Kundalini Chitra develops Vigyanmaya Kosha

There are many descriptions in the scriptures that happiness is within, that is, it is in the soul, not outside. But I could not find any scientific explanation for this. Probably the form of the soul is like the existential void or the sky. In avidya or darkness there is one quality of the soul remaining, the void or the sky or the being. The quality of light disappears in it. That’s why the joy in it is greatly reduced, because all the qualities of the soul are related to each other more or less. In any form, the light that is experienced through the experience of the world, tries to fulfill the lack of light in the soul. What happens is that when that worldly light feeling is very fast, changing, i.e. dynamic or flamboyant or real like, then it cannot be mixed with the soul, because the soul is non undulating or changeless, like the nature of the sky, but on the contrary, the fast worldly feelings fluctuate quickly like waves of ups and downs means they are of the nature of change. One gets momentary happiness from them, as long as they remain, but as soon as they are removed, the darkness of the soul becomes more dense even from earlier. It is similar to how a person becomes blind for a while after coming out of bright light at night. When those worldly luminous experiences become dull due to non-attachment or Kundalini meditation etc., then they start matching with the empty soul. By this they give their light to the soul. Due to this, the lack of the soul is fulfilled and so bliss is felt, because according to the above scriptures, there is happiness in the soul itself, not outside. This is called satoguni avidya. Satogun is Prakash Pradhan. This is not only a matter of spiritual importance but also a matter of practical importance. Everyone likes a man who is calm and not the flamboyant one. The mental darkness of a person with a calm nature is also calm, while the mental darkness of a person with a fierce nature, ignorance of passion, is also fierce, deep and painful. This is the main difference between a gentleman and a scoundrel. The ignorance of a sage is due to being born of sattva guna, whereas that of a wicked person is due to being born of rajo guna and tamo guna.

When thoughts or mental images are changing rapidly due to passion, then their identity with the Pranamaya and Annamaya Kosha cannot be felt. Because later both are much more slow moving. Means it is difficult to consider them as one with the same combined body composition. Also the mental images related to common worldliness or livelihood are physical, because they are associated with the so-called material world, but the soul is immaterial, so they do not match. It is easy to associate mental images that are like static or slow and immaterial with this body group. In the Punjabi language and in the Sanskrit language, there is long path style or slowness, which increases the quality of goodness or sattvaguna. That’s why the use of these languages creates joy. The darkness of avidya that keeps on arising during worldliness through them, is the form of satoguni avidya. It is blissful. Similarly, keeping a beard like Sadhu Baba also makes a man’s behavior slow, contemplative, that is, satvik. This is why Baba remains intoxicated with bliss.

When a man attains a high position or object, the elders of the house keep him calm by preventing him from jumping too much. In our childhood, our mother used to bring us down from the sky to the ground immediately after some big achievement. In most of the cases, she did not let us fly in the sky of ego. She belonged to a family lineage of good and Vedic rites. If there is no contact of elders and sages in someone’s circle, then he flies far away with the achievements for a short time. Then, when the intoxication of flying breaks, he falls and starts drowning in the pit of depression, and the world starts considering him as crazy or mad, then he comes to his senses. But by then he would have lost a lot of joy and progress of the soul. That’s why it is not that this psychological principle of sattva guna avidya is applicable only in spirituality. This is equally applicable in worldly dealings too. Perhaps that’s why it comes in abundance in the scriptures that one has to suffer or do penance to attain knowledge. The scriptures believe that a person troubled by the sufferings of penance or lack of worldly goods will definitely find happiness in the soul.

When the gross body is also felt along with the thoughts, then the body gets their power and the burden of the brain is reduced. Means the force which was causing pressure in the brain gets transformed into the contraction of the muscles. Thoughts remain but fading with joy, they come to different chakras and dissolve. This happens because the chakras are not flooded with changing thoughts like the brain or mind. Infact chakra is not a dedicated organ for feelings like brain. Only one picture, mainly the Kundalini picture, remains on the chakras for a long time. This long stay of a sharp, quiet but unique mental image is a symbol of virtue. The avidya that arises from this is satoguni avidya. This is the bliss treasure. It is like a quiet and bright and non physical though unique candle flame mixed in the dark and quiet self more than other vibrant thoughts comparatively. Only the Kundalini picture that remains stable for a long time makes the best vigyanmaya kosha. It is a knowledge of immanent existence like the soul, but still a special knowledge. Meaning it is neither enlightenment or awakening, nor ordinary cosmic knowledge, but special knowledge or vigyan which is undoubtedly close to enlightenment.

कुण्डलिनी शक्ति अशुभ व भूतिया घटनाओं से रक्षा करती है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि पुराने लोगों को वर्महोल, व्हाइट होल और टेलीपोर्टेशन आदि का पता था, हालांकि अपने तरीके से। उन्हें पता था कि स्थूल शरीर के साथ यह संभव नहीं है, पर सूक्ष्मशरीर के साथ संभव है। इसलिए वे अच्छे कर्मों से अपने सूक्ष्मशरीर को ज्यादा से ज्यादा अच्छा बनाते थे, ताकि वह उन्हें अच्छे ग्रह, सितारे या ब्रह्माण्ड में ले जा सके, क्योंकि उन्हें यह भी पता था कि क्वांटम इनफार्मेशन कभी नष्ट नहीं होती। इसी वजह से हम देखते हैं कि आजकल के बच्चे जन्म से ही हाइटेक होते हैं। वे स्मार्टफोन के बिना खाना भी नहीं खाते। दरअसल उनके हाल ही के पिछले जन्म की हाइटेक सूचना उनके सूक्ष्मशरीर में दर्ज हुई होती है। रही बात शरीर के साथ व्हाइट होल से गुजरना या टेलीपोर्टेशन करना, मुझे तो यह संभव लगता नहीँ है। चलो मान लेते हैं कि किसी चमत्कारिक शक्ति से यह संभव हो गया। फिर भी जाएंगे कहाँ क्योंकि अभी तक कोई भी पूरी तरह से हेबिटेबल अर्थात जीवन के अनुकूल ग्रह नहीँ मिला है। कोई मंगल पर जाने की योजना बना रहा है, कोई चाँद पर। वहाँ बाद में जाएं, पहले ऊँचे हिमालय में जाकर देख लो। तापमान की एक डिग्री की कमी भी कम्पकम्पी दे सकती है और जीवन को जोखिम में डाल सकती है। दूसरे ग्रह पर बाद में जाना, क्योंकि वहाँ तो ऐसी अनगिनत समस्याएं होंगी, वे भी विकराल रूप में। धरती पर ही ऐसे बहुत से स्थान हैं, जिन्हें विज्ञान हेबिटेबल नहीँ बना पा रहा है, अन्य ग्रहों की तो दूर की बात है। उमंग और जोश बनाए रखने में कोई बुराई नहीं है।

वैज्ञानिक अंदेशा जता रहे हैं कि ब्लैक होल में छुपे पदार्थ किसी अन्य आयाम में छिपे ब्रह्माण्ड में जा सकते हैं। अंतरिक्ष के अनगिनत आयाम मतलब अनगिनत कॉपीयां हो सकती हैं, जैसा अभी हाल की एक पिछली पोस्ट में बताया गया है। अब पता नहीं कौन सी कॉपी में जाकर वे पुनः भौतिक रूप में जन्म ले लेते हैं। यह ऐसे ही है जैसे आदमी मरने के बाद पता नहीं कौन सी कॉपी में चला जाता है। हम जीव दूसरी कॉपी मतलब दूसरे जीव में स्थित ब्रह्माण्ड को बिल्कुल भी अनुभव नहीं कर सकते। हालांकि हम दूसरे जीव के शरीर को तो अनुभव कर ही सकते हैं। इसी तरह हम बाहरी अर्थात स्थूल रूप में तो दूसरे ब्रह्माण्ड को जान ही सकते हैं। पर दूसरे ब्रह्माण्ड हमारी पहुंच से परे हैं। यह ऐसे ही है जैसे नार्थ पोल पर बैठा व्यक्ति साऊथ पोल पर बैठे व्यक्ति को नहीं देख सकता।

अब तो यह प्रमाण भी मिला है कि ब्लैक होल में सभी पदार्थ बहुत ज्यादा विस्फोटक दबाव में दबे होते हैं। वे सम्भवतः विस्फोट के साथ बाहर निकलना चाहते हों, क्योंकि कोई भी वस्तु हो या व्यक्ति, दबाव में रहना पसंद नहीं करते। हवा, पानी आदि चीजें उच्च दबाव के क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की तरफ भागते हैं। काम के बेवजह दबाव की वजह से हर साल हजारों-लाखों कर्मचारी अपनी कम्पनियाँ बदलते हैं, अन्यथा बीमार पड़ जाते हैं। पर ब्लैक होल के वे दबे पदार्थ ब्लैकहोल के गुरुत्व बल को भगाकर बाहर नहीं भाग पाते। यह ऐसे ही है जैसा मैं हाल की एक पिछली पोस्ट में सूक्ष्मशरीर रूपी प्रेतात्मा के बारे में बता रहा था। हालांकि कुछेक मामलों में ब्लैक होलों को थोड़े-बहुत पदार्थ उगलते हुए देखा गया है। इसी तरह प्रेतात्मा भी विरले मामलों में डरावने रूप बनाकर लोगों को डरा सकते हैं। इन्हें भटकी हुई आत्माएं कहते हैं। ये उनके साथ ज्यादा होता है, जो अकाल मृत्यु से मरते हैं। अकालमृत्यु मतलब पूरी दुनियावी मायामोह में डूबे आदमी की अचानक मृत्यु। दुनिया के प्रति आसक्ति और द्वैत भाव वाले आदमी के साथ भी ऐसा हो सकता है। इसमें आदमी को अपने मानसिक ब्रह्माण्ड को हल्का और छोटा करने का मौका ही नहीं मिलता। इससे उनका सूक्ष्म शरीर अचानक से बहुत ज्यादा दबाव के साथ बन जाता है। उसी दबाव के कारण वे आभासी जैसे डरावने रूप बनाते रहते हैं। यह पता नहीं कि कैसे। कईयों में अच्छे संकल्पों का दबाव ज्यादा होता है, इसलिए उन्हें स्वर्ग का अनुभव होता है। कईयों में बुरे संकल्पों का दबाव ज्यादा होता है इसलिए वही संकल्प नर्क के अनुभव के रूप में बाहर को स्फुटित होते रहते हैं। वैसे तो प्रेतात्मा अँधेरे के रूप में रहती है। उसमें कोई संकल्प-विकल्प नहीँ होते। पर संकल्प-विकल्प उसमें आत्मा के अँधेरे के रूप में छिपे होते हैं। आदमी जब ऐसी आत्मा के सम्पर्क में आता है, तो वे छुपे हुए संकल्प उसके मन में जिन्दा होने लगते हैं। वे इतना ज्यादा शक्तिशाली हो सकते हैं कि वे उसे असली भौतिक रूप में भी दिख सकते हैं। इसे ही भूत दिखना कहते हैं। भूत का मतलब ही भूतकाल है। मतलब यह पुराने समय में हुआ है, अभी नहीँ है। इसीलिए भूतिया फिल्मों में आदमी की भूत बनी जीवात्मा की जीवित समय की मार्मिक घटना भूत बनकर डराते हुई दिखाई जाती है। यदि किसी का ऐसे काल्पनिक भूत से सामना हो जाए तो कहते हैं कि उससे बात नहीँ करनी चाहिए। क्योंकि क्या पता करतबी दिमाग़ झूठमूठ में ही क्या डरावना नजारा दिखा दे, जिससे हर्टफेल ही हो जाए। दिमाग़ के करतब का एक अन्य उदाहरण है, मरते हुए आदमी को ले जाने काले यमराज का काले भैंसे पर बैठकर आना। यह शास्त्रों में भी लिखा है और यह एक वैश्विक अनुभव भी है, मतलब किसी देश या धर्म तक सीमित नहीँ है। दरअसल उस समय ऐसी मानसिक अवस्था होती है कि दिमाग़ वैसा  काल्पनिक दृश्य रच लेता है जो असली जैसा लगता है। भौतिक रूप से कहीं कोई भैंसा-वैँसा नहीं आता। एकबार मुझे एक जीवंत सपने में एक काला भैंसा पहाड़ी की चोटी की तरफ घने अँधेरे जंगल से होकर ले गया। वह अंधेरा दिव्य व आनंदमय था, किसी महान आदमी या संत के सूक्ष्मशरीर की तरह। वह भैंसा मुझे बीच रास्ते में छोड़कर भाग गया। फिर मैं ऊपर चढ़ते हुए उस अकेली व मध्यम ऊँचाई की पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गया। अलौकिक दृश्य था। दो या तीन मंजिला दिव्य कुटिया थी। दिव्य व चाँद या मौमबत्ती जैसी रौशनी थी, फिर भी चकाचक। जब मैं दूसरी मंजिल के खुले आँगन या टेरेस में बाहर निकला, तो वहाँ एक दिव्य साधुबाबा थे। मेरी लिखी पुस्तक उनके हाथ में थी और खुशी से मुस्कुराते हुए कह रहे थे कि उन्हें डाक आदि से मिली और वे मेरा ही इंतजार कर रहे थे। उन्होंने मेरा प्रेमभाव से भरा दिव्य सम्मान किया। जल्दी ही स्वप्न टूटा और मैं उस दिव्य अहसास से बाहर हो गया। इसका वर्णन मैंने इस वैबसाईट के अबाउट पेज पर भी किया है।

भटकी आत्मा के संबंध में मैं एक घटना सुनाता हूँ। मैं एक सुंदर पहाड़ी पर बने ढाबे में कभीकभार लंच करने जाया करता था। उसमें वेज-ननवेज हर किस्म का खाना बनता था। सुनने में आया कि एकबार रात को कुछ बदमाश ग्राहकों ने शराब के नशे में बिल को लेकर कहासुनी के बाद ढाबामालिक के बाप के ऊपर जबरदस्ती गाड़ी चढ़ा दी और फरार हो गए। अचानक, एकदम और दर्दनाक मृत्यु हुई थी, इसलिए वह अकालमृत्यु हुई। उसके बाद जब भी मैं उस ढाबे में जाता था, मुझे वहां अजीब सी एनर्जी महसूस होती थी। साथ में हर बार मेरे संबंधियों के साथ कोई न कोई अशुभ वाकया होता-होता टल जाता था। सम्भवतः मुझे कुण्डलिनी बचा लेती थी, पर कुण्डलिनी योग न करने के कारण कमजोर मन वाले संबंधी पर वह असर डालती थी। सम्भवतः कुण्डलिनी का कुछ असर उन तक भी पहुंच जाता था। उसके बाद मैंने वहाँ जाना बिल्कुल बंद कर दिया। साधारण धार्मिक कृत्य तो सभी कराते हैं, पर विशेष मृत्यु के बाद वे विशेष व शक्तिशाली होने चाहिए, ताकि दिवंगत आत्मा को शांति मिले। इसी तरह मैं एक बार परिचित के घर में सोया था। रात को मैंने देखा कि छत से जलती हुई लकड़ियाँ मेरे ऊपर गिर रही हैं। मैं चिल्लाया भी। फिर मैंने गुरु और कुण्डलिनी का ध्यान किया। इससे वह भूतिया दृश्य हट गया और मुझे नींद आ गई। वहाँ पर ऐसी भूतिया घटनाओं और अकालमृत्यु का पुराना इतिहास रहा था। संक्षेप में प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा सुनी घटनाएं कहूँ तो एक व्यक्ति को रात को पानी पर तैरती ज्योतियां दिखती थीं, जो जलती और बुझती थीं। उस पानी में एक नजदीकी प्रेतग्रस्त परिवार ने प्रेत को गिट्टीयों में बांधकर दबा रखा था। शायद पत्थरों के छोटे टुकड़ों या ऐसे यन्त्रों को गिट्टी कहा गया है। एक मित्र को आधी रात को सुनसान सड़क के पास खेलते बच्चे दिखे जो छोटे-बड़े हो रहे थे। एक मित्र को प्रेतबाधा से ग्रस्त मकान में रात को दरवाजा खटखटाने की आवाज आती, दरवाजा खोलने पर लगता कि कुछ अंदर भागता हुआ किसी छेद वगैरह से कुछ वस्तुओं की आवाज के साथ बाहर निकल गया, पर दिखता कुछ नहीँ था। मेरे पूर्व के एक सज्जन व भोले पड़ोसी को एक तांत्रिक ने यह कह कर रात को अकेले श्मशान या कब्रगाह में जाने को इसलिए कह दिया कि उससे उसका खतरे में पड़ा व्यापार सुरक्षित बचेगा। सुबह वह वहाँ मृत मिला। रिपोर्ट से पता चला कि उसका हर्ट फेल हुआ। पर मेरे दादा इतने बहादुर होते थे कि अक्सर कहते थे कि श्मशान में अकेले आराम से सो सकते हैं। बस ऊपर से ओढ़ने के लिए एक चादर चाहिए। उनके अंदर बहुत कुण्डलिनी बल था। हनुमान चालीसा को भूत भगाने में सर्वोत्तम माना जाता है। मुझे भी लगता है कि हनुमान चालीसा एकदम से कुण्डलिनी शक्ति और कुण्डलिनी चित्र को मजबूती के साथ क्रियाशील कर देता है। हाँ, वही भगवान हनुमान इस चालीसा के माध्यम से शक्ति देते हैं, जिसे बाघेश्वर धाम सरकार वाले पंडित धीरेन्द्र शास्त्री ने सिद्ध किया हुआ है, और जिससे वे बहुत से चमत्कार दिखाते हैं। मुझे सबसे रोमांचकारी, नकली या ढोंगी गुरुओं से बचाने वाली और पारिवारिक प्रेम को उजागर करने वाली यह बात लगी कि उनके दादा ही उनके धर्मगुरु हैं। बहुत से तथाकथित जादूगर, सैकुलर और विधर्मी लोग उनका पर्दाफाश करने सामने आए, पर सफल न हो सके। आजकल यह एक गर्म चर्चा का विषय बना हुआ है।

फिर कहते हैं कि ब्लैक होल चमकते सितारों को अपनी तरफ खींच कर निगल लेते हैं। मतलब वे मृत्युरूप होते हैं। सूक्ष्मशरीर भी तो मृत्युरूप ही होता है। जीवन उसके चारों तरफ घूमता है। वह जीवन के केंद्र में होता है, और बढ़ती आयु के साथ जीवन को अपनी ओर ज्यादा से ज्यादा खींचता जाता है। अंत में जीवन उसमें गिरकर खत्म हो जाता है। आदमी का सूक्ष्मशरीर उसके जीवन की हरेक गतिविधि पर अपना नियंत्रण रखता है। कहते हैं कि वे संस्कार सूक्ष्मशरीर अर्थात सबकोन्सियस माइंड अर्थात अवचेतन मन में ही रहते हैं, जो आदमी के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। उसी तरह ब्लैक होल भी अपने से जुड़े सभी ग्रहों, सितारों और अन्य आकाशीय पिंडों को अपने नियंत्रण में रखकर उन्हें अपने चारों तरफ घुमाता रहता है। इसी तरह डार्क एनर्जी और डार्क मेटर भी पूरे ब्रह्माण्ड का संतुलन बना कर रखते हैं। फिर कहते हैं कि एक ब्लैक होल अपने पितृ तारे को तो निगलता ही हैं, पर दूसरे अन्य अनगिनत तारों को भी निगलते हैं। महान आत्मा जैसे कि किसी महान नेता, खिलाड़ी या अन्य किसी महान कलाकार का सूक्ष्म शरीर भी तो उनके अनगिनत फॉलोवर को अपनी तरफ खींचता है। उनकी मृत्यु से उनके पिछलग्गू कई दिन मातम व मायूसी के माहौल में रहते हैं, कई आत्महत्या कर लेते हैं, और कई दंगे फैलाकर जिनोसाइड अर्थात सामूहिक नरसंहार को अंजाम देते हैं। बेशक वे सभी एक बड़े ब्लैकहोल में समा जाते हैं, पर उनकी पृथक सत्ता भी रहती ही है।

Kundalini Shakti protects from inauspicious and ghostly events

Friends, I was telling in the previous post that old people knew about wormhole, white hole and teleportation etc., though in their own way. They knew that this is not possible with the physical body, but it is possible with the subtle body. So they used to make their astral body as good as possible by doing good deeds, so that it can take them to a good planet, star or universe, because they also knew that quantum information is never destroyed. For this reason, we see that today’s children are hi-tech from birth. They don’t even eat food without a smartphone. Actually the hi-tech information of their recent past birth is recorded in their subtle body. As for passing through a white hole with the body or doing teleportation, I don’t think it is possible. Let’s assume that some miraculous power made this possible. Still, where will we go because till now no completely habitable planet has been found. Some are planning to go to Mars, some to the moon. Go there later, first go to the higher Himalayas and see. Even a one-degree drop in temperature can cause shivering and put life at risk. Go to another planet later, because there will be innumerable such problems, that too in a gigantic form. There are many such places on earth itself, which science is not able to make habitable, let alone other planets. There is nothing wrong in maintaining enthusiasm and positivity.

Scientists are speculating that the matter hidden in the black hole can go to the hidden universe in some other dimension. An infinite number of dimensions of space can mean an infinite number of copies, as explained in a recent previous post. Now don’t know in which copy it goes and take birth again in physical form. It is as if a man goes to who knows which copy after his death. We creatures are in another copy means we cannot experience the universe located in other copies at all. Although we can feel the body of another living being. In the same way, we can know the other universe in external means in gross form. But other universes are beyond our reach. It is like a person sitting at the North Pole cannot see the person sitting at the South Pole.

Now this evidence has also been found that all the matter in the black hole is buried under very explosive pressure. They probably want to go out with a bang, because no matter what the person or thing, they don’t like to be under pressure. Things like air, water etc. move from the area of high pressure to the area of low pressure. Every year thousands of employees change their companies due to unnecessary pressure of work, otherwise they fall ill. But those buried substances of the black hole are not able to run away from the gravitational force of the black hole. This is similar to what I was talking about in a recent post about the spirit in the form of a subtle body. However, in some cases, black holes have been observed spewing out a small amount of material. Similarly, ghosts can also scare people by making scary appearances in rare cases. These are called lost or wandering souls. This happens more with those who die of premature death. Premature death means the sudden death of a man immersed in worldly illusion. The same can happen to a man with attachment and duality towards the world. In this man does not get a chance to lighten and reduce his mental universe. Due to this their subtle body suddenly becomes made with a lot of pressure. Due to the same pressure, they keep on making scary forms like virtual forms. Don’t know how. Some have more pressure of good thoughts, that is why they experience heaven. Many have a lot of pressure of bad thoughts, that’s why the same thoughts continue to erupt outside in the form of an experience of hell. By the way, the ghost lives in the form of darkness. There are no resolutions or thoughts in it. But the thoughts and choices are hidden in it in the form of darkness of the soul. When a man comes in contact with such a soul, those hidden thoughts come alive in his mind. They can be so powerful that they can even appear to him in their true physical form. This is called seeing a ghost. Bhoot in Sanskrit means past. Means it happened in the old time, not now. That’s why in ghostly movies, the poignant incident of the living time of the soul which became the ghost of a man is shown as a ghost and scares. If someone encounters such an imaginary ghost, then it is said that one should not talk to it. Because don’t know what a scary sight the clever mind can show in a falsehood, due to which heartfail will happen. Another example of a trick of the mind is the arrival of the black Yamraj sitting on a black buffalo to carry a dying man with him. It is also written in the scriptures and it is also a universal experience, meaning it is not limited to any country or religion. Actually at that time there is such a mental state that the mind creates such an imaginary scene which seems like real. Physically, no buffalo or Yama comes anywhere. Once, in a vivid dream, a black buffalo led me on its back through a dense dark forest towards the top from lower side of the hill. That darkness was divine and blissful, like the subtle body of a great man or a saint. That buffalo ran away leaving me in the middle of the way. Then I climbed up and reached that lonely and medium height hill. It was a supernatural scene. There was a two or three storied divine hut. The light was divine and like the moon or a candle, yet dazzling. When I came out in the open courtyard or terrace of the second floor, there was a divine Sadhu Baba. My newly written book was in his hand and was smiling happily saying that he had received it from the post etc. and he was waiting for me. He respected me affectionately and divinely. Soon the dream broke and I passed out of that divine feeling. I have also described this on the about page of this website.

Let me narrate an incident regarding the lost soul. I used to go to a dhaba on a beautiful hill to have lunch occasionally. Veg and non-veg food was prepared in it. It was heard that once at night some miscreant customers, after an altercation over the bill, forced their car over dhaba owner’s father and fled. The death was sudden, and painful, so it was a premature death. After that whenever I used to go to that dhaba, I used to feel strange energy there. Along with this, every time one or the other bad incident happened with my relatives, it was averted. Probably Kundalini used to save me, but due to not doing Kundalini Yoga, it used to affect the weak minded relatives. Probably some effect of Kundalini used to reach them as well. After that I completely stopped going there. Ordinary religious rituals are performed by everyone, but after special death they should be special and powerful, so that the departed soul may rest in peace. Similarly, once I slept in an acquaintance’s house. At night I saw burning wood falling on me from the roof. I screamed too. Then I meditated on Guru and Kundalini. This removed the ghostly vision and I fell asleep. There was an old history of such ghostly incidents and premature death there. In brief, the incidents heard by the eyewitnesses, a person used to see lights floating on the water at night, which kept on burning and extinguishing. A nearby haunted family had buried the ghost in that water by tying it in ballasts. Perhaps small pieces of stones or such instruments that’s yantras are called ballast. A friend saw children playing near a deserted road in the middle of the night who were growing up and going small too. A friend used to hear door knocking at night in a haunted house, on opening the door it seemed that something ran inside and came out with the sound of some objects from a hole etc., but nothing was visible. My past gentleman and innocent neighbor as directed by a tantrik went to the crematorium or burial ground alone at night so that his endangered business would be safe. In the morning he was found dead there. The report revealed that he had heart failure. But my grandfather was so brave that he used to say that he could sleep comfortably alone in the crematorium. Just a bed sheet is needed to cover the top. He had a lot of Kundalini shakti inside him. Hanuman Chalisa is considered best in exorcism. I also feel that Hanuman Chalisa immediately activates the Kundalini Shakti and Kundalini picture strongly. Yes, the same Lord Hanuman gives power through this chalisa, which has been perfected by pundit Dhirendra Shastri of Bageshwar Dham sarkar, and by which he shows many miracles. What I found most thrilling, saving from fake gurus and highlighting family love, is that his grandfather is his godfather or Guru. Many so-called magicians, secular and heretical people came forward to expose him, but could not succeed. Nowadays it has become a burning topic.

Then it is said that black holes pull the shining stars towards them and swallow them. Meaning they are mortality-inducer. The subtle body is also a form of death. Life revolves around it. It is at the center of life, and with increasing age pulls life more and more towards it. In the end life ends by falling into it. The subtle body of a man exercises control over every activity of his life. It is said that those impressions remain in the subtle body that’s subconscious mind only called as Sanskaras, which affect the behavior of a man. Similarly, the black hole also keeps all the planets, stars and other celestial bodies attached to it under its control and rotates them around itself. Similarly, dark energy and dark matter also maintain the balance of the entire universe. Then it is said that a black hole not only swallows its parent star, but many also swallow countless other stars. Even the subtle body of a great soul such as a great leader, sportsperson or any other great artist attracts countless followers towards it. After his death, his followers live in an atmosphere of mourning and despair for many days, many commit suicide, and by spreading riots, many commit Genocide, that is, mass death. Of course they all get absorbed in a big blackhole, but their separate existence also remains.

अच्छा लगता नूतन साल~एक अतिलघु कविता

अच्छा लगता नूतन साल

जैसा भी हो चाहे हाल।

परिवर्तन की कैसी चाल

काल का कैसा मायाजाल।

कुंडलिनी-शिव विवाह ही साधारण लौकिक विवाह का उद्गम स्थान है

मित्रो, आप सभी को छठ पर्व की शुभकामनाएं। मैं हाल ही के एक लेख में बता रहा था कि हिंदू त्यौहारों वाली आध्यात्मिक संस्कृति प्रकृति की पुजारी है, और वातावरणीय प्रदूषण के विरुद्ध है। सूत्रों के अनुसार अभी जब 2-3 दिन पहले छठी देवी की पूजा करने के लिए कुछ महिलाएं दिल्ली की यमुना नदी के पानी के बीच में सूर्य को अर्घ्य देने के लिए खड़ी हुईं, तो दुनिया को यमुना के वास्तविक प्रदूषण का पता चला। यमुना का पानी काला था, और उस पर इतनी ज्यादा सफेद झाग तैर रही थी कि वह ध्रुवीय समुद्र के बीच में तैर रहे बर्फ के पहाड़ लग रहे थे। बताने की जरूरत नहीं है कि अब यमुना की सफाई के प्रयास जोरों से शुरु हो गए हैं। पर इसको करवाने के लिए अनजाने में ही व्हिसल ब्लोवर का काम उन हिन्दू परंपरावादी महिलाओं से हो गया जो अपनी जान को जोखिम में डालकर प्रकृति को सम्मान देने और उसकी पूजा करने के लिए ज़हरीली नदी में उतरीं। कुछ तथाकथित अत्याधुनिक लोग तो उन्हें रूढ़िवादी और अंधविश्वासी कह सकते हैं, पर उन्होंने वह काम कर दिखाया जिसे बड़े-बड़े आधुनिकतावादी और तर्कवादी भी न करे। यह एक छोटा सा उदाहरण है। प्रकृति प्रेमी हिंदूवाद की इसी तरह हर जगह बेकद्री होती हुई दिखती है, इसीलिए प्रकृति विनाश की तरफ जाती हुई प्रतीत होती है। मैं यहाँ किसी धर्मविशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, और न ही किसी विचारधारा का विरोध कर रहा हूँ, बल्कि जो सत्य घटना घटित हुई है, उसीका वर्णन और विश्लेषण कर रहा हूँ।

राजा हिमाचल मस्तिष्क का और उसका राज्य शरीर का प्रतीक है

शिवपुराण में आता है कि राजा हिमाचल ने विवाह महोत्सव के लिए अपने सभी संबंधी पर्वतों और नदियों को निमंत्रण दिया। विभिन्न प्रकार के अन्नों का भंडारण करवाया। चारों तरफ साज-सज्जा की गई। अपने राज्य के सभी लोगों के लिए खूब सुख-सुविधाएं वितरित कीं। उससे उसके पूरे राज्य के लोग प्रसन्न हो गए। प्रमुख ऋषियों को शिव के पास विवाह का निमंत्रण लेकर कैलाश मिलने भेजा। दरअसल राजा हिमाचल और उसका महल मस्तिष्क ही है। कैलाश सहस्रार चक्र है। धरती ही राजा हिमाचल का राज्य है। वह पूरा शरीर है। वैसे भी पर्वत को भूभृत कहते हैं। इसका मतलब है, धरती को पालने वाला। मस्तिष्क ही शरीर को पालता है। राजा हिमाचल सभी नदियों को अपने महल बुलाता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सभी नाड़ियों की ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित करता है। वह सभी पर्वतों को भी न्यौता देता है, मतलब मस्तिष्क का मुख्य केंद्र अन्य छोटे-छोटे केंद्रों से संवेदना-शक्ति को इकट्ठा करके कुंडलिनी जागरण की सर्वोच्च संवेदना को अभिव्यक्त करता है। यही शिव विवाह है, और इसीको ही विभिन्न पर्वतों का शिवविवाह में सम्मिलित होना कहा गया है। पर्वतराज हिमाचल विभिन्न खाद्यान्नों का भंडारण करता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सारी ऊर्जा अपनी तरफ खींचता है। भोजन ही ऊर्जा है, ऊर्जा ही भोजन है। प्राण ऊर्जा की प्राप्ति के लिए ही भोजन किया जाता है। तभी तो कहते हैं कि अन्न ही प्राण है। राजा हिमाचल के पूरे राज्य की जनता धन-धान्य से युक्त होकर हर्षोल्लास से भर जाती है, मतलब मस्तिष्क में जब ऊर्जा की भरमार होती है, तब उससे ऐसे रसायन निकलते हैं, जो पूरे शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। शरीर और ब्रह्मांड के बीच में इस तरह की समकक्षता पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में सर्वोत्तम रूप में दर्शाई गई है। शिवविवाह के दिन राज्य के सभी लोग विभिन्न भोगों की धाम खाते हैं, और विभिन्न विलासों का भरपूर आनन्द उठाते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण वाले दिन पूरे शरीर में रक्तसंचार बढ़ जाता है। ऋषियों को आम आदमी के जैसे साधारण विवाह को इतने विस्तार से लिखने की क्या जरूरत थी, क्योंकि वे ज्यादातर खुद ब्रह्मचारी या अविवाहित होते थे, और कई तो गृहस्थी से दूर रहकर वनों में तप करते थे। कुंडलिनी के तो माता-पिता हैं, पर शिव के कोई नहीं। वह तो स्वयंभू परमात्मा हैं, इसीलिए शम्भु कहे जाते हैं। इससे जाहिर होता है कि यह साधारण विवाह नहीँ है। कुंडलिनी जागरण को ही शिवविवाह के रूप में वर्णित किया गया है, ताकि गृहस्थी में बंधे हुए आमजन भी उसे समझ सके और उसे आसानी से प्राप्त कर सके।

हिमाचल राज्य का सर्वोच्च महल सहस्रार है, जहाँ पर शिव-शक्ति का वैवाहिक जोड़ा ही स्थायी रूप से निवास कर सकता है

उपरोक्तानुसार सप्तऋषियों को विवाह के निमंत्रण पत्र के साथ शिव के पास कैलाश भेजा। कैलाश सहस्रार चक्र है। वहाँ पर ही अद्वैतभाव रूपी शिव का निवासस्थान है। दरअसल प्राणोत्थान के बाद शरीर की ऊर्जा-नदी का प्रवाह सहस्रार की तरफ ही होता है। उससे स्वाभाविक है कि उस ऊर्जा के बल से सहस्रार क्षेत्र में अद्वैतभाव व आनन्द के साथ सुंदर चित्र प्रकट होते रहते हैं। यह भी स्वाभाविक ही है कि अधिकांशतः वे चित्र भी उन्हीं लोगों या वस्तुओं के बनते हैं, जिनके साथ अद्वैत भाव या आध्यात्मिक भाव जुड़ा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई व्यक्ति उसी क्षेत्र में जाना चाहता है, जो क्षेत्र उसके अनुकूल या उसके जैसा हो। ऋषि-मुनियों से अधिक अद्वैतरूप या आध्यात्मिक कौन हो सकता है। इसीलिए उन आध्यात्मिक वस्तुओं या व्यक्तियों को सप्तर्षिओं के रूप में दिखाया गया है। वैसे वह गुरु, मंदिर का पुजारी, मंदिर, गाय, गंगा आदि कोई भी आध्यात्मिक वस्तु हो सकती है। शिवजी के नजदीक तो ये चीजें जाती हैं, और उन्हें कुंडलिनी के साथ एकाकार होने के लिए प्रेरित भी करती हैं, पर खुद शिव से एकाकार नहीं हो पातीं। इसीको इनके द्वारा शिव को उन्हीं के विवाह के लिए निमंत्रण देने के रूप में दिखाया गया है। विवाह किससे, कुंडलिनी से। शिव के साथ एकाकार न हो पाने के कारण ही इन्हें निमंत्रण देकर वापिस आते हुए दिखाया गया है। कोई भी चित्र शिव से जुड़े बिना निरन्तर सहस्रार में नहीं बना रह सकता, उसे जल्दी ही मस्तिष्क के निम्नतर ऊर्जा स्तर वाले निचले साधारण क्षेत्रों में आना ही पड़ता है। कुंडलिनी ही शिव के साथ एकाकार होने या जागृत होने के फलस्वरूप शिव के साथ कैलाश में निरंतर बनी रह पाती है। मतलब कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को अपनी आत्मा के साथ जुड़ी हुई कुंडलिनी का अनुभव सहस्रार चक्र में निरंतर होता रहता है। यही कुंडलिनी जागरण की सर्वप्रमुख खूबी है, और यही आदमी को मोक्ष की ओर ले जाती है।

प्राण ही सहस्रार में शिव-शक्ति का विवाह रचाते हैं

फिर आता है कि शिव के विवाह समारोह के लिए विश्वकर्मा ने अद्भुत व दिव्य विवाह मंडप, भवन व प्रांगण आदि बनाए। जड़ मूर्तियां सजीव लग रही थीं, और सजीव वस्तुएं जड़ मूर्तियां लग रही थीं। जल में स्थल का और स्थल में जल का भान हो रहा था। दरअसल कुंडलिनी जागरण के आसपास प्राणों के सहस्रार में होने के कारण सब कुछ अद्भुत व दिव्य लगता है। अतीव आनन्द की स्थिति होती है। चारों ओर शांति महसूस होती है। अद्वैत भाव चरम के करीब होता है, और कुंडलिनी जागरण के दौरान तो चरम पर पहुंच जाता है। सभी कुछ एक जैसा लगता है। भेद दृष्टि खत्म सी हो जाती है। यह नशे के जैसी मूढ़ अवस्था नहीं होती, पर परम चेतनता और आनन्द से भरी होती है। इसी आध्यात्मिक भाव को यहाँ उपरोक्त रोचक कथानक के रूप में दर्शाया गया है। जल का थल लगना या थल का जल लगना, मतलब जल और थल के बीच में अभेद का अनुभव। जड़ का चेतन की तरह दिखना व चेतन का जड़ की तरह दिखना, मतलब जड़ और चेतन के बीच में समानता नजर आना। हर जगह झाड़-बुहार के पूरी तरह से साफ व निर्मल कर दी गई थी। इसका मतलब है कि सहस्रार में ही असली व पूर्ण निर्मलता का अनुभव होता है। बाहर से जितना मर्जी सफाई कर लो, यदि सहस्रार में प्राण नहीं हैं, तो सबकुछ मैला ही लगता है। इसी वजह से तो गाय के गोबर से पुते हुए आध्यात्मिक स्थान अति पवित्र महसूस होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिकता के प्रभाव से सहस्रार चक्र प्राण से संपन्न होता है। जिन मूल्यवान भवनों में लड़ाई-झगड़ों का बोलबाला हो, वहां की चाकचौबंद सफाई भी रास नहीं आती, और वहाँ दम सा घुटता है। इसके विपरीत एक आध्यात्मिक साधु पुरुष की गोबर से लिपीपुती घासफूस की झौंपड़ी भी बड़ी आकर्षक व संजीदा लगती है।

Kundalini is the visible creation, the energy continuum in Sahasrar is the God, and the dormant kundalini energy in muladhar is the dark energy~ post update

Kundalini is the visible creation, the energy continuum in Sahasrar is the God, and the dormant kundalini energy in muladhar is the dark energy

Kundalini is the main motive of biological evolution

Friends, I said in a previous post that I experienced Kundalini on different chakras according to level of consciousness of my mind. When there was more consciousness, the Kundalini came on the upper chakras, and when there was less consciousness, it came on the lower chakras. In fact the level of consciousness is measured by a pure mind, not by a combined mind with external senses. With the help of external senses, all people and many other creatures are full of consciousness. External senses do not remain after death. At that time only the subtle consciousness of pure mind comes into use. When looking at something with eyes, there is a flood of consciousness in the mind. That consciousness is born by the strength of the eyes, not by the strength of the mind. Similarly, in the case of other external senses, one should also understand. As the capacity of the mind increases from within to reveal consciousness in subtlety, it becomes more worthy of liberation. Kundalini enhances this same ability. With the eyes closed at the time of Kundalini meditation, the doors of almost all external senses are closed. Still, with the power of yoga meditation, there is so much consciousness in the Kundalini being ignited in the mind, that is not even with the help of external senses. Such continuous practice of years brings the same consciousness in a calm, thoughtless mind without Kundalini. This is called enlightenment. Actually, mind is also a subtle form of external senses. A thoughtless mind is often called a soul.

Organism development as Kundalini development

In fact, Kundalini (neuronal energy) is evolving or rising up in the form of evolving organisms. Actually, Kundalini represents the mind itself. Kundalini is the highest level of mental thought. Therefore, we can measure the level of consciousness of the mind through the level of consciousness of Kundalini. Reverse is also true that’s the consciousness of Kundalini can be measured through the consciousness of mind.

Kundalini working requires the same neuronal energy that is required for brain or mind working. That neuronal energy is stimulated by prana energy or prana shakti that is generalized energy of whole body. So both are propelled by same fuel that’s why both are interconnected. But the main objective of creation is providing ultimate status to the organism. This is done by kundalini. It means that kundalini development is the primary goal of creation, not the brain development. Brain development is there itself unwillingly. It’s a after effect and even becomes a side effect if utilized in a negative way. Many old civilizations understood this fact very well and kept main focus on Kundalini in the form of various spiritual practices. Today, Kundalini happenings are increasing day by day because brain development of today’s era is also causing Kundalini development indirectly. Therefore, it’s best way to undertake Kundalini development and brain or world development together so as to get kundalini awakening in a shortest time possible. Karma yoga is also a good method for this.

Kundalini is the measure of the development of consciousness. Kundalini is in sleep in least conscious subject. Kundalini’s sleep means that the mind is asleep. It’s not called mindlessness because the consciousness of the mind never ends, it only becomes incoherent, that is, it falls asleep. At that time, there is darkness in the place of conscious mind. It is just like when a man is asleep, then his consciousness disappears, but it is still doing all the work that keeps the body alive. After enlightenment, Kundalini with higher consciousness is constantly dominating  in the mind, which we call samadhi. It can be called the closest stage of complete awakening of Kundalini. Between these two opposite ends most of the organisms are there. The bulb of his Kundalini consciousness sometimes burns, sometimes slows down, sometimes extinguishes.

The one who comes to hear about yoga, he hears that only Kundalini keeps on climbing in the form of different creatures. Among the lowest living organisms and plants, it remains dormant at the base. It’s also called Kundalini shakti or prana shakti. Actually, there too it’s always working in background without being experienced by organism to maintain body. It is distributed in whole body but it’s called residing in muladhar chakra because that’s the main place of it’s growth and nourishment. It’s like as if a man can wander everywhere in the world but he achieves his growth, nourishment and rest (sleep) mainly at it’s home. Uncouncious mind and muladhar chakra, both are said to be as similar and both being connected with the worst sentiments. Further added, kundalini starts it’s long journey from Muladhar Chakra only. Journey towards the light starts from the darkness only. In some of the less evolved organisms, it comes into a mildly awake state in the base chakra. These may be called bisexual or hermaphroditic. Probably at this stage, the soul fell from Sahasrara and fell asleep in the pit of Muladhara. That is why that organism was divided into yin or female and yang or male form, so that by attraction towards each other, the soul could ascend from muladhara to re-enter Sahasrara. Muladhar dominated lowest organisms have nothing to do outer energetic functions other than the elimination of waste body products. This is the work of muladhar chakra situated near anal opening. So their Kundalini energy is said to be concentrated in muladhar chakra. In the organisms that develop from it, it rises up to the Swadhisthana chakra. Here, sexual differentiation of organism occurs and it start feeling sexual desire with sexual attraction. It’s often seen that lower organisms reproduce at much higher rate and major part of their energy is consumed by this process. It provides wonderful force for kundalini or organism development. This force is still working continuously in today’s well developed human being too. In moderately developed organisms, kundalini enters the navel chakra. That’s why lower organisms keep on eating throughout day and night continuously. It comes into the heart chakra in a higher quality animal, probably in the cow and in a loving person. Possibly that’s why the cow appears as full of affection. Majority of digestive processes are carried out by microorganisms in cow, so it saves lot of energy. It brings down one’s negative energies existing in the form of high blood pressure, stress etc. down. That’s why people are spending thousands of dollars today to develop cowmunication (communication with cow). In primates like baboon, gorilla etc. the Kundalini energy further travels ahead to their arms or forelimbs, that’s why they maximally utilize their forelimb function. Likewise, in beautifully singing bird like cuckoo, Kundalini energy can be said to be concentrated in throat chakra. In intelligent animals with analytical skills like dolphins, it can be said to be coming up to agya chakra. It can come to Sahasrara chakra in human only that too with proper brain practice, because only he can awaken it and the place of awakening is sahasrar only. In the highest order human, it is fully awake in Sahasrara.

The seven chakras of Kundalini are in the form of seven worlds

The scriptures describe the seven worlds above earth. These seven lokas or abodes are in the form of seven chakras. The lowest abode is the Mooladhara Chakra, because the organisms at that level have the lowest consciousness. The level of consciousness increases by going into the realms or chakras above it. This level is highest in Sahasrara. Kundalini awakening means that the level of consciousness is reached at the of union of Shiva and Shakti, making it known as Shivaloka or Brahmaloka. By the way, seven dark abodes have been told even below the earth. In them also, the consciousness keeps falling downwards respectively. In these worlds, most of the demons are said to be living. This is because their level of consciousness has fallen so much that they continue to malign the gods, sages and other beings with higher consciousness. Earth has been considered equivalent to Muladhara Chakra. The abodes in the sky above are the high abodes or heaven, while below the earth are as the hell.

The upright standing of the man and the pit in the back is also an important link in the bio-development chain

I told in an old post how I had to keep my back straight and in a natural posture while sitting in my new car, because its legspace seemed a little low. This helped my muladhar energy to awaken my Kundalini through efficiently climbing up in the back. People can say that the man stood up straight to use the next two legs as a hand. But even primates like gorillas do so. Even the early humans used to do this. Their back is not straight, nor does it seem necessary to use hands. Then why the developed man’s back was straightened. This happened in order to make Kundalini easily and efficiently offered from the base to the brain. Kundalini is as subtle as the sky. Its nature is to rise upwards. That’s why at the time of awakening of the Kundalini, it seems that the Kundalini is flying upwards with speed and power. Then you can say why then a pit formed in the back in the direction of the navel. In fact, it acts like a pit of a roller coaster. It keeps sucking Kundalini energy from the base with the power of yogic inbreathing  and depositing it inside as voluminous storage. Then, while working or doing yoga, when a man bends forward, this stored lot of energy quickly runs upwards towards the brain after catching the velocity. A small pit is formed at the center of the neck, which is the vishuddhi chakra. It likewise pushes the energy upwards to brain by providing a Momentum to this Kundalini energy gathered on the Anahata Chakra with the power of yogic outbreathing. Likewise, swadhishthan chakra and muladhar chakra keeps sexual energy stored to help push it up through back during yoga.

The sexual drive is the biggest contributor to the development of life

In a bisexual organism, yin and yang were together in the same body. This means that it was a complete soul. Because they did not have their own separate desire for development, they were developed like other natural and lifeless objects like mountains, soil, celestial bodies. The pace of that development was natural and slow. Then along with the division of gender, yin-yang was also divided. There was majority of yang in the male category and yin in the female category. This division made the organism feel imperfect within itself. Probably at this stage, the incomplete soul was born. He started trying to gather Yin or Yang to be complete again as earlier. This led to the creation of Kama Bhava or sexual feeling. This created an intense attraction between the male category and the female category of organisms. This sexual sentiment is the biggest contributor to the development of life. Because it produces the most powerful non duality, with which Kundalini develops most strongly and rapidly. We have experientially proved in many posts that non duality, Kundalini and bliss tend to live together. This gave artificiality and fast pace to biological development. Even today, in the form of Tantric Kundalini yoga, it is helping man to make the final jump of the development chain to achieve the perfection or liberation. It combines Yin (shakti) residing at Mooladhara chakra with Yang (Shiva) residing at Sahasrar chakra. Yin is called Prakriti and Yang is called Purusha in Indian philosophy. Advaita bhava is produced by the union of yin-yang, which indirectly develops the kundalini. It is not that the attraction of yin-yang is only the attraction of men and women. It can be between any of the opposite expressions. Muladhara is a symbol of darkness, inferiority, ignorance, hatred, etc. all low emotions. In contrast, Sahasrara is a symbol of light, highness, knowledge, love, etc. all high emotions. That is why the simultaneous Kundalini meditation on these two chakras creates intense nonduality, due to which the Kundalini starts to shine in Sahasrara. The main function of sexual attraction is that by it the muladhara and the Sahasrara Chakra are refreshed and strengthened together.

सौंदर्य के आधार के रूप में कुंडलिनी

सुन्दरता क्या है

यह अक्सर कहा जाता है कि सुन्दरता किसी दूसरे में नहीं, अपितु अपने अन्दर होती है। ध्यान योग से यह बात बखूबी सिद्ध हो जाती है। सुन्दर वस्तु को इसलिए सुन्दर कहा जाता है क्योंकि वह हमारे मन में आनंद के साथ लम्बे समय तक दृढ़तापूर्वक बसने की सामर्थ्य रखती है। मन में वैसी आकर्षक व स्थायी छवि को ही कुण्डलिनी भी कहते हैं।

सुन्दर वस्तु के प्रति अनायास ध्यान

लम्बे समय तक मन में बैठी हुई वस्तु की तरफ ध्यान स्वयं ही लगा रहता है। इससे अनादिकाल से लेकर मन में दबे पड़े चित्र-विचित्र विचार व रंग-बिरंगी भावनाएं उमड़ती रहती हैं। उनके प्रति साक्षीभाव व अनासक्ति-भाव स्वयं ही विद्यमान रहता है, क्योंकि मन में बैठी हुई उपरोक्त वस्तु निरंतर अपनी ओर व्यक्ति का ध्यान खींचती रहती है। इससे वे भावनामय विचार क्षीण होते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उत्तरोत्तर शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। अंततः व्यक्ति पूर्ण शून्यता या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है।

सबसे अधिक सुन्दर वस्तु

लौकिक परिपेक्ष्य में एक सर्वगुणसंपन्न स्त्री को एक उसके योग्य व उसके रुचिकर पुरुष के लिए सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि वैसी स्त्री का चित्र वैसे पुरुष के मन में सर्वाधिक मजबूती से बस जाता है। दोनों के बीच में प्रतिदिन के संपर्क से वह चित्र मजबूती प्राप्त करता रहता है। अंततः वह इतना अधिक माजबूत व स्थायी बन जाता है कि वह एक योग-समाधि का रूप ले लेता है। यदि बीच में स्वस्थ आकर्षण में (सच्चे प्यार में) खलल पड़े, तो मानसिक चित्र कमजोर भी पड़ सकता है। ऐसा जरूरत से ज्यादा इंटरेक्शन, शारीरिक सम्बन्ध आदि से हो सकता है। लौकिक व्यवहार में यह नजर भी आता है कि विवाह के बाद परस्पर आकर्षण कम हो जाता है। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती रहें, तो ऐसे यिन-यांग आकर्षण को समाधि व आत्मज्ञान के स्तर तक पहुँचाने के लिए २ साल काफी हैं। ऐसे ही बहुत सारे मामलों में हैरान कर देने वाली अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ईश्वर पर व अच्छे कर्मों पर बरबस ही विश्वास हो जाता है।

सुन्दरता की प्राप्ति सांसारिक वस्तुओं पर नहीं, अपितु अच्छे कर्मों व ईश्वर-कृपा पर निर्भर

कई लोगों के पिछले कर्म अच्छे नहीं होते, और उन पर  ईश्वर की कृपा भी नहीं होती। ऐसे लोगों को ऐसा मजबूत यिन-यांग आकर्षण उपलब्ध ही नहीं होता। कई लोगों को यदि उपलब्ध हो भी जाता है, तो भी अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण वह लम्बे समय तक स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे में समाधि नहीं लग पाती। बहुत से लोग वर्तमान में बहुत अच्छे कर्म कर रहे होते हैं। वे सदाचारी होते हैं। वे बड़ों-बूढ़ों को व गुरुओं को प्रसन्न रखते हैं, एवं उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। वे उनके सामने नतमस्तक बने रहते हैं। वे सभी कठिनाईयों व दुर्व्यवहारों को प्रसन्नता के साथ सहते हैं। इससे उनके मन में अपने गुरुओं, वृद्धों व परिवारजनों की छवियाँ बस जाती हैं। उनमें से कोई अनुकूल छवि उनकी कुण्डलिनी बन जाती है। कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को पुष्ट करने वाला यिन-यांग आकर्षण भी कई किस्मत वालों को प्राप्त हो जाता है।

अवसरों से रहित लोगों के लिए कुण्डलिनी-योग एक बहुत बड़ी राहत

जिन अधिकाँश व बदकिस्मत लोगों को प्राकृतिक रूप से भरपूर ध्यान का अवसर नहीं मिलता, उन्हीं के लिए कुण्डलिनी योग बनाया गया है, मुख्य रूप से। कई हतोत्साहित व निराशावादी लोग इसे “रेत में से तेल निकालने” की संज्ञा भी देते हैं। यद्यपि यह अब सच्चाई है कि रेत में भी तेल (पैट्रोल) होता है। इसमें उपयुक्त समय पर तंत्र के प्रणय-योग के सम्मिलन से यह बहुत आसान, व्यावहारिक व कारगर बन जाता है।

बनावटी प्यार

किसी विशेष वस्तु से प्रतिदिन  के लौकिक प्यार की कमी को मेडीटेशन से पूरा करना भी एक जादुई कारीगरी ही है। इसे हम “प्रेम का कृत्रिम निर्माण (synthesis of love)” भी कह सकते हैं। योग एक ऐसी फैक्टरी है, जो प्रेम का कृत्रिम उत्पादन करती है। यह कारीगरी मुझे बचपन से लेकर प्रभावित करती आई है। इससे लौकिक प्यार की तरह पतन की भी सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वस्तु से सारा इंटरेक्शन मन में ही तो होता है। अति तो इन्द्रियों से ही होती है हमेशा।

सुन्दरता सापेक्ष व आभासिक होती है

यदि सुन्दरता निरपेक्ष होती, तो एक सुन्दर स्त्री सभी प्रकार के लोगों को एकसमान सुन्दर लगा करती, और हिंसक जानवर भी उसके पीछे लट्टू हो जाया करते। इसी तरह, यदि सुन्दरता भौतिक रूप-आकार पर निर्भर होती, तब योग से प्रवृद्ध की गई वृद्ध गुरु व काली माता (बाहरी तौर पर कुरूप व डरावनी) के रूप की कुण्डलिनी सबसे अधिक सुन्दर न लगा करती, और वह योगी के मन में सबसे ज्यादा मजबूती से न बस जाया करती।

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भाई विनोद शर्मा जी द्वारा रचित व दिल को छूने वाली कुछ कविताएँ

ये काल का प्रहार है

 काल का प्रहार
आकाश अश्रु रो रहा
सृष्टि के पाप धो रहा

धरा मिलनकी इच्छासे
पर्वत भी धैर्य खो रहा

चारों दिशा अवरुद्ध है
जल धाराएँ क्रुद्ध हैं

नर कंकाल बह रहे
हकीकत बयान कर रहे

कुदरत की गहरी मार है
ये काल का प्रहार है।

रिश्तों में अपनापन नहीं
बच्चों में भोलापन नहीं

शीतल रुधिर शिराओं में
धीरज नहीं युवाओं में

वाणी मधु से रिक्त है
हरएक स्वार्थ सिक्त है

अविश्वास से भरा हुआ
हर शख्स है डरा हुआ

इन्सानियत की हार है
ये काल का प्रहार है।

दहक रही भीषण अग्न
झुलस रहा है बाग-वन

सूरज के रक्त नयन से
बरस रहे अंगार हैं

गुलों में वो महक नहीं
परिंदों की वो चहक नहीं

ठूंठ बन गए तरू
भूखंड हो गए मरू

आबोहवा बेज़ार है
ये काल का प्रहार है।

जागृति के नाम पर
विलुप्त शिष्टाचार है

सभ्यता ठगी खड़ी
सुषुप्त संस्कार है

श्रेष्ठता के ढोंग का
ओढ़े हुए नक़ाब है

कर्तव्य बोध शून्य है
अधिकारों का हिसाब है

निश्छलता तार-तार है
ये काल का प्रहार है।

शब्दों से कैसे खेलूं मैं

 शब्दों से कैसे खेलूं मैं
अन्तर में भावों की ज्वाला
धधक-धधक सी उठती है।

असह्य अखण्डित दाह-वेदना
जिह्वा पर मेरे ठिठकती है।

प्राकट्य जटिल सा हो जाता है
बस भीतर -भीतर झेलूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!
शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

इस जगती में हर श्वास की
परिमित एक कड़ी होती है।

हृदय निकट गहन रिश्तों की
चिन्ता -व्यथा बड़ी होती है।

धीर धरूं क्यों?मन करता है
सबकी पीड़ा ले लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!
शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

कोकिल की मीठी स्वर लहरी में
झींगुर की झिन-झिन दोपहरी में

मस्त मयूरों के नृत्यों में
गुंजित भवरों के कृत्यों में

प्रच्छन्न सरस जीवन-पय घट से
मधु वंचित प्याले भर लूं मैं।

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!
शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

काल सरित की अविरल धारा
अबल-सबल हर कोई हारा।

मूर्ख है जो धारा संग उलझे
गिरह ये ऐसी जो न सुलझे।

अब तक कोई रोक न पाया
तो फिर कैसे ठेलूं मैं?

अब तू ही बता हमदर्द मेरे!
शब्दों से कैसे खेलूं मैं?

ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।

 ऐ ज़िन्दगी ! तू बेहद खूबसूरत है।
तेरा हर नाज़ो नख़रा सह लेते हैं।

रुलाए तू हंसाए तू,
नश्तर चुभा,सहलाए तू।

तेरी लौ की तपिश में
परवाने बन जल जाते हैं,कुर्बान हुए जाते हैं ।
ऐ ज़िन्दगी!….

भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े

 भीड़ न बनो जुदा हों भीड़ से खड़े,
जिधर भी तुम चलो काफ़िला साथ चल पड़े।
है ज़िन्दगी की राह मुश्किलात से भरी,
ये रास्ते न होंगे हीरे-मोती से जड़े।
भीड़ न बनो…….

मेहनत से ही मिलेगा मुक़द्दर में जो लिखा,
नहीं मिलेंगे स्वर्ण-कलश खेत में गढ़े।
भीड़ न बनो……

पढ़े लिखों का दौर यही शोर चारों ओर,
इन्सां वही है जो दिलों के ज़ज्बों को पढ़े।
भीड़ न बनो…..

हर लम्हा है बदलाव ये मन्ज़ूर तुम करो,
तोड़ रूढ़ियों की बन्दिशें आगे चलो बढ़े।
भीड़ न बनो…..

ज़हनी संगीनें तन चुकी हैं होश में आओ,
जिस्मानी जंग छोड़ के हम खुद से ही लड़ें।
भीड़ न बनो…..

मतलबी हर शख़्स यहाँ घात में बैठा,
मालूम नहीं किस ग़रज़ से शानों पे चढ़े।
भीड़ न बनो…..

करता है वो इन्साफ बिना भेदभाव के,
अपनी कमी का दोष हम किसी पे क्यों मढ़ें।
भीड़ न बनो…..

लियाक़त नहीं मोहताज किसी धन की दोस्तो!
खिलते हैं वे कमल भी जो कीचड़ में हों पड़े।
भीड़ न बनो…..।

दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं

 दिल के इस मयखाने में जज़्बात ये साक़ी बनते हैं
आँखों के पैमाने से फिर दर्द के जाम छलकते हैं।

तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको

 तेरी रहमतों की बारिश का इन्तज़ार मुझको
उम्मीद के ये बादल घिरने लगे हैं फिर से ।

जो ज़ख़्म अब से पहले नासूर बन गए थे
रिस्ते हुए ज़ख़्म वो भरने लगे हैं फिर से।

दो अश्क

 बैठ कहीं सुनसान जगह पर
ख़ुदग़रज़ी के इस आलम से
माज़ी के गुज़रे लम्हों में
कुछ देर मैं खोना चाहता हूँ
दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

जाड़े की ठण्डी सुबह में
ठिठुरते हुए बाहों को बांधे
प्राची से उगते सूरज को
बेसब्री से तकना चाहता हूँ
दो अश्क बहाना चाहता हूँ।

पशु चराने दादी के संग
सुनसान सघन जंगल के भीतर
सर रखकर उनकी गोदी में
वही कथा मैं सुनना चाहता हूँ
दो अश्क——————-।

सुबह सबेरे खेत जोतते
पिता के पद-चिह्नों के पीछे
‘चल’ ‘हट’ कर उन बैलों को
सही दिशा दिखाना चाहता हूँ
दो अश्क——————-।

व्यर्थ उलझकर भाई-बहन से
सच्चे-झूठे आँसू लेकर
स्नेह भरे माँ के आँचल में
वो दुलार मैं पाना चाहता हूँ
दो अश्क—————-।

शहर गए अब्बू के संग
भीड़ भरी सड़क पर उनकी
विश्वास भरी उँगली को थामे
उस भीड़ में खोना चाहता हूँ
दो अश्क—————–।

कोई बड़ी शरारत हो जाने पर
सहमे हुए घबराए मन से
घास गई उस माँ की मैं
वही बाट जोहना चाहता हूँ
दो अश्क—————-।

बिना बताए माँ-अब्बू जब
आँखों से ओझल हो जाते
घर आने पर कहीं दुबककर
मैं उनसे रूठना चाहता हूँ
दो अश्क—————-।

मासूम बचपना कहीं छोड़कर
हरपल मरता है शख़्स यहाँ
इतराता अपने जन्म दिवस पर
क्यों? यही जानना चाहता हूँ
दो अश्क——————।

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प्राचीन मिस्र की आध्यात्मिक यौनता एवं भारतीय तंत्र के बीच में समानता

अन्खिंग क्या है और कैसे किया जाता है?

अन्खिंग में पूर्णता से थोड़ा कम (90%) सांस भर कर शक्ति को यौनचक्रों से पीठ वाले अनाहत चक्र (उनके अनुसार पांचवां चक्र) तक चढ़ाया जाता है, और वहां से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर खुले में मोड़ दिया जाता है। वह फिर स्वयं ही आँख के लूप से होते हुए सबसे ऊपर वाले आठवें चक्र (सिर से एक हाथ लम्बाई ऊपर) पर पहुँच जाती है। वह चक्र वर्टिकल बोडी लाइन से 90 डिग्री के कोण पर स्थित है। वहां से वह आँख-लूप के अगले भाग से नीचे उतर कर अनाहत चक्र (आगे का) पर पुनः स्थापित हो जाती है। फिर बाकि का बचा हुआ 10% सांस भी अन्दर भर लिया जाता है। धीरे-2 सांस छोड़ते हुए ध्यान किया जाता है कि वह शक्ति उस आँख-चेनल में घूम रही है। फिर गहरी साँसें लेते जाएं, जब तक कि पूरे शरीर में रिलैक्सेशन महसूस न हो जाए। फिर अपनी साँसें नार्मल कर लें। ध्यान करो कि यह शक्ति पूरे शरीर में रिसती हुई, उसकी सभी कोशिकाओं को पुष्ट करती हुई, उसके बाहर भी चारों ओर फैल रही है। फिर पूरी तरह से रिलैक्स हो जाओ, या सो जाओ।

अन्खिंग के रेखा-चित्र व लूप का मनोवैज्ञानिक रहस्य

अन्खिंग प्रक्रिया में शक्ति हृदय के ऊपर के शरीर के हिस्से को स्पर्श नहीं करती। वह चारों और बाहर-2 से ही लूप बना कर पुनः हृदय चक्र पर पहुँच जाती है। इसीलिए शक्ति-मार्ग को दर्शाने वाले रेखा-चित्र में रीढ़ की हड्डी को छूती हुई सीधी रेखा केवल यौनचक्र (मूलाधार) से हृदय चक्र तक ही दिखाई गई है, उसके ऊपर नहीं। उसके ऊपर उपरोक्त अन्खिंग-लूप जुड़ा है। हृदय चक्र पर एक सीधी रेखा आगे से पीछे जाते हुए एक क्रोस बनाती है। इस डिजाइन का यह मतलब है कि मूलाधार चक्र व नाभि चक्र के आगे वाले भाग से होते हुए कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे लचीले भाग में होते हैं, और योग-बंधों के कारण अन्दर की तरफ पिचक कर मेरुदंड वाले चक्र-भागों से जुड़कर एक हो जाते हैं। इससे आगे वाले चक्रों की शक्ति स्वयं ही पीछे वाले चक्रों को मिल जाती है। हृदय चक्र पर इसलिए आगे-पीछे गुजरने वाली रेखा है, क्योंकि आगे वाला चक्र पिचक कर पीछे वाले चक्र से नहीं जुड़ता है। देखा भी जाता है कि छाती का क्षेत्र विस्तृत है, और ज्यादा अन्दर-बाहर भी नहीं होता।

अन्खिंग का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण

शक्ति मनोवैज्ञानिक दबाव से ही अनाहत चक्र से 90 डिग्री के कोण पर पीछे की ओर बाहर निकलती है। ऐसा सोचा जाता है, तभी ऐसा होता है। आठवें चक्र तक भी वह मनोवैज्ञानिक दबाव से ही आँख (अन्खिंग-लूप) से होते हुए ऊपर चढ़ती है। एक प्रकार से शक्ति बीच के चक्रों को बाईपास करते हुए, सीधे ही आठवें चक्र तक पहुँच जाती है। वहां से नीचे भी यह इसी तरह के दबाव के अभ्यास से आती है। इसमें शरीर की बनावट से मेल खाता हुआ रेखा-चित्र भी मानसिक चिंतन के दबाव की सहायता करता है।

अन्खिंग व सैक्सुअल कुण्डलिनीयोग के बीच में समानता

कुण्डलिनीयोग में शक्ति को कुण्डलिनी कहा जाता है। यह अधिकाँश मामलों में गुरु या देवता का मानसिक चित्र ही होता है। इस योग में यौनशक्ति से कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों पर पुष्ट किया जाता है, विशेषकर मस्तिष्क में। पुष्टता को प्राप्त कुण्डलिनी फिर लम्बे समय तक अनुभवदृष्टि में बनी रहकर तन-मन को शुद्ध करती रहती है। अन्खिंग में भी ऐसा ही होता है। यद्यपि उसमें शक्ति को हृदय क्षेत्र में ही केन्द्रित माना गया है। थोड़े समय के लिए आठवें चक्र पर भी रुकती है। बीच वाले रस्ते व लूप में तो केवल उसकी सूक्ष्म चाल ही होती है। वास्तव में हृदय में सबसे प्रिय वस्तु ही बसी होती है। यह वस्तु एक ही होती है। दो से तो प्रेम ही नहीं होता। हृदय ही प्रेम का स्थान है। इस तरह से, अन्खिंग की तथाकथित शक्ति स्वयं ही कुण्डलिनी-रूप सिद्ध हो गई। प्राचीन मिस्र की मान्यता के अनुसार, साधारण यौनसम्बन्ध के दौरान यौन-उन्माद/स्खलन की शक्ति या तो नीचे गिर कर भूमिगत हो जाती है, या मस्तिष्क के विभिन्न विचारों के रूप में प्रस्फुटित होती है। दोनों ही मामलों में यह नष्ट हो जाती है। परन्तु यदि मस्तिष्क का विचार एकमात्र कुण्डलिनी के रूप में हो, तब वह यौनशक्ति नष्ट नहीं होती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुण्डलिनी का ध्यान प्रतिदिन किया जाता है, अन्य विचारों का नहीं। इसलिए यौनशक्ति से निर्मित, कुण्डलिनी की प्रचंडता लम्बे समय तक बनी रहती है। क्योंकि अन्य विचार कभी-कभार ही दोबारा पैदा होते हैं, इसलिए उनकी प्रचंडता तब तक गिर चुकी होती है। साथ में, यौनशक्ति सभी विचारों में बंट कर बहुत छोटी रह जाती है, जबकि वह कुण्डलिनीयोग से एक ही कुण्डलिनी को मिलती है, जिससे पूरी बनी रहती है। अतः सिद्ध होता है कि प्राचीन मिस्र की तथाकथित शक्ति कुण्डलिनी ही है, और अन्खिंग भी कुण्डलिनीयोग से भिन्न नहीं है। एक प्रकार से हम कुण्डलिनीयोग को अन्खिंग तकनीक का सरल व वैज्ञानिक रूपांतर भी कह सकते हैं।

प्राचीन तंत्र में यौनोन्माद (बिंदुपात) पूर्णतया वर्जित नहीं है, अपितु उस पर आत्मनियंत्रण न होना ही वर्जित है

प्रेमयोगी वज्र के अनुसार, यदि ओर्गैस्मिक शिखर/वीर्यपात के समय मूलबबंध व उड्डीयान बंध को मजबूती से व लम्बे समय तक बना कर रखा जाता है, तब पूरी यौनशक्ति मस्तिष्क-स्थित कुण्डलिनी को मिलती है। उससे ऐसा लगता है कि यौन-चक्र व मस्तिष्क-चक्र मिलकर एक हो गए हैं, और दोनों पर कुण्डलिनी एकसाथ चमक रही है। इससे वीर्य का क्षरण भी बहुत कम होता है, जबकि आनंद बहुत अधिक प्राप्त होता है। यदि केवल उड्डीयान बंध ही लगाया जाए, तो यह सकारात्मक प्रभाव बहुत कम हो जाता है।

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Sex, and specifically the orgasm, is more that just something that feels good and allows procreation. There are many other functions, such as the release of dysfunctional energy within the body, which can help to keep one from becoming diseased. There is the function that opens the higher chakras, and under the right conditions allows a person to begin the process of enlightenment. And further, if two people, lovers, practice sacred sex, the entire experience can lead them together into higher consciousness and into worlds beyond this plane——

Ancient Egyptian Sexual Ankhing 

The ancient egyptians believed that orgasm is more than just something that feels good and allows procreation…

This Ancient Egyptian Sex Technique May Be the Secret to Eternal Life

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