दोस्तों! तनाव आजकल एक महामारी की तरह फैला हुआ है। काम का तनाव, सफर का तनाव परिवार का तनाव, मौसमी वातावरण का तनाव आदि आदि। अनगिनत किस्म के तनाव हैं। कुछ दिन पहले एक मित्र से मेरा संपर्क हुआ। वह किसी योग संस्था से जुड़ा था। उससे बातचीत के दौरान उसने बताया कि योग के हर एक पोज या हर एक चक्र ध्यान के बाद 8 या 10 सेकंड के लिए रुकना है। इससे फौरन राहत मिलती है और मस्तिष्क भी अगले कदम के लिए तैयार हो जाता है। मैने ऐसा किया तो मुझे भी राहत मिली। पहले मैं बिना रुके लगातर करता था, जिससे थकान के साथ उच्च रक्तचाप जैसा व हल्की सी सिर दर्द भी महसूस होती थी। क्या तनाव को खत्म करने का रहस्य इसी में छिपा है? हो सकता है कि हो। मतलब काम के बीच-बीच में ब्रेक लेकर रिलैक्स होते रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य को नहीं लांघना चाहिए। जब शरीर और मन को काम के दौरान असहज सा लगने लगे, तो थोड़ी ब्रेक ले लो। मुझे तो इससे लिखने में भी मदद मिल रही है। थोड़ा लिखने के बाद तनिक रुक कर नए विचार और यादें तरोताजा हो जाती हैं।
मुख्य प्रश्न है कि योग से तनाव से कैसे राहत मिलती है। मुझे लगता है कि अवचेतन मन में दबे विचार ही तनाव पैदा करते हैं। आत्मा में तो वही पैदा करते हैं। क्योंकि आत्मा शरीर से जुड़ी है इसलिए स्वाभाविक है कि शरीर में भी करेेंगे। दबाव भी एक तनाव ही है। मैने जब एक अशरीरी आत्मा का साक्षात्कार किया था, उस समय उसमें असंख्य विचार अंधेरे के रूप में दबे हुऎ दिखे थे मुझे। आत्मा उससे तनाव में लग रही थी। आत्मा उजाले की तरफ आना चहती थी। ऐसा लग रहा था जैसे सूर्य को ग्रहण ने ढक लिया हो और वह उससे बाहर निकलना चाह रहा हो। ऐसा उन दबे विचारों को खत्म करके ही किया जा सकता था। पर दबे विचार अपने आप तो खत्म होते नहीं। उन्हें पुनः पुनः मन में अभिव्यक्त करना ही पड़ता है। फिर योगाभ्यास से उनके प्रति एकात्मभाव या अनासक्ति से ही वे धीरे-धीरे खत्म होते हैं। क्योंकि उस अशरीरी आत्मा के पास शरीर नहीं था। इसलिए संभव है कि उसने पुनर्जन्म लेकर नया शरीर धरण किया। अब शरीर तो कर्मों के अनुसार ही मिलेगा। आदमी का भी मिल सकता है और पशु पक्षी का भी। फिर वे दबे विचार नए शरीर में बाहर आने लगते हैं। इससे अस्थायी राहत ही मिलती है। क्योंकि वे खत्म नहीं हो पाते। क्योंकि पशु पक्षी योगाभ्यास नहीं कर सकते। वे विचार शिथिल जरूर हो जाते हैं। हो सकता है कि नष्ट भी हो जाते हों पर कई जन्म और युग लगेंगे। मनुष्य में यह काम योग से बहुत जल्दी हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में कहा है कि पशु पक्षी सीधे भी मुक्त हो सकते हैं। पर लगता है बहुत कम मामलों में ऐसा होता होगा। वह भी बहुत अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर ही। ऐसा इसलिए क्योंकि पशु को ज्यादा सामाजिक सुरक्षा सुलभ नहीं होती। इससे उनके वर्तमान संघर्षपूर्ण जीवन के विचार ऐसे ही उनके मन में दबे रह जाते हैं। उनमें आदमी की तरह यह ज्ञान भी नहीं होता कि आत्मा ही सब कुछ है। इसलिए वे शरीरकेंद्रित ही होते हैं। इसीलिए सभ्य समाज में हर किस्म की सुरक्षा चाहिए होती है। कई कहते हैं कि सरकार का कार्य केवल सैन्य सुरक्षा देना ही होना चाहिए। फिर रोजगार की या आमदनी की सुरक्षा कौन देगा? यह भी सैन्य सुरक्षा से कम जरूरी नहीं है। अगर सैन्य सुरक्षा होगी पर आमदनी की सुरक्षा नहीं होगी, तो भी आदमी हर समय तनाव में ही रहेगा और कभी शिथिल नहीं हो पाएगा।
तनाव ही अज्ञान है और शिथिलता ही योग या ज्ञान है। हम अगर शिथिलता का मजाक उड़ाते हैं तो एक प्रकार से योग का मजाक उड़ाते हैं। हम अगर तनाव को अच्छा समझते हैं तो एक प्रकार से योगहीनता या अज्ञान को अच्छा समझ रहे हैं। इनको अलग नहीं कर सकते। जरूरी नहीं कि काम तनाव के साथ ही हो। काम शिथिलता या रिलैक्सेशन के साथ भी हो सकता है। यही तो कला है। फिर एक आदमी के लिए जो तनाव है, वह दूसरे के लिए शिथिलता है। इसलिए तनाव और शिथिलता का पैमाना हर आदमी के लिए अलग है। सबके शरीर की बनावट और मन की सोच अलग अलग होती है। मतलब जो काम एक आदमी के लिए तनाव है, वह दूसरे के लिए शिथिलता है। एक के लिए तनाव इसलिए क्योंकि जब काम करते समय उसके दबे विचार बाहर निकलने की कोशिश करेेंगे, तो वह उसका प्रतिरोध करेेगा। इससे उसे ज्यादा तनाव महसूस होगा। पहले तो वे विचार आराम से सोए थे। तनाव तो उस समय भी था, पर कम था क्योंकि उन्हें दबाकर रखने को ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ रहा था। वे पहले ही सोए हुऎ थे। पर जब काम के दौरान शक्ति जागने लगती है, तब सोए हुऎ विचार भी जागने लगते हैं। कई लोग उनसे डरकर या उनसे घृणा करके उन्हें दबाकर रखने के लिए जोर लगाते हैं। इससे और भी ज्यादा तनाव में आकर थक जाते हैं। मतलब तनाव घटने की बजाय बढ़ता है। साथ में नए काम के नए विचार भी उनके साथ जुड़कर दब जाते हैं। वही काम अगर योगी करता है तो उसका तनाव बढ़ने की बजाय घटता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उसे योग के माध्यम से दबे विचारों का संदूक खाली करते रहने की आदत है। बेशक वह योगी कम शारीरिक शक्ति वाला है। मतलब साफ है कि तनाव काम करने से नहीं बढ़ता बल्कि गलत तरीके से काम करने से बढ़ता है। असल में योगयुक्त ढंग से काम करने से तो तनाव घटता ही है। यही कर्म और योग का मिश्रण है। यही कर्मयोग है।
एक आम धारणा है कि शक्ति सिर्फ कुंडलिनी योग से ही जगती है। ऐसा नहीं है। कुंडलिनी शक्ति हर एक काम से जगती है। और मस्तिष्क को चढ़ती है। तभी तो कोई भी काम करते समय सोए विचार जगने लगते हैं। इसीलिए तो गहरे काम के बाद आदमी यौनोन्मुख सा हो जाता है। यह इसलिए क्योंकि वह अपने मूलाधार को पुनः तेजी से रिचार्ज करना चाहता है। वैसे तो धीरे-धीरे वह अपने आप भी रिचार्ज हो जाता है। हां यह अलग चीज है कि कुंडलिनी शक्ति के पूर्ण जागरण को ही कुंडलिनी जागरण कहा जाता है।
तनाव देने वाला व्यक्ति वह नहीं जो काम देता है। बल्कि तनाव देने वाला वह है जो मन की आज़ादी छीनता है। मतलब जो मन के दबे विचारों को खुलकर बाहर आने से रोकता है। विचारों के बाहर आने को ही हृदय ग्रंथि का खुलना कहा गया है। ये दबे विचार ही हृदय को लपेटकर गांठ बनाकर बांध कर रखते हैं। इसीलिए तनाव से हार्ट अटैक ज्यादा आते हैं। दबे विचार रक्त शिराओं को भी दबा देते हैं। दबाना इनके डीएनए में है। दबना और दबाना इनका स्वभाव है। यह इनकी आदत है। ये पूरे शरीर को दबाकर रखते हैं। इन्हीं के प्रतिरोध के लिए ही हरेक आदमी स्वतंत्रता चाहता है। वास्तव में स्वतंत्रता एक मन की अवस्था है। योगी ही परम स्वतंत्र है, चाहे वह कैसी ही बाहरी परिस्थिति में क्यों न रहे। प्रकाश, सूर्य या गर्मी सबको फैलाती है। अंधेरा और ठंड सबको दबाते हैं। इसीलिए विंटर डिप्रेशन होता है। ये दबे विचार ही कुंडल बनाकर सिकुड़े रहते हैं। इन्हें ही कुंडलिनी शक्ति खोलती है। मतलब साफ है कि एक योगी ही सर्वोच्च कोटि का प्रबंधक, नेता या अधिकारी हो सकता है। एक योगी ही सबको समान रूप से सम्मान, प्रेम और स्वतंत्रता दिला सकता है। यह अलग बात है कि योग या योगी बाबा का नाम सुनते ही निठल्ले लोग इकट्ठे होने लगते हैं। बेशक वे भी धीरे-धीरे कर्मोन्मुख होने लगते हैं जब उन्हें सच्चाई का पता चलता है। उदार हृदयानाम तु वसुधैव कुटुंबकम्। इस वैदिक उक्ति का लौकिक अर्थ अक्सर यह लिया जाता है कि जो पूरी पृथ्वी को अपना परिवार समझे, वह खुले दिल वाला है।
वास्तव में इसका गहरा आध्यातमिक अर्थ यह है कि जो आदमी किसी भी विचार से राग या द्वेष रखकर उसे हृदय में दबाकर नहीं रखता, पर सभी के प्रति समान भाव रखकर सबको खुले छोड़ कर रखता है, वही महान या खुले दिल वाला है। वही योगी है। तनाव या अवसाद की जो मर्जी व्याख्या कर लो पर इसका मूल रूप ये दबे सोए विचार ही हैं। दरअसल तनाव और अवसाद एक ही चीज है। तनाव अगर इन सुप्त संस्कारों का भौतिक लक्षण है तो अवसाद इनकी अनुभूति है।
दोस्तों, खुले पार्क में बैठकर काफी धूप सेंक ली और विपासना से तनाव भी काफी हल्का हो गया। इसलिए अब बंद कोठरी में चलते हैं।