सभी प्रिय पाठकों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई
दोस्तो, इस पोस्ट में बहुत से रहस्य छिपे हुए हैं। मुझे तो यह गागर में सागर की तरह लग रही है। मूलाधार चक्र सिर्फ मेरुदंड के आधार पर कोई स्थान विशेष नहीं है। यह आत्मा या मन की अवस्था भी है, जिसमें सांसारिकता का कचरा नगण्य सा बचा होता है। सहस्रार चक्र पर ज्ञान या सात्त्विकता से जुड़े अहंकार का कचरा होता है। आज्ञा चक्र पर बुद्धिमत्ता का कचरा होता है। विशुद्धि चक्र पर वाणी से संबंधित कचरा होता है। अनाहत चक्र पर भावनाओं से जुड़ा कचरा होता है। मणिपुर चक्र पर भोजन से संबंधित सांसारिक विचारों का कचरा होता है। स्वाधिष्ठान चक्र पर प्रजनन व यौनता से जुड़ा कचरा होता है। मूलाधार चक्र पर शौच से जुड़ा सांसारिक कचरा होता है। मतलब कि जब मन पर जमा हुआ संसार का सारा कचरा नष्ट हो जाता है, तब मन अपने असली पुरातन रूप में आ जाता है। मन का वह आदिम या आदिकालिक रूप मूल प्रकृति ही है। यही मूल आधार मतलब मूलाधार है। यह चेतना का सबसे निचला स्तर होता है। इसीलिए इसको शरीर का सबसे निचला स्थान दिया गया है। मूलाधार से अगर यह क्रमवार चक्रों से होकर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है, तब यह पुनः सांसारिक कचरा इकट्ठा करने लगता है। अक्सर आदमी के साथ ऐसा ही होता है। आपने सुना भी होगा। जैसे कि फलां आदमी बिल्कुल दिवालिया या कंगाल हो गया था या सड़क पर आ गया था। फिर उसने धीरे-धीरे तरक्की करते हुए अपार धन संपदा इकट्ठी कर ली। वह दरअसल मूलाधार में पहुंच गया था, सब कुछ खोकर। मूलाधार में अपार ध्यान शक्ति होती है। यह इसलिए क्योंकि वहां सांसारिक कचरे का व्यवधान नहीं होता। उस ध्यान शक्ति को उसने कुंडलिनी योग साधना में नहीं लगाया, पर प्रचुर धन संपत्ति इकट्ठा करने में लगाया। सब कुछ तो नहीं मिल सकता न। शक्ति की भी एक सीमा होती है। इधर लगाओगे, तो उधर के लिए नहीं बचेगी। उधर लगाओगे, तो इधर के लिए नहीं बचेगी। अगर थोड़ा थोड़ा दोनों तरफ लगाओगे, तो न इधर कुछ हासिल होगा, न उधर। ऐसा इसलिए, क्योंकि हर एक उपलब्धि के लिए एक मुक्तिगामी वेग अर्थात एस्केप वेलोसिटी की जरूरत होती है। यह अधिकतम शक्ति से ही हासिल होती है। कई लोग जानबूझकर कुंडलिनी साधना को ठुकराते हैं, क्योंकि उनकी मजबूरी होती है। पेट का भरण पोषण ज्यादा महत्वपूर्ण है, कुंडलिनी जागरण बाद में। कई लोग जीवन जीने का भरपूर गुजारा होते हुए भी धन के लालच में आकर इसे मूर्खतापूर्वक ठुकराते हैं। पर अधिकांश लोगों को तो कुंडलिनी साधना का ज्ञान ही नहीं होता। यह इसलिए क्योंकि इसे आदि काल से आम आदमी से छुपाया जाता रहा है। खासकर बालकों और किशोरों से तो पूरी तरह से छुपाया गया है। युवावस्था में वह काम धंधों की उलझनों में फंस कर इस बारे जानकारी हासिल नहीं कर पाता। जब वह परिपक्व और बूढ़ा होने लगता है, तब उसे इसकी जानकारी दी जाती है। पर तब शरीर की अशक्तता के कारण तांत्रिक कुंडलिनी साधना हो नहीं पाती। अपनी बूढ़ी उम्र में अगर आदमी मूलाधारवासिनी नागिन का मुंह हमेशा ऊपर की ओर मोड़ के रखेगा तो प्रोस्टेट तो बढ़ेगा ही। महाराज ओशो ने इसीलिए तांत्रिक संभोग से पर्दा उठा कर उसे सार्वजनिक किया। मैं उस काम के लिए उन्हें दाद देता हूं।
तांत्रिक कुंडलिनी योग को छिपाने की मुख्य वजह मुझे यह लगती है कि कई बार इससे मिलने वाली शक्ति को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। उससे आदमी हिंसक भी बन सकता है, पागल भी बन सकता है। बांग्लादेश में क्या हो रहा है? मुझे तो लगता है कि जिहादियों के पास वही अनियंत्रित कुंडलिनी शक्ति है, जो वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं को इसका निशाना बनाते हुए उनसे अनगिनत कुकर्म करवा रही है। इस्कॉन कृष्ण मंदिर का हाल ही देख लीजिए, सबकुछ टूटा फूटा हुआ और देव मूर्तियां तहस नहस। साथ में, उनका कुंडलिनी तंत्र को अपनाने का तरीका भी तो गलत और अधूरा जैसा ही है। लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। इसलिए हिंदुओं के वेदपुराण बने थे ताकि लोग उनके अनुसार प्रारंभिक जीवन जीते हुए आराम और सुरक्षा के साथ कुंडलिनी तंत्र तक पहुंचकर उसे अपनाते और बिना दुष्प्रभाव के उसमें सफल होते। पर ये क्या, जेहादी मानसिकता के लोग तो सीधे ही मतलब वेदों की सहायता लिए बिना ही साधना के अंतिम पायदान मतलब निराकार ब्रह्म तक पहुंच जाते हैं, वह भी तांत्रिक क्रियाओं जैसे कृत्यों के साथ। इससे नुकसान तो होगा ही। वेदपुराण न पढ़ने होते तो शरीरविज्ञान दर्शन ही पढ़ लेते, क्योंकि यह वेदपुराणों का आधुनिक और संक्षिप्त स्पष्टीकरण ही लगता है मुझे। आप ही सोचो कि क्या कोई आदमी एबीसी सीखे बिना ही अंग्रेजी में पीएचडी कर सकता है? करने लगेगा तो कन्फ्यूज या पागल तो होगा ही। मतलब कि छिपाने का प्रयास करते हुए भी यह विद्या छिपी कहां है, साथ में यह इसके सुपात्र लोगों को भी नहीं मिल पा रही है। ऐसे भी अतिवादी इसे गलत ढंग से भी तो सीख ही रहे हैं, यदि विद्वान इसे न छिपाते तो सही ढंग से तो सीखते। इससे अच्छा होता कि इसे नियंत्रण करने के तरीके खोजे जाते और सार्वजनिक किए जाते।
लोकतंत्र के अनेक लाभ हैं, पर यह बहुसंख्यक आबादी मुख्यतः कट्टरपंथी जिहादियों द्वारा किए जाने वाले जुल्मों पर लगाम नहीं लगा पा रहा है। शेख हसीना ने कोशिश की तो उसे जान बचा कर भागना पड़ा। अगर लगाम लगा भी देती तो बहुसंख्यक आबादी उसे चुनाव में हरा देती, और फिर विपक्ष पर दबाव डालकर आजीवन कारावास या मृत्युदंड दिलवा देती या साजिशन खुद ही मरवा देती। इसी डर से राष्ट्राध्यक्ष उग्र भीड़ से मनमानी भरा तांडव करने देते हैं। आखिर जान तो सबको प्यारी होती है।
मूलाधार पर कुंडलिनी साधना करने वाले भी दो किस्म के लोग होते हैं। पहले किस्म के लोग कुंडलिनी का हर एक चक्र पर लंबे समय तक या महीनों तक एक ही चक्र पर ध्यान करते हुए धीरे-धीरे ऊपर चढ़ाते हैं। लगता है, आजकल ऐसे लोग कामयाब नहीं हो सकते। आज के आपाधापी के युग में सालों तक शांत व व्यवधानरहित जीवन नसीब नहीं हो सकता। गनीमत है अगर एक दो महीना या एक दो साल भी मिल जाए। ऐसे में कुंडलिनी बीच के ही चक्रों में फंसी रह सकती है। दूसरे किस्म के लोग बुलेट ट्रेन की तरह होते हैं। वे एकदम से संभोग आधारित तांत्रिक कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को सीधे ही एकदम से मूलाधार से सहस्रार तक चढ़ा देते हैं। ऐसे लोगों के लिए तो एक महीने का समय भी काफी होता है। अगर एक दो साल का उपयुक्त जीवन मिल जाए, तब तो कहने ही क्या।
स्पष्ट है कि आम आदमी मूलाधार और सहस्रार के बीच झूलता रहता है, विभिन्न चक्रों से होते हुए, जागृति को पाए बिना ही। वह कभी मुक्त नहीं हो पाता। कुंडलिनी जागरण भी मुक्ति की गारंटी नहीं है। मुक्ति तो सन्यासी की तरह मन को पूरी तरह से त्यागने से मिलती है, जो कि व्यवहारिक जीवन में संभव नहीं है। यह अलग बात है कि किसी चमत्कारिक व अनजाने तरीके से मुक्ति खुद ही मिल जाती हो, बेशक इसके लिए प्रयास तो करना ही चाहिए। मूलाधार और मूल प्रकृति की समकक्षता को देखकर तो यही लगता है कि आदमी का सांसारिक बंधन अनादि है, बेशक इसका अंत हो सकता है।