दोस्तो, हाल ही की पिछली एक पोस्ट में बात हो रही थी कि कैसे हसन नामक आदमी एक गाय बन गया था। दरअसल उसकी गाय उसकी पीठ पीछे तब मरी थी जब वह बाजार गया हुआ था। लोगों ने इस भय से कि कहीं वह इस गम से सदमे में न आ जाए, क्योंकि वह उससे बहुत प्यार करता था, उसे बताया कि वह कहीं भाग के चली गई और उसे ढूंढा जा रहा है। मतलब उसने अपनी गाय का मृत शरीर नहीं देखा। इसीलिए वह उसके मन में बस गई। शायद इसी वजह से बड़े बाबा को मरने के बाद भी आनंद की मुद्रा में आसन पर बैठे हुए जिंदा आदमी के रूप में ससम्मान दफनाया जाता है, ताकि उनके चेलों और भक्तों को वे अपने मन में हमेशा जीवित लगें और उनका ध्यान कर सकें। इसीलिए महापुरुषों की और अवतारों की जीवित अवस्था का ही बोलबाला बना रहता है। अवतारों की तो मृत्यु मानी ही नहीं जाती। उन्हें तो शरीर के साथ ही दिव्य लोक जाते दिखाया जाता है, जैसे राम या कृष्ण को। किसी को आज भी सूक्ष्म रूप में घूमते दिखाया जाता है जैसे परशुराम को। खैर, इस पोस्ट के विषय पर चलते हैं।
लंबी गहरी और धीमी सांसों से जी मिचलाना नौसिया उल्टी को मन करना आदि समस्याएं एकदम खत्म सी हो जाती हैं। मैंने ये फार्मूला चंडोल अर्थात मैरी गो राउंड में और बस में बैठ कर सीखा। पहले सांस रोको। टॉलरेबल लास्ट लिमिट तक जाकर ऐसी उन्नत सांसें भरें और छोड़ें उन पर ध्यान देते हुए। सांस बहुत मीठी लगेगी और संतुष्टिदायक भी। इससे कुंडलिनी चित्र भी चमकने लगेगा जिससे तमोगुणी अंधेरा दूर होगा। उस अंधेरे से उत्पन्न दोष जैसे कि भय, चिंता, पश्चाताप, मन का भटकाव व चंचलता आदि भी दूर होंगे। इसीलिए कहते हैं कि प्राणायाम से पाप नष्ट होते हैं। जब जानबूझ कर सांस रोकने से दम सा घुटता है, वह मृत्यु के समान ही है। मृत्यु तो पाप के लिए सबसे बड़ी सजा है। यह सजा मिल गई, तो बाकि क्या बची। शायद इसके पीछे यही अध्यत्मवैज्ञानिक सिद्धांत है।
वर्तमान में प्रतिष्ठित होने के लिए सांस रोकने से मदद मिलती है। वैसे भी घुमड़ते विचारों का बारीकी से अवलोकन करने के लिए सांस को धीमा और इंपरसेप्टिबल करना पड़ता है। यह ऐसे ही है जैसे किसी भयपूर्ण अवस्था में सांस रुक जैसी जाती है या अपने को छिपाने के लिए आदमी दबे पांव और सांस रोककर चलता है। सांस रोककर आदमी वर्तमान में आकर चौकस हो जाता है जिससे किसी भी विपरीत परिस्थिति से एकदम से निपट लेता है। यही सिद्धांत सांस रोककर वर्तमान की जागरूकता बढ़ाने हेतु प्रयुक्त किया जाता है। सांस रोककर किसी चीज पर ध्यान स्थिर या एकाग्र करना कुंडलिनी योग ही तो है। इससे जाहिर होता है कि कुंडलिनी योग के अभ्यास से वर्तमान में प्रतिष्ठित होने में मदद मिलती है। अभ्यास से ऐसा समय भी आता है जब खुद ही सांस रुकती है, साधारण रूप से सांस छोड़ने के बाद, मतलब बलपूर्वक नहीं। इसे केवल कुंभक कहते हैं। मतलब यह न तो पूरक कुंभक मतलब सांस भरने के बाद किया कुंभक होता है और न ही रेचक कुंभक मतलब सांस छोड़ने के बाद किया हुआ कुंभक। इससे एक सुकून सा और सांसों के तामझाम या बोझ से छुटकारा सा महसूस होता है। केवल-कुंभक के पूरा होने के साथ ही इतनी शांत और उथली सांस चलने लगती है कि वे खुद को भी महसूस नहीं होती, उसकी आवाज आनी तो दूर की बात है। संभवतः इसी अवस्था में सुषुम्ना के पूरी तरह से खुलने और उसमें शक्ति चढ़ने की दिव्य अनुभूति होती है, जैसा कि एक अमेरिकी योगी जेजे सेंपल ने लिखा है। वे भारतीय योगी श्री गोपीकृष्ण को बहुत मानते थे और उनसे मिले भी थे।
वर्तमान पर ध्यान देने से जो हल्केफुल्के जैसे विचार मन में आते हैं, वे भी वर्तमान से जुड़कर उस जैसे ही हो जाते हैं। मतलब जैसे वर्तमान की अनुभूतियां जजमेंट या निर्णय से रहित शुद्ध अनुभूति मात्र हैं, उसी तरह से मन के विचार भी शुद्ध अनुभूति मात्र रह जाते हैं, जो बंधन में नहीं डाल सकते। साथ में, जैसे मन के विचार अपने अंदर भासते हैं, उसी तरह वर्तमान का स्थूल जगत भी अंदर ही भासने लगता है, क्योंकि दोनों किस्म की अनुभूतियों की प्रकृति में कोई अंतर नहीं होता। डबल फायदा। अंदर वाला बाहर वाले की मदद करता है, और बाहर वाला अंदर वाले की। इस दोहरे फायदे से हर किस्म की अनुभूति सूक्ष्म और जजमेंट अर्थात परीक्षण-तुलना आदि से रहित बन जाती है। संगीत सुनने से भी ऐसा ही होता है, वह भी सहजता से। इसीलिए संगीत सुखद लगता है। पर संगीत के साथ आसपास की वर्तमान की घटनाओं पर भी ध्यान रहना चाहिए, सिर्फ संगीत पर ही नहीं, ताकि संगीत खत्म होने पर उसका अजीब सा अभाव महसूस न होए या उसके प्रति आसक्ति ही न पैदा हो जाए।
एखार्ट टोले की संस्था इसी वर्तमान की जागरूकता पर लिखते हैं और उसी को मुक्ति का एकमात्र सरलतम द्वार मानते हैं। इसके व्यापार का तरीका भी बहुत अच्छा, मनोवैज्ञानिक और यूजर फ्रैंडली है। एक साल तक शुल्क दो, न अच्छा लगे तो पैसे वापस। ज्यादातर लोग पैसे वापस नहीं लेते क्योंकि कुछ न कुछ ज्ञान और लाभ तो उन्हें मिलता ही है। यह आध्यात्मिक धोखाधड़ी का नतीजा ही है कि लोगों का इस पर से विश्वास सा उठ गया। इसी विश्वास को बनाने के लिए मनी बैक ऑफर दी जाती है।