दोस्तो, योग से एक कदम और आगे तंत्रयोग है। जब तांत्रिक जोड़ीदार की या कहो यिनयांग की समीपता से कुंडलिनी शक्ति मूलाधार से सहस्रार की तरफ ऊपर चढ़ती है तो उससे दो काम एकसाथ होते हैं। एक तो सहस्रार में शक्ति के पहुंचने से अद्वितीय और महान आनंद महसूस होता है। इसे लौकिक भाषा में यौन आनंद कहा जाता है। इसे सभी लौकिक आनंदों में उच्चतम आनंद समझा जाता है। इसको पाने के लिए मनुष्य सहित सभी जीव महान से महान संघर्ष करते देखे जाते हैं। इसका स्रोत सहस्रार चक्र माना जाता है। सहस्रार चक्र में आत्मा का निवास भी माना जाता है। अतः एक प्रकार से इस आनंद को आत्मा का आनंद माना जाता है। आनंद को पैदा करने में यिनयांग मिश्रण का योगदान भी है। आत्मा में यिनयांग बराबर मिश्रित है। इसलिए इससे भी यह आत्मा का ही आनंद सिद्ध होता है। कुंडलिनी शक्ति से दूसरा काम यह होता है कि यह सभी चक्रों से ऊपर गुजरते हुए उन्हें क्रियाशील कर देती है। इससे दुनियादारी भी क्रियाशील हो जाती है, बेशक अद्वैतमय आत्मज्ञान के साथ। साथ में, इससे उनमें दबे या सोए हुए अवचेतन मन के विचार व्यक्त मन में अभिव्यक्त से होकर उभरने लगते हैं। शायद इसी को सोई हुई कुंडलिनी शक्ति का जागना कहते हैं। दरअसल जागते तो मन के सोए विचार हैं। अकेली शक्ति तो जड़ है। वह कैसे सोएगी और कैसे जागेगी। क्योंकि विचार शक्ति का ही अनुसरण करते हैं, इसीलिए विचारों के क्रियाकलाप को शक्ति का क्रियाकलाप माना जाता है। जब विचार सोए होते हैं तो उसे कुंडलिनी शक्ति का सोना कहा जाता है। इसी तरह जब विचार जागते हैं तो उसे कुंडलिनी शक्ति का जागना कहा जाता है। आदमी रात को नींद में कुंडल जैसा सोया होता है, सीधा नहीं। ऐसे सोने से वह ज्यादा आराम पाता है। यह इसलिए क्योंकि शरीर के ऐसे पॉश्चर में विचार भी गहरी नींद सो जाते हैं। इसीलिए तो अच्छी नींद आती है। कभी कोई पीठ के बल सीधे सोकर देखना। बुरे सपने आएंगे और नींद भी पूरी नहीं आएगी। हम विस्तार के भय से इसके गहरे विज्ञान में नहीं जाएंगे। मतलब मन के विचार भी कुंडल बना कर सो जाते हैं। मतलब उनको जगाने वाली शक्ति भी कुंडल बना कर सो जाती है। इसीलिए इसका नाम कुंडलिनी शक्ति पड़ा है। इसका शाब्दिक अर्थ है, कुंडल बना कर सोने वाली शक्ति। जब आदमी जाग कर खड़ा हो जाता है तो उसके विचार भी जाग कर सीधे खड़े हो जाते हैं। मतलब कुंडलिनी शक्ति भी कुंडल खोल कर सीधी खड़ी हो जाती है और नागिन की तरह विचारों के रूप में फुफकारे मारने लगती है। हालांकि ये सतही विचार होते हैं। गहरे दबे विचार तो कुंडलिनी योग से ही जागते हैं। इसमें शक्ति को बलपूर्वक और ज्यादा जगाया जाता है। यहां एक और अंतर्दृष्टि पैदा हो रही है। कहते हैं कि सोई हुई कुंडलिनी में अढ़ाई घेरे होते हैं। आदमी जब बाईं या दाईं करवट होकर कुंडल बना कर सोता है, तो उसके शरीर में भी अढ़ाई मोड़ बनते हैं। एक पूरा मोड़ घुटनों के मुड़ने से बनता है। दूसरा पूरा मोड़ कूल्हे अर्थात हिप के मुड़ने से बनता है। तीसरा व आधा सा मोड़ नाभि के स्तर से ऊपर वाले हिस्से में बनता है। शायद कुंडलिनी के अढ़ाई वलय इन्हीं को कहा गया है।
अब मुख्य बिंदु पर आते हैं। कुंडलिनी योग से क्या होता है कि शक्ति सभी चक्रों से गुजरते हुए उन्हें झकझोरती है। इससे चक्रों पर दबे सोए विचार भी जाग जाते हैं जो मन में अनासक्ति के साथ उभरते हैं। इससे विपासना के कारण आनंद पैदा हो जाता है। इस किया में कुछ शक्ति सहस्रार तक भी पहुंच जाती है। इससे आनंद और ज्यादा बढ़ जाता है। पर इसमें यिनयांग मिश्रण की भावना नहीं जुड़ी होती। इस वजह से आनंद में कुछ कमी रह जाती है। यह कमी तांत्रिक यौनयोग से ही पूरी होती है। इसीलिए उसमें परम आनंद जैसी अनुभूति मिलती है। इसीलिए इसमें सभी उभरते विचार अपनी आत्मा के सबसे नजदीक लगते हैं। यह इसलिए क्योंकि जहां आनंद है, वहां आत्मा है; और जहां आत्मा है, वहां आनंद है। जितना ज्यादा आनंद, आत्मा से उतनी ज्यादा निकटता। पुत्र को इसीलिए शास्त्रों में आत्मा कहा गया है क्योंकि उसके साथ यिनयांग के आकर्षण का महान आनंद जुड़ा होता है। वैसे भी अपनी संतान सभी को प्यारी लगती है, चाहे वह कैसी भी हो। वैसे तो दत्तक संतान के साथ भी यह आकर्षण धीरे धीरे जुड़ जाता है, पर अपनी संतान के साथ तो यह उसके पेट में रहने के समय से ही जुड़ना शुरु हो जाता है। इस तरह से अगर देखा जाए तो एकनिष्ठ तंत्रयोगी साधु के लिए पूरी दुनिया उसकी संतान की तरह है। असली साधु ऐसे ही होते हैं। कई असली साधु जो गृहस्थ से दूर दिखते हैं, पर उनके मन के अन्दर यिनयांग मिश्रण जरूर मजबूती से जमा होता होगा। वे केवल बाहर से ही अकेले दिखते हैं। एक बार मेरी एक सच्चे जैसे दिखने वाले साधु से मित्रता हो गई थी। एकबार वे बता रहे थे कि उन्हें एक लड़की से प्यार हो गया था पर घर वालों ने शादी की इजाजत नहीं दी। बाद में उन्होंने घर छोड़ दिया और वे साधु बन गए। अब वे यादें उनके मन में इतने हल्के रूप में चलती हैं जैसे कोई पुराने ज़माने की हल्की क्वालिटी की ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा की रील चल रही हो। मतलब उनके मन में यिंनयांग जमा हुआ था। ज्यादातर नहीं तो बहुत से लोग ऐसे ही साधु बनते हैं, या तो प्रेम में सफल होकर या असफल होकर। यिंनयांग जोड़ा दोनों में होता है। और कईयों में तो यह यिनयांग ठेठ और अय्याश किस्म के गृहस्थों से भी बढ़कर होता है। यह दुनिया जैसी दिखती है, दरअसल वैसी होती नहीं, और जैसी होती है, वैसी दिखती नहीं। हमारी बहुत सारी बातें रटी रटाई होती हैं। अगर हम स्वतंत्रता के साथ गहराई से अवलोकन करें तो हमें जो सिखाया गया या बताया गया है, या जो सतही तौर पर दिखता है, सच्चाई उससे उलट ही नजर आती है। इसी यिनयांग की दिव्य शक्ति के कुछ अंश के कारण ही सुखी दंपत्ति महान और ज्ञानी साधुओं से कमतर नहीं दिखते और उनके साथ सारी दुनिया खड़ी होती हुई दिखती है।
जो अधिकारी सपरिवार अपने कार्यस्थल पर रहते हैं, उनसे उनके मातहत ज्यादा प्रसन्न रहते दिखते हैं। इससे वे अधिक दक्षता और मेहनत से काम करते हैं। मुझे लगता है कि सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के व्यक्तिगत मनोरंजन की उनकी कार्यकुशलता में अहम भूमिका है। इसलिए अब माना जा रहा है कि बीचबीच में कर्मचारियों को छुट्टियां देने व उन्हें अपने अपने परिवारों के साथ भरपूर मनोरंजन करने देने से वे ज्यादा कुशलता से कार्यक्षम बन जाते हैं, और काम में ज्यादा प्रोग्रेस निकालते हैं। हर समय काम और काम का ढोल बजाते रहना और वह भी चरित्र विकास और आध्यात्मिक विकास की कीमत पर, अच्छा नहीं लगता। मुझे नहीं पता कि कामकाजी महिलाएं अपने परिवारों के मनोरंजन का कैसे पूरा ध्यान रख पाती होंगी। वैसे तो आधुनिकता के नाम पर इतना मिथ्या ज्ञान और अज्ञान समाज में फैशन के रूप में फैला है कि क्षणिक सुख को ही परम सुख मान लिया गया है। इससे कोई नहीं बचा है, चाहे कोई कामकाजी हो या गृहव्यवस्थक। हमें लगता है कि शिक्षा नीति के अंतर्गत जैसे व्यक्तिगत वित्तीय शिक्षा को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने की मांग की जाती है, वैसी ही मांग परिवार प्रबंधन के लिए भी की जानी चाहिए। सभी स्कूली बच्चों ने आखिर बड़े होकर परिवार तो चलाना ही है, जिसमें वित्तीय प्रबंधन भी शामिल है। अभी कुछ दिन पहले एक सज्जन का बहुत सी शुभ कामनाओं के साथ संदेश आया कि इस ब्लॉग पर यौन तंत्र की पौराणिक प्रामाणिकता देखकर उनका दांपत्य जीवन पटरी पर आ गया। ऐसे संदेशों से खुशी होती है कि किसी का भला हो रहा है। वैसे हमने तो कुछ नया नहीं बताया, केवल पुराण में लिखी बात को ही स्पष्ट किया।