गायत्री मंत्र, सुषुम्ना और ब्रह्म चेतना: कुंडलिनी योग द्वारा जाति से परे जागृति का अनुभव

गायत्री शब्द पर आया पहला विचार

आज मेरी विनती पर एक योगी मेरे पास आए और उन्होंने मुझे सूत्र नेति की कुछ तकनीकें दिखाईं। मैंने उनसे उनकी जाति पूछी तो उन्होंने बताया कि वे ओबीसी हैं, और जवाब में उन्होंने कहा कि योगियों की कोई जाति नहीं होती। इस संबंध में बात करते हुए एक विचार मेरे मन में आया कि गायत्री शब्द में “त्रि” है, जिसका अर्थ तीन होता है। मुझे लगा कि यह तीन इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों को दर्शाता है। ये तीनों नाड़ियाँ योग शरीर की मूल ऊर्जा धाराएँ हैं। इड़ा और पिंगला दोनों स्त्री स्वभाव की हैं क्योंकि वे शक्ति से संबंधित हैं, और सुषुम्ना संयुक्त और सर्वोच्च शक्ति है। सभी नाड़ियाँ प्रकृति से जुड़ी हैं, पुरुष से नहीं। इसी कारण गायत्री को देवी कहा गया है। यही त्रिशक्ति योग साधना का आधार है और वेदों की भीतरी उत्पत्ति भी यही है। इसलिए गायत्री का संबंध योगी और ब्राह्मण दोनों से जोड़ा जाता है।

गायत्री वेदों की माता क्यों कही गई

शास्त्रों में कहा गया है कि गायत्री वेदों की माता है। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने किताबें पैदा कीं, बल्कि इसका अर्थ यह है कि जिस चेतना अवस्था से वेदों का ज्ञान उत्पन्न होता है, वही गायत्री है। जब इड़ा और पिंगला संतुलित होती हैं, तब सुषुम्ना खुलती है। जब सुषुम्ना खुलती है, तब ऋत यानी ब्रह्मांडीय व्यवस्था का बोध होता है। यही बोध वेद है। इस प्रकार गायत्री केवल मंत्र नहीं है, बल्कि वह अवस्था है जिससे वेद-दर्शन संभव होता है।

योगी और ब्राह्मण दोनों गायत्री का जप क्यों करते हैं

प्राचीन काल में ब्राह्मण का अर्थ जाति नहीं था, बल्कि वह व्यक्ति था जो ब्रह्म जागरूकता में रहता था। योगी वह है जो ऊर्जा को जोड़ता है। दोनों एक ही आंतरिक प्रक्रिया को अलग भाषा में कहते हैं। गायत्री जप से श्वास संतुलित होती है, इड़ा-पिंगला संतुलित होती हैं और धीरे-धीरे सुषुम्ना सक्रिय होती है। इसलिए गायत्री को संध्या समय जपा जाता है, धीरे-धीरे बोला जाता है और उपनयन के समय दिया जाता है ताकि अंदर की साधना शुरू हो सके। यह मंत्र के रूप में छुपा हुआ योग है।

गायत्री का अर्थ: जो गायन से बचाती है

गायत्री का अर्थ बताया गया है —
“गायन्तं त्रायते इति गायत्री”
अर्थात जो जप करने वाले को बचाती है।

यहाँ गायन का अर्थ आवाज़ से गाना नहीं, बल्कि लयबद्ध जप है। त्राण का अर्थ है बंधन से मुक्ति। योग में बंधन का मतलब है इड़ा-पिंगला का असंतुलन, जिससे मन द्वंद्व और संस्कारों में फँसा रहता है। जब जप किया जाता है तो श्वास सूक्ष्म होती है, नाड़ियाँ संतुलित होती हैं और सुषुम्ना खुलती है। तब चेतना मन से हटकर साक्षी बन जाती है। यही छोटी लेकिन वास्तविक मुक्ति है। इसी तरह गायत्री बचाती है।

गायन का असली अर्थ और उसका प्रभाव

सच्चा गायन तेज आवाज़ में गाना नहीं, बल्कि मन ही मन जप करना है। गायत्री संध्या समय सबसे अच्छा काम करती है क्योंकि उस समय नाड़ियों के जोड़ बदलते हैं। जब ध्यान आज्ञा चक्र या हृदय में स्थिर होता है, तब अनुभव से स्पष्ट होता है कि ब्रह्म जागरूकता अपने आप प्रकट हो जाती है।

मंत्र नाड़ियों को चलाता है, नाड़ियाँ मंत्र को नहीं

गायत्री इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना से पैदा नहीं होती। बल्कि गायत्री इन नाड़ियों को नियंत्रित करती है। मंत्र पहले है, ऊर्जा बाद में आती है। इससे साधना सुरक्षित और संतुलित रहती है।

भूः, भुवः और स्वः का आंतरिक अर्थ

भूः, भुवः और स्वः स्थान नहीं, बल्कि चेतना की अवस्थाएँ हैं। भूः शरीर और स्थूल चेतना है। भुवः प्राण, मन और सूक्ष्म गति है। स्वः बुद्धि, प्रकाश और कारण शरीर की अवस्था है। जब इड़ा और पिंगला हावी होती हैं, तब चेतना भूः और भुवः के बीच घूमती रहती है। जब सुषुम्ना खुलती है, तब चेतना अपने आप स्वः में उठ जाती है।

सवितुः: भीतर का प्रकाशित करने वाला सूर्य

सविता बाहरी सूर्य नहीं है। यह भीतर का प्रकाश है जो तीनों अवस्थाओं को प्रकाशित करता है। यह वही साक्षी-प्रकाश है जो सुषुम्ना में ऊर्जा प्रवाहित होने पर अनुभव होता है। यही बुद्धि में ब्रह्म का प्रतिबिंब है। जैसे सूर्य जिन-जिन लोकों या स्थानों को प्रकाशित करता है, उनसे वह प्रभावित नहीं होता, उसी तरह सुषुम्ना प्रवाह के समय शुद्ध ब्रह्म जागरूकता तीनों लोकों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि केवल उन्हें साक्षी रूप में देखती रहती है।

भर्गो देवस्य वरेण्यम: चुना गया श्रेष्ठ प्रकाश

भर्ग का अर्थ है अज्ञान को जलाने वाला प्रकाश। यह गर्मी नहीं बल्कि स्पष्टता है। जब सुषुम्ना स्थिर होती है, तो संस्कार अपने आप इस प्रकाश में घुल जाते हैं। इसलिए मंत्र कहता है कि यही प्रकाश चुनने योग्य है, क्योंकि इंद्रिय, भाव और विचारों का प्रकाश अस्थिर होता है।

धियो यो नः प्रचोदयात: बुद्धि का परिवर्तन

धि का अर्थ बुद्धि है। प्रचोदयात का अर्थ है प्रेरित करना, जगाना और पुनर्गठित करना। जब सुषुम्ना बहती है, तो बुद्धि व्यक्तिगत नहीं रहती, वह सार्वभौमिक हो जाती है। यही ब्रह्म जागरूकता है। गायत्री मंत्र में जिस ब्रह्म का वर्णन है, वही सुषुम्ना के खुलने पर अनुभव होता है।

मंत्र, नाड़ी और जागरूकता एक ही प्रक्रिया हैं

मंत्र, नाड़ी और जागरूकता एक ही सत्य के तीन रूप हैं। मंत्र ध्वनि रूप है, नाड़ी ऊर्जा रूप है और जागरूकता अनुभूति है। गायत्री ब्रह्म का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसे देखने का मार्ग बनाती है। इसलिए मंत्र का अनुभव और सुषुम्ना का अनुभव एक जैसा लगता है।

यह ज्ञान समझाया नहीं गया, छुपाया गया

इस ज्ञान को खुलकर समझाया नहीं गया क्योंकि समझाने से लोग अनुभव की लालसा करने लगते हैं। इसे छुपाकर रखा गया ताकि केवल साधक ही इसे अनुभव से जान सकें। यहाँ भी पहले अनुभव आया और बाद में अर्थ समझ में आया, जो सही क्रम है।

व्यक्तिगत सावधानी और संतुलन

अपने अनुभव से यह स्पष्ट है कि सुषुम्ना को जबरदस्ती खोलना जीवन को असंतुलित कर सकता है। इसलिए मंत्र सबसे सुरक्षित तरीका है। गायत्री जागृति को बिना जीवन से हटाए स्थिर रखती है।

निष्कर्ष: गायत्री और ब्रह्म एक ही अनुभूति हैं

गायत्री मंत्र में जिस ब्रह्म का वर्णन है, वही ब्रह्म सुषुम्ना के खुलने पर अनुभव होता है। इसलिए गायत्री वेदों की माता, नाड़ियों की नियंता, बुद्धि की जाग्रता और भीतर का सूर्य है। वह मुक्ति का वादा नहीं करती, बल्कि जप और जागरूकता के माध्यम से उसे घटित करती है।

योगी ही असली ब्राह्मण है

ऐसा लगता है कि इस अर्थ में जाति जन्म से नहीं होती। जो व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण है लेकिन योग नहीं करता, वह असली ब्राह्मण जैसा नहीं लगता। लेकिन जो व्यक्ति किसी भी जाति या धर्म में जन्म लेकर योग करता है, वह ब्राह्मण जैसा ही लगता है। इसके बहुत से उदाहरण हैं। दासीपुत्र विदुर, वाल्मीकि, विश्वामित्र, शबरी, कबीर, रहीम और ऐसे कई लोग अलग-अलग धर्मों और जातियों से थे, लेकिन सभी योगियों की तरह जाग्रत थे और आज भी ब्राह्मणों की तरह सम्मानित हैं।

कुंडलिनीयोग से गंगा की तरह बहती हुई शक्ति शिवलिंगरूपी चक्रों को सिंचित करती है

अत्रि-अनसूया की प्रसिद्ध पौराणिक कथा

शिवपुराण में अनसूया की कथा आती है। अनसूया मतलब किसी की असूया या निंदा न करने वाली। एक बार महान अकाल पड़ा। हर जगह पानी की कमी हो गई। लोग व प्राणी प्यास से व्याकुल होकर मरने लगे। साधुओं से संसार का दुख देखा नहीं जाता। इसलिए अत्रि मुनि पानी के लिए तप करने लगे। उनके शिष्य भी उनको छोड़कर चले गए। केवल अनसूया अपने पति की सेवा करती रही और प्रतिदिन शिवलिंग का पूजन करती रही। एक दिन अत्रि ने पानी मांगा। अनसूया कमंडल लेकर पानी ढूंढने चल पड़ी। रास्ते में उसे गंगा मिली। गंगा अनसूया के पातिव्रत्य से प्रसन्न हो गई। अनसूया ने गंगा से पानी मांगा। गंगा ने उसे एक गड्ढा करने को कहा। वह गड्ढा पानी से भर गया। अनसूया पानी लेकर चली गई। उसने अत्रि को पानी पिलाया। अत्रि ने कहा कि वह रोज के पिए जाने वाले पानी के जैसा नहीं था। अनसूया ने सारी बात बता दी। वह अत्रि को उस गड्ढे के पास ले गई। दोनों ने उसमें आचमन व स्नान किया। उससे सारे लोक तृप्त हो गए। गंगा जाने लगी तो अनसूया ने उससे हमेशा वहीं रहने के लिए प्रार्थना की। गंगा ने बदले में उससे उसका एक साल का पतिव्रत धर्म का और शिव पूजा का फल मांगा। गंगा ने कहा कि उसे पतिव्रता धर्म सबसे ज्यादा पसंद है। अनसूया ने वह दे दिया तो गंगा वहीं पर बस गई। साथ में शिव भी अत्रीश्वर लिंग के रूप में हमेशा के लिए वहीं विराजमान हो गए।

मिथक कथा का स्पष्टीकरण

अत्रि जीवात्मा है। अत्रि का शाब्दिक अर्थ है, तीनों गुणों से रहित। ऐसा आत्मा ही है। अनसूया बुद्धि है। बुद्धि किसी की निंदा नहीं करती, क्योंकि वह सबसे अपना काम बनवाना चाहती है। निकम्मा मन ही निंदा करता है। बुद्धि अपने पति जीव की पतिव्रता पत्नि की तरह ही है। वह जीव की हर प्रकार से सेवा करती है, साथ में परमेश्वर शिव की पूजा करती रहती है। निकम्मा मन ही कुछ नहीं करता। दरअसल बुद्धि से काम होता है, और कर्म को ही पूजा कहा गया है। शिवलिंग की पूजा इसलिए कहा है क्योंकि संसार पुरुष मतलब शिव और प्रकृति मतलब शक्ति के संयोग से ही बना है। शरीर ही वह सूखाग्रस्त देश है। शरीर की सभी कोशिकाएं ही उसके लोगबाग और प्राणी हैं। वे प्यासे मतलब शक्तिरूपी जल से वंचित रहने लगे। शक्ति जल की तरह ही बहती है। बुद्धि ऋषि अत्रि रूपी आत्मा को गुजारे लायक शक्ति या जीवनयापन के लिए साधारण पानी दिलवाती थी। पर उससे पूरे शरीरदेश का गुजारा नहीं होता था। इसलिए अतिरिक्त शक्ति के लिए ऋषि तप अर्थात कुंडलिनी योगसाधना करते हैं। एकदिन ऋषिजीव के शक्तिजल मांगने पर अनसूयाबुद्धि पूरे देहदेश में भटकने लगी उसकी खोज में। उसे शिवलिंग की कृपा से मूलाधार के आसपास यौनाधारित कुंडलिनी शक्ति मतलब गंगा महसूस हुई। उसने शरीर के प्राणों को मतलब दहदेश के कर्मचारियों को वहां गड्ढा बनाने के लिए मतलब सिद्धासन में मूलाधार को एड़ी से दबाने के लिए प्रेरित किया या योगासनों, मालिशों आदि से पिछले मणिपुर चक्र में संवेदनात्मक गड्ढा बनवाया। मुझे तो लगता है कि पीठ वाले मूलाधार या हिप बोन से ऊपर की ओर लगता गहरा गड्ढा ही वह गड्ढा है। उसमे मालिश के समय सीधी हथेली के आधार से जोर से दबाकर और धीरे धीरे ऊपर खिसका कर तेज व आनंदमय सनसनी महसूस होती है जो रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ती लगती है। यह असली मूलाधार या मूलाधार से सीधा जुड़ा लगता है, क्योंकि मूलाधार को भी गड्ढा ही कहा जाता है अक्सर। मेरुदंड में उंगलियों के बल से मालिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे नाजुक हड्डी में चोट जैसी हानि का डर बना रह सकता है। वहां दिव्य जल भर गया मतलब वहां शक्ति संवेदना महसूस हुई। उसने वह जल ऋषि को पिलाया मतलब जीवात्मा ने उस संवेदना को महसूस किया। जीवात्मा को वह और दिन से अलग और दिव्य लगा क्योंकि उसमें यौनानंद भी मिश्रित था। दोनों ने उसमें स्नान आचमन किया मतलब वह मूलाधार से चढ़कर मस्तिष्क तक चढ़ गई जिससे पूरे शरीर के साथ दोनों तरोताजा हो गए। बुद्धि और जीवात्मा दोनों मस्तिष्क में रहते हैं और आपस में जुड़े होते हैं इसलिए सबकुछ साथ साथ महसूस करते हैं। इसको दूसरे तरीके से भी ले सकते हैं कि एक तांत्रिक जोड़ा यबयुम आसन में एकसाथ शक्ति का उपभोग कर रहा है। सारे जीवजंतु जल पीकर तृप्त हो गए मतलब शरीर के सारे सेल्स शक्ति से रिफ्रेश और रिचार्ज हो गए। गंगा को अनसूया का पतिव्रता धर्म पसंद आया। जरूर उसने उसकी परीक्षा ली होगी, तभी पता चला। आजकल तो पतिव्रता धर्म के परीक्षक बहुत हैं। दफ्तर या कामधंधे पे जाने वाली महिलाओं को विभिन्न पुरूषों के द्वारा उन्हें प्रेमभरी अश्लीलता से झांकना व उनसे बतियाना, उनसे हरकत करने की फिराक में रहना आदि उनकी परीक्षा ही है। घर के अंदर बैठकर परीक्षा थोड़े न होगी। मतलब साफ़ है कि रहो सबके साथ पर सेवा अपने पति की ही करो। गंगा ने स्थायी तौर पर वहां बसने के बदले में अनसूया से एकसाल का सदकर्मफल मांगा मतलब एक साल की तांत्रिक योगसाधना और शिवलिंग पूजा से सुषुम्ना स्थायी तौर पर जागृत हो सकती है। वहां अत्रीश्वर लिंग की भी स्थायी स्थापना हो गई। मुझे तो यह जागृत मूलाधार चक्र ही लगता है। चक्र लिंगरूप ही हैं, क्योंकि वहां लिंग जैसी ही संवेदना अनुभूत होती है। द्वादश ज्योतिर्लिंग बारह चक्र ही हैं। ज्योति वहां ध्यानचित्र के चमकने से पैदा होती है। वह ध्यानचित्र शिव, गुरु, प्रेमी आदि किसी का भी रूप हो सकता है। शिवपुराण के अनुसार बहुत से लिंग और उपलिंग हैं, पर ये बारह ज्योतिर्लिंग मुख्य हैं। अन्य लिंगों को लिंग ही कहा है, ज्योतिर्लिंग नहीं, क्योंकि कुंडलिनीचित्र की चमक चक्रों पर ही महसूस होती है। वैसे तो शरीर की हरेक कोशिका को लिंग कह सकते हैं, क्योंकि सबके ऊपर शक्तिरूपी जल गिरने से ही वे क्रियाशील हैं। जहां तक गंगारूपी कुंडलिनी शक्ति पहुंचती है स्नान कराने को, वहां तक लिंग ही लिंग हैं। वैसे भी रीढ़ की हड्डी में सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड बहता है, जो पानी की तरह ही है। कई वैज्ञानिक दावा करते हैं कि उसी फ्लूड के प्रवाह के रूप में शक्ति का प्रवाह होता है। हालंकि सुषुम्ना जागरण के समय वह चमकीली संवेदना रेखा के रूप में बहती है। हो सकता है कि दोनों ही तरीकों से प्रवाह हो, खासकर आम व साधारण शक्ति प्रवाह में फ्लूड प्रवाह का योगदान ज्यादा हो। इस कथा से लगता है कि किसी ऋषि ने कुंडलिनी शक्ति की खोज कर के उसको महसूस किया, जिसको उन्होंने सीधा न बताकर मिथक कथा के रूप में बताया।

कुंडलिनीयोग पर्यावरण संरक्षण के लिए विशेष महत्त्व रखता है

जब अर्जुन पाशुपत अस्त्र के लिए भगवान शिव की तपस्या कर रहे थे, तब दुर्योधन का भेजा मूक दैत्य एक सुअर का रूप धारण कर वहां आया। वह पर्वतों के शिखरों को तोड़ता हुआ, अनेक वृक्षों को उखाड़ता हुआ तथा विविध प्रकार के अर्थहीन शब्द करता हुआ उसी मार्ग से जा रहा था, जहां अर्जुन था। उसको देखकर अर्जुन शिव का स्मरण करने लगा। शिव उसे मारने के लिए भीलराज बनके आए। अर्जुन और शिव के बीच वह शूकर अद्भुत शिखर की तरह लग रहा था। दोनों ने एकसाथ बाण चलाया। शिवजी का बाण पूंछ में घुसकर मुख से निकलकर शीघ्र ही पृथ्वी में विलीन हो गया। अर्जुन का बाण (शायद मुख में प्रविष्ट होकर) पूंछ से निकलकर भूमि पर पार्श्वभाग में गिर गया। शूकर उसी समय मर कर गिर गया।

उपरोक्त मिथक कथा का स्पष्टीकरण

दुर्योधन मतलब अहंकार अर्जुनरूपी कर्मयोगी जीवात्मा से इतना काम करवाता है कि उसकी इड़ा और पिंगला नाड़ियां क्रियाशील हो जाती हैं, मतलब अर्जुन का शरीर ही शूकररूप हो जाता है। मूलाधार ही उसकी पूंछ है। इड़ा और पिंगला उसके किनारे वाले दो नुकीले दांत हैं। द्वैत के जंगल में भटकते मन के विविध विचार उसका मुखभाग है। केवल भटकता हुआ मन ही पर्वतों को तोड़ सकता है, शरीर नहीं। मूक गूंगे को कहते हैं। क्योंकि भटकता मन आदमी को कभी नहीं कहता कि वह उसका दुश्मन है और उससे लड़ने आया है, पर धोखे से हमला करता रहता है, इसीलिए उसे मूक दैत्य कहते हैं। जैसे जीवात्मा और परमात्मा के बीच में मन एक पहाड़ की तरह भासता है, वैसे ही वह शूकर भास रहा था। इड़ा और पिंगला नाड़ियों के बारीबारी से क्रियाशील होने से आदमी इतना क्रियाशील हो जाता है कि जैसे वह पहाड़ तोड़ने को तैयार होए। इड़ा के क्रियाशील होने पर वह दुनिया के काम पागलपन जैसे से भरकर ताबड़तोड़ ढंग से करता है, और पिंगला के चालू होने से वह सुस्ता के सो जाता है। नींद से जागकर तरोताजा होकर फिर से लूट खसूट जैसे पापकर्म करने दौड़ पड़ता है। वह इसी अंधेरे और प्रकाश के द्वैत के बीच झूलता रहता है, और उनके बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी की साम्य या अद्वैत अवस्था को नहीं देख पाता। भारतीय जंगली सूअर का रंग भी काले और भूरे रंग का मिश्रण है, जो द्वैत को दर्शाता है। पशु की तरह मूर्खता से भरकर  घटिया और पर्यावरणघाती काम करता रहता है। आजकल का आदमी ऐसा ही तो है। क्रियाशीलता पर ब्रेक ही नहीं है। अंधे की तरह हर कहीं सिर मार रहा है। जमीन को खोखला कर रहा है। वनों का सफाया कर रहा है। हवा, जमीन और जल को प्रदूषित करके उसमें आनंद और मस्ती के साथ लोट रहा है। ये सब सुअर के ही लक्षण तो हैं। शिव ने पूंछ से मतलब मूलाधार से तीर घुसाया, मतलब सुषुम्नारूपी शक्तिरेखा को क्रियाशील किया। दरअसल शिवलिंग के ध्यान व पूजन से ऐसा ही होता है। वह तीर उसके मुख से मतलब सहस्रार चक्र से निकलकर पृथ्वी में मतलब फ्रंट चैनल से शरीर में विलीन हो गया।
अर्जुन शिवलिंग का ध्यानपूजन तो वैसे भी कर ही रहा था। उससे स्वाभाविक है कि उसकी सुषुम्ना क्रियाशील हो गई। यह ब्रह्मशिर तीर ब्रह्मरंध्र से बाहर निकलता है। सूअर का पूरा शरीर ही मुखरूप है। ऐसा भी समझ सकते हैं कि वह तीर फिर आज्ञा चक्र में विलीन हो गया। वहां से वह मुख तक पहुंचता ही है, तालु के स्राव के माध्यम से। वहां वह स्राव भूमि मतलब उदर में चला जाता है, और वहां भोजन को पचाने में शक्तिरूप में व्यय या विलीन हो जाता है। जैसे भूमि में अन्न बनता है, वैसे ही उदर में भी बनता है, बेशक हल्के और टूटे हुए सूक्ष्म टुकड़ों के रूप में।
अर्जुन ने तालु से जीभ को छुआ कर मस्तिष्क की शक्ति को फ्रंट चैनल से नीचे उतारा। इससे वह ऊपर चढ़ी हुई शक्ति वापिस मूलाधार तक चली गई। मस्तिष्क के अंदर जो अर्जुन के द्वारा अपनी इच्छा से ध्यान लगाया जाता है, वह अर्जुन का छोड़ा हुआ तीर है। वह ऊपर से नीचे की ओर आता है फ्रंट चैनल से। मान लो कि वह शक्तिबाण मूलाधार तक पंहुचा और बाहर निकलकर पार्श्वभाग में जमीन पर गिर गया। पर बाहर कैसे गिरा। एक तो यह संभावना है कि वीर्य रूप में शक्ति बाहर गिरी। पर अर्जुन उसे हासिल करने बाहर क्यों भागना था। वैसे वीर्य की शक्ति से ही बड़े बड़े काम होते हैं, बड़े बड़े उद्योग धंधे चलते हैं, और चारों ओर भौतिक समृद्धि छा जाती है। शायद अर्जुन उन्हें अपना अपना कहते हुए उन्हें बटोरने इधर उधर भागा। यह संभावना भी है कि शक्ति वीर्यरूप में वज्र शिखा तक आई, जिसे अर्जुन ने योग से वापिस ऊपर खींचना चाहा। पर पार्श्वभाग में कैसे गिरी। हो सकता कि योनि में गिरी हो, जिसे वज्रोली मुद्रा से वापिस खींचा जा रहा हो। पर इसमें शिवगणों को आपत्ति नहीं होनी चाहिए थी, क्योंकि यह व्यक्तिगत मामला है। शिवगण ने कहा कि वह शूकर शिव के तीर से मरा और वह पार्श्वभाग में गिरा हुआ शिव का तीर है। दरअसल शिवलिंगम के प्रभाव से मूलाधार की शक्ति ही सहस्रार तक जाकर फिर मुड़कर फ्रंट चेनल से नीचे आ रही थी। अर्जुन को लगा कि वह शक्ति उसने पैदा की अपने मस्तिष्क में ध्यान लगाकर, पर वास्तव में वह मूलाधार से ऊपर आ रही शक्ति के बल से ही मस्तिष्क में ध्यान कर पा रहा था, केवल अपने आत्मबल या इच्छाशक्ति से नहीं। मूलाधार चक्र की जागृति से सुषुम्ना सक्रिय हो गई थी, जिसके प्रभाव से इड़ा और पिंगला निष्क्रिय सी हो गई थीं। मतलब अज्ञानरूप सुअर मर गया था और उससे होने वाला अज्ञानजनित उत्पात भी। अर्जुन का अहम में आकर शिवलिंग का आश्रय छोड़ना या शिवलिंग को अज्ञानशूकर को मारने का श्रेय न देना ही उसका शिवावतार भीलराज़ से लड़ना है। अंत में उसे शिवलिंग का माहात्म्य समझ आना ही भीलराज के द्वारा उसे हराना है। अर्जुन के पार्श्वभाग में गिरा हुआ शक्तिबाण अन्न, घास, पुष्प आदि किसी भी रूप में हो सकता है, जिसे उसने टांगों से चलकर उगाया था। टांगों को मुख्यतः मूलाधार से ही शक्ति नीचे उतरती है। और मूलाधार को शिवलिंग से शक्ति मिली थी। इसीलिए शिवगण उन पर अपना हक जता रहे थे। अन्न, घास, पत्ते, पुष्प आदि खाने वाले पशु, पक्षी और कीट ही शिवगण हैं, जो अपने जीवन के लिए आदमी की दया पर आश्रित हैं।
अर्जुन ने कहा कि वह बाण पिच्छ रेखाओं से चित्रित है तथा उसमें उसका नाम अंकित है। बाणरूपी फ्रंट चैनल की रेखाएं हम पसलियों की लकीरों को कह सकते हैं, जो उसके शुरु में ही होती हैं। नाम खुदा हुआ हम हृदय चक्र को कह सकते हैं, क्योंकि उसीमें आदमी का पूरा मनोभाव मतलब परिचय छिपा होता है। अहंकारी आदमी लड़ाई तो करता ही है ईश्वर के साथ, अपनी संपत्ति बटोरने के लिए। परमात्मा उसे उस स्वार्थ की सजा भी देते ही रहते हैं। यही शिव और अर्जुन के बीच का युद्ध है जो मल्लयुद्ध तक पहुंच जाता है। फिर ऐसा समय आता है कि आदमी अपने स्वार्थ के लिए भगवान के मंदिर में माथा रगड़ता है। यह कहानी का वही भाग है, जिसमें अर्जुन शिव को पैरों से पकड़ता है और उसे घुमाकर पटकने की कोशिश करता है, पर उसी समय अपने पैर पकड़े जाने से प्रसन्न होकर शिव अपने असली रूप में आ जाते हैं और उसे वरदान रूप में पाशुपत अस्त्र देते हैं। यह ऐसे ही कि जब आदमी भगवान के मंदिर में किसी भी भाव से जाकर सद्बुद्धि प्राप्त करता है, और अनजाने में ही विपत्ति से बचने का वर प्राप्त कर लेता है। पाशुपत अस्त्र मतलब शिव ने उपरोक्त घटनाक्रम के माध्यम से उसे समझा दिया था कि मूलाधार ही शक्ति को अच्छे से नियंत्रित कर सकता है, सहस्रार या मस्तिष्क नहीं। इसी समझ से उसने अश्वत्थामा के द्वारा छोड़े हुए ब्रह्मास्त्र से हो रही मस्तिष्क की जलन को शांत किया था।
इस घटना को निम्न प्रकार से और ज्यादा स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। अर्जुन भीलरूपी शिव से कई वर्षों तक युद्ध करता रहा, पहले तीरों से और फिर मल्लयुद्ध से। दरअसल ऐसा युद्ध अहंकार और सत्य के बीच ही हो सकता है, क्योंकि दो व्यक्ति तो वर्षों तक लगातार नहीं लड़ सकते। अंहकार पहले अपने जीवन के सारे साजोसामान और सारी समृद्धियां परमात्मा को झुठलाने में लगा देता है। परमात्मा उन्हें बारीबारी से नष्ट करते जाते हैं ताकि वह सुधर सके। बेशक वे उन्हें उसके मन में ही नष्ट करे उनसे बोरियत के रूप में, बाहरी भौतिक रूप में नहीं। अंत में जब कुछ नहीं बचता तो आदमी अपने अंदर मौजूद उन भौतिक उपलब्धियों की यादों और वासनाओं की मदद से प्रभु से लड़ता है मतलब परमात्मा से अलग होकर अपनी पृथक सत्ता बनाए रखता है। अगर कोई घर का सदस्य घर छोड़ कर जाएगा, तो लड़कर ही जाएगा, प्रेमभाव से गले मिलकर तो नहीं। वासना पंजाबी शब्द वाशना से बना लगता है, जिसका मतलब गंध होता है। सारा मजा गंध में ही होता है। जब जुकाम आदि में गंध महसूस नहीं होती, तब खाना बिल्कुल भी स्वादिष्ट नहीं लगता। आपने देखा होगा कि कभी कोई पुरानी धुंधली याद आती है, पूरे मजे के साथ। ऐसा लगता है कि जो मजा उस असली स्थूल भौतिक घटना के समय भी नहीं आया होगा, वो उसकी बहुत धुंधली सी याद में आता है। यही उस घटना की वासना या गंध है। यह ऐसे ही होती है जैसे किसी इत्र की खुशबू। शायद यही संसार का सबसे सूक्ष्म रूप है जिसे तन्मात्रा भी कहते हैं। अगर बीती घटनाओं या बीते संसार की ऐसी गंधें आ रही हों, तो समझो योगी साधना के उच्च पद पर स्थित है और उसका सांसारिक कचरा शुद्ध होकर आत्मा में विलीन होता जा रहा है। शीघ्र ही उसे जागृति की झलक भी मिल सकती है। जब वासना रूपी अंतिम हथियार भी खत्म हो जाता है, तब वह अंधेरे जैसे में डूबने लगता है, जिसे डार्क नाइट ऑफ साउल या आत्मा की अंधेरी रात भी कहते हैं। फिर वह परमात्मा को हराने के लिए उन्हींके मंदिर जाता है, मतलब वह शिव को उठाकर फेंकने के लिए उन्हीं के पैर पकड़ता है। यह ऐसे ही है जेसे आदमी भौतिक समृद्धियों की मुराद मांगने मंदिर जाता है। फिर परमात्मा प्रसन्न होकर उसके सामने अपना असली रूप प्रकट कर देते हैं, जिससे वह उसी पल हार मान लेता है। परमात्मा के प्रकाश के सामने अहंकार का अंधेरा टिक ही नहीं सकता। शायद यही जागृति है।

कुंडलिनी की सहायता के बिना देवता भी कामयाब नहीं हो पाते

पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए, बुद्धिस्म में तंत्र वाली शाखा को वज्रयान नाम इसीलिए दिया गया है। प्रेमयोगी वज्र नाम भी इसीलिए पड़ा है। उसकी साधना में मूलरूप में तो प्रेमयोग ही है, पर उसमें तंत्र का भी अच्छा योगदान है। देवताओं ने वृत्रासुर के साथ लंबे अरसे तक युद्ध किया था। परंतु वे उसे हरा न सके थे। अंत में वे हार मानते हुए अपने अस्त्रशस्त्र दधिचि मुनि के आश्रम के निकट छोड़कर भाग गए। इसका मतलब है कि देवताओं ने दुखों के विचारों से बचने के लिए आदमी के शरीर में हाथपैर, आंखें, कान, मस्तिष्क आदि अनेकों अंग लगाए। पहले आदमी कीटाणुविषाणु की तरह एककोशिकीय जीव होता था। वह तो दुःख से भरी अवस्था ही थी। उस दुःख को दूर करने के लिए देवताओं ने कई युगों तक उस प्राथमिक जीव का विकास किया। अंत में मनुष्य शरीर बना। इतनी मेहनत के बाद भी दुखों का अंत कहां हुआ। उल्टा वह बढ़ने ही लगा। आज विज्ञान जितनी ज्यादा तरक्की कर रहा है, प्रकृति से उतनी ही ज्यादा छेड़छाड़ बढ़ रही है, जिससे जानमाल की तबाहियां भी बढ़ रही हैं। प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं। हत्या, लूटपाट आदि अपराध बढ़ रहे हैं। मन के मुख्य पांच दोष काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और उनसे पैदा होने वाले अनगिनत मानसिक विकार जैसे कि अवसाद, अकेलापन, हिंसा, स्वार्थभाव आदि बढ़ ही रहे हैं। मतलब दुखों के पहाड़ के रूप में वृत्रासुर का ही हमला हो गया। मजबूरन देवताओं ने हाथ खड़े कर दिए। दधिचि मुनि यहां आत्मा को कहा गया है। उसके आश्रम के निकट देवताओं ने हथियार छोड़ दिए, मतलब उन्होंने शरीर के सभी अंग निर्मित कर दिए, क्योंकि शरीर ही आत्मा के सबसे निकट है। देवताओं ने हार मान ली, मतलब इंद्रियों व अंगों के बल से चित्त का अहंकाररूपी परम दुख या शत्रु कभी नष्ट नहीं हो सकता था, यह पूरी तरह से सिद्ध हो गया था, छोटेमोटे शारीरिक व मानसिक दुख बेशक दूर हो जाते। यह परम दुख ही वृत्रासुर राक्षस था। शिव के वरदान से ही दधीचि मुनि की अस्थियां वज्रतुल्य बनी थीं। मतलब कि शिवप्रदत्त योग से हड्डियों में, विशेषकर रीढ़ की हड्डी में इतनी लोच व जीवंतता थी कि उसमें कुंडलिनी ऊर्जा आसानी से प्रवाहित हो सकती थी। वज्रपात बिजली गिरने को कहते हैं। उससे कठोर चट्टान भी टूट जाती है, और साथ में उसमें बिजली भी प्रवाहित होती है। इसी तरह रीढ़ की हड्डी की सुषुम्ना नाड़ी में प्रकाशमान ऊर्जारेखा का दौड़ना ही बिजली गिरने के समान है, और उससे अहंकार का नष्ट होना ही चट्टान के टूटने जैसा है। अहंकार ही दुनिया की सबसे कठोर वस्तु है, जिसे तोड़ना सबसे कठिन है।
कहते हैं कि ऋषि दधिचि की सुवर्चा नाम की एक पत्नी भी थी। जब देवता ब्रह्मा के पास सहायता मांगने गए थे, तब उन्होंने ही उन्हें दधीचि से अस्थियां मांगने की सलाह दी थी। सुवर्चा अंदर वाले कक्ष में थी, और देवता बाहर वाले कक्ष में बैठे दधीचि से उनकी हड्डियां मांग के ले गए। दधीचि ने योगसमाधि लगा कर शरीर छोड़ दिया और वे ब्रह्म में विलीन हो गए। जब सुवर्चा को पता चला तो वह बहुत क्रोधित हुई, और उसने देवताओं को श्राप दिया। उस समय सुवर्चा गर्भवती थी। ऋषि की वीर्यशक्ति से उसे दूसरे शिव के समान महान पुत्र प्राप्त हुआ। उसका नाम पिप्पलाद था। सृष्टि के मूल निर्माता तो ब्रह्मा ही हैं। उन्हें पता है कि देवता जितना मर्जी जोर लगा लें, पर वे आध्यात्मिक अज्ञान को नहीं मिटा सकते। यह भी उन्हें पता था कि योगी के मेरुदंड में स्थित सुषुम्ना में ऊर्जाप्रवाह से जब कुंडलिनी जागरण होगा, उसी से वह मर सकता है। जागृति से अज्ञान तो मिटेगा ही, अहंकार भी मिटेगा। अहंकार ही मनुष्य का अपना साधारण या लौकिक अनुभव वाला रूप होता है। जब अहंकार ही नहीं, तब मनुष्य का अस्तित्व भी कैसे रह सकता है। इसी को ऐसा कहा है कि दधीचि मुनि खुद शरीर छोड़कर चले गए। दरअसल अहंकार तो जागृति से पहले ही खत्म हो चुका होता है। तभी तो जागृति का अनुभव होता है। जरा भी अहंकार रहने से जागृति का अनुभव कैसे हो सकता है, क्योंकि दोनों एकदूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। तांत्रिक योगसाधना से जब योगी का अहंकार नष्टप्राय हो जाता है, तभी जागृति की असली शुरुआत होती है। अहंकार खत्म होने से योगी के मस्तिष्क में सांसारिक कचरा भी कम से कम रहता है, जिससे कुंडलिनी को जागृत होने के लिए पर्याप्त नाड़ी शक्ति उपलब्ध हो जाती है। ऋषि दधीचि की पत्नि जो सुवर्चा है, वह दरअसल बुद्धि है। अहंकार के नष्ट हो जाने से आदमी का रूपांतरण जैसा हो जाता है। रूपांतरण से पुराने विचार और स्मरण भुने बीज की तरह नष्टप्राय जैसे हो जाते हैं। पर वह प्रकाशमान बुद्धि या सद्बुद्धि बनी रहती है, जो अच्छे रास्ते पर लगाती है। पुराने अनुभव भी याद रहते ही हैं। संस्कृत शब्द वर्चस का अर्थ प्रकाशमान होता है। उसने देवताओं को श्राप दिया, मतलब तब शरीर देवताओं के अधीन रहकर मनमाना आचरण नहीं करता, बल्कि सद्बुद्धि के दिशानिर्देशन में रहकर युक्तियुक्त व्यवहार ही करता है। आदमी के रूपांतरण के बाद जो उसकी नई, जागृत व देवतुल्य अवस्था आती है, उसे ही पुत्र पिप्पलाद कहा गया है। वह रुद्र अर्थात शिव की तरह तंत्रात्मक अवस्था होती है, इसीलिए उसे रुद्रावतार कहा गया है।

कुंडलिनी शक्ति ही राक्षस वृत्रासुर को इंद्र-वज्र बन कर मारती है

मित्रो, पिछली पोस्ट में हमने देखा कि कैसे शुक्राचार्य के रूप में सांसारिक बुद्धि बलि के रूप में बने जीवात्मा को जागृति से वंचित रखना चाहती है। बहुत सुंदर कथा है। ऐसी ही एक योगरहस्यात्मक कथा वृत्रासुर वध की पुराणों में आती है। देवताओं ने दैत्य वृत्रासुर को मारने के लिए दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र बनाया था। वृत्र शब्द वृत्ति शब्द से बना लगता है। इसका मतलब है मन के संकल्प। चित्त में वृत्ति होती है। चित्त मतलब उन विचारों का संग्रह जो पहले कभी आए थे, और अब याददाश्त में जमा हैं। इसीलिए याद आने को चेता आना भी कहते हैं। उनको कुंडलिनी जागरण ही क्षीण या पंगु कर सकता है। ऐसा लगता है कि कुंडलिनी जागरण मेरुदंड में स्थित सुषुम्ना के क्रियाशील होने से ही मिल सकता है, अन्यथा नहीं। वृत्रासुर वज्र प्रहार से मरा, मतलब मेरुदंड में सुषुम्ना के जागने से ही कुण्डलिनी जागरण हुआ। उसको ऐसे कहा गया है कि वज्र के साथ विश्वकर्मा ने एक बाण भी बनाया। वज्र का आकार दंडवत कहा गया है। रीढ़ की हड्डी भी दंडवत ही होती है। तीर का नाम ब्रह्मशिर है, मतलब वह ब्रह्मरंध्र तक जाता है, जो सिर के सिरे मतलब शिखर पर है। यह तीर सुषुम्ना नाड़ी ही है। दधिचि ऋषि की हड्डियों से विश्वकर्मा ने और भी बहुत से अस्त्र बनाए थे। मतलब कि योगासन हड्डियों की सहायता से ही संभव हो पाते हैं। हड्डियों के विभिन्न जोड़ ही हमें विभिन्न आसन लगाने में मदद करते हैं। फिर उन आसनों से शरीर में उर्जा संचरण होता है, जो शक्ति को जगाने में मदद करता है। वह वृत्रासुर सभी देवताओं को परेशान करता था। इसका मतलब है कि मन की चंचलता व बेचैनी से शरीर का चयापचय गड़बड़ा जाता है, और उसमें विभिन्न रोग घर कर जाते हैं। शरीर देवताओं से ही तो बना है। विश्वकर्मा का शाब्दिक अर्थ होता है, विश्व के सभी कार्य करने वाला, मतलब विश्व को बनाने वाला। सारा विश्व शरीर में ही तो बसा हुआ है। कथा में कहा गया है कि रीढ़ की हड्डियों से वज्र और ब्रह्मशिर नाम का तीर बनाया। यह भी कहा गया है कि इंद्र ने सुरभि को बुलाकर उससे अस्थियों को चटवाया और फिर विश्वकर्मा को उनसे वज्र के निर्माण की आज्ञा प्रदान की। शिवजी के तेज से वृद्धि को प्राप्त इंद्र उस वज्र को उठाकर बड़े वेग से वृत्रासुर पर क्रोध करके इस प्रकार दौड़े, मानो रुद्र यम की तरफ़ दौड़ रहे हों। इसके बाद उन इंद्र ने भलीभांति सन्नद्ध होकर शीघ्रता से उस वज्र के द्वारा उत्साहपूर्वक पर्वतशिखर के समान वृत्रासुर का सिर काट दिया। यह अलंकारिक भाषाशैली है। शिवजी के तेज से, मतलब तंत्र की सहायता से, क्योंकि शिव ही तंत्र के आदिप्रवर्तक हैं। यह कुंडलिनी जागरण की ऊर्जावान अवस्था का ही वर्णन है। क्योंकि चित्तवृत्तियां सिर में ही पैदा होती हैं, इसीलिए वृत्रासुर का सिर काटने की बात कही है। यह कथा अगली पोस्ट में भी जारी है।

जब सभी देवता मिलजुल कर काम करते हैं, तो ऐसा कहा जाता है कि इंद्र ने वह काम किया, क्योंकि इंद्र ही देवताओँ का राजा है। कुंडलिनी योग शरीर के सभी अंगों मतलब सभी देवताओं के मिलेजुले प्रयास से ही संपन्न होता है। इसीलिए कहा है कि इंद्र ने वृत्रासुर को मारा। मुझे लगता है कि सुरभि गाय के द्वारा चटाना खेचरी मुद्रा को कहा गया है, जिसमें उल्टी जीभ नरम तालु के साथ छुआई जाती है। क्योंकि सिर रीढ़ की हड्डी के साथ सीधा जुड़ा है, इसलिए वज्र का ही हिस्सा है। इससे ही ऊर्जा नाड़ी लूप में आसानी से घूमती है। उसके बाद वज्रनिर्माण शुरु होता है, मतलब रीढ़ की हड्डी में उर्जा के दौड़ने का आभास होने लगता है।

विश्वकर्मा ने बनाया, मतलब वह निर्माण वैज्ञानिक सिद्धांत से अपने आप होता है, उसे कोई आदमी नहीं बनाता। बस, अपनेआप होने के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करनी पड़ती हैं। विश्व भी अपनेआप ही बनता है। इसी अपनेआप होने को सजाने के लिए विश्वकर्मा का नाम दिया गया है।

कुंडलिनी वामन भगवान बनके शुक्राचार्य की द्वैतरूपी आंख फोड़ती है

दोस्तों, पिछली पोस्ट को जारी रखते हुए, वह बलिरूपी अहंकार वामन को मजबूरन आने देता है, और उसे अंदेशा भी हो जाता है कि वह कुंडलिनी जागरण के बाद बच नहीं सकता। वैसे महिमा ऐसे गाई गई है कि राजा बलि सबसे बड़ा दानवीर था, जिसने अपना भावी नाश जानते हुए भी वामन को तीन पग जमीन दान में दी। हरेक जीव राजा बलि की तरह परम दानवीर होता है। वह यह जानकर कि कुंडलिनी योग से उसका अहंकार नष्ट हो जाएगा, उसका असीमित भौतिक संसार नष्ट हो जाएगा, फिर भी वह कभी न कभी जरूर कुंडलिनी साधना करता है। जब आदमी राजा बलि की तरह अच्छे कर्मों में लगा होता है, तब कभी न कभी भगवान विष्णु उसका भला करने एक ध्यानचित्र के रूप में उसके पास आते हैं। वे मित्र, प्रेमी, गुरु या देवता किसी भी रूप में हो सकते हैं। गुरु को भी तो भगवान का ही रूप समझा जाता है। वैसे भी हर किसी के लिए अपना प्रेमी भगवान ही होता है। उदाहरण के लिए मान लो कि किसी पुरुष की जिंदगी में एक स्त्री का प्रवेश होता है। पुरुष के बीसों कारोबार होते हैं, और सैंकड़ों रिश्ते। उनके कारण उसके मन में अनगिनत विचारचित्र बने होते हैं। इसलिए वह उस स्त्री को हल्के में ले लेता है, और सोचता है कि उसके विस्तृत भौतिक संसार के सामने एक स्त्री कुछ भी नहीं है। वह उसे अपने मन में जगह बनाने देता है, मतलब वह उससे जुड़े भाव या सत्त्वगुणरूपी पहले कदम, गति या रजोगुणरूपी दूसरे कदम, और अंधकार या तमोगुणरूपी तीसरे कदम को अपने मनरूपी साम्राज्य में पड़ने देता है। पर धीरेधीरे उसका उसके प्रति प्यार बढ़ता रहता है, और समय के साथ वह उसके मन में ज्यादा से ज्यादा जगह घेरती रहती है। आखिर में वह उसके पूरे साम्राज्य में फैल जाती है, और फिर जागृत होकर आदमी के राजाबलिरूपी अहंकार को खत्म ही कर देती है। कुंडलिनी योग में भी ऐसा ही होता है। इसका मतलब है कि योग और प्रेम के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है। राजा बलि भी बहुत बड़ा यज्ञ मतलब अच्छा काम ही कर रहा था। आदमी को पता चल जाता है कि वह ध्यानचित्र के चक्कर में पड़कर बावला प्रेमी या योगी या प्रेमयोगी या प्रेमरोगी बन जाएगा, फिर भी वह उसे अपनाता है, और आगे बढ़ाता है। उसने कुण्डलिनी जागरण के माध्यम से एक कदम से मतलब सत्वगुण से सारा स्वर्ग कब्जे में कर लिया। स्वर्ग सतोगुण प्रधान होता है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण के समय तीनों गुण अनंत हो जाते हैं, इसीलिए कहा गया है कि कुंडलिनी या वामन से तीनों लोक पूरी तरह से व्याप्त हो गए मतलब भर गए। दूसरे कदम मतलब रजोगुण से कुण्डलिनी चित्र पूरी धरती में फैल गया, क्योंकि धरती रजोगुणप्रधान है। तमोगुणरूपी तीसरे कदम से अहंकार व उससे जुड़े कर्मविचार मूलाधार के अँधेरे अवचेतन अर्थात पाताल में चले जाते हैं। क्योंकि तमोगुण किसी को मारकर या नष्ट करके ही बनता है, इसलिए वह अहंकार और उससे पोषित मानसिक सृष्टि को नष्ट करने से बनता है। पाताल लोक के द्वारपाल के रूप में भगवान विष्णु के स्थित हो जाने का मतलब है कि ध्यानचित्र कुंडलिनीयोग के माध्यम से उन राक्षसों को अर्थात अवचेतन में दबे विचारों को ऊपर अर्थात मस्तिष्क या स्वर्ग की तरफ जाने देकर शुद्ध करता रहता है, ताकि सब देवता ही बन जाएं। साथ में, विष्णुस्वरूप ध्यानचित्र को कुंडलिनी योग से स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्रों पर केंद्रित किया जाता रहता है, जिससे उनमें दबी हुई राक्षसरूपी भावनाएं उजागर होकर उसके संपर्क में आने से शुद्ध बनी रहती हैं, जिससे वे योगी को बंधन में नहीं डाल पातीं, मतलब राक्षस देवताओं को परेशान नहीं कर पाते, क्योंकि शरीर में ही सभी देवता बसे हुए हैं। वैसे भी स्वाधिष्ठान चक्र को इमोशनल बैगेज मतलब भावनाओं की गठरी कहते हैं।
यज्ञ में बलि के पुरोहित बने हुए राक्षसगुरु शुक्र आचार्य पहले बलि को बहुत समझाते हैं कि वह वामन पर भरोसा न करे क्योंकि वह तीन कदमों में ही उसका सबकुछ छीन लेंगे। पर जब बलि नहीं मानता तो शुक्राचार्य संकल्पजल गिरा रहे शंख के सुराख़ में घुस जाते हैं, पर वामन उसमें कुशा डालकर उसकी आंख फोड़ देते हैं? एक बात और, क्योंकि शंख भी जीव की पीठ पर होता है, और रीढ़ की हड्डी की तरह ही उसे सुरक्षा देता है, इससे भी पक्का हो जाता है कि सुषुम्ना नाड़ी को ही शंख कहा गया है। साथ में, शंख का आकार भी एक फन उठाए नाग या ड्रेगन के जैसा ही होता है, जिसकी समानता मेरुदंड व उसमें स्थित सुषुम्ना के साथ की जाती है। एक अनुभवी कुलपुरोहित कभी भी अपने यजमान को अध्यात्म के बीहड़ में नहीं खोने देना चाहता, बेशक उससे यजमान का फायदा ही क्यों न हो। उसे पता होता है कि अगर यजमान को सत्य का पता चल गया तो उसे ठगकर उससे यज्ञ आदि कर्मकांड के नाम पर पैसा ऐंठना आसान नहीं रहेगा। हालांकि अपनी जगह पर कर्मकाण्ड सही है और जागरण के लिए महत्त्वपूर्ण सीढ़ी है, पर मंजिल मिलने पर कौन सीढ़ी की परवाह करता है। वैसे भी वह भौतिकवादी गुरु है। शुक्राचार्य अर्थात भौतिक विज्ञानवादी व्यक्ति या गुरु द्वारा शुक्र अर्थात वीर्य को बाहर बहा कर सुषुम्ना के शक्ति प्रवाह को ब्लॉक करना ही शंख में घुसना है। वामन का उसको कुशा डंडी द्वारा खोलना ही योगी द्वारा कुण्डलिनी ध्यानचित्र के माध्यम से मूलाधार से शक्ति को ऊपर चढ़ाना है। यह मूलाधार से लेकर सहस्रार तक फैली हुई संवेदना की रेखा जैसी होती है जो रीढ़ की हड्डी में होती है। यह झाड़ू या कुशा की सींक जैसी पतली फील होती है। यही सुषुम्ना जागरण है। अगर संभोग से पहले पीठ की विशेषकर मेरुदंड की ढंग से मालिश करवा ली जाए, तो यह संवेदना रेखा आसानी से और आनंद के साथ महसूस होती है। फिर वीर्य शक्ति आसानी से ऊपर चढ़ती है, जिससे संभोग बहुत आनंदमय और आध्यात्मिक बन जाता है। यौनांगों का दबाव भी एकदम से खत्म हो जाता है। आदमी अक्सर ऐसा कुंडलिनीजनित आनंद के लालच से प्रेरित होकर करता है, इसीलिए मिथक कथा में कहा गया है कि वामन ने ऐसा किया। इससे शुक्राचार्य की आंख फूटना मतलब कुण्डलिनी के प्रभाव से  वीर्यशक्ति की द्वैत दृष्टि अर्थात दोगली नजर नष्ट होना है। जब वीर्यशक्ति द्वैत से भरे संसार की तरफ न बहकर अद्वैत से भरी आत्मा की तरफ बहेगी, तो स्वाभाविक है कि वीर्यशक्ति की दोगली नजर नष्ट होगी ही। बलि या अहंकार पाताल को चला जाता है, मतलब कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी व्यक्त अर्थात प्रकाशमान जगत का अहंकार नहीं कर सकता क्योंकि उसने सबसे अधिक प्रकाशमान कुंडलिनी जागरण का अनुभव कर लिया है। इसलिए वह स्थूल जगत से उपरत सा होकर अपने सूक्ष्म शरीर के रूप में अव्यक्त अन्धकार सा बन जाता है। यही उसका पातालगमन है। हालांकि सूक्ष्म शरीर के धीरे-धीरे स्वच्छ होने से स्वच्छ होता रहता है। इसे ही ऐसे कहा गया है कि भगवान विष्णु उसके द्वारपाल के रूप में पहरा देते हैं।

कुण्डलिनीछवि ही भगवान वामन का अवतार लेकर, जागृत होकर और अहंकाररूपी राजा बलि को पाताललोक भेजकर पूरी सृष्टि पर कब्जा कर लेती है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में धर्म बारे थोड़ी बात चल पड़ी थी। धर्म का शास्त्रीय मतलब है लाइफस्टाइल। जिसका लाइफस्टाइल कट्टर है, वह पिछड़ जाता है। नोकिया ने समय के साथ बदलाव नहीं किया। साथ में, यह निष्कर्ष भी निकला था कि जिन बहुत से लोगों को मनोरोगी समझकर उनके ऊपर दवाईयों से, शोषण से या सामाजिक बहिष्कार से उन्हें दबाया जाता है, वे दरअसल जागृति के रोगी होते हैं। काश कि मनोविज्ञान कुंडलिनी के लक्षणों और मनोरोग या मूर्खता के लक्षणों के बीच अंतर कर पाता। मुझे लगता है कि यह अंतर कर पाना पश्चिमी सभ्यता जैसी संस्कृति के लिए कठिन है, पर पूर्वी संस्कृति वालों को तो इसका अनुभव प्राचीन काल से ही है। खैर, आपने देखा होगा, हाल ही की पिछली एक पोस्ट में शेर कैसे योगी बना था। वैसे तो सिंघासन नाम का एक योगासन भी होता है। वैसे भी कुंडलिनी योगी को अजगर या ड्रेगन जैसा रूप दिया गया है, जिसका मुंह भी शेर की तरह खुला हुआ है। योग सांसों का खेल है, और शेर भी सांसों की ताकत से दहाड़ता है और अपने चेहरे को खतरनाक बना लेता है। हिंदू पुराणों में इसी तरह की एक दंतकथा आती है कि वामन भगवान ने तीन पग में सारी धरती माप ली थी। दरअसल तीन कदम सत्त्व, रज और तम, तीन गुणों के प्रतीक हैं। इड़ा नाड़ी देवी अदिति है, और पिंगला नाड़ी देवी दिति है। पिंगला दुनियावी भेद बुद्धि और अहंकार को बढ़ाती है, मतलब राक्षसी द्वैत भाव, रजोगुण व तमोगुण को बढ़ाती है। पर इड़ा नाड़ी शांति, तनावरहित्य, अद्वैतभाव व सत्वगुण जैसे दैवीय भाव पैदा करती है। इसीलिए कहते हैं कि अदिति सभी देवताओं की मां है और दिति सभी राक्षसों की मां। कश्यप मुनि की ये दोनों पत्नियां थीं। कश्यप ब्रह्मा के पुत्र थे। ब्रह्मा मन ही है। क्योंकि मन ही सारे संसार को रचता है। वह कमल पर बैठता है, सहस्रार रूपी कमल पर। जब आत्मा का स्थान सहस्रार बताया जाता है, तो मन का भी यही हुआ क्योंकि दोनों आपस में जुड़े हैं, एक के बिना दूसरा नहीं। ऋषि कश्यप अवचेतन मन है, क्योंकि वह मन से ही पैदा होता है। वह मूलाधार में रहता है। क का मतलब जल होता है, और श्य शयन शब्द से बना है, मतलब जल में सोने वाला। जल वीर्य द्रव और रीढ़ की हड्डी में बहने वाले सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड के रूप में है, और अवचेतन मन को सोए हुए आदमी के रूप में दिखाया गया है, क्योंकि इसमें ही सभी भावनाएं दबी–सोई रहती हैं। यह अवचेतन मन मूलाधार व स्वाधिष्ठान चक्रों जैसे गहरे व अंधेरे गड्ढों जैसे स्थानों में रहता है। जब इसके जागते हुए भावों या विचारों को अद्वैत भाव अर्थात इड़ा नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे भाव देवता बन जाते हैं, पर जब द्वैत भाव अर्थात पिंगला नाड़ी का साथ मिलता है, तब वे राक्षस बन जाते हैं। ये जागते विचार ही कश्यप और अदिति या दिति के पुत्र हैं। अदिति और दिति के रूप में क्रमशः इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही उसकी दो पत्नियां हैं, क्योंकि वह इन्हीं की मदद से पुत्ररूप में जागता है, मतलब शक्तिमान होता है। मानसिक कुंडलिनी छवि ही वामन भगवान है। यह सभी विचाररूपी पुत्रों में श्रेष्ठ है, इसलिए इसे भगवान विष्णु का अवतार कहा गया है। एकदम मस्त मनोविज्ञान है। ब्रह्मा मूल मन है। वास्तव में वही किस्म किस्म की सांसारिक रचनाएं जैसे घर, बाग, सड़क, पुल आदि बनाता है। वह सीधा विचाररूपी पुत्रों को पैदा नहीं करता। वह पहले अवचेतन मनरूपी कश्यप मुनि को पैदा करता है। उसीसे विचाररूपी पुत्र बनते हैं। आपने भी देखा होगा कि अगर आप दुनिया में कुछ काम न करो तो सीधे कोई मजबूत विचार नहीं बनेंगे। काम करने से उसकी यादें अवचेतन मन में समा जाती हैं, जो बाद में शक्तिशाली विचारों के रूप में उमड़ती रहती हैं। पिंगला नाड़ी के अधिकार क्षेत्र में आने वाला बायां मस्तिष्क राक्षसराज बलि के अधिकार में है, इड़ा–शासित दायां मस्तिष्क देवताओं के अधिकार में है। राजा बलि अहंकार है। अहंकार बलवान ही होता है। बलि नाम उसको इसलिए भी दिया हुआ लगता है क्योंकि अहंकार अपनी ताकत को बनाए रखने के लिए जीवों की बलि लेता है, हिंसा करता है। कुण्डलिनी छवि इड़ा के प्रभाव से बनती है। वैसे तो इड़ा और पिंगला दोनों संतुलित रूप में होनी चाहिए, क्योंकि दोनों का अस्तित्व एकदूसरे पर निर्भर है, पर इड़ा तुलनात्मक रूप से ज्यादा प्रभावी होनी चाहिए। इड़ा नाड़ी के प्रभाव में आदमी शांत, तनावरहित, अच्छी भूख व अच्छे पाचन से सम्पन्न हो जाता है। इसी चैन की अवस्था में शुभ विचार के रूप में कुण्डलिनी चित्र मन में डेरा डालता है, मतलब देवमाता अदिति से वामन भगवान का जन्म होता है। देखने को तो वह एक छोटा सा अकेला मानसिक चित्र है, इसीलिए उसे बौना कहा है। वह राजा बलि से ब्रह्माण्ड में अपने लिए सिर्फ तीन पग भूमि मांगता है। एक मानसिक छवि कितना स्थान लेगी। हरेक मानसिक वस्तु की तरह वह ध्यानचित्र भी तीन गुणों से ही बना है, सत्त्व, रज और तम। यही तीन पग हैं। आदमी का अहंकार रूपी बलि उसे उतनी जगह भी दे देता है, और सोचता है कि उससे उसका क्या नुकसान होगा। अहंकार बहुत बलशाली होता है। वह दुनिया के बड़े से बड़े काम करता है। छोटे से एकमात्र कुण्डलिनी चित्र को वह मजाक में लेता है। रीढ़ की हड्डी शंख है। इसका शंख जैसा ही रूप है, सिर के भाग में चौड़ी और निचले भाग में पतली। इसमें स्थित मेरुदंड या सुषुम्ना नाड़ी ही शंख के अंदर की ड्रेन या नाली है। नाड़ी शब्द नदी शब्द से ही बना है। उस ड्रेन में बहने वाला जल ही कुंडलिनी शक्ति की संवेदना है। शक्ति भी जल प्रवाह की तरह बहती है। क्योंकि इसमें कुण्डलिनी ध्यान या संकल्प मिश्रित होता है, इसलिए इसे संकल्पजल कहा गया है। ध्यान को ही संकल्प कहते हैं। हिंदु धर्म में हरेक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान शंख या अर्घे (पूजा का एक विशेष बर्तन) या आचमन से जल गिराते हुए संकल्प किया जाता है, मतलब उस अनुष्ठान के कारण, विधि, पुरोहित, और फल अर्थात उद्देश्य के बारे में कुछ क्षणों के लिए गहरा ध्यान किया जाता है। यज्ञ में बैठे हुए बलि ने शंख से जल गिराते हुए वामन भगवान को तीन कदम भूमि देने का संकल्प लिया था। संभवतः जल गिराने से कुण्डलिनी शक्ति बहने लगती है, क्योंकि दोनों में समानता है, जिससे ध्यान मजबूत होता है। अरघे या शंख से जल की गिरती धारा के साथ कुण्डलिनी शक्ति भी फ्रंट चैनल से नीचे की ओर बहने लगती है, जिसके दबाव से वह बैक चैनल में से गुजरते हुए पीठ से ऊपर चढ़ जाती है, और अपने साथ मूलाधार की अतिरिक्त व विशेष कुण्डलिनी शक्ति भी ले जाती है। कुण्डलिनीसंकल्प रूपी वामन, पतली मेरुदंड रूपी सुषुम्ना–शंख में, बह रहे शक्तिरूपी संकल्पजल की मदद से योगसाधना से बढ़ता ही रहता है, और अंत में जागृत होकर सम्पूर्ण सृष्टि को व्याप्त कर लेता है। यही तीन पग से तीनों लोकों को मापना है। इससे अहंकार खुद ही अवचेतन रूपी पाताल लोक में दब जाता है। जिसे ऐसे कहा गया है कि तीसरा पग वामन ने बलि के सिर पर रखा। यह कथा आने वाली अगली पोस्ट में भी जारी है।

कुंडलिनी योगी नृसिंह भगवान रूपी ध्यानचित्र की मदद से हिरण्यकशिपु रूपी अहंकार व तांत्रिक पापों को भस्म करके प्रह्लाद रूपी आत्मबुद्धि की रक्षा करता है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मोर कैसे योगी बना हुआ था। योगी का पिछ्ला एनर्जी चैनल नर मोर है, तो अगला चैनल मोरनी है। अवसाद से भरे माहौल में मूलाधार की शक्ति से उसके मस्तिष्क में बहुत से दोषपूर्ण विचार बनते हैं, क्योंकि शक्ति को व्यय होने का और रास्ता नहीं मिलता। उन्हीं विचारों अर्थात आंसुओं को वह खेचरी मुद्रा के रूप में उल्टी जीभ को मुंह के अंदर के नर्म तालु से छुआ कर पीता है। वही आंसू फ्रंट चैनल से नीचे उतरते हुए चक्रों पर विशेषकर नाभि चक्र पर कुण्डलिनी चित्र का रूप ले लेते हैं, मतलब मोरनी गर्भवती हो जाती है।

पुराणों की एक कथा के अनुसार हिरण्यकशिपु नामक एक राक्षस ने ब्रह्मा से वरदान मांगा कि न वह मनुष्य के द्वारा न पशु के द्वारा, न दिन में न रात में, न आकाश में और न धरातल पर, न घर के अंदर न बाहर, और न अस्त्र से और न ही शस्त्र से मारा जा सकेगा। हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु को अपना कुलशत्रु मानता था। परंतु उसका बेटा प्रह्लाद विष्णुभक्त था। हिरण्यकशिपु ने उसे बहुत समझाया पर जब वह नहीं माना तो उसने उसे मारने के बहुत से प्रयास किए। एकबार उसने लोहे का खंबा लाल गर्म करवाया और प्रह्लाद को उससे चिपकने को कहा। प्रह्लाद ने एक चींटी को उस पर रेंगते हुए देखा तो बिना डरे उस खंबे को गले लगा लिया। तभी उससे एक विचित्र जीव निकला, जिसका मुंह शेर का था परंतु वह नीचे से आदमी था। उसका नाम नृसिंह था। उसने हिरण्यकशिपु को संध्या के समय, घर के दरवाजे पर ले जाकर, अपनी गोद में उठाकर अपने नखों से मार डाला।
हिरण्यकशिपु तांत्रिक पाप का प्रतीक भी है। तांत्रिक पंचमकार पापरूप ही तो हैं। पापरूपी शक्ति का रुझान भौतिक दुनिया की तरफ ज्यादा होता है। इसलिए वह आदमी को अध्यात्म की तरफ नहीं जाने देती। पर गुरुकृपा से आदमी का रुझान अध्यात्म की ओर हो जाता है। इसीको कथा में ऐसे कहा गया है कि पाठशाला के गुरु ने प्रह्लाद को अध्यात्म की तरफ मोड़ा। फिर हिरण्यकशिपु ने उस गुरु को हटा कर छलकपट से भरी भौतिक शिक्षा देने वाला नया गुरु रख लिया। पर प्रह्लाद का स्वभाव नहीं बदला। मतलब साफ है कि अंधी शक्ति सच्चे गुरु से भी दूर ले जाने की कोशिश करती है, पर अगर सच्चे गुरु से थोड़ा सा भी संपर्क स्थापित हो जाए, तो वह कामयाब नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप अध्यात्म की तरफ झुके हुए इन तांत्रिक पापों से आदमी की सुषुम्ना क्रियाशील हो जाती है। यही हिरण्यकशिपु द्वारा लाल गर्म लोहे का खंबा बनाना है। योगी द्वारा ध्यानचित्र को इसके साथ जोड़ना ही उसका इससे आलिंगन करना है, क्योंकि आदमी का अपना रूप भी वही होता है, जिसका वह हरपल ध्यान कर रहा होता है। ध्यानचित्र के जागने मतलब नृसिंह भगवान के प्रकट होने से अन्य सभी पापों के साथ कुण्डलिनी साधना की सफलता के लिए किए गए वे तांत्रिक पाप भी नष्ट हो जाते हैं। यही नृसिंह के द्वारा हिरण्यकशिपु का वध है। संध्या के समय उस जलते खम्बे से नृसिंह का प्रकट होना मतलब अन्य समय की अपेक्षा उस समय सुषुम्ना ज्यादा क्रियाशील होकर सहस्रार में ध्यान चित्र को जागृत जैसा करती है। सक्रिय सुषुम्ना नाड़ी ही वह दहकता लाल लौह स्तंभ है। सुषुम्ना भी रीढ़ की हड्डी के अंदर रहती है, जो लोहे की तरह कठोर है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र को कई लोग भूतिया जैसा डरावना मानते हैं, क्योंकि उसका भौतिक अस्तित्व नहीं होता, इसीलिए उसको डरावने नृसिंह का रूप दिया गया है। ध्यान चित्र न मनुष्य होता है और न ही पशु। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि जब हनुमान, गणेश जैसे अर्धमानुष रूपों का ध्यान किया जाता है, तब ध्यानचित्र सबसे ज्यादा अभिव्यक्त होता है। वह न अंदर होता है और न ही बाहर। इसका मतलब है कि ध्यानचित्र कोई भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि केवल एक काल्पनिक चित्र है। वह न दिन में अच्छे से बनता है और न रात को, बल्कि संध्या के समय कुंडलिनी योग करते हुए बनता है। वह हिरणयकाशीपु को गोद में उठाकर उसके पेट को नख से फोड़ता है, मतलब मूलाधार स्वाधिष्ठान से अवचेतन और अचेतन मन के रूप में दबे अहंकार को ऊपर उठाकर उन्हें चक्रोँ पर प्रकट करके समाप्त करता है, मतलब यह विपासना साधना ही है। सहस्रार चक्र में यह अहंकार पूरा अभिव्यक्त जैसा बना रहता है, और मूलाधार में सोया हुआ सा रहता है, इसलिए दोनों ही स्थानों पर मरने को नहीं आता। यह बीच वाले चक्रों में ही अर्धजागृत या अर्धसुशुप्त सा रहता है, इसलिए बीच में ही मरने को आता है। विपासना साधना के साक्षीभाव का भी तो यही सिद्धांत है। यह शक्ति के द्वारा चक्रभेदन ही है। पहले अवचेतन मन रूपी धरातल से सुषुप्त विचारों और वासनाओं को प्राण शक्ति से जगा कर चक्रों पर अभिव्यक्त किया जाता है, फिर चक्रों पर प्राण के प्रवाह से उनका भेदन किया जाता है। दरअसल भेदन या नाश तो उन वासनाओं व संस्कारों का होता है, पर भेदन चक्रों का माना जाता है। क्योंकि पेट का नाभि चक्र सबसे प्रमुख होता है, इसलिए हिरण्यकशिपु का पेट फाड़ने की बात कही गई है। क्योंकि ज्यादातर योगी चक्रस्थान पर अंगुली का नख वाला सिरा रख कर नख से चक्र की तीव्र चुभन वाली संवेदना से या कम से कम अंगुली रखकर ध्यान को मजबूत करते हैं, इसीलिए कहा गया है कि नरसिंह ने हिरण्यकशीपु को नख से फाड़ा। इसमें जो संतुलित या बीच वाली अवस्थाओं में हिरणकशिपु का वध है, वह यही बताता है कि संगम अर्थात यिनयाँग वाली अवस्था में ही सुषुम्ना क्रियाशील होती है। अहंकार को न कोई मनुष्य मार सकता है, और न कोई पशु। उसे किसी भी अस्त्र–शस्त्र से नहीं मारा जा सकता। उसे न तो पूरी तरह बाहर अर्थात बाह्यमुखी होके मारा जा सकता है, और न ही पूरी तरह अंदर अर्थात अंतर्मुखी होकर, बल्कि दोनों के उपयुक्त मिश्रण से ही मारा जा सकता है। कुण्डलिनी योगी को जो पीठ में अर्थात सुषुम्ना में रेंगती जैसी हल्की संवेदना महसूस होती है, उससे उसे कुण्डलिनी जागने बारे विश्वास हो जाता है, जिससे वह योगाभ्यास में लगा रहता है, और सुषुम्ना को क्रियाशील करके कुण्डलिनी जागरण प्राप्त कर लेता है। इसीको ऐसे कहा गया है कि प्रह्लाद को उस जलते लोहस्तंभ पर एक कीड़ी रेंगते हुए दिखी, जिससे आश्वस्त होकर उसने उसे गले लगा लिया, जिससे नृसिंह भगवान प्रकट हुए।

कुण्डलिनीयोग में कपालभाति प्राणायाम की अहम भूमिका है

बाएं और दाएं नथुने से बारीबारी साँस ली जाती है, और छोड़ी जाती है, ताकि इड़ा और पिंगला, दोनों साइड की नाड़ियों में कुण्डलिनी शक्ति झूलती रहे, और धीरे-धीरे बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी में ऊपर चढ़ती रहे। पतंग भी इसी तरह उड़ती है। डोरी को ढील देने पर कभी वह बहती हवा के थपेड़े से दाईं तरफ के आकाश में फैल जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर चढ़ती है। कभी विपरीत दिशा में हवा बहने से वह बाईं तरफ के आकाश में पसर जाती है, और फिर खींच देने पर सीधी ऊपर उठती है। दोनों साइड को झूलने से वह बहुत ऊँचाई में पहुंच जाने पर भी आदमी के सिर के ऊपर सीधी बनी होती है। यह सीधाई ही सुषुम्ना नाड़ी के समकक्ष है। कुण्डलिनी योग के समय भी, जब शरीर के बाएं हिस्से में प्राण की कमी होती है, और शरीर को ढीला छोड़ा जाता है, तो कुण्डलिनी शरीर के बाएं हिस्से मतलब इड़ा नाड़ी में बहने लगती है। इसी तरह जब शरीर के दाएं भाग में प्राणों की कमी हो जाती है, तो कुण्डलिनी दाएं भाग अर्थात पिंगला नाड़ी में बहती महसूस होती है। ऐसा लगता है कि जैसे आनंदमयी जैसी हलचल हो रही है, कोई करेंट वाली पतली तार जैसी नाड़ी मुझे तो महसूस होती नहीं। हो सकता है कि यह अव्यवहारिक किताबी बातें हों या उच्च स्तर के अभ्यास में महसूस होती हो। मुझे तो साधारण अनुभव से ही काफ़ी शक्ति महसूस होती है। आकाश में भी उस हिस्से की तरफ हवा चलती है, जिस हिस्से में वायु का दबाव कम हो जाता है, मतलब प्राण कम हो जाता है, क्योंकि वायु ही प्राण है। इससे स्वाभाविक है कि प्राण या हवा के बहाव के साथ कुण्डलिनी या मन या पतंग उसी तरफ चली जाती है। फिर जब वहाँ हवा या प्राण ज्यादा बढ़ जाता है, तो वह थोड़ा उल्टी दिशा की तरफ वापिस भागता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी उसके साथ बह जाती है, और मान लो सीधी सिर के ऊपर या सुषुम्ना में आ जाती है। क्षणभर वहाँ रुक के वायु या प्राण दाएं आसमान में या पिंगला में पहुंच जाता है, जिसके साथ पतंग या कुण्डलिनी भी होती है। वहाँ से फिर बाईं ओर का सफर शुरु होता है। कुण्डलिनीरूपी मन या पतंग का इस तरह का पेंडुलम के जैसा दोलन चलता रहता है, और वह सुषुम्ना में या आसमान में ऊपर उठती रहती है।

जब पतंग बहुत ऊपर उठ जाती है, तब डोर पर खींच लगाकर उसे नीचे उतारते हैं। इसी तरह जब कुण्डलिनी काफी ऊँचाई तक उठकर दिमाग़ में दबाव, थकान, और सिरदर्द पैदा करती है, तब निःश्वास झटके के साथ चलने लगते हैं। ऐसा कपालभाती प्राणायाम में होता है, जहाँ बाहर जाती सांस झटके और दबाव से चलती है, पर अंदर जाती साँस इतनी शांति से व धीरे चलती है कि उसका पता ही नहीँ चलता। इससे निःश्वास पर ज्यादा अवेयरनेस रहती है। साथ में, इसमें शरीर की मांसपेशियां भी नीचे की तरफ धक्का लगाती हैं। इन दोनों बातों से कुण्डलिनी शक्ति फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है, जिससे मस्तिष्क का दबाव कम होने से आदमी पुनः तरोताज़ा होकर फिर से दिमागी काम के लिए तैयार हो जाता है। चमत्कारी प्रभाव पैदा करता है कपालभाती। इसलिए काम के दबाव व समय की कमी के दौरान केवल इसी तरह की साँस ली जाए, तो बहुत लाभ प्रदान करती है। यहाँ एक बात बता दें कि मन-पतंग स्थायी तौर पर नीचे नहीं रहती, यह फिर बैक चैनल से ऊपर चढ़ जाती है। यह लगातार उपरनीचे घूमती रहती है। यह ऐसे ही है जैसे पतंग को हल्की खींच या तुनका लगाया जाता है, तो वह और ऊपर उठती है। साँसें तो यथार्थ में ही मन की डोर हैं, जैसा अक्सर कहा भी जाता है कि फलां की सांसों की डोर लंबी खिंच गई मतलब कोई जिन्दा बचगया, या सांसों की डोर टूट गई मतलब कोई मर गया। श्रीमदभागवत गीता में जब अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं कि भगवन, मन को वश में करना तो बहुत कठिन है, वायु को वश में करने से भी कठिन है, तब भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कौन्तेय, मन अभ्यास से वश में आ जाता है, विशेषकर प्राणायाम के अभ्यास से।

ठंडे पानी से नहाते समय साँस तेजी से और झटकों से बाहर की ओर चलने लगती है। अधिकांश समय मुंह भी पूरा खुला होता है, जिससे साँसें धौकनी की तरह बाहर निकलती हैं। इससे दिमाग़ का दबाव नीचे उतरता है जिससे सिरदर्द से बचाव होता है। सम्भवतः ब्रेन हीमोरेज का खतरा भी कम हो जाता है। इससे ठंडा पानी झेलने की क्षमता बढ़ती है और वह आनंद दायी लगने लगता है। इसी तरह खाना खाने के बाद वज्र-आसन से भी लगभग ऐसा ही होता है। इससे दिमाग़ की शक्ति पाचन अंगों तक उतरती है जिससे पाचन दुरस्त होता है। साँस का ये स्टाइल कपालभाती ही है।

कुण्डलिनी योग भी एक लहर ही है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में एक विचार-प्रयोग के माध्यम से बता रहा था कि सृष्टि के अंत में कैसे गुरुत्वाकर्षण सभी चीजों को निगल जाएगा। कई वैज्ञानिक भी ऐसा ही अंदाजा जता रहे हैं, जिसे बिग क्रन्च नाम दिया गया है।

साथ में मूलकण के तरंग स्वभाव के बारे में भी बात चली थी। हवा, पानी आदि भौतिक तरंगों के मामले में देखने में आता है कि क्रेस्ट और ट्रफ एकसाथ नहीं बन सकते। जब क्रेस्ट बनाने के लिए जल सतह से ऊपर की तरफ उठेगा, तो उसी समय उसी जगह पर वह ट्रफ के रूप में सतह के नीचे नहीं डूब सकता। पर आकाश की तरंग के मामले में ऐसा हो सकता है, क्योंकि यह आभासी है, और इसके लिए किसी भौतिक वस्तु या माध्यम की जरूरत नहीं है। इसीलिए एकसाथ त्रिआयामी क्रेस्ट और ट्रफ बनने से मूलतरंग मूलकण की तरह भी दिखती है, और उसके जैसा व्यवहार भी करती है, जैसा कि पिछली पोस्ट में चित्रोक्त किया गया है। मूलकण रूपी तरंग ऐसे ही क्रेस्ट और ट्रफ बनाते हुए आगे से आगे बढ़ती रहती है, क्योंकि प्रकृति और पुरुष हर जगह विद्यमान हैं, और प्रकृति से पुरुष की तरफ दौड़ हर जगह चली रहती है। इसीलिए मूलकण कई जगह एकसाथ दिखाई देते हैं। पिछले क्रेस्ट से अगला ट्रफ बनता है, और पिछले ट्रफ से अगला क्रेस्ट, क्योंकि प्रकृति को सीमेट्री प्यारी है। इस तरह अनगिनत तरंगों के रूप में अंतरिक्ष में अनगिनत सूक्ष्म लूप बन जाते हैं। मतलब पूरा आकाश लूपों में बंटा हुआ सा लगता है। क्वांटम लूप थ्योरी भी यही कहती है कि अंतरिक्ष सपाट न होकर सूक्ष्मतम टुकड़ों में बंटा है। उससे छोटे टुकड़े नहीं हो सकते। पर अगर सिद्धांत से देखा जाए तो हरेक चीज टूटते हुए सबसे छोटी जरूर बनेगी। वह विशेषता से रहित शून्य आसमान ही है। जिसे अंतरिक्ष का क्वांटम लूप कहा गया है, वह दरअसल शून्य अंतरिक्ष का अपना स्वाभाविक रूप नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष में आभासी मूलकण है। इससे इन सभी बातों का उत्तर मिल जाता है कि तरंग कण के जैसे क्यों व्यवहार करती है, स्टैंडिंग वेव और प्रॉपेगेटिंग वेव कैसे बनती है आदि। कोई भी लहर वास्तव में ध्यानरूप ही है, जैसा पिछली पोस्ट में बताया गया है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ लहर के रूप में ही चलती हैं। लहर में कोई चीज आगे नहीं बढ़ती, लहर बनाने वाली चीज केवल अपने स्थान पर आगे-पीछे या ऊपर-नीचे कांप कर अपनी पूर्ववत जगह पर आ जाती है। केवल लहर आगे बढ़ती है। वैसे भी शून्य जैसे अंतरिक्ष में कोई चीज है ही नहीं प्रकट होने को। इसलिए एकमात्र लहर का ही विकल्प बचता है। वहाँ तो अपनी जगह पर कांपने के लिए भी कोई चीज नहीं है। इसलिए झूठमूठ में ही कंपन दिखाया जाता है। यह नहीं पता कि कैसे। प्रकाश जिसको ईश्वररूप या दैवरूप माना जाता है, लहर के रूप में ही चलता है। इसी तरह अग्नि भी।

नाड़ी की गति भी लहर के रूप में ही होती है

नाड़ी में संवेदना लहर के रूप में आगे बढ़ती है। इसमें सोडियम-पोटाशियम पम्प काम करता है। सोडियम और पोटाशियम आयन अपनी ही जगह पर नाड़ी की दीवार से अंदर-बाहर आते-जाते रहते हैं, और संवेदना की लहर आगे बढ़ती रहती है।

लहर सूचना को आगे ले जाती है

तालाब में कहीं पर कंकड़ मारने से उसके पानी पर लहर पैदा होकर चारों तरफ फैल जाती है। उससे जलीय जंतु संभावित खतरे से सतर्क हो जाते हैं। जमीन पर चलने से उस पर एक लहर पैदा हो जाती है, जिसे सांप आदि जंतु पकड़कर सतर्क हो जाते हैं या भाग जाते हैं। वायु से आवाज के रूप में सूचना संप्रेषण के बारे में तो सभी जानते हैं। मूलाधार से संवेदना की लहर सहस्रार तक जाती है, जिससे सहस्रार सतर्क अर्थात क्रियाशील हो जाता है। सतर्क कालरूपी शत्रु से होता है, जो हर समय मौत के रूप में आदमी के सामने मुंह बाँए खड़ा रहता है। इसलिए सहस्रार अद्वैत के साथ सांसारिक अनुभूतियों के रूप में जागृति या आध्यात्मिक जीवनयापन के लिए प्रयास करता है। वैसे दुनियादारी में सफलता भी सहस्रार से ही मिलती है, क्योंकि वही अनुभूति का केंद्र है।

जीवात्मा विद्युतचुंबकीय तरंगों की सहायता से अपने अंदर आभासी संसार को महसूस करता है

नाड़ी में चार्जड पार्टिकलस की गति से आसपास के आकाश में विद्युत्चुंबकीय तरंग बनती है। उस तरंग से सहस्रार के आत्म-आकाश में आभासी तरंगें बनती महसूस होती हैं। इसीलिए कहते हैं कि आत्मा का स्थान सहस्रार है। यह आश्चर्य की बात है कि अनगिनत स्थानों पर विद्युत्चुंबकीय तरंगों से आकाश में अनगिनत आभासी कलाकृतियाँ बनती रहती हैं, पर वे केवल जीवों के मस्तिष्क के सहस्रार में ही आत्मा को महसूस होती हैं। अगर उसकी बनावट व उसकी कार्यप्रणाली की सही जानकारी मिल जाए तो हो सकता है कि कृत्रिम जीवकृत्रिम मस्तिष्क का निर्माण भी विज्ञान कर पाए।