मुझे बिंग एआई से जानकारी मिली कि आत्मज्ञान धीरे धीरे हासिल होता है, किसी योग आदि तकनीक से एकदम से नहीं। पर आत्मज्ञान कहते हैं, अपने को महसूस करने को। बहुत से लोगों ने इसे योग तकनीक से महसूस किया है। मुझे भी परमात्मा की असीम कृपा से सौभाग्यवश तंत्रसहायित कुंडलिनी योग से इसकी मामुली सी झलक महसूस की थी, जिसका वर्णन तथाकथित 10 सैकंड का कुंडलिनी जागरण कह के वर्णित किया गया है इस वेबसाईट पर। दुर्भाग्यवश ज्यादातर लोग इस स्तर तक नहीं पहुंच पाए होंगे और कुंडलिनी क्रियाशीलता या तथाकथित कुंडलिनी जागरण तक ही सीमित कर पाए हों, और वैसा ही वर्णन उन्होंने ऑनलाइन किया हो, जिसे बिंग एआई ने पकड़ लिया हो। शायद चैट जीपीटी वही पकड़ता है जो ज्यादा होता है। उनका कुंडलिनी जागरण भी आत्मज्ञान से निचले स्तर का रहा होगा। जागरण या समाधि के भी स्तर होते हैं। जैसे कोई आदमी जागकर बैठता है, कोई चलता है, कोई दौड़ता है, तो कोई दुनिया जीतता है। इसी तरह कुंडलिनी जागरण की अंतिम पराकाष्ठा ही आत्मज्ञान है। अगर मैं पुराणपाठी गुरु और देवताओं के सान्निध्य और उनकी अप्रत्यक्ष प्रेरणा से साधारण कुंडलिनी जागरण को तांत्रिक बल न देता तो शायद वह कुछ ही क्षणों के लिए पूर्ण रूप से जागृत महसूस न हुई होती। यही पूर्ण जागृति आत्मज्ञान है। मतलब इसमें मन जागकर आत्मा या परमात्मा जितना विस्तृत हो गया है। सिर्फ स्तर का अंतर है, और कुछ नहीं। इसे ही पूर्ण समाधि भी कह सकते हैं। तथाकथित आम भाषा की समाधि भी कुंडलिनी जागरण का बहुत ऊंचा स्तर होता है। वैसे तो हरेक अनुभव किसी न किसी स्तर की समाधि होता है। किसी चीज से जुड़े बिना हम उसे अनुभव ही नहीं कर सकते। पर पूर्ण जागरण मतलब आत्मज्ञान उस तथाकथित या लोकप्रसिद्ध योगसमाधि से भी एक कदम आगे होता है। ज्यादातर मामलों में समाधि को ही योग से प्राप्त होने वाली अंतिम अवधि माना जाता है। यह इसलिए क्योंकि योग की सहायता से समाधि से आगे बहुत कम लोग गए होंगे जिनकी आवाज को अनसुना कर दिया गया होगा। संसार में तो बीन बाजे की ही ज्यादा पूछ होती है। ज्यादातर लोग लोकलाज या घरगृहस्थी की मोहमाया से घरबार न छोड़ सकने के कारण अपनी समाधि को यौनतांत्रिक बल न दे पाए होंगे। शायद इसी वजह से पतंजलि ने भी अपने अष्टांगयोग सूत्र में समाधि को ही योग की अंतिम अवधि मान बैठे हैं। हो सकता है कि वे अल्पसंख्यक योगियों की आवाज न सुन पाए हों। पतंजलि भी यही कहते हैं कि अगर समाधि के बाद ईश्वर के सहारे जीवन जिया जाए , तो उनकी कृपा से आत्मज्ञान भी शीघ्र ही हो जाता है। जो काम आदमी खुद कर सकता है, उसके लिए खुद भी प्रयत्न करना चाहिए, ईश्वर तो ख़ैर हमेशा ही सबकी सहायता करता है। यह अक्सर होता है कि अपने काम की कमी को पूरा करने के लिए भी ईश्वर से मदद मांगी जाती है। मुझे यह भी लगता है कि इसमें गलतफहमी भी हुई है। क्योंकि समाधि का अनुभव तो अक्सर योगसाधना की क्रिया के दौरान होता है, पर जागृति का नहीं। जागृति कहीं सुंदर स्थान जैसे झील के पास, पहाड़ पर, या समारोह आदि में ज्यादा होती है। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उस समय भी नियमित रूप से चल रही वर्तमानकालिक तांत्रिक योगसाधना से इकट्ठी हुई कुंडलिनी ऊर्जा ही जागृति कराती है। क्योंकि तांत्रिक तरीके से ही योगसाधना वैज्ञानिक रूप से निश्चित और अल्प समय में मतलब कुछ महीनों के अंदर आत्मज्ञान करा सकती है, पर साधारण योग से तो पूर्णतः अनिश्चित होता है। क्या पता कितने साल में होए, पूरी उम्र में होए या ताउम्र न होए। ज्यादातर को तो ताउम्र नहीं होता, ऐसा लगता है। लोग बताने से छिपाते हों, यह अलग बात है। पूरी तरह से चमत्कार या विशेष कृपा की जरूरत होती है, जैसा पतंजलि कहते हैं। वैसे यह पतंजलि की मजबूरी भी रही होगी क्योंकि अगर उनकी पुस्तक में तंत्र का उल्लेख किया गया होता, तो शायद वह उस समय के अति आदर्शवादी समाज को ज्यादा स्वीकार्य न होती। एक कामयाब लेखक बनने के लिए कई बार सत्य को ढकना भी पड़ जाता है। इसीलिए मुझे शिव सबसे बड़े देवता लगते हैं, क्योंकि वे खुलकर सत्य सबके सामने रखते हैं। जिसे ऑनलाइन पोर्टल पर उम्र के पड़ाव के साथ धीरे धीरे मिलने वाला बताया गया है, वह आत्मज्ञान नहीं बल्कि आत्मा की विचारों की गंदगी की सफाई है। आत्मा मतलब अपने को जानने में तो कुछ ही क्षण काफी हैं। हम दोस्त को पहचानने में भी कुछ क्षणों से ज्यादा समय नहीं लेते, फिर उस अपने आप को पहचानने में कैसे ज्यादा समय ले सकते हैं, जो सबसे निकट है।
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कुंडलिनी योग जीवन का पार्श्वसंगीत है
दोस्तों, पिछली पोस्ट में शक्तिजल की बात हो रही थी। मुझे तो लगता है कि इंद्र जो बारिश करता है, वह जागृति की ही बारिश है, वही सुषुम्नाशक्ति रूपी वज्र चलाता है। इंद्र की प्रसन्नता मतलब सभी देवताओं की प्रसन्नता या अनुकूलता। यही चढ़दी कला है। मैं यह नहीं कह रहा कि भौतिक वर्षा के साथ इंद्र का संबंध नहीं है। वह भी जरूर है क्योंकि जो भीतर है, वही बाहर भी है। जैसे बारिश होने के लिए सभी देवताओं के साथ से पैदा होने वाली अनुकूल परिस्थितियां चाहिए, वैसे ही जागृति के लिए भी। पुराणों पर प्रेम और विश्वास बना रहे, तो सभी रास्ते खुद ही खुलने लगते हैं। फिर कथा में आया था कि गौतम मुनि ने वरुण देव के वरदान से अक्षय जल पाया। वरुण देवता वेदों के एक प्रमुख देवता हैं। वे जल के अधिपति देवता हैं। जलरूपी शक्ति के बिना गूढ़ आध्यात्मिक वेदों का सही ज्ञान होना संभव नहीं है। वरुणदेव सीमित जल ही दे सकते हैं। ख्वाजा भी सिंधुघाटी सभ्यता का ऐसा ही देवता था, जो समुद्र, नदियों और जल का अधिपति था। मैंने एक भूमिगत जल का पता लगाने वाले आदमी के बारे में सुना था जो काफी सटीक आकलन करता था, और ख्वाजा का सिद्ध उपासक था। वैसे आज भी कई गांवों में ख्वाजा की जलदेव के रूप में पूजा करते हैं। हो सकता है कि वेदों में गुप्त भाषा में वरुणदेव उसके प्रतीक के तौर पर कहा गया हो, जिसकी सहायता से शरीर में शक्तिजल की उपलब्धता बराकरार रहती हो, पर उसके पाठकों या व्याख्याकारों ने उसे भौतिक जल का देवता मान लिया हो। कुछ भी हो, बाहर भीतर में समानता तो है ही, इसलिए एकदूसरे को जरूर प्रभावित करते होंगे। मुझे खुद महसूस होता है कि शुद्ध जल से भरे झील, सरोवर आदि जलस्रोतों के निकट कुंडलिनी शक्ति बहुत अच्छे से घूमने लगती है, क्योंकि दोनों के स्वभाव में बहना है। दोनों में संबंध तो है ही। हिंदुओं और बौद्घों में नागदेवता को भी जल का देवता माना जाता है। कुंडलिनी शक्ति नाड़ी भी नाग की आकृति में होती है। हमारे गांव में नेउआ मतलब दिव्य नाग या सर्प और ख्वाजा दोनों को स्थानीय जल और उसके आसपास उपजी वनस्पति का अधिपति माना जाता था। जो जल के आसपास वनस्पति काटता था, उसे नेऊआ सांप के द्वारा पीछा करने का भय दिखाया जाता था, जिससे वनों का अच्छा सरंक्षण होता था। कई जगह मैंने ख्वाजा को मछली के रूप जैसी मूर्ति में भी देखा। इसका मतलब है कि वरुण, नाग और ख्वाजा आपस में जुड़े हैं और तीनों जलरूपी शक्ति के देवता हैं। यह भी मान्यता है कि ये सिर्फ़ जल ही नहीं देते, बल्कि अन्य दुनियावी समृद्धियां और सुरक्षाएं भी देते हैं। मतलब ये शक्ति के देवता ज्यादा लगते हैं।
इसी तरह इंद्र देव भी वेदों में बहुतायत में वर्णित हैं। जो देव जागृति के लिए जरूरी है, उसका ज्यादा वर्णन होगा ही। क्योंकि वेद का मूल ध्येय जागृति ही है। गुप्त तरीके से शायद इसे ही वर्षा लिखा है। जहां वर्षा है, वहीं कर्म, यज्ञ, धनधान्य और समस्त वैभव हैं। इन्हीं से सब चढ़दी कला में रहते हैं। ऐसी ही अवस्था में जागृति होती है। बेशक इसके भौतिक और आध्यात्मिक दोनों अर्थ हों, पर दूसरा ही ज्यादा सटीक लगता है, क्योंकि वेद अध्यात्म को डील करते हुऐ लगते हैं, न कि भौतिकता को।
मुझे लगता है कि जागरण और आत्मसाक्षात्कार के बीच अंतर है। पहली अवस्था प्रारंभ है, तो दूसरी अवस्था आध्यात्मिक विकास का चरम या अंत। मुझे यह जीपीटी एआई पावर्ड बिंग सर्च से पता चला। कहते हैं कि कईयों की कुंडलिनी बचपन से ही जागृत होती है। अगर कुंडलिनी जागरण पूर्णता होती तो उसके बाद पुनर्जन्म क्यों होता। यह भी हो सकता है कि पूर्णता के अनुभव के बाद भी आत्मा की पूरी सफाई जरूरी हो, जिसके लिए कई बार नया जन्म लेना पड़ता होए। यह भी बोलते हैं कि महान व्यक्तियों जैसे कलाकारों और नेताओं की कुंडलिनी भी जागृत होती है। बिंग एआई निःशुल्क है और सबसे अच्छी जानकारी देने वाला लगा मुझे, हिंदी अंग्रेजी दोनों में। आजकल ब्लॉग लिखने में और शोध करने में एआई से बहुत मदद मिल रही है। जब शरीर के भौतिक संपर्क के बिना आदमी को अंधेरा सा महसूस होता है, तो उसे कहते हैं कि शक्ति सोई हुई है। पर जब अंधेरे के बीच में भी एक ध्यान चित्र हमेशा चमकता है, तब उसे कहते हैं कि शक्ति जागी हुई है। यहां से साधना शुरु होती है, जिससे ध्यानचित्र उत्तरोत्तर चमकता जाता है, मतलब कुंडलिनी शक्ति को ज्यादा से ज्यादा जगाया जाता है। फिर एक समय ऐसा आता है, जब ध्यानचित्र इतना ज्यादा मजबूत हो जाता है कि साधक को अपने और ध्यानचित्र के बीच फर्क ही महसूस नहीं होता, न ही उसे ऐसा लगता है कि वह उसका ध्यान कर रहा है। मतलब इसमें ध्यान करने वाला, ध्यानचित्र, और ध्यान की प्रक्रिया, तीनों एकाकार हो जाते हैं। इसे ही समाधि कहते हैं। इसी के दौरान कभी भी आत्मसाक्षात्कार अर्थात आत्मज्ञान का अनुभव हो सकता है। शायद मैं इसे ही पहले कुंडलिनी जागरण कह के वर्णन कर रहा था। कोई बात नहीं, यह सिर्फ़ शब्दावलियों का अंतर है, अनुभव में कोई अंतर नहीं पड़ता।
पिछली कथा के अनुसार गंगा रूपी शक्तिजल ने देवताओं से इस शर्त पर हमेशा सुषुम्ना में बसे रहने को कहा था कि उसे सर्वाधिक महत्त्व देना होगा। मतलब साफ है कि अगर रोज योग करते हुए सुषुम्ना में बह रही शक्ति को महसूस न किया गया, तो वह धूमिल पड़ जाएगी। मतलब बेशक कुछ भी काम छूट जाए, पर योग नहीं छूटना चाहिए। अक्सर होता यह है कि भैतिक कर्म ही दिखता है, मानसिक या आध्यात्मिक कर्म नहीं। प्राचीन भारत में लोग ज्ञान, भक्ति आदि जैसे मानसिक कर्म में लगे होते थे, जो सबसे बड़ा कर्म है, क्योंकि इसी से मुक्ति और सृष्टि चक्र को सही गति मिलती है। शेष दुनिया विशेषकर पश्चिम में भौतिकता, साफसफाई आदि में ही व्यस्त रहते थे लोग, जो काम के रूप में स्पष्ट नजर आते हैं। वैसे सर्वोत्तम तरीका कर्मयोग है, जिसमें भौतिक कर्म और योगसाधना खुद ही एकसाथ होते रहते हैं।
दरअसल कुंडलिनी योग जीवनरूपी विविध धुनों को जोड़ने वाला बैकग्राउंड म्यूजिक है। जब किसी कारणवश मुख्य संगीत बजना बंद हो जाता है, तो यही पार्श्व संगीत सुखी जीवन के लिए सहारा होता है। जैसे मुख्य संगीत बंद होने से पार्श्व संगीत बहुत तेज लगने लगता है, वैसे ही जीवन की सांसारिक गतिविधियों के शोर के शांत होने से योग का ध्यानचित्र बहुत तेज चमकने लगता है, जिससे वह जागृत भी हो सकता है। संभवतः पुराणों में इसी को गड्ढे में साधना या समुद्र के भीतर बंद व अंधेरे कारागार में साधना आदि की उपमा दी गई है।
ऋषि गौतम की पिछली कथा का एक दूसरा रूपांतर भी है। इसमें गाय के मरने पर गौतम को कुटिल ऋषियों के षड्यंत्र का पता चल जाता है। इससे क्रुद्ध होकर वे उन्हें और उनकी संतानों को शैवधर्म से बहिष्कृत रहने का और उससे नरकगामी बनने का श्राप देते हैं। कहते हैं कि फिर कलियुग उन्हीं के जैसे लोगों से भर गया। उस कथा रूपांतर में उन्हें शिवदर्शन होने का कोई उल्लेख नहीं है। मतलब साफ है कि दुष्ट ऋषियों की साजिश को उन्होंने सकारात्म सकारात्मकता से लेते हुए शिवसाधना नहीं की, बल्कि अपनी संचित ऊर्जा क्रोध में और श्राप देने में लगा दी, इसीलिए उन्हें जागृति नहीं मिली। हरेक क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है।
कुंडलिनीयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए विशेष महत्त्व रखता है
जब अर्जुन पाशुपत अस्त्र के लिए भगवान शिव की तपस्या कर रहे थे, तब दुर्योधन का भेजा मूक दैत्य एक सुअर का रूप धारण कर वहां आया। वह पर्वतों के शिखरों को तोड़ता हुआ, अनेक वृक्षों को उखाड़ता हुआ तथा विविध प्रकार के अर्थहीन शब्द करता हुआ उसी मार्ग से जा रहा था, जहां अर्जुन था। उसको देखकर अर्जुन शिव का स्मरण करने लगा। शिव उसे मारने के लिए भीलराज बनके आए। अर्जुन और शिव के बीच वह शूकर अद्भुत शिखर की तरह लग रहा था। दोनों ने एकसाथ बाण चलाया। शिवजी का बाण पूंछ में घुसकर मुख से निकलकर शीघ्र ही पृथ्वी में विलीन हो गया। अर्जुन का बाण (शायद मुख में प्रविष्ट होकर) पूंछ से निकलकर भूमि पर पार्श्वभाग में गिर गया। शूकर उसी समय मर कर गिर गया।
उपरोक्त मिथक कथा का स्पष्टीकरण
दुर्योधन मतलब अहंकार अर्जुनरूपी कर्मयोगी जीवात्मा से इतना काम करवाता है कि उसकी इड़ा और पिंगला नाड़ियां क्रियाशील हो जाती हैं, मतलब अर्जुन का शरीर ही शूकररूप हो जाता है। मूलाधार ही उसकी पूंछ है। इड़ा और पिंगला उसके किनारे वाले दो नुकीले दांत हैं। द्वैत के जंगल में भटकते मन के विविध विचार उसका मुखभाग है। केवल भटकता हुआ मन ही पर्वतों को तोड़ सकता है, शरीर नहीं। मूक गूंगे को कहते हैं। क्योंकि भटकता मन आदमी को कभी नहीं कहता कि वह उसका दुश्मन है और उससे लड़ने आया है, पर धोखे से हमला करता रहता है, इसीलिए उसे मूक दैत्य कहते हैं। जैसे जीवात्मा और परमात्मा के बीच में मन एक पहाड़ की तरह भासता है, वैसे ही वह शूकर भास रहा था। इड़ा और पिंगला नाड़ियों के बारीबारी से क्रियाशील होने से आदमी इतना क्रियाशील हो जाता है कि जैसे वह पहाड़ तोड़ने को तैयार होए। इड़ा के क्रियाशील होने पर वह दुनिया के काम पागलपन जैसे से भरकर ताबड़तोड़ ढंग से करता है, और पिंगला के चालू होने से वह सुस्ता के सो जाता है। नींद से जागकर तरोताजा होकर फिर से लूट खसूट जैसे पापकर्म करने दौड़ पड़ता है। वह इसी अंधेरे और प्रकाश के द्वैत के बीच झूलता रहता है, और उनके बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी की साम्य या अद्वैत अवस्था को नहीं देख पाता। भारतीय जंगली सूअर का रंग भी काले और भूरे रंग का मिश्रण है, जो द्वैत को दर्शाता है। पशु की तरह मूर्खता से भरकर घटिया और पर्यावरणघाती काम करता रहता है। आजकल का आदमी ऐसा ही तो है। क्रियाशीलता पर ब्रेक ही नहीं है। अंधे की तरह हर कहीं सिर मार रहा है। जमीन को खोखला कर रहा है। वनों का सफाया कर रहा है। हवा, जमीन और जल को प्रदूषित करके उसमें आनंद और मस्ती के साथ लोट रहा है। ये सब सुअर के ही लक्षण तो हैं। शिव ने पूंछ से मतलब मूलाधार से तीर घुसाया, मतलब सुषुम्नारूपी शक्तिरेखा को क्रियाशील किया। दरअसल शिवलिंग के ध्यान व पूजन से ऐसा ही होता है। वह तीर उसके मुख से मतलब सहस्रार चक्र से निकलकर पृथ्वी में मतलब फ्रंट चैनल से शरीर में विलीन हो गया।
अर्जुन शिवलिंग का ध्यानपूजन तो वैसे भी कर ही रहा था। उससे स्वाभाविक है कि उसकी सुषुम्ना क्रियाशील हो गई। यह ब्रह्मशिर तीर ब्रह्मरंध्र से बाहर निकलता है। सूअर का पूरा शरीर ही मुखरूप है। ऐसा भी समझ सकते हैं कि वह तीर फिर आज्ञा चक्र में विलीन हो गया। वहां से वह मुख तक पहुंचता ही है, तालु के स्राव के माध्यम से। वहां वह स्राव भूमि मतलब उदर में चला जाता है, और वहां भोजन को पचाने में शक्तिरूप में व्यय या विलीन हो जाता है। जैसे भूमि में अन्न बनता है, वैसे ही उदर में भी बनता है, बेशक हल्के और टूटे हुए सूक्ष्म टुकड़ों के रूप में।
अर्जुन ने तालु से जीभ को छुआ कर मस्तिष्क की शक्ति को फ्रंट चैनल से नीचे उतारा। इससे वह ऊपर चढ़ी हुई शक्ति वापिस मूलाधार तक चली गई। मस्तिष्क के अंदर जो अर्जुन के द्वारा अपनी इच्छा से ध्यान लगाया जाता है, वह अर्जुन का छोड़ा हुआ तीर है। वह ऊपर से नीचे की ओर आता है फ्रंट चैनल से। मान लो कि वह शक्तिबाण मूलाधार तक पंहुचा और बाहर निकलकर पार्श्वभाग में जमीन पर गिर गया। पर बाहर कैसे गिरा। एक तो यह संभावना है कि वीर्य रूप में शक्ति बाहर गिरी। पर अर्जुन उसे हासिल करने बाहर क्यों भागना था। वैसे वीर्य की शक्ति से ही बड़े बड़े काम होते हैं, बड़े बड़े उद्योग धंधे चलते हैं, और चारों ओर भौतिक समृद्धि छा जाती है। शायद अर्जुन उन्हें अपना अपना कहते हुए उन्हें बटोरने इधर उधर भागा। यह संभावना भी है कि शक्ति वीर्यरूप में वज्र शिखा तक आई, जिसे अर्जुन ने योग से वापिस ऊपर खींचना चाहा। पर पार्श्वभाग में कैसे गिरी। हो सकता कि योनि में गिरी हो, जिसे वज्रोली मुद्रा से वापिस खींचा जा रहा हो। पर इसमें शिवगणों को आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी, क्योंकि यह व्यक्तिगत मामला है। शिवगण ने कहा कि वह शूकर शिव के तीर से मरा और वह पार्श्वभाग में गिरा हुआ शिव का तीर है। दरअसल शिवलिंगम के प्रभाव से मूलाधार की शक्ति ही सहस्रार तक जाकर फिर मुड़कर फ्रंट चेनल से नीचे आ रही थी। अर्जुन को लगा कि वह शक्ति उसने पैदा की अपने मस्तिष्क में ध्यान लगाकर, पर वास्तव में वह मूलाधार से ऊपर आ रही शक्ति के बल से ही मस्तिष्क में ध्यान कर पा रहा था, केवल अपने आत्मबल या इच्छाशक्ति से नहीं। मूलाधार चक्र की जागृति से सुषुम्ना सक्रिय हो गई थी, जिसके प्रभाव से इड़ा और पिंगला निष्क्रिय सी हो गई थीं। मतलब अज्ञानरूप सुअर मर गया था और उससे होने वाला अज्ञानजनित उत्पात भी। अर्जुन का अहम में आकर शिवलिंग का आश्रय छोड़ना या शिवलिंग को अज्ञानशूकर को मारने का श्रेय न देना ही उसका शिवावतार भीलराज़ से लड़ना है। अंत में उसे शिवलिंग का माहात्म्य समझ आना ही भीलराज के द्वारा उसे हराना है। अर्जुन के पार्श्वभाग में गिरा हुआ शक्तिबाण अन्न, घास, पुष्प आदि किसी भी रूप में हो सकता है, जिसे उसने टांगों से चलकर उगाया था। टांगों को मुख्यतः मूलाधार से ही शक्ति नीचे उतरती है। और मूलाधार को शिवलिंग से शक्ति मिली थी। इसीलिए शिवगण उन पर अपना हक जता रहे थे। अन्न, घास, पत्ते, पुष्प आदि खाने वाले पशु, पक्षी और कीट ही शिवगण हैं, जो अपने जीवन के लिए आदमी की दया पर आश्रित हैं।
अर्जुन ने कहा कि वह बाण पिच्छ रेखाओं से चित्रित है तथा उसमें उसका नाम अंकित है। बाणरूपी फ्रंट चैनल की रेखाएं हम पसलियों की लकीरों को कह सकते हैं, जो उसके शुरु में ही होती हैं। नाम खुदा हुआ हम हृदय चक्र को कह सकते हैं, क्योंकि उसीमें आदमी का पूरा मनोभाव मतलब परिचय छिपा होता है। अहंकारी आदमी लड़ाई तो करता ही है ईश्वर के साथ, अपनी संपत्ति बटोरने के लिए। परमात्मा उसे उस स्वार्थ की सजा भी देते ही रहते हैं। यही शिव और अर्जुन के बीच का युद्ध है जो मल्लयुद्ध तक पहुंच जाता है। फिर ऐसा समय आता है कि आदमी अपने स्वार्थ के लिए भगवान के मंदिर में माथा रगड़ता है। यह कहानी का वही भाग है, जिसमें अर्जुन शिव को पैरों से पकड़ता है और उसे घुमाकर पटकने की कोशिश करता है, पर उसी समय अपने पैर पकड़े जाने से प्रसन्न होकर शिव अपने असली रूप में आ जाते हैं और उसे वरदान रूप में पाशुपत अस्त्र देते हैं। यह ऐसे ही कि जब आदमी भगवान के मंदिर में किसी भी भाव से जाकर सद्बुद्धि प्राप्त करता है, और अनजाने में ही विपत्ति से बचने का वर प्राप्त कर लेता है। पाशुपत अस्त्र मतलब शिव ने उपरोक्त घटनाक्रम के माध्यम से उसे समझा दिया था कि मूलाधार ही शक्ति को अच्छे से नियंत्रित कर सकता है, सहस्रार या मस्तिष्क नहीं। इसी समझ से उसने अश्वत्थामा के द्वारा छोड़े हुए ब्रह्मास्त्र से हो रही मस्तिष्क की जलन को शांत किया था।
इस घटना को निम्न प्रकार से और ज्यादा स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। अर्जुन भीलरूपी शिव से कई वर्षों तक युद्ध करता रहा, पहले तीरों से और फिर मल्लयुद्ध से। दरअसल ऐसा युद्ध अहंकार और सत्य के बीच ही हो सकता है, क्योंकि दो व्यक्ति तो वर्षों तक लगातार नहीं लड़ सकते। अंहकार पहले अपने जीवन के सारे साजोसामान और सारी समृद्धियां परमात्मा को झुठलाने में लगा देता है। परमात्मा उन्हें बारीबारी से नष्ट करते जाते हैं ताकि वह सुधर सके। बेशक वे उन्हें उसके मन में ही नष्ट करे उनसे बोरियत के रूप में, बाहरी भौतिक रूप में नहीं। अंत में जब कुछ नहीं बचता तो आदमी अपने अंदर मौजूद उन भौतिक उपलब्धियों की यादों और वासनाओं की मदद से प्रभु से लड़ता है मतलब परमात्मा से अलग होकर अपनी पृथक सत्ता बनाए रखता है। अगर कोई घर का सदस्य घर छोड़ कर जाएगा, तो लड़कर ही जाएगा, प्रेमभाव से गले मिलकर तो नहीं। वासना पंजाबी शब्द वाशना से बना लगता है, जिसका मतलब गंध होता है। सारा मजा गंध में ही होता है। जब जुकाम आदि में गंध महसूस नहीं होती, तब खाना बिल्कुल भी स्वादिष्ट नहीं लगता। आपने देखा होगा कि कभी कोई पुरानी धुंधली याद आती है, पूरे मजे के साथ। ऐसा लगता है कि जो मजा उस असली स्थूल भौतिक घटना के समय भी नहीं आया होगा, वो उसकी बहुत धुंधली सी याद में आता है। यही उस घटना की वासना या गंध है। यह ऐसे ही होती है जैसे किसी इत्र की खुशबू। शायद यही संसार का सबसे सूक्ष्म रूप है जिसे तन्मात्रा भी कहते हैं। अगर बीती घटनाओं या बीते संसार की ऐसी गंधें आ रही हों, तो समझो योगी साधना के उच्च पद पर स्थित है और उसका सांसारिक कचरा शुद्ध होकर आत्मा में विलीन होता जा रहा है। शीघ्र ही उसे जागृति की झलक भी मिल सकती है। जब वासना रूपी अंतिम हथियार भी खत्म हो जाता है, तब वह अंधेरे जैसे में डूबने लगता है, जिसे डार्क नाइट ऑफ साउल या आत्मा की अंधेरी रात भी कहते हैं। फिर वह परमात्मा को हराने के लिए उन्हींके मंदिर जाता है, मतलब वह शिव को उठाकर फेंकने के लिए उन्हीं के पैर पकड़ता है। यह ऐसे ही है जेसे आदमी भौतिक समृद्धियों की मुराद मांगने मंदिर जाता है। फिर परमात्मा प्रसन्न होकर उसके सामने अपना असली रूप प्रकट कर देते हैं, जिससे वह उसी पल हार मान लेता है। परमात्मा के प्रकाश के सामने अहंकार का अंधेरा टिक ही नहीं सकता। शायद यही जागृति है।
कुंडलिनीयोग का संकल्पपुरुष ब्लैकहोल के अन्दर ब्रह्मांड की उत्पत्ति की पुष्टि करता है
अनंताकाश का गड्ढा भी तो वही अनंताकाश हुआ न। उसे दूसरा अनंताकाश कैसे कह सकते हैं। चादर में बना गड्ढा भी उसी चादर से बना है, उसे दूसरी चादर थोड़ी न कहेंगे। सीमित चादर तो सीमित गड्ढा ही बना सकती है। असीमित आकाश में असीमित गड्ढा क्यों नहीं बन सकता। जब छोटे, बड़े द्रव्यमान वाले पिंड आकाश में छोटे, बड़े गड्ढे बना सकते हैं, तो अनंत द्रव्यमान का पिंड अनंत आकाश में अनंत आकार वाला गड्ढा भी बना सकता है। क्योंकि तारे के सिकुड़ने से बनी सिंगुलरिटी का आकार अनंत छोटा है, इसलिए उसका द्रव्यमान भी अनंत ज्यादा है। इसीलिए उससे अंतरिक्ष में अनंत आकार का गड्ढा मतलब ब्लैकहोल बनता है। ब्लैकहोल इसीलिए तो गड्ढा है। मतलब बेशक मूल आकाश में ही है, पर खाली है, अर्थात उसकी सृष्टि से अछूता है। ॐ के आकार को अनंत छोटा कैसे मानेंगे। माना कि अनंत बड़ा आकार तो शून्य आकाश है। पर अनंत छोटा आकार भी तो शून्य आकाश ही है। दोनों के अभासिक अनुभव में अंतर हो सकता है, जैसे पहले वाला परम प्रकाश परमात्मा है, तो बाद वाला परम अंधकार जीवात्मा। मतलब एक मृत तारे से नए आकाश का निर्माण हो गया। इसीलिए तो ब्लैकहोल का आकाश खत्म नहीं होता, क्योंकि उसमें तारे के निरंतर सिकुड़ने से नया अनंत आकाश जो बन गया। पर एक से ज्यादा आकाश का होना असम्भव है, इसीलिए वह अलग अनंत आकाश नहीं बल्कि उसमें अनंत आकार का गड्ढा है। ओम शायद आकाश का नाम और रूप है। क्योंकि ध्वनि एक तरंग है, जो आकाश में हर जगह फैलती है प्रकाश तरंग की तरह। यह अलग बात है कि उसे हर जगह डिटेक्ट नहीं किया जा सकता। वैसे भी शब्द या आवाज को आकाश का गुण कहा गया है। फिर सिर्फ ओम ध्वनि को ही आकाश का रूप क्यों दिया गया है। शायद इसलिए क्योंकि यह सबसे साधारण और आधारभूत है। ओम शब्द तीन अक्षरों अ, उ और म से बना है, जिनका मतलब क्रमशः सृजन, पालन और विनाश है। आकाश भी यही करता है। यह पहले अपने अंदर दुनिया को बनाता है, कुछ समय तक उसको कायम रखता है, और फिर अपने में ही विलीन कर लेता है। मतलब ओम अनंत आकाश का ही नाम है। सटीकता से बोलें तो शायद अनंत गड्ढे का, क्योंकि यही सबसे मूलभूत विचार से बनता है। पर आकाश में गड्ढा, यह बात इतनी सरल नहीं है। कुछ तो रहस्य छिपा है इसमें। फिर तो अगर परमात्मा अनंत आकाश है, तो जीवात्मा उसमें अनंत श्याम गड्ढा। शून्य आकाश में गड्ढा भी कोई विशेष होगा, साधारण नहीं। हम तो आकाश में गढ्ढा नहीं बना सकते। हां एक तरीका है, भ्रम से गड्ढे जैसा दिखा दिया जाए। फिर तो अनंत आकाश भी रहेगा, और उसमें अनंत गढ्ढा भी, दोनों एकसाथ। जीवात्मा तो परमात्मा में ऐसा ही भ्रमपूर्ण है, असली नहीं, जैसा कि शास्त्रों में लिखा है। पर अगर भौतिक आकाश में भी ऐसा भ्रमपूर्ण गढ्ढा बनता है, तब तो सभी पदार्थ और यहां तक कि प्रकाश भी भ्रमित होकर उसमें गिर जाते हैं। जीवात्मा रूपी गड्ढे में भी तो बाहर की दुनिया गिरती रहती है, बेशक सूक्ष्म रूप में। विभिन्न इंद्रियां बाहर से विभिन्न सूचनाएं इकट्ठा करके जीवात्मा का प्रभाव बढ़ाती रहती हैं। बेशक ब्लैकहोल जीवात्मा की तरह भ्रम को महसूस नहीं करते। अंधेरे कुएं की तरफ हरकोई गिरता है, बेशक गिरने वाला महसूस करे या न। अब ये पता नहीं, उस गड्ढे को क्या चीज़ रेखांकित करती है। हो सकता है, आकाश की आभासी अर्थात वर्चुअल तरंग हो। जैसे चादर धागे की बनी है, इसी तरह आकाश भी आभासी धागों या तरंगों से भरा हुआ है। चादर के गड्ढे की खाली जगह में हवा भर जाती है, जो धागे जितनी घनी नहीं है, इसलिए चादर पर रखी गेंद उसके गड्ढे की तरफ़ लुढ़कती है। इसी तरह भारी पिंड के वजन से आकाश के आभासी तानेबाने में गड्ढा बन जाता है। उस गड्ढे की खाली जगह में बाहर के अटूट आकाश की तुलना में कम घना आभासी तानाबाना बुना होता है। इसीलिए आसपास के अन्य छोटे पिंड उस गड्ढे की तरफ़ लुढ़कते हैं, पर हमें ऐसा लगता है कि बड़ा पिंड छोटे पिंड को गुरुत्व बल से अपनी तरफ खींच रहा है। यह ऐसे ही है जैसे हवा उच्च दाब वाले क्षेत्र से निम्न दाब वाले क्षेत्र की तरफ़ बहती है। शून्य आकाश वही एकमात्र है, पर आभासी तरंगों के कारण उसमें आभासी गड्ढा बन जाता है। इसका मतलब है कि अंतरिक्ष में हर समय बनने वाली आभासी तरंगें व कण वस्तुओं पर दबाव डालते हैं। केसीमिर इफेक्ट के प्रयोग में यह सिद्ध भी किया गया है। संभवतः यह दबाव भी पिंडों को आकाश में बने गड्ढों की तरफ़ धकेलने में मदद करता है, जिसे गुरुत्वाकर्षण कहते हैं।
आदमी दरअसल विशेष किस्म का आकाश है। उसका शरीर तो केवल उस आभासी आकाश का निर्माण करने वाली मशीन है, ब्लैकहोल की तरह। आकाश में सदैव आभासी तरंगे बनती, मिटती रहती हैं, पर उन्हें कोई भी, परमात्मा भी अनुभव नहीं करता, ऐसे ही जैसे समुद्र अपनी तरंगों को महसूस नहीं करता। यह समुद्र और उसकी तरंग का उदाहरण शास्त्रों में अनेक स्थानों पर मिलता है। मस्तिष्क भी उसमें वैसी ही आभासी तरंगें बनाता है, पर उसे जीवात्मा अनुभव करता है, और भ्रम में पड़कर अपने पूर्ण परमात्माकाश रूप को भूलकर जीवात्माकाश बन जाता है। इसे ब्लैकहोल की तरह आकाश में अनंत गड्ढा मान लो।
ऐसा लगता है कि फिर ब्लैकहोल के आकाश में ब्रह्मांड नहीं बनेगा। क्योंकि वह आभासी तरंगों का जाल तो बाहरी मूल आकाश में है जिससे पदार्थ बनते हैं, वह ब्लैकहोल में नहीं है या कम है। पर ब्लैकहोल के आकाश में तारे का द्रव्यमान भी एनकोडिड है, शायद डार्क एनर्जी या डार्क मैटर के रूप में। वह नया ब्रह्माण्ड बनाता हो। या ब्लैकहोल के आकाश में दूसरे व हल्के किस्म की आभासी तरंगें पैदा हो जाती हों जो पदार्थ व ब्रह्माण्ड बनाती हों। फिर उसमें भी कभी ब्लैकहोल बनेगा। जो फिर से नया ब्रह्माण्ड बनाएगा। यह सिलसिला पता नहीं कहां रुकेगा। कुंडलिनी योग से तो सिलसिला जल्दी ही रुक जाता है। योगवासिष्ठ में संकल्पपुरुष शब्द कई जगह लिखा आता है। शायद यह आदमी के लिए कहा गया है कि वह ब्रह्मा के मन के संकल्प या स्वप्न का आदमी है, असली नहीं। इसी तरह आदमी जब किसी देवता, गुरु आदि का ध्यान करता है, तो वह उसका संकल्पपुरुष बन जाता है। पर क्या वह संकल्पपुरुष अपना पृथक अस्तित्व महसूस करता है हमारी तरह, यह विचारणीय है। कई सभ्यताओं में मान्यता है कि जबतक किसी पूर्वज को उसके वंशजों द्वारा याद किया जाता है और श्राद्ध आदि धार्मिक समारोहों के माध्यम से पूजा जाता है, वह तब तक स्वर्ग में निवास करता है। इस पर कोको नाम की बेहतरीन एनिमेशन फिल्म भी बनी है। इसका मतलब है कि हम ध्यान से नया अस्तित्व तो नहीं बना सकते, पर यदि पूर्वनिर्मित अस्तित्व का ध्यान करते हैं, तो उसे उससे पोषण प्राप्त होता है। फिर तो यह भी हो सकता है कि एक उच्च कोटि का योगी ब्रह्मा की तरह अपने मन से नए मनुष्य की रचना कर दे। शास्त्रों में ऐसी बहुत सी कथाएं आती हैं। एक ऋषि ने तो अपने विवाहोत्तर विहार के लिए मनोवांछित दुनियावी साजोसामान और प्राकृतिक नजारे अपनी योगशक्ति से पैदा कर दिए थे। यह तो ऐसे ही है जैसे ब्लैकहोल में बिल्कुल अपने पितृ ब्रह्मांड के जैसा एक अन्य ब्रह्मांड का निर्माण होता है। अगर शास्त्रों का संकल्पपुरुष संभव है, तब तो ब्लैकहोल के अंदर ब्रह्मांड की उत्पत्ति भी संभव है।
ब्लैकहोल इसीलिए तो गड्ढा है, क्योंकि वह मूल आकाश की आभासी तरंगों से रहित मतलब खाली है। मतलब बेशक मूल आकाश में ही है, पर खाली है, अर्थात उसकी सृष्टि से अछूता है।हालाँकि, मूल आकाश की आभासी तरंगें अभी भी अपने मूल स्थान पर हैं, लेकिन इसके ऊपर एक नया आकाश भी बन गया है, पर वह मूल आकाश की आभासी तरंगों के प्रभाव से रहित है। यह कैसे हो सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो यह केवल एक और एक ही आकाश है, लेकिन इसके अनगिनत रूप एक ही समय में आभासी तरंगों की विविधता के रूप में मौजूद हैं। अद्भुत मामला है। मैं पिछली एक पोस्ट में भी बता रहा था कि एक ही अनन्त आकाश में एक ही स्थान पर अनगिनत ब्रह्माण्ड हो सकते हैं। संभवतः उन सभी की आभासी तरंगें एकदूसरे से अप्रभावित रहती हों। आत्मा के मामले में भी ऐसा ही होता है। एक ही अनंत अंतरिक्ष में असंख्य आत्माएं अर्थात अलग-अलग जीवों के अपनेअपने अनंत अंतरिक्ष हैं, जो विचारों के रूप में एक-दूसरे की आभासी और सूक्ष्म सृष्टिरचनाओं अर्थात ब्रह्मांडों को नोटिस नहीं कर पाते अर्थात उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते। जीवों के मामले में तो सभी जीवों की आभासी तरंगें एकसमान स्वभाव की हैं, फिर भी वे एकदूसरे की पहुंच से परे हैं, शायद स्थूल ब्रह्मांडों के मामले में भी ऐसा ही हो, मतलब वर्चुअल तरंगें एकसमान किस्म की हैं, पर एक ही स्थान पर एक ब्रह्मांड अन्य सभी ब्रह्मांडों से पूरी तरह अप्रभावित और कटा हुआ है। दिवंगत जीवात्मा में सबकुछ सूक्ष्म मतलब अनभिव्यक्त रूप में रहता है, इसलिए उसमें अंधेरा है। ब्लैकहोल में भी इसीलिए अंधेरा है। संभवतः यह अंधकारमय अनुभूति ही श्याम ऊर्जा अर्थात डार्क एनर्जी है, कोई भौतिक वस्तु नहीं। इसीलिए ऐसा प्रतीत होता है कि यही तथाकथित सबसे छोटी भौतिक इकाई अर्थात सिंगुलैरिटी अर्थात ओम है। डार्क मैटर कहना ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि इसका द्रव्यमान है, जिसमें गुरुत्व बल है। मुझे तो लगता है कि दोनों एक ही चीज़ है, कभी यह एनर्जी के रूप में व्यवहार करती है, तो कभी मैटर के रूप में, ऐसे ही जैसे आदमी के मन का अंधेरा कभी शांत, हल्का और आनंदप्रद सा प्रतीत होता है, तो कभी घना, भारी और दुखप्रद सा। पहले किस्म के अंधेरे से आदमी योग आदि की तरफ़ मुड़कर दुनिया से दूर भागने की कोशिश करता है, पर दूसरे किस्म के अंधेरे से दुनियादारी को अपनी तरफ आकृष्ट करता है। योग की यह विशेष खासियत है कि यह डार्क मैटर को हल्का करके डार्क एनर्जी में परिवर्तित करने की कोशिश करता है। यह ऐसे ही है, जेसे डार्क एनर्जी में धकेलने का गुण होता है, पर डार्क मैटर में आकर्षित करने का। इसका वर्णन हमें शास्त्रों में मिलता है जब कोई एक ऋषि से पूछता है कि प्रलय के बाद सृष्टि कैसी होती है, तो ऋषि कहते हैं कि इतना घनीभूत अंधेरा होता है कि अगर कोई चाहे तो उसे मुट्ठी में भर ले। यह डार्क मैटर की बात हो रही है, क्योंकि पदार्थ ही मुट्ठी में भरा जा सकता है, खाली आसमान नहीं। मुझे तो लगता है कि बेशक यह साधारण पदार्थ नहीं होता पर उसके जैसा सॉलिड महसूस होता है, वैसे ही जैसे क्वांटम कण दरअसल पदार्थ नहीं तरंगरूप होते हैं, पर पदार्थ के जैसा व्यवहार भी करते हैं।
चंद्रयान-3 प्रक्षेपण हेतु शुभकामनाएं
कुंडलिनी वामन भगवान बनके शुक्राचार्य की द्वैतरूपी आंख फोड़ती है
दोस्तों, पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए, वह बलिरूपी अहंकार वामन को मजबूरन आने देता है, और उसे अंदेशा भी हो जाता है कि वह कुंडलिनी जागरण के बाद बच नहीं सकता। वैसे महिमा ऐसे गाई गई है कि राजा बलि सबसे बड़ा दानवीर था, जिसने अपना भावी नाश जानते हुए भी वामन को तीन पग जमीन दान में दी। हरेक जीव राजा बलि की तरह परम दानवीर होता है। वह यह जानकर कि कुंडलिनी योग से उसका अहंकार नष्ट हो जाएगा, उसका असीमित भौतिक संसार नष्ट हो जाएगा, फिर भी वह कभी न कभी जरूर कुंडलिनी साधना करता है। जब आदमी राजा बलि की तरह अच्छे कर्मों में लगा होता है, तब कभी न कभी भगवान विष्णु उसका भला करने एक ध्यानचित्र के रूप में उसके पास आते हैं। वे मित्र, प्रेमी, गुरु या देवता किसी भी रूप में हो सकते हैं। गुरु को भी तो भगवान का ही रूप समझा जाता है। वैसे भी हर किसी के लिए अपना प्रेमी भगवान ही होता है। उदाहरण के लिए मान लो कि किसी पुरुष की जिंदगी में एक स्त्री का प्रवेश होता है। पुरुष के बीसों कारोबार होते हैं, और सैंकड़ों रिश्ते। उनके कारण उसके मन में अनगिनत विचारचित्र बने होते हैं। इसलिए वह उस स्त्री को हल्के में ले लेता है, और सोचता है कि उसके विस्तृत भौतिक संसार के सामने एक स्त्री कुछ भी नहीं है। वह उसे अपने मन में जगह बनाने देता है, मतलब वह उससे जुड़े भाव या सत्त्वगुणरूपी पहले कदम, गति या रजोगुणरूपी दूसरे कदम, और अंधकार या तमोगुणरूपी तीसरे कदम को अपने मनरूपी साम्राज्य में पड़ने देता है। पर धीरेधीरे उसका उसके प्रति प्यार बढ़ता रहता है, और समय के साथ वह उसके मन में ज्यादा से ज्यादा जगह घेरती रहती है। आखिर में वह उसके पूरे साम्राज्य में फैल जाती है, और फिर जागृत होकर आदमी के राजाबलिरूपी अहंकार को खत्म ही कर देती है। कुंडलिनी योग में भी ऐसा ही होता है। इसका मतलब है कि योग और प्रेम के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। राजा बलि भी बहुत बड़ा यज्ञ मतलब अच्छा काम ही कर रहा था। आदमी को पता चल जाता है कि वह ध्यानचित्र के चक्कर में पड़कर बावला प्रेमी या योगी या प्रेमयोगी या प्रेमरोगी बन जाएगा, फिर भी वह उसे अपनाता है, और आगे बढ़ाता है। उसने कुण्डलिनी जागरण के माध्यम से एक कदम से मतलब सत्वगुण से सारा स्वर्ग कब्जे में कर लिया। स्वर्ग सतोगुण प्रधान होता है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण के समय तीनों गुण अनंत हो जाते हैं, इसीलिए कहा गया है कि कुंडलिनी या वामन से तीनों लोक पूरी तरह से व्याप्त हो गए मतलब भर गए। दूसरे कदम मतलब रजोगुण से कुण्डलिनी चित्र पूरी धरती में फैल गया, क्योंकि धरती रजोगुणप्रधान है। तमोगुणरूपी तीसरे कदम से अहंकार व उससे जुड़े कर्मविचार मूलाधार के अँधेरे अवचेतन अर्थात पाताल में चले जाते हैं। क्योंकि तमोगुण किसी को मारकर या नष्ट करके ही बनता है, इसलिए वह अहंकार और उससे पोषित मानसिक सृष्टि को नष्ट करने से बनता है। पाताल लोक के द्वारपाल के रूप में भगवान विष्णु के स्थित हो जाने का मतलब है कि ध्यानचित्र कुंडलिनीयोग के माध्यम से उन राक्षसों को अर्थात अवचेतन में दबे विचारों को ऊपर अर्थात मस्तिष्क या स्वर्ग की तरफ जाने देकर शुद्ध करता रहता है, ताकि सब देवता ही बन जाएं। साथ में, विष्णुस्वरूप ध्यानचित्र को कुंडलिनी योग से स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्रों पर केंद्रित किया जाता रहता है, जिससे उनमें दबी हुई राक्षसरूपी भावनाएं उजागर होकर उसके संपर्क में आने से शुद्ध बनी रहती हैं, जिससे वे योगी को बंधन में नहीं डाल पातीं, मतलब राक्षस देवताओं को परेशान नहीं कर पाते, क्योंकि शरीर में ही सभी देवता बसे हुए हैं। वैसे भी स्वाधिष्ठान चक्र को इमोशनल बैगेज मतलब भावनाओं की गठरी कहते हैं।
यज्ञ में बलि के पुरोहित बने हुए राक्षसगुरु शुक्र आचार्य पहले बलि को बहुत समझाते हैं कि वह वामन पर भरोसा न करे क्योंकि वह तीन कदमों में ही उसका सबकुछ छीन लेंगे। पर जब बलि नहीं मानता तो शुक्राचार्य संकल्पजल गिरा रहे शंख के सुराख़ में घुस जाते हैं, पर वामन उसमें कुशा डालकर उसकी आंख फोड़ देते हैं? एक बात और, क्योंकि शंख भी जीव की पीठ पर होता है, और रीढ़ की हड्डी की तरह ही उसे सुरक्षा देता है, इससे भी पक्का हो जाता है कि सुषुम्ना नाड़ी को ही शंख कहा गया है। साथ में, शंख का आकार भी एक फन उठाए नाग या ड्रेगन के जैसा ही होता है, जिसकी समानता मेरुदंड व उसमें स्थित सुषुम्ना के साथ की जाती है। एक अनुभवी कुलपुरोहित कभी भी अपने यजमान को अध्यात्म के बीहड़ में नहीं खोने देना चाहता, बेशक उससे यजमान का फायदा ही क्यों न हो। उसे पता होता है कि अगर यजमान को सत्य का पता चल गया तो उसे ठगकर उससे यज्ञ आदि कर्मकांड के नाम पर पैसा ऐंठना आसान नहीं रहेगा। हालांकि अपनी जगह पर कर्मकाण्ड सही है और जागरण के लिए महत्त्वपूर्ण सीढ़ी है, पर मंजिल मिलने पर कौन सीढ़ी की परवाह करता है। वैसे भी वह भौतिकवादी गुरु है। शुक्राचार्य अर्थात भौतिक विज्ञानवादी व्यक्ति या गुरु द्वारा शुक्र अर्थात वीर्य को बाहर बहा कर सुषुम्ना के शक्ति प्रवाह को ब्लॉक करना ही शंख में घुसना है। वामन का उसको कुशा डंडी द्वारा खोलना ही योगी द्वारा कुण्डलिनी ध्यानचित्र के माध्यम से मूलाधार से शक्ति को ऊपर चढ़ाना है। यह मूलाधार से लेकर सहस्रार तक फैली हुई संवेदना की रेखा जैसी होती है जो रीढ़ की हड्डी में होती है। यह झाड़ू या कुशा की सींक जैसी पतली फील होती है। यही सुषुम्ना जागरण है। अगर संभोग से पहले पीठ की विशेषकर मेरुदंड की ढंग से मालिश करवा ली जाए, तो यह संवेदना रेखा आसानी से और आनंद के साथ महसूस होती है। फिर वीर्य शक्ति आसानी से ऊपर चढ़ती है, जिससे संभोग बहुत आनंदमय और आध्यात्मिक बन जाता है। यौनांगों का दबाव भी एकदम से खत्म हो जाता है। आदमी अक्सर ऐसा कुंडलिनीजनित आनंद के लालच से प्रेरित होकर करता है, इसीलिए मिथक कथा में कहा गया है कि वामन ने ऐसा किया। इससे शुक्राचार्य की आंख फूटना मतलब कुण्डलिनी के प्रभाव से वीर्यशक्ति की द्वैत दृष्टि अर्थात दोगली नजर नष्ट होना है। जब वीर्यशक्ति द्वैत से भरे संसार की तरफ न बहकर अद्वैत से भरी आत्मा की तरफ बहेगी, तो स्वाभाविक है कि वीर्यशक्ति की दोगली नजर नष्ट होगी ही। बलि या अहंकार पाताल को चला जाता है, मतलब कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी व्यक्त अर्थात प्रकाशमान जगत का अहंकार नहीं कर सकता क्योंकि उसने सबसे अधिक प्रकाशमान कुंडलिनी जागरण का अनुभव कर लिया है। इसलिए वह स्थूल जगत से उपरत सा होकर अपने सूक्ष्म शरीर के रूप में अव्यक्त अन्धकार सा बन जाता है। यही उसका पातालगमन है। हालांकि सूक्ष्म शरीर के धीरे-धीरे स्वच्छ होने से स्वच्छ होता रहता है। इसे ही ऐसे कहा गया है कि भगवान विष्णु उसके द्वारपाल के रूप में पहरा देते हैं।
कुंडलिनी तंत्र धर्म-जनित मानसिक बीमारी को नियंत्रित कर सकता है
दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी योग मेरी मानसिक स्थिति को स्थिर व तंदुरुस्त बना के रखता था। एक मित्र बोल रहे थे कि अपंग दिमाग प्रेम आदि से स्वस्थ नहीं हो सकता। इस हिसाब से तो प्रेम से कुंडलिनी जागरण भी नहीं हो सकता। पर वह होता है। दिमागी विकृति के विभिन्न स्तर होते हैं। हम यह नहीं कहते कि सभी स्वस्थ हो जाएंगे, पर कुछ न कुछ सुधार तो सबमें होगा। यहां तक कि सभी शारीरिक रोगी खासकर जन्मजात या आनुवंशिक रोगी भी दवा से कहां ठीक होते हैं। मेरे कहने का मतलब था कि जब कुंडलिनी योग एक मानसिक बिमारी जैसा लगता है, तब मानसिक बिमारी भी तो कुंडलिनी योग जैसी बनाई जा सकती है। शायद इसीलिए अधिकांश धर्मों में मानसिक रोग को दैवीय दृष्टि से देखा जाता है। एक बात और है। जब ध्यान को बोला जाए, पर उसके लिए जरूरी ऊर्जा का प्रबंध न किया जाए, तो मानसिक रोग तो फैलेंगे ही। मैं किसी खास धर्म को पिनपोइंट नही करूंगा। पर यह सबको पता है कि ज्यादातर धर्म और अध्यात्म को अंधे जैसे होकर मानने वाले कट्टर किस्म के लोग ही इस समय मानसिक रोगी या मानसिक रोगी जैसे दिखाई देते हैं। पाकिस्तान इसका एक जीता जागता उदाहरण है, जहां एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग पाँच करोड़ से ज्यादा मानसिक रोगी हैं। ऐसा लगता है कि अगर किसी धर्म में पर्याप्त अतिरिक्त ऊर्जा है, तो सही तरीके से ध्यान नहीं है, या फिर ध्यान है ही नहीं। केवल कुंडलिनी तंत्र ही मुझे इसमें अपवाद लगता है, क्योंकि यह ध्यान के लिए भी बोलता है, और उसके लिए जरूरी अतिरिक्त ऊर्जा का प्रबंध भी करता है। सही तरीके से ध्यान और ऊर्जा की कमी से धर्म या अध्यात्म कुछ से कुछ बन जाता है, बिल्कुल उल्टा हो जाता है, अपने असली मूलरूप में रहता ही नहीं है। एकहोर्ट टाले को अवसाद के शिखर पर ही जागरण की अनुभूति मिली। मतलब वे मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि कुदरती कुंडलिनी साधना के दौर से गुजर रहे थे, जिसे उन्होंने और दुनिया के लोगों ने गलती से अवसाद समझा हुआ था, इसीलिए वे उसे ढंग से नहीं संभाल पा रहे थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। एक दिमागी अपंग आदमी हमारे कार्यालय में अपने पैर के जूतों को अपने सिर पर रखकर दौड़ता हुआ अक्सर आता था। उसके साथ प्रसन्नता और हंसीमजाक के साथ हाथ मिलाना पड़ता था, या फिर उसे एक रुपया देना पड़ता था। न मिले तो साबुन का छोटा सा टुकड़ा उठाकर वैसे ही भाग जाता था। एकबार हमारे सामने उसने एक अजनबी को जोर का तमाचा जड़ा था, जिससे वह पूरा हिल गया था। मुझे लगा कि वह मुझसे नाराज़ था पर मेरी तांत्रिक शक्ति से डरकर उसने मेरा गुस्सा उसपर उतार दिया। आजतक मैं उसके चेहरे पर उस घटना का पछतावा देखता हूं। यह प्यार ही है जो उसे लाइन पर रख रहा था। इसी तरह एक हल्के स्तर का अविवाहित व दिव्यांग व्यक्ति मेरी कुंडलिनी योगशक्ति से प्रभावित होकर मेरे लिए बहुत से काम लगभग बिना मेहनताने के करता था, पर मैं उसके परिवार वालों को उसके नाम पर पैसे दे देता था। ऐसा क्यों न समझा जाए कि अल्जाइमर जैसे मानसिक रोगों में मस्तिष्क के मुख्य पुर्जों के खराब होने से जो अतिरिक्त नाड़ी रसायन अर्थात न्यूरोकैमिकल्स जमा हो जाते हैं, वे हैलुसिनेशन के रूप में असली लगने वाला काल्पनिक चित्र बनाते हैं। इसी तरह योग द्वारा मन पर लगाम लगने से भी ऐसा ही होता होगा, तभी तो स्थायी समाधि चित्र बनता है। पर पहली स्थिति में यह समाधि जैसा मानसिक चित्र अस्वस्थ, अनियंत्रित और जागरण के उद्देष्य से रहित है, पर दूसरी स्थिति में यह नियंत्रित व स्वस्थ ध्यानसमाधि चित्र है, जो जागृति को दिलाता है। क्या साम्यवादियों ने इसी भ्रम के कारण “धर्म की अफीम का नशा” वाक्य ईजाद किया है? शेष, इस विषय को हम मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए छोड़ते हैं, क्योंकि हम अपने मूल विषय से भटकना नहीं चाहते।
कुंडलिनीयोग और सिगमंड फ्रायड का मनोविज्ञान एक ही बात कहता है
दोस्तो, हाल की पिछली कुछ पोस्टों के विश्लेषण से लगता है कि हो सकता है कि जिन्हें हम मानसिक बिमारी समझते हों, वे दरअसल जागृति की तरफ बढ़ रहे मन के लक्षण हों, पर उन्हें हम ढंग से संभाल न पाने के कारण वे मानसिक रोग बन जाते हों। मैं इसे अपनी आपबीती से भी सिद्ध कर सकता हूं। जिस किसी स्थान विशेष पर मुझे यौनबल मिलता था, वहां मेरा ध्यानचित्र मुझे हर क्षेत्र में अव्वल बनाता था, चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक। पर जहां मुझे वह नहीं मिलता था, वहां वह मुझे एक मनोरोगी जैसा भी बना देता था। बेशक वह यौनबल काल्पनिक संभोग ही क्यों न हो, काल्पनिक यौनसाथी का समाधि जैसा स्थायी मानसिक चित्र क्यों न हो। यहां तक कि बेशक वह स्त्री की बजाय पुरुष ही क्यों न हो। ऐसे में तो मुझे समलैंगिकता में भी कोई बुराई महसूस नहीं हुई। हालांकि यह अलग बात है और जैसा मुझे लगता है कि कुंडलिनी जागरण स्त्रीपुरुष प्रेम से ही मिलता है, क्योंकि यिन और यांग का संपूर्ण सम्मिलन पुरुष और स्त्री के बीच ही हो सकता है। पाठकों को यह अजीब लग सकता है।
महान पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड कहते हैं कि शरीर के हरेक हिस्से में यौन-उन्माद अर्थात ऑर्गेज्म है। यह तो तंत्र में बहुत पहले से कहा गया है। तभी तो कुण्डलिनी शक्ति का चक्रोँ पर आना मतलब वहाँ पर यौन उन्माद को अनुभव करना ही है। कुंडलिनी योग का मतलब ही उस मूलाधार की यौनोन्माद या ऑर्गेस्मिक से भरी संवेदना को ऊपर चढ़ाते हुए उसे सभी चक्रों को बारीबारी से प्रदान करना है। यह ऑर्गेस्मिक व आनंदपूर्ण संवेदना एक सुपर टॉनिक की तरह है। यह जिस चक्र पर पहुंचती है, उसकी सभी जैविक गतविधियों को बढ़ाते हुए उन्हें सुधारती भी है और संतुलित भी करती है। उस चक्र के प्रभावक्षेत्र में जितने भी अंग व जैवीय भाग आते हैं, वे भी खुद ही चक्र की तरह लाभान्वित हो जाते हैं। क्योंकि सातों चक्रों में सारा शरीर कवर हो जाता है, इसलिए पूरा शरीर स्वस्थ व संतुलित हो जाता है, बिमारियां इससे दूर रहती हैं। दरअसल जननांगों का यौनोन्माद तो चक्रों के अपने स्वाभाविक या इन्हेरेंट यौनोन्माद को बढ़ाने का ही काम करते हैं, अपना यौनोन्माद तो उनके अंदर पहले से ही है। उनका यह आंतरिक यौनोन्माद विभिन्न जैविक अभिक्रियाओं व प्रक्रियाओं के आधारभूत रूप में है। जननांगों से तो उसे बस अतिरिक्त धक्का ही मिलता है। ऐसा समझ लो कि उनका अपना यौनोन्माद आइडलिंग पर स्वतः घूम रहे इंजिन की तरह है, और जननांगों का यौनोन्माद गाड़ी के एकसेलरेटर पैडल की तरह है। अगर जननांगों का यौनोन्माद ही सबकुछ होता, तब तो फेल हो रहा हार्ट भी उससे चालू हो जाता। पर ऐसा नहीं होता। यह ऐसे ही है, जैसे अगर इंजन बंद हो या पिस्टन आदि पुर्जों की खराबी से वह बंद हो रहा हो, तो एकसेलरेटर पैडल को दबाने से भी वह चालू नहीं होगा।
एक जगह सिगमंड फ्रायड थोड़ा हट कर विचार रखते हैं। वे कहते हैं कि संभोग शक्ति सबसे बड़ी है, मतलब प्राइम मोटिवेटर या प्रमुख प्रेरक है, पर हमारे तंत्र दर्शन में शुरु से ही कहा गया है कि संकल्प शक्ति उससे भी बड़ी प्रेरक है। अगर फ्रायड बिल्कुल सही होते तो हरेक व्यक्ति को जागृति मिला करती, क्योंकि संभोग तो सभी लोग करते हैं। सच्चाई यह है कि संभोग से भी जागृति उन्हीं को मिलती है, जिन्होंने योगसाधना और अन्य आध्यात्मिक तरीकों से गुरु और जागृति की प्राप्ति के लिए मन में पहले से ही दृढ़ संकल्प बना कर धारण कर रखा हो। इस बारे में किसी नई पोस्ट में विस्तार से चर्चा की कोशिश करेंगे।
कुंडलिनी ध्यानसाधना और जागरूकता ध्यान एकदूसरे से भिन्न नहीं हैं
मित्राें, पिछली पोस्ट में सच्चे व समर्पित प्यार से उपजे चमत्कार को हमने देखा। अगर इसका उल्टा हो जाए, तो क्या होगा, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। लवजिहाद में यही उल्टा खेल चल रहा है। ऐसे ही भयानक संक्रामक रोगों के कारण सदियों से स्त्री और पुरुष के बीच अविश्वास की खाई बनी हुई है। यह आज से नहीं, बल्कि सदियों से न्यूनाधिक रूप से, इस नाम से या उस नाम से चल रहा है। आज तो यह ढंग से दुनिया के सामने आ रहा है। विश्वास बनाने में वर्षों लग जाते हैं, पर तोड़ने में कुछ ही पल। बल से शरीर को तो जीता जा सकता है, पर दिल को तो प्रेम और विश्वास से ही जीता जा सकता है। इसी पर बनी हुई लाजवाब फिल्म “केरला स्टोरी” आजकल अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा व आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। पर यह इस ब्लॉग का विषय नहीं है, यह तो ऐसे ही पोस्ट के संबंध में बात चली थी, तो यह वर्तमानकालिक मुद्दा खुद ही जुड़ गया।
जब किसी मूर्ति आदि पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तब भटकते विचारों की शक्ति वहाँ केंद्रित हो जाती है। विचारों की शक्ति को प्रकट होने का एक ही रास्ता बचता है, ध्यानचित्र के रूप में प्रकट होने का। योगी मूर्ति की बजाय अपने शरीर के चक्रोँ पर ध्यान केंद्रित करते है। उससे भी वैसा ही होता है। साथ में शरीर भी स्वस्थ रहता है। जो इनको नहीं मानते, वे आसमान पर या उसमें रहने वाले किसी अदृश्य भगवान पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उससे भी वैसा ही होता है। मतलब साफ है कि कोई भी काफ़िर नहीं है।
साथ में, नदी, पर्वत, वृक्ष पर ध्यान लगाने से अर्थात उनकी पूजा करने से वे सभी भी शरीर के चक्रों की तरह स्वस्थ रहते हैं, क्योंकि फिर चक्रों की तरह ही आदमी की प्राणशक्ति उनको भी लगती है। पर्यावरण की सुरक्षा इसी मूलमंत्र में छुपी हुई है।
अवयरनेस मेडिटेशन अर्थात जागरूकता ध्यान पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। कहते हैं कि एवयरनेस मेडिटेशन से बहुत लाभ मिलता है। मुझे हाल ही में एक नए मित्र से मिलने का मौका मिला। वे होम्योपैथिक मेडिसिन की अच्छी प्रेक्टिस भी करते हैं। वैसे भी होम्योपेथी भारतीय ऋषि परम्परा से बहुत मेल खाती है। इसी सिलसिले में वहाँ गया था तो थोड़ा परिचय हो गया। उनके साहित्य व अध्यात्म के शौक को जानकर मैं भी अध्यात्म की बातें करने लग गया। कहते हैं कि जौहरी को ही हीरा दिखाना चाहिए, आम आदमी तो उसे पत्थर समझकर नाले में फैक देगा। मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि हर समय अवेयरनेस के साथ रहना चाहिए। ओशो महाराज भी बिल्कुल यही कहते हैं कि हरेक काम अवेयरनेस के साथ करो। वे खुद भी ओशो के अनुयायी लगे मुझे। सतसंग से लाभ तो मिलता ही है, जैसा मुझे मिला। मैं इसके मनोवैज्ञानिक सिद्धांत की तह तक पहुंच सका। मुझे लगता है कि जब हम वर्तमान के रियल टाइम में शरीर को महसूस हो रही किसी भी संवेदना पर ध्यान दे रहे होते हैं, तब मनोमय कोष, अन्नमय कोष और प्राणमय कोष आपस में मिश्रित हो रहे होते हैं, जैसा मैंने पिछली कुछ पोस्टों में विस्तृत रूप से वर्णन किया था। वर्तमान की संवेदना की तरफ ध्यान देने से शरीर और सांस पर भी खुद ही ध्यान चला जाता है, क्योंकि तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। वैसे तो बीती हुई और आने वाली घटनाओं के ख्याल भी मानसिक संवेदना के ही अंतर्गत आते हैं, पर उनके साथ शरीर और सांस कम जुड़ते हैं, क्योंकि न भूतकाल में यह वर्तमान काल में स्थित भौतिक शरीर था, और न ही भविष्यकाल में होगा, यह तो केवल वर्तमान काल में ही स्थित है। इसीलिए कहते हैं कि वर्तमान में ही स्थित रहना चाहिए। मुझे लगता है कि जब किसी के द्वारा वर्तमान स्थिति के साथ जुड़ी भौतिक संवेदनाओं का ध्यान किया जाता है, तो इससे यह विश्वास पक्का होता रहता है कि वे उसके शरीर से ही जुड़ी हैं, क्योंकि वे शरीर और सांसों की बदलती स्थिति के साथ बदलती रहती हैं। इससे यह विश्वास भी खुद ही हो जाता है कि उसकी सभी मानसिक संवेदनाएं जैसे कि विभिन्न भावनाएं और विचार भी उसके शरीर के ही भाग हैं, क्योंकि संवेदना चाहे शारीरिक हो या मानसिक, वर्तमानकालिक हो या भूतकालिक या भविष्यकालिक, उन सभी का गुणस्वभाव व अनुभव बिल्कुल एकसमान ही होता है। इससे वे शांत हो जाती हैं, क्योंकि अपने आप से किसीको आसक्तिभाव, लगाव या प्रेम नहीं होता। क्योंकि स्वयं तो स्वयं से हमेशा के लिए जुड़ा हुआ है, उसे कोई अलग नहीं कर सकता, क्योंकि वह अपना ही रूप है। आसक्ति केवल दूसरे से या अलग व्यक्ति या पदार्थ से होती है मतलब तब काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे मानसिक दोष शांत होकर जीवन को अपने लिए और औरों के लिए सुखमय बना देते हैं। इसी शान्त माहौल में ही आध्यात्मिक प्रगति भी होती है, भौतिक प्रगति तो होती ही है। इसका प्रमाण है ऐसी अवस्था में कुंडलिनी ध्यानचित्र का आदमी के मन में सुस्पष्ट अभिव्यक्त होना। साथ में, कुंडलिनी ध्यानसाधना से मस्तिष्क इतना ज्यादा चुस्त और संवेदनशील हो जाता है कि वह हरेक भौतिक संवेदना को गहराई से महसूस करने लगता है, जिससे खुद ही जागरूकता साधना की आदत पड़ जाती है। साथ में आदमी को ऐसा भी लगता है कि जब सभी संवेदनाएं एकजैसी ही हैं, तब वह किसी संवेदना पर ज्यादा तो किसी पर कम आसक्त क्यों है। उसे तो सबके प्रति बराबर रहना चाहिए। इसलिए वह निष्पक्ष व निरपेक्ष होकर शान्त हो जाता है। या ऐसा समझ लो कि आसक्ति वाली संवेदनाओं से सामान्य भौतिक संवेदनाओं की तरफ ध्यान डाईवर्ट हो जाता है।
कुंडलिनीपरक संभोग योग ही मस्तिष्क को जागरण के लिए तैयार करती है
दोस्तों, पिछली पोस्ट में कुंडलिनी ध्यान और मनोरोग के बीच तुलनात्मक अध्ययन के बारे में बात हो रही थी। उसी कड़ी में ऐसा भी लगता है कि ऐसे मनोरोगियों का इलाज प्रेमचिकत्सा से भी हो सकता है। इसलिए अक्सर यह कहावत आम है कि प्यार व्यक्ति को नशामुक्ति में मदद करता है। प्यार एक सुपरटोनिक है। मानसिक रोग हमेशा ही बुरे नहीं होते, जैसी कि आम मान्यता है, पर एक गॉडगिफ्ट भी हो सकते हैं। संभवतः हिंदु धर्म में इसीलिए मानसिक रोगियों को विशेष दैवीय नजरिए से देखा जाता है, सम्मान से देखा जाता है। यहां उन्हें मानसिक हस्पताल कम ही भेजा जाता है, जब तक कोई गंभीर खतरा ही पैदा न हो जाए। वे मनोरंजन का मुख्य स्रोत होते हैं, और समारोह आदि में आकर्षण का मुख्य बिंदु होते हैं। फिर भी ज्यादातर उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है, और उन्हें पीड़ा नहीं पहुंचाई जाती। उन्हें समाज पर बड़ा बोझ भी नहीं समझा जाता।
मुझे लगता है कि मूलाधारवासिनी कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क को दबाव झेलने में सक्षम बनाती है। यह शायद रक्तवाहिनियों का लचीलापन बढ़ाकर उन्हें ज्यादा और बिना दबाव के रक्त प्रवाह बढ़ाने में मदद करती है। विचित्र सा लगता था जब ध्यान के नाम से ही आम लोग सिर पकड़कर बैठ जाते थे, पर मेरे मस्तिष्क में हर समय ध्यान–समाधि लगी होती थी, यौनयोग के बल से। जब मुझे क्षणिक कुंडलिनी जागरण हुआ था, उस समय मैं तांत्रिक यौनयोग के पूरे प्रभाव में था। नहीं तो वह मुझे होता ही न। शरीर को पता होता है कि अपने साथ कब क्या करना है। इसने तभी जागृति के लिए बैक चैनल पूरी तरह से खोली, जब मस्तिष्क दो तीन महीनों से लगातार यौनयोग की कुंडलिनी शाक्ति के प्रभाव में रहकर ज्यादा से ज्यादा दबाव झेलने में सक्षम बन गया था। मैंने अनजाने में कुंडलिनी को इसलिए नीचे नहीं उतारा कि मैं उसका दबाव सहन नहीं कर पा रहा था, बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे यह भय था कि कहीं मैं भौतिक रूप से पिछड़ न जाऊं। क्योंकि ऐसा ही मेरा एक पुराना अनुभव भी था। यह ऑर्गेज्मिक शक्ति पता नहीं क्या जादू करती है। यह एक आन्नदमयी शक्ति है।
सेक्सुअल यिनयांग एकदूसरे के प्रति समर्पण से बढ़ता है। इसीलिए समर्पण भाव पर बहुत जोर दिया जाता है। होता क्या है कि एकदूसरे के प्रति पूरे समर्पण से ही यिन और यांग आपस में एकदूसरे से पूरी तरह से मिश्रित हो पाते हैं। यौन समर्पण से बड़ा भला कौनसा समर्पण हो सकता है। यिनयांग तो हरेक वस्तु में होता है, पर समर्पण केवल पुरुष और स्त्री के ही बीच में होता है। जितना निकटता और अंतर्संबंध एक प्रेमी पुरुष और स्त्री के जोड़े के बीच बनता है, उतना किसी और के बीच में नहीं बनता। इसीलिए प्रेमसंबंध और समर्पण से भरा हुआ संभोग ही सर्वोत्तम यिनयांग एकत्व का भंडार है। इसलिए स्वाभाविक है कि यही भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का भी सर्वोत्तम आधार है। यिनयांग ही पूर्णता है, कुंडलिनी जागरण ही पूर्णता है, ईश्वरत्व ही पूर्णता है। भौतिक संसार भी इसी पूर्णता के अंतर्गत आता है, इससे अलग नहीं है।
कुंडलिनी ध्यान व मानसिक रोग के बीच तांत्रिक यौन ऊर्जा की एक पतली दीवार होती है
पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए, केवल प्रह्लाद ही हिरण्यकशिपु को मनाने गया, क्योंकि वह किसी भी देवता के मनाने से नहीं मान रहा था। जागृति के बाद अक्सर ऐसा ही होता है। इसे ऐसे समझ लो कि अनंत चेतना से गिरा हुआ आदमी बहुत तेजतर्रार और क्रियाशील होता है। वह बाकि लोगों को भी रास्ते पर लाने की कोशिश करेगा क्योंकि कोई भी आदमी समाज के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। वैसे ऐसा ज्यादातर तभी होता है, जब आदमी को जागृति उस समय मिलती है, जब वह स्वस्थ ऊर्जा से भरा होता है, जैसे किशोरावस्था और यौनावस्था। एक बीमार, कमजोर और बूढ़ा व्यक्ति समाज को कैसे बदल सकता है, वह तो अपने को भी बदल ले, तो भी काफी है। जब प्रह्लाद को जागृति मिली, उस समय वह ऊर्जावान बचपन की अवस्था में था। ऐसी अवस्था में उससे लोग ईर्ष्या करेंगे, उसपर क्रोध करेंगे, उसको सता भी सकते हैं, जैसा यीशु के साथ भी हुआ था। इससे समाज को पाप लग सकता है, जिससे उसमें रह रहे लोगों की दुर्गति हो सकती है। मतलब अपनी तरफ से तो लोग जागृति को शांत करने की कोशिश करते हैं, क्योंकि लोगों के विभिन्न अंगों के रूप में देवता उनके शरीर में ही स्थित हैं। देवता कभी नहीं चाहते कि कोई भी साधु जैसा बन जाए, क्योंकि वे तो जगत को भड़काने और विस्तार देने का काम करते हैं। पर साधु जगत को शांत करता है। इसलिए लोग उसे कुंडलिनी योग करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह खुद भी होता है, जब लोग उसे बहिष्कृत सा कर देते हैं। फिर अकेलेपन के उबाऊ माहौल में जागृत व्यक्ति कुंडलिनी ध्यान नहीं करेगा, तो क्या करेगा। दूसरों को तो ध्यानचित्र दिखता नहीं है। वे तो अंदाजा लगाते हैं कि वह डरावना भूत है। जैसा देवताओं ने शेररूप नरसिंह कल्पित कर लिया। पर प्रह्लाद तो उसे जानता था कि वह तो परम प्रेमी व हितैषी है, कोई काल्पनिक भूत वगैरह नहीं। शायद लोग पागलपन या हैलूसिनेशन या भूतप्रेतबाधा या अवसाद या नशे आदि की अवस्थाओं से भी ध्यानसाधना की तुलना करते हैं, बेशक अनजाने में ही, अवचेतन मन में सदियों से पले हुए भ्रम के कारण। और हां, प्यार में धोखा खाया हुआ आदमी भी तो इसी तरह एक भ्रष्ट ध्यानयोगी की तरह अपने प्रेमी की याद में पगलाया जैसा रहता है। सम्भवतः इसीलिए जल्दी से कहीं उसकी शादी कराने पर जोर दिया जाता है, ताकि उसे तांत्रिक यौनबल से कुछ सहारा मिल सके। अधिकांश फिल्में इसी मामले पे तो बनी होती हैं। अजीब लोचा है भाई। कहीं एकबार मैने गलती से तंबाकू खा ली थी, एकबार भांग, और एकबार गुस्सा कम करने की दवाई। तीनों ही स्थितियों में मेरे मस्तिष्क में ध्यानचित्र छलांगें लगा रहा था। हैलुसिनेशन की हद तक असली आदमी की तरह स्पष्ट लग रहा था। पर यह डलनेस और मूर्खता के साथ था। आनंद भी कम था। कुछ अवसाद जैसा भी था। किसी से बात न करने अपनी ही पागल जैसी मस्ती में रहने को मन करता था। सिर में दबाव के साथ कुछ थकान व बेचैनी भी थी। योग में शारीरिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने पर भी इसीलिए जोर दिया जाता है। मुझे लगता है कि ध्यानचित्र के आनंद में मूलाधार की सम्भोगीय संवेदना का बहुत बड़ा योगदान है। यह ध्यानचित्र से जुड़े तथाकथित नकारात्मक और अवसादीय लक्षणों को खत्म करके आदमी को सामान्य से भी ज्यादा सही ढंग से सामान्य अर्थात स्वस्थ बना देती है। शायद यह यिनयांग से ही पैदा होती है, क्योंकि बिना जोड़े के संवेदना का कोई अर्थ जैसा नहीं रह जाता। यही संवेदना मस्तिष्क को कुंडलिनी जागरण का दबाव सहने में सक्षम बनाती है, क्योंकि दोनों का स्वभाव एकजैसा ही है। अर्थात आनंदरूप। जहां भ्रम रूप में चीजों के दिखने के पीछे मानसिक रोग या मानसिक थकान या मानसिक रसायनों की गड़बड़ी या अन्य मानसिक अनियमितता आदि मुख्य रूप में वजह होते हैं, वहीं ध्यान या कुंडलिनी जागरण की अवस्था में मन बिल्कुल स्वस्थ व तरोताजा होता है, यहां तक कि एक आम तंदुरुस्त आदमी से भी ज्यादा। जहां मानसिक रोग की हालत में आदमी काम करने में अक्षम जैसा होता है, वहीं दूसरी ओर ध्यान की अवस्था में पूरी तरह से सक्षम होता है, यहां तक कि एक आम इंसान से भी ज्यादा। जहां ध्यान की अवस्था में आदमी को दुनियावी कामों और संकल्पों के प्रति साक्षीभाव के कारण आनंद मिलता है, वहीं मानसिक रोगी को नहीं। इसीलिए वह उद्विग्न और मुरझाया सा दिखता है। साक्षीभाव तो वह तब करेगा न जब उसके लिए उसके मस्तिष्क में दुनियावी कामों के तंदुरुस्त संकल्प बनेंगे। पर अक्सर ऐसा होता नहीं है। सच्चाई यही है कि एक स्वस्थ आदमी ही स्वस्थ ध्यान कर सकता है। जब योगी कुंडलिनी ध्यान में आनन्दमग्न रहने लगता है, तब लोग उसके तथाकथित पागलपन से छुटकारा पाकर अपनेअपने कामधंधों में पूर्ववत आसक्ति और जोशखरोश से लग जाते हैं, जिससे देवता खुश हो जाते हैं। इसीको ऐसे कहा गया है कि प्रह्लाद ने नृसिंह भगवान को स्तुति से प्रसन्न किया। इससे क्रोध छोड़कर वे शांत हो गए, जिससे देवता और संसार नष्ट होने से बच गए।