मित्रो, गुलामी में प्यार और सहयोग का माहौल नहीं होता, इसीलिए गुलामी को सबसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। सुख सुविधाओं वाली गुलामी एक सोने के पिंजरे की तरह लगती है मुझे। शायद इसीलिए इतिहास आजादी के लिए संघर्ष की गाथाओं से भरा पड़ा है। असली और टिकाऊ विकास वही लगता है मुझे, जो परस्पर प्रेमभाव, सहयोग और स्वतंत्रता के साथ हो। आज के युग में मानव प्रबंधन दक्षता मुझे इसी में लगती है कि मानवीय स्वतंत्रता और मानवीय विकास में संतुलन कैसे रखा जाए। स्वतंत्रता के साथ मानवीय शब्द मैने इसलिए जोड़ा क्योंकि स्वतंत्रता भी असीमित नहीं हो सकती। इसे मानवता अर्थात योग के दायरे में रहना ही पड़ेगा। आजादी अगर घृणा, लूटपाट, हिंसा, बलात्कार, धार्मिक और जातीय भेदभाव, और जेहाद जैसे कुकृत्यों के लिए मांगी जाए तो उससे अच्छी वह गुलामी है जिसमें मानवता पनपती और फलती फूलती हो। ऐसी आजादी तो काल्पनिक या आभासी है, और वास्तव में गुलामी से भी बड़ी गुलामी है, क्योंकि ऐसे कुकृत्य आदमी को जन्म मरण के बंधन रूपी परम गुलामी की तरफ ले जाते हैं। आपको पता ही होगा कि ऐसी आजादी कहां कहां मांगी जाती है। हम विस्तार में जाकर वेबसाइट के मूल विषय से भटकना नहीं चाहते और न ही अपने ऊपर पक्षपाती होने का झूठा ठप्पा लगवाना चाहते हैं। इशारों में कहें तो बांग्लादेश को ही देख लो। वहां के बहुसंख्यक लोगों ने कैसे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने के लिए ही शेख हसीना सरकार से आजादी पाई है, यह सबके सामने है। इसी तरह विकास भी मानवता की हद में ही रहना चाहिए। प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं विकास के द्वारा मानवता को लांघने से ही पैदा हो रही हैं।
मुझे लगता है कि प्रेमभाव स्वतंत्रता की कमी का पूरक है। एक पशु प्रेमभाव से बंधा होने के कारण ही प्रतिदिन अपने खूंटे के पास पहुंच जाता है। अगर उसे मालिक के मन में प्रेमभाव न महसूस हुआ करता तो वह प्रतिदिन खूंटे का विरोध किया करता और हर समय मुक्त होकर जंगल में भागने की फिराक में रहता। पशु गहराई में छिपा प्रेमभाव भी समझ जाते हैं। अगर उन्हें मारो भी, तो भी वे उसके आधार में छिपे प्रेम को समझ जाते हैं। प्रेम का यही कमाल है कि वह औरों से अपनी गुलामी को बिना किसी जोर जबरदस्ती से करवा लेता है। मीरा और गोपियां कृष्ण के प्रेम में गुलाम थीं, तो रतनो देवी बाबा बालक नाथ के प्रति मातृभाव की गुलाम थी। मेरे बुजुर्गों के समय मेरे घर में तथाकथित निम्न वर्ग के श्रमिक, गुलामी जैसी करते हुए दिखते थे। वे सुबह दरवाजे के नजदीक पहुंचते ही दरवाजे की दहलीज का और परिवारजनों का हंसमुख होके प्रेमभाव से अभिवादन करते और मेरे बुजुर्ग भी प्रेमभाव से उसका उत्तर देते। वे अलग बर्तन गिलास आदि का प्रयोग करके उन्हें धोकर यथास्थान रखते। जिस स्वच्छ और पौष्टिक खाद्य पेय का प्रयोग स्वामी करता, उसे ही सेवक को अपने जैसा समझते हुए उपलब्ध करवाया जाता। वे अपना काम पूरे श्रद्धाभाव, पूरी ईमानदारी और तत्परता से बिना लापरवाही के करते। जिस भी काम का उन्हें यथायोग्य और प्रेमयुक्त आदेश मिलता उसे प्रसन्नता और शालीनता से स्वीकार करते हुए उसे पूरा करने में जुट जाते। ऐसा नहीं था कि उनसे ऐसा जबरदस्ती करवाया जाता था। बल्कि वे उसे मालिक के द्वारा प्रदर्शित प्रेमभाव के बल से खुद ही वैसा करते थे। यही तो प्रेम का कमाल है। दअरसल प्रेमभाव से आदमी में हर प्रकार का अहंकार भाव नष्ट हो जाता है, स्वामीपन का अहंकार भाव भी। इससे उसके मातहत को यह लगता है कि वह अपना काम स्वामी के लिए नहीं बल्कि प्रेम के लिए कर रहा है। और प्रेम तो ईश्वर का रूप है ही। मतलब वह ईश्वर के लिए काम कर रहा है। इससे बड़ा कर्मयोग क्या हो सकता है, वह भी अनायास ही और हंसी खुशी के साथ भी। ऐसी प्रेममय संस्कृति हर जगह थी। बाद में इसे गलत समझा गया। इसकी तुलना अन्यान्य जगत में प्रचलित गुलामी से की गई। जातिवाद, छुआछूतवाद आदि पता नहीं किन किन शब्दों और उनसे जुड़ी कुत्सित धारणाओं से इसे कलंकित करने का प्रयास किया गया। मुझे तो लगता है कि ज्यादातर मामलों में यह नासमझी या विकृत समझ से खुद ही हुआ। जानबूझकर दुष्प्रचार करने वाले तो मुट्ठी भर लोग ही थे जिनका अपना निजी स्वार्थ विभिन्न वर्गों के बीच वैरविरोध पैदा करने के साथ जुड़ा हुआ था। जातीय भेद और रंगभेद में समानता नहीं है। जातीय व्यवस्था में निम्न जाति के बहुत से लोग भी अपनी आत्मा को परिष्कृत करके महान योगी और संत बने हैं, जिनका सम्मान उच्च जाति के संतों से भी ज्यादा किया गया है, क्योंकि उन्होंने बहुत छोटे दर्जे से शुरु करके बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इस व्यवस्था में आत्मा के रंग को अहमियत दी जाती है, शरीर के रंग को नहीं। वैसे अपवाद और विकृत धारणा जैसे हर जगह है, वैसे ही इसमें भी है। मैं सिर्फ़ मूल अवधारणा और सिद्धांत की बात कर रहा हूं। इस दुनिया में दूध का धुला कोई नहीं है। अन्य संस्कृतियों की गुलामी वाली अवधारणा हो या कुछेक धर्मों की गुलामी वाली अवधारणा हो, दोनों ही प्रेम से नहीं, बल्कि नफरत से भरी थीं, अत्याचारों से भरी थीं। एक विशेष किस्म की अवधारणा तो इससे भी खतरनाक थी, क्योंकि उसके साथ धर्म भी मिला दिया गया था। इसी वजह से इतिहास उनके द्वारा औरों के प्रति खासकर शांतिप्रिय धर्मों के प्रति द्वेष से भरा पड़ा है। हम यह नहीं बोल रहे कि ऐसा हमेशा हुआ ही होगा, पर कर्मों का बीज अवधारणा में ही होता है। मतलब अगर अवधारणा गलत हो, तो उससे गलत काम भी हो ही सकते हैं। जरूरी नहीं कि वे हों ही। देखो, अपवाद तो हर जगह होते हैं। आर्यन संस्कृति में भी गुलामी विकृत अवधारणा वाली रही होगी कई मामलों में, और अन्यान्य संस्कृतियों में भी कई जगह गुलामी मानवीय अवधारणा वाली रही होगी। इसी तरह कुछ छिटपुट मामलों में विशेष धर्म भी काफिरों और अन्य विधर्मियों के प्रति नरम रुख रखते होंगे। पर अगर विस्तृत परिपेक्ष्य में देखें तो दोनों किस्म की संस्कृतियों और धर्मों में गुलामी की मूल अवधारणा एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत लगती है। कहीं पर धर्म में ही लिखित विकृत अवधारणा दर्ज है, तो कहीं यह बिना लिखित रूप के ही आम संस्कृति में या खून में विद्यमान है। हालांकि लिखित अवधारणा भी समय और अभ्यास के साथ खून में प्रविष्ट हो ही जाती है। कई धर्मों के मूल में विकृत अवधारणा नहीं है, पर उन्हें मानने वाले लोगों की संस्कृति की छलकपट से सौदेबाजी की अवधारणा उनसे मिश्रित हो गई है। ऐसा नहीं कि आर्यन संस्कृति इससे अछूती है। रामचरितमानस के एक दोहे और मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्रों के कुछ श्लोकों में और रामायण के एक श्लोक में जो विकृत अवधारणा का हवाला दिया जाता है, उसे अपवाद कहा जा सकता है। वह पूरे संस्कृत साहित्य का नगण्य सा अंश है। इसे संस्कृत साहित्य की मूल अवधारणा नहीं कहा जा सकता। इसे तो जुबान का फिसलना भी कह सकते हैं। यह उन विशेष धर्मों की तरह नहीं है जहां विकृत अवधारणा को बारंबार और जानबूझ कर और स्पष्ट रूप में लिखा गया है, ताकि वह विकृत अवधारणा मन में अच्छे से बैठ जाए। जरूर आज के सभ्य समाज में इन सबको मिटा दिया जाना चाहिए क्योंकि बेशक इनका मूल अर्थ कुछ और हो पर मूर्ख लोग तो इन्हें अक्षरशः सत्य समझेंगे। यह भी सत्य है कि हिंदू धर्म में व्यवहार में इनको अक्षरशः माने जाने के ठोस सबूत नहीं मिले हैं और आज तो अधिकांश लोग इनका खंडन और विरोध ही करते हैं। वैसे भी अन्य धर्मों की तरह हिंदू या सनातन धर्म किसी एक किताब के हिसाब से नहीं चला। ये तथाकथित धर्मशास्त्र कभी इसकी मूल पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा नहीं रहे। जहां एक अवधारणा में प्रेम की गुलामी है तो दूसरी अवधारणा में डंडे की गुलामी है। दोनों को एक तराजू से नहीं तोला जा सकता। दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। पहली किस्म की गुलामी जहां जागृति और मुक्ति की तरफ ले जाती है, वहीं दूसरी किस्म की गुलामी अज्ञान और बंधन की तरफ। योगी लोग भी प्रेम के दीवाने होते हैं, देवता के प्रेम के दीवाने, कुंडलिनी के प्रेम के दीवाने। यह प्रेम की गुलामी स्वतंत्रता से भी बड़ी है। बिना प्रेम की स्वतंत्रता के कोई मायने नहीं है। स्वतंत्रता की सफलता इसी में है कि वह प्रेम करवा सके। अगर गुलामी में ही प्रेम हो जाए तो स्वतंत्रता की क्या जरूरत है, क्योंकि स्वतंत्रता का लक्ष्य तो पहले ही प्राप्त हो चुका है। दअरसल स्वामी खुद भी देवता या कुंडलिनी के प्रेम में दीवाने अर्थात ध्यानमग्न रहा करते थे, इसलिए सेवक भी उस प्रेम से कैसे अछूते रहते।
दोस्तो, ब्राह्मण वर्ग के लोग उच्च कोटि के कुंडलिनी योगी होते थे। मतलब वे कुंडलिनी की पराधीनता से महान आत्मिक सुख प्राप्त करते थे। उस सुख में हिस्सा प्राप्त करने के लिए निम्न वर्ग के लोग खुद ही ब्राह्मण वर्ग के निकट रहते हुए उनकी सेवा करने लग जाते थे। सुख ही वह जैविक चुंबक है जो सभी जीवों को अपनी तरफ खींचता है। यह खुद अपने आप होता था। यह व्यवस्था किसी ने नहीं बनाई है। तभी तो वेदों में लिखा है कि वर्ण व्यवस्था परमात्मा के द्वारा निर्मित है। हैरानी की बात यह है कि कुंडलिनी प्रदत्त आत्मिक सुख कुंडलिनी योगी ब्राह्मण को इतना नहीं मिलता था जितना उसकी सेवा करने वाले को। इत्र की खुशबू दूर से ही महसूस होती है, निकट से नहीं। शायद यह इसलिए क्योंकि अन्य वर्ग दुनियादारी वाले वर्ग थे और उनका हल्का सा आत्मिक सुख भी उनकी प्रचंड दुनियादारी से मिलकर महान आत्मिक सुख बन जाया करता था। इसका मतलब हुआ कि अन्य वर्णों के लोग ब्राह्मण से भी ज्यादा ज्ञानी बन जाया करते थे कालांतर में। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। बाल्मीकि, रविदास और विश्वामित्र आदि उदाहरण तो मुझे याद भी हैं। फिर कहते हैं कि इस व्यवस्था को जन्म से क्यों जोड़ा गया। यह भी किसी ने कर के नहीं किया बल्कि यह भी खुद ही हुआ। भारतवर्ष का महान लोकतंत्र नया नहीं है। यह हजारों वर्ष पुराना है। यहां किसी तानाशाह किस्म के आदमी का फरमान नहीं चलता था। यहां सबकुछ स्वयं ही आम जनमानस की स्वाभाविक सोच और जरूरत के हिसाब से होता था। तभी तो दुनिया के कई लोग भी हैरानी प्रकट करते हैं कि इतने बड़े देश को परमात्मा ही चला रहे हैं क्योंकि यहां स्वतंत्रता और लोकतंत्र की पराकाष्ठा है। खबरों में कुछ होता है पर जो सामने दिखता है वह कुछ और होता है। यहां धर्मप्राण भूमि है और ज्यादातर लोग योगधर्म से प्रेरित होकर खुद ही नियम कानून बना कर रखते हैं। वैसे हर जगह की तरह अपवाद यहां भी हैं।
बढ़ई के बेटे ने अपने जन्म से लेकर अपने ही बढ़ई के काम को संभाला। क्षत्रिय के बेटे ने अपने काम में ही महारत हासिल की। पंडित का बेटा पुरखों की दी गई विद्या को परिष्कृत करके उनसे भी महान पंडित बन गया। इस तरह सभी विद्याएं विकसित होती गईं। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं है। छोटापन सिर्फ़ और सिर्फ़ काम में निपुणता की कमी में है, और बड़प्पन काम की निपुणता में बढ़ौतरी में है। पुराने ज़माने के आश्चर्य देख लो। एक चट्टान को काट कर बनाए गए मंदिर जैसे मसरूर, दक्षिण के ऐसे आश्चर्यमयी मंदिर जिनको बनाने की कल्पना आज भी इतनी मशीनें होने के बावजूद भी नहीं की जा सकती। ओंकारवाट का महान मंदिर देख लो। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। आज स्नातक और यहां तक कि स्नातकोत्तर में भी अपने काम में वह व्यवहारिक और तकनीकी निपुणता नहीं आई है जो पारिवारिक अनुभव को संजोए लोगों में बिना किसी औपचारिक शिक्षा के स्वयं ही आ जाती है। अगर तो उन्हें औपचारिक शिक्षा भी मिले तब तो कहना ही क्या। पूरा विश्व इससे चिंतित है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में रोज़ नए नए परिवर्तन किए जा रहे हैं। घूम फिर कर पहुंचेंगे वे उसी पुरानी वर्णाश्रम व्यवस्था पर। बेशक उसे कोई और नाम, रूप दे दिया जाए।
दोस्तो, जिस लेख को समग्रता से न लिखकर किसी पक्ष को छोड़ दिया गया हो, वह लेखन नहीं दुष्प्रचार होता है। हमारी वैबसाइट की यह खासियत है कि यह बिना किसी भेदभाव के सभी पक्षों को प्रस्तुत करती है इसीलिए जनमानस में इतनी स्वीकार्य है। हम न किसी का समर्थन करते हैं और न विरोध, केवल यथार्थता और उसके पीछे छिपे गूढ़ सिद्धांत को प्रस्तुत करते हैं। हरेक व्यवस्था में गुण दोष होते हैं। कोई पूर्ण नहीं होती। अगर पूर्ण होती तो परिवर्तन ही क्यों होता। पर कुछ शरारती तत्व अपने स्वार्थ के लिए परिवर्तन को बंधक बनाकर अपने पक्ष में मोड़ लेते हैं। इससे सही परिवर्तन नहीं होता और मूल समस्या बनी रहती है। अगर सिर्फ़ परमात्मा की बनाई व्यवस्था ही पूर्ण होती तो आदमी का और उसके प्रयास का कोई औचित्य न रह जाता। इसलिए व्यवस्था का विकास तो होता ही रहना चाहिए पर निष्पक्ष रूप से और व्यापक वैश्विक जनहित को देखते हुए।