दोस्तों! आध्यात्मिक शास्त्र उच्च कोटि के ज्ञान से भरे पड़े हैं। अगर उनके साथ अनुभव का तड़का भी लग जाए तो बात कुछ और ही हो जाती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम सभी दुनियादारी में उलझे हुए आदमी हैं। हमारा अनुभव इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता कि वह स्वतंत्र रूप से पारलौकिक तथ्यों को सिद्ध कर सके। हां, अगर हमारा अनुभव शास्त्रों के प्रामाणिक तथ्यों जैसा है, तब हमारा अनुभव प्रामाणिक माना जा सकता है। मैं भी अपने ऐसे ही एक छोटे से अनुभव को इस पोस्ट के अंत में साझा करूंगा।
शास्त्रों में प्रलय-काल की प्रकृति को साम्यावस्था की स्थिति के तौर पर बताया गया है। मतलब इसमें इसके तीनों गुण अपने-अपने एक समान स्तर पर बने रहते हैं। बदलते नहीं हैं।ऐसा जरूरी नहीं कि जितना सतोगुण है, उतना ही रजोगुण है और उतना ही तमोगुण है। बल्कि इसका यह मतलब है कि बेशक सब की भिन्न-भिन्न मात्रा है पर हरेक गुण अपनी विशिष्ट मात्रा पर एक समान बना रहता है। वह कम या ज्यादा नहीं होता। उदाहरण के तौर पर अगर सतोगुण का अनुपात 1 है तो एक ही रहेगा। तमोगुण का 5 है तो 5 ही रहेगा और रजोगुण का तीन है तो तीन ही रहेगा। अगर तीनों गुण एकदूसरे के बराबर हुआ करते तो विभिन्न सृष्टियों में विभिन्नता न हुआ करती, बल्कि सभी सृष्टियां बिल्कुल एक समान हुआ करतीं। इसी के साथ, सभी आदमी भी एक जैसे हुआ करते, उनमें भी कोई विभिन्नता न हुआ करती। और तो और, फिर तो सभी दिवंगत आत्माएं भी एकजैसी हुआ करतीं। पर ऐसा तो संभव नहीं है, क्योंकि सृष्टि में विभिन्नता हरेक स्तर पर दिखाई देती है। कुछ आत्माएं पवित्र होती हैं, जो हर तरह से भला करती हैं। पर कुछ आत्माएं पापपूर्ण भी होती हैं, जो नुकसान करने से जरा भी नहीं हिचकतीं। बेशक शरीर न होने के कारण दिवंगत आत्माएं जानबूझ कर भला या बुरा नहीं कर सकतीं, पर उनके सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र से खुद ही भला या बुरा होता है। शायद इसे ही शास्त्रों में प्रेत योनि कहा है। मतलब है तो यह दिवंगत और शरीररहित आत्मा ही, पर बहुत लंबे समय तक इसे शरीर न मिलने के कारण इसे मनुष्य योनि की तरह ही एक स्थायी योनि मान लिया गया हो। बेशक यह सूक्ष्म योनि है। उदाहरण के लिए, कई भयानक सड़क दुर्घटना के स्थानों पर बारबार दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इसके लिए वहां भटकी हुई या बिना गति लगी हुई या बिना स्थूल योनि को प्राप्त हुई बुरी प्रेतात्मा को जिम्मेदार मानकर वहां भगवान हनुमान आदि देवता के मंदिर या मूर्ति को प्रतिष्ठित किया जाता है। कहते हैं कि उससे दुर्घटनाओं का सिलसिला रुक जाता है। शायद देवता से पैदा सकारात्मक ऊर्जा बुरी प्रेतात्मा की नकारात्मक ऊर्जा को निष्प्रभावी कर देती है। शायद बहुत उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा को ही देव योनि कहा जाता हो।
दोबारा सृष्टि-निर्माण से कुछ नहीं बदलता। सिर्फ प्रकृति में पहले से विद्यमान गुणों में क्षोभ पैदा होता है। मतलब कभी सतोगुण अपने आधारभूत स्तर से एकदम से बढ़ जाता है, तो कभी तमोगुण तो कभी रजोगुण। इस तरह से हर-एक गुण का स्तर लगातार बदलता रहता है। जो आदमी ज्यादा क्रियाशील है, उसमें ज्यादा जल्दी से बदलता रहता है। जो कम क्रियाशील है, उसमें कम रफ्तार से बदलता रहता है। आप सोचेंगे कि मैं यहां प्रकृति से आदमी के ऊपर क्यों आ गया। वास्तव में प्रकृति का अनुमान आदमी से ही लगाया गया है। सीधे तौर पर तो कोई भी समष्टि मतलब सर्वव्यापक प्रकृति को अनुभव नहीं कर सकता है। पर व्यष्टि अर्थात सीमित प्रकृति के रूप में स्थित आदमी के जन्म-मरण को जरूर अनुभव किया जा सकता है। योगियों ने इसे अनुभव किया है, जिसके आधार पर ही भारतीय दर्शन और शास्त्र बने हैं।
मरने के बाद आदमी के तीनों गुण अपने-अपने औसत स्तर पर आ जाते हैं और फिर बदलते नहीं। गुणों में क्षोभ पैदा करने के लिए शरीर चाहिए। वह मरने के बाद होता नहीं। जीवित अवस्था में मन के सुंदर विचारों से सतोगुण बढ़ता है। मन की ज्यादा क्रियाशीलता से रजोगुण बढ़ता है, और अकेलेपन या अवसाद जैसी अवस्था में तमोगुण बढ़ता है। ये सारे गुण रहते तो मरने के बाद भी हैं, पर बदलते नहीं हैं। मतलब आदमी कभी नहीं मरता। हमें आदमी मरा हुआ इसलिए लगता है क्योंकि हम गुणों के तूफान में उलझे होते हैं। इससे हमें गुणों की सूक्ष्म अवस्था नजर नहीं आती। यह ऐसे ही है, जैसे चकाचौंध रोशनी के बाद सामान्य अंधेरा भी घुप्प अंधेरा लगता है। हां, जब कुंडलिनी योग से गुणों का तूफान कुछ शांत हो जाता है, तब दिवंगत आत्मा से साक्षात्कार की संभावना बढ़ जाती है। अब आप पूछेंगे कि मरने के बाद गुणों की वह आधारभूत अवस्था कैसे निर्धारित होती है। वास्तव में वह आदमी के पिछले सभी जन्मों के गुणों का औसत होती है। मतलब अगर कोई ज्यादा सतोगुण में रहा है तो आधारभूत सत्त्वगुण ज्यादा रहता है। क्योंकि सतोगुण पुण्य कर्म से बनता है, मतलब उसमें उसके सभी अच्छे कर्मों का लेखा जोखा भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान होता है। जिसके रजोगुण का औसत ज्यादा होगा, उसके कर्म उद्यमशीलता और व्यापार आदि के ज्यादा रहेंगे। ज्यादा तमोगुण का मतलब ज्यादा पाप कर्मों का संचय। मतलब कि गुणों के रूप में सभी कर्म अपनी आधारभूत अवस्था में रहते हैं। हो सकता है कि यह व्यवस्था इतनी निपुण हो कि औसत की बजाय हर एक कर्म अलग-अलग गुण के रूप में पृथक रूप में मौजूद हो। इसकी और शास्त्र यह इशारा करते हुए लिखते हैं कि हर-एक कर्म का फल उस कर्म के अनुसार मिलकर ही रहता है।
खैर मुझे जो पवित्र दिवंगत आत्मा का अनुभव हुआ था, उसमें तो मुझे गुणों की समान और औसत अवस्था ही महसूस हुई थी। मतलब कि आत्मा एक अंधेरे आकाश की तरह महसूस हो रही थी। पर उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व नजर आ रहा था, जिस आदमी की वह दिवंगत आत्मा थी। मतलब वह मुझे मरा हुआ ही नहीं लग रहा था, बल्कि जीवित से भी ज्यादा जीवित लग रहा था। वह व्यक्ति जीवित अवस्था से भी ज्यादा नजर आ रहा था। मतलब उस आत्मा में उसके पिछले जन्मों की छाप भी थी। मतलब वह प्रलय-काल की साम्य-अवस्था वाली प्रकृति ही थी, जिसमें कोई क्षोभ पैदा नहीं हो रहा था। इस आत्मा के अनुभव का वर्णन मैंने इस ब्लॉग की कुछ पुरानी पोस्टों में विस्तार से किया है। अब आप ही बताओ कि समुद्र के निश्चल जल में और उसी जल की लहरों में क्या अंतर है, कुछ भी नहीं? इसी तरह से शरीर-स्थित आत्मा में और दिवंगत आत्मा में भी कोई अंतर नहीं है। जब गुणों और कर्मों के संयोग से उस दिवंगत आत्मा को पुनः नया शरीर मिलता है, तो फिर से उसके गुणों में क्षोभ शुरु हो जाता है, जिसे हम पुनः नई सृष्टि का आरंभ कहते हैं।
मुझे लगता है कि किसी आत्मा के साक्षत्कार के लिए उस आत्मा की इच्छा भी होनी चाहिए मिलने की और उस मिलन को कुछ निर्णायक क्षणों तक झेलने के लिए और आत्मा से बात करने के लिए आदमी में पर्याप्त मानसिक शक्ति भी होनी चाहिए। यह एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से ही संभव लगता है, साधारण से नहीं। साथ में, अपना शरीर न होने के कारण आत्मा तो कोई इच्छा जाहिर नहीं कर सकती। मतलब कि आत्मा में वह इच्छा उसकी शरीरयुक्त जीवित अवस्था में होनी चाहिए, खासकर उसके मरते समय। इसी को अंतिम इच्छा कहते हैं। इसीलिए इसको बहुत महत्त्व दिया जाता है। उसे पूरा किया जाता है और मरणासन्न व्यक्ति को उसे पूरा करने का वचन दिया जाता है, ताकि उसकी आत्मा उस इच्छा की वजह से भटके न। ये गुत्थियां धीरे-धीरे सुलझती हैं, एकदम से नहीं। मैं भी सपरिवार उन व्यक्ति से मिलने उनकी मरणासन्न अवस्था में थोड़ा देर से पहुंचा था। वे मुझसे बात करना चाहते थे, पर बोल नहीं पा रहे थे। सिर्फ छोटी सी चीख ही उनके मुंह से निकलती थी और वे फिर बेहोश से हो जाते थे। देख तो वे सकते ही नहीं थे। शायद वे कुछ सुन और समझ पा रहे थे, पर देख व बोल नहीं पा रहे थे। उसके दो तीन घंटे बाद ही उनकी आत्मा मुक्त गगन को प्रस्थान कर गई थी। अध्यात्म में बहुत कुछ है। यह तो आइसबर्ग का सिर्फ टिप मात्र है।