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आज के वैज्ञानिक दौर में केवल वही चीज़ें मूल्यवान मानी जाती हैं जो सीधे अनुभव की जा सकें। अध्यात्म भी इससे अलग नहीं होना चाहिए—यह सिर्फ़ मान्यताओं पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित होना चाहिए। यही कारण है कि झलक जागरण (Glimpse Awakening) इतना महत्वपूर्ण है। जहां अंतिम मोक्ष (Liberation) एक धुंधली और दूर की अवधारणा लगती है, वहीं ये झलकियाँ स्पष्ट प्रमाण हैं—ऐसे क्षण जब अहंकार मिट जाता है और केवल शुद्ध चेतना शेष रह जाती है।
मैंने भी ऐसे जागरण के अनुभव किए हैं—गहरे, लेकिन क्षणिक। उन पलों में “मैं” नाम की कोई पहचान नहीं बची, सिर्फ़ शुद्ध अस्तित्व शेष रहा। लेकिन ये अनुभव स्थायी नहीं थे। उन्होंने मुझे पूरी तरह बदल नहीं दिया और न ही किसी अंतिम स्थिति तक पहुँचाया। मैं यह दावा नहीं करता कि मुझे अंतिम मुक्ति प्राप्त हो गई है। बल्कि, इन अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी मनोकल्पित लक्ष्य को पाने की चाह ही सबसे बड़ी भ्रांति है।
ये झलकियाँ मेरे लिए मार्गदर्शक और दर्पण दोनों रही हैं—रास्ता दिखाने वाली भी और यह बताने वाली भी कि मैं कहाँ खड़ा हूँ। इन्होंने मेरी कमज़ोरियों को उजागर किया, जिससे मैं आध्यात्मिक भ्रमों में फँसने से बचा रहा। अनेक पंथों और उनके तथाकथित आध्यात्मिक स्कूलों के चंगुल से बचा रहा। बहुत से साधक केवल कल्पनाओं में खो जाते हैं, लेकिन झलक जागरण विश्वास के बजाय अनुभव का प्रमाण देता है।
इन अनुभवों ने मेरी जिज्ञासा को और बढ़ाया। अब मैं किसी अनदेखे “मोक्ष” की तलाश में नहीं हूँ, बल्कि उस अनुभव को स्थिर और गहरा करने में रुचि रखता हूँ, जिसे मैंने पहले ही छू लिया है। अब यह किसी अज्ञात लक्ष्य का पीछा करने के बजाय जो पहले से यहाँ है, उसे निखारने का प्रयास है।
इसे हासिल करने के लिए मैं संगठित अभ्यास और सहजता दोनों का सहारा लेता हूँ, जो भी उस समय उपयुक्त लगे। अनुशासन स्थिरता देता है, जबकि सहजता अनुभव को प्राकृतिक बनाती है। विभिन्न समुदायों से काम की चीजें भी लेता हूं और अपने हिसाब से भी अपनाता हूं। किसी स्कूल या समुदाय विशेष के बंधन में भी नहीं रहता। दोनों का संतुलन आवश्यक है, और इसका प्रभाव मैं अपनी ध्यान छवि (Meditation Image) में स्पष्ट रूप से देखता हूँ। अगर छवि धुंधली पड़ने लगे, तो कभी अनुशासन से, तो कभी सहजता से उसे संतुलित करता हूँ। यही संतुलन इसे जीवंत बनाए रखता है।
इसके अलावा, मैंने यह भी जाना कि ऊर्जा का प्रवाह स्वाभाविक होता है। यह स्वयं ऊपर-नीचे होता रहता है, इसे ज़बरदस्ती नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं है। पहले मैं इसे रोकने या दिशा देने की कोशिश करता था, लेकिन अब मैं इसे स्वाभाविक रूप से बहने देता हूँ। हां, साधना के समय तो बलपूर्वक ध्यान लगाना ही पड़ता है। मेरा ध्यान अब किसी कल्पित भविष्य पर नहीं, बल्कि जो इस क्षण में मौजूद है, उसे पूरी तरह अनुभव करने पर केंद्रित है।
इन झलकियों ने मुझे दिखा दिया है कि आध्यात्मिक पथ कोई भ्रम नहीं है। ये अंतिम मंज़िल नहीं हैं, लेकिन यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि जागरण वास्तविक है। किसी दूर के मोक्ष की प्रतीक्षा करने के बजाय, मैं अन्वेषण, परिष्करण और गहराई को प्राथमिकता देता हूँ—क्योंकि जो अभी यहाँ मौजूद है, वही सबसे प्रामाणिक सत्य है।