दोस्तों! कुछ समय पहले की बात है। मैं दूर के एक बड़े शहर गया हुआ था। एक कंपनी से मेरा सौदा चला हुआ था। कंपनी से कुछ मनमुटाव भी थे। कुछ जरूरी कार्यों को पेंडिंग छोड़कर मैं यात्रा को चला गया था। बीच में कंपनी की महिला प्रबंधक का फोन आया। अब सबको पता है कि परिवार के साथ हंसी खुशी के साथ सैरसपाटे को नजरंदाज करके कौन कंपनी का काम करेेगा? इसलिए प्रबंधक से कुछ हल्की कहासुनी भी हो गई। उस समय मेरे अनुभव पटल पर प्रबंधक का सूक्ष्म शरीर आया। वह विचित्र और कुटिल सा अंधेरा था। वह अंधेरा विशेष था। मैने पहले भी लिखा है कि सभी के सूक्ष्म शरीर का अंधेरा भिन्नभिन्न होता है। उस अंधेरे में मुझे बहुत कुछ दबा हुआ मिला। उसमें चंचलता, आगे बढ़ने की होड़, काम में तेजी, चालाकी, स्त्रियोचित सौंदर्य, साथ में कुटिलता और अनेकों पापकर्म और पता नहीं क्या-क्या महसूस हुआ? अलग-अलग करके ऐसे गुण उसमें कुछ नहीं थे। वह अंधेरा एक ही था। उसमें कोई विभाग नहीं थे। क्योंकि एक इकट्ठे मिश्रण का अलग अलग करके वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए मजबूरन टुकड़ों में वर्णन करना पड़ता है। देखा जाए तो उसका पुरा वर्णन करना तो असंभव ही है। उस एकमात्र अद्वितीय अंधेरे से अनगिनत जन्मों के एक एक कर्म, एक-एक फल, एक-एक चरित्र कौन पृथक कर सकता है? गजब की एनकोडेड फॉर्म होती है उस सूक्ष्म शरीर की। जैसी वह महिला प्रबंधक स्थूल रूप में थी, उसका सूक्ष्म शरीर भी बिलकुल उससे ही मैच कर रहा था। ऐसा समझ लो कि उसी की परछाई थी। जिस समय वह मुझे अनुभव हुआ, उस समय शायद वह अपना पूरा जोर लगाकर ठेका रद्द करने का पत्र लिख रही थी। वैसा उसने पिछला सब कुछ याद करके किया होगा। साथ में अपने बारे में, अपनी कमियों और खूबियों के बारे में, अपने लिए इसके लाभ हानि के बारे में, मेरे इमोशनों के बारे में, अपने सभी इमोशनों और भावनाओं के बारे में, या कहो कि अपने संपूर्ण व्यक्तित्व के बारे में भी खूब विचार किया होगा। क्योंकि सब मेरे स्मरण के साथ किया होगा, इससे उसके सूक्ष्म शरीर की छाप मेरे मानस पटल पर पड़ गई होगी। वैसे भी सृष्टि की सभी आत्माएं एक दुसरे से जुड़ी हुई हैं। एक जगह आत्मा की हलचल पूरी कायनात में हलचल पैदा कर देती है। इसको कई योगी लोग महसूस कर लेते हैं। खैर मेरे वापस आने पर ठेका रद्द होने का पत्र मेरे सामने था। हालांकि यह अलग बात है कि कुछ बीचबचाव व वादविवाद के बाद वह ठेका मुझे पुनः वापस मिल गया था।
बेशक उस सूक्ष्मशरीर का अनुभव मात्र दस सेकंड के समय जितना ही कायम रहा होगा पर था वह स्पष्ट, अप्रत्यक्ष और हैरान सा कर देने वाला। हैरानी इसलिए क्योंकि स्थूल शरीर से आदमी का पूरा पता नहीं चलता। स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर पर ऐसे मढ़ा हुआ होता है जैसे कोयले की खदान पर हराभरा जंगल। सूक्ष्मशरीर से ही आदमी के यथार्थ स्वरूप का पता चलता है। मुझे लगता है कि जो स्त्री के प्रति लंबे समय तक संयम रखने के बाद उसके प्रति आकर्षण खुद ही कम हो जाता है, वह इसलिए क्योंकि उसके सूक्ष्म शरीर की झलक मिलने लग जाती है। मतलब स्त्री का असली स्वभाव, मानसिक झुकाव, विचार, आदतें आदि उसके असली स्वरूप या सूक्ष्म शरीर का परिचय देने लग जाते हैं। शायद स्त्री इसीलिए सबसे दूरी बनाकर रखती है ताकि उसके सुंदर स्थूल शरीर, मधुर आवाज और कामुक हावभाव के आवरण के नीचे उसका सूक्ष्म शरीर ढका रहे और लोगों की उसपर नजर न पड़े।
अगर मैं गहराई से याद करके विश्लेषण करूं तो जिस समय उससे बहस हुई थी, लगभग उसी समय या थोड़ी देर बाद मुझे उसके सूक्ष्म शरीर का अनुभव हो गया था। मतलब उसने अपने अवचेतन मन में यह निर्णय कर लिया था कि आगे क्या करना था। बाद में तो सिर्फ चेतन मन द्वारा उस निर्णय को लागू ही किया गया। आज वैज्ञानिक भी यही दावा कर रहे हैं कि आदमी के द्वारा किया जाने वाला हरेक काम उसके अवचेतन मन द्वारा उसके जाने बिना पहले ही निर्धारित कर दिया गया होता है। आदमी तो बस अपने चेतन मन से उस आदेश का पालन ही करता है। पर मुझे लगता है कि ऐसा आम अज्ञानी जनों के साथ ही होता होगा। योगी या ज्ञानी लोगों का तो अपने ऊपर, यहां तक कि अवचेतन मन पर भी भरपूर नियंत्रण होता है।
दारअसल प्रतिदिन के कुंडलिनीयोग सिद्ध ध्यान अभ्यास से ऊर्जा जागृत अवस्था में बनी रहती है। अगर कुछ दिन अभ्यास छोड़ दिया जाए तो कुंडलिनी ऊर्जा मूलाधार में पुनः सो जाती है। इसलिए इसे प्रतिदिन जगाते रहना चाहिए। कई लोग सोचते हैं कि एक बर जगा दी तो स्थायी तौर पर जग गई। ऐसा नहीं है। सुबह इसको जगाने के बाद शाम होने तक यह पुनः मूलाधार में जाकर आराम से तकिया लगाकर सो जाती है। इसलिए शाम को इसे पुनः जगाकर ऊपर चढ़ाना पड़ता है। इसीलिए योग को दिन में दो बार करने को कहा गया है। कम से कम खाना खाने के बाद 4 घंटे, पानी पीने के बाद आधा घंटे, चाय या दूध या अन्य पेय पदार्थ पीने के बाद 1 घंटा बीत जाना चाहिए, नहीं तो गैस्ट्रिक की शिकायत हो सकती है। अब जब ऊर्जा लगातार मस्तिष्क में जागी रहेगी तो स्वाभाविक है कि सूक्ष्म और पारलौकिक अनुभव तो उपलब्ध करवाती ही रहेगी। कई लोग चार दिन योग करने के बाद बोलते हैं कि उन्हें तो ऐसे कोई अनुभव नहीं हुए। वे तभी होंगे न जब उनके होने का मौका आएगा। ऐसे ही शून्य आसमान से कहाँ टपक पड़ेंगे। सब कुछ मौका आने पर ही होता है। हां, यह जरुर है कि जो लगातार आत्मचेतना के अनुभव में रमा रहेगा, तब ये छोटे-मोटे पारलौकिक अनुभव खुद ही होंगे, जब उनके होने की भौतिक दुनियादारी की परिस्थिति बनेगी। शरीर, सांस या किसी भी मौजूदा चीज़/कार्य/संगीत आदि पर ध्यान लगाने से उत्पन्न आत्म-जागरूकता व्यक्ति को वर्तमान क्षण में स्थिर रखती है। इससे यह आने-जाने वाले विचारों को साक्षीभाव से देखने में सक्षम बनाती है। इससे यह उन विचारों को आनंद के साथ स्वयं में विलीन करके कमजोर बनाती है। इससे यह मानसिक शोर को कम करती है, जिससे पारलौकिक अनुभवों के लिए मन में पर्याप्त खाली जगह बनाने में मदद मिलती है। वैसे तो परम पारलौकिक अनुभव तो आत्मचेतना का अनुभव ही है।