कुंडलिनी ही साँसें हैं, साँसें ही कुंडलिनी हैं

मित्रों, पिछले ब्लॉग लेखों में जो लिखा गया है कि ठंडे मौसम में ठंडे जल से नहाने वाली ऋषिपत्नियों अर्थात छः चक्रों ने वीर्यशक्ति को ग्रहण किया, यह मुझे ईसाइयों के बैप्टिसम संस्कार की तरह ही लगता है। बैप्टिसम में भी नंगे शरीर पर ठंडा पानी गिराया जाता है। इससे चक्र खुल जाते हैं, और शक्ति का संचार सुधर जाता है। साथ में, नंगा शरीर होने से मन में एक बालक के जैसा अनासक्ति भाव औऱ अद्वैत छा जाता है। इससे भी शक्ति के संचरण और कुंडलिनी की अभिव्यक्ति में मदद मिलती है। मुझे तो प्रतिदिन नहाते हुए अपने बैप्टिसम के जैसा अनुभव होता है। इससे सिद्ध होता है कि योग और बैप्टिसम के पीछे एक ही सिद्धांत काम करता है। साथ में, छः ऋषिपत्नियों अर्थात छः चक्रों के द्वारा कबूतर बने अग्निदेव से वीर्यतेज ग्रहण करने के बारे में लिखा गया है, वे स्वाधिष्ठान चक्र को छोड़कर शेष छः चक्र भी हो सकते हैं। वह इसलिए क्योंकि खुद स्वाधिष्ठान चक्र तो उस कबूतर बने अग्निदेव का हिस्सा है। सहस्रार में कुंडलिनी से अद्वैत भाव पैदा होता है। चन्द्रमा अद्वैत का प्रतीक है, क्योंकि इसमें प्रकाश और अंधकार दोनों समान रूप में विद्यमान होते हैं। इसीलिए सूर्य को अस्त होते हुए और चन्द्रमा को उदय होते दिखाया गया है। उसी अद्वैत अवस्था के दौरान कुंडलिनी आज्ञा चक्र और फिर हृदय चक्र को उतर जाती है। हृदय चक्र को ही कई योगी असली चक्र मानते हैं। उनका अनुभव है कि आत्मज्ञान व मुक्ति की ओर रास्ता हृदय से जाता है, मस्तिष्क से नहीं। मुझे भी ऐसा कई बार लगता है। प्रेम से जो मुक्ति कही गई है, वह हृदय से ही तो है, क्योंकि प्रेम हृदय में ही बसता है। किसी भी भावनात्मक मनःस्थिति में कुंडलिनी हृदय में विराजमान होती है। विपरीत परिस्थितियों में वह भावनात्मक सदमे और उसके परिणामस्वरूप हृदयाघात से भी बचाती है। इसीलिए तो पशुओं से प्रेम करने को कहा जाता है। पशु का नियंत्रक हृदय है, मस्तिष्क नहीं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वे बोल नहीं सकते। इसलिए उनकी मानसिक विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भावनाप्रधान हृदय ही है। आप भी किसी दिन मौनव्रत धारण करके देख लें। पूरे दिनभर आपकी कुंडलिनी हृदय में रहेगी। मौनव्रत की अपार महिमा है। गाय में हृदय का प्रभाव सभी पशुओं से श्रेष्ठ है, इसीलिए हिंदु धर्म में गाय को बड़ा महत्त्व दिया जाता है। इसीलिए आजकल कॉमिउनिकेशन के नाम से गाय के साथ रहने का चलन बढ़ा है। इससे बढ़ा हुआ रक्तचाप सामान्य हो जाता है, और तनाव से राहत मिलती है। दरअसल ऐसा कुंडलिनी शक्ति के द्वारा अनाहत चक्र पर डेरा लगा लेने से होता है। इसलिए कुंडलिनी योग हमेशा करते रहना चाहिए। बुरे वक्त में कुंडलिनी ही सभी शारीरिक व मानसिक हानियों से बचाती है। कुंडलिनी जागरण की झलक के एकदम बाद बहुत से लोगों को नीचे उतरती हुई कुंडलिनी का ऐसा ही अनुभव होता है। इस तरह कुंडलिनी सभी चक्रों में फैल जाती है। इसीको इस तरह से लिखा गया है कि चन्द्रमा ने शिव को बताया कि कृत्तिकाएँ कार्तिकेय को अपने साथ ले गईं। जो शाख अर्थात इड़ा नाड़ी और वैशाख अर्थात पिंगला नाड़ी से कार्तिकेय अर्थात कुंडलिनी पुरुष का शक्तिमान होना कहा गया है, वह मेरे अपने अनुभव के अनुसार भी है। मुझे तो सुषुम्ना की तरह ही इड़ा और पिंगला से भी अपनी कुंडलिनी सुदृढ़ होती हुई महसूस होती है, बशर्ते कि दोनों नाड़ियाँ साथसाथ या एकदूसरे के निकट रहें। जब ये दोनों संतुलित नहीं होती, तब इनसे कुंडलिनी सहस्रार को नहीं जाती, और अन्य चक्रों पर भी कम ही रहती है, हालांकि शरीर के अंदर या बाहर कहीं भी महसूस होती है। इसलिए वह माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट लूप में कम ही घूम पाती है। हालाँकि उसकी शक्ति तो बढ़ती ही है, पर वह सुस्त व अव्यवस्थित सी रहती है, जिससे आदमी भी वैसा ही रहता है। सम्भवतः इसीलिए कहा जाता है कि कुंडलिनी योग साधना की तकनीक सही होनी चाहिए, बिना तकनीक के हर कहीं ध्यान नहीं लगाना चाहिए। कुंडलिनी माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट लूप में घूमती रहनी चाहिए। आध्यात्मिक समाज में यह बात भी फैली हुई है कि कुंडलिनी इड़ा और पिंगला में नहीं जानी चाहिए। सम्भवतः यह बात अनुभवी व एक्सपर्ट कुंडलिनी योगी के लिए कही गई है। दरअसल आम दुनियादारी में इनके बिना कुण्डलिनी का सुषुम्ना में सीधे प्रवेश करना बहुत कठिन है। इसका मतलब है कुण्डलिनी का ध्यान कहीं पर भी लग जाए, लगा लेना चाहिए। इड़ा और पिंगला में भटकने के बाद वह देरसवेर सुषुम्ना में चली ही जाती है। इसीलिए लौकिक मंदिरों व आध्यात्मिक क्रियाकलापों में कहीं भी ध्यान की पद्धति नहीं दर्शाई होती है। बस मूर्तियों आदि के माध्यम से ध्यान को ही महत्त्व दिया गया होता है। क्रौंच पर्वत की उपमा हमने आज्ञाचक्र को दी। उत्तराखंड में वास्तविक क्रौंच पर्वत भी है। वहाँ भगवान कार्तिकेय का मंदिर है। कहते हैं कि वहाँ से हिमालय के लगभग 80% शिखर साफ नजर आते हैं। वहाँ घना जंगल है, और चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा हुआ है। दरअसल पिंड और ब्रह्मांड में कोई अंतर नहीं है। जो भौतिक रचनाएं इस शरीर में हैं, बाहर भी वे ही हैं अन्य कुछ नहीं। यह अलग बात है कि शरीर में उनका आकार छोटा है, जबकि विस्तृत जगत में बड़ा है। हालांकि आकार सापेक्ष होता है, एब्सोल्यूट या असली नहीँ। यह सिद्धांत पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में विज्ञान की कसौटी पर परख कर साबित किया गया है। मुझे लगता है कि पहले पुराणों की रचना हुई, फिर उनमें दर्शाए गए रूपकात्मक और मिथकीय स्थानों को बाहर के स्थूल जगत में दिखाया गया। इसका एक उद्देश्य धार्मिकता व अध्यात्मिकता को बढ़ावा देना हो सकता है, तो दूसरा उद्देश्य व्यावसायिक व धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना भी हो सकता है। ऐसे नामों के अनगिनत उदाहरण हैं। पुराणों में गंगा सुषुम्ना नाड़ी को कहा गया है, पर लोक में इसे उत्तराखंड से निकलने वाली एक नदी के रूप में दिखाया जाता है। जैसे सुषुम्ना शरीर के बीचोंबीच सफर करती है, उसी तरह गंगा नदी भी भारतीय भूभाग के बीचोंबीच बहती है। जैसे सुषुम्ना पूरे शरीर को मस्तिष्क से जोड़ती है, वैसे ही गंगा नदी पूरे भारतीय भूभाग को हिमालय से जोड़ती है।हिमालय को इसीलिए देश का मस्तक कहा जाता है। कैलाश रूपी सहस्रार भी मस्तक में ही होता है। गंगा में स्नान से मुक्ति प्राप्त होने का अर्थ यही है कि सुषुम्ना नाड़ी में बह रही कुंडलिनी ऊर्जा जब सहस्रार में बसे जीवात्मा को प्राप्त होती है, तो उसके पाप धुल जाने से वह पवित्र हो जाता है, जिससे मुक्ति मिल जाती है। पर आम लोगों ने उसे साधारण भौतिक नदी समझ लिया। उसमें स्नान करने के लिए लोगों की लाइन लग गई। वैसे तो आध्यात्मिक प्रतीकों से कुछ अप्रत्यक्ष लाभ तो मिलता ही है, पर उससे सुषुम्ना नाड़ी में नहाने से मिले लाभ की तरह प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल सकता।

देवताओं के द्वारा शिव के समक्ष कार्तिकेय से संबंधित गवाही देना जीवात्मा के द्वारा शरीर की गतिविधियों को अनुभव करना है

ध्यान से अपने शरीर का अवलोकन करना ही शिव के द्वारा देवताओं की सभा बुलाना है। ऐसी सभा का वर्णन मैंने अनायास ही अपनी पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में की है। मुझे लगता है कि सम्भवतः मैं पिछले जन्म में शिवपुराण का गहन जानकार होता था। इस जन्म में तो मैंने कभी शिव पुराण पढ़ा नहीं था, फिर कैसे मेरे से उससे हूबहू मिलती जुलती हालाँकि आधुनिक विज्ञानवादी पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन की रचना हो गई। या फिर भटकती हुई मानवसभ्यता पर दया करते हुए शिव की ही आज्ञा या प्रेरणा हो कि उनके द्वारा प्रदत्त लुप्तप्राय विद्या को पुनर्जीवित किया जाए। यह भी हो सकता है कि मेरे परिवार का संस्कार मेरे ऊपर बचपन से ही पड़ा हो, क्योंकि मुझे याद आता है कि मेरे दादाजी शिवपुराण को बहुत पसंद करते थे, और उसे विशेष रूप से पढ़ा करते थे। फिर जीवात्मा को कार्तिकेय जन्म की घटना की असलियत का पता चलना ही देवताओं द्वारा शिव को वस्तुस्थिति से अवगत कराना है। उस वीर्यतेज को कुंडलिनी पुरुष के रूप में जीवात्मा के अनुभव में न लाना ही उसकी चोरी है। क्योंकि वह शरीर के अंदर ही रहता है, इसलिए उसकी चोरी का शक देवताओं के ऊपर ही जाता है, जो पूरे शरीर का नियमन करते हुए शरीर में ही स्थित हैं। वीर्य की दाहकता ही वीर्यचोर को दिया गया श्राप है। रक्तसंचार के वेग से ही अँगों को प्राण मिलता है। उसी प्राण से उन अंगों के सम्बंधित चक्र क्रियाशील हो जाते हैं, जिससे वहाँ कुंडलिनी भी चमकने लगती है। उदाहरण के लिए यौनोत्तेजना के समय वज्रप्रसारण उसमें रक्त के भर जाने से होता है। मैं यहाँ बता दूं कि जो कुंडलिनी-नाग का ऊपर की ओर रेंगना बताया गया है, वह वज्र प्रसारण के बाद के वज्र संकुचन से होता है। इसके साथ सहस्रार से लेकर मूलाधार तक फैली नाग की आकृति की सुषुम्ना नाड़ी का ध्यान किया जाता है। वज्र उस नाग की पूंछ है, पैल्विक घेरा नाग का चौड़ है, पीठ के केंद्र से होकर वह ऊपर खड़ा है, मस्तिष्क में उसके अनगिनत फन फैले हैं, और उस नाग का अंत आज्ञा चक्र पर केंद्रीय फन के रूप में होता है। वज्र प्रसारण के बाद इस ध्यान से उत्पन्न वज्र संकुचन से ऐसा लगता है कि नाग ऊपर की तरफ रेंगते हुए सहस्रार में पहुंच गया और उसके साथ कुंडलिनी पुरुष भी सहस्रार में चमकने लगता है। यदि नाग की पूँछ का ऐसा ध्यान करो कि वह आगे से ऊपर चढ़कर आज्ञा चक्र को छू रही है, मतलब नाग की पूँछ उसके सिर को छूकर एक गोल छल्ला जैसा बना रही है, तब यह रेंगने की अनुभूति ज्यादा होती है। फिर वह आज्ञा चक्र से होते हुए आगे से नीचे उतरता है। इस तरह एक लूप सा बन जाता है, जिस पर गशिंग व ऑर्गैस्मिक ब्लिस फील के साथ एनर्जी लगातार घूमने लगती है। यह प्रक्रिया कुछ क्षणों तक ही रहती है। फिर मांसपेशियों की निरंतर व स्पासमोडिक किस्म की सिकुड़न से शरीर थक जाता है। यह सिकुड़न जैसा घटनाक्रम ज्यादातर लगभग एक ही लम्बी व अटूट सांस में होता है। सम्भवतः इसीलिए सांस को ज्यादा देर तक रोकने के लिए योगी को प्राणायाम का अभ्यास कराया जाता है। फिर कई घण्टों के उपयुक्त क्रियाकलापों से या आराम से ही इसे दुबारा से सही ढंग से करने की शक्ति हासिल होती है। वज्र में रक्त भर जाने से स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर कुंडलिनी की अभिव्यक्ति बढ़ जाती है। उसी रक्त को रूपक में दुग्ध कहा गया है, क्योंकि दुग्ध रक्त से ही बना है। दुग्ध अन्य कुछ नहीं बल्कि एक प्रकार से छना हुआ रक्त ही है। दुग्ध इसलिए भी कहा गया है क्योंकि तांत्रिक कुंडलिनी मूलाधार से हृदय चक्र तक ही सबसे ज्यादा जाती है। वह वक्षस्थल पर होता है, जहाँ पर दुग्ध के स्रोत स्तन भी होते हैं। मिस्र की अँखिन्ग तकनीक में भी कुंडलिनी यौनांग से पीछे के हृदय चक्र तक जाती है। उसे फिर अँखिन्ग लूप से पीछे से ऊपर ले जाकर सिर के ऊपर से घुमा कर वापिस आगे से नीचे ले जाकर आगे के हृदय चक्र तक उतारा जाता है। सम्भवतः इसी तकनीक से कृतिका डर गई हो। अँखिन्ग लूप में कुंडलिनी का बारबार घूमना ही कार्तिकेय का कृत्तिका को आश्वासन देना और उससे बारबार मिलने आना है। जैसे ही लंबी-गहरी-धीमी और ध्यान लगाई गई साँसों की सहायता से होने वाली संकुचन -प्रसारण जैसी तांत्रिक क्रिया से शक्ति को मूलाधार से ऊपर पीठ से होते हुए मस्तिष्क की ओर चढ़ाया जाता है, वैसे ही वज्र संकुचित हो जाता है, और उसके साथ कुंडलिनी भी ऊपर चली जाती है। फिर जिस चक्र पर वह प्राण शक्ति जाती है, रक्त या दुग्ध भी वहीं चला जाता है, जिसका पीछा करते हुए कुण्डलिनी पुरुष भी। हालांकि उन चक्रों पर हमें वज्र प्रसारण की तरह कोई तरलजनित प्रसारण अनुभव नहीं होता, क्योंकि वे क्षेत्र शरीर में गहरे और दृढ़तापूर्वक स्थित होते हैं। कई बार उल्टा भी होता है। किसी चक्र पर यदि कुंडलिनी पुरुष का ध्यान किया जाए, तो शक्ति खुद ही वहाँ के लिए दौड़ पड़ती है। इसीलिए कार्तिकेय को षण्मुखी कहा गया है क्योंकि यह छहों चक्रों पर प्राणों से अर्थात दुग्ध से पोषण प्राप्त करता है। रक्त क्योंकि जल देवता के आधिपत्य में आता है, इसीलिए कहा गया है कि जलदेवता ने बताया कि कृत्तिकाएँ उस नवजात बालक को स्तनपान कराती हैं। पौराणिक युग के पुराण रचनाकार गजब के अध्यात्म वैज्ञानिक होते थे। जो शिवगण कृत्तिकाओं से कार्तिकेय को लेने जाते हैं, वे तांत्रिक क्रियाएं ही हैं, जो चक्रों से कुण्डलिनी को सहस्रार की तरफ खींचती हैं। वे क्रियाएँ साधारण हठयोग वाली संकुचन-प्रसारण वाली या वीभत्स प्रकार की पँचमकारी भी हो सकती हैं, इसीलिए कृत्तिकाओं का उनसे डरना दिखाया गया है। स्वाभाविक है कि कुंडलिनी के साथ ही वहाँ से रक्तसंचार भी जाने लग पड़ता है, इसलिए वे मुरझा कर पीली सी पड़ने लगती हैं अर्थात डरने लगती हैं। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी का बार-बार चक्रों की ओर लौटना ही कार्तिकेय का अपनी माता को पुनः वापिस लौटने का आश्वासन देना है। इससे वे नए रक्तसंचार से प्रफुल्लित होने लगती हैं, अर्थात उनका भय खत्म हो जाता है। कई लोग बोलते हैं कि उनकी कुंडलिनी किसी चक्र पर फंसी हुई है, और चलाने पर भी नहीं चलती। दरअसल जब कुंडलिनी है ही नहीं, तो चलेगी कैसी। कई बार कमजोर कुंडलिनी भी एक जगह अटक जाती है, कमजोर आदमी की तरह। ताकतवर कुंडलिनी को कोई चलने से नहीं रोक सकता। तांत्रिक पँचमकारों से कुण्डलिनी को अतिरिक्त शक्ति मिलती है। कुंडलिनी को अभिव्यक्त करने का सबसे आसान तरीका बताता हूँ। लम्बी-गहरी-धीमी साँसें लो और उस पर ध्यान देकर रखो। इधर-उधर के विचारों को भी अपने आप आते-जाते रहने दो। न उनका स्वागत करो, और न ही अनादर। एकदम से कुंडलिनी पुरुष किसी चक्र पर अनुभव होने लगेगा। फिर उसे अपनी इच्छानुसार चलाने लग जाओ। कुंडलिनी पुरुष को अभिव्यक्त कराने वाला दूसरा पर हल्के वाला तरीका बताता हूँ। अपने शरीर के किसी निर्वस्त्र स्थान जैसे कि हाथों पर शरीरविज्ञान दर्शन के ध्यान के साथ नजर डालो। कुंडलिनी अभिव्यक्त हो जाएगी। कुंडलिनी पुरुष और कुंडलिनी शक्ति साथसाथ रहते हैं। मानसिक ध्यान चित्र या कुंडलिनी चित्र ही कुंडलिनी पुरुष है। यही शिव भी है। यह शक्ति के साथ ही रहता है। शक्ति की बाढ़ से शिव पूर्ण रूप में अर्थात अपने असली रूप में अभिव्यक्त होता है। यही कुंडलिनी जागरण है। दरअसल अँगदर्शन वाले उपरोक्त तरीके से भी यौगिक साँसें चलने लगती है। उसीसे कुण्डलिनी चित्र अभिव्यक्त होता है। सारा कमाल साँसों का ही है। साँस ही योग है, योग ही साँस है। किसी विचार के प्रति आसक्ति के समय हमारी सांसें थम जैसी जाती हैं। जब हम फिर से स्वाभाविक साँसों को चलाना शुरु करते हैं, तो आसक्ति गायब होकर अनासक्ति में तब्दील हो जाती है। इससे परेशान करने वाला विचार भी आराम से शांत हो जाता है। इससे काम, क्रोध आदि सभी मानसिक दोष भी शांत हो जाते हैं, क्योंकि ये विकृत व आसक्तिपूर्ण विचारों की ही उपज होते हैं। अगर साँसों पर ध्यान दिया जाए, तो कुंडलिनी की शक्ति से अनासक्ति और ज्यादा बढ़ जाती है।

यब-युम तकनीक यौन तंत्र का महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ है

यब-युम की तकनीक भी इसी कार्तिकेय-कथा में रहस्यात्मक रूपक की तरह दर्शाई गई है। क्योंकि कथा में आता है कि कबूतर के रूप में बना गुप्तांग वीर्य को ग्रहण करके ऋषिपत्नियों के रूप में बने चक्रों को प्रदान करते हैं। उन में उससे गर्भ बन जाता है, जो कुंडलिनी पुरुष के रूप में विकसित होने लगता है। यब-युम में भी तो यही किया जाता है। यब-युम की युग्मावस्था में यह वीर्यतेज का स्थानांतरण बहुत तेजी से होता है। इसमें पुरुष-स्त्री का जोड़ा अपने सभी युग्मित चक्रों पर एकसाथ ध्यान लगाता है। उससे दो मूलाधरों की ऊर्जा एकसाथ बारी-बारी से सभी चक्रों पर पड़ती है। उससे वहाँ तेजी से कुंडलिनी पुरुष प्रकट हो जाता है, जो वीर्यतेज से और तेजी से बढ़ने लगता है। यह तन्त्र की बहुत कारगर तकनीक है। इस तकनीक के बाद ऐसा लगता है कि मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रों और सम्बंधित अँगों का दबाव एकदम से कम हो गया। दरअसल वहां से वीर्यतेज चक्रों पर पहुंच कर वहाँ कुंडलिनी पुरुष बन जाता है। यही ऋषिपत्नियों के द्वारा गर्भ धारण करना है। ऐसे लम्बे अभ्यास के बाद सुषुम्ना नाड़ी पूरी खुल जाती है। फिर चक्रों पर स्थित वह तेज एकदम से सुषुम्ना से ऊपर चढ़कर सहस्रार में भर जाता है। यह कुंडलिनी जागरण या प्राणोत्थान है। यही ऋषिपत्नियों के द्वारा गर्भसहित वीर्यतेज को गंगा नदी को प्रदान करना है। गंगा के द्वारा किनारे में उगी सरकंडे की घास को प्रदान करना है, और उस पर एक शिशु का जन्म है। यह रूपक पिछले कुछ लेखों में विस्तार से वर्णित किया गया है। यहाँ ध्यान देने योग्य मुख्य बिंदु है कि शिवलिंग भी यब-युम का ही प्रतीक है। इसी वजह से शिवलिंगम की अराधना से भी यब-युम के जैसा लाभ प्राप्त होता है। और तो और, हठयोग के आसनों को भी इसी वीर्य ऊर्जा को पूरे शरीर में वितरित करने के लिए बनाया गया है, ऐसा लगता है। ऐसे प्रत्यक्ष अनुभव से ही पाश्चात्य देशों में यह धारणा बनी हुई है कि योगासन संभोग शक्ति को बढ़ाते हैं।

शिवपुराण में साफ लिखा है कि शिव के वीर्य से उत्पन्न कार्त्तिकेय अर्थात कुंडलिनी पुरुष ही तारकासुर अर्थात आध्यात्मिक अज्ञान को मारकर उससे मुक्ति दिला सकता है, अन्य कुछ नहीं। इससे यह क्यों न मान लिया जाए कि यौनयोग ही आत्मजागृति के लिए आधारभूत व मुख्य तकनीक है, अन्य बाकि तो सहयोगी क्रियाकलाप हैं। अगर गिने चुने लोगों को जागृति होती है, तो अनजाने में इसी यौन ऊर्जा के मस्तिष्क में प्रविष्ट होने से होती है। यह इतनी धीरे होता है कि उनको इसका पता ही नहीं चलता। इसलिए वे जागृति का श्रेय अपने रंगबिरंगे क्रियाकलापों और चित्रविचित्र मान्यताओं को देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनकी जागृति के समय वे उन-उन प्रकार के क्रियाकलापों या मान्यताओं से जुड़े होते हैं। इससे आपसी विवाद भी पैदा होता है। अन्धों की तरह कोई हाथी की पूंछ पकड़कर उसे असली हाथी बताता है, तो कोई हाथी की सूंड को। असली हाथी का किसीको पता नहीं होता। ऐसा भी हो सकता है कि अपनी विशिष्ट मान्यताओं या क्रियाओं से मूलाधार की यौन शक्ति हासिल हो, पर आदमी शर्म के कारण उसके यौनता से जुड़े अंश को जगजाहिर न करता हो। हम अन्य तकनीकों का विरोध नहीं करते। पर हैरानी इसको लेकर है कि मुख्य तकनीक व सिद्धांत को सहायक या गौण बना दिया गया है, और सहायक तकनीकों को मुख्य। जब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा तब स्वाभाविक है कि बहुत से लोगों को स्पष्ट व वैज्ञानिक रूप से जागृति होगी, संयोगवश गिनेचुने लोगों को ही नहीं। अक्सर लोग बाहरी अलंकारों और रूपकों में डूबे होते हैं, असल चीज का पता ही नहीं होता। मुझे तो वे समझ भी नहीं आते, और उनका रहस्य समझे बिना वे किसी दिव्य ग्रह की कथाएं लगती हैं। मैं फेसबुक पर देखता रहता हूँ। डाकिनी, काली आदि देवियों के कितने ही नाम इस मूल सिद्धांत से जोड़े गए हैं। सभी पन्थों और संप्रदायों ने अपनेअपने हिसाब से नाम दिए हैं। मूल चीज एक ही है। ऐसी बात भी नहीं है कि जागृति के मूल वैज्ञानिक सिद्धांत का पता न हो लोगों को। योग शास्त्रों में साफ लिखा है कि कुंडलिनी मूलाधार में ही रहती है, अन्यत्र कहीं नहीं। तो फिर इधर-उधर क्यों भागा जाए। मूलाधार में ही शक्ति को क्यों न ढूंढा जाए। दरअसल इसको व्यावहारिक रूप में नहीं, बल्कि अलंकार या रूपक की तरह माना गया। रूपक बनाने से यह नुकसान हुआ कि लोगों को पता ही नहीं चला कि क्या रूपक है और क्या असली। जिन्होंने इसे कुछ समझा, वे संभोग के सिवाय अन्य सभी टोटकों की सहायता लेने लगे मूलाधार की शक्ति को जागृत करने के लिए। सम्भवतः ऐसा सामाजिक संकोच व लज्जा के कारण हुआ। महिलाएं तो इस बारे में ज्यादा ही अनभिज्ञ और संकोची बनती हैं, जबकि पुराने जमाने में महिलाएं ही सफल तन्त्रगुरु हुआ करती थीं। एक तरफ तो मान रहे हैं कि कुंडलिनी मूलाधार में ही रहती है, और कहीं नहीं, और दूसरी तरफ उस संभोग को नकार रहे हैं, जो मूलाधार की शक्ति को जगाने के लिए सबसे प्रत्यक्ष और शक्तिशाली क्रिया है। विचित्र सा विरोधाभास रहा यह। सम्भवतः शक्ति की कमी भी इसमें कारण रही। समाज के जरूरत से ज्यादा ही आदर्शवादी और अहिंसक बनने से शरीर में शक्ति की कमी हो गई। शक्ति की कमी होने पर संभोग में रुचि कम हो जाती है। अंडे का सेवन एक उचित विकल्प हो सकता है। अंडा तो शाकाहारी भोजन ही माना जा सकता है, क्योंकि उसमें जीवहिंसा नहीं होती। वह तो दूध की तरह ही पशु का बाइप्रोडक्ट भर ही है। उसमें सभी पोषक तत्त्व संतुलित मात्रा में होते हैं। अंडा यौन उत्तेजना को भी बढ़ाता है, इसलिए तन्त्र के हिसाब से इसका सेवन सही होना चाहिए। आजकल के विकसित व वैज्ञानिक युग में तो यौनता के प्रति संकोच कम होना चाहिए था। विज्ञान की बदौलत आजकल अनचाहे गर्भ का भय भी नहीं है। बेशक तांत्रिक संभोग के साथ कंडोम का प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि तांत्रिक क्रियाओं से वज्र लगातार संकुचित व प्रसारित होता रहता है, जिससे वह अंदर फंस सकता है। एड्स आदि यौन रोगों के संचरण का खतरा बढ़ सकता है इसके बिना। पर ऐसी नौबत ही नहीं आती क्योंकि यौनतन्त्र एक ही जीवनसाथी अर्थात पत्नी के साथ ही सिद्ध होता है। तन्त्र में वैसे भी दूसरों की बेटियों व पत्नियों को यौनतन्त्र साथी बनाना वर्जित है। कामभाव जागृत करने के लिए सभ्य तरीके से अप्रत्यक्ष सम्पर्क या हंसीमजाक तो चलता रहता है। फिर भी बहुत से गर्भनिरोधक उपाय हैं। हॉर्मोन की गोलियां हैं। हालांकि इनको लम्बे समय तक लगातार रोज लेना पड़ता है, जिससे दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। यदि तांत्रिक अभ्यास के समय असुरक्षित चक्र-काल में गल्ती से योनि में स्खलन हो भी जाए, तो गर्भ रोकने के लिए अन्य हॉर्मोनल दवाइयां हैं, जैसे कि विकल्प-72, जिसे स्खलन के बाद के 72 घण्टे के अंदर लेने पर गर्भ नहीं ठहरता। यदि किसी कारणवश उसे न लिया जा सके, या बहुत विरले मामले में वह फेल हो जाए, तो एबॉर्शन पिल नाम से अन्य हॉर्मोनल दवाइयां मिलती हैं, जिन्हें माहवारी मिस होने के बाद जितना जल्दी लिया जाए, उतना अच्छा परिणाम मिलता है। ऐसे यूजर फ्रेंडली मिनीकिट उपलब्ध हैं, जिनसे माहवारी मिस होने के दिन से अगले 2-3 दिन में ही गर्भ ठहरने का पता चल जाता है। वैसे तो इन सबकी जरूरत ही नहीं पड़ती यदि यौनतन्त्र के प्रारम्भिक अभ्यास के समय सुरक्षित काल में ही संभोग किया जाए। यह समय माहवारी के पहले दिन समेत माहवारी चक्र के प्रथम सात दिन और अंतिम 7 दिन हैं। इन दिनों में स्खलन होने पर भी गर्भ नहीं बनता, क्योंकि इन दिनों में शुक्राणुओं को अण्डाणु उपलब्ध नहीं होता। यह समय सीमा उनके लिए है, जिनमें चक्र काल 28 दिनों का है, और हरबार इतना ही और अपरिवर्तित रहता है। यदि काल इससे कम-ज्यादा हो, तो उसी हिसाब से सुरक्षित काल कम-ज्यादा हो जाता है। यदि यह काल बराबर नहीं तब भी धोखा लग सकता है। हालाँकि कोई भी गर्भनिरोधक तरीका 100 प्रतिशत नहीं है, पर सभी तरीके मिलाकर तो लगभग 100 प्रतिशत सुरक्षा दे ही देते हैं। कई बार प्रीइजेक्युलेट में भी थोड़े से शुक्राणु होते हैं। पर वे अक्सर गर्भ के लिए नाकाफी होते हैं। वैसे हल्के तरीके ही काफी हैं। कॉपर टी, नलबंदी, नसबंदी जैसे जटिल तरीकों की तो जरूरत ही नहीं पड़ती अधिकांशतः। मैं एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट में पढ़ रहा था जिसमें एक तंत्राभ्यासी कह रहे थे कि आजकल जनसंख्या व बेरोजगारी अधिक है, इसलिए यौन तन्त्र से समस्या आ सकती है। इसलिए यौन तन्त्र का अभ्यास करें तो सावधानी से करें, और यह मान कर चलें कि यदि अनचाहा गर्भ ठहर जाए तो उसे खुशी-खुशी स्वीकार करने में ही भलाई है। पर आज के वर्तमान दौर में ये सब बातें पुरानी हो गई हैं। गर्भ भी उसी प्रकार की प्रचण्ड यौन ऊर्जा से बनता है, जिससे जागृति मिलती है। जिस सुस्त व आलसी संभोग से गर्भ नहीं बन सकता, उससे जागृति भी नहीं मिल सकती। इसीलिए तो देवी पार्वती को हैरानी हुई कि भगवान शिव के शक्तिशाली संभोग से उपजे शक्तिशाली वीर्य से गर्भ तो अवश्य बनना था, वह वीर्य असफल नहीं हो सकता था। पर वह गर्भ गया कहाँ। बाद में पता चला कि वह गर्भ सहस्रार में जागृति के रूप में प्रकट हुआ। इससे स्वाभाविक है कि पुराने जमाने में संभोग तन्त्र से लोगों को परहेज होना ही था, क्योंकि इससे गर्भ ठहरने की पूरी संभावना होती है, और भौतिक विज्ञान की कमी से उस समय भौतिक गर्भनिरोधक तकनीकों और ज्ञान का अभाव तो था ही। ऐसी जानकारियों वाली बातें लिखने और पढ़ने में ही अच्छी लगती हैं, इन्हें बोलने और सुनने में संकोच और लज्जा जैसी महसूस होती है। इसी वजह से तो आजकल के चैटिंग के युग में देखने में आता है कि कई बार एक देवी सदृश और पतिव्रता नारी भी, जिससे ऐसी बातें बोलने और सुनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती, वह भी अपने मोबाइल फोन पर इतनी अश्लील चैटिंग कर लेती है कि लेखन के जादू पर उसको भी यकीन होने लगता है जो लेखन का धुर विरोधी रहा हो।

कुंडलिनी पुरुष के रूप में भगवान कार्तिकेय का लीला विलास

मित्रो, मुझे भगवान कार्तिकेय की कथा काफी रोचक लग रही है। इसमें बहुत से कुंडलिनी रहस्य भी छिपे हुए लगते हैं। इसलिए हम इसे पूरा खंगालेंगे। शिवपुराण के अनुसार ही, फिर सरकंडे पर जन्मे उस बालक को ऋषि विश्वामित्र ने देखा। बालक ने उन्हें अपना वेदोक्त संस्कार कराने के लिए कहा। जब विश्वामित्र ने कहा कि वे क्षत्रिय हैं, ब्राह्मण नहीं, तब कार्तिकेय ने उनसे कहा कि वे उसके वरदान से ब्राह्मण हो गए। फिर उन्होंने उसका संस्कार किया। तभी वहाँ छः कृत्तिकाएँ आईं। जब वे उस बालक को लेकर लड़ने लगीं, तो वह छः मुंह बनाकर छहों का एकसाथ स्तनपान करने लगा। अग्निदेव ने भी उसे अपना पुत्र कहकर उसे शक्तियां दीं। उन शक्तियों को लेकर वह करौंच पर्वत पर चढ़ा और उसके शिखर को तोड़ दिया। तब इंद्र ने नाराज होकर उस पर वज्र से कई प्रहार किए, जिनसे शाख, वैशाख और नैगम तीन पुरुष पैदा हुए और वे चारों इंद्र को मारने के लिए दौड़ पड़े। कृत्तिकाओं ने अपना दूध पिलाकर कार्तिकेय को पाला पोसा, और जगत की सभी सुख सुविधाएं उसे दीं। उसे उन्होंने दुनिया की नजरों से छिपाकर रखा कि कहीं उस प्यारे नन्हें बालक को कोई उनसे छीन न लेता। 
पार्वती ने शंकित होकर शिव से पूछा कि उनका अमोघ वीर्य कहाँ गया। उसे किसने चुराया। वह निष्फल नहीं हो सकता। भगवान शिव जब पार्वती के साथ व अन्य देवताओं के साथ अपनी सभा में बैठे थे, तो उन्होंने सभी देवताओं से इस बारे पूछा। उन्होंने कहा कि जिसने भी उनके अमोघ वीर्य को चुराया है, वह दण्ड का भागी होगा, क्योंकि जो राजा दण्डनीय को दण्ड नहीं देता, वह लोकनिंदित होता है। सभी देवताओं ने बारी-बारी से सफाई दी, और वीर्यचोर को भिन्न-भिन्न श्राप दिए। तभी अग्निदेव ने कहा कि उन्होंने वह वीर्य शिव की आज्ञा से सप्तऋषियों की पत्नियों को दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने वह हिमालय को दे दिया। हिमालय ने बताया कि वह उसे सहन नहीं कर पाया और उसे गंगा को दे दिया। गंगा ने कहा कि उस असह्य वीर्य को उसने सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। वायुदेव बोले कि उसी समय वह वीर्य एक बालक बन गया। सूर्य बोले कि रोते हुए उस बालक को देख न सकने के कारण वह अस्ताचल को चला गया। चन्द्रमा बोला कि कृत्तिकाएँ उसे अपने घर ले गईं। जल बोला कि उस बालक को कृत्तिकाओं ने स्तनपान कराके बड़ा किया है। संध्या बोली कि कृत्तिकाओं ने प्रेम से उसका पालन पोषण करके कार्तिक नाम रखा है। रात्रि बोली कि वे कृत्तिकाएँ उसे अपनी आँखों से कभी दूर नहीं होने देतीं। दिन बोला कि वे कृत्तिकाएँ उसे श्रेष्ठ आभूषण पहनाती हैं, और स्वादिष्ट भोजन कराती हैं। इससे शिवपार्वती, दोनों बड़े खुश हुए, और समस्त जनता भी। तब शिव के गण दिव्य विमान लेकर कृतिकाओं के पास गए। जब कृतिकाओं ने उसे देने से मना किया तो गणों ने उन्हें शिवपार्वती का भय दिखाया। कृत्तिकाएँ डर गईं तो कार्तिकेय ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि उसके होते हुए उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने रोते हुए कार्तिकेय को हृदय से लगाकर उसीसे पूछा कि वह कैसे उन अपनी दूध पिलाने वाली माताओं से अलग हो पाएगा, जो एकपल के लिए भी उसे अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देतीं। कार्तिकेय ने कहा कि वह उनसे मिलने आया करेगा। दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर कार्तिकेय शिवपार्वती के पास कैलाश पर आ गया। हर्षोल्लास का पर्व मनाया गया। शिवपार्वती ने उसे गले से लगा लिया। कार्तिकेय के दिव्य तेज से प्रभावित होकर बहुत से लोग उसके भक्त बन कर उसकी स्तुति करने लगे। वे उसे शिव की प्राप्ति कराने वाला और जन्ममरण से मुक्ति देने वाला कहते। वे उसे अपना सबसे प्रिय इष्टदेव कहते। एक आदमी का यज्ञ के लिए बंधा बकरा कहीं भाग गया था। सबने उसे ब्रह्मांड में हर जगह ढूंढा, पर वह नहीं मिला। फिर वह आदमी भगवान कार्तिकेय के पास आकर उनसे प्रार्थना करने लगा कि वे ही उस बकरे को ला सकते हैं, नहीं तो उसका अजमेध यज्ञ नष्ट हो जाएगा। कार्तिकेय ने वीरबाहु नामक गण को पैदा करके उसे वह काम सौंपा। वह उसे ब्रह्मांड के किसी कोने से बांध कर ले आया और कार्तिकेय के समक्ष उस आदमी को सौंप दिया। कार्तिकेय ने उसपर पानी छिड़कते हुए उससे कहा कि वह बकरा बलिवध के योग्य नहीं, और उसे उस आदमी को दे दिया। वह कार्तिकेय को धन्यवाद देकर चला गया।

उपर्युक्त कुंडलिनी रूपक का रहस्योद्घाटन

विश्वामित्र ने कुंडलिनी का अनुभव किया था। वे क्षत्रिय थे पर कुंडलिनी के अनुभव से उनमें ब्रह्मतेज आ गया था। उसी कुंडलिनी पुरुष अर्थात कार्तिकेय के अनुभव से ही वे ब्रह्मऋषि बने। कुंडलिनी से ब्रह्मऋषित्व है, जाति या धर्म से ही नहीं। कार्तिकेय का संस्कार करने का मतलब है कि उन्होंने कुंडलिनी पुरुष को अपनी योगसाधना से प्रतिष्ठित किया। छः कृत्तिकाएँ छः चक्र हैं। कुंडलिनी पुरुष अर्थात कुंडलिनी चित्र कभी किसी एक चक्र पर तो कभी किसी अन्य चक्र पर जाता हुआ सभी चक्रों पर भ्रमण करता है। इसीको उनका आपस में लड़ना कहा गया है। फिर योगी ने तीव्र योगसाधना से उसे सभी चक्रों पर इतनी तेजी से घुमाया कि वह सारे चक्रों पर एकसाथ स्थित दिखाई दिया। यह ऐसे ही है कि यदि कोई जलती मशाल को तेजी से चारों ओर घुमाए, तो वह पूरे घेरे में एकसाथ जलती हुई दिखती है। इसीको कार्तिकेय का छः मुख बनाना और एकसाथ छहों कृत्तिकाओं का दूध पीना कहा गया है। चक्रों पर कुंडलिनी पुरुष के ध्यान से उसे बल मिलता है। इसे ही कार्तिकेय का दूध पीना कहा गया है। रोमांस से सम्बंधित विषयों को ‘हॉट’ भी कहा जाता है। इसलिए उन विषयों पर अग्निदेव का आधिपत्य रहता है। क्योंकि कुंडलिनी पुरुष की उत्पत्ति इन्हीं विषयों से हुई, इसीलिए वह अग्निदेव का पुत्र हुआ। उत्पत्ति होने के बाद भी कुंडलिनी पुरुष को तांत्रिक योग से बल मिलता रहा, जिसमें प्रणय प्रेम की मुख्य भूमिका होती है। इसीको अग्निदेव के द्वारा कार्तिकेय को बल देना कहा गया है। फिर कुंडलिनी उससे शक्ति लेकर आज्ञाचक्र के ऊपर आ गई। मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में सीधे जुड़े हुए दिखाए जाते हैं। इसको कार्तिकेय का क्रौंच पर्वत पर चढ़ना बताया गया है। क्रौं से मिलता जुलता सबसे नजदीकी शब्द क्रांति है। क्रांतिकारी चक्र आज्ञा चक्र को भी कह सकते हैं। आज्ञाचक्र एक बुद्धिप्रधान चक्र है। क्रांति बुद्धि से ही होती है, मूढ़ता से नहीं। क्रौंच पर्वत के शिखर को तोड़ता है, मतलब तेज, जजमेंटल और द्वैतपूर्ण बुद्धि को नष्ट करता है। अहंकार से भरा जीवात्मा कुंडलिनी को सहस्रार में जाने से रोकना चाहता है। उसी अहंकार को इंद्र कहा गया है। उसके द्वारा कुंडलिनी को रोकना ही उसके द्वारा कार्तिकेय पर वज्र प्रहार है। कुंडलिनी आज्ञाचक्र पर तीन नाड़ियों से आती है। ये नाड़ियां हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इससे कुंडलिनी आज्ञा चक्र से नीचे आती रहती है, और तीनों नाड़ियो से फिर से ऊपर जाती रहती है। इससे वह बहुत शक्तिशाली हो जाती है। यही वज्र प्रहार से कार्तिकेय से तीन टुकड़ों का अलग होना है। शाख इड़ा है, वैशाख पिंगला है, नैगम सुषुम्ना है। शाखा से जुड़ा नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि ये दोनों नाड़ियां टहनियों की तरह हैं। मूल वृक्ष सुषुम्ना है, इसलिए उसे नैगम नाम दिया गया है। सभी निगमों अर्थात धर्मशास्त्रों का निचोड़ सुषुम्ना ही है, इसीलिए नैगम नाम दिया गया। कुंडलिनी पुरुष अर्थात कार्तिकेय के साथ ये तीनों पुरुष इंद्र को मारने दौड़ पड़े, मतलब कुंडलिनी सहस्रार की ओर अग्रसर थी, जिससे इंद्र रूपी अहंकार का नाश होना था। सभी लोग कार्तिक की ऐसे स्तुति कर रहे हैं, जैसे कुंडलिनी पुरुषरूप देवता की स्तुति की जाती है। कुंडलिनी तांत्रिक क्रियाओं से भी शक्ति प्राप्त कर सकती है। ऐसा तब ज्यादा होता है जब कुंडलिनी की तीव्र अभिव्यक्ति के साथसाथ शारिरिक श्रम भी खूब किया जाता है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी ही तांत्रिक यज्ञों को सफल बनाती है। कार्तिकेय के द्वारा पैदा किए गए वीरबाहु नामक गण के द्वारा बलि के बकरे को ढूंढ कर यज्ञ को पूर्ण करना इसी सिद्धांत को दर्शाता है। वीरबाहु का मतलब है, ऐसा व्यक्ति, जो अपनी भुजाओं की शक्ति के कारण ही वीर है। यह श्रमशीलता का परिचायक है। अधिकांशतः कुंडलिनी शक्ति के प्रतीकों से ही संतुष्ट हो जाती है, शक्ति के लिए हिंसा की जरूरत ही नहीं पड़ती। इससे यह तातपर्य भी निकलता है कि कम से कम हिंसा और अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ। तंत्र के नाम पर नाजायज हिंसा का विरोध करने के लिए ही यह दिखाया गया है कि कार्तिकेय ने बकरे पर जल का छिड़काव करके उसे छोड़ देने के लिए कहा। यह हिंसा का प्रतीकात्मक स्वरूप ही है। शेष अगले हफ्ते।

कुंडलिनी साहित्य के रूप में संस्कृत साहित्य एक आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक, अत्याधुनिक, और सदाबहार साहित्य है

संस्कृत साहित्य कुंडलिनी आधारित साहित्य होने के कारण ही एक अनुपम साहित्य है

दोस्तो, मैं संस्कृत साहित्य का जन्मजात शौकीन हूँ। संस्कृत साहित्य बहुत मनोरम, सजीव, जीवंत व चेतना से भरा हुआ है। एक सज्जन संस्कृत विद्वान ने बहुत वर्षों पहले ‘संस्कृत साहित्य परिचायिका’ नाम से एक सुंदर, संक्षिप्त व ज्ञान से भरपूर पुस्तक लिखी थी। उस समय ऑनलाइन पुस्तकों का युग नहीं आया था। इससे वह आजतक गुमनामी में पड़ी रही। मेरी इच्छा उसको ऑनलाइन करने की हुई। कम्प्यूटर पर टाइपिंग में समस्या आई, क्योंकि अधिकांश शब्द संस्कृत के थे, और टाइप करने में कठिन थे। भला हो एंड्रॉयड में गूगल के इंटेलिजेंट कीबोर्ड का। उससे अधिकांश टाइपिंग खुद ही होने लगी। मैं तो शुरु के कुछ ही वर्ण टाइप करता हूँ, बाकी वह खुद प्रेडिक्ट कर लेता है। आधे से ज्यादा टाइप हो गई। अधिकांश पब्लिशिंग प्लेटफोरमों पर तो मैंने इसे ऑनलाइन भी कर दिया है। शेष स्थानों पर भी मैं इसे जल्दी ही ऑनलाइन करूँगा। निःशुल्क पीडीएफ बुक के रूप में यह इस वेबसाइट के शॉप पेज पर दिए गए निःशुल्क पुस्तकों के लिंक पर भी उपलब्ध है। यह सभी साहित्यप्रेमियों के पढ़ने लायक है। आजकल किसी भी विषय का आधारभूत परिचय ही काफी है। बोलने का तात्पर्य है कि विषय की हिंट ही काफी है। उसके बारे में बाकि विस्तार तो गूगल पर व अन्य साधनों से मिल जाता है। केवल साहित्य से जुड़े हुए प्रारम्भिक संस्कार को बनाने की आवश्यकता होती है, जिसे यह पुस्तक बखूबी बना देती है। संस्कृत साहित्य का भरपूर आनंद लेने के लिए इस पुस्तक का कोई सानी नहीं है। यह छोटी जरूर है, पर गागर में सागर की तरह है। इसी पुस्तक से निर्देशित होकर मैं कालीदासकृत कुमारसम्भव काव्य की खोज गूगल पर करने लगा। मुझे पता चला कि इसमें शिव-पार्वती के प्रेम, उससे भगवान कार्तिकेय के जन्मादि की कथा का वर्णन है। कुमार मतलब लड़का या बच्चा, सम्भव मतलब उत्पत्ति। कहते हैं कि शिव और पार्वती के संभोग का वर्णन करने के पाप के कारण कवि कालीदास को कुष्ठरोग हो गया था। इसलिए वहां पर उन्होंने उसे अधूरा छोड़ दिया। बाद में उसे पूरा किया गया। कुछ लोग कहते हैं कि आम जनमानस ने शिव-पार्वती के प्रति भक्तिभावना के कारण उनके संभोग-वर्णन को स्वीकार नहीं किया। इसलिए उन्हें उसे रोकना पड़ा। पहली संभावना यद्यपि विरली पर तथ्यात्मक भी लगती है, क्योंकि वह आम संभोग नहीं है। उसका लौकिक तरीके से वर्णन नहीं किया जा सकता। वह एक तंत्रसाधना के रूप में है, और रूपकात्मक है, जैसा कि पिछली पोस्ट में दिखाया गया है। लौकिक हास्यविनोद व मनोरंजन का उसमें कोई स्थान नहीं है। इस संभावना के पीछे मनोविज्ञान तथ्य भी है। क्योंकि देवताओं के साथ बहुत से लोगों की मान्यताएं और आस्थाएँ जुड़ी होती हैं, इसलिए उनके अपमान से उनकी अभिव्यक्त बददुआ या नाराजगी की दुर्भावना तो लग ही सकती है, पर अनभिव्यक्त अर्थात अवचेतनात्मक रूप में भी लग सकती है। इस तरह से अवलोकन करने पर पता चलता है कि सारा संस्कृत साहित्य हिंदु वेदों और पुराणों की कथाओं और आख्यानों के आधार पर ही बना है। अधिकाँश साहित्यप्रेमी और लेखक वेदों या पुराणों से किसी मनपसंद विषय को उठा लेते हैं, और उसे विस्तार देते हुए एक नए साहित्य की रचना कर लेते हैं। क्योंकि वेदों और पुराणों के सभी विषय कुण्डलिनी पर आधारित होने के कारण वैज्ञानिक हैं, इसलिए संस्कृत साहित्य भी कुण्डलिनीपरक और वैज्ञानिक ही सिद्ध होता है।

विभिन्न धर्मों की मिथकीय आध्यात्मिक कथाओं के रहस्योद्घाटन को सार्वजनिक करना आज के आधुनिक, वैज्ञानिक, व भौतिकवादी युग की मूलभूत मांग प्रतीत होती है

मुझे यह भी लगता है कि आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करने से समाज को बहुत लाभ भी प्राप्त हो सकता  है। मैं यह तो नहीं कहता कि हर जगह रहस्य को उजागर किया जाए, क्योंकि ऐसा करने से रहस्यात्मक कथाओं का आनन्द समाप्त ही हो जाएगा। पर कम से कम एक स्थान पर तो उन रहस्यों को उजागर करने वाली रचना उपलब्ध होनी चाहिए। कहते हैं कि आध्यात्मिक सिद्धांतों व तकनीकों को इसलिए रहस्यमयी बनाया गया था, ताकि आदमी आध्यात्मिक परिपक्वता से पहले उनको आजमाकर पथभ्रष्ट न होता। पर कई बार ऐसा भी होता है कि अगर आध्यात्मिक परिपक्वता से पहले ही आदमी को रहस्य की सच्चाई पता चल जाए, तब भी वह उससे तभी लाभ उठा पाएगा जब उसमें परिपक्वता आएगी। रहस्य को समझ कर उसे यह लाभ अवश्य मिलेगा कि वह उससे प्रेरित होकर जल्दी से जल्दी आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त करने की कोशिश करके आध्यात्मिक परिपक्वता को हासिल करेगा, ताकि उस रहस्य से लाभ उठा सके। साथ में, तब तक वह योग साधना के रहस्यों व सिद्धांतों से भलीभांति परिचित हुआ रहेगा। उसे जरूरत पड़ने पर वे नए और अटपटे नहीं लगेंगे। कहते भी हैं कि अगर कोई आदमी अपने पास लम्बे समय तक चाय की दुकान का सामान संभाल कर रखे तो वह एकदिन चाय की दुकान जरूर खोलेगा, और कामयाब उद्योगपति बनेगा। पहले की अपेक्षा आज के युग में आध्यात्मिक रहस्योद्घाटन को सार्वजनिक करना इसलिए भी जरूरी लगता है क्योंकि आजकल ईमानदार, व निपुण आध्यात्मिक गुरु विरले ही मिलते हैं, और जो होते हैं वे भी अधिकांशतः आम जनमानस की पहुंच से दूर होते हैं। पहले ऐसा नहीं होता था। उस समय अध्यात्म का बोलबाला होता था। आजकल तो भौतिकता का बोलबाला ज्यादा है। अगर आजकल कोई आध्यात्मिक रूप से परिपक्व हो जाए, और उसे उसकी जरूरत के अनुसार सही मार्गदर्शन न मिले, तो उसे तो बड़ी आध्यात्मिक हानि उठानी पड़ सकती है। एक अन्य लाभ यह भी मिलेगा कि जब सभी धर्मों का रहस्योद्घाटन हो जाएगा, तब सबको कुंडलिनी तत्त्व अर्थात अद्वैत तत्त्व ही अध्यात्म के मूल तत्त्व के रूप में नजर आएगा। इससे सभी धर्मों के बीच में आपसी कटुता समाप्त हो जाएगी और असल रूप में सर्वधर्मसमभाव स्थापित हो पाएगा। इससे दुनिया के अधिकांश झगड़े समाप्त हो जाएंगे।

इड़ा नाड़ी को ही ऋषिपत्नी अरुन्धती कहा गया है

अब पिछली पोस्ट में वर्णित रूपकात्मक कथा को आगे बढ़ाते हैं। उसमें जिस अरुंधति नामक ऋषिपत्नी का वर्णन है, वह दरअसल इड़ा नाड़ी है। इड़ा नाड़ी अर्धनारीश्वर के स्त्री भाग का प्रतिनिधित्व करती है। कई बार हठयोग का अभ्यास करते समय प्राण इड़ा नाड़ी में ज्यादा प्रवाहित होने लगता है। इसका मतलब है कि वह प्राण को सुषुम्ना में जाने से रोकती है। सुषुम्ना से होता हुआ ही प्राण चक्रों पर अच्छी तरह स्थापित होता है। प्राण के साथ वीर्यतेज भी होता है। इसको यह कह कर बताया गया है कि अरुंधति ने ऋषिपत्नियों को अग्नि देव के निकट जाने से रोका। पर योगी ने आज्ञाचक्र के ध्यान से प्राण के साथ वीर्यतेज को सुषुम्ना से प्रवाहित करते हुए चक्रों पर उड़ेल दिया। इसको ऐसे दिखाया गया है कि ऋषिपत्नियों ने अरुंधती की बात नहीं मानी, पर भगवान शिव के इशारे को समझा। आज्ञाचक्र शिव का प्रतीक भी है, क्योंकि वहीँ पर उनका तीसरा नेत्र है।

कुंडलिनी जागरण और कुंडलिनी योग के बीच में केवल अनुभव की मात्रा को लेकर ही भिन्नता है, अनुभव की प्रकृति को लेकर नहीं

कई जगह सहस्रार को आठवां चक्र माना जाता है। सहस्रार तक वीर्यतेज पहुंचाना अन्य चक्रों से मुश्किल होता है। जबरदस्ती ऐसा करने से सिरदर्द होने लग सकता है। इसलिए नीचे के सात चक्रों पर ही वीर्य को स्थापित किया जाता है। इसीको रूपक में ऐसा कहा गया है कि आठ में से सात ऋषिपत्नियाँ ही अग्निदेव के पास जाकर आग सेंकने लगीं। आई तो आठवी भी, पर उसने आग की तपिश नहीं ली। मतलब कि थोड़ा सा वीर्यतेज तो सहस्रार तक भी जाता है, पर वह नगण्यतुल्य ही होता है। सहस्रार तक वीर्यतेज तो मुख्यतः सुषुम्ना के ज्यादा क्रियाशील होने से उससे होकर ही जाता है। इसीको रूपक में यह कहा गया है कि गंगानदी ने शिव के वीर्य को सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि प्राण या वीर्यतेज या ऊर्जा या शक्ति के साथ कुंडलिनी चित्र तो रहता ही है। ये सभी नाम आपस में पर्यायवाची की तरह हैं, अर्थात सभी शक्तिपर्याय हैं। वीर्यतेज से सर्वप्रथम व सबसे ज्यादा जलन आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर महसूस होती है। यह उसी जननांग से जुड़ा है, जिसे पिछले लेख में कबूतर कहा गया है। उसके साथ जब चक्रों पर बारी-बारी से कुंडलिनी का भी ध्यान किया जाता है, तब वह तेज चक्रों पर आने लगता है। फिर वह चक्रों से रीढ़ की हड्डी में जाता हुआ महसूस होता है। सम्भवतः यह आगे के चक्र से पीछे के चक्र को रिस जाता है। इसीलिए आगे-पीछे के दोनों चक्र आपस में एक पतले एनर्जी चैनल से जुड़े हुए बताए जाते हैं। इसीको मिथक कथा में यह कह कर बताया गया है कि ऋषिपत्नियों ने वह वीर्य तेज हिमालय को दिया, क्योंकि पीछे वाले चक्र रीढ़ की हड्डी में ही होते हैं। पुराण बहुत बारीकी से लिखे गए होते हैं। उनके हरेक शब्द का बहुत बड़ा और गहरा अर्थ होता है। इस तेज-स्थानांतरण का आभास पीठ के मध्य भाग में नीचे से ऊपर तक चलने वाली सिकुड़न के साथ आनन्द की व नीचे के बोझ के कम होने की अनुभूति से होता है। फिर थोड़ी देर बाद उस सिकुड़न की सहायता से वह तेज सुषुम्ना में प्रविष्ट होता हुआ महसूस होता है। यह अनुभूति बहुत हल्की होती है, और खारिश की या किसी संवेदना की या यौन उन्माद या ऑर्गेज्म की एक आनन्दमयी लाइन प्रतीत होती है। यह ऐसा लगता है कि पीठ के मेरुदंड की सीध में एक मांसपेशी की सिकुड़न की रेखा एकसाथ नीचे से ऊपर तक बनती है और ऑर्गेज्म या यौन-उन्माद के आनन्द के साथ कुछ देर तक लगातार बनी रहती है। ऐसा लगता है कि वह नाड़ी सहस्रार में कुछ उड़ेल रही है। इसके साथ ही कुंडलिनी चित्र सहस्रार में महसूस होता है। अभ्यास के साथ तो हर प्रकार की अनुभूति बढ़ती रहती है। इसीको रूपक में ऐसे कहा गया है कि अग्निदेव ने वह तेज सात ऋषिपत्नियों को दिया, ऋषिपत्नियों ने हिमालय को दिया, हिमालय ने गंगानदी को, और गंगानदी ने सरकंडे की घास को दिया। इसका सीधा सा मतलब है कि कुंडलिनी क्रमवार ही सहस्रार तक चढ़ती है, सीधी नहीं। योग में अक्सर ऐसा ही बोला जाता है। हालाँकि तांत्रिक योग से सीधी भी सहस्रार में जा सकती है। किसीकी कुंडलिनी मूलाधार में बताई जाती है, किसी की स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ी हुई, किसीकी मणिपुर चक्र तक, किसीकी अनाहत चक्र तक, किसीकी विशुद्धि तक, किसी की आज्ञाचक्र तक और किसीकी सहस्रार तक चढ़ी हुई बताई जाती है। हालांकि इन सातों चक्रों में तो कुण्डलिनी प्रतिदिन के योगाभ्यास में चढ़ती औऱ उतरती रहती है, पर कुंडलिनी को लम्बे समय तक एक चक्र पर स्थित रखने के लिए काफी अभ्यास की जरूरत होती है। आपकी कुंडलिनी प्रतिदिन सहस्रार में भी जाएगी, पर यह योगाभ्यास के दौरान सहस्रार पर ध्यान लगाने के समय जितने समय तक ही सहस्रार में रहेगी। जब कुण्डलिनी लगातार, पूरे दिनभर, कई दिनों तक और बिना किसी योगाभ्यास के भी सहस्रार में रहने लगेगी, तभी वह सहस्रार तक चढ़ी हुई मानी जाएगी। इसे ही प्राणोत्थान भी कहते हैं। इसमें आदमी दैवीय गुणों से भरा होता है। पशुओं को आदमी की इस अवस्था का भान हो जाता है। मैं जब इस अवस्था के करीब होता हूँ, तो पशु मुझे विचित्र प्रकार से सूंघने और अन्य प्रतिक्रियाएं दिखाने लगते हैं। इसमें ही कुंडलिनी जागरण की सबसे अधिक संभावना होती है। इसके लिए सेक्सुअल योग से बड़ी मदद मिलती है। ये जरूरी नहीं कि ये सभी अनुभव तभी हों, जब कुंडलिनी जागरण हो। हरेक कुंडलिनी योगी को ये अनुभव हमेशा होते रहते हैं। कई इन्हें समझ नहीं पाते, कई ठीक ढंग से महसूस नहीं कर पाते, और कई दूसरे छोटे-मोटे अनुभवों से इन्हें अलग नहीं कर पाते। सम्भवतः ऐसा तब होता है, जब कुंडलिनी योग का अभ्यास हमेशा या लंबे समय तक नित्य प्रतिदिन नहीं किया जाता। अभ्यास छोड़ने पर कुण्डलिनी से जुड़ीं अनुभूतियां शुरु के सामान्य स्तर पर पहुंच जाती हैं। मैं एक उदाहरण देता हूँ। नहाते समय चाहे शरीर के किसी भी हिस्से में पानी के स्पर्श की अनुभूति ध्यान के साथ की जाए, वह अनुभूति एक सिकुड़न के साथ पीठ से होते हुए सहस्रार तक जाती हुई महसूस होती है। इससे जाहिर होता है कि मेरुदण्ड में ही सुषुम्ना नाड़ी है, क्योंकि वही शरीर की सभी संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुंचाती है। कुंडलिनी जागरण और कुंडलिनी योग के बीच में केवल अनुभव की मात्रा को लेकर ही भिन्नता है, अनुभव की प्रकृति को लेकर नहीं। कुंडलिनी जागरण में कुंडलिनी अनुभव उच्चतम स्तर तक पहुंच जाता है, व इससे सम्बंधित अन्य अनुभव भी शीर्षतम स्तर तक पहुंच सकते हैं। कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी फिर से एक साधारण कुंडलिनी योगी बन जाता है, ज्यादा कुछ नहीं।

मेडिटेशन एट टिप अर्थात शिखर पर ध्यान

यह एक वज्रोली क्रिया का छोटा रूप ही है। इसमें वीर्य को बाहर नहीं गिराया जाता पर पेनिस टिप या वज्रशिखा पर उसे ले जाकर वापिस ऊपर चढ़ाया जाता है। यह ऐसा ही है कि वीर्य स्खलन के बिना ही उसकी चरम अनुभूति के करीब तक संवेदना को बढ़ाया जाता है, और फिर संभोग को रोक दिया जाता है। यह ऐसा ही है कि यदि उस अंतिम सीमाबिन्दु के बाद थोड़ा सा संभोग भी किया जाए, तो वीर्य का वेग अनियंत्रित होने से वीर्यस्खलन हो जाता है। यह तकनीक ही आजकल के तांत्रिकों विशेषकर बुद्धिस्ट तांत्रिकों में लोकप्रिय है। यह बहुत प्रभावशाली भी है। यह तकनीक पिछले लेख में वर्णित अग्निदेव के कबूतर बनने की शिवपुराण कथा से ही आई है। यह ज्यादा सुरक्षित भी है, क्योंकि इसमें पूर्ण वज्रोली की तरह ज्यादा दक्षता की जरूरत नहीं, और न ही संक्रमण आदि का भय ही रहता है। दरअसल शिवपुराण में रूपकों के रूप में लिखित रहस्यात्मक कथाएं ही तंत्र का मूल आधार हैं। 

शरीर व उसके अंगों का देवता के रूप में सम्मान करना चाहिए

तंत्र शास्त्रों में आता है कि योनि में सभी देवताओं का निवास है। इसीलिए कामाख्या मंदिर में योनि की पूजा की जाती है। इससे सभी देवताओं की पूजा स्वयं ही हो जाती है। दरअसल ऐसा मूलाधार की प्रचण्ड ऊर्जा के कारण ही होता है। वास्तव में यही मूलाधार को ऊर्जा देती है। उससे वहाँ कुंडलिनी चित्र का अनुभव होता है। क्योंकि मन में सभी देवताओं का समावेश है, और कुंडलिनी मन का सारभूत तत्त्व या प्रतिनिधि है, इसीलिए ऐसा कहा जाता है। इसलिए पिछले लेख में वर्णित रूपक के कुछ यौन अंशों को अन्यथा नहीं लेना चाहिए। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार शरीर के सभी अंग भगवदस्वरूप हैं। पुराणों के अनुसार भी शरीर के सभी अंग देवस्वरूप हैं। शरीर में सभी 33 करोड़ देवताओं का वास है। इसका मतलब तो यह हुआ कि शरीर का हरेक सेल या कोशिका देवस्वरूप ही है। इससे यह अर्थ भी निकलता है कि शरीर की सेवा और देखभाल करना सभी देवताओं की पूजा करने के समान ही है। पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में यह सभी कुछ तथ्यों के साथ सिद्ध किया गया है। यह शरीर सभी पुराणों का और शरीरविज्ञान दर्शन का सार है। पुराण पुराने समय में लिखे गए थे, पर शरीरविज्ञान दर्शन आधुनिक है। इसलिए शरीर के किसी भी अंग का अपमान नहीं करना चाहिए। शारीरिक अंगों का अपमान करने से देवताओं का अपमान होता है। ऐसा करने पर देवता तारकासुर रूपी अज्ञान को नष्ट करने में मदद नहीं करते, जिससे आदमी की मुक्ति में अकारण विलंब हो जाता है। कई लोग धर्म के नाम पर इसलिए नाराज हो जाते हैं कि किसी देवता की तुलना शरीर के अंग से क्यों कर दी। इसका मतलब तो भगवदस्वरूप शरीर और उसके अंगों को तुच्छ व हीन समझना हुआ। एक तरफ वे देवता को खुश कर रहे होते हैं, पर दूसरी तरफ भगवान को नाराज कर रहे होते हैं।

कुंडलिनी तांत्रिक योग को यौन-संभोग प्रवर्धन व वीर्य रूपांतरण की सहायता से दिखाता हिंदु शिवपुराण~संभोग से समाधि

ॐ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगिन्द्रहारम् सदावसंतं हृदयारविन्दे भवंभवानीसहितं नमामि

मित्रो, शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के साथ देवी पार्वती का विवाह हुआ। फिर वे पार्वती के साथ कामक्रीड़ा करते हुए विहार करते रहे। उनको रमण करते हुए सैंकड़ों वर्ष बीत गए, पर वे उससे उपरत नहीँ हुए। इससे सभी देवता उदास होकर ब्रह्मा के पास चले गए। ब्रह्मा उन सबको साथ लेकर भगवान नारायण के पास चले गए। नारायण ने उन्हें समझाया कि किसी पुरुष और स्त्री के जोड़े को आपसी रमण करने से नहीं रोकना चाहिए। यदि कोई ऐसा करता है, तो उसे अपनी पत्नी और संतानों से वियोग का दुःख झेलना पड़ता है। उन्होंने ऐसे बहुत से लोगों का उदाहरण दिया जिन्होंने ऐसा किया था और जिसका दण्ड भी उन्हें मिला था। फिर उन्होंने कहा कि भगवान शिव एक हजार साल तक पार्वती के साथ संभोग करेंगे। उसके बाद वे उससे उपरत हो जाएंगे। इसलिए तब तक देवताओं को उनसे न मिलने की सलाह दी। परन्तु एक हजार साल बाद भी शिव और पार्वती गुफा से बाहर नहीं निकले। उन दोनों की रतिक्रीड़ा से भू कम्पित होने लगी, और जिस कच्छप और शेषनाग पर धरती टिकी हुई है, उनकी थकावट के कारण वायुमंडल की वायु भी स्तम्भित जैसी होने लग गई।  तब सभी देवता व्याकुल होकर उस गुफा के द्वार के पास पहुंच गए। उस समय शिव-पार्वती संभोग में क्रीड़ारत थे। देवताओं ने दुखभरी आवाज में रुदन करते हुए शिव की स्तुति की, और राक्षस तारकासुर द्वारा अपने ऊपर किए गए अत्याचार से उन्हें अवगत कराया। भगवान शिव उनका रुदन सुनकर पार्वती को छोड़कर करुणावश उनसे मिलने द्वार तक आ गए। शिव ने उन्हें समझाया कि होनी को कोई नहीं टाल सकता, यहाँ तक कि वे खुद भी नहीं। फिर उन्होंने कहा कि जो होना था, वह हो गया, अब आगे की स्थिति स्पष्ट करते हैं। शिव ने कहा कि जो उनके वीर्य को ग्रहण कर सके, वही राक्षस तारकासुर से सुरक्षा दिला सकता है। सभी देवताओं ने इसके लिए अग्नि देवता को आगे किया। फिर शिव ने आश्वस्त होकर अपना वीर्य धरा पर गिरा दिया। अग्नि देवता ने कबूतर बनकर अपनी चोंच से उस वीर्य का पान कर लिया। तभी पार्वती अंदर से रुष्ट होकर बाहर आई, और देवताओं के ऊपर क्रोध करते हुए उन पर आरोप लगाने लगी कि उन्होंने उसके संभोग के आंनद में विघ्न पैदा करके उसे बन्ध्या बना दिया। ऐसा कहते हुए उसने उनको श्राप दे दिया कि वे भी वन्ध्या की तरह निःसंतान रहेंगे। फिर अग्नि देवता को फटकारते हुए कहा कि उसने वीर्यपान जैसा नीच कर्म किया है, इसलिए वह कहीं शान्ति प्राप्त नहीं करेगा, और दाहकता से जलता रहेगा। वीर्य के असह्य तेज से परेशान होकर वह महादेव की शरण में चला गया, और उनसे अपनी व्यथाकथा सुनाई। महादेव शिव ने उसकी जलन कम करने के लिए एक उपाय बताया। उन्होंने कहा कि यदि माघ या जनवरी के महीने में प्रातः जल्दी स्नान करने वाली सात स्त्रियां इस वीर्य को अपनी योनि में ग्रहण करें, तो उसे उस वीर्य की जलन से छुटकारा मिल जाएगा। फिर देवी पार्वती भगवान शिव को फिर से गुफा के भीतर ले गई, और उनके साथ संभोग सुख प्राप्त करते हुए गणेश नामक पुत्र को उत्पन्न किया। तभी गुफा द्वार पर स्थित देवताओं के समक्ष आठ ऋषिपत्नियाँ पहुंच गईं। उन्हें माघ महीने के ठंडे जल के स्नान से ठंड लगी थी, इसलिए उनमें से सात स्त्रियां उस अग्नि के समीप जाने लगीं। एक अन्य ऋषिपत्नी अरुंधति को सब पता था, इसलिए उसने उन्हें रोका भी, पर वे नहीं रुकीं। अग्नि के पहुंचते ही अग्नि की सूक्ष्म चिंगारियों से होता हुआ वह वीर्य उनके अंदर प्रविष्ट हो गया, और वे गर्भवती हो गईं। जब उनके पति ऋषियों को इस बात का पता चला, तो उन्हें व्यभिचारिणी कहते हुए उनका परित्याग कर दिया। अब वे अपने कृत्य पर पछताते हुए दुनिया में इधर-उधर भटकने लगीं। उनसे वीर्य की जलन नहीं सही जा रही थी। वे हिमालय पर्वत पे चली गईं और उस वीर्य को हिमालय को देकर जलन और दबाव के भार से मुक्त हो गईं। जब हिमालय से वह वीर्यतेज नहीँ सहा गया, तो उसने वह गंगा नदी को दे दिया। गंगा भी उस वीर्य के तेज से परेशान हो गई, और उसने उसे अपने किनारे पर उगे सरकंडों में उड़ेल दिया। वहाँ पर उससे एक सरकंडे के ऊपर एक बालक ने जन्म लिया। उसके जन्म लेते ही चारों ओर खुशियां छा गईं। अनजाने में ही शिव और पार्वती परम प्रसन्नता, ताजगी व किसी बड़े बोझ के खत्म होने का अनुभव करने लगे। अत्यधिक प्रेम उमड़ने के कारण पार्वती के स्तनों से खुद ही दूध निकलने लगा। उनके निवास पर चारों ओर उत्सव के जैसा माहौल छा गया। देवता खुशियां मनाने लगे, और तारकासुर जैसे राक्षसों का अंत निकट मानने लगे। वह बालक कार्तिकेय के नाम से विख्यात हुआ, जिसने बड़े होकर तारकासुर का वध किया।

उपरोक्त रूपक का मनोवैज्ञानिक व कुण्डलिनीयोग परक विश्लेषण

शिव एक जीव की आत्मा है। जीवात्मा और परमात्मा में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। पार्वती उसकी पत्नि है। जीव हरेक मनुष्य जन्म में अपनी पत्नी के साथ भरपूर सहवास करता है, पर जीवन-मरण से मुक्ति का उपाय नहीं करता। देवताओं ने जगत और जीव के शरीर का निर्माण इसलिए किया है, ताकि उसमें रहने वाली जीवात्मा मुक्त हो सके। उससे देवताओं को भी फायदा होता है, क्योंकि वे फिर जीव की सीमित देह के बंधन को त्याग कर पूर्ववत अपनी असीमित ब्रह्मांडीय देह में विहार करने लगते हैं। कुछ जन्मों तक तो वे लोकपालक विष्णु की आज्ञा से उसे संभोग सुख में डूबे रहने देते हैं। पर जब उसके दसियों जन्म ऐसे ही बीत जाते हैं, तब विष्णु भी देवताओं के साथ मिलकर उसे मनाने चल पड़ते हैं। आध्यात्मिक मुक्ति के सम्बंध में मनुष्य को प्रकृति ने स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है, इसलिए उस पर जोरजबरदस्ती तो नहीं चल सकती। इसका मतलब है कि देवताओं को प्रेम से उसकी प्रार्थना और स्तुति करनी पड़ती है। देवता उससे कहते हैं कि राक्षस तारकासुर उन्हें परेशान करता है, और आपका पुत्र ही उसका वध कर सकता है। तारकासुर अज्ञान का प्रतीक है, क्योंकि वह आदमी को अंधा कर देता है। जीव का पुत्र कुंडलिनी को कहा गया है। दरअसल जीव लिंग रूप में है, और उसकी पत्नी योनि रूप में है, जो गुहारूप ही है। देवपूजा आदि विभिन्न आध्यात्मिक साधनाओं से व सत्संग से उसके मन में कुंडलिनी का विकास होता है। उसके साथ संभोग की शक्ति भी मिश्रित हो जाती है। उसी प्रचण्ड कुंडलिनी के प्रभाव से उसके शरीर में कम्पन पैदा होने लगता है, और साँसे भी उखड़ने लगती हैं। इसीको रूपक कथा में धरती के कम्पन और वायु के स्तम्भन के रूप में दर्शाया गया है। जीव का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में फैला हुआ है, जिसकी आकृति एक फन उठाए हुए नाग से मिलती है। कुंडलिनी चित्र उसी केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में पलता और बढ़ता है। स्वाभाविक है कि प्रचंड कुंडलिनी के वेग से वह थक जाएगा। साँसों की गति व शरीर के कम्पन को भी वही केंद्रीय तंत्रिका तंत्र नियंत्रित करता है। उसकी थकावट से ही साँसे अनियमित, लम्बी या उखड़ी हुई सी हो जाती हैं। इसीको योगासन और प्राणायाम भी कह सकते हैं। इसीको रूपक में यह कह कर बताया गया है कि शेषनाग की थकान से वायुमंडल की वायु स्तम्भित होने लगी। वही कुंडलिनी उसे संभोग के समय स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र के आसपास महसूस होती है। इसीको समस्त देवताओं का गुहाद्वार पर इकट्ठे होने के रूप में दर्शाया गया है। क्योंकि कुंडलिनी ही पूरे शरीर का अर्थात सभी देवताओं का सार है। फिर शिवलिंग रूपी शिव गुफा से बाहर आते हैं। जीव को परमात्मा शिव की प्रेरणा से आभास हो जाता है कि जब जननांग क्षेत्र में वीर्य तत्त्व से कुंडलिनी चित्र इतना अधिक घनीभूत हो जाता है, तब उसे मस्तिष्क को चढ़ाकर समाधि या कुंडलिनी जागरण को अवश्य प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए वह अपने ही शरीर के अंतर्गत स्थित देवताओं से कहता है कि जो उसके वीर्य के तेज को धारण कर पाएगा, वह तारकासुर के वध में सहायक होगा। फिर जीव अपनी पुट्ठे की, पेट की व मूत्रनालिका की मांसपेशियों को जोर से ऊपर की ओर सिकोड़ता हुआ वीर्य को ऊपर की ओर खींचता है। इस शक्तिशाली कर्म से शरीर में गर्मी चढ़ जाती है। इसे ही अग्नि देवता द्वारा वीर्यपान कहा गया है। वीर्य का चुसाव जननेन्द्रिय से शुरु होता है, जिसकी आकृति एक चोंच वाले पक्षी की तरह है। इसीको अग्नि द्वारा कबूतर बन कर अपनी चोंच से वीर्यपान करना बताया गया है। कई तांत्रिक हठयोगी तो इस क्रिया में इतनी महारत हासिल कर लेते हैं कि वे वीर्य को बाहर गिराकर भी वापिस ऊपर खींच लेते हैं। इस तकनीक को तंत्र में वज्रोली क्रिया कहा जाता है। इससे क्योंकि योनि में वीर्य नहीं गिरता, इसलिए स्वाभाविक है कि गर्भ नहीं बनेगा। यही पार्वती के द्वारा देवताओं को श्राप देना है। क्योंकि शरीर देवताओं से ही बना है, इसलिए स्वाभाविक है कि जीव के निःसन्तान होने से देवता भी निःसन्तान अर्थात बन्ध्या हो जाएंगे। वीर्य को धारण करने से जननांग में एक दबाव सा या जलन सी पैदा हो जाती है। यही पार्वती द्वारा अग्निदेव को दिया गया श्राप है। परमात्मा शिव रूपी गुरु की आज्ञा से जीव अपनी जननेन्द्रिय के वीर्य के तेज को अपने शरीर के सातों चक्रों के ऊपर प्रतिस्थापित कर देता है। क्योंकि आठवां चक्र शरीर के बाहर और मस्तिष्क से थोड़ा ऊपर होता है, इसलिए वह उसे वीर्यतेज नहीं दे पाता। नहाते समय चक्रों पर एक आनन्दमयी संवेदना और सिकुड़न पैदा होती है। पानी जितना ठंडा होता है, यह अनुभव इतना ही ज्यादा होता है। इसीलिए शास्त्रों में सभी के लिए, विशेषकर योगियों के लिए वर्षभर प्रातः जल्दी उठकर ठंडे पानी से नहाने की हिदायत दी गई है। अपनी सिकुड़न की शक्ति से चक्र उस वीर्यतेज को जननांग से अपनी ओर खींच लेते हैं। यही ऋषिपत्नियों का ठंड के मारे अग्नि के निकट जाकर आग तपना, और अग्नि की सूक्ष्म चिंगारियों के माध्यम से उनके अंदर वीर्यतेज का प्रविष्ट होना है। क्योंकि माघ का महीना सबसे ठंडा होता है, इसलिए स्वाभाविक है कि यह प्रक्रिया तब सर्वाधिक होती है। इसीको रूपक में उन आठ स्त्रियों, सात स्त्रियों व माघ माह में उनके ठंडे पानी से स्नान के रूप में दिखाया गया है। क्योंकि कुंडलिनीयुक्त हठयोग से भी चक्रों पर ठंडे पानी के जैसा प्रभाव पड़ता है, इसलिए यह रूपक अंश कुंडलिनी योग के हठयोग भाग (विशेषकर आसनों) का भी प्रतीक है। मन को ऋषि के रूप में दिखाया गया है। अलग-अलग चक्रों में मन के अलग-अलग विचार दबे होते हैं। इसलिए चक्रों को ही ऋषिपत्नियाँ कहा गया है। चक्र एक छल्ले के सुराख के जैसी आकृति है, इसलिए इसे योनिरूप में दर्शाया गया है। चक्र में छिपा मन का विचार स्त्रीरूप है। उसमें स्थापित वीर्य का तेज पुरुषरूप है। दोनों का मिलन होने से गर्भ बनता है। इसीको ऋषिपत्नियों का गर्भवती होना बताया गया है। चक्र पर वीर्य का तेज भी ज्यादा शक्तिशाली नहीं होता, और कुंडलिनी विचार भी मस्तिष्क के कुंडलिनी विचार की तरह मजबूत नहीं होता। इसलिए वह गर्भ कामयाब नहीं हो पाता। गर्भ और वीर्य के तेज से चक्रों को जलन महसूस होने लगी। वीर्य के तेज से चक्र पर इधर-उधर के फालतू विचारों का शोर थम गया, और उनकी जगह एकमात्र कुंडलिनी विचार ने ले ली। मतलब मन ने चक्र का साथ छोड़ दिया, क्योंकि विचारों का समूह ही मन है। यही ऋषियोँ के द्वारा अपनी पत्नियों को व्यभिचार का आरोप लगाकर छोड़ना है। सबसे अधिक जलन और दबाव स्वाधिष्ठान चक्र को महसूस होता है। चक्रों ने गर्भ सहित उस वीर्यतेज को रीढ़ की हड्डी को दे दिया। मतलब कि जीव ने स्वाधिष्ठान चक्र की जलन के साथ रीढ़ की हड्डी को उसके ध्यान के साथ अनुभव किया। रीढ़ की हड्डी मूलाधार चक्र से मस्तिष्क तक जाती है। पर उसकी अनुभूति पिछले स्वाधिष्ठान चक्र से पिछले आज्ञा चक्र तक ज्यादा होती है। यही ऋषिपत्नियों के द्वारा अपने अंदर प्रविष्ट वीर्य और गर्भ के तेज को हिमालय को देना है। नीचे का, पुट्ठे वाला क्षेत्र पर्वत का निचला आधार है, और मस्तिष्क उस पर्वत का ऊपरी आधार या शिखर है, जबकि रीढ़ की हड्डी उन दोनों मूलभूत आधारों को जोड़ने वाली एक पतली, लम्बी और ऊंची पहाड़ी है। हड्डी में यह सामर्थ्य नहीँ है कि वह अपने अंदर स्थित वीर्यतेज को प्रवाहित कर सके, क्योंकि वह स्थूल व कठोर होती है। इससे वीर्य का तेज उसके विभिन्न व विशेष बिंदुओं पर एकस्थान पर ही दबाव डालने लगा। ये सभी बिंदु फ्रंट चैनल के चक्रों की सीध में ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी में होते हैं। इनमें से दो मुख्य बिंदु हैं, पीछे का स्वाधिष्ठान चक्र और पीछे का आज्ञा चक्र। वीर्यतेज के ज्यादा होने पर अनाहत चक्र के क्षेत्र में भी बनता है। और ज्यादा होने पर नाभि चक्र के क्षेत्र में भी बन जाता है, इस तरह से। जब तांत्रिक शक्ति से सम्पन्न, नियमित, व निरंतर योगाभ्यास से वीर्य का तेज बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब वह रीढ़ की हड्डी से सुषुम्ना नाड़ी में चला जाता है। इसीको इस तरह से लिखा गया है कि जब हिमालय के लिए वीर्यतेज असहनीय हो गया तो उसने उसे गंगा नदी में उड़ेल दिया। गंगा नदी यहाँ सुषुम्ना नाड़ी को कहा गया है। सुषुम्ना से होता हुआ वह प्रकाशमान तेज एक विद्युत रेखा के रूप में सहस्रार में प्रविष्ट हो जाता है। वहाँ उस तेज की शक्ति से कुंडलिनी जागृत हो जाती है। इसको रूपक के तौर पर ऐसा लिखा गया है कि गंगा के प्रवाह में बहता हुआ वह वीर्य गंगा के लिए असह्य हो गया। इसलिए गंगा ने उसे किनारे पर उगी हुई सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। वहाँ उससे एक सरकंडे के ऊपर एक बालक का जन्म हुआ। सरकंडे की घास वाला किनारा यहाँ मस्तिष्क के लिए कहा गया है। मस्तिष्क को ढकने वाली खोपड़ी पर सरकंडे की तरह पैने और चुभने वाले बाल होते हैं। दोनों को ही पशु नहीं खाते। सरकंडे की घास में जड़ से निकलने वाली कुछ ऐसी शाखाएं भी होती हैं, जिन पर फूल लगते हैं। वे बांस की तरह लकड़ीनुमा और गाँठेदार होती हैं। उनसे लकड़ी का छोटामोटा और सजावटी फर्नीचर भी बनाया जाता है। उन पर पत्तों की घनी छाल लगी होती है, जिसको निकालकर और कूट कर एक रेशा निकाला जाता है। उससे मूँज की रस्सी बनाई जाती है। इसीलिए मूँज एक आध्यात्मिकता और सात्विकता का प्रतीक भी है। दरअसल सरकंडा एक बहुपयोगी पौधा है, जो नदी या तालाब के किनारों पर उगता है। सरकंडे की उस पुष्पगुच्छ वाली शाखा में इसी तरह बीच-बीच में गाँठे होती हैं, जिस तरह रीढ़ की हड्डी में चक्र। सम्भवतः इसीलिए उसपर बालक का जन्म बताया गया है। कुंडलिनी चित्र का जागरण ही बालक का जन्म है। पर यह भौतिक बालक नहीं, मानसिक बालक होता है। अगर जागरण न भी हो, तो भी कुंडलिनी चित्र का मन में दृढ़ समाधि के तौर पर स्थायी और स्पष्ट रूप से बने रहना भी कुंडलिनी-बालक का जन्म ही कहा जाएगा। वीर्य इसे बाहर निकलकर पैदा नहीं करता, बल्कि अंदर या उल्टी दिशा में जाकर पैदा करता है। ब्रह्मा भी एक मानसिक चित्र ही है, इसीलिए उसे अयोनिज कहा जाता है। मतलब वह जो योनि से पैदा न हुआ हो। कोई शंका कर सकता है कि केवल एक बार के यौनयोग से कैसे कुंडलिनी जागरण या दृढ़ समाधि की प्राप्ति हो सकती है। पर यह हो भी सकता है। प्रसिद्ध व महान तंत्र दार्शनिक ओशो कहते थे कि यदि एक बार भी ठीक ढंग से संभोग के साथ समाधि का अनुभव हो जाए, तो भी आध्यात्मिक सफलता मिल जाती है। यह अलग बात है कि वे ऐसे तांत्रिक रहस्यों को खुले तौर पर, प्रत्यक्ष तौर पर और मौखिक भाषणों के रूप में आम जनमानस के बीच ले गए, जिससे गलतफहमी से उनके बहुत से दुश्मन और आलोचक भी बन गए। यह भी आशंका जताई जाती है कि सम्भवतः उनकी मृत्यु के पीछे किसी साजिश का हाथ हो। इसलिए तंत्र को गुप्त कला या गुह्य विद्या कहा जाता है। यद्यपि इसे आज की खुली दुनिया में छिपाना ठीक नहीं है, फिर भी कुछ गोपनीयता की आवश्यकता है, और अपात्र, अनिच्छुक, अविश्वसनीय, विश्वासहीन और असमर्पित व्यक्ति के सामने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रकट नहीं किया जाना चाहिए। लेखक की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत पहचान दिखाए बिना और किसी संभावित लक्ष्य को तय किए बिना, और स्वार्थ व पक्षपात के बिना, सभी के लिए ऑनलाइन ब्लॉग में इसे प्रदर्शित करना आज के मुक्तसमाज में गोपनीयता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है। सम्भवतः इसी गोपनीयता को बनाए रखने के लिए ही पुराणों के लेखक ने कभी भी अपना नाम और पता सार्वजनिक नहीं किया। हर जगह लेखक को दर्शाने के लिए ‘व्यास’ शब्द लिखा गया है, जो सभी आध्यात्मिक कथावाचकों के लिए दिया गया एक आम सामान्य शब्द है। कुंडलिनी जागरण से शरीर का आधा बायाँ भाग और आधा दायाँ भाग, दोनों बराबर मात्रा में पुष्ट और प्रसन्न हो गए। कुंडलिनी चित्र यहाँ बाएँ भाग या स्त्री या पार्वती की खुशी का प्रतीक है, और भटकती हुई आत्मा की शांति यहाँ दाएँ भाग या पुरुष या शिव की खुशी का प्रतीक है। मतलब कि एकदूसरे से बिछुड़े हुए शिव और पार्वती अपने पुत्र के रूप में एक दूसरे में एक हो गए। जीव कभी पूर्ण और एक था। पर माया की शक्ति से वह दो टुकड़ों में बंट कर अपूर्ण हो गया। तभी से वे दोनों टुकड़े एक होने का प्रयास कर रहे हैं। जीव के द्वारा फिर से पूर्ण होने के लिए की गई आपाधापी से ही जीव और जगत का विकास होता है। तांत्रिक जोड़े के पुरुष और स्त्री भाग या पार्टनर, दोनों भी वीर्यतेज के बोझ, दबाव, व दाह से मुक्त होकर सुप्रसन्न हो गए। पूरे मन में हर्षोल्लास व आनन्द छा गया। शरीर का रोम-रोम खिल गया। इसी को कथा में ऐसे दर्शाया गया है कि उस बालक के जन्म लेने पर शिव व पार्वती, और सभी देवता दोनों बहुत प्रसन्न हुए, और चारों ओर हर्षोल्लास छा गया। कुंडलिनी जागरण के बाद कुंडलिनी चित्र मन में अधिक से अधिक स्पष्ट और स्थायी होता गया। फिर वह स्थायी समाधि के रूप में मन में लगातार बना रहने लगा। उस स्थायी समाधि से जगत के प्रति आसक्ति क्षीण होती गई, और अद्वैत भावना बढ़ती रही। फिर जीवात्मा को अपनी जीवनमुक्ति का आभास हुआ। यही उसके अज्ञान का अंत था। इसको मिथक कथा में इस तरह दिखाया गया है कि वह बालक बड़ा होकर कार्तिकेय नाम से विख्यात हुआ, जिसने राक्षस तारकासुर का वध किया। साथ में, इस कथा के बारे में यह भी लिखा गया है कि जो कोई इस कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़ेगा या सुनेगा, वह जगत के सारे सुख प्राप्त करते हुए आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करेगा। इसका मतलब है कि यह मिथकीय व रूपकात्मक कथा तांत्रिक कुंडलिनी योग का ही वर्णन कर रही है। यदि यह साधारण सहवास, पुत्रजन्म या राक्षसवधकी कथा होती, तो आध्यात्मिक मुक्ति की बात तो दूर की, साधारण लौकिक सुखों की प्राप्ति में भी संदेह होता।

तंत्र की उत्पत्ति की प्राचीनता, वीर्य रोकना, उसे धारण करना, उसका उदात्तीकरण और रूपांतरण

मित्रो, इसके अलावा, उपरोक्त कहानी कुंडलिनी योग अभ्यास, समाधि, कुंडलिनी जागरण, आध्यात्मिक परिवर्तन और मुक्ति में त्वरित सफलता की प्राप्ति के लिए प्रामाणिक स्रोत के रूप में कार्य करती है, जो प्राचीन काल के प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही इन तथाकथित गुप्त या गोपनीय या विवादास्पद प्रथाओं की मदद से सबसे आसानी से प्राप्त की जा सकती है। हालाँकि, इन सबसे तेज़ी से काम करने वाली विद्याओं का अभ्यास करते समय स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से मुख्य रूप से यौन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी विचार किया जाना चाहिए। इसके अलावा, इस वेबसाइट और ब्लॉग की अन्य सभी सामग्री की तरह, यह लेख भी पूरी तरह से व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। यह केवल सैद्धांतिक या शाब्दिक नहीं है। इन्हें इसलिए शाब्दिक रूप से प्रस्तुत किया गया है और वेदों, पुराणों, शास्त्रों और अन्य आध्यात्मिकता उन्मुख दस्तावेजों में वर्णित प्राचीन विश्वास और प्रथाओं से इनका मिलान इसलिए किया गया है, ताकि इन्हें और ज्यादा प्रामाणिक बनाया जा सके और आम जनता के मन में इनके प्रति आस्था और विश्वास पैदा किया जा सके। यहां हम एक अतिरिक्त अंतर्दृष्टि यह जोड़ना चाहते हैं कि जो कथा में वीर्य पीने से उत्पन्न कबूतर के कंठ में स्थायी जलन कही गई है, वह वास्तविक परिदृश्य में प्रोस्टेट ग्रंथि की सूजन प्रतीत होती है। वह भी लगभग स्थायी जैसी होती है और किसी भी इलाज से आसानी से नहीं जाती।। कुंडलिनी योग की चक्र साधना, शक्ति चालन और ठंडे जल से स्नान से उससे अस्थायी राहत जरूर मिलती है। हालांकि यह जलन व्यक्ति व्यक्ति की शरीरगत भिन्नता पर भी निर्भर कर सकती है।

कुंडलिनी योग का निरूपण करती हुई श्रीमद्भागवत गीता

श्रीकृष्णेन गीता

मित्रों, एक मित्र ने मुझे कुछ दिनों पहले व्हाट्सएप पर ऑनलाइन गीता भेजना शुरु किया। एक श्लोक सुबह और एक शाम को प्रतिदिन भेजता है। उसमें मुझे बहुत सी सामग्री मिली जो कुंडलिनी और अद्वैत से सम्बंधित थी। कुछ ऐसे बिंदु भी मिले जिनके बारे में समाज में भ्रम की स्थिति भी प्रतीत होती है। वैसे तो गीता के संस्कार मुझे बचपन से ही मिले हैं। मेरे दादाजी का नाम गीता से शुरु होता था, और वे गीता के बहुत दीवाने थे। मैंने भी गीता के ऊपर विस्तृत टीका पढ़ी थी। पर पढ़ने और कढ़ने में बहुत अंतर होता है।

गीता के चौथे अध्याय के 29वें श्लोक में तांत्रिक कुंडलिनी योग का वर्णन

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४-२९॥

इस श्लोक की पहली पंक्ति का शाब्दिक अर्थ है कि कुछ योगी अपान वायु में प्राणवायु का हवन करते हैं। प्राण वायु शरीर में छाती से ऊपर व्याप्त होता है। अपान वायु स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र के क्षेत्रों में व्याप्त होता है। जब आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर एकसाथ ध्यान किया जाता है, तब स्वाधिष्ठान चक्र पर प्राण और अपान इकट्ठे हो जाते हैं। इससे स्वाधिष्ठान चक्र पर कुंडलिनी चमकने लगती है। योग में स्वाधिष्ठान की जगह पर मणिपुर चक्र को भी रखते हैं। फिर प्राण और अपान का हवन समान वायु में होता है। फिर भी इसे अपान में प्राण का हवन ही कहते हैं, क्योंकि अपान वहाँ से प्राण की अपेक्षा ज्यादा नजदीक होता है। कई बार एक ही चक्र का, सहस्रार का या आज्ञा चक्र का ध्यान किया जाता है। फिर हल्का सा ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र का या मूलाधार चक्र का किया जाता है। इससे ऊपर का प्राण नीचे आ जाता है, और वह अपान बन जाता है। एक प्रकार से अपान प्राण को खा जाता है, वैसे ही जैसे अग्नि समिधा या हविष्य को खा जाती है। इसीलिए यहाँ अपान में प्राण का हवन लिखा है। राजयोगी प्रकार के लोग सांसारिक आधार को अच्छी तरह से प्राप्त करने के लिए इस भेंट को अधिक चढ़ाते हैं, क्योंकि उनके वैचारिक स्वभाव के कारण उनके शीर्ष चक्रों में बहुत ऊर्जा होती है।
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति का शाब्दिक अर्थ है कि कुछ दूसरे लोग प्राण में अपान का हवन करते हैं। जब आज्ञा चक्र, अनाहत चक्र और मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र का एकसाथ ध्यान किया जाता है, तब अनाहत चक्र पर प्राण और अपान इकट्ठे हो जाते हैं। क्योंकि आज्ञा चक्र के साथ अनाहत चक्र पर भी प्राण ही है, इसीलिए कहा जा रहा है कि अपान का हवन प्राण अग्नि में करते हैं। इसमें भी कई बार दो ही चक्रों का ध्यान किया जाता है। पहले मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान किया जाता है। फिर हल्का सा ध्यान सहस्रार या आज्ञा चक्र की तरफ मोड़ा जाता है। इससे नीचे का अपान एकदम से ऊपर चढ़ कर प्राण में मिल जाता है। इसे ही अपान का प्राण में हवन लिखा है। ध्यान रहे कि कुंडलिनी ही प्राण या अपान के रूप में महसूस होती है। तांत्रिक प्रकार के लोग इस प्रकार की भेंट अधिक चढ़ाते हैं, क्योंकि उनके नीचे के चक्रों में बहुत ऊर्जा होती है। इससे उन्हें कुंडलिनी सक्रियण और जागरण के लिए आवश्यक मानसिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
तीसरी और चौथी पंक्ति का शब्द है कि प्राणायाम करने वाले लोग प्राण और अपान की गति को रोककर, मतलब प्रश्वास और निश्वास को रोककर ऐसा करते हैं। योग में यह सबसे महत्त्वपूर्ण है। वास्तव में यही असली और मुख्य योग है। अन्य क्रियाकलाप तो केवल इसके सहायक ही हैं। प्रश्वास अर्थात अंदर साँस भरते समय प्राण मेरुदंड से होकर ऊपर चढ़ता है। उसके साथ कुंडलिनी भी। निःश्वास अर्थात साँस बाहर छोड़ते समय प्राण आगे की नाड़ी से नीचे उतरता है, मतलब वह अपान को पुष्ट करता है। इसके साथ कुंडलिनी भी नीचे आ जाती है। फिर प्रश्वास के साथ दुबारा पीछे की नाड़ी से ऊपर चढ़ता है। यह चक्र चलता रहता है। इससे कुंडलिनी एक जगह स्थिर नहीं रह पाती, जिससे उसका सही ढंग से ध्यान नहीं हो पाता। प्राण को तो हम रोक नहीं सकते, क्योंकि यह नाड़ियों में बहने वाली सूक्ष्म शक्ति है। हाँ, हम प्राणवायु या साँस को रोक सकते हैं, जिससे प्राण जुड़ा होता है। इस तरह साँस प्राण के लिए एक हैन्डल का काम करता है। जब साँस रोकने से प्राण स्थिर हो जाता है, तब हम उसे या कुंडलिनी को ध्यान से नियंत्रित गति दे सकते हैं। साँस लेते समय हम उसे ध्यान से ज्यादा नियंत्रित नहीं कर सकते, क्योंकि साँसे उसे इधर-उधर नचाती रहती हैं। अंदर जाती हुई साँस के साथ प्राण और कुँडलिनी पीठ की नाड़ी से ऊपर चढ़ते हैं, और बाहर जाती हुई साँस के साथ आगे की नाड़ी से नीचे उतरते हैं। साँस को रोककर प्राण और कुंडलिनी दोनों रुक जाते हैं। कुंडलिनी के रुकने से मन भी स्थिर हो जाता है, क्योंकि कुंडलिनी मन का ही एक प्रायोगिक अंश जो है। पूरे मन को तो हम एकसाथ काबू नहीं कर सकते, इसीलिए कुंडलिनी के रूप में उसका एक एक्सपेरिमेंटल टुकड़ा या सैम्पल टुकड़ा लिया जाता है। इसी वजह से तो कुंडलिनी योग के बाद मन की स्थिरता व शांति के साथ आनन्द महसूस होता है। प्राण एक ही है। केवल समझाने के लिए ही जगह विशेष के कारण उसे झूठमूठ में विभक्त किया गया है, जिसे प्राण, अपान आदि। प्राण और अपान को किसी चक्र पर, कल्पना करो मणिपुर चक्र पर आपस में भिड़ाने के लिए साँस को रोककर मुख्य ध्यान मणिपुर चक्र पर रखा जाता है, और साथ में तिरछा ध्यान आज्ञा चक्र और मूलाधार पर भी रखा जाता है। इससे ऊपर का प्राण नीचे और नीचे का अपान ऊपर आकर मणिपुर चक्र पर आपस में भिड़ जाते हैं। इससे वहाँ कुंडलिनी उजागर हो जाती है। हरेक चक्र पर इन दोनों को एक बार बाहर साँस छोड़कर व वहीँ रोककर भिड़ाया जाता है, और एक बार साँस भरकर व वहीं रोककर भिड़ाया जाता है। यह ध्यान में रखना चाहिए कि साँस को अपनी सामर्थ्य से अधिक देर तक नहीं रोकना चाहिए। अपनी बर्दाश्त की सीमा को लांघने से मस्तिष्क को हानि पहुंच सकती है।

बीच वाले चक्र पर हाथ रखकर ध्यान लगाने में मदद मिलती है। इसी तरह, सिद्धासन में बैठने पर एक पैर की एड़ी के दबाव से मूलाधार पर दबाव की संवेदना महसूस होती है, और दूसरे पैर से स्वाधिष्ठान चक्र पर। इस संवेदना से भी चक्र के ध्यान में मदद मिलती है। पर याद रखो कि पूर्ण सिद्धासन से कई बार घुटने में दर्द होती है, खासकर उस टांग के घुटने में जिसकी ऐड़ी स्वाधिष्ठान चक्र को स्पर्श करती है। इसलिए ऐसी हालत में अर्ध सिद्धासन लगाना चाहिए। इसमें केवल एक टांग की एड़ी ही मूलाधार चक्र को स्पर्श करती है। दूसरी टांग पहली टांग के ऊपर नहीं बल्कि जमीन पर नीचे आराम से टिकी होती है। घुटनों के दर्द की लंबी अनदेखी से उनके खराब होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

गीता के चौथे अध्याय के 30वें श्लोक में राजयोग का निरूपण

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।सर्वेऽप्येते यज्ञविदोयज्ञक्षपितकल्मषाः॥४-३०॥

इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ है कि नियमित आहार-विहार वाले लोग प्राणों का प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं॥30॥

नियमित आहार-विहार वाले योगी राजयोगी होते हैं। ये तांत्रिक पंचमकारों का आश्रय नहीं लेते। इसलिए इनके शरीर के निचले भागों में स्थित चक्र कमजोर होते हैं, वहाँ पर प्राणशक्ति या अपान की कमी से। ये मस्तिष्क से हृदय तक ही, शरीर के ऊपर के चक्रों में कुंडलिनी का ध्यान करते हैं। ये मुख्यतया ध्यान का त्रिभुज बनाते हैं। उस त्रिभुज का एक बिंदु सहस्रार चक्र होता है, दूसरा बिंदु आगे का आज्ञा चक्र होता है, और तीसरा बिंदु पीछे का आज्ञा चक्र होता है। इसमें एक बिंदु पर खासकर आगे के आज्ञा चक्र पर सीधा या मुख्य ध्यान लगा होता है, और बाकि दोनों चक्रों पर तिरछा या गौण ध्यान। बिंदुओं को आपस में बदल भी सकते हैं। इसी तरह त्रिभुज दूसरे चक्रों को लेकर भी बनाया जा सकता है। तीनों बिंदुओं का प्राण त्रिभुज के मुख्य ध्यान बिंदु पर इकट्ठा हो जाता है, और वहाँ कुंडलिनी चमकने लगती है। इन त्रिभुजों में टॉप का बिंदु अधिकांशतः सहस्रार चक्र ही होता है। दरअसल, त्रिभुज या खड़ी रेखा को चारों ओर से आस-पास के क्षेत्रों से प्राण को अपनी रेखाओं केंद्रित करने के लिए बनाया गया है। कोई एक साथ बड़े क्षेत्र का ध्यान नहीं कर सकता। त्रिभुज पर स्थित प्राण की अधिक सघनता के लिए इसके तीन शंक्वाकार बिन्दुओं का चयन किया जाता है। इन तीन बिन्दुओं में से एक बिंदु पर मुख्य ध्यान केन्द्रित करके प्राण को उस एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जाता है। अंत में, हमें कुंडलिनी के साथ-साथ उस एक बिंदु पर अत्यधिक एकाग्र या सघन प्राण मिलता है, जिससे वहाँ कुंडलिनी चमकने लगती है। इसी तरह, सीधी रेखा, कल्पना करो मूलाधार, मणिपुर और आज्ञा चक्र बिंदुओं को आपस में जोड़ने वाली रेखा के साथ भी ऐसा ही होता है। पहले रेखा के चारों ओर के शरीर का प्राण रेखा पर केंद्रित किया जाता है। फिर रेखा का प्राण इन तीनों चक्र बिंदुओं पर केंद्रित किया जाता है। फिर तीनों बिंदुओं का प्राण उस चक्र बिंदु पर इकट्ठा हो जाता है, जिस पर मुख्य ध्यान लगा होता है। अन्य दोनों बिंदुओं पर गौण या तिरछा ध्यान लगा होता है। यह एक अद्भुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान है।

ईसाई धर्म में प्राण-अपान संघ

जीवित यीशु ने उत्तर दिया और कहा: “धन्य है वह मनुष्य जिसने इन बातों को जाना। वह स्वर्ग को नीचे ले आया, उसने पृथ्वी को उठा लिया और उसे स्वर्ग में भेज दिया, और वह बीच का बन गया, क्योंकि यह कुछ भी नहीं है। मुझे लगता है कि स्वर्ग प्राण है जिसे ऊपर वर्णित अनुसार नीचे लाया गया है। इसी तरह, पृथ्वी अपान है जो ऊपर उठाया गया है। मध्य दोनों का मिलन है। वहां उत्पादित “कुछ भी नहीं” कुंडलिनी ध्यान से उत्पन्न मन की स्थिरता ही है, जो अद्वैत के साथ आती है। अद्वैत के साथ मन की स्थिरता “कुछ भी नहीं” के बराबर ही है। प्राण को स्वर्ग इसलिए कहा गया है क्योंकि यह शरीर के ऊपरी चक्रों में व्याप्त रहता है, और ऊपरी चक्रों का स्वभाव स्वर्गिक लोकों के जैसा ही है, और ऐसा ही अनेक स्थानों पर निरूपित भी किया जाता है। इसी तरह अपान को पृथ्वी इसलिए कहा है क्योंकि यह शरीर के निचले चक्रों विशेषकर मूलाधार में व्याप्त रहता है। इन निचले चक्रों को घटिया या नारकीय लोकों की संज्ञा भी दी गई है। मूलाधार को पृथ्वी की उपमा दी गई है, क्योंकि इसके ध्यान से आदमी अच्छी तरह से जमीन या भौतिक आयाम से जुड़ जाता है, अर्थात यह आदमी को आधार प्रदान करता है। इसीलिए इसका नाम मूल और आधार शब्दों को जोड़कर बना है। धरती भी जीने के लिए और खड़े रहने के लिए सबसे बड़ा आधार प्रदान करती है। इस कोडेक्स के स्रोत तक निम्नलिखित लिंक पर पहुँचा जा सकता है-

The Gaian Mysteries Of Gnosis – The Bruce Codex

कुंडलिनी विज्ञान ही अधिकांश धार्मिक मान्यताओं की रीढ़ है


इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी-मार्ग

मित्रो, कुंडलिनी विज्ञान सभी धर्मों की रीढ़ है। सभी धार्मिक मान्यताएं इस पर आधारित है। आज मैं हिन्दू धर्म की कुछ परंपरागत मान्यताओं का उदाहरण देकर इस सिद्धान्त को स्पष्ट करूंगा। साथ में, कुंडलिनी योग के कुछ व्यावहारिक बिंदुओं पर भी प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा। हालांकि ये मान्यताएं तुच्छ लगती हैं, पर ये कुंडलिनी योग का बहुत बड़ा व व्यावहारिक संदेश देती हैं।

दोनों पैरों की ठोकर से कुंडलिनी को केंद्रीकृत करना

इस मान्यता के अनुसार यदि किसी आदमी के पैर की ऐड़ी को पीछे से किसी अन्य आदमी के पैर से ठोकर लग जाए तो दूसरे पैर को भी उसी तरह ठोकर मारनी पड़ती है। उससे दोनों लोगों का शुभ होता है। दरअसल एक तरफ के पैर की ठोकर से कुंडलिनी शरीर के उस तरफ अधिक क्रियाशील हो जाती है, क्योंकि कुंडलिनी संवेदना का पीछा करती है। जब शरीर के दूसरी तरफ के पैर में भी वैसी ही संवेदना पैदा होती है, तब कुंडलिनी दूसरी तरफ जाने लगती है। इससे वह शरीर के केंद्र अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में आ जाती है। इससे आदमी संतुलित हो जाता है, जिससे उसका हर प्रकार से शुभ होता है। दूसरे आदमी को भी इस प्रभाव का लाभ मिलता है, क्योंकि जैसा कर्म, वैसा फल। मैंने यह खुद होते देखा है।

एक या ऑड छींक अशुभ, पर दो या ईवन छींकें शुभ मानी जाती हैं

इसके पीछे भी यही कुंडलिनी सिद्धांत काम करता है। एक छींक की संवेदना से दिमाग का एक ही तरफ का हिस्सा क्रियाशील होता है। कल्पना करो कि बायाँ हिस्सा क्रियाशील हुआ। इसका मतलब है कि उस समय आदमी की सोच सीमित, लीनियर या लॉजिकल थी। क्योंकि दिमाग के दोनों हिस्से आपस में लगातार कंम्यूनिकेट करते रहते हैं, इसलिए यह पक्का है कि वह दाएँ हिस्से को सतर्क कर देगा। जब दूसरी छींक आती है, तो उससे दिमाग का दायाँ हिस्सा क्रियाशील हो जाता है। उससे आदमी की सोच असीमित या इलॉजिकल हो जाती है। इससे कुंडलिनी या अवेयरनेस दिमाग के दोनों हिस्सों में घूमकर दिमाग के बीच में केंद्रित हो जाती है। इसी केंद्रीय रेखा पर सहस्रार और आज्ञा चक्र विद्यमान हैं। इससे पूर्णता, संतुलन और आनन्द का अनुभव होता है। 

मस्तिष्क में अंदरूनी विवाह ही अर्धनारीश्वर का रूप या शिवविवाह है

मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ भाग बारी-2 से काम करते रहते हैं। ऐसा उनके बीच के स्थाई संपर्क मार्ग से होता है। इस न्यूरोनल या नाड़ी मार्ग को कॉर्प्स कॉलोसम कहते हैं। जिनमें किसी रोग आदि के कारण नहीं होता, वे लगातार मस्तिष्क के एक ही हिस्से से बड़ी देर तक काम करते रहते हैं। उनमें आपसी तालमेल न होने के कारण वे अपने काम ढंग से नहीं कर पाते। सामान्य व्यक्ति में कुछ देर तक बायाँ मस्तिष्क काम करता है। वह तर्कपूर्ण, सीमित, व व्यावहारिक दायरे में रहकर कुशलता से रोजमर्रा के काम करवाता है। थोड़ी देर में ही वह विचारों की चकाचौंध से थक जाता है। फिर शरीर दाएँ मस्तिष्क के नियंत्रण में आ जाता है। उसकी कार्यशैली आकाश की तरह असीमित, तर्कहीन, व खोजी स्वभाव की होती है। क्योंकि इसमें आदमी को सीमित दायरे में बांधने वाले विचारों की चकाचौंध नहीं होती, इसलिए यह अंधकार लिए होता है। इसमें रहकर जैसे ही आदमी की विचारों की पुरानी थकान खत्म होती है, वैसे ही यह हिस्सा बन्द हो जाता है, और बायाँ हिस्सा फिर से चालू हो जाता है। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। कार्य के आधिपत्य को आपस में परिवर्तित करने का समय अंतराल आदमी की सतर्कता और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के अनुसार बदलता रह सकता है। अब बात आती है, मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को एकसाथ समान रूप से क्रियाशील करने की। यही कुंडलिनी का केंद्रीय रेखा या सुषुम्ना में आना है। इससे कुंडलिनी शक्ति मतलब प्राण शक्ति दोनों हिस्सों में बराबर बंट जाती है, और पूरे मस्तिष्क को क्रियाशील कर देती है। ऐसा ही कुंडलिनी जागरण के समय भी महसूस होता है, जब किसी विशेष क्षेत्र की बजाय पूरा मस्तिष्क समान रूप में चेतन, क्रियाशील और कम्पायमान हो जाता है। इसे हम अर्धनारीश्वर का आंतरिक मिलन या शिवविवाह भी कह सकते हैं। यह भी कह सकते हैं, शरीर के बाएँ भाग का विवाह दाएँ भाग से हो गया है। हिंदु धर्म में अर्धनारीश्वर नामक शिव के बाएं भाग को स्त्री और आधे दाएँ भाग को पुरुष के रूप में दिखाया गया है। कुंडलिनी चित्र बाएँ मस्तिष्क में रहने का ज्यादा प्रयास करता है, इसीलिए कुंडलिनी को स्त्री रूप दिया गया है। आप खुद देखिए, हर किसी के मन में चकाचौंध से भरे विचारों के पूल के अंदर हमेशा डूबे रहने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को दाएँ मस्तिष्क के खाली आकाश में जागरूकता को स्थानांतरित करने के नियमित अभ्यास के माध्यम से दूर किया जाना ही लक्ष्य है। कुंडलिनी योग के माध्यम से इसे केंद्र में लाने की कोशिश की जाती है। कुंडलिनी के केन्द्रीभूत होने से ही एक आदमी पूर्ण मानव बनता है। इससे उसमें तार्किक व्यावहारिकता भी रहती है, और साथ में अतार्किक भावप्रधानता व खोजीपना भी। इसका अर्थ है कि वहाँ अद्वैत उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के बिना दो विरोधी गुणों का साथ रहना सम्भव ही नहीं है। इसी तरह, सीधे तौर पर शरीरविज्ञान दर्शन या पुराणों से अद्वैत भाव बना कर रखने से मन में कुंडलिनी की स्पष्टता बढ़ जाती है। मन में दो विरोधी गुणों को एकसाथ बना कर रखने के लिए या कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बना कर रखने के लिए बहुत अधिक प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसीलिए मैंने पिछ्ली पोस्ट में योग के लिए संतुलित आहार व संतुलित जीवन पर बहुत जोर दिया है। शुरु-2 में मैं कुंडलिनी योग करते समय मस्तिष्क में सहस्रार चक्र व आज्ञा चक्र के स्तर पर कुंडलिनी को सिर में चारों ओर ऐसे घुमाता था, जैसे एक किसान गोलाकार खेत में हल चला रहा हो। उससे मेरा पूरा मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता था, और आनन्द के साथ कुंडलिनी केन्द्रीभूत हो जाती थी। मैंने यह भी देखा कि एक नाक से जल खींचकर दूसरे नाक से निकालने पर भी कुंडलिनी को केन्द्रीभूत होने में मदद मिलती है। इसे जलनेती कहते हैं। इसके लिए जल गुनगुना गर्म और हल्का नमकीन होना चाहिए, नहीं तो सादा और ठंडा जल नाक की म्यूकस झिल्ली में बहुत चुभता है। 

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ ही कुंडलिनी जागरण के लिए मूलभूत नाड़ियाँ हैं

कुंडलिनी योग के अभ्यास के दौरान पीठ में तीन नाड़ियों की अनुभूति होती है। नाड़ियाँ वास्तव में सूक्ष्म संवेदना मार्ग हैं, जो केवल अनुभव ही की जा सकती हैं। भौतिक रूप में तो मुझे ये शरीर में नजर आती नहीं। हो सकता है कि ये भौतिक रूप में भी हों। यह एक रिसर्च का विषय है। एक नाड़ी पीठ के बाएं हिस्से से होकर ऊपर चढ़ती है, और बाएँ मस्तिष्क से होते हुए आज्ञा चक्र पर समाप्त हो जाती है। दूसरी नाड़ी भी इसी तरह पीठ के व मस्तिष्क के दाएँ हिस्से से गुजरते हुए आज्ञा चक्र पर ही पूर्ण हो जाती है। एक इसमें इड़ा और दूसरी पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के बिल्कुल बीच में और ठीक रीढ़ की हड्डी के बीच में से तीसरी नाड़ी पीठ व मस्तिष्क के बीचोंबीच होती हुई सहस्रार तक जाती है। यह सुषुम्ना नाड़ी है। सामान्य आरेखों के विपरीत, मुझे इड़ा और पिंगला पीठ में अधिक किनारों पर मिलती हैं। यह एक कम अभ्यास का प्रभाव हो सकता है। दरअसल, योग में दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा भावना या अनुभव मायने रखता है। कुंडलिनी जागरण इसी नाड़ी से चढ़ती हुई कुंडलिनी से होता है। यदि कुंडलिनी इड़ा या पिंगला नाड़ी से होकर भी ऊपर चढ़ रही हो, तब भी उसे रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी हर हालत में फायदेमंद ही होती है। उसे जबरदस्ती सुषुम्ना में धकेलने का भी प्रयास करना चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी जबरदस्ती को ज्यादा पसंद नहीं करती। कुंडलिनी अपने प्रति समर्पण से खुश होती है। जब वह इड़ा या पिंगला से चढ़ रही हो, तब उसके ध्यान के साथ मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र व आज्ञा चक्र का भी एकसाथ ध्यान करना चाहिए। इससे वह एकदम सुषुम्ना में आ जाती है, या थोड़ी देर के लिए पीठ के दूसरे किनारे की नाड़ी में चढ़ने के बाद सुषुम्ना में चढ़ने लगती है। इससे कुंडलिनी सहस्रार में प्रकाशित होने लगती है। इसके साथ, शरीर व मन के संतुलन के साथ आनन्द की प्राप्ति भी होती है। कुंडलिनी को सहस्रार से नीचे आज्ञा चक्र को नहीं उतारा जाता, इसीलिए सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में चित्रित किया जाता है। वास्तव में कुंडलिनी को सहस्रार में रखना व उधर जागृत करना ही कुंडलिनी योग का सर्वप्रमुख ध्येय है। इसीसे सभी आध्यात्मिक गुण प्रकट होते हैं। सहस्रार चक्र पिंड को ब्रह्मांड से जोड़ता है। यह सबसे अधिक आध्यात्मिक चक्र है, जो एक तरफ आत्मा से जुड़ा होता है, और दूसरी तरफ परमात्मा से। सहस्रार में कुंडलिनी के दबाव को झेलने की बहुत क्षमता होती है। ऐसा लगता है कि कुंडलिनी से सहस्रार की खारिश मिट रही है, और मजा आ रहा है। फिर भी यदि वहां असहनीय दबाव लगे, तो कुंडलिनी को आज्ञा चक्र तक व आगे की नाड़ी से शरीर में नीचे उतार सकते हैं। हालांकि, यह इडा या पिंगला के माध्यम से नीचे लाने की तुलना में अधिक कठिन और गड़बड़ वाला दिखाई देता है। हालाँकि उल्टी जीभ को नरम तालु से छुआ कर रखने से इसमें मदद मिलती है। इसीलिए इड़ा और पिंगला का अंत आज्ञा चक्र में चित्रित किया गया है, पर सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में दिखाया गया है। यदि आप मूलाधार और आज्ञा चक्र पर एकसाथ ध्यान लगाओ, तो कुंडलिनी का संचार इड़ा नाड़ी से होता है। यदि आप स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र का एकसाथ ध्यान करो, तो कुंडलिनी का संचरण पिंगला नाड़ी से होता है। चित्र में भी ऐसा ही दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र, तीनों का एकसाथ ध्यान करने से कुंडलिनी का संचरण सुषुम्ना नाड़ी से ही होगा या वह सीधी ही सहस्रार तक पहुंच जाएगी। ऐसा चित्र में दिखाया भी गया है। आप देख सकते हैं कि सुषुम्ना नाड़ी की भागीदारी के बिना ही कुंडलिनी सहस्रार चक्र तक पहुंच गई है। इड़ा और पिंगला से कुंडलिनी एकसाथ आज्ञा चक्र तक आई। वहाँ से वह बाएँ और दाएँ मस्तिष्क से ऊपर चढ़ कर सहस्रार पर इकट्ठी हो जाती है। ऐसा महसूस भी होता है। दोनों तरफ के मस्तिष्क में दबाव से भरी मोटी लहर ऊपर जाती और सहस्रार में जुड़ती महसूस होती है। तभी चित्र में इन दोनों लघु नाड़ियों को मोटी पट्टी के रूप में दिखाया गया है। जब कुंडलिनी को आगे की नाड़ी से नीचे उतारना होता है, तब इन्हीं पट्टीनुमा नाड़ियों से इसे सहस्रार से आज्ञा चक्र तक उतारा जाता है, और वहाँ से नीचे। आपने भी देखा होगा, जब आदमी मानसिक रूप से थका होता है, तो वह अपने माथे को मलता है, और अपनी आँखों को भींचता है। इससे उसे माथे के दोनों किनारों से गशिंग या उफनते हुए द्रव की पट्टी महसूस होती है। उससे वह मानसिक रूप से पुनः तरोताजा हो जाता है। ये इन्हीं नाड़ियों की क्रियाशीलता से अनुभव होता है। आप इसे अभी भी करके अनुभव कर सकते हो। वास्तविक व त्वरित दैनिक अभ्यास के दौरान कोई नाड़ी महसूस नहीं होती। केवल ये चार चक्र महसूस होते हैं, और कुंडलिनी सहस्रार चक्र में महसूस होती है। इड़ा नाड़ी अर्धनारीश्वर देव के स्त्री भाग का प्रतिनिधित्व करती है। पिंगला नाड़ी उनके आधे और पुरुष भाग का प्रतिनिधित्व करती है। सुषुम्ना नाड़ी दोनों भागों के मिलन या विवाह का द्योतक है। मूलाधार से मस्तिष्क तक सबसे ज्यादा ऊर्जा का वहन सुषुम्ना नाड़ी करती है। तभी तो तांत्रिक योग के समय सहस्रार का ध्यान करने से मूलाधार एकदम से संकुचित और शिथिल हो जाता है। दैनिक लोकव्यवहार में आपने भी महसूस किया होगा कि जब मस्तिष्क किसी और ही काम में व्यस्त हो जाता है, तो कामोत्तेजना एकदम से शांत हो जाती है। बेशक वह ऊर्जा सुषुम्ना से गुजरते हुए नहीं दिखती, पर सहस्रार तक उसके गुजरने का रास्ता सुषुम्ना से होकर ही है। सुषुम्ना से ऊर्जा का प्रवाह तो यौगिक साँसों के विशेष और लम्बे अभ्यास से अनुभव होता है। वह भी केवल कुछ क्षणों तक ही अनुभव होता है, जैसा आसमानी बिजली गिरने का अनुभव क्षणिक होता है। पर इसको अनुभव करने की आवश्यकता भी नहीं। महत्त्वपूर्ण तो कुंडलिनी जागरण है, जो इसके अनुभव के बिना ही होता है। यदि आप सीधे ही फल तक पहुंच पा रहे हो, तो पेड़ को देखने की क्या जरूरत है। सम्भवतः इसी से यह कहावत बनी हो, “आम खाओ, पेड़ गिनने से क्या लाभ”। इड़ा और पिंगला से भी ऊर्जा आज्ञा चक्र तक ऊपर चढ़ती है, पर सुषुम्ना जितनी नहीं।

कुंडलिनी ही शिव को भीतर से सत्त्वगुणी बनाती है, बेशक वे बाहर से तमोगुणी प्रतीत होते हों


दोस्तो, भगवान शिव के बारे में सुना जाता है कि वे तमोगुणी हैं। तमोगुण मतलब अंधेरे वाला गुण। शिव भूतों के साथ श्मशान में रमण करते हैं। अपने ऊपर उन्होंने चिता की भस्म को मला होता है। साथ में यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव परम सतोगुण स्वरूप हैं। सतोगुण मतलब प्रकाश वाला गुण। इस तरह दोनों विरोधी गुण शिव के अंदर दिखाए जाते हैं। फिर इसको जस्टिफाई करने के लिए कहा जाता है कि शिव बाहर से तमोगुणी हैं, पर भीतर से सतोगुणी हैं। आज हम इसे तांत्रिक कुंडलिनी योग के माध्यम से स्पष्ट करेंगे।

कुंडलिनी ही शिव के सत्त्वगुण का मूल स्रोत है

दरअसल शिव तन्त्र के अधिष्ठाता देव हैं। उन्हें हम सृष्टि के पहले तांत्रिक भी कह सकते हैं। यदि हम तांत्रिक योगी के आचरण का बारीकी से अध्ययन करें, तो शिव के संबंध में उठ रही शंका भी निर्मूल हो जाएगी। वामपंथी तांत्रिक को ही आमतौर पर असली तांत्रिक माना जाता है। वे पाँच मकारों का सेवन भी करते हैं। बेशक शिव पंचमकारी नहीँ हैं, पर तमोगुण तो उनके साथ वैसे ही रहता है, जैसे पंचमकारी तांत्रिक के साथ। दुनिया के आम आदमी के अंदर इनके सेवन से तमोगुण उत्पन्न होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे इससे उत्पन्न ऊर्जा को संभाल नहीं पाते और उसके आवेश में गलत काम कर बैठते हैं। वे गलत काम तमोगुण को और अधिक बढ़ा देते हैं। पंचमकार खुद भी गुणों में तेज हलचल पैदा करते हैं, जिससे स्वाभाविक तौर पर तमोगुण भी उत्पन्न हो जाता है, आम दुनिया के अधिकांश लोग जिसके प्रभाव में आकर निम्न हरकत कर बैठते हैं। परन्तु एक तंत्रयोगी गुणों की हलचल को अपने कुंडलिनी योग की बदौलत हासिल अद्वैत भाव से शांत कर देते हैं। इससे उन्हें बहुत अधिक कुंडलिनी लाभ मिलता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी अक्सर रहती ही है। इससे कुंडलिनी तेजी से चमकने लगती है। तमोगुण से दबी हुई प्राण शक्ति और नाड़ी शक्ति जब कुंडलिनी को लगती है, तो वह जीवंत होने लगती है। यह वैसे ही होता है जैसे अंधेरे में दीपक या चिंगारी अच्छे से चमकते हैं। तभी तो भगवान शिव की तरह श्मशान में किया गया कुंडलिनी योगाभ्यास शीघ्रता से फलीभूत होता है। वैसे भी देखने में आता है कि तमोगुण की अधिकता में मस्तिष्क में विचारों की हलचल रुक सी जाती है। ऐसा किसी भय से, उदासी से, हादसे के नजदीक गुजरने से, तनाव से, अवसाद से, नशे से, तमोगुणी आमिषादि भोजन से, काम आदि से मन व शरीर की थकान से, आदि अनेक कारणों से हो सकता है। ऐसे समय में मस्तिष्क में न्यूरोनल एनर्जी का संग्रहण हो रहा होता है। इसमें जो बीच-बीच में इक्का-दुक्का विचार उठते हैं, वे बहुत शक्तिशाली और चमकीले होते हैं, क्योंकि उन्हें घनीभूत न्यूरोनल एनर्जी मिल रही होती है। योगी लोग इन्हीं विचारों को कुंडलिनी विचार में तब्दील करते रहते हैं। इससे सारी न्यूरोनल एनर्जी कुंडलिनी को मिलती रहती है। बुरे समय में भगवान या कुंडलिनी को याद करने से उत्पन्न महान लाभ के पीछे यही सिद्धांत काम करता है। इस तमोगुण के दौर के बाद सतोगुण व रजोगुण का दौर आता है। यह विचारों के प्रकाश से भरा होता है। दरअसल संग्रहीत न्यूरोनल एनर्जी बाहर निकल रही होती है। इसमें चमकीले विचारों की बाढ़ सी आती है। आम आदमी तो इनमें न्यूरोनल एनर्जी को बर्बाद कर देता है, पर योगी उन विचारों को कुंडलिनी मेँ तब्दील करके सारी एनर्जी कुंडलिनी को दे रहा होता है। योगी ऐसा करने के लिए अक्सर किसी अद्वैत शास्त्र की मदद लेता है। अद्वैत शास्त्रों में देवता संबंधी दार्शनिक पुस्तकें होती हैं, जैसे कि पुराण, स्तोत्र आदि। शरीरविज्ञान दर्शन भी एक उत्तम कोटि का आधुनिक अद्वैत शास्त्र है। वह अद्वैतशास्त्र को अपनी वर्तमान गुणों से भरपूर अवस्था के ऊपर पिरोता रहता है। वह इस सच्चाई को समझता रहता है कि उसके जैसी सभी अवस्थाएँ हर जगह व हर किसी में विद्यमान हैं। इससे शान्ति और आनन्द के साथ कुंडलिनी चमकने लगती है। वह कुंडलिनी, योग के माध्यम से सभी चक्रों पर भ्रमण करते हुए सभी को स्वस्थ और मजबूत करती है। पूरा तन और मन आनन्द व प्रकाश से भर जाता है। इस प्रकार जिन चीजों से आम आदमी के भीतर तमोगुण उत्पन्न होता है, उनसे तन्त्रयोगी के भीतर सतोगुण उत्पन्न हो जाता है। सम्भवतः यही वजह है कि दुनिया वालों को भगवान शिव बाहर से तमोगुणी दिखते हैं, पर असल में वे भीतर से सतोगुणी होते हैं। इससे यिन और यांग का मिलन भी हो जाता है, जिससे ज्ञान पैदा होता है। यिन तमोगुण है, और यांग सतोगुण।

कुंडलिनी ध्यान चौबीसों घंटे करने के तीन तरीके

मित्रो, मैंने पिछली पोस्टों में बताया था कि जीभ को तालु से छुआ कर कुंडलिनी को आगे के चैनल से नीचे उतारते हैं। मैंने यह भी कहा था कि किसी भी संवेदना के अनुभव का एकमात्र स्थान सहस्रार ही है, कोई अन्य चक्र नहीं। कुंडलिनी चित्र हमेशा सहस्रार में ही बन रहा होता है। अन्य चक्रों में वह तभी प्रतीत होता है, जब उसका ऊर्जा स्तर एक न्यूनतम सीमा से नीचे गिरता है। ऊर्जा का स्तर जितना नीचे गिरता है, वह उतना ही ज्यादा निचले चक्र में जाता है। मैंने हाल ही में इससे संबंधित एक नया अनुभव प्राप्त किया, जिसे मैं उन्हीं निम्नलिखित सिद्धांतों की पुष्टि के लिए प्रयोग में लाऊँगा।

आध्यात्मिक आयाम को प्राप्त कराने वाली दो मुख्य यौगिक विधियां हैं

पहली विधि दार्शनिक है, और दूसरी विधि प्रयोगात्मक या तांत्रिक है। पहली विधि में किसी पसंदीदा अद्वैत दर्शन को अपनी वर्तमान स्थिति पर आरोपित किया जाता है। दूसरी विधि में जीभ को तालु से छुआ कर रखा जाता है।

आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कराने वाली दार्शनिक या राजयोग गत विधि

मैं एक दिन बहुत से जटिल कार्यों में व्यस्त था। उन कार्यों से लगातार द्वैत पैदा हो रहा था। द्वैत के साथ मानसिक परेशानी आ रही थी। उससे स्वाभाविक था कि शारीरिक परेशानी भी पैदा हो रही थी। मैं उस द्वैत को अद्वैत में रूपांतरित करने के लिए दार्शनिक विधि का सहारा लेने लगा। मैं स्वनिर्मित “शरीरविज्ञान दर्शन” नामक पुस्तक को अपनी उस समय की वर्तमान व मनोदोलन से भरी अवस्था पर आरोपित करने लगा। मैं अपनी अवस्था को बिल्कुल नहीं बदल रहा था। मतलब कि जैसी अवस्था बन रही थी, उसे वैसा ही रहने दे रहा था। अवस्था को बदलने से देवता नाराज होते हैं, और वे कामकाज में विघ्न डालते हैं। वे चाहते हैं कि आदमी हर प्रकार की अवस्था का अनुभव करे। यह अलग बात है कि असली योगी उन सभी अवस्थाओं को अनासक्ति से अनुभव करे। देवता इससे और ज्यादा खुश हो जाते हैं, क्योंकि वे खुद भी अनासक्त होते। वे हर अवस्था का अनासक्ति से सामना करते हैं, उनसे भागते नहीं हैं। अवस्थाओं से पलायन करने को अपना और अपनी बनाई सृष्टि का अपमान समझते हैं, क्योंकि सभी अवस्थाएं इस विभिन्नताओं से भरी सृष्टि के हक में ही होती हैं। इसीलिए मैं अवचेतन मन से ही यह मान रहा था कि मेरा अद्वैत दर्शन मेरी सभी अवस्थाओं से जुड़कर उनको अद्वैतशील बना रहा है। मैं सीधे तौर पर इसका चिंतन नहीँ कर रहा था, क्योंकि उससे मेरी अवस्थाएं दुष्प्रभावित हो सकती थीं। उससे क्या होता था कि मेरे अज्ञातस्थान वाले चिन्तन में कुंडलिनी प्रकट हो जाती थी, और मेरे किसी चक्र पर स्थित हो जाया करती थी। जितना कम मानसिक ऊर्जा स्तर मेरी अवस्था का होता, मेरी कुंडलिनी उतना ज्यादा निचले चक्र पर चली जाती थी। मन के कुछ ऊर्जावान रहने पर वह हृदय चक्र पर आ जाती थी। ऊर्जा स्तर के काफ़ी ज्यादा गिरने पर वह नाभि चक्र पर आ जाती थी। उससे भी कम ऊर्जा होने पर वह स्वाधिस्ठानचक्र पर भी स्थित हो जाती थी।

आत्म-जागरूकता पैदा करने वाली तांत्रिक विधि

फिर से मस्तिष्क की थकान होने पर मैंने अपनी उलटी जीभ को नरम तालु से छुआया। मुझे वहाँ नमकीन सा स्वाद लगा और तीव्र संवेदना की अनुभूति हुई। इसके साथ ही मस्तिष्क की ऊर्जा जीभ के पिछले हिस्से की केंद्रीय रेखा से सभी चक्रों को भेदते हुए नीचे उतर गई और नाभि चक्र पर स्थित हो गई। उसके साथ कुण्डलिनी भी थी। मस्तिष्क में केवल विचारों का कंफ्यूसिंग पुलिंदा था। वह नीचे उतरते हुए कुण्डलिनी बन गया। उससे मस्तिष्क की थकान एकदम से कम हो गई। अद्वैत व आनन्द के साथ शांति का उदय हुआ। विचार व कर्म अनासक्ति के साथ होने लगे। 

राजयोग व तंत्र के नियमों के मिश्रण वाली तीसरी यौगिक विधि

कुछ देर बाद मेरे मस्तिष्क में फिर से द्वैत से युक्त दबाव बनने लगा था। उसे कम करने के लिए मैंने उपरोक्त दोनों विधियों का प्रयोग किया। पहले मैंने जीभ को तालु से लगातार छुआ कर रखा। उसके साथ ही शरीरविज्ञान पुस्तक से अपने मन में कुंडलिनी को पैदा करने का प्रयास किया। पर वह मस्तिष्क में ढंग से प्रकट हो पाती, उससे पहले ही फ्रंट चैनेल से नीचे आ गई। उसके जीभ को क्रॉस करते समय जीभ में स्वाद से भरी हुई तेज संवेदना पैदा होती थी। इससे कुंडलिनी लूप भी पूरा हो गया था। इससे वह नाभि चक्र से भी नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र से होते हुए मूलाधार को संकुचित करने से पीठ के बैक चैनेल से ऊपर चढ़ जाती थी और आगे से फिर नीचे उतर जाती थी। इससे कुंडलिनी चक्र की तरह लूप में घूमने लगी। यह विधि मुझे सर्वाधिक शक्तिशाली लगीं। हालांकि समय के अनुसार किसी भी विधि को अपने लाभ के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।