कुंडलिनी तंत्र धर्म-जनित मानसिक बीमारी को नियंत्रित कर सकता है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे कुंडलिनी योग मेरी मानसिक स्थिति को स्थिर व तंदुरुस्त बना के रखता था। एक मित्र बोल रहे थे कि अपंग दिमाग प्रेम आदि से स्वस्थ नहीं हो सकता। इस हिसाब से तो प्रेम से कुंडलिनी जागरण भी नहीं हो सकता। पर वह होता है। दिमागी विकृति के विभिन्न स्तर होते हैं। हम यह नहीं कहते कि सभी स्वस्थ हो जाएंगे, पर कुछ न कुछ सुधार तो सबमें होगा। यहां तक कि सभी शारीरिक रोगी खासकर जन्मजात या आनुवंशिक रोगी भी दवा से कहां ठीक होते हैं। मेरे कहने का मतलब था कि जब कुंडलिनी योग एक मानसिक बिमारी जैसा लगता है, तब मानसिक बिमारी भी तो कुंडलिनी योग जैसी बनाई जा सकती है। शायद इसीलिए अधिकांश धर्मों में मानसिक रोग को दैवीय दृष्टि से देखा जाता है। एक बात और है। जब ध्यान को बोला जाए, पर उसके लिए जरूरी ऊर्जा का प्रबंध न किया जाए, तो मानसिक रोग तो फैलेंगे ही। मैं किसी खास धर्म को पिनपोइंट नही करूंगा। पर यह सबको पता है कि ज्यादातर धर्म और अध्यात्म को अंधे जैसे होकर मानने वाले कट्टर किस्म के लोग ही इस समय मानसिक रोगी या मानसिक रोगी जैसे दिखाई देते हैं। पाकिस्तान इसका एक जीता जागता उदाहरण है, जहां एक रिपोर्ट के मुताबिक लगभग पाँच करोड़ से ज्यादा मानसिक रोगी हैं। ऐसा लगता है कि अगर किसी धर्म में पर्याप्त अतिरिक्त ऊर्जा है, तो सही तरीके से ध्यान नहीं है, या फिर ध्यान है ही नहीं। केवल कुंडलिनी तंत्र ही मुझे इसमें अपवाद लगता है, क्योंकि यह ध्यान के लिए भी बोलता है, और उसके लिए जरूरी अतिरिक्त ऊर्जा का प्रबंध भी करता है। सही तरीके से ध्यान और ऊर्जा की कमी से धर्म या अध्यात्म कुछ से कुछ बन जाता है, बिल्कुल उल्टा हो जाता है, अपने असली मूलरूप में रहता ही नहीं है। एकहोर्ट टाले को अवसाद के शिखर पर ही जागरण की अनुभूति मिली। मतलब वे मानसिक रोगी नहीं थे बल्कि कुदरती कुंडलिनी साधना के दौर से गुजर रहे थे, जिसे उन्होंने और दुनिया के लोगों ने गलती से अवसाद समझा हुआ था, इसीलिए वे उसे ढंग से नहीं संभाल पा रहे थे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। एक दिमागी अपंग आदमी हमारे कार्यालय में अपने पैर के जूतों को अपने सिर पर रखकर दौड़ता हुआ अक्सर आता था। उसके साथ प्रसन्नता और हंसीमजाक के साथ हाथ मिलाना पड़ता था, या फिर उसे एक रुपया देना पड़ता था। न मिले तो साबुन का छोटा सा टुकड़ा उठाकर वैसे ही भाग जाता था। एकबार हमारे सामने उसने एक अजनबी को जोर का तमाचा जड़ा था, जिससे वह पूरा हिल गया था। मुझे लगा कि वह मुझसे नाराज़ था पर मेरी तांत्रिक शक्ति से डरकर उसने मेरा गुस्सा उसपर उतार दिया। आजतक मैं उसके चेहरे पर उस घटना का पछतावा देखता हूं। यह प्यार ही है जो उसे लाइन पर रख रहा था। इसी तरह एक हल्के स्तर का अविवाहित व दिव्यांग व्यक्ति मेरी कुंडलिनी योगशक्ति से प्रभावित होकर मेरे लिए बहुत से काम लगभग बिना मेहनताने के करता था, पर मैं उसके परिवार वालों को उसके नाम पर पैसे दे देता था। ऐसा क्यों न समझा जाए कि अल्जाइमर जैसे मानसिक रोगों में मस्तिष्क के मुख्य पुर्जों के खराब होने से जो अतिरिक्त नाड़ी रसायन अर्थात न्यूरोकैमिकल्स जमा हो जाते हैं, वे हैलुसिनेशन के रूप में असली लगने वाला काल्पनिक चित्र बनाते हैं। इसी तरह योग द्वारा मन पर लगाम लगने से भी ऐसा ही होता होगा, तभी तो स्थायी समाधि चित्र बनता है। पर पहली स्थिति में यह समाधि जैसा मानसिक चित्र अस्वस्थ, अनियंत्रित और जागरण के उद्देष्य से रहित है, पर दूसरी स्थिति में यह नियंत्रित व स्वस्थ ध्यानसमाधि चित्र है, जो जागृति को दिलाता है। क्या साम्यवादियों ने इसी भ्रम के कारण “धर्म की अफीम का नशा” वाक्य ईजाद किया है? शेष, इस विषय को हम मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों के लिए छोड़ते हैं, क्योंकि हम अपने मूल विषय से भटकना नहीं चाहते।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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