अच्छा लगता नूतन साल~एक अतिलघु कविता

अच्छा लगता नूतन साल

जैसा भी हो चाहे हाल।

परिवर्तन की कैसी चाल

काल का कैसा मायाजाल।

कुंडलिनी-शिव विवाह ही साधारण लौकिक विवाह का उद्गम स्थान है

मित्रो, आप सभी को छठ पर्व की शुभकामनाएं। मैं हाल ही के एक लेख में बता रहा था कि हिंदू त्यौहारों वाली आध्यात्मिक संस्कृति प्रकृति की पुजारी है, और वातावरणीय प्रदूषण के विरुद्ध है। सूत्रों के अनुसार अभी जब 2-3 दिन पहले छठी देवी की पूजा करने के लिए कुछ महिलाएं दिल्ली की यमुना नदी के पानी के बीच में सूर्य को अर्घ्य देने के लिए खड़ी हुईं, तो दुनिया को यमुना के वास्तविक प्रदूषण का पता चला। यमुना का पानी काला था, और उस पर इतनी ज्यादा सफेद झाग तैर रही थी कि वह ध्रुवीय समुद्र के बीच में तैर रहे बर्फ के पहाड़ लग रहे थे। बताने की जरूरत नहीं है कि अब यमुना की सफाई के प्रयास जोरों से शुरु हो गए हैं। पर इसको करवाने के लिए अनजाने में ही व्हिसल ब्लोवर का काम उन हिन्दू परंपरावादी महिलाओं से हो गया जो अपनी जान को जोखिम में डालकर प्रकृति को सम्मान देने और उसकी पूजा करने के लिए ज़हरीली नदी में उतरीं। कुछ तथाकथित अत्याधुनिक लोग तो उन्हें रूढ़िवादी और अंधविश्वासी कह सकते हैं, पर उन्होंने वह काम कर दिखाया जिसे बड़े-बड़े आधुनिकतावादी और तर्कवादी भी न करे। यह एक छोटा सा उदाहरण है। प्रकृति प्रेमी हिंदूवाद की इसी तरह हर जगह बेकद्री होती हुई दिखती है, इसीलिए प्रकृति विनाश की तरफ जाती हुई प्रतीत होती है। मैं यहाँ किसी धर्मविशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, और न ही किसी विचारधारा का विरोध कर रहा हूँ, बल्कि जो सत्य घटना घटित हुई है, उसीका वर्णन और विश्लेषण कर रहा हूँ।

राजा हिमाचल मस्तिष्क का और उसका राज्य शरीर का प्रतीक है

शिवपुराण में आता है कि राजा हिमाचल ने विवाह महोत्सव के लिए अपने सभी संबंधी पर्वतों और नदियों को निमंत्रण दिया। विभिन्न प्रकार के अन्नों का भंडारण करवाया। चारों तरफ साज-सज्जा की गई। अपने राज्य के सभी लोगों के लिए खूब सुख-सुविधाएं वितरित कीं। उससे उसके पूरे राज्य के लोग प्रसन्न हो गए। प्रमुख ऋषियों को शिव के पास विवाह का निमंत्रण लेकर कैलाश मिलने भेजा। दरअसल राजा हिमाचल और उसका महल मस्तिष्क ही है। कैलाश सहस्रार चक्र है। धरती ही राजा हिमाचल का राज्य है। वह पूरा शरीर है। वैसे भी पर्वत को भूभृत कहते हैं। इसका मतलब है, धरती को पालने वाला। मस्तिष्क ही शरीर को पालता है। राजा हिमाचल सभी नदियों को अपने महल बुलाता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सभी नाड़ियों की ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित करता है। वह सभी पर्वतों को भी न्यौता देता है, मतलब मस्तिष्क का मुख्य केंद्र अन्य छोटे-छोटे केंद्रों से संवेदना-शक्ति को इकट्ठा करके कुंडलिनी जागरण की सर्वोच्च संवेदना को अभिव्यक्त करता है। यही शिव विवाह है, और इसीको ही विभिन्न पर्वतों का शिवविवाह में सम्मिलित होना कहा गया है। पर्वतराज हिमाचल विभिन्न खाद्यान्नों का भंडारण करता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सारी ऊर्जा अपनी तरफ खींचता है। भोजन ही ऊर्जा है, ऊर्जा ही भोजन है। प्राण ऊर्जा की प्राप्ति के लिए ही भोजन किया जाता है। तभी तो कहते हैं कि अन्न ही प्राण है। राजा हिमाचल के पूरे राज्य की जनता धन-धान्य से युक्त होकर हर्षोल्लास से भर जाती है, मतलब मस्तिष्क में जब ऊर्जा की भरमार होती है, तब उससे ऐसे रसायन निकलते हैं, जो पूरे शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। शरीर और ब्रह्मांड के बीच में इस तरह की समकक्षता पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में सर्वोत्तम रूप में दर्शाई गई है। शिवविवाह के दिन राज्य के सभी लोग विभिन्न भोगों की धाम खाते हैं, और विभिन्न विलासों का भरपूर आनन्द उठाते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण वाले दिन पूरे शरीर में रक्तसंचार बढ़ जाता है। ऋषियों को आम आदमी के जैसे साधारण विवाह को इतने विस्तार से लिखने की क्या जरूरत थी, क्योंकि वे ज्यादातर खुद ब्रह्मचारी या अविवाहित होते थे, और कई तो गृहस्थी से दूर रहकर वनों में तप करते थे। कुंडलिनी के तो माता-पिता हैं, पर शिव के कोई नहीं। वह तो स्वयंभू परमात्मा हैं, इसीलिए शम्भु कहे जाते हैं। इससे जाहिर होता है कि यह साधारण विवाह नहीँ है। कुंडलिनी जागरण को ही शिवविवाह के रूप में वर्णित किया गया है, ताकि गृहस्थी में बंधे हुए आमजन भी उसे समझ सके और उसे आसानी से प्राप्त कर सके।

हिमाचल राज्य का सर्वोच्च महल सहस्रार है, जहाँ पर शिव-शक्ति का वैवाहिक जोड़ा ही स्थायी रूप से निवास कर सकता है

उपरोक्तानुसार सप्तऋषियों को विवाह के निमंत्रण पत्र के साथ शिव के पास कैलाश भेजा। कैलाश सहस्रार चक्र है। वहाँ पर ही अद्वैतभाव रूपी शिव का निवासस्थान है। दरअसल प्राणोत्थान के बाद शरीर की ऊर्जा-नदी का प्रवाह सहस्रार की तरफ ही होता है। उससे स्वाभाविक है कि उस ऊर्जा के बल से सहस्रार क्षेत्र में अद्वैतभाव व आनन्द के साथ सुंदर चित्र प्रकट होते रहते हैं। यह भी स्वाभाविक ही है कि अधिकांशतः वे चित्र भी उन्हीं लोगों या वस्तुओं के बनते हैं, जिनके साथ अद्वैत भाव या आध्यात्मिक भाव जुड़ा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई व्यक्ति उसी क्षेत्र में जाना चाहता है, जो क्षेत्र उसके अनुकूल या उसके जैसा हो। ऋषि-मुनियों से अधिक अद्वैतरूप या आध्यात्मिक कौन हो सकता है। इसीलिए उन आध्यात्मिक वस्तुओं या व्यक्तियों को सप्तर्षिओं के रूप में दिखाया गया है। वैसे वह गुरु, मंदिर का पुजारी, मंदिर, गाय, गंगा आदि कोई भी आध्यात्मिक वस्तु हो सकती है। शिवजी के नजदीक तो ये चीजें जाती हैं, और उन्हें कुंडलिनी के साथ एकाकार होने के लिए प्रेरित भी करती हैं, पर खुद शिव से एकाकार नहीं हो पातीं। इसीको इनके द्वारा शिव को उन्हीं के विवाह के लिए निमंत्रण देने के रूप में दिखाया गया है। विवाह किससे, कुंडलिनी से। शिव के साथ एकाकार न हो पाने के कारण ही इन्हें निमंत्रण देकर वापिस आते हुए दिखाया गया है। कोई भी चित्र शिव से जुड़े बिना निरन्तर सहस्रार में नहीं बना रह सकता, उसे जल्दी ही मस्तिष्क के निम्नतर ऊर्जा स्तर वाले निचले साधारण क्षेत्रों में आना ही पड़ता है। कुंडलिनी ही शिव के साथ एकाकार होने या जागृत होने के फलस्वरूप शिव के साथ कैलाश में निरंतर बनी रह पाती है। मतलब कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को अपनी आत्मा के साथ जुड़ी हुई कुंडलिनी का अनुभव सहस्रार चक्र में निरंतर होता रहता है। यही कुंडलिनी जागरण की सर्वप्रमुख खूबी है, और यही आदमी को मोक्ष की ओर ले जाती है।

प्राण ही सहस्रार में शिव-शक्ति का विवाह रचाते हैं

फिर आता है कि शिव के विवाह समारोह के लिए विश्वकर्मा ने अद्भुत व दिव्य विवाह मंडप, भवन व प्रांगण आदि बनाए। जड़ मूर्तियां सजीव लग रही थीं, और सजीव वस्तुएं जड़ मूर्तियां लग रही थीं। जल में स्थल का और स्थल में जल का भान हो रहा था। दरअसल कुंडलिनी जागरण के आसपास प्राणों के सहस्रार में होने के कारण सब कुछ अद्भुत व दिव्य लगता है। अतीव आनन्द की स्थिति होती है। चारों ओर शांति महसूस होती है। अद्वैत भाव चरम के करीब होता है, और कुंडलिनी जागरण के दौरान तो चरम पर पहुंच जाता है। सभी कुछ एक जैसा लगता है। भेद दृष्टि खत्म सी हो जाती है। यह नशे के जैसी मूढ़ अवस्था नहीं होती, पर परम चेतनता और आनन्द से भरी होती है। इसी आध्यात्मिक भाव को यहाँ उपरोक्त रोचक कथानक के रूप में दर्शाया गया है। जल का थल लगना या थल का जल लगना, मतलब जल और थल के बीच में अभेद का अनुभव। जड़ का चेतन की तरह दिखना व चेतन का जड़ की तरह दिखना, मतलब जड़ और चेतन के बीच में समानता नजर आना। हर जगह झाड़-बुहार के पूरी तरह से साफ व निर्मल कर दी गई थी। इसका मतलब है कि सहस्रार में ही असली व पूर्ण निर्मलता का अनुभव होता है। बाहर से जितना मर्जी सफाई कर लो, यदि सहस्रार में प्राण नहीं हैं, तो सबकुछ मैला ही लगता है। इसी वजह से तो गाय के गोबर से पुते हुए आध्यात्मिक स्थान अति पवित्र महसूस होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिकता के प्रभाव से सहस्रार चक्र प्राण से संपन्न होता है। जिन मूल्यवान भवनों में लड़ाई-झगड़ों का बोलबाला हो, वहां की चाकचौबंद सफाई भी रास नहीं आती, और वहाँ दम सा घुटता है। इसके विपरीत एक आध्यात्मिक साधु पुरुष की गोबर से लिपीपुती घासफूस की झौंपड़ी भी बड़ी आकर्षक व संजीदा लगती है।

Kundalini is the visible creation, the energy continuum in Sahasrar is the God, and the dormant kundalini energy in muladhar is the dark energy~ post update

Kundalini is the visible creation, the energy continuum in Sahasrar is the God, and the dormant kundalini energy in muladhar is the dark energy

Kundalini is the main motive of biological evolution

Friends, I said in a previous post that I experienced Kundalini on different chakras according to level of consciousness of my mind. When there was more consciousness, the Kundalini came on the upper chakras, and when there was less consciousness, it came on the lower chakras. In fact the level of consciousness is measured by a pure mind, not by a combined mind with external senses. With the help of external senses, all people and many other creatures are full of consciousness. External senses do not remain after death. At that time only the subtle consciousness of pure mind comes into use. When looking at something with eyes, there is a flood of consciousness in the mind. That consciousness is born by the strength of the eyes, not by the strength of the mind. Similarly, in the case of other external senses, one should also understand. As the capacity of the mind increases from within to reveal consciousness in subtlety, it becomes more worthy of liberation. Kundalini enhances this same ability. With the eyes closed at the time of Kundalini meditation, the doors of almost all external senses are closed. Still, with the power of yoga meditation, there is so much consciousness in the Kundalini being ignited in the mind, that is not even with the help of external senses. Such continuous practice of years brings the same consciousness in a calm, thoughtless mind without Kundalini. This is called enlightenment. Actually, mind is also a subtle form of external senses. A thoughtless mind is often called a soul.

Organism development as Kundalini development

In fact, Kundalini (neuronal energy) is evolving or rising up in the form of evolving organisms. Actually, Kundalini represents the mind itself. Kundalini is the highest level of mental thought. Therefore, we can measure the level of consciousness of the mind through the level of consciousness of Kundalini. Reverse is also true that’s the consciousness of Kundalini can be measured through the consciousness of mind.

Kundalini working requires the same neuronal energy that is required for brain or mind working. That neuronal energy is stimulated by prana energy or prana shakti that is generalized energy of whole body. So both are propelled by same fuel that’s why both are interconnected. But the main objective of creation is providing ultimate status to the organism. This is done by kundalini. It means that kundalini development is the primary goal of creation, not the brain development. Brain development is there itself unwillingly. It’s a after effect and even becomes a side effect if utilized in a negative way. Many old civilizations understood this fact very well and kept main focus on Kundalini in the form of various spiritual practices. Today, Kundalini happenings are increasing day by day because brain development of today’s era is also causing Kundalini development indirectly. Therefore, it’s best way to undertake Kundalini development and brain or world development together so as to get kundalini awakening in a shortest time possible. Karma yoga is also a good method for this.

Kundalini is the measure of the development of consciousness. Kundalini is in sleep in least conscious subject. Kundalini’s sleep means that the mind is asleep. It’s not called mindlessness because the consciousness of the mind never ends, it only becomes incoherent, that is, it falls asleep. At that time, there is darkness in the place of conscious mind. It is just like when a man is asleep, then his consciousness disappears, but it is still doing all the work that keeps the body alive. After enlightenment, Kundalini with higher consciousness is constantly dominating  in the mind, which we call samadhi. It can be called the closest stage of complete awakening of Kundalini. Between these two opposite ends most of the organisms are there. The bulb of his Kundalini consciousness sometimes burns, sometimes slows down, sometimes extinguishes.

The one who comes to hear about yoga, he hears that only Kundalini keeps on climbing in the form of different creatures. Among the lowest living organisms and plants, it remains dormant at the base. It’s also called Kundalini shakti or prana shakti. Actually, there too it’s always working in background without being experienced by organism to maintain body. It is distributed in whole body but it’s called residing in muladhar chakra because that’s the main place of it’s growth and nourishment. It’s like as if a man can wander everywhere in the world but he achieves his growth, nourishment and rest (sleep) mainly at it’s home. Uncouncious mind and muladhar chakra, both are said to be as similar and both being connected with the worst sentiments. Further added, kundalini starts it’s long journey from Muladhar Chakra only. Journey towards the light starts from the darkness only. In some of the less evolved organisms, it comes into a mildly awake state in the base chakra. These may be called bisexual or hermaphroditic. Probably at this stage, the soul fell from Sahasrara and fell asleep in the pit of Muladhara. That is why that organism was divided into yin or female and yang or male form, so that by attraction towards each other, the soul could ascend from muladhara to re-enter Sahasrara. Muladhar dominated lowest organisms have nothing to do outer energetic functions other than the elimination of waste body products. This is the work of muladhar chakra situated near anal opening. So their Kundalini energy is said to be concentrated in muladhar chakra. In the organisms that develop from it, it rises up to the Swadhisthana chakra. Here, sexual differentiation of organism occurs and it start feeling sexual desire with sexual attraction. It’s often seen that lower organisms reproduce at much higher rate and major part of their energy is consumed by this process. It provides wonderful force for kundalini or organism development. This force is still working continuously in today’s well developed human being too. In moderately developed organisms, kundalini enters the navel chakra. That’s why lower organisms keep on eating throughout day and night continuously. It comes into the heart chakra in a higher quality animal, probably in the cow and in a loving person. Possibly that’s why the cow appears as full of affection. Majority of digestive processes are carried out by microorganisms in cow, so it saves lot of energy. It brings down one’s negative energies existing in the form of high blood pressure, stress etc. down. That’s why people are spending thousands of dollars today to develop cowmunication (communication with cow). In primates like baboon, gorilla etc. the Kundalini energy further travels ahead to their arms or forelimbs, that’s why they maximally utilize their forelimb function. Likewise, in beautifully singing bird like cuckoo, Kundalini energy can be said to be concentrated in throat chakra. In intelligent animals with analytical skills like dolphins, it can be said to be coming up to agya chakra. It can come to Sahasrara chakra in human only that too with proper brain practice, because only he can awaken it and the place of awakening is sahasrar only. In the highest order human, it is fully awake in Sahasrara.

The seven chakras of Kundalini are in the form of seven worlds

The scriptures describe the seven worlds above earth. These seven lokas or abodes are in the form of seven chakras. The lowest abode is the Mooladhara Chakra, because the organisms at that level have the lowest consciousness. The level of consciousness increases by going into the realms or chakras above it. This level is highest in Sahasrara. Kundalini awakening means that the level of consciousness is reached at the of union of Shiva and Shakti, making it known as Shivaloka or Brahmaloka. By the way, seven dark abodes have been told even below the earth. In them also, the consciousness keeps falling downwards respectively. In these worlds, most of the demons are said to be living. This is because their level of consciousness has fallen so much that they continue to malign the gods, sages and other beings with higher consciousness. Earth has been considered equivalent to Muladhara Chakra. The abodes in the sky above are the high abodes or heaven, while below the earth are as the hell.

The upright standing of the man and the pit in the back is also an important link in the bio-development chain

I told in an old post how I had to keep my back straight and in a natural posture while sitting in my new car, because its legspace seemed a little low. This helped my muladhar energy to awaken my Kundalini through efficiently climbing up in the back. People can say that the man stood up straight to use the next two legs as a hand. But even primates like gorillas do so. Even the early humans used to do this. Their back is not straight, nor does it seem necessary to use hands. Then why the developed man’s back was straightened. This happened in order to make Kundalini easily and efficiently offered from the base to the brain. Kundalini is as subtle as the sky. Its nature is to rise upwards. That’s why at the time of awakening of the Kundalini, it seems that the Kundalini is flying upwards with speed and power. Then you can say why then a pit formed in the back in the direction of the navel. In fact, it acts like a pit of a roller coaster. It keeps sucking Kundalini energy from the base with the power of yogic inbreathing  and depositing it inside as voluminous storage. Then, while working or doing yoga, when a man bends forward, this stored lot of energy quickly runs upwards towards the brain after catching the velocity. A small pit is formed at the center of the neck, which is the vishuddhi chakra. It likewise pushes the energy upwards to brain by providing a Momentum to this Kundalini energy gathered on the Anahata Chakra with the power of yogic outbreathing. Likewise, swadhishthan chakra and muladhar chakra keeps sexual energy stored to help push it up through back during yoga.

The sexual drive is the biggest contributor to the development of life

In a bisexual organism, yin and yang were together in the same body. This means that it was a complete soul. Because they did not have their own separate desire for development, they were developed like other natural and lifeless objects like mountains, soil, celestial bodies. The pace of that development was natural and slow. Then along with the division of gender, yin-yang was also divided. There was majority of yang in the male category and yin in the female category. This division made the organism feel imperfect within itself. Probably at this stage, the incomplete soul was born. He started trying to gather Yin or Yang to be complete again as earlier. This led to the creation of Kama Bhava or sexual feeling. This created an intense attraction between the male category and the female category of organisms. This sexual sentiment is the biggest contributor to the development of life. Because it produces the most powerful non duality, with which Kundalini develops most strongly and rapidly. We have experientially proved in many posts that non duality, Kundalini and bliss tend to live together. This gave artificiality and fast pace to biological development. Even today, in the form of Tantric Kundalini yoga, it is helping man to make the final jump of the development chain to achieve the perfection or liberation. It combines Yin (shakti) residing at Mooladhara chakra with Yang (Shiva) residing at Sahasrar chakra. Yin is called Prakriti and Yang is called Purusha in Indian philosophy. Advaita bhava is produced by the union of yin-yang, which indirectly develops the kundalini. It is not that the attraction of yin-yang is only the attraction of men and women. It can be between any of the opposite expressions. Muladhara is a symbol of darkness, inferiority, ignorance, hatred, etc. all low emotions. In contrast, Sahasrara is a symbol of light, highness, knowledge, love, etc. all high emotions. That is why the simultaneous Kundalini meditation on these two chakras creates intense nonduality, due to which the Kundalini starts to shine in Sahasrara. The main function of sexual attraction is that by it the muladhara and the Sahasrara Chakra are refreshed and strengthened together.

सौंदर्य के आधार के रूप में कुंडलिनी

सुन्दरता क्या है

यह अक्सर कहा जाता है कि सुन्दरता किसी दूसरे में नहीं, अपितु अपने अन्दर होती है। ध्यान योग से यह बात बखूबी सिद्ध हो जाती है। सुन्दर वस्तु को इसलिए सुन्दर कहा जाता है क्योंकि वह हमारे मन में आनंद के साथ लम्बे समय तक दृढ़तापूर्वक बसने की सामर्थ्य रखती है। मन में वैसी आकर्षक व स्थायी छवि को ही कुण्डलिनी भी कहते हैं।

सुन्दर वस्तु के प्रति अनायास ध्यान

लम्बे समय तक मन में बैठी हुई वस्तु की तरफ ध्यान स्वयं ही लगा रहता है। इससे अनादिकाल से लेकर मन में दबे पड़े चित्र-विचित्र विचार व रंग-बिरंगी भावनाएं उमड़ती रहती हैं। उनके प्रति साक्षीभाव व अनासक्ति-भाव स्वयं ही विद्यमान रहता है, क्योंकि मन में बैठी हुई उपरोक्त वस्तु निरंतर अपनी ओर व्यक्ति का ध्यान खींचती रहती है। इससे वे भावनामय विचार क्षीण होते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उत्तरोत्तर शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। अंततः व्यक्ति पूर्ण शून्यता या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है।

सबसे अधिक सुन्दर वस्तु

लौकिक परिपेक्ष्य में एक सर्वगुणसंपन्न स्त्री को एक उसके योग्य व उसके रुचिकर पुरुष के लिए सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि वैसी स्त्री का चित्र वैसे पुरुष के मन में सर्वाधिक मजबूती से बस जाता है। दोनों के बीच में प्रतिदिन के संपर्क से वह चित्र मजबूती प्राप्त करता रहता है। अंततः वह इतना अधिक माजबूत व स्थायी बन जाता है कि वह एक योग-समाधि का रूप ले लेता है। यदि बीच में स्वस्थ आकर्षण में (सच्चे प्यार में) खलल पड़े, तो मानसिक चित्र कमजोर भी पड़ सकता है। ऐसा जरूरत से ज्यादा इंटरेक्शन, शारीरिक सम्बन्ध आदि से हो सकता है। लौकिक व्यवहार में यह नजर भी आता है कि विवाह के बाद परस्पर आकर्षण कम हो जाता है। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती रहें, तो ऐसे यिन-यांग आकर्षण को समाधि व आत्मज्ञान के स्तर तक पहुँचाने के लिए २ साल काफी हैं। ऐसे ही बहुत सारे मामलों में हैरान कर देने वाली अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ईश्वर पर व अच्छे कर्मों पर बरबस ही विश्वास हो जाता है।

सुन्दरता की प्राप्ति सांसारिक वस्तुओं पर नहीं, अपितु अच्छे कर्मों व ईश्वर-कृपा पर निर्भर

कई लोगों के पिछले कर्म अच्छे नहीं होते, और उन पर  ईश्वर की कृपा भी नहीं होती। ऐसे लोगों को ऐसा मजबूत यिन-यांग आकर्षण उपलब्ध ही नहीं होता। कई लोगों को यदि उपलब्ध हो भी जाता है, तो भी अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण वह लम्बे समय तक स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे में समाधि नहीं लग पाती। बहुत से लोग वर्तमान में बहुत अच्छे कर्म कर रहे होते हैं। वे सदाचारी होते हैं। वे बड़ों-बूढ़ों को व गुरुओं को प्रसन्न रखते हैं, एवं उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। वे उनके सामने नतमस्तक बने रहते हैं। वे सभी कठिनाईयों व दुर्व्यवहारों को प्रसन्नता के साथ सहते हैं। इससे उनके मन में अपने गुरुओं, वृद्धों व परिवारजनों की छवियाँ बस जाती हैं। उनमें से कोई अनुकूल छवि उनकी कुण्डलिनी बन जाती है। कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को पुष्ट करने वाला यिन-यांग आकर्षण भी कई किस्मत वालों को प्राप्त हो जाता है।

अवसरों से रहित लोगों के लिए कुण्डलिनी-योग एक बहुत बड़ी राहत

जिन अधिकाँश व बदकिस्मत लोगों को प्राकृतिक रूप से भरपूर ध्यान का अवसर नहीं मिलता, उन्हीं के लिए कुण्डलिनी योग बनाया गया है, मुख्य रूप से। कई हतोत्साहित व निराशावादी लोग इसे “रेत में से तेल निकालने” की संज्ञा भी देते हैं। यद्यपि यह अब सच्चाई है कि रेत में भी तेल (पैट्रोल) होता है। इसमें उपयुक्त समय पर तंत्र के प्रणय-योग के सम्मिलन से यह बहुत आसान, व्यावहारिक व कारगर बन जाता है।

बनावटी प्यार

किसी विशेष वस्तु से प्रतिदिन  के लौकिक प्यार की कमी को मेडीटेशन से पूरा करना भी एक जादुई कारीगरी ही है। इसे हम “प्रेम का कृत्रिम निर्माण (synthesis of love)” भी कह सकते हैं। योग एक ऐसी फैक्टरी है, जो प्रेम का कृत्रिम उत्पादन करती है। यह कारीगरी मुझे बचपन से लेकर प्रभावित करती आई है। इससे लौकिक प्यार की तरह पतन की भी सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वस्तु से सारा इंटरेक्शन मन में ही तो होता है। अति तो इन्द्रियों से ही होती है हमेशा।

सुन्दरता सापेक्ष व आभासिक होती है

यदि सुन्दरता निरपेक्ष होती, तो एक सुन्दर स्त्री सभी प्रकार के लोगों को एकसमान सुन्दर लगा करती, और हिंसक जानवर भी उसके पीछे लट्टू हो जाया करते। इसी तरह, यदि सुन्दरता भौतिक रूप-आकार पर निर्भर होती, तब योग से प्रवृद्ध की गई वृद्ध गुरु व काली माता (बाहरी तौर पर कुरूप व डरावनी) के रूप की कुण्डलिनी सबसे अधिक सुन्दर न लगा करती, और वह योगी के मन में सबसे ज्यादा मजबूती से न बस जाया करती।

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प्राचीन मिस्र की आध्यात्मिक यौनता एवं भारतीय तंत्र के बीच में समानता

अन्खिंग क्या है और कैसे किया जाता है?

अन्खिंग में पूर्णता से थोड़ा कम (90%) सांस भर कर शक्ति को यौनचक्रों से पीठ वाले अनाहत चक्र (उनके अनुसार पांचवां चक्र) तक चढ़ाया जाता है, और वहां से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर खुले में मोड़ दिया जाता है। वह फिर स्वयं ही आँख के लूप से होते हुए सबसे ऊपर वाले आठवें चक्र (सिर से एक हाथ लम्बाई ऊपर) पर पहुँच जाती है। वह चक्र वर्टिकल बोडी लाइन से 90 डिग्री के कोण पर स्थित है। वहां से वह आँख-लूप के अगले भाग से नीचे उतर कर अनाहत चक्र (आगे का) पर पुनः स्थापित हो जाती है। फिर बाकि का बचा हुआ 10% सांस भी अन्दर भर लिया जाता है। धीरे-2 सांस छोड़ते हुए ध्यान किया जाता है कि वह शक्ति उस आँख-चेनल में घूम रही है। फिर गहरी साँसें लेते जाएं, जब तक कि पूरे शरीर में रिलैक्सेशन महसूस न हो जाए। फिर अपनी साँसें नार्मल कर लें। ध्यान करो कि यह शक्ति पूरे शरीर में रिसती हुई, उसकी सभी कोशिकाओं को पुष्ट करती हुई, उसके बाहर भी चारों ओर फैल रही है। फिर पूरी तरह से रिलैक्स हो जाओ, या सो जाओ।

अन्खिंग के रेखा-चित्र व लूप का मनोवैज्ञानिक रहस्य

अन्खिंग प्रक्रिया में शक्ति हृदय के ऊपर के शरीर के हिस्से को स्पर्श नहीं करती। वह चारों और बाहर-2 से ही लूप बना कर पुनः हृदय चक्र पर पहुँच जाती है। इसीलिए शक्ति-मार्ग को दर्शाने वाले रेखा-चित्र में रीढ़ की हड्डी को छूती हुई सीधी रेखा केवल यौनचक्र (मूलाधार) से हृदय चक्र तक ही दिखाई गई है, उसके ऊपर नहीं। उसके ऊपर उपरोक्त अन्खिंग-लूप जुड़ा है। हृदय चक्र पर एक सीधी रेखा आगे से पीछे जाते हुए एक क्रोस बनाती है। इस डिजाइन का यह मतलब है कि मूलाधार चक्र व नाभि चक्र के आगे वाले भाग से होते हुए कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे लचीले भाग में होते हैं, और योग-बंधों के कारण अन्दर की तरफ पिचक कर मेरुदंड वाले चक्र-भागों से जुड़कर एक हो जाते हैं। इससे आगे वाले चक्रों की शक्ति स्वयं ही पीछे वाले चक्रों को मिल जाती है। हृदय चक्र पर इसलिए आगे-पीछे गुजरने वाली रेखा है, क्योंकि आगे वाला चक्र पिचक कर पीछे वाले चक्र से नहीं जुड़ता है। देखा भी जाता है कि छाती का क्षेत्र विस्तृत है, और ज्यादा अन्दर-बाहर भी नहीं होता।

अन्खिंग का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण

शक्ति मनोवैज्ञानिक दबाव से ही अनाहत चक्र से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर बाहर निकलती है। ऐसा सोचा जाता है, तभी ऐसा होता है। आठवें चक्र तक भी वह मनोवैज्ञानिक दबाव से ही आँख (अन्खिंग-लूप) से होते हुए ऊपर चढ़ती है। एक प्रकार से शक्ति बीच के चक्रों को बाईपास करते हुए, सीधे ही आठवें चक्र तक पहुँच जाती है। वहां से नीचे भी यह इसी तरह के दबाव के अभ्यास से आती है। इसमें शरीर की बनावट से मेल खाता हुआ रेखा-चित्र भी मानसिक चिंतन के दबाव की सहायता करता है।

अन्खिंग व सैक्सुअल कुण्डलिनीयोग के बीच में समानता

कुण्डलिनीयोग में शक्ति को कुण्डलिनी कहा जाता है। यह अधिकाँश मामलों में गुरु या देवता का मानसिक चित्र ही होता है। इस योग में यौनशक्ति से कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों पर पुष्ट किया जाता है, विशेषकर मस्तिष्क में। पुष्टता को प्राप्त कुण्डलिनी फिर लम्बे समय तक अनुभवदृष्टि में बनी रहकर तन-मन को शुद्ध करती रहती है। अन्खिंग में भी ऐसा ही होता है। यद्यपि उसमें शक्ति को हृदय क्षेत्र में ही केन्द्रित माना गया है। थोड़े समय के लिए आठवें चक्र पर भी रुकती है। बीच वाले रस्ते व लूप में तो केवल उसकी सूक्ष्म चाल ही होती है। वास्तव में हृदय में सबसे प्रिय वस्तु ही बसी होती है। यह वस्तु एक ही होती है। दो से तो प्रेम ही नहीं होता। हृदय ही प्रेम का स्थान है। इस तरह से, अन्खिंग की तथाकथित शक्ति स्वयं ही कुण्डलिनी-रूप सिद्ध हो गई। प्राचीन मिस्र की मान्यता के अनुसार, साधारण यौनसम्बन्ध के दौरान यौन-उन्माद/स्खलन की शक्ति या तो नीचे गिर कर भूमिगत हो जाती है, या मस्तिष्क के विभिन्न विचारों के रूप में प्रस्फुटित होती है। दोनों ही मामलों में यह नष्ट हो जाती है। परन्तु यदि मस्तिष्क का विचार एकमात्र कुण्डलिनी के रूप में हो, तब वह यौनशक्ति नष्ट नहीं होती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी का ध्यान प्रतिदिन किया जाता है, अन्य विचारों का नहीं। इसलिए यौनशक्ति से निर्मित, कुण्डलिनी की प्रचंडता लम्बे समय तक बनी रहती है। क्योंकि अन्य विचार कभी-कभार ही दोबारा पैदा होते हैं, इसलिए उनकी प्रचंडता तब तक गिर चुकी होती है। साथ में, यौनशक्ति सभी विचारों में बंट कर बहुत छोटी रह जाती है, जबकि वह कुण्डलिनीयोग से एक ही कुण्डलिनी को मिलती है, जिससे पूरी बनी रहती है। अतः सिद्ध होता है कि प्राचीन मिस्र की तथाकथित शक्ति कुण्डलिनी ही है, और अन्खिंग भी कुण्डलिनीयोग से भिन्न नहीं है। एक प्रकार से हम कुण्डलिनीयोग को अन्खिंग तकनीक का सरल व वैज्ञानिक रूपांतर भी कह सकते हैं।

प्राचीन तंत्र में यौनोन्माद (बिंदुपात) पूर्णतया वर्जित नहीं है, अपितु उस पर आत्मनियंत्रण न होना ही वर्जित है

प्रेमयोगी वज्र के अनुसार, यदि ओर्गैस्मिक शिखर/वीर्यपात के समय मूलबबंध व उड्डीयान बंध को मजबूती से व लम्बे समय तक बना कर रखा जाता है, तब पूरी यौनशक्ति मस्तिष्क-स्थित कुण्डलिनी को मिलती है। उससे ऐसा लगता है कि यौन-चक्र व मस्तिष्क-चक्र मिलकर एक हो गए हैं, और दोनों पर कुण्डलिनी एकसाथ चमक रही है। इससे वीर्य का क्षरण भी बहुत कम होता है, जबकि आनंद बहुत अधिक प्राप्त होता है। यदि केवल उड्डीयान बंध ही लगाया जाए, तो यह सकारात्मक प्रभाव बहुत कम हो जाता है।

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Sex, and specifically the orgasm, is more that just something that feels good and allows procreation. There are many other functions, such as the release of dysfunctional energy within the body, which can help to keep one from becoming diseased. There is the function that opens the higher chakras, and under the right conditions allows a person to begin the process of enlightenment. And further, if two people, lovers, practice sacred sex, the entire experience can lead them together into higher consciousness and into worlds beyond this plane——

Ancient Egyptian Sexual Ankhing 

The ancient egyptians believed that orgasm is more than just something that feels good and allows procreation…

This Ancient Egyptian Sex Technique May Be the Secret to Eternal Life

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गुरु के बारे में एक आधारभूत रहस्योद्घाटन

गुरु क्या है

गुरु वह विलक्षण व्यक्तित्व है, जिस पर विश्वास है, जिससे प्रेम है, और जो अपने से कहीं अधिक महत्त्वशाली प्रतीत होते हैं। संस्कृत शब्द “गुरु” का अर्थ ही भारी या बड़ा है।

क्या एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है

काफी हद तक एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है, यद्यपि अधिकाँश मामलों में पूर्णरूप से गुरु नहीं बन सकता। वैसे कुछ अपवाद तो हर जगह ही देखने को मिल जाते हैं। अधिकांशतः प्रेमी के प्रति आदरभाव कम होता है, और उसके प्रति महत्त्वबुद्धि भी कम होती है। उससे प्रेमी का चित्र मन में अच्छी तरह से नहीं बैठता। गुरु के प्रति तो प्रेम के साथ आदरभाव व महत्त्वबुद्धि दोनों का होना आवश्यक है। इसीलिए गुरु अधिकांशतः आयु में वृद्धावस्था के करीब होते हैं। इससे वे ज्ञानी, ध्यानी, सम्मानित व योगसाधक होते हैं। वे आध्यात्मिक कर्मकांड करने वाले, व देवता के पुजारी होते हैं। वे साधारण व सात्विक जीवन जीने वाले होते हैं। वे सर्वप्रिय, मृदुभाषी, संतुलित, अहिंसक व कट्टरता से रहित होते हैं। उनके मन-मंदिर में सभी सद्गुणों का वास होता है। वे मन के दोषों से रहित, अनासक्त व अद्वैतशील होते हैं। गुरु के प्रति उपरोक्त आदरबुद्धि व महत्त्वबुद्धि के कारण उनका लीलामय रूप शिष्य के मन में पक्की तरह से बैठ जाता है, और लम्बे समय तक बना रहता है।

गुरु में दिव्य गुणों का होना आवश्यक है

ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी स्वयं दिव्य है और दिव्य गुणों का उत्पादन करती है। इसलिए, गुरु की दिव्यता एक व्यक्ति के दिमाग में कुंडलिनी को मजबूत करने में बेहतर रूप से मदद करती है। इसके अलावा, देवत्व भगवान के अनुग्रह को भी आकर्षित करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान भी देवत्व से भरे हुए हैं। भगवान की कृपा भी कुंडलिनी वृद्धि में एक महत्वपूर्ण कारक है।

गुरु व प्रणय-प्रेमी एक दूसरे के पूरक के रूप में

गुरु व प्रणय-प्रेमी की जुगलबंदी तंत्र का एक अभिन्न व आधारभूत हिस्सा है। तंत्र के अनुसार, गुरु व प्रणय-प्रेमी/प्रेमिका के बीच में किसी भी प्रकार से सम्बन्ध या संपर्क बना रहना चाहिए। कई आध्यात्मिक आकांक्षी प्रेमी के साथ भी और गुरु के साथ भी एकसाथ मजबूत संबंध (मानसिक या शारीरिक या दोनों) बना कर रखते हैं। यह भी स्वयं ही प्रेमी और गुरु की मानसिक छवियों के परस्पर मिलन का कारण बनता है। उससे गुरु के प्रति बनी हुई आदरबुद्धि प्रणय-प्रेमी के ऊपर स्थानांतरित हो जाती है, और प्रणय-प्रेमी के प्रति किया गया प्रणय-प्रेम गुरु के ऊपर शुद्ध प्रेम के रूप में स्थानांतरित हो जाता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे एक अँधा और एक लंगड़ा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। आमतौर पर गुरु की वृद्धावस्था के कारण उनके प्रति उतना मजबूत व आकर्षण से भरा हुआ प्रेम पैदा नहीं होता, जितना कि एक यौनप्रेमी के प्रति होता है। इसी तरह, एक यौनप्रेमी के प्रति उतनी आदरबुद्धि नहीं होती, जितनी एक वृद्ध गुरु के प्रति होती है। इसका कारण यह है कि अधिकांशतः प्रणय-प्रेमी भौतिकवादी, कम आयु वाला, कम अनुभव वाला, कम योग्यता वाला, कम योगसाधना करने वाला, कम गुणों वाला, मन के दोषों से युक्त व द्वैतशील होता है।

दो कुण्डलिनियों का एकसाथ निर्माण, व विकास

गुरु व प्रेमी के निरंतर संपर्क से, दोनों के लीलामय रूपों की कुण्डलिनियां (स्पष्ट व स्थायी मानसिक चित्र) एकसाथ विकसित होती रहती हैं। वे दोनों एक-दूसरे को शक्ति देती रहती हैं। भौतिक माहौल में प्रेमी की व अध्यात्मिक माहौल में गुरु की कुण्डलिनी अधिक विकसित होती है। अनुकूल परिस्थितियों के अनुसार, दोनों में से कोई भी कुण्डलिनी पहले जागृत हो सकती है। अधिकाँशतः गुरु के रूप की कुण्डलिनी ही जागृत होती है, प्रणय-प्रेमी की कुण्डलिनी तो उसकी सहायक बन कर रह जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्ण मानसिक मिलन तो गुरु के साथ ही संभव है। प्रणय-प्रेमी से सम्बंधित शारीरिक उत्तेजना उसके रूप की कुण्डलिनी से एकाकार होने (कुण्डलिनी जागरण) की राह में रोड़ा बन जाती है। यह सारा कुछ ठीक इसी तरह ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ, जो इस वेबसाईट का नायक है।

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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019

सभी मित्रों को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस- 2019 की बहुत-2 हार्दिक शुभकामनाएं।

योग-साधकों के लिए कुछ जरूरी व व्यावहारिक सुझाव-

1) योग प्रतिदिन करना चाहिए। यदि किसी दिन व्यस्तता और थकान अधिक भी हो, तो भी योगसाधना के नियम को नहीं तोड़ना चाहिए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वैसे व्यस्त व थकान से भरे दिन योग-साधक एक नई व प्रभावकारी योगक्रिया स्वतः ही आसानी से सीख जाता है। साथ में, उस दिन एक नई अंतर्दृष्टि विकसित होती है।यदि उस दिन योग न किया जाए, तो साधक उस नई तकनीक या अंतर्दृष्टि से लम्बे समय तक वंचित रह सकता है।

यदि समय की बहुत ही अधिक कमी हो, तो ही योग साधना को कुछ संक्षिप्त करना चाहिए, अन्यथा पहले की तरह पूरे विस्तार के साथ योग करना चाहिए। उदाहरण के लिए, मैं आगे के और पीछे के चक्रों को जोड़कर, एकसाथ दोनों का ध्यान करने की कला ऐसे ही व्यस्त समय में सीखा था। पहले मैं आगे के चक्र पर अलग से व पीछे के चक्र पर अलग से कुण्डलिनी का ध्यान करता था। पहले दौरे में मैं ऊपर से लेकर नीचे तक सभी आगे वाले चक्रों का ध्यान करता था। दूसरे दौरे में नीचे से लेकर ऊपर तक सभी मेरुदंड वाले चक्रों का ध्यान बारी-२ से करता था। एक व्यस्तता से भरे हुए दिन के दौरान मैंने दोनों चक्रों को एक मनोवैज्ञानिक, काल्पनिक व अनुभवात्मक रेखा के माध्यम से जोड़कर, दोनों पर एकसाथ ध्यान लगाने का प्रयास किया। बहुत आनंद व कुण्डलिनी की तीव्र चमक के साथ वे दोनों चक्र मुझे अनुभव हुए। उनको आपस में जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा पर कुण्डलिनी आगे-पीछे जा रही थी। वह कभी एक चक्र पर स्थित हो जाती थी, तो कभी दूसरे चक्र पर। कभी वह रेखा के बीचों-बीच स्थित हो जाती थी, और वहां पर दोनों चक्रों का प्रतिनिधित्व करती थी।

2) प्राणायाम करते समय शिथिल (रिलेक्स्ड) रहें। अन्दर-बाहर आती-जाती साँसों पर भरपूर ध्यान दें। उससे कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। यदि अन्य विचार भी उठें, तो वे भी शुद्ध हो जाते हैं, क्योंकि आराम व तनावहीनता की अवस्था में सभी मानसिक विचार साक्षीभाव के साथ प्रकट होते हैं। तनाव व क्रोध आदि मानसिक दोषों की अवस्था में उठने वाले मानसिक विचार अशुद्ध व बंधनकारी होते हैं। इसलिए सदैव शांत, तनावरहित, व मानसिक दोषों से रहित बने रहने का प्रयत्न करें। शरीरविज्ञान दर्शन से इसमें बहुत मदद मिलती है।

प्रेमयोगी वज्र क्षणिक आत्मज्ञान के बाद बिलकुल तनावरहित बन गया था। उसने उत्तेजित व अशांत लोगों की घटिया मानसिकता को बहुत समय तक शांति के साथ झेला। एक दिन उसके मन में क्रोध उत्पन्न हो गया, और उसने एक सिरफिरे आदमी की पिटाई कर दी। यद्यपि ऐसा उसने अपने बचाव में किया। बाद में पता चला कि वह नशे में था। उसी दिन से उसे अपने मन के विचारों से अपना बंधन महसूस होने लगा, और वह बढ़ता ही गया। उसकी अशांति व उसका तनाव दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा, और साथ में उसका आत्मबंधन भी। वह डरा हुआ सा रहता था। दोनों प्रकार के भाव एक-दूसरे को बढ़ाने लगे। जिस प्रकार आत्मबंधन से भय उत्पन्न होता है, उसी प्रकार भय से आत्मा बद्ध हो जाती है। दरअसल, यह एक प्रकार की चेन रिएक्शन है, और जब यह शुरू हो जाती है, तो यह अपने आप बढ़ती चली जाती है। इस प्रकार से वह अपने आत्मज्ञान को शीघ्रता से विस्मृत करने लगा।  उसे आश्चर्य हुआ कि कैसे एक बार का किया हुआ क्रोध भी आदमी को योगभ्रष्ट कर सकता है। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि वह व्यक्ति मुझे सबसे प्रिय है, जिसकी किसी के भी साथ शत्रुता नहीं है।

अतः सिद्ध होता है कि योग से ही विश्व में वास्तविक प्रेम व सौहार्द बना रह सकता है।

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कुण्डलिनी व मूर्तिपूजा के बीच में परस्पर सम्बन्ध

कुण्डलिनी को क्रियाशील व जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के साथ बहुत लम्बे समय तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना पड़ता है। अधिकांशतः ऐसा एक ही जीवनकाल में संभव नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक है कि कुण्डलिनी के स्मरण वाला संस्कार एक आदमी को उसके जन्म से ही मिल जाए। यहाँ तक कि जब वह माता के गर्भ में हो, तभी से मिलना शुरू हो जाए। इसको संभव बनाने के लिए ही इष्टदेव को कल्पित किया गया है। वह कल्पित रूप सदा से सभी के लिए एक जैसा होता है। इससे उस इष्टदेव को मानने वाले परिवार में उस इष्टदेव के स्मरण से सम्बंधित संस्कार वंश परम्परा के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है। इसीलिए शैव सम्प्रदाय के लोगों के लिए शिव के रूप का ध्यान करना आसान हो जाता है। उसी ध्यान-शक्ति से एक शैव के मन में बसने वाला शिव उसकी कुण्डलिनी बन जाता है, जो अंततः कुण्डलिनी-जागरण के रूप में जीवंत भी हो सकता है। यदि दूरदर्शी ऋषियों के द्वारा शिव को निश्चित रूप न दिया गया होता, तो शिव का ध्यान उत्तरोत्तर न बढ़कर बार-२ टूटता रहता।

मान लो, किसी आदमी नि शिव को जटाधारी माना होता, और उसके पुत्र ने शिव को जटाहीन माना होता, तो क्या होता? वैसे में पिता के द्वारा अर्जित ध्यान पुत्र को प्राप्त न होता। वह अपना ध्यान स्वयं ही शुरू से इकट्ठा करता, जिससे उसे बहुत थोड़ा ही लाभ मिलता। उसे जो लाभ मिलता, वह यह होता कि उससे उसके जीवन में अल्प मात्रा में ही अद्वैत व अनासक्ति-भाव उत्पन्न होते। उससे प्रचंड अनासक्ति व अद्वैत के साथ कुण्डलिनी-जागरण न मिलता।

देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देव शंकर हैं। इसीलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। उन्हें एक निश्चित रूप प्रदान किया गया है। उनके गले में सर्प की माला है। उनके सिर पर लम्बी-२ जटाएं हैं। उनके मस्तक पर आधा चन्द्रमा विराजमान है। उनकी जटाओं से गंगा नदी निकल रही है। उनके माथे पर तीन समानांतर रेखाओं के रूप में तिलक है, जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। कई जगह उनके भ्रूमध्य में खुला हुआ तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। वे भस्म से लिपटे हुए हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, और एक हाथ में डमरू है। वे बैल की सवारी करते हैं। वे बाघ का चर्म ही ओढ़ते हैं, अन्य कोई वस्त्र नहीं पहनते हैं। वे सुन्दर हैं। उनके नयन-नक्श संतुलित व त्रुटिरहित हैं। उनका मुख कान्तिमान व आकर्षक है। उनका शरीर सुडोल व संतुलित है। वे मध्यम गोरे रंग के हैं। उनकी चाल-ढाल अद्वैत, अनासक्ति, व वैराग्य से भरी हुई है।

इसी तरह अन्य देवी-देवताओं को भी निश्चित रूप व आकार प्रदान किए गए हैं। साथ में, उन्हें निश्चित भाव-भंगिमाएं व आचार-विचार भी प्रदान किए गए हैं। गणेश को मूषक की सवारी करने वाला, लड्डू खाने वाला, व हाथी के जैसे मुख वाला बताया गया है। इसी तरह, नौ देवियों को भी भिन्न-२ परिचय दिए गए हैं।

इसी सिद्धांत के अनुसार अपने पूर्वज या पारिवारिक वृद्ध (पितामह आदि) को गुरु बनाना अधिक लाभप्रद है। क्योंकि एक व्यक्ति उनके साथ जन्म से लेकर परिचित व सौहार्दपूर्ण बना होता है, इसलिए उन्हें मन में बैठाना सर्वाधिक सरल होता है। वही मानसिक मूर्ति फिर लगातार के अभ्यास से कुण्डलिनी बन कर क्रियाशील व जागृत हो सकती है।

देव-मूर्ति पुराने मित्रों, परिचितों व पूर्वजों से भी जुड़ी होती है। जब कोई उन चिर परिचितों की समकालीन देव-मूर्ति से पुनः संपर्क साधता है, तब उन चिर-परिचितों की याद पुनः ताजा हो जाती है। उनमें से सर्वाधिक प्रभावशाली स्मरण बार-२ के अभ्यास से स्थायी स्मरण (कुण्डलिनी) के रूप में मन में उभर सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे कंडीशंड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) कहते हैं। इसके अनुसार जब दो वस्तुएं मन में एकसाथ बैठ गई हों, तो दोनों वस्तुएं आपस में जुड़ जाती हैं। जब कभी एक वस्तु का स्मरण किया जाता है, तो उससे जुड़ी हुई दूसरी वस्तु का स्मरण स्वयं ही हो जाता है। यह उस जैविक घटना की तरह है, जब एक गाय अपने बछड़े को देखकर अपना दूध छोड़ने लगती है। इस प्रकार से देव-मूर्तियाँ सामाजिक कंडिशनर (social conditioner) या सामाजिक संपर्कसूत्र (social link) का काम करती हैं। अपने प्रिय व परिचित जनों की याद बनाए रखने में ये अहम् भूमिका निभाती हैं। यही बात अन्य सभी निर्धारित किए गए धार्मिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यद्यपि देव-मूर्तियाँ इनमें मुख्य हैं, क्योंकि वे मानवाकार, सुन्दर, सहज सुलभ, सर्वसुलभ, व आकर्षक होती हैं।

अगर किसी को मूर्ति पूजा से प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता है, तो भी इसकी मदद से ध्यान और गहरी भावना की एक अच्छी आदत पड़ जाती है। यह मानवता के समग्र विकास में मदद करता है। यह सब प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ, तभी तो वह क्षणिक आत्मज्ञान व क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को अनुभव कर पाया। दरअसल, वैदिक काल में देवताओं को उनके शुद्ध प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था। बाद में, इनमें से कई देवताओं को मानव समाज में चल रहे सामाजिक सुधारों के साथ मानव रूप दिया गया, जो ज्ञान-विज्ञान सम्मत भी है।

प्राकृतिक चीजें अद्वैतशाली व अनासक्त होती हैं, तभी तो प्रकृति के बीच में आनंददायक शान्ति का अनुभव होता है। वास्तव में, देव-मूर्तियाँ घर के सीमित स्थान के लिए निर्मित किए गए, विराट प्रकृति के सूक्ष्म रूप ही हैं। शास्त्रों के वचनों से व वैज्ञानिक दर्शन “शरीरविज्ञान दर्शन” से भी यह प्रमाणित ही है कि जो कुछ भी इस बाह्य व विराट प्रकृति में है, वह सभी कुछ इस मानव शरीर के अन्दर भी वैसा ही है।

अब बात आती है, धर्म-परिवर्तन के बारे में। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तो अपने धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि धर्म परिवर्तन करने से अपने कुलधर्म से जुड़ी हुई चिर-परिचित लोगों व वस्तुओं की यादें गायब हो जाती हैं, और कुण्डलिनी-विकास का अच्छा अवसर हाथ से छूट जाता है। शास्त्रों में भी आता है, श्रेयो स्वधर्मो विगुणोपि, परधर्मो भयावहः। अर्थात, अपना धर्म कम गुणों वाला होने पर भी कल्याणकारी है, दूसरों का धर्म तो भयावह है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कट्टर धार्मिक होना चाहिए, या दूसरे धर्मों को नहीं मानना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि सभी मानवीय धर्मों को मानते हुए, अपने धर्म को ही मुख्य बना कर रखना चाहिए। यह ध्यान में रहना चाहिए कि यह बात योग पर लागू नहीं होती, क्योंकि योग कोई विशेष धर्म नहीं है। योग तो एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो सभी धर्मों का एक अभिन्न अंग है।

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पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि- Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

पुलवामा के आतंकी हमले में शहीद सैनिकों के लिए सैद्धांतिक श्रद्धांजलि (please browse down or click here to view this post in English)

इतिहास गवाह है कि हमलावर ही अधिकाँश मामलों में विजयी हुआ है। यदि वह जीतता है, तब तो उसकी कामयाबी सबके सामने ही है, परन्तु यदि वह हारता है, तब भी वह कामयाब ही होता है। इसके पीछे गहरा तांत्रिक रहस्य छिपा हुआ है। हमला करने से पहले आदमी ने मन को पूरी तरह से तैयार किया होता है। हमले के लिए मन की पूरी तैयारी का मतलब है कि वह मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है। मृत्यु का भय वह तभी समाप्त कर पाएगा, यदि उसे जीवन व मरण, दोनों बराबर लगेंगे। जीवन-मरण उसे तभी बराबर लगेंगे, जब वह मृत्यु में भी जीवन को देखेगा, अर्थात मृत्यु के बाद जन्नत मिलने की बात को दिल से स्वीकार करेगा। दूसरे शब्दों में, यही तो अद्वैत है, जो सभी दर्शनों व धर्मों का एकमात्र सार है। उसी अद्वैतभाव को कई लोग भगवान्, अल्लाह आदि के नाम से भी पुकारते हैं। तब सीधी सी बात है कि हरेक हमलावर अल्लाह का बन्दा स्वयं ही बन जाता है, चाहे वह अल्लाह को माने, या ना माने। अगर तो वह भगवान या अल्लाह को भी माने, तब तो सोने पे सुहागा हो जाएगा, और दुगुना फल हासिल होगा।

अब हमला झेलने वाले की बात करते हैं। वह मानसिक रूप से कभी भी तैयार नहीं होता है, लड़ने व मरने-मारने के लिए। इसका अर्थ है कि वह द्वैतभाव में स्थित होता है, क्योंकि वह मृत्यु से डरता है। वह जीवन के प्रति आसक्ति में डूबा होता है। इसका सीधा सा प्रभाव यह पड़ता है कि वह खुल कर नहीं लड़ पाता। इसलिए अधिकाँश मामलों में वह हार जाता है। यदि कभी वह जीत भी जाए, तो भी उसका डर व द्वैतभाव बना रहता है, क्योंकि विजयकारक द्वैत पर उसका विश्वास बना रहता है। सीधा सा अर्थ है कि वह हार कर भी हारता है, और जीत कर भी हार जाता है। बेहतरी से अचानक का हमला झेलने में वही सक्षम हो सकता है, जो अपने मन में हर घड़ी, हर पल अद्वैतभाव बना कर रखता है। अर्थात जो मन से साधु-संन्यासी की तरह की अनासक्ति से भरा हुआ जीवन जीता है, समर्थ होते हुए भी हमले की शुरुआत नहीं करता, और अचानक हुए हमले का सर्वोत्तम जवाब भी देता है। वैसा आदमी तो भगवान को सर्वप्रिय होता है। तभी तो भारत ने हजारों सालों तक ऐसे हमले झेले, और हमलावरों को नाकों चने भी चबाए। तभी भारत में शुरू से ही धर्म का, विशेषतः अद्वैत-धर्म का बोलबाला रहा है। इसी धर्म-शक्ति के कारण ही भारत को कभी भी किसी के ऊपर हमला करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अपने धर्म को मजबूत करने के लिए हमला करने की आवश्यकता उन्हें पड़ती है, जो अपने दैनिक जीवन में शांतिपूर्वक ढंग से धर्म को धारण नहीं कर पाते। यह केवलमात्र सिद्धांत ही नहीं है, बल्कि तांत्रिक प्रेमयोगी वज्र का अपना स्वयं का अनुभव भी है। जीवन के हरेक पल को अद्वैत से भरी हुई, भगवान की पूजा बनाने के लिए ही उसने इस वेबसाईट को बनाया है।

अब एक सर्वोत्तम तरीका बताते हैं। यदि अद्वैत-धर्म का निरंतर पालन करने वाले लोग दुष्टों पर हमला करके भी अद्वैत-धर्म की शक्ति प्राप्त करने लग जाए, तब तो सोने पर सुहागे वाली बात हो जाएगी। विशेषकर उन पर तो हमला किया ही जा सकता है, जिनसे अपने को खतरा हो, और जो अपने ऊपर हमला कर सकते हों। हमारा देश आज ऐसे ही मोड़ पर है। यहाँ यह तरीका सबसे सफल सिद्ध हो सकता है। भारत के सभी लोगों को ऋषियों की तरह जीवन बिताना चाहिए। भारत के सैनिकों को भी ऋषि बन जाना चाहिए, और हर-हर महादेव के साथ उन आततायियों पर हमले करने चाहिए, जो धोखे से हमला करके देश को नुक्सान पहुंचाते रहते हैं। एक बार परख लिया, दो बार परख लिया, चार बार परख लिया। देश कब तक ऐसे उग्रपंथियों को परखता रहेगा?

आतंकवादियों के आश्रयस्थान के ऊपर जितने अधिक प्रतिबन्ध संभव हो, उतने लगा देने चाहिए, अतिशीघ्रतापूर्वक। उन प्रतिबंधों में शामिल हैं, नदी-जल  को रोकना, व्यापार को रोकना, संयुक्त राष्ट्र संघ में आतंकवादी देश घोषित करवाना आदि-2।

एक सैद्धांतिक व प्रेमयोगी वज्र के द्वारा अनुभूत सत्य यह भी है कि जब मन में समस्या (कुण्डलिनी चक्र अवरुद्ध) हो, तभी संसार में भी दिखती है। यही बात यदि उग्रपंथी समझें, तो वे दुनिया को सुधारने की अंधी दौड़ को छोड़ दें।

भगवान करे, उन वीरगति-प्राप्त सैनिकों की आत्मा को शांति मिले।

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https://demystifyingkundalini.com/2018/12/23/योग-व-तंत्र-एक-तुलनात्मक-अ

https://demystifyingkundalini.com/2018/07/18/religious-extremism

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Theological tribute to martyr soldiers in the Pulwama terror attack

History is the witness that the attacker has won in most of the cases. If he wins, then his success is in front of everyone, but if he loses, he still succeeds. The deep tantric mystery is hidden behind this. Before attacking other, man had prepared the mind completely. The complete preparation of the mind for the attack means that he eliminates the fear of death. He will be able to destroy the fear of death only if both life and death will be equal for him. Life and death will be equal to him, when he will see life in death also, that means, after death, he will accept the matter of getting the Paradise. In other words, this is the Advaita (non-duality), which is the only essence of all philosophies and religions. Many people call the same adwaita as the name of God, Allah etc. Then it is a straightforward thing that every attacker is the man of Allah itself, whether he believe in Allah or does not believe. If he also obeys God or Allah, then he will be blessed with borax on gold, means double reward will be achieved.

Now talk about the attacked. He is never mentally prepared regarding fighting and do or die. This means that he is present inside duality, because he is afraid of death. He is immersed in attachment to life. Its direct effect is that he does not openly fight. Therefore, in most cases he loses. Even if he wins, even then his fear and duality will remain, because his faith remains on the victorious duality. Straightforward it means that he loses even after defeating, and also loses by winning. He can be able to withstand the sudden attack better, who keeps non-duality in his mind at each moment of his life. That means, the mind that lives in a way filled with non-attachment like a Sage-Sannyasi. Even when capable, he does not start the attack, and gives a most appropriate answer to the sudden attack. Such a person is most loved by God. Only then did India take such attacks for thousands of years, and even shown stars in the daytime to the attackers. Only then India has religion dominated, especially Advaita Dharma (non duality-religion). Because of this same power, India never needed to attack anyone. Those need to attack to strengthen their own religion, who cannot hold religion in peace in their daily life. It is not only a mere theory, but also a tantric, Premyogi Vajra has this type of own experience. He has created this website to make every moment of one’s life full of Advaita, the unique and real worship of God.

Now tell a best way. If people, who constantly follow the Advaita Dharma, also continue to get the power of Advaita Dharma by attacking the evil ones, then there will be again borax over the gold. Especially those attackers can be attacked, who are a threat to one’s security, and those who can attack suddenly. Our country is on the same twist today. Here this method can be proven most successful. All people of India should spend life like sages. The soldiers of India should become sages, and with slogan of Har- Har Mahadev, they should attack those terrorists, who continue to harm the country by attacking deceptively. Once those have been tested, tested twice, tested four times. How long will the country test such extremists?

The restrictions on the shelter of the terrorists should be imposed as much as possible, in the fastest way possible. Those restrictions include stopping river-water, preventing trade, declaring a terrorist country in the United Nations etc.

The truth that is perceived by Premyogi vajra is that when there is a problem in the mind (Kundalini Chakra is blocked), then only in the world it is also visible. If extremists understand the same thing, then they should leave the blind race to improve the world.

May God bestow peace to the departed soul of those martyrs.

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