The non dual, tantric, Kundalini yoga technique (the real meditation) including Patanjali Yogsutras, Kundalini awakening, spiritual Enlightenment (self-realization), and spiritual liberation explained, verified, clarified, simplified, justified, taught, guided, defined, displayed, summarized, and proved in experiential, exhilarating, story like, biography like, philosophical, practical, humanely, scientific, and logical ways altogether best over- अद्वैतपूर्ण, तांत्रिक, कुंडलिनी योग तकनीक (असली ध्यान) सहित पतंजलि योगसूत्र, कुण्डलिनीजागरण, आत्मज्ञान और अध्यात्मिक मोक्ष को एक अनुभवपूर्ण, रोमांचक, कथामय, जीवनचरित्रमय, दार्शनिक, व्यावहारिक, मानवीय, वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से; सबसे अच्छे रूप में समझने योग्य, सत्यापित, स्पष्टीकृत, सरलीकृत, औचित्यीकृत, सीखने योग्य, निर्देशित, परिभाषित, प्रदर्शित, संक्षिप्त, और प्रमाणित किया गया है
दोस्तों, जीवाश्म ईंधन के अंधाधुंध इस्तेमाल से धरती का जीवन संकट में आ गया है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। धरती लगातार गर्म हो रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। सुंदर समुद्रतटीय प्रदेशों के निकट भविष्य में पूरी तरह से जलमग्न होने के आसार बन गए हैं। वातावरण में कार्बनडाइऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बहुत बढ़ गई है और लगातार बढ़ ही रही है। इससे मौसम भी बदल गया है। बारिश के मौसम में सूखा पड़ रहा है और सूखे के समय बारिश हो रही है। इससे जन, धन, अन्न समेत सभी वस्तुओं को भारी क्षति पहुंच रही है। किसान बदहाल हो रहे हैं। उनकी खड़ी, पकी और काटी गई फसल भारी बारिश की भेंट चढ़ रही है। अत्यधिक वर्षा से भारी भूस्खलन हो रहे हैं। मौसम और प्रकृति क्रोधित जैसे लग रहे हैं और एकदम से कहर बनकर बरस जाते हैं। भयंकर बाढ़ें, आंधी और तूफान आ रहे हैं। प्लास्टिक के कचरे से निकास नालियों के अवरुद्ध होने से गंदा पानी गलियों में भरकर बीमारियां पैदा कर रहा है। शहरों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और गांव खाली होते जा रहे हैं। औद्योगिक शोरगुल से दूर शांतिपूर्ण एकांत मिलना लोगों के लिए दुष्कर्म हो गया है।
इन सभी समस्याओं का हल मुझे हरित ऊर्जा में दिखता है। सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा हरित ऊर्जा के सर्वोत्तम स्रोत हैं। अगर सभी घरों की छतों पर सौर पैनल और पवन चक्की लग जाएं तो घरों की सारी बिजली की जरूरत तो पूरी होगी ही, साथ में उद्योगों के लिए और बहुमंजिला इमारतों के लिए भी अतिरिक्त बिजली की आपूर्ति की जा सकती है। तकनीक के विकसित होने से अब तो सौर विद्युत जीवाश्म स्रोतों से निर्मित विद्युत से भी सस्ती हो गई है। इसकी एक वजह यह भी है कि सौर विद्युत को जरूरत वाली जगह पर ही बनाया जा सकता है। इससे ट्रांसमिशन लॉस पर भी रोक लगती है। मेटलर्जी जैसे क्षेत्रों में बहुत ज्यादा ताप ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। वहां के लिए डायरेक्ट सोलर थर्मल प्लांट का उपयोग किया जा सकता है। उसमें सौर ऊर्जा विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित ना होकर सीधी ताप ऊर्जा में बदल जाती है। इससे सौर ऊर्जा से विद्युत ऊर्जा और विद्युत ऊर्जा से ताप ऊर्जा में रूपांतरण के दौरान होने वाली ऊर्जा की क्षति रुकती है।
अब तो विद्युत भंडारित करने के लिए बढ़िया से बढ़िया बैटरीयां बन रही है। लिथियम आयन बैटरी लेड एसिड बैटरी से ज्यादा कार्यक्षम और सुविधापूर्ण है। पर धरती से लिथियम निकालते समय भी पर्यावरण को खनन आदि के रूप में भारी क्षति पहुंचती है। फिर इसका वेस्ट भी हानिकारक होता है। सोडियम आयन बैटरी का भी जोरों से विकास हो रहा है। आने वाले समय में यह सबसे अधिक पर्यावरण हितैषी बैटरी बन सकती है। ग्रीन हाइड्रोजन पर भी काम चल रहा है, पर उसकी सुरक्षा समस्या और भंडारण समस्या, ये दो मुख्य समस्याएं हैं। इनका हल भी खोजा जा रहा है। ग्रीन एनर्जी की सहायता से तैयार एथनॉल आदि बायोफ्यूल को भी विकसित किया जा रहा है। इससे भी नेट कार्बन एमिशन रुकेगा।
इन्हीं सब वजहों से आजकल ग्रीन एनर्जी के स्टोक्स उछाल पर हैं क्योंकि लोगों को इनमें भविष्य में बढ़ोतरी की उम्मीद दिख रही है। ग्रीन एनर्जी का दौर तो आएगा ही, समय कम ज्यादा हो सकता है। ग्रीन एनर्जी को सपोर्ट करना वैसे तो सबका दायित्व है पर फिर भी आदमी को अपनी वित्तीय स्थिति के अनुसार ही फैसला लेना चाहिए, और वित्तीय विशेषज्ञ की सलाह भी लेनी चाहिए।
ग्रीन एनर्जी को अपनाने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लोगों की आदतों में सुधार आएगा। इससे लोगों की सोच सकारात्मक बनेगी। इससे लोग पर्यावरण हितैषी जीवनशैली अपनाने लगेंगे। ऐसी जीवनशैली योगयुक्त जीवनशैली ही होती है। क्योंकि अति सक्रियता से पर्यावरण को हानि पहुंचती है, इसलिए लोग इस पर रोक लगाएंगे। क्योंकि अति सक्रियता से योग को अर्थात आत्मा को भी हानि पहुंचती है, इसलिए इस पर रोक लगने से आत्मा या योग को भी लाभ मिलेगा। आत्मा और योग पर्यायवाची जैसे शब्द हैं। योग से आत्मा विकसित होती है और आत्मा के विकसित होने से योग विकसित होता है। इससे आदमी न्यूनतावाद को अपनाकर कम से कम पर्यावरण नाशक संसाधनों से अपना गुजारा चलाएगा। साथ में, घर पर ही हरित ऊर्जा पैदा होने से आदमी को भीड़भाड़ वाले ऊर्जा सघन क्षेत्रों में रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे शहरों का बोझ कम होगा। आदमी एकांत में रहकर अपनी जरूरत की सारी ऊर्जा कुदरती तरीके से तैयार कर लेगा। उस से जल को जमीन से निकाला जा सकेगा। उससे किचन गार्डनिंग हो सकेगी। वह अपने वाहन को हरित ऊर्जा से चार्ज करके जरूरत के सामान की आवाजाही कर पाएगा। सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से उसका मन भी साफ रहेगा। इससे और एकांत के प्रभाव से खुद ही उसका कुंडलिनी योग के प्रति रुझान बढ़ जाएगा। जब योग से उसकी आत्मा काफी निर्मल हो जाएगी, तब ऐसा समय भी आएगा जब उसे कुदरती चीजों का इस्तेमाल ही पसंद आएगा। उदाहरण के लिए बिजली के बल्ब की जगह उसे कुदरती तेल का दिया ही अच्छा लगेगा, क्योंकि यह इतना अधिक प्राकृतिक है जितना आत्मा को खुशी से उत्तेजित करने के लिए काफी है। गाड़ी वगैरह की बजाय उसे साइकिल से या पैदल चलना ही ज्यादा अच्छा लगेगा। फिर एक प्रकार से हरित योग योग युग में रूपांतरित हो जाएगा।
दोस्तों आम लोकधारणा के अनुसार न्यूनतावाद को मुक्ति का पर्याय माना जाता है। यह धारणा शास्त्रों से बनी है। पर शास्त्रों का मतलब मुझे कुछ और ही लगता है। अगर न्यूनतावाद ही मुक्ति की पहचान होती, तब तो सभी गरीब और भिखारी लोग मुक्त और परम ज्ञानी होते। पर असल में उनकी दशा तो सबसे खराब होती है। मुझे शास्त्रों की इस उक्ति का तात्पर्य लगता है कि अगर कोई आदमी योग साधना में सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है तो उसे न्यूनतम जरूरत से ज्यादा भौतिकता की तरफ भागने की जरूरत नहीं है। क्योंकि उसकी भौतिकता की तरफ की दौड़ उसकी योग साधना में विघ्न पैदा कर सकती है। मतलब ज्यादा महत्व योग साधना का है, न्यूनतावाद का नहीं। हां, अगर उसकी योग साधना में भौतिकता विघ्न ना पैदा कर रही हो तो भौतिकता में बुराई भी नहीं है। दरअसल भौतिकता नहीं, बल्कि भौतिकता की तरफ दौड़ ही विघ्न पैदा करती है। इससे जो ऊर्जा योग साधना में लगनी थी, वह भौतिकता में या भौतिकता को प्राप्त करने में बर्बाद हो जाती है। अगर किसी को मुफ्त में भौतिक सुख समृद्धि मिल रही हो, तो उससे तो उसकी ऊर्जा की बचत ही होगी। उस बची हुई अतिरिक्त ऊर्जा को वह योग साधना में लगा सकता है। शास्त्रों में फकीरों के जैसे न्यूनतावाद का इसीलिए समर्थन किया गया है ताकि ज्यादा शारीरिक कामों से भी ऊर्जा की बर्बादी ना होए और ज्यादा शारीरिक उपभोगों से भी ऊर्जा बर्बाद ना होए। बल्कि इसके विपरीत थोड़ा शारीरिक श्रम भी होता रहे और थोड़ा शारीरिक उपभोग भी होता रहे। इससे ऊर्जा का संचय होता है। यह संचित ऊर्जा योगसाधना में लगाई जा सकती है। यह बुद्ध का मध्य मार्ग ही है। अगर कोई बिल्कुल ही कंगाल होगा तो भोजन के अभाव में भोगों का मध्यम उपभोग कैसे करेगा और कैसे मध्यम शारीरिक श्रम कर पाएगा? इससे बेशक ऊर्जा का अपव्यय तो नहीं होगा, पर ऊर्जा का संचय भी तो नहीं होगा। इसी तरह यदि कोई अति धनाढ्य होगा तो वह भी लापरवाही व अहम के कारण बिल्कुल भी शारीरिक काम नहीं करेगा और साथ में वह भोगों का अति उपभोग भी करेगा। इससे उसकी ऊर्जा का संचय भी नहीं होगा और बचीखुची उर्जा भी भोग भोगने में नष्ट हो जाएगी। फिर वह योग कैसे करेगा। पर यदि कोई धनाढ्य होता हुआ भी मध्यम श्रम और भोगों का मध्यम उपभोग करता है, और उससे संचित ऊर्जा से योग करता है, तो वह न्यूनतावादी या फकीर ही माना जाएगा। मतलब शास्त्रों में न्यूनतावादी का हवाला देते हुए परोक्ष रूप से योग का ही समर्थन किया गया है। राजा जनक महान धनाढ्य थे, पर फिर भी योगी थे। इसी से उनके अंदर न्यूनतावादी स्वभाव खुद ही पनप गया था। दरअसल दुनिया के आम लोग मोटी बुद्धि के होते हैं, इसलिए मोटी बात ज्यादा समझते हैं। योग पर लोगों का ध्यान आसानी से नहीं जाता। इसीलिए शास्त्रों में कई स्थानों पर न्यूनतावाद को ही मुक्ति का पर्याय बताया गया है, योग को नहीं। ऋषियों का मत रहा होगा कि शायद न्यूनतावाद से लोगों में खुद ही योग की आदत पड़ जाए। बहुतों में ऐसा हुआ भी होगा पर मुझे तो ऐसे कम ही मामले नजर आते हैं। ज्यादातर लोग तो न्यूनतावाद में ही उलझे रहते हैं, और योग की तरफ जाते हुए नहीं दिखते। “न माया मिली न राम” यह कहावत उन्हीं लोगों के लिए बनी प्रतीत होती है जो न्यूनतावादी तो बनते हैं पर योग नहीं करते। वैसे ज्यादा असली ज्यादा और सार्थक न्यूनतावाद वही है जो योग से खुद पैदा होए।
दोस्तों आजकल मन में वैसे भाव नहीं उठते, जैसे आधुनिक संचार युग के आने से पहले उमड़ा करते थे। पुराने समय में मन में बहुत मीठे और सूक्ष्म भाव उमड़ा करते थे। किस्म किस्म के भाव होते थे। प्रेम के भाव होते थे, दया के भाव होते थे, मित्रता के भाव होते थे, खुशी के भाव होते थे और भी कई किस्म के भाव मन में आते थे। वे भाव चेहरे पर भी साफ परिलक्षित होते थे। अपनी ऊंची अवस्था में होने पर भी ये सभी भाव नियंत्रित और संयमित होते थे। आजकल तो आदमी जल्दी ही भाव में बहने लगता है। अब मस्तिष्क में वह शक्ति नहीं रही जो भावों की आसक्ति से बचा सके और आदमी को उनमें बहने से रोक सके। आजकल की पीढ़ी मुझे भावशून्य सी लगती है। बच्चों में वह बचपना नहीं दिखता, किशोर भी किशोर कम और बच्चे ज्यादा लगते हैं, और युवाओं में भी वह यौवन नहीं दिखता। हमने तो पुराना युग भी देखा है, इसलिए नए युग से ज्यादा कुप्रभावित नहीं होते, पर वह नई पीढ़ी जिसने पुराने युग के अनुभव का जरा भी मजा नहीं लिया है, उसका क्या होगा। उन्हें हम प्यार से ही अपने अनुभव प्रेषित कर सकते हैं। वो अगर समझ गए तो वो भी अपने से नई पीढ़ी को उनको प्रेषण कर सकते हैं। इस तरह से मानव सभ्यता प्रकृति के मार्ग से दिग्भ्रमित होने से बच सकती है। और तो और, अगर पुराने समय में घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, शत्रुता आदि के भाव भी होते थे, तो वे भी नियंत्रित और संतुलित होते थे। आदमी के पास इतना नियंत्रण होता था कि वह उन्हें हल्का कर सके और उनकी छाप को चेहरे पर आने से रोक सके।
मुझे लगता है कि आजकल की कुंठित मानसिकता के लिए संचार की अदृश्य तरंगें जिम्मेदार हैं। इन्हें हम विज्ञान की भाषा में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे कहते हैं। भौतिक स्तर पर तो वे इस शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकती, क्योंकि उनमें बहुत कम ऊर्जा होती है। ये सूर्य के प्रकाश की तरंगों की तरह होती हैं। पर मुझे तो लगता है कि प्रकाश की तरंगें भी मन के सूक्ष्म विचारों पर कुछ ना कुछ असर तो डालती ही हैं। इसीलिए संध्या के समय जब सूर्य का प्रकाश बहुत कम होता है, उस समय मन में बहुत ही सुंदर सुविचार उमड़ते हैं। इसी तरह योगी लोग अंधेरी गुफा में साधना करना पसंद करते थे क्योंकि वहां प्रकाश का व्यवधान भी नहीं होता था। इसके अलावा, वीएफएक्स (विशेषकर छायादार ग्राफिक्स) से भरी फिल्में, प्राकृतिक प्रकाश से भरी फिल्मों की तुलना में अधिक आनंददायक और भावनाओं से भरी लगती हैं। इसी तरह जहां पर फोन टीवी आदि के सिग्नल कम होते हैं, वहां पक्षी ज्यादा तादाद में दिखाई देते हैं। इस पर एक फिल्म भी बनी हुई है। एक बार मुझे ऐसी सुदूर घाटी में रहना पड़ा था जहां पर कोई मोबाइल नेटवर्क नहीं था। वहां मुझे पुराने जमाने के जैसी अनोखी शांति महसूस हुई थी। मन के भाव भी वहां अच्छे से बन रहे थे। इसका मतलब है कि बेशक सामान्य विद्युत चुंबकीय तरंगों में न्यूनतम ऊर्जा होती है पर ये आत्मा को और उसकी अनुभव करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि जो मस्तिष्क के न्यूरॉन्स में स्पंदनशील विद्युत प्रवाह बनता है, उससे जो स्पंदनशील व अदृश्य विद्युत विद्युतचुंबकीय क्षेत्र बनता है, उसी को आत्मा विचारों के रूप में अनुभव करती है। देखा जाए तो विद्युत चुंबकीय तरंगें भी बदलते हुए विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों के रूप में ही होती हैं। इसलिए अगर दोनों एकदूसरे को प्रभावित करे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इससे यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि संचार साधनों की विद्युत चुंबकीय तरंगे मन के विचारों को प्रभावित करती हैं। पर फिर भी इनसे घबराने की जरूरत नहीं है। ठीक ही कहा है कि जहां चाह वहां राह। कुंडलिनी योग से मस्तिष्क की विद्युतचुंबकीय शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि बाहरी विद्युतचुंबकीय तरंगों का उस पर कम ही असर पड़ता है। योग के दौरान तो ऐसा होता ही है पर अगर योग को दिन में दो या तीन बार किया जाए तो यह शक्ति दिनभर बनी रहती है। आज के युग में विद्युत चुंबकीय तरंगों से मुक्त क्षेत्र में ज्यादा समय बिताना एक सपने की तरह ही लगता है। हम पूरी धरती को तो चमड़े से मढ़ नहीं सकते, पर चमड़े के जूते जरूर पहन सकते हैं। मतलब कि हम जमाने को तो एकदम से नहीं बदल सकते पर अपने को जमाने के अनुसार जरूर बदल सकते हैं।
आदमी चाह कर भी अपने गुणों की हलचल को नहीं रोक सकता। प्राणवायु गुणों में ऐसे ही लहरें पैदा करती रहती है, जैसे वायु समुद्र में तूफान पैदा करती है। हालांकि जिन योगियों ने प्राणायाम आदि से प्राणवायु को वश में कर लिया होता है, वे काफी हद तक इन लहरों को नियंत्रित कर के अपने असली व गुणों के आधारभूत स्तर वाले जीवात्म स्वरूप को जान भी लेते हैं। एक आदमी को लें जिसने हमेशा तूफान वाला समुद्र ही देखा है, और कभी भी शांत और निश्चल समुद्र नहीं देखा है। वह समझेगा कि समुद्र हमेशा ऐसा ही होता है और वही उसका असली स्वरूप है। उसे समुद्र के, बिना लहर वाले, असली व आधारभूत रूप के जैसे निश्चल जीवात्मा रूप का कोई ज्ञान नहीं होगा। उसे अगर उसकी जगह कभी बिल्कुल शांत समुद्र दिख गया या मान लो कि पोलर रीजन का ठंड से जमा हुआ समुद्र दिख गया, तो वह कहेगा कि समुद्र सूख गया या खत्म हो गया। ऐसे ही जिंदा आदमी को मरा हुआ देखने पर लोग कहते हैं कि वह तो मर गया, पर आदमी कभी नहीं मरता। यहां यह उल्लेखनीय है कि यह शरीर के प्रति लापरवाही जैसे कि स्वयं को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति या आत्महत्या आदि का सकारात्मक मूल्यांकन नहीं है। शरीर तो मरता ही है। फिर पता नहीं कब नया शरीर मिले, कैसा जैसा मिले, क्या पता कितनी कठिनाइयों के साथ मिले, मिलने के बाद भी पता नहीं कितने समय जिंदा रहे, किसको पता। इसलिए शरीर का भलीभांति ख्याल तो रखना ही चाहिए। इस बात का असली मतलब यह है कि आदमी की आत्मा कभी नहीं मरती, क्योंकि आत्मा ही आदमी का असली रूप है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी ने हमेशा मन की लहरों के रूप वाले अर्थात बदलते गुणों वाले अपने स्वरूप को ही महसूस किया है। उसे पता ही नहीं है कि यह लहरों वाला स्वरूप उसका आधारभूत स्वरूप नहीं है। उसने कभी योग, ध्यान आदि से मन को शांत नहीं किया। तूफान वाले सभी समुद्र एक जैसे ही लगते हैं, क्योंकि उनमें पानी ढंग से नजर नहीं आता। पर जब तूफान शांत हो जाता है, तब किसी का पानी नीला तो किसी का हरा नजर आता है। किसी का पानी कम तो किसी का ज्यादा नमकीन होता है। किसी में शैवाल आदि समुद्री वनस्पति कम होती है तो किसी में ज्यादा। किसी में किसी किस्म के समुद्री जलचर होंगे तो किसी में किसी अन्य किस्म के। इसी तरह ताबड़तोड़ मानसिक तूफान वाले आदमी भी एक जैसे लगते हैं। जैसे ही हम उनके किसी गुण पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं, वह गुण उसी पल बदल जाता है। इसी वजह से तो मृत्यु के बाद की आत्मा के साक्षात्कार से ही उसके आधारभूत गुणों वाले स्वरूप के बारे में सही और विस्तृत सूचना मिल सकती है। हालांकि ऐसा नहीं कि टीवी की तरह सबकुछ दिखता है, पर उसके औसत सूक्ष्म स्वरूप का अनुभव होता है। बेशक वह रूप हमें कुछ घुटन भरा लग सकता है, क्योंकि हमें उसकी आदत नहीं है। पर उस जीवात्मा को तो ऐसा नहीं लगेगा क्योंकि वह तो अपने उस स्वरूप की अभ्यस्त हो चुकी होगी।
सृष्टि में जितनी जीवात्माएं हैं, समुद्र भी उतने ही हैं
यह बहुत रोचक विषय है और लिखते रहने से नई से नई गुत्थियां सुलझती रहती हैं। और अगर साथ में थोड़ा बहुत अनुभव भी हो तब तो कहने ही क्या। ऊंची उठी लहर को सुख या सतोगुण मान लो और समुद्र की सामान्य सतह से नीचे गिरी हुई लहर को दुख या तमोगुण मान लो। जीवन भर मन में ऐसा ही चलता रहता है। मरने के बाद मन या आत्मा समुद्र की सामान्य सतह जैसा हो जाता है। न लहर ऊपर को और न नीचे को। न सुख, न दुख। पर ऐसा नहीं है, क्योंकि अगर गुण हैं तो सुख और दुख तो साथ रहेंगे ही। यह तो त्रिगुणातीत परमात्मा ही है जिसमें न सुख है न दुख, सिर्फ़ निरपेक्ष आनंद है। ऐसा समझ लो कि इसमें सतोगुण और तमोगुण दोनों ही हैं। हालांकि दोनों कम मात्रा में हैं क्योंकि उनको उठाने या गिराने वाला अर्थात उनमें लहरें पैदा करने वाला शरीर नहीं है। यही गुणों की साम्यावस्था है। मतलब सतोगुण भी एक बराबर और तमोगुण भी एक बराबर। कोई कहेगा कि फिर सभी लोगों में तीनों गुणों की मात्रा अलग अलग कैसे होगी। देखो, जिसमें मृत्यु के समय ज्यादा सतोगुण होगा, वह मृत्यु के बाद वहीं फिक्स हो जाएगा मतलब बाद में भी ज्यादा बना रहेगा। यह ऐसे ही कि अगर ध्रुवीय समुद्र के जमते समय उसकी लहर ऊपर को उठी होगी तो वह जमने के बाद भी उतनी ही ऊपर उठी रहेगी, वहां से बदलेगी नहीं। यह भी सत्य है कि मृत्यु के समय अक्सर गुण वैसे ही रहते हैं जैसे उसके पिछले सारे गुणों और कर्मों का औसत रूप होता है। मतलब सब लोगों की आत्मा में अंधेरे की अलग अलग मात्रा होगी। चाहे दो व्यक्ति आपस में कितने ही ज्यादा नजदीकी क्यों न हों, दोनों की आत्माओं में अंधेरे की मात्रा एकसमान हो ही नहीं सकती। यह असंभव है। कुछ न कुछ फर्क तो रहेगा ही। इसीलिए तो कभी आत्मा के मामले में धोखा नहीं होता कि फलां की आत्मा गलती से फलां के शरीर में चली गई। जो कथा कहानियों में होता है, वो शिक्षात्मक रूपक ही लगता है। जब किसी के शरीर पर प्रेत आदि का कब्जा होता है तो वह साफ बताता है कि वह प्रेत है। इसीलिए उसे तांत्रिक आदि से भगाया जाता है। अगर किसी की आत्मा की फोटोकॉपी बनने की किसी में ताकत होती तो प्रेत भी बन जाता। फिर किसी को पता न चलता और उसे दूसरे के शरीर से कोई भगाता भी न। पर ऐसा नहीं होता। इसीलिए कहते हैं कि मृत्यु के समय की मानसिक स्थिति मृत्यु के बाद की गति को निर्धारित करती है। इसीलिए कई लोग मरने के लिए काशी जैसे तीर्थों में जाते हैं, कई मृत्यु के समय गीता आदि आध्यात्मिक ग्रंथ सुनते हैं। यहां पर एक पेच और खुलता है। बेशक मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा के जैसा परिवर्तनरहित और हलचल से रहित, शांत और व्यापक बन जाता है, पर दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। जीवात्मा निर्गुण जैसा लगता हुआ भी तीनों गुणों से बंधा होता है, पर परमात्मा असली निर्गुण अर्थात गुणातीत होता है। इसीलिए वह जीवात्मा से भी ज्यादा और यूं कहो कि परम सूक्ष्म, परम व्यापक, परम परिवर्तनरहित, परम शांत, और परम सच्चिदानंद रूप होता है। यह खासकर उन लोगों को समझना चाहिए जो परमात्मा और जीवात्मा को करीब एकजैसा मानने के धोखे में पड़े होते हैं। कई दफनाए हुए मृत शरीर आदि की पूजा करते हैं। कई ऐसा समझते हैं कि मरने के बाद उनका जन्नत का टिकट कटा हुआ है।
कुंडलिनी योग कामयाब संभोग में मदद करता है
कुंडलिनी योग सेक्स का एक अभिन्न अंग है
एक और रहस्यपूर्ण तथ्य जो मैं आपको बताता हूँ, वह यह है कि यौन संपर्क के दौरान भी यह मूल स्तर की आत्मा का संपर्क सबसे गहरा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सेक्स के समय व्यक्ति दो यौन साथियों को छोड़कर पूरी तरह से अकेला रहना चाहता है। न दुनिया की और न ही दुनियावी विचारों की दखलंदाजी चाहता है। यह प्रवृत्ति ही यौन मामलों में शर्मीलेपन की उत्पत्ति करती है। कोई भी सार्वजनिक रूप से सेक्स नहीं करना चाहता क्योंकि तब वह सेक्स नहीं बल्कि केवल एक नाटक होता है। यहाँ तक कि कोई भी अपने वास्तविक यौन अनुभव के बारे में बात नहीं करना चाहता, धोखेबाज़ों द्वारा प्रचारित यौन नाटक की तो बात ही छोड़िए। तो सोचो कि सांसारिक अराजकता से पूरी तरह से दूर मूल आत्मा के रूप से अधिक अकेलापन क्या हो सकता है। यहाँ तक कि संभोग के समय यौन ऊर्जा भी इतनी अधिक होती है कि यह उस अल्पकालिक मूल आत्मा के संपर्क के समय पर्याप्त से अधिक आनंद प्रदान करती है। इस तरह प्रेम भी बढ़ता है। यह आम तौर पर देखा जाता है कि दिवंगत आत्मा का संपर्क अक्सर तांत्रिक मिश्रित यौन वातावरण में होता है। इसका कारण एक ही है कि तंत्र की तीव्र यौन ऊर्जा उस अल्पकालिक घुटन भरे आत्मिक संपर्क को झेलने के लिए पर्याप्त शक्ति प्रदान करती है। साधारण सेक्स पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि इसमें मन पर कम नियंत्रण होता है और साथ ही, यह कम अवधि का होता है। कुंडलिनी योग आधारित तंत्र यौन अनुभव को बढ़ाता है क्योंकि यह कुंडलिनी ध्यान की मदद से अकेलेपन के स्तर को और ज्यादा बढ़ाता है जो आनंदमय और सफल सेक्स के लिए आवश्यक है। कुंडलिनी ध्यान एक मानसिक कुंडलिनी छवि को छोड़कर हर सांसारिक अराजकता को खत्म कर देता है। यह आवश्यक भी है क्योंकि हम मानसिक शक्ति को रोक कर नहीं रख सकते हैं, और ऐसा करते समय यह घुटन भरा होता है और आनंद भी रुक सा जाता है। फिर आनंद के बिना सेक्स कैसा। लेकिन कुंडलिनी छवि को ध्यान में रखते हुए, यह गहन आनंद का स्रोत बन जाता है। यह पूरी तरह से अकेलेपन के समान है क्योंकि मानसिक कुंडलिनी छवि कुछ भी भौतिक नहीं बल्कि केवल एक मानसिक रचना है। इसीलिए कहते हैं कि असली प्रेम एकबार में एक से ही हो सकता है, दो से नहीं। तंत्र भी लंबे समय तक एक ही साथी के साथ रहने की वकालत करता है। हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण और दिलचस्प है कि एक व्यक्ति जिसे कई साथियों द्वारा बुरी तरह से फटकार लगाई जाती है, वही केवल एक ही साथी के साथ पूर्ण शांति में रहना चाहता है। शायद संभोग में आनंद भी इसीलिए है क्योंकि यह आत्मा की सर्वाधिक गहराई तक जाने का प्रयास करता है, और आत्मा तो आनंद का खजाना है ही। वास्तव में सेक्स विज्ञान जितना जाना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा और विशाल है जैसा कि ओशो महाराज ने सच ही कहा है।
आत्मा और जगत प्रकाश और अंधकार का परस्पर खेल है
मुझे तो लगता है कि जिसे हम सतोगुण समझते हैं, वही नेपथ्य में तमोगुण बन रहा होता है। यह ऐसे है जैसे धूप से ही छांव बनती है। इसका मतलब है कि जीवात्मा ने शुरु से जो कुछ भी अनुभव किया है, वह सभी कुछ उसमें तमोगुण अर्थात अंधेरे के रूप में मौजूद है। आगे भी वह जो महसूस करती रहेगी, वह भी अंधेरे के रूप में दर्ज होता रहेगा। यह ऐसे ही है जैसे जितनी अधिक और जैसी धूप होगी, छांव भी उतनी ही ज्यादा और वैसी ही बनेगी। वृक्ष की जैसी पत्तियां होंगी, छांव भी वैसी ही बनेगी। अर्थात जैसा शरीर या मन या मस्तिष्क होगा, तमोगुण रूपी छांव भी उसकी वैसी ही बनेगी। मतलब कि छांव में उसको बनाने वाली धूप या रौशनी या उसकी पत्तियों से छनकर आई हुई धूप के बारे में पूरी सूचना दर्ज है। सतोगुण तो आत्मा का अपना शुद्ध रूप है ही। वह तो रहेगा ही। वह तो मिट नहीं सकता। यह हो सकता है कि तमोगुण की मात्रा के अनुसार वह कम या ज्यादा महसूस होए। अगर तमोगुण ज्यादा होगा तो सतोगुण कम होगा और अगर तमोगुण कम होगा तो सतोगुण ज्यादा होगा। रजोगुण भी आत्मा की उस स्वाभाविक चेष्टा के रूप में होगा जिसके तहत वह तमोगुण से सतोगुण की तरफ जाना चाहती है। इसका मतलब है कि हम अगर दुनिया को महसूस न करें, तो वह आत्मा में तमोगुण के रूप में दर्ज नहीं होगी। पर दुनिया से किनारा कर पाना भी संभव नहीं है। तमोगुण की बात तो बाद में आएगी, पहले भूखे मरने की नौबत आ सकती है। बीच वाला मध्य मार्ग है अनासक्ति का। मतलब दुनियादारी को बिना आसक्ति के अनुभव करना है। इससे दुनियादारी भी चलती रहेगी और उसकी छांव भी आत्मा पर नहीं जम पाएगी या कम जमेगी। ऐसा योग से आसानी से संभव है। शास्त्रों में आसक्तिरहित सात्त्विक तरीकों को अपनाने के लिए इसलिए बोला जाता है ताकि इसके सात्त्विक संस्कार मन में पड़ते रहें। सात्विक संस्कारों को मन से निकालने में कम मेहनत लगती है जिससे मुक्ति की संभावना बढ़ जाती है। यदि इनको मन में न डाला जाए तो ऊटपटांग संस्कार मन में पड़ते रहेंगे क्योंकि मन खाली नहीं रह सकता। इन्हें बाहर निकालना बहुत मुश्किल होता है जिससे मुक्ति की संभावना काफी घट जाती है। पर इसी से बात नहीं बनेगी। पिछ्ले अनगिनत जन्मों की दुनियादारी की छाप की कालिख जो आत्मा पर जमी है, उसे भी साफ करना पड़ेगा। वह भी कुंडलिनी योग से ही होगा, खासकर एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से। इससे आत्मा में सतोगुण बढ़ेगा और तमोगुण और रजोगुण कम हो जाएगा। रजोगुण इसलिए कम होगा क्योंकि अब नाममात्र के तमोगुण में इतना पोटेंशल नहीं है कि वह तेज गति से सतोगुण की तरफ जा सके। यह लेटेंट रजोगुण भी बिजली के दो विपरीत ध्रुवों के बीच के विभवांतर की तरह होता है। जितना ज्यादा अंतर उनके विपरीत आवेश के बीच में होगा, उतनी ही रफ्तार और अधिकता से विद्युत प्रवाह उनको जोड़ने वाले परिपथ में दौड़ेगा। शुद्ध आत्मा का सतोगुण तो सर्वोच्च और निश्चित निर्धारित है। बद्ध जीवात्मा के तमोगुण की मात्रा ही निर्धारित करेगी कि उनके बीच में रजोगुण रूपी विभवांतर कम होगा या ज्यादा। देखो, दोनों के बीच परिपथ तो तभी जुड़ेगा जब जीवात्मा को शरीर मिलेगा। फिर उनके बीच में मानसिक विचारों के रूप में खूब विद्युत प्रवाह बहेगा। वह जीवात्मा के तमोगुण के अनुसार कम ज्यादा होता रहेगा। इसीलिए तो पार्टी आदि में ड्रिंक आदि करने के बाद लोग तरोताजा होकर नई उमंग और जोश से अपने काम धंधे में पहले से भी ज्यादा लग जाते हैं। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है और अध्यात्म के मामले में हानिकारक भी हो सकता है। कई लोग लंबे समय तक अकेलापन बिताने के बाद नई और बढ़ी हुई शक्ति के साथ दुनियादारी में उतरते हैं। यह अकेलेपन की तमोगुण की ही शक्ति होती है। कुंडलिनी योग से तमोगुण घट जाता है। इससे सतोगुण और तमोगुण के बीच रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है। इसीलिए योगी का व्यवहार इंपलसिव या तुनकमिजाजी या अंध प्रगतिशील नहीं होता, बल्कि धीर, गंभीर और व्यवस्थाशील होता है। कई बार तंत्रयोगी देशकाल की मांग के अनुसार अस्थायी इंपलसिव व्यवहार प्राप्त करने के लिए अस्थाई रूप से तमोगुण को स्वीकार भी कर सकते हैं। बिना शरीर की जीवात्मा में यह रजोगुण लेटेंट विभवांतर के रूप में रहता है। मतलब अंधेरे से प्रकाश की तरफ जाने का बल तो लग रहा होता है, पर शरीररूपी विद्युत परिपथ न होने के कारण अंधकार प्रकाश तक जा नहीं पाता। मतलब तमोगुण सतोगुण नहीं बन पाता।
दोस्तों! आध्यात्मिक शास्त्र उच्च कोटि के ज्ञान से भरे पड़े हैं। अगर उनके साथ अनुभव का तड़का भी लग जाए तो बात कुछ और ही हो जाती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम सभी दुनियादारी में उलझे हुए आदमी हैं। हमारा अनुभव इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता कि वह स्वतंत्र रूप से पारलौकिक तथ्यों को सिद्ध कर सके। हां, अगर हमारा अनुभव शास्त्रों के प्रामाणिक तथ्यों जैसा है, तब हमारा अनुभव प्रामाणिक माना जा सकता है। मैं भी अपने ऐसे ही एक छोटे से अनुभव को इस पोस्ट के अंत में साझा करूंगा।
शास्त्रों में प्रलय-काल की प्रकृति को साम्यावस्था की स्थिति के तौर पर बताया गया है। मतलब इसमें इसके तीनों गुण अपने-अपने एक समान स्तर पर बने रहते हैं। बदलते नहीं हैं।ऐसा जरूरी नहीं कि जितना सतोगुण है, उतना ही रजोगुण है और उतना ही तमोगुण है। बल्कि इसका यह मतलब है कि बेशक सब की भिन्न-भिन्न मात्रा है पर हरेक गुण अपनी विशिष्ट मात्रा पर एक समान बना रहता है। वह कम या ज्यादा नहीं होता। उदाहरण के तौर पर अगर सतोगुण का अनुपात 1 है तो एक ही रहेगा। तमोगुण का 5 है तो 5 ही रहेगा और रजोगुण का तीन है तो तीन ही रहेगा। अगर तीनों गुण एकदूसरे के बराबर हुआ करते तो विभिन्न सृष्टियों में विभिन्नता न हुआ करती, बल्कि सभी सृष्टियां बिल्कुल एक समान हुआ करतीं। इसी के साथ, सभी आदमी भी एक जैसे हुआ करते, उनमें भी कोई विभिन्नता न हुआ करती। और तो और, फिर तो सभी दिवंगत आत्माएं भी एकजैसी हुआ करतीं। पर ऐसा तो संभव नहीं है, क्योंकि सृष्टि में विभिन्नता हरेक स्तर पर दिखाई देती है। कुछ आत्माएं पवित्र होती हैं, जो हर तरह से भला करती हैं। पर कुछ आत्माएं पापपूर्ण भी होती हैं, जो नुकसान करने से जरा भी नहीं हिचकतीं। बेशक शरीर न होने के कारण दिवंगत आत्माएं जानबूझ कर भला या बुरा नहीं कर सकतीं, पर उनके सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र से खुद ही भला या बुरा होता है। शायद इसे ही शास्त्रों में प्रेत योनि कहा है। मतलब है तो यह दिवंगत और शरीररहित आत्मा ही, पर बहुत लंबे समय तक इसे शरीर न मिलने के कारण इसे मनुष्य योनि की तरह ही एक स्थायी योनि मान लिया गया हो। बेशक यह सूक्ष्म योनि है। उदाहरण के लिए, कई भयानक सड़क दुर्घटना के स्थानों पर बारबार दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इसके लिए वहां भटकी हुई या बिना गति लगी हुई या बिना स्थूल योनि को प्राप्त हुई बुरी प्रेतात्मा को जिम्मेदार मानकर वहां भगवान हनुमान आदि देवता के मंदिर या मूर्ति को प्रतिष्ठित किया जाता है। कहते हैं कि उससे दुर्घटनाओं का सिलसिला रुक जाता है। शायद देवता से पैदा सकारात्मक ऊर्जा बुरी प्रेतात्मा की नकारात्मक ऊर्जा को निष्प्रभावी कर देती है। शायद बहुत उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा को ही देव योनि कहा जाता हो।
दोबारा सृष्टि-निर्माण से कुछ नहीं बदलता। सिर्फ प्रकृति में पहले से विद्यमान गुणों में क्षोभ पैदा होता है। मतलब कभी सतोगुण अपने आधारभूत स्तर से एकदम से बढ़ जाता है, तो कभी तमोगुण तो कभी रजोगुण। इस तरह से हर-एक गुण का स्तर लगातार बदलता रहता है। जो आदमी ज्यादा क्रियाशील है, उसमें ज्यादा जल्दी से बदलता रहता है। जो कम क्रियाशील है, उसमें कम रफ्तार से बदलता रहता है। आप सोचेंगे कि मैं यहां प्रकृति से आदमी के ऊपर क्यों आ गया। वास्तव में प्रकृति का अनुमान आदमी से ही लगाया गया है। सीधे तौर पर तो कोई भी समष्टि मतलब सर्वव्यापक प्रकृति को अनुभव नहीं कर सकता है। पर व्यष्टि अर्थात सीमित प्रकृति के रूप में स्थित आदमी के जन्म-मरण को जरूर अनुभव किया जा सकता है। योगियों ने इसे अनुभव किया है, जिसके आधार पर ही भारतीय दर्शन और शास्त्र बने हैं।
मरने के बाद आदमी के तीनों गुण अपने-अपने औसत स्तर पर आ जाते हैं और फिर बदलते नहीं। गुणों में क्षोभ पैदा करने के लिए शरीर चाहिए। वह मरने के बाद होता नहीं। जीवित अवस्था में मन के सुंदर विचारों से सतोगुण बढ़ता है। मन की ज्यादा क्रियाशीलता से रजोगुण बढ़ता है, और अकेलेपन या अवसाद जैसी अवस्था में तमोगुण बढ़ता है। ये सारे गुण रहते तो मरने के बाद भी हैं, पर बदलते नहीं हैं। मतलब आदमी कभी नहीं मरता। हमें आदमी मरा हुआ इसलिए लगता है क्योंकि हम गुणों के तूफान में उलझे होते हैं। इससे हमें गुणों की सूक्ष्म अवस्था नजर नहीं आती। यह ऐसे ही है, जैसे चकाचौंध रोशनी के बाद सामान्य अंधेरा भी घुप्प अंधेरा लगता है। हां, जब कुंडलिनी योग से गुणों का तूफान कुछ शांत हो जाता है, तब दिवंगत आत्मा से साक्षात्कार की संभावना बढ़ जाती है। अब आप पूछेंगे कि मरने के बाद गुणों की वह आधारभूत अवस्था कैसे निर्धारित होती है। वास्तव में वह आदमी के पिछले सभी जन्मों के गुणों का औसत होती है। मतलब अगर कोई ज्यादा सतोगुण में रहा है तो आधारभूत सत्त्वगुण ज्यादा रहता है। क्योंकि सतोगुण पुण्य कर्म से बनता है, मतलब उसमें उसके सभी अच्छे कर्मों का लेखा जोखा भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान होता है। जिसके रजोगुण का औसत ज्यादा होगा, उसके कर्म उद्यमशीलता और व्यापार आदि के ज्यादा रहेंगे। ज्यादा तमोगुण का मतलब ज्यादा पाप कर्मों का संचय। मतलब कि गुणों के रूप में सभी कर्म अपनी आधारभूत अवस्था में रहते हैं। हो सकता है कि यह व्यवस्था इतनी निपुण हो कि औसत की बजाय हर एक कर्म अलग-अलग गुण के रूप में पृथक रूप में मौजूद हो। इसकी और शास्त्र यह इशारा करते हुए लिखते हैं कि हर-एक कर्म का फल उस कर्म के अनुसार मिलकर ही रहता है।
खैर मुझे जो पवित्र दिवंगत आत्मा का अनुभव हुआ था, उसमें तो मुझे गुणों की समान और औसत अवस्था ही महसूस हुई थी। मतलब कि आत्मा एक अंधेरे आकाश की तरह महसूस हो रही थी। पर उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व नजर आ रहा था, जिस आदमी की वह दिवंगत आत्मा थी। मतलब वह मुझे मरा हुआ ही नहीं लग रहा था, बल्कि जीवित से भी ज्यादा जीवित लग रहा था। वह व्यक्ति जीवित अवस्था से भी ज्यादा नजर आ रहा था। मतलब उस आत्मा में उसके पिछले जन्मों की छाप भी थी। मतलब वह प्रलय-काल की साम्य-अवस्था वाली प्रकृति ही थी, जिसमें कोई क्षोभ पैदा नहीं हो रहा था। इस आत्मा के अनुभव का वर्णन मैंने इस ब्लॉग की कुछ पुरानी पोस्टों में विस्तार से किया है। अब आप ही बताओ कि समुद्र के निश्चल जल में और उसी जल की लहरों में क्या अंतर है, कुछ भी नहीं? इसी तरह से शरीर-स्थित आत्मा में और दिवंगत आत्मा में भी कोई अंतर नहीं है। जब गुणों और कर्मों के संयोग से उस दिवंगत आत्मा को पुनः नया शरीर मिलता है, तो फिर से उसके गुणों में क्षोभ शुरु हो जाता है, जिसे हम पुनः नई सृष्टि का आरंभ कहते हैं।
मुझे लगता है कि किसी आत्मा के साक्षत्कार के लिए उस आत्मा की इच्छा भी होनी चाहिए मिलने की और उस मिलन को कुछ निर्णायक क्षणों तक झेलने के लिए और आत्मा से बात करने के लिए आदमी में पर्याप्त मानसिक शक्ति भी होनी चाहिए। यह एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से ही संभव लगता है, साधारण से नहीं। साथ में, अपना शरीर न होने के कारण आत्मा तो कोई इच्छा जाहिर नहीं कर सकती। मतलब कि आत्मा में वह इच्छा उसकी शरीरयुक्त जीवित अवस्था में होनी चाहिए, खासकर उसके मरते समय। इसी को अंतिम इच्छा कहते हैं। इसीलिए इसको बहुत महत्त्व दिया जाता है। उसे पूरा किया जाता है और मरणासन्न व्यक्ति को उसे पूरा करने का वचन दिया जाता है, ताकि उसकी आत्मा उस इच्छा की वजह से भटके न। ये गुत्थियां धीरे-धीरे सुलझती हैं, एकदम से नहीं। मैं भी सपरिवार उन व्यक्ति से मिलने उनकी मरणासन्न अवस्था में थोड़ा देर से पहुंचा था। वे मुझसे बात करना चाहते थे, पर बोल नहीं पा रहे थे। सिर्फ छोटी सी चीख ही उनके मुंह से निकलती थी और वे फिर बेहोश से हो जाते थे। देख तो वे सकते ही नहीं थे। शायद वे कुछ सुन और समझ पा रहे थे, पर देख व बोल नहीं पा रहे थे। उसके दो तीन घंटे बाद ही उनकी आत्मा मुक्त गगन को प्रस्थान कर गई थी। अध्यात्म में बहुत कुछ है। यह तो आइसबर्ग का सिर्फ टिप मात्र है।
दोस्तों, पिछली पोस्ट में हम देख रहे थे कि कैसे आजकल आदमी जितनी भौतिक तरक्की कर रहा है, उसके आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक दुख भी बढ़ते जा रहे हैं। मन के सभी दोष चरम के करीब हैं, और राक्षस बनकर आदमी को निगलने को तैयार हैं। यह भी कि कुंडलिनी शक्ति से ही उस राक्षस को मारा जा सकता है। मतलब साफ़ है कि मानव सभ्यता आज उस मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे केवल कुंडलिनी योग ही बचा सकता है। मैं हाल ही में पहाड़ों के भ्रमण पर गया था। जहां मैदानों में ऐसी और कूलर चले हुए था, वहां पहाड़ों में लोग रजाई कंबल ओढ़ कर सो रहे थे, और आग जला कर सेंक रहे थे। एक दिन के भीतर ही सालभर के सारे मौसम देखने को मिल जाते हैं। अद्भुत नजारा देखा। वहां एक स्थानीय परिचित भी मिले। उनके पास नदी की गहराई से लेकर पहाड़ के शिखर तक के रास्ते पर हरेक प्राइम लोकेशन पर जमीन है। वे उस रास्ते को टूरिस्ट ट्रेकिंग रूट की तरह इस्तेमाल करने की और बीच के प्राइम पॉइंट्स पर झोंपड़ीनुमा टूरिस्ट कमरों व फुलवारियों की कल्पना को साकार करना चाह रहे थे। हालंकि उसके लिए प्रारंभिक निवेश व मैनपावर की जरूरत होती है, पर वे सस्ते में व प्राकृतिक तरीके से ऐसा करना चाहते थे, ताकि कम से कम कृत्रिम संसाधन लगे, और बिजनेस में जोखिम को दूर किया जा सके, क्योंकि वे आर्थिक रूप से मुझे ज्यादा समृद्ध नहीं लगे। अक्सर ऐसा ही होता है। करने वाले के पास पैसा नहीं होता और पैसे वाले कर नहीं पाते। वे होम्योपैथी व नेचरोपेथी की प्रेक्टिस भी करते हैं। उनका कहना था कि उनके पास प्रतिदिन ऐसे मरीज व अन्य लोग आते हैं, जो 2 किलो वजन कम करने के लिए गोवा जैसी दूरपार की व महंगी जगह जाकर चार लाख तक खर्च करते हैं। तो वे कहते हैं कि वे उनके नजदीक में ही और उससे बहुत कम समय व पैसे में चार किलो वजन कम कर सकते हैं। पर वही बात है न कि लोगों को शतप्रतिशत कुदरती भी पसंद नहीं आता, आकर्षण पैदा करने के लिए कुछ न कुछ कृत्रिम निर्माण तो करना ही पड़ता है। आजकल लोगों में प्रकृति के बीच रहने की जबरदस्त भूख है, क्योंकि हर जगह कृत्रिमता की अंधाधुंध भरमार है। बस उस भूख को शान्त करने के लिए ढंग से परोसने वालों की कमी है। फिर भी मन के घोड़ों को तो उड़ा ही सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है, दिन पर दिन पर्यटकों में शिष्टाचार व अनुशासन का घटता ग्राफ, असामाजिक तत्त्वों का डर अलग से लगा रहता है। वैसे तो उन्हें सही ढंग से गाइड व सर्व करने वाले पर्यटन संबंधी निपुण कर्मचारियों की भी कमी है। पहाड़ों के कुदरती जंगलों की जगह कंक्रीट के जंगल लेते जा रहे हैं। बढ़ती आबादी पर कम व अपर्याप्त नियंत्रण लगता दिख रहा है। मुझे तो कंक्रीट की विशाल, भव्य खूबसूरत हवेली छोड़कर एक छोटे से, शान्त क्षेत्र में बने, पुराने और जीर्णशीर्ण से, कुदरती हवापानी और धूप को अंदर प्रविष्ट कराने वाले और प्यारे हानिरहित सूक्ष्म जंतुओं जैसे चींटी, छिपकली, कोकरोच, लकड़ी और मिट्टी खाने वाले कीड़ों आदि का सामना करवाने वाले मकान में ही अपनी तांत्रिक योगसाधना सफल होते हुए दिखी। ध्यानस्थ शिव के चारों ओर भी तो सांप बिच्छू रहते हैं। हालांकि यह हम इंसानों के मामले में घातक चरम स्थिति है। बेशक मेरे पुराने घर में भी दो या तीन बार चमगादड़ और चूहे घुसे। चमगादड़ को बड़ी मुश्किल से खिड़की से भगाया क्योंकि उन्हें दिखता नहीं। फिर दीवारों के छेदों, दरारों आदि को लिफाफों आदि की पैकिंग से बंद किया, क्योंकि वे छोटी सी खाली जगह से भी घुस जाते हैं। इसी तरह चूहों को भी सांप के डर से मार भगाना पड़ा। उसकी छत आरसीसी की नहीं थी, बल्कि आरसीसी की पतली कड़ियां अंतरालों पर बिछी हुई थी। अंतरालों के बीच की खाली जगह पर टाइलें लगी थीं, जो दोनों साइड की कड़ियों पर टिकी हुई थीं। टाइलों के उपर चिकनी जैसी मिट्टी की खूब मोटी परत थी। मिट्टी के ऊपर फिर टाइलें आपस में जोड़ के लगी थीं, ताकि बारिश का पानी अंदर न घुसे। थोड़े बहुत रिसाव को तो मिट्टी शोषित कर के बाहर उड़ा देती होगी। इससे छत धूप से ज्यादा तपता भी नहीं था, और ठंड में ज्यादा ठंडा भी नहीं होता था। देखो, बातें आगे से आगे खुलती हैं। अंधेरे जैसी परिस्थितियां मूलाधार की प्रतीक हैं। ऐसे माहौल के प्रभाव से शक्ति आसानी से सहस्रार को चढ़ती है, बशर्ते अगर समुचित साधना की जाए। इसीलिए शिव श्मशान में रहते हैं। शायद यह उसी भव्यता के सूक्ष्म व अप्रत्यक्ष बल से ही बाद में हुआ, क्योंकि रात के बाद ही दिन अच्छा लगता है। वैसे भी भवन, गाड़ी आदि पर सामर्थ्य से ज्यादा खर्च करने पर या उन्हें बेवजह विस्तार देने से आदमी उनकी चिंता में, रखरखाव में उलझा रहता है, जिससे योगसाधना को पर्याप्त समय व प्राणशक्ति नहीं दे पाता। सोचो, एक औसत भव्य मकान कम से कम पचास लाख रुपए में बनता है। इतने पैसे पेंशन स्कीम में डालकर पचास हजार की पेंशन हर महीने बनती है, पूरी उम्र के लिए, और मूलधन पचास लाख वैसा ही सुरक्षित खड़ा रहता है। सारी उम्र कमाई की चिन्ता करने की जरूरत नहीं। आराम से झोंपड़ीनुमा पर्यावरणमित्र व स्वास्थ्यमित्र मकान में रहते हुए आनंदमय जीवन के साथ योगसाधना करते रहो और गिटार बजाते रहो। गिटार बजाना भी एक उच्चकोटि की साधना है, साक्षीभाव साधना है। कई लोग बैंक से लोन लेते हैं, तो किश्तें चुकाते चुकाते वह मकान दुगुनी मतलब एक करोड़ के लगभग की कीमत में पड़ जाता है। कई चतुर लोग ब्याज से बचने के लिए रिश्तेदारों या मित्रों से पैसा उधार ले लेते हैं। भोलेभाले लोग उनको उधार दे भी देते हैं, पर उनसे ब्याज तो छोड़ो, मूलधन की उगाही भी नहीं कर पाते। उससे फिर रिश्ते और दोस्ती में दरार पड़ जाती है। कई लोग तो अपने बच्चों को भी उधार की चक्की में पिसवा देते हैं। बेफजूल के मकान का शौक बहुत महंगा पड़ता है। भव्यता से अहंकार भी बढ़ता है, और उसके नष्ट होने से वह भी नष्ट हो जाता है। वैसे भी पुराना और कच्चा कंक्रीट फिर भी जीवित और कुछ सांस लेता लगता है, पक्के और नए कंक्रीट में तो दम सा घुटता लगता है। असली जान तो मिट्टी वाले घर में होती है, इसीलिए आजकल मडहाउस की तरफ़ लोगों का क्रेज बढ़ रहा है। यह भूकंपरोधी भी होता है। आजकल कई लोग पिलरस और लेंटर को आरसीसी का भूकंपरोधी जाल की तरह बना कर दीवारें कूटी हुई मिट्टी की और खूब चौड़ी रख रहे हैं, और लेंटर या लोहे की चद्दर की छत के नीचे लकड़ी के फट्टों की सीलिंग लगा रहे हैं। इससे मजबूती और कुदरतीपने का दोहरा फायदा मिल रहा है। अंदर फर्श पर और दो या तीन फुट की धरातल की दीवार पर कुदरती लगने वाली, चौड़ी और सांस लेने वाली टाइलें भी लगाई जा सकती हैं। कमरों के बीच पार्टिशन ईंट की बजाय मिट्टी की पतली या मोटी दीवार जगह के अनुसार या लकड़ी की भी दी जा सकती है। रसोई और वाशरूम कम टॉयलेट भी इसी तरह मिट्टी के प्राकृतिक रखे जा सकते हैं, बशर्ते फर्श पर और कुछ हाईट तक वर्किंग दीवार और शेल्फ पर टाइलें फिक्स की जाएं। मैं इस तरह की अंग्रजों के समय की बनी आलीशान व पूरी तरह से कुदरती, मिट्टी पत्थर से बनी, सीलिंग तक लगभग बीस फीट ऊंचाई वाली पर्यावरण मित्र कोठी मतलब बंगले में कई सालों तक सुकून से रहा हूं, देखने में लगभग ऐसी ही जैसी इस पोस्ट की हेडर इमेज में दिखाई गई है। बेशक उसमें टाइलें वगैरह बाद में जोड़ी गई हों। उसकी लकड़ी के फट्टों के ऊपर लोहे की चद्दर की छत थी। बोलते हैं कि वह भी उसी पुराने जमाने की है, नई नहीं डाली है। मिट्टी की दीवारों पर बिजली की फिटिंग भी नायाब थी। ऐसा लगता था कि वे नीचे गिर सकती है, पर हमने उसपे झूलना थोड़े ही है। जिस घर की दीवारें भी सांस लेती हों, उसमें प्राणायाम योग आदि करने का मन तो खुद ही करेगा। मिट्टी भी लचीली होती है, और योग में भी लचीलापन होता है। मिट्टी में धरती की आधारशक्ति होती है। यह मूलाधार चक्र का काम करते हुए आदमी को संतुलित व नियंत्रित व व्यवहारिक बनाए रखती है। भूकंप का खतरा तो हर पल बना ही रहता है। आज फिर से भूकंप के हल्के झटके महसूस हुए। लम्बे अरसे से ये झटके लगातार आ रहे हैं, जो किसी अनहोनी की ओर इशारा भी हो सकते हैं। परमात्मा से करबद्ध प्रार्थना है कि ऐसा न हो, अगर वे चाहें तो बेशक धरती की अतिरिक्त व विनाशकारी ऊर्जा छोटेछोटे झटकों से ही खत्म हो जाए। यह पता नहीं लोग भूकंप को बहुत ज्यादा नजरंदाज क्यों करते हैं। वे ऐसा क्यों मान लेते हैं कि उनके होते हुए भूकंप आ ही नहीं सकता। वे गृहनिर्माण के समय हर चीज का ध्यान रखते हैं पर भूकंप का नहीं। शायद भूकंप की बात करने वाले को सभी मूर्ख और डरपोक समझते हैं। शायद यह ऐसे ही है, जैसे मृत्यु सत्य है, पर उसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। इसकी एक वजह मुझे यह भी लगती है कि आजकल लोग पहले से ही दुनिया में बहुत दुखी और परेशान जैसे हैं, शायद वे भूकंप को अवचेतन मन में मतलब अनजाने में ही सभी समस्याओं का हल समझ लेते हों, पर व्यवहार में उसे नजरंदाज करने का रूप दे देते हों। घर के गुणों का प्रभाव उसमें रहने वाले आदमी पर जरूर पड़ता है। मुझे जितना पक्का और मजबूत मकान दिखता है, उसमें रहने वाले लोगों का अहंकार भी मुझे उतना ही पक्का और मजबूत दिखता है। मिट्टी लचीली और जमीन से जुड़ी होती है, इसीलिए उसमें रहने वाले लोगों का अहंकार कच्चा और लचीला होता है, और वे जमीन से जुड़े हुए, मनमौजी और साधारण सभ्य इंसान प्रतीत होते हैं मुझे। इसका मतलब है कि आजकल के आदमी के पतन में आधुनिक मकानों का भी बहुत बड़ा योगदान है। ये वातावरण को बहुत ज्यादा प्रदूषित करते हैं। माना जा रहा है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सीमेंट मुख्य भूमिका निभाता है। वास्तव में सीमेंट बहुत कच्चा होता है। इसे सरिए आदि के मिश्रण से ही ताकत मिलती है। बड़ी इमारतों व शहरों के लिए या बड़े पुलों, फ्लाईओवरों, पुलों, बांधों और अन्य जल भंडारण संरचनाओं के लिए माना कि सिमेंटिड स्ट्रक्चर जरूरी भी है, पर गांव देहात या विरली अबादी वाले स्थानों के आम घरों के लिए इसकी क्या जरूरत है, क्योंकि वहां ज्यादा मजबूती की जरूरत नहीं। वहां ये भेड़चाल या फैशन सिंबल की तरह अपनाया जा रहा है। इसमें बिजली पानी की भी ज्यादा खपत होती है। स्विट्जरलैंड में जब पहली बार इसका प्रयोग बहुत बड़े डैम बनाने में हुआ, तो इसे राष्ट्रीय गर्व मान लिया गया, और इसे अजर अमर समझ लिया गया। पर बाद मैं पता चला कि कंक्रीट की अधिकतम उम्र सिर्फ सौ साल है। जहां पर जमीन की उपलब्धता में कोई बाधा नहीं है, वहां एकमंजिला मकान काफी होता है। वह सुंदर भी लगता है, और जमीन से भी जुड़ा होता है। मुझे लगता है कि पहाड़ों में एक से ज्यादा मंजिल उंचाई का भवन बनाने से देवता का अपमान होता है, क्योंकि ऊंचे पहाड़ देवता का रूप होते हैं। वैसे भी वहां पर पेड़ पौधे और अन्य प्राकृतिक नजारे ऊंचे अर्थात मुख्यरूप से दिखने चाहिए, भवन आदि मानवनिर्मित कृत्रिम संरचनाएं नहीं। वास्तुशास्त्र का एक सिद्धांत भी खुद ही मेरे अनुभव में आया है, मैंने कहीं पढ़ा नहीं है। खुले व हवादार जैसे स्थान में ऐसा चौराहा जहां आमने सामने के रास्ते लगभग बराबर जैसी रचनाओं को धारण करते हैं, वहां कुंडलिनी क्रियाशील होने लगती है। दरअसल ऐसा चौराहा स्वस्तिक जैसा चिह्न बनाता है।
मित्राें, पिछली पोस्ट में सच्चे व समर्पित प्यार से उपजे चमत्कार को हमने देखा। अगर इसका उल्टा हो जाए, तो क्या होगा, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। लवजिहाद में यही उल्टा खेल चल रहा है। ऐसे ही भयानक संक्रामक रोगों के कारण सदियों से स्त्री और पुरुष के बीच अविश्वास की खाई बनी हुई है। यह आज से नहीं, बल्कि सदियों से न्यूनाधिक रूप से, इस नाम से या उस नाम से चल रहा है। आज तो यह ढंग से दुनिया के सामने आ रहा है। विश्वास बनाने में वर्षों लग जाते हैं, पर तोड़ने में कुछ ही पल। बल से शरीर को तो जीता जा सकता है, पर दिल को तो प्रेम और विश्वास से ही जीता जा सकता है। इसी पर बनी हुई लाजवाब फिल्म “केरला स्टोरी” आजकल अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा व आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। पर यह इस ब्लॉग का विषय नहीं है, यह तो ऐसे ही पोस्ट के संबंध में बात चली थी, तो यह वर्तमानकालिक मुद्दा खुद ही जुड़ गया।
जब किसी मूर्ति आदि पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तब भटकते विचारों की शक्ति वहाँ केंद्रित हो जाती है। विचारों की शक्ति को प्रकट होने का एक ही रास्ता बचता है, ध्यानचित्र के रूप में प्रकट होने का। योगी मूर्ति की बजाय अपने शरीर के चक्रोँ पर ध्यान केंद्रित करते है। उससे भी वैसा ही होता है। साथ में शरीर भी स्वस्थ रहता है। जो इनको नहीं मानते, वे आसमान पर या उसमें रहने वाले किसी अदृश्य भगवान पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उससे भी वैसा ही होता है। मतलब साफ है कि कोई भी काफ़िर नहीं है। साथ में, नदी, पर्वत, वृक्ष पर ध्यान लगाने से अर्थात उनकी पूजा करने से वे सभी भी शरीर के चक्रों की तरह स्वस्थ रहते हैं, क्योंकि फिर चक्रों की तरह ही आदमी की प्राणशक्ति उनको भी लगती है। पर्यावरण की सुरक्षा इसी मूलमंत्र में छुपी हुई है। अवयरनेस मेडिटेशन अर्थात जागरूकता ध्यान पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। कहते हैं कि एवयरनेस मेडिटेशन से बहुत लाभ मिलता है। मुझे हाल ही में एक नए मित्र से मिलने का मौका मिला। वे होम्योपैथिक मेडिसिन की अच्छी प्रेक्टिस भी करते हैं। वैसे भी होम्योपेथी भारतीय ऋषि परम्परा से बहुत मेल खाती है। इसी सिलसिले में वहाँ गया था तो थोड़ा परिचय हो गया। उनके साहित्य व अध्यात्म के शौक को जानकर मैं भी अध्यात्म की बातें करने लग गया। कहते हैं कि जौहरी को ही हीरा दिखाना चाहिए, आम आदमी तो उसे पत्थर समझकर नाले में फैक देगा। मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि हर समय अवेयरनेस के साथ रहना चाहिए। ओशो महाराज भी बिल्कुल यही कहते हैं कि हरेक काम अवेयरनेस के साथ करो। वे खुद भी ओशो के अनुयायी लगे मुझे। सतसंग से लाभ तो मिलता ही है, जैसा मुझे मिला। मैं इसके मनोवैज्ञानिक सिद्धांत की तह तक पहुंच सका। मुझे लगता है कि जब हम वर्तमान के रियल टाइम में शरीर को महसूस हो रही किसी भी संवेदना पर ध्यान दे रहे होते हैं, तब मनोमय कोष, अन्नमय कोष और प्राणमय कोष आपस में मिश्रित हो रहे होते हैं, जैसा मैंने पिछली कुछ पोस्टों में विस्तृत रूप से वर्णन किया था। वर्तमान की संवेदना की तरफ ध्यान देने से शरीर और सांस पर भी खुद ही ध्यान चला जाता है, क्योंकि तीनों आपस में जुड़े हुए हैं। वैसे तो बीती हुई और आने वाली घटनाओं के ख्याल भी मानसिक संवेदना के ही अंतर्गत आते हैं, पर उनके साथ शरीर और सांस कम जुड़ते हैं, क्योंकि न भूतकाल में यह वर्तमान काल में स्थित भौतिक शरीर था, और न ही भविष्यकाल में होगा, यह तो केवल वर्तमान काल में ही स्थित है। इसीलिए कहते हैं कि वर्तमान में ही स्थित रहना चाहिए। मुझे लगता है कि जब किसी के द्वारा वर्तमान स्थिति के साथ जुड़ी भौतिक संवेदनाओं का ध्यान किया जाता है, तो इससे यह विश्वास पक्का होता रहता है कि वे उसके शरीर से ही जुड़ी हैं, क्योंकि वे शरीर और सांसों की बदलती स्थिति के साथ बदलती रहती हैं। इससे यह विश्वास भी खुद ही हो जाता है कि उसकी सभी मानसिक संवेदनाएं जैसे कि विभिन्न भावनाएं और विचार भी उसके शरीर के ही भाग हैं, क्योंकि संवेदना चाहे शारीरिक हो या मानसिक, वर्तमानकालिक हो या भूतकालिक या भविष्यकालिक, उन सभी का गुणस्वभाव व अनुभव बिल्कुल एकसमान ही होता है। इससे वे शांत हो जाती हैं, क्योंकि अपने आप से किसीको आसक्तिभाव, लगाव या प्रेम नहीं होता। क्योंकि स्वयं तो स्वयं से हमेशा के लिए जुड़ा हुआ है, उसे कोई अलग नहीं कर सकता, क्योंकि वह अपना ही रूप है। आसक्ति केवल दूसरे से या अलग व्यक्ति या पदार्थ से होती है मतलब तब काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे मानसिक दोष शांत होकर जीवन को अपने लिए और औरों के लिए सुखमय बना देते हैं। इसी शान्त माहौल में ही आध्यात्मिक प्रगति भी होती है, भौतिक प्रगति तो होती ही है। इसका प्रमाण है ऐसी अवस्था में कुंडलिनी ध्यानचित्र का आदमी के मन में सुस्पष्ट अभिव्यक्त होना। साथ में, कुंडलिनी ध्यानसाधना से मस्तिष्क इतना ज्यादा चुस्त और संवेदनशील हो जाता है कि वह हरेक भौतिक संवेदना को गहराई से महसूस करने लगता है, जिससे खुद ही जागरूकता साधना की आदत पड़ जाती है। साथ में आदमी को ऐसा भी लगता है कि जब सभी संवेदनाएं एकजैसी ही हैं, तब वह किसी संवेदना पर ज्यादा तो किसी पर कम आसक्त क्यों है। उसे तो सबके प्रति बराबर रहना चाहिए। इसलिए वह निष्पक्ष व निरपेक्ष होकर शान्त हो जाता है। या ऐसा समझ लो कि आसक्ति वाली संवेदनाओं से सामान्य भौतिक संवेदनाओं की तरफ ध्यान डाईवर्ट हो जाता है।
दोस्तों, सूक्ष्मशरीर से सम्पर्क अक्सर होता रहता है। जिससे प्रेमपूर्ण संबंध हो, उसके सूक्ष्मशरीर से सम्पर्क जुड़ा होता है। इसी तरह जिसके सूक्ष्मशरीर से सम्पर्क जुड़ा होता है, उससे प्यार भी होता है। खाली स्थूलशरीर से प्यार नहीं हो सकता। सऊलमेट को ही देख लो। उनको ऐसा लगता है कि वे एकदूसरे की मिरर इमेज़ हैं। बेशक उनकी शक्ल आपस में न मिलती हो, पर उनके मन आपस में बहुत ज्यादा मेल खाते हैं। उनमें एक लड़का होता है, और एक लड़की। बेशक यौन आकर्षण भी उन्हें एकदूसरे के नजदीक लाते हैं, पर इससे एकदूसरे से नजदीकी से रूबरू ही हो सकते हैं, इससे प्यार पैदा नहीँ किया जा सकता। तभी तो आपने देखा होगा कि आदमी सेक्स से संतुष्ट ही नहीं होता। यदि सम्भोग में प्यार पैदा करने की शक्ति होती तो आदमी का कभी तलाक न हुआ करता, आदमी एक से ज्यादा शादियां न करता, और न ही एक से ज्यादा महिलाओं से यौनसंबंध बनाता। मुझे लगता है कि सेकसुअल सम्पर्क एक निरीक्षण अभियान है, जिससे आदमी नजदीक जाकर यह पता लगाता है कि उसे अमुक से प्यार है कि नहीँ। यह अलग बात है कि कई लोग इस सर्वे में इतना गहरा घुस जाते हैं कि बाहर ही नहीं निकल पाते और मजबूरी में वहीं रहकर समझौता कर लेते हैं। कइयों को लगता होगा कि मैं विरोधी बातें करता हूँ। मैं ओपन माइंड रहना पसंद करता हूँ, किसी भी विशेष सोच से चिपके रहना नहीं। कई जगह मैंने कहा है कि संभोग में प्यार को पैदा करने की शक्ति है। यह भी सही है, पर शर्त लागू होती है। इसके लिए काफी समय, प्रयास व संसाधनों की आवश्यकता होती है। जब बना बनाया खाना मिलने की उम्मीद हो, तो खुद क्यों बनाना भाई।
गहरे स्त्रीपुरुष प्यार में सूक्ष्मशरीर बेशक आपस में जुड़े हों, पर वे एकदूसरे से बदले नहीँ जा सकते। गहरे प्यार में एकदूसरे से टेलीपेथीक सम्पर्क बन जाता है, एकदूसरे की सोच और जीवन एकदूसरे को प्रभावित करने लगते हैं। अगर एक पार्टनर कुछ सोचे तो दूसरे के साथ वैसा ही होने लगता है, बेशक वह कितना ही दूर क्यों न हो। मतलब साफ है कि वे एकदूसरे के सूक्ष्मशरीर से प्रभावित होते हैं। पर पता नहीँ क्यों तीसरे सूक्ष्मशरीर के अखाड़े में प्रवेश करने से सभी परेशान होने लगते हैं। हाहा। इससे यह भी सिद्ध होता है कि सूक्ष्मशरीर अनंत आकाश की तरह सर्वव्यापी है। एकबार मेरे विश्वविद्यालय के मित्र के पिता का देहावसान हुआ था। उनसे मैं कई बार प्रेमपूर्ण माहौल में मिला भी था। वह मुझसे सैंकड़ों किलोमीटर दूर थे। मुझे कुछ पता नहीँ था। उसी रात मुझे नींद में अपने पिता की मृत्यु की जीवंत तस्वीर दिखी थी। मैं उसकी वजह नहीँ समझ पा रहा था। अगले दिन जब मुझे खबर मिली तब बात समझ में आई। उस दौरान मैं गहन तांत्रिक कुण्डलिनी योग अभ्यास करता था, संभवतः उससे ही इतना जीवंत महसूस हुआ हो। लगता है कि क्वांटम एन्टेंगलमेंट भी यही है। दोनों एन्टेंगलड क्वांटम पार्टिकल्स आपस में सूक्ष्मशरीर जैसी चीज से जुड़े हो सकते हैं। यह तो जाहिर ही है कि दृश्य ब्रह्माण्ड के आधार में डार्क मैटर और डार्क एनर्जी से भरा अनंत अंतरिक्ष होता है। यह भी पता है कि वही दृश्य जगत के रूप में उभरता है, उसी के नियंत्रण में रहता है, और नष्ट होने पर वही बनकर उसी में समा जाता है। इसका मतलब है कि डार्क मेटर और दृश्य जगत केवल आपस में बारबार रूप बदलता रहता है, कभी न तो कुछ नया बनता है, और न ही बना हुआ नष्ट होता है। यह दुनिया पहले भी हनेशा थी, आज भी है, और आगे भी हमेशा रहेगी। इसमें रोल प्ले करने वाले नए-नए कलाकार आते रहेंगे, और मुक्तिरूपी परमानेंट नेपथ्य में जाते रहेंगे। एन्टेंगलड क्वांटम पार्टिकल्स का सूक्ष्मशरीर एक ही होता है। वह सूक्ष्म शरीर उन पार्टिकल्स का डार्क मेटर है, जिससे वे बने हैं। इसीलिए जब एक पार्टिकल से छेड़छाड़ होती है, तो वह दूसरे को भी उसी समय प्रभावित करती है, बेशक वे दोनों एकदूसरे से कितनी ही दूरी पर क्यों न हो, बेशक एक कण गेलेक्सी के एक छोर पर हो और दूसरा दूसरे छोर पर। इसका मतलब है कि हरेक फंडामेन्टल पार्टिकल का अपना अलग डार्क मेटर है, जो अनंत अंतरिक्ष में फैला होकर अनंत अंतरिक्षरूप ही है। इसी तरह जैसे हरेक जीव एक अलग अनंत अंतरिक्षरूप है, अपनी किस्म का। जैसे आदमी का हरेक क्रियाकलाप उसके सूक्ष्मशरीर में दर्ज हो जाता है, और उसीके अनुसार वह उसीके जैसा बारबार बनाता रहता है, उसी तरह हरेक मूलकण का हरेक क्रियाकलाप उसके डार्क मेटर में दर्ज होता रहता है। प्रलय के बाद जब पुनः सृष्टि प्रारम्भ होने का समय आता है, तब उस डार्क मेटर से पुनः वह मूलकण बन जाता है, और उसमें दर्ज सूचनाओं के अनुसार आगे से आगे सृष्टि निर्माण करने लगता है। इसी तरह से सभी मूलकणों के सहयोग से सृष्टि पुनः निर्मित हो जाती है। शास्त्रों में इसे ऐसे कहा है कि पहले ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई, उनसे प्रजापतियों की उत्पत्ति हुई आदि-आदि। मतलब शास्त्रों में भी मूलकणों को मनुष्यों का रूप दिया गया है, क्योंकि दोनों के स्वभाव एकजैसे हैं। लगता है कि भौतिक विज्ञान सूक्ष्मशरीर को अलग तरीके से समझ रहा है। इसके अनुसार एन्टेंगलड क्वांटम पार्टिकल्स की तरंग आपस में जुड़ी होती है। वह अनंत अंतरिक्ष की दूरी तक भी आपस में जुड़ी ही रहती है।
फिर कहते हैं कि दो मूलकणों को एन्टेगल किया जा सकता है, अगर उन्हें एकदूसरे के काफी नजदीक कर दिया जाए। सम्भवतः इससे उनके डार्क मेटर आपस में एकदूसरे तक पहुंच बना लेते हैं। यह ऐसे ही है, जैसे दो नजदीकी प्रेमियों के सूक्ष्मशरीर एकदूसरे तक पहुंच बना लेते हैं, जैसा ऊपर बताया गया है।
उपरोक्त विवरण से कुछ वैज्ञानिकों और शास्त्रों का यह दावा भी सिद्ध हो जाता है कि भूत, भविष्य और वर्तमान सब आपस में जुड़े हैं, मतलब समय का अस्तित्व नहीं है। जो आज हो रहा है, और जो आगे होगा, वैसा ही पहले भी हुआ था, कुछ अलग नहीँ। सबकुछ पूर्वनिर्धारित है। हालांकि आदमी के कर्म और प्रयास का महत्त्व भी है।
दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि विद्युत्चुंबकीय क्षेत्र या तरंग से मानसिक दुनिया बनती है। तो फिर यह क्यों न मान लिया जाए कि बाहर का भौतिक संसार भी इन्हीं तरंगों से बनता है। यही अंतर है कि मानसिक संसार में ये तरंगें अस्थिर होती हैं, और आँखों आदि इन्द्रियों के माध्यम से बाहर से लाई जा रही सूचनाओं के अनुसार लगातार बदलती रहती हैं, पर बाहर के स्थूल जगत में ये किसी बल से स्थिरता पाकर स्थायी मूलकणों की तरह व्यवहार करने लगती हैं, जिनसे दुनिया आगे से आगे बढ़ती जाती है। दिमाग़ में तो विद्युत्चुंबकीय तरंग मूलाधार से आ रही ऊर्जा से बनती है, पर बाहर शून्य अंतरिक्ष में यह ऊर्जा कहाँ से आती है, यह खोज का विषय है।
फील्ड से कण और कण से फील्ड का उदय
क्वांटम फील्ड थ्योरी सबसे आधुनिक और स्वीकृत है। इसके अनुसार हरेक कण और बल की एक सर्वव्यापी फील्ड मौजूद होती है। फील्ड मतलब प्रभाव क्षेत्र, कण की फील्ड मतलब कण का प्रभाव क्षेत्र। अंतरिक्ष शून्य नहीं बल्कि इन फील्डों से भरा होता है। फील्ड मतलब पोटेंशल, तरंग व कण बनाने की योग्यता। यह फील्ड एक सबसे हल्के स्तर की लहर होती है। मुझे लगता है यह ऐसे है कि जब एक कंकड़ एक जल-सरोवर में गिराया जाता है तो एक मुख्य लहर के साथ छोटी लहरों के झुंड के रूप में विक्षोभ पैदा होता है। मुख्य बड़ी तरंग कण के समान है और छोटी तरंगें उसके क्षेत्र या फील्ड के समान हैं। जिस क्षेत्र तक इन सूक्ष्म तरंगों का अनुभव होता है, वह कण के रूप में स्थित उस मुख्य तरंग का फील्ड का दायरा होता है। जब इलेक्ट्रोन की फील्ड में किसी पॉइंट को एनर्जी मिलती है तो वहां फील्डरूपी छोटी लहर का एम्प्लीचूड या आयाम बढ़ जाता है, और वहाँ एक कण का उदगम होता है। वह इलेक्ट्रोन है। ये आधारभूत फील्ड सबसे छोटे कण क्वार्क से भी सूक्ष्म होती हैं। इसी तरह इलेक्ट्रोन के चारों तरफ भी एक फील्ड बनती है। मतलब इलेक्ट्रोन रूपी बड़ी लहर के चारों तरफ भी एक सूक्ष्म लहरों का क्षेत्र बन जाता है। वह प्रोटोन से भी इसी इलेक्ट्रोमेग्नेटीक फील्ड से ही दूर से आकर्षित होकर उससे जुड़ जाता है। इस आकर्षण की फील्ड तरंगों से भी विशेष सूक्ष्म कण सम्भवतः फोटोन पैदा होता है, जो इस आकर्षण को क़ायम करता है। इस तरह फील्ड से कण और कण से फील्ड पैदा होकर बाहर की स्थूल संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।
अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त का उदय
मन भी तो क्वांटम फील्ड की तरह होता है। इसमें हरेक किस्म का संकल्प अदृष्य रूप अर्थात अदृष्य लहर के रूप में रहता है। इसे सांख्य दर्शन के अनुसार अव्यक्त कहते हैं। जब इसे मूलाधार से एनर्जी मिलती है, तब इस मानसिक क्वांटम फील्ड की लहरें बड़ी होने लगती हैं, जो स्थूलकण रूपी चित्रविचित्र संसार पैदा करती हैं। उससे और फील्ड पैदा होती है, जिससे और विचार पैदा होते हैं। इस तरह यह सिलसिला चलता रहता है और आदमी के विचार रुकने में ही नहीं आते। अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त पैदा होकर भीतरी मानसिक संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।
क्वांटम भौतिक विज्ञान और आध्यात्मिक मनोविज्ञान के बीच समानता
प्रकृति या अव्यक्त ही वह हल्के स्तर की आधारभूत लहर है। अव्यक्त व्यक्त से ही बना है, अव्यक्त मतलब हल्के स्तर का व्यक्त। हालांकि उसके मूल में भी निश्चेष्ट या अवर्णनीय पुरुष ही है। अंत के पैराग्राफ में बताऊंगा कि निश्चेष्ट या गतिहीन पुरुष क्यों कुछ काम नहीं कर पाता। क्यों उसे मूक दर्शक की तरह माना जाता है, जो अपनी उपस्थिति मात्र से प्रकृति की मदद तो करता है, पर खुद कुछ नहीं करता। सारा काम प्रकृति ही करती है। पुरुष अर्थात शुद्ध आत्मा एक चुंबक की तरह है जिसकी तरफ खिंच कर ही प्रकृति से सब काम अनायास ही खुद ही होते रहते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जो भगवान के सहारे है, उसका जीवन खुद ही अच्छे से कट जाता है। पर भगवान असली और अच्छी तरह से समझा हुआ होना चाहिए, जो कुण्डलिनी योग से ही संभव है। जैसे हमारा हरेक कर्म और विचार संस्कार रूप से पहले से ही सूक्ष्म रूप में हमारी अव्यक्त प्रकृति के रूप में मौजूद होता है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं, उसी तरह हरेक क्वांटम कण भी अपनी क्वांटम फील्ड के रूप में पहले से ही मौजूद होता है। व्यष्टि मूलाधार मतलब शारीरिक मूलाधार से मिल रही शक्ति से व्यष्टि अव्यक्त मतलब शरीरबद्ध अव्यक्त या व्यष्टि फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे विभिन्न लहरों के रूप में विचारों मतलब व्यष्टि मूलकणों का उदय होता है। इसी तरह समष्टि मूलाधार अर्थात ब्रह्माण्डव्याप्त मूलाधार अर्थात मूल प्रकृति से उत्पन्न शक्ति से समष्टि क्वांटम फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे समष्टि मूलकण पैदा होते हैं। पर समष्टि जगत में ये शक्ति कहाँ से आती है? दार्शनिक तौर पर तो मूल प्रकृति को समष्टि मूलाधार मान सकते हैं, क्योंकि दोनों में मूल शब्द जुड़ा है, और दोनों ही सब सांसारिक रचनाओं के मूल आधार या नींव के पहले पत्थर हैं हैं, पर इसे वैज्ञानिक रूप से कैसे सिद्ध करेंगे? व्यष्टि के मूलाधार की तरह समष्टि मूलाधार में भी कोई सम्भोग क्रिया और उससे उत्पन्न सम्भोग-शक्ति होनी चाहिए। तो उसे पुरुष और प्रकृति के बीच सम्भोग क्यों न माना जाए, जिसका इशारा शास्त्रों में किया गया है।
संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया तांत्रिक कुण्डलिनी योग का भौतिक मार्ग ही है
दरअसल जीवों का जो अव्यक्तरूप सूक्ष्म शरीर है, वह मरने के बाद और भी सूक्ष्म हो जाता है, क्योंकि उस समय उसे स्थूल शरीर से बिल्कुल भी ऊर्जा नहीं मिल रही होती है। वह एक घने अँधेरे आत्माकाश की तरह हो जाता है, जिसका अंधेरा उसमें छिपे हुए अव्यक्त जगत के अनुसार होता है। वह अव्यक्त जगत भी व्यक्त जगत के अनुसार ही होता है। इसीलिए सब जीवों के सूक्ष्म शरीर उनके स्थूल स्वभाव के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इस तरह से बहुत से जीवों के अव्यक्त आत्माकाश जब समष्टि अव्यक्ताकाश मतलब मूल प्रकृति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक निश्चित सीमा से ज्यादा अव्यक्त भाव अर्थात अंधकारमय आकाश बना देते हैं, तब वहाँ से एक शक्ति की लहर पुरुष की तरफ छलांग लगाती है। इसी से क्वांटम फील्ड में लहरों का एम्प्लीच्युड आदि बढ़ने से मूलकणों का उदय और सृष्टि का विस्तार शुरु होता है। यह ऐसे ही है जैसे कभी कोई आदमी अपनी सहन-सीमा से ज्यादा ही गम या अवसाद के अँधेरे में डूबने लग जाए, तो वह सम्भोग की सहायता से अपने मूलाधार के अँधेरे में डूबे अपने अव्यक्त मानसिक जगत को ऊपर चढ़ती हुई शक्ति के साथ सहस्रार की तरफ भेजने की कोशिश करता है, ताकि उसके विचारों का मानसिक संसार पुनः प्रकाशित होने लगे। शक्ति तो खुद एक वाहक या बल है, जो अव्यक्त जगत को व्यक्त बनाने में मदद करती है। शास्त्रों में भी यही कहा है कि जब जीवों के कर्म, फल देने को उन्मुख हो जाते हैं, अर्थात जब जीव अंधकार से ऊबने जैसे लगते हैं, तब वे प्रलय के बाद पुनः सृष्टि को प्रारम्भ करने की प्रेरणा देते हैं। यह सामूहिक अर्थात समष्टि सृष्टि और प्रलय है। व्यक्तिगत सृष्टि और प्रलय तो हरेक जीव के जन्म और मरण के साथ चली ही रहती है। सहज व प्राकृतिक मृत्यु के बाद कुछ समय तो जीव चैन की बंसी बजाता हुआ अव्यक्त में आराम करता है, फिर जल्दी ही उससे ऊब जाता है। इसलिए उस अव्यक्तरूप जीव को व्यक्त करने के लिए शक्ति पुरुष की तरफ बढ़ने की कोशिश करना चाहती है। देखा जाए तो शक्ति जाती कहीं नहीं है, क्योंकि पुरुष, प्रकृति और शक्ति तीनों व्यष्टि मूल प्रकृति में साथ-साथ ही रहते हैं। ऐसे ही जैसे अव्यक्त, व्यक्त और उनको बनाने वाली शक्ति मस्तिष्क में ही रहते हैं, पर अव्यक्त जगत मूलाधार से ऊपर चढ़ता हुआ महसूस होता है, क्योंकि पुरुष या मस्तिष्क की शक्ति को प्रेरित करने वाला विशेष सेकसुअल बल मूलाधार से ऊपर चढ़ता है। उसके लिए सम्भोग के माध्यम से एक आदमी और एक औरत का आपसी मिलन जरूरी होता है। संयोगवश उस मृत जीव की जीवात्मा किसी सम्भोगरत आदमी और औरत के जोड़े के मिश्रित मूलाधार में स्थित अव्यक्त जगत से मेल खाती है। दोनों का मिश्रित अव्यक्त जगत संभोग-शक्ति के माध्यम से ऊपर उठते हुए दोनों के हरेक चक्रोँ में दबी हुई भावनाओं व छिपे हुए विचारों को अपने साथ ले जाकर सहस्रार में आनंद के साथ व्यक्त हो जाता है, और एकदूसरे के सहस्रार चक्रोँ में आपस में मिश्रित ही बना रहता है। आदमी के सहस्रार से वह मिश्रित जगत आगे के चैनल से शक्ति के साथ नीचे उतरकर वीर्य में रूपांतरित होकर औरत के गर्भ में प्रविष्ट होकर एक बालक का निर्माण करता है। इसीलिए बालक में माता और पिता दोनों के गुण मिश्रित होते हैं। इसीलिए मांबाप के व्यवहार का बच्चों पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि तीनों की एनर्जी आपस में जुड़ी होती है। इसीलिए व्यवहार में देखा जाता है कि सम्भोग सुख के साथ प्रेम से रमण करने के आदी दम्पत्ति की संतानेँ बहुत तरक्की करती हैं, भौतिक रूप से भी और आध्यात्मिक रूप से भी। इसके विपरीत आपस में अजनबी जैसे रहने वाले दंपत्तियों के बच्चे अक्सर कुंठित से रहते हैं। यह अलग बात है कि कई अच्छी किस्मत वाले लोग इधरउधर से गुजारा कर लेते हैं। हाहा। अनुभवी तंत्रयोगी सम्भोग की, जगत को व्यक्त करने वाली कुण्डलिनी शक्ति को अपने सहस्रार में केवल एक ही ध्यानचित्र पर फोकस करते हैं, और उसे वीर्य रूपी बीज में नीचे न उतारकर लम्बे समय तक वहीं रोककर रखते हैं, जिससे वह मानसिक चित्र जागृत हो जाता है। इसे ही तांत्रिक कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।
पूरा ब्रह्माण्ड ही एक एलियन
इन उपरोक्त तथ्यों का मतलब है कि ब्रह्माण्ड भी एक विशालकाय जीव या मनुष्य की तरह व्यवहार करता है। इससे वैदिक उक्ति, “यत्पिंडे तत् ब्रह्मान्डे” यहाँ भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो जाती है। इसका मतलब है कि जो कुछ भी छोटी चीज जैसे शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में भी है, अन्य कुछ नहीं। पिंड यहाँ शरीर को ही कहा है, अन्य किसी चीज को नहीं, क्योंकि किसीकी मृत्यु के बाद जब उसे श्राद्ध आदि के द्वारा खाने-पीने की चीजें दी जाती हैं, उसे पिंडदान कहते हैं। क्योंकि अगर हरेक छोटी चीज के बारे में कहना होता तो अंडे, खंडे आदि दूसरे शब्द ज्यादा बेहतर होते, पिंडे नहीं। दूसरा, पंजाबी भाषा में वह स्थान जहाँ लोग सामूहिक रूप से एकसाथ रहते हैं, जिसे गाँव कहते हैं, वह पिंड कहलाता है। मूल प्रकृति ब्रह्माण्ड का मूलाधार है, और चेतन पुरुष या परमात्मा इसका सहस्रार या उसमें कुण्डलिनी जागरण है। चित्रविचित्र संसारों की रचना के रूप में ही इसका जीवनयापन या कर्मयोग या इसका कुण्डलिनी जागरण की तरफ बढ़ना है। ऐसा यह अद्वैत के साथ करता है। शास्त्रों में ऐसा ही लिखा है कि ब्रह्मा खुद कहते हैं कि वे अद्वैतभाव के साथ सृष्टि की रचना करते हैं, जिससे वे जन्ममरण के बंधन में नहीं पड़ते। इसलिए यही इसका कुण्डलिनी योग है। अद्वैत और कुण्डलिनी योग आपस में जुड़े हुए हैं। सृष्टि का संपूर्ण निर्माण ही इसका कुण्डलिनी जागरण है। जैसे कुण्डलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने सबकुछ कर लिया, इसी तरह सबकुछ कर लेने के बाद ब्रह्मा को कुण्डलिनी जागरण होता है, यह इसका मतलब है। इसके बाद सृष्टि निर्माण से उपरत होकर इसका संन्यास लेना ही सृष्टि विस्तार का धीमा पड़ना और रुक जाना है। देहांत के बाद इसका परम तत्त्व में मिल जाना ही प्रलय है। शास्त्रों में इसीलिए देव ब्रह्मा की कल्पना की गई है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही जिसका शरीर है। आजकल विज्ञान भी इस अवधारणा पर विश्वास करने लग गया है। इसीलिए एक वैज्ञानिकथ्योरी यह भी सामने आ रही है कि हो सकता है कि पूरा ब्रह्माण्ड ही एक विशालकाय एलियन हो।
जिसे हम अंधेरनुमा शून्य या अव्यक्त कहते हैं, वह भी खाली नहीं बल्कि सीमित उतार-चढ़ाव वाली जगतरूपी तरंगों से भरा होता है
अगर चैतन्यमय आत्माकाश या परमात्मा में कोई बहुत ज्यादा स्थित हो जाए या लगातार आत्माकाश में ही स्थित रहने लगे तो वह कुछ काम भी नहीं कर सकता। वह पराश्रित व नादान सा रहता है संन्यासी की तरह। इसका मतलब है कि उस समय उसमें व्यक्त दुनिया अव्यक्त आकाश के रूप में नहीं रहती। मतलब वह शुद्ध आत्माकाश बन जाता है। मतलब उसके आत्माकाश में क्वांटम फील्ड नाम की बिल्कुल भी वाइब्रेशनस नहीं रहतीं। वह पूर्ण चिदाकाश बन जाता है। इसी वजह से स्थूल ब्रह्माण्ड में भी उस जगह आकाश खाली होता है, जहाँ वाइब्रेशन नहीं होतीं। अन्य स्थान ग्रहों-सितारों से भरे होते हैं। वर्चुअल पार्टिकल तो बनते रहते हैं थोड़ी-बहुत वाइब्रेशन से। मतलब थोड़ा-बहुत काम-वाम तो वे संन्यासी भी कर लेते हैं, पर कोई निर्णायक कार्य-अभियान या व्यापार-धंधा नहीं चला पाते। हाँ, एक बीच वाला हरफनमौला तरीका भी है कि तांत्रिक योग से आत्माकाश में लगातार कंपन बनाते भी रहो और मिटाते भी रहो, और सबकुछ करते हुए भी उससे अछूते बने रहो।
मन के अंदर और बाहर दोनों एकदूसरे के सापेक्ष और मिथ्या हैं
मन के बाहर किसी भी चीज या जगत का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता
दोस्तों मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे जगत सत्य नहीं, बल्कि आत्माकाश के अंदर एक आभासी तरंग है। इसी तरह, स्थूल जगत का भी कोई अस्तित्व नहीं है, इसकी रचना भी मन ने की है। यह कोई आज की खोज नहीं है, जैसा कि कई जगह दिखावा हो रहा है। यह ऋषिमुनियों और अन्य अनेकों जागृत व्यक्तियों ने हजारों साल पहले अनुभव कर लिया था, जो उन्होंने आगे आने वाली हमारी जैसी पीढ़ियों के फायदे के लिए अध्यात्म शास्त्रों में लिखकर छोड़ा। विशेषकर योगवासिष्ठ ग्रंथ में इन तथ्यों का बड़ा सुंदर और वैज्ञानिक जैसा वर्णन है। कभी उसका इतना आकर्षण होता था कि उसको शांति से पढ़ने के लिए या उसे पढ़कर कई लोग घरबार छोड़कर ज्ञानप्राप्ति के लिए निर्जन आश्रम में चले जाते थे। यह पाठक को क्वांटम या पारलौकिक जैसे आयाम में स्थापित कर देता है। इसमें पूनरुक्तियां बहुत ज्यादा हैं, इसलिए बारबार एक ही चीज को विभिन्न आकर्षक तरीकों से दोहराकर यह माइंडवाश जैसा कर देता है। कट्टर भौतिकवादी कह सकते हैं कि जागृति से अनुभव हुए आत्माकाश के अंदर मानसिक सूक्ष्म जगत के बारे में तो यह बात सही है, पर बाहर के स्थूल भौतिक जगत के बारे में यह कैसे मान लें। पर वे उसी पल यह बात भूल जाते हैं कि मन के इलावा स्थूल जगत जैसी चीज का कोई अस्तित्व ही नहीं है, क्योंकि मन के इलावा आदमी कुछ नहीं जान सकता। सिर्फ उस जगत की एक कल्पना कर सकते हैं, पर वह काल्पनिक जगत भी तो सूक्ष्म ही है। फिर कुछ तर्क जिज्ञासु लोग यह कल्पना कर सकते हैं कि चेतन आकाश को ही मूल क्यों समझा जाए, जड़ आकाश को क्यों नहीं, क्योंकि दुःख अभाव आदि जड़ आकाश के टुकड़े हैं।
अचेतन आकाश भी चेतन आत्माकाश में जगत की तरह आभासी व मिथ्या है
इसका जवाब जागृत लोग इस तरह से देते हैं कि चिदाकाश-लहर की तरह ही अचेतन आकाश का अस्तित्व भी नहीं है। वह भ्रम से अपनी आत्मा के रूप में महसूस होता है। वह भ्रम जगत के प्रति आसक्ति से बढ़ता है, और अनासक्ति से घटता है। जैसे चेतन आकाश में जगत आभासी है, उसी तरह अचेतन आकाश भी। इसीलिए सांख्य दर्शन अचेतन आकाश को भी चेतन आकाश की तरह शाश्वत मानता है। हालांकि सर्वोच्च स्कूल ऑफ़ थॉट वेदांत दर्शन स्पष्ट करता है कि अचेतन आकाश चेतन आत्माकाश में वास्तविक नहीं आभासी है।
पूर्णता की अनुभूति भाव रूपी चेतन आकाश के अनुभव से ही होती है, अभाव रूपी अचेतन आकाश के अनुभव से नहीं
जरा गहराई से सोचें तो यह अनुभवसिद्ध भी है। किसीको अचेतन आत्माकाश के अनुभव से यह महसूस नहीं होता कि उसे सबकुछ महसूस हो गया या वह पूर्ण हो गया, उसे कुछ जानने, करने और भोगने के लिए कुछ शेष बचा ही नहीं। पर ऐसा चेतन आत्माकाश के अनुभव से महसूस होता है। इससे मतलब स्पष्ट हो जाता है कि असल में चेतनाकाश ही सत्य और अनंत है, आम अनुभव में आने वाला भौतिक जगत तो उसमें मामुली सी, व मिथ्या अर्थात आभासी तरंग की तरह है।
सृष्टि ब्रह्म की तरह अनिर्वचनीय व अनुभवरूप है
जगत कल्पनिक है, मतलब स्थूल भौतिक जगत काल्पनिक है, क्योंकि उस तक हमारी पहुंच ही नहीं है। मानसिक सूक्ष्म जगत काल्पनिक नहीं क्योंकि यह तो अनुभव होता है। हालांकि सूक्ष्म भी स्थूल के सापेक्ष ही है। जब स्थूल ही नहीं तो सूक्ष्म कैसे हो सकता है। मतलब कि स्थूल-सूक्ष्म आदि सभी विरोधी व द्वैतपूर्ण भाव काल्पनिक हैं। इसलिए जगत सिर्फ अनुभव रूप है, अनिर्वचनीय है। इसे ही गूंगे का गुड़ कहते हैं। हर कोई ब्रह्म में ही स्थित है, केवल स्तर का फर्क है। जागृत व्यक्ति ज्यादा स्तर पर, अन्य विभिन्न प्रकार के निचले स्तरों पर। पूर्ण कोई नहीं।
एक दार्शनिक थोट एक्सीपेरिमेंट
विज्ञान जो अपने को कट्टर प्रयोगात्मक, वास्तविक व वस्तुपरक मानता है, वह भी आजकल बहुत से दार्शनिक विचार-प्रयोग प्रस्तुत कर रहा है, जिन्हें भौतिक प्रयोगों से बिल्कुल भी सिद्ध नहीं किया जा सकता। फिर हम थोट एक्सपेरिमेंट करने से क्यों हिचकिचाएं, क्योंकि कुण्डलिनी का क्षेत्र भौतिक विज्ञान से ज्यादा दार्शनिक व अनुभवात्मक है। वह विचार-प्रयोग है, सृष्टि के सूक्ष्मतम मूलकण को कुण्डलिनी योग का अभ्यास मानना। वैसे शास्त्रों से यह बात प्रमाण-सिद्ध है। वेद-शास्त्रों को भी भौतिक प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण माना गया है, कई मामलों में तो भौतिक से भी ज्यादा, जैसे ईश्वर व जागृति के मामलों में।
इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही सूक्ष्मतम तरंग के क्रेस्ट या शिखा और ट्रफ या गर्त हैं
मूलकणरूपी स्टैंडिंग वेव वह हो सकती है, जब स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र के जोड़े को या मूलाधार और सहस्रार बिंदु के जोड़े को एकसाथ अंगुली से दबाकर उनके बीच कभी इड़ा से शक्ति की तरंग दौड़ती है, कभी पिंगला से, और बीचबीच में सुषुम्ना से। मूलाधार यिन या पाताल या प्रकृति है,और आज्ञा या सहस्रार यांग या स्वर्ग या पुरुष है। बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी ही मूल कण या दुनिया का असली रूप है, क्योंकि उससे ही कुण्डलिनी अर्थात मन अर्थात दुनिया का प्रदुर्भाव होता है।
अस्थायी मूलकण अल्प योगाभ्यास के रूप में है जबकि स्थायी मूलकण सम्पूर्ण योगाभ्यास के रूप में
जैसे आदमी में मूलाधार और सहस्रार के बीच में शक्ति का प्रवाह लगातार जारी रहता है, उसी तरह मूलकण में प्रकृति और पुरुष के बीच। इसीलिए तो तरंग लगातार चलती रहती है, कभी स्थिर नहीं होती। यह स्थिर या असली कण के जैसा है। आभासी कण उस प्रारम्भिक योगाभ्यास की तरह है, जिसमें इड़ा और पिंगला में शक्ति का प्रवाह थोड़ी-थोड़ी देर के लिए होता है, और कम प्रभावशाली होता है। इसीलिए ये अस्थायी कण थोड़े ही समय के लिए प्रकट होते रहते हैं, और आकाश में लीन होते रहते हैं।
पार्टिकल मूलाधार से सहस्रार की ओर चल रही तरंग के रूप में है, जबकि एंटीपार्टिकल सहस्रार से मूलाधार को वापिस लौट रही तरंग के रूप में है
सृष्टि के अंत में सभी कणों के एंटीपार्टिकल पैदा हो जाएंगे जो एकदूसरे को नष्ट करके प्रलय ले आएंगे
मूलाधार यहाँ प्रकृति का प्रतीक है, और सहस्रार पुरुष का। उपरोक्त अस्थायी आभासी कण प्लस और माइनस रूप के दो विपरीत कणों के रूप में पैदा होते रहते हैं। इसका मतलब है कि कभी न कभी स्थायी मूलकणरूपी तरंग भी खत्म होगी ही, बेशक सृष्टि के अंत में। फिर विपरीत मूलकण रूपी तरंग सहस्रार से मूलाधार मतलब पुरुष से प्रकृति की तरफ उल्टी दिशा में चलेगी। ऐसे में हरेक प्लस मूलकण के ठीक उलट माइनस मूलकण बनेंगे। इससे मूलकण और प्रतिमूलकण एकदूसरे से जुड़कर एकदूसरे को निगल जाएंगे, और सृष्टि का अंत हो जाएगा। इसीको प्रलय कहते हैं। फिर लम्बे समय तक कोई तरंग नहीं उठेगी। इसे ही नारायण का योगनिद्रा में जाना कहा गया है। मतलब निद्रा में तो है, पर भी अपने पूर्ण आत्मजागृत स्वरूप में स्थित है। विज्ञान कहता है कि पार्टिकल के बनते ही एंटीपार्टिकल भी बन जाता है, पर वह कहीं गायब हो जाता है। हो सकता है कि सृष्टि के अंत में वे एंटीपार्टिकल दुबारा वापस आ जाते हों।
इस समय एंटीपार्टिकल गुरुत्वाकर्षण के रूप में हैं
मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई वैज्ञानिक किस्म के लोग भी ऐसा ही कह रहे हैं। ग्रेविटी अंतरिक्ष में गड्ढे की तरह है। तरंग का आधा भाग भी गड्ढे की तरह होता है। दोनों किसी बल के कारण मिल नहीं पाते। इसलिए कण से निर्मित ग्रेविटी कण को अपनी तरफ खिंचती तो है, पर पूरी तरह उससे मिल नहीं पाती। जब तरंग का ऊपर का आधा भाग ही दिखता है, तो वह कण की तरह ही दिखता है। जब ग्रेविटी का गड्ढा भी उसके साथ देखा जाता है, तो वह कण तरंग रूप में आ जाता है। इसका मतलब है कि प्रलय के समय गुरुत्वाकर्षण ही सारी सृष्टि को निगल जाएगा।
क्वांटम ग्रेविटी का अस्तित्व है
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि इलेक्ट्रोन, क्वार्क आदि मूलकणों की भी ग्रेविटी है। यह सूक्ष्म कण द्वारा निर्मित अंतरिक्ष के आभासी सूक्ष्म गड्ढे के जैसे एंटीपार्टिकल के रूप में है। इसे विज्ञान ढूंढ नहीं पा रहा है, पर क्वांटम ग्रेविटी के अस्तित्व को नकार भी नहीं पा रहा है।
मूल तरंग का पहला नोड प्रकृति है, और दूसरा नोड पुरुष है
ये चित्रोक्त बिंदू स्टैंडिंग वेव के दो नोड हैं। एक कोने पर ब्लू डॉट नेगेटिव या नॉर्थ पोल नोड है और दूसरे कोने पर रेड डॉट पॉजिटिव या साउथ पोल नोड है। दोनों तरफ को झूलती तरंग ही सृष्टि बनाने के लिए इच्छा या सोचविचार है। केंद्रीय रेखा ही ध्यान रूपी या भाव रूप सुषुम्ना है, जो सृष्टि बनाने का पक्का निश्चय है। इसीलिए कहते हैं कि ब्रह्मा ने ध्यान रूपी तप से सृष्टि को रचा। मतलब प्रकृति एक नोड है और पुरुष दूसरा नोड। वैसे भी सृष्टि की उत्पत्ति प्रकृति-पुरुष संयोग से मानी गई है। प्रकृति अंधेरा आसमान है, और पुरुष स्वयंप्रकाश आकाश है। दोनों शाश्वत हैं। प्रकृति नेगेटिव नोड है, और पुरुष पॉजिटिव नोड है। इन दोनों के बीच बनने वाली स्थिर तरंग ही सबसे छोटा मूलकण है। इस तरह के कण आकाश में पॉप आउट होते रहते हैं और उसीमें मर्ज होते रहते हैं। इनको किसी चीज से जब स्थिरता मिलती है तो ये आगे से आगे जुड़कर अनगिनत कण बनाते हैं। इससे सृष्टि का विस्तार होता है। इसका मतलब कि सृष्टि का प्रत्येक कण योग कर रहा है। पूरी सृष्टि योगमयी है।
मूलकण एक कुण्डलिनी योगी है, जो कुण्डलिनी ध्यान कर रहा है
सूक्ष्मतम तरंग की नोड से नोड के बीच की न्यूनतम दूरी प्लेँक लेंथ बनती है
वैज्ञानिकों को क्वार्क से छोटा कोई कण नहीं मिला है। यह भी हो सकता है कि क्वार्क से छोटी तरंगें भी हैं, जैसा कि स्ट्रिंग थ्योरी कहती है, पर वे क्वार्क के स्तर तक बढ़ कर ही अपने को कण रूप में दिखा पाती हैं। केवल कण के स्तर पर ही तरंगें पकड़ में आती हैं। हो सकता है कि सबसे छोटी तरंग प्लेंक लेंथ के बराबर है, जो सबसे छोटी लम्बाई संभव है। उस प्लेँक तरंग का एक नोड प्रकृति है, और दूसरा पुरुष। वैसे प्रकृति और पुरुष एक ही हैं, केवल आभासी अंतर है। इस तरह प्लेँक लेंथ भी वास्तविक नहीं आभासिक है। आकाश में तरंग भी तो आभासी ही हो सकती है, असली नहीं। प्रकृति मतलब मूलाधार से एक शक्ति की तरंग पुरुष मतलब सहस्रार की तरफ उठती है, मतलब देव ब्रह्मा योगरूपी तप के लिए ध्यान लगाते हैं। वह तरंग इड़ा और पिंगला के रूप में बाईं और दाईं तरफ बारी-बारी से झूलने लगती है, मतलब ब्रह्मा ध्यान में डूबने की कोशिश करते हैं। ध्यान थोड़ा स्थिर होने पर शक्ति की तरंग बीच वाली आभासी जैसी सुषुम्ना नाड़ी में बहने लगती है। इसीलिए कण भी आभासी या एज्यूम्ड ही है, असली तो तरंग ही है। इससे कुण्डलिनी चित्र मन में स्थिर हो जाता है, मतलब पहला और सबसे छोटा मूलकण बनता है। फिर तो आगे से आगे सृष्टि बढ़ती ही जाती है। आज भी तो सारी सृष्टि बाहर के खुले व खाली अंतरिक्ष की तरफ भाग रही है, मतलब वही मूल स्वभाव बरकरार है कि प्रकृति से पुरुष की तरफ जाने की होड़ लगी है। सृष्टि की हरेक वस्तु और जीव का एक ही मूल स्वभाव है, अचेतनता से चेतनता की ओर भागना।