तंत्र, धर्म, व इस्लाम (एक तुलनात्मक अध्ययन)- Islam, religion, and Tantra (a comparative study)

तंत्र, धर्म, व इस्लाम (एक तुलनात्मक अध्ययन)

मैंने बहुत पहले उपरोक्त विषय से सम्बंधित, अपनी तरफ से एक बहुत ही सार-गर्भित व विस्तृत पोस्ट लिखी थी, जिसे मैं पुलवामा के आतंकवादी-हमले में वीरगति को प्राप्त सैनिकों की याद में, बतौर उन्हें श्रद्धांजलि यहाँ फिर से उजागर कर रहा हूँ।

तंत्र में प्रारंभ से ही एक व्यक्ति अपने आपको देहपुरुष की तरह अद्वैतपूर्ण, मुक्त व अनासक्त समझते हुए ही समस्त व्यवहार करता है। परन्तु योग में एक व्यक्ति पहले अपनी कुण्डलिनी को जगाता है। उससे उसे अद्वैत से जुड़े हुए महान आनंद का अनुभव होता है। उस कुन्डलिनीजागरण के आनंद के वशीभूत होकर ही वह अनायास ही अद्वैतमयी आचरण प्रारम्भ करता है, और धीरे-२ तांत्रिक की तरह अद्वैतपूर्ण बन जाता है। एक योगी कुण्डलिनीजागरण से आगे बढ़ते हुए आत्मज्ञान को भी अनुभव कर सकता है। उससे उसके अद्वैतज्ञान को और अधिक दृढ़ता मिलती है। इसका अर्थ है कि तंत्र योग की अपेक्षा अधिक आसान, सर्वसुलभ, स्वाभाविक व मानवतापूर्ण है। जब योगोपलब्धि के बाद भी तंत्र को स्वीकारना ही पड़ता है, तब क्यों न उसे प्रारम्भ से ही स्वीकार किया जाए। बहुत से तंत्र का अभ्यास करने वाले लोग समय के साथ स्वयं ही कुण्डलिनीजागरण व आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, बिना किसी भिन्न या विशेष प्रयास के। कई लोगों को तो तंत्र को सिद्ध करने का भी स्वाभाविक रूप से अवसर मिलता है, और योग को भी; जैसा कि इस वेबसाईट के नायक प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ। बहुत से लोग तंत्र को पंचमकारों तक ही सीमित कर देते हैं। परन्तु सच्चाई यह है कि तंत्र एक सम्पूर्ण जीवन पद्धति है। यह एक अद्वैतपूर्ण जीवनपद्धति है। हिन्दू संस्कृति के अधिकाँश अचार-विचार एक तांत्रिक पद्धति के ही विभिन्न अंग हैं, चाहे वह वेद-पुराणों का अध्ययन हो, या उनसे जुड़े हुए विभिन्न क्रियाकलाप। प्राचीनकाल में जिन लोगों को आत्मज्ञान हुआ, उन्हें आम साधारण जनजीवन में जीवन व्यतीत करना बहुत कठिन लगा। इसका कारण यह था कि आम लोग तो भौतिक दृष्टिकोण से जीवन जीने के आदी थे, जिसे आत्मज्ञानी लोगों का ज्ञानपूर्ण मन स्वीकार न कर सका। अतः उन्होंने आम अज्ञानी लोगों के व्यवहार की नक़ल को छोड़कर प्रकृति की नक़ल करते हुए अपना जीवन जीने का प्रयास किया। वैसा इसलिए, क्योंकि उन्हें प्रकृति के सभी व्यवहार ज्ञानपूर्ण लगे। वैसा करने से उनके आध्यात्मिक स्तर में और अधिक इजाफा हुआ, और वे जीवन्मुक्त बन गए। प्राकृतिक जीवनशैली से अपने को लाभ होते देखते हुए उनके मन में औरों को भी वैसा लाभ दिलाने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को जीवंत रूप में लिपिबद्ध करना शुरू कर दिया। वे ही लिपिबद्ध संग्रह कालान्तर में वेद-पुराणों के नाम से विख्यात हुए, जिन्होंने बहुत से लोगों के लिए जीवन्मुक्ति को सुलभ करवाया। उन पुराणों को लिखने वाले आत्मज्ञानी लोग ऋषि-मुनि कहलाए।

उपरोक्त प्रकार की ही घटना तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र के साथ भी घटित हुई। उसे भी बचपन में ही क्षणिक आत्मज्ञान हो गया था। उसके बाद वह भी आम लोगों की तरह जीवनयापन करने में अपने आप को अक्षम पा रहा था। इसीलिए उसने अपने लाभ के लिए शरीरविज्ञान दर्शन नामक, पौराणिक दर्शन से मिलता-जुलता एक जीवन दर्शन बनाया। उसके सान्निध्य से उसे जो अद्वैत व अनासक्ति की उपलब्धि हुई, उससे उसकी चहुंमुखी प्रगति सुनिश्चित हुई, और यहाँ तक कि अनायास ही कुण्डलिनीजागरण की एक झलक भी मिली। उसी लाभ से प्रेरित होकर उसने उसी दर्शन पर आधारित एक पुस्तक की रचना की, जिसे हम आधुनिक पुराण भी कह सकते हैं। पुराणों में तो बाहर मौजूद स्थूल सृष्टि का वर्णन है, परन्तु शरीरविज्ञान दर्शन में हमारे अपने भीतर मौजूद सूक्ष्म सृष्टि का वर्णन है। ‘यत्पिंडे तत्ब्रम्हांडे’ नामक वेदोक्ति के अनुसार दोनों सृष्टियों के बीच में लेशमात्र भी अंतर नहीं है। इसलिए हम प्रेमयोगी वज्र को आधुनिक ऋषि भी कह सकते हैं। उसकी पुस्तक भी पुराणों की तरह ही तांत्रिक ही है, यद्यपि साथ में कुछ अंश पंचमकारी विद्या का भी है, श्रीमद देवीभागवत पुराण से मिलता जुलता। अब रही बात पंचमकारी तंत्र की, तो वह विशाल तांत्रिक पद्धति का केवलमात्र एक छोटा सा हिस्सा ही है। तांत्रिक पद्धति का बहुत लम्बे समय तक आचरण करने के बाद जब आम साधक का तांत्रिक दृष्टिकोण बहुत परिपक्व हो जाता है, तभी एक योग्य गुरु के मार्गदर्शन में तंत्र के पंचमकारी अंग का आश्रय लेना चाहिए, ताकि कुण्डलिनीजागरण के लिए पर्याप्त शक्ति मिल सके। समय से पहले अपनाने पर या अयोग्य गुरु के मार्गदर्शन में यह लाभ के स्थान पर हानि भी पहुंचा सकता है। साथ में, पंचमकारी तांत्रिकों का ध्येय हिंसा नहीं, अपितु कुण्डलिनीजागरण ही है। शक्ति के सर्वश्रेष्ठ स्रोत तो माँस, मैथुन व मद्य ही हैं, जो हिंसा के बिना प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। इसलिए उनके कम से कम प्रयोग से अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ को प्राप्त करने को ही प्राथमिकता दी गई है। इसका उदाहरण है, मत्स्य-सेवन। क्योंकि मछली को आवश्यकतानुसार न्यूनतम मात्रा में भी पकड़ा जा सकता है, इसलिए उससे निरर्थक हिंसा नहीं होती, जिससे हिंसा-दोष न्यूनतम स्तर पर बना रहता है। साथ में, मछली ठंडी प्रकृति की होती है। इसलिए यह पंचमकारी के अन्दर उस क्रोध को नहीं पनपने देती, जो आध्यात्मिक राह में सबसे बड़ा विघ्न होता है। साथ में, यह आमिषाहारों में सबसे कम तमोगुण उत्पन्न करता है, और इसके शरीर के ऊपर दुष्प्रभाव भी अन्य की तुलना में न्यूनतम होते हैं। इसी तरह इसमें एकपत्नीव्रत को प्राथमिकता दी गई है, ताकि यौनता की अति से बचा जा सके, क्योंकि वह भी एक विशेष प्रकार की हिंसा ही है, विशेषकर यदि सही तांत्रिक नियम न अपनाए जाएं। फिर भी थोड़ी-बहुत भूल-चूक तो सीखते समय स्वाभाविक ही है। यदि तांत्रिक-साथी को बदलना ही पड़े, तो बहुत लम्बे समय के बाद व विशेष आध्यात्मिक प्रगति को प्राप्त करने के बाद ही। स्त्री पर बुरी नजर सर्वथा वर्जित है। यौनता / पञ्चमकारों के बारे में भद्दे शब्द व भद्दे मजाक भी वर्जित हैं। स्त्री को देवी व गुरु की तरह सम्मान देना पड़ता है। किसी की बेटी या किसी की पत्नी को तांत्रिक-साथी नहीं बनाया जाता, क्योंकि उन्हें दूसरों की भावनात्मक संपति के अंश के रूप में देखा जाता है। प्राचीनकाल के अधिकाँश प्रख्यात तांत्रिक वही हैं, जो पहले आम जनमानस में प्रचलित साधारण तांत्रिक पद्धतियों से जीवन व्यतीत करते थे, परन्तु बाद में विभिन्न कारणों से उसके पंचमकारी अंग का भी सेवन करने लगे। उन कारणों में एक मुख्य कारण था, समाज से बहिष्कृति या समाज में पर्याप्त सम्मान न मिलना। तभी तो कुछ प्रख्यात तांत्रिक आज के पंजाब की भारत-पाकिस्तान सीमा के आसपास हुए हैं, कुछ तो आज के पाकिस्तान में भी हुए हैं। दूसरा कारण है कि पंजाब शुरु से ही समृद्ध रहा है, इसलिए वहां खाने-पीने व मौज-मस्ती करने वालों की परंपरा रही है। उसी तरफ को तांत्रिक मंदिर भी बहुतायत से पाए जाते हैं। पंजाब में गुरु-परम्परा  का बोलबाला भी तंत्र के अनुरूप ही विकसित हुआ है। मैंने स्वयं पंजाब के सुदूर व पाकिस्तान की दिशा के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहकर सभी कुछ प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया है। उन सुदूर क्षेत्रों तक हिन्दुओं की आम तांत्रिक पद्धति की पहुँच ढीली थी, अतः वहां पर रहने वाले लोगों को सामूहिक आध्यात्मिकता से मिलने वाले बल की प्राप्ति नहीं हो रही थी। उसके प्रतिकारस्वरूप उन्होंने पंचमकारी तंत्र को सही ढंग से अपनाया, व त्वरित सफलता को प्राप्त किया, क्योंकि पंचमकारी शक्ति से उत्पन्न आध्यात्मिक बल सामूहिक आध्यात्मिकता के बल से भी कहीं अधिक था। निस्संदेह वे तांत्रिक आम सर्वसाधारण या आध्यात्मिक समाज से कटे-२ से रहे, फिर भी वे सिद्धियों के चरम पर पहुंचे, और दूसरों को भी प्रेरित करते रहे। स्वाभाविक है कि वैसे तांत्रिकों में बहुत से दलित व पिछड़े वर्गों के लोग भी इन्हीं उपरोक्त कारणों से शामिल हुए। वैसा ही उदाहरण दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में कष्टमय व एकाकी जीवन बिताने वाले तिब्बती बौद्धों का भी है। उन्हें सुविधामय मैदानी क्षेत्रों में प्रचलित साधारण तंत्र की अपेक्षा पंचमकारी तंत्र ही अधिक उपयुक्त लगा, इसीलिए यह वहां आज भी अच्छी तरह से जिन्दा है। चाईनी ताओ धर्म में तो एक यौनसनकी साधु को ही आदर्श साधु बताया गया है। वास्तव में जब से पंचमकारों का तंत्र से अलगाव हुआ, तब से ही आध्यात्मिकता का पतन प्रारंभ हो गया। पंचमकारों को उत्पथगामियों का आचार बताया गया। इससे हुआ यह कि पंचमकारों की शक्ति उत्पथगामियों को ही मिलती रही, और वे उससे पुष्ट होते रहे। धीरे-२ करके सारी धरती उत्पथगामियों से परिपूर्ण हो गई। दूसरी ओर आध्यात्मिकता आवश्यक शक्ति के बिना क्षीण होती गई, क्योंकि पंचमकारों को उससे दूर रखा गया। आजकल पंचमकारी तंत्र को तो गलत बोला जाता है, वैसे पंचमकारों का उपयोग धड़ल्ले से व बिना किसी रोक-टोक के खुल्लम-खुल्ला हो रहा है, आध्यात्मिकता के लिए नहीं, अपितु अंधी भौतिकता के लिए। इससे सिद्ध होता है कि आज असली तांत्रिकों की समाज को सख्त आवश्यकता है।

प्रेमयोगी वज्र के साथ भी कुछ-२ ऐसा ही हुआ। वह भी आम जनमानस की तंत्रपद्धतियों को अपनाता था। परन्तु उससे उसका आध्यात्मिक विकास बहुत धीरे-२ हो रहा था। जब बहुत लम्बे समय तक भी उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक की आशा तक भी नहीं मिली, तब वह आम अध्यात्मिक जनमानस के विरुद्ध बागी जैसा हो गया। उससे उसका बहुत अपमान होने लगा। उसका विरोध भी तांत्रिक पंचमकारों के सेवन के रूप में बढ़ता ही जा रहा था। ये दोनों कार्य-कारण एक दूसरे को बढ़ाते जा रहे थे। अपमान से विरोध व विरोध से अपमान। यह चक्र तब तक चलता रहा, जब तक उसे कुण्डलिनीजागरण की झलक नहीं मिल गई। उससे वह संतुष्ट होकर शांत हो गया, और पंचमकारी तंत्र के ऊपर उसका विश्वास बढ़ गया।

वास्तव में योग (आम आध्यात्मिक तांत्रिक पद्धतियों सहित) व तंत्र (पंचमकारी योग) एक ही हैं, केवल प्रचंडता के स्तर में ही अंतर है। पंचमकारी योग से साधारण योग की अपेक्षा कुण्डलिनी अधिक प्रचंड रहती है। अतः एक बुद्धिमान तांत्रिक व्यक्ति दोनों का समयानुसार आश्रय लेता रहता है। दोनों में कुछ भी विरोध नहीं है। तांत्रिक तो सभी आध्यात्मिक लोग हैं, पर पंचमकारी तांत्रिक को ही तांत्रिक कहने का प्रचलन है। उसे हम पंचमकारी साधु भी कह सकते हैं, क्योंकि साधारण साधु व पंचमकारी साधु के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है, कुण्डलिनी की अभिव्यक्ति के स्तर को छोड़कर।

ऐसा प्रतीत होता है कि तंत्र मैं मैथुन मकार ही सबसे प्रमुख है, क्योंकि इसीसे कुण्डलिनी को आश्चर्यजनक बल प्राप्त होता है। अन्य मकार तो केवल आवश्यकतानुसार इस मुख्य मकार के सहायक ही हैं। अन्य पंचमकारी धर्मों को तो मैं तंत्र का ही एक रूपांतरित स्वरूप मानता हूँ। उनमें जो शक्ति विद्यमान है, और जिसके प्रति अधिकाँश लोग आकर्षित होते हैं, वह पंचमकारिक तांत्रिक शक्ति ही प्रतीत होती है। परन्तु सात्विक हिन्दु धर्म / तंत्र का विरोध करके वे विरोधी धर्म आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति नहीं करा सकते, अपितु उल्टा हानि ही कराते हैं, यह बात तो तय है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह सिद्धांत है कि पंचमकार तभी सफल होते हैं, यदि वे सात्विक तंत्र / योग / धर्म के सान्निध्य में रहें। इससे दोनों पद्धतियों को आध्यात्मिक व भौतिक, दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं। अन्यथा पंचमकार पापों के भण्डार ही तो हैं। अतः सभी धर्मों के सहयोगात्मक सहअस्तित्व में ही सबका भला है। स्वर्णसंज्ञक या आकर्षक व्यक्तित्व / रंग-रूप वाले हिंदु पंडितों के लिए इसीलिए अनुष्ठानपरक, निस्स्वार्थी, मानवतापूर्ण, प्रेमपूर्ण, संतोषी, सामाजिक व अहिंसावादी होकर रहने का निर्देश दिया गया है, ताकि उनमें अद्वैतभाव व अनासक्तिभाव के साथ-२ एक दिव्य तेज व आकर्षण भी विद्यमान रहे। तभी तो अन्य आम या पंचमकारी लोग उन्हें गुरु बना कर उनके रूप की कुण्डलिनी को अपने मन में पुष्ट कर सकते हैं। तभी पंचमकारों की शक्ति कुण्डलिनी को लगेगी, अन्यथा वह उनके लिए नरक का रास्ता ही साफ करेगी।

कई स्थानों पर तो पंचमकारों का सेवन संकेतमात्र या औपचारिकता मात्र के लिए इसलिए निर्दिष्ट किया गया है, ताकि किसी को यह अहंकार न होए कि मैं बहुत शुद्ध हूँ, और साथ में उत्तम प्रकार का अद्वैतभाव भी बना रहे। तंत्र में यह सिद्धांत भलीभांति ध्यान में रखा गया है कि कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा, इसलिए पंचमकारों के प्रयोग में बहुत संयम व सावधानी बरती जाती है। कई स्थानों पर इसलिए उनका प्रयोग बताया गया है, ताकि हिंसक या राक्षस प्रकृति के लोगों को सही ढंग से खाना-पीना व भोग-विलास करना सिखाया जा सके, और उनके भोग-विलास के अन्दर अध्यात्म का बीज डालकर उन्हें भी अध्यात्म की ओर मोड़ा जा सके। बाद में धीरे-२ वे खुद सुधर जाते हैं। परन्तु कुछ भी हो, पंचमकारी तंत्र की आश्चर्यजनक शक्ति को नकारा नहीं जा सकता। सिद्ध तांत्रिक तो यहां तक कहते हैं कि तंत्र विशेषकर यौनतंत्र के बिना आत्मज्ञान को प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है।

तंत्र के बारे में और भी बहुत से रोचक तथ्य विद्यमान हैं। तंत्रसमाज को गुह्य समाज भी कहते हैं। कई तो उनमें महान ब्राम्हण पंडित भी शामिल हो गए थे। कई तांत्रिकों की तो उनकी अपनी बहन ही उनकी तांत्रिक गुरु थी। इस्लाम में भी अपनी बहन से (यद्यपि सहोदर बहन से या पिता की पत्नी से पैदा हुई के साथ नहीं) विवाह की अनुमति है। इससे कुछ अंदाजा लगता है कि इस्लाम के मूल में कहीं न कहीं पंचमकारी तंत्र विद्यमान है। काबा में जिस काले पत्थर को चूमने का रिवाज है, उसे अधिकाँश लोग शिवलिंग ही मानते हैं। भगवान शिव तो तंत्रमार्ग के आदि प्रवर्तक हैं ही। विषमवाही तंत्र के मामले में तो यह भी माना गया है कि तांत्रिक प्रेमिका जितनी अधिक बदसूरत या अनाकर्षक हो, वह उतनी ही अधिक तंत्रसम्मत होती है, बशर्ते कि वह तांत्रिक गुणों से संपन्न हो। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसमें अहंकार नहीं होता, जिससे वह दूसरों / गुरु के रूप की कुण्डलिनी को अपने ऊपर आसानी से पनपने देती है। विषमवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि किसी और की (गुरु आदि की) होती है, जबकि कुण्डलिनीवाहक तो तांत्रिक प्रेमिका ही होती है। समवाही तंत्र का अर्थ है कि मानसिक कुण्डलिनी छवि भी तांत्रिक प्रेमिका के रूप की होती है, और कुण्डलिनी-वाहक भी वही होती है। समवाही तंत्र में सांकेतिक / अप्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन अधिक कारगर है, परन्तु विषमवाही तंत्र में पूर्ण / स्पष्ट / प्रत्यक्ष तांत्रिकमैथुन क्रिया। इसीलिए अधिक से अधिक यौनाकर्षण उत्पन्न करने के लिए समवाही तांत्रिका आकर्षक होनी चाहिए। समवाही व विषमवाही नाम के तंत्र के दो प्रकार मैंने इसी मेजबान वेबसाईट पर प्रेमयोगी वज्र के अनुभवात्मक विवरण में देखे, अन्य स्थान पर नहीं, यद्यपि तंत्र में यह प्रचलित धारणा है कि पिछड़े वर्ग की महिलाएँ प्रत्यक्ष तांत्रिकसम्बन्ध के लिए सर्वोत्तम होती हैं। इससे प्रेमयोगी वज्र का कथन स्पष्ट हो जाता है। कहा जाता है कि एक बार एक प्रख्यात तांत्रिक-गुरु की बदसूरत व काली तांत्रिक प्रेमिका का उनके शिष्य ने उपहास उड़ाया था। उससे नाराज होकर उस तांत्रिक-प्रेमिका ने उसको उसके जीवनकाल में आत्मज्ञान की प्राप्ति न होने का श्राप दिया। उससे वैसा ही हुआ।

अब हम तंत्र व इस्लाम के बीच समानता पर विस्तार से चर्चा करते हैं। तंत्र व इस्लाम की शुरुआत लगभग एकसाथ हुई। दोनों में ही संसार-त्याग को अस्वीकार किया गया है, और सांसारिक प्रवृत्ति पर जोर दिया गया है। दोनों में ही स्त्री को महत्त्व दिया गया है। खतना के पीछे भी तान्त्रिक सिद्धांत ही प्रतीत होता है। इस्लाम में मौलवी के द्वारा हलाला करने की रिवाज भी तंत्र की उस प्रथा का विकृत रूप प्रतीत होती है, जिसमें गुरु व शिष्य की संयुक्त तांत्रिक-प्रेमिका होती है। दोनों ही साधना-पथ सभी सर्वसाधारण व शुद्धि-बुद्धि से रहित लोगों को भी मुक्ति प्रदान करने के लिए बनाए गए हैं। तांत्रिक नाथ सम्प्रदाय के बहुत से गुरुओं को बहुत से मुसलमान अपना भी गुरु मानते हैं। तांत्रिक गुरुओं को पीर बाबा भी कहा जाता है। जिस तरह दक्षिणपंथी, हिन्दुओं के शुद्धिवादी हैं, उसी तरह सूफी साधना-पथ इस्लाम में शुद्धिवादी व नरमपंथी विचारधारा है। अधिकांशतः, हिन्दु धर्म के दक्षिणतंत्र व वामतंत्र को एक-दूसरे का विरोधी बताया जाता है। परन्तु प्रेमयोगी वज्र के तांत्रिक अनुभव के आधार पर मैंने इस लेख में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि वामतंत्र व दक्षिणतंत्र आपस में विरोधी नहीं, अपितु सहयोगी हैं। साधारण तांत्रिक पद्धतियों को दक्षिणतंत्र कह लो, व पंचमकारी तंत्र को वामतंत्र। इसी तरह हिन्दु धर्म व इस्लाम धर्म भी एक दूसरे के सहयोगी ही सिद्ध हुए, क्योंकि वृहद् परिपेक्ष्य में हिन्दु धर्म को दक्षिणतंत्र एवं इस्लाम को वामतंत्र कह लो। इसलिए दोनों के बीच में वैमनस्य या कटुता के लिए कोई स्थान नहीं है। दोनों ही धर्म एक-दूसरे से घृणा करके अनजाने में ही एक दूसरे से प्रेम कर रहे होते हैं। परन्तु उससे पूरा काम नहीं चलता। फिर क्यों न ये दोनों सीधे तौर पर एक-दूसरे से प्रेम करें, जिससे वे एक-दूसरे की शक्ति को और अधिक मात्रा में व अधिक सकारात्मकता के साथ प्राप्त कर सकें। विचारों में भिन्नता तो मानवमात्र का स्वभाव है ही, परन्तु उससे आपसी प्रेम व सहयोग पर दुष्प्रभाव नहीं पढ़ना चाहिए। यदि उन्हें अपने प्राचीन धर्मशास्त्रों में संशोधन करने की आवश्यकता पड़े, तो मानवता के हित में धर्मसभा या सर्वधर्मसभा बैठाकर कर लेना चाहिए। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यहाँ पर सभी धर्मों की बात हो रही है, किसी विशेष धर्म की नहीं। सभी को अमानवीयता, कट्टरता व घृणा से भरे हुए शब्दों में इस तरह से संशोधन करने पर विचार करना चाहिए, जिससे सभी धर्मों का सम्मान भी बना रहे, और जमाने के अनुसार उनमें संशोधन भी हो जाएं। उदाहरण के लिए जब से हिंदु धर्म में बलि प्रथा का विरोध होने लगा, तब से ही प्रतीतात्मक रूप में नारियल की बलि दी जाती है। तंत्र में कुण्डलिनी / गुरु के नाम पर पंचमकारों का सेवन किया जाता है, तो इस्लाम में अल्लाह (ईश्वर) के नाम पर, यद्यपि दोनों कुछ समानता साझा करते हैं। वास्तव में निराकार ईश्वर के निरंतर ध्यान से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है, यह रहस्य सभी को पता नहीं है। परन्तु कट्टर इस्लाम में पंचमकारों में मानव के प्रति हिंसा व झूठ-फरेब को भी सम्मिलित किया गया है। तुलनात्मक रूप से हल्के स्तर पर ऐसा हिन्दु धर्म व इसाई धर्म में भी हुआ, यद्यपि अधिकाँश मामलों में यह कहा जाता है कि ऐसा प्रतिक्रयास्वरूप हुआ। अब पुराने जमाने में इसकी क्या जरूरत पड़ी होगी, यह स्पष्टतया कह नहीं सकते, परन्तु आज के शिक्षित व मानवतापूर्ण युग में यह जरा भी प्रासंगिक नहीं है, ओर पूरी तरह से त्याज्य है। हालांकि घोर आत्मरक्षा के लिए (जान बचाने के लिए) इनके प्रयोग पर विरले मामलों में विचार किया जा सकता है। असली त्याग तो भावना का त्याग है। सुप्त भावना भी काम करती रहती है। इसलिए तत्संबंधित संकल्पों की दृढ़ अभिव्यक्ति से अमानवता का खंडन करना चाहिए, तभी सुप्त भावना (संस्कार) नष्ट होती है। ये सभी तथ्य इस वेबसाईट के नायक व एक तांत्रिक, प्रेमयोगी वज्र के अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर लिखे गए हैं, यह मात्र खाली थ्योरी नहीं है। प्रेमयोगी वज्र एक आत्मज्ञानी है, व उसकी कुण्डलिनी भी जागृत हो चुकी है। उसे भी तभी आध्यात्मिक सफलता मिली, जब उसने लगभग 25 वर्ष पूर्व अमानवता का सार्वजनिक रूप से कड़े शब्दों में खंडन किया। इसे इसी मेज वेबसाइट पर स्थित वेबपेज के निम्न लिंक पर पढ़ा जा सकता है-https://demystifyingkundalini.com/%E0%A4%97%E0%A5%83%E0%A4%B9-10/

एक स्पष्टीकरण यहाँ युक्तियुक्त प्रतीत हो रहा है। यदि ईश्वर की खिलाफत करने वाले बन्दे को ईश्वर के स्मरण के साथ यातना दी जाए जेहाद आदि के नाम पर,  तब उसके बदले में जो यातनारूपी फल उस यातना देने वाले को मिलेगा, उसके साथ स्वयं ही ईश्वर का स्मरण बढ़ते समय के साथ दुगुने या अधिक रूप में हो जाएगा, क्योंकि कर्म व उसका फल दोनों आपस में जुड़े हुए होते हैं। फिर यदि वह यातनाफल सहते हुए मर ही जाए, तब तो सीधा मुक्त हो गया, क्योंकि सनातन धर्म में भी कहा है कि मरते समय जिसका स्मरण किया जाए, वही रूप मरणोपरांत मिलता है। परन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ, तो नरक का द्वार खुला है। यह अलग बात है कि उसे नरक में भी ईश्वर का स्मरण होता रहेगा। इसलिए बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। इसी तरह, अब जब कोई ईश्वर के नाम पर पीड़ा सहेगा, तो स्वाभाविक है कि उसमें भी ईश्वर का स्मरण जागेगा, जिससे वह भी ईश्वर को प्रिय हो जाएगा। इससे पीड़ा देने वाले का व पीड़ा सहने वाले का, इन दोनों का एकसाथ भला होगा। अतः स्पष्ट है कि इसमें पीड़ा सहने वाले से अधिक बुरा तो पीड़ा देने वाले का होगा, क्योंकि यदि वह तंत्र का आचरण सही ढंग से नहीं कर पाया, तो बुरे कर्म से पैदा होने वाली नरकरुपी तलवार सदैव उसके ऊपर लटकी रहती है। क्योंकि यह महान कर्म-सिद्धांत है कि जब तक कोई मुक्त नहीं हो जाता, तब तक कर्म का फल तो मिल कर ही रहेगा। इसीलिए इसमें ‘सबकुछ’ या ‘कुछ भी नहीं’ होता है, बीच वाले स्तर नहीं होते। यही तंत्र का भी, विशेषतः अतिवादी तंत्र का भी सिद्धांत है। यही एक मुख्य कारण है कि महान इस्लाम एक अतिवादी तंत्र की तरह लगता है। परन्तु दुर्भाग्य से अतिवादी तंत्र के डर के कारण ही बहुत से लोग साधारण तंत्र से भी दूर रहने लगे, जिससे वे एक विज्ञानमिश्रित आध्यात्मिक पद्धति के लाभों से अछूते रहने लगे। प्रेमयोगी वज्र ने इसे अपने अनुभव से सिद्ध किया। उसने कुण्डलिनी के ध्यान के साथ मांसाहार किया। जब उससे उसे छिटपुट चोट के रूप में उसका फल मिला, तब एकदम से उसके मस्तिष्क में वह कुण्डलिनी प्रचंड होकर प्रकट हो गई, और उससे जुड़ा हुआ माँसभक्षण का पापकर्म भी उसे स्मरण हो आया। अब जो कहा है कि अल्लाह के बन्दे को परेशान नहीं करना चाहिए, वह भी सनातन धर्म के अनुसार ही है, जिसमें कहा गया है कि ईश्वरभक्त का बुरा करने वाले को ईश्वर कभी क्षमा नहीं करते। वास्तव में सभी धर्म एकरूप ही हैं, केवल समझने भर का फर्क है। इसी तरह, एक बार प्रेमयोगी वज्र ने कुण्डलिनीध्यान / अद्वैतपूर्ण जीवन के साथ हल्का-फुल्का राजद्रोह किया। वास्तव में वह राजद्रोह नहीं था, अपितु राजद्रोह का अभिनय मात्र ही था मूलतः, क्योंकि उसमें अहिन्सापूर्वक सर्वलोकहित छुपा हुआ था। जब उसे सजा मिली, तो उसने दिव्य प्रेरणा से सजा से बचने का पूरा प्रयास किया, जिसमें उसे अनौखी सफलता भी मिली। जब उसे उसकी हल्की-फुल्की सजा मिली, तब वह उसे ईनाम की तरह लगी, और उसके मन में कुण्डलिनी-ध्यान / अद्वैतभाव पहले से भी प्रचंड हो गया मूलकर्म के स्मरण के साथ, जिससे उसका थोड़े से योग के प्रयास के साथ कुण्डलिनीजागरण हो गया। साथ में कहें, जैसे योग के समय शारीरिक जोड़ों पर सांसों / मुड़ने / गति आदि के प्रभाव से उत्पन्न संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी आरोपित होकर प्रचंड हो जाती है, उसी प्रकार धर्मसम्मत वेदना आदि के समय ईश्वर, संवेदना के ऊपर आरोपित होकर अति स्पष्ट हो जाते हैं।

तभी तो मैं कहता हूँ कि कोई भी किसी से कभी घृणा कर ही नहीं सकता। यदि एक आदमी दूसरे आदमी से संपर्क स्थापित करता है, तो वह हर हालत में उससे प्रेम ही करता है। यदि वह उसका भला करता है, तो उसको प्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ने का मौक़ा देकर, और यदि वह बुरा करता है, तो उसके पापों को नष्ट करके अप्रत्यक्ष रूप से। यद्यपि पहले वाला तरीका अधिक प्रशंसनीय व व्यावहारिक है। दूसरे तरीके का प्रयोग यदि मजबूरीवश करना ही पड़े, तो हल्के या अधिक से अधिक मध्यम स्तर तक ही, अतिवादी स्तर तक कभी नहीं।

हो सकता है कि प्राचीनकाल में आम जनजीवन में लड़ाई-झगड़ों की, युद्धादि की व पशु आदि के प्रति हिंसाओं की बहुतायत हुआ करती थी, जिनका निवारण संभवतः असंभव था। इसलिए उन्हें ही धर्म का आवरण पहना कर शुद्ध व मुक्तिकारी कर दिया गया। क्योंकि हिंसाओं व अशुद्धियों से भरे हुए वातावरण में शुद्ध वैदिक क्रियाएं लाभ के स्थान पर हानि पहुंचा सकती थीं, इसीलिए उनके प्रति घृणा को फैलाया गया। बाद में स्थिति बदल गई, परन्तु उनके बनाए गए नियम सदा के लिए हो गए, क्योंकि वे निष्ठा व विश्वास से लिखित रूप में पक्के कर दिए गए थे। उस समय यातायात व संचार की भी संतोषजनक सुविधाएं नहीं होती थीं। इसलिए एक छोटे से दुष्कर / विशेष परिस्थिति वाले क्षेत्र में सीमित लोग समझते थे कि पूरी दुनिया उन्हीं के जैसी थी। इसीलिए वे अपनी विचारधारा को पूरी दुनिया में फैलाने की मंशा रखते थे।

इसी तरह पुराने समय में तंत्र में भी विरले मामलों में नर-बलि की प्रथा थी, जो अब नहीं है। दोनों में ही शरीर-सुख को अधिक महत्त्व दिया गया है। दोनों में ही हठयोग के आसन हैं। दोनों ही पलायनवादी नरम हिंदुत्व के विरोधस्वरूप ही बने थे। यद्यपि तंत्र इस्लाम की अपेक्षा नरम हिंदुत्व के प्रति बहुत अधिक उदारवादी बना रहा, और उसके बीच में पूरी तरह से घुल-मिल कर जीवित बना रहा।

यहाँ हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि इस्लाम में 5 मकार न होकर 4 मकार ही हैं, कम या अधिक रूप से। उसमें मदिरा निषिद्ध है। यद्यपि मैं तो माँस के प्रभाव को मदिरा के प्रभाव के समकक्ष ही मानता हूँ। दोनों ही तमोगुणस्वरूप हैं। साथ में यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि वे पञ्चमकार वहां तंत्र की तरह स्पष्ट व अच्छी तरह से परिभाषित  न होकर पञ्चमकार की तरह ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनका प्रभाव पञ्चमकारों की तरह ही ईश्वरीय शक्ति की ओर ले जाने वाला है। उपरोक्त तथ्यों के लिए एक अन्य प्रामाणिक लेख निम्नोक्त लिंक पर पढ़ा जा सकता है- http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

अल्ला संस्कृत शब्द है-स्क्रिब्ड

साथ में, “ल” अक्षर तंत्रप्रधान है। मूलाधार चक्र का बीजमंत्र  भी “लं” है। मूलाधार तंत्र का सर्वाधिक शक्तिशाली चक्र है। इस्लाम में “ल” अक्षर का, विशेषतः “ल्ल” का प्रयोग प्रचुरता से है, जैसे कि रसूल, इला, अल्ला आदि-2। “ल्ल” का शक्तिशाली तांत्रिक प्रभाव तो प्रेमयोगी वज्र ने स्वयं भी अनुभव किया है। अधिक जानकारी के लिए यह पोस्ट पढ़ें- होली त्यौहार व तंत्र के बीच समानता

अंततः धार्मिक उन्माद से बचाने वाली, व वास्तविक मानवता-धर्म सिखाने वाली संक्षिप्त जानकारी इसी वेबसाईट पर (जिसका नायक प्रेमयोगी वज्र है) प्राप्त की जा सकती है, और विस्तृत जानकारी वाली पुस्तक को निम्नलिखित लिंक पर प्राप्त किया जा सकता है।

यदि आपको इस पोस्ट से कुछ लाभ प्रतीत हुआ, तो कृपया इसके अनुसार तैयार की गई उपरोक्त अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में निष्पक्षतापूर्वक समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। इस पुस्तक की संक्षिप्त रूप में सम्पूर्ण जानकारी आपको इसी पोस्ट की होस्टिंग वेबसाईट / hosting website पर ही मिल जाएगी। धन्यवाद।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

Islam, religion, and Tantra (a comparative study)

I have written a very abstract and elaborate post related to the above topic, very long ago, which I am highlighting here in the memory of the soldiers who received Veergati (martyrdom) in the terrorist attack of Pulwama, as a tribute to them.

From the very beginning in the tantric system, a person treats himself, just like the person of God / dehapurusha, as a supremely, free, nondual and unattached. However, in Yoga, a person first wakes up his kundalini. From that, he experiences great joy associated with Advaita / nonduality. With the happiness of that KundaliniJagran, he begins to adopt unattached conduct in an unintended manner, and gradually becomes non-dual like Tantric. A yogi can also experience enlightenment while moving ahead with KundaliniJagran. His adeptness gets more firmness from that. This means that the tantric technique is easier, more natural, universal, friendly to all human beings and humanistic than yoga. When the tantric system has to be accepted even after yogic achievement, why not accept it from the beginning? People who practice tantric mechanisms get themselves KundaliniJagran and enlightenment over time, without any different or special effort. Many people also get a natural opportunity to prove both the mechanisms, tantric as well as Yoga together; as with this hosting website, it happened with the protagonist Premyogi vajra. Many people limit the system to the five Ms. But the truth is that the tantric system is a whole life pattern. This is an Advaitic way (nondual) of life. Most spiritual pickles of Hindu culture are different parts of a tantric system, whether it is study of Vedas-Puranas, or various activities related to them. In ancient times, those people who had enlightenment became too decent and found very difficult to live their life in normal life. The reason for this was that the common people were used to living life from a physical perspective, which could not accept the enlightened minds of the enlightened people. Therefore, they tried to live their life while copying the natural style means imitating nature, leaving the common, ignorant and worldly people away from their deep heart. That is because they found all activities to be knowledgeable in nature. By doing so, their spiritual level increased further, and they became lively liberated. Seeing the benefits of natural lifestyles, they became curious to show the benefits to others in their mind. Therefore, they started writing natural events in the living form. That well-known scriptural collection in written form became famous as Vedas-Puranas, that made life easier and spiritual for many people. The enlightened people who wrote those mythologies were called sages/ monks.

The same type of incident happened with tantrik Premyogi Vajra as well. Even in his childhood, he got transient enlightenment. After that, he was unable to live himself as a normal person. That is why he made a philosophy of physiology philosophy / body science philosophy, a lively philosophy similar to mythical philosophies of Vedas-Puranas, for his benefit. From his proximity to that self-made philosophy, with the achievement of Advaita and non-attachment, his all-round progress was ensured, and even unintentionally, there was a glimpse of KundaliniJagran. Inspired by the same benefits, he composed a book based on the same philosophy, which we can call modern mythology. In the Puranas, there is a description of the physical universe outside, but in the philosophy of body, the description of the subtle creation within our own body is described. According to ‘Yatpinde Tatbramhande’, there is no difference between the two worlds. Therefore, we can also call Premyogi Vajra as a modern sage. His book is like a Tantric book, similar to the Puranas, although there is also a few parts of Panchmakari Vidya / 5 Ms, like the Srimad Devibhaagavat Purana. Now it is the Panchamakari tantric system, it is only a small part of the vast Tantric system. After conducting a tantric system for a very long time, when the Tantric attitude of the common seeker becomes very mature, then only under the guidance of a qualified master, the five-M part of the system should be taken as a shelter, so that sufficient power can be obtained for KundaliniJagran. In the direction of its adoption earlier than the proper time or under the guidance of an inept guru, it can also bring losses to the place of profit. Together, the goal of Panchmakari Tantricas is not violence, but KundaliniJagran only. The best sources of power are only meat, sex and alcohol, which cannot be obtained without violence. Therefore, the least of their experiments have been given priority to achieve maximum spiritual benefits. An example of this is fish-intake. Because the fish can also be caught in the minimum quantity as needed, hence there is no redundant violence, so that violence-faults remain at a minimum level. Together, the fish is of cold nature. Therefore, it does not allow that anger in the Panchamakari to occur, which is the biggest obstacle in the spiritual path. Together, it produces the lowest Tamoguna than related other nonvegs, and its side effects on the body are even less than the other. In the same way, a single wife has been given priority so that excessive sexuality can be avoided, because that is also a particular kind of violence, especially if the right tantric rules are not adopted. Still, light mistakes are natural when learning. If the tantric-mates have to change, then in rare cases, only after a very long time and after getting special spiritual progress or after achieving enough spiritual progress. The evil eye on the woman is absolutely forbidden. Bad words and bad jokes about sexuality / 5 Ms are also taboo. The woman is to be respected as Goddess and Guru as far as possible. No one’s daughter or anyone’s wife is made to be a tantric companion, because they are seen as part of the emotional property of others. Most of the earliest known tantrics of ancient times are those who used to live life with the prevalent ordinary tantric practices, but later on for various reasons they also started consuming the Panchmakaras. One of the main reasons for these reasons was boycott from society or not adequate respect in society. Only then, some eminent tantric technicians have been around the Indo-Pak border of Punjab today, some have happened in today’s Pakistan. The second reason being the Punjab area is well prosperous, so there are people fond of making merry. In Punjab, the patronage of Guru-tradition has also been developed according to tantra. I myself have experienced everything directly from Punjab while living there in the direction of border areas with Pakistan. Tantric temples are also found abundantly on the same side. The access to the common Tantric system of the Hindus was reduced to those remote areas, so the people living there were not receiving the force from collective spirituality. Because of this resistance, they adopted the Panchamkari system correctly, and achieved quick success, because the spiritual force generated with the Panchamkari Shakti was more than the force of collective spirituality. Undoubtedly, they remained cut off from the common and spiritual society, yet they reached the peak of accomplishments, and continued to inspire others too. Naturally, in the same way, many Dalit and backward classes were also involved due to the above-mentioned reasons. The same example is also the Tibetan Buddhists who spend their lives alone in remote mountainous areas. The Panchamakari system seemed more suitable than the simple system prevailing in the plains, so it is still alive there. In Chinese Taoism / Tao religion, a sexual sage has been described as an ideal sage. In fact, since the separation of the Panchamakaras from the spiritual system, the decline of spirituality has started. Panchamakaras were described as the abode of evils. It was from this that the power of Panchamakars kept on raising the power of the evil people, and they continued to get stronger from it. After all, the whole earth became full with the so-called ignorant or evil people. On the other hand, spirituality became impaired without the necessary power, because the five Ms were kept away from it. Nowadays, the Panchamakari tantric system is spoken incorrectly, though the use of the Panchamakars is being used in the open and without any interference, not for spirituality, but for blind materiality. This proves that today the society of real tantrics is a strict requirement.

Something similar happened with Premyogi Vajra. He also adopted the spiritual techniques of common sense. However, his spiritual growth was slowing down. When he could not even get the hope of glimpse of KundaliniJagran even for a very long time, he became like a rebel against the common spiritual system. Common people started to insult him. His opposition was also increasing in the form of intake of Tantric Panchamakars. Both of this effect-reason was increasing each other. Disrespect with opposition and opposition with insult. This cycle continued until he got a glimpse of KundaliniJagran. He became content with his calmness, and his faith increased over the Panchamakari tantric system.

In fact, yoga (including common spiritual tantric methods) and tantra (Panchamkari Yoga) is the same, only difference in the level of magnitude of kundalini expression. Kundalini is more massive with Panchamakari Yoga than ordinary yoga. Therefore, an intelligent tantric person keeps on taking shelter of both as per time. There is nothing opposed in both. Tantric is all the spiritual people, but the Panchmakari Tantric is the prevalence of saying Tantric. We can also call him Panchmakari Sadhu, because there is no difference in principle between the ordinary Sadhu and Panchamakari sadhu, except the level of manifestation of Kundalini.

It seems that the maithun-makar / sexuality-M is only the most important M of all the 5 Ms, because it gives a wonderful force to the Kundalini. Other considerations are, therefore, only helpful in this main cause. I consider other Panchmakari religions as a transformational form of the panchmakari tantric system. The power that exists in those, and the majority of which attract the people, appears to be the power of 5Ms. However, opposing Satvik Hindu religion / system, anti-religion cannot attain spiritual benefits, but reverse harm only; it is a matter of course. This is because it is the principle that the five Ms are successful only if those live near the satvik and peaceful system / yoga / religion. This gives both methods both spiritual and physical benefits. Otherwise, those are only the reserves of sins. Therefore, in all the cooperative co-existence of all religions, it is a blessing for everyone. It is instructed to be a rational, selfless, humanistic, loving, satisfying, social and non-violent, for the Hindu philosophers / priests of charming personality / colorful (svarna) Hindu pundits, so that they have a divine pace and attraction along with the non duality and detachment. Only then other common or Panchamakari tantric people can fortify their physical image as Kundalini in their mind by making them a guru. Only then will the power of Panchamakars look after and raise up the Kundalini, otherwise those will clear the path of hell for them.

In many places, the consumption of panchamkaras has been specified for signatory purpose or formalities, so that no one should have the ego that I am very pure, and together with the best kind of non-duality. This principle in the spiritual system has been kept in mind that the result of karmic effect / Karma will continue to be met; hence, the use of panchamkaras is very modest and cautious. In many places, their use has been told so that people of violent or demon nature can be taught to eat, drink and enjoy the right way, and by putting the seeds of spiritualism within their enjoyment and luxury, they too could be turned towards spirituality. Slowly later on they themselves improve. However, anything, the amazing power of the Panchamakari tantric system cannot be denied. Siddha Tantric even says that without the Tantra especially sexual tantra, enlightenment can not be attained.

There are even more interesting facts about the tantric system. Tantrasamaj is also called a cosmopolitan / secret society. Many of them had joined the great Brahmin pundit too. For many of the Tantric, their own sister was their tantric master. Islam is also allowed to marry one’s own sister (although not born from the wife of father). This suggests that there exists somewhere in the origin of Islam the Panchamakari tantric system. The black stone that kabba have a custom to kiss, most people consider that as Shivling. Lord Shiva is the originator of the Tantra. In the case of hetero-vehicle tantra, it is also believed that the more tantric girlfriend is more ugly or unattractive; tactical it is, provided it is filled with tantric qualities. That is because there is no ego in her, so that she lets the mental kundalini image made from physical forms of others / gurus to grow easily on herself. The vishamvaahee / hetero-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is of physical form of somebody else (the master), whereas the Kundalinivahika / kundalini carrier is a tantric lover. Samavaahee / homo-vehicle tantra means that the image of the mental kundalini is also of the physical form of a tantric lover, and the Kundalini-carrier is the same. In samavaahee tantra, signatory / indirect sexual technique is more effective, but complete / clear / direct tantric sexual action in the vishamvaahee tantric system. Therefore, to create more and more sexual attraction, the samavaahee Tantrica (female tantric) should be attractive. I have seen two types of tantric mechanisms called samavaahee tantra and vishamvaahee tantra in the experimental details of Premyogi Vajra on this host website only, not at other places. Although there is a prevailing belief in tantra that women of the backward classes are the best for direct tantric sexual activities. This makes the statement of Premyogi Vajra clear. It is said that once a famous Tantric guru’s ugly and black tantrica girlfriend was ridiculed by his disciple. Angered by that, that tantric girlfriend cursed him for not achieving enlightenment during his lifetime. That’s how it happened.

Now we discuss the similarity between Tantra and Islam in detail. The beginning of the Tantra and Islam began almost simultaneously. In both, escaping away from world has been rejected, and the emphasis is on worldly tendencies. Both have given importance to women. There appears Tantric principle behind circumcision. Halala done by maulavee in islam also appears as a distorted form of tantric ritual of making joint consort by guru and disciple. Both sadhana paths have been created to provide salvation for all the general and purity-free people. Too many Muslims consider tantric nath-gurus as their own gurus too. Tantric gurus are also called Pir Baba. Just as the rightists are purists of Hindus, in the same way, the Sufi spiritual practice is a puritanical and moderate ideology in Islam. Most of the time, the right Dynasties of Hinduism and the left ones are said to be anti to each other. But based on the tantric experience of Premyogi Vajra, I have tried to prove in this article that the tantra and the right Dynasty are not anti to each other, but collaborative. Say ordinary tantric methods to be dakshinatantra / right tantra, and the Panchamakari system is called vamatantra / left tantra. In the same way, Hindu religion and Islam also proved to be collaborators of each other, because in the larger perspective, call the Hindu religion as right tantra and Islam as a left tantra. Therefore there is no place for animosity or bitterness between the two. Both religions are loathing each other and are thus unknowingly loving each other for the love resides inside hatred. But it does not work in full. Then why do not these two love each other directly, so that they can achieve each other’s strength in greater quantity and with greater positiveity. The difference in ideas is the nature of mankind, but it should not be used to cause ill effects on mutual love and cooperation. If they need to amend their ancient theology, then it should be done in the interest of humanity by sitting in the Synod / dharmsabha or Sarvadharma Sabha / all religions’ assembly. I want to make it clear here that here all the religions are talking about, not of any particular religion. All should consider making amendments in this way in words filled with inhumanity, fanaticism and hatred, which will also preserve the respect of all religions, and also be amended according to the era. For example, since when Hinduism began to oppose the practice of spiritual slaughter, coconut was sacrificed in a symbolic form. In the name of the Kundalini / Guru in Tantra, the Panchamakars are consumed, however in the name of Allah (God) in Islam, however both share similarities. Actually minding the invisible god always feeds up the kundalini, the secret only known by few ones. But in the hardcore Islam, among the Panchamakars, violence and lies towards human beings have also been included. In Hinduism and Christianity, it was also there comparatively at a lighter level, although in most cases it is said that it was reactionary. Now, what was the need of it in the olden days, it can not be said, but in today’s educated and humanistic era it is not relevant, and needs to be totally exterminated. However, for one’s great self-defense (to save lives) their use can be considered in rare cases. Real sacrifice is the sacrifice of the bad spirit. Dormant sense also works. Therefore, the firm expression of the related resolutions should contradict the inhumanity, only then the latent feeling (samskaras) is destroyed. All these facts are written based on the personal experience of the hero of this website and a tantric, Premyogi Vajra, this is not a mere empty theory. Premogi Vajra is an enlightened man, and his Kundalini is also awakened. He also got spiritual success only when he denied the inhumanity in stern words nearly about 25 years ago. It can be read on this link to the webpage-https://demystifyingkundalini.com/home-5/

An explanation seems to be justified here. If the hostile opponent of God is tortured with the remembrance of God in the name of jihad etc, then in return, when that torture-giver would get the fruit of punishment arising out of that karma of torturing other, then the God will be remembered by him in much intensity for the karma and that’s fruit are both interconnected.. Then, if he dies while suffering torture, then he would be liberated, because even in Sanatan Dharma, it is said that whatever at the time of death is remembered, the same form is got posthumously. However, if it does not happen, then the door of hell is open. It is a different matter that he will remember God in hell also. Therefore, very caution is required. Now, when someone accepts pain in the name of God, it is natural that in him there will be a remembrance of God, so that he too will be dear to God. Due to this the person causing suffering and the person who suffers, will be blessed with one and the same. However it is clear that it will be worse for the suffering-causer than the one who suffers pain, because if the former does not perform the Tantra properly, then the hell-sword which is born from evil deeds always hangs over him. Because it is a karmic principle that until one becomes free, then the effect of karma will remain unchanged. That is why there is ‘everything’ or ‘nothing’, there is no middle level in it. This is also the principle of the Tantra especially the extreme Tantra. This is one of the main reasons that Great Islam seems like an extremist Tantra. However, unfortunately due to fear of extreme tantra, many people started living away from the ordinary or soft Tantra, by which they became untouched by the benefits of a science-based spiritual method of Tantra. Premyogi vajra proved it through his experience. He enjoyed flesh with the remembrance of Kundalini. When he got his fruit as a sporadic injury, kundalini suddenly appeared much more intense in his mind, and he also remembered the interconnected karma of eating flesh. Now whoever says that a devotee of Allah should not be disturbed, it is according to Sanatan Dharma, which states that God does not forgive the one who does bad to devotee of God. Actually all religions are the same, there is a difference between understanding only. Likewise, once, Premyogi vajra had a slight rebellion along with Kundalini-dhyan / Advaita-life. In fact, that was not treason, but the act of light apparent sedition only, because there was non-violence with benefit of the whole world hidden inside. When he was punished, he tried his best to avoid punishment by divine inspiration, in which he also had unique success. When he got his light sentence, he felt that like a prize, and in his mind, Kundalini-meditation / advaita became even more prevalent, so that he got KundaliniJagran with some effort of yoga. Simultaneously further saying, as on the body joints in yoga, the sensation generated by the effects of breathing / twisting / motion etc. becomes enraged by the Kundalini, in the same way, during the time of devotional pain, the God sensed spontaneously over the sensation becomes very clear.

Only then I say that no one can ever hate anyone. If a person establishes contact with another person, then he loves him in every situation. If he does good to him, then by giving him a chance to move forward, and if he does bad, then by destroying his sins indirectly. Although the former way is more plausible and practical. If the use of the second method is to be compulsive, then only to the mild level or up to the moderate  level at maximum, never to the extreme level.

It may be that in ancient times there was an abundance of violence in the form of quarrels, wars and animals as the main source of diet etc., whose redress was possibly impossible. Therefore, those were made clean and liberating by wearing a cover of religion. Because pure Vedic actions in the atmosphere filled with violence and impurities could cause harm to the place of profit, therefore hatred towards them spread. Afterwards, the situation changed, but the rules made by them were made forever, because they were confirmed in a written form with loyalty and faith. At that time there was not even satisfactory facilities for traffic and communication. Therefore, the limited people in a small drought area / special geographic area understood that the whole world was like them. That is why they intended to spread their ideology to the whole world.

Similarly in ancient times, there was a practice of human sacrifice in rare cases in Tantra, which is no longer there. Both of them have given greater importance to body pleasure. Both have the postures of Hatha Yoga. Both were made to oppose the escapist and soft Hindutva. Although the Tantra remained much more moderate towards soft Hindutva than Islam, and remained completely dissolving in its midst.

Here, we want to make it clear that Islam does not have five makaras, but only four are there, more or less. Wine is prohibited in it. Although I consider the effect of meat equivalent to the effect of alcohol. Both are tamoguni (darkness producing) Together, also, want to make it clear that the five-makaras there seem not as clearly and well defined as in Tantra, but those appear as panchmakaras, because their influence is going to lead towards divine power just like the Panchmakaras of Tantra.

For further confirmation, you can visit this link- http://greatvashikaranspecialist.com/islamic-tantra

Allah is a Sanskrit word- Scribd

Together, the letter “L” is Tantra-oriented. The seed mantra of the Mooladar chakra is also “Lm”. The most powerful chakra of tantra is Mooladar. The word “L” in Islam, especially “Ll” is used extensively, such as Rasul, Ila, Alla etc. The powerful tantric influence of “Ll” has also been experienced by Premyogi Vajra himself. For more information on this, read this post- Holi festival versus tantra

In the end, a brief information that can save you from religious frenzy, and teach true humanity-religion, can be found on this website (Whose hero is a Premyogi vjara), and a detailed information book can be found on the following link.

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed in unbiased way as the best, excellent and must read by everyone) made with steps as told above. If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि- Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि (please browse down or click here to view this post in English)

इतिहास गवाह है कि हमलावर ही अधिकाँश मामलों में विजयी हुआ है। यदि वह जीतता है, तब तो उसकी कामयाबी सबके सामने ही है, परन्तु यदि वह हारता है, तब भी वह कामयाब ही होता है। इसके पीछे गहरा तांत्रिक रहस्य छिपा हुआ है। हमला करने से पहले आदमी ने मन को पूरी तरह से तैयार किया होता है। हमले के लिए मन की पूरी तैयारी का मतलब है कि वह मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है। मृत्यु का भय वह तभी समाप्त कर पाएगा, यदि उसे जीवन व मरण, दोनों बराबर लगेंगे। जीवन-मरण उसे तभी बराबर लगेंगे, जब वह मृत्यु में भी जीवन को देखेगा, अर्थात मृत्यु के बाद जन्नत मिलने की बात को दिल से स्वीकार करेगा। दूसरे शब्दों में, यही तो अद्वैत है, जो सभी दर्शनों व धर्मों का एकमात्र सार है। उसी अद्वैतभाव को कई लोग भगवान्, अल्लाह आदि के नाम से भी पुकारते हैं। तब सीधी सी बात है कि हरेक हमलावर अल्लाह का बन्दा स्वयं ही बन जाता है, चाहे वह अल्लाह को माने, या ना माने। अगर तो वह भगवान या अल्लाह को भी माने, तब तो सोने पे सुहागा हो जाएगा, और दुगुना फल हासिल होगा।

अब हमला झेलने वाले की बात करते हैं। वह मानसिक रूप से कभी भी तैयार नहीं होता है, लड़ने व मरने-मारने के लिए। इसका अर्थ है कि वह द्वैतभाव में स्थित होता है, क्योंकि वह मृत्यु से डरता है। वह जीवन के प्रति आसक्ति में डूबा होता है। इसका सीधा सा प्रभाव यह पड़ता है कि वह खुल कर नहीं लड़ पाता। इसलिए अधिकाँश मामलों में वह हार जाता है। यदि कभी वह जीत भी जाए, तो भी उसका डर व द्वैतभाव बना रहता है, क्योंकि विजयकारक द्वैत पर उसका विश्वास बना रहता है। सीधा सा अर्थ है कि वह हार कर भी हारता है, और जीत कर भी हार जाता है। बेहतरी से अचानक का हमला झेलने में वही सक्षम हो सकता है, जो अपने मन में हर घड़ी, हर पल अद्वैतभाव बना कर रखता है। अर्थात जो मन से साधु-संन्यासी की तरह की अनासक्ति से भरा हुआ जीवन जीता है, समर्थ होते हुए भी हमले की शुरुआत नहीं करता, और अचानक हुए हमले का सर्वोत्तम जवाब भी देता है। वैसा आदमी तो भगवान को सर्वप्रिय होता है। तभी तो भारत ने हजारों सालों तक ऐसे हमले झेले, और हमलावरों को नाकों चने भी चबाए। तभी भारत में शुरू से ही धर्म का, विशेषतः अद्वैत-धर्म का बोलबाला रहा है। इसी धर्म-शक्ति के कारण ही भारत को कभी भी किसी के ऊपर हमला करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अपने धर्म को मजबूत करने के लिए हमला करने की आवश्यकता उन्हें पड़ती है, जो अपने दैनिक जीवन में शांतिपूर्वक ढंग से धर्म को धारण नहीं कर पाते। यह केवलमात्र सिद्धांत ही नहीं है, बल्कि तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र का अपना स्वयं का अनुभव भी है। जीवन के हरेक पल को अद्वैत से भरी हुई, भगवान की पूजा बनाने के लिए ही उसने इस वेबसाईट को बनाया है।

अब एक सर्वोत्तम तरीका बताते हैं। यदि अद्वैत-धर्म का निरंतर पालन करने वाले लोग दुष्टों पर हमला करके भी अद्वैत-धर्म की शक्ति प्राप्त करने लग जाए, तब तो सोने पर सुहागे वाली बात हो जाएगी। विशेषकर उन पर तो हमला किया ही जा सकता है, जिनसे अपने को खतरा हो, और जो अपने ऊपर हमला कर सकते हों। हमारा देश आज ऐसे ही मोड़ पर है। यहाँ यह तरीका सबसे सफल सिद्ध हो सकता है। भारत के सभी लोगों को ऋषियों की तरह जीवन बिताना चाहिए। भारत के सैनिकों को भी ऋषि बन जाना चाहिए, और हर-हर महादेव के साथ उन आततायियों पर हमले करने चाहिए, जो धोखे से हमला करके देश को नुक्सान पहुंचाते रहते हैं। एक बार परख लिया, दो बार परख लिया, चार बार परख लिया। देश कब तक ऐसे उग्रपंथियों को परखता रहेगा?

आतंकवादियों के आश्रयस्थान के ऊपर जितने अधिक प्रतिबन्ध संभव हो, उतने लगा देने चाहिए, अतिशीघ्रतापूर्वक। उन प्रतिबंधों में शामिल हैं, नदी-जल  को रोकना, व्यापार को रोकना, संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकवादी देश घोषित करवाना आदि-2।

एक सैद्धांतिक व प्रेमयोगी वज्र के द्वारा अनुभूत सत्य यह भी है कि जब मन में समस्या (कुण्डलिनी चक्र अवरुद्ध) हो, तभी संसार में भी दिखती है। यही बात यदि उग्रपंथी समझें, तो वे दुनिया को सुधारने की अंधी दौड़ को छोड़ दें।

भगवान करे, उन वीरगति-प्राप्त सैनिकों की आत्मा को शांति मिले।

इस पोस्ट से सम्बंधित अन्य पोस्टों को आप निम्नलिखित लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं-

https://demystifyingkundalini.com/2018/12/23/योग-व-तंत्र-एक-तुलनात्मक-अ

https://demystifyingkundalini.com/2018/07/18/religious-extremism

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

History is the witness that the attacker has won in most of the cases. If he wins, then his success is in front of everyone, but if he loses, he still succeeds. The deep tantric mystery is hidden behind this. Before attacking other, man had prepared the mind completely. The complete preparation of the mind for the attack means that he eliminates the fear of death. He will be able to destroy the fear of death only if both life and death will be equal for him. Life and death will be equal to him, when he will see life in death also, that means, after death, he will accept the matter of getting the Paradise. In other words, this is the Advaita (non-duality), which is the only essence of all philosophies and religions. Many people call the same adwaita as the name of God, Allah etc. Then it is a straightforward thing that every attacker is the man of Allah itself, whether he believe in Allah or does not believe. If he also obeys God or Allah, then he will be blessed with borax on gold, means double reward will be achieved.

Now talk about the attacked. He is never mentally prepared regarding fighting and do or die. This means that he is present inside duality, because he is afraid of death. He is immersed in attachment to life. Its direct effect is that he does not openly fight. Therefore, in most cases he loses. Even if he wins, even then his fear and duality will remain, because his faith remains on the victorious duality. Straightforward it means that he loses even after defeating, and also loses by winning. He can be able to withstand the sudden attack better, who keeps non-duality in his mind at each moment of his life. That means, the mind that lives in a way filled with non-attachment like a Sage-Sannyasi. Even when capable, he does not start the attack, and gives a most appropriate answer to the sudden attack. Such a person is most loved by God. Only then did India take such attacks for thousands of years, and even shown stars in the daytime to the attackers. Only then India has religion dominated, especially Advaita Dharma (non duality-religion). Because of this same power, India never needed to attack anyone. Those need to attack to strengthen their own religion, who cannot hold religion in peace in their daily life. It is not only a mere theory, but also a tantric, Premyogi Vajra has this type of own experience. He has created this website to make every moment of one’s life full of Advaita, the unique and real worship of God.

Now tell a best way. If people, who constantly follow the Advaita Dharma, also continue to get the power of Advaita Dharma by attacking the evil ones, then there will be again borax over the gold. Especially those attackers can be attacked, who are a threat to one’s security, and those who can attack suddenly. Our country is on the same twist today. Here this method can be proven most successful. All people of India should spend life like sages. The soldiers of India should become sages, and with slogan of Har- Har Mahadev, they should attack those terrorists, who continue to harm the country by attacking deceptively. Once those have been tested, tested twice, tested four times. How long will the country test such extremists?

The restrictions on the shelter of the terrorists should be imposed as much as possible, in the fastest way possible. Those restrictions include stopping river-water, preventing trade, declaring a terrorist country in the United Nations etc.

The truth that is perceived by Premyogi vajra is that when there is a problem in the mind (Kundalini Chakra is blocked), then only in the world it is also visible. If extremists understand the same thing, then they should leave the blind race to improve the world.

May God bestow peace to the departed soul of those martyrs.

You can read other posts related to this post by visiting the following link-

https://demystifyingkundalini.com/2018/12/23/योग-व-तंत्र-एक-तुलनात्मक-अ

https://demystifyingkundalini.com/2018/07/18/religious-extremism

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें- How to keep control over body weight through Yoga

योग से शारीरिक वजन को कैसे नियंत्रण में रखें (please browse down or click here to view post in English)

योग के साथ शारीरिक वजन घटता है। यहां तक ​​कि मैंने देखा है कि एक दिन के भारी काम के साथ भी मुझे अपनी पेंट के साथ बेल्ट लगाने की जरूरत महसूस होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मैं दैनिक योग अभ्यास की आदत रखता हूं। जब मैंने कड़ी मेहनत की, तब उसके साथ किए गए नियमित योग-अभ्यास से मेरी भड़की हुई भूख बहुत कम हो गई। इसलिए उस कड़ी मेहनत के साथ हुई वसा-हानि / fat loss को पुनर्निर्मित / recover नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मेरा वजन घट गया। नियमित योग-अभ्यास के बिना सामान्य लोग भारी काम के बाद बहुत अधिक खाते हैं, इस प्रकार वे अपनी खोई हुई वसा का तुरंत पुनर्निर्माण कर लेते हैं। योग-अभ्यास दैनिक और हमेशा के लिए जारी रखा जाना चाहिए। यदि कोई अपना अभ्यास थोड़े समय के लिए जारी रखता है, जैसे कि यदि 2 महीने के लिए कहें, तो उसे अपने शरीर के वजन में कमी का अनुभव होगा। लेकिन अगर वह उसके बाद व्यायाम करना बंद कर देता है, तो उसकी योग से निर्मित शारीरिक व मानसिक शक्ति के पास भूख को उत्तेजित करने के अलावा अन्य कोई काम नहीं रहता है। इसके कारण उसे बहुत भूख लगती है, और वह बहुत भोजन, खासतौर से उच्च ऊर्जा वाले खाद्य पदार्थों को खाता है। इसके परिणामस्वरूप उसके शरीर की वसा का पर्याप्त निर्माण हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शरीर के वजन में एकाएक वृद्धि होती है, जो उसके पहले के मूल वजन को भी पार कर सकती है। तो निरंतर अभ्यास हमेशा जारी रखा जाना चाहिए। यह एक वैज्ञानिक और अनुभव से साबित तथ्य है कि खिंचाव वाली कसरतों / stretching exercises के अभ्यास से थोड़ी-बहुत कैलोरी जल जाती है। यद्यपि योग के अभ्यास से बड़ी मात्रा में कैलोरी जलाई नहीं जाती है, फिर भी ये अभ्यास शरीर को फिट, स्वस्थ और लचीला रखते हैं। यह किसी भी समय किसी भी प्रकार के साधारण या कठिन शारीरिक कार्य को कामयाबी व आसानी के साथ शुरू करने में मदद करता है, और व्यायामशाला के अभ्यास को भी अधिक कारगर बनाता है। इसके अलावा, यह पूरे शरीर में उचित अनुपात में रक्त के समान परिसंचरण में भी मदद करता है। इससे यह शरीर के रिमोट भंडारगृहों में जमा वसा की आसान निकासी में मदद करता है। उससे सभी कोशिकाओं को ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में वसा उपलब्ध हो जाती है। इसलिए शरीर भूख की कमी के लिए ऊर्जा की कमी का संदेश नहीं भेजता है, जिसके परिणामस्वरूप भारी भूख के बावजूद भारी भूख की रोकथाम होती है। परंतु आम लोगों में भारी काम के एकदम बाद भारी भूख भड़क जाती है, जिससे वे अपने खोए हुए वजन की भरपाई एकदम से कर लेते हैं। योग कुछ खास नहीं है, बल्कि भौतिक व्यायाम, सांस लेने और केंद्रित एकाग्रता को बढ़ाने का एक सहक्रियात्मक संयोजन है। फोकसड एकाग्रता / focused concentration इसके लिए विचारों के लिए नियंत्रक वाल्व / controlling valve के रूप में काम करती है, अराजक विचारों की अचानक भीड़ को रोकती है, जिससे इस प्रकार पेरानोइया/ paranoia और दिमाग को झूलने / mind swinging से रोकती है। जब अवचेतन मन में संचित विचार बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, तो उन्हें दिमाग के अंदर ध्यान की केंद्रित छवि द्वारा धीरे-धीरे और सुरक्षित रूप से मुक्त करके छोड़ा जाता रहता है। साथ में, उन विचारों को बाँझ और गैर-हानिकारक बना दिया जाता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो दृढ़ता से उत्तेजित विचार ध्यान की कुण्डलिनी छवि की कंपनी के कारण स्वयं ही शुद्ध हो जाते हैं। यह छवि दिन-प्रतिदिन की सांसारिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली अराजक मानसिक गतिविधियों पर भी जांच रखती है। इसके कारण योग-अभ्यास के लिए एक जुनूनी शौक सा उत्पन्न हो जाता है, और इसे दैनिक कार्यक्रम से कभी भी गायब नहीं होने देता है। कुंडलिनी छवि पर केन्द्रित एकाग्रता के बिना योग-अभ्यास के साथ, योग अभ्यास के लिए शौक जल्द ही खो जाता है, और विभिन्न छिपे हुए विचारों की अराजकता की वजह से दैनिक क्रियाकलाप भी गंभीर रूप से पीड़ित हो जाते हैं।

तांत्रिक तकनीक मानसिक कुंडलिनी छवि को मजबूत करने और इस तरह से योग के प्रति लगन को बढ़ाने के लिए एक और गूढ़ चाल है। इसके परिणामस्वरूप पूरे श्वास में वृद्धि होती है, जिससे पूरे शरीर में पोषक तत्वों से समृद्ध और अच्छी तरह से ऑक्सीजनयुक्त रक्त की आपूर्ति में वृद्धि हो जाती है। इससे यह शरीर के वजन पर भी जांच रखता है। दरअसल तंत्र प्राचीन भारतीय आध्यात्मिकता से अलग कोई स्वतंत्र रूप का अनुशासन नहीं है। तभी तो वेद-शास्त्रों में इसका कम ही वर्णन आता है, जिससे इस रहस्य से अनभिज्ञ लोग महान तंत्र की सत्ता को ही नकारने लगते हैं। यह आत्मजागृति की ओर एक प्राकृतिक और सहज दौड़ / प्रक्रिया ही है। यह तो केवल विभिन्न आध्यात्मिक प्रयासों से पुष्ट की गई कुण्डलिनी को जागरण के लिए अंतिम छलांग / escape velocity ही देता है। यदि किसी की बुद्धि के भीतर कोई आध्यात्मिक उद्देश्य और आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, तो अराजक बाहरी दुनिया के अंदर उपयोग में आ जाने के अलावा तांत्रिक शक्ति के लिए अन्य कोई रास्ता नहीं है। इसका मतलब है कि तांत्रिक तकनीक के लिए आवेदन से पहले कुंडलिनी छवि किसी के दिमाग में पर्याप्त रूप से मजबूत होनी चाहिए। तंत्र तो जागने के लिए कुंडलिनी को आवश्यक और अंतिम भागने की गति ही प्रदान करता है। यह आम बात भी सच है कि गुरु तांत्रिक साधना के साथ अवश्य होना चाहिए। वह गुरु दृढ़ता से चिपकने वाली मानसिक कुंडलिनी छवि के अलावा कुछ विशेष नहीं है। यही कारण है कि बौद्ध-ध्यान में, कई वर्षों के सरल सांद्रता-ध्यान के बाद ही एक योगी को तांत्रिक साधना लेने की अनुमति दी जाती है। लेकिन आज बौद्ध लोग, विषेशतः तिब्बती बुद्ध तंत्र सहित सभी रहस्यों को प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि अब वे लंबे समय से चल रहे बाहरी आक्रमण के कारण अपनी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को खोने से डर रहे हैं।

तंत्र के बारे में विस्तृत जानकारी इस वेबपोस्ट की स्रोत वेबसाईट / source website पर पढ़ी जा सकती है, व पूर्ण जानकारी के लिए निम्नांकित पुस्तक का समर्थन किया जाता है-

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा), एक अनुपम ई-पुस्तक (हिंदी भाषा में, 5 स्टार प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड ) को यहाँ क्लिक करके डाऊनलोड करें। यदि मुद्रित पुस्तक ही आपके अनुकूल है, तो भी, क्योंकि इलेक्ट्रोनिक डीवाईसिस / फोन आदि पर पुस्तक का निरीक्षण करने के उपरांत ही उसका मुद्रित-रूप / print version मंगवाना चाहिए, जो इस पुस्तक के लिए इस लिंक पर उपलब्ध है। धन्यवाद।

ई-रीडर व ई-बुक्स के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहां क्लिक करें।

How to keep control over body weight through Yoga

Body weight decreases with yoga. Even I have noticed my pent becoming lose at waist even with one day of heavy physical work. This occurs because I am habitual of daily yoga practice. When I worked hard, routine yoga exercise along with that depressed my appetite due to my too tiredness. So fat loss with that hard work was not rebuilt up, which resulted in my weight loss. Ordinary people without routine yoga practice eat a lot after heavy work thus rebuilding up their lost fat immediately. Yogic exercises should be continued daily and forever. If anyone continues his exercises for short time, say for 2 months, then he would experience reduction in his body weight. But if he stops exercising after that, then his built up stamina has no way to work other than to provoke the voracious appetite. Due to this he becomes too hungry and eats foods especially high energy foods abundantly. This results in substantial build up of his body fat which results in his body weight gain again that can surpass even his earlier basic body weight. So exercises continued should be kept continued always. It is a scientifically and experientially proven fact that hathyogic stretching exercises burn down a moderate amount of calories. Although stretching type yoga exercises don’t burn major amount of calories yet these exercises keep body fit, healthy, active and flexible. This helps in undertaking of any type of simple or hard physical work at any time successfully and with ease, also making gym exercises more effective. Also, it also helps in uniform circulation of blood throughout the entire body in appropriate proportions. This helps in easy withdrawal of fat deposited in the remote storehouses of the body. This in turn makes that fat available to all the body cells as the main source of energy. Therefore body doesn’t send the message of energy shortage to the appetite centre, that results in inhibition of voracious appetite just as seen commonly after a heavy work. Yoga is nothing special but a synergistic combination of stretching exercises, breathing and focused concentration. Focused concentration works as a controller valve for thoughts for it prevents sudden rush of chaotic thoughts thus preventing build up of paranoia and mind swinging. When accumulated thoughts in subconscious mind becomes too agitated then those are made to be released slowly and safely by the meditatively focused image inside the mind. Those thoughts are made sterile and non harmful or in other words get purified due to company of that strongly shimmering meditative image. That image also keeps check over the chaotic mental activities arising out of day to day worldly activities. Due to this an interest is generated inside the yoga practice and it is never missed out of daily schedule. With yoga exercises without the focused concentration on a kundalini image, interest for yoga exercises is lost soon and daily schedule severally suffers due to the chaotic rush of various hidden thoughts.

Tantric technique is another trick to reinforce the mental kundalini image and thus to enhance up the yoga-interest. It also results in enhanced breathing thus profuse supply of nutrient rich and well oxygenated blood to the entire body. This also puts a check over body weight. Actually tantra is not a separate discipline at its own independent of the ancient Indian spiritualism. It is a natural and spontaneous run / process towards the awakening. It only reinforces the spiritual efforts as a final or leaping step to awakening. If there is no spiritual motive and spiritual achievement inside one’s intellect, then there is no way for tantric power to go other than to become used up inside the chaotic external world. It means that kundalini image should be enough strong inside one’s mind prior to the application of tantric technique. Tantra provides the required and final escape velocity to kundalini to awakening. This is true for the common saying that Guru must be there with tantric sadhna. That guru is nothing other than the firmly affixed mental kundalini image. This is the reason why in Buddhist meditation, a yogi is allowed to take over the tantric sadhna after spending many years of simple concentrating meditation. But today Buddhists especially Tibetan Buddhists are trying to reveal all the secrets including the tantra to the world for they are afraid of losing for ever their rich spiritual heritage due to the long persisting external invasion.

You can learn about tantra in detail at the parent website of this web post, and for full detail following book is recommended-

If you have found some benefit from this post, please download here the above mentioned e-book (in Hindi language, 5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone). If only print version suits you, then too print version should only be got after testing that’s e- version on the electronic devices / phone etc., that is available on this link for this book. You can also find the complete information about this book, both in English as well as Hindi languages on the hosting website of this post. Thank you.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Know in full detail about e-readers and e-books here.

 

पुस्तक-प्रचार, एक निःशुल्क पुस्तकों का खजाना- Book-promotion as a treasure of free books

पुस्तक-प्रचार, एक निःशुल्क पुस्तकों का खजाना (ई-पुस्तकों व ई-रीडर के बारे में सम्पूर्ण, दिलचस्प व स्वानुभूत जानकारी)- Please browse down or click this Link to see post in English

उदाहरण के लिए इस लिंक को क्लिक करके आपको हिंदी की एक अत्युत्तम ई-पुस्तक (*****पांच सितारा प्राप्त, सर्वश्रेष्ठ व सर्वपठनीय उत्कृष्ट / अत्युत्तम / अनौखीरूप में समीक्षित / रिव्यूड) अति कम मूल्य पर उपलब्ध हो जाएगी। फिर कोई पुस्तकप्रेमी यदि उसका कागजी-प्रतिरूप भी अपने पास रखना चाहे, तो उसे बाद में मंगवा सकता है। यदि किसी सज्जन के पास अपना ई-रीडर नहीं है, या वे ई-रीडर में पढ़ना पसंद नहीं करते हैं, तो वे अपने मोबाईल फोन पर ही उक्त पुस्तक को  न्यूनतम मूल्य में डाऊनलोड कर सकते हैं। यदि बीच-2 में जांचने-परखने पर वह पुस्तक उन्हें अच्छी लगे, तो वे उस पुस्तक के सशुल्क कागजी-प्रतिरूप (प्रिंट वर्जन) को बाद में मंगवा सकते हैं।

ऐसी बहुत सी वेबसाईटें हैं, जो प्रचारान्तर्गत पुस्तकों (प्रोमोशनल बुक्स) को सूचिबद्ध करती हैं, तथा पुस्तक-प्रेमियों को निःशुल्क उपलब्ध करवाती हैं (यद्यपि भारत के पुस्तक प्रेमियों के लिए यह सेवा मुझे उपलब्ध नहीं दिखती है)। उन वेबसाईटों के माध्यम से हमें नए जमाने की नई-2 पुस्तकों के बारे में निःशुल्क जानकारी प्राप्त होती रहती है। यदि कोई पुस्तक हमें अच्छी लगे, तो उसे हम विस्तार के साथ भी पढ़ सकते हैं। पूरी पढ़ने के बाद यदि हमें पुस्तक प्रशंसा के योग्य लगे, और यदि हम अन्य लोगों से भी उसके पढ़ने के लिए उसकी सिफारिश करना चाहते हैं, तब हम उसी वेबसाईट पर या पुस्तक-विक्रेता वेबसाईट पर उसका रिव्यू / review भी डाल सकते हैं। जिनके पास किन्डल ई-रीडर / kindle e-reader है, या अन्य कंपनियों के ई-रीडर हैं, उनके लिए तो वे निःशुल्क पुस्तकें किसी वरदान से कम नहीं होतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ई-रीडर पर कागजी पुस्तक से कहीं अधिक अच्छा पढ़ा जाता है। वे आँखों पर ज़रा भी दुष्प्रभाव नहीं डालते, क्योंकि उनमें मोबाईल फोन की तरह लाईट / रेडिएशन नहीं होती, बल्कि वे बाहर की रौशनी से ही पढ़े जाते हैं, कागजी पुस्तकों की तरह ही। उसमें ई-स्याही (e-ink) होती है, जिसमें कोई रेडिएशन नहीं होती। इसी वजह से उसमें बहुत कम बिजली खर्च होती है। एक बार फुल चार्ज करने के बाद वह एक हफ्ते से लेकर एक महीने तक चल पड़ता है, प्रयोग के अनुसार। उसमें हम अपनी सुविधानुसार अक्षरों को छोटा या बड़ा कर सकते हैं, बहुत लम्बी रेंज तक। यह सुविधा दृष्टिदोष वालों के लिए व बुजुर्ग लोगों के लिए बहुत फायदेमंद साबित होती है। अक्षरों को बड़ा करके उसे रेलगाड़ी या बस में भी आराम से पढ़ा जा सकता है। उसकी एक ख़ास बात होती है कि उसमें सैंकड़ों पुस्तकें भंडारित करके रखी जा सकती हैं, जिससे पुस्तकों का भारी-भरकम बोझ साथ में उठा कर रखने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। क्या पता कि कब किस प्रकार की पुस्तक को पढ़ने का मन कर जाए। कहीं पर भी यदि आदमी को किसी चीज का इन्तजार करते हुए बोरियत व समय की बर्बादी महसूस होने लगे, तो उससे बचने का सर्वोत्तम उपाय ई-रीडर ही है। इसके प्रयोग से मोबाईल फोन की जरूरत से ज्यादा लत भी धीरे-२ छूटने लगती है। लगभग एक बड़े मोबाईल फोन के या औसत टेबलेट के जितने आकार (परन्तु कुछ अधिक वर्गाकार आकृति होती है ई-रीडर की) के ई-रीडर का वजन केवलमात्र 50-75 ग्राम के आसपास प्रतीत होता है, और एक पुराने जमाने के छोटे मोबाईल फोन के वजन जितना लगता है। इसमें कम्प्यूटिंग जगत का सबसे साधारण प्रॉसेसर, सेलेरोन लगा होता है, जिससे यह कभी गर्म भी नहीं होता।इसका मतलब यह है कि ई-रीडर बहुत हल्का होता है। उसकी एक अन्य खासियत यह है कि जो पुस्तक हमने जहां तक पढ़ी हो, उसे दुबारा खोलने पर वह वहीं से शुरू होती है। इसलिए कागजी पुस्तक की तरह निशान लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। पुस्तक के किसी भी भाग में हम मात्र एक क्लिक से पहुँच सकते हैं। उसके अक्षरों को हम आवश्यकतानुसार हाईलाईट / highlight कर सकते हैं, और उसे उसी जैसे ई-रीडर पर वही ई-पुस्तक पढ़ रहे लोगों के साथ शेयर / share भी कर सकते हैं। उसमें शब्दकोश की सुविधा भी होती है। किसी अंग्रेजी के शब्द को क्लिक करके उसका विस्तृत अर्थ सामने आ जाता है। अतः उसमें कठिन से कठिन अंग्रेजी में पुस्तकों को भी आसानी से पढ़ सकते हैं। उसको पढ़ने के लिए उतने ही प्रकाश की आवश्यकता होती है, जितने प्रकाश की आवश्यकता एक कागजी पुस्तक को पढ़ने के लिए होती है। परन्तु अब नए व तुलनात्मक रूप से महंगे ई-रीडरों में अपनी लाईट भी लगी होती है। उसे हम बाहरी प्रकाश के अनुसार एडजस्ट भी कर सकते हैं। वह लाईट वास्तव में ई-रीडर के अन्दर से नहीं आती, बल्कि स्क्रीन के बाहर, उसके किनारों पर लगे बल्बों से स्क्रीन के ऊपर बाहर से पड़ती रहती है। इसका अर्थ है कि उन ई-रीडरों को हम रात के समय अपने बेडरूम में ही, रूमलाईट को जलाए बिना व अन्य पारिवारिक सदस्यों की नींद खराब किए बिना भी पढ़ सकते हैं। इससे बिजली की भी बचत हो जाती है, क्योंकि उस प्रकार के ई-रीडर में बहुत कम पावर की एलईडी लाईट लगी होती है। एक साधारण ई-रीडर का न्यूनतम मूल्य लगभग 5500 रुपए होता है, वहीँ अपनी लाईट वाले एक आधुनिक ई-रीडर का न्यूनतम मूल्य लगभग 8500 रुपये होता है। दोनों में केवल लाईट का ही अंतर होता है, अन्य कुछ नहीं या बहुत मामूली / अस्पष्ट सा (महंगे वाले में अधिक स्क्रीन रिजोल्यूशन होता है)। किन्डल / kindle के ई-रीडर सबसे सस्ते माने जाते हैं। सनेपडील / snapdeal के माध्यम से न्यूनतम मूल्य पर मिल जाते हैं। जहाँ पर पसंदीदा कागजी पुस्तक को मंगवाने के लिए कई दिन या हफ्ते लग जाते हैं, वहीँ पर ई-रीडर के माध्यम से एक मिनट से भी कम समय में ई-पुस्तक उपलब्ध हो जाती है। कई पुस्तकें तो ई-पुस्तकों के रूप में ही मिलती हैं, क्योंकि उन पुस्तकों के कागजी प्रतिरूप छपे ही नहीं होते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि या तो पुस्तक नई-2 बाजार में आई होती है, या उसका लेखक विभिन्न बाध्यताओं के कारण उसके कागजी प्रतिरूप को नहीं छपवा पाता। ई-रीडर में इंटरनेट भी चल सकता है। यद्यपि उसमें इंटरनेट चलाना मोबाईल फोन के जितना सुविधाजनक तो नहीं होता, परन्तु फिर भी पुस्तकों को सर्च करने और उन्हें डाऊनलोड करने के लिए काफी होता है। ई-रीडर में वाई-फाई रिसीवर भी लगा होता है, जिससे वह हमारे स्मार्टफोन के वाई-फाई हॉटस्पॉट से उत्सर्जित इंटरनेट डाटा-युक्त सिग्नल को रिसीव कर सकता है, और उससे पुस्तक-हेतु इंटरनेट सर्फ़ कर सकता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे हम एक फोन से दूसरे फोन को वाई-फाई से इंटरनेट का सिग्नल भेजते हैं। हम अपने स्मार्टफोन पर भी ई-पुस्तक को डाऊनलोड कर सकते हैं, और फिर दोनों डिवाईसों / उपकरणों को वाई-फाई के माध्यम से सिंक / sync करके, उस ई-पुस्तक को ई-रीडर को भेज सकते हैं। कई बार सिंक होने में कठिनाई आती है, इसलिए उस समय सीधे ही ई-रीडर पर डाऊनलोड करना ठीक रहता है। इससे हम ई-रीडर को दुबारा रिसेट / reset करने से बच जाते हैं। यद्यपि किनडल कंपनी के बाहर से प्राप्त की गईं सशुल्क व  निःशुल्क पीडीएफ पुस्तकें ई-रीडर पर सीधी डाउनलोड नहीं की जा सकतीं, इसलिए उन्हें पहले फोन पर डाउनलोड करना पड़ता है। इसलिए सिंक को पुनः चालू करने के लिए ई-रीडर को रिसेट करना पड़ता है। उससे पहले की डाऊनलोड की हुई पुस्तकें ई-रीडर से गायब हो जाती हैं, हालांकि रिसेटिंग के बाद वे फिर से लाईब्रेरी में प्रतीक रूप में दिख जाती हैं, जिन्हें फिर से डाऊनलोड करना पड़ता है। जो पुस्तकें ई-रीडर वाली कंपनी से नहीं प्राप्त की गई थीं, अपितु कहीं बाहर से हासिल की गई थीं व कनवर्ट करके ई-रीडर को भेजी गई थीं, वे रिसेटिंग के बाद नहीं दिखतीं। इसलिए उन ई-पुस्तकों के पीडीएफ वर्जन को अपने स्मार्ट फोन पर सुरक्षित रखना चाहिए या क्लाउड सर्विस / cloud service (like evernote) पर सुरक्षित रूप से भंडारित करके रखना चाहिए, ताकि बाद में उन्हें फिर से कन्वर्ट करके ई-रीडर को भेजा जा सके और उनकी मूल वेबसाईटों में उन्हें ढूँढने में दिक्कत भी न हो। रिसेटिंग के थोड़े से झंझट से बचने के लिए डाटा केबल के प्रयोग से ई-पुस्तकों को अन्य इलेक्ट्रोनिक स्टोरेज डिवाईसिस से ई-रीडर को भेजा जा सकता है। महंगे ई रीडर में अपना इंटरनेट भी होता है। उससे हम शान्ति के लिए अपना फोन घर पर छोड़कर भी ई रीडर के साथ घूम सकते है।  किन्डल कंपनी पीडीएफ पुस्तक को स्वयं कन्वर्ट करने की सुविधा भी देती है। उसके लिए ई-रीडर में किन्डल सर्विस से जुड़े हुए अपने ईमेल आईडी को एक्टिवेट करने की ऑप्शन होती है। उस ईमेल पते पर उस पीडीएफ बुक को अटेचमेंट के रूप में भेजा जाता है, तथा मेसेज की सब्जेक्ट लाइन में CONVERT लिखा जाता है। फिर वह बुक रीडेबल मोबि फोरमेट में हमारे ई-रीडर पर पहुँच जाती है, जिसे हम फिर डाऊनलोड कर लेते हैं।

ई-रीडरों का भविष्य उज्जवल है। पुस्तकीय कागज़ के लिए पेड़ों का अंधाधुंध कटान हो रहा है, जिससे पर्यावरण को हानि पहुँच रही है, और कागज़-उद्योगों से प्रदूषण भी बढ़ रहा है। यदि कोई व्यक्ति ई-रीडर पर 100 ई-पुस्तकें पढ़ता है, तो इसका अर्थ है कि उसने उन पुस्तकों में प्रयुक्त होने वाले कागज़ को बचाया। हमारे देश के विद्यालयों में कागज़ की बहुत खपत व साथ में बर्बादी भी होती है, क्योंकि कक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद अधिकाँश विद्यार्थी अपनी पुस्तकों को रद्दी में बेच देते हैं। वे किताबें सिर्फ एक साल ही पढ़ी गई होती हैं, जिससे वे नई होती हैं। विदेशों की तरह ही, पुस्तकें विद्यालयों के द्वारा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए, और कक्षा पूरी करने के बाद विद्यार्थी से वापिस ले ली जानी चाहिए, ताकि वे नए विद्यार्थी को पढ़ने के लिए दी जा सकें। इससे विद्यार्थी पुस्तकों का सम्मान करना भी सीखेंगे। इससे जहां एक ओर कागज़ की बर्बादी रुकेगी, वहीँ पर सर्वशिक्षा अभियान को भी मदद मिलेगी। यदि कागज़ की पूर्ण बचत करनी हो, तो विद्यालयों में भी सभी को ई-रीडर उपलब्ध करवा दिए जाने चाहिए।

ई-पुस्तकों से ज्ञान एकदम से और चारों ओर से बढ़ता है, जो आध्यात्मिक उत्कर्ष / कुण्डलिनी-जागरण के लिए अत्यावश्यक है। अधिकाँश मामलों में आध्यात्मिक रुचि केवल थोड़े से समय के लिए ही उत्पन्न होती है। इसलिए उस रुचि को पूरा करने वाली पुस्तक तुरंत मिलनी चाहिए, जो ई-बुक से ही संभव है। फिर स्थान-2 के आध्यात्मिक आश्रमों, योगाश्रमों या आध्यात्मिक / मनोहर प्रकृतियों के बीच में भौतिक पुस्तकों को उठा कर घूमा भी तो नहीं जा सकता। जब तक कागजी पुस्तक जिज्ञासु व्यक्ति तक पहुंचती है, तब तक उसका शौक या तो ठंडा पड़ गया होता है, या नष्ट हो गया होता है, समय की कमी से या अन्य अनेक कारणों से। इसका ताजा उदाहरण है, इस वेबसाईट व उपरोक्त प्रचाराधीन पुस्तक का नायक, “प्रेमयोगी वज्र”। उसने विभिन्न वेबसाईटों, ई-पुस्तक विक्रेता वेबसाईटों, ई-रीडर व ई-पुस्तकों के माध्यम से तीव्रता से अपने आध्यात्मिक उत्कर्ष को प्राप्त किया।

यह जानकर हैरानी होगी कि जापान जैसे तकनीकप्रधान देश के लोग भी बहुत पुस्तक-प्रेमी होते हैं। वहां पर नई पुस्तक की रिलीज के बाहर उतनी भीड़ लग जाती है, जितनी हमारे देश में नई फ़िल्म की रिलीज के बाहर नहीं लगती। भारत में अन्य विकसित देशों की तुलना में अभी ई-रीडर का चलन बहुत कम है, और अधिकाँश लोग भौतिक / कागजी पुस्तक के ही आश्रित हैं। अच्छी ई-पुस्तकों के बाजार में आने से ई-रीडर के चलन में तेजी आएगी।

जो सामग्री इस ई-पुस्तक में उपलब्ध है, वह पूरी की पूरी इस वर्तमान ब्लॉग की मेजबानी-वेबसाईट / hosting website पर भी उपलब्ध है। नया कुछ नहीं है। ई-पुस्तक में तो केवल उस सामग्री को अधिक निष्ठा व मेहनत के साथ विस्तृत किया गया है, और सजाया गया है। कुशाग्रबुद्धि व मेहनती व्यक्ति तो इस वेबसाईट को समझ कर उसकी सामग्री से खुद भी इस ई-पुस्तक को तैयार कर सकता है। होना भी ऐसा ही चाहिए। सभी लोग भिन्न-2 होते हैं। कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर होता है, जो पुस्तक नहीं खरीद सकता और उसके पास समय की भी कमी होती है। किसी व्यक्ति को पुस्तकें पढ़ने का शौक नहीं होता। वैसे व्यक्तियों के लिए वेबसाईट ही बहुत होती है। कोई व्यक्ति निःशुल्क या सस्ती वस्तु को तुच्छ समझता है। कोई व्यक्ति महँगी पुस्तक को पसंद नहीं करता। वैसे व्यक्ति के लिए सस्ती ई-पुस्तक को बनाया गया है। कोई व्यक्ति मूल्यवान व गुणवान वस्तु को निःशुल्क प्राप्त करना चाहता है, विविध कारणों से। वैसे व्यक्ति के लिए इस पुस्तक का यह त्रिदिवसीय व वर्तमानकालिक निःशुल्क पुस्तक का प्रचाराभियान रखा गया है। कोई व्यक्ति ई-पुस्तक को महत्त्व देता है, तो कोई कागजी-पुस्तक को। ताकि सभी प्रकार के व्यक्तियों की जरूरतें पूरी हो सकें, इसीलिए इस प्रकार की अनेकदिशात्मक प्रणाली को बनाया जाता है।

कई बार क्या होता है कि हम बहुत सी मुश्किलों का सामना करते हुए कागजी पुस्तक / paper book खरीद भी लेते हैं। फिर यदि वह अच्छी न भी लगे, तो भी उसे मजबूरीवश पढ़ना ही पढ़ता है, क्योंकि उसमें बहुत सा पैसा खर्च किया गया होता है, और बेशकीमती कागज़ भी। इसके विपरीत इंटरनेट / internet पर हजारों ई-पुस्तकें पीडीएफ फाईल / pdf file के रूप में निःशुल्क उपलब्ध होती हैं। हम बहुत आसानी से उन पीडीएफ फाईलों को ऑनलाईन या ऑफलाइन फाईल कनवर्टरों / file converters (कैलिबर / caliber आदि) से ई-रीडर पर पढ़ने योग्य (किन्डल के लिए मोबी फाईल / mobi file के रूप में) बना सकते हैं। इस तरह से हम बीसियों पुस्तकों को एकसाथ डाऊनलोड / download कर सकते हैं। उन्हें हम बन्दर-दृष्टि से बीच-२ में व जल्दी-२ से पढ़ सकते हैं। पुस्तकों के जो भाग हमें अच्छे लगें, हम सिर्फ उन्हें ही पढ़ सकते हैं, बाकि के निरर्थक भाग को छोड़कर। यह तरीका खोजी प्रकार के लोगों के लिए बहुत अच्छा रहता है, क्योंकि उन्होंने किसी एक संक्षिप्त विषय के बारे में वर्तमान तक की विश्वभर की सम्पूर्ण जानकारी चाहिए होती है, ताकि वे कुछ उससे अलग व नया कर सके। भौतिक पुस्तकों से हम इतनी शीघ्रता से जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। यदि हम किसी एक विषय से सम्बंधित विश्व की सभी कागजी पुस्तकों को पुस्तकालय आदि में प्राप्त भी कर लें, तो भी उस विषय के बारे में सभी पुस्तकों को पड़ना बहुत दूभर व असंभव सा ही होता है। क्योंकि वैसा करते हुए समय भी बहुत लगेगा, और हमारे शरीर का 5 किलोग्राम वजन भी घट जाएगा। धूल खाने को मिलेगी, वह अलग। साथ में, जल्दबाजी में व सामान्य प्रयोग-क्षरण के तहत भौतिक पुस्तकों को जो नुक्सान होगा, वह भी अलग।  ई-रीडर को तो हम धूप में भी पढ़ सकते हैं, कागजी पुस्तक की तरह ही। यह इसका विशेष गुण है, जो फोन या कम्प्यूटर आदि में नहीं होता है।

कागजी पुस्तक को तो निःशुल्क नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उस पर भौतिक संसाधन खर्च किए गए होते हैं। इसी तरह से, कागजी पुस्तकों के प्रोमोशनल ऑफर / promotional offer भी नहीं दिए जा सकते। इस बात को लेकर भी मुकाबले में ई-पुस्तक ही बाजी मार जाती है। इसकी एक ही कमी है कि इसमें चित्र अच्छे नहीं दिखते, रंग तो दिखते ही नहीं। ई-स्याही केवल श्वेत-श्याम ही दिखा सकती है।इस क्षेत्र में भी इसमें सुधार चल रहा है।

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

पुस्तक के स्वयंप्रकाशन से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करें।

Book-promotion as a treasure of free books (Full, interesting and experiential information about e-books and e-readers)

For example, by clicking on this link, you will get one of the best Hindi eBooks (*****5 star rated, reviewed as the best, excellent and must read by everyone) at minimum price tag. Then if someone book lover wants to keep its paper-version too, then he can arrange it later. If a gentleman does not have his e-reader, or he does not like to read on an e-reader, he can download this above said book on his mobile phone. If the book looks good to him, then he can order the comparatively costlier paper version of that book later on.

There are many such websites, which lists promotional books, and make books available to book lovers free of charge (although this service doesn’t appear to me available for Indian book lovers presently). Through these websites, we get free new information about new-age new books. If a book looks good to us, then we can also read it with detail. After reading the entire book, if we find the book worthy of praise and if we want to recommend it to other people to read it, then we can put a review on the same website or book-seller website. For those who have a kindle e-reader, or e-readers of other companies, those free books are not less than any boon. This is because the e-reader is better to read than the paper book. These do not have any side effects on their eyes, because these do not have light / radiation, like mobile phones, but they are read only in the outside light, just like paper books. There is an e-ink in which there is no radiation. That is why it costs very little power. Once full charge, this works from one week to one month according to usage. In this we can shorten or enlarge the letters at our convenience, to a very long range. This feature proves to be beneficial for partially blind people and elderly people. The letters can be expanded and read comfortably even at the train or bus. There is a special thing that hundreds of books can be stored in it, this eliminates the need to keep a heavy load of books together. Do you know when to read what type of book? If somewhere waiting for a man feeling boredom and waste of time waiting for something, then the best way to avoid it is e-reader. Using this, the excessive addiction of mobile phone also decreases slowly. The weight of the e-reader of the size of a large mobile phone or small tablet appears only around 50-75 grams, that is the weight of the old mobile phone. It works on simplest computing processor, celeron, so it never heats up. This means that the e-reader is very light. Another feature of it is that the book that we have read as far as it has been opened, it starts it right there. That is why it does not need to be marked as a paper book. In any part of the book, we can reach with just one click. We can highlight words of e-book in it and share with people same book on similar e-reader. It requires as much light to read it, as much as the light is needed to read a paper book. But now, the new and comparatively costly e-readers have their own lights. We can also adjust that according to the outer light. The light does not actually come from the e-reader inside, but it keeps coming from the outside of the screen with the bulbs on its edges, outside the screen. This means that we can read those e-readers in the night of the bedroom, without switching on the room light and disturbing sleep of other room partners. This also saves electricity, because this type of e-reader has very low power LED light. The minimum value of a simple e-reader is about INR 5500, the minimum price of a modern e-reader with its own light is about INR 8500. there is not any other appreciable difference between both except of the barely noticeable higher screen resolution of the costly one. Kindle E-readers are counted as cheapest. Through snapdeal these are available at a minimum price. Where it takes days or weeks to get a favorite paper book, its e-Book version becomes available in less than a minute via e-reader. Many books are available only in the form of e-books, because the paper versions of those books are not printed. This is because either the book has come newly in the market, or its author has not been able to print its paper counterpart due to various compulsions. The Internet can also run in the e-Reader. Although running the Internet is not as convenient as in the mobile phone, but still it is enough to search and download the books. The e-reader also has a Wi-Fi receiver, so that it can receive Internet data signal emitted from the Wi-Fi hotspot of our smart phone, and it can surf the Internet for the book. It is just like we send an Internet signal from one phone to another. We can also download the e-book on our smart phone, and then by syncing both the devices via Wi-Fi, you can send that e-book to the e-reader. Many times, there is problem in syncing. In such cases it is better to download the e-book directly on e-reader. Due to this we are saved from resetting the e-reader. However, free or prized pdf-books from sources other than kindle can not be directly downloaded on the e-reader. In that case we have to reset the e-reader. Due to that old downloaded e-books are washed away, however they are again visible on e-reader after resetting to be downloaded. To be saved from resetting, data cable can be used to transfer book from other storage devices to kindle. Books which were not received from the e-reader company, but were received from outside elsewhere and converted then sent to e-readers, those do not appear after the resetting. So pdf version of those books needs to be properly stored in the smart phone or cloud service (evernote etc.) so that those could be again sent to e-reader after conversion and also those pdf books need not to be searched again in the source website. Some costly e readers have their own internet. So we can wander with those peacefully leaving our phone at home. Kindle Company also gives the facility to convert the PDF book itself. For that, the e-reader has an option to activate the email id associated with the Kindle Service. That PDF is sent on that activated address as an attachment, and in the subject line of message it is written, CONVERT. Then the book reaches our e-reader in the readable Mobi format, which we then download again. Other than the facility of highlighting the text on e reader, there is also dictionary facility in it. On clicking a word it’s detailed meaning pops up. So it’s easy to read challenging English books in it.

The future of e-readers is bright. The trees are being indiscriminately cut down for the paper, which is causing harm to the environment, and pollution from paper industries is also increasing. If a person reads 100 eBooks on e-Reader, it means that he has saved the paper used in those books. There is a lot of paper consumption in our country’s schools as well as its wastage because most of the students sell their books in the trash after passing the class. Those books have been read only for one year, due to which those are new. Like abroad, books should be made available by the schools, and after completing the class, the books should be taken back from the student and should be given to new student to read. Then students will also learn to care for books. This will help prevent the waste of paper on one hand, the Sarva Shiksha Abhiyan / Mission of education to all will also be helped on other hand. If there is desired a complete saving of paper, then everyone should be provided e-reader in schools too.

Knowledge from e-books grows instantly and all around, which is essential for spiritual prosperity / Kundalini-Jagran / awakening. In most people, spiritual interest arises only for a short time. Therefore, a book fulfilling that interest should be available immediately, which is possible only through the e-book. Also, in the spiritual ashrams / retreats, yoga-ashrams or spiritual / attractive natural places, one cannot wander through lifting physical books. As long as the paper book reaches the inquisitive person, then his hobbies have either fallen or destroyed, due to lack of time or many other reasons. The latest example of this is the protagonist of this on-promotion book and this very same website too, “Premogi vajra”. He achieved his spiritual prosperity through various websites, e-book vendor websites, e-readers and e-books.

It will be surprising to know that people of tech-driven country like Japan are very book-lovers. There is so much rush outside the release of the new book, as does not seem to be outside the release of the new film in our country. In India, the trend of e-readers is very low compared to other developed countries, and most people are dependent on the physical / paper books. With good e-books coming into the market, the e-reader trend will accelerate.

The content available in this e-book is also available entirely on this current blog-hosting website. Nothing new. In e-book, only that material has been expanded with more fidelity and hard work, and is decorated. A diligent person can understand this website and prepare his own eBook from this content. It should be the same. All people are different from each other. Someone is financially weak, who cannot buy a book. Someone don’t like books. For such persons the website is very much. Someone considers free or low cost thing to be despised. Someone does not like expensive books. The cheap e-book has been made for such a person. Someone wants to get valuable and costly book for free. For that person, this three days long, free eBook promotional offer has been kept. Someone gives importance to e-book, but for someone paper-book is important. In order to meet the needs of all types of individuals, this kind of much disciplinary system is made.

What happens many times, that we also hire a paper book while facing many difficulties. Even if it does not feel good, he reads it strictly, because he has spent a lot of money in it, and even prized papers. On the contrary, thousands of eBooks are available free of charge as PDF file on the internet. We can easily make those PDF files through online or offline file converters (caliber etc) readable on e-reader (as a mobi file for kindle). In this way, we can download twenties of books together. We can read them with monkey-eye, rapidly and selectively. The parts of the books that we think are good; we can only read those, except for the futile part of the rest. This method is very good for people of the type of searching and researching habit, because they need a brief subject to be present in the whole world till date, so that they can do something different and new. We cannot get information from physical books so quickly. Even if we get all the world’s books together in the library etc. related to one topic, then even reading all the books about that subject is very confusing and nearly impossible. Because doing so will take too much time, and our body will also lose 5-kilogram weight. Dust will also be eaten little or more. In the hasty and common use-erosion, the damage to physical books is also there. We can also read the e-Reader in the sun, just like a paper book. This is its special quality, which is not in the phone or computer etc.

The paper book cannot be made free because the physical resources are spent on it. Similarly, promotional offers of paper books cannot be given too. E-book only gets hit in this match about this matter. It’s only drawback is that it doesn’t show pictures well, never show colours at all. E-ink can only show black and white.

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

Get complete information about self publishing.

Mahishasur mardini (goddess, killer of demon mahishasur)-महिषासुर मर्दिनी

Mahishasur mardini (कृपया इस पोस्ट को हिंदी में पढ़ने के लिए नीचे ब्राऊस करें या इस वाक्य के लिंक पर क्लिक करें)

Mahishasur was a great demon in prehistoric ages. He was having nature and appearance that of a male Buffalo. He used to appear as a divine and smart human being or as a male Buffalo as per his willingness. His army and followers of Buffalo race were too strong to be defeated even by the gods / demigods / devatas. He had captured all the territories including the divine and astral ones. He was torturing everyone. Ordinary people went to the doorsteps of gods, but they were unable to help those and were themselves too badly affected for the demon was not allowing them to work for the development of human race, most intelligent of all the creatures. Ultimately all gods became gathered and went to the doorstep of super god Bramha. He along with those went to another super god Shiva. He finding himself unable to help those went to last and topmost super god Vishnu along with them. Vishnu told them the importance of unity. All gods and super gods expressed out their individual powers. Those all individual powers were then united together and came out in the form of a super power in the appearance of a too beautiful, powerful and divine goddess called as Durga. She warned the demon many times but he took her lightly. Ultimately she killed him thus opening the way for the development of humanity and divinity.
This is a classical pauranik story of Hindu religious literature. We can take it into original scientific form. Mahishasur demon was the prehistoric dinosaur kingdom when Buffalo-mouthed reptilians used to roam the earth, hindering the human evolution by the natural elements / gods. No separate / lonely natural element was able to detain those. So in embodied / body less human spirits went to the personified heads of those natural elements / gods to help them for their embodied expression. Those natural elements ultimately joined together and made a most favorable condition for their destruction in the form of that scientifically proved drastic and prehistoric meteorite-hit that pushed dinosaurs to extinction. The flashing light of that meteorite was considered as the most beautiful goddess that was made through the so rare incidence of union of all of the favorable climatic conditions as union of individual powers of all the climate controlling natural elements / gods. May be that small meteorite-hits also occured before that drastic one as the signs of warning from the goddess.
This proves that ancient pauranik stories are just only the personified descriptions of the real and scientific world around us. This has only been done with a motive to produce functional non duality that leads to kundalini awakening with sustained practice. So these puranas should be regularly read, understood and that’s non dual attitude attached with one’s own individual life.
Premyogi vajra has made a Tantric book in Hindi, in which he has described universe existing inside our own body in a Purana-style. He has taken help of medical science for this. He has correlated everything happening inside our own human body with our gross social life. It’s already proved that whatever there is inside the universe, that everything is present inside our own body. His book appears more interesting than Purana today for he has written everything that’s scientifically proved, so in an easy form to comprehend. I have myself read it and found it suddenly transforming and spiritually elevating. It’s an extraordinary, incomparable and wonderful book. Detailed description of this book is available here at-

The non dual, tantric, Kundalini yoga technique (the real meditation), and spiritual Enlightenment explained, verified, clarified, simplified, justified, taught, guided, defined, displayed, summarized, and proved in an experiential, philosophical, practical, humanely, scientific and logical way best over

If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.

 

महिषासुर प्रागैतिहासिक युग में एक महान दैत्य था। वह पुरुष बफेलो / भैंसे के जैसे स्वभाव व उसीकी जैसी शक्ल का था। वह अपनी इच्छा के अनुसार कभी एक दिव्य और स्मार्ट / सुन्दर इंसान और कभी एक भैंसे के रूप में दिखाई देता था। भैंस-वंश की उसकी सेना और उसके अनुयायी देवताओं द्वारा भी पराजित होने के लिए नहीं बने थे। उन्होंने दिव्य और सूक्ष्म लोकों सहित सभी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। वह महिषराज हर किसी को यातना दे रहा था। साधारण लोग देवताओं के दरवाजे पर सहायता के लिए गए, लेकिन वे उन लोगों की मदद करने में असमर्थ थे और उन राक्षसों से खुद भी बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जिससे उन्हें उस मानव जाति के विकास के लिए काम करने की इजाजत नहीं मिल पा रही थी, जो सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान होती है। आखिरकार सभी देवता इकट्ठे हो गए और सुपर गॉड / महा देवता ब्रह्मा के द्वार पर गए। वे उनके साथ एक और सुपर भगवान शिव के पास गए। उन्होंने भी खुद को उन लोगों व देवताओं की सहायता करने में असमर्थ पाया, अतः वे भी उनके साथ अंतिम और शीर्ष सुपर भगवान विष्णु के पास चले गए। विष्णु ने उन्हें एकता के महत्व के बारे में बताया। सभी देवताओं और सुपर देवताओं ने अपनी व्यक्तिगत शक्तियों को अभिव्यक्त किया। फिर उन सभी व्यक्तिगत शक्तियों को एक साथ एकजुट किया गया, जिससे एक बहुत ही शक्तिशाली, सुन्दर, मनुष्याकृत और दिव्य देवी के रूप में एक सुपर पावर उत्पन्न हुई, जिसे दुर्गा कहा जाता था। उसने राक्षस को कई बार चेतावनी दी लेकिन उसने उसे हल्के में लिया। आखिरकार उसने मानवता और दिव्यता के विकास के लिए रास्ता खोलने के लिए उसे मार डाला।

यह हिंदू धार्मिक साहित्य की शास्त्रीय पौराणिक कहानी है। हम इसे मूल वैज्ञानिक रूप में ले सकते हैं। महिषासुर राक्षस का साम्राज्य प्रागैतिहासिक डायनासौर का साम्राज्य ही था, जब महिषमुख सरीसृप पृथ्वी के चारों ओर घूमते थे, और प्राकृतिक तत्वों / देवताओं द्वारा मानव विकास में बाधा डालते थे। कोई अकेला प्राकृतिक तत्व उनको रोकने में सक्षम नहीं था। तो देहरहित मानव आत्माओं ने उन प्राकृतिक तत्वों के मनुष्याकृत प्रमुखों / देवताओं से अपनी मानवीय अभिव्यक्ति के लिए सहायता माँगी। वे सभी प्राकृतिक तत्व / जल, वायु, अग्नि आदि आखिरकार एक साथ शामिल हो गए और वैज्ञानिक रूप से साबित प्रागैतिहासिककाल की कठोर उल्कापिंड-टक्कर के रूप में उन्होंने उन दैत्यों के विनाश के लिए सबसे अनुकूल स्थितियां बनाईं, जो अंततः डायनासोर को विलुप्त कर पाईं। उस उल्कापिंड की चमकती रोशनी को सबसे खूबसूरत / दिव्य व शक्तिशाली देवी माना गया, जो सभी अनुकूल जलवायु-स्थितियों के संघ की इतनी दुर्लभ घटना के माध्यम से अंतरिक्ष से धरती की ओर गिराया गया था। वास्तव में  ऐसी अति दुर्लभ घटना करोड़ों वर्षों में, सभी जलवायु नियंत्रक प्राकृतिक तत्वों / देवताओं की व्यक्तिगत शक्तियों के संघ से ही होती है। हो सकता है कि उससे पहले भी छोटे-२ उल्कापात हुए हों, जो उस दैत्य को देवी के द्वारा दी गई अंतिम चेतावनी के रूप में माने जा रहे हों।

यह साबित करता है कि प्राचीन पौराणिक कहानियां हमारे आस-पास की वास्तविक और वैज्ञानिक दुनिया के केवल personified / मनुष्याकृत वर्णन ही हैं। ऐसा केवल कार्यात्मक अद्वैत को पैदा करने के उद्देश्य से किया गया है, जो निरंतर अभ्यास के साथ कुंडलिनी जागृति को उत्पन्न करता है। इसलिए इन पुराणों को नियमित रूप से पढ़ा जाना चाहिए, समझ लिया जाना चाहिए और इनसे उत्पन्न अद्वैत-दृष्टिकोण को अपने वर्तमान के अपने व्यक्तिगत जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।

प्रेमयोगी वज्र ने हिंदी में एक तांत्रिक पुस्तक बनाई है, जिसमें उन्होंने पुराण-शैली में अपने शरीर के अंदर मौजूद ब्रह्मांड का वर्णन किया है। उन्होंने इसके लिए चिकित्सा विज्ञान की मदद ली है। उन्होंने अपने स्वयं के मानव शरीर के भीतर होने वाली हर चीज को हमारे अपने सकल सामाजिक जीवन के साथ सहसंबंधित किया है। यह पहले ही साबित होया हुआ है कि ब्रह्मांड के अंदर जो कुछ भी है, वह सब हमारे अपने शरीर के अंदर भी वैसा ही मौजूद है। उनकी आधुनिक पुस्तक प्राचीन पुराण की तुलना में अधिक दिलचस्प व व्यावहारिक प्रतीत होती है, क्योंकि उन्होंने वही सब कुछ लिखा है जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है और समझने में बहुत आसान है। मैंने खुद इसे पढ़ लिया है और इससे मैंने अपने आपको अचानक ही रूपांतरित सा व आध्यात्मिक रूप से उन्नत सा महसूस किया। यह एक आश्चर्यजनक, अनुपम व अविस्मरणीय पुस्तक है। इस पुस्तक का विस्तृत विवरण यहां उपलब्ध है-

अद्वैतपूर्ण, तांत्रिक, कुंडलिनी योग तकनीक (असली ध्यान), और आत्मज्ञान को एक अनुभवपूर्ण, दार्शनिक, व्यावहारिक, मानवीय, वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से; सबसे अच्छे रूप में समझने योग्य, सत्यापित, स्पष्टीकृत, सरलीकृत, औचित्यीकृत, सीखने योग्य, निर्देशित, परिभाषित, प्रदर्शित, संक्षिप्त, और प्रमाणित किया गया है

यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

On the holy occasion of Gandhi anniversary / गांधी जयंती के पावन अवसर पर

Mr. M.K. Gandhi, a peaceful Indian freedom fighter was a man of practicality, not mere that of a theory. Whatever he said in his life, he proved all that practically. He translated and explained the Geeta, a Hindu sacred text, practically while he was there inside a prison. The compilation arose in the form of a book named as “Anasakti Yoga” in Hindi. He has described in that the scientific and practical meaning of the teachings of Geeta.Therein he has given full stress on the unattached attitude of living a fully functional and practical human life. He has uncovered this deep secret lying inside Geeta. Although I haven’t read that fully myself but I have read that’s modern and Tantric variety in the name of book “Shareervigyan darshan- ek aadhunik kundalini tantra (ek yogi ki premkatha)” by Premyogi vajra in Hindi. Premyogi vajra has proved scientifically that everything including every religion and philosophy exist there inside our own human body. Although there is total environment of unattached / nondual attitude there inside this micro society against the duality / attachment filled environment in our so famous day to day macro society. He has utilized the health science related knowledge fully to unveil this secret. As a result, the book appears resembling a Hindu Purana although in a more comprehensible, scientific and widely acceptable way comparatively. The full information of this book is available here at the webpage-
It’s also the birth anniversary of Mr. Laal bahaadur shaastri, the second prime minister of Independent India today, therefore salute to both of these great men.
If you liked this post then please follow this blog providing your e-mail address, so that all new posts of this blog could reach to you immediately via your e-mail.
श्री मोहनदास कर्मचंद गांधी, एक शांतिपूर्ण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और व्यावहारिकता से भरे हुए आदमी थे, न कि केवल एक सिद्धांतवादी। जो कुछ भी उन्होंने अपने जीवन में कहा, उसे व्यावहारिक रूप से साबित करके भी दिखाया। उन्होंने गीता का सरलीकृत अनुवाद तब किया, जब वे जेल में थे। वह संकलन हिंदी में “अनासक्ति योग” नामक पुस्तक के रूप में उभरा। उन्होंने गीता की शिक्षाओं को वैज्ञानिक और व्यावहारिक अर्थ में वर्णित किया है। उन्होंने इसमें पूरी तरह कार्यात्मक व व्यावहारिक मानव जीवन जीने के साथ अनासक्तिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने पर पूरा जोर दिया है। उन्होंने गीता के अंदर बसने वाले इस गहरे रहस्य को उजागर किया है। यद्यपि मैंने इसे स्वयं विस्तार से नहीं पढ़ा है, केवल इसकी प्रस्तावना ही पढ़ी है, लेकिन मैंने प्रेमयोगी वज्र द्वारा “शरीरविज्ञान दर्शन-एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” नामक किताब को अच्छी तरह से पढ़ा है, जो उपरोक्त पुस्तक का आधुनिक व तांत्रिक रूपान्तर ही प्रतीत होती है। प्रेमयोगी वज्र ने वैज्ञानिक रूप से साबित कर दिया है कि हर धर्म और दर्शन सहित सब कुछ हमारे अपने मानव शरीर के अंदर बसा हुआ है। यद्यपि इस सूक्ष्म शरीर-समाज के भीतर हमारी रोजमर्रा की मैक्रो सोसाइटी/स्थूल समाज के विपरीत पूर्ण अनासक्ति व अद्वैत का वातावरण विद्यमान है। इस रहस्य का अनावरण करने के लिए उन्होंने स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित ज्ञान का भी पूरी तरह से उपयोग किया है। नतीजतन, पुस्तक एक हिंदु-पुराण जैसी दिखती है, हालांकि तुलनात्मक रूप से एक अधिक समझपूर्ण, वैज्ञानिक, व्यापक व सर्वस्वीकार्य तरीके से। इस पुस्तक की सम्पूर्ण जानकारी यहां निम्नोक्त वेबपृष्ठ पर उपलब्ध है-
आज स्वतंत्र भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिवस भी है, इसलिए इन दोनों महापुरुषों को कोटि-2 नमन।
यदि आपने इस लेख/पोस्ट को पसंद किया तो कृपया इस वार्तालाप/ब्लॉग को अनुसृत/फॉलो करें, व साथ में अपना विद्युतसंवाद पता/ई-मेल एड्रेस भी दर्ज करें, ताकि इस ब्लॉग के सभी नए लेख एकदम से सीधे आपतक पहुंच सकें। धन्यवादम।

Happy janamaashtami/जन्माष्टमी पर्व की बधाइयाँ

Geetaa philosophy dictated by Lord Krishna is a wonderful treatise of worldwide spirituality. Every religion, philosophy, spirituality seems to be emerging out of it. It’s Karmyoga is an amazing gift to the world. Today, it’s most necessary for people are becoming more and more lethargic, workless and paranoiac/depressed due to today’s mechanized work style. Many types of strange diseases like diabetes, heart ailments, thyroid ailments etc. are gaining their strong foot hold.

Actually, karmyoga teaches us how to be busy physically and mentally along with the development of spirituality round the clock. It helps in achieving worldly as well as spiritual goals, both together in a quickest possible time. Karmayoga is equal to tantra, but with additional sexual element added in tantra for super fast spiritual success. Lord Krishna was also a tantric. Keeping so many gopa-girls happy and even arranging raas in the lonely night with too many of them isn’t possible without tantra.

In karmyoga/tantra, one need to maintain non duality/mental awareness every moment. This is done through practices of vedas-puranas, shareervigyaan darshan/body science philosophy or any other suitable means. It’s a psychic principle that non duality, kundalini and bliss remains always together and enrich each other. So, there are four options for karmayogi. Either enrich kundalini with Kundalini yoga or enrich non duality through philosophical contemplation or through increasing his bliss through humanely relationships or all of these. Last is the best for it incorporates all the spiritual fundamentals. For detailed experiential information, please visit this website.

श्रीकृष्ण के द्वारा उच्चारित गीता दुनियाभर में आध्यात्मिकता का एक अद्वितीय खजाना है। प्रत्येक प्रकार का धर्म, दर्शन, आध्यात्मिक जीवन इससे निकलता हुआ प्रतीत होता है। इसका कर्मयोग दुनिया के लिए एक अद्भुत तोहफा है। आजकल यह सर्वाधिक प्रासंगिक है, क्योंकि आजकल के मशीनी युग में लोग सुस्त, कर्महीन, आलसी व अवसादग्रस्त से हो रहे हैं, जिसकी वजह से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल आदि विचित्र बीमारियां बढ़ रही हैं।

वास्तव में, कर्मयोग हमें सिखाता है कि कैसे हमने शारीरिक व मानसिक रूप, दोनों से दिन-रात व्यस्त रहना है, और साथ में अवसाद खत्म करके आध्यात्मिक विकास भी तीव्रतम गति से करना है। कर्मयोग से सर्वाधिक शीघ्रता से भौतिक व आध्यात्मिक विकास, दोनों हो जाते हैं। कर्मयोग व तन्त्र एक ही चीज है, यद्यपि तंत्र में अतिरिक्त भाग के रूप में यौनसंबंध भी जुड़ा होता है, ताकि आध्यात्मिक विकास तीव्रतम वेग से हो जाए।

अद्वैत, कुंडलिनी व आनंद , तीनों एकसाथ रहते हैं, और एक -दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। इसलिए  आध्यात्मिक विकास की चार विधियाँ मुख्य है। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बढ़ाओ या वेद-पुराणों, शरीरविज्ञान दर्शन आदि उचित अद्वैतकारी दर्शनों के अभ्यास से निरंतर अद्वैत को धारण किया जाए या मानवीय व्यवहारों से आनंद बढ़ाया जाए या तीनों प्रयासों को एकसाथ किया जाए। अन्तिम विधि सर्वाधिक बलवान है, क्योंकि इसके अंदर अध्यात्म के सभी मूलभूत सिद्धांत हैं।

वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण एक तांत्रिक भी थे। इतनी सारी गोप कन्याओं को खुश रखना, व उनमें से अनेकों के साथ रात्रि के एकांत में रास रचाना तंत्र ज्ञान के बिना संभव नहीं है।

अतरिक्त व अनुभवात्मक जानकारी के लिए कृपया इस वेबसाइट को प्रारंभ से व विस्तार से पढ़ें।