है। इसलिए दोस्तो, चाहे कुछ भी हो जाए, योग हमेशा और प्रतिदिन करना चाहिए।

जयतु योग:

कुंडलिनीयोग से गंगा की तरह बहती हुई शक्ति शिवलिंगरूपी चक्रों को सिंचित करती है

अत्रि-अनसूया की प्रसिद्ध पौराणिक कथा

शिवपुराण में अनसूया की कथा आती है। अनसूया मतलब किसी की असूया या निंदा न करने वाली। एक बार महान अकाल पड़ा। हर जगह पानी की कमी हो गई। लोग व प्राणी प्यास से व्याकुल होकर मरने लगे। साधुओं से संसार का दुख देखा नहीं जाता। इसलिए अत्रि मुनि पानी के लिए तप करने लगे। उनके शिष्य भी उनको छोड़कर चले गए। केवल अनसूया अपने पति की सेवा करती रही और प्रतिदिन शिवलिंग का पूजन करती रही। एक दिन अत्रि ने पानी मांगा। अनसूया कमंडल लेकर पानी ढूंढने चल पड़ी। रास्ते में उसे गंगा मिली। गंगा अनसूया के पातिव्रत्य से प्रसन्न हो गई। अनसूया ने गंगा से पानी मांगा। गंगा ने उसे एक गड्ढा करने को कहा। वह गड्ढा पानी से भर गया। अनसूया पानी लेकर चली गई। उसने अत्रि को पानी पिलाया। अत्रि ने कहा कि वह रोज के पिए जाने वाले पानी के जैसा नहीं था। अनसूया ने सारी बात बता दी। वह अत्रि को उस गड्ढे के पास ले गई। दोनों ने उसमें आचमन व स्नान किया। उससे सारे लोक तृप्त हो गए। गंगा जाने लगी तो अनसूया ने उससे हमेशा वहीं रहने के लिए प्रार्थना की। गंगा ने बदले में उससे उसका एक साल का पतिव्रत धर्म का और शिव पूजा का फल मांगा। गंगा ने कहा कि उसे पतिव्रता धर्म सबसे ज्यादा पसंद है। अनसूया ने वह दे दिया तो गंगा वहीं पर बस गई। साथ में शिव भी अत्रीश्वर लिंग के रूप में हमेशा के लिए वहीं विराजमान हो गए।

मिथक कथा का स्पष्टीकरण

अत्रि जीवात्मा है। अत्रि का शाब्दिक अर्थ है, तीनों गुणों से रहित। ऐसा आत्मा ही है। अनसूया बुद्धि है। बुद्धि किसी की निंदा नहीं करती, क्योंकि वह सबसे अपना काम बनवाना चाहती है। निकम्मा मन ही निंदा करता है। बुद्धि अपने पति जीव की पतिव्रता पत्नि की तरह ही है। वह जीव की हर प्रकार से सेवा करती है, साथ में परमेश्वर शिव की पूजा करती रहती है। निकम्मा मन ही कुछ नहीं करता। दरअसल बुद्धि से काम होता है, और कर्म को ही पूजा कहा गया है। शिवलिंग की पूजा इसलिए कहा है क्योंकि संसार पुरुष मतलब शिव और प्रकृति मतलब शक्ति के संयोग से ही बना है। शरीर ही वह सूखाग्रस्त देश है। शरीर की सभी कोशिकाएं ही उसके लोगबाग और प्राणी हैं। वे प्यासे मतलब शक्तिरूपी जल से वंचित रहने लगे। शक्ति जल की तरह ही बहती है। बुद्धि ऋषि अत्रि रूपी आत्मा को गुजारे लायक शक्ति या जीवनयापन के लिए साधारण पानी दिलवाती थी। पर उससे पूरे शरीरदेश का गुजारा नहीं होता था। इसलिए अतिरिक्त शक्ति के लिए ऋषि तप अर्थात कुंडलिनी योगसाधना करते हैं। एकदिन ऋषिजीव के शक्तिजल मांगने पर अनसूयाबुद्धि पूरे देहदेश में भटकने लगी उसकी खोज में। उसे शिवलिंग की कृपा से मूलाधार के आसपास यौनाधारित कुंडलिनी शक्ति मतलब गंगा महसूस हुई। उसने शरीर के प्राणों को मतलब दहदेश के कर्मचारियों को वहां गड्ढा बनाने के लिए मतलब सिद्धासन में मूलाधार को एड़ी से दबाने के लिए प्रेरित किया या योगासनों, मालिशों आदि से पिछले मणिपुर चक्र में संवेदनात्मक गड्ढा बनवाया। मुझे तो लगता है कि पीठ वाले मूलाधार या हिप बोन से ऊपर की ओर लगता गहरा गड्ढा ही वह गड्ढा है। उसमे मालिश के समय सीधी हथेली के आधार से जोर से दबाकर और धीरे धीरे ऊपर खिसका कर तेज व आनंदमय सनसनी महसूस होती है जो रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ती लगती है। यह असली मूलाधार या मूलाधार से सीधा जुड़ा लगता है, क्योंकि मूलाधार को भी गड्ढा ही कहा जाता है अक्सर। मेरुदंड में उंगलियों के बल से मालिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे नाजुक हड्डी में चोट जैसी हानि का डर बना रह सकता है। वहां दिव्य जल भर गया मतलब वहां शक्ति संवेदना महसूस हुई। उसने वह जल ऋषि को पिलाया मतलब जीवात्मा ने उस संवेदना को महसूस किया। जीवात्मा को वह और दिन से अलग और दिव्य लगा क्योंकि उसमें यौनानंद भी मिश्रित था। दोनों ने उसमें स्नान आचमन किया मतलब वह मूलाधार से चढ़कर मस्तिष्क तक चढ़ गई जिससे पूरे शरीर के साथ दोनों तरोताजा हो गए। बुद्धि और जीवात्मा दोनों मस्तिष्क में रहते हैं और आपस में जुड़े होते हैं इसलिए सबकुछ साथ साथ महसूस करते हैं। इसको दूसरे तरीके से भी ले सकते हैं कि एक तांत्रिक जोड़ा यबयुम आसन में एकसाथ शक्ति का उपभोग कर रहा है। सारे जीवजंतु जल पीकर तृप्त हो गए मतलब शरीर के सारे सेल्स शक्ति से रिफ्रेश और रिचार्ज हो गए। गंगा को अनसूया का पतिव्रता धर्म पसंद आया। जरूर उसने उसकी परीक्षा ली होगी, तभी पता चला। आजकल तो पतिव्रता धर्म के परीक्षक बहुत हैं। दफ्तर या कामधंधे पे जाने वाली महिलाओं को विभिन्न पुरूषों के द्वारा उन्हें प्रेमभरी अश्लीलता से झांकना व उनसे बतियाना, उनसे हरकत करने की फिराक में रहना आदि उनकी परीक्षा ही है। घर के अंदर बैठकर परीक्षा थोड़े न होगी। मतलब साफ़ है कि रहो सबके साथ पर सेवा अपने पति की ही करो। गंगा ने स्थायी तौर पर वहां बसने के बदले में अनसूया से एकसाल का सदकर्मफल मांगा मतलब एक साल की तांत्रिक योगसाधना और शिवलिंग पूजा से सुषुम्ना स्थायी तौर पर जागृत हो सकती है। वहां अत्रीश्वर लिंग की भी स्थायी स्थापना हो गई। मुझे तो यह जागृत मूलाधार चक्र ही लगता है। चक्र लिंगरूप ही हैं, क्योंकि वहां लिंग जैसी ही संवेदना अनुभूत होती है। द्वादश ज्योतिर्लिंग बारह चक्र ही हैं। ज्योति वहां ध्यानचित्र के चमकने से पैदा होती है। वह ध्यानचित्र शिव, गुरु, प्रेमी आदि किसी का भी रूप हो सकता है। शिवपुराण के अनुसार बहुत से लिंग और उपलिंग हैं, पर ये बारह ज्योतिर्लिंग मुख्य हैं। अन्य लिंगों को लिंग ही कहा है, ज्योतिर्लिंग नहीं, क्योंकि कुंडलिनीचित्र की चमक चक्रों पर ही महसूस होती है। वैसे तो शरीर की हरेक कोशिका को लिंग कह सकते हैं, क्योंकि सबके ऊपर शक्तिरूपी जल गिरने से ही वे क्रियाशील हैं। जहां तक गंगारूपी कुंडलिनी शक्ति पहुंचती है स्नान कराने को, वहां तक लिंग ही लिंग हैं। वैसे भी रीढ़ की हड्डी में सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड बहता है, जो पानी की तरह ही है। कई वैज्ञानिक दावा करते हैं कि उसी फ्लूड के प्रवाह के रूप में शक्ति का प्रवाह होता है। हालंकि सुषुम्ना जागरण के समय वह चमकीली संवेदना रेखा के रूप में बहती है। हो सकता है कि दोनों ही तरीकों से प्रवाह हो, खासकर आम व साधारण शक्ति प्रवाह में फ्लूड प्रवाह का योगदान ज्यादा हो। इस कथा से लगता है कि किसी ऋषि ने कुंडलिनी शक्ति की खोज कर के उसको महसूस किया, जिसको उन्होंने सीधा न बताकर मिथक कथा के रूप में बताया।

कुण्डलिनीछवि ही भगवान वामन का अवतार लेकर, जागृत होकर और अहंकाररूपी राजा बलि को पाताललोक भेजकर पूरी सृष्टि पर कब्जा कर लेती है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में धर्म बारे थोड़ी बात चल पड़ी थी। धर्म का शास्त्रीय मतलब है लाइफस्टाइल। जिसका लाइफस्टाइल कट्टर है, वह पिछड़ जाता है। नोकिया ने समय के साथ बदलाव नहीं किया। साथ में, यह निष्कर्ष भी निकला था कि जिन बहुत से लोगों को मनोरोगी समझकर उनके ऊपर दवाईयों से, शोषण से या सामाजिक बहिष्कार से उन्हें दबाया जाता है, वे दरअसल जागृति के रोगी होते हैं। काश कि मनोविज्ञान कुंडलिनी के लक्षणों और मनोरोग या मूर्खता के लक्षणों के बीच अंतर कर पाता। मुझे लगता है कि यह अंतर कर पाना पश्चिमी सभ्यता जैसी संस्कृति के लिए कठिन है, पर पूर्वी संस्कृति वालों को तो इसका अनुभव प्राचीन काल से ही है। खैर, आपने देखा होगा, हाल ही की पिछली एक पोस्ट में शेर कैसे योगी बना था। वैसे तो सिंघासन नाम का एक योगासन भी होता है। वैसे भी कुंडलिनी योगी को अजगर या ड्रेगन जैसा रूप दिया गया है, जिसका मुंह भी शेर की तरह खुला हुआ है। योग सांसों का खेल है, और शेर भी सांसों की ताकत से दहाड़ता है और अपने चेहरे को खतरनाक बना लेता है। हिंदू पुराणों में इसी तरह की एक दंतकथा आती है कि वामन भगवान ने तीन पग में सारी धरती माप ली थी। दरअसल तीन कदम सत्त्व, रज और तम, तीन गुणों के प्रतीक हैं। इड़ा नाड़ी देवी अदिति है, और पिंगला नाड़ी देवी दिति है। पिंगला दुनियावी भेद बुद्धि और अहंकार को बढ़ाती है, मतलब राक्षसी द्वैत भाव, रजोगुण व तमोगुण को बढ़ाती है। पर इड़ा नाड़ी शांति, तनावरहित्य, अद्वैतभाव व सत्वगुण जैसे दैवीय भाव पैदा करती है। इसीलिए कहते हैं कि अदिति सभी देवताओं की मां है और दिति सभी राक्षसों की मां। कश्यप मुनि की ये दोनों पत्नियां थीं। कश्यप ब्रह्मा के पुत्र थे। ब्रह्मा मन ही है। क्योंकि मन ही सारे संसार को रचता है। वह कमल पर बैठता है, सहस्रार रूपी कमल पर। जब आत्मा का स्थान सहस्रार बताया जाता है, तो मन का भी यही हुआ क्योंकि दोनों आपस में जुड़े हैं, एक के बिना दूसरा नहीं। ऋषि कश्यप अवचेतन मन है, क्योंकि वह मन से ही पैदा होता है। वह मूलाधार में रहता है। क का मतलब जल होता है, और श्य शयन शब्द से बना है, मतलब जल में सोने वाला। जल वीर्य द्रव और रीढ़ की हड्डी में बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड के रूप में है, और अवचेतन मन को सोए हुए आदमी के रूप में दिखाया गया है, क्योंकि इसमें ही सभी भावनाएं दबी–सोई रहती हैं। यह अवचेतन मन मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रों जैसे गहरे व अंधेरे गड्ढों जैसे स्थानों में रहता है। जब इसके जागते हुए भावों या विचारों को अद्वैत भाव अर्थात इड़ा नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे भाव देवता बन जाते हैं, पर जब द्वैत भाव अर्थात पिंगला नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे राक्षस बन जाते हैं। ये जागते विचार ही कश्यप और अदिति या दिति के पुत्र हैं। अदिति और दिति के रूप में क्रमशः इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही उसकी दो पत्नियां हैं, क्योंकि वह इन्हीं की मदद से पुत्ररूप में जागता है, मतलब शक्तिमान होता है। मानसिक कुंडलिनी छवि ही वामन भगवान है। यह सभी विचाररूपी पुत्रों में श्रेष्ठ है, इसलिए इसे भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है। एकदम मस्त मनोविज्ञान है। ब्रह्मा मूल मन है। वास्तव में वही किस्म किस्म की सांसारिक रचनाएं जैसे घर, बाग, सड़क, पुल आदि बनाता है। वह सीधा विचाररूपी पुत्रों को पैदा नहीं करता। वह पहले अवचेतन मनरूपी कश्यप मुनि को पैदा करता है। उसीसे विचाररूपी पुत्र बनते हैं। आपने भी देखा होगा कि अगर आप दुनिया में कुछ काम न करो तो सीधे कोई मजबूत विचार नहीं बनेंगे। काम करने से उसकी यादें अवचेतन मन में समा जाती हैं, जो बाद में शक्तिशाली विचारों के रूप में उमड़ती रहती हैं। पिंगला नाड़ी के अधिकार क्षेत्र में आने वाला बायां मस्तिष्क राक्षसराज बलि के अधिकार में है, इड़ा–शासित दायां मस्तिष्क देवताओं के अधिकार में है। राजा बलि अहंकार है। अहंकार बलवान ही होता है। बलि नाम उसको इसलिए भी दिया हुआ लगता है क्योंकि अहंकार अपनी ताकत को बनाए रखने के लिए जीवों की बलि लेता है, हिंसा करता है। कुण्डलिनी छवि इड़ा के प्रभाव से बनती है। वैसे तो इड़ा और पिंगला दोनों संतुलित रूप में होनी चाहिए, क्योंकि दोनों का अस्तित्व एकदूसरे पर निर्भर है, पर इड़ा तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रभावी होनी चाहिए। इड़ा नाड़ी के प्रभाव में आदमी शांत, तनावरहित, अच्छी भूख व अच्छे पाचन से सम्पन्न हो जाता है। इसी चैन की अवस्था में शुभ विचार के रूप में कुण्डलिनी चित्र मन में डेरा डालता है, मतलब देवमाता अदिति से वामन भगवान का जन्म होता है। देखने को तो वह एक छोटा सा अकेला मानसिक चित्र है, इसीलिए उसे बौना कहा है। वह राजा बलि से ब्रह्माण्ड में अपने लिए सिर्फ तीन पग भूमि मांगता है। एक मानसिक छवि कितना स्थान लेगी। हरेक मानसिक वस्तु की तरह वह ध्यानचित्र भी तीन गुणों से ही बना है, सत्त्व, रज और तम। यही तीन पग हैं। आदमी का अहंकार रूपी बलि उसे उतनी जगह भी दे देता है, और सोचता है कि उससे उसका क्या नुकसान होगा। अहंकार बहुत बलशाली होता है। वह दुनिया के बड़े से बड़े काम करता है। छोटे से एकमात्र कुण्डलिनी चित्र को वह मजाक में लेता है। रीढ़ की हड्डी शंख है। इसका शंख जैसा ही रूप है, सिर के भाग में चौड़ी और निचले भाग में पतली। इसमें स्थित मेरुदंड या सुषुम्ना नाड़ी ही शंख के अंदर की ड्रेन या नाली है। नाड़ी शब्द नदी शब्द से ही बना है। उस ड्रेन में बहने वाला जल ही कुंडलिनी शक्ति की संवेदना है। शक्ति भी जल प्रवाह की तरह बहती है। क्योंकि इसमें कुण्डलिनी ध्यान या संकल्प मिश्रित होता है, इसलिए इसे संकल्पजल कहा गया है। ध्यान को ही संकल्प कहते हैं। हिंदु धर्म में हरेक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान शंख या अर्घे (पूजा का एक विशेष बर्तन) या आचमन से जल गिराते हुए संकल्प किया जाता है, मतलब उस अनुष्ठान के कारण, विधि, पुरोहित, और फल अर्थात उद्देश्य के बारे में कुछ क्षणों के लिए गहरा ध्यान किया जाता है। यज्ञ में बैठे हुए बलि ने शंख से जल गिराते हुए वामन भगवान को तीन कदम भूमि देने का संकल्प लिया था। संभवतः जल गिराने से कुण्डलिनी शक्ति बहने लगती है, क्योंकि दोनों में समानता है, जिससे ध्यान मजबूत होता है। अरघे या शंख से जल की गिरती धारा के साथ कुण्डलिनी शक्ति भी फ्रंट चैनल से नीचे की ओर बहने लगती है, जिसके दबाव से वह बैक चैनल में से गुजरते हुए पीठ से ऊपर चढ़ जाती है, और अपने साथ मूलाधार की अतिरिक्त व विशेष कुण्डलिनी शक्ति भी ले जाती है। कुण्डलिनीसंकल्प रूपी वामन, पतली मेरुदंड रूपी सुषुम्ना–शंख में, बह रहे शक्तिरूपी संकल्पजल की मदद से योगसाधना से बढ़ता ही रहता है, और अंत में जागृत होकर सम्पूर्ण सृष्टि को व्याप्त कर लेता है। यही तीन पग से तीनों लोकों को मापना है। इससे अहंकार खुद ही अवचेतन रूपी पाताल लोक में दब जाता है। जिसे ऐसे कहा गया है कि तीसरा पग वामन ने बलि के सिर पर रखा। यह कथा आने वाली अगली पोस्ट में भी जारी है।

कुंडलिनीयोग और सिगमंड फ्रायड का मनोविज्ञान एक ही बात कहता है

दोस्तो, हाल की पिछली कुछ पोस्टों के विश्लेषण से लगता है कि हो सकता है कि जिन्हें हम मानसिक बिमारी समझते हों, वे दरअसल जागृति की तरफ बढ़ रहे मन के लक्षण हों, पर उन्हें हम ढंग से संभाल न पाने के कारण वे मानसिक रोग बन जाते हों। मैं इसे अपनी आपबीती से भी सिद्ध कर सकता हूं। जिस किसी स्थान विशेष पर मुझे यौनबल मिलता था, वहां मेरा ध्यानचित्र मुझे हर क्षेत्र में अव्वल बनाता था, चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक। पर जहां मुझे वह नहीं मिलता था, वहां वह मुझे एक मनोरोगी जैसा भी बना देता था। बेशक वह यौनबल काल्पनिक संभोग ही क्यों न हो, काल्पनिक यौनसाथी का समाधि जैसा स्थायी मानसिक चित्र क्यों न हो। यहां तक कि बेशक वह स्त्री की बजाय पुरुष ही क्यों न हो। ऐसे में तो मुझे समलैंगिकता में भी कोई बुराई महसूस नहीं हुई। हालांकि यह अलग बात है और जैसा मुझे लगता है कि कुंडलिनी जागरण स्त्रीपुरुष प्रेम से ही मिलता है, क्योंकि यिन और यांग का संपूर्ण सम्मिलन पुरुष और स्त्री के बीच ही हो सकता है। पाठकों को यह अजीब लग सकता है।

महान पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड कहते हैं कि शरीर के हरेक हिस्से में यौन-उन्माद अर्थात ऑर्गेज्म है। यह तो तंत्र में बहुत पहले से कहा गया है। तभी तो कुण्डलिनी शक्ति का चक्रोँ पर आना मतलब वहाँ पर यौन उन्माद को अनुभव करना ही है। कुंडलिनी योग का मतलब ही उस मूलाधार की यौनोन्माद या ऑर्गेस्मिक से भरी संवेदना को ऊपर चढ़ाते हुए उसे सभी चक्रों को बारीबारी से प्रदान करना है। यह ऑर्गेस्मिक व आनंदपूर्ण संवेदना एक सुपर टॉनिक की तरह है। यह जिस चक्र पर पहुंचती है, उसकी सभी जैविक गतविधियों को बढ़ाते हुए उन्हें सुधारती भी है और संतुलित भी करती है। उस चक्र के प्रभावक्षेत्र में जितने भी अंग व जैवीय भाग आते हैं, वे भी खुद ही चक्र की तरह लाभान्वित हो जाते हैं। क्योंकि सातों चक्रों में सारा शरीर कवर हो जाता है, इसलिए पूरा शरीर स्वस्थ व संतुलित हो जाता है, बिमारियां इससे दूर रहती हैं। दरअसल जननांगों का यौनोन्माद तो चक्रों के अपने स्वाभाविक या इन्हेरेंट यौनोन्माद को बढ़ाने का ही काम करते हैं, अपना यौनोन्माद तो उनके अंदर पहले से ही है। उनका यह आंतरिक यौनोन्माद विभिन्न जैविक अभिक्रियाओं व प्रक्रियाओं के आधारभूत रूप में है। जननांगों से तो उसे बस अतिरिक्त धक्का ही मिलता है। ऐसा समझ लो कि उनका अपना यौनोन्माद आइडलिंग पर स्वतः घूम रहे इंजिन की तरह है, और जननांगों का यौनोन्माद गाड़ी के एकसेलरेटर पैडल की तरह है। अगर जननांगों का यौनोन्माद ही सबकुछ होता, तब तो फेल हो रहा हार्ट भी उससे चालू हो जाता। पर ऐसा नहीं होता। यह ऐसे ही है, जैसे अगर इंजन बंद हो या पिस्टन आदि पुर्जों की खराबी से वह बंद हो रहा हो, तो एकसेलरेटर पैडल को दबाने से भी वह चालू नहीं होगा।

एक जगह सिगमंड फ्रायड थोड़ा हट कर विचार रखते हैं। वे कहते हैं कि संभोग शक्ति सबसे बड़ी है, मतलब प्राइम मोटिवेटर या प्रमुख प्रेरक है, पर हमारे तंत्र दर्शन में शुरु से ही कहा गया है कि संकल्प शक्ति उससे भी बड़ी प्रेरक है। अगर फ्रायड बिल्कुल सही होते तो हरेक व्यक्ति को जागृति मिला करती, क्योंकि संभोग तो सभी लोग करते हैं। सच्चाई यह है कि संभोग से भी जागृति उन्हीं को मिलती है, जिन्होंने योगसाधना और अन्य आध्यात्मिक तरीकों से गुरु और जागृति की प्राप्ति के लिए मन में पहले से ही दृढ़ संकल्प बना कर धारण कर रखा हो। इस बारे में किसी नई पोस्ट में विस्तार से चर्चा की कोशिश करेंगे।

कुंडलिनी योगी नृसिंह भगवान रूपी ध्यानचित्र की मदद से हिरण्यकशिपु रूपी अहंकार व तांत्रिक पापों को भस्म करके प्रह्लाद रूपी आत्मबुद्धि की रक्षा करता है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मोर कैसे योगी बना हुआ था। योगी का पिछ्ला एनर्जी चैनल नर मोर है, तो अगला चैनल मोरनी है। अवसाद से भरे माहौल में मूलाधार की शक्ति से उसके मस्तिष्क में बहुत से दोषपूर्ण विचार बनते हैं, क्योंकि शक्ति को व्यय होने का और रास्ता नहीं मिलता। उन्हीं विचारों अर्थात आंसुओं को वह खेचरी मुद्रा के रूप में उल्टी जीभ को मुंह के अंदर के नर्म तालु से छुआ कर पीता है। वही आंसू फ्रंट चैनल से नीचे उतरते हुए चक्रों पर विशेषकर नाभि चक्र पर कुण्डलिनी चित्र का रूप ले लेते हैं, मतलब मोरनी गर्भवती हो जाती है।

पुराणों की एक कथा के अनुसार हिरण्यकशिपु नामक एक राक्षस ने ब्रह्मा से वरदान मांगा कि न वह मनुष्य के द्वारा न पशु के द्वारा, न दिन में न रात में, न आकाश में और न धरातल पर, न घर के अंदर न बाहर, और न अस्त्र से और न ही शस्त्र से मारा जा सकेगा। हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु को अपना कुलशत्रु मानता था। परंतु उसका बेटा प्रह्लाद विष्णुभक्त था। हिरण्यकशिपु ने उसे बहुत समझाया पर जब वह नहीं माना तो उसने उसे मारने के बहुत से प्रयास किए। एकबार उसने लोहे का खंबा लाल गर्म करवाया और प्रह्लाद को उससे चिपकने को कहा। प्रह्लाद ने एक चींटी को उस पर रेंगते हुए देखा तो बिना डरे उस खंबे को गले लगा लिया। तभी उससे एक विचित्र जीव निकला, जिसका मुंह शेर का था परंतु वह नीचे से आदमी था। उसका नाम नृसिंह था। उसने हिरण्यकशिपु को संध्या के समय, घर के दरवाजे पर ले जाकर, अपनी गोद में उठाकर अपने नखों से मार डाला।
हिरण्यकशिपु तांत्रिक पाप का प्रतीक भी है। तांत्रिक पंचमकार पापरूप ही तो हैं। पापरूपी शक्ति का रुझान भौतिक दुनिया की तरफ ज्यादा होता है। इसलिए वह आदमी को अध्यात्म की तरफ नहीं जाने देती। पर गुरुकृपा से आदमी का रुझान अध्यात्म की ओर हो जाता है। इसीको कथा में ऐसे कहा गया है कि पाठशाला के गुरु ने प्रह्लाद को अध्यात्म की तरफ मोड़ा। फिर हिरण्यकशिपु ने उस गुरु को हटा कर छलकपट से भरी भौतिक शिक्षा देने वाला नया गुरु रख लिया। पर प्रह्लाद का स्वभाव नहीं बदला। मतलब साफ है कि अंधी शक्ति सच्चे गुरु से भी दूर ले जाने की कोशिश करती है, पर अगर सच्चे गुरु से थोड़ा सा भी संपर्क स्थापित हो जाए, तो वह कामयाब नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप अध्यात्म की तरफ झुके हुए इन तांत्रिक पापों से आदमी की सुषुम्ना क्रियाशील हो जाती है। यही हिरण्यकशिपु द्वारा लाल गर्म लोहे का खंबा बनाना है। योगी द्वारा ध्यानचित्र को इसके साथ जोड़ना ही उसका इससे आलिंगन करना है, क्योंकि आदमी का अपना रूप भी वही होता है, जिसका वह हरपल ध्यान कर रहा होता है। ध्यानचित्र के जागने मतलब नृसिंह भगवान के प्रकट होने से अन्य सभी पापों के साथ कुण्डलिनी साधना की सफलता के लिए किए गए वे तांत्रिक पाप भी नष्ट हो जाते हैं। यही नृसिंह के द्वारा हिरण्यकशिपु का वध है। संध्या के समय उस जलते खम्बे से नृसिंह का प्रकट होना मतलब अन्य समय की अपेक्षा उस समय सुषुम्ना ज्यादा क्रियाशील होकर सहस्रार में ध्यान चित्र को जागृत जैसा करती है। सक्रिय सुषुम्ना नाड़ी ही वह दहकता लाल लौह स्तंभ है। सुषुम्ना भी रीढ़ की हड्डी के अंदर रहती है, जो लोहे की तरह कठोर है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र को कई लोग भूतिया जैसा डरावना मानते हैं, क्योंकि उसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता, इसीलिए उसको डरावने नृसिंह का रूप दिया गया है। ध्यान चित्र न मनुष्य होता है और न ही पशु। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि जब हनुमान, गणेश जैसे अर्धमानुष रूपों का ध्यान किया जाता है, तब ध्यानचित्र सबसे ज्यादा अभिव्यक्त होता है। वह न अंदर होता है और न ही बाहर। इसका मतलब है कि ध्यानचित्र कोई भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि केवल एक काल्पनिक चित्र है। वह न दिन में अच्छे से बनता है और न रात को, बल्कि संध्या के समय कुंडलिनी योग करते हुए बनता है। वह हिरणयकाशीपु को गोद में उठाकर उसके पेट को नख से फोड़ता है, मतलब मूलाधार स्वाधिष्ठान से अवचेतन और अचेतन मन के रूप में दबे अहंकार को ऊपर उठाकर उन्हें चक्रोँ पर प्रकट करके समाप्त करता है, मतलब यह विपासना साधना ही है। सहस्रार चक्र में यह अहंकार पूरा अभिव्यक्त जैसा बना रहता है, और मूलाधार में सोया हुआ सा रहता है, इसलिए दोनों ही स्थानों पर मरने को नहीं आता। यह बीच वाले चक्रों में ही अर्धजागृत या अर्धसुशुप्त सा रहता है, इसलिए बीच में ही मरने को आता है। विपासना साधना के साक्षीभाव का भी तो यही सिद्धांत है। यह शक्ति के द्वारा चक्रभेदन ही है। पहले अवचेतन मन रूपी धरातल से सुषुप्त विचारों और वासनाओं को प्राण शक्ति से जगा कर चक्रों पर अभिव्यक्त किया जाता है, फिर चक्रों पर प्राण के प्रवाह से उनका भेदन किया जाता है। दरअसल भेदन या नाश तो उन वासनाओं व संस्कारों का होता है, पर भेदन चक्रों का माना जाता है। क्योंकि पेट का नाभि चक्र सबसे प्रमुख होता है, इसलिए हिरण्यकशिपु का पेट फाड़ने की बात कही गई है। क्योंकि ज्यादातर योगी चक्रस्थान पर अंगुली का नख वाला सिरा रख कर नख से चक्र की तीव्र चुभन वाली संवेदना से या कम से कम अंगुली रखकर ध्यान को मजबूत करते हैं, इसीलिए कहा गया है कि नरसिंह ने हिरण्यकशीपु को नख से फाड़ा। इसमें जो संतुलित या बीच वाली अवस्थाओं में हिरणकशिपु का वध है, वह यही बताता है कि संगम अर्थात यिनयाँग वाली अवस्था में ही सुषुम्ना क्रियाशील होती है। अहंकार को न कोई मनुष्य मार सकता है, और न कोई पशु। उसे किसी भी अस्त्र–शस्त्र से नहीं मारा जा सकता। उसे न तो पूरी तरह बाहर अर्थात बाह्यमुखी होके मारा जा सकता है, और न ही पूरी तरह अंदर अर्थात अंतर्मुखी होकर, बल्कि दोनों के उपयुक्त मिश्रण से ही मारा जा सकता है। कुण्डलिनी योगी को जो पीठ में अर्थात सुषुम्ना में रेंगती जैसी हल्की संवेदना महसूस होती है, उससे उसे कुण्डलिनी जागने बारे विश्वास हो जाता है, जिससे वह योगाभ्यास में लगा रहता है, और सुषुम्ना को क्रियाशील करके कुण्डलिनी जागरण प्राप्त कर लेता है। इसीको ऐसे कहा गया है कि प्रह्लाद को उस जलते लोहस्तंभ पर एक कीड़ी रेंगते हुए दिखी, जिससे आश्वस्त होकर उसने उसे गले लगा लिया, जिससे नृसिंह भगवान प्रकट हुए।

कुण्डलिनी योग से मनोमय कोष रूपी पतंग प्राणमय कोष और अन्नमय कोष रूपी माँझे और चकरी से जुड़कर विज्ञानमय कोष रूपी उड़ान भरकर आनंदमय कोष रूपी मजा देती है

होता क्या है कि जब योग करते समय अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर के क्रियाशील होते ही मनोमय शरीर क्रियाशील होता रहता है, तब यह विश्वास पक्का होता रहता है कि मनोमय शरीर बेशक बाहरी और अनंत अंतरिक्ष में फैला महसूस होए, पर वह हमारे शरीर से जुड़ा हमारा ही स्वरूप है। हालांकि दुनियादारी के सभी कामों, खेलों, व व्यायामों के दौरान भी अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और मनोमय कोष एकसाथ सक्रिय हो जाते है, पर वे इतनी तेजी से सक्रिय होते हैं कि उनकी आपस में एकत्व भावना करने का मौका ही नहीं मिलता। साथ में आदमी का ध्यान काम की पेचीदगी, उससे जुड़ी तकनीक, उससे जुड़े फल पर और अन्य लौकिक दुनियादारी पर भी रहता है, जिससे भी एकत्व की भावना की तरफ ध्यान नहीं जाता। वैसे भी एकत्व की भावना द्वैत से भरी दुनियादारी की विरोधी है। दो विरोधी चीजें साथ नहीं रह सकतीं। जल और अग्नि साथ नहीं रह सकते। मनोमय शरीर के प्रति इसी आत्मभावना से विज्ञानमय शरीर भी क्रियाशील हो जाता है। दुनियादारी का हर किस्म का ज्ञान साधारण ज्ञान की श्रेणी में आता है। किसी को डॉक्टरी का ज्ञान है, किसी को दर्जी का, किसी को नाई का, किसी को अध्यापन का, किसी को उपदेश देने का, किसी को यज्ञ या कर्मकांड करने या अन्य धार्मिक परम्परा निभाने का है। सब साधारण ज्ञान में आते हैं क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए और लौकिक व्यवहार के लिए हैं। विशेष ज्ञान या विज्ञान इन सबसे हटकर व अकेला है, जो न तो जीविकोपार्जन के लिए है, और न ही लौकिक व्यवहार की सिद्धि के लिए है, बल्कि केवल आत्मा की पूर्ण व प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए है। विज्ञानमय शरीर का मतलब ही विशेष ज्ञान वाला शरीर है। इसमें स्थित होने पर साधक को ऐसा महसूस होता है कि वह स्थूल शरीर, प्राण, और मन का मिलाजुला रूप माने संघातमात्र है। जैसा मैंने पिछली पोस्ट में भी पतंग के उदाहरण से स्पष्ट किया था। अगर भटकते मन को अपना आत्मरूप न भी समझ सको तो यह तो समझ ही सकते हैं कि वह शरीर से साँस के माध्यम से ऐसे ही जुड़ा है जैसे एक पतंग मांझे के माध्यम से गट्टू या चकरी से जुड़ी होती है। पतंग उड़ाने का बहुत मजा आएगा। कभी बादलों के ऊपर, कभी दूर देश, कभी दूर ग्रह या तारे पर, कभी दूसरे ब्रह्माण्ड में, कभी परलोक में, तो कभी बिल्कुल पास में या चकरी में लिपटी हुई, कभी आँखों से ओझल होगी और सिर्फ चकरी और धागा ही नजर आएगा, फिर एकदम कहीं प्रकट हो जाएगी, कभी तूफ़ान में जैसी फँसी हुई बेढंगी उड़ेगी और बेढंगी दिखेगी, इस तरह अनंत आकाश में वह हर जगह उड़ेगी, पर हमेशा जुड़ी रहेगी शरीर के चक्रोँ के साथ। शायद चकरी से ही चक्र नाम पड़ा हो। हाहा। अब मनोवैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर के साथ एक चांदी के धागे से जुड़ा होता है। यह धागा नाभि से जुड़ा होता है। जैसे मांझा चकरी से बँधा होता है, वैसे ही योगा सांस नाभि से ही चलती है। सीधी सी बात है, अनुभव रूपी पतंग हमेशा अपने से अर्थात आत्मा से अर्थात अपने शरीर से जुड़ी हुई है। सम्भवतः इसीलिए नाभि चक्र को आदमी के शरीर का केंद्र बिंदु कहते हैं। नाभि पर एक अंदर की तरफ भिंचाव सा महसूस भी होता है, जब सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर का ध्यान भी किया जाता है। सम्भवतः नाभि चक्र से ही पतंग की चकरी का नाम पड़ा हो। उससे भौतिक दुनिया का प्रकाश आत्मा को मिलेगा ही, क्योंकि आत्मभावना जुड़ी है सबके साथ। फिर पूर्वोक्तानुसार आनंद भी पैदा होगा ही और कुण्डलिनी भी अभिव्यक्त होगी ही, क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही ऐसी भौतिक वस्तु है, जो ध्यान के माध्यम से आत्मा से सबसे ज्यादा जुड़ी होती है। मतलब कुण्डलिनी आत्मा से भौतिक दुनिया के जुड़ाव की प्रतिनिधि है। विशेष ज्ञान या विज्ञान के विपरीत साधारण ज्ञान दुनियादारी के मामले में होता है। ज्ञान जल्दी ही अज्ञान में परिवर्तित हो जाता है अगर उसे विज्ञान का साथ प्राप्त न हो। यह साइंस वाला विज्ञान नहीं है। प्राणमय शरीर का मतलब साँस पर ही ध्यान नहीं है, पर साँस से उत्पन्न शरीर की गति और शरीर के अन्य हिलने-डुलने पर ध्यान भी है। इस मामले में पैदल चलना एक सर्वोत्तम अध्यात्मवैज्ञानिक व्यायाम लगता है। इसमें पूरे शरीर पर, उसकी गति पर, उसकी संवेदनाओं पर और सांसों पर अच्छे से ध्यान जाता है। साथ में मन में भी सात्विकता के साथ विचारों की क्रियाशीलता भी काफी अच्छी होती है।

कुण्डलिनी योग भी एक लहर ही है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में एक विचार-प्रयोग के माध्यम से बता रहा था कि सृष्टि के अंत में कैसे गुरुत्वाकर्षण सभी चीजों को निगल जाएगा। कई वैज्ञानिक भी ऐसा ही अंदाजा जता रहे हैं, जिसे बिग क्रन्च नाम दिया गया है।

साथ में मूलकण के तरंग स्वभाव के बारे में भी बात चली थी। हवा, पानी आदि भौतिक तरंगों के मामले में देखने में आता है कि क्रेस्ट और ट्रफ एकसाथ नहीं बन सकते। जब क्रेस्ट बनाने के लिए जल सतह से ऊपर की तरफ उठेगा, तो उसी समय उसी जगह पर वह ट्रफ के रूप में सतह के नीचे नहीं डूब सकता। पर आकाश की तरंग के मामले में ऐसा हो सकता है, क्योंकि यह आभासी है, और इसके लिए किसी भौतिक वस्तु या माध्यम की जरूरत नहीं है। इसीलिए एकसाथ त्रिआयामी क्रेस्ट और ट्रफ बनने से मूलतरंग मूलकण की तरह भी दिखती है, और उसके जैसा व्यवहार भी करती है, जैसा कि पिछली पोस्ट में चित्रोक्त किया गया है। मूलकण रूपी तरंग ऐसे ही क्रेस्ट और ट्रफ बनाते हुए आगे से आगे बढ़ती रहती है, क्योंकि प्रकृति और पुरुष हर जगह विद्यमान हैं, और प्रकृति से पुरुष की तरफ दौड़ हर जगह चली रहती है। इसीलिए मूलकण कई जगह एकसाथ दिखाई देते हैं। पिछले क्रेस्ट से अगला ट्रफ बनता है, और पिछले ट्रफ से अगला क्रेस्ट, क्योंकि प्रकृति को सीमेट्री प्यारी है। इस तरह अनगिनत तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में अनगिनत सूक्ष्म लूप बन जाते हैं। मतलब पूरा आकाश लूपों में बंटा हुआ सा लगता है। क्वांटम लूप थ्योरी भी यही कहती है कि अंतरिक्ष सपाट न होकर सूक्ष्मतम टुकड़ों में बंटा है। उससे छोटे टुकड़े नहीं हो सकते। पर अगर सिद्धांत से देखा जाए तो हरेक चीज टूटते हुए सबसे छोटी जरूर बनेगी। वह विशेषता से रहित शून्य आसमान ही है। जिसे अंतरिक्ष का क्वांटम लूप कहा गया है, वह दरअसल शून्य अंतरिक्ष का अपना स्वाभाविक रूप नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष में आभासी मूलकण है। इससे इन सभी बातों का उत्तर मिल जाता है कि तरंग कण के जैसे क्यों व्यवहार करती है, स्टैंडिंग वेव और प्रॉपेगेटिंग वेव कैसे बनती है आदि। कोई भी लहर वास्तव में ध्यानरूप ही है, जैसा पिछली पोस्ट में बताया गया है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ लहर के रूप में ही चलती हैं। लहर में कोई चीज आगे नहीं बढ़ती, लहर बनाने वाली चीज केवल अपने स्थान पर आगे-पीछे या ऊपर-नीचे कांप कर अपनी पूर्ववत जगह पर आ जाती है। केवल लहर आगे बढ़ती है। वैसे भी शून्य जैसे अंतरिक्ष में कोई चीज है ही नहीं प्रकट होने को। इसलिए एकमात्र लहर का ही विकल्प बचता है। वहाँ तो अपनी जगह पर कांपने के लिए भी कोई चीज नहीं है। इसलिए झूठमूठ में ही कंपन दिखाया जाता है। यह नहीं पता कि कैसे। प्रकाश जिसको ईश्वररूप या दैवरूप माना जाता है, लहर के रूप में ही चलता है। इसी तरह अग्नि भी।

नाड़ी की गति भी लहर के रूप में ही होती है

नाड़ी में संवेदना लहर के रूप में आगे बढ़ती है। इसमें सोडियम-पोटाशियम पम्प काम करता है। सोडियम और पोटाशियम आयन अपनी ही जगह पर नाड़ी की दीवार से अंदर-बाहर आते-जाते रहते हैं, और संवेदना की लहर आगे बढ़ती रहती है।

लहर सूचना को आगे ले जाती है

तालाब में कहीं पर कंकड़ मारने से उसके पानी पर लहर पैदा होकर चारों तरफ फैल जाती है। उससे जलीय जंतु संभावित खतरे से सतर्क हो जाते हैं। जमीन पर चलने से उस पर एक लहर पैदा हो जाती है, जिसे सांप आदि जंतु पकड़कर सतर्क हो जाते हैं या भाग जाते हैं। वायु से आवाज के रूप में सूचना संप्रेषण के बारे में तो सभी जानते हैं। मूलाधार से संवेदना की लहर सहस्रार तक जाती है, जिससे सहस्रार सतर्क अर्थात क्रियाशील हो जाता है। सतर्क कालरूपी शत्रु से होता है, जो हर समय मौत के रूप में आदमी के सामने मुंह बाँए खड़ा रहता है। इसलिए सहस्रार अद्वैत के साथ सांसारिक अनुभूतियों के रूप में जागृति या आध्यात्मिक जीवनयापन के लिए प्रयास करता है। वैसे दुनियादारी में सफलता भी सहस्रार से ही मिलती है, क्योंकि वही अनुभूति का केंद्र है।

जीवात्मा विद्युतचुंबकीय तरंगों की सहायता से अपने अंदर आभासी संसार को महसूस करता है

नाड़ी में चार्जड पार्टिकलस की गति से आसपास के आकाश में विद्युत्चुंबकीय तरंग बनती है। उस तरंग से सहस्रार के आत्म-आकाश में आभासी तरंगें बनती महसूस होती हैं। इसीलिए कहते हैं कि आत्मा का स्थान सहस्रार है। यह आश्चर्य की बात है कि अनगिनत स्थानों पर विद्युत्चुंबकीय तरंगों से आकाश में अनगिनत आभासी कलाकृतियाँ बनती रहती हैं, पर वे केवल जीवों के मस्तिष्क के सहस्रार में ही आत्मा को महसूस होती हैं। अगर उसकी बनावट व उसकी कार्यप्रणाली की सही जानकारी मिल जाए तो हो सकता है कि कृत्रिम जीवकृत्रिम मस्तिष्क का निर्माण भी विज्ञान कर पाए।

कुंडलिनी योग को ही गंगा अवतरण की कथा के रूप में दिखाया गया है

अश्वमेध यज्ञ साक्षीपन साधना या विपासना का अलंकारिक शैली में लिखा रूप प्रतीत होता है

दोस्तों, हिन्दु दर्शन में गंगा के अवतरण की एक प्रसिद्ध कथा आती है। क्या हुआ कि राजा सगर के साठ हजार पुत्र थे। एक बार वे अश्वमेध यज्ञ करने लगे। यज्ञ के अंत में यज्ञ का घोड़ा छोड़ा गया। देवराज को डर लगा कि अगर राजा सगर का वह सौवां अश्वमेध यज्ञ सफल हो गया तो सगर को उसका इंद्र का पद मिल जाएगा। इसलिए उसने घोड़े को चुराकर पाताल लोक में कपिल मुनि के आश्रम के बाहर बाँध दिया। सगरपुत्रों ने समझा कि घोड़े को कपिल मुनि ने चुराया था। इसलिए वे उन्हें अपशब्द कहने लगे। इससे जब कपिल मुनि ने आँखें खोलीं तो वे उनसे निकले तेज से खुद ही भस्म हो गए। फिर इससे दुखी होकर राजा सगर कपिल मुनि से क्षमा मांगने लगे और अपने पुत्रों के उद्धार का उपाय पूछने लगे। फिर उन्होंने गंगा नदी से उनका उद्धार होने की बात कही। फिर इतना बड़ा काम कोई नहीं कर सका। सगर के बाद की कई पीढ़ियों के बाद जन्मे भागीरथ ने ब्रह्मा से वरदान में माँ गंगा को माँगा और शिव से उसे जटा में धारण करने की प्रार्थना की। उनकी इच्छा पूरी हुई और गंगा नदी ने उन भस्मित सगर पुत्रों की राख के ऊपर से गुजर कर उनका उद्धार किया।

गंगा नदी के जन्म की कथा का कुंडलिनीविज्ञान आधारित विश्लेषण

राजा सगर संसार-सागर का प्रतीक है। मतलब संसार में आसक्त आदमी। साठ हजार पुत्र हजारों इच्छाओं व भावनाओं के प्रतीक हैं। अश्वमेध यज्ञ का मतलब इन्द्रियों का दमन है। मेध का मतलब बलि या वध होता है। अश्व की बलि मतलब इन्द्रियों की बलि। अगर बाह्य इन्द्रिय रूपी अश्व की बलि अवचेतन मन रूपी हवनकुण्ड में दी जाए और उससे दबे हुए विचारों को उघाड़ने के रूप में अग्नि प्रज्वलित की जाए तो स्वाभाविक है कि उससे मुक्ति रूपी स्वर्ग मिलेगा। उस यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं क्योंकि पूरे शरीर को देवताओं ने ही बनाया है और वे ही उसे नियंत्रित करते हैं, जैसे कि आँख को सूर्य देव, भुजाओं को इंद्र आदि। इससे परमात्मा-निर्देशित देवताओं का उद्देश्य पूरा होता है, क्योंकि बारबार के जन्ममरण आदि के दुःख से जीव को मुक्ति दिलाकर उसे अपना सर्वोत्तम पद प्रदान करना ही जीवविकास के पीछे मुख्य वजह प्रतीत होती है। इस उद्देष्य की पूर्ति से देवताओं को शक्ति मिलती है। इसीलिए कहा गया है कि यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं और वर्षा आदि उचित समय पर करवाकर धनधान्य में वृद्धि करते हैं। प्रत्यक्ष लाभ यह तो होता ही है कि लोगों के बीच आपसी मनमुटाव नहीं रहता और एकदूसरे से प्रेम और सहयोग बना रहता है, जिससे सकारात्मक विकास होता है। एकबार ऐसा यज्ञ करने से काम नहीं चलता। यज्ञ पूरी उम्र भर लगातार करते रहना पड़ता है। यह अवचेतन मन बहुत गहरे और आकर्षक कुएँ की तरह है, जिससे बाहर निकला विचारों का कचरा फिर से उसमें गिरता रहता है, हालांकि फिर ऊपर ही रहता है, और बारम्बार के प्रयास से स्थायी रूप से बाहर निकल जाता है। हो सकता है कि किसी वार्षिक उत्सव की तरह साल में एक बार विचारों के कचरे को विस्तार से बाहर निकालने की जरूरत हो। उसे अश्वमेध यज्ञ कहते हों। इसीलिए सौ साल की पूरी उम्र में सौ यज्ञ हुए। सौवां यज्ञ न होने से जीवन के अंतिम वर्ष में पैदा हुए विचारों और भावों का कचरा अवचेतन मन में दबा रह जाता हो, जो आदमी को मुक्त न होने देता हो। हमारी दादी माँ हमें एक दंतकथा सुनाया करती थी। एक स्वर्ग को जाने वाली रस्सी थी। उस पर सावधानी से चलते हुए लोग स्वर्ग जाया करते थे। एक बार एक बुढ़िया एक योगी को उस पर जाते हुए देख रही थी। उसने योगी को आवाज लगाई कि उसे भी साथ ले चल। योगी को उस पर दया आ गई और उसका हाथ पकड़कर उसे भी रस्सी पर चलाने लगा। पर योगी ने एक शर्त रखी कि वह पीछे मुड़कर अपने भाई-बंधुओं को उससे बिछड़ने के दुःख में रोते-बिलखते नहीं देखेगी। अगर उसने पीछे देखा तो उसका संतुलन बिगड़ जाएगा और वह वापिस धरती पर गिर जाएगी। बुढ़िया ने उसकी शर्त मान ली। पर रास्ते में उससे रहा नहीं गया, और जैसे ही उसने नीचे को देखा, वह नीचे गिर गई, पर योगी बिना उसकी तरफ देखे आगे निकल लिए। ऐसी दंतकथाओं के बहुत गहरे और ज्ञानविज्ञान से भरे अर्थ होते हैं।

मन की सफाई तो अंततः विपासना से ही होती है, जो एक शांत किस्म का ध्यानयोग है

वैसे कुंडलिनी जागरण, आत्मज्ञान वगैरह-वगैरह से मुक्ति नहीं मिलती। इनसे तो विचारों या कर्मों के दबे कचरे की सफाई में मदद भर मिलती है, अगर कोई लेना चाहे तो। अगर कोई न लेना चाहे तो अलग बात है। इसीलिए आजकल कुंडलिनी जागरण जैसे मस्तिष्क झकझोरने वाले अनुभव का ज्यादा प्रचलन व महत्त्व नहीं रह गया है, अगर सच कहूँ तो। वैसे भी आज के व्यस्त, तकनीकी और अध्ययन से भरे युग में दिमाग़ पर पहले से ही बहुत दबाव है। वह और कितना दबाव झेलेगा जागृति के नाम पर। अधिकांश लोगों को एकांत व शांति तो नसीब होना बहुत मुश्किल है। अत्यधिक मस्तिष्क दबाव से कहीं पार्किंसन, अलजाइमर जैसे लाइलाज मस्तिष्क रोग हो गए तो। पर ये मेरे नहीं कुछ अन्य योगियों के विचार हैं। दरअसल ऐसा होता नहीं अगर अपनी सहनशक्ति की सीमा के अंदर रहकर और सही ढंग से ध्यानयोग या कुंडलिनी जागरण किया जाए। ध्यान से हमेशा लाभ ही मिलता है। यह पैराग्राफ कुछ अन्य लोगों के विचारों को परखने के लिए लिख रहा हूँ। सही अर्थों में आजकल तो शांत विपश्यना अर्थात साक्षीभाव साधना का युग है। वैसे विपासना भी एक ध्यान ही है, शांत, सरल, स्वाभाविक व धीमा ध्यान। अगर भैंस खुद ठीक रस्ते पे जा रही है तो उसे डंडे क्यों मारने भाई। कचरा ही साफ करना है न, तो सीधे जाके कर लो, टेढ़ेमेढ़े रास्ते से क्यों भागना। बाहर स्थित विचारों का कचरा कभी कभार अगर दिख भी जाए तो भी वह शुद्ध ही होता है क्योंकि उससे लगाव या क्रेविंग पैदा नहीं होता। यह भी कह सकते हैं कि विपासना से आदमी शांत, तनावमुक्त और हल्का हो जाता है, जिससे खुद ही उसका मन कुंडलिनी ध्यान को करता है। उससे और कुंडलिनी जागरण से विपासना में और मदद मिलती है, बदले में विपासना से कुंडलिनी ध्यान और ज्यादा मजबूती प्राप्त करता है। इस तरह से विपासना और कुंडलिनी ध्यान साधना एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं।

ध्यानयोग या ध्यान यज्ञ ही असली यज्ञ है, और इन्द्रियों का दमन ही पशुबलि है

इन्द्रियों को शास्त्रों में घोड़े या पशु की उपमा दी जाती है। पशुपति अर्थात इन्द्रियों का पति भगवान शिव का ही एक नाम है। जैसे पशु का झुकाव आंतरिक आत्मा की बजाय बाहरी दुनिया की तरफ होता है, उसी तरह बाह्य इन्द्रियों का भी। आदमी की उम्र सौ साल होती है। उसके बाद मृत्यु मतलब स्वर्ग की प्राप्ति। स्वर्ग को जीते जी प्राप्त नहीं किया जा सकता। मुक्ति तो देवराज इंद्र के लिए भी स्वर्ग है। इसीलिए इस परम स्वर्ग की प्राप्ति को इंद्र अपना अपमान मानता है कि कोई कैसे उससे और उसके द्वारा नियंत्रित तीनों लोकों से ऊपर उठ सकता है। हालांकि देवताओं के साथ इंद्र भी आदमी की मुक्ति से बल प्राप्त करता है, पर यह अहंकार जो है न, वह अपना भला-बुरा कब देखने देता है। सौवें घोड़े को पाताल में बाँधने का अर्थ है कि इंद्र ने इन्द्रियों की शक्ति को मूलाधार के अंधकार भरे क्षेत्र में स्थापित कर दिया। शरीर इंद्र के द्वारा संचालित है। शरीर की अतिरिक्त शक्ति कुदरती तौर पर खुद ही मूलाधार को चली जाती है, इसीलिए इंद्र से इसका नाम जोड़ा गया है। इतना तो सबको पता ही है कि नाभि चक्र को चली जाती है, इसीलिए जब कोई काम और तनाव न हो तो बहुत भूख लगती है और खाना भी अच्छे से पचता है। उससे शरीर में और शक्ति बढ़ती है। वह वहाँ से स्वाधिष्ठान चक्र को उतरती है क्योंकि शक्ति की चाल की दिशा ऐसी ही है। वहाँ अगर उससे यौनता से संबंधित काम लिया गया तो वह पीठ से दुबारा ऊपर चढ़कर पूरे शरीर में आनंद के साथ फैल जाती है या बाहर निकल कर बर्बाद हो जाती है। अगर वह काम भी नहीं लिया गया तो वह मूलाधार को उतरकर वहीं पड़ी रहती है। अगर कभी थकान व तनाव देने वाला खूब काम किया जाए तो वह वहाँ से पीठ से होते हुए संबंधित थके हुए अंग तक पहुंच कर उसकी मुरम्मत करती है, नहीं तो वहीं सोई रहती है। मूलाधार में शक्ति का सोया हुआ होना इसलिए भी कहा गया होगा क्योंकि जब हम मन में नींद-नींद का लगातार उच्चारण करते हैं तो शक्ति आगे के चक्रोँ से नीचे जाते हुए महसूस होती है और वापिस ऊपर नहीं चढ़ती। अगर चढ़ती है, तो एकदम से नीचे उतर जाती है। अगर शक्ति को नीचे आने में रुकावट लग रही हो, तो मस्तिष्क से गले तक तो आ ही जाती है। इसके साथ एकदम से शांति और राहत महसूस होती है, और ऐसा लगता है कि मस्तिष्क दाब और रक्तचाप एकदम से कम हुआ। हरेक चक्र में शक्ति काम करती है, पर मूलाधार में आमतौर पर नहीं, क्योंकि वह शक्ति का शयनकक्ष है। वहाँ शक्ति को जगा कर करना पड़ता है। हरेक चक्र के साथ विभिन्न अंग जुड़े हैं। वैसे तो मूलाधार के साथ भी गुदामार्ग जुड़ा है, पर वह स्वाधिष्ठान से भी जुड़ा है। मुझे लगता है कि मूलाधार वाले सभी काम स्वाधिष्ठान चक्र भी कर लेता है। जागृति का स्थान मस्तिष्क है, इसलिए स्वाभाविक है कि शक्ति मस्तिष्क से जितना ज्यादा दूर होगी, वह वहाँ उतनी ही ज्यादा सोई हुई होगी। शास्त्रों में नाभि चक्र को यज्ञ कुंड भी कहा जाता है जहाँ भोजन रूपी आहुति जलती रहती है। इसका यह मतलब नहीं कि बाहरी या भौतिक स्थूल यज्ञ की जरूरत नहीं। दरअसल बाहरी यज्ञ भीतरी कुंडलिनी यज्ञ को प्रेरित भी करता है। समारोह आदि में भौतिक हवन यज्ञ करते हुए मुझे कुंडलिनी की क्रियाशीलता महसूस होती है। हाँ इतना जरूर किया जा सकता है कि भौतिक यज्ञ के नाम पर भौतिक संसाधनों का बेवजह दुरुपयोग न हो।

शक्ति नीचे से ऊपर चढ़ती है, पर अवचेतन मन का निवास मूलाधार और स्वाधिष्ठान पर होने के कारण वह सहस्रार से नीचे जाते हुए दिखाई गई है

मूलाधार में कपिल मुनि का आश्रम मतलब वहाँ मूलाधर चक्र का पवित्र अधिष्ठाता देवता है। उसे अपशब्द कहना मतलब मूलाधार को अपवित्र मानना। सगर का साठ हजार पुत्र उसे ढूंढने भेजना मतलब आदमी द्वारा अपनी खोई हुई शक्ति अर्थात इन्द्रिय शक्ति अर्थात कुंडलिनी शक्ति को प्राप्त करने के लिए हजारों इच्छाओं व भावनाओं को खुले छोड़ देना मतलब संसार में हर तरफ अपना डंका बजाने की कोशिश करना। शास्त्र कहते हैं कि जैसे जंगल में भटकने वाले को जल्दी रत्न मिल जाता है, उसी तरह दुनिया में भटकने वाले को जल्दी ही मूलाधार और उसमें सोई शक्ति मिल जाती है। यह बहुत बड़ी शिक्षा है, जिसके अनुसार दुनिया में भटकते हुए थकने के बाद आदमी बाह्य इन्द्रियों से ऊबकर अवचेतन मन में डूबने लगता है। पर यह तभी होता है अगर आदमी अद्वैत व अनासक्ति के साथ दुनिया में जीवनयापन कर रहा हो, नहीं तो दुनिया के लोग उसका अवचेतन मन में भी पीछा नहीं छोड़ते और उसे वहाँ से भी बाहर खींच लाते हैं और उसे ध्यानसाधना नहीं करने देते। इससे साफ है कि आम आदमी को आध्यात्मिक तरक्की के लिए अद्वैत और अनासक्ति का भाव बना के रखना बहुत ज्यादा जरूरी है। जैसे इस कथा में पाताल समुद्र से नीचे है और समुद्र से होकर ही वहाँ तक रास्ता जाता है, उसी तरह मूलाधार चक्र भी सभी दुनियावी (शास्त्रों में संसार को भी समुद्र कहा गया है) चक्रोँ के नीचे है, और पाताल की तरह ही सुषुप्त लोक जैसा है। तभी तो अवचेतन कह रहे इसको। वहाँ मुनि कपिल को देखना मतलब सांख्ययोग व जैन धर्म के मूल प्रवर्तक को ध्यान रूप में देखना। जैनी मुनि भी दिगंबर अर्थात नग्न अवस्था में रहते हैं। मुनि को अपशब्द कहते हुए उन पर चोरी का इल्जाम लगाना मतलब उनको पता चलना कि इस ध्यान चित्र ने ही शक्ति को नीचे खींच कर अपने पास कैद किया है। किसी चीज का अपमान करके आदमी उससे भरपूर फायदा नहीं उठा सकता।अगर मूलाधार को छि-छि करते रहोगे, तो उस पर कुंडलिनी छवि का ध्यान करके उसे जगाओगे कैसे। उस छवि पर ही अगर ऐसा इल्जाम लगाओगे कि इसने मेरी सारी शक्ति छीन ली है, तो उसे और शक्ति कैसे दोगे। अतिरिक्त या अन्यूजड शक्ति तो उसमें जाएगी ही, अनजाने में और वहाँ सुषुप्त पड़ी रहेगी। वह शक्ति वहाँ तभी अवचेतन मन को उघाड़ पाएगी, यदि उसे ऐसा करने का मौका दोगे और उसके साथ सहयोग करोगे। तभी तो आपने देखा होगा कि सेक्सी किस्म के लोग बहुत गहराई से देखने और सोचने वाले होते हैं। यह इसलिए क्योंकि उनके मन में ज्यादा कचरा नहीं होता। वे अपनी मूलाधार स्थित यौन शक्ति से मन के कचरे को लगातार साफ करते रहते हैं, और दूसरी तरफ साफसुथरे होने का और यौनता से दूरी रखने का दिखावा करने वाले अंदर से अवचेतन मन के कचरे से भरे होते हैं। सेक्सी आदमी स्पष्टवादी और तेज दिमाग लिए होते हैं। उनका ध्यान शरीर के दूसरे क्षेत्रों की बजाय मूलाधार क्षेत्र में ज्यादा टिका होता है। हालांकि चेहरा और मूलाधार आपस में जुड़े होते हैं। मुनि की दृष्टि रूपी क्रोधाग्नि से उन साठ हजार पुत्रों का भस्म होना मतलब मन के सभी विचारों और भावनाओं का मूलाधार में शक्ति के साथ सो जाना। मतलब कुंडलिनी शक्ति अवचेतन मन को साथ लेकर सुषुप्तावस्था में चली गई। सगर वंश में कई पीढ़ियों के बाद भागीरथ नामक एक महापुरुष हुआ जो गंगा को लाने में स्मर्थ हुआ जिसने सभी सगरपुत्रों को जीवित करके मुक्त कर दिया मतलब व्यक्ति कई जन्मों के बाद इस काबिल हुआ कि सुषुम्ना को जागृत करके कुंडलिनी जागरण को प्राप्त कर सका जिससे अवचेतन मन (पाताल लोक समतुल्य) में दबे हुए विचार और भावनाएं आनंद, अद्वैत व आनंद के साथ अभिव्यक्त होते गए और ब्रह्म में विलीन होते गए। भागीरथ ने घोर तपस्या की मतलब कुंडलिनी योग किया। ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर वर दिया मतलब कुंडलिनी सहस्रार में क्रियाशील हो गई। सहस्रार चक्र भी कमल की तरह है और ब्रह्मा भी कमल पर बैठते हैं। कैलाश पर रहने वाले शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया मतलब सुषुम्ना नाड़ी में बहती हुई चेतना रेखा सहस्रार में समाहित हो जाती है। सहस्रार चक्र बालों से भरे हुए सिर के अंदर ही होता है। कई जगह सहस्रार को कैलाश पर्वत की उपमा दी जाती है। वह गंगा स्वर्ग लोक से आई मतलब सुषुम्ना में बहती हुई शक्ति से सहस्रार चक्र दिव्यता अर्थात दिव्य लोक के साथ जुड़ जाता है जिसे कुंडलिनी जागरण के दौरान का अनुभव कहते हैं। दरअसल अवचेतन मन का स्थान भी मस्तिष्क ही है, पर क्योंकि वह मुलाधार से ऊपर आती सुषुम्ना-शक्ति से जागता है, इसलिए कहा जाता है कि वह मूलाधार चक्र में शक्ति के साथ सुषुप्तावस्था में फंसा हुआ था। इसी तरह अगर अवचेतन मन को ध्यान लगाकर उघाड़ने लगो तो मूलाधार और सुषुम्ना क्रियाशील होने लगते हैं। मतलब ये तीनों आपस में जुड़े हैं। इसीलिए इस मिथकीय कहानी में कहा गया है कि गंगा मतलब सुषुम्ना शक्ति स्वर्ग मतलब जागृति के सर्वव्यापी व सर्वानन्दमयी अनुभव से कैलाश मतलब मस्तिष्क को आई, वहाँ से नीचे हिमालय मतलब रीढ़ की हड्डी से उतरते हुए महासागर अर्थात दुनिया अर्थात विभिन्न चक्रोँ से गुजरते हुए पाताल लोक मतलब मूलाधार चक्र में पहुंची। होता उल्टा है दरअसल, मतलब शक्ति नीचे से ऊपर चढ़ती है। फिर कहते हैं कि भागीरथ गंगा के साथ-साथ चलता रहा, और जहाँ भी उसका मार्ग अवरुद्ध हो रहा था, वहाँ-वहाँ वह उस अवरोध को हटा रहा था। यह ऐसे ही है जैसे आदमी बारीबारी से चक्रोँ पर ध्यान लगाते हुए शक्ति के अवरोधों को दूर करता है। चक्र-ब्लॉक ही वे अवरोधन हैं। तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय भगोड़े इस्लामिक विद्वान और आतंकवाद के आरोपों से घिरे जाकिर नईक जैसे लोगों को यह ब्लॉग जरूर फॉलो करना चाहिए, क्योंकि वह हिंदु शास्त्रों के मिथकीय पक्ष को तो उजागर करके दुष्प्रचार से उन्हें बदनाम करने की कोशिश करते हैं, पर उनके वैज्ञानिक पक्ष से अपरिचित हैं।

कुंडलिनी योग दर्शन को दर्शाती कार्टून फ़िल्म राया एंड द लास्ट ड्रेगन

सभी को श्री गुरु नानकदेव के प्रकाश पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं

दोस्तों, मैं पिछली पोस्टों में ड्रेगन के कुंडलिनी प्रभावों के बारे में बात कर रहा था। इसी कड़ी में मुझे एनीमेशन मूवी राया एंड द लास्ट ड्रेगन देखने का मौका मिला। इसमें मुझे एक सम्पूर्ण योगदर्शन नजर आया। अब यह पता नहीं कि क्या इस फ़िल्म को बनाते समय योगदर्शन की भी किसी न किसी रूप में मदद ली गई या मुझे ही इसमें नजर आया है। जहाँ तक मैंने गूगल पर सर्च किया तो पता चला कि दक्षिण पूर्वी एशियाई (थाईलैंड आदि देश) जनजीवन से इसके लिए प्रेरणा ली गई है, किसी योग वगैरह से नहीं। थाईलैंड में वैसे भी योग काफी लोकप्रिय हो गया है। इसमें एक ड्रेगन शेप की नदी या दुनिया होती है। उसमें एक हर्ट नामक कुमान्द्रा लैंड होती है। वहाँ सब मिलजुल कर रहते हैं। हर जगह ड्रेगन्स का बोलबाला होता है। ड्रेगन सबको ड्रन अर्थात बवंडर नामक पापी राक्षस से बचाती है। ड्रन लोगों की आत्मा को चूसकर उन्हें निर्जीव पत्थर बना देते हैं। ड्रेगन उन ड्रन राक्षसों से लड़ते हुए नष्ट हो जाती हैं। फिर पांच सौ साल बाद वे ड्रन फिर से हमला कर देते हैं। हर्ट लैंड के पास ड्रेगन का बनाया हुआ रत्न होता है, जो ड्रन से बचाता है। वह पत्थर बने आदमी को तो जिन्दा कर सकता है, पर पत्थर बनी ड्रेगनस को नहीं। दूरपार के कबीले उस रत्न की प्राप्ति के लिए हर्ट लैंड के कबीले से अलग होकर नदी के विभिन्न भागों में बस जाते हैं। उन कबीलों के नाम होते हैं, टेल, टेलन, स्पाइन और फैंग। टेलन ट्राइब ने तो ड्रन से बचने के लिए अपने घर नदी पे बनाए होते हैं। दरअसल पानी में ड्रेगन का असर नहीं होता है, जिससे ड्रन वहाँ नहीं पहुंच पाता। हर्ट कबीले का मुखिया बैंज चाहता है कि सभी कबीले इकट्ठे होकर समझौता कर के फिर से कुमान्द्रा बना ले, जिसमें सभी मिलजुल कर ड्रन से सुरक्षित रहें। इसलिए वह समारोह का आयोजन करता है जिसमें वह सभी कबीलों को बुलाता है। वहाँ फैंग कबीले का एक बच्चा बैंज की बेटी राया को धोखा देकर सभी कबीलों के लोगों को रत्न तक पहुंचा देती है। वे सभी रत्न के लिए आपस में लड़ने लगते हैं। इससे रत्न पांच टुकड़ों में टूट जाता है। हरेक कबीले के हाथ एक-एक टुकड़ा लगता है। रत्न के टूटने से ड्रन सब पर हमला कर देता है। सब जान बचाने को इधर-उधर भागते हैं। बैंज भी पुल पर खड़े होकर रत्न का टुकड़ा अपनी बेटी को देकर यह कहते हुए उसे नदी में धक्का देता है कि वह कुमान्द्रा बना ले और वह खुद ड्रन के हमले से पत्थर बन जाता है। छः सालों बाद राया नदी का किनारा ढूंढने किश्ती में जा रही होती है ताकि अंतिम ड्रेगन सिसू कहीं मिल जाए। उसे वह रेगिस्तान जैसे टेल कबीले के नजदीक अचानक मिलती है। सिसू उसे बताती है कि वह रत्न उसके भाई बहिनों ने बनाकर उसे सौम्पा था, उसपर विश्वास करके। वह पाती है कि जब वह एक टुकड़ा रखती है तो वह अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकती है। हरेक टुकड़ा उसकी अलग किस्म की शक्ति को क्रियाशील करता है। वह सिसू की मदद से वहाँ के मंदिर में रत्न का दूसरा टुकड़ा ढूंढ लेती है। इससे सिसू ड्रेगन को आदमी के रूप में आने की शक्ति मिल जाती है। फिर फैंग कबीले से बचते हुए वे स्पाइन कबीले में पहुंचते हैं। इस यात्रा में राया को पांच छः दोस्त भी मिल जाते हैं, जिनमें कोई तो बच्चे की तरह तो कोई बंदर की तरह और कोई मूर्ख जैसा होता है, हालांकि सभी ताकतवर होते हैं। शक्तिशाली फैंग कबीले की राजकुमारी नमारी से सिसू लड़ना नहीं चाहती, और उसे तोहफा देकर समझाना चाहती है। जब सिसू उसे रत्न के टुकड़े दिखा रही होती है, तब नमारी धोखे से उसपर तीरकमान साध लेती है। डर के मारे राया उसपर जैसे ही तलवार से हमला करने लगती है, वह वैसे ही तीर चला देती है, जिससे सिसू मरकर नदी में गिर जाती है। सारा पानी सूखने लगता है और ड्रन के हमले एकदम से बढ़ जाते हैं। राया के सभी दोस्त और नमारी भी अपने-अपने रत्न के टुकड़े से ड्रन को भगाने लगते हैं, पर कब तक। वे टुकड़े भाप में गायब हो रहे होते हैं। तभी राया को सिसू की बात याद आती है कि रत्न के टुकड़े जोड़ने के लिए विश्वास भी जरूरी है। इसलिए वह नमारी को रत्न का टुकड़ा थमाती है, और खुद पत्थर बन जाती है। राया को देखकर उसके दोस्त भी नमारी को टुकड़े सौम्प कर खुद पत्थर बन जाते हैं। अंत में नमारी भी अपना टुकड़ा उनमें जोड़कर खुद भी पत्थर बन जाती है। रत्न पूरा होने पर चारों ओर प्रकाश छा जाता है, राया के पिता बैंज समेत सभी पत्थर बने लोग जिन्दा हो जाते हैं। सभी पत्थर बनी ड्रेगन्स भी जिन्दा हो जाती हैं। कुमान्द्रा वापिस लौट आता है, और सभी लोग फिर से मिलजुल कर रहने लगते हैं।

राया एन्ड द लास्ट ड्रेगन का कुंडलिनी-आधारित स्पष्टीकरण

यह चाइनीस ड्रेगन कम और कुंडलिनी तंत्र वाला नाग ज्यादा है। यही सुषुम्ना नाड़ी है। मैं पिछली एक पोस्ट में बता रहा था कि दोनों एक ही हैं, और कुंडलिनी शक्ति को रूपांकित करते हैं। वह रीढ़ की हड्डी जैसे आकार का है, और पानी में मतलब स्पाइनल कॉर्ड के सेरेबरोस्पाइनल फ्लूड में रहता है। मेरुदण्ड में कुंडलिनी शक्ति के प्रवाह से ड्रन-रूपी या पापरूपी बुरे विचार दूर रहते हैं। कुमान्द्रा वह देह-देश है, जिसमें सभी किस्म के भाव अर्थात लोग मिलजुल कर रहते हैं। विभिन्न चक्र ही विभिन्न कबालई क्षेत्र हैं, और उन चक्रोँ पर स्थित विभिन्न मानसिक भाव व विचार ही विभिन्न कबालई लोग हैँ। कुमान्द्रा दरअसल कुंडलिनी योग की अवस्था है, जिसमें सभी चक्रोँ पर कुंडलिनी शक्ति अर्थात ड्रेगन को एकसाथ घुमाया जाता है। हरेक चक्र के योगदान से इस कुंडलिनी शक्ति से एक कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र चमकने लगता है। यह कभी किसी चक्र पर तो कभी किसी दूसरे चक्र पर प्रकट होता रहता है। यही वह रत्न है जो द्वैत रूपी ड्रन से बचाता है। आदमी ने उस कुंडलिनी चित्र को केवल अपने हृदय में धारण किया हुआ था। मतलब आदमी साधारण राजयोगी की तरह था, तांत्रिक कुंडलिनी योगी की तरह नहीं। इससे हर्ट लैंड के लोग मतलब हृदय की कोशिकाएं तो शक्ति से भरी थीं, पर अन्य चक्रोँ से संबंधित अंग शक्ति की कमी से जूझ रहे थे। इसलिए स्वाभाविक है कि वे हर्ट कबीले से शक्तिस्रोत रत्न को चुराने का प्रयास कर रहे थे। एकबार हर्टलैंड के मुखिया बैंज मतलब जीवात्मा ने सभी लोगों को दावत पे बुलाया मतलब सभी चक्रोँ का सच्चे मन से ध्यान किया। पर उन्होंने मिलजुल कर रहने की अपेक्षा छीनाझपटी की और रत्न को तोड़ दिया, मतलब कि आदमी ने निरंतर के तांत्रिक कुंडलिनी योग के अभ्यास से सभी चक्रोँ को एकसाथ कुंडलिनी शक्ति नहीं दी, सिर्फ एकबार ध्यान किया या सिर्फ साधारण अर्थात अल्पप्रभावी कुंडलिनी योग किया। इससे स्वाभाविक है कि शक्ति तो चक्रोँ के बीच में बंट गई, पर कुंडलिनी चित्र गायब हो गया, मतलब वह निराकार शक्ति के रूप में सभी पांचोँ मुख्य चक्रोँ पर स्थित हो गया अर्थात रत्न पांच टुकड़ों में टूट गया और एक टुकड़ा हरेक कबीले के पास चला गया। इस शक्ति से सभी चक्रोँ के लोग जिन्दा तो रह सके थे, पर अज्ञान रूपी ड्रन से पूरी तरह से सुरक्षित नहीं थे, क्योंकि रत्न रूपी सम्पूर्ण कुंडलिनी चित्र नहीं था। अज्ञान से तो ध्यान-चित्र रूपी रत्न ही बचाता है। ध्यान-चित्र अर्थात रत्न के छिन जाने से बैंज नामक आत्मा तो अज्ञान के अँधेरे में डूब गई मतलब वह मर गया, पर उसने बेटी राया मतलब बुद्धि को बचीखुची कुंडलिनी शक्ति का प्रकाश मतलब रत्न का टुकड़ा देकर कहा कि वह शरीर-रूपी दुनिया में पुनः कुमान्द्रा मतलब अद्वैतवाद अर्थात मेलजोल स्थापित करे। राया मतलब बुद्धि फिर पानी मतलब सेरेबरोस्पाइनल फ्लूड या मेरुदण्ड के ध्यान में छलांग लगा देती है, जहाँ कुंडलिनी शक्ति मतलब सिसू ड्रेगन के प्रभाव से वह ड्रन से बच जाती है। दरअसल चक्रोँ के ध्यान को ही ध्यान कहते हैं। चक्र पर ध्यान को आसान बनाने के लिए बाएं हाथ से चक्र को स्पर्ष कर के रखा जा सकता है, क्योंकि दायां हाथ तो प्राणायाम के लिए नाक को स्पर्ष किए होता है। इससे खुद ही कुंडलिनी चित्र का ध्यान हो जाता है। यही हठयोग की विशिष्टता है। राजयोग में ध्यान-चित्र का ध्यान जबरदस्ती और मस्तिष्क पर बोझ डालकर करना पड़ता है, जो कठिन लगता है। जैसे चक्र का ध्यान करने से खुद ही ध्यानचित्र का ध्यान होने लगता है, उसी तरह मेरुदण्ड में स्थित नागरूपी सुषुम्ना नाड़ी का ध्यान करने से भी कुंडलिनी चित्र का ध्यान खुद ही होने लगता है। स्पर्ष में बड़ी शक्ति है। सुषुम्ना का स्पर्ष पीठ की मालिश करवाने से होता है। ऐसे बहुत से आसन हैं, जिनसे सुषुम्ना पर दबाव का स्पर्ष महसूस होता है। जो कुर्सी पूरी पीठ को अच्छे से स्पर्ष करके भरपूर सहारा देती है, वह इसीलिए आनंददायी लगती है, क्योंकि उस पर सुषुम्ना क्रियाशील रहती है। जो मैं ओरोबोरस सांप वाली पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे एकदूसरे के सहयोग से पुरुष और स्त्री दोनों ही अपने शरीर के आगे वाले चैनल में स्थित चक्रोँ के रूप में अपने शरीर के स्त्री रूप वाले आधे भाग को क्रियाशील करते हैं, वह सब स्पर्श का ही कमाल है। राया को उस नदी अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में ड्रेगन रूपी शक्ति का आभास होता है, इसलिए वह उसकी खोज में लग जाती है। उसे वह टेल आईलैंड में छुपी हुई मतलब उसे शक्ति मूलाधार चक्र में निद्रावस्था में मिल जाती है। उस ड्रेगन रूपी कुंडलिनी शक्ति की मदद से वह रत्न के टुकड़ों को मतलब कुंडलिनी चित्र को उपरोक्त टापुओं पर मतलब शक्ति के अड्डों पर मतलब चक्रोँ पर ढूंढने लगती है। एक टुकड़ा तो उसके पास दिल या मन या आत्मा या सहस्रार रूपी बैंज का दिया हुआ है ही, सदप्रेरणा के रूप में। आत्मा दिल या मन में ही निवास करती है। दूसरा टुकड़ा उसे टेल आईलैंड के मंदिर मतलब मूलाधार चक्र पर मिल जाता है। इससे ड्रेगन मानव रूप में आ सकती है, मतलब वीर्यबल से कुंडलिनी शक्ति पूरी सुषुम्ना नाड़ी में फैल गई, जो एक फण उठाए नाग या मानव की आकृति की है। टेलन द्वीप के लोग पानी के ऊपर रहते हैं, मतलब फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र के बॉडी सेल्स तरल वीर्य से भरे प्रॉस्टेट के ऊपर स्थित होते हैं। फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र एक पुल जैसे नाड़ी कनेक्शन से रियर स्वाधिष्ठान चक्र से जुड़ा होता है। इसे ही टेलन द्वीप के लोगों का नदी के बीच में बने प्लेटफॉर्म आदि पर घर बना कर रहना बताया गया है। इसी नदी जल रूपी तरल वीर्य की शक्ति से इस द्वीप रूपी चक्र पर ड्रन रूपी अज्ञान या निकम्मेपन का प्रभाव नहीं पड़ता। पुल से गुजरात राज्य के मोरबी का पुल हादसा याद आ गया। हाल ही में एक लोकप्रिय हिंदु मंदिर से जुड़े उस झूलते पुल के टूटने से सौ से ज्यादा लोग नदी में डूब कर मर गए। उनमें ज्यादातर बच्चे थे। सबसे कम आयु का बच्चा दो साल का बताया जा रहा है। टीवी पत्रकार एक ऐसे छोटे बच्चे के जूते दिखा रहे थे, जो नदी में डूब गया था। जूते बिल्कुल नए थे, और उन पर हँसते हुए जोकर का चित्र था। बच्चा अपने नए जूते की खुशी में पुल पर आनंद में खोया हुआ कूद रहा होगा, और तभी उसे मौत ने अपने आगोश में ले लिया होगा। मौत इसी तरह दबे पाँव आती है। इसीलिए कहते हैं कि मौत को और ईश्वर को हमेशा याद रखना चाहिए। दिल को छूने वाला दृश्य है। जो ऐसे हादसों में बच जाते हैं, वे भी अधिकांशतः तथाकथित मानसिक रूप से अपंग से हो जाते हैं। मैं जब सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ता था, तब हमें अंग्रेजी विषय पढ़ाने एक नए अध्यापक आए। वे शांत, गंभीर, चुपचाप, आसक्ति-रहित, और अद्वैतशील जैसे रहते थे। कुछ इंटेलिजेंट बच्चों को तो उनके पढ़ाने का तरीका धीमा और पिछड़ा हुआ लगा पहले वाले अध्यापक की अपेक्षा, पर मुझे बहुत अच्छा लगा। सम्भवतः मैं उनके तथाकथित आध्यात्मिक गुणों से प्रभावित था। प्यार से देखते थे, पर हँसते नहीं थे। कई बार कुछ सोचते हुए कहा करते थे कि कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए, इस जीवन में क्या रखा है आदि। बाद में सुनने में आया कि जब वे अपने पिछले स्कूल में स्कूल का कैश लेके जा रहे थे, तब कुछ बदमाशों ने उनसे पैसे छीनकर उन्हें स्कूटर समेत सड़क के पुल से नीचे धकेल दिया था। वहाँ वे बेहोश पड़े रहे जब उनकी पत्नि ने उन्हें ढूंढते हुए वहाँ से अस्पताल पहुंचाया। डरे हुए और मजबूर आदमी के तरक्की के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, यहाँ तक कि उसकी पहले की की हुई तरक्की भी नष्ट होने लगती है। बेशक वह पिछली तरक्की के बल पर आध्यात्मिक तरक्की जरूर कर ले। पर पिछली तरक्की का बल भी कब तक रहेगा। हिन्दुओं को पहले इस्लामिक हमलावरों ने डराया, अब पाकिस्तान पोषित इस्लामिक आतंकवाद डरा रहा है। तथाकथित ख़ालिस्तानी आतंकवाद भी इनमें एक है। जिस धर्म के लोगों और गुरुओं ने मुग़ल हमलावरों से हिंदु धर्म की रक्षा के लिए हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे, आज उन्हींके कुछ मुट्ठी भर लोग तथाकथित हिंदुविरोधी खालिस्तान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, बाकि अधिकांश लोग भय आदि के कारण चुप रहते हैं, क्योंकि बहुत से बोलने वालों को या तो जबरन चुप करवा दिया गया या मरवा दिया गया। अगर विरोध में थोड़ा-थोड़ा सब स्वतंत्र रूप से बोलें, तो आतंकवादी किस किस को मारेंगे। सूत्रों के अनुसार कनाडा उनका मुख्य अड्डा बना हुआ है। अभी हाल ही में हिन्दूवादी शिवसेना के नेता सुधीर सूरी की तब गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वे देव मूर्तियों को कूड़े में फ़ेंके जाने का विरोध करने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार इसके तार भी पाक-समर्थित खालिस्तान से जुड़े बताए जा रहे हैं। तथाकथित हिंदु विचारधारा वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता गगनेजा हो या रवीन्द्र गोसाईं, इस अंतर्राष्ट्रीय साजिश के शिकार लोगों की सूचि लंबी है। गहराई से देखने पर तो यह लगता है कि हिंदु ही हिंदु से लड़ रहे हैं, उकसाने और साजिश रचने वाले तथाकथित बाहर वाले होते हैं। हाँ, अब पोस्ट के मूल विषय पर लौटते हैं। आपने भी देखा ही होगा कि कोई चाहे कैसा ही क्यों न हो, किसी न किसी बहाने सम्भोग की तरफ आकर्षित हो ही जाता है, ताकि अपनी ऊर्जा को बढ़ा सके, मतलब यहाँ निकम्मापन नहीं पनपता। तीसरा टुकड़ा उसे स्पाइन ट्राईब अर्थात मेरुदण्ड में मिला, सुषुम्ना में उठ रही संवेदना के रूप में। मेरुदण्ड स्थित कुंडलिनी शक्ति अर्थात सिसू ड्रेगन को कुंडलिनी चित्र चक्रोँ से मिला होता है, जैसा कि शिवपुराण में आता है कि ऋषिपत्नियों (चक्रोँ) ने अपने वीर्य तेज को हिमालय (मेरुदण्ड) को दिया। इसीको सिसू कहती है कि उसे रत्न के टुकड़े उसके भाई-बहिनों ने दिए, जो इन विभिन्न टापुओं पर रहते थे। हरेक चक्र से मिली कुंडलिनी चित्र रूपी चिंतन शक्ति से सिसू रूपी कुंडलिनी शक्ति मजबूती प्राप्त करती है, और अपने मस्तिष्क में अर्थात आदमी के मस्तिष्क में (क्योंकि फन उठाए नाग का मस्तिष्क ही आदमी का मस्तिष्क है) एक विशेष शक्ति और उससे एक नया सकारात्मक रूपांतरण महसूस करती है। इसको उपरोक्त मिथक कथा में ऐसे कहा है कि हरेक रत्न का टुकड़ा प्राप्त करने से वह एक विशेष नई शक्ति प्राप्त करती है। राया और सिसू फैंग कबीले से बचते हुए स्पाइन कबीले में पहुंचते हैं, मतलब अवेयरनेस या बुद्धि और कुंडलिनी शक्ति आगे के चक्रोँ से ऊपर नहीं चढ़ती, अपितु पीछे स्थित रीढ़ की हड्डी से ऊपर चढ़ती है। यह इसलिए कहा गया है क्योंकि फैंग मतलब मुंह का नुकीला दाँत आगे के चक्रोँ के रास्ते में ही आता है। इस यात्रा में उसे चार-पांच मददगार दोस्त मिल जाते हैं, मतलब पाँच प्राण और मांसपेशियों की ताकत जो कि कुंडलिनी शक्ति को घुमाने में मदद करते हैं। फैंग आईलैंड में वे पीछे से मतलब पीछे के विशुद्धि चक्र से प्रविष्ट होती हैं। वह इसलिए क्योंकि कुंडलिनी शक्ति को विशुद्धि चक्र से ऊपर चढ़ाना सबसे कठिन है, इसलिए वह आगे की तरफ फ़िसलती है। वहाँ राजकुमारी निमारी मतलब बीमारी मतलब कमजोरी या अंधभौतिकता उसे मार देती है, मतलब उसे वापिस हटने पर मजबूर करती है, और वह नदी में गिर जाती है, मतलब मेरुदण्ड के फ्लूड में बहती हुई वापिस नीचे चली जाती है। उससे बवंडर ताकतवर होकर लोगों को मारने लगते हैं, मतलब चक्रोँ में फँसी भावनाओं को बाहर निकलने का मौका न देकर वहीं उन्हें पत्थर अर्थात शून्य अर्थात बेजान बनाने लगते हैं। चक्र भी बवंडर की तरह गोलाकार होते हैं। सिसू नमारी से लड़ना नहीं चाहती मतलब जब कुंडलिनी शक्ति विशुद्धि चक्र को लांघ कर ऊपर चढ़ने लगती है, तब मन की लड़ाई-झगड़े वाली सोच नष्ट हो जाती है। मन का सतोगुण बढ़ा हुआ होता है। वह नमारी को तोहफा देना चाहती है मतलब उसे कुछ मिष्ठान्न आदि खिलाकर। वैसे भी मुंह में कुछ होने पर कुंडलिनी सर्कट कम्प्लीट हो जाता है, जिससे कुंडलिनी आसानी से घूमने लगती है। पर हुआ उल्टा। उस तोहफे से कुंडलिनी की मदद करने की बजाय वह दुनियादारी के दोषों जैसे गुस्से, लड़ाई व अति भौतिकता आदि को बढ़ाने लगी। इससे तो कुंडलिनी शक्ति नष्ट होगी ही। इसको ऐसे दिखाया गया है कि सिसू तीर लगने से मरकर नदी में गिर जाती है, मतलब शक्ति फिर सेरेबरोस्पाइनल द्रव से होती हुई मेरुदण्ड में वापिस नीचे चली जाती है। इससे फिर से ड्रन के हमले शुरु हो जाते हैं। इससे शक्ति की कमी से टुकड़ों में बंटे कुंडलिनीचित्र रूपी रत्न से वे बवंडर से बचने की कोशिश करते हैं, पर शक्ति के बिना कब तक कुंडलिनी चित्र बचा पाएगा। कुंडलिनी चित्र अर्थात ध्यान चित्र को शक्ति से ही जान और चमक मिलती है, और शक्ति को कुंडलिनी चित्र से। दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। इससे वह मेडिटेशन चित्र भी धूमिल पड़ने लगता है। इससे राया मतलब बुद्धि को याद आता है कि आपसी सौहार्द और विश्वास से ही सीसू मतलब शक्ति ने वह कुंडलिनी रत्न प्राप्त किया था। इसलिए वह अपना रत्न भाग नमारी मतलब दुनियादारी या भौतिकता को दे देती है। सभी अंग और प्राण बुद्धि का ही अनुगमन करते हैं, इसलिए उसके सभी दोस्त मतलब प्राण भी जिन्होंने विभिन्न चक्रोँ से कुंडलिनी भागों को कैपचर किया है, वे भी अपनेअपने रत्नभाग नमारी को दे देते हैं। नमारी भी अपना टुकड़ा उसमें जोड़ देती है, मतलब वह भी पूरी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए दुनियादारी में अनासक्ति और अद्वैत के साथ व्यवहार करने लगती है। इससे वह रत्न पूरा जुड़ जाता है मतलब अद्वैत की शक्ति से कुंडलिनी चित्र आनंद और शांति के साथ पूरा चमकने लगता है। इससे चक्रोँ में दबी हुई भावनाएँ फिर से प्रकट होकर आत्मा के आनंद में विलीन होने लगती हैं, मतलब बवंडर द्वारा पत्थर बनाए लोग फिर से जिन्दा होकर आनंद मनाने लगते हैं। सुषुम्ना की शक्ति भी उस चित्र की मदद से जागने लगती है। सुषुम्ना नाड़ी के साथ ही शरीर की अन्य सभी नाड़ियों में भी अवेयरनेस दौड़ने लगती है, मतलब उनमें दौड़ती हुई शक्ति की सरसराहट आनंद के साथ महसूस होने लगती है। इसको ऐसे कहा गया है कि फिर पत्थर बनी सभी ड्रेगन भी जिन्दा हो जाती हैं। वे ड्रेगन पूरे कुमान्द्रा में खुशहाली और समृद्धि वापिस ले आती है। क्योंकि शरीर भी एक विशाल देश की तरह ही है, जिसमें शक्ति ही सबकुछ करती है। हरेक नाड़ी में आनंदमय शक्ति के दौड़ने से पूरा शरीर खुशहाल, हट्टाकट्टा और तंदुरस्त तो बनेगा ही। इससे पहले रत्न के टुकड़े पत्थर बने लोगों को तो जिन्दा कर पा रहे थे पर पत्थर बनी ड्रेगनों को नहीं। इसका मतलब है कि धुंधले कुंडलिनी चित्र से चक्रोँ में दबी भावनाएँ तो उभरने लगती हैं, पर उससे सरसराहट के साथ चलने वाली शक्ति महसूस नहीं होती। शक्तिशाली नाग के रूप में सरसराहट करने वाली कुण्डलिनी शक्ति मानसिक कुंडलिनी छवि का ही अनुसरण करती है। इसके और आगे, तांत्रिक यौन योग इस शक्ति को और ज्यादा मजबूती प्रदान करता है। महाराज ओशो भी यही कहते हैं। मतलब कि शक्ति चक्रोँ पर विशेषकर मूलाधार चक्र में सोई हुई अवस्था में रहती है। इसका प्रमाण यह भी है कि यदि आप मन में नींद-नींद का उच्चारण करने लगो, तो कुंडलिनी शक्ति के साथ कुंडलिनी चित्र स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर महसूस होने लगेगा, नाभि चक्र में भी अंदर की ओर सिकुड़न महसूस होगी। साथ में रिलेक्स फील भी होता है, असंयमित विचारों की बाढ़ शांत हो जाती है, मस्तिष्क में दबाव एकदम से कम होता हुआ महसूस होता है, और सिरदर्द से भी राहत मिलती है। यह तकनीक उनके लिए बहुत फायदेमंद है जिनको नींद कम आती हो या जो तनाव में रहते हैं।

निद्रा देवी ही नींद की अधिष्ठात्री है। “श्री निद्रा है” मंत्र मैंने डिज़ाइन किया है। श्री से शरीरविज्ञान दर्शन का अद्वैत अनुभव होता है, जिससे कुंडलिनी मस्तिष्क में कुछ दबाव बढ़ाती है, निद्रा से वह कुंडलिनी दबाव के साथ निचले चक्रोँ में उतर जाती है, है से आदमी सामान्य स्थिति में लौट आता है। अगर योग करते हुए मस्तिष्क में दबाव बढ़ने लगे, तब भी यह उपाय बहुत कारगर है। दरअसल योग के लिए नींद भी बहुत जरूरी है। जागृति नींद के सापेक्ष ही है, इसलिए नींद से ही मिल सकती है। जो जबरदस्ती ही हमेशा ही सतोगुण को बढ़ा के रखकर जागे रहने का प्रयास करता है, वह कई बार मुझे ढोंग लगता है, और उससे आध्यात्मिक जागृति प्राप्त होने में मुझे संदेह है। इसी तरह किताब में पढ़ते समय मुझे लगता था कि शाम्भवी मुद्रा पता नहीं कितनी बड़ी चमत्कारिक विद्या है, क्योंकि लिखा ही ऐसा होता था। लेखन इसलिए होता है ताकि कठिन चीज सरल बन सके, न कि उल्टा। सब कुछ सरल है यदि व्यावहारिक ढंग से समझा जाए। नाक पर या नासिकाग्र पर नजर रखना कुंडलिनी शक्ति को केंद्रीकृत कर के घुमाने के लिए एक आम व साधारण सी प्रेक्टिस है। एकसाथ दोनों आँखों से बराबर देखने से आज्ञा चक्र पर भी ध्यान चला जाता है, यह भी साधारण अभ्यास है। जीभ को तालू से ज्यादा से ज्यादा पीछे छुआ कर रखना भी एक साधारण योग टेक्टिक है। इन तीनों तकनीकों को एकसाथ मिलाने से शाम्भवी मुद्रा बन जाती है, जिससे तीनों के लाभ एकसाथ और प्रभावी रूप से मिलते हैं। इसीलिए जीवन संतुलित होना चाहिए ताकि उसमें पूरे शरीर का बराबर योगदान बना रहे, और शरीर कुमान्द्रा अर्थात संतुलित बना रहे। संतुलन ही योग है। इसी तरह रत्न के टुकड़े लोगों का ड्रन से स्थायी बचाव नहीं कर पा रहे थे। यह राजयोग वाला उपाय है, जिसमें केवल मन या दिल में कुंडलिनी चित्र का ध्यान किया जाता है, हठयोग के योगासन व प्राणायाम आदि के रूप में पूरी योगसाधना नहीं की जाती। इसलिए जबतक कुंडलिनी चित्र का ध्यान किया जाता है तब तक तो वह बना रहता है, पर जैसे ही ध्यान हटाया जाता है, वैसे ही वह एकदम से धूमिल पड़ जाता है। यही बैंज कबीले वाला स्थानीय उपाय है। इससे मन या हृदय में तो ड्रन से बचाव होता है, पर अन्य चक्रोँ पर लोगों के पत्थर बनने के रूप में भावनाएँ दबती रहती हैं। इसलिए सम्पूर्ण, सार्वकालिक व सार्वभौमिक उपाय हठयोग के साथ यथोचित दुनियादारी ही है, राजयोग मतलब खाली बैठकर केवल ध्यान लगाना नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि हठयोग में पूरे शरीर का और बाहरी संसार का यथोचित इस्तेमाल होता है। संसार में भी पूरे शरीर का इस्तेमाल होता है, केवल मन व दिल का ही नहीं। हालांकि प्रारम्भिक तौर पर पूर्ण सात्विक राजयोग ही कुंडलिनी चित्र को तैयार करता है, और उसे संभाल कर रखता है। यह ऐसे ही है, जैसे बैंज कबीले के मुखिया ने रत्न को संभाल कर रखा हुआ था। कई लोग हठयोग के आसनों को देखकर बोलते हैं कि यह तो शारीरिक व्यायाम है, असली योग तो मन में ध्यान से होता है। उनका कहने का मतलब है कि मन रूपी चिड़िया बिना किसी आधार के खाली अंतरिक्ष में उड़ती रहती है। पर सच्चाई यह है कि मन रूपी चिड़िया शरीर रूपी पेड़ पर निवास करती है। पेड़ जितना ज्यादा स्वस्थ और फलवान होगा, चिड़िया उतनी ही ज्यादा खुश रहेगी।