आदि तंत्रयोगी शिव को उनके पावन शिवरात्रि महोत्सव के अवसर पर कोटि कोटि नमन, वे सब पर कृपा बनाए रखें।
एक साधारण लेकिन गहरा सवाल मेरे मन में उठा – जब हमें पैर में दर्द होता है, तो हमें यह पैर में ही क्यों महसूस होता है, जबकि दर्द का सारा संकेत मस्तिष्क में जाता है?
अगर मस्तिष्क ही अनुभव का केंद्र होता, तो दर्द वहीं महसूस होना चाहिए था, न कि पैर में। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसका मतलब यह हुआ कि कोई सूक्ष्म ताकत शरीर और चेतना को जोड़ रही है, जो अनुभव को उसी जगह महसूस कराती है जहां वह होता है। यही अदृश्य कड़ी प्राण है।
प्राण: केवल ऊर्जा नहीं, यह चेतना को स्थान देता है
अगर प्राण सिर्फ सांस या जीवन-शक्ति होता, तो यह नहीं समझा पाते कि अलग-अलग भावनाएँ शरीर के अलग-अलग हिस्सों में क्यों महसूस होती हैं। प्रेम हृदय में महसूस होता है, डर पेट में, और काम ऊर्जा निचले अंगों में। प्राण एक ऐसा जाल है जो चेतना को अभौतिक पर अनुभवात्मक नाड़ियों के माध्यम से शरीर के विभिन्न हिस्सों से जोड़ता है, जिससे हर अनुभव वास्तविक और विशिष्ट स्थान पर होता है।
यह समझ मुझे प्राण के प्रति एक नई दृष्टि देता है—यह केवल ऊर्जा का प्रवाह नहीं है, बल्कि स्वयं अनुभव का प्रवाह है।
तंत्र योग: अनुभव को शरीर से मन तक पहुँचाना
यही सिद्धांत मेरे तंत्र योग अभ्यास से भी जुड़ता है। तंत्र में काम ऊर्जा को दबाया नहीं जाता, बल्कि ऊपर उठाया जाता है। सामान्यतः, सुख का अनुभव निचले हिस्सों में होता है क्योंकि वहाँ प्राण केंद्रित होता है। लेकिन कुछ विशेष विधियों से इस ऊर्जा को मस्तिष्क तक ले जाया जा सकता है।
जब प्राण ऊपर उठता है, तो चेतना का अनुभव भी स्थान बदल लेता है।
- जो सुख पहले केवल इंद्रियों तक सीमित था, वह स्थिर आनंद, स्पष्टता और ध्यान में बदल जाता है।
- बाहरी उत्तेजना आंतरिक प्रकाश में बदल जाती है।
मैंने इस बदलाव को अनुभव किया है, लेकिन अभी इसे पूरी तरह स्थिर नहीं कर पाया हूँ। प्रक्रिया स्पष्ट है, लेकिन सच्ची सिद्धि—जहाँ प्राण सहज रूप से ऊर्ध्वगमन करे—अभी बाकी है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव: क्या यह अभ्यास नुकसानदायक हो सकता है?
ऊर्जा को ऊपर उठाने से मानसिक स्पष्टता और गहरा ध्यान आता है, लेकिन यदि इसे जबरदस्ती किया जाए, तो यह असंतुलन भी ला सकता है। कुछ संभावित समस्याएँ हो सकती हैं:
- सिर में भारीपन या मानसिक थकान: यदि प्राण को बिना संतुलन के मस्तिष्क में रोका जाए, तो यह असहजता या दुनिया से कटाव पैदा कर सकता है।
- दुनियावी कार्यों में रुचि कम होना: यदि प्राण अचानक ऊर्ध्वगमन कर जाए, तो सांसारिक चीज़ों में दिलचस्पी कम हो सकती है।
- शारीरिक असंतुलन: बिना सही संतुलन के ऊर्ध्वगमन से तंत्रिका तंत्र, पाचन या यौन ऊर्जा से जुड़ी समस्याएँ हो सकती हैं।
संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है
मैंने सीखा है कि प्राण को खींचना नहीं, उसे सहजता से बहने देना ही सही तरीका है। जब यह स्वाभाविक रूप से होता है, तो संतुलित विकास होता है, बिना किसी परेशानी के। मैं ज़रूरत पड़ने पर खुद को ग्राउंड करने की तकनीक अपनाता हूँ, ताकि ऊँचाई और स्थिरता दोनों बनी रहें।
आध्यात्मिक यात्रा और मेरी सीख
इस पूरी प्रक्रिया से मेरे सामने कुछ गहरे सत्य खुले:
- प्राण सिर्फ जीवन को बनाए नहीं रखता, यह चेतना को भी दिशा देता है।
- जहाँ प्राण बहता है, वहाँ अनुभव बनता है।
- यदि हम प्राण को नियंत्रित कर सकते हैं, तो हम केवल ऊर्जा ही नहीं, बल्कि अपने पूरे अनुभव को नियंत्रित कर सकते हैं।
मैं इस बदलाव की झलक देख चुका हूँ, लेकिन अभी इस साधना को और परिपक्व बनाना बाकी है। मेरा लक्ष्य इसे सहज और स्वाभाविक बनाना है—कोई अस्थायी अनुभव नहीं, बल्कि ऐसा स्थायी संतुलन जो आध्यात्मिक उन्नति और सांसारिक जीवन दोनों को बनाए रखे।