मानवतापूर्ण समस्याएँ भी कुण्डलिनी को क्रियाशील करती हैं

मानवतापूर्ण समस्याएँ क्या हैं

ऐसी समस्याएँ जो सतही या आभासिक होती हैं, तथा जिनसे अपना या औरों का कोई अहित नहीं होता है, वे मानवतापूर्ण समस्याएँ कहलाती हैं। उदाहरण के लिए, किसी को प्रेमसंबंध के टूटने की समस्या का आभास होता है। यद्यपि वास्तविकता यह होती है कि उसका प्रेमप्रसंग कभी चला ही नहीं होता है। ऐसा ही आश्चर्यजनक एहसास प्रेमयोगी वज्र को भी हुआ था, जिससे उसे क्षणिक आत्मजागरण की अनुभूति होने में मदद मिली थी।

अन्य उदाहरण हम उपवास का लेते हैं। वह हमें समस्या की तरह लगता है, जबकि वास्तव में वैसा होता नहीं है। उपवास से शरीर और मन के साथ कुण्डलिनी को भी ऊर्जा मिलती है।

मानवता के लिए समस्या झेलना भी मानवतापूर्ण समस्या है

जप, तप, योग आदि आध्यात्मिक गतिविधियाँ इसका अच्छा उदाहरण हैं। देश, समाज, मानवीय धर्म, परिवार आदि के लिए समस्या सहना मानवीय समस्या है। समस्या से जितनी अधिक सत्यता व शुद्धि के साथ जितने अधिक लोगों का भला होगा, उसकी मानवता उतनी ही अधिक होगी।

मानवतापूर्ण समस्या से क्या होता है

मानवतापूर्ण समस्या से आदमी मानवता से प्रेम करने लगता है। वह सभी मनुष्यों से प्रेम करने लगता है। उसके मन में एक विशेष मनुष्य (गुरु,मित्र,देव आदि) की छवि बस जाती है। समय के साथ वही फिर कुण्डलिनी बन जाती है। प्रेमयोगी वज्र के साथ भी यही हुआ। शरीरविज्ञान दर्शन के प्रभाव से चल रही उसकी अति क्रियाशीलता के कारण उसके मन में उन वृद्धाध्यात्मिक पुरुष की छवि पुष्ट होती गई।

मानवीय समस्या से कुण्डलिनी कैसे विकसित होती है

जब कुण्डलिनी मन में काफी मजबूत हो जाती है, तब एक समय ऐसा आता है कि व्यक्ति काम के व कुण्डलिनी के दोहरे बोझ से टूट जैसा जाता है। वैसी स्थिति में जैसे ही कोई बड़ी आभासिक समस्या उसके रास्ते में आए, तो वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के समक्ष आत्मसमर्पण कर देता है, और कुण्डलिनी के आश्रित हो जाता है। इससे उसकी कुण्डलिनी क्रियाशील हो जाती है।

क्रियाशील हो चुकी कुण्डलिनी फिर कैसे जागृत होती है

कुण्डलिनी के क्रियाशील हो जाने के बाद समस्याग्रस्त व्यक्ति का मानसिक अवसाद घट जाता है, और आनंद बढ़ जाता है। इससे कुण्डलिनी पर उसका विश्वास बढ़ जाता है, और उसे लगता है कि उसकी कुण्डलिनी से ही उसको सभी समस्याओं से सुरक्षा मिलती है। फिर वह कुण्डलिनी को जागृत करने वाले योग आदि शास्त्रों का अध्ययन और उनका अभ्यास करने लगता है। इससे उसका योग से सम्बंधित ज्ञान और अभ्यास आगे से आगे बढ़ता रहता है। अंततः उसकी कुण्डलिनी जागृत हो जाती है।

प्रेमयोगी वज्र को कैसे समस्या से कुण्डलिनी के लिए एस्केप विलोसिटी मिली

प्रेमयोगी वज्र शरीरविज्ञान दर्शन के प्रभाव से प्राप्त हो रहीं मानवीय समस्याओं, विभिन्न मानवीय कामों और कुण्डलिनी के बोझ से टूट जैसा गया था, शारीरिक रूप से। उसकी स्मरणशक्ति भी काफी घट गई थी। यद्यपि उसके मन में आनंद व शान्ति काफी बढ़ गए थे। फिर उसे घर से बहुत अधिक दूर सपरिवार शान्ति के साथ एक मनोरम स्थान पर रहने का मौक़ा मिला। घर से वहां तक आवागमन के लिए उसने अत्याधुनिक व बहुत महंगी गाड़ी खरीदी। उसको उसमें ड्राईवर सीट कम्फर्ट नहीं मिला। वह बहुत पछताया, पर जो होना था, वह हो चूका था। अपने को संभालने के लिए वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के सहारे होकर मन में उसका ध्यान करने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी चमकने लगी, और उसकी चिंता लगभग समाप्त ही हो गई। इससे आश्वस्त होकर वह ई-बुक्स, पेपर बुक्स, इंटरनेट व मित्रों की मदद से योग सीखने लगा। उससे उसकी कुण्डलिनी एक साल में ही बहुत मजबूत हो गई। उसके अंतिम एक महीने में यौनयोग की सहायता लेने पर वह जागृत हो गई। उसके बाद वह अपनी गाड़ी का अभ्यस्त हो गया, तथा उसे पता चला कि उसकी गाड़ी का कम्फर्ट दरअसल अन्य गाड़ियों से कहीं अधिक था। इसका अर्थ है कि उसकी समस्या असली नहीं बल्कि आभासिक थी, जो उसकी कुण्डलिनी को जगाने के लिए उसके अन्दर पैदा हुई थी।

कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है।

आभासिक समस्या सफलता के लिए भरपूर कोशिशों के बाद होनी चाहिए

यदि थोड़े से एफर्ट्स के बाद ही समस्या का सामना करना पड़े, तब आदमी का विश्वास विविधतापूर्ण दुनियादारी पर बना रहता है, और वह कुण्डलिनी के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण नहीं करता। परन्तु जब भरपूर प्रयास करने के बाद भी आदमी को हानि का ऐहसास होता है, तब दुनिया से उसका विश्वास उठ जाता है, और वह पूरी तरह से कुण्डलिनी के सामने घुटने टेक देता है, ताकि बिना भौतिक मशक्कतों के ही उसे प्राण-रस या जीवन-रस मिलता रहे। यह सिद्धांत है कि भरपूर प्रयासों के बाद आने वाली समस्याएँ आभासिक या सकारात्मक ही होती हैं, वास्तविक या नकारात्मक नहीं।

इस कुंडलिनी उत्प्रेरक समस्या को भौतिक दुनियादारी के प्रति सकारात्मक और अस्थायी अविश्वास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है

इस कुंडलिनी उत्प्रेरक समस्या को बहुत से लोग भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक आघात / ट्रामा के रूप में परिभाषित करते हैं। हालांकि यह वास्तव में आघात नहीं है, क्योंकि आघात तो व्यक्ति को नीचे गिराता है, कुंडलिनी की असीमित ऊंचाइयों तक नहीं उठाता। वास्तव में इसे भौतिक दुनिया के प्रति विश्वास के सकारात्मक और अस्थायी रूप से क्षीण होने के रूप में कहा जाना चाहिए, जो कि व्यक्ति को कुंडलिनी {एकमात्र मानसिक छवि} की मानसिक दुनिया की ओर प्रेरित करता है।

तंत्र के अनुसार भौतिक दुनियादारी से मन भरने पर ही कुण्डलिनी आसानी से प्राप्त होती है

एक व्यक्ति को जीवन के हरेक क्षेत्र का अनुभव होना चाहिए {जैसा प्रेमयोगी वज्र को था}, नहीं तो भौतिक दुनिया के प्रति लालसा से उसका मन दुनिया में रमा रहेगा। वह पार्याप्त रूप से समृद्ध भी होना चाहिए {जैसा प्रेमयोगी वज्र था}, नहीं तो उसे कमाई की चिंता बनी रहेगी, जिससे उसका मन दुनिया से नहीं हटेगा। सीधी सी तंत्रसम्मत बात है कि जिसका मन भौतिक दुनिया की सकारात्मक, कर्मपूर्ण व मानवीय रंगीनियों से भर गया हो, उसे ही उससे ऊपर उठने का मौक़ा आसानी से मिलता है।

कुण्डलिनी के विलयन से आत्मज्ञान

योग-साधना करते-२ एक समय ऐसा आता है, जब कुण्डलिनी आत्मा में विलीन होने लगती है। तब व्यक्ति का विश्वास कुण्डलिनी से भी हटकर आत्मा पर केन्द्रित हो जाता है। उसके दौरान ही उसे क्षणिक आत्मज्ञान हो जाता है। ऐसा ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ था, जिसका वर्णन उसने अपनी हिंदी में पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” तथा अंग्रेजी में पुस्तक “Love story of a Yogi- what Patanjali says” में विस्तार के साथ किया है।

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मानवता से भरी हुई ख़ुशी ही असली व कुण्डलिनी से जुड़ी हुई ख़ुशी है

वैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि मानवता से भरी हुई ख़ुशी से ही मानव का विकास होता है। यही बात वैदिक संस्कृति में व विभिन्न धर्मों में शुरू से लेकर कही जा रही है। उन्होंने तीन प्रकार के लोगों के समूहों के जीनोम का अध्ययन किया। उन्होंने साधारण समूह के साधारण जीनोम को मापा। वह जीनोम साधारण था। फिर उन्होंने उसमें से दो समूह बनाए। एक समूह को मानवता से भरी  हुई ख़ुशी (Eudaimonic) अपनाने को कहा तो दूसरे समूह को स्वार्थ से भरी हुई ख़ुशी अपनाने को। जब उनके जीनोम को मापा गया, तो उन्होंने पाया कि मानवता वाले समूह का जीनोम तेज गति से अभिव्यक्त/विकसित हो रहा था, जबकि स्वार्थ से भरी हुई ख़ुशी (Hedonic) वाले समूह का जीनोम वैसा ही था।

तो क्या कुण्डलिनी से भी जीनोम विकसित होता है?

मानवता की भावना से भी जीनोम विकसित होता है, यद्यपि मानवता से भरे हुए कर्मों की अपेक्षा कम गति से। वास्तव में आदमी भावनामय ही है। कर्म से भी भावना ही निर्मित होती है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि मानवता से भरी हुई भावना प्रबल हो, तो उससे जीनोम का विकास मानवता से भरे हुए कर्मों से भी आधिक हो सकता है। कुण्डलिनी (मानव रूप/गुरु/देवता/प्रेमी की स्पष्ट व स्थिर मानसिक छवि) भी तो मानवता से भरी हुई प्रबल भावना ही है। इसके विपरीत, यदि मानवता से भरे हुए कर्मों से मानवता से भरी भावना का निर्माण न हो रहा हो, तो उस कर्म से जीनोम के लिए विशेष लाभ प्रतीत नहीं होता।

वैदिक संस्कृति में मानवता से भरी भावना पर जोर

इन्हीं उपरोक्त कारणों से संस्कृत मन्त्रों को भावनामय बनाया गया। वे एकदम से प्रबल मानवता की भावना को विकसित करते हैं। कई बार उनके सामने मानवता से भरे हुए कर्म भी बौने पड़ जाते हैं।

कुण्डलिनी व मानवता से भरी हुई भावना के बीच में सम्बन्ध

कुण्डलिनी परम प्रेम का प्रतीक है। प्रेम ही मानवता का सबसे प्रमुख मापदंड है। इसका अर्थ है कि कुण्डलिनी योग से भी जीनोम विकसित होता है। यह वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित है। मानवता से भरी हुई ख़ुशी से भी जीनोम धीरे-धीरे विकसित होता हुआ एक ऐसी आवस्था पर पहुँच जाता है, जो कुण्डलिनी को सक्रिय कर देता है। कुण्डलिनी जागरण से तो जीनोम के विकास को एकदम से पंख लग जाते हैं।

वैदिक संस्कृति में मानवता की भावना के कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण

यत्पिंडे तत्ब्रम्हांडे

इसका अर्थ है कि जो कुछ ब्रम्हांड में है, वह सभी कुछ हमारे अपने शरीर में भी है।

पुरुषसूक्त

इसमें ब्रम्हांडरूपी मानव शरीर का वर्णन किया गया है।

सर्वदेवमया धेनुः

इसका अर्थ है कि गाय के शरीर में सभी देवता विद्यमान हैं। इसलिए गाय आदि जीवों की सेवा करने से सभी देवताओं की अर्थात पूरी सृष्टि की सेवा हो जाती है। इससे परम मानवता से भरी भावना विकसित होती है।

शक्तिपीठ

देवी के बहुत से शक्तिपीठ हैं। जिस भूमि-स्थान पर देवी के शरीर का कोई विशेष अंग गिरा है, वह एक विशेष शक्तिपीठ के रूप में प्रख्यात हुआ है। नैनादेवी नामक शक्तिपीठ में देवी के नयन गिरे हैं। इसी तरह ज्वालाजी में देवी की जिह्वा गिरी है। इसी तरह और भी हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि जब एक विशेष भूमि-स्थान देवी के एक अंग के रूप में है, तब वहां रहने वाले सभी प्राणी विशेषकर मनुष्य उस अंग के घटक/देहपुरुष (कोशिकाएं, जैव-रसायन आदि) हैं। इसलिए सभी सेव्य हैं। यह दर्शन पूरी तरह से शरीरविज्ञान दर्शन से मेल खता है।

शरीरविज्ञान दर्शन सम्मत मन्त्र

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः, सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं। 
पूजा ते विषयोपभोग रचना, निद्रा समाधिः स्थितिः।।
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः, स्तोत्राणि सर्वौ गिरौ।
यत्यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनं।।

यह उपरोक्त मन्त्र भी शरीर को संपूर्ण सृष्टि के रूप में दिखा रहा है, तथा इसकी सेवाचर्या को ईश्वर की अराधना बता रहा है।

निष्कर्ष

उपरोक्तानुसार भावना करते रहने से अपने लिए स्वार्थपूर्ण ढंग से किए गए सभी काम भी पूरे ब्रम्हांड के लिए किए गए काम बन जाते हैं। प्रेमयोगी वज्र द्वारा रचित शरीरविज्ञान दर्शन में भी यह तथ्य वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया जा चुका है।

शरीरविज्ञान दर्शन से मानवता की भावना

इस दर्शन में वैज्ञानिक रूप से दिखाया गया है कि किस प्रकार हमारे अपने शरीर में सभी प्रकार के प्राणी, सभी प्रकार की संरचनाएं व सभी प्रकार के क्रियाकलाप मौजूद होते हैं। हमारे अपने शरीर में भी विविध प्रकार की विशाल पर्वतमालाएं, व जल-स्रोत हैं। बड़े-२ उद्योग हैं। व्यापक कृषिसंपन्न भूभाग हैं। घने जंगल हैं, जिनमें चित्र-विचित्र जंगली जानवर निवास करते हैं। लोगों की विकसित सभ्यता है। अनेक प्रकार के कार्यकारी विभाग हैं, जैसे कि जल-विभाग, संचार-विभाग आदि-२। इसमें हर समय देवासुर संग्राम चलता रहता है। अलौकिक प्रेम-प्रसंग भी देखने को मिलते रहते हैं। इस वैज्ञानिक दर्शन को भलीभांति समझ जाने पर आदमी सदा के लिए प्रसन्न व मानवतावादी बन जाता है। उसके द्वारा अपने शरीर की भलाई के लिए किए गए सारे क्रियाकलाप स्वयं ही पूरी सृष्टि की भलाई के लिए किए गए क्रियाकलाप बन जाते हैं। अगर तो शरीरविज्ञान दार्शनिक कर्म भी दूसरे जीवों की भलाई के लिए करने लगे, तब तो इस दर्शन से और भी अधिक लाभ मिलता है। इससे उसका जीनोम शीघ्र विकसित होकर उसकी कुण्डलिनी को सक्रिय कर देता है।  

Interestingly, molecular analysis of hedonic and eudaimonic individuals revealed quite different gene expression patterns. Individuals with high hedonic happiness showed increased pro-inflammatory gene expression and decreased expression of genes associated with antibody synthesis ——

Different Molecular Profiles of Eudaimonic and Hedonic Happiness

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