कुंडलिनी योग एक माली की तरह काम करता है

दोस्तों, पूर्ण प्रकृति संपूर्ण जगत की छाया है। पूर्ण प्रकृति को मूल प्रकृति भी कहते हैं। यह समष्टि जगत की मूल प्रकृति है। व्यष्टि जगत की मूल प्रकृति को मूलाधार कहते हैं। पर मूलाधार तो शुद्ध छाया होती है। उसमें किसी विशेष भौतिक वस्तु की सूचना नहीं छिपी होती। मतलब यह शून्यमय छाया होती है। उधर हम मूल प्रकृति के अंदर संपूर्ण भौतिक जगत की सूचना को दर्ज होया हुआ मान रहे हैं। पर इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। मूल प्रकृति में सभी विरोधी सूचनाएं एक दूसरे से रद्द होकर शून्य ही बन जाती हैं। पूरी सृष्टि संतुलित है, मतलब न्यूट्रल है। इसमें जितना पॉजिटिव है, उतना ही नेगेटिव है। इस तरह से मूल प्रकृति और मूलाधार दोनों एक ही है। मतलब आदमी मूलाधार के रूप में मूल प्रकृति को भी महसूस कर सकता है। क्योंकि मूल प्रकृति संपूर्ण सृष्टि का सूक्ष्म रूप है, इसका मतलब है कि आदमी अप्रत्यक्ष रूप में अर्थात मूलाधार के रूप में संपूर्ण सृष्टि को भी एक साथ अनुभव कर सकता है।

यहां एक पेच भी है। कोई कह सकता है कि जब मूल प्रकृति में सभी सूचनाएं खत्म हो गईं, तो उसमें अंधेरा कैसे रहा, क्योंकि अंधेरे का मतलब ही उसमें सूक्ष्म सूचनाओं की उपस्थिति है। दरअसल सूचनाएं खत्म नहीं हुईं, पर उनका कुल प्रभाव एकदूसरे से रद्द हो गया। सूचनाएं तो उसमें सारी रहीं। यह ऐसे ही है जैसे हलवे में चीनी और नीम डालने से होगा। रहेंगी तो ये दोनों चीजें, पर हलवा हमें न मीठा लगेगा, न कड़वा। आदमी के मूलाधार में पहुंचने पर भी ऐसा ही होता है। उसमें सभी सूचनाएं एकसमान होती हैं। इसलिए एकसमान सा, न चुभने वाला और आनंदमयी सा अंधेरा महसूस होता है उसमें। न किसी सूचना से राग, न किसी सूचना से द्वेष। यही अद्वैत है। इसीलिए अद्वैत और अनासक्त जीवन जीने की सलाह दी जाती है। इससे आदमी जल्दी मूलाधार में पहुंच जाता है। पर यह तभी होता है, जब अद्वैत के साथ भरपूर, विविध, और विरोधी दुनियादारी को भी जिया जाए। इससे आदमी सभी किस्म की विपरीत सूचनाएं इकट्ठा करेगा, जो एकदूसरे से रद्द होकर जल्दी ही मूलाधार में प्रवेश करा देती हैं। बिना विरोधी दुनियादारी के अद्वैत का आचरण एक दिखावा ही लगता है मुझे। 

फिर कहते हैं कि मूलाधार तो विकास करते हुए कुंडली जागरण के माध्यम से पुरुष में विलीन हो सकता है। फिर मूल प्रकृति पुरुष में विलीन होकर खत्म क्यों नहीं हो जाती। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि मूल प्रकृति का भौतिक अस्तित्व है, जिसे हम डार्क मैटर या डार्क एनर्जी कहते हैं। यह वैज्ञानिक सिद्धांत है कि भौतिक वस्तु कभी खत्म नहीं हो सकती। वह केवल रूप बदल सकती है, पर रहेगी वह हमेशा। इसे हम थ्योरी ऑफ कंजर्वेशन ऑफ मास एंड एनर्जी कहते हैं। एक वस्तु विभिन्न किस्म की वस्तुओं के रूप में या ऊर्जा के रूप में रह सकती है। यह सभी रूप आपस में बदलते रह सकते हैं। पर वह वस्तु कभी खत्म नहीं हो सकती। दूसरी तरफ मूलाधार का कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। यह एक आत्मा का अनुभव है। वह अनुभव भी सच्चा नहीं पर भ्रमपूर्ण है। या ऐसा कह लो कि यह आत्मा पर भ्रम से बना हुआ मूल प्रकृति का आभासी चित्र मात्र है। असली या भौतिक उसमें कुछ भी नहीं है। जब आत्मा को ज्ञान होने पर भ्रम समाप्त हो जाता है, तो मूलाधार का अनुभव पुरुष के अनुभव के असली रूप में आ जाता है। यही सच्चा और असली अनुभव है। अगर मूल प्रकृति भी मात्र एक अनुभव होता और उसका कोई भौतिक अस्तित्व न होता, तब तो वह कब की खत्म हो जाती, और सृष्टि का अस्तित्व ही नहीं बचता। तब न हम होते, न आप और न ही यह रंगीन दुनिया। कई वेदांती लोग कहते हैं कि मूल प्रकृति का अस्तित्व नहीं है। वह भ्रम है, आदि-आदि। वे दरअसल मूलाधार की बात कर रहे हैं, जो मूल प्रकृति का आभासी मानसिक चित्र है। भौतिक रूप में तो सूक्ष्म मूल प्रकृति का अस्तित्व वैसा ही सत्य है, जैसा स्थूल भौतिक जगत का। बाईबल के Genesis 2:7 में मानवता को इसी तरह परिभाषित किया गया है। वहाँ हम पाते हैं कि परमेश्वर ने मानवता को परमेश्वर की छवि में बनाया है। परमेश्वर ने मानवता को एक ऐसे तरीके से बनाया है जो भौतिक दुनिया को बनाने के तरीके से बहुत अलग है।

कुंडलिनी योग से मूलाधार को ही पुरुष में विलीन किया जा सकता है, मूल प्रकृति को नहीं। पहले हर एक चक्र पर जमा संसारी कचरे को बाहर निकाला जाता है। फिर खाली हुए चक्र स्थानों पर कुंडलिनी चित्र को भरा जाता है। तभी यह हर समय ध्यान में रहते हुए उचित अवसर आने पर जाग जाता है। यह ऐसे ही है, जैसे एक माली बंजर भूमि पर फूल तभी उगा सकता है, जब उसके द्वारा पहले वहां के घास, फूस, झाड़, कंकड़ आदि को हटाकर उस जगह को साफ किया जाता है। अच्छी तरह से पाला और संभाला गया फूल का पौधा ऊपर उठता हुआ और बढ़ता हुआ कभी न कभी तो जागृति के फूल के रूप में खिलेगा ही।

भौतिक वस्तु न तो कभी पैदा हो सकती है, और न नष्ट हो सकती है, यह वैज्ञानिक सिद्धांत सांख्य दर्शन के सिद्धान्त को भी बयां करता है। इसके अनुसार प्रकृति भी रूप बदलती रहती है। यह कभी व्यक्त होती है, कभी अव्यक्त। पर रहती यह हमेशा है। मतलब यह अनादि, अनंत है। इसलिए यह सत्य नहीं कि प्रकृति या जगत की उत्पत्ति पुरुष अर्थात परमात्मा से हुई है। पुरुष की तरह प्रकृति का भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। यह जो पुरुष से प्रकृति के उत्पन्न होने की बात की गई है, वह मन के अंदर बने प्रकृति के चित्र मतलब व्यष्टि प्रकृति के लिए कही गई है। आत्मा मतलब पुरुष खुद उस चित्र का रूप ले लेता है। मतलब उस प्रकृतिचित्र की उत्पत्ति पुरुष से हुई, प्रकृति की नहीं। आत्मा को जब अपने असली पुरुष रूप का ज्ञान हो जाता है, तो मानो वह प्रकृतिचित्र फिर से अपने असली पुरुष रूप में आ गया, मतलब प्रकृति पुरुष में विलीन हो गई।

कुंडलिनी योग से डार्क मैटर डार्क एनर्जी के रूप में व्यवहार करने लगता है

दोस्तों, स्थूल जगत और उसका अभाव दोनों का ही अस्तित्व नहीं है। आदमी दोनों को अस्तित्व प्रदान करता है। जगतभाव पुरुष का अविभाजित अंश है। इसलिए जगतअभाव भी पुरुष का अंश ही सिद्ध हुआ। बेशक भाव की अपेक्षा बहुत छोटा। अगर जगत भाव को हम पुरुष का अविभाजित अंश कहते हैं तो अभाव को प्रकृति का अविभाजित अंश कहने में कोई समस्या नहीं है। ज्ञान और साधना से आदमी पूर्ण पुरुष तो बन सकता है पर पूर्ण प्रकृति कैसे बनेगा। पूर्ण पुरुष का अस्तित्व है पर पूर्ण प्रकृति का तो अस्तित्व ही नहीं है। वैसे अस्तित्व तो संपूर्ण जगतभाव का भी नहीं है। मतलब आंशिक जगतभाव का अस्तित्व ही संभव है। यह इसलिए क्योंकि जगतभाव को अस्तित्व जीवों के अनुभव से मिलता है। और ऐसा कोई जीव नहीं है जो संपूर्ण जगतभाव को एक साथ अनुभव कर सके। सृष्टि के सभी जीव मिलकर भी ऐसा नहीं कर सकते। इसी तरह संपूर्ण जगतअभाव अर्थात प्रकृति का भी अस्तित्व संभव नहीं है। मतलब यह है कि बेशक समग्र जगतभाव का और समस्त जगतअभाव का भौतिक अस्तित्व है पर उनमें आत्मा नहीं है, और उन्हें कोई जीवात्मा भी अनुभव नहीं करता।

क्योंकि पुरुष तो कभी नष्ट नहीं होता इसलिए उसका अभाव नहीं होता। मतलब पुरुष की छाया बन ही नहीं सकती। छाया वास्तव में अभाव को ही कहते हैं। पेड़ की छाया वस्तुतः पेड़ की नहीं होती बल्कि प्रकाश किरणों की होती है। जिस क्षेत्र पर प्रकाश किरणों का अभाव हो गया, उस क्षेत्र में पेड़ की छाया पड़ी हुई मानी जाती है। इसी तरह से जगत से जो छाया बनती है, वह पुरुष के अभाव से बनती है। मतलब जगत एक पेड़ की तरह है, और पुरुष सूर्य की तरह है। इसी तरह समग्र सृष्टि की छाया ही मूल प्रकृति है, पुरुष का इससे कुछ लेना देना नहीं। समग्र जगत के अभाव को मूल प्रकृति कहेंगे। क्योंकि समग्र जगत भी पुरुष का ही अविभाजित अंश है, इसलिए व्यवहार में मूल प्रकृति को पुरुष की छाया कहा जाता है। लघु मतलब व्यष्टि या व्यक्तिगत जगत के द्वारा पैदा किए गए छायानुमा अभाव को लघु या व्यष्टि या व्यक्तिगत प्रकृति कहेंगे। मतलब व्यष्टि जगत को ही अनुभवात्मक सत्ता मिलती है, समष्टि जगत को नहीं। हालांकि भौतिक अस्तित्व दोनों का होता है।

प्रकृति सीधी पुरुष तक नहीं जा सकती। उसे पुरुष अंशों से होकर ही क्रमवार ऊपर चढ़ना पड़ता है। इसलिए यह पुरुष के अविभाजित अंश को धीरे-धीरे बढ़ाती रहती है। सबसे छोटे जीव जैसे कि जीवाणु आदि में जरा भी पुरुष अंश नहीं होता। पर यह पुरुष अंश पैदा करने वाली शरीररूपी सीढ़ी का पहला पायदान होता है। फिर मेंढक, मछली आदि जीवो में प्रकृति बनी जीवात्मा को पुरुष अंश महसूस होने लगता है। कुत्ता, बंदर जैसे प्राणियों में यह अंश काफी बढ़ जाता है। आदमी में यह अंश सर्वोच्च स्तर पर होता है। इस स्तर से प्रकृति कुंडलिनी योग से सीधे ही पुरुष तक छलांग लगा सकती है। मतलब मनुष्य शरीर से ज्यादा विकसित शरीर की जरूरत नहीं पड़ती। महामानव आदि तो मिथकीय परिकल्पना ही लगती हैं इस मामले में, जिनका कोई विशेष उद्देश्य नहीं दिखता।

हम स्थूल जगत को कभी सीधे तौर पर अनुभव नहीं कर सकते, न इसके भाव को और न इसके अभाव को। स्थूल जगत का जो सूक्ष्म चित्र हमारी आत्मा पर बनता है, हम उसे ही महसूस कर सकते हैं। स्थूल जगत के भाव का चित्र तो हमें पहाड़, नदी, सूर्य आदि विविध पदार्थों के रूप में महसूस होता है। इन पदार्थों के अभाव का चित्र हमें अंधेरे के रूप में महसूस होता है। वह तो अंधेरे का सूक्ष्म रूप है। पर उसका स्थूल रूप भी बाहर मौजूद होता है, उसी तरह जैसे आत्मा में अनुभव हो रहे सूक्ष्म जगत का स्थूल रूप बाहर के स्थूल जगत के रूप में होता है। उस स्थूल अंधेरे को ही शायद डार्क एनर्जी, डार्क मैटर आदि कहते हैं।

भौतिक शरीर की तरह भौतिक जगत की भी एक जीवन सीमा है। जैसे शरीर उस सीमा को छू लेने पर मर जाता है, उसी तरह जगत भी अपनी आयु पूरी होने पर नष्ट हो जाता है। स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर रूपी व्यष्टि प्रकृति में समा जाता है। स्थूल जगत डार्क एनर्जी एंड डार्क मैटर जैसे नाम वाली समष्टि प्रकृति अर्थात मूल प्रकृति में समा जाता है। उस सूक्ष्म शरीर से नया शरीर फिर से जन्म ले लेता है। उसी तरह मूल प्रकृति से भी नया जगत पैदा हो जाता है। यह सिलसिला चक्रवत चलता रहता है।

कई लोग बोलते हैं कि इस जगत की उत्पत्ति परमात्मा से हुई है। वास्तव में पुरुष से कुछ पैदा नहीं होता। वह बिल्कुल असंग है। वह आश्चर्यमय और अद्वितीय है। हां, उसकी निकटता से जगत को अनुभवात्मक सत्ता मिलती है। जगत तो पुरुष की तरह ही अनादि, अनंत है। यहां यह अंतर है कि पुरुष हमेशा पूर्ण और एकसमान रहता है, जबकि जगत बदलता रहता है। जगत कभी भाव रूप में होता है तो कभी अभाव रुप में। इसके भाव रूप में अभिव्यक्ति के भी अनगिनत स्तर हैं और अभाव रुप में अभियुक्ति के भी अनगिनत स्तर हैं। इसी जगत को प्रकृति कहते हैं। जब इसे पुरुष की समीपता मिलती है, तब यह अनुभव के दायरे में आता है, अन्यथा बिना अनुभव के ही चलायमान रहता है, जैसे कि कोई नर्तकी अंधेरे में नाच रही हो। इसीलिए कहते हैं कि अनुभव में आने वाला समस्त संसार प्रकृति और पुरुष के सहयोग से बना है।

इसी तरह से लोग कहते हैं कि बच्चे परमात्मा से आते हैं इसलिए परमात्मा का साक्षात रुप है। आदमी के जन्म के साथ ही वह अपने मस्तिष्क में जगत के चित्र महसूस करने लगता है। मस्तिष्क में वे तभी महसूस हो सकते हैं, अगर वे बच्चे के सूक्ष्म शरीर में पहले से मौजूद हों, अन्यथा वे चित्र बनेंगे तो जरूर पर किसी को महसूस ही नहीं होंगे। बोलने का मतलब है कि अंधेरा रूपी सूक्ष्मशरीर पर ही वे प्रकाशमान चित्र बन सकते हैं। अगर बच्चों की आत्मा अंधेरे सूक्ष्म शरीर की बजाय प्रकाशमान पुरुष के रूप में हो तब उस पर प्रकाशमान चित्र कैसे बन सकते हैं। प्रकाशमान दीवार पर प्रकाश से रेखाचित्र तो नहीं बन सकते। पहले दीवार को काला या अंधेरानुमा करना होगा। हां यह जरूर है कि बच्चे परमात्मा के सबसे निकट होते हैं, क्योंकि उनमें अहंकार भाव बहुत कम होता है।

प्रकृति व्यक्त और अव्यक्त होती रहती है। यह शाश्वत चक्र है। इसमें पुरुष का कोई लेना देना नहीं है। वह स्थिर, शाश्वत और चेतन तत्व है। उसकी समीपता से प्रकृति को ऐसे ही शक्ति और गति मिलती रहती है, जैसे चुंबक की समीपता से लोहे को। अव्यक्त प्रकृति को डार्क मैटर कह सकते हैं। डार्क मैटर में सिर्फ गुरुत्व होता है, अन्य कुछ नहीं। मतलब डार्क मैटर का अस्तित्व है भी और नहीं भी है। इसलिए “नहीं है”, क्योंकि इसमें अस्तित्ववान वस्तु की कोई विशेषता नहीं है। इसे न देख सकते हैं, न सुन सकते हैं, न छू सकते हैं। यह इंद्रियों की पहुंच में नहीं है। यह “है” इसलिए है, क्योंकि इसमें गुरुत्व बल है। गुरुत्व बल भी सत्ता का या होने का ही सामान्य या छोटा सा लक्षण है। तभी तो कहते हैं कि फलां की बातों में वजन या गुरुत्व है। मतलब फलां की बातों का व्यावहारिक अस्तित्व है। डार्क एनर्जी भी मूल प्रकृति हो सकती है। यह भी डार्क मैटर और मूल प्रकृति की तरह अनिर्वचनीय ही है। यह “नहीं है”, क्योंकि इसमें भौतिक वस्तु का कोई भी लक्षण नहीं है। यह “है”, क्योंकि यह ऊर्जा के जैसा प्रभाव पैदा करती है। इसलिए हो सकता है कि दोनों एक ही चीज हों। किसी चीज के अस्तित्व के साथ उसका प्रभाव भी जुड़ा होता है। प्रभाव के बिना अस्तित्व अधूरा है। यदि एक कठोर चट्टान चोट न पहुंचा सके, तो उस चट्टान के होने का कोई मतलब नहीं रह जाता। डार्क मेटर उसी कठोर चट्टान की तरह है, और डार्क एनर्जी उसके द्वारा लगाई गई चोट है, जो ब्रह्मांड को बाहर की ओर धकेल रही है। जैसे नदी में पड़ी चट्टान किसी बहते आदमी को रोक भी सकती है, और किसी आदमी को अपने साथ बहा भी सकती है, उसी तरह मूल प्रकृति डार्क मैटर की तरह व्यवहार करके सभी अंतरिक्षीय पिंडों को गुरुत्व बल से आपस में बांध भी सकती है, और डार्क एनर्जी की तरह व्यवहार करके उन्हें एक दूसरे से दूर भी धकेल सकती है। आम आदमी के मन का अंधेरा डार्क मैटर जैसा होता है, जो उसके जगत को अपने में खींच कर और बांध कर रखता है। पर कुंडलिनी योगी के मन का अंधेरा डार्क एनर्जी की तरह व्यवहार करता है, जो उसके जगत को अपने से बाहर धकेलने की कोशिश करता रहता है। वह जगत फिर बाहर निकल कर उसके मन में पुनः उभरता रहता है, और प्रकाशमान आत्मा में विलीन होता रहता है। एक संतुलित व्यक्ति में डार्क एनर्जी और डार्क मैटर एक संतुलित अनुपात में रहते हैं, वैसे ही जैसे बाहर के भौतिक ब्रह्मांड में होते हैं।

इस लिहाज से तो आदमी के मस्तिष्क की सृष्टि भी व्यक्त और अव्यक्त के बीच झूलने वाली होनी चाहिए, अनादि काल से। मतलब आदमी का बंधन अनादि होना चाहिए। इसका विश्लेषण हम अगली पोस्ट में करेंगे।

कुंडलिनी योग के लिए दूरदर्शन फिल्म व सिनेमा मूवी देखना जरूरी है

दोस्तों, इंद्रियों के भ्रम को हम एक और उदाहरण से समझ सकते हैं। जब हम दूर रखे टेलीविजन की आवाज ब्लूटूथ इयरबड्स से सुनते हैं, तो हमें लगता है कि वह आवाज टेलीविजन में पैदा हो रही है, जबकि वह हमारे कानों में पैदा हो रही होती है। हम टेलीविजन के जिस दृष्य के प्रति जितना ज्यादा आसक्त होते हैं, वह दृष्य हमें उतना ही ज्यादा टेलीविजन के अंदर महसूस करते हैं। जब हम अनासक्त होकर देखने लगते हैं या ऊब जाते हैं, या कान थक जाते हैं, तो वह आवाज हमें अपने कानों के अंदर महसूस होती है। मतलब कानों में पैदा हो रही आवाजों ने और आंखों में बन रहे चित्रों ने मिलकर टेलीविजन में दिख रहे दृष्यों में स्थित पंचमहाभूतों का निर्माण कर दिया था। जब हम ऊब गए या थक गए तो टीवी के नजारों पर ज्यादा ध्यान नहीं गया, जिससे सिर्फ आवाजें और चित्र ही बचे रहे, जैसे मानो पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। जब कान में बन रही आवाजों और आँखों में बन रहे चित्रों से भी ऊब गए तो उन पर भी ध्यान नहीं जाने लगा। कान और आंख थके हुए थे, इसलिए उनकी थकान महसूस हो रही थी। या कह लो नींद आ गई या टीवी को बंद कर दिया। इससे तन्मात्राएं भी नहीं रहीं, और बस कान और आँखें ही रही। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। जागने के बाद इंद्रियां तरोताजा हो गईं पर उनमें वे आवाजें और दृष्य नहीं रहे। इंद्रियों में एकदम से काम शुरु करने की शक्ति नहीं रही, क्योंकि वे अभी भी अपनी क्षतिपूर्ति ही कर रही थीं। इंद्रियां शांत होने से प्राणवायु अच्छे से चलने लगी। जिस समय इंद्रियां टीवी देखने में व्यस्त थीं, उस समय सांसों से ध्यान हट कर टीवी पर लगा हुआ था। आपने देखा भी होगा कि जब हम टीवी पर मनोरंजक कार्यक्रम देख रहे होते हैं, उस समय सांसें अटक सी जाते हैं। अगर उस समय हम सांसों पर ध्यान देते हुए लंबी लंबी और नियमित सांस लेने की कोशिश करें तो टीवी देखने का मजा ही नहीं आता और उसे बंद करने का मन करता है। इससे अंतर्मुखी बनने के लिए सांसों और प्राणायाम का महत्त्व खुद ही सिद्ध हो जाता है। इससे यह संदेश भी मिलता है कि जब इंद्रियां थकी हुई हों, तो प्राणायाम कर लेना चाहिए। इससे इंद्रियों को भी सुकून मिलता है, और मन के क्रियाशील होने से जीवन में आनंद और प्रकाश भी बना रहता है। हां, तो इंद्रियां शांत होने से जो उनसे संवेदनाओं की अनुभूतियां हो रही थीं, वे प्राण में विलीन हो गईं। प्राण सांस ही है और उसमें वे अनुभूतियां ज्यादा समय तक नहीं रह सकतीं। प्राण एक प्रकार से संवेदनाओं को इंद्रियों से लेकर मन तक पहुंचाता है। यह उन अनुभूतियों को महसूस नहीं करता। इसे हम डाकिए की तरह समझ सकते हैं, जो चिट्ठियां इधर से उधर ले जाता है, पर खुद चिट्ठियां नहीं पढ़ता। प्राणों से मन हरकत में आ जाता है। उसमें इंद्रियों द्वारा महसूस की गई संवेदनाएं उमड़ने लगती हैं, हालांकि अब मन के रूप में, क्योंकि अब उन संवेदनाओं के निर्माण में सहायक टीवी के दृष्य तो नहीं रहे। यह एक प्रकार से याद आने की तरह ही है। फिर उन अनुभूतियों के साथ मन में अन्य विविध विचार भी उमड़ने लगते हैं। यह प्राणों का मन में विलीन होना है। फिर कुछ समय तक ऐसे विचारों की स्वप्निल दुनिया में खोने के बाद आदमी को होश आता है कि कुछ दुनियादारी के काम भी करने चाहिए। मतलब बुद्धि क्रियाशील हो जाती है। मन नष्ट नहीं होता पर बुद्धि के रूप में रूपांतरित होने लगता है या बुद्धि में विलीन होने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसी तरीके से काम करने लगेगी, जैसा उसका मन था। तभी तो कहते हैं कि अगर मन को अच्छा रखेंगे, तभी काम भी अच्छे होंगे। आजकल के बच्चे जो रातदिन भरपूर और भयानक हिंसा से भरी वीडियो गेमों को देखते और खेलते रहते हैं, वे आगे चलकर कैसे अच्छे काम कर पाएंगे। उन्हें यह पोस्ट जरूर पढ़ानी और समझानी चाहिए। अच्छी बुद्धि से वह कुछ दिनों तक अच्छी दुनियादारी निभाता है, और अच्छी तरक्की भी करता है। फिर वह थक सा जाता है, और दुनियादारी से ऊब सा भी जाता है। इससे उसकी बुद्धि शांत होने लगती है, जिससे उसकी आत्मा के अंदर अंधेरा सा बढ़ने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसके अहंकार के रूप में रूपांतरित हो जाती है। फिर कोई कुंडलिनी योगी अगर चाहे तो इसके आगे आत्मा को प्राप्त कर सकता है। पर आम आदमी यहां से वापिस लौट आता है। थोड़े दिन अहंकार के अंधेरे में आराम से बिताने के बाद दुनियादारी में लौट आता है, और बुद्धि के सहयोग से पुनः अपनी पैठ जमाता है। फिर कुछ तरक्की करके सैकड़ों इच्छाएं पालकर मन की शरण में पहुंचता है। मतलब बुद्धि मन में विलीन हो जाती है। फिर मन के उकसावे में आकर मूवी देखने सिनेमा थिएटर चला जाता है। वह वैसी ही मूवी देखना पसंद करेगा जैसी उसकी बुद्धि और दुनियादारी थी, क्योंकि बुद्धि ही मन के रूप में बन कर सामने आई। सिनेमा हॉल घर से जितना दूर होता है, उतना ही मजा आता है, क्योंकि मन को प्राणों के रूप में रूपांतरित होने के लिए भी समय चाहिए होता है। सिनेमा जाने के रास्ते में उसकी बड़ी अच्छी, लंबी, नियमित और आनंददायी सांसें चलती हैं, क्योंकि मन की सिनेमा देखने की इच्छा खत्म हो रही होती है मतलब मन खत्म हो रहा होता है, और उसकी शक्ति प्राणों को मिल रही होती है। फिर भी मन की सूक्ष्म सोच प्राणों में भी कायम रहती है, क्योंकि कारण कभी नष्ट नहीं होता, पर कार्य के रूप में मौजूद रहता है। मूवी देखना शुरु करते ही उसकी सांसें थम सी जाती हैं, और वह अपनी आंखों और अपने कानों में मधुर संवेदनाओं का आनंद लेने लगता है। मतलब उसके प्राण इंद्रियों में रूपांतरित हो जाते हैं। जब तक पर्दे पर विज्ञापन चलते हैं, तब तक वह उन दृष्यों का गहराई से अवलोकन नहीं करता। मतलब उसे संवेदनाएं आंखों और कानों में ही महसूस हो रही होती हैं, कहीं बाहर से आती हुई प्रतीत नहीं होतीं। यह इंद्रियों की अभिव्यक्ति की अवस्था ही होती है। थोड़ी देर बाद जब मूवी शुरु होने के बाद उसे मूवी कुछ समझ में आने लगती है, तो उसे वे अनुभूतियां सिनेमा के पर्दे से मिलती हुई महसूस होती हैं। मतलब उसकी इंद्रियां तन्मात्राओं में विलीन हो जाती हैं। बाद में फिल्म में गहरे डूबने पर उसे पर्दे पर दिख रहे पहाड़, महल आदि असली लगने लगते हैं। मतलब तन्मात्राएं पंचमहाभूतों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। मतलब उसकी सृष्टि की रचना पूर्ण हो गई।

अब फिल्म खत्म होती है। सारे दृष्य खत्म। मतलब उसके व्यक्तिगत सूक्ष्म ब्रह्मांड की प्रलय शुरु हो जाती है। पर्दे पर विज्ञापन आने लगते हैं। अब उसे उन विज्ञापनों में दिखाए गए पहाड़ और महल असली नहीं लगते, क्योंकि वह उन्हें ध्यान से नहीं देखता। उसे बस आंख से कुछ दिख रहा होता है और कान से सुनाई दे रहा होता है। आदमी को उन्हें थोड़ी देर देखना अच्छा लगता है। क्योंकि सभी को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर क्रमवार आना और जाना जाना अच्छा लगता है। मतलब पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। फिर आदमी थोड़ी देर बाद उन संवेदनाओं को अपनी इन्द्रियों में ही महसूस करने लगता है, बाहर नहीं। उससे भी ऊबकर और अपनी आंखों और अपने कानों की थकान को महसूस करते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। वह थोड़ा चायपानी करके तरोताजा होता है। फिर उसकी सांसें अच्छी, गहरी और नियमित चलने लगती हैं। जब आंखों और कानों को मलने से उन पर ध्यान जाता है, तो उन्हें शक्ति देने के लिए सांस खुद ही चलने लगती है। हालांकि उससे वे तरोताजा ही हो सकती हैं, पुनः काम नहीं कर सकती। क्योंकि वे इतना ज्यादा काम करने के बाद अपनी क्षतिपूर्ति कर रही होती हैं। फिर सांसों की अतिरिक्त शक्ति मन को लगती है। मतलब इंद्रियां प्राण में विलीन हो गईं और प्राण मन में। फिर प्राण या सांस की शक्ति से मन भागने लगता है। मन को भगा कर सांस फिर उथली और अनियमित हो जाती है। मतलब प्राण मन में रूपांतरित हो गया। उस मन की चहलपहल से प्रेरित होकर वह शोपिंग माल में घुस जाता है। वहां विभिन्न चीजों की गुणवत्ता और उनका मोलभाव जांचते हुए उसकी बुद्धि क्रियाशील हो जाती है और मन सुस्त पड़ जाता है। मतलब मन बुद्धि में रूपांतरित हो गया। बुद्धि के भी थकने से जब उसकी आत्मा में अहंकार का अंधेरा काफी बढ़ने लगता है, तब वह परिवारसहित गाड़ी में बैठकर घर को चल देता है। मतलब बुद्धि अहंकार में रूपांतरित हो गई। उस अहंकार में उसके पूरे दिवस के क्रियाकलापों का खाका सूक्ष्म रूप में दर्ज हो जाता है। घर आकर वह तांत्रिक कुंडलिनी योग से आत्मा के अंधकार को कुंडलिनी ध्यान से रौशन कर देता है। मतलब अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है। बेशक पूर्ण आत्मा न सही, उसका कुछ अंश ही सही। अगले दिन फिर उसे न चाहते हुए भी आत्मा से क्रमवार नीचे गिरना पड़ता है, ताकि वह पुनः दुनियादारी को अच्छे से निभा सके। यह सिलसिला ऐसे ही चक्रवत चलता रहता है। यह सभी किस्म की अनुभूतियों, सभी किस्म के क्रियाकलापों, सभी किस्म की सांसारिकताओं, सभी किस्म के लोगों, सभी इंद्रियों और सभी किस्म के शरीरों के साथ ऐसा ही होता है। यह एक सामान्य सिद्धांत है। शास्त्रों में ऐसे अनेकों सिद्धांत बड़ी सूक्ष्मता व गहराई से वर्णित किए गए हैं, जहां तक मुझे लगता है आज भी आधुनिक मनोविज्ञान नहीं पहुंच सका है। उपरोक्त चलचित्र या दूरदर्शन वाला उदाहरण तो समझाने के लिए एक छोटा सा बिंदु है। आदमी जो कुछ भी करता है, उसे अपने स्वभाव अर्थात अहंकार के वशीभूत होकर ही करता है, बेशक उसे लगे कि वह स्वतंत्रता से करता है। यही अहंकार है, यही स्वभाव है, यही अवचेतन मन है, यही संस्कार है। यह सब शब्दों का खेल है। चीज एक ही है। जिसने अहंकार को नहीं जीता है, वह हमेशा उसी के वश में रहता है। पूर्ण स्वतंत्रता तो केवल योगी को ही प्राप्त होती है।

कुंडलिनी जागरण सच्चाई के बाहर होने की बजाय भीतर होने की पुष्टि करता है

दोस्तों शास्त्रों के अनुसार फिर पंचज्ञानेंद्रियों से पंचतन्मात्राओं की रचना होती है। तन्मात्राएं महाभूतों का सूक्ष्म रूप हैं, जो इंद्रियों के अनुभव में आता है। यह अविभक्त अनुभव होता है, जैसे कि रूप तन्मात्रा सभी किस्म के पदार्थों का दिखने में आने वाला सामान्य रूप है। यह पत्थर, पानी, पेड़ आदि सब चीजों के लिए सामान्य है। मतलब कि जल और पृथ्वी दो अलग-अलग महाभूत हैं पर उनकी रूप तन्मात्रा एक ही है। ये दोनों इसी रूप तन्मात्रा के कारण दिखते हैं। आंखें इंद्रियां इन दोनों की केवल रूप तन्मात्रा को ग्रहण करती हैं, अन्य कुछ नहीं। यह रूप तन्मात्रा प्रकाश की किरणों के माध्यम से आंख तक पहुंचती है। इसी तरह नासिका इंद्रिय गंध तन्मात्रा को ग्रहण करती है। कान शब्द तन्मात्रा को और चमड़ी स्पर्श तन्मात्रा को ग्रहण करती है। जीभ इंद्रिय रस तन्मात्रा को ग्रहण करती है। ये तन्मात्राएं इंद्रियों को अनुभव देने का और पंचमहाभूतों का एहसास कराने का काम करती हैं। इसी को ऐसा कहा गया है कि तन्मात्राओं से महाभूतों का निर्माण होता है। जब हम पत्थर की रूप तन्मात्रा को ग्रहण करते हैं तो हमें किसी चीज के उपस्थित होने का आभास होता है। जब हम उसकी स्पर्श तन्मात्रा को भी अनुभव करते हैं, तब हमें उसके कठोर होने का आभास होता है। जब हम उसकी गंध तन्मात्रा को और रस तन्मात्रा को भी ग्रहण करते हैं, तब हमें उसके भोजन ना होने का पता चलता है। जब उसकी शब्द तन्मात्रा को भी ग्रहण करते हैं, तो पता चलता है कि वह कोई अटूट धातु नहीं है, पर एक टूटने वाला पत्थर है। इस तरह से पांचों तन्मात्राओं से हमें किसी भी पदार्थ की सभी विशेषताओं का पता चलता है। फिर ऐसा क्यों कहा गया है कि गंध तन्मात्रा से पृथ्वी की, रस तन्मात्रा से जल की, रूप तन्मात्रा से अग्नि की, स्पर्श तन्मात्रा से वायु की, और शब्द तन्मात्रा से आकाश की उत्पत्ति होती है। यह इसीलिए क्योंकि इन सभी तन्मात्राओं में से एक तन्मात्रा ही किसी एक महाभूत में मुख्य होती है। बाकि तन्मात्राएं तो सामान्य होती हैं, या दूसरे महाभूतों के मिश्रित होने से बनी होती हैं। शुद्ध जल गंधहीन होता है। इसलिए उसमें गंध तन्मात्रा की उपस्थिति नहीं मानी जाती। पर अगर उसमें कठोर दाल पकी हो तो गंध आएगी। इसीलिए पृथ्वी मतलब कठोर वस्तु को गंध का मुख्य गुण दिया गया। हम जो कुछ भी स्वाद ले पाते हैं, तभी ले पाते हैं जब भोजन हमारे मुंह के लार द्रव से मिश्रित होता है। यह द्रव जल जैसा ही होता है। अगर भूख ना होने से मुंह सूखा हो तो कुछ भी स्वाद नहीं आता। इसीलिए जल महाभूत को रस नामक मुख्य गुण दिया गया है। रस का मतलब स्वाद भी होता है, और तरल पदार्थ भी। जब सूरज चमकता है या दीपक जलता है, तभी हमें सभी रूपों का आभास होता है। इसीलिए अग्नि को रूप का मुख्य गुण दिया गया है। सबसे संवेदनात्मक, अच्छा और सुखद स्पर्श वायु से ही मिलता है। इसीलिए वायु को स्पर्श तन्मात्रा से उत्पन्न माना गया है। दो लोगों के बीच अगर दीवार या पहाड़ हो तो उनकी आवाज एक दूसरे तक नहीं पहुंचती। मतलब आवाज या शब्द को ले जाने के लिए खुला आकाश होना चाहिए। इसीलिए आकाश को शब्द तन्मात्रा से निर्मित बताया गया है। मतलब अगर हम पंचमहाभूतों को महसूस न करें, तो उनका अस्तित्व ही नहीं माना जाएगा। अंधेरे में महल होने का क्या महत्त्व हो सकता है। सारे महाभूत और उनसे बना सारा जगत अंधेरे में ही हैं, अगर उन्हें कोई भी महसूस न कर पाए। फिर तो वे न होने के बराबर ही हैं। तन्मात्राओं से ही हमें वे महसूस होते हैं। मतलब सूक्ष्म तन्मात्राओं से ही उनकी उत्पत्ति हुई। यह अंदर से बाहर की ओर की अप्रोच है। यही अध्यात्म है। यही सत्य एप्रोच है। बाहर से अंदर की ओर एप्रोच भौतिक विज्ञान है। यह आध्यात्मिक रूप से असत्य अप्रोच है। हां, भौतिक रूप से सत्य हो सकती है। पर भोतिकता खुद भी असत्य ही है, बेशक व्यवहार के लिए उसे कामचलाउ सत्य मानना पड़ता है।

सच्चाई अंदर है, बाहर नहीं। यही वास्तविकता है। कुंडलिनी जागरण के दौरान इस वास्तविकता का साक्षात अनुभव होता है, जब सारा जगत अपनी उस अंतरात्मा में महसूस होता है, जो हृदय की गहराईयों में सबसे भीतर स्थित रहती है, और सामान्य तौर पर अहंकाररूपी अंधेरे के रूप में महसूस होती है।

पंचमहाभूत के तन्मात्रा में विलीन होने का यह मतलब नहीं कि जल, वायु आदि पंचमहाभूत नष्ट हो गए। इसका मतलब है कि इंद्रियों से वे पंचमहाभूत स्पष्ट या पृथक वस्तुओं के रूप में या अलग-अलग रूप में महसूस नहीं हुए। बल्कि वे तन्मात्राओं के रूप में महसूस हुए। समुद्र पृथक व सत्य वस्तु के रूप में महसूस नहीं हुआ। पर वह रूप तन्मात्रा, रस तन्मात्रा, स्पर्श तन्मात्रा, गंध तन्मात्रा और शब्द तन्मात्रा के मिश्रण के रूप में महसूस हुआ। यह ऐसे ही है कि कंप्यूटर अलग वस्तु के रूप में महसूस नहीं हुआ पर सीपीयू, हार्ड डिस्क, मदर बोर्ड आदि के मिश्रण के रूप में महसूस हुआ। मतलब एक प्रकार से कंप्यूटर नष्ट न होकर वैसा ही बना रहा, पर अपने घटकों में विलीन हो गया। वैसे भी अद्वैत दर्शन कहता है कि घटक ही सत्य हैं, घटक से निर्मित वस्तु नहीं। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि रूप तन्मात्रा से सभी चीजों का रूप और आकार तो महसूस हुआ पर आंख उन चीजों का गहराई से अवलोकन नहीं कर सकी। मतलब सिर्फ सामान्य रूप का ही पता चला, रूपों में विभिन्नताओं का नहीं। यह सामान्य रूप ही रूप तन्मात्रा है। इसमें विभिन्नता महसूस होने से यह सामान्य रूप विभिन्न वस्तुओं के रूप में दिखने लगता है। मतलब रूप तन्मात्रा से अग्नि महाभूत की उत्पत्ति हो जाती है। इस अग्नि महाभूत की मात्रा सभी वस्तुओं में भिन्न भिन्न है। ऐसा ही सभी महाभूतों के साथ होता है।

कुंडलिनी योग से मृत्यु, प्रलय, जन्म और सृष्टि का रहस्योद्घाटन

दोस्तों! आध्यात्मिक शास्त्र उच्च कोटि के ज्ञान से भरे पड़े हैं। अगर उनके साथ अनुभव का तड़का भी लग जाए तो बात कुछ और ही हो जाती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम सभी दुनियादारी में उलझे हुए आदमी हैं। हमारा अनुभव इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता कि वह स्वतंत्र रूप से पारलौकिक तथ्यों को सिद्ध कर सके। हां, अगर हमारा अनुभव शास्त्रों के प्रामाणिक तथ्यों जैसा है, तब हमारा अनुभव प्रामाणिक माना जा सकता है। मैं भी अपने ऐसे ही एक छोटे से अनुभव को इस पोस्ट के अंत में साझा करूंगा।

शास्त्रों में प्रलय-काल की प्रकृति को साम्यावस्था की स्थिति के तौर पर बताया गया है। मतलब इसमें इसके तीनों गुण अपने-अपने एक समान स्तर पर बने रहते हैं। बदलते नहीं हैं।ऐसा जरूरी नहीं कि जितना सतोगुण है, उतना ही रजोगुण है और उतना ही तमोगुण है। बल्कि इसका यह मतलब है कि बेशक सब की भिन्न-भिन्न मात्रा है पर हरेक गुण अपनी विशिष्ट मात्रा पर एक समान बना रहता है। वह कम या ज्यादा नहीं होता। उदाहरण के तौर पर अगर सतोगुण का अनुपात 1 है तो एक ही रहेगा। तमोगुण का 5 है तो 5 ही रहेगा और रजोगुण का तीन है तो तीन ही रहेगा। अगर तीनों गुण एकदूसरे के बराबर हुआ करते तो विभिन्न सृष्टियों में विभिन्नता न हुआ करती, बल्कि सभी सृष्टियां बिल्कुल एक समान हुआ करतीं। इसी के साथ, सभी आदमी भी एक जैसे हुआ करते, उनमें भी कोई विभिन्नता न हुआ करती। और तो और, फिर तो सभी दिवंगत आत्माएं भी एकजैसी हुआ करतीं। पर ऐसा तो संभव नहीं है, क्योंकि सृष्टि में विभिन्नता हरेक स्तर पर दिखाई देती है। कुछ आत्माएं पवित्र होती हैं, जो हर तरह से भला करती हैं। पर कुछ आत्माएं पापपूर्ण भी होती हैं, जो नुकसान करने से जरा भी नहीं हिचकतीं। बेशक शरीर न होने के कारण दिवंगत आत्माएं जानबूझ कर भला या बुरा नहीं कर सकतीं, पर उनके सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र से खुद ही भला या बुरा होता है। शायद इसे ही शास्त्रों में प्रेत योनि कहा है। मतलब है तो यह दिवंगत और शरीररहित आत्मा ही, पर बहुत लंबे समय तक इसे शरीर न मिलने के कारण इसे मनुष्य योनि की तरह ही एक स्थायी योनि मान लिया गया हो। बेशक यह सूक्ष्म योनि है। उदाहरण के लिए, कई भयानक सड़क दुर्घटना के स्थानों पर बारबार दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इसके लिए वहां भटकी हुई या बिना गति लगी हुई या बिना स्थूल योनि को प्राप्त हुई बुरी प्रेतात्मा को जिम्मेदार मानकर वहां भगवान हनुमान आदि देवता के मंदिर या मूर्ति को प्रतिष्ठित किया जाता है। कहते हैं कि उससे दुर्घटनाओं का सिलसिला रुक जाता है। शायद देवता से पैदा सकारात्मक ऊर्जा बुरी प्रेतात्मा की नकारात्मक ऊर्जा को निष्प्रभावी कर देती है। शायद बहुत उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा को ही देव योनि कहा जाता हो।

दोबारा सृष्टि-निर्माण से कुछ नहीं बदलता। सिर्फ प्रकृति में पहले से विद्यमान गुणों में क्षोभ पैदा होता है। मतलब कभी सतोगुण अपने आधारभूत स्तर से एकदम से बढ़ जाता है, तो कभी तमोगुण तो कभी रजोगुण। इस तरह से हर-एक गुण का स्तर लगातार बदलता रहता है। जो आदमी ज्यादा क्रियाशील है, उसमें ज्यादा जल्दी से बदलता रहता है। जो कम क्रियाशील है, उसमें कम रफ्तार से बदलता रहता है। आप सोचेंगे कि मैं यहां प्रकृति से आदमी के ऊपर क्यों आ गया। वास्तव में प्रकृति का अनुमान आदमी से ही लगाया गया है। सीधे तौर पर तो कोई भी समष्टि मतलब सर्वव्यापक प्रकृति को अनुभव नहीं कर सकता है। पर व्यष्टि अर्थात सीमित प्रकृति के रूप में स्थित आदमी के जन्म-मरण को जरूर अनुभव किया जा सकता है। योगियों ने इसे अनुभव किया है, जिसके आधार पर ही भारतीय दर्शन और शास्त्र बने हैं।

मरने के बाद आदमी के तीनों गुण अपने-अपने औसत स्तर पर आ जाते हैं और फिर बदलते नहीं। गुणों में क्षोभ पैदा करने के लिए शरीर चाहिए। वह मरने के बाद होता नहीं। जीवित अवस्था में मन के सुंदर विचारों से सतोगुण बढ़ता है। मन की ज्यादा क्रियाशीलता से रजोगुण बढ़ता है, और अकेलेपन या अवसाद जैसी अवस्था में तमोगुण बढ़ता है। ये सारे गुण रहते तो मरने के बाद भी हैं, पर बदलते नहीं हैं। मतलब आदमी कभी नहीं मरता। हमें आदमी मरा हुआ इसलिए लगता है क्योंकि हम गुणों के तूफान में उलझे होते हैं। इससे हमें गुणों की सूक्ष्म अवस्था नजर नहीं आती। यह ऐसे ही है, जैसे चकाचौंध रोशनी के बाद सामान्य अंधेरा भी घुप्प अंधेरा लगता है। हां, जब कुंडलिनी योग से गुणों का तूफान कुछ शांत हो जाता है, तब दिवंगत आत्मा से साक्षात्कार की संभावना बढ़ जाती है। अब आप पूछेंगे कि मरने के बाद गुणों की वह आधारभूत अवस्था कैसे निर्धारित होती है। वास्तव में वह आदमी के पिछले सभी जन्मों के गुणों का औसत होती है। मतलब अगर कोई ज्यादा सतोगुण में रहा है तो आधारभूत सत्त्वगुण ज्यादा रहता है। क्योंकि सतोगुण पुण्य कर्म से बनता है, मतलब उसमें उसके सभी अच्छे कर्मों का लेखा जोखा भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान होता है। जिसके रजोगुण का औसत ज्यादा होगा, उसके कर्म उद्यमशीलता और व्यापार आदि के ज्यादा रहेंगे। ज्यादा तमोगुण का मतलब ज्यादा पाप कर्मों का संचय। मतलब कि गुणों के रूप में सभी कर्म अपनी आधारभूत अवस्था में रहते हैं। हो सकता है कि यह व्यवस्था इतनी निपुण हो कि औसत की बजाय हर एक कर्म अलग-अलग गुण के रूप में पृथक रूप में मौजूद हो। इसकी और शास्त्र यह इशारा करते हुए लिखते हैं कि हर-एक कर्म का फल उस कर्म के अनुसार मिलकर ही रहता है।

खैर मुझे जो पवित्र दिवंगत आत्मा का अनुभव हुआ था, उसमें तो मुझे गुणों की समान और औसत अवस्था ही महसूस हुई थी। मतलब कि आत्मा एक अंधेरे आकाश की तरह महसूस हो रही थी। पर उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व नजर आ रहा था, जिस आदमी की वह दिवंगत आत्मा थी। मतलब वह मुझे मरा हुआ ही नहीं लग रहा था, बल्कि जीवित से भी ज्यादा जीवित लग रहा था। वह व्यक्ति जीवित अवस्था से भी ज्यादा नजर आ रहा था। मतलब उस आत्मा में उसके पिछले जन्मों की छाप भी थी। मतलब वह प्रलय-काल की साम्य-अवस्था वाली प्रकृति ही थी, जिसमें कोई क्षोभ पैदा नहीं हो रहा था। इस आत्मा के अनुभव का वर्णन मैंने इस ब्लॉग की कुछ पुरानी पोस्टों में विस्तार से किया है। अब आप ही बताओ कि समुद्र के निश्चल जल में और उसी जल की लहरों में क्या अंतर है, कुछ भी नहीं? इसी तरह से शरीर-स्थित आत्मा में और दिवंगत आत्मा में भी कोई अंतर नहीं है। जब गुणों और कर्मों के संयोग से उस दिवंगत आत्मा को पुनः नया शरीर मिलता है, तो फिर से उसके गुणों में क्षोभ शुरु हो जाता है, जिसे हम पुनः नई सृष्टि का आरंभ कहते हैं।

मुझे लगता है कि किसी आत्मा के साक्षत्कार के लिए उस आत्मा की इच्छा भी होनी चाहिए मिलने की और उस मिलन को कुछ निर्णायक क्षणों तक झेलने के लिए और आत्मा से बात करने के लिए आदमी में पर्याप्त मानसिक शक्ति भी होनी चाहिए। यह एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से ही संभव लगता है, साधारण से नहीं। साथ में, अपना शरीर न होने के कारण आत्मा तो कोई इच्छा जाहिर नहीं कर सकती। मतलब कि आत्मा में वह इच्छा उसकी शरीरयुक्त जीवित अवस्था में होनी चाहिए, खासकर उसके मरते समय। इसी को अंतिम इच्छा कहते हैं। इसीलिए इसको बहुत महत्त्व दिया जाता है। उसे पूरा किया जाता है और मरणासन्न व्यक्ति को उसे पूरा करने का वचन दिया जाता है, ताकि उसकी आत्मा उस इच्छा की वजह से भटके न। ये गुत्थियां धीरे-धीरे सुलझती हैं, एकदम से नहीं। मैं भी सपरिवार उन व्यक्ति से मिलने उनकी मरणासन्न अवस्था में थोड़ा देर से पहुंचा था। वे मुझसे बात करना चाहते थे, पर बोल नहीं पा रहे थे। सिर्फ छोटी सी चीख ही उनके मुंह से निकलती थी और वे फिर बेहोश से हो जाते थे। देख तो वे सकते ही नहीं थे। शायद वे कुछ सुन और समझ पा रहे थे, पर देख व बोल नहीं पा रहे थे। उसके दो तीन घंटे बाद ही उनकी आत्मा मुक्त गगन को प्रस्थान कर गई थी। अध्यात्म में बहुत कुछ है। यह तो आइसबर्ग का सिर्फ टिप मात्र है।

कुंडलिनी शक्ति ही अंधेरे से संपूर्ण सृष्टि की रचना करती है

गुप्त कालचक्र मुझे अवचेतन मन का खेल लगता है। आदमी के हरेक अंग से संबंधित सूचना उससे संबंधित चक्र में छुपी होती है। ये पिछले अनगिनत जन्मों की सूचनाएं होती हैं, क्योंकि सभी जीवों के शरीर, उनके क्रियाकलाप, उनसे जुड़ी भावनाएं और चक्र सभी लगभग एकजैसे ही होते हैं, मात्रा में कम ज्यादा का या रूपाकार का अंतर हो सकता है। चक्रों पर ध्यान करने से वे सूचनाएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रकट होकर मिटती रहती हैं। जब स्थूल मन की सफाई हो जाती है, तब आदमी सूक्ष्म मन की सफाई के लिए खुद ही चक्रसाधना की ओर मुड़ता है। जैसे स्थूल मन की अवस्था समय के साथ प्रतिपल बदलती रहती है, वैसे ही सूक्ष्म अवचेतन मन की भी बदलती रहती है, क्योंकि सूक्ष्म मन भी स्थूल मन का ही प्रतिबिंब है, पर वह हमें नजर नहीं आता। इसीलिए इसे गुप्त कालचक्र कहते हैं। मतलब कि अगर अवचेतन मन पूरा साफ भी कर लिया तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि यह फिर गंदा नहीं होगा। सभी चक्रों का ऊर्जा स्तर बदलता महसूस होता रहेगा चक्रसाधक को। काल के थपेड़ों से कुछ नहीं बच सकता। इसलिए भलाई इसी में है कि जो है, उसे स्वीकार करते रहो हर स्थिति में बराबर और अप्रभावित से बने रहते हुए। यही वैकल्पिक कालचक्र है। यही गुप्तकालचक्र साधना का मुख्य उद्देश्य लगता है मुझे।

कुंडलिनी शक्ति सृष्टि का निर्माण करती है, जो यह कहा जाता है इसका यह अर्थ नहीं लगता कि वह अंतरिक्ष के ग्रह तारों आदि भौतिक और स्थूल पिंडों का निर्माण करती है। बल्कि ज्यादा युक्तियुक्त तो यह अर्थ लगता है कि वह प्रजनक संभोगशक्ति के जैसी है जो एक बच्चे को जन्म देती है और उसके शरीर और मनमस्तिष्क के रूप में संपूर्ण सृष्टि का निर्माण करती है। हालांकि पहले वाली उक्ति भी अप्रत्यक्ष रूप से सही हो सकती है, क्योंकि जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है, पर दूसरी उक्ति तो प्रत्यक्ष, व्यवहारिक व स्पष्ट रूप से सत्य दिखती है।

कई लोग बोल सकते हैं कि संभोग शक्ति तो वंश परंपरा को बढ़ाने के लिए है, उसमें कुंडलिनी कहां से आ गई। आदमी तो कुछ भी मायने निकाल सकता है उस शक्ति के। अगर उसका असली उद्देश्य जानना हो तो पशु को देखना चाहिए। ये अपनी सोच या लक्ष्य के हिसाब से नहीं बल्कि कुदरती प्रेरणा या इंस्टिंक्ट अर्थात स्वाभाविक प्रवृत्ति से ज्यादा चलते हैं। उनके मन में संतानोत्पत्ति का उद्देश्य नहीं होता संभोग को लेकर। वे तो अज्ञान के अंधेरे में संकुचित मन को विस्तार देने के लिए ही संभोग के लिए प्रेरित होते हैं, वह भी तब जब प्राकृतिक अनुकूल परिस्थितियां उन्हें इसके लिए प्रेरित करे, ऐसे तो इसके लिए भी अपनेआप उनमें लालसा पैदा नहीं होती। एक भैंस और भैंसा तभी इसके लिए प्रेरित होंगे जब भैंस मद में अर्थात हीट में होगी जो महीने में एक या दो दिन के लिए आती है। गर्मियों के मौसम में तो वह हीट आना भी बंद हो जाता है। अन्य समय तो दोनों साथ में रहते हुए भी संभोग नहीं करेंगे। पर जब मद में होती है तो जानकार मानते हैं कि भैंस पच्चीस किलोमीटर तक भैंसे को खोजते हुए अकेले निकल सकती है, बेशक वह रास्ते में मर ही क्यों न जाए। आदमी विकसित प्राणी है। वह कुदरती नियमों से लाभ लेना जानता है। तंत्रयोगी एक कदम और आगे है। वह अंधेरे में संकुचित मन की एक ध्यानचित्र के रूप में छोटी सी लौ जलाता है। फिर वह उसे संभोगसहायित योग से इतना ज्यादा बढ़ाता है कि वह जागृत हो जाती है। यही कुंडलिनी जागरण है। अब चाहे ध्यानचित्र के रूप में संकुचित मन को कुंडलिनी कहो या अंधेरे में संकुचित मन को। बात एक ही है क्योंकि वही अंधेरा ध्यानसाधना से विकसित होकर ध्यानचित्र बन जाता है। जो संभोग शक्ति उसे विकसित होने का बल देती है, वह मूलाधार मतलब अंधेरे कुंड में रहती है, इसीलिए इसका नाम कुंडलिनी है। मतलब ध्यानचित्र का कुंडलिनी नाम तभी पड़ा जब उसे संभोग शक्ति अर्थात वीर्यशक्ति का बल मिला। मतलब कुंडलिनी शब्द ही तांत्रिक है। आम आदमी अंधेरे में या अनगिनत क्षुद्र और हल्के विचारों में संकुचित मन के साथ सीधे ही संभोग करता है, जिससे अनगिनत विचारों में वह शक्ति बंट जाती है। इससे उसे दुनियावी विस्तार या तरक्की तो मिल सकती है, पर जागृति के लाभ कम ही मिलते हैं।

जब शक्ति मूलाधाररूपी कुंड के अंधेरे में घुसती है, तभी जीव संभोग की ओर आकृष्ट होता है। हमेशा पूर्ण ज्ञान के प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति का तो संभोग का मन ही नहीं करता। मेरे एक खानेपीने वाले एक वरिष्ठ अनुभवी मित्र थे जिन्होंने मुझे एकबार कहा था कि अगर मैं मांसाहार नहीं करूंगा तो संभोग कैसे कर पाऊंगा। मैं उस बात को मन से नहीं मान पाया था। आज मैं उनकी बात में छिपे तंत्र दर्शन को समझ पा रहा हूं। अंधेरा सिर्फ़ खानेपीने से ही पैदा नहीं होता। दुनियादारी में आसक्ति से कर्मशील रहते हुए भी पैदा होता है। मुझे लगता है कि शरीर की बनावट ही ऐसी है कि मस्तिष्क या मन का अंधेरा जैसे जैसे बढ़ता है, वैसे वैसे ही शक्ति नीचे जाती है। सबसे ज्यादा या घुप्प अंधेरे का मतलब है कि शक्ति मूलाधार पर इकट्ठी हो गई है। यह रक्तसंचार ही है जो कुदरतन नीचे की ओर इकट्ठा होता रहता है। मूलाधार तक पहुंचकर शक्ति फिर पीठ से होकर सीधी मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मूलाधार पर शक्ति के पहुंचने से स्वाभाविक है कि वहां के यौनांग क्रियाशील हो जाएंगे। कई संयम रखकर उस शक्ति को वापिस ऊपर जाने का मौका देते हैं। कई तांत्रिक विधि से उसे बढ़ा कर फिर बढ़ी हुई मात्रा को ऊपर चढ़ाते हैं, और कई गिरा देते हैं। शक्ति के गिरने से मूलाधार में शक्ति फिर इकट्ठी होने लगती है जिसमें पहले से ज्यादा समय लग जाता है। अच्छी खुराक से वह जल्दी इकट्ठी होती है पर उसमें पापकर्म भी शामिल हो सकता है। साथ में, भोजन को पचाने और उसे शरीर में लगाने में भी ऊर्जा खर्च होती है, मतलब कुल मिलाकर प्राण ऊर्जा की हानि ही होती है। फिर ऐसे ही होगा कि आगे दौड़ और पीछे चौड़। इन साधारण लोकोक्तियों के बड़े गहन अर्थ होते हैं। चौड़ मतलब कुंडलिनी सर्पिणी का कुंडल। मतलब शक्ति पाप के अंधेरे के रूप में सो जाती है, बेशक उसे उस अंधेरे की शक्ति से ही ऊपर चढ़ाया गया हो। पर मुझे लगता है कि उतना पाप खाने पीने से नहीं लगता जितना दुनिया में आसक्तिपूर्ण व्यवहार से लगता है। इसीलिए तो शिव भूतों की तरह खाने पीने वाले दिखते हुए भी मस्तमलंग, निस्संग और निष्पाप बने हुए विचरते रहते हैं। पर जब आदमी का मन या आत्मा इतना साफ हो जाएगा कि उसमें अंधेरा होगा ही नहीं बेशक शक्ति मूलाधार को गई हुई हो, तब क्या होगा। शायद तब बिना संभोग के उसकी शक्ति ऐसे ही घूमती रहेगी। उसे यौनोन्माद भी होगा, इरेक्शन भी होगा, पर वह भौतिक संभोग के प्रति ज्यादा प्रेरित नहीं होगा, क्योंकि उसे महसूस होगा कि उससे शक्ति की हानि है, बेशक कितनी ही सावधानी क्यों न बरती जाए। मुलाधार में शक्ति के समय उसके मन में किसी कामुक स्त्री का चित्र छा सकता है, और सहस्रार में शक्ति के समय किसी गुरु या आध्यात्मिक व्यक्ति या प्रेमी पुरुष का। पर वह दोनों से ही अनासक्त रहते हुए अपने काम में व्यस्त रहेगा, जिससे वह शक्ति उसमें झूलती रहेगी और वह हमेशा आनंद में डूबा रहेगा।

जब ऊर्जा मूलाधार को जाएगी तो मास्तिष्क में तो उसकी कमी पड़ेगी ही जैसे जब बारिश का पानी जमीन में रिसेगा, तो पानी से भरे गढ्ढे सूखेंगे ही। इससे मन में कुछ न कुछ अंधेरा तो छाएगा ही, बेशक आदमी कितना ही ज्यादा शुद्ध और सिद्ध क्यों न बन गया हो। विकारशील दुनिया में इतना सिद्ध कोई नहीं हो सकता जिसका मन मस्तिष्क हमेशा उजाले से भरा रहता हो। आम सांसारिक आदमी के मन का उजाला तो ऊर्जा के सहारे ही है। बिना भौतिक ऊर्जा के उजाला रखने वाला तो कोई अति विरला साधु संन्यासी ही हो सकता है। फिर भी पूरा उजाला तो पूर्ण मुक्ति की अवस्था में में ही होना संभव है, जो शरीर के रहते संभव नहीं है। विकारी शरीर के साथ जुड़े होने पर कोई पूरी तरह कैसे निर्विकार रह सकता है। बैलगाड़ी में बैठने वाला हिचकोलों से कैसे बच सकता है। जो बिना संभोग के ही मन में उजाला बना कर रखते हैं, उन्होंने संभोग से इतर सात्त्विक तकनीकों में महारत हासिल कर ली होती है, जिनसे मूलाधार की ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती रहती है। यह सांसों पर ध्यान, शरीर पर ध्यान, वर्तमान पर ध्यान, चक्रों पर साधारण या बीजमंत्रो के साथ ध्यान, विपश्यना, देवपुजा आदि ही हैं। उदाहरण के लिए चक्रों पर बीजमंत्रों के ध्यान से प्राण खुलते हैं, सांसें खुलती हैं, चेतना और उससे मन विचारों की चमक बढ़ती है, बुद्धि बढ़ती है, और मूलाधार पर ऊपर की तरफ संकुचन बल लगता है। चमक चाहे शरीर के भीतर हो या बाहर, ऊर्जा से ही आती है।

मानसिक अंधेरा भी दो किस्म का होता है। एक खाने पीने, शारीरिक श्रम, नींद, आराम आदि से उत्पन्न अंधेरा होता है। उसमें शरीर में ऊर्जा तो बहुत होती है, पर मन में उसकी कमी होती है, क्योंकि हिंसा, नशे आदि से और दुनियावी आसक्ति के भ्रम के बाद अकेलेपन से मन की चेतना दबी हुई होती है। मतलब साफ़ है कि जब मास्तिष्क में नहीं, तब वह मूलाधार के दायरे में केंद्रित होती है। शरीर के दो ही मुख्य दायरे हैं। एक सहस्रार का तो दूसरा मूलाधार का। ऊर्जा एक दायरे में नहीं तो स्वाभाविक है कि दूसरे दायरे में होगी। अगर सिक्के का हैड नहीं आया तो टेल ही आएगा, अन्य कोई विकल्प नहीं। ऐसी अवस्था में तांत्रिक संभोग से लाभ मिलता है। दूसरी किस्म का अंधेरा वह होता है जिसमें पूरे शरीर में ऊर्जा की कमी होती है। यह तो रोग जैसी या अवसाद जैसी या थकावट जैसी या कमजोरी जैसी अवस्था होती है। इसीलिए इसमें संभोग का मन नहीं करता। अगर करेगा तो बीमार पड़ सकता है, क्योंकि एक तो पहले ही शरीर में ऊर्जा की कमी होती है, दूसरा ऊपर से संभोग में भी ऊर्जा को व्यय कर रहा है। सबको पता है कि घर की छत की टंकी में पानी जीवन के कई काम संपन्न करवाता है। पर पानी को छत तक चढ़ाने के लिए भी ऊर्जा चाहिए और भूमिगत टैंक में भी पानी होना चाहिए। अगर सूखे टैंक में या कम वोल्टेज में पंप चलाएंगे, तो पंप तो खराब होगा ही। वैसे तो तांत्रिक संभोग का भी संत वाला शांत तरीका भी है, जिससे उसमें कम से कम ऊर्जा की खपत होती है, और ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। मस्तिष्क में ऊर्जा होना सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि वही पूरे शरीर को नियंत्रित करता है। नीचे के चक्रों में, विशेषकर सबसे नीचे के दो चक्रों में ऊर्जा कुछ कम भी रहे तो भी ज्यादा नुकसान नहीं।

कई लोग बोल सकते हैं कि शून्य अंधेरे से विचाररूपी सृष्टि कैसे बनती है। अंधेरे का मतलब ही सूक्ष्म या अव्यक्त या छुपी हुई सृष्टि है। अंधेरा वास्तव में शून्य नहीं होता जैसा अक्सर माना जाता है। असली शून्य तो बौद्धों का शून्य मतलब परब्रह्म परमात्मा ही होता है। सृष्टि बनने के लिए दो चीजें ही चाहिए, अंधेरा और शक्ति अर्थात ऊर्जा। अगर ऊर्जा नहीं है तो अंधेरा सृष्टि के रूप में व्यक्त नहीं हो पाएगा। जीवात्मा के रूप में जो अंधेरा होता है, उसी को सृष्टि के रूप में प्रकट करने के लिए ही उसे शरीर मिलता है, जिससे ऊर्जा मिलती है। यह अलग बात है कि वह योगसाधना से उस सृष्टि को शून्य कर पाएगा या उसी अंधेरे में छुपा देगा या उससे भी ज्यादा आसक्तिमय दुनियादारी से अपने को उससे भी ज्यादा अंधेरे में बदल देगा, जिसके लिए उसे फिर से नया जन्म और नया शरीर प्राप्त करना पड़ेगा। नया शरीर कर्मों के अनुसार मिलेगा। अच्छे कर्म हुए तो मनुष्य शरीर फिर मिल जाएगा जिससे सृष्टि को शून्य करने का मौका पुनः मिल जाएगा। अगर कर्म बुरे हुए तो किसी जानवर का शरीर मिलने से अंधेरे का बोझ कुछ कम तो हो जाएगा पर शून्य नहीं हो पाएगा, क्योंकि जानवर योग नहीं कर सकते। इस तरह पता नहीं फिर कब मौका मिलेगा। यही वेदवाणी कहती है।

वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध कर चुके हैं कि स्थूल भौतिक सृष्टि में भी ऐसा ही होता है। उन्होंने पाया कि अंतरिक्ष में हर जगह वे मूलभूत कण या तरंगें क्वांटम फ्लैकचुएशन के रूप में मौजूद हैं जिनसे सृष्टि का निर्माण होता है। क्योंकि वे बहुत सूक्ष्म और अव्यक्त जैसे हैं इसलिए पकड़ में न आने से अंधेरे के रूप में महसूस होते हैं। उदाहरण के लिए डार्क एनर्जी, डार्क मैटर यह सब अंधेरा ही तो है। जब कहीं से उन्हें ऊर्जा मिलती है तो उनका स्पंदन बढ़ने लगता है जिससे सृष्टि का या स्थूल पदार्थों का निर्माण शुरु हो जाता है। विचारों के लिए तो यह ऊर्जा शरीर से मिलती है पर स्थूल सृष्टि के लिए कहां से मिलती है। इसके बारे में अभी स्पष्टता और एकमतता नहीं दिखती। कुछ कहते हैं कि ब्लैकहोल आदि पिंडों के आपस में टकराने से जो गुरुत्वाकर्षण तरंगें आदि अंतरिक्ष में हलचलें पैदा होती हैं, उसीसे वह ऊर्जा मिलती है। जहां पर अंतरिक्ष में ज्यादा हलचल है, वहां ज्यादा तारों का निर्माण होता पाया गया है। पर सृष्टि की शुरुआत में अंतरिक्ष की सबसे पहली हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह पता नहीं है। शास्त्र तो कहते हैं कि ओम ॐ की आवाज निकली जिससे सृष्टि का निर्माण शुरु हुआ। ओम की ध्वनि एक अंतरिक्ष की तरंग या हलचल ही है। हो सकता है कि उसी ने आगे की हलचलों और निर्माणों का सिलसिला शुरु किया हो। ॐ ध्वनि रूपी हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह प्रश्न अनुत्तरित है। यह शायद परमात्मा की अपनी अचिंत्य शक्ति है, जिसका उत्तर योग के अतिरिक्त विज्ञान से मिल भी नहीं सकता। अगर शक्ति नहीं होगी तो शिव शव की तरह अंधेरा बना रहेगा, व्यष्टि शरीर के अंदर भी और समष्टि शरीर मतलब स्थूल भौतिक सृष्टि में भी।

कुंडलिनी योग डीएनए को सूक्ष्म शरीर और डार्क एनर्जी या डार्क मैटर के रूप में दिखाता है

सूक्ष्म शरीर पांच ज्ञानेन्द्रियों, पांच कर्मेंद्रियों, पांच प्राण, एक मन और एक बुद्धि के योग से बना है। 

यह सूक्ष्मशरीर ही परलोकगमन करता है, हाड़मांस से बना स्थूलशरीर नहीं। कोई बोल सकता है कि जब स्थूल शरीर नष्ट हो गया, तब ये इन्द्रियां, प्राण आदि कैसे रह सकते हैं, क्योंकि ये सभी स्थूलशरीर के आश्रित ही तो हैं। यही तो ट्रिक है। इसे आप लेखन की वर्णन करने की कला भी कह सकते हैं। लेखक अगर चाहता तो सीधा लिख सकता था कि शरीर और उसके सारे क्रियाकलाप उसके सूक्ष्मशरीर में दर्ज हो जाते हैं। पर यह वर्णन आकर्षक और समझने में सरल न होता। क्योंकि शरीर और उसके सभी क्रियाकलाप उसके मन, बुद्धि, कर्मेंद्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, और पांचोँ प्राणों के आश्रित रहते हैं, इसलिए कहा गया कि सूक्ष्मशरीर इन पांचोँ किस्म की चीजों से मिलकर बना है। मुझे तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ था। मुझे तो ये चीजें सूक्ष्मशरीर में अलगअलग महसूस नहीँ हुई, बल्कि एक ही अविभाजित अंधेरा महसूस हुआ, जिसमें इन सभी चीजों की छाप महसूस हो रही थी। मतलब साफ है कि सूक्ष्मशरीर अनुभवरूप अपनी आत्मा के माध्यम से ही चिंतन करता है, आत्मा से ही निश्चय करता है, आत्मा से ही काम करता है, आत्मा के माध्यम से ही सभी इन्द्रियों के अनुभव लेता है, और आत्मा से ही दैनिक जीवन के सभी शारीरिक क्रियाकलाप करता है। मतलब सूक्ष्मशरीर में जीव के पिछले सभी जीवन पूरी तरह से दर्ज रहते हैं, जिनको वह लगातार आत्मरूप से अपने में अनुभव करता रहता है। ये अनुभव स्थूल शरीर की तरंगों की तरह बदलते नहीं। एक प्रकार से ये पिछले सभी जन्मों का मिलाजुला औसत रूप होता है। कई लोग सोचते होंगे कि सूक्ष्मशरीर एक बिना शरीर का मन होता होगा, जिसमें खाली अंतरिक्ष में विचारों की तरंगें उठती रहती होंगी, पर फिर स्थूल और सूक्ष्म शरीर में क्या अंतर रहा। वैसे भी बिना स्थूल शरीर के आधार के स्थूल मन का अस्तित्व संभव नहीं है। उदाहरण के लिए आप अपनी अंगूठी में जड़े हुए हीरे को सूक्ष्मशरीर मान लो। इसमें इसके जन्म से लेकर सभी सूचनाएं दर्ज हैं। कभी यह शुद्ध ऊर्जा था। सृष्टि निर्माण के साथ यह धरती पर वृक्ष बन गया। फिर भूकंप आदि से वृक्ष धरती के अंदर सैंकड़ो किलोमीटर नीचे दब कर कोयला बना। फिर पत्थर का कोयला बना। लाखों वर्षो तक यह भारी तापमान और दबाव झेलता रहा। इसमें अनगिनत परिवर्तन हुए। इसने अनगिनत क्रियाएं कीं। इसने अनगिनत वर्ष बिताए। फिर वह खोद कर निकाला गया। फिर तराशा गया। फिर आपने इसे खरीदा और अपनी अंगूठी में लगाया। ये सभी सूचनाएं इस हीरे में दर्ज हैं। हालांकि हीरे को देखकर हमें इन सूचनाओं का स्थूलरूप में पता नहीं चलता, पर वे सूचनाएं सूक्ष्मरूप में हमें जरूर अनुभव होती हैं, तभी हमें हीरा बहुत सुंदर, आकर्षक और कीमती लगता है। ऐसे ही किसीके सूक्ष्म शरीर के अनुभव से उसका पूरा पिछला ब्यौरा स्थूल रूप में मालूम नहीं होता, पर सूक्ष्मरूप में अनुभव होता है, उसके औसत स्वभाव को अनुभव करके। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे अर्जुन के पिछले सभी जन्मों को जानते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें अपने मन में दूरदर्शन की तरह सभी दृष्य महसूस हो रहे थे, बल्कि यह मतलब है कि उन सबका निचोड़ सूक्ष्मशरीर के रूप में महसूस हो रहा था। शास्त्रों की शैली ही ऐसी है कि वे अक्सर तथ्यों का पूर्ण विश्लेषण न करके उन्हें चमत्कारिक रूप में रहने देते हैं, ताकि पाठक हतप्रभ हो जाए।
ये अनुभव स्थूलशरीर से लिए अनुभवों से सूक्ष्म होते हैं, हालांकि हमें ऐसा लगता है, सूक्ष्मशरीर के लिए तो वह स्थूल अनुभव की तरह ही शक्तिशाली लगते होंगे, क्योंकि उस अवस्था में जीवित अवस्था के उन विचारों के शोर का व्यवधान नहीं होता, जो अनुभवों को कुंठित करते हैं। साथ में, पिछले सारे जन्मों का अनुभव भी आत्मा में हर समय सूक्ष्म रूप में बना रहता है, जबकि स्थूलशरीर में स्थूल विचारों के शोर में दबा रहता है। हाँ, वह नए अनुभव नहीँ ले सकता, क्योंकि उसके लिए स्थूलशरीर जरूरी होता है। इसलिए उसका आगे का विकास भी नहीँ होता। आगे के विकास के लिए ही उसे स्थूलशरीर के रूप में पुनर्जन्म लेना पड़ता है। मुझे तो सूक्ष्मशरीर डीएनए की तरह जीव की सारी सूचनाएं दर्ज करने वाला लगता है। इसी तरह मुझे डार्क एनर्जी या डार्क मैटर भी स्थूल ब्रह्माण्ड का शाश्वत डीएनए लगता है।

डार्क एनर्जी और सूक्ष्मशरीर की समतुल्यता तभी सिद्ध हो सकती है, अगर उसे हम विभागों में न बांटकर एकमात्र अंधेरभरे आसमान की तरह मानें जिसमें इनके स्थूल रूप की सभी सूचनाएं सूक्ष्म अर्थात आत्म-अनुभवरूप में दर्ज होती हैं। कृपया इसे पूर्ण आत्मानुभव अर्थात आत्मज्ञान न समझ लिया जाए। यह आत्म-अनुभव की सर्वोच्च अवस्था है, जो एक ही किस्म का होता है, और जिसमें कोई सूचना दर्ज नहीँ होती मतलब शुद्ध आत्म-रूप होता है, जबकि सूक्ष्मशरीर वाला आत्म-अनुभव बहुत हल्के दर्जे का होता है, और उसमें दर्ज गुप्त सूचनाओं के अनुसार असंख्य प्रकार का होता है। यह “यत्पिंडे तत् ब्रह्मान्डे” के अनुसार ही होगा।

कुण्डलिनी योग विज्ञान ब्लैक होल में भी झाँक सकता है

शिव की तरह शक्ति भी शाश्वत है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि शक्ति कहाँ से आती है। शाक्त कहते हैं कि शिव की तरह शक्ति भी शाश्वत है। यह मानना ही पड़ेगा, क्योंकि अगर शक्ति नाशवान है, तब वह सृष्टि के प्रारम्भिक शून्य आकाश में कहाँ से आती है। अगर शिव को ही एकमात्र अविनाशी और मूल तत्त्व माना जाए तो एक नया स्पष्टीकरण है। सूक्ष्मशरीर रूपी क्वांटम फ्लकचूएशनस आत्मा में रिकॉर्ड हो जाती हैं। उन क्वांटम फ्लकचूएशनस के अनुसार ही आत्मा में अंधेरा होता है। मतलब क्वांटम फ्लकचूएशनस की किस्म और मात्रा के अनुसार ही आत्मा का अंधेरा भिन्नता रखता है। यह नियम व्यष्टि और समष्टि, दोनों ही मामलों में लागू होता है। इसे ही कारण शरीर कहते हैं। आत्मा का वही अंधेरा फिर सृष्टि के प्रारम्भ में अपने अनुसार पुनः  क्वांटम फ्लकचूएशन पैदा करता है। मतलब कारण शरीर या कारण ब्रह्माण्ड सूक्ष्मशरीर या सूक्ष्म ब्रह्माण्ड के रूप में आ जाता है। उससे फिर स्थूल शरीर या स्थूल ब्रह्माण्ड बन ही जाता है। पर प्रश्न फिर भी बचा ही रहता है। फौरी तौर पर तो यही उत्तर बनता है कि अँधेरे अंतरिक्ष के रूप में शक्ति अर्थात कारण शरीर तो रहता है, पर अनुभव के रूप में उसका अपना अस्तित्व नहीं होता, अनुभव के रूप में वह परमात्मा शिवरूप ही होता है। या कह लो कि शक्ति शून्य शिव से एकाकार हो जाती है।

सृष्टि के प्रारम्भ में शक्ति शिव से अलग होकर सृष्टि की रचना प्रारम्भ करती है

जैसे सरोवर का जल हमेशा हिलता रहता है वैसे ही अंतरिक्ष में हमेशा सूक्ष्म तरंगें उठती रहती हैं। दोनों में कभी हवा आदि से लहरें ज्यादा बढ़ जाती हैं। यही एनर्जी से कण का उदय है। अंतरिक्ष में ये तरंगें आकाशीय पिंडों के आपस में टकराने से बनती हैं। यह तो वैज्ञानिक भी बोलते हैं कि जब अंतरिक्ष में ज्यादा उथलपुथल मचती है, तो नए ग्रहों व सितारों आदि का ज्यादा निर्माण होता है। पर शुरुआत के शून्य अंतरिक्ष में यह उथलपुथल कैसे मचती है, यह खोज का विषय है।

ब्लैक होल में ब्रह्माण्ड के जन्म और मृत्यु का राज छिपा हो सकता है

तारा जब मरता है तो वह सिंगुलेरिटी तक कंम्प्रेस होकर ब्लैक होल बन जाता है। वह सिंगुलेरिटी अव्यक्त आकाश में विलीन हो जाती है, क्योंकि किसी चीज के छोटा होने की अंतिम सीमा शून्य आकाश में जाकर ही खत्म होती है। मतलब वह पहले स्बसे छोटा मूलकण बनता है। उसकी ग्रेविटी बहुत ज्यादा होती है। मतलब वह क्वांटम ग्रेविटी है। इसमें एक मूलकण से सृष्टि बनने का राज अर्थात बिग बैंग का राज छिपा हुआ है। जब एक मूलकण के अंदर पूरा तारा समा सकता है तो उससे पूरे तारे का उदय भी तो हो सकता है। वह पुनः-रचना व्हाइट होल के माध्यम से हो सकती है। तभी कहते हैं कि ब्लेक होल सृष्टि रचना की फैक्ट्री हो सकता है। हो सकता है कि सृष्टि के अंत में ग्रेविटी हावी होकर पूरे ब्रह्माण्ड या पूरी सृष्टि को ही ब्लैक होल बना कर खत्म कर दे। फिर पूरा अंतरिक्ष ही ब्लैक होल अर्थात अव्यक्त आकाश अर्थात अंधकारपूर्ण आकाश अर्थात मूल प्रकृति बन जाएगा। हालांकि उसमें पूरी सृष्टि उच्च दबाव में समाई होगी। अब ये नहीं पता कि वह किस रूप में उसमें होगी। जब उस परम ब्लैक होल का अंधकाररूप दबाव एक निश्चित मात्रा या समय सीमा को लांघेगा, तब प्रलय का अंत हो जाएगा और उसमें दबे अव्यक्त पदार्थ प्रकाशमान तरंगों के रूप में बाहर अर्थात परम व्यक्त अर्थात परम पुरुष की ओर प्रस्फुटित होने लगेंगे। इसे ही प्रकृति और पुरुष अर्थात यिन और यांग के बीच आकर्षण और सम्भोग कहा जाता है। इससे शिशु रूप में नई सृष्टि का पुनर्जन्म और विकास होगा। सम्भवतः इसीलिए शास्त्रों में अनेक स्थानों पर मन के विचारों मुख्यतः कुण्डलिनी छवि को भी पुत्र कह कर सम्बोधित किया जाता है। उदाहरण के लिए देव कार्तिकेय, सगर-पुत्र आदि। स्वाभाविक है कि सृष्टि पहले की तरह ही बनेगी क्योंकि पिछली सृष्टि के दबे पदार्थ ही उसे बना रहे हैं। नई सृष्टि बनने की प्रक्रिया और क्रम भी पुरानी की तरह ही होगा क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि जिस क्रम में कोई चीज टूट कर नष्ट होती है, वह लगभग उसी क्रम और प्रक्रिया में आगे से आगे जुड़ते हुए पुनः निर्मित होती है। यह भी हो सकता है कि बिग क्रन्च होने की बजाय बिग बैंग ही चलता रहे, जिससे अंत में सभी मूलकण भी एकदूसरे से दूर छिटक कर आकाश में विलीन हो जाएं। पर बनेगा तो तब भी ब्लैक होल जैसा ही। उसमें भी सब कुछ यहाँ तक कि प्रकाश भी टूट कर मूल अंतरिक्ष के अँधेरे में गायब हो जाएगा।

आदमी का सूक्ष्म शरीर भी एक ब्लैक होल ही है

आदमी भी तो ऐसे ही मरता है। सारे जीवन भर मानसिक ब्रह्माण्ड का निर्माण करता है। अंत में सब कुछ अँधेरनुमा ब्लैकहोल जैसे अव्यक्त में समा जाता है। आदमी के नए जन्म पर उसके नए मानसिक ब्रह्माण्ड का निर्माण इसी मानसिक या सूक्ष्म ब्लैकहोल से होता है। मतलब जैसी सूचना उस अँधेरे में दर्ज होती है, नया ब्रह्माण्ड भी वैसा ही बनता है। तभी तो कहते हैं कि आदमी का नया जन्म उसके पुराने जन्मों के अनुसार ही होता है।

ब्लैक होल में प्रकाश तो अनगिनत सितारों जितना समाया हो सकता है, पर वह दबा हुआ या अव्यक्त होता है। यह मृत्यु के बाद जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर अर्थात प्रेतात्मा की तरह है। उसमें अनेक जन्मों के जगत का प्रकाश समाहित होता है, पर वह दबा हुआ सा अर्थात अनभिव्यक्त सा होता है। ऐसा लगता है कि वह प्रकाश बाहर उमड़ने को बेताब है।

हरेक जीव एक ब्रह्माण्ड और ब्लैक होल के रूप में जन्म और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है

ब्लैक होल का अनुभवात्मक विवरण

मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि जीवात्मा का पुनर्जन्म एक मां के गर्भ में होता है। यह अनेक सम्भावनाओं में से एक है। जीवात्मा सूर्य-आदि मार्गों से भी जा सकती है, चंद्रादि मार्ग से भी, स्वर्ग भी जा सकती है और नर्क भी, किसी भी ग्रह या लोक-परलोक को जा सकती है, मुक्त भी हो सकती है, और बद्ध भी रह सकती है। इसका असली अनुभव तो ज्ञानी ऋषियों ने ही किया था, जिसका वर्णन उन्होंने वेद-शास्त्रों में किया है। हम तो उन्हींके अनुभवों की वैज्ञानिक विवेचना करने की कोशिश करते हैं। मेरा अनुभव तो यही है कि मैंने एकबार अपने मृत परिचित की जीवात्मा को अनुभव किया था। वह ब्लैक होल की तरह थी, मतलब उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व समाया हुआ था, जो उसकी जीवित अवस्था से भी ज्यादा अनुभव हो रहा था, उसके पिछले सभी जन्मों के प्रभाव के साथ, पर फिर भी सबकुछ अंधेरनुमा ही था, हालांकि अंतहीन खुले आसमान की तरह। वैसे ही, जैसे ब्लैक होल में पूरा विश्व समाया होता है। ऐसा लग रहा था जैसे उनका जीवित अवस्था का प्रकाशमान जगत अर्थात उनका जीवनयात्रा की शुरुआत से लेकर अब तक का पूरा पिछला व्यक्तित्व किसी दबाव से दबा था, इससे वह अवस्था कज्जली या चमकीली काली थी, मतलब चेतना व सेल्फ अवेयरनेस अर्थात आत्मजागरूकता से भरा अंधेरा था वह, जड़ता या मूढ़ता से भरा नहीं, और शान्तियुक्त आनंद भी था उसमें, हालांकि प्रकाश की कमी से आनंद अधूरा था। ऐसा ही जैसे किसी को सुखचैन तो दो पर अँधेरी कोठरी में बंद रखो। शायद यह एक जानवर जैसा बंधन है जो एक अंधेरे कमरे में बंधा हुआ है, लेकिन अच्छी तरह से खिलाया और पानी पिलाया जाता है, इसलिए भगवान को पशुपति नाथ या जानवरों का स्वामी कहा जाता है। ऐसा लग रहा था कि वह दबा हुआ बैकग्राउंड प्रकाश पूरे जोर व विस्फोट से बाहर को फैलना चाहता हो अभिव्यक्ति के रूप में। सम्भवतः ब्लैक होल भी ऐसा ही होता है। इवेंट होरीजन के साथ देखने पर तो वह वैसा ही लगता है। इवेंट होरीज़ोन को आप आदमी के स्थूल शरीर जैसा या अभिव्यक्त रूप जैसा कह लो, और ब्लैक होल को इसके सूक्ष्म शरीर या दबे रूप जैसा। इवेंट होरीज़ोन में पूरा दृश्य जगत प्रकाशमान और स्थूल होता है, जबकि ब्लैक होल के अंदर वह सूक्ष्मता और अँधेरे में चला जाता है, रहता वहाँ भी पूरा ही है। विचित्र अवस्था होती है सूक्ष्म शरीर की। फिर वो जीवात्मा कई दिन बाद दिव्य जैसी अवस्था में टहलते हुए महसूस हुई। सम्भवतः वह स्वर्ग या मुक्ति की तरफ जा रही थी। मैंने इसका सविस्तार वर्णन एक पुरानी पोस्ट में किया है। मैं इस अनुभव के दौरान तांत्रिक कुण्डलिनी योग का गहन अभ्यास कर रहा था। सम्भवतः इसी ने मुझे उस दिव्य अनुभव के योग्य बनाया था। वह शुभचिंतक प्रेतात्मा थी। इसी तरह एकबार मुझे योगाभ्यास के बीच में ही कुछ अशुभ प्रेतात्माओं के सूक्ष्म शरीरों का अनुभव भी हुआ था। वे हिंसक व गुस्सैल व रक्तपिपासु जैसे लग रहे थे। दरअसल सूक्ष्म शरीर अपनी आत्मा के अंदर या आत्मा के रूप में महसूस होते हैं। वह एक अहसास होता है, जिसके लिए विचारों का घोड़ा दौड़ाने की जरूरत नहीं होती। आपको चीनी की मिठास क्या विचार बताते हैं। नहीं, वह एक अपना अंदरूनी अहसास होता है। उसके साथ पीछे से अच्छे विचार आए, वह अलग बात है। उसी तरह उन दुष्ट प्रेतों के अहसास के साथ कुछ हड्डीनुमा, लाल आँखों वाले व बड़े नुकीले दांतों व गुस्से वाले चित्र तो मन में बने, पर वे तो अहसास का पीछा करने वाले विचार होते हैं, अहसास नहीं। सूक्ष्म शरीर तो एक अहसास ही होता है, बिना किसी भौतिक रूपरंग का। मस्तिष्क एक थिएटर मेन की तरह होता है, जो अहसास या मूड के अनुसार चित्र बना लेता है। मैंने गुरु स्मरण से उस घटिया अहसास को शांत किया। वह अहसास 10-20 सेकंड जितना ही रहा होगा। उसके एक-दो दिन बाद एक बुरी घटना टलने की खुशखबरी मिली। इसी तरह मैंने बताया था कि किस तरह जीव का जन्म होता है। यह भी मैं शास्त्रों में लिखी बातों को वैज्ञानिक अमलीजामा पहना रहा था, कुछ अपना हल्का अनुभव भी है, हालांकि वह गहरा या निर्णायक अनुभव नहीं है। एक उपनिषद में तो एक जगह यहाँ तक कहा गया है कि जीवात्मा बादलों तक पहुंच कर बारिश के जल में घुलकर जमीन पर आ जाती है, फिर जड़ों से होकर अन्न के पौधे में घुस जाती है। जब कोई आदमी उस अन्न के दाने को खाता है, तो उसके शरीर से होकर उसके वीर्य में पहुंच जाती है। उससे उसकी पत्नि के गर्भ में प्रविष्ट होकर जन्म ले लेती है।

जो भौतिक विज्ञान की पहुंच से परे हो, वहाँ आध्यात्मिक योग-विज्ञान से ही पहुंचा जा सकता है

भौतिक वैज्ञानिक ब्लैक होल के अँधेरे में झाँकने में अस्मर्थ हैं। पर योग विज्ञान इशारा कर रहा है कि उसमें सभी पदार्थ अदृष्य आत्मा अर्थात अदृष्य आसमान के रूप में विद्यमान रहते हैं, जिन्हें आसमान रूप आत्मा के द्वारा सीधा अनुभव तो किया जा सकता है पर भौतिक इन्द्रियों के द्वारा नहीं। जीव का सूक्ष्म शरीर भी वैसा ही होता है।

ब्लैक होल ब्रह्माण्ड-शरीर अर्थात ब्रह्मा का सूक्ष्म शरीर व कारण शरीर है

एलियन हरेक भौतिक पदार्थ के रूप में उपस्थित रहकर हमारे सबसे निकट होते हुए भी सबसे दूर हैं

उपरोक्त तथ्यों से तो यही सिद्ध होता है। देहरहित सूक्ष्मशरीर व कारण शरीर के बीच मुझे कोई ज्यादा अंतर नहीं लगता। दोनों में ही क्वांटम फ्लकचूएशनस आत्मा में रिकॉर्ड हो जाती हैं। यही मामुली सा अंतर है कि सूक्ष्मशरीर थोड़े समय के लिए रहता है, क्योंकि उसको स्थूल रूप में प्रकट करने के लिए भौतिक सृष्टि का वजूद होता है, जबकि कारण शरीर लम्बे समय तक बना रहता है, क्योंकि उस समय सृष्टि की प्रलयावस्था होती है, और कहीं कुछ भी भौतिक रूप में नहीं होता। इसके अलावा, कारण शरीर पूरी तरह से शांत दिखाई देता है क्योंकि इसमें किसी भी क्वांटम लहर की उतार-चढ़ाव को आकर्षक भूतिया अभिव्यक्ति के रूप में लंबे समय तक अनुभव नहीं किया जाता है, जैसा कि कभी-कभी सूक्ष्म शरीर के मामले में होता है। इसका मतलब है कि आम जीव की तरह ब्रह्मा नाम के जीव का अस्तित्व भी है, जैसा शास्त्रों में कहा गया है। ब्रह्माण्ड ही उसका शरीर है। यह अलग बात है कि वह इससे बद्ध नहीं होता। प्रलय के समय ब्रह्मा की आत्मा में ब्रह्माण्ड रिकॉर्ड हो जाता है। सृष्टि के समय वह फिर अपने पुराने स्थूल रूप में प्रकट हो जाता है। पर शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मा प्रलय के समय अपनी मृत्यु के साथ मुक्त हो जाता है। फिर नई सृष्टि के लिए वो रेकॉर्डिंग कहाँ रहती है। मतलब साफ है कि वह जीवनमुक्त हो जाता है, विदेहमुक्त नहीं। मतलब उसका शरीर और जन्म-मृत्यु का चक्र बना रहता है, पर मुक्ति के अहसास के साथ। पर जीवनमुक्त तो वह पहले भी था। ऐसा शायद यह दर्शाने के लिए लिखा गया है कि जीव और ब्रह्मा की गति एक जैसी है। ब्रह्मा और जीव में कोई अंतर नहीं। जीवनमुक्त के बारे में जो कुछ भी सोच लो, वह सही ही होता है, क्योंकि वह किसी से प्रभावित ही नहीं होता। यह ऐसे ही है जैसे कुछ अंतरिक्ष वैज्ञानिक अंदेशा जता रहे हैं कि हमें एलियन इसलिए नहीं दिखते क्योंकि वे भौतिक पदार्थों के रूप में ढल गए हैं, और ऐसे बन गए हैं कि वे हर जगह हैं भी और नहीं भी। पूरा ब्रह्माण्ड भी ऐसा ही एक विशालकाय एलियन हो सकता है। सम्भवतः इस बात को जानकर ही सभी चीजों को देवता मानने की और उनको विभिन्न रूपों में पूजने की परम्परा शुरु हुई थी। ऐसे जीवनमुक्त लोग ही तो होते हैं। फिर शास्त्र कहते हैं कि कोई भी जीव तरक्की करते हुए ब्रह्मा बन सकता है। इसका मतलब मुझे यही लगता है कि ब्रह्मा की तरह पूर्ण जीवनमुक्त बन सकता है, न कि असली ब्रह्मा।

शिव अगर सरोवर है तो शक्ति उसमें हलचल पैदा करने वाला हवा का झोँका है

मान लेते हैं कि सरोवर में जल की हलचल की तरह अंतरिक्ष में क्वांटम फ्लकचूएशनस हमेशा विद्यमान रहती हैं, जिसे हम अव्यक्त कहते हैं। यह भी मान लेते हैं कि महाप्रलय के समय अंतरिक्ष एक पूर्ण शांत जल-सरोवर की तरह हो जाता है, जिसमें बिल्कुल भी हलचल नहीं रहती, मतलब क्वांटम फ्लकचूएशनस भी थम जाती हैं। इसे परम अव्यक्त भी कह सकते हैं और परम व्यक्त या परमात्मा भी। जैसे हवा के झोंके से जल की सतह पर बार-बार उसी किस्म की तरंगों के पैटर्न  उसी क्रम में बनते रहते हैं, उसी तरह अंतरिक्ष में भी उसी किस्म की सृष्टि उसी निश्चित क्रम में बारबार बनती रहती है। पर फिर भी अंत में प्रश्न यही बचता है कि प्रलय के अंत में जब सब कुछ शून्य होता है, तब वह ऊर्जा या शक्ति कहाँ से आती है, जो उस हलचल को बढ़ा देती है। शून्य में वो हवा का झोंका कहाँ से आता है, जो शुरुआती हलचल को पैदा करता है। बाद में तो यह भी मान सकते हैं कि हलचल से हलचल खुद ही आगे से आगे बढ़ती रहती है। अंतरिक्ष में चलने वाला वह हवा का झोंका ही वह शक्ति है, जिसे शाक्त सम्प्रदाय वाले लोग शिव की तरह शाश्वत और अविनाशी मानते हैं। शिव अगर निश्चल अंतरिक्ष है, तो शक्ति उसमें हलचल पैदा करने वाला हवा का झोंका है।

कुण्डलिनी योग से ही ब्रह्माण्ड एक देवता या विशालकाय एलियन बनता है

शून्य में विद्युत्चुंबकीय तरंग

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि विद्युत्चुंबकीय क्षेत्र या तरंग से मानसिक दुनिया बनती है। तो फिर यह क्यों न मान लिया जाए कि बाहर का भौतिक संसार भी इन्हीं तरंगों से बनता है। यही अंतर है कि मानसिक संसार में ये तरंगें अस्थिर होती हैं, और आँखों आदि इन्द्रियों के माध्यम से बाहर से लाई जा रही सूचनाओं के अनुसार लगातार बदलती रहती हैं, पर बाहर के स्थूल जगत में ये किसी बल से स्थिरता पाकर स्थायी मूलकणों की तरह व्यवहार करने लगती हैं, जिनसे दुनिया आगे से आगे बढ़ती जाती है। दिमाग़ में तो विद्युत्चुंबकीय तरंग मूलाधार से आ रही ऊर्जा से बनती है, पर बाहर शून्य अंतरिक्ष में यह ऊर्जा कहाँ से आती है, यह खोज का विषय है।

फील्ड से कण और कण से फील्ड का उदय

क्वांटम फील्ड थ्योरी सबसे आधुनिक और स्वीकृत है। इसके अनुसार हरेक कण और बल की एक सर्वव्यापी फील्ड मौजूद होती है। फील्ड मतलब प्रभाव क्षेत्र, कण की फील्ड मतलब कण का प्रभाव क्षेत्र। अंतरिक्ष शून्य नहीं बल्कि इन फील्डों से भरा होता है। फील्ड मतलब पोटेंशल, तरंग व कण बनाने की योग्यता। यह फील्ड एक सबसे हल्के स्तर की लहर होती है। मुझे लगता है यह ऐसे है कि जब एक कंकड़ एक जल-सरोवर में गिराया जाता है तो एक मुख्य लहर के साथ छोटी लहरों के झुंड के रूप में विक्षोभ पैदा होता है। मुख्य बड़ी तरंग कण के समान है और छोटी तरंगें उसके क्षेत्र या फील्ड के समान हैं। जिस क्षेत्र तक इन सूक्ष्म तरंगों का अनुभव होता है, वह कण के रूप में स्थित उस मुख्य तरंग का फील्ड का दायरा होता है। जब इलेक्ट्रोन की फील्ड में किसी पॉइंट को एनर्जी मिलती है तो वहां फील्डरूपी छोटी लहर का एम्प्लीचूड या आयाम बढ़ जाता है, और वहाँ एक कण का उदगम होता है। वह इलेक्ट्रोन है। ये आधारभूत फील्ड सबसे छोटे कण क्वार्क से भी सूक्ष्म होती हैं। इसी तरह इलेक्ट्रोन के चारों तरफ भी एक फील्ड बनती है। मतलब इलेक्ट्रोन रूपी बड़ी लहर के चारों तरफ भी एक सूक्ष्म लहरों का क्षेत्र बन जाता है। वह प्रोटोन से भी इसी इलेक्ट्रोमेग्नेटीक फील्ड से ही दूर से आकर्षित होकर उससे जुड़ जाता है। इस आकर्षण की फील्ड तरंगों से भी विशेष सूक्ष्म कण सम्भवतः फोटोन पैदा होता है, जो इस आकर्षण को क़ायम करता है। इस तरह फील्ड से कण और कण से फील्ड पैदा होकर बाहर की स्थूल संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।

अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त का उदय

मन भी तो क्वांटम फील्ड की तरह होता है। इसमें हरेक किस्म का संकल्प अदृष्य रूप अर्थात अदृष्य लहर के रूप में रहता है। इसे सांख्य दर्शन के अनुसार अव्यक्त कहते हैं। जब इसे मूलाधार से एनर्जी मिलती है, तब इस मानसिक क्वांटम फील्ड की लहरें बड़ी होने लगती हैं, जो स्थूलकण रूपी चित्रविचित्र संसार पैदा करती हैं। उससे और फील्ड पैदा होती है, जिससे और विचार पैदा होते हैं। इस तरह यह सिलसिला चलता रहता है और आदमी के विचार रुकने में ही नहीं आते। अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त पैदा होकर भीतरी मानसिक संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।

क्वांटम भौतिक विज्ञान और आध्यात्मिक मनोविज्ञान के बीच समानता

प्रकृति या अव्यक्त ही वह हल्के स्तर की आधारभूत लहर है। अव्यक्त व्यक्त से ही बना है, अव्यक्त मतलब हल्के स्तर का व्यक्त। हालांकि उसके मूल में भी निश्चेष्ट या अवर्णनीय पुरुष ही है। अंत के पैराग्राफ में बताऊंगा कि निश्चेष्ट या गतिहीन पुरुष क्यों कुछ काम नहीं कर पाता। क्यों उसे मूक दर्शक की तरह माना जाता है, जो अपनी उपस्थिति मात्र से प्रकृति की मदद तो करता है, पर खुद कुछ नहीं करता। सारा काम प्रकृति ही करती है। पुरुष अर्थात शुद्ध आत्मा एक चुंबक की तरह है जिसकी तरफ खिंच कर ही प्रकृति से सब काम अनायास ही खुद ही होते रहते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जो भगवान के सहारे है, उसका जीवन खुद ही अच्छे से कट जाता है। पर भगवान असली और अच्छी तरह से समझा हुआ होना चाहिए, जो कुण्डलिनी योग से ही संभव है। जैसे हमारा हरेक कर्म और विचार संस्कार रूप से पहले से ही सूक्ष्म रूप में हमारी अव्यक्त प्रकृति के रूप में मौजूद होता है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं, उसी तरह हरेक क्वांटम कण भी अपनी क्वांटम फील्ड के रूप में पहले से ही मौजूद होता है। व्यष्टि मूलाधार मतलब शारीरिक मूलाधार से मिल रही शक्ति से व्यष्टि अव्यक्त मतलब शरीरबद्ध अव्यक्त या व्यष्टि फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे विभिन्न लहरों के रूप में विचारों मतलब व्यष्टि मूलकणों का उदय होता है। इसी तरह समष्टि मूलाधार अर्थात ब्रह्माण्डव्याप्त मूलाधार अर्थात मूल प्रकृति से उत्पन्न शक्ति से समष्टि क्वांटम फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे समष्टि मूलकण पैदा होते हैं। पर समष्टि जगत में ये शक्ति कहाँ से आती है? दार्शनिक तौर पर तो मूल प्रकृति को समष्टि मूलाधार मान सकते हैं, क्योंकि दोनों में मूल शब्द जुड़ा है, और दोनों ही सब सांसारिक रचनाओं के मूल आधार या नींव के पहले पत्थर हैं हैं, पर इसे वैज्ञानिक रूप से कैसे सिद्ध करेंगे? व्यष्टि के मूलाधार की तरह समष्टि मूलाधार में भी कोई सम्भोग क्रिया और उससे उत्पन्न सम्भोग-शक्ति होनी चाहिए। तो उसे पुरुष और प्रकृति के बीच सम्भोग क्यों न माना जाए, जिसका इशारा शास्त्रों में किया गया है।

संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया तांत्रिक कुण्डलिनी योग का भौतिक मार्ग ही है

दरअसल जीवों का जो अव्यक्तरूप सूक्ष्म शरीर है, वह मरने के बाद और भी सूक्ष्म हो जाता है, क्योंकि उस समय उसे स्थूल शरीर से बिल्कुल भी ऊर्जा नहीं मिल रही होती है। वह एक घने अँधेरे आत्माकाश की तरह हो जाता है, जिसका अंधेरा उसमें छिपे हुए अव्यक्त जगत के अनुसार होता है। वह अव्यक्त जगत भी व्यक्त जगत के अनुसार ही होता है। इसीलिए सब जीवों के सूक्ष्म शरीर उनके स्थूल स्वभाव के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इस तरह से बहुत से जीवों के अव्यक्त आत्माकाश जब समष्टि अव्यक्ताकाश मतलब मूल प्रकृति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक निश्चित सीमा से ज्यादा अव्यक्त भाव अर्थात अंधकारमय आकाश बना देते हैं, तब वहाँ से एक शक्ति की लहर पुरुष की तरफ छलांग लगाती है। इसी से क्वांटम फील्ड में लहरों का एम्प्लीच्युड आदि बढ़ने से मूलकणों का उदय और सृष्टि का विस्तार शुरु होता है। यह ऐसे ही है जैसे कभी कोई आदमी अपनी सहन-सीमा से ज्यादा ही गम या अवसाद के अँधेरे में डूबने लग जाए, तो वह सम्भोग की सहायता से अपने मूलाधार के अँधेरे में डूबे अपने अव्यक्त मानसिक जगत को ऊपर चढ़ती हुई शक्ति के साथ सहस्रार की तरफ भेजने की कोशिश करता है, ताकि उसके विचारों का मानसिक संसार पुनः प्रकाशित होने लगे। शक्ति तो खुद एक वाहक या बल है, जो अव्यक्त जगत को व्यक्त बनाने में मदद करती है। शास्त्रों में भी यही कहा है कि जब जीवों के कर्म, फल देने को उन्मुख हो जाते हैं, अर्थात जब जीव अंधकार से ऊबने जैसे लगते हैं, तब वे प्रलय के बाद पुनः सृष्टि को प्रारम्भ करने की प्रेरणा देते हैं। यह सामूहिक अर्थात समष्टि सृष्टि और प्रलय है। व्यक्तिगत सृष्टि और प्रलय तो हरेक जीव के जन्म और मरण के साथ चली ही रहती है। सहज व प्राकृतिक मृत्यु के बाद कुछ समय तो जीव चैन की बंसी बजाता हुआ अव्यक्त में आराम करता है, फिर जल्दी ही उससे ऊब जाता है। इसलिए उस अव्यक्तरूप जीव को व्यक्त करने के लिए शक्ति पुरुष की तरफ बढ़ने की कोशिश करना चाहती है। देखा जाए तो शक्ति जाती कहीं नहीं है, क्योंकि पुरुष, प्रकृति और शक्ति तीनों व्यष्टि मूल प्रकृति में साथ-साथ ही रहते हैं। ऐसे ही जैसे अव्यक्त, व्यक्त और उनको बनाने वाली शक्ति मस्तिष्क में ही रहते हैं, पर अव्यक्त जगत मूलाधार से ऊपर चढ़ता हुआ महसूस होता है, क्योंकि पुरुष या मस्तिष्क की शक्ति को प्रेरित करने वाला विशेष सेकसुअल बल मूलाधार से ऊपर चढ़ता है। उसके लिए सम्भोग के माध्यम से एक आदमी और एक औरत का आपसी मिलन जरूरी होता है। संयोगवश उस मृत जीव की जीवात्मा किसी सम्भोगरत आदमी और औरत के जोड़े के मिश्रित मूलाधार में स्थित अव्यक्त जगत से मेल खाती है। दोनों का मिश्रित अव्यक्त जगत संभोग-शक्ति के माध्यम से ऊपर उठते हुए दोनों के हरेक चक्रोँ में दबी हुई भावनाओं व छिपे हुए विचारों को अपने साथ ले जाकर सहस्रार में आनंद के साथ व्यक्त हो जाता है, और एकदूसरे के सहस्रार चक्रोँ में आपस में मिश्रित ही बना रहता है। आदमी के सहस्रार से वह मिश्रित जगत आगे के चैनल से शक्ति के साथ नीचे उतरकर वीर्य में रूपांतरित होकर औरत के गर्भ में प्रविष्ट होकर एक बालक का निर्माण करता है। इसीलिए बालक में माता और पिता दोनों के गुण मिश्रित होते हैं। इसीलिए मांबाप के व्यवहार का बच्चों पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि तीनों की एनर्जी आपस में जुड़ी होती है। इसीलिए व्यवहार में देखा जाता है कि सम्भोग सुख के साथ प्रेम से रमण करने के आदी दम्पत्ति की संतानेँ बहुत तरक्की करती हैं, भौतिक रूप से भी और आध्यात्मिक रूप से भी। इसके विपरीत आपस में अजनबी जैसे रहने वाले दंपत्तियों के बच्चे अक्सर कुंठित से रहते हैं। यह अलग बात है कि कई अच्छी किस्मत वाले लोग इधरउधर से गुजारा कर लेते हैं। हाहा। अनुभवी तंत्रयोगी सम्भोग की, जगत को व्यक्त करने वाली कुण्डलिनी शक्ति को अपने सहस्रार में केवल एक ही ध्यानचित्र पर फोकस करते हैं, और उसे वीर्य रूपी बीज में नीचे न उतारकर लम्बे समय तक वहीं रोककर रखते हैं, जिससे वह मानसिक चित्र जागृत हो जाता है। इसे ही तांत्रिक कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

पूरा ब्रह्माण्ड ही एक एलियन

इन उपरोक्त तथ्यों का मतलब है कि ब्रह्माण्ड भी एक विशालकाय जीव या मनुष्य की तरह व्यवहार करता है। इससे वैदिक उक्ति, “यत्पिंडे तत् ब्रह्मान्डे” यहाँ भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो जाती है। इसका मतलब है कि जो कुछ भी छोटी चीज जैसे शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में भी है, अन्य कुछ नहीं। पिंड यहाँ शरीर को ही कहा है, अन्य किसी चीज को नहीं, क्योंकि किसीकी मृत्यु के बाद जब उसे श्राद्ध आदि के द्वारा खाने-पीने की चीजें दी जाती हैं, उसे पिंडदान कहते हैं। क्योंकि अगर हरेक छोटी चीज के बारे में कहना होता तो अंडे, खंडे आदि दूसरे शब्द ज्यादा बेहतर होते, पिंडे नहीं। दूसरा, पंजाबी भाषा में वह स्थान जहाँ लोग सामूहिक रूप से एकसाथ रहते हैं, जिसे गाँव कहते हैं, वह पिंड कहलाता है। मूल प्रकृति ब्रह्माण्ड का मूलाधार है, और चेतन पुरुष या परमात्मा इसका सहस्रार या उसमें कुण्डलिनी जागरण है। चित्रविचित्र संसारों की रचना के रूप में ही इसका जीवनयापन या कर्मयोग या इसका कुण्डलिनी जागरण की तरफ बढ़ना है। ऐसा यह अद्वैत के साथ करता है। शास्त्रों में ऐसा ही लिखा है कि ब्रह्मा खुद कहते हैं कि वे अद्वैतभाव के साथ सृष्टि की रचना करते हैं, जिससे वे जन्ममरण के बंधन में नहीं पड़ते। इसलिए यही इसका कुण्डलिनी योग है। अद्वैत और कुण्डलिनी योग आपस में जुड़े हुए हैं। सृष्टि का संपूर्ण निर्माण ही इसका कुण्डलिनी जागरण है। जैसे कुण्डलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने सबकुछ कर लिया, इसी तरह सबकुछ कर लेने के बाद ब्रह्मा को कुण्डलिनी जागरण होता है, यह इसका मतलब है। इसके बाद सृष्टि निर्माण से उपरत होकर इसका संन्यास लेना ही सृष्टि विस्तार का धीमा पड़ना और रुक जाना है। देहांत के बाद इसका परम तत्त्व में मिल जाना ही प्रलय है। शास्त्रों में इसीलिए देव ब्रह्मा की कल्पना की गई है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही जिसका शरीर है। आजकल विज्ञान भी इस अवधारणा पर विश्वास करने लग गया है। इसीलिए एक वैज्ञानिक थ्योरी यह भी सामने आ रही है कि हो सकता है कि पूरा ब्रह्माण्ड ही एक विशालकाय एलियन हो।

जिसे हम अंधेरनुमा शून्य या अव्यक्त कहते हैं, वह भी खाली नहीं बल्कि सीमित उतार-चढ़ाव वाली जगतरूपी तरंगों से भरा होता है

अगर चैतन्यमय आत्माकाश या परमात्मा में कोई बहुत ज्यादा स्थित हो जाए या लगातार आत्माकाश में ही स्थित रहने लगे तो वह कुछ काम भी नहीं कर सकता। वह पराश्रित व नादान सा रहता है संन्यासी की तरह। इसका मतलब है कि उस समय उसमें व्यक्त दुनिया अव्यक्त आकाश के रूप में नहीं रहती। मतलब वह शुद्ध आत्माकाश बन जाता है। मतलब उसके आत्माकाश में क्वांटम फील्ड नाम की बिल्कुल भी वाइब्रेशनस नहीं रहतीं। वह पूर्ण चिदाकाश बन जाता है। इसी वजह से स्थूल ब्रह्माण्ड में भी उस जगह आकाश खाली होता है, जहाँ वाइब्रेशन नहीं होतीं। अन्य स्थान ग्रहों-सितारों से भरे होते हैं। वर्चुअल पार्टिकल तो बनते रहते हैं थोड़ी-बहुत वाइब्रेशन से। मतलब थोड़ा-बहुत काम-वाम तो वे संन्यासी भी कर लेते हैं, पर कोई निर्णायक कार्य-अभियान या व्यापार-धंधा नहीं चला पाते। हाँ, एक बीच वाला हरफनमौला तरीका भी है कि तांत्रिक योग से आत्माकाश में लगातार कंपन बनाते भी रहो और मिटाते भी रहो, और सबकुछ करते हुए भी उससे अछूते बने रहो।

कुण्डलिनी योग से ही सृष्टि के मूलकण, मूल तरंग व प्लेन्क लेंथ जैसे क्वांटम तत्त्व बनते हैं

मन के अंदर और बाहर दोनों एकदूसरे के सापेक्ष और मिथ्या हैं

मन के बाहर किसी भी चीज या जगत का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता

दोस्तों मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे जगत सत्य नहीं, बल्कि आत्माकाश के अंदर एक आभासी तरंग है। इसी तरह, स्थूल जगत का भी कोई अस्तित्व नहीं है, इसकी रचना भी मन ने की है। यह कोई आज की खोज नहीं है, जैसा कि कई जगह दिखावा हो रहा है। यह ऋषिमुनियों और अन्य अनेकों जागृत व्यक्तियों ने हजारों साल पहले अनुभव कर लिया था, जो उन्होंने आगे आने वाली हमारी जैसी पीढ़ियों के फायदे के लिए अध्यात्म शास्त्रों में लिखकर छोड़ा। विशेषकर योगवासिष्ठ ग्रंथ में इन तथ्यों का बड़ा सुंदर और वैज्ञानिक जैसा वर्णन है। कभी उसका इतना आकर्षण होता था कि उसको शांति से पढ़ने के लिए या उसे पढ़कर कई लोग घरबार छोड़कर ज्ञानप्राप्ति के लिए निर्जन आश्रम में चले जाते थे। यह पाठक को क्वांटम या पारलौकिक जैसे आयाम में स्थापित कर देता है। इसमें पूनरुक्तियां बहुत ज्यादा हैं, इसलिए बारबार एक ही चीज को विभिन्न आकर्षक तरीकों से दोहराकर यह माइंडवाश जैसा कर देता है। कट्टर भौतिकवादी कह सकते हैं कि जागृति से अनुभव हुए आत्माकाश के अंदर मानसिक सूक्ष्म जगत के बारे में तो यह बात सही है, पर बाहर के स्थूल भौतिक जगत के बारे में यह कैसे मान लें। पर वे उसी पल यह बात भूल जाते हैं कि मन के इलावा स्थूल जगत जैसी चीज का कोई अस्तित्व ही नहीं है, क्योंकि मन के इलावा आदमी कुछ नहीं जान सकता। सिर्फ उस जगत की एक कल्पना कर सकते हैं, पर वह काल्पनिक जगत भी तो सूक्ष्म ही है। फिर कुछ तर्क जिज्ञासु लोग यह कल्पना कर सकते हैं कि चेतन आकाश को ही मूल क्यों समझा जाए, जड़ आकाश को क्यों नहीं, क्योंकि दुःख अभाव आदि जड़ आकाश के टुकड़े हैं।

अचेतन आकाश भी चेतन आत्माकाश में जगत की तरह आभासी व मिथ्या है

इसका जवाब जागृत लोग इस तरह से देते हैं कि चिदाकाश-लहर की तरह ही अचेतन आकाश का अस्तित्व भी नहीं है। वह भ्रम से अपनी आत्मा के रूप में महसूस होता है। वह भ्रम जगत के प्रति आसक्ति से बढ़ता है, और अनासक्ति से घटता है। जैसे चेतन आकाश में जगत आभासी है, उसी तरह अचेतन आकाश भी। इसीलिए सांख्य दर्शन अचेतन आकाश को भी चेतन आकाश की तरह शाश्वत मानता है। हालांकि सर्वोच्च स्कूल ऑफ़ थॉट वेदांत दर्शन स्पष्ट करता है कि अचेतन आकाश चेतन आत्माकाश में वास्तविक नहीं आभासी है।

पूर्णता की अनुभूति भाव रूपी चेतन आकाश के अनुभव से ही होती है, अभाव रूपी अचेतन आकाश के अनुभव से नहीं

जरा गहराई से सोचें तो यह अनुभवसिद्ध भी है। किसीको अचेतन आत्माकाश के अनुभव से यह महसूस नहीं होता कि उसे सबकुछ महसूस हो गया या वह पूर्ण हो गया, उसे कुछ जानने, करने और भोगने के लिए कुछ शेष बचा ही नहीं। पर ऐसा चेतन आत्माकाश के अनुभव से महसूस होता है। इससे मतलब स्पष्ट हो जाता है कि असल में चेतनाकाश ही सत्य और अनंत है, आम अनुभव में आने वाला भौतिक जगत तो उसमें मामुली सी, व मिथ्या अर्थात आभासी तरंग की तरह है।

सृष्टि ब्रह्म की तरह अनिर्वचनीय व अनुभवरूप है

जगत कल्पनिक है, मतलब स्थूल भौतिक जगत काल्पनिक है, क्योंकि उस तक हमारी पहुंच ही नहीं है। मानसिक सूक्ष्म जगत काल्पनिक नहीं क्योंकि यह तो अनुभव होता है। हालांकि सूक्ष्म भी स्थूल के सापेक्ष ही है। जब स्थूल ही नहीं तो सूक्ष्म कैसे हो सकता है। मतलब कि स्थूल-सूक्ष्म आदि सभी विरोधी व द्वैतपूर्ण भाव काल्पनिक हैं। इसलिए जगत सिर्फ अनुभव रूप है, अनिर्वचनीय है। इसे ही गूंगे का गुड़ कहते हैं। हर कोई ब्रह्म में ही स्थित है, केवल स्तर का फर्क है। जागृत व्यक्ति ज्यादा स्तर पर, अन्य विभिन्न प्रकार के निचले स्तरों पर। पूर्ण कोई नहीं।

एक दार्शनिक थोट एक्सीपेरिमेंट

विज्ञान जो अपने को कट्टर प्रयोगात्मक, वास्तविक व वस्तुपरक मानता है, वह भी आजकल बहुत से दार्शनिक विचार-प्रयोग प्रस्तुत कर रहा है, जिन्हें भौतिक प्रयोगों से बिल्कुल भी सिद्ध नहीं किया जा सकता। फिर हम थोट एक्सपेरिमेंट करने से क्यों हिचकिचाएं, क्योंकि कुण्डलिनी का क्षेत्र भौतिक विज्ञान से ज्यादा दार्शनिक व अनुभवात्मक है। वह विचार-प्रयोग है, सृष्टि के सूक्ष्मतम मूलकण को कुण्डलिनी योग का अभ्यास मानना। वैसे शास्त्रों से यह बात प्रमाण-सिद्ध है। वेद-शास्त्रों को भी भौतिक प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण माना गया है, कई मामलों में तो भौतिक से भी ज्यादा, जैसे ईश्वर व जागृति के मामलों में।

इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही सूक्ष्मतम तरंग के क्रेस्ट या शिखा और ट्रफ या गर्त हैं

मूलकणरूपी स्टैंडिंग वेव वह हो सकती है, जब स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र के जोड़े को या मूलाधार और सहस्रार बिंदु के जोड़े को एकसाथ अंगुली से दबाकर उनके बीच कभी इड़ा से शक्ति की तरंग दौड़ती है, कभी पिंगला से, और बीचबीच में सुषुम्ना से। मूलाधार यिन या पाताल या प्रकृति है,और आज्ञा या सहस्रार यांग या स्वर्ग या पुरुष है। बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी ही मूल कण या दुनिया का असली रूप है, क्योंकि उससे ही कुण्डलिनी अर्थात मन अर्थात दुनिया का प्रदुर्भाव होता है।

अस्थायी मूलकण अल्प योगाभ्यास के रूप में है जबकि स्थायी मूलकण सम्पूर्ण योगाभ्यास के रूप में

जैसे आदमी में मूलाधार और सहस्रार के बीच में शक्ति का प्रवाह लगातार जारी रहता है, उसी तरह मूलकण में प्रकृति और पुरुष के बीच। इसीलिए तो तरंग लगातार चलती रहती है, कभी स्थिर नहीं होती। यह स्थिर या असली कण के जैसा है। आभासी कण उस प्रारम्भिक योगाभ्यास की तरह है, जिसमें इड़ा और पिंगला में शक्ति का प्रवाह थोड़ी-थोड़ी देर के लिए होता है, और कम प्रभावशाली होता है। इसीलिए ये अस्थायी कण थोड़े ही समय के लिए प्रकट होते रहते हैं, और आकाश में लीन होते रहते हैं।

पार्टिकल मूलाधार से सहस्रार की ओर चल रही तरंग के रूप में है, जबकि एंटीपार्टिकल सहस्रार से मूलाधार को वापिस लौट रही तरंग के रूप में है

सृष्टि के अंत में सभी कणों के एंटीपार्टिकल पैदा हो जाएंगे जो एकदूसरे को नष्ट करके प्रलय ले आएंगे

मूलाधार यहाँ प्रकृति का प्रतीक है, और सहस्रार पुरुष का। उपरोक्त अस्थायी आभासी कण प्लस और माइनस रूप के दो विपरीत कणों के रूप में पैदा होते रहते हैं। इसका मतलब है कि कभी न कभी स्थायी मूलकणरूपी तरंग भी खत्म होगी ही, बेशक सृष्टि के अंत में। फिर विपरीत मूलकण रूपी तरंग सहस्रार से मूलाधार मतलब पुरुष से प्रकृति की तरफ उल्टी दिशा में चलेगी। ऐसे में हरेक प्लस मूलकण के ठीक उलट माइनस मूलकण बनेंगे। इससे मूलकण और प्रतिमूलकण एकदूसरे से जुड़कर एकदूसरे को निगल जाएंगे, और सृष्टि का अंत हो जाएगा। इसीको प्रलय कहते हैं। फिर लम्बे समय तक कोई तरंग नहीं उठेगी। इसे ही नारायण का योगनिद्रा में जाना कहा गया है। मतलब निद्रा में तो है, पर भी अपने पूर्ण आत्मजागृत स्वरूप में स्थित है। विज्ञान कहता है कि पार्टिकल के बनते ही एंटीपार्टिकल भी बन जाता है, पर वह कहीं गायब हो जाता है। हो सकता है कि सृष्टि के अंत में वे एंटीपार्टिकल दुबारा वापस आ जाते हों।

इस समय एंटीपार्टिकल गुरुत्वाकर्षण के रूप में हैं

मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई वैज्ञानिक किस्म के लोग भी ऐसा ही कह रहे हैं। ग्रेविटी अंतरिक्ष में गड्ढे की तरह है। तरंग का आधा भाग भी गड्ढे की तरह होता है। दोनों किसी बल के कारण मिल नहीं पाते। इसलिए कण से निर्मित ग्रेविटी कण को अपनी तरफ खिंचती तो है, पर पूरी तरह उससे मिल नहीं पाती। जब तरंग का ऊपर का आधा भाग ही दिखता है, तो वह कण की तरह ही दिखता है। जब ग्रेविटी का गड्ढा भी उसके साथ देखा जाता है, तो वह कण तरंग रूप में आ जाता है। इसका मतलब है कि प्रलय के समय गुरुत्वाकर्षण ही सारी सृष्टि को निगल जाएगा।

क्वांटम ग्रेविटी का अस्तित्व है

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि इलेक्ट्रोन, क्वार्क आदि मूलकणों की भी ग्रेविटी है। यह सूक्ष्म कण द्वारा निर्मित अंतरिक्ष के आभासी सूक्ष्म गड्ढे के जैसे एंटीपार्टिकल के रूप में है। इसे विज्ञान ढूंढ नहीं पा रहा है, पर क्वांटम ग्रेविटी के अस्तित्व को नकार भी नहीं पा रहा है।

मूल तरंग का पहला नोड प्रकृति है, और दूसरा नोड पुरुष है

ये चित्रोक्त बिंदू स्टैंडिंग वेव के दो नोड हैं। एक कोने पर ब्लू डॉट नेगेटिव या नॉर्थ पोल नोड है और दूसरे कोने पर रेड डॉट पॉजिटिव या साउथ पोल नोड है। दोनों तरफ को झूलती तरंग ही सृष्टि बनाने के लिए इच्छा या सोचविचार है। केंद्रीय रेखा ही ध्यान रूपी या भाव रूप सुषुम्ना है, जो सृष्टि बनाने का पक्का निश्चय है। इसीलिए कहते हैं कि ब्रह्मा ने ध्यान रूपी तप से सृष्टि को रचा। मतलब प्रकृति एक नोड है और पुरुष दूसरा नोड। वैसे भी सृष्टि की उत्पत्ति प्रकृति-पुरुष संयोग से मानी गई है। प्रकृति अंधेरा आसमान है, और पुरुष स्वयंप्रकाश आकाश है। दोनों शाश्वत हैं। प्रकृति नेगेटिव नोड है, और पुरुष पॉजिटिव नोड है। इन दोनों के बीच बनने वाली स्थिर तरंग ही सबसे छोटा मूलकण है। इस तरह के कण आकाश में पॉप आउट होते रहते हैं और उसीमें मर्ज होते रहते हैं। इनको किसी चीज से जब स्थिरता मिलती है तो ये आगे से आगे जुड़कर अनगिनत कण बनाते हैं। इससे सृष्टि का विस्तार होता है। इसका मतलब कि सृष्टि का प्रत्येक कण योग कर रहा है। पूरी सृष्टि योगमयी है।

मूलकण एक कुण्डलिनी योगी है, जो कुण्डलिनी ध्यान कर रहा है

सूक्ष्मतम तरंग की नोड से नोड के बीच की न्यूनतम दूरी प्लेँक लेंथ बनती है

वैज्ञानिकों को क्वार्क से छोटा कोई कण नहीं मिला है। यह भी हो सकता है कि क्वार्क से छोटी तरंगें भी हैं, जैसा कि स्ट्रिंग थ्योरी कहती है, पर वे क्वार्क के स्तर तक बढ़ कर ही अपने को कण रूप में दिखा पाती हैं। केवल कण के स्तर पर ही तरंगें पकड़ में आती हैं। हो सकता है कि सबसे छोटी तरंग प्लेंक लेंथ के बराबर है, जो सबसे छोटी लम्बाई संभव है। उस प्लेँक तरंग का एक नोड प्रकृति है, और दूसरा पुरुष। वैसे प्रकृति और पुरुष एक ही हैं, केवल आभासी अंतर है। इस तरह प्लेँक लेंथ भी वास्तविक नहीं आभासिक है। आकाश में तरंग भी तो आभासी ही हो सकती है, असली नहीं। प्रकृति मतलब मूलाधार से एक शक्ति की तरंग पुरुष मतलब सहस्रार की तरफ उठती है, मतलब देव ब्रह्मा योगरूपी तप के लिए ध्यान लगाते हैं। वह तरंग इड़ा और पिंगला के रूप में बाईं और दाईं तरफ बारी-बारी से झूलने लगती है, मतलब ब्रह्मा ध्यान में डूबने की कोशिश करते हैं। ध्यान थोड़ा स्थिर होने पर शक्ति की तरंग बीच वाली आभासी जैसी सुषुम्ना नाड़ी में बहने लगती है। इसीलिए कण भी आभासी या एज्यूम्ड ही है, असली तो तरंग ही है। इससे कुण्डलिनी चित्र मन में स्थिर हो जाता है, मतलब पहला और सबसे छोटा मूलकण बनता है। फिर तो आगे से आगे सृष्टि बढ़ती ही जाती है। आज भी तो सारी सृष्टि बाहर के खुले व खाली अंतरिक्ष की तरफ भाग रही है, मतलब वही मूल स्वभाव बरकरार है कि प्रकृति से पुरुष की तरफ जाने की होड़ लगी है। सृष्टि की हरेक वस्तु और जीव का एक ही मूल स्वभाव है, अचेतनता से चेतनता की ओर भागना।

मूलकण