कुंडलिनी तंत्र की अनियंत्रित शक्ति ही बांग्लादेश में मुस्लिम जिहादियों की भीड़ से अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार करवा रही है

सभी प्रिय पाठकों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई

दोस्तो, इस पोस्ट में बहुत से रहस्य छिपे हुए हैं। मुझे तो यह गागर में सागर की तरह लग रही है। मूलाधार चक्र सिर्फ मेरुदंड के आधार पर कोई स्थान विशेष नहीं है। यह आत्मा या मन की अवस्था भी है, जिसमें सांसारिकता का कचरा नगण्य सा बचा होता है। सहस्रार चक्र पर ज्ञान या सात्त्विकता से जुड़े अहंकार का कचरा होता है। आज्ञा चक्र पर बुद्धिमत्ता का कचरा होता है। विशुद्धि चक्र पर वाणी से संबंधित कचरा होता है। अनाहत चक्र पर भावनाओं से जुड़ा कचरा होता है। मणिपुर चक्र पर भोजन से संबंधित सांसारिक विचारों का कचरा होता है। स्वाधिष्ठान चक्र पर प्रजनन व यौनता से जुड़ा कचरा होता है। मूलाधार चक्र पर शौच से जुड़ा सांसारिक कचरा होता है। मतलब कि जब मन पर जमा हुआ संसार का सारा कचरा नष्ट हो जाता है, तब मन अपने असली पुरातन रूप में आ जाता है। मन का वह आदिम या आदिकालिक रूप मूल प्रकृति ही है। यही मूल आधार मतलब मूलाधार है। यह चेतना का सबसे निचला स्तर होता है। इसीलिए इसको शरीर का सबसे निचला स्थान दिया गया है। मूलाधार से अगर यह क्रमवार चक्रों से होकर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है, तब यह पुनः सांसारिक कचरा इकट्ठा करने लगता है। अक्सर आदमी के साथ ऐसा ही होता है। आपने सुना भी होगा। जैसे कि फलां आदमी बिल्कुल दिवालिया या कंगाल हो गया था या सड़क पर आ गया था। फिर उसने धीरे-धीरे तरक्की करते हुए अपार धन संपदा इकट्ठी कर ली। वह दरअसल मूलाधार में पहुंच गया था, सब कुछ खोकर। मूलाधार में अपार ध्यान शक्ति होती है। यह इसलिए क्योंकि वहां सांसारिक कचरे का व्यवधान नहीं होता। उस ध्यान शक्ति को उसने कुंडलिनी योग साधना में नहीं लगाया, पर प्रचुर धन संपत्ति इकट्ठा करने में लगाया। सब कुछ तो नहीं मिल सकता न। शक्ति की भी एक सीमा होती है। इधर लगाओगे, तो उधर के लिए नहीं बचेगी। उधर लगाओगे, तो इधर के लिए नहीं बचेगी। अगर थोड़ा थोड़ा दोनों तरफ लगाओगे, तो न इधर कुछ हासिल होगा, न उधर। ऐसा इसलिए, क्योंकि हर एक उपलब्धि के लिए एक मुक्तिगामी वेग अर्थात एस्केप वेलोसिटी की जरूरत होती है। यह अधिकतम शक्ति से ही हासिल होती है। कई लोग जानबूझकर कुंडलिनी साधना को ठुकराते हैं, क्योंकि उनकी मजबूरी होती है। पेट का भरण पोषण ज्यादा महत्वपूर्ण है, कुंडलिनी जागरण बाद में। कई लोग जीवन जीने का भरपूर गुजारा होते हुए भी धन के लालच में आकर इसे मूर्खतापूर्वक ठुकराते हैं। पर अधिकांश लोगों को तो कुंडलिनी साधना का ज्ञान ही नहीं होता। यह इसलिए क्योंकि इसे आदि काल से आम आदमी से छुपाया जाता रहा है। खासकर बालकों और किशोरों से तो पूरी तरह से छुपाया गया है। युवावस्था में वह काम धंधों की उलझनों में फंस कर इस बारे जानकारी हासिल नहीं कर पाता। जब वह परिपक्व और बूढ़ा होने लगता है, तब उसे इसकी जानकारी दी जाती है। पर तब शरीर की अशक्तता के कारण तांत्रिक कुंडलिनी साधना हो नहीं पाती। अपनी बूढ़ी उम्र में अगर आदमी मूलाधारवासिनी नागिन का मुंह हमेशा ऊपर की ओर मोड़ के रखेगा तो प्रोस्टेट तो बढ़ेगा ही। महाराज ओशो ने इसीलिए तांत्रिक संभोग से पर्दा उठा कर उसे सार्वजनिक किया। मैं उस काम के लिए उन्हें दाद देता हूं।

तांत्रिक कुंडलिनी योग को छिपाने की मुख्य वजह मुझे यह लगती है कि कई बार इससे मिलने वाली शक्ति को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। उससे आदमी हिंसक भी बन सकता है, पागल भी बन सकता है। बांग्लादेश में क्या हो रहा है? मुझे तो लगता है कि जिहादियों के पास वही अनियंत्रित कुंडलिनी शक्ति है, जो वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं को इसका निशाना बनाते हुए उनसे अनगिनत कुकर्म करवा रही है। इस्कॉन कृष्ण मंदिर का हाल ही देख लीजिए, सबकुछ टूटा फूटा हुआ और देव मूर्तियां तहस नहस। साथ में, उनका कुंडलिनी तंत्र को अपनाने का तरीका भी तो गलत और अधूरा जैसा ही है। लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। इसलिए हिंदुओं के वेदपुराण बने थे ताकि लोग उनके अनुसार प्रारंभिक जीवन जीते हुए आराम और सुरक्षा के साथ कुंडलिनी तंत्र तक पहुंचकर उसे अपनाते और बिना दुष्प्रभाव के उसमें सफल होते। पर ये क्या, जेहादी मानसिकता के लोग तो सीधे ही मतलब वेदों की सहायता लिए बिना ही साधना के अंतिम पायदान मतलब निराकार ब्रह्म तक पहुंच जाते हैं, वह भी तांत्रिक क्रियाओं जैसे कृत्यों के साथ। इससे नुकसान तो होगा ही। वेदपुराण न पढ़ने होते तो शरीरविज्ञान दर्शन ही पढ़ लेते, क्योंकि यह वेदपुराणों का आधुनिक और संक्षिप्त स्पष्टीकरण ही लगता है मुझे। आप ही सोचो कि क्या कोई आदमी एबीसी सीखे बिना ही अंग्रेजी में पीएचडी कर सकता है? करने लगेगा तो कन्फ्यूज या पागल तो होगा ही। मतलब कि छिपाने का प्रयास करते हुए भी यह विद्या छिपी कहां है, साथ में यह इसके सुपात्र लोगों को भी नहीं मिल पा रही है। ऐसे भी अतिवादी इसे गलत ढंग से भी तो सीख ही रहे हैं, यदि विद्वान इसे न छिपाते तो सही ढंग से तो सीखते। इससे अच्छा होता कि इसे नियंत्रण करने के तरीके खोजे जाते और सार्वजनिक किए जाते।

लोकतंत्र के अनेक लाभ हैं, पर यह बहुसंख्यक आबादी मुख्यतः कट्टरपंथी जिहादियों द्वारा किए जाने वाले जुल्मों पर लगाम नहीं लगा पा रहा है। शेख हसीना ने कोशिश की तो उसे जान बचा कर भागना पड़ा। अगर लगाम लगा भी देती तो बहुसंख्यक आबादी उसे चुनाव में हरा देती, और फिर विपक्ष पर दबाव डालकर आजीवन कारावास या मृत्युदंड दिलवा देती या साजिशन खुद ही मरवा देती। इसी डर से राष्ट्राध्यक्ष उग्र भीड़ से मनमानी भरा तांडव करने देते हैं। आखिर जान तो सबको प्यारी होती है।

मूलाधार पर कुंडलिनी साधना करने वाले भी दो किस्म के लोग होते हैं। पहले किस्म के लोग कुंडलिनी का हर एक चक्र पर लंबे समय तक या महीनों तक एक ही चक्र पर ध्यान करते हुए धीरे-धीरे ऊपर चढ़ाते हैं। लगता है, आजकल ऐसे लोग कामयाब नहीं हो सकते। आज के आपाधापी के युग में सालों तक शांत व व्यवधानरहित जीवन नसीब नहीं हो सकता। गनीमत है अगर एक दो महीना या एक दो साल भी मिल जाए। ऐसे में कुंडलिनी बीच के ही चक्रों में फंसी रह सकती है। दूसरे किस्म के लोग बुलेट ट्रेन की तरह होते हैं। वे एकदम से संभोग आधारित तांत्रिक कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को सीधे ही एकदम से मूलाधार से सहस्रार तक चढ़ा देते हैं। ऐसे लोगों के लिए तो एक महीने का समय भी काफी होता है। अगर एक दो साल का उपयुक्त जीवन मिल जाए, तब तो कहने ही क्या।

स्पष्ट है कि आम आदमी मूलाधार और सहस्रार के बीच झूलता रहता है, विभिन्न चक्रों से होते हुए, जागृति को पाए बिना ही। वह कभी मुक्त नहीं हो पाता। कुंडलिनी जागरण भी मुक्ति की गारंटी नहीं है। मुक्ति तो सन्यासी की तरह मन को पूरी तरह से त्यागने से मिलती है, जो कि व्यवहारिक जीवन में संभव नहीं है। यह अलग बात है कि किसी चमत्कारिक व अनजाने तरीके से मुक्ति खुद ही मिल जाती हो, बेशक इसके लिए प्रयास तो करना ही चाहिए। मूलाधार और मूल प्रकृति की समकक्षता को देखकर तो यही लगता है कि आदमी का सांसारिक बंधन अनादि है, बेशक इसका अंत हो सकता है।

कुंडलिनी योग से सतोगुण और तमोगुण के बीच का रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है

आदमी चाह कर भी अपने गुणों की हलचल को नहीं रोक सकता। प्राणवायु गुणों में ऐसे ही लहरें पैदा करती रहती है, जैसे वायु समुद्र में तूफान पैदा करती है। हालांकि जिन योगियों ने प्राणायाम आदि से प्राणवायु को वश में कर लिया होता है, वे काफी हद तक इन लहरों को नियंत्रित कर के अपने असली व गुणों के आधारभूत स्तर वाले जीवात्म स्वरूप को जान भी लेते हैं। एक आदमी को लें जिसने हमेशा तूफान वाला समुद्र ही देखा है, और कभी भी शांत और निश्चल समुद्र नहीं देखा है। वह समझेगा कि समुद्र हमेशा ऐसा ही होता है और वही उसका असली स्वरूप है। उसे समुद्र के, बिना लहर वाले, असली व आधारभूत रूप के जैसे निश्चल जीवात्मा रूप का कोई ज्ञान नहीं होगा। उसे अगर उसकी जगह कभी बिल्कुल शांत समुद्र दिख गया या मान लो कि पोलर रीजन का ठंड से जमा हुआ समुद्र दिख गया, तो वह कहेगा कि समुद्र सूख गया या खत्म हो गया। ऐसे ही जिंदा आदमी को मरा हुआ देखने पर लोग कहते हैं कि वह तो मर गया, पर आदमी कभी नहीं मरता। यहां यह उल्लेखनीय है कि यह शरीर के प्रति लापरवाही जैसे कि स्वयं को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति या आत्महत्या आदि का सकारात्मक मूल्यांकन नहीं है। शरीर तो मरता ही है। फिर पता नहीं कब नया शरीर मिले, कैसा जैसा मिले, क्या पता कितनी कठिनाइयों के साथ मिले, मिलने के बाद भी पता नहीं कितने समय जिंदा रहे, किसको पता। इसलिए शरीर का भलीभांति ख्याल तो रखना ही चाहिए। इस बात का असली मतलब यह है कि आदमी की आत्मा कभी नहीं मरती, क्योंकि आत्मा ही आदमी का असली रूप है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी ने हमेशा मन की लहरों के रूप वाले अर्थात बदलते गुणों वाले अपने स्वरूप को ही महसूस किया है। उसे पता ही नहीं है कि यह लहरों वाला स्वरूप उसका आधारभूत स्वरूप नहीं है। उसने कभी योग, ध्यान आदि से मन को शांत नहीं किया। तूफान वाले सभी समुद्र एक जैसे ही लगते हैं, क्योंकि उनमें पानी ढंग से नजर नहीं आता। पर जब तूफान शांत हो जाता है, तब किसी का पानी नीला तो किसी का हरा नजर आता है। किसी का पानी कम तो किसी का ज्यादा नमकीन होता है। किसी में शैवाल आदि समुद्री वनस्पति कम होती है तो किसी में ज्यादा। किसी में किसी किस्म के समुद्री जलचर होंगे तो किसी में किसी अन्य किस्म के। इसी तरह ताबड़तोड़ मानसिक तूफान वाले आदमी भी एक जैसे लगते हैं। जैसे ही हम उनके किसी गुण पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं, वह गुण उसी पल बदल जाता है। इसी वजह से तो मृत्यु के बाद की आत्मा के साक्षात्कार से ही उसके आधारभूत गुणों वाले स्वरूप के बारे में सही और विस्तृत सूचना मिल सकती है। हालांकि ऐसा नहीं कि टीवी की तरह सबकुछ दिखता है, पर उसके औसत सूक्ष्म स्वरूप का अनुभव होता है। बेशक वह रूप हमें कुछ घुटन भरा लग सकता है, क्योंकि हमें उसकी आदत नहीं है। पर उस जीवात्मा को तो ऐसा नहीं लगेगा क्योंकि वह तो अपने उस स्वरूप की अभ्यस्त हो चुकी होगी।

सृष्टि में जितनी जीवात्माएं हैं, समुद्र भी उतने ही हैं

यह बहुत रोचक विषय है और लिखते रहने से नई से नई गुत्थियां सुलझती रहती हैं। और अगर साथ में थोड़ा बहुत अनुभव भी हो तब तो कहने ही क्या। ऊंची उठी लहर को सुख या सतोगुण मान लो और समुद्र की सामान्य सतह से नीचे गिरी हुई लहर को दुख या तमोगुण मान लो। जीवन भर मन में ऐसा ही चलता रहता है। मरने के बाद मन या आत्मा समुद्र की सामान्य सतह जैसा हो जाता है। न लहर ऊपर को और न नीचे को। न सुख, न दुख। पर ऐसा नहीं है, क्योंकि अगर गुण हैं तो सुख और दुख तो साथ रहेंगे ही। यह तो त्रिगुणातीत परमात्मा ही है जिसमें न सुख है न दुख, सिर्फ़ निरपेक्ष आनंद है। ऐसा समझ लो कि इसमें सतोगुण और तमोगुण दोनों ही हैं। हालांकि दोनों कम मात्रा में हैं क्योंकि उनको उठाने या गिराने वाला अर्थात उनमें लहरें पैदा करने वाला शरीर नहीं है। यही गुणों की साम्यावस्था है। मतलब सतोगुण भी एक बराबर और तमोगुण भी एक बराबर। कोई कहेगा कि फिर सभी लोगों में तीनों गुणों की मात्रा अलग अलग कैसे होगी। देखो, जिसमें मृत्यु के समय ज्यादा सतोगुण होगा, वह मृत्यु के बाद वहीं फिक्स हो जाएगा मतलब बाद में भी ज्यादा बना रहेगा। यह ऐसे ही कि अगर ध्रुवीय समुद्र के जमते समय उसकी लहर ऊपर को उठी होगी तो वह जमने के बाद भी उतनी ही ऊपर उठी रहेगी, वहां से बदलेगी नहीं। यह भी सत्य है कि मृत्यु के समय अक्सर गुण वैसे ही रहते हैं जैसे उसके पिछले सारे गुणों और कर्मों का औसत रूप होता है। मतलब सब लोगों की आत्मा में अंधेरे की अलग अलग मात्रा होगी। चाहे दो व्यक्ति आपस में कितने ही ज्यादा नजदीकी क्यों न हों, दोनों की आत्माओं में अंधेरे की मात्रा एकसमान हो ही नहीं सकती। यह असंभव है। कुछ न कुछ फर्क तो रहेगा ही। इसीलिए तो कभी आत्मा के मामले में धोखा नहीं होता कि फलां की आत्मा गलती से फलां के शरीर में चली गई। जो कथा कहानियों में होता है, वो शिक्षात्मक रूपक ही लगता है। जब किसी के शरीर पर प्रेत आदि का कब्जा होता है तो वह साफ बताता है कि वह प्रेत है। इसीलिए उसे तांत्रिक आदि से भगाया जाता है। अगर किसी की आत्मा की फोटोकॉपी बनने की किसी में ताकत होती तो प्रेत भी बन जाता। फिर किसी को पता न चलता और उसे दूसरे के शरीर से कोई भगाता भी न। पर ऐसा नहीं होता। इसीलिए कहते हैं कि मृत्यु के समय की मानसिक स्थिति मृत्यु के बाद की गति को निर्धारित करती है। इसीलिए कई लोग मरने के लिए काशी जैसे तीर्थों में जाते हैं, कई मृत्यु के समय गीता आदि आध्यात्मिक ग्रंथ सुनते हैं। यहां पर एक पेच और खुलता है। बेशक मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा के जैसा परिवर्तनरहित और हलचल से रहित, शांत और व्यापक बन जाता है, पर दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। जीवात्मा निर्गुण जैसा लगता हुआ भी तीनों गुणों से बंधा होता है, पर परमात्मा असली निर्गुण अर्थात गुणातीत होता है। इसीलिए वह जीवात्मा से भी ज्यादा और यूं कहो कि परम सूक्ष्म, परम व्यापक, परम परिवर्तनरहित, परम शांत, और परम सच्चिदानंद रूप होता है। यह खासकर उन लोगों को समझना चाहिए जो परमात्मा और जीवात्मा को करीब एकजैसा मानने के धोखे में पड़े होते हैं। कई दफनाए हुए मृत शरीर आदि की पूजा करते हैं। कई ऐसा समझते हैं कि मरने के बाद उनका जन्नत का टिकट कटा हुआ है।

कुंडलिनी योग कामयाब संभोग में मदद करता है

कुंडलिनी योग सेक्स का एक अभिन्न अंग है

एक और रहस्यपूर्ण तथ्य जो मैं आपको बताता हूँ, वह यह है कि यौन संपर्क के दौरान भी यह मूल स्तर की आत्मा का संपर्क सबसे गहरा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सेक्स के समय व्यक्ति दो यौन साथियों को छोड़कर पूरी तरह से अकेला रहना चाहता है। न दुनिया की और न ही दुनियावी विचारों की दखलंदाजी चाहता है। यह प्रवृत्ति ही यौन मामलों में शर्मीलेपन की उत्पत्ति करती है। कोई भी सार्वजनिक रूप से सेक्स नहीं करना चाहता क्योंकि तब वह सेक्स नहीं बल्कि केवल एक नाटक होता है। यहाँ तक कि कोई भी अपने वास्तविक यौन अनुभव के बारे में बात नहीं करना चाहता, धोखेबाज़ों द्वारा प्रचारित यौन नाटक की तो बात ही छोड़िए। तो सोचो कि सांसारिक अराजकता से पूरी तरह से दूर मूल आत्मा के रूप से अधिक अकेलापन क्या हो सकता है। यहाँ तक कि संभोग के समय यौन ऊर्जा भी इतनी अधिक होती है कि यह उस अल्पकालिक मूल आत्मा के संपर्क के समय पर्याप्त से अधिक आनंद प्रदान करती है। इस तरह प्रेम भी बढ़ता है। यह आम तौर पर देखा जाता है कि दिवंगत आत्मा का संपर्क अक्सर तांत्रिक मिश्रित यौन वातावरण में होता है। इसका कारण एक ही है कि तंत्र की तीव्र यौन ऊर्जा उस अल्पकालिक घुटन भरे आत्मिक संपर्क को झेलने के लिए पर्याप्त शक्ति प्रदान करती है। साधारण सेक्स पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि इसमें मन पर कम नियंत्रण होता है और साथ ही, यह कम अवधि का होता है। कुंडलिनी योग आधारित तंत्र यौन अनुभव को बढ़ाता है क्योंकि यह कुंडलिनी ध्यान की मदद से अकेलेपन के स्तर को और ज्यादा बढ़ाता है जो आनंदमय और सफल सेक्स के लिए आवश्यक है। कुंडलिनी ध्यान एक मानसिक कुंडलिनी छवि को छोड़कर हर सांसारिक अराजकता को खत्म कर देता है। यह आवश्यक भी है क्योंकि हम मानसिक शक्ति को रोक कर नहीं रख सकते हैं, और ऐसा करते समय यह घुटन भरा होता है और आनंद भी रुक सा जाता है। फिर आनंद के बिना सेक्स कैसा। लेकिन कुंडलिनी छवि को ध्यान में रखते हुए, यह गहन आनंद का स्रोत बन जाता है। यह पूरी तरह से अकेलेपन के समान है क्योंकि मानसिक कुंडलिनी छवि कुछ भी भौतिक नहीं बल्कि केवल एक मानसिक रचना है। इसीलिए कहते हैं कि असली प्रेम एकबार में एक से ही हो सकता है, दो से नहीं। तंत्र भी लंबे समय तक एक ही साथी के साथ रहने की वकालत करता है। हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण और दिलचस्प है कि एक व्यक्ति जिसे कई साथियों द्वारा बुरी तरह से फटकार लगाई जाती है, वही केवल एक ही साथी के साथ पूर्ण शांति में रहना चाहता है। शायद संभोग में आनंद भी इसीलिए है क्योंकि यह आत्मा की सर्वाधिक गहराई तक जाने का प्रयास करता है, और आत्मा तो आनंद का खजाना है ही। वास्तव में सेक्स विज्ञान जितना जाना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा और विशाल है जैसा कि ओशो महाराज ने सच ही कहा है।

आत्मा और जगत प्रकाश और अंधकार का परस्पर खेल है

मुझे तो लगता है कि जिसे हम सतोगुण समझते हैं, वही नेपथ्य में तमोगुण बन रहा होता है। यह ऐसे है जैसे धूप से ही छांव बनती है। इसका मतलब है कि जीवात्मा ने शुरु से जो कुछ भी अनुभव किया है, वह सभी कुछ उसमें तमोगुण अर्थात अंधेरे के रूप में मौजूद है। आगे भी वह जो महसूस करती रहेगी, वह भी अंधेरे के रूप में दर्ज होता रहेगा। यह ऐसे ही है जैसे जितनी अधिक और जैसी धूप होगी, छांव भी उतनी ही ज्यादा और वैसी ही बनेगी। वृक्ष की जैसी पत्तियां होंगी, छांव भी वैसी ही बनेगी। अर्थात जैसा शरीर या मन या मस्तिष्क होगा, तमोगुण रूपी छांव भी उसकी वैसी ही बनेगी। मतलब कि छांव में उसको बनाने वाली धूप या रौशनी या उसकी पत्तियों से छनकर आई हुई धूप के बारे में पूरी सूचना दर्ज है। सतोगुण तो आत्मा का अपना शुद्ध रूप है ही। वह तो रहेगा ही। वह तो मिट नहीं सकता। यह हो सकता है कि तमोगुण की मात्रा के अनुसार वह कम या ज्यादा महसूस होए। अगर तमोगुण ज्यादा होगा तो सतोगुण कम होगा और अगर तमोगुण कम होगा तो सतोगुण ज्यादा होगा। रजोगुण भी आत्मा की उस स्वाभाविक चेष्टा के रूप में होगा जिसके तहत वह तमोगुण से सतोगुण की तरफ जाना चाहती है। इसका मतलब है कि हम अगर दुनिया को महसूस न करें, तो वह आत्मा में तमोगुण के रूप में दर्ज नहीं होगी। पर दुनिया से किनारा कर पाना भी संभव नहीं है। तमोगुण की बात तो बाद में आएगी, पहले भूखे मरने की नौबत आ सकती है। बीच वाला मध्य मार्ग है अनासक्ति का। मतलब दुनियादारी को बिना आसक्ति के अनुभव करना है। इससे दुनियादारी भी चलती रहेगी और उसकी छांव भी आत्मा पर नहीं जम पाएगी या कम जमेगी। ऐसा योग से आसानी से संभव है। शास्त्रों में आसक्तिरहित सात्त्विक तरीकों को अपनाने के लिए इसलिए बोला जाता है ताकि इसके सात्त्विक संस्कार मन में पड़ते रहें। सात्विक संस्कारों को मन से निकालने में कम मेहनत लगती है जिससे मुक्ति की संभावना बढ़ जाती है। यदि इनको मन में न डाला जाए तो ऊटपटांग संस्कार मन में पड़ते रहेंगे क्योंकि मन खाली नहीं रह सकता। इन्हें बाहर निकालना बहुत मुश्किल होता है जिससे मुक्ति की संभावना काफी घट जाती है। पर इसी से बात नहीं बनेगी। पिछ्ले अनगिनत जन्मों की दुनियादारी की छाप की कालिख जो आत्मा पर जमी है, उसे भी साफ करना पड़ेगा। वह भी कुंडलिनी योग से ही होगा, खासकर एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से। इससे आत्मा में सतोगुण बढ़ेगा और तमोगुण और रजोगुण कम हो जाएगा। रजोगुण इसलिए कम होगा क्योंकि अब नाममात्र के तमोगुण में इतना पोटेंशल नहीं है कि वह तेज गति से सतोगुण की तरफ जा सके। यह लेटेंट रजोगुण भी बिजली के दो विपरीत ध्रुवों के बीच के विभवांतर की तरह होता है। जितना ज्यादा अंतर उनके विपरीत आवेश के बीच में होगा, उतनी ही रफ्तार और अधिकता से विद्युत प्रवाह उनको जोड़ने वाले परिपथ में दौड़ेगा। शुद्ध आत्मा का सतोगुण तो सर्वोच्च और निश्चित निर्धारित है। बद्ध जीवात्मा के तमोगुण की मात्रा ही निर्धारित करेगी कि उनके बीच में रजोगुण रूपी विभवांतर कम होगा या ज्यादा। देखो, दोनों के बीच परिपथ तो तभी जुड़ेगा जब जीवात्मा को शरीर मिलेगा। फिर उनके बीच में मानसिक विचारों के रूप में खूब विद्युत प्रवाह बहेगा। वह जीवात्मा के तमोगुण के अनुसार कम ज्यादा होता रहेगा। इसीलिए तो पार्टी आदि में ड्रिंक आदि करने के बाद लोग तरोताजा होकर नई उमंग और जोश से अपने काम धंधे में पहले से भी ज्यादा लग जाते हैं। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है और अध्यात्म के मामले में हानिकारक भी हो सकता है। कई लोग लंबे समय तक अकेलापन बिताने के बाद नई और बढ़ी हुई शक्ति के साथ दुनियादारी में उतरते हैं। यह अकेलेपन की तमोगुण की ही शक्ति होती है। कुंडलिनी योग से तमोगुण घट जाता है। इससे सतोगुण और तमोगुण के बीच रजोगुण रूपी विभवांतर कम हो जाता है। इसीलिए योगी का व्यवहार इंपलसिव या तुनकमिजाजी या अंध प्रगतिशील नहीं होता, बल्कि धीर, गंभीर और व्यवस्थाशील होता है। कई बार तंत्रयोगी देशकाल की मांग के अनुसार अस्थायी इंपलसिव व्यवहार प्राप्त करने के लिए अस्थाई रूप से तमोगुण को स्वीकार भी कर सकते हैं। बिना शरीर की जीवात्मा में यह रजोगुण लेटेंट विभवांतर के रूप में रहता है। मतलब अंधेरे से प्रकाश की तरफ जाने का बल तो लग रहा होता है, पर शरीररूपी विद्युत परिपथ न होने के कारण अंधकार प्रकाश तक जा नहीं पाता। मतलब तमोगुण सतोगुण नहीं बन पाता।