कुंडलिनी योग से मृत्यु, प्रलय, जन्म और सृष्टि का रहस्योद्घाटन

दोस्तों! आध्यात्मिक शास्त्र उच्च कोटि के ज्ञान से भरे पड़े हैं। अगर उनके साथ अनुभव का तड़का भी लग जाए तो बात कुछ और ही हो जाती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम सभी दुनियादारी में उलझे हुए आदमी हैं। हमारा अनुभव इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता कि वह स्वतंत्र रूप से पारलौकिक तथ्यों को सिद्ध कर सके। हां, अगर हमारा अनुभव शास्त्रों के प्रामाणिक तथ्यों जैसा है, तब हमारा अनुभव प्रामाणिक माना जा सकता है। मैं भी अपने ऐसे ही एक छोटे से अनुभव को इस पोस्ट के अंत में साझा करूंगा।

शास्त्रों में प्रलय-काल की प्रकृति को साम्यावस्था की स्थिति के तौर पर बताया गया है। मतलब इसमें इसके तीनों गुण अपने-अपने एक समान स्तर पर बने रहते हैं। बदलते नहीं हैं।ऐसा जरूरी नहीं कि जितना सतोगुण है, उतना ही रजोगुण है और उतना ही तमोगुण है। बल्कि इसका यह मतलब है कि बेशक सब की भिन्न-भिन्न मात्रा है पर हरेक गुण अपनी विशिष्ट मात्रा पर एक समान बना रहता है। वह कम या ज्यादा नहीं होता। उदाहरण के तौर पर अगर सतोगुण का अनुपात 1 है तो एक ही रहेगा। तमोगुण का 5 है तो 5 ही रहेगा और रजोगुण का तीन है तो तीन ही रहेगा। अगर तीनों गुण एकदूसरे के बराबर हुआ करते तो विभिन्न सृष्टियों में विभिन्नता न हुआ करती, बल्कि सभी सृष्टियां बिल्कुल एक समान हुआ करतीं। इसी के साथ, सभी आदमी भी एक जैसे हुआ करते, उनमें भी कोई विभिन्नता न हुआ करती। और तो और, फिर तो सभी दिवंगत आत्माएं भी एकजैसी हुआ करतीं। पर ऐसा तो संभव नहीं है, क्योंकि सृष्टि में विभिन्नता हरेक स्तर पर दिखाई देती है। कुछ आत्माएं पवित्र होती हैं, जो हर तरह से भला करती हैं। पर कुछ आत्माएं पापपूर्ण भी होती हैं, जो नुकसान करने से जरा भी नहीं हिचकतीं। बेशक शरीर न होने के कारण दिवंगत आत्माएं जानबूझ कर भला या बुरा नहीं कर सकतीं, पर उनके सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र से खुद ही भला या बुरा होता है। शायद इसे ही शास्त्रों में प्रेत योनि कहा है। मतलब है तो यह दिवंगत और शरीररहित आत्मा ही, पर बहुत लंबे समय तक इसे शरीर न मिलने के कारण इसे मनुष्य योनि की तरह ही एक स्थायी योनि मान लिया गया हो। बेशक यह सूक्ष्म योनि है। उदाहरण के लिए, कई भयानक सड़क दुर्घटना के स्थानों पर बारबार दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इसके लिए वहां भटकी हुई या बिना गति लगी हुई या बिना स्थूल योनि को प्राप्त हुई बुरी प्रेतात्मा को जिम्मेदार मानकर वहां भगवान हनुमान आदि देवता के मंदिर या मूर्ति को प्रतिष्ठित किया जाता है। कहते हैं कि उससे दुर्घटनाओं का सिलसिला रुक जाता है। शायद देवता से पैदा सकारात्मक ऊर्जा बुरी प्रेतात्मा की नकारात्मक ऊर्जा को निष्प्रभावी कर देती है। शायद बहुत उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा को ही देव योनि कहा जाता हो।

दोबारा सृष्टि-निर्माण से कुछ नहीं बदलता। सिर्फ प्रकृति में पहले से विद्यमान गुणों में क्षोभ पैदा होता है। मतलब कभी सतोगुण अपने आधारभूत स्तर से एकदम से बढ़ जाता है, तो कभी तमोगुण तो कभी रजोगुण। इस तरह से हर-एक गुण का स्तर लगातार बदलता रहता है। जो आदमी ज्यादा क्रियाशील है, उसमें ज्यादा जल्दी से बदलता रहता है। जो कम क्रियाशील है, उसमें कम रफ्तार से बदलता रहता है। आप सोचेंगे कि मैं यहां प्रकृति से आदमी के ऊपर क्यों आ गया। वास्तव में प्रकृति का अनुमान आदमी से ही लगाया गया है। सीधे तौर पर तो कोई भी समष्टि मतलब सर्वव्यापक प्रकृति को अनुभव नहीं कर सकता है। पर व्यष्टि अर्थात सीमित प्रकृति के रूप में स्थित आदमी के जन्म-मरण को जरूर अनुभव किया जा सकता है। योगियों ने इसे अनुभव किया है, जिसके आधार पर ही भारतीय दर्शन और शास्त्र बने हैं।

मरने के बाद आदमी के तीनों गुण अपने-अपने औसत स्तर पर आ जाते हैं और फिर बदलते नहीं। गुणों में क्षोभ पैदा करने के लिए शरीर चाहिए। वह मरने के बाद होता नहीं। जीवित अवस्था में मन के सुंदर विचारों से सतोगुण बढ़ता है। मन की ज्यादा क्रियाशीलता से रजोगुण बढ़ता है, और अकेलेपन या अवसाद जैसी अवस्था में तमोगुण बढ़ता है। ये सारे गुण रहते तो मरने के बाद भी हैं, पर बदलते नहीं हैं। मतलब आदमी कभी नहीं मरता। हमें आदमी मरा हुआ इसलिए लगता है क्योंकि हम गुणों के तूफान में उलझे होते हैं। इससे हमें गुणों की सूक्ष्म अवस्था नजर नहीं आती। यह ऐसे ही है, जैसे चकाचौंध रोशनी के बाद सामान्य अंधेरा भी घुप्प अंधेरा लगता है। हां, जब कुंडलिनी योग से गुणों का तूफान कुछ शांत हो जाता है, तब दिवंगत आत्मा से साक्षात्कार की संभावना बढ़ जाती है। अब आप पूछेंगे कि मरने के बाद गुणों की वह आधारभूत अवस्था कैसे निर्धारित होती है। वास्तव में वह आदमी के पिछले सभी जन्मों के गुणों का औसत होती है। मतलब अगर कोई ज्यादा सतोगुण में रहा है तो आधारभूत सत्त्वगुण ज्यादा रहता है। क्योंकि सतोगुण पुण्य कर्म से बनता है, मतलब उसमें उसके सभी अच्छे कर्मों का लेखा जोखा भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान होता है। जिसके रजोगुण का औसत ज्यादा होगा, उसके कर्म उद्यमशीलता और व्यापार आदि के ज्यादा रहेंगे। ज्यादा तमोगुण का मतलब ज्यादा पाप कर्मों का संचय। मतलब कि गुणों के रूप में सभी कर्म अपनी आधारभूत अवस्था में रहते हैं। हो सकता है कि यह व्यवस्था इतनी निपुण हो कि औसत की बजाय हर एक कर्म अलग-अलग गुण के रूप में पृथक रूप में मौजूद हो। इसकी और शास्त्र यह इशारा करते हुए लिखते हैं कि हर-एक कर्म का फल उस कर्म के अनुसार मिलकर ही रहता है।

खैर मुझे जो पवित्र दिवंगत आत्मा का अनुभव हुआ था, उसमें तो मुझे गुणों की समान और औसत अवस्था ही महसूस हुई थी। मतलब कि आत्मा एक अंधेरे आकाश की तरह महसूस हो रही थी। पर उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व नजर आ रहा था, जिस आदमी की वह दिवंगत आत्मा थी। मतलब वह मुझे मरा हुआ ही नहीं लग रहा था, बल्कि जीवित से भी ज्यादा जीवित लग रहा था। वह व्यक्ति जीवित अवस्था से भी ज्यादा नजर आ रहा था। मतलब उस आत्मा में उसके पिछले जन्मों की छाप भी थी। मतलब वह प्रलय-काल की साम्य-अवस्था वाली प्रकृति ही थी, जिसमें कोई क्षोभ पैदा नहीं हो रहा था। इस आत्मा के अनुभव का वर्णन मैंने इस ब्लॉग की कुछ पुरानी पोस्टों में विस्तार से किया है। अब आप ही बताओ कि समुद्र के निश्चल जल में और उसी जल की लहरों में क्या अंतर है, कुछ भी नहीं? इसी तरह से शरीर-स्थित आत्मा में और दिवंगत आत्मा में भी कोई अंतर नहीं है। जब गुणों और कर्मों के संयोग से उस दिवंगत आत्मा को पुनः नया शरीर मिलता है, तो फिर से उसके गुणों में क्षोभ शुरु हो जाता है, जिसे हम पुनः नई सृष्टि का आरंभ कहते हैं।

मुझे लगता है कि किसी आत्मा के साक्षत्कार के लिए उस आत्मा की इच्छा भी होनी चाहिए मिलने की और उस मिलन को कुछ निर्णायक क्षणों तक झेलने के लिए और आत्मा से बात करने के लिए आदमी में पर्याप्त मानसिक शक्ति भी होनी चाहिए। यह एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से ही संभव लगता है, साधारण से नहीं। साथ में, अपना शरीर न होने के कारण आत्मा तो कोई इच्छा जाहिर नहीं कर सकती। मतलब कि आत्मा में वह इच्छा उसकी शरीरयुक्त जीवित अवस्था में होनी चाहिए, खासकर उसके मरते समय। इसी को अंतिम इच्छा कहते हैं। इसीलिए इसको बहुत महत्त्व दिया जाता है। उसे पूरा किया जाता है और मरणासन्न व्यक्ति को उसे पूरा करने का वचन दिया जाता है, ताकि उसकी आत्मा उस इच्छा की वजह से भटके न। ये गुत्थियां धीरे-धीरे सुलझती हैं, एकदम से नहीं। मैं भी सपरिवार उन व्यक्ति से मिलने उनकी मरणासन्न अवस्था में थोड़ा देर से पहुंचा था। वे मुझसे बात करना चाहते थे, पर बोल नहीं पा रहे थे। सिर्फ छोटी सी चीख ही उनके मुंह से निकलती थी और वे फिर बेहोश से हो जाते थे। देख तो वे सकते ही नहीं थे। शायद वे कुछ सुन और समझ पा रहे थे, पर देख व बोल नहीं पा रहे थे। उसके दो तीन घंटे बाद ही उनकी आत्मा मुक्त गगन को प्रस्थान कर गई थी। अध्यात्म में बहुत कुछ है। यह तो आइसबर्ग का सिर्फ टिप मात्र है।

कुंडलिनी योग से मृत व्यक्ति भी जीवित हो सकता है

शिवपुराण में एक सुधर्मा ब्राह्मण की कथा आती है। वह संतुष्ट, प्रसन्न और अद्वैत भाव में स्थित रहता था। उसकी सुदेहा नाम की एक शिवधर्मपरायण पतिव्रता पत्नि थी। उनकी उम्र काफी बीत गई पर उनके कोई पुत्र नहीं हुआ। फिर भी तत्त्ववेत्ता सुधर्मा को जरा भी दुख नहीं हुआ। पर उसकी पत्नि को पुत्र न होने का बड़ा दुख था। वह अपने पति से पुत्र के लिए प्रयत्न करने को कहा करती। फिर सुधर्मा उसे डांटकर समझाते कि पुत्र क्या करेगा। कौन किसकी माता तथा कौन पिता है, कौन पुत्र है और कौन भाई या मित्र है। सभी स्वार्थ का ही साधन करने वाले हैं। एक बार किसी पड़ोसी औरत ने सुदेहा को पुत्र न होने का ताना देते हुए बहुत धिक्कारा। वह फिर अपने पति से शिकायत करने लगी। उसने उसे बहुत समझाया पर जब वह फिर भी नहीं समझी तो उसने उसके सामने दो पुष्प रखे और उसे उनमें से एक पुष्प उठाने को कहा। सुदेहा ने वह पुष्प उठाया जिस पर ब्राह्मण ने पुत्र न होना सोचा था। फिर भी वह न मानी और पुत्र के बिना आत्महत्या की धमकी दे दी। तब सुदेहा अपनी सगी बहन घुश्मा को लेकर आई और अपने पति को उससे पुत्र के लिए विवाह करने को कहा। सुधर्मा ने उसे समझाया कि वह उसके पुत्रवती होने पर उससे ईर्ष्या करने लगेगी, जिससे उसे दुख होगा। उस पर घुश्मा ने कहा कि वह अपनी सगी बहन से कैसे ईर्ष्या कर सकती थी। घुश्मा प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव लिंगों का निर्माण, पूजन और विसर्जन करती थी। इस तरह जब एक लाख लिंगों की संख्या पूरी हुई तो उसे सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ। सुधर्मा उसे देखकर बहुत खुश हुआ और आसक्तिरहित होकर सुखभोग करने लगा। उसके बाद तो सुदेहा घुश्मा से बहुत ईर्ष्या करने लगी। सभी संबंधी घुश्मा का सम्मान करने लगे। हालांकि सुधर्मा तब भी सुदेहा को अधिक सम्मान और प्रेम देता था, पर उसके मन में कपट था। घुश्मा के बेटे का विवाह भी हो गया। जलती भुनती सुदेहा से एक दिन रहा न गया। उसने अपनी पत्नि के साथ सोए सौतेले पुत्र को मारकर उसके शरीर को खंडखंड करके उन खंडों को नदी में बहा दिया। संयोग से उसी स्थान पर ही सुदेहा भी पार्थिव लिंगों का विसर्जन करती थी। जब पुत्रवधु ने सुबह उठकर खून के छींटे और पति के शरीर के टुकड़े शैय्या पर बिखरे देखे तो रो पड़ी। सुदेहा भी नाटक करते हुए रोने लगी। पर घुश्मा ने जरा भी दुख नहीं किया और पार्थिव पूजन के व्रत में लगी रही। उसके पति ने भी कोई ध्यान नहीं दिया, जब तक शिवलिंग पूजन पूरा नहीं हुआ। वह स्थिरचित्त होकर शिव का नाम लेते हुए पार्थिव शिवलिंगों को बहाने गई और जब वह मुड़ लौटने लगी तो उसने उस सरोवर के तट पर अपने पुत्र को देखा। घुश्मा अपने पुत्र को जीवित देखकर भी ज्यादा खुश नहीं हुई, जैसे कि वह उसके मरने पर दुखी भी नहीं थी, पर यथावत शिवजी के ध्यान में तत्पर रही। उसी समय वहां से संतुष्ट हुए ज्योतिस्वरूप सदाशिव प्रकट हो गए और घुश्मा से वर मांगने को कहा। तब उसने अपनी बहन सुदेहा की रक्षा का वर मांगा। शिव ने जब इस पर आश्चर्य प्रकट किया तो घुश्मा ने कहा कि जो अपकार करने वाले का भी उपकार करता है, उसके दर्शन मात्र से ही सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। तब शिव ने इससे खुश होकर अन्य वर मांगने को कहा। तब घुश्मा ने शिव को हमेशा अपने पास रहने को कहा। इस पर शिव वहां पर घुश्मेश्वर लिंग नाम से स्थित हो गए। पुत्र को जीवित देखकर सुदेहा लज्जित हो गई और दोनों से क्षमा मांगकर अपने पाप को नष्ट करने वाले व्रत का आचरण करने लगी।

घुश्मेश्वर लिंग कथा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

इस कथा के रूप में कर्मयोग, अनासक्ति और अद्वैतभाव की महिमा का वर्णन हुआ है। घुश्मा को पुत्र देखकर भी ज्यादा खुशी नहीं हुई। मतलब किसी अन्य व्यक्ति के लाभ की खुशी तो कर्मयोगी को भी होती है, पर ज्यादा नहीं, मतलब इतनी नहीं कि उसके प्रति आसक्ति ही हो जाए। अपने मृत पुत्र को देखकर घुश्मा को जरा भी दुख नहीं हुआ। जो जाना था, वह तो चला गया। उसके लिए दुख करने का क्या फायदा था। अपने लिए जरा भी दुख नहीं हुआ, मतलब कर्मयोगी अपने लिए दुख को जरा भी नहीं मानता। शायद अपने लिए खुशी को भी नहीं मानता। अपने जीवित पुत्र को देखकर जो उसे थोड़ी खुशी हुई, वह उसके लिए हुई होगी, अपने लिए नहीं। अद्वैतभाव में रहने पर खुद ही इष्ट पर ध्यान लगने लगता है। इसीको ऐसा कहा है कि वह अपने पुत्र को जीवित देखकर खुश नहीं हुई, पर शिवजी के ध्यान में तत्पर रही। संबंध न्याय से तो इष्ट के ध्यान से अद्वैतभाव पैदा होना चाहिए शायद यही हुआ हो। कुंडलिनी ध्यानयोग से आध्यात्मिक गुण पैदा होने के पीछे यही सिद्धांत कारण है। मृत व्यक्ति कभी जीवित नहीं हो सकता। वह जो उसे अपना मृत पुत्र दिखाई दिया, वह उसकी शिवसाधना के प्रभाव से उसका प्रगाढ़ ध्यान लगने के कारण उसे अपने मन में ही दिखाई दिया। तभी उसे शिव भी नजर आए, मतलब उस ध्यान से वह जागृत भी गई। अगर सचमुच उसका पुत्र जीवित हो गया होता तो सुदेहा तप करके प्रायश्चित क्यों करती, क्योंकि तब तो उसके पुत्र के जीवित होने से उसको मारने का पाप खुद ही नष्ट हो जाता। कहानी अप्रत्यक्ष रूप से बताती है कि सुदेहा द्वारा घुश्मा की ध्यानसिद्ध कल्पना में उसके द्वारा मारे गए उसके बेटे को देखे जाने से उसे बार-बार अपना वह पाप याद आया जिसने उसे तपस्या करने के लिए प्रेरित किया। इस तरह की सौतनों पर बहुत सी फिल्में बनी हैं। एक पंजाबी फिल्म सौंकण सौंकने तो हूबहू यही कथा लगती है। यही अंतर है कि उसमें सौतन कुछ नुकसान होने से पहले खुद ही अलग होकर अपने मायके चली गई। रही बात अपकार करने वाले को माफ करने की, तो ऐसे उदाहरणों से वेदपुराण भरे पड़े हैं। शायद हिंदु धर्म इसीलिए सबसे सहिष्णु कौम है। पर कई कौमों ने इसका नाजायज फायदा भी उठाया। कहते हैं कि यदि पृथ्वीराज चौहान मुहम्मद गौरी को तराईं के युद्ध में माफ न करता तो भारत सैंकड़ों सालों के लिए मुगलों का गुलाम सा न बनता। गुलामी की झलक तो आज तक दिखती है किसी न किसी रूप में। सबको पता है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून और समान नागरिक संहिता को लागू करने में कौन सी कौमें सबसे ज्यादा अड़चन पैदा कर सकती हैं। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। अब म्यांमार के बौद्ध संत विराथू को ही लें। उनकी यह बात सोशल मीडिया पर बड़ी चली थी कि प्यार और सहिष्णुता तो ठीक है पर आप पागल कुत्ते की बगल में तो नहीं ही सो सकते। खैर यह पुराण पर आधारित बात चल पड़ी, इसका कोई पृथक उद्देश्य नहीं। कुल मिलाकर अतिवाद हर जगह हानिकारक होता है। मतलब कि दूसरे को माफ करना बेशक बहुत पुण्यदायक है, पर अगर सामने वाला जान लेने पर ही उतारू है, तो उस पुण्य का क्या करोगे, क्योंकि सबकुछ शरीर पर ही निर्भर है। वैसे भगवान शिव इस अतिवाद के खिलाफ ही लगते हैं, क्योंकि वे लगभग हर जगह ऐसे अति सहिष्णु वरदान पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। अगर ऐसा वर मांगना स्वाभाविक होता या बिल्कुल ठीक होता तो उन्हें आश्चर्य नहीं होना था। वैसे वे इस पर बहुत प्रसन्न भी होते थे। मतलब कि सहिष्णुता और अति सहिष्णुता को विभाजित करने वाली रेखा बहुत पतली है, और मौके के अनुसार ही प्रतिक्रिया होनी चाहिए। मुझे लगता है कि घुश्मा, अत्रि आदि लोग महान शिवभक्त होते थे जिन्होंने शिवलिंग की सहायता से जागृति प्राप्त की। उन्हीं को सम्मान देने के लिए ही उनके निवास स्थानों पर उनके नामों से स्थायी शिवलिंग बनाकर वहां तीर्थों के निर्माण कर दिए होंगे ताकि लोगों को उनसे प्रेरणा मिलती रहे। भौतिक वैज्ञानिकों को भी जब ऐसा श्रेय दिया जाता है तो आध्यात्मिक वैज्ञानिकों को क्यों नहीं। यही घुश्मेश्वर लिंग, अत्रीश्वर लिंग आदि के पीछे का कारण नजर आता है। इस कथा से एक अंदाजा यह भी लगता है कि किसी को मरणोपरांत याद करने से उसे परलोक में लाभ मिलता है। हो सकता है कि जब तीव्र ध्यान से घुश्मा ने अपने पुत्र को जीवित देखा तो वह सूक्ष्म रूप से जीवित हो गया हो, बेशक किसी को न दिखता हो। इसीलिए बहुत सी संस्कृतियों में हर वर्ष मृत संबंधियों को याद करते हुए उनकी पूजा करने की परंपरा है। शायद वह पुनर्जीवित आत्मा उसका ध्यान करने वाली आत्मा के नजदीक सूक्ष्म रूप में बस जाती है, और उसके द्वारा किए जा रहे कर्मों को करती है, उसके द्वारा भोगे जा रहे फलों को भोगती है, और उसके साथ ही मुक्त भी हो जाती है। शायद यह ऐसा ही संबंध होता है जैसा एक मां और उसके पेट में पल रहे बच्चे के बीच में होता है। कई बार जब कोई बुरी आत्मा किसी के शरीर में डेरा डालती है तो उससे गलत काम भी करवाती है। फिर उसे तांत्रिकों की सहायता से भगाना भी पड़ता है। इसीलिए बुरी संगति से बचने को कहा जाता है। अच्छी आत्माएं किसी के शरीर में ज्यादा दखलंदाजी नहीं करती क्योंकि वे अपनी मर्यादाएं समझती हैं, हालांकि मौका पड़ने पर सही रास्ते पर लगाती भी रहती हैं। इसलिए उन्हें भगाने की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें तो बुलाकर किया जाता है, जैसे कि देवताओं का इन्वोकेशन अर्थात आह्वान। वैसे भी इस अजूबों से भरी दुनिया में क्या कुछ अजीब नहीं घट सकता।

कुंडलिनी जागरण से ही समुद्र में छिपे हुए राक्षसों और भूतप्रेतों का समूल नाश संभव है

दोस्तो, शिवपुराण में एक कथा आती है कि पार्वती के वरदान से अंहकार में डूबी हुई दारुका नाम की एक राक्षसी थी। उसका पति दारुक भी महाबलवान था। वह अनेक राक्षसों को साथ लेकर सत्पुरुषों को दुख दिया करती थी। पश्चिम सागर के तट पर उसका एक वन था, जो सर्वसमृद्धिसंपन्न था। दारूकी ने उसकी देखरेख का भार अपने पति दारुक को दिया हुआ था। लोगों ने ऋषिमुनियों से उन्हें भगाने की प्रार्थना की। तो ऋषियों ने कहा कि अगर ये राक्षस पृथ्वी पर प्राणियों का वध करते रहेंगे और यज्ञ का विध्वंस करते रहेंगे तो खुद भी मर जाएंगे। शाप को सुनकर मौके का फायदा उठाते हुए देवता उनसे युद्ध करने लगे। शाप के डर से राक्षसों ने सोचा कि अगर वे युद्ध करेंगे तो भी मारे जाएंगे, और न करें तो खाएंगे क्या, तब भी मारे जाएंगे। तब दारुक ने पार्वती द्वारा प्रदान किए गए उस वर को याद किया कि वह अपने वन और परिजनों के साथ जहां चाहे वहां जा सकती है। राक्षसों की सलाह से वह संपूर्ण वन को उड़ाकर समुद्र के बीच में पानी पर चली गई। उस घटना को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे पर्वत पंख लगा कर आसमान में उड़ रहे हों। और्व मुनि के शाप के भय से वे राक्षस भूमि पर नहीं आते थे। बल्कि जल में ही घूमते रहते थे। वे नावों पर बैठे मनुष्यों को अपने नगर में लाकर जेल में डालते और किसी किसी को मार भी देते थे। वे वहां रहकर भी किसी न किसी तरह से लोगों को पीड़ा देते ही रहते थे। जैसे लोगों को पहले उनके स्थल पर रहने पर भय बना रहता था, वैसे ही अब उनके जल में रहने पर भी बना रहने लगा। एक बार वह राक्षसी जल में स्थित अपने नगर से निकल कर लोगों को पीड़ा देने के लिए पृथ्वी पर जाने का मार्ग रोककर स्थित हो गई। उसी समय वहां चारों ओर से मनुष्यों से भरी हुईं बहुत सी सुंदर नावें आईं। उससे खुश हो राक्षसों ने जल्दी ही उनको पकड़ लिया। उन्हें पक्की जंजीरों में बांधकर जेल में डाल दिया। वहां उनको राक्षसों की फटकार भी पड़ती रहती थी, जिससे वे दुखी रहते थे। उन लोगों में सुप्रिय नाम का शिवभक्त शिवपूजन करता रहता था, और अन्य सभी लोगों को भी सिखाकर उनसे करवाता था। शिव भी उसकी चढ़ाई सामग्री को प्रत्यक्ष ग्रहण करते थे, पर यह बात वैश्य को भी पता नहीं थी। एकदिन दारुक राक्षस के सेवक ने वैश्य के समक्ष शिवजी को प्रत्यक्ष देखा। दारुक ने वैश्य से पूछा तो उसने पता होने से इंकार कर दिया। दारुक ने उसे मरवाने का हुक्म दिया। जब राक्षस उसे मारने दौड़े तो वह लगातार शिवकीर्तन करने लगा। इससे चारों ओर दरवाजों वाले उत्तम मंदिर के साथ शिव उस गड्ढे मतलब कैदखाने से प्रकट हुए। शिव ने वैश्य को पाशुपत अस्त्र देकर सब राक्षसों को मार दिया। फिर वरदान दिया कि इस वन में चारों वर्णों के धर्म नित्य स्थिर रहेंगे और यहां शिवभक्त ही होंगे, तमोगुणी कभी नहीं होंगे। इससे दुखी दारुकी पार्वती के पास रोती हुई चली गई। पार्वती ने उन राक्षसों की रक्षा हेतु शिव से कलह किया। इससे शिव ने उनसे कहा कि फिर जो चाहे वो करो। फिर पार्वती ने शिव से कहा कि आपका वचन या वरदान युग के अंत में लागू होगा। तब तक तामसी सृष्टि बनी रहेगी। और कहा कि ये दारुकी राक्षसी मेरी शक्ति है, सभी राक्षसियों में बलिष्ठ है, यह राक्षसों पर राज करे। ये राक्षसों की पत्नियां यहां अपने पुत्रों को उत्पन्न करेंगी। ये सब मिलकर इस वन में मेरी आज्ञा से निवास करेंगी। तब शिव ने कहा कि इस वन में अपने भक्तों की रक्षा के लिए मैं भी निवास करूंगा। यहां पर जो अपने वर्णोचित धर्म में स्थित होकर प्रेमपूर्वक मेरा दर्शन करेगा, वह चक्रवर्ती राजा होगा। फिर कलियुग के बीतने पर सत्ययुग प्रारंभ होने पर अपनी बड़ी सेना के साथ जो वीरसेन नामक प्रसिद्ध राजा होगा, वह मेरी भक्ति से अति पराक्रमी होगा, और यहां आकर मेरा दर्शन करेगा, और उसके फलस्वरूप चक्रवर्ती राजा बनेगा। इस प्रकार लीलाधारी शिव और पार्वती हासविलास करते हुए वहीं स्थित हो गए। शिव नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से और पार्वती नागेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हुई।

मिथक कथा का अनुसंधानात्मक विश्लेषण

दारुक राक्षस अहंकार है। उसकी पत्नि दारुका राक्षसी बुद्धि है। उससे बहुत से विचार पैदा होते हैं। वे ही इन दोनों की राक्षस संतानें हैं। ये आदमी को इधर उधर भटकाते रहते हैं, उन्हें चिंता में डालते हैं, उनमें भय आदि अनेक दोष पैदा करते हैं। कई तो इन दोषाें के कारण मर भी जाते हैं। पश्चिम दिशा शरीर का पिछला हिस्सा है। वन बालों से भरे हुए मास्तिष्क क्षेत्र को कहा है, जो शरीर की पिछली तरफ ज्यादा फैला होता है। सागर मूलाधार क्षेत्र है क्योंकि दोनों ही सबसे नीची जगह पर स्थित होते हैं। यह मानसिक जंजाल मस्तिष्क में ही फैला होता है। अंहकार ही शरीर समेत इसकी भी रक्षा करता है। लोग इस जंजाल की शांति के लिए गुरुओं और ऋषियों के पास जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि यदि मानसिक जंजाल लोगों को ऐसे ही भटकाता रहा तो वे काम कैसे कर पाएंगे। और अगर वे काम नहीं करेंगे तो कमाएंगे क्या और खाएंगे क्या। इससे शिकार बने लोगों के ही न रहने से शिकारी बना यह मनोजंजाल भी किसे परेशान करके खाएगा। इससे आश्वस्त होकर लोग इस मानसिक जंजाल को काबू में रख कर अपने अपने काम में लग जाते हैं। इसको ऐसा कहा है कि मौका जानकर देवताओं ने उनसे युद्ध छेड़ दिया, क्योंकि देवताओं के रूप में स्थित इंद्रियों से ही लोग कामकाज कर पाते हैं। अगर यह मानसिक जंजाल योग की मानसिकता से फिर प्रकट होता रहता है, तो इसके प्रति खुद ही साक्षीभाव बना रहता है, क्योंकि लोग अपने कामों में व्यस्त होते हैं। इससे यह नष्ट हो जाएगा। अगर न प्रकट होता रहे, तो अपनी सत्ता को कैसे कायम रखे, मतलब जिंदा कैसे रहे। इसको ऐसे कहा गया है कि अगर राक्षस देवताओं से युद्ध करें, तो भी मारे जाएंगे, और अगर न करें, तो खाएंगे क्या, इसलिए तब भी मारे जाएंगे। मतलब लोगों की परेशानी ही उनका भोजन है, और उससे बढ़ने वाला अज्ञान का अंधेरा ही उनकी बढ़ी हुई सेहत है। इसलिए मानसिक जंजाल सूक्ष्म या अव्यक्त या अवचेतन रूप में आकर छुप सा जाता है। एक प्रकार से यह मूलाधार रूपी अंधेरे समुद्र में छुप जाता है। समुद्र के बीच में, गहराई में अंदर अंधेरा ही होता है, क्योंकि वहां तक प्रकाश की किरण नहीं पहुंच पाती। जो भी आदमी जिंदगी से थक कर या परेशान होकर अवसाद में आ जाता है, वह एक प्रकार से मूलाधार रूपी समुद्र में नौका विहार करता है, यह सोचकर कि यहां पर दुनियादारी के जमीनी झमेले नहीं हैं। थोड़े समय तो उसे सुकून मिलता है, पर फिर वह अंधेरे अवचेतन मन की गिरफ्त में आ जाता है। हो सकता है कि किसी गरीबी, दुर्भिक्ष, महामारी, राजनैतिक या भौगोलिक संकट के दौर में बहुत से लोग सामूहिक रूप से परेशानी और अवसाद की चपेट में आ गए हों। इसे ही बहुत से लोगों का एकसाथ नौकाओं से समुद्र में उतरना कहा गया हो। अवचेतन मन की अमनस्कता से अनुभव होने वाला अंधेरा उन राक्षसों के द्वारा उसे अंधेरी जेल की कोठरी में डालना है। अंधेरे के रूप में ही वे राक्षस उसे परेशान करते हैं। अवचेतन मन में दबे हुए पुराने किए हुए कुकर्म जब गुस्से से भरे जीवों या मनुष्यों के रूप में महसूस होते हैं, शायद इसे ही राक्षसों द्वारा उन लोगों को फटकारना कहा गया हो। कईयों को मार देते हैं, मतलब कई लोग अवसाद से बीमार होकर मर जाते हैं, और कई आत्महत्या कर लेते हैं। कोई शिवभक्त उस अंधेरी अवस्था में मूलाधार पर कुंडलिनी का ध्यान करता है। उसके सत्संग से अन्य लोगों को भी लाभ मिलता है। जितना ज्यादा अंधेरा उस अवचेतन मन रूपी अंधेरी कोठरी में होता है, कुंडलिनी भी उतनी ही ज्यादा चमकती है। शायद इसी को ऐसा कहा गया है कि एक राक्षस ने भगवान शिव को प्रत्यक्ष देखा। अंधेरा रूपी जगत योगी को साधना से रोकता है। इससे उसके मन में न जगत का क्योंकि वह पहले ही जगत को छोड़ चुका है, और न ही साधना का, कहीं का भी प्रकाश नहीं बचा रहता। यह अवस्था मृत्यु के समान ही है। शायद इसे ही ऐसा कहा गया है कि दारुक रूपी लोगों के अहंकार ने राक्षसों रूपी सांसारिक विचारों और वस्तुओं के माध्यम से वैश्य को मरवाने का हुक्म दिया। इससे साधक जगत के डर के मारे या खुंदक में आकर अपनी साधना को और तेज बढ़ाता है, और अपनी कुंडलिनी को जागृत कर लेता है। शायद इसी को ऐसा कहा है कि उन राक्षसों के डर से वह वैश्य लगातार और जोर जोर से शिवकीर्तन करने लगा। फिर चार दरवाजों वाला मंदिर प्रकट होता है, और उसमें शिव विराजमान होते हैं। मूलाधार चक्र की भी चार पंखुड़ियां होती हैं। कुंडलिनी जागरण ही शिव का प्रत्यक्ष होना है। वह मानसिक जंजाल रूपी राक्षसों को ख़त्म करता है। दरअसल अवचेतन मन आत्मा के अंधकार के रूप में आत्मा से चिपका होता है। जब आत्मा में प्रकाश पैदा हो जाता है, तो वह खुद नष्ट हो जाता है।

पार्वती प्रकृति रूपा है। वह तो संसार का विस्तार चाहती है, जो तमोगुण के बिना संभव नहीं। दारुकी रूपी बुद्धि उनकी शक्ति है। मतलब बुद्धि से ही संसार का विस्तार होता है। बुद्धि ही सबसे बलशाली इंद्रिय है। वह अंहकार रूपी जीव को पति अर्थात अपना रक्षक बनाकर बहुत से राक्षस रूपी विचारों को पैदा करती है। जो विचार हैं, वे हस्तपाद आदि इंद्रियों से विवाह करके मतलब उनसे मिलकर व उनके सहयोग से किस्म किस्म की सांसारिक वस्तुएं पैदा करते हैं। वे सभी वस्तुएं ही उन राक्षसों और राक्षसियों के पुत्र कहे गए हैं। ये सभी रहते उसी वन रूपी मास्तिष्क में जो सूक्ष्मरूप में मूलाधार में जाकर बस जाता है। दुनियावी वस्तुएं बेशक बाहर लगें देखने में, पर सभी मस्तिष्क में ही होती हैं। उनको वहां रहने की आज्ञा बुद्धि से ही मिलती है, क्योंकि अगर वह चाहे तो वह योग आदि से उन सबको बाहर भी निकलवा सकती है। शिवलिंग, शिवमंदिर और शिवमूर्ति भी इसी वन का हिस्सा हैं, जो भक्तों की रक्षा करते हैं। जो आदमी वर्णोचित धर्म मतलब कर्मयोग का पालन करेगा और उससे उत्पन्न शक्ति से शिवरूपी कुंडलिनी से प्रेम करके उसे जागृत करेगा मतलब शिव के दर्शन करेगा, वह चक्रवर्ती राजा होगा, मतलब ऐसा जीवात्मा होगा जिसके सभी चक्र जागृत या क्रियाशील होंगे। कलियुग, सतयुग ये सब आदमी की अवस्थाएं हैं। कलियुग अवस्था मतलब आदमी की प्रतिस्पर्धा और भौतिकता से भरी दुनियादारी वाली अवस्था। जब तक यह अवस्था है, तब तक तो मन के दोष रहेंगे ही। जब आदमी विकसित होकर सत्ययुग वाली अवस्था में, मतलब आध्यात्मिक साधना वाली अवस्था में प्रवेश करता है, तब वह पराक्रमी योद्धा की तरह इन दोषों का वध करता है। ऐसा शिव की शक्ति से मतलब शिव के ध्यान से होता है। उससे उसको कुंडलिनी जागरण मतलब शिवदर्शन मिलता है, जो चक्रवर्ती राजा जैसी अवस्था है। क्योंकि मूलाधार चक्र कुंडलिनी शक्ति और सुषुम्ना नाड़ी सर्प से जोड़ी गई हैं, इसलिए मूलाधार में स्थित लिंग का नाम नागेश्वर और उससे जुड़ी शक्ति का नाम नागेश्वरी है। इससे जुड़ी वीरसेन राजा की रहस्यात्मक कथा क्या है, उसका वर्णन अगली पोस्ट में करेंगे।

शुभ दशहरा और राक्षस रावण दहन

कुंडलिनीयोगानुसार ओम ॐ ही वह सिंगुलेरटी है जिसमें ब्लैकहोल समा जाता है

ब्लैकहोल में जो भी पदार्थ रूपी सूचना जाती है, वह नष्ट या अज्ञात रूप में रहती है। उसी तरह आदमी का अवचेतन मन भी उसकी सभी विचाररूपी सूचना को अनादिकाल से लेकर अपने अंदर नष्ट रूप में संजोकर रखता है। जब उन विचारों को साक्षीभाव साधना आदि से प्रकट या अभिव्यक्त रूप में वापिस लाया जाता है, तब वे धीरे धीरे ढीले होकर परमात्मा में विलीन होने लगते हैं। जब सभी विचार विलीन हो जाते हैं, तो जीवात्मा या सूक्ष्मश्रीर मुक्त हो जाता है। संभवतः ब्लैकहोल से भी इसी तरह बारबार स्थूल सृष्टि बनते रहने से वे सूचनाएं ढीली होती रहती हैं और अंत में महाकाश रूपी परमात्मा से एकाकार हो जाती हैं और पुनः कभी वापिस नहीं आतीं। मतलब ब्लैकहोल मुक्त हो जाता है। यहां एक पेच है। बारबार स्थूल सृष्टि बनने से ब्लैकहोल मुक्त नहीं होता, जैसे आदमी बारबार जन्म लेने से खुद मुक्त नहीं हो जाता। जब ब्लैकहोल से सूचनाएं सूक्ष्मरूप में लगातार बाहर निकलती रहती हैं, उन्हीं के रूप में वह महाकाश में विलीन होता है, सीधा नहीं। संभवतः वे सूक्ष्म सूचनाएं ही हॉकिंस रेडिएशन हैं, जिनके रूप में कभी पूरा ब्लैकहोल विलीन हो जाएगा। बेशक इसमें बहुत ज्यादा समय लगता है। जीव की मुक्ति में भी कम समय कहां लगता है। ब्लैकहोल से हॉकिंस रेडिएशन भी निकलती रहती हैं, और वह साथसाथ में नई सृष्टि भी बनाता रहता है, बेशक नई सृष्टियों का आकार धीरे धीरे घटता जाता है। इसी तरह आदमी की साक्षीभाव साधना भी कम या ज्यादा रूप में चलती रहती है, और साथसाथ में उसके नए नए जन्म भी होते रहते हैं, बेशक आगे आगे के जन्म में मन के विचारों का शोर कम होता जाता है, अहंकार घटता जाता है।
विज्ञान कहता है कि ब्लैकहोल के अंदर जितना पदार्थ घुसता जाएगा, उसका गुरुत्व बल उतना ही बढ़ता जाएगा, और उसके बाहर की एकरीशन डिस्क उतनी ही मोटी होती जाएगी। पहले मैंने सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जब नया अनंत आकाश बन गया, तब तो उसमें घुसे हुए पदार्थ अनंत आकाश में फैल जाने चाहिए, और उनका प्रभाव एकरीशन डिस्क पर नहीं पड़ना चाहिए। साथ में, जब एकबार मूल अनंत आकाश में अनंत गड्ढा बन गया, तब अंदर और पदार्थ घुसने से वह गड्ढा और ज्यादा कैसे बढ़ सकता है, क्योंकि अनंत से बड़ा तो कुछ भी नहीं है। और ग्रेविटी बढ़ने का मतलब ही अंतरिक्ष में गड्ढे की गहराई बढ़ने से है वास्तव में। पर मुझे इसका हल जीवात्मा से इसकी तुलना करने पर मिला। जब पहली बार जीवात्मा रूपी व्यष्टि-अनन्ताकाश बनता है, तो वह नए बने ब्लैकहोल की तरह  होता है। पहली बात, जीवात्मा कैसे बनता है। जब किसी सबसे छोटे जीव में मन का पहला विचार बनता है, तो चिदाकाश अर्थात परमाकाश परमात्मा उसे अपने अंदर महसूस करता है। उस विचार की तरफ़ आसक्त होकर वह तुरंत अपने परमाकाश या महाकाश रूप को भूल जाता है। रहता वह महाकाश ही है, पर भ्रम से अपने परम सत्ता, ज्ञान (सत्य ज्ञान) और आनंद को काफी हद तक भूल जाता है। यह महाकाश के अंदर जीवाकाश की उत्पत्ति हो गई। हालांकि महाकाश परमात्मा बिना परिवर्तन का, वैसा ही, अपने मूलरूप में रहता है। मतलब यह परमात्मा के अंदर जीवात्मा की उत्पत्ति हो गई। अब ब्लैकहोल पर आते हैं। मूलाकाश के अंदर किसी बड़े तारे का ईंधन खत्म हो गया। तो उसके अंदर की तरफ़ के गुरुत्व बल का मुकाबला करने के लिए बाहर की तरफ़ का गर्म गैसों का बल नहीं रहता। इससे वह अपने भीतर ही भीतर लगातार सिकुड़ कर सबसे छोटे संभावित रूप तक पहुंच जाता है। मुझे तो लगता है कि वह रूप मन का सबसे सूक्ष्म विचार ही है। क्योंकि उसके सामने तो प्रोटोन, इलेक्ट्रॉन आदि मूलकण भी स्थूल ही है। सबसे छोटा विचार ॐ की मानसिक आवाज है। इसका प्रमाण यह है कि इसके साथ आत्मा को अपने पूर्ण रूप का सबसे कम भ्रम पैदा होता है। यहां तक कि भ्रम खत्म भी होने लगता है। इसीलिए ब्रह्मज्ञानी व पूर्ण योगियों के मुंह से ॐ का उच्चारण अनायास ही होता रहता है। दूसरे विचार तो जितना बढ़ते रहते हैं, भ्रम भी उतना ही बढ़ता रहता है। तो सबसे छोटी चीज ओम ध्वनि हुई। जीवात्मा की उत्पत्ति भी संभवतः ॐ से ही होती है, क्योंकि यत्पिंडे तत् ब्रह्मांडे। स्थूल वस्तु आकाश में छेद नहीं कर सकती। अगर ऐसा होता तो हरेक पत्थर एक अलग जीव या जीवात्मा होता, हरेक मूलकण जिंदा होता, और अपना अलग से अनंत आकाश वाला पृथक अस्तित्व महसूस करता। पर ऐसा नहीं होता। केवल मन का विचार ही आकाश में छेद कर सकता है। इसीलिए जितने शरीर अर्थात मस्तिष्क या मन हैं, उतने ही अनंताकाश रूपी जीव हैं। इसीलिए नया ब्रह्मांड बनाने के लिए मन की जरूरत पड़ती है, क्योंकि वह तभी बनेगा जब आकाश में छेद होगा। ॐ वही सूक्ष्मतम मन है। इसीलिए कहते हैं कि ईश्वर या ब्रह्मा के संकल्प या विचार से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। तारे से बने ओम से उसके दायरे का मूलाकाश अपना मूलरूप भूलकर नया ही पूर्ण आकाश बन जाता है। हालांकि मूलाकाश वैसा ही रहता है। इसीको विज्ञान की भाषा में कहा गया है कि तारे से बनी सिंगुलरिटी से अंतरिक्ष में अनंत गहराई का गड्ढा बन जाता है। शायद ॐ को ही विज्ञान में सिंगुलरिटी कहा गया है, क्योंकि पता ही नहीं कि वह क्या है। बस यह अंदाजा लगाया है कि वह सबसे छोटी चीज है। सम्भवतः हमने सिद्ध कर दिया कि वह सबसे छोटी चीज ॐ ही है। फिर कहते हैं कि उसी सिंगुलरीटी में विस्फोट से सृष्टि का निर्माण फैलने लगता है। शास्त्रों में भी यही कहा है कि ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इस सबसे यह अर्थ भी निकलता है कि एक छोटे से विचार में भी सैंकड़ों सूर्यों के बराबर द्रव्यमान समाया हुआ है, इसी वजह से तो वह मूल आकाश की त्रिआयामी चादर में इतना बड़ा गड्ढा कर देता है कि एक नया ही आकाश बन जाता है, मतलब एक नया स्वतंत्र जीव रूपी नया स्वतंत्र ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आ जाता है। पर यह आश्चर्य की बात है कि ब्रह्माण्ड की रचना कर सकने वाला जीव कैसे दयनीय, और परतंत्र सा बना रहता है। तो अगर कल को वार्प ड्राइव बनी, तो वह ऐसी ही कोई ॐ मशीन होगी, जो आकाश को जितना चाहे मोड़कर अन्तरिक्ष की सैर करवाएगी। हो सकता है कि एलियंस ऐसी ही मशीन की सहायता से धरती पर आते हों। तथाकथित यूएफओ क्रैश के बाद एलियन से साक्षात्कार के मामले से जुड़े लोग दावा करते हैं कि एलियंस के पास आध्यात्मिक तकनीकें होती हैं, और वे योगी की तरह अपने असली रूप को अच्छे से पहचानते हैं। उनके लिए धरती की मानव सभ्यता एक बंदरों की सभ्यता की तरह है। फिर
उत्पत्ति के बाद जीवात्मा अपना दायरा बढ़ाता है। वह आंख, कान आदि विभिन्न इंद्रियों से सूचनाएं ग्रहण करता रहता है, और बढ़ता रहता है। यह ऐसे ही है जैसे ब्लैकहोल बाहर के पदार्थ निगलता रहता है, और अपना द्रव्यमान बढ़ाता रहता है। जीवात्मा जितना महान होता है, उसके प्रभाव का दायरा भी उतना ही बड़ा होता है। जहां कीड़ों मकोड़ों का दायरा कुछ इंच या फीट तक होता है, वहीं महापुरुषों के मन के अंदर इतनी ज्यादा सूचनाएं होती हैं कि उनके प्रभाव का दायरा पूरे राष्ट्र या विश्व तक फैला होता है। पूरी दुनिया से लोग उनकी तरफ़ खिंचे चले आते हैं। उनके प्रभाव के दायरे की तुलना ब्लैकहोल की इकरीशन डिस्क से की जा सकती है।
ओम से सृष्टि बनती रहती है और उसमें समाती भी रहती है। कभी केवल एक तारे की जगह पूरी सृष्टि का द्रव्यमान सिकुड़कर ॐ के अंदर समा जाएगा। इसे परम ब्लैकहोल का बनना कहेंगे। उसे निगलने के लिए कुछ मिलेगा ही नहीं। इससे वह जल्दी ही भूखा मर जाएगा, मतलब फ़िर वह ॐ भी परमाकाश परमात्मा में समा जाएगा। इसे प्रलय कहते हैं। लंबे समय तक प्रलय बनी रहेगी। फिर सृष्टि के आरंभ में सारी पुरानी सृष्टि का द्रव्यमान समेटे हुए ॐ पुनः प्रकट हो जाएगा। उसमें बिग बैंग या महाविस्फोट होगा और सृष्टि की रचना पुनः प्रारंभ हो जाएगी। यह प्रक्रिया बारंबार दोहराई जाती रहती है।
अब कई लोग कहेंगे कि ब्लैकहोल ने तो ब्रह्मांड की तुलना में नगण्य सा ही पदार्थ निगला होता है, उससे इतना बड़ा नया ब्रह्मांड कैसे बन सकता है। पर भई अनन्त आकाश तो बन ही गया होता है। उसमें नए पदार्थ खुद भी तो बन सकते हैं। पुराने ब्रह्मांड से निगले हुए पदार्थ तो सिर्फ एक शुरुआत करते हैं। यह ऐसे ही है जैसे एक बच्चा अपने पिछले जन्म की सूचनाएं बहुत सूक्ष्म रूप में लाया होता है, जो कि पिछले पूरे जन्म की तुलना में नगण्य जितनी दिखती है। फिर वह बाहर से भी कुछ सूचनाएं इकट्ठा करता है, वह भी नगण्य जैसी ही होती हैं। अधिकांश सूचनाएं तो वह खुद अपने अंदर तैयार करता है अपनी रचनात्मकता से, अपने कर्मों से। इसी तरह सबसे पहले बनने वाले सूक्ष्म जीव में सिर्फ सूक्ष्मतम ओम विचार होता है, पर विकास करते करते वह ब्रह्मा भी बन जाता है, जिसमें पूरा ब्रह्माण्ड समाया होता है। इससे तो यह मतलब भी निकलता है कि ब्लैकहोल चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, वह बड़ा से बड़ा ब्रह्मांड बना सकता है, क्योंकि वह अनंत आकाश के रूप में अनंत आकार का बर्तन बना लेता है। और जहां बर्तन है, वहां बारिश का पानी भी इकट्ठा हो ही जाता है।

कुंडलिनी योग ही हमें या एलियंस को लंबी दूरी की इंटरस्टेलर यात्रा की तकनीक दिखा रहा है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि अन्नमय कोष को खोलने के लिए शरीर का ध्यान बहुत जरूरी है। ध्यान से पहले ज्ञान का होना जरूरी है। इसीलिए शास्त्रों में शरीर के ब्रह्माण्ड के रूप में वर्णन की बहुतायत है। साथ में, ब्रह्माण्ड का अध्यात्मिक रूप में वर्णन ज्यादा है, शरीर का कम। क्योंकि सम्भवतः उस समय शरीर की सूक्ष्मता को जाँचने वाली कोई व्यावहारिक वैज्ञानिक तकनीक नहीं थी, इसलिए यही तरीका बचता था। शरीरविज्ञान दर्शन में आधुनिक विज्ञान और पुरातन अध्यात्म ज्ञान को मिश्रित किया गया है, जिससे इससे शरीर का उत्कृष्ट तरीके से ज्ञान हो जाता है। सम्भवतः इसीलिए पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन प्रशंसा की पात्र बनी है। इसे विज्ञान से अध्यात्म में प्रवेशद्वार कह सकते हैं। पिछली कुछ पोस्टों का ज्यादा झुकाव क्वांटम भौतिकी और अंतरिक्ष विज्ञान की ओर था। हालांकि वे भी कुण्डलिनी योग विज्ञान से जुड़ी हुई थीं। ऐसा इसलिए क्योंकि आजकल अधिकांश लोग भौतिक विज्ञान को ही विज्ञान मानते हैं, अध्यात्म विज्ञान को नहीं। अध्यात्म विज्ञान से ही टेलीपोर्टेशन संभव हो सकता है। हो सकता है कि अध्यात्म विज्ञान इतना उन्नत हो जाए कि इस धरती का आदमी सूक्ष्मशरीर बन कर पूरे ब्रह्माण्ड की सैर पर निकल जाए, और कहीं किसी ग्रह पर किसी जीव के शरीर में कुछ दिन निवास करके वापिस धरती पर आ जाए। यह भी हो सकता है कि अपने बराबर उन्नत प्राणी के साथ मिलकर आपस में सूक्ष्मशरीरों को कुछ समय के लिए एक्सचेंज करें और एकदूसरे के ग्रहों पर कुछ जीवन बिता कर अपने-अपने ग्रह वापिस लौट जाएं। सूक्ष्मशरीर के माध्यम से ही अनंत ब्रह्माण्ड को लंघा जा सकता है, स्थूल शरीर से नहीं। पुराने समय में योगी लोग ऐसी यात्राएं करते भी थे। कुल मिलाकर आत्मज्ञान होने पर आदमी हर समय हर जगह स्थित हो जाता है, जो सर्वोच्च स्तर की अंतरिक्ष यात्रा ही तो है। यही टाइम ट्रेवल और स्पेस ट्रेवल का सबसे आसान और सही तरीका लगता है मुझे, बेशक जो चाहे वह भौतिक शरीर के साथ भी प्रयास कर सकता है। हो सकता है कि एलियन्स को उनसे ही धरती का पता चला है, जिसके बाद वे यूएफओ से भी यहाँ आने लग गए हों। क्रायोस्लीप, लाइट सेल, वर्महोल और वार्प ड्राइव संभावित समाधान प्रदान करते हैं। दुर्भाग्य से, ये केवल दिवास्वप्न हो सकते हैं, जिसका अर्थ होगा कि लंबी दूरी की इंटरस्टेलर यात्रा संभव नहीं है। यह मैं नहीं, बहुत से वैज्ञानिक कह रहे हैं। मतलब तांत्रिक कुण्डलिनी योग व कर्मसिद्धांत ही धरती से अन्य ग्रह पर पहुंचा सकते हैं। मनोरंजन और उत्साहवर्धन के लिए प्रत्यक्ष व सीधे तौर पर शरीर के टेलीपोर्टेशन की कल्पना भी की जा सकती है। ऐसी ही नाटकीय कल्पना “लॉस्ट इन स्पेस” नामक वेबसेरीस में की गई है। मैंने हाल ही में यह देखी। मुझे अच्छी और बाँधने वाली लगी। मैं किसीका प्रचार नहीं कर रहा, बल्कि दिल की बात बता रहा हूँ। सच्ची बात कह देनी चाहिए, उसमें अगर किसी का प्रचार होता हो तो होता रहे, हमें क्या।

कुछ बिमारियां आदमी का महामानव बनने का प्रयास लगती हैं

वैज्ञानिक तो यह दावा भी कर रहे हैं कि आदमी में जो आनुवंशिक बिमारियां हो रही हैं, वे एलियन के डीएनए की वजह से हो रही है। कभी एलियन यहाँ की औरतों को उठाकर ले गए थे और उन्हें गर्भवती करके वापिस भेज दिया था या वहाँ उनसे संतान पैदा की थी। फिर वो डीएनए सबमें फैल गया। यह आदमी को महामानव बनाने के लिए हुआ। मुझे अपना एंकोलाईसिंग स्पोंडीलोआर्थराईटिस वैसी ही फॉरेन बिमारी लगती है। यह बिमारी मुझे योग करने के लिए मजबूर करती है। इससे वैज्ञानिकों का दावा कुछ सिद्ध भी हो जाता है। मुझे तो लगता है कि प्रॉस्टेट और बवासीर भी ऐसी ही आनुवंशिक बीमारियां हैं। ये भी आदमी को योगी जैसा बनाती हैं। पुराने लोगों ने इसे ऐसे समझा होगा कि कष्ट झेलने से योग सफल होता है, इसीसे तप शब्द का प्रचलन बढ़ा होगा। आजकल कैंसर भी बढ़ रहा है। यह भी आनुवंशीकी से जुड़ा रोग होता है। हो सकता है कि यह प्रकृति के मानव को महामानव बनाने के प्रयास के दौरान पैदा हुआ डिफेक्ट हो। वैसे भी बहुत से महान योगियों को कैंसर विशेषकर गले का कैंसर हुआ है। क्वांटम और स्पेस के बारे में लिखने का दूसरा उद्देश्य था कि वैज्ञानिकों की कुछ मदद हो जाए, क्योंकि वे इन क्षेत्रों में कुछ पजल्ड और फ़्रस्टेटिड दिखाई देते हैं। अब पुनः अध्यात्म विज्ञान की तरफ लौटते हैं, क्योंकि जो मजा इसमें है, वह और कहीं नहीं है। भौतिकता से प्यास बढ़ती है, तो अध्यात्म से प्यास बुझती है। दोनों का अपना महत्त्व है। गीता में भी श्रीकृष्ण स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि “अध्यात्मविद्या विद्यानाम्“। मतलब विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ। मतलब उन्होंने अध्यात्मविद्या को सभी विद्याओं में श्रेष्ठ माना है। फिर भी जैसे-जैसे भौतिक विज्ञान की पहेलियाँ सुलझती रहेंगी, हम बीचबीच में उनका भी उल्लेख करते रहा करेंगे।

कुण्डलिनी जागरण बनाम सूक्ष्मशरीर-समाधि

दोस्तो, मैं पिछली कुछ पोस्टों में ब्लैकहोलसूक्ष्मशरीर जैसे अनुभव के बारे में बात कर रहा था। थोड़ा उसका और गहराई से अध्यात्मवैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं। मुझे लगता है कि जो चीज अनंत व शून्य अंतरिक्षरूपी आत्मा से अलग भौतिक रूप में है, चाहे कितने ही छोटे कण के रूप में है, उसे हम आत्मरूप से अनुभव नहीं कर सकते। आत्मा से आत्मा ही जुड़ सकती है, अन्य कुछ नहीं। वैसे तो आत्मा की आभासी लहर भी जुड़ सकती है, कण तो बिल्कुल नहीं। वैसे तो लहर भी नहीँ जुड़ती, केवल जुड़ी हुई दिखती है। वह असली नहीँ बल्कि आभासी होती है, जैसे बंद आँखों को खोलते हुए पलकों के बालों से आसमान में बुलबुले जैसे दिखाई देते हैं। दरअसल आसमान में कोई बुलबुले नहीँ होते। यह उदाहरण मैंने योगवासिष्ठ ग्रंथ से लिया है। कण द्वैत का प्रतीक है। वह आत्म-आकाश से अलग है, आकाश-पुष्प या आकाश-उद्यान की तरह, जैसा शास्त्र कहते हैं। आकाश में बिना किसी आधार के यकायक फूल नहीँ खिल सकता। अगर हम योग समाधि से कुण्डलिनी छवि को आत्मरूप में महसूस करें तो वह अपनी आत्मा से अभिन्न उसमें तरंग रूप से अनुभव होगी, किसी पृथक भौतिक वस्तु या कण के रूप में नहीं। जो मुझे सूक्ष्म शरीर आत्मरूप में अनुभव हुआ वह तरंगरूप नहीं था। मतलब वह वैसा नहीं था जैसी सभी भौतिक चीजें मन के विचारों के रूप में लहरदार होती हैं। मतलब उनकी सत्ता या चमक घटती-बढ़ती रहती है। वह सूक्ष्मशरीर तो एकसमान कज्जली चमक वाला अंधेरा था। फिर उसके बारे में मुझे पूरा ब्यौरा कैसे महसूस हो रहा था, उससे भी ज्यादा जितना भौतिक रूपों से मिलता है। इसका मतलब है कि उसमें सूक्ष्म तरंगें थीं, जिनका अहसास नहीं हो रहा था, पर उनमें दर्ज सभी सूचनाओं का पूरा अहसास हो रहा था। ये तरंगें क्वांटम फ्लैकचूएशन या हलचल के रूप में हो सकती हैं, जिन्हें शरीर के बिना ऊर्जा नहीं मिल रही थीं, जिससे वे स्थूल तरंगों के रूप में व्यक्त नहीं हो पा रही थीं। वे सूक्ष्म तरंगें भी स्थूल तरंगों की तरह ही थीं। इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे यदि पानी के तलाब में एक पत्थर फ़ेंकने की ऊर्जा से थोड़ी देर के लिए स्थूल तरंगें बनती हैं, तब पत्थर से मिली ऊर्जा खत्म होने के बाद भी बड़ी देर तक उसी पैटर्न की सूक्ष्म तरंगें बनती रहती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि तरंगें पेंडुलम की तरह व्यवहार करती हैं, मतलब अपनी ही अंतरंग ऊर्जा से उठती गिरती रहती हैं। फिर तो मरने के बाद आदमी के सूक्ष्मशरीर के कंपन लगातार घटते रहने चाहिए और अंततः वह कंपनरहित चिदाकाश अर्थात परमात्मा बन जाना चाहिए अर्थात आदमी खुद ही मुक्त हो जाना चाहिए। कई जगह शास्त्र भी इस ओर इशारा करते हैं कि ऐसा होता है, हालांकि ऐसा स्पष्ट नहीं कहा है, पर जिसको ज्ञान न हो या जिसने आसक्ति और द्वैत से भरा जीवन जिया हो, वह उस अँधेरे से घबराकर या उससे ऊब कर जल्दी ही अपने लिए नया शरीर चुन लेता है, और शरीर उसे अपने कंपन के अनुसार ही अच्छा या बुरा मिलता है। इसका यह मतलब भी है कि इसी तरह ब्लैकहोल की सूक्ष्म तरंगें भी समय के साथ शांत हो जाती हैं, और वह निश्चल समुद्र जैसे अनंत व शून्य अंतरिक्ष से पूरी तरह एक हो जाता है। हालांकि इसमें करोड़ों साल लग सकते हैं, क्योंकि वह पानी का नहीं बल्कि शून्य अंतरिक्ष का कंपन है। पर शास्त्र यह भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मोक्ष अपनेआप नहीं मिलता। करोड़ों-अरबों वर्षों तक जारी रहने वाले प्रलयकाल में भी कारण शरीर से आत्मा का बंधन बना रहता है। मुझे तो लगता है कि दोनों ही बातें सही हैं, समय और परिस्थिति के अनुसार, हालांकि दूसरी बात ज्यादातर मामलों में फिट बैठती होगी।

कुण्डलिनी चित्र का हम बारबार ध्यान करते हैं, इससे वह समाधि अर्थात कुण्डलिनी जागरण के रूप में आत्मा से एकाकार हो जाता है। मतलब किसी भी चीज के बारे में ध्यान करके उसको जगा कर हम उसके बारे में पूरी तरह से सबकुछ जान जाते हैं, जैसा कि शास्त्र कहते हैं। योगवासिष्ठ में कहा गया है कि वायु से योगसमाधि से जुड़ने पर वायु की सभी शक्तियाँ मिलती हैं, जैसे आसमान में उड़ना, अदृष्य होना आदि। इसी तरह अन्य पदार्थों जैसे अग्नि, जल आदि से जुड़ने से उन-उन पदार्थोँ का संपूर्ण व प्रत्यक्ष ज्ञान होने से उनकी सभी शक्तियां मिलती हैं। सम्भवतः इन्हें पंचभूत समाधि भी कहते हैं। अब इनका वैज्ञानिक विश्लेषण तो मैं इस समय नहीँ कर सकता। पर किसी के या अपने ही सूक्ष्म शरीर को जगाने के लिए हम किसका ध्यान करेंगे। सूक्ष्मशरीर का ही करेंगे। यह नहीं पता कैसे। सम्भवतः ऐसे ही जैसे भूत का किया जाता है। गीता में कहा गया है कि देव को पूजने वाले देवता बनते हैं, और भूत को पूजने वाले भूत। तो स्वाभाविक है कि सूक्ष्म शरीर का ध्यान करने वाला सूक्ष्मशरीर ही बनेगा। क्योंकि सूक्ष्मशरीर में अँधेरे का राज है, इसलिए अंधेरा व शक्ति पैदा करने वाले मांसमदिरासंभोग जैसे पंचमकारों के साथ तांत्रिक कुण्डलिनी योग से भूत या सूक्ष्मशरीर का आत्मरूप में अनुभव होता है, ऐसा मुझे लगता है। प्रेतात्माएं लोगों से सम्पर्क करके मदद लेना और देना चाहती हैं, पर इसके लिए आदमी में प्रेतात्मा की उच्च दबाव वाली ऊर्जा का आवेश झेलने की शक्ति होना जरूरी है, जो केवल समर्पित तांत्रिक कुण्डलिनी योग से ही संभव प्रतीत होता है। कुण्डलिनी चित्र यदि उस विशेष भूत या सूक्ष्मशरीर से संबंधित हो तो ध्यान ज्यादा जल्दी सफल और प्रभावशाली हो जाता है। पर ऐसा कैसे होता है, उसके लिए थोड़ा गहराई से विश्लेषण करना होगा।

मुझे एक नई अंतर्दृष्टि मिली है। उपरोक्त समाधि का अनुभव कुण्डलिनी जागरण की तरह नहीं था। मतलब उस अनुभव में मैं परमात्मा से एकाकार नहीं हुआ, बल्कि एक अन्य जीवात्मा से एकाकार हुआ। अगर मैं परमात्मा से एकाकार हुआ होता, तो कुण्डलिनी जागरण की तरह अनंत प्रकाश, आकाश व आनंद से कुछ क्षणों के लिए सम्पन्न हो जाता। साथ में मन-मस्तिष्क में सुहाने विचार, सागर में तरंगों की तरह उमड़ते, जैसा कि मैंने पिछली एक पोस्ट में लिखा है कि मस्तिष्क एक थिएटर मेन की तरफ काम करता है, जो मूड के अनुसार दृश्य प्रस्तुत कर देता है। हालांकि कुछ क्षणों के सूक्ष्मशरीर के अनुभव के बाद मस्तिष्क उससे संबंधित विचार बनाने लगा, जैसे उनकी मृत्यु से दुखी लोग आदि। हालांकि ये अनुभव सागर में तरंग की तरह महसूस नहीँ हो रहे थे, क्योंकि मुझे उस परमात्म-सागर का अनुभव नहीँ हो रहा था, जिसमें सभी कुछ तरंगों के रूप में है। विचारों के उठने के साथ ही शुद्ध अनुभव खत्म होने लगता है। विचार एक शोर जैसा या भ्रम जैसा पैदा करते हैं। योगी को ऐसे दिव्य अनुभव इसीलिए ज्यादा होते हैं, क्योंकि वे ज्यादा देर तक निर्विचार बने रह सकते हैं। होते सभी को हैं, पर वे विचारों के शोर के कारण इतने कम समय के लिए रहते हैं कि पहचान में ही नहीँ आते। जैसा ओशो महाराज कहते हैं कि सम्भोग के दौरान वीर्यपात के अनुभव के कुछ क्षणों के दौरान सभी को समाधि का अनुभव होता है, पर वह इतने कम समय के लिए रहता है कि उसका पता ही नहीं चलता। इसलिए वे ध्यानयोग के माध्यम से उस समय को बढ़ाने को कहते हैं। कहते हैं कि जानवरों को निकट भविष्य का अंदाजा लग जाता है, क्योंकि वे आदमी से ज्यादा निर्विचार होते हैं, हालांकि अलग अर्थात अज्ञान वाले तरीके से। मेरे इस उपरोक्त अनुभव को एकाकार भी नहीँ कह सकते, क्योंकि एकाकार तो परमात्मा के साथ ही हुआ जा सकता है। इसे ऐसे कह सकते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिए अपने आत्मरूप को छोड़कर सूक्ष्मशरीर बन गया। यह ऐसे था कि एक ही सूक्ष्मशरीर था, पर उसे एकसाथ अनुभव करने वाली दो आत्माएं थीं। असली या होस्ट आत्मा उन दिवंगत परिचित की थी। नकली या अतिथि या घुसपैठिया आत्मा मेरी थी। सूक्ष्मशरीर से ऐसे ही सम्पर्क किया जा सकता है। भला अँधेरे व शून्य आसमान को जानने का और क्या तरीका हो सकता है। उनकी समस्या या उनका प्रश्न जानने के लिए मैं उनके सूक्ष्मशरीर से जुड़ गया। उनकी बात कानों से नहीँ सुनाई दे रही थी, पर सीधी आत्मा में महसूस हो रही थी। न उनका शरीर, न मुख और न ही शब्द। फिर भी उनके बारे में सबकुछ जान पा रहा था और उनकी हरेक बात सुन पा रहा था। मैंने उनके सूक्ष्मशरीर में रहकर उन्हींको जवाब भी दिया, जिसे उन्होंने ध्यान से सुना, पर वैसे ही आत्म-भाषा में। फिर सम्भवतः जब मैं अपना जागृति से संबंधित अनुभव याद करने के लिए अपने सूक्ष्मशरीर में आने लगा, तब मेरे मस्तिष्क में विचारों का शोर बढ़ने लगा, जिससे सम्पर्क टूट गया। पर मुख्य बात मैंने बता दी थी। शायद मकानमालिक ने घुसपैठिये को किक मारके भगा दिया था। हाहाहा। हो सकता है बहुत से कारण रहे हो पर सबसे मुख्य वजह यह डर लगता है कि कहीं मैं उनके सूक्ष्मशरीर में हमेशा के लिए कैद न हो जाऊं, और मेरे सूक्ष्मशरीर को खाली जानकर उनकी आत्मा उसपर कब्जा न कर लें। भाई पहले अपना घर बचाना था, न कि किसी की मदद करनी थी। वैसे भी अधिकांश मामलों में कोई दूसरे के सूक्ष्मशरीर में ज्यादा देर नहीँ ठहर सकता, जैसे कोई अतिथि बनकर किसीके घर पर कब्जा नहीँ कर सकता। सम्भवतः परकायाप्रवेश सिद्धि इसीका उत्कृष्ट रूप हो, जिसमें सूक्ष्मशरीर के मालिक आत्मा को भगाकर अतिथि आत्मा स्थायी तौर पर बस जाती है। कहते हैं कि आदि शंकराचार्य इसमें पारंगत थे। शास्त्रों में एक कथा आती है, जिसमें राजकुमार पुरु ने अपने वृद्ध पिता और राजा ययाति को अपनी जवानी दान दे दी थी। यह तभी हो सकता है, जब उन्होंने अपने सूक्ष्मशरीर एकदूसरे के साथ बदल दिए हों। मैंने बचपन में एक तथाकथित सत्य घटना का वर्णन पढ़ा-सुना था, जिसके अनुसार एक अंग्रेज अधिकारी कहता है कि उसने एक वृद्ध योगी बाबा को झाड़ियों के बीच में से एक नौजवान की लाश घसीटते देखा। कुछ देर के बाद वह नौजवान जिन्दा होकर किश्ती में सवार होकर नदी पार कर रहा था। मतलब साफ है कि योगी ने अपने शरीर सूक्ष्म को अपने बूढ़े शरीर से बाहर निकालकर नौजवान के मृत शरीर में प्रविष्ट करा दिया था ताकि वह लम्बे समय तक और योग कर पाता। अब पता नहीँ यह सच है कि ढोंग है कि जब किसी के शरीर में बाहरी प्रेतात्मा का कब्जा हो जाता है, जिससे उस आदमी का मन व शरीर उसके कब्जे में आ जाता है। इसे तंत्र-मंत्र आदि से ठीक करवा दिया जाता है। कुछ तो बात जरूर है, जिसे आध्यात्मिक विज्ञान ही ज्यादा अच्छे से समझ सकता है, भौतिक विज्ञान नहीं।

कुण्डलिनी योग विज्ञान ब्लैक होल में भी झाँक सकता है

शिव की तरह शक्ति भी शाश्वत है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि शक्ति कहाँ से आती है। शाक्त कहते हैं कि शिव की तरह शक्ति भी शाश्वत है। यह मानना ही पड़ेगा, क्योंकि अगर शक्ति नाशवान है, तब वह सृष्टि के प्रारम्भिक शून्य आकाश में कहाँ से आती है। अगर शिव को ही एकमात्र अविनाशी और मूल तत्त्व माना जाए तो एक नया स्पष्टीकरण है। सूक्ष्मशरीर रूपी क्वांटम फ्लकचूएशनस आत्मा में रिकॉर्ड हो जाती हैं। उन क्वांटम फ्लकचूएशनस के अनुसार ही आत्मा में अंधेरा होता है। मतलब क्वांटम फ्लकचूएशनस की किस्म और मात्रा के अनुसार ही आत्मा का अंधेरा भिन्नता रखता है। यह नियम व्यष्टि और समष्टि, दोनों ही मामलों में लागू होता है। इसे ही कारण शरीर कहते हैं। आत्मा का वही अंधेरा फिर सृष्टि के प्रारम्भ में अपने अनुसार पुनः  क्वांटम फ्लकचूएशन पैदा करता है। मतलब कारण शरीर या कारण ब्रह्माण्ड सूक्ष्मशरीर या सूक्ष्म ब्रह्माण्ड के रूप में आ जाता है। उससे फिर स्थूल शरीर या स्थूल ब्रह्माण्ड बन ही जाता है। पर प्रश्न फिर भी बचा ही रहता है। फौरी तौर पर तो यही उत्तर बनता है कि अँधेरे अंतरिक्ष के रूप में शक्ति अर्थात कारण शरीर तो रहता है, पर अनुभव के रूप में उसका अपना अस्तित्व नहीं होता, अनुभव के रूप में वह परमात्मा शिवरूप ही होता है। या कह लो कि शक्ति शून्य शिव से एकाकार हो जाती है।

सृष्टि के प्रारम्भ में शक्ति शिव से अलग होकर सृष्टि की रचना प्रारम्भ करती है

जैसे सरोवर का जल हमेशा हिलता रहता है वैसे ही अंतरिक्ष में हमेशा सूक्ष्म तरंगें उठती रहती हैं। दोनों में कभी हवा आदि से लहरें ज्यादा बढ़ जाती हैं। यही एनर्जी से कण का उदय है। अंतरिक्ष में ये तरंगें आकाशीय पिंडों के आपस में टकराने से बनती हैं। यह तो वैज्ञानिक भी बोलते हैं कि जब अंतरिक्ष में ज्यादा उथलपुथल मचती है, तो नए ग्रहों व सितारों आदि का ज्यादा निर्माण होता है। पर शुरुआत के शून्य अंतरिक्ष में यह उथलपुथल कैसे मचती है, यह खोज का विषय है।

ब्लैक होल में ब्रह्माण्ड के जन्म और मृत्यु का राज छिपा हो सकता है

तारा जब मरता है तो वह सिंगुलेरिटी तक कंम्प्रेस होकर ब्लैक होल बन जाता है। वह सिंगुलेरिटी अव्यक्त आकाश में विलीन हो जाती है, क्योंकि किसी चीज के छोटा होने की अंतिम सीमा शून्य आकाश में जाकर ही खत्म होती है। मतलब वह पहले स्बसे छोटा मूलकण बनता है। उसकी ग्रेविटी बहुत ज्यादा होती है। मतलब वह क्वांटम ग्रेविटी है। इसमें एक मूलकण से सृष्टि बनने का राज अर्थात बिग बैंग का राज छिपा हुआ है। जब एक मूलकण के अंदर पूरा तारा समा सकता है तो उससे पूरे तारे का उदय भी तो हो सकता है। वह पुनः-रचना व्हाइट होल के माध्यम से हो सकती है। तभी कहते हैं कि ब्लेक होल सृष्टि रचना की फैक्ट्री हो सकता है। हो सकता है कि सृष्टि के अंत में ग्रेविटी हावी होकर पूरे ब्रह्माण्ड या पूरी सृष्टि को ही ब्लैक होल बना कर खत्म कर दे। फिर पूरा अंतरिक्ष ही ब्लैक होल अर्थात अव्यक्त आकाश अर्थात अंधकारपूर्ण आकाश अर्थात मूल प्रकृति बन जाएगा। हालांकि उसमें पूरी सृष्टि उच्च दबाव में समाई होगी। अब ये नहीं पता कि वह किस रूप में उसमें होगी। जब उस परम ब्लैक होल का अंधकाररूप दबाव एक निश्चित मात्रा या समय सीमा को लांघेगा, तब प्रलय का अंत हो जाएगा और उसमें दबे अव्यक्त पदार्थ प्रकाशमान तरंगों के रूप में बाहर अर्थात परम व्यक्त अर्थात परम पुरुष की ओर प्रस्फुटित होने लगेंगे। इसे ही प्रकृति और पुरुष अर्थात यिन और यांग के बीच आकर्षण और सम्भोग कहा जाता है। इससे शिशु रूप में नई सृष्टि का पुनर्जन्म और विकास होगा। सम्भवतः इसीलिए शास्त्रों में अनेक स्थानों पर मन के विचारों मुख्यतः कुण्डलिनी छवि को भी पुत्र कह कर सम्बोधित किया जाता है। उदाहरण के लिए देव कार्तिकेय, सगर-पुत्र आदि। स्वाभाविक है कि सृष्टि पहले की तरह ही बनेगी क्योंकि पिछली सृष्टि के दबे पदार्थ ही उसे बना रहे हैं। नई सृष्टि बनने की प्रक्रिया और क्रम भी पुरानी की तरह ही होगा क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि जिस क्रम में कोई चीज टूट कर नष्ट होती है, वह लगभग उसी क्रम और प्रक्रिया में आगे से आगे जुड़ते हुए पुनः निर्मित होती है। यह भी हो सकता है कि बिग क्रन्च होने की बजाय बिग बैंग ही चलता रहे, जिससे अंत में सभी मूलकण भी एकदूसरे से दूर छिटक कर आकाश में विलीन हो जाएं। पर बनेगा तो तब भी ब्लैक होल जैसा ही। उसमें भी सब कुछ यहाँ तक कि प्रकाश भी टूट कर मूल अंतरिक्ष के अँधेरे में गायब हो जाएगा।

आदमी का सूक्ष्म शरीर भी एक ब्लैक होल ही है

आदमी भी तो ऐसे ही मरता है। सारे जीवन भर मानसिक ब्रह्माण्ड का निर्माण करता है। अंत में सब कुछ अँधेरनुमा ब्लैकहोल जैसे अव्यक्त में समा जाता है। आदमी के नए जन्म पर उसके नए मानसिक ब्रह्माण्ड का निर्माण इसी मानसिक या सूक्ष्म ब्लैकहोल से होता है। मतलब जैसी सूचना उस अँधेरे में दर्ज होती है, नया ब्रह्माण्ड भी वैसा ही बनता है। तभी तो कहते हैं कि आदमी का नया जन्म उसके पुराने जन्मों के अनुसार ही होता है।

ब्लैक होल में प्रकाश तो अनगिनत सितारों जितना समाया हो सकता है, पर वह दबा हुआ या अव्यक्त होता है। यह मृत्यु के बाद जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर अर्थात प्रेतात्मा की तरह है। उसमें अनेक जन्मों के जगत का प्रकाश समाहित होता है, पर वह दबा हुआ सा अर्थात अनभिव्यक्त सा होता है। ऐसा लगता है कि वह प्रकाश बाहर उमड़ने को बेताब है।

हरेक जीव एक ब्रह्माण्ड और ब्लैक होल के रूप में जन्म और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है

ब्लैक होल का अनुभवात्मक विवरण

मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि जीवात्मा का पुनर्जन्म एक मां के गर्भ में होता है। यह अनेक सम्भावनाओं में से एक है। जीवात्मा सूर्य-आदि मार्गों से भी जा सकती है, चंद्रादि मार्ग से भी, स्वर्ग भी जा सकती है और नर्क भी, किसी भी ग्रह या लोक-परलोक को जा सकती है, मुक्त भी हो सकती है, और बद्ध भी रह सकती है। इसका असली अनुभव तो ज्ञानी ऋषियों ने ही किया था, जिसका वर्णन उन्होंने वेद-शास्त्रों में किया है। हम तो उन्हींके अनुभवों की वैज्ञानिक विवेचना करने की कोशिश करते हैं। मेरा अनुभव तो यही है कि मैंने एकबार अपने मृत परिचित की जीवात्मा को अनुभव किया था। वह ब्लैक होल की तरह थी, मतलब उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व समाया हुआ था, जो उसकी जीवित अवस्था से भी ज्यादा अनुभव हो रहा था, उसके पिछले सभी जन्मों के प्रभाव के साथ, पर फिर भी सबकुछ अंधेरनुमा ही था, हालांकि अंतहीन खुले आसमान की तरह। वैसे ही, जैसे ब्लैक होल में पूरा विश्व समाया होता है। ऐसा लग रहा था जैसे उनका जीवित अवस्था का प्रकाशमान जगत अर्थात उनका जीवनयात्रा की शुरुआत से लेकर अब तक का पूरा पिछला व्यक्तित्व किसी दबाव से दबा था, इससे वह अवस्था कज्जली या चमकीली काली थी, मतलब चेतना व सेल्फ अवेयरनेस अर्थात आत्मजागरूकता से भरा अंधेरा था वह, जड़ता या मूढ़ता से भरा नहीं, और शान्तियुक्त आनंद भी था उसमें, हालांकि प्रकाश की कमी से आनंद अधूरा था। ऐसा ही जैसे किसी को सुखचैन तो दो पर अँधेरी कोठरी में बंद रखो। शायद यह एक जानवर जैसा बंधन है जो एक अंधेरे कमरे में बंधा हुआ है, लेकिन अच्छी तरह से खिलाया और पानी पिलाया जाता है, इसलिए भगवान को पशुपति नाथ या जानवरों का स्वामी कहा जाता है। ऐसा लग रहा था कि वह दबा हुआ बैकग्राउंड प्रकाश पूरे जोर व विस्फोट से बाहर को फैलना चाहता हो अभिव्यक्ति के रूप में। सम्भवतः ब्लैक होल भी ऐसा ही होता है। इवेंट होरीजन के साथ देखने पर तो वह वैसा ही लगता है। इवेंट होरीज़ोन को आप आदमी के स्थूल शरीर जैसा या अभिव्यक्त रूप जैसा कह लो, और ब्लैक होल को इसके सूक्ष्म शरीर या दबे रूप जैसा। इवेंट होरीज़ोन में पूरा दृश्य जगत प्रकाशमान और स्थूल होता है, जबकि ब्लैक होल के अंदर वह सूक्ष्मता और अँधेरे में चला जाता है, रहता वहाँ भी पूरा ही है। विचित्र अवस्था होती है सूक्ष्म शरीर की। फिर वो जीवात्मा कई दिन बाद दिव्य जैसी अवस्था में टहलते हुए महसूस हुई। सम्भवतः वह स्वर्ग या मुक्ति की तरफ जा रही थी। मैंने इसका सविस्तार वर्णन एक पुरानी पोस्ट में किया है। मैं इस अनुभव के दौरान तांत्रिक कुण्डलिनी योग का गहन अभ्यास कर रहा था। सम्भवतः इसी ने मुझे उस दिव्य अनुभव के योग्य बनाया था। वह शुभचिंतक प्रेतात्मा थी। इसी तरह एकबार मुझे योगाभ्यास के बीच में ही कुछ अशुभ प्रेतात्माओं के सूक्ष्म शरीरों का अनुभव भी हुआ था। वे हिंसक व गुस्सैल व रक्तपिपासु जैसे लग रहे थे। दरअसल सूक्ष्म शरीर अपनी आत्मा के अंदर या आत्मा के रूप में महसूस होते हैं। वह एक अहसास होता है, जिसके लिए विचारों का घोड़ा दौड़ाने की जरूरत नहीं होती। आपको चीनी की मिठास क्या विचार बताते हैं। नहीं, वह एक अपना अंदरूनी अहसास होता है। उसके साथ पीछे से अच्छे विचार आए, वह अलग बात है। उसी तरह उन दुष्ट प्रेतों के अहसास के साथ कुछ हड्डीनुमा, लाल आँखों वाले व बड़े नुकीले दांतों व गुस्से वाले चित्र तो मन में बने, पर वे तो अहसास का पीछा करने वाले विचार होते हैं, अहसास नहीं। सूक्ष्म शरीर तो एक अहसास ही होता है, बिना किसी भौतिक रूपरंग का। मस्तिष्क एक थिएटर मेन की तरह होता है, जो अहसास या मूड के अनुसार चित्र बना लेता है। मैंने गुरु स्मरण से उस घटिया अहसास को शांत किया। वह अहसास 10-20 सेकंड जितना ही रहा होगा। उसके एक-दो दिन बाद एक बुरी घटना टलने की खुशखबरी मिली। इसी तरह मैंने बताया था कि किस तरह जीव का जन्म होता है। यह भी मैं शास्त्रों में लिखी बातों को वैज्ञानिक अमलीजामा पहना रहा था, कुछ अपना हल्का अनुभव भी है, हालांकि वह गहरा या निर्णायक अनुभव नहीं है। एक उपनिषद में तो एक जगह यहाँ तक कहा गया है कि जीवात्मा बादलों तक पहुंच कर बारिश के जल में घुलकर जमीन पर आ जाती है, फिर जड़ों से होकर अन्न के पौधे में घुस जाती है। जब कोई आदमी उस अन्न के दाने को खाता है, तो उसके शरीर से होकर उसके वीर्य में पहुंच जाती है। उससे उसकी पत्नि के गर्भ में प्रविष्ट होकर जन्म ले लेती है।

जो भौतिक विज्ञान की पहुंच से परे हो, वहाँ आध्यात्मिक योग-विज्ञान से ही पहुंचा जा सकता है

भौतिक वैज्ञानिक ब्लैक होल के अँधेरे में झाँकने में अस्मर्थ हैं। पर योग विज्ञान इशारा कर रहा है कि उसमें सभी पदार्थ अदृष्य आत्मा अर्थात अदृष्य आसमान के रूप में विद्यमान रहते हैं, जिन्हें आसमान रूप आत्मा के द्वारा सीधा अनुभव तो किया जा सकता है पर भौतिक इन्द्रियों के द्वारा नहीं। जीव का सूक्ष्म शरीर भी वैसा ही होता है।

ब्लैक होल ब्रह्माण्ड-शरीर अर्थात ब्रह्मा का सूक्ष्म शरीर व कारण शरीर है

एलियन हरेक भौतिक पदार्थ के रूप में उपस्थित रहकर हमारे सबसे निकट होते हुए भी सबसे दूर हैं

उपरोक्त तथ्यों से तो यही सिद्ध होता है। देहरहित सूक्ष्मशरीर व कारण शरीर के बीच मुझे कोई ज्यादा अंतर नहीं लगता। दोनों में ही क्वांटम फ्लकचूएशनस आत्मा में रिकॉर्ड हो जाती हैं। यही मामुली सा अंतर है कि सूक्ष्मशरीर थोड़े समय के लिए रहता है, क्योंकि उसको स्थूल रूप में प्रकट करने के लिए भौतिक सृष्टि का वजूद होता है, जबकि कारण शरीर लम्बे समय तक बना रहता है, क्योंकि उस समय सृष्टि की प्रलयावस्था होती है, और कहीं कुछ भी भौतिक रूप में नहीं होता। इसके अलावा, कारण शरीर पूरी तरह से शांत दिखाई देता है क्योंकि इसमें किसी भी क्वांटम लहर की उतार-चढ़ाव को आकर्षक भूतिया अभिव्यक्ति के रूप में लंबे समय तक अनुभव नहीं किया जाता है, जैसा कि कभी-कभी सूक्ष्म शरीर के मामले में होता है। इसका मतलब है कि आम जीव की तरह ब्रह्मा नाम के जीव का अस्तित्व भी है, जैसा शास्त्रों में कहा गया है। ब्रह्माण्ड ही उसका शरीर है। यह अलग बात है कि वह इससे बद्ध नहीं होता। प्रलय के समय ब्रह्मा की आत्मा में ब्रह्माण्ड रिकॉर्ड हो जाता है। सृष्टि के समय वह फिर अपने पुराने स्थूल रूप में प्रकट हो जाता है। पर शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मा प्रलय के समय अपनी मृत्यु के साथ मुक्त हो जाता है। फिर नई सृष्टि के लिए वो रेकॉर्डिंग कहाँ रहती है। मतलब साफ है कि वह जीवनमुक्त हो जाता है, विदेहमुक्त नहीं। मतलब उसका शरीर और जन्म-मृत्यु का चक्र बना रहता है, पर मुक्ति के अहसास के साथ। पर जीवनमुक्त तो वह पहले भी था। ऐसा शायद यह दर्शाने के लिए लिखा गया है कि जीव और ब्रह्मा की गति एक जैसी है। ब्रह्मा और जीव में कोई अंतर नहीं। जीवनमुक्त के बारे में जो कुछ भी सोच लो, वह सही ही होता है, क्योंकि वह किसी से प्रभावित ही नहीं होता। यह ऐसे ही है जैसे कुछ अंतरिक्ष वैज्ञानिक अंदेशा जता रहे हैं कि हमें एलियन इसलिए नहीं दिखते क्योंकि वे भौतिक पदार्थों के रूप में ढल गए हैं, और ऐसे बन गए हैं कि वे हर जगह हैं भी और नहीं भी। पूरा ब्रह्माण्ड भी ऐसा ही एक विशालकाय एलियन हो सकता है। सम्भवतः इस बात को जानकर ही सभी चीजों को देवता मानने की और उनको विभिन्न रूपों में पूजने की परम्परा शुरु हुई थी। ऐसे जीवनमुक्त लोग ही तो होते हैं। फिर शास्त्र कहते हैं कि कोई भी जीव तरक्की करते हुए ब्रह्मा बन सकता है। इसका मतलब मुझे यही लगता है कि ब्रह्मा की तरह पूर्ण जीवनमुक्त बन सकता है, न कि असली ब्रह्मा।

शिव अगर सरोवर है तो शक्ति उसमें हलचल पैदा करने वाला हवा का झोँका है

मान लेते हैं कि सरोवर में जल की हलचल की तरह अंतरिक्ष में क्वांटम फ्लकचूएशनस हमेशा विद्यमान रहती हैं, जिसे हम अव्यक्त कहते हैं। यह भी मान लेते हैं कि महाप्रलय के समय अंतरिक्ष एक पूर्ण शांत जल-सरोवर की तरह हो जाता है, जिसमें बिल्कुल भी हलचल नहीं रहती, मतलब क्वांटम फ्लकचूएशनस भी थम जाती हैं। इसे परम अव्यक्त भी कह सकते हैं और परम व्यक्त या परमात्मा भी। जैसे हवा के झोंके से जल की सतह पर बार-बार उसी किस्म की तरंगों के पैटर्न  उसी क्रम में बनते रहते हैं, उसी तरह अंतरिक्ष में भी उसी किस्म की सृष्टि उसी निश्चित क्रम में बारबार बनती रहती है। पर फिर भी अंत में प्रश्न यही बचता है कि प्रलय के अंत में जब सब कुछ शून्य होता है, तब वह ऊर्जा या शक्ति कहाँ से आती है, जो उस हलचल को बढ़ा देती है। शून्य में वो हवा का झोंका कहाँ से आता है, जो शुरुआती हलचल को पैदा करता है। बाद में तो यह भी मान सकते हैं कि हलचल से हलचल खुद ही आगे से आगे बढ़ती रहती है। अंतरिक्ष में चलने वाला वह हवा का झोंका ही वह शक्ति है, जिसे शाक्त सम्प्रदाय वाले लोग शिव की तरह शाश्वत और अविनाशी मानते हैं। शिव अगर निश्चल अंतरिक्ष है, तो शक्ति उसमें हलचल पैदा करने वाला हवा का झोंका है।

कुंडलिनी भी एक भूत है~ एक पवित्र भूत

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि भूत क्या होते हैं। कुछ लोगों ने सवाल किया कि अंग्रेजी में इसे घोस्ट शब्द में क्यों ट्रांसलेट किया है, घोस्ट का कोई आध्य्यात्मिक महत्व नहीं। मैंने कहा कि यह गूगल ने ट्रांसलेट किया है, मैंने नहीं। दरअसल हम शब्दों में ज्यादा उलझे रहते हैं, मूल भावना को कम समझने की कोशिश करते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक कमजोरी है। पर उनकी बात भी सही है।जो वास्तविक शाब्दिक अर्थ भूत शब्द का बनता है, वह घोस्ट शब्द का बनता ही नहीं। भूत मन ही है। यही आदमी को डराता है, ताकि आदमी सीधे रास्ते पर चले। भटके हुए मन के विविध रूप ही विविध प्रकार के भूत हैं। किसी के पेट पर आँख है, कोई अनगिनत भुजाओं वाला है, कोई अनगिनत टांगों वाला है आदि। समुद्री जीव भी तो ऐसे ही विविध व आश्चर्यजनक रूपों वाले होते हैं। उनके अंदर भी भटका हुआ मन है। वही अजीब मन ही अजीब किस्म का भूत है, जो अजीब शरीर को ही अपने रहने के लिए चुन पाता है। शरीर के मरने के बाद भी मन नहीं मरता। मन भी आत्मा की तरह ही अमर है। मन मर नहीं सकता, केवल आत्मा में विलीन ही हो सकता है। शरीर के न रहने पर मन अजीब से घने अंधकार का रूप ले लेता है। वह काले कज्जल की तरह घना और चमकीला सा होता है। उसमें उसकी शुरु से लेकर सारी सूचनाएं मनोवैज्ञानिक कोड केे रूप में दर्ज होती हैं। वे इतनी स्पष्ट होती हैं कि यदि कोई अपनी जानपहचान वाले आदमी का भूत देख ले तो तुरंत पहचान जाता है कि वह उसका भूत है। यहाँ तक कि जीव की वेे व्यक्तिगत सूचनाएं उसके भूत में उसके अपने जीवित समय के शरीर से भी ज्यादा स्पष्ट व प्रत्यक्ष होती हैं। दरअसल भूत मन में प्रत्यक्ष की तरह महसूस होता है। दिमाग उससे प्रेरित होकर भूत के रूप के अनुसार चित्र बना लेता है। दिमाग के ट्रिकस सबको पता ही हैं। वह हमें लगता है कि आंखों से दिख रहा है, पर होता वह दिमाग में है। आदमी समझता है कि सिर्फ मरने के बाद ही भूत बनते हैं। दरअसल जिंदा जीव या आदमी भी भूत ही है। भूत का शाब्दिक अर्थ ही “पैदा होया हुआ पदार्थ” है। न तो भगवान पैदा होता है, न ही प्रकृति। दोनों अनादि व अनंत हैं। केवल जीव ही परमात्मा से पैदा होता है, और उसीमें विलीन भी होता है। पैदा भी नहीं होता। असल में यह उसकी परछाई की तरह है। परछाई केवल महसूस होती है। परछाई का अस्तित्व नहीं होता। ऐसा ही भूत भी है। इसलिए जीव ही भूत है। मृत भूत ही लोगों को डरावना लगता है, क्योंकि उसका शरीर नहीं होता। अब यदि कोई आसमान में बिना लकड़ी की आग देख ले, तो वह डरेगा ही कि यह क्या हुआ। 

धर्म के लिए कुछ कट्टरता जरूरी भी है

फिर मैं यह बात भी बता रहा था कि जहाँ अति कट्टरता हानिकारक है, वहीं थोड़ी कट्टरता या थोड़ा हठ धर्म के लिए जरूरी भी है। यदि आप नियमित कुंडलिनी योग करने का हठ नहीं पकड़ोगे, तो कर ही नहीं पाओगे। कभी यह बहाना बनाओगे कि उस दिन आपने इसलिए नहीं किया क्योंकि उस दिन आप विवाह या बारात में गए थे। यदि आप कट्टर होते तो थोड़ी देर के लिए एकांत ढूंढ कर जरूर कुंडलिनी योग करते। कभी आप यह बहाना बनाओगे कि उस दिन मैं शहर गया था जहाँ जगह की कमी थी। यदि आप कट्टर होते तो कुर्सी पर भी कर लेते। कभी यह बहाना बनाओगे कि उस दिन आप देर रात को घर पहुंचे, इसलिए योग नहीं कर पाए। पर यदि आप हठी होते तो चाहे कम समय के लिए करते, पर करते जरूर। कभी आप बहाना बनाओगे कि उस दिन आपने खाना खा लिया था या आप बीमार थे। पर आप हल्के आसन और हल्के प्राणायाम भी कर सकते थे। साथ में, समस्याओं के बीच में भी कुंडलिनी योग करने से तो कुंडलिनी लाभ कई गुना बढ़ जाता है। इस तरह से यदि सकारात्मक कट्टरता न हो, तो बहाने खत्म ही नहीं होते, जिससे आदमी साधना पे अडिग नहीं रह पाता।

अगर पूजा ही सबकुछ होती, तो पूजा करने वालों के साथ दुखदायी घटनाएं न घटित हुआ करतीं

पूजा साधन है, साध्य नहीं। साध्य अद्वैत है। वही ईश्वर है। पूजा से भक्ति बढ़ती है, और भक्ति से अद्वैत। अद्वैत के साथ कुंडलिनी अवश्य रहती है। यह तो सभी जानते हैं कि कुंडलिनी हमेशा मंगल ही करती है। वैसे उसमें अद्वैत का ही अधिकांश योगदान है, जो कुंडलिनी से पैदा होता है। अद्वैत से कुंडलिनी, और कुंडलिनी से अद्वैत, ये दोनों एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं। अद्वैत से आदमी संतुलित और ऊर्जा से भरा रहता है, इससे बुद्धि अच्छे से काम करती है। अद्वैत से विचारों के शोर पर लगाम लगती है, जिससे ऊर्जा की बर्बादी नहीं होती। एकबार मैं किसी लघु जानपहचान वाले के घर एक व्यावसायिक कार्य से उसके द्वारा बुलाने पर गया था। उस घर का एक सदस्य जो मुझे मित्र के जैसा लगता था, वह मुझे अपने साथ ले गया था। वहाँ उसके नवयुवक भाई से तब बात हुई, जब उसने मेरा अभिवादन किया। उसके चेहरे पर मुझे एक विचित्र सा तेज नजर आ रहा था। उसका नाम भी शिव के नाम से जुड़ा था। इसलिए मैंने अनजाने में ही खुशी और मुस्कुराहट के साथ  उसकी तुलना शिव से कर दी। दरअसल स्वभाव भी उसका कुछ वैसा ही था। उससे वह भी मुस्कुराया, और परिवार के अन्य लोग भी। आकर्षक, शर्मीला, मां-बाप का विशेष लाड़ला और मेहनती लड़का था वह। उसके एक या दो दिन बाद वह अपने स्कूल टाईम के मित्र के साथ उसकी एकदम नई खरीदी मोटरसाइकिल पर उत्साह से भरा हुआ कहीं घूमने चला गया। सम्भवतः उसका वह दोस्त बाइक चलाना सीख ही रहा था। रास्ते में वे एक प्रख्यात शिव व स्थानीय देवता के मंदिर में दर्शन के लिए रुके। सम्भवतः नई गाड़ी की पूजा करवाना ही मुख्य उद्देश्य था वहाँ रुकने का। वहां से शहर घूमने निकले तो रास्ते में एक ट्रैक्टर ट्रॉली के पिछले हिस्से से टकरा गए। राइडर तो बच गया, पर पीछे बैठे उस नवयुवक ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। इससे यह भी पता लगता है कि बच्चों को बचपन में ही साइकिल आदि दोपहिया वाहनों का अच्छा प्रशिक्षण मिलना चाहिए। आम आदमी सोचता है कि बच्चा बड़ा होकर खुद सीख जाएगा, पर कई बार तब तक काफी देर हो चुकी होती है। चोरी छिप के चलाने वाले या सीखने वाले कुछ अन्य किशोरों में भी मैंने ऐसे हादसे देखे हैं। हो सकता है कि मेरे अवचेतन मन पर शिव के भूतों का प्रभाव पड़ा हो, जिससे शिव वाली बात मेरे मुंह से निकली हो। यह भी हो सकता है कि शक्तिशाली अद्वैत साधना से मेरे अवचेतन मन को घटना का पूर्वाभास हो गया हो। हालाँकि उस समय मैं कोई विशेष व नियमित योगसाधना नहीं करता था। मेरा काम करने का तरीका ही ऐसा था कि उससे खुद ही योगसाधना हो जाती थी। उस तरीके का सविस्तार वर्णन पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन~ एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र” में मिलता है। परिवार वाले हैरान होकर सोचते कि शिवनाम का सहारा होने पर भी वह बड़ा हादसा कैसे हो गया। होता भी, तो जान तो बच ही जाती। फिर यह मानकर संतुष्ट हो जाते कि उसे शिवनाम से मुक्ति मिल गई होगी। अब ये तो किसको पता कि क्या हुआ होगा पर इतना जरूर है कि पूजा लापरवाही को नहीं भर सकती। भौतिक कमियां केवल भौतिक साधनों से ही पूरी की जा सकती है। पूजा से सहयोग तो मिलता है, पर उसकी भी अपनी सीमाएं हैं। मन को बेशक लगे कि ऑल इज वैल, पर लगने और होने में फर्क है। अच्छा लगना और अच्छा होना। फील गुड एण्ड बींग गुड़। हालांकि दोनों आपस में जुड़े हैं, पर एक निश्चित सीमा तक ही। उसके परिवार वाले यह भी कहते कि वह पिछले कुछ समय से अजीब-अजीब सी और अपने स्वयं के बारे में दुनिया से जाने वाली जैसी बातें भी करता था। होनी ही वैसी रही होगी। उसके पिता जो अक्सर बीमार रहते थे, वे भी अपने बेटे के गम में कुछ दिनों के बाद चल बसे। जो कुछ भी हुआ, उससे पगलाए जैसे उसके भाई से मेरी मित्रता टूट जैसी चुकी थी। कुछ डिस्टर्ब जैसा तो वह पहले भी लगा करता था, पर उतना नहीं। कई बार वह यह सोचने लग जाता था कि कहीं उसके भाई को मंदिर में किसी काले तंत्र ने बलि का बकरा न बनाया हो। दुखी मन क्या नहीं सोचता। उसका सदमा मुझे भी काफी लगा और कुछ समय मुझे भी डिप्रेशन की गोलियाँ खानी पड़ीं, जिसको लेने के कुछ अन्य कारण भी थे, हालांकि मेरे स्वनिर्मित अद्वैत दर्शन और उसके अनुसार मेरी काम करने की आदत ने मुझे जल्दी ही संभाल लिया। मुझे महसूस हुआ कि डिप्रेशन की दवाइयां भी अद्वैत ही पैदा करवाती हैं, हालाँकि जबरदस्ती से और कुछ घटिया गुणवत्ता के साथ और स्मरणशक्ति व कार्यदक्षता के ह्रास के साथ। साथ में, शरीर और दिमाग को भी हानि पहुंचाती हैं। जब मूलतः अद्वैत से ही अवसाद दूर होता है, तब क्यों न कुंडलिनी की सहायता ली जाए, क्यों भौतिक दवाइयों की आदत डाली जाए। मैंने  ऐसे सहव्यवसायी भी देखे हैं, जिन्हें इन दवाओं की आदत है। वे कुछकुछ मरीजों, खासकर मानसिक मरीजों की तरह लगते हैं। भगवान करे, ऐसे हादसे किसी के साथ न हों।

अवसाद भूत का छोटा भाई है, जिसे कुंडलिनी ही सर्वोत्तम रीति से भगा सकती है

वैसे तो ईश्वर के सिवाय सभी कुछ भूत है, पर लोकव्यवहार में शरीररहित जीवात्मा को ही भूत माना जाता है। अवसाद की अवस्था भी शरीररहित अवस्था से मिलती जुलती है। इसमें शरीर के विविध सुखों का अनुभव घट जाता है। सम्भवतः यही प्रमुख कारण है कि अवसादग्रस्त व्यक्ति में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है। अवसाद में कुंडलिनी योग एक जीवनरक्षक की भूमिका निभा सकता है। अवसादरोधी दवाओं से भी अद्वैत या कुंडलिनी ज्यादा स्पष्ट हो जाती है। मतलब कि अवसादरोधी दवाएं भी कुंडलिनी सिद्धांत से ही काम करती हैं। इसका वैज्ञानिक अन्वेषण होना चाहिये। मुझे लगता है कुण्डलिनी के प्रारंभिक अन्वेषण के लिए इनका इस्तेमाल विशेषज्ञ चिकित्सक की निगरानी में थोड़े समय के लिए किया जा सकता है। मुझे यह भी लगता है कि भांग भी यही काम करती है, इसीलिए योगी साधु इनका समुचित व नियंत्रित सेवन किया करते थे। कुंडलिनी ही शरीर के सभी सुखों का स्रोत या आधार है। इससे मस्तिष्क में भौतिक सुखों को अनुभव कराने वाले रसायन बनने लगते हैं। हम मन के रूप में ही भौतिक सुखों को अनुभव कर सकते हैं, सीधे नहीं। कुंडलिनी उच्च कोटि का संवर्धित और परिष्कृत मन ही तो है। इससे भौतिक वस्तुओं के बिना ही भौतिक सुख जैसा सुख मिलने लगता है। सीधा सा मतलब है कि कुंडलिनी भौतिक सुखों के लिए भौतिक सुविधाओं को बाईपास करने वाला अनूठा तरीका है। मुझे यह कुंडलिनी लाभ एकबार नहीं, अनेक बार मिला है। सबको मिलता है, पर वे इसकी गहराई में नहीं जाते। भारत कभी कुंडलिनी योग प्रधान देश था, तभी तो यह भौतिकवाद के बिना भी सर्वाधिक विकसित होता था।

अद्वैत का सबसे व्यावहारिक तरीका हमेशा अपने को संपूर्ण का हिस्सा मानना है

कोई उसे परमात्मा कहता है, कोई ईश्वर, कोई गॉड और कोई और कुछ। पर व्यावहारिकता में उसे संपूर्ण कम ही लोग मानते हैं। कई लोग मानते हैं, यद्यपि बाहर-बाहर से ही, क्योंकि अगर उनके सामने कोई भूखा या लाचार कुत्ता आ जाए, तो वे उसे गाली दे सकते हैं, या डंडा मार सकते हैं। फिर कैसा सम्पूर्ण का ध्यान या पूजन हुआ, जब उसके एक हिस्से से नफरत कर रहे हैं। इसलिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, अपने को हमेशा सम्पूर्ण का हिस्सा मानना चाहिए। वह सम्पूर्ण, जिसमें सबकुछ है, जिससे अलग कुछ नहीं है। ध्यान करने की जरूरत भी नहीं, मानना ही काफी है। ध्यान तो अपने काम पर लगाना है। अगर ध्यान सम्पूर्ण पर लग गया, तो काम कैसे होगा। किसी भी परिस्थिति को ठुकराना नहीं, अंधेरा या प्रकाश कुछ भी, क्योंकि वह सम्पूर्ण का हिस्सा होने से उससे अलग नहीं है। एवरीथिंग इज पार्ट ऑफ ए व्होल। ऐसी मान्यता बनी रहने से कुंडलिनी भी मन में बनी रहेगी, और चारों ओर घूमते हुए पूरे शरीर को स्वस्थ रखेगी। यद्यपि इस विश्वास को सीधे चौबीसों घंटे बनाए रखना न तो व्यावहारिक और न ही आसान लगता है, इसलिए इसे अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त करने के लिए एक व्यावहारिक अद्वैत दर्शन और कुंडलिनी योग को अपनाया जाना चाहिए। ऐसी मान्यता बनाए रखने में अद्वैत की लोकप्रिय व व्यावहारिक पुस्तक”शरीरविज्ञान दर्शन~ एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र” ने मेरी बहुत मदद की।

कुंडलिनी भी एक भूत है, एक पवित्र भूत

जब मन ही भूत है, तब कुंडलिनी भी भूत ही सिद्ध हुई, क्योंकि कुंडलिनी भी एक उच्च कोटि का मन ही है। आम भूत का भी भौतिक अस्तित्व नहीं होता, और कुंडलिनी का भी नहीं। आम भूत भी केवल मन की ही उपज होते हैं, और कुंडलिनी भी। पर यह आम भूत से अलग है। जहाँ आम भूत परमात्मा से दूर ले जाते हैं, वहीँ पर कुंडलिनी-भूत परमात्मा की ओर ले जाता है। क्या इसाई धर्म में वर्णित पवित्र भूत या हॉली घोस्ट कुण्डलिनी ही है? इसका निर्णय मैं आपके ऊपर छोड़ता हूँ।

कुंडलिनी सभी प्रकार के अनुभवों को सुरक्षित रूप से झेलने की शक्ति देती है; और कुण्डलिनी जागरण तो सबसे बड़ा अनुभव है, जिसके आगे सभी अनुभव बौने हैं; प्रेत आत्मा से सामना होने की कुछ घटनाएं

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने ड्रीम विजिटेशन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं उससे संबंधित अपने अनुभवों के बारे में बताऊंगा।

आदमी (आत्मा) की मृत्यु नहीं होती, वह केवल रूप बदलता रहता है

आज से दो वर्ष पहले मेरी दादी जी का देहांत हो गया था। बुढ़ापा मृत्यु का मुख्य कारण रहा, हालांकि उसमें एक अनजानी सी लंबी बीमारी का भी योगदान था। यह भी संयोग ही है कि उन्हें श्वासरोग की भी समस्या थी, और कोरोना(कोविड-19) भी श्वासरोग ही फैला रहा है। बहुत से शारीरिक व मानसिक कष्टों के बीच में उन्होंने अपने प्राण छोड़े। स्वभाव से वे कोमल, भावनाप्रधान, सुखप्रधान व भीरु स्वभाव की थीं। कई बार तो वे अपनेपन की मोहमाया से ग्रस्त लगती थीं, पर वे उसे प्रेमभावना कहती थीं। दयालु, मानवतापूर्ण व ममतामयी स्वभाव की मूर्ति थीं। मेहनती थीं और अच्छे-बुरे की अच्छी परख रखती थीं। अपनों के सुख व भले के लिए चिंतित रहा करती थीं। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। बच्चों को वे जरा भीडांटने नहीं देती थीं, उन्हें गुस्से में हाथ भी लगाना तो दूर की बात रही। वे पालतु जानवरों की भी बहुत देखरेख रखती थीं। वे बहुत सोच-विचार करा करती थीं। मरने से और उसके बाद की दुर्गति से बहुत डरती थीं। उनकी मृत्यु के लगभग 15 दिन बाद मेरी उनसे सपने में मुलाकात हुई। अजीब सा शांतिपूर्ण अंधेरा था। मुट्ठी में भरने लायक घना अंधेरा था। पर आम अंधेरे के विपरीत उसमें चमक थी चमकीले काजल की तरह। वह मोहमाया या अज्ञान से दबी हुई आत्मा की स्वाभाविक चमक होती है। उस अंधेरे के रूप में भी मैं उन्हें स्पष्ट पहचान रहा था। इसका मतलब है कि उस अंधेरे में उनके रूप की एनकोडिंग थी। मतलब कि किसी आदमी की आत्मा का अंधेरा उसके गुण और रूप के अनुसार होता है। उसी अंधेरे से अगले जन्म में वही गुण और कर्म फिर से प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि सभी अंधेरे एक जैसे नहीं होते।

उनका वह रूप मुझे अच्छा लगा। वह आकाश की तरह पूरा खुला हुआ और विस्तृत था। वह मुझे अपनी क्षणिक आत्मज्ञान की अनुभूति की तरह लगा। परन्तु उसमें प्रकाश व आनंद वाला गुण किसी चीज के दबाने से ढका हुआ जैसा लग रहा था। शायद यही दबाव अज्ञान, आसक्ति, द्वैत, मोहमाया, कर्मसंस्कार आदि के नाम से जाना जाता है। ऐसा लगा जैसे ग्रहण काल में आसमान के आकार का सूर्य पूरा ढका हुआ हो, और नीचे का प्रकाश उस काले आसमान को कुछ अजीब सी या चमकीले काजल जैसी चमक देता हुआ बाहर की तरफ उमड़ना चाह रहा हो। इसे ही अज्ञान के पर्दे से आत्मा का ढकना कहते हैं। इसे ही अज्ञान रूपी बादल से आत्मा रूपी सूर्य का ढकना भी कहते हैं।

मैंने उनसे उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहाँ पर तो ऐसी-वैसी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने मेरा हाल पूछा तो मैंने कहा कि मैं ठीक था। उन्होंने कहा, “मैं तो वैसे ही डरती थीं  कि मरने के बाद पता नहीं क्या होता होगा। पर मैं तो यहाँ ठीक हूँ”। उन्हें वह स्थिति कुछ शक के साथ पूर्ण जैसी लग रही थी, पर मुझे उसमें कमी लग रही थी। शायद वे उस स्थिति को भगवान ही समझ रही हों। शायद वह उस स्थिति के बारे में जानने के लिए मुझसे संपर्क कर रही हों। मैंने प्रसन्न मुद्रा में आसमान की तरफ ऊपर हाथ उठाकर और ऊपर देखते हुए उन्हें उनके अंत समय के निकट कहा भी था कि वे सबसे ऊपर के आकाश लोक में जाएंगी, जिसे उन्होंने गौर से व विश्वास के साथ सुना था। ऐसा मैंने उनके ऐसा पूछने पर कहा था कि उस लाईलाज बिमारी के बाद वह कहाँ जा रही थीं। उनके उस विश्वास की एक वजह यह भी थी कि मेरे दादाजी ने लगभग 25 वर्ष पहले उन्हें मेरे सामने मेरे आत्मज्ञान के बारे में प्रसन्नता व बड़े आत्मगौरव के साथ बताया था। मेरी कुंडलिनी के निर्माण में मेरे दादाजी का बहुत बड़ा योगदान रहा था।

फिर उस ड्रीम विजिटेशन में मेरी दादीजी ने मुझसे कहा, “तेरे बहुत से अहितचिंतक पीठ पीछे तेरे विरुद्ध बोल रहे हैं”। तो मैंने उनसे कहा, “आप भगवान के बहुत नजदीक हो, इसलिए कृपया उनसे स्थिति सामान्य करने के लिए प्रार्थना करो”। उन्होंने कहा, “ठीक है”। मैं उस समय प्रतिदिन कुण्डलिनी योग कर रहा था। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी (अद्वैत) मृत्यु के बाद ईश्वर की तरफ ले जाती है।

प्रेतात्मा के द्वारा भगवान का स्मरण करना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उस समय वह पूरी तरह से भूखी-प्यासी व आश्रय विहीन होती है। हो सकता है कि उससे उन्हें भगवान की तरफ गति मिल गई हो। आश्चर्य की बात है कि जिस स्थान पर उन प्रेतात्मा के लिए धार्मिक रीति के अनुसार जल का कलश रखा हुआ था, वहीं पर उनसे मुलाकात हुई। वहां पर एक शिवलिंग टेलीफोन सेट का काम कर रहा था, जिसके माध्यम से उनसे बात हो रही थी। बड़ी स्पष्ट,भावपूर्ण व जीवंत आवाज थी उनकी। वह मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। वह सीधी उनकी आत्मा से आ रही थी और मेरी आत्मा को छू रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई स्विच दबा और मैं शरीर रहित आयाम में प्रविष्ट हो गया था। फिर मैंने परिवार के और सदस्यों से उनकी बात करानी चाही। पर वे लोग उन्हें मरा हुआ मान रहे थे। फिर मुझे भी उनके मरे हुए होने का भान हुआ। मैं तनिक दुखी होकर विलाप करने लगा और थोड़ा डर सा गया। उससे वह आत्मा ओझल हो गई और मैं एकदम से आत्मा के आयाम से बाहर आ गया।

प्रियजनों की आत्मा आने वाले खतरे का बोध भी करवाती है

कुछ महीनों बाद मैंने उन्हें बड़ी भयावह अवस्था में देखा। वह शायद वैसी ही स्थिति थी, जैसी उन्होंने अपनी मृत्यु के समय महसूस की होगी। मैंने उन्हें अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में मृत रूप में जीवित बैठे देखा। वह बड़ा विचित्र व क्लेशपूर्ण अनुभव था। शायद वह मुझे अगले दिन होने वाली दुर्घटना के बारे में बताना चाह रही हों, पर बोल नहीं पा रही हों। अगले दिन मेरे कमरे की खिड़की पर एक जहरीला कोबरा सांप था, जिससे मेरा कर्मचारी बाल-बाल बच गया।

एकबार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को फिर से भगवान की याद दिलाई

वह किसी रिश्तेदार के यहाँ आराम से सबके साथ बाहर बैठी थीं। मेरी मुलाकात होने पर मैंने उन्हें ईश्वर की याद दिलाई। वह धीरे-2 भवन के अंदर को सरक गईं और ओझल हो गईं। उनका रूप पहले से कुछ अधिक स्वच्छ लग रहा था। सूक्ष्म शरीर भगवान के तेज को ज्यादा देर सहन नहीं कर सकता।

अंतिम बार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को बहुत निर्मल देखा

वे मेरे पुश्तैनी घर के मुख्य गेट से बरामदे में प्रविष्ट हो रही थीं। उन्होंने उज्ज्वल सफेद कपड़े पहन रखे थे। वे बहुत निर्मल, शान्त व आनन्दमयी लग रही थीं। उनसे मिल कर मेरा रोम-2 खिल उठा। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ गया था। मैंने कहा कि मैं हरिद्वार गया था। हरिद्वार भगवान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यह विश्वप्रसिद्ध योग राजधानी ऋषिकेश के नजदीक स्थित है। वे मुस्कुराते हुए व मुझसे यह पूछते हुए भवन के अंदर प्रविष्ट हुईं कि क्या मैं उससे पहले हरिद्वार नहीं गया था। उनका पूछने का मतलब था कि मैं पहले भी तो हरिद्वार गया हुआ था।

जब मेरे चाचा का सूक्ष्म शरीर मुझे चेतवानी देने आया था

उससे कुछ समय पहले मेरे चाचा की मृत्यु हाईपर थायरेडिसम बीमारी के कारण अचानक हृदय गति रुकने से हुई थी। वे बड़े मिलनसार व सामाजिक होते थे। ड्रीम विजिटेशन में मुझे वे अपनी मित्रमण्डली के साथ होहल्ला व हंसी मजाक करते हुए एक विचित्र सी अंधेरी पर शांत गुफा के अंदर चलते मिले। मैं और मेरी 5 साल की बेटी भी कुछ अजीब, चन्द्रमा की रौशनी से मिश्रित अंधेरे वाली और आनंद वाली जगह पर कुछ सीढ़ियां चढ़ कर उनके पीछे चल दिए। गुफा के दूसरे छोर पर बहुत तेज स्वर्ग के जैसा प्रकाश था। चाचा ने मुझसे मुस्कुराते हुए अपने साथ चलने के लिए पूछा। मैंने अनहोनी की आशंका से मना कर दिया। मेरी बेटी को वह नजारा बड़ा भा रहा था, इसलिए वह उनके साथ चलने के लिए जिद करने लगी। मैंने उसे बलपूर्वक रोका और हम गुफा से बाहर वापिस लौट आए। अगले दिन मेरी कार सड़क से बाहर निकलने से बाल-2 बच गई। साथ बैठी हुई मेरी फैमिली ने मुझे समय रहते चेता दिया था।

अपरिचित की आत्मा भी ड्रीम विजिटेशन में सहायता माँग सकती है

मेरे एक रिश्तेदार के लड़के को सपने में एक मंदिर के साधु बार-2 आकर अपना अंतिम संस्कार करने के लिए कहते थे। खोजबीन करने पर पता चला कि उन साधु की हत्या हो गई थी और उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मेरे उन रिश्तेदार ने साधु का पुतला बनवाया और उसका विधिवत अंतिम संस्कार करवाया। उसके बाद उन साधु का सपने में आना बंद हो गया। मैं उस बात पर यकीन नहीं करता था। पर अपने खुद के उपरोक्त ड्रीम विजिटेशन के अनुभव के बाद वैसी अलौकिक घटनाओं पर विश्वास होने लग गया।