कुंडलिनी योग से एक कलाकार अपने फिल्मी किरदार वाले नकली रूप के चंगुल से छूट कर अपने असली रूप को पहचान लेता है

दोस्तों दुनिया के सारे अनुभव आत्मा को ही होते हैं। आत्मा ही मन की लहरों की तरह बनकर अपने आप को लहरों के रूप में महसूस करती है। मतलब आत्मा एक नकलची बंदर की तरह है। यह मन की नकल करती रहती है। आत्मा किसी भी दूसरी चीज को महसूस नहीं कर सकती। यह सिर्फ अपने आप को महसूस कर सकती है। अपने से अन्य को महसूस करने के लिए यह अन्य का रूप धारण करके अपने आप को ही महसूस करती है। सीधे तौर पर किसी अन्य को नहीं। इसका मतलब है कि अगर यह अन्य के जैसी ना बन कर अपने मूल रूप या असली रूप में ही रहे तो भी यह अपने को तो महसूस करती ही रहेगी। एक कलाकार जोकर का रूप बनाकर अपने को जोकर के रूप में महसूस करता है। अगर वह जोकर न भी बने तो भी वह अपने को अपने मूल कलाकार के रूप में भी तो महसूस करेगा ही। कभी वह खलनायक का रूप बन कर अपने को खलनायक के रूप में महसूस करता है, तो कभी नायक के रूप में। पर उसका अपना मूल कलाकार का रूप तो एकमात्र वही अपरिवर्तित रहता है। एक जोकर भी खाना खाता है, खलनायक भी खाना खाता है। नायक भी खाना खाता है, और मूल कलाकार भी खाना खाता है। मतलब मूल कलाकार के सभी रूप सभी एक जैसे मूलभूत काम करते हैं। केवल वे बाहर से ही अलग अलग दिखते हैं। इसी तरह मूल आत्मा भी सभी काम करती है। वह मनुष्य के रूप में भी सभी काम करती है, और पशु के रूप में भी सभी जीवन के मूलभूत काम करती है। केवल बाहर बाहर से देखने पर ही सभी रूप अलग-अलग दिखते हैं। कई कलाकार ऐसे होते हैं जो अपने नकली रूपों में ऐसे डूब जाते हैं कि उन्हें अपने असली रूप का ध्यान ही नहीं रहता। कहते हैं कि दिग्गज सिने कलाकार राजेश खन्ना भी एक ऐसे ही कलाकार थे। वह बहुत उम्दा ढंग से अपने किरदार के रोल को निभाते थे। वह अपने किरदार में जान डाल देते थे। तो स्वाभाविक ही है कि आदमी के लिए उस किरदार से वापस निकलना मुश्किल होगा ही। इससे वे अपनी असली जिंदगी में अवसाद में आ जाते थे, और अपनी कलाकारी के नकली रूपों की यादों और भावनाओं में अक्सर खोए रहते थे।

आत्मा के साथ भी लगभग ऐसा ही होता है। वह अपने किस्म किस्म के शरीरों के रूपों की यादों में खुश हुई रहती है और अपने असली मूल रूप को लगभग भूल ही जाती है। शायद जो लोग बहुत-बहुत भौतिकता और गुणवत्ता के साथ या लगन के साथ या आसक्ति के साथ दुनिया में काम करते हैं, उनके साथ ऐसा ज्यादा होता है। हालांकि वे जल्दी ही इस समस्या को समझकर इससे बाहर भी निकल जाते हैं। जो ऐसे ही ईजी गोइंग वे या आरामफरोशी में जिंदगी गुजार देते हैं, उन्हें इस समस्या का पता ताउम्र नहीं चल पाता, जिससे वे इससे बाहर भी नहीं निकल पाते। यह एक पेचीदा मामला है।

शास्त्र कहते हैं कि आत्मा चेतना से भरपूर है। इसको लेखन के माध्यम से सरल करने की जरूरत है। आत्मा में चेतनता का मतलब यह होता है कि आत्मा चेतन मनुष्य के जैसे सभी काम करती है और सभी फल भोगती भी है। अब अगर आत्मा मनुष्य की तरह सभी कर्म करेगी तो उसके अंदर सभी कर्मेंद्रियों की उपस्थिति खुद ही सिद्ध हो गई। मतलब आत्मा के अंदर विभिन्न काम करने वाली हाथ, पैर, वाक, उपस्थेंद्रिय, और जननेंद्रिय, ये पांचो कर्मेंद्रियां विद्यमान हैं। इसी तरह अगर आत्मा मनुष्य की तरह सभी फल भोगती है तो उसके अंदर सभी ज्ञानेंद्रियों की उपस्थिति खुद ही सिद्ध हो गई। मतलब आत्मा में फल या ज्ञान भोगने वाली आंख, कान, त्वचा, नाक और जीभ, ये पांचों ज्ञानेंद्रियां विद्यमान है। देखो, थोड़ा समझने की जरूरत है। हमने तरीका नहीं बल्कि प्रभाव पकड़ना है। चेतना को दर्शाने वाला मुख्य प्रभाव आनन्द है। सभी कर्मेंद्रियां और ज्ञानेंद्रियां इस आनन्द प्रभाव को प्रकट करती हैं, मतलब चेतना को प्रकट करती हैं। क्योंकि मूल आत्मा परमानंद स्वरूप है, इसलिए चेतना का प्रभाव अनंत होने से परम चेतना भी उसमें अनंत ही मानी जाएगी। जब उसमें प्रभाव अनंत हो गया, तब उस प्रभाव को पैदा करने वाले तरीके अपने आप ही अनंत सिद्ध हो गए। मतलब आत्मा में सभी कर्मेंद्रियां और ज्ञानेंद्रियां अनंत रूप में मौजूद हैं। यही गीता में विराट रूप का वर्णन है, जिसमें उनके सहस्र हाथ, सहस्र पैर, सहस्र मुख आदि बताए गए हैं।

जब आत्मा मनुष्य शरीर के रूप में जन्म लेती है तो वह एक सीमित चेतना वाले व्यक्ति के रूप में अभिनय कर रही होती है। यह ऐसे ही है जैसे एक अरबपति कलाकार फिल्म में एक भिखारी का अभिनय कर रहा होता है। भिखारी के रूप में होने से उसकी चेतना बहुत घट जाती है। उसकी कर्मेंद्रियां कमजोर होती हैं और उनसे कर्म भी बहुत कम होते हैं। इसी तरह उसकी ज्ञानेंद्रियां भी कमजोर होती हैं और वे बहुत थोड़े फलों का ही अनुभव करती हैं। हो सकता है कि कोई अरबपति कलाकार अपने असली रूप को भूलकर पूरी उम्र के लिए भिखारी के रूप में ही फंसा रह जाए। ज्यादातर आत्माओं के साथ तो ऐसा ही होता है। वे अपने परम चेतन रूप को भूलकर सीमित चेतना वाले मनुष्य आदि शरीरों के रूप में ही बंध कर रह जाती हैं। शायद ऐसा आसक्ति से ही होता है। कुंडलिनी योग से जब आसक्ति मिटती है तब आत्मा अपने शुद्ध मूल रूप को जागृति के रूप में पहचान लेती है। पहचानना अलग चीज है और उसे प्राप्त करना अलग। हां, यह जरूर है कि किसी चीज को पहचान कर उसे प्राप्त करना आसान हो जाता है। मेरे स्वप्नकालिक आत्मा के साक्षात्कार से ऐसा लगता है कि आत्मा बेस लेवल पर संबंधित शरीर के सारे काम कर सकती है। अनुभव का आधार तो आत्मा ही है। शरीर की सहायता से उस अनुभव को ज्यादा स्थूलता, तरंगता और परिवर्तनशीलता मिलती है। पर आदमी इस तड़क-भड़क में आकर आत्मा के मूल अनुभवों को भूल ही जाता है।