दोस्तों यह पोस्ट थोड़ी लंबी लग सकती है, पर इसमें सृष्टि का बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। बात हो रही थी कि जिस तरह पुरुष मतलब प्रकाश हर जगह और हर समय मौजूद है, उसी तरह मूल प्रकृति मतलब अंधेरा भी है। अगर मूल प्रकृति ना होती तो सृष्टि ही ना होती। पुरुष तो बिल्कुल निश्चेष्ट है क्योंकि वह अपनी अभौतिक आत्मा में पूर्ण है जिससे उसे किसी भी चीज की जरूरत ही नहीं है। जीवाणु को या चींटी को भी प्रकृति ही चलाती है, और बड़े-बड़े ग्रहों और नक्षत्रों को भी वही प्रकृति चलाती है। पुरुष तो एक लक्ष्य है, प्रकृति जिसे पाने की कोशिश करती है। उसी कोशिश में उससे सृष्टि के सारे काम संपन्न होते हैं। हालांकि हाथी, बंदर, मनुष्य जैसे विकसित प्राणी के शरीर को भी प्रकृति ही चलाती है। पर यहां एक विशेषता है। इनको चलाने में जीवात्मा नाम की एक दूसरी प्रकृति भी मदद करती है। जीवात्मा इन प्राणियों के जीवन के अनुभवों से संबंधित सभी सूचनाओं को भंडारित करके रखने का काम करती है। इससे इन्हें चलाना और ज्यादा निपुणता युक्त और आसान हो जाता है। यूं कहो कि मूल प्रकृति ही विकसित होकर कालांतर में जीवात्मा बन जाती है।
मूल प्रकृति मूल पुरुष की छाया है। इसलिए इसमें शुद्ध अंधेरे के सिवाय कुछ नहीं है। इसमें पुरुष की तरह ही संसार का कोई नामोनिशान नहीं है। पर मूल प्रकृति जीवात्मा तब बनती है, जब एक अनुभव करने वाले मस्तिष्क को धारण करने वाला जीव बनता है। वह जिन सांसारिक विषयों को अनुभव करता है, वह भी उससे जुड़ी मूल प्रकृति में सूक्ष्म कोड के रूप में जमा होने लगते हैं। इससे उसे पुरुष तक जल्दी पहुंचने में बहुत मदद मिलती है। हालांकि पहले वाली शुद्ध मूल प्रकृति भी अपनी जगह पर वैसी ही बनी रहती है, क्योंकि वह पुरुष की तरह अजर, अमर है।
जैसे आदमी सहित हर एक जीव के जीवन की परछाई उसकी जीवात्मा के रूप में बनी है, उसी तरह परम पुरुष की भी जरूर होगी। पुरुष की उसी परछाई को प्रकृति कहा गया है। यह सत्य नहीं पर आभासी है। वैसे ही जैसे पेड़ की छाया सत्य नहीं पर आभासी है। किसी पेड़ की छांव बिल्कुल उस पेड़ की तरह होती है। सिर्फ एक फर्क के साथ कि वह अंधेरमयी या काली होती है। इसी तरह प्रकृति भी बिल्कुल पुरुष की तरह अनादि, अनंत, अजर, अमर और सर्वव्यापक है। केवल यही फर्क है कि उसमें पुरुष की तरह प्रकाश नहीं होता। क्योंकि वह पुरुष की आभासी छाया है।
जब सृष्टि बनना शुरू होती है, तो सबसे पहले निर्मित सबसे छोटा मूल कण अपने को उन्नत करने की कोशिश करता हुआ आगे से आगे बढ़ने लगता है। उसे आगे बढ़ने की शक्ति मूल प्रकृति से मिलती है। मतलब मूल प्रकृति उस कण की आत्मा के रूप में है। वैसे तो मूल प्रकृति आनंद के रास्ते ही पुरुष तक पहुंच सकती है, क्योंकि पूर्ण आनंद ही पुरुष का असली रूप है। पर अपना आनंद बढ़ाने के लिए उसे पहले अपने सृष्टिरूपी शरीर की सत्ता बढ़ानी होगी। क्योंकि यदि विभिन्न कणों का आपस में खूनी संघर्ष होता रहा, तो ग्रह, सूर्य आदि पिंड कैसे बनेंगे? यदि इन पिंडों का आपस में और अंदरूनी खूनी संघर्ष चलता रहा तो पृथ्वी जैसा शांत और स्थिर ग्रह कैसे बनेगा। अगर पृथ्वी पर डायनासोरों जैसे जीवो का खूनी विध्वंस जारी रहा तो मनुष्य जैसा तीव्र बुद्धि वाला व विकसित प्राणी कैसे बनेगा। जब तक जीव में अनुभव करने वाला मस्तिष्क नहीं बना, तब तक प्रकृति सत्ता के लालच में सृष्टि का विकास करती रही। सत्ता के लिए अनुभव की जरूरत नहीं है। हालांकि सत्ता और आनंद आपस में जुड़े हुए हैं। सत्ता का विकास होने से आनंद का विकास भी होता है। हालांकि वह बाद में दिखाई दिया जब मस्तिष्क बना। मस्तिष्क बनने पर तो जीव के विकास की रफ्तार कई गुना बढ़ गई, क्योंकि अब वह विकास के लिए अनुभव या आनंद से भी प्रेरित हो रहा था। अनुभव और आनंद लगभग एक ही चीज हैं। सत्ता से तो पहले भी प्रेरित हो रहा था। आदमी बनने पर उसने कठिन कुंडलिनी योग साधना की और उससे कुंडलिनी जागरण के रूप में परम आनंद का अनुभव प्राप्त किया। मतलब प्रकृति की पुरुष तक की यात्रा पूरी हो गई। मूल प्रकृति विकास करती हुई पुरुष में विलीन हो गई पर मूल प्रकृति भी वैसी ही रही। यह ऐसे ही है जैसे एक पेड़ से उसकी जितनी मर्जी परछाइयां बना लो। मतलब अगर पेड़ की परछाई अपना विकास करके कुछ और ही बन जाए। तब भी उस पेड़ की मूल परछाई तो वैसी ही रहेगी।
दोस्तों मूल प्रकृति तब तक अपने शुद्ध मूल रूप में थी, जब तक अनुभव करने वाले मस्तिष्क का निर्माण नहीं हो गया। जब अनुभवात्मक मस्तिष्क बना तब मूल प्रकृति में प्रकाश की तरंगें उमड़ने लगीं। इन्हीं तरंगों को हम अनुभव कहते हैं। ये प्रकाश तरंगें प्रकाशमान पुरुष से ही प्राप्त हुई थीं, बेशक आभासिक रूप में। मतलब प्रकृति और पुरुष का आपस में मिलन हो गया था। इसीलिए शास्त्रों में कहा है कि सृष्टि पुरुष और प्रकृति के जुड़ने से बनी है। ऐसा नहीं कहा है कि खाली प्रकृति से बनी है। मतलब सृष्टि का निर्माण शुरु हो गया था। आप कहेंगे कि सृष्टि तो पहले से ही विकसित हो रही थी। बेशक ऐसा ही हो रहा था पर उसे अनुभव करने वाला तो कोई भी नहीं था उस समय। अंधेरे में हो रहे नृत्य का भला क्या महत्व है, जब उसे कोई देख ही नहीं सकता। जंगल में मोर नाचा, किसने देखा।मतलब सृष्टि की उत्पत्ति तभी मानी गई जब उसे अनुभव करने वाले जीव की और उसके रूप में प्रकृति पुरुष युग्म की उत्पत्ति हुई। फिर तो प्रकृति को पुरुष तक पहुंचने के लिए आनंद का सहारा भी मिल गया था। वह अधिक से अधिक आनंद की खोज करती हुई एक प्रकार से पुरुष की ही प्रचुर खोज कर रही थी। जागृति मिलने पर वह खोज खत्म हो गई और प्रकृति पुरुष में मिल गई। मतलब पेड़ की छाया पेड़ में मिल गई। पर पुरुष की छाया दिव्य है। यह चाहे कितनी ही बार पुरुष से मिल जाए, फिर भी यह कभी खत्म नहीं होती।
पुरुष भी प्रकृति की तरह दिव्य है। सूरज के प्रकाश को अगर लगातार निकाला जाता रहे तो यह कभी ना कभी खत्म हो जाएगा। पुरुष के प्रकाश को प्रकृति चाहे जितना मर्जी खींचती रहे, यह कभी कम नहीं होता, अनंत ही बना रहता है। जैसे एक आग का शोला अपना कुछ खोए बिना ही अनगिनत दीपकों को जला सकता है, वैसे ही एक पुरुष अपना कोई नुकसान किए बिना ही अनगिनत प्रकृतियों को जगमग कर सकता है।