कुंडलिनी योग में बीजमंत्रों का महत्त्व

दोस्तों, हरेक चक्र के साथ एक बीजमंत्र जुड़ा होता है। सहस्रार चक्र के साथ ॐ आज्ञा चक्र के साथ ओम या शं, विशुद्धि चक्र के साथ हं, अनाहत चक्र के साथ यं, मणिपुर चक्र के साथ रं, स्वाधिष्ठान चक्र के साथ वं, और मूलाधार चक्र के साथ लं जुड़ा होता है। इस लेख में हम उनसे जुड़ा विज्ञान समझने की कोशिश करेंगे। बीजमंत्र के ऊपर जो बिंदी होती है, वह चक्र रूप होती है। इससे ध्यान ज्यादा पिनपोइंट मतलब ज्यादा केंद्रित और प्रभावी हो जाता है। बीजमंत्र के दृश्यात्मक रूप आकार का ध्यान चक्र पर करने से और उसकी आवाज मन में बोलने से ऊपर का प्राण और नीचे का अपान उस बीजमंत्र पर पहुंच कर इकट्ठे हो जाते हैं। यह अच्छी वैज्ञानिक तकनीक है पूरे शरीर की शक्ति को एक बिंदु पर केंद्रित करने की। चक्र पर कईयों को सीधा ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत आती है। उनके लिए यह अच्छा विकल्प है। इससे ध्यानचित्र भी चक्र पर ज्यादा स्पष्ट हो जाता है। मुझे तो वैसे बीजमंत्र की जरूरत नहीं पड़ी थी, क्योंकि चक्रों पर ध्यानचित्र मुझे पहले से ही स्पष्ट अनुभव होता था। लगता है कि उसी ने मेरे लिए बीजमंत्र का काम किया। उसी से मैं चक्रों को शक्ति दे पाया। अब जाकर मैं बीजमंत्राें की उपयोगिता समझ पाया हूं। पहले तो मैं इन्हें हल्के में लेता था। जिनका ध्यानचित्र अभी विकसित नहीं हुआ है, उनके लिए बीजमंत्र बहुत अहम हैं, क्योंकि ये ध्यानचित्र को विकसित करते हैं। बीजमंत्र के शीर्ष पर जो बिंदु होता है, उसे चक्र के सबसे संवेदनात्मक स्थान पर संलग्न करो, और उसके साथ बीजमंत्र का शेष भाग जिस मर्जी आड़े तिरछे, सीधे, उल्टे, यहां तक कि बिंदु के चारों ओर घुमाते हुए जोड़कर पूरा बीजमंत्र बनने दो और मन में उसका उच्चारण करो तो एकदम से फायदा महसूस होता है। उदाहरण के लिए नाभि के छेद को रं बीजमंत्र का बिंदु बना दो। हं गले के चक्र से इसलिए जुड़ा है क्योंकि शायद यह अहंकार का प्रतीक है, और गले से ही मैं मैं मतलब अहम अहम की आवाज निकलती है। ॐ अक्षर सहस्रार व आज्ञा चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि तीनों में ही अद्वैत का भाव है। शं बीजमंत्र आज्ञा चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि संस्कृत में इसका मतलब शांति है, और दिमाग के भटकाव, थकान या अशांति का प्रभाव आज्ञा चक्र पर ज्यादा पड़ता है, क्योंकि यह बुद्धि और दिमाग के सांसारिक कार्यों से जुड़ा है। सहस्रार तो पहले ही पारलौकिक चक्र है, इसलिए उसमें अशांति का मतलब ही नहीं है। दिमाग के ये दो ही मुख्य चक्र हैं। यं हृदय चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि दया भाव हृदय में रहता है, और दोनों में य अक्षर है। रं नाभि को इसलिए दिया गया होगा क्योंकि पेट में भोजन जलता है, और जलाने को राड़ना भी कहते कहते हैं। ब बं बं बं बं लहरी की मंत्र तो शिव को प्रसन्न करने वाला प्रमुख मंत्र है। शायद यह स्वाधिष्ठान चक्र का बीजमंत्र वं ही है। लं मूलाधार को इसलिए दिया गया होगा क्योंकि ल अक्षर में कामभाव है। बीजमंत्र के ऊपर स्थित बिंदु के दो फायदे हैं। एक तो उससे ॐ जैसी अद्वैतबोधक ध्वनि मिलती है, और दूसरा इससे संवेदनात्मक चक्रबिंदु पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है। वैसे तो विभिन्न चक्रों के साथ विभिन्न रंगों और पंखुड़ियों के कमल भी जुड़े होते हैं। रंगों से ध्यानचित्र का रिसोलयुशन अर्थात स्पष्टता बढ़ती है। पंखुड़ियों से चक्रों के शरीर से संपर्क माने कनेक्शन का पता चलता है। इससे शरीर से चक्र तक पर्याप्त प्राणशक्ति पहुंचती है। जैसे कि आज्ञा चक्र पर दो पंखुड़ियों का मतलब दोनों भौहों की तरफ से दो नाड़ियां हैं। ये इड़ा और पिंगला ही हैं जो आज्ञा चक्र तक शक्ति लाती हैं। इसी तरह हृदय चक्र का षट्कोण यहां चारों तरफ से शक्ति लाता है। आसमानी नीला रंग गले के चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि आवाज आसमान में ही चलती है। हरा रंग हृदय चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि यह शांति, दया, हरियाली, वृद्धि व विकास का प्रतीक है। पीला रंग नाभि चक्र को इसलिए दिया गया है क्योंकि पेट में खाना जल कर पीला पड़ जाता है, जैसे पेड़ के पत्ते ज्यादा धूप से पीले पड़ जाते हैं। हल्दी भी पीली होती है और लड्डू भी। स्वाधिष्ठान चक्र पर संतरी रंग से ज्यादा ध्यान लगता है। कामभाव खट्टे स्वाद से जुड़ा है और संतरा भी खट्टा मीठा होता है। मूलाधार चक्र को लाल रंग इसलिए दिया गया है क्योंकि अज्ञानता के अंधेरे में हिंसा आदि के साथ ही लाल रक्त जुड़ा है आदि आदि। सहस्रार चक्र पर बैंगनी रंग से अच्छा ध्यान लगता है। इसी तरह आज्ञा चक्र पर गहरे नीले या काले रंग से अच्छा ध्यान लगता है। वैसे रंगों का और कमल के फूल का अभ्यास थोड़ा मुश्किल होता है, पर लगता है कि इससे फायदा भी उतना ही ज्यादा मिलता है। सिर्फ रंग या रंगदार घेरे का ध्यान भी किया जा सकता है। वं के बिंदु को एक संतरा माना जा सकता है। इसी तरह मूलाधार चक्र के संवेदनात्मक बिंदु मतलब लं के बिंदु को टमाटर माना जा सकता है। नाभि छिद्र को रं का बिंदु और एक पीला लड्डू माना जा सकता है। हृदय चक्र पर जो हरा षट्कोण है, उसे यं का बिंदु समझा जा सकता है। सहस्रार के कमल या किसी भी फूल के केंद्रीय सघन गोले को ॐ का बिंदु माना जा सकता है। चारों तरफ इसके पंखुड़ियां होती हैं। कमल का फूल इसलिए लिया गया है क्योंकि कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे निर्लिप्त रहता है, और शायद इसके ध्यान से आदमी भी दुनिया में निर्लिप्त रहना सीख जाए। फूल के केंद्रीय गोले का आकार भी ऐसा ही होता है, जैसे ॐ के ऊपर एक तिरछी ब्रेकेट होती है। बिंदु को उस गोले के अंदर उस फूल का बीज समझा जा सकता है। कुछ भी निर्धारित नियम नहीं है। जैसा आसान व प्रभावी लगे, उस तरीके से ध्यान कर सकते हैं। इसी तरह आज्ञा चक्र और विशुद्धि चक्र के फूल को भी क्रमशः ओम और हं अक्षर का भाग माना जा सकता है। जो बीजमंत्र ध्यान में आए, उसी का ध्यान करते रहना चाहिए, वह खुद अपनी जगह पर बैठ जाता है। सभी चक्र आपस में जुड़े होते हैं। यदि गले पर हं का ही ध्यान हो रहा है, तो कोई बात नहीं, यह जब ऊर्जा खींचेगा, तो बीच वाले अनाहत, मणिपुर आदि चक्र खुद ऊर्जा प्राप्त करेंगे क्योंकि वे बीच के रास्ते में ही पड़ते हैं। इससे उन चक्रों के यं, रं आदि बीजमंत्र खुद ही ध्यान में आ जाते हैं। जब ऊर्जा की जंजीर घूमती है तो सभी चक्रों की मालिश खुद ही हो जाती है। एक चक्र को बल देने से सभी चक्रों को खुद ही बल मिलता है। यह ऐसे ही है जैसे चंडोल अर्थात मैरी गो राउंड के इसी एक बॉक्स सीट को धक्का देने से सभी बॉक्स सीटों को गति मिलती है। अभ्यास होने पर सिर से पैर तक सभी चक्रों पर उनके बीजमंत्रों का माला के मनके की तरह ध्यान किया जा सकता है। शायद यही असली माला है और भौतिक माला भी इसीको क्रियाशील करती है।