कुंडलिनी योग: ब्लैक होल का वजन कम करने का मार्ग

हाल ही में खगोल वैज्ञानिकों ने एक अद्भुत खोज की है। उन्होंने पाया कि कई पुरानी आकाशगंगाओं में सितारों के बनने की प्रक्रिया लगभग बंद हो चुकी है। इसका कारण वहां मौजूद सुपर मैसिव ब्लैक होल हैं, जो अपनी ऊर्जा और विकिरण से आकाशगंगा के भीतर मौजूद गैस और धूल के बादलों को बाहर धकेल रहे हैं—ये वही सामग्री है जिससे नए सितारे बनते हैं।

अगर इसे ध्यान से देखें, तो यह ब्रह्मांडीय घटना हमारे जीवन की वास्तविकता से गहराई से जुड़ी है। हमारे भीतर का अंधकार, जिसे अध्यात्म में तमोगुण कहा गया है, उसी ब्लैक होल की तरह कार्य करता है। यह अंधकार रचनात्मकता को बाधित करता है, चाहे वह व्यक्ति के स्तर पर हो (व्यष्टि) या समाज के स्तर पर (समष्टि)।

लेकिन इस अंधकार का समाधान संभव है। कुंडलिनी योग, साक्षी भाव और शरीर विज्ञान दर्शन जैसे उपायों से इस आंतरिक ब्लैक होल का “वजन” कम किया जा सकता है। आइए, इसे गहराई से समझते हैं।

शरीर विज्ञान, खगोल विज्ञान, और अध्यात्म का अद्वितीय संबंध

हमारे जीवन को समझने के लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों—शरीर विज्ञान, खगोल विज्ञान और अध्यात्म विज्ञान—को अलग-अलग देखने की बजाय, उन्हें एक साथ जोड़कर समझने की जरूरत है।

खगोल विज्ञान ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करता है।

शरीर विज्ञान हमारे शरीर की संरचना और कार्यप्रणाली की पड़ताल करता है।

अध्यात्म विज्ञान हमारी चेतना, ऊर्जा, और आंतरिक शांति के गूढ़ पहलुओं को उजागर करता है।

प्राचीन काल में लोग अध्यात्म विज्ञान के माध्यम से शरीर और ब्रह्मांड के कई रहस्यों का अनुमान लगाते थे, क्योंकि इसके लिए किसी भौतिक संसाधन या मशीनरी की आवश्यकता नहीं होती थी। आज, आधुनिक युग में शरीर विज्ञान और खगोल विज्ञान ने तकनीकी उन्नति के कारण असाधारण प्रगति की है, लेकिन तुलनात्मक रूप से अध्यात्म विज्ञान को पीछे छोड़ दिया गया है।

इसके बावजूद, अध्यात्म विज्ञान आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल मुक्ति (परम लक्ष्य) की ओर ले जाता है, बल्कि भौतिक संसार के कई अदृश्य रहस्यों को भी समझने में मदद करता है। इसलिए, इन तीनों क्षेत्रों का एकीकृत अध्ययन ही सही दिशा है।

मन का ब्लैक होल: रचनात्मकता में बाधा

ब्रह्मांड में ब्लैक होल की तरह, हमारे भीतर का अंधकार भी ऊर्जा को निगल जाता है और रचनात्मकता को रोकता है।

विचारों का भार: हमारे मन में असंख्य विचार, भावनाएं, और अनसुलझी समस्याएं जमा हो जाती हैं। ये हमारे मन को भारी बना देती हैं, जैसे कोई ब्लैक होल अपनी विशाल गुरुत्वाकर्षण से सबकुछ खींच लेता है।

तनाव और ऊर्जा ह्रास: यह मानसिक भार हमारे शरीर की ऊर्जा को खा जाता है, जिससे तनाव और थकावट पैदा होती है।

रचनात्मकता का अवरोध: जब ऊर्जा का अभाव होता है, तो नए और रचनात्मक विचार पनप नहीं पाते।

इस मनोवैज्ञानिक ब्लैक होल को हम व्यष्टि ब्लैक होल कह सकते हैं। इसका समाधान ढूंढना अत्यंत आवश्यक है, और यहां कुंडलिनी योग तथा साक्षी भाव जैसे उपाय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कुंडलिनी योग: आंतरिक अंधकार का समाधान

कुंडलिनी योग हमारी चेतना को जागृत करने की प्रक्रिया है, जिसमें शरीर की सोई हुई ऊर्जा (कुंडलिनी) को सक्रिय किया जाता है। यह ऊर्जा जब मेरुदंड के सातों चक्रों के माध्यम से ऊपर उठती है, तो मन का अंधकार धीरे-धीरे मिटने लगता है।

कुंडलिनी योग कैसे काम करता है?

1. दबे हुए विचारों का नाश: कुंडलिनी योग की प्रथाओं से मन में दबे हुए विचार और भावनाएं सतह पर आती हैं और धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं।

2. ऊर्जा की बहाली: यह योग शरीर और मन में नई ऊर्जा का संचार करता है, जिससे तनाव घटता है और मानसिक भार हल्का होता है।

3. रचनात्मक शक्ति का विकास: जब मानसिक अंधकार हटता है, तो मन नई और रचनात्मक विचारधाराओं का केंद्र बन जाता है।

4. आत्मसाक्षात्कार: कुंडलिनी जागरण के माध्यम से व्यक्ति अपनी उच्च चेतना से जुड़ता है और अपने जीवन के गहरे अर्थ को समझ पाता है।

साक्षी भाव: मानसिक ब्लैक होल को हल्का करना

साक्षी भाव का अर्थ है अपने विचारों, भावनाओं, और अनुभवों का एक निष्पक्ष साक्षी बनना।

जब हम अपने विचारों को केवल “देखते” हैं, उनके साथ तादात्म्य नहीं बनाते, तो वे धीरे-धीरे अपनी शक्ति खो देते हैं।

यह प्रक्रिया मन को हल्का करती है और भीतर शांति और स्पष्टता का संचार करती है।

खगोल विज्ञान, शरीर विज्ञान और अध्यात्म विज्ञान का संगम

यह समझना जरूरी है कि खगोल विज्ञान का ब्लैक होल और हमारे मन का ब्लैक होल अलग-अलग नहीं हैं। दोनों ऊर्जा और रचनात्मकता के अवरोध का प्रतीक हैं।

जहां खगोल विज्ञान ब्लैक होल के प्रभावों का अध्ययन करता है,

वहीं शरीर विज्ञान और अध्यात्म विज्ञान इस अंधकार को हल्का करने के उपाय सुझाते हैं।

इस प्रकार, इन तीनों क्षेत्रों का एकीकृत अध्ययन हमें न केवल ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने में मदद करता है, बल्कि हमारी आंतरिक यात्रा को भी दिशा देता है।

निष्कर्ष

कुंडलिनी योग, साक्षी भाव, और अध्यात्म विज्ञान के अन्य उपाय केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं हैं; ये पूरे समाज की रचनात्मकता और प्रगति में योगदान कर सकते हैं।

आइए, हम अपने भीतर के ब्लैक होल का वजन कम करें, ताकि हमारा मन एक नई आकाशगंगा की तरह चमके, जहां विचार और रचनात्मकता के नए “सितारे” जन्म ले सकें। जब हम अपने भीतर के अंधकार को मिटा देंगे, तो बाहरी ब्रह्मांड भी हमें पहले से कहीं अधिक उज्जवल दिखाई देगा।

कुण्डलिनीयोग एक अध्यात्मवैज्ञानिक मशीन के रूप में

मनोमय शरीर भी आदमी खुद ही होता है। वह कोई और नहीं होता। वह बहुत विस्तृत होता। जब उसे अपने आप के रूप में अनुभव किया जाता है, तब वह क्षीण होने लगता है, और कुण्डलिनी छवि का रूप लेने लगता है। खालीपन, हल्कापन और आनंद सा भी महसूस होता है। इसी तरह, दरअसल ज्ञान आत्मा का होता है। पर विज्ञान मतलब विशेष ज्ञान तब होता है, जब आत्मा के साथ मन मतलब मनोमय शरीर भी जुड़ जाता है। मन आत्मा का ही विशेष रूप है। इसलिए मन का ज्ञान जब आत्मा के विशेष ज्ञान के रूप में किया जाता है, तब यही विज्ञानमय कोष है। मन का साधारण व पराई वस्तु के रूप में ज्ञान तो मनोमय कोष है। पर जब उसे ही अपना रूप समझा जाता है, तब यही विज्ञानमय कोष है। यह भी शरीर से जुड़ा हमारा ही भाग या कोष है, पर लगता है जैसे बाहर अनंत दिशाओं और दूरियों में फैला है। दरअसल आदमी एक उड़ती हुई पतंग की तरह है। मन उड़ने वाला रंगीन कागज है, इसके शरीर से जुड़े होने की भावना डोर है, और शरीर उस डोर को पकड़ने वाला है। जब तक डोर है, तभी तक पतंग सलामत है, नहीँ तो भटक कर नष्ट हो जाएगी। एक जगह मैंने बस के डेशबोर्ड पर लिखा हुआ पढ़ा था कि मन एक पैराशूट की तरह है, यह तभी अच्छे से काम करता है, जब यह खुला हुआ होता है। शायद इसका भी यही अर्थ है। शास्त्रों में इसे ऐसे कहा है कि मन को दृष्य रूप न समझकर द्रष्टा रूप समझना है। साक्षीभाव भी यही है, बल्कि इसका ही हल्का और आसान तरीका है। जब आत्मा मन को चुपचाप साक्षी बनकर देखता है, तब भी मन की ध्यान छवि अभिव्यक्त होने लगती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि मन आत्मा का ही विशेष रूप है, मतलब मन विज्ञान रूप है। मन तभी तक है, जब तक इसे बाहरी या पराया समझा जाए। जब इसे अपना आत्मरूप समझा जाता है, तब यह हल्का पड़ने लगता है। घर की मुर्गी दाल बराबर। महत्त्वबुद्धि बाहरी या पराई चीज के लिए होती है, अपनी चीज या अपने लिए नहीं। इसमें मन नष्ट नहीँ होता, बल्कि महत्त्वहीन सा होकर धीमा पड़ जाता है। इससे आनंद पैदा होता है। पहले की भटकी हुई अवस्था में मन ने जो अतिरिक्त शक्ति ली हुई थी, वह कुण्डलिनी छवि को मिल जाती है। इससे आनंद में और इजाफा होता है, क्योंकि कुण्डलिनी छवि लम्बे समय तक बने रहकर बिना आदमी के दार्शनिक प्रयास के खुद ही भटकते मन की अतिरिक्त चर्बी उतारकर चूसती रहती है, जिससे आनंद लम्बे समय तक, और पहुंचे हुए कुण्डलिनी योगियों में तो स्थायी ही बना रहता है। मन की हल्की वृत्ति सत्त्वगुणरूप है। इसलिए मन के  क्षीण होने से जो मनमिश्रित अंधेरा जैसा पैदा होता है, उसे सतोगुणी अविद्या कहते हैं, जैसा पिछली पोस्ट में बताया गया था। इसी से इसमें आनंद होता है। यही आनंदमय कोष है। इसके विपरीत मन का बिल्कुल नष्ट होना तमोगुणरूप है, और मन का पूरे वेग में होने से उसका वास्तविक जैसा लगना रजोगुणरूप है। इनके साथ जुड़ा अविद्यारूपी अंधेरा क्रमशः तमोगुणी अविद्या और रजोगुणी अविद्या है। पहली अवस्था में दुःख और दूसरी अवस्था में सुख होता है, आनंद नहीँ। सुख और दुःख एकदूसरे से जिन्दा रहते हैं। आनंद सुख व दुःख से परे है, और हमेशा एक जैसा बना रहता है। आनंद को सुख और दुःख का मिश्रित रूप भी कह सकते हैं, क्योंकि इसमें मन और अंधेरा दोनों बराबर संतुलन में एकसाथ रहते हैं। रजोगुण में मन बहुत भड़कीला होता है, जिसके साथ अंधेरा बिल्कुल नहीँ रहता, इसलिए यह सुख है। जब मन थककर बैठ जाता है, तब पूरी तरह से बेजान सा हो जाता है, जिससे मस्तिष्क में घुप्प अंधेरा छा जाता है। यह दुःख है। यही घोर तमोगुण भी है। सुख और दुःख का चक्र चलता रहता है, जिससे आत्मा की सफाई नहीं होती। मुझे अपनी प्रारम्भिक पुस्तक के समय इसका इतना गहरा विश्लेषण पता नहीं था, हालांकि ऐसा व्यावहारिक अनुभव जरूर था। उसमें मैंने इसे ऐसे लिखा है कि अनासक्ति से ही आनंद पैदा होता है। बात सही भी है। अनासक्ति से मन धीमे और संतुलित चलता है। वैसे आसक्ति औरों के प्रति ही होती है, अपने प्रति नहीँ। इसलिए मन को आत्मा समझने से अनासक्ति खुद पैदा होती है। मैंने अनासक्ति सिद्धांत के बहुत से उदाहरण दिए थे। जैसे कि आनंद मदिरा से नहीं बल्कि उससे मन के धीमा होने से होता है, जो अनासक्ति व सत्त्वगुण का लक्षण है। इसी तरह आनंद मांसभक्षण से नहीं बल्कि उससे उत्पन्न जीवन के प्रति नश्वर बुद्धि से पैदा वैराग्य से उत्पन्न अनासक्ति से पैदा होता है। ऐसे बहुत से उदाहरण दिए थे।

कुण्डलिनी योग से यही प्रभाव पैदा होता है। अनासक्ति अर्थात अद्वैत और कुण्डलिनी साथसाथ रहते हैं। इसलिए कुण्डलीनियोग से कुण्डलिनी छवि के मन में रहने पर आनंद पैदा होता है। अतः कुण्डलीनियोग एक अध्यात्मवैज्ञानिक मशीन या तकनीक या ट्रिक की तरह है, जो अनासक्ति के दार्शनिक झमेले से बचाते हुए स्वचालित रूप से अनासक्ति का प्रभाव पैदा करता है। इसका उदाहरण मैं अपने से देता हूँ। मैंने बहुत पैसा खर्च करके कुछ विकासात्मक काम किए थे। पर कुछ अटल कारणों से उनमें से कुछ चीजें छूट गईं और कुछ में घाटा हुआ। मुझे पछतावा भी हुआ और नहीं भी, क्योंकि चलना ही जीवन है। जब आदमी बाहर नजर घुमाए रखता है तब वह अपनी चीज से संतुष्ट नहीँ होता। उससे उसका अपना आनंद भी गायब हो जाता है। मैं डिस्टर्ब सा रहने लगा। मैंने कहीं से कुण्डलिनी योग सीखा और सोचा कि सब ठीक हो जाएगा। योग से मेरा खोया हुआ आनंद लौट आया, वह भी सूद समेत। मैंने आध्यात्मिक उन्नति भी बहुत की। उस समय तो इसके आधारभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का पता नहीं था, पर आज इसका पता चला है। कुण्डलिनी एक चमत्कारिक मानसिक ध्यान छवि है, जो एक स्वचालित यंत्र की तरह हर प्रकार से लाभ करती है। हुआ क्या कि कुण्डलिनी ने मेरे भटके हुए मन की शक्ति हर ली। इससे कुण्डलिनी की सहायता से अनायास ही मेरा मनोमय कोष विज्ञानमय कोष में बदल गया। विज्ञानमय कोष आनंदमय कोष में तब्दील हो गया। उक्त विकासात्मक दुनियादारी से मेरे प्रारम्भिक तीनों कोष बहुत विकसित हो गए थे। वैसे तो अद्वैत की सहायता से विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष को भी मैं इनके साथ विकसित कर रहा था, पर अंतिम दो कोशोँ को रॉकेट गति कुण्डलिनी योग से ही मिली जिससे कुण्डलिनी जागरण की तथाकथित मामुली सी झलक भी मिली थी।