कुंडलिनी योग के लिए दूरदर्शन फिल्म व सिनेमा मूवी देखना जरूरी है

दोस्तों, इंद्रियों के भ्रम को हम एक और उदाहरण से समझ सकते हैं। जब हम दूर रखे टेलीविजन की आवाज ब्लूटूथ इयरबड्स से सुनते हैं, तो हमें लगता है कि वह आवाज टेलीविजन में पैदा हो रही है, जबकि वह हमारे कानों में पैदा हो रही होती है। हम टेलीविजन के जिस दृष्य के प्रति जितना ज्यादा आसक्त होते हैं, वह दृष्य हमें उतना ही ज्यादा टेलीविजन के अंदर महसूस करते हैं। जब हम अनासक्त होकर देखने लगते हैं या ऊब जाते हैं, या कान थक जाते हैं, तो वह आवाज हमें अपने कानों के अंदर महसूस होती है। मतलब कानों में पैदा हो रही आवाजों ने और आंखों में बन रहे चित्रों ने मिलकर टेलीविजन में दिख रहे दृष्यों में स्थित पंचमहाभूतों का निर्माण कर दिया था। जब हम ऊब गए या थक गए तो टीवी के नजारों पर ज्यादा ध्यान नहीं गया, जिससे सिर्फ आवाजें और चित्र ही बचे रहे, जैसे मानो पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। जब कान में बन रही आवाजों और आँखों में बन रहे चित्रों से भी ऊब गए तो उन पर भी ध्यान नहीं जाने लगा। कान और आंख थके हुए थे, इसलिए उनकी थकान महसूस हो रही थी। या कह लो नींद आ गई या टीवी को बंद कर दिया। इससे तन्मात्राएं भी नहीं रहीं, और बस कान और आँखें ही रही। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। जागने के बाद इंद्रियां तरोताजा हो गईं पर उनमें वे आवाजें और दृष्य नहीं रहे। इंद्रियों में एकदम से काम शुरु करने की शक्ति नहीं रही, क्योंकि वे अभी भी अपनी क्षतिपूर्ति ही कर रही थीं। इंद्रियां शांत होने से प्राणवायु अच्छे से चलने लगी। जिस समय इंद्रियां टीवी देखने में व्यस्त थीं, उस समय सांसों से ध्यान हट कर टीवी पर लगा हुआ था। आपने देखा भी होगा कि जब हम टीवी पर मनोरंजक कार्यक्रम देख रहे होते हैं, उस समय सांसें अटक सी जाते हैं। अगर उस समय हम सांसों पर ध्यान देते हुए लंबी लंबी और नियमित सांस लेने की कोशिश करें तो टीवी देखने का मजा ही नहीं आता और उसे बंद करने का मन करता है। इससे अंतर्मुखी बनने के लिए सांसों और प्राणायाम का महत्त्व खुद ही सिद्ध हो जाता है। इससे यह संदेश भी मिलता है कि जब इंद्रियां थकी हुई हों, तो प्राणायाम कर लेना चाहिए। इससे इंद्रियों को भी सुकून मिलता है, और मन के क्रियाशील होने से जीवन में आनंद और प्रकाश भी बना रहता है। हां, तो इंद्रियां शांत होने से जो उनसे संवेदनाओं की अनुभूतियां हो रही थीं, वे प्राण में विलीन हो गईं। प्राण सांस ही है और उसमें वे अनुभूतियां ज्यादा समय तक नहीं रह सकतीं। प्राण एक प्रकार से संवेदनाओं को इंद्रियों से लेकर मन तक पहुंचाता है। यह उन अनुभूतियों को महसूस नहीं करता। इसे हम डाकिए की तरह समझ सकते हैं, जो चिट्ठियां इधर से उधर ले जाता है, पर खुद चिट्ठियां नहीं पढ़ता। प्राणों से मन हरकत में आ जाता है। उसमें इंद्रियों द्वारा महसूस की गई संवेदनाएं उमड़ने लगती हैं, हालांकि अब मन के रूप में, क्योंकि अब उन संवेदनाओं के निर्माण में सहायक टीवी के दृष्य तो नहीं रहे। यह एक प्रकार से याद आने की तरह ही है। फिर उन अनुभूतियों के साथ मन में अन्य विविध विचार भी उमड़ने लगते हैं। यह प्राणों का मन में विलीन होना है। फिर कुछ समय तक ऐसे विचारों की स्वप्निल दुनिया में खोने के बाद आदमी को होश आता है कि कुछ दुनियादारी के काम भी करने चाहिए। मतलब बुद्धि क्रियाशील हो जाती है। मन नष्ट नहीं होता पर बुद्धि के रूप में रूपांतरित होने लगता है या बुद्धि में विलीन होने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसी तरीके से काम करने लगेगी, जैसा उसका मन था। तभी तो कहते हैं कि अगर मन को अच्छा रखेंगे, तभी काम भी अच्छे होंगे। आजकल के बच्चे जो रातदिन भरपूर और भयानक हिंसा से भरी वीडियो गेमों को देखते और खेलते रहते हैं, वे आगे चलकर कैसे अच्छे काम कर पाएंगे। उन्हें यह पोस्ट जरूर पढ़ानी और समझानी चाहिए। अच्छी बुद्धि से वह कुछ दिनों तक अच्छी दुनियादारी निभाता है, और अच्छी तरक्की भी करता है। फिर वह थक सा जाता है, और दुनियादारी से ऊब सा भी जाता है। इससे उसकी बुद्धि शांत होने लगती है, जिससे उसकी आत्मा के अंदर अंधेरा सा बढ़ने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसके अहंकार के रूप में रूपांतरित हो जाती है। फिर कोई कुंडलिनी योगी अगर चाहे तो इसके आगे आत्मा को प्राप्त कर सकता है। पर आम आदमी यहां से वापिस लौट आता है। थोड़े दिन अहंकार के अंधेरे में आराम से बिताने के बाद दुनियादारी में लौट आता है, और बुद्धि के सहयोग से पुनः अपनी पैठ जमाता है। फिर कुछ तरक्की करके सैकड़ों इच्छाएं पालकर मन की शरण में पहुंचता है। मतलब बुद्धि मन में विलीन हो जाती है। फिर मन के उकसावे में आकर मूवी देखने सिनेमा थिएटर चला जाता है। वह वैसी ही मूवी देखना पसंद करेगा जैसी उसकी बुद्धि और दुनियादारी थी, क्योंकि बुद्धि ही मन के रूप में बन कर सामने आई। सिनेमा हॉल घर से जितना दूर होता है, उतना ही मजा आता है, क्योंकि मन को प्राणों के रूप में रूपांतरित होने के लिए भी समय चाहिए होता है। सिनेमा जाने के रास्ते में उसकी बड़ी अच्छी, लंबी, नियमित और आनंददायी सांसें चलती हैं, क्योंकि मन की सिनेमा देखने की इच्छा खत्म हो रही होती है मतलब मन खत्म हो रहा होता है, और उसकी शक्ति प्राणों को मिल रही होती है। फिर भी मन की सूक्ष्म सोच प्राणों में भी कायम रहती है, क्योंकि कारण कभी नष्ट नहीं होता, पर कार्य के रूप में मौजूद रहता है। मूवी देखना शुरु करते ही उसकी सांसें थम सी जाती हैं, और वह अपनी आंखों और अपने कानों में मधुर संवेदनाओं का आनंद लेने लगता है। मतलब उसके प्राण इंद्रियों में रूपांतरित हो जाते हैं। जब तक पर्दे पर विज्ञापन चलते हैं, तब तक वह उन दृष्यों का गहराई से अवलोकन नहीं करता। मतलब उसे संवेदनाएं आंखों और कानों में ही महसूस हो रही होती हैं, कहीं बाहर से आती हुई प्रतीत नहीं होतीं। यह इंद्रियों की अभिव्यक्ति की अवस्था ही होती है। थोड़ी देर बाद जब मूवी शुरु होने के बाद उसे मूवी कुछ समझ में आने लगती है, तो उसे वे अनुभूतियां सिनेमा के पर्दे से मिलती हुई महसूस होती हैं। मतलब उसकी इंद्रियां तन्मात्राओं में विलीन हो जाती हैं। बाद में फिल्म में गहरे डूबने पर उसे पर्दे पर दिख रहे पहाड़, महल आदि असली लगने लगते हैं। मतलब तन्मात्राएं पंचमहाभूतों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। मतलब उसकी सृष्टि की रचना पूर्ण हो गई।

अब फिल्म खत्म होती है। सारे दृष्य खत्म। मतलब उसके व्यक्तिगत सूक्ष्म ब्रह्मांड की प्रलय शुरु हो जाती है। पर्दे पर विज्ञापन आने लगते हैं। अब उसे उन विज्ञापनों में दिखाए गए पहाड़ और महल असली नहीं लगते, क्योंकि वह उन्हें ध्यान से नहीं देखता। उसे बस आंख से कुछ दिख रहा होता है और कान से सुनाई दे रहा होता है। आदमी को उन्हें थोड़ी देर देखना अच्छा लगता है। क्योंकि सभी को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर क्रमवार आना और जाना जाना अच्छा लगता है। मतलब पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। फिर आदमी थोड़ी देर बाद उन संवेदनाओं को अपनी इन्द्रियों में ही महसूस करने लगता है, बाहर नहीं। उससे भी ऊबकर और अपनी आंखों और अपने कानों की थकान को महसूस करते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। वह थोड़ा चायपानी करके तरोताजा होता है। फिर उसकी सांसें अच्छी, गहरी और नियमित चलने लगती हैं। जब आंखों और कानों को मलने से उन पर ध्यान जाता है, तो उन्हें शक्ति देने के लिए सांस खुद ही चलने लगती है। हालांकि उससे वे तरोताजा ही हो सकती हैं, पुनः काम नहीं कर सकती। क्योंकि वे इतना ज्यादा काम करने के बाद अपनी क्षतिपूर्ति कर रही होती हैं। फिर सांसों की अतिरिक्त शक्ति मन को लगती है। मतलब इंद्रियां प्राण में विलीन हो गईं और प्राण मन में। फिर प्राण या सांस की शक्ति से मन भागने लगता है। मन को भगा कर सांस फिर उथली और अनियमित हो जाती है। मतलब प्राण मन में रूपांतरित हो गया। उस मन की चहलपहल से प्रेरित होकर वह शोपिंग माल में घुस जाता है। वहां विभिन्न चीजों की गुणवत्ता और उनका मोलभाव जांचते हुए उसकी बुद्धि क्रियाशील हो जाती है और मन सुस्त पड़ जाता है। मतलब मन बुद्धि में रूपांतरित हो गया। बुद्धि के भी थकने से जब उसकी आत्मा में अहंकार का अंधेरा काफी बढ़ने लगता है, तब वह परिवारसहित गाड़ी में बैठकर घर को चल देता है। मतलब बुद्धि अहंकार में रूपांतरित हो गई। उस अहंकार में उसके पूरे दिवस के क्रियाकलापों का खाका सूक्ष्म रूप में दर्ज हो जाता है। घर आकर वह तांत्रिक कुंडलिनी योग से आत्मा के अंधकार को कुंडलिनी ध्यान से रौशन कर देता है। मतलब अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है। बेशक पूर्ण आत्मा न सही, उसका कुछ अंश ही सही। अगले दिन फिर उसे न चाहते हुए भी आत्मा से क्रमवार नीचे गिरना पड़ता है, ताकि वह पुनः दुनियादारी को अच्छे से निभा सके। यह सिलसिला ऐसे ही चक्रवत चलता रहता है। यह सभी किस्म की अनुभूतियों, सभी किस्म के क्रियाकलापों, सभी किस्म की सांसारिकताओं, सभी किस्म के लोगों, सभी इंद्रियों और सभी किस्म के शरीरों के साथ ऐसा ही होता है। यह एक सामान्य सिद्धांत है। शास्त्रों में ऐसे अनेकों सिद्धांत बड़ी सूक्ष्मता व गहराई से वर्णित किए गए हैं, जहां तक मुझे लगता है आज भी आधुनिक मनोविज्ञान नहीं पहुंच सका है। उपरोक्त चलचित्र या दूरदर्शन वाला उदाहरण तो समझाने के लिए एक छोटा सा बिंदु है। आदमी जो कुछ भी करता है, उसे अपने स्वभाव अर्थात अहंकार के वशीभूत होकर ही करता है, बेशक उसे लगे कि वह स्वतंत्रता से करता है। यही अहंकार है, यही स्वभाव है, यही अवचेतन मन है, यही संस्कार है। यह सब शब्दों का खेल है। चीज एक ही है। जिसने अहंकार को नहीं जीता है, वह हमेशा उसी के वश में रहता है। पूर्ण स्वतंत्रता तो केवल योगी को ही प्राप्त होती है।

कुंडलिनी तंत्र ही अहंकार से बचा कर रखता है

दोस्तों, जागृति के बाद आदमी की बुद्धि का नाश सा हो जाता है। इसे द्वैतपूर्ण भौतिक बुद्धि का नाश कहो तो ज्यादा अच्छा होगा। आध्यात्मिक प्रगति तो वह करता ही रहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भौतिक बुद्धि अहंकार से पैदा होती है। पर जागृति के तुरंत बाद अहंकार खत्म सा हो जाता है। आदमी में हर समय एक समान प्रकाश सा छाया रहता है। नींद की बात नहीं कर रहा। नींद में तो सब को अंधेरा ही महसूस होता है, पर फिर भी जागते हुए एक जैसा प्रकाश रहने के कारण नींद का अंधेरा भी नहीं अखरता। वह भी आनंददायक सा हो जाता है। अहंकार अंधेरे का ही तो नाम है। यह अज्ञान का ही अंधेरा होता है। कई भाग्यशाली लोगों को इस अहंकारविहीन स्थिति में लंबे समय रहने का मौका मिलता है। पर कईयों को दुनिया से परेशानी या अभाव महसूस होने के कारण वे जल्दी ही अहंकार को धारण करने लगते हैं। कई लोग, जो शरीर से पूरी तरह से स्वस्थ होते हैं, वे उन्नत तांत्रिक कुंडलिनी योग के अभ्यास से उस दुनियावी परेशानी के बीच में भी अहंकार से बचे रहते हैं। वे कामचलाऊ बुद्धि को भी धारण करके रखते हैं, और अहंकार को भी अपने पैर नहीं जमाने देते। पर जब शारीरिक दुर्बलता या रोग से सही से तांत्रिक कुंडलिनी योग नहीं कर पाते तो वे भी अहंकार के चंगुल में फंसने लगते हैं। अहंकार की गिरफ्त में आते ही उनकी बुद्धि बुलेट ट्रेन की तरह भागने लगती है। यह भी करना, वह भी करना। यह जिम्मेदारी, वह परेशानी। इस तरह से बुद्धि सैकड़ों कल्पित बहाने बनाते हुए अपने को पूरी तरह से स्थापित कर लेती है। जब अंदर ही अंधेरा बस जाए तो बाहर भी हर जगह अंधेरा ही दिखता रहेगा और आदमी उससे बचने के लिए छटपटाता ही रहेगा। अगर अंदर का अंधेरा मिटा दिया जाए तो बाहर खुद ही मिट जाएगा और आदमी शांति से बैठ पाएगा। काला चश्मा लगाकर बाहर सबकुछ काला ही दिखता है। चश्मा हटा दो तो सबकुछ साफ दिखने लगता है। फिर बुद्धि के भागते ही मन भी कहां पीछे रहने वाला। जब बुद्धि ने अच्छी सी आमदनी पैदा कर दी, तब मन उसे भोगने के लिए ललचाएगा ही। कभी सिनेमा जाने का ख्वाब देखेगा तो कभी पिकनिक का। कभी पहाड़ पर भ्रमण को तो कभी खाने पीने का। कभी यह करने का तो कभी वह करने का। इन ख्वाबों के साथ अन्य और भी अनगिनत विचार उमड़ने लगते हैं। इस तरह मन में पूरा संसार तैयार हो जाता है।

जब आदमी मन के सोचे हुए पर चलने लगता है तो सांसें तो तेज चलेंगी ही। परिश्रम जो लगता है। मतलब आदमी प्राण के स्तर पर पहुंच जाता है। उन सांसो से इंद्रियों में भोगों को भोगने की और उनसे काम करने की शक्ति आ जाती है। पहले पहले उसे भोगों का आनंद इंद्रियों में महसूस होता है, बाहर नहीं। बाद में जब वह भोगी जाने वाली वस्तु पर ज्यादा ध्यान देने लगता है, तब उसे महसूस होता है कि उनसे कुछ सूक्ष्म चीजें निकल कर उसकी इंद्रियों के संपर्क में आती हैं, जिन्हें वे महसूस करती हैं। वे तन्मात्रा ही हैं। फिर भोगी जाने वाली वस्तुओं के ज्यादा ही कसीदे पढ़ने से उसे महसूस होने लगता है कि यह आनंद का अनुभव भोग पदार्थों में ही है। इससे उसका उन पदार्थों से लगाव बढ़ता है, जिससे वह उन पदार्थों का गहराई से अध्ययन करने लगता है। मतलब पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हो जाती है।

हम यहां यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम इस वेबसाइट पर कहीं भी ऐसा नहीं कह रहे हैं कि ऐसा करना चाहिए या ऐसा नहीं करना चाहिए। सबकी अपनी अपनी व्यक्तिगत समस्या और जरूरत होती है, जिसके अनुसार सबको चलना ही पड़ता है। अगर आदमी समझबूझ से खुद कोई फैंसला ले तो ज्यादा अच्छा रहता है बजाय इसके कि उस पर जबरदस्ती थोपा जाए। हमारी संस्कृति में शायद ऐसा होने लग गया था, इसीलिए सैद्धांतिक और वैज्ञानिक ज्ञानविज्ञान का ह्रास हुआ। हम तो केवल सिद्धांत पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। सच्चाई का तो पता होना ही चाहिए, उस पर चलना या न चलना व्यक्ति के अपने चुनाव पर निर्भर है। महात्मा बुद्ध कहते हैं कि जिंदगी में उठना गिरना चलता रहता है। पर बुराई इस चीज में है जब आदमी गिरा हुआ हो और यह न समझे कि वह गिरा हुआ है। जिसको अपने गिरे होने का अहसास है वह मौका मिलने पर उठने का प्रयास जरूर करेगा। पर जिसको अपने गिरे होने का अंदाजा ही नहीं है, वह अपनी अवस्था को सामान्य अवस्था या उठी हुई अवस्था मानने के भ्रम में जीता रहेगा और मौका मिलने पर भी उठने का प्रयास नहीं कर पाएगा।

शास्त्रों में ऐसा सब कुछ विशद वर्णन है, पर आजकल उनके बारे में लोगों की समझ विकृत सी हो गई है। एक बार कहीं लिखा हुआ पढ़ा था कि आदरणीय महेश योगी जी भी लगभग ऐसा ही कहते थे। विदेशों में उनकी अच्छी पैठ है। वैसे तो उनके विरोधियों की तरफ से उन पर कुछ आरोप भी लगते रहे हैं। उस लेख के अनुसार भारत में प्राचीन हिंदु संस्कृत विकृत सी हो गई है। मतलब लगता है कि इन वैज्ञानिक तथ्यों को अवैज्ञानिकता, लाचारी, गुलामी, दरिद्रता, रूढ़िवादिता, मूर्खता और कट्टरता जैसे दोषों ने ढक लिया है। वैसे यह अहसास किसी चीज को देखने के नजरिए, आध्यात्मिक और भौतिक विकास के स्तर, सांस्कृतिक परिवेश, देश और काल आदि विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। एक आदमी को एक चीज बुरी लग सकती है, तो दूसरे आदमी को वही चीज अच्छी भी लग सकती है। जिस अहसास की तरफ ज्यादा लोगों का या ज्यादा सत्ता का रुझान होता है, वही समाज या दुनिया में मान्य समझा जाता है। फिर भी इन तथ्यों को इन दोषों से बाहर निकालने की जरूरत है। समय के साथ हर एक संस्कृति के ऊपर दोषारोपण होने लगते हैं। विश्व की अनेकों संस्कृतियां इस वजह से इतिहास बन गई हैं, पर हिंदू संस्कृति पुरानतम संस्कृतियों में होने के बावजूद भी आज तक इसीलिए बच पाई है, क्योंकि समय-समय पर विभिन्न दार्शनिक और समाज सुधारक इस पर लगे दोषारोपण को बाहर निकालने का प्रयास करते आए हैं। आज तो यह दोषारोपण चरम पर लगता है। इसलिए इसको बाहर निकालने के लिए भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले व सकारात्मक बुद्धिजीवियों को आगे आना होगा। वैसे हम यह बता देना चाहते हैं कि हम किसी धर्म वगैरह के साथ नहीं बल्कि सच्चाई के साथ हैं।

कुंडलिनी रूपी द्वारपाल ही आत्मा के अनंत साम्राज्य में प्रवेष की अनुमति देता है

दोस्तों, कई लोग सोचते होंगे कि अगर अहंकार तक पहुंच गए तो आत्मा तक खुद ही पहुंच जाएंगे। पर ऐसा नहीं है। अपने आप कुछ नहीं होता। आत्मा के लिए प्रयास तो अंत तक करना होगा। मन, बुद्धि, अहंकार आदि तो आत्मा तक पहुंचने के विभिन्न स्तर मात्र हैं। जो प्रयास नहीं करेंगे, वे जल्दी ही अहंकार से भी वापस लौट जाएंगे। अहंकार से बुद्धि के स्तर तक आएंगे। फिर मन के स्तर तक, फिर प्राणों के, फिर इंद्रियों के, फिर तन्मात्राओं के और फिर महाभूतों मतलब पूर्ण भौतिकता के स्तर तक। यह सिलसिला चलता रहता है। अहंकार से आत्मा तक तो योगी लोग ही पहुंचते हैं। वैसे तो आत्मा को किसी भी तरीके से प्राप्त कर सकते हैं। पर हर चीज की तरह आत्मा को प्राप्त करने का भी एक सबसे आसान और वैज्ञानिक तरीका होता है। वह यही है कि पहले पंचमहाभूतों के स्तर पर कर्म योगी की तरह व्यवहार किया जाए। कर्म योग से आत्मा तक पहुंचने की आधारशिला तैयार होती है। फिर समय के फेर से या कुछ सालों तक इस स्तर पर मेहनत करने के बाद आदमी को खुद महसूस होता है कि वह रूपांतरित हो रहा है। वह खुद ही पंचतन्मात्रा के उच्चतर स्तर में प्रविष्ट हो जाता है। मतलब जब वह किसी चीज को देखता है तो उसे लगता है कि वह रूप को महसूस कर रहा है। उसे विभिन्न वस्तुओं को देखते हुए सर्वसामान्य रूप के इलावा कुछ भी अलग अलग महसूस नहीं होता। यह अद्वैत जैसा ही भाव होता है। उसी तरह उसे विभिन्न प्रकार की आवाजें सुनते हुए एक सामान्य शब्द का ही एहसास होता है। उन शब्दों के बीच का अंतर उसे ज्यादा महसूस नहीं होता। विभिन्न प्रकार के स्वाद को अनुभव करते हुए भी उसे केवल सामान्य रस भाव का ही अनुभव होता है। अलग-अलग उसे नजर नहीं आता। विभिन्न प्रकार का स्पर्श महसूस करते हुए उसे अलग-अलग पदार्थ महसूस नहीं होते। बस एकमात्र स्पर्श संवेदना की अनुभूति होती है, जो कभी ज्यादा तो कभी कम, कभी किसी तरह की तो कभी किसी तरह की। मतलब उसे पदार्थों का अंतर महसूस नहीं होता, बल्कि संवेदना में उतार-चढ़ाव महसूस होता है। फिर भी होती तो है एकमात्र संवेदना ही है। विभिन्न प्रकार के गंधयुक्त पदार्थ भी उसे अलग-अलग ना दिख कर सब में केवल गंध तन्मात्रा ही विभिन्न आभासी रूपों में महसूस होती है। अगर वह कर्मयोग और अद्वैत भाव को बनाकर रखता है तो उसका पंचतन्मात्रा के स्तर से पंचकर्मेंद्रियों और पंचज्ञानेंद्रियों के उच्चतर स्तर में प्रवेश हो जाता है। मतलब अब उसे यह पांचों ज्ञानेंद्रियों की संवेदनाएं और पांचों कर्मेंद्रियों की संवेदनाएं बाहरी पदार्थों में महसूस नहीं होतीं बल्कि अपनी इंद्रियों में महसूस होती हैं। मतलब उसे लगता है कि ये संवेदनाएं बाहर नहीं बल्कि उसकी इंद्रियों में पैदा हो रही हैं। फिर अपने शरीर की इंद्रियों के प्रति कैसा आकर्षण। इसलिए वह उन संवेदनाओं से मोहित ना होकर स्वतः ही आगे बढ़ने लगता है। हालांकि अगर वह आध्यात्मिक प्रयास छोड़ देता है तो इस स्तर से नीचे गिर कर फिर से पंचतन्मात्रा और पंचमहाभूत के स्तर तक भी गिर सकता है।

यदि वह कर्म योग और अद्वैत भाव बनाकर रखता है, तो प्राण के स्तर तक स्तरोन्नत हो जाता है। इसमें बीच-बीच में उसकी सांस लंबी और गहरी आने लगती है। देखा जाए तो प्रत्येक स्तर लंबे लंबे समय तक भी रहता है और सभी स्तर एकसाथ भी चलते रहते हैं। खासकर शरीरविज्ञान दर्शन से प्राप्त कर्मयोग से यह सभी स्तर एक साथ भी चलते रहते हैं। हां, फिर अपने आप एक लंबी और गहरी सांस चलने से ही मन क्रियाशील हो जाता है। आदमी जब कुंडलिनी योग से इस लंबी सांस को लंबे समय तक लेता है तब और ज्यादा लाभ मिलता है। यह भी लगता है कि प्राण के स्तर तक पहुंचने पर कुंडलिनी योग से ज्यादा लाभ मिलता है। वैसे तो इसे इससे पहले भी कर सकते हैं। मन पर भी जब शरीर विज्ञान दर्शन और कुंडलिनी योग से लगाम लगने लगती है तब आदमी बुद्धि वाले स्तर तक पहुंच जाता है। बुद्धि भी तभी आत्मा की खोज में लगेगी, अगर उसे जानबूझ कर निर्देशित किया जाता रहे। बुद्धि पर भी जब कुंडलिनी योग से अंकुश लगेगा तो वह अहंकार में विलीन हो जाएगी। अहंकार में सभी कुछ अंधेरी आत्मा के रूप में छुपा होगा। इसीलिए इस अवस्था में कुंडलिनी चित्र मन में हरदम छाया रहता है। यह इसीलिए क्योंकि मस्तिष्क की उर्जा ने कहीं ना कहीं तो खर्च होना ही है। अगर कुंडलिनी चित्र को बल पूर्वक हटाया जाएगा तो वह ऊर्जा पुनः दुनिया की तरफ भाग सकती है। इसलिए आत्मा तक पहुंचने के लिए कुंडलिनी का सहारा तो लेना ही पड़ेगा। इस स्तर पर अगर तीव्र और तांत्रिक कुंडलिनी साधना की गई तो कुंडलिनी जागृत होने से अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है। अगर नहीं किया गया तो अहंकार से आदमी फिर क्रमवार बाहर भी लौट कर आ सकता है। मतलब कुंडलिनी ही आत्मा के दिव्य महल के बाहर खड़े द्वारपाल के रूप में है। अगर इसका सम्मान किया गया तो ही आत्मा के अनंत महल में प्रवेश मिलेगा, नहीं तो बाहर के जगतरूपी जंगल में ही भटकते रहना पड़ेगा।

कुंडलिनी जागरण से ही अहंकार की सही से पहचान होती है और इसका सही से निवारण होता है

दोस्तों, शास्त्रों में कही गई बातों के गहरे मतलब होते हैं। जैसे कि हम चर्चा कर रहे थे कि योग स्थूलता से सूक्ष्मता की तरफ जाता है। मृत्यु या प्रलय को भी स्थूलता से सूक्ष्मता की तरफ जाने को ही कहते हैं। फिर योग में और मृत्यु में क्या अंतर है, इसे जरा गहराई से समझते हैं। मृत्यु वाली सूक्ष्मता अहंकार पर रुक जाती है। पर योग वाली सूक्ष्मता आत्मा तक पहुंच जाती है। आत्मा सूक्ष्मता की अंतिम सीमा है। आत्मा से सूक्ष्म अन्य कुछ नहीं है। इसमें ब्लैक होल के जैसा आकर्षण भी  है। जो इसको पा लेता है, वह फिर कभी भौतिक दुनिया में वापस नहीं लौटता। फिर हमेशा के लिए आत्मा की सूक्ष्म और अनंत दुनिया ही उसकी दुनिया बन जाती है। दूसरी तरफ मृत्यु वाली सूक्ष्मता अहंकार पर पहुंचकर रुक जाती है। आदमी का अहंकार बेशक सूक्ष्म है, और उसमें आदमी के सारे पिछले क्रियाकलाप सूक्ष्म कोडों के रूप में दर्ज हैं। पर फिर भी यह परमसूक्ष्म आत्मा के सामने पहाड़ जैसा स्थूल है। आत्मा में जगत का बिल्कुल भी नामोनिशान नहीं है, सूक्ष्म या कोड रूप में भी नहीं।

कई लोग इसी अहंकार को जीवात्मा कहते हैं। कई लोग इसी को अवचेतन मन कहते हैं। कई इसी को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। यह सब शब्दों का जाल है। चीज एक ही है। इसे अहंकार इसलिए कहते हैं क्योंकि यह सभी लोगों को अपने आप के रूप में दिखता है, पराए रूप में नहीं। पर दरअसल में यह अपना रूप नहीं होता। इसीलिए शास्त्रों में अहंकार को झूठा और धोखा कहा जाता है। संस्कृत शब्द “अहम” का मतलब ही “मैं” होता है। जिस दुनिया से आदमी व्यवहार करता है, वह पराए रूप में होती है। जैसे आदमी बोलता है कि उसने गाड़ी चलाई। वह ऐसे तो नहीं बोलता कि उसने अपने को चलाया। पर उसे पता ही नहीं चलता कि वे दुनिया की पराई चीजें ही सूक्ष्म रूप होकर उसके अपने आप के स्वरूप वाले अहंकार को बनाती हैं और बढ़ाती हैं।

उपरोक्तानुसार आदमी के अहंकार अर्थात अवचेतन मन में सभी पराई चीजें भरी होती हैं। पर आदमी उन्हें कभी पराया नहीं समझता। वह इसलिए क्योंकि वे बहुत सूक्ष्म रूप में होती हैं। वे आत्मा से इतनी नजदीकी से चिपकी होती हैं कि मरने पर भी नहीं छूटती। वे हमेशा आदमी की आत्मा के साथ जन्म जन्मांतरों में और लोक लोकांतरों में भ्रमण करती रहती हैं। इसीलिए वे आत्मा को अपना स्वरूप लगती हैं। एक प्रकार से आदमी पूरी दुनिया को अपने साथ घुमाए फिरता रहता है। बोलते हैं कि फलां की उम्र पूरी हो गई और उसने दुनिया को छोड़ दिया। पर दुनिया उसे कहां छोड़ती है। वह तो उसके अहंकार के रूप में उसी के साथ हो लेती है।

प्रत्येक पराई वस्तु या पराए विचार की छाया आदमी की आत्मा में अहंकार के रूप में दर्ज होती रहती है। कई दुनियादारी में निपुण लोग बड़ा दावा या नाटक करते हैं कि उनमें अहंकार नहीं है, पर ऐसा होना असंभव है। कई महान अहंकारी तो आत्मज्ञानी बनकर घूमते फिरते हैं। मैं यह किसी धर्म के अधिष्ठाता के बारे में नहीं बोल रहा। दुनिया की छाया तो आत्मा पर बनेगी ही, चाहे आदमी अपना जितना मर्जी बचाव कर ले। हां, अगर वह साथ में कुंडलिनी योग भी प्रतिदिन करता रहे, तब वह छांव कमजोर बनेगी और बनी हुई छांव मिटने लगेगी। फिर हम कह सकते हैं कि अमुक आदमी में बहुत कम अहंकार है। मतलब साफ है कि कुंडलिनी योग ही किसी के अहंकार का पैमाना है, दुनियादारी नहीं।

या तो आदमी स्थूल जगत को भी सूक्ष्म जगत की तरह अपना स्वरूप समझे या किसी को भी अपना स्वरूप ना समझे। गड़बड़ वहां होती है, जब स्थूल जगत को पराया रूप समझा जाता है, और सूक्ष्म जगत को अपना रूप समझा जाता है। जब आदमी अपने अहंकार की तरह ही स्थूल जगत को भी अपना रूप समझेगा तो उसके प्रति उसकी आसक्ति कम हो जाएगी। अपने से भला कौन आसक्ति करता है। इससे आत्मा पर उसकी कम गहरी छाया बनेगी। इससे अहंकार भी खुद ही कम हो जाएगा। अगर आदमी जगत के साथ अहंकार को भी पराया समझेगा तो वह कुंडलिनी योग साधना की तरफ झुकेगा और उसकी मदद से अपनी शुद्ध आत्मा से चिपकी पराई और गंदी चीज को बाहर निकालना चाहेगा।

आम आदमी को अपनी शुद्ध आत्मा का पता ही नहीं होता। इसलिए वह अहंकार को ही अपनी आत्मा समझे रखता है। पर कुंडलिनी जागरण से आदमी को अपनी शुद्ध आत्मा का अनुभव होता है। बेशक कुंडलिनी जागरण का अनुभव और उससे जुड़ा आत्मा का अनुभव कुछ ही क्षणों के लिए होता है। इससे अहंकार स्पष्ट रूप से पराया और अज्ञान की वजह से शुद्ध आत्मा से चिपका हुआ सा नजर आने लगता है। यह अज्ञान आत्मा का अज्ञान ही है, जिसे शास्त्रों में ज्ञान से मतलब आत्मा के ज्ञान से खत्म करने की सलाह हर जगह दी गई है। मतलब परोक्ष रूप से कुंडलिनी जागरण की सलाह दी गई है, क्योंकि उसी से आत्मा का ज्ञान अर्थात आत्मा का अनुभव होगा। आत्मा का ज्ञान कोई किताबी ज्ञान की तरह नहीं है कि पढ़ा और हो गया, जैसा कई लोग समझते हैं। बल्कि यह आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव है। वैसे भी पढ़ा तो किसी दूसरी चीज के बारे में ही जा सकता है। अपने को कोई कैसे पढ़ेगा। अपने को तो केवल प्रत्यक्ष रूप में महसूस ही किया जा सकता है। इसलिए जागृत अर्थात आत्मज्ञानी आदमी कुंडलिनी योग समेत विभिन्न प्रकार की साधनाओं से उस विषबेल रूपी अहंकार को परे हटाने का प्रयास भी करता रहता है। शायद दार्शनिक शैली में अहंकार को ही विषबेल कहा गया है, क्योंकि दोनों लिपटते हैं, और जिससे लिपटते हैं, उसे मार देते हैं। इसी तरह अहंकार को ही आकाशबेल कहा गया है। आकाशबेल मतलब ऐसी बेल जो आकाश से लिपटती है। आत्मा आकाश की तरह स्वच्छ और शून्य है। अहंकार ही इससे लिपट सकता है, अन्य तो कुछ भी आकाश से नहीं चिपक सकता। यह भी आश्चर्य ही है कि अहंकार शून्य आकाश को भी नहीं छोड़ता।

मतलब साफ है कि कुंडली जागरण कोई स्थाई उपलब्धि नहीं है। पर इसका महत्त्व इसी में है कि यह आदमी को योग की तरफ प्रेरित करता रहता है। हां, सबको तो कुंडली जागरण मिलता नहीं है। इसीलिए जागृत व्यक्ति की संगत करने को कहा जाता है। जैसे स्वर्ण का जानकार पूरी दुनिया को स्वर्ण की पहचान बताता है। उसी तरह एक जागृत व्यक्ति ही पूरे समाज को आत्मा और अहंकार की सही पहचान बता सकता है। इसीलिए शास्त्रों में कुंडलिनी जागरण को बहुत महत्व दिया गया है। आजकल के सत्संगों आदि में बेशक मुख्य प्रवचक आदि लोग जागृत नहीं होते, पर वे शास्त्रों में लिखे जागृत लोगों के वचनों की पुनरावृत्ति करते हैं। इससे भी काम चल पड़ता है। इसीलिए व्यास या कथावाचक को भी बहुत महत्त्व व सम्मान दिया जाता है। बेशक वे जागृत नहीं होते पर जागृत लोगों के वचनों को अपनी दार्शनिक चतुराई और वाकपटुता से श्रोता गणों को अच्छे से समझाते हैं। हम भी इस वेबसाइट पर लगभग यही करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि हम शास्त्रों के ही आध्यात्मिक तथ्यों को आधुनिक, वैज्ञानिक और तार्किक रूप में समझने की और दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश करते रहते हैं।

कुंडलिनी के लिए किए गए प्रयास के प्रति भी अहंकार के नष्ट होने से ही कुंडलिनी जागरण होता है

मनरूपी आँख को ही तीसरी आँख कहते हैं

जब हमें नींद आ रही हो लेटे-लेटे और उस समय हम खड़े हो जाएं तो एकदम नींद भाग जाती है। दरअसल खड़े होने से व तनिक हिलने-डुलने से पीठ से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। मैं पिछ्ली पोस्ट में कुंडलिनी से पैदा हुई अति संवेदनशीलता के कारण अजीबोगरीब घटनाओं की संभावनाओं के बारे में बात कर रहा था।जब कुंडलिनी मस्तिष्क में क्रियाशील या जागृत होती है, तब मस्तिष्क की संवेदनशीलता बहुत बढ़ जाती है। इंद्रियों के सारे अनुभव तीव्र महसूस होते हैं। उदाहरण के लिए, खाने में स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। सुगन्धि भी कई गुना मजबूत महसूस होती है। वास्तव में जिस प्राण ऊर्जा से इन्द्रियातीत कुंडलिनी उजागर हो सकती है, उससे अन्य इन्द्रियातीत अनुभव भी प्रकट हो सकते हैं, जैसे कि उड़ने का अनुभव, पानी पर चलने का अनुभव। इन्हें ही योगसिद्धियाँ कहते हैं। दरअसल ये अनुभव शरीर से नहीं, केवल मन से होते हैं। यह ऐसे ही होता है, जैसे कुंडलिनी के दर्शन आँखों से नहीं, बल्कि मन से होते हैं। इसी जागृत मन को ही तीसरी आँख का खुलना कहा गया है। क्योंकि मन से ही सारा संसार है, इसीलिए प्राचीन योग पुस्तकों में ऐसे मानसिक अनुभवों को शारीरिक अनुभवों की तरह लिखा गया है, ताकि आम आदमी को समझने में आसानी हो। पर अधिकांश लोग इन्हें शारीरिक या असल के भौतिक अनुभव समझने लगते हैं। समर्पित कुंडलिनी योगी अधिकांशतः कुंडलिनी से ही जीवन का महान आनन्द प्राप्त करता रहता है। वह जीवन के आनंद के लिए भौतिक वस्तुओं के अधीन नहीं रहता। इसलिए स्वाभाविक है कि यदि किन्हीं सांसारिक क्लेशों से उसकी कुंडलिनी क्षतिग्रस्त या कमजोर हो जाए, तो वह अवसाद रूपी अंधेरे से घिर जाएगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उसे आनन्द प्राप्ति का दुनियादारी वाला तरीका एकदम से समझ नहीं आएगा, और न ही रास आएगा। इसीलिए कहते हैं कि मध्यमार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है, क्योंकि इसमें अध्यात्म और दुनियादारी साथ-साथ चलते हैं, ताकि किसी की भी कमी से हानि न उठानी पड़े।

सीडेंटरी लाइफस्टाइल भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों का दुश्मन है

योग करते समय अद्वैत चिंतन ज्यादा सफल होता है, क्योंकि अद्वैत का  सदप्रभाव कुंडलिनी के माध्यम से ही प्राप्त होता है। योग करते समय सभी नाड़ियाँ मुख्यतः सुषुम्ना नाड़ी और चक्र खुले हुए रहते हैं। इससे अद्वैत से उजागर होती हुई कुंडलिनी आसानी से उपयुक्त चक्र पर काबिज हो जाती है। यदि मानसिक ऊर्जा का स्तर कम हो, तो कुंडलिनी नीचे के चक्रों पर काबिज होती है, और अगर मानसिक ऊर्जा अधिक हो, तो कुंडलिनी ऊपर के चक्रों की तरफ भागती है। इसी तरह अन्य किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रियाशीलता के समय अद्वैत का ध्यान करने से भी इसी वजह से ज्यादा कुंडलिनी लाभ मिलता है। सुस्ती और शिथिलता के मौकों पर नाड़ियाँ और चक्र सोए जैसे रहते हैं, जिससे उनमें कुंडलिनी आसानी से संचरण नहीं कर सकती। इसी वजह से आदमी के बीमार पड़ने का डर भी बना रहता है। इसी वजह से सीडेंटरी लाइफस्टाइल वाले लोग न तो भौतिक रूप से और न ही आध्यात्मिक रूप से समृद्ध होते हैं।

सद्प्रयास कभी विफल नहीं होता

जितने भी विश्वप्रसिद्ध, कलाकार व समृद्ध व्यक्ति हैं, उनसे मुझे अपना गहरा रिश्ता महसूस होता है। वे मुझे अपने बचपन के दोस्तों व परिजनों के जैसे महसूस होते हैं। हो सकता है कि मैं पिछले जन्म में सम्भवतः उन्हीं की तरह भौतिक तरक्की के चरम तक पहुंच गया था। फिर मुझे कुंडलिनी जागरण की इच्छा महसूस हुई होगी और मैंने उसके लिए प्रयत्न भी किया होगा, पर मुझे सफलता न मिली होगी। उसीके प्रभाव से मुझे इस जन्म में पिछले जन्म के सम्पन्न, जगत्प्रसिद्ध व आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के बीच में जन्म मिला होगा। क्षणिक कुंडलिनी जागरण की अनुभूति भी उसी के प्रभाव से मिली होगी। मेरे संपर्क के दायरे में आने वाले व्यक्ति भी पिछले जन्म के महान लोग रहे होंगे, और उन्हें कुंडलिनी का भी कुछ न कुछ साथ जरूर मिला होगा। उसी कुंडलिनी प्रभाव से वे मेरे संपर्क के दायरे में आए होंगे। इसका मतलब है कि सद्प्रयास कभी विफल नहीं जाता। वैसे भी स्वाभाविक रूप से कुंडलिनी जागरण की इच्छा भौतिकता का चरम छू लेने पर ही होती है। मनोवैज्ञानिक रूप से ऐसा भी हो सकता है कि कुंडलिनी जागरण की शक्ति से ही मुझे शक्तिशाली व्यक्तियों व वस्तुओं से अपनापन लगता हो, क्योंकि सभी शक्तियों का खजाना कुंडलिनी जागरण ही तो है।

प्रयास के बिना या अपने आप कुछ भी प्राप्त नहीं होता

रहस्यमय दृष्टिकोण ने मनुष्य को लापरवाह बना दिया है। इससे वह चमत्कार होने की प्रतीक्षा करता है। यह ब्लॉग इस रहस्यवाद को तोड़ रहा है। कुंडलिनी जागरण सहित सब कुछ वैज्ञानिक है और इसके लिए भी भौतिक चीजों की तरह लंबे समय तक एक निरंतर तार्किक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। इस ब्लॉग व वेबसाइट में किताबों सहित मेरी तथाकथित स्वतःस्फूर्त जागृति की घटना के बारे में पढ़ने के लिए सब कुछ है। मुख्य रूप से, किताब लव स्टोरी ऑफ ए योगी, फिर कुंडलिनी विज्ञान~ एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान, भाग १ और २। इसके अलावा, इस ब्लॉग का अनुसरण करने से हर हफ्ते ताज़ा सामग्री भी मिलेगी। मेरे बारे में कई लोग सोचते हैं कि मुझे अपनेआप या बिना किसी प्रयास के उच्च आध्यात्मिक अनुभव हुए। काफी हद तक बात भी सही है, क्योंकि मैंने इनके लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए। मुझे अनुकूल परिस्थितियां मिलती गईं, और सब कुछ खुद से होता रहा। पर मेरे पूर्वजों की जो मेहनत इसमें छुपी हुई है, वह किसी को नहीं दिखाई देती। कम से कम मेरी तीन पीढ़ियों से मेरे परिवार में आध्यात्मिकता और उच्च कोटि के आदर्शवाद का बोलबाला था। इस वजह से समाज में दूर-दूर तक मेरे परिवार का नाम और मान-सम्मान होता था। मेरी दो पीढ़ियों से मेरा परिवार ब्राह्मण पुरोहिताई का काम करता आ रहा है। इस काम में वैदिक कर्मकांड किया जाता है। वैदिक कर्मकांड दरअसल कुंडलिनी योग का प्रथम अध्याय ही है, क्योंकि यह आदमी का कुंडलिनी से परिचय करवाता है, और उसे आसान व दुनियादारी वाले तरीक़े से मन में मजबूती प्रदान करता है। ऐसे आध्यात्मिक परिवार की संगति से ही मेरे मन में कुंडलिनी ने अनायास ही अपना पक्का डेरा जमाया। इसका मतलब है कि मेरे परिवार की सैकड़ों सालों की मेहनत का फल मेरे अंदर प्रकट हुआ। मुझे अपनेआप कुछ नहीं मिला। अपनेआप कुछ नहीं मिलता। यदि हम आध्यात्मिकता के रास्ते पर चलते रहेंगे, तो हमारे बच्चों, पौत्रों, प्रपौत्रों आदि को उसका फल मिलेगा। उन्हें अपनेआप कुछ नहीं मिलेगा। इसका मतलब है कि कुंडलिनी के लिए किया गया प्रयास कभी विफल नहीं होता। यदि प्रयास करने वाले को एकदम से फल मिलता न दिखे, तो समाज व दुनिया को अवश्य मिलता है। कालांतर में प्रयास करने वाले को भी फल मिल ही जाता है।

जागरण के लिए ध्यान या योग करने का अहंकार भी त्याग देना चाहिए

कुंडलिनी जागरण एक दुर्लभ घटना है। इसके लिए शायद ही कभी जोरदार प्रयास की आवश्यकता होती है। हां, जबरदस्त प्रयासों से मानसिक और शारीरिक रूप से इसके लिए तैयार हुआ जा सकता है। बलपूर्वक प्रयास मनुष्य में उपलब्ध प्राण ऊर्जा के स्तर पर होना चाहिए अन्यथा अत्यधिक बलपूर्वक प्रयास शरीर और मन को नुकसान पहुंचा सकता है। मैंने ऐसी ही संतुलित कोशिश की थी। मैं 15 वर्षों तक दुनिया के साथ बहता रहा, हालांकि मेरे अपने स्वयं के अनूठे दर्शन के माध्यम से मेरा हमेशा अद्वैतवादी रवैया बना रहता था। फिर मैंने प्राण शक्ति की अधिकता होने पर एक वर्ष तक बलपूर्वक हठयोग और फिर अगले एक मास तक तांत्रिक योग किया। फिर मैंने अपना यह अहंकार भी त्याग दिया, और मैं फिर से संसार के साथ बहने लगा। योग यथावत चलता रहा। योग आदि करने के इस अहंकार के त्यागने से ही मुझे अंततः कुण्डलिनी जागरण की सहजता से एक झलक मिली। फिर भी कोई बड़ा तीर नहीं चला लिया, क्योंकि जागृति से कहीं ज्यादा महत्त्व तो जागृत जीवनचर्या का ही है। संक्षेप में कहूँ तो केवल झलक इसलिए, क्योंकि मेरा उद्देश्य कोई ज्ञानप्राप्ति नहीं था, बल्कि मैं कुंडलिनी जागरण को वैज्ञानिक रूप में अनुभव करना चाहता था, और लोगों को बताकर उन्हें गुमराही से बचाना चाहता था। आखिर इच्छा पूरी हो ही जाती है। इसका मतलब है कि जागरण के लिए ध्यान या योग या अन्य पुण्य कर्म करने का अहंकार भी त्याग देना चाहिए। यह शास्त्रों में एक प्रसिद्ध उपदेशात्मक वाक्य द्वारा बताया गया है कि सतोगुण से आध्यात्मिकता बढ़ती है और उस सतोगुण के प्रति भी अहंकार को नष्ट करने से ही जागृति प्राप्त होती है। सतोगुण का मतलब है, योगसाधना के प्रभाव से मन व शरीर में प्रकाशमान दैवीय गुणों का प्रकट होना। इससे पहले मैं भी इस उपदेश के रहस्य को नहीं समझता था, परन्तु अब ही मुझे इसका मतलब स्पष्ट, व्यावहारिक व अनुभवात्मक रूप से समझ आया है। मुझे जागृति काल के दौरान न तो यह और न ही वह भावना या इमोशन, किसी विशेष रूप में अनुभव हुई। कोई विशेष संवेदना भी महसूस नहीं हुई, जैसे कि लोग अजीबोगरीब दावे करते रहते हैं। यह सब सिर्फ शक्ति का खेल ही तो है। जानबूझकर जागृति के लिए, लोग अक्सर अहंकार से भरे विभिन्न रास्ते अपनाते हैं, और इसी वजह से इसे कभी हासिल नहीं कर पाते हैं। कुछ अन्य लोग शांत रहते हैं, और सामान्य दुनियावी नदी के बीच बहते रहते हैं, हालांकि अपने अहंकार को मिटा कर रखते हैं। वे इसे विशेष व जानबूझकर किए जाने वाले प्रयास के बिना भी प्राप्त कर लेते हैं। कई दोनों के संतुलन वाला मध्यमार्ग अपनाते हैं, जिससे सबसे जल्दी सफलता मिलती है। मेरे साथ भी सम्भवतः यही मध्यमार्ग चरितार्थ हुआ लगता है।