कुण्डलिनी से सुहाने सपने

दोस्तों, अब मुझे हर हफ्ते नई पोस्ट लिखने के लिए खुद ही हिंट मिल जाती है, और नई घटना भी। आज रात को मैंने एक तंत्र से सम्बंधित स्वप्न देखा। वह जीवंत, स्पष्ट व असली लग रहा था। वह स्वप्न सुबह के समय आया। ऐसा लग रहा था कि वह मेरी किसी पूर्वजन्म की घटना पर आधारित रहा होगा। तभी तो मैं उसमें भावनात्मक रूप से बहुत ज्यादा बह गया था, और मुझे आनंद भी आया। उस स्वप्न से प्राचीनकाल के तंत्र के बारे में मेरे मन में तस्वीर स्पष्ट हो गई। वैसे भी एक कुण्डलिनी योगी का पुरानी या अपने पूर्वजन्मों की घटनाओं से सामना उसके स्वप्न में होता ही रहता है। वे सारे स्वप्न बहुत मीनिंगफुल होते हैं।

प्राचीनकाल में तंत्र बहुत उन्नत था

उस सपने में मैंने देखा कि मैं अपने परिवार सहित एक ऊंचे पहाड़ के किसी पर्यटक स्थल जैसे स्थान पर था, जहां पर चहल-पहल थी, व बहुत आनंद आ रहा था। कुछ पुराने परिचितों से भी वहां मेरी मुलाक़ात हुई। उस पहाड़ की तलहटी एक मैदानी जैसे भूभाग से जुड़ी हुई थी। उस जोड़ पर एक विशालकाय मंदिर जैसा स्थान था। हम नीचे उतर कर उस मंदिर परिसर में प्रविष्ट हो गए। चारों और बहुत सुन्दर चहल-पहल थी। बहुत आनंद आ रहा था। परिसर में एक प्रकाशमान गुफा जैसी संरचना भी थी, जिसके अन्दर भी बाजार सजे हुए थे। मेरी पत्नी उसमें घुमते-फिरते और शौपिंग करते हुए कहीं मुझसे खो गई थी। मैं उसे भी खोज रहा था। उस खोजबीन में मैंने मंदिर के बहुत से कमरे देखे, जो लाइन में थे. हालांकि कुछ कमरे सीढ़ियों से कुछ ऊपर चढ़कर भी थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सारा मंदिर परिसर किसी विशालकाय छत के नीचे था। नीचे की पंक्ति के एक कमरे में मैं घुस गया। वहां पर बहुत से लोग नीचे, एक दरी पर बैठे थे। वहां पर बीच में जैसे मैंने अपना बैग पीठ से उतार कर रख दिया, और मैं भी बैठ गया। तभी एक महिला अन्दर आई, और मुझे बड़े प्यार व अपनेपन से अपने साथ, गलियों से होते हुए, सीढ़ियों के ऊपर के एक कमरे तक ले गई। उससे कुछ पुरानी जान-पहचान भी महसूस हो रही थी, पर वह स्पष्ट नहीं थी। शायद इसीलिए मुझे उसके साथ आनंद आ रहा था। एक-दो स्थान पर उसने मुझे अपना स्पर्श भी करवाया। वह उस कमरे में एक कुर्सी पर बैठ गई। उसके सामने मेज पर बहुत से कागजात पड़े थे। उसके समीप ही दो-चार पुरुष लोग भी कुर्सियों पर बैठे हुए थे। महिला ने किसी बीमा जैसी योजना के कुछ कागजात जैसे दिखाए, और मुझसे कहा कि मेरी पत्नी ने उस योजना के लिए हामी भरी थी। मैं मुकरने लगा, तो उसके चेहरे पर कुछ हलकी मायूसी जैसी दिखी। तभी वे लोग कुछ अन्य ग्राहकों का काम निपटाने लगे, जिससे मैं मौक़ा पाकर वहां से खिसक गया। मैं वापिस उसी कमरे में आ गया, जहां पहले बैठा था, क्योंकि मैं अपना बैग वहीं भूल गया था। पर मुझे अपना बैग वहां नहीं मिला। मैं काफी उदास हुआ, क्योंकि उसमें कुछ अन्य जरूरी चीजों के साथ मेरा महँगा किन्डल ई-रीडर भी था। मैं बहुत निराश होकर बैग खोजने लगा। मैंने कई कमरों में तलाश की, यह सोचकर कि कहीं मैं दूसरे कमरों में तो नहीं बैठा। मैं फिर बीच वाली खुली लॉबी में गया, जिसके अन्दर वे कमरे खुलते थे। वह एक रेलवे स्टेशन की तरह बहुत खुली-डुली जगह थी, जहाँ पर काफी चहल-पहल थी। वहां एक-दो पुलिस वाले भी सीमेंट के बेंच पर बैठे हुए थे। उनसे पूछा, तो उन्होंने लापरवाही से व मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए कहा कि मेरा बैग कभी नहीं मिलेगा, और उसे किसी ने उठा लिया होगा। मैंने फिर से उसी कमरे का दरवाजा खोला, जहां मैं बैठा हुआ था। वहां पर दो भद्र पुरुष नाईट सूट में मदिरा पीने का आनंद ले रहे थे। वे दोनों पालथी लगा कर आराम से बैठे फुए थे। वे मध्यम कद-काठी के और कुछ सांवले लग रहे थे। मदहोशी की ख़ुशी की मुस्कान उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि मेरा बैग वहीं कमरे में पड़ा था। मैं बहुत खुश हुआ और उनसे कहा कि शराब से आपके अन्दर ज्ञान की आँख खुली, जिससे आप मेरा बैग ढूंढ सके। वे बहुत खुश होकर मुस्कुराने लगे, और एक पेग हाथ में पकड़ कर मुझसे बोले कि मैं भी उसे देवी माता के नाम पर पी लेता। मैंने उन्हें मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहा, और चल दिया। यद्यपि मेरा मन लगातार कर रहा था कि मैं एक पेग देविमाता के नाम पर लगा लेता। परन्तु मैं उन्हें मना कर चुका था, इसलिए वापिस नहीं मुड़ना चाहता था। परिसर से बाहर निकल कर ही दुकानों की एक कतार लगी हुई देखी। मैं एक मिठाई की दुकान में कुछ मिठाई खरीदने के लिए घुस गया। वहां पर दुकान के शुरू में ही खड़े मुझे कुछ चिर-परिचित दोस्त मिले, जो ख़ुशी के साथ शराब के बारे में कुछ आपसी बातें करने लगे। मैंने कहा कि ऐसी बातें न करो, नहीं तो मेरा मन भी देवी माता के नाम पर एक पेग लगाने का कर जाएगा। ऐसा सुनकर सब हंसने लगे। उन दुकानों की कतार वाली सड़क चढ़ाई की दिशा में बाहर जा रही थी। कुछ चढ़ाई चढ़ कर मैं निचले तरफ की एक दुकान के सीमेंट से बने पक्के प्लेटफोर्म पर चढ़ गया। तभी मुझे विचित्र व दिल को छूने वाले गाजे-बाजे/संगीत की आवाजें सुनाई देने लगीं। वह सजे हुए रथ पर देवी माता की झांकी निकल रही होगी। मैं देवी माता के प्यार मैं इतना बह गया कि मेरी आँखों में प्रेम के आंसुओं की बाढ़ आ गई, और मैं हलकी आवाज में रुक-२ कर रोने लगा। मैं बार-बार अपनी दाहिनी बाजू को फोल्ड करके, उससे अपनी आँखों को पोंछ रहा था, और आँखों को ढक भी रहा था। वह मैं इसलिए कर रहा था, ताकि कोई मुझे रोता हुआ जानकार अजीब न समझे, और उससे मेरे प्यार की भावना में बहने में रुकावट न पैदा हो। फिर मैंने सोचा कि उस अजनबी स्थान पर मुझे कोई नहीं पहचानता होगा। इसलिए मैं खुले दिल से जोर-जोर से रोने लगा। तभी मुझे एक लेटा हुआ भक्त सड़क पर दिखा, जो रोल होकर ऊपर की तरफ आ रहा था। वह देवी माता का कोई महान भक्त होगा। वह भी मध्यम से सांवले रंग का था। उसने खड़े होकर मुझे बड़ी-बड़ी व भावपूर्ण आँखों से देखा, और वह भी मानो भावना में बह गया। तभी मैंने देखा कि एक सांवले व ताकतवर आदमी ने एक बकरी के बच्चे को एक हाथ से सीधा अपने सिर से भी ऊपर, गले से पकड़ कर उठाया हुआ था, और उसे देवी माता की भक्ति के साथ मिश्रित क्रोध व हिंसक भाव के साथ देख रहा था। किड मिमिया रहा था। उसका दूसरा हाथ सीधा नीचे की ओर था, जिसमें उसने एक बड़ा सा खंजर पकड़ा हुआ था। वह बार-बार देवी माता का नाम ले रहा था। मैं पीछे हट कर दुकान की ओट में आ गया, ताकि वह निर्दयी दृश्य मुझे न दिखता। थोड़ी देर बाद, मैं आगे को खिसका ताकि मैं देख सकता कि क्या वहां पर किड के जुदा किए हुए धड़ और सिर थे, और चारों तरफ फैला हुआ खून था। परन्तु वहां पर सभी किड पहले की तरह ज़िंदा थे, और ख़ुशी से हिल-डुल रहे थे। उससे मैंने चैन की सांस ली, और ख़ुशी महसूस की। शायद सांकेतिक रूप में ही देवी माता को भेंट चढ़ा दी गई थी। तभी अलार्म बजा, और मेरा स्वप्न टूट गया।

उस स्वप्न से मुझे प्राचीनकाल के उन्नत तंत्र, विशेषकर काले तंत्र के बारे में स्पष्ट अनुभूति हुई। प्राचीनकाल में तंत्र एक उन्नत विज्ञान के रूप में था, और जन-जन में व्याप्त था। परन्तु उसके साथ हिंसा, व्यभिचार आदि के बहुत से दोष भी बढ़ जाते थे, विशेषतः जब उसे उचित तरीके से नहीं अपनाया जाता था। तंत्र के दुरूपयोग के कारण ही इसकी अवनति हुई। इस्लाम भी एक प्रकार का अतिवादी तंत्र ही है। यह इतना कट्टर है कि लोग इस बारे बात करने से भी कतराते हैं। इसीलिए यह जस का तस बना हुआ है। हिन्दु तंत्र में भी प्राचीनकाल में नरबली की प्रथा था, परन्तु उसका व्यापक विरोध होने पर उसे बंद कर दिया गया।

प्रेमयोगी वज्र का तंत्र सम्बंधित अपना अनुभव

उसने कुण्डलिनी के विकास के लिए किसी विशेष तंत्र का सहारा नहीं लिया। उसने वही काम किए, जो दूसरे सामान्य लोग भी करते हैं, पर उसने उन कामों को अद्वैतपूर्ण/तांत्रिक दृष्टिकोण के साथ किया। यही तरीका उचित भी है। इससे तंत्र का दुरुपयोग नहीं होता।    

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कुण्डलिनी से कौशल विकास एवं रचनात्मकता

आजकल का युग वैज्ञानिक युग है। कौशल व विज्ञान एक दूसरे के प्रमुख सहयोगी हैं। कुशलता के बिना विज्ञान अधूरा है, और विज्ञान के बिना कुशलता अधूरी है। किसी भी काम में वैज्ञानिक तकनीकें भी नाकामयाब या नुकसानदेह/जानलेवा हो जाती हैं, यदि कौशलता का अभाव हो। विज्ञान आज लगभग हर जगह विद्यमान है, परन्तु कुशलता हर जगह विद्यमान नहीं है। अविकसित देशों में अधिकाँश स्थानों पर कुशलता का अभाव होता है। इसी तरह, विकसित देशों के दूर-दराज के व जनजातीय क्षेत्रों में भी कुशलता का भाव होता है। हर रोज जब मैं आसपास नजर दौड़ाता हूँ, तो मुझे कौशल की भारी कमी महसूस होती है। उदाहरण के लिए, मेसनरी वर्क को ही लें। यह मुझे कहीं पर भी गुणवत्तापूर्ण नहीं दिखता। छोटी-२ बातों का ध्यान नहीं रखा जाता, जिससे बड़े-२ नुक्सान हो जाते हैं। अधिकाँश मिस्त्री वैज्ञानिक तथ्यों से परिचित नहीं होते। जो परिचित होते हैं, वे उन्हें व्यावहारिक रूप में लागू करने में आलस करते हैं। कई तो उन्हें लागू करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते। कईयों को प्रशिक्षण का अभाव खलता है। कई रूढ़ीवादी सोच के कारण उन्हें जानबूझ कर लागू नहीं करते।

कुण्डलिनी से कौशल विकास कैसे होता है

यह तो सर्वविदित ही है कि अद्वैतभाव के साथ मन में बसी रहने वाली छवि को ही कुण्डलिनी कहते हैं। यह गुरु की, प्रेमी-प्रेमिका की, पुत्र की, माता-पिता की, दादा-दादी की, मित्र की, किसी मनपसंद स्थान या वस्तु आदि किसी की भी हो सकती है।

किसी के मन में कुण्डलिनी के बारम्बार प्रकट होने का सीधा सा अर्थ है कि वह किसी भी चीज की गहराई तक जाता है, और उसे ऊपर-२ से जानकार छोड़ नहीं देता। इससे गहराई तक जाने का उसका स्वभाव स्वयं ही बन जाता है। इस धीर स्वभाव से यह होता है कि जब वह कोई भी काम करता है, तब उसे पूरे विस्तार के साथ सम्पादित करता है। वह उसमें कोई कमी नहीं रहने देना चाहता। वह उस काम से लम्बे समय तक चिपका रहता है। इससे उसे उस काम के बारे में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान व अनुभव प्राप्त करने का मौक़ा मिल जाता है। इससे उसकी कुण्डलिनी भी मजबूत होती रहती है, क्योंकि कुण्डलिनी को भी तो चिपकू स्वभाव की ही जरूरत होती है। इससे दोनों सिद्धियाँ एकसाथ प्राप्त हो रही होती हैं। एकतरफ उसे कौशल विकास के साथ भौतिक काम की उच्च गुणवत्ता के रूप में भौतिक सिद्धि प्राप्त हो रही होती है, तो दूसरी तरफ कुण्डलिनी विकास के रूप में आध्यात्मिक सिद्धि भी।

कुण्डलिनी व कौशल विकास के आपसी रिश्ते के बारे में प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

जब प्रथम देविरानी के रूप की कुण्डलिनी उसके मन में फुली ब्लोन अप थी, तब वह सभी काम बड़ी बारीकी से करता था। वह अपना अकादैमिक अध्ययन बहुत गहरी व स्पष्टता से करता था। वह हरेक विषय की जड़ तक चला जाता था। उसे औरों के द्वारा ऊपर-२ से किया गया काम पसंद नहीं आता था। वह उसके लिए उन्हें कई बार ताने भी मार देता था, जिससे बहुत से लोग उसे अव्यावहारिक, आलोचक, नकारात्मक, बड़ी-२ बातें बनाने वाला, व घमंडी मानने लग गए थे। परन्तु वह औरों की सहायता के बिना कैसे बदलाव ला सकता था। अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता। अतः उसे अनेकों बार परिस्थिति के साथ समझौता करना पड़ता था।

कालान्तर में जब उसके मन में गुरु के रूप की कुण्डलिनी चमकने लगी, तब वह बहुत ज्यादा व्यावहारिक व स्वावलंबी बन गया। तब उसने जो भी काम किए, वे पूरी गुणवत्ता के साथ किए। वह छोटे-२ सभी काम स्वयं कर लेता था, क्योंकि उसकी बारीक और गहरी नजर को कोई समझ ही नहीं पाता था। जब लोगों ने उसके चमत्कारिक परिणाम देखे, तब लोगों को असलियत का पता चला, और वे उसकी तारीफ करने लगे।

सौहार्दपूर्ण वातावरण में कौशल अधिक विकसित होता है

ऐसे वातावरण में लोग एक-दूसरों को वस्तु-सेवाओं व व्यावहारिक जानकारियों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। कुण्डलिनी विकास के लिए भी सौहार्दपूर्ण वातावरण की आवश्यकता होती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी कौशल विकास में मदद करती है।

कुण्डलिनी योग को कौशल विकास के प्रशिक्षण में शामिल किया जाना चाहिए

प्रेमयोगी वज्र को प्राकृतिक रूप से इतना अधिक प्यार मिला कि उसके मन में स्वयं ही कुण्डलिनी विकसित हो गई। उसे योग करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यह अलग बात है कि उसने बाद में दूसरों के लाभ के लिए कुण्डलिनी योग से भी कुण्डलिनी जागरण प्राप्त किया, ताकि सभी लोगों को कुण्डलिनी की उपलब्धि हो सके। सभी लोग उसकी तरह तो खुशकिस्मत नहीं होते।     

सबसे प्रिय वस्तु को ही कुण्डलिनी कहते हैं। जब कौशल प्रशिक्षण कुण्डलिनी के साथ जुड़ जाता है, तब वह भी कुण्डलिनी की तरह ही सर्वाधिक प्रिय बन जाता है। यही कौशल व कुण्डलिनी के आपसी गठजोड़ का मूलभूत सिद्धांत है। इससे कौशल व कुण्डलिनी आजीवन एक-दूसरे को एकसाथ बढ़ाते रहते हैं, और एकसाथ बुलंदियां छूते रहते हैं।    

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कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही असली समर्पण है

सभी धर्मों में ईश्वर के प्रति समर्पण/सरेंडर पर बहुत जोर दिया गया है। वास्तव में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है। ईश्वर निराकार है। उसे कोई देख नहीं सकता, जान नहीं सकता, और न ही उसे कोई अनुभव कर सकता है। जिसका कोई अता-पता ही नहीं है, उसके प्रति कोई कैसे समर्पित हो सकता है? वास्तव में कुण्डलिनी ही ईश्वर का छोटा रूप है, जो जानने में आ सकता है। यह कुण्डलिनी क्राइस्ट के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, भगवान् राम के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, किसी के मन में उसके अपने गुरु/मित्र/प्रेमी के चित्र के रूप में हो सकती है आदि-2।

अद्वैत के प्रति समर्पित होने का अर्थ भी कुण्डलिनी के प्रति समर्पित होना ही है

जैसा कि हमने पहले भी बताया है की अद्वैत और कुण्डलिनी साथ-2 रहते हैं । एक के बढ़ने से दूसरा स्वयं ही बढ़ जाता है। अनासक्ति भी अद्वैत का ही रूप है। इसका सीधा सा अर्थ है की ईश्वर सीधे नहीं, अपितु अद्वैत/अनासक्ति/साक्षीभाव {साक्षी भाव से अद्वैत व अनासक्ति बढ़ते हैं}/कुण्डलिनी के रूप में रहता है। ये चारों भाव एकसमान ही हैं, क्योंकि एक के भी बढ़ने से अन्य भाव स्वयं बढ़ने लगते हैं। यदि सभी भाव एकसाथ बढ़ाए जाएं, तब तो और भी अच्छा, क्योंकि तब बहुत तेज आध्यात्मिक प्रगति होती है।

प्रेमयोगी वज्र ने जब शरीरविज्ञान दर्शन के माध्यम से अद्वैत को लम्बे समय तक अपनाया, तब उसमें बहुत से आध्यात्मिक गुण बढ़ोत्तरी को प्राप्त हुए, और कुण्डलिनी भी परिवृद्ध हुई, जो अंततः जागृत हो गई।

ईश्वर के प्रति समर्पण से कुण्डलिनी के प्रति समर्पण स्वयं ही हो जाता है

वास्तव में भगवान् के ध्यान से भी कुण्डलिनी का ही ध्यान होता है। निराकार भगवान् के ध्यान से अद्वैत का ध्यान स्वयं ही हो जाता है, क्योंकि भगवान् सभी स्थितियों में एकसमान हैं। और यह निर्विवाद सत्य है कि अद्वैत के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही होने लगता है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि ईश्वर के प्रति समर्पण स्वयं ही अप्रत्यक्ष रूप में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण बन जाता है। फिर क्यों न सीधे ही कुण्डलिनी-साधना की जाए।

इसीलिए कहा जाता है कि गुरु भगवान् से बढ़कर हैं

गुरु गोबिंद दोनों मिले, काके परूं पाए।
बलिहारी गुरु आपकी, गोबिंद दियो मिलाए।।

तुलनात्मक रूप से गुरु को भगवान् से बढ़कर बताया गया है, क्योंकि भगवान की प्राप्ति गुरु से ही तो होती है। कुण्डलिनी वास्तव में गुरु/प्रेमी की मन में बसी हुई छवि/कुण्डलिनी ही तो है। इससे भी सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी के प्रति समर्पण अधिक आसान, मानवीय, व्यावहारिक व कारगर होता है।  

हिंदु धर्म और इस्लाम एक ही बात बोलते हैं

इस्लाम धर्म में अल्लाह/निराकार ईश्वर के प्रति समर्पण पर जोर दिया गया है। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म में मुख्यतः साकार ईश्वर/मूर्ति/कुण्डलिनी के प्रति समर्पण पर अधिक जोर दिया गया है। ऊपर हमने यह भी सिद्ध कर दिया है कि निराकार ईश्वर के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं होने लगता है। इसी तरह, कुण्डलिनी/मूर्ति का ध्यान करने से निराकार ईश्वर/अल्लाह का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। साथ में, इससे यह भी स्वयं सिद्ध हो जाता है कि इस्लाम में मूर्ति/कुण्डलिनी-पूजा का विरोध वास्तविक नहीं, अपितु काल्पनिक है, जो किसी गलतफहमी के कारण पैदा हुआ है।  

इसीलिए आजकल के बौद्धिक युग में हर जगह कुण्डलिनी योग का बोलबाला है।

और अज्ञानी गुरु भी कभी काम आ सकता है, अगर आप समर्पण कर दें। क्योंकि समर्पण करना ही घटना है, गुरु तो सिर्फ बहाना है।

ओशो प्रवचन- समर्पण की छलांग

मां कुंडलिनी के सम्मुख पूर्ण समर्पण की भावना भी रखनी चाहिए ।

आंतरिक शक्ति को जगाएं- speakingtree.in

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द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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कुण्डलिनी व मूर्तिपूजा के बीच में परस्पर सम्बन्ध

कुण्डलिनी को क्रियाशील व जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के साथ बहुत लम्बे समय तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना पड़ता है। अधिकांशतः ऐसा एक ही जीवनकाल में संभव नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक है कि कुण्डलिनी के स्मरण वाला संस्कार एक आदमी को उसके जन्म से ही मिल जाए। यहाँ तक कि जब वह माता के गर्भ में हो, तभी से मिलना शुरू हो जाए। इसको संभव बनाने के लिए ही इष्टदेव को कल्पित किया गया है। वह कल्पित रूप सदा से सभी के लिए एक जैसा होता है। इससे उस इष्टदेव को मानने वाले परिवार में उस इष्टदेव के स्मरण से सम्बंधित संस्कार वंश परम्परा के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है। इसीलिए शैव सम्प्रदाय के लोगों के लिए शिव के रूप का ध्यान करना आसान हो जाता है। उसी ध्यान-शक्ति से एक शैव के मन में बसने वाला शिव उसकी कुण्डलिनी बन जाता है, जो अंततः कुण्डलिनी-जागरण के रूप में जीवंत भी हो सकता है। यदि दूरदर्शी ऋषियों के द्वारा शिव को निश्चित रूप न दिया गया होता, तो शिव का ध्यान उत्तरोत्तर न बढ़कर बार-२ टूटता रहता।

मान लो, किसी आदमी नि शिव को जटाधारी माना होता, और उसके पुत्र ने शिव को जटाहीन माना होता, तो क्या होता? वैसे में पिता के द्वारा अर्जित ध्यान पुत्र को प्राप्त न होता। वह अपना ध्यान स्वयं ही शुरू से इकट्ठा करता, जिससे उसे बहुत थोड़ा ही लाभ मिलता। उसे जो लाभ मिलता, वह यह होता कि उससे उसके जीवन में अल्प मात्रा में ही अद्वैत व अनासक्ति-भाव उत्पन्न होते। उससे प्रचंड अनासक्ति व अद्वैत के साथ कुण्डलिनी-जागरण न मिलता।

देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देव शंकर हैं। इसीलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। उन्हें एक निश्चित रूप प्रदान किया गया है। उनके गले में सर्प की माला है। उनके सिर पर लम्बी-२ जटाएं हैं। उनके मस्तक पर आधा चन्द्रमा विराजमान है। उनकी जटाओं से गंगा नदी निकल रही है। उनके माथे पर तीन समानांतर रेखाओं के रूप में तिलक है, जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। कई जगह उनके भ्रूमध्य में खुला हुआ तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। वे भस्म से लिपटे हुए हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, और एक हाथ में डमरू है। वे बैल की सवारी करते हैं। वे बाघ का चर्म ही ओढ़ते हैं, अन्य कोई वस्त्र नहीं पहनते हैं। वे सुन्दर हैं। उनके नयन-नक्श संतुलित व त्रुटिरहित हैं। उनका मुख कान्तिमान व आकर्षक है। उनका शरीर सुडोल व संतुलित है। वे मध्यम गोरे रंग के हैं। उनकी चाल-ढाल अद्वैत, अनासक्ति, व वैराग्य से भरी हुई है।

इसी तरह अन्य देवी-देवताओं को भी निश्चित रूप व आकार प्रदान किए गए हैं। साथ में, उन्हें निश्चित भाव-भंगिमाएं व आचार-विचार भी प्रदान किए गए हैं। गणेश को मूषक की सवारी करने वाला, लड्डू खाने वाला, व हाथी के जैसे मुख वाला बताया गया है। इसी तरह, नौ देवियों को भी भिन्न-२ परिचय दिए गए हैं।

इसी सिद्धांत के अनुसार अपने पूर्वज या पारिवारिक वृद्ध (पितामह आदि) को गुरु बनाना अधिक लाभप्रद है। क्योंकि एक व्यक्ति उनके साथ जन्म से लेकर परिचित व सौहार्दपूर्ण बना होता है, इसलिए उन्हें मन में बैठाना सर्वाधिक सरल होता है। वही मानसिक मूर्ति फिर लगातार के अभ्यास से कुण्डलिनी बन कर क्रियाशील व जागृत हो सकती है।

देव-मूर्ति पुराने मित्रों, परिचितों व पूर्वजों से भी जुड़ी होती है। जब कोई उन चिर परिचितों की समकालीन देव-मूर्ति से पुनः संपर्क साधता है, तब उन चिर-परिचितों की याद पुनः ताजा हो जाती है। उनमें से सर्वाधिक प्रभावशाली स्मरण बार-२ के अभ्यास से स्थायी स्मरण (कुण्डलिनी) के रूप में मन में उभर सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे कंडीशंड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) कहते हैं। इसके अनुसार जब दो वस्तुएं मन में एकसाथ बैठ गई हों, तो दोनों वस्तुएं आपस में जुड़ जाती हैं। जब कभी एक वस्तु का स्मरण किया जाता है, तो उससे जुड़ी हुई दूसरी वस्तु का स्मरण स्वयं ही हो जाता है। यह उस जैविक घटना की तरह है, जब एक गाय अपने बछड़े को देखकर अपना दूध छोड़ने लगती है। इस प्रकार से देव-मूर्तियाँ सामाजिक कंडिशनर (social conditioner) या सामाजिक संपर्कसूत्र (social link) का काम करती हैं। अपने प्रिय व परिचित जनों की याद बनाए रखने में ये अहम् भूमिका निभाती हैं। यही बात अन्य सभी निर्धारित किए गए धार्मिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यद्यपि देव-मूर्तियाँ इनमें मुख्य हैं, क्योंकि वे मानवाकार, सुन्दर, सहज सुलभ, सर्वसुलभ, व आकर्षक होती हैं।

अगर किसी को मूर्ति पूजा से प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता है, तो भी इसकी मदद से ध्यान और गहरी भावना की एक अच्छी आदत पड़ जाती है। यह मानवता के समग्र विकास में मदद करता है। यह सब प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ, तभी तो वह क्षणिक आत्मज्ञान व क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को अनुभव कर पाया। दरअसल, वैदिक काल में देवताओं को उनके शुद्ध प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था। बाद में, इनमें से कई देवताओं को मानव समाज में चल रहे सामाजिक सुधारों के साथ मानव रूप दिया गया, जो ज्ञान-विज्ञान सम्मत भी है।

प्राकृतिक चीजें अद्वैतशाली व अनासक्त होती हैं, तभी तो प्रकृति के बीच में आनंददायक शान्ति का अनुभव होता है। वास्तव में, देव-मूर्तियाँ घर के सीमित स्थान के लिए निर्मित किए गए, विराट प्रकृति के सूक्ष्म रूप ही हैं। शास्त्रों के वचनों से व वैज्ञानिक दर्शन “शरीरविज्ञान दर्शन” से भी यह प्रमाणित ही है कि जो कुछ भी इस बाह्य व विराट प्रकृति में है, वह सभी कुछ इस मानव शरीर के अन्दर भी वैसा ही है।

अब बात आती है, धर्म-परिवर्तन के बारे में। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तो अपने धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि धर्म परिवर्तन करने से अपने कुलधर्म से जुड़ी हुई चिर-परिचित लोगों व वस्तुओं की यादें गायब हो जाती हैं, और कुण्डलिनी-विकास का अच्छा अवसर हाथ से छूट जाता है। शास्त्रों में भी आता है, श्रेयो स्वधर्मो विगुणोपि, परधर्मो भयावहः। अर्थात, अपना धर्म कम गुणों वाला होने पर भी कल्याणकारी है, दूसरों का धर्म तो भयावह है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कट्टर धार्मिक होना चाहिए, या दूसरे धर्मों को नहीं मानना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि सभी मानवीय धर्मों को मानते हुए, अपने धर्म को ही मुख्य बना कर रखना चाहिए। यह ध्यान में रहना चाहिए कि यह बात योग पर लागू नहीं होती, क्योंकि योग कोई विशेष धर्म नहीं है। योग तो एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो सभी धर्मों का एक अभिन्न अंग है।

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Please click on this link to view this post in English (Interrelation between Kundalini and idol worship)

आज के समय में ब्लॉग की प्रासंगिकता – Blog’s relevance in today’s time

आज के समय में ब्लॉग की प्रासंगिकता (please browse down or click here to view this post in English)

मसूद अजहर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पेश होने के एक दिन पहले ही न्यूयार्क टाईम्स में छपे एक लेख ने अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के एजेंडे को फिर से उजागर कर दिया है। इसमें पुलवामा घटना पर एक विचित्र व तथ्यहीन लेख उजागर हुआ है। उस लेख के शीर्ष में ही उस हमले को आतंकवादी हमला नहीं, अपितु एक विस्फोट बताया गया है। विस्फोट तो दीपावली व क्रिसमस को पटाखों में किए जाते हैं। उनसे जान-माल की कोई हानि नहीं होती। परन्तु पुलवामा के आतंकवादी हमले में तो 40 से अधिक सैनिक शहीद हुए थे।

अंतर्राष्ट्रीय व प्रख्यात मीडिया हाऊसों द्वारा पूर्वाग्रहों से भरे हुए एजेंडे चलाना कोई नई बात नहीं है। ख़बरों को तोड़-मरोड़ कर अपने पक्ष में किया जाता है। मुझे क्वोरा टॉप राईटर-2018 का सम्मान मिला था। उसके साथ ही मुझे एक वर्ष के लिए न्यूयार्क टाईम्स का निःशुल्क सबसक्रिप्शन दिया गया था। मुझे उस पत्रिका की सामग्री जरा भी पसंद नहीं आई। मुझे उसकी भाषा भी विचित्र, बनावटी, बेमतलब के धूम-धड़ाके वाली, अहंकार से भरी हुई, व एजेंडे से भरी हुई लगी। मैंने उसे कुछ दिनों बाद ही अनसबसक्राईब कर दिया। मैंने अपने दोस्तों के सामने इच्छा जाहिर की कि उससे अच्छा क्वोरा वाले मुझे भागवत पुराण (एक धार्मिक ग्रन्थ) दे देते। न्यूयार्क टाईम्स को विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका माना जाता है। उसे बहुत से अवार्ड भी मिले हैं।

पहले भी इस पत्रिका में एक भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिक को एक गाय के साथ अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष-समुदाय के कक्ष में प्रविष्ट होते हुए दिखाया गया था। एक बार एक भारतीय रेलगाड़ी को हाथी के द्वारा खींचते हुए दिखाया गया था। भारत को सपेरों व जादूगरों का देश कहा जाता है। इसे योगियों का देश भी तो कहा जा सकता है। नकारात्मक ही क्यों? भारत के अपने अन्दर ही बहुत से नकारात्मक लोग बैठे हैं। उन्हीं की देखा-देखी में विदेशी मीडिया भी वैसा ही रुख अपनाने लगता है। हंसते हुए व जोक में तो कुछ भी कहा जा सकता है। परन्तु जोक का अलग ही तरीका होता है। उससे मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बढ़ते हैं, घटते नहीं। उससे हीनता की भावना नहीं उत्पन्न होती, अपितु गर्व के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। यदि नकारात्मक पक्ष ही बार-बार दोहराया जाता रहे, तब तो उसे जोक नहीं कह सकते।

इसके विपरीत, ब्लॉग में कोई एजेंडा नहीं होता। इसमें एक व्यक्तिगत राय होती है। अधिकाँश ब्लोगर व्यावसायिक भी नहीं होते। इसलिए वे अपने प्रचार की अंधी दौड़ में शामिल नहीं होते। पत्रिकाएँ तो अपने प्रचार के लिए कुछ भी कुत्सित हथकंडा अपना सकती हैं। ये जनता के मन को दूषित कर सकती हैं। लोगों का इन पर अँधा विश्वास होता है। वे न चाहकर भी उन पर पूरा यकीन कर लेते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि पत्रिकाओं को वे पैसा चुका कर खरीदते हैं। परन्तु ब्लॉग को कोई भी व्यक्ति ब्लोगर की निजी राय बताकर ठुकरा भी सकता है। साथ में, वह कमेन्ट में उसका तर्कों व प्रमाणों के साथ खंडन भी कर सकता है। इससे सभी का ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। पत्रिका के लेख को तो ना चाहकर भी स्वीकार करना ही पड़ता है, क्योंकि खंडन करने के लिए उसमें अवसर ही नहीं दिया गया होता है। ये तो इस प्रकार की बात हुई कि “आप हमारी बात मानो या न मानो, पर आपको माननी ही पड़ेगी”। साथ में, ब्लॉग ओनलाईन होता है, और उसे कभी भी एडिट या दुरस्त किया जा सकता है। इसके विपरीत, लाखों की संख्या में एकसाथ छपने वाली पत्रिकाओं के कारण, उन्हें दुरस्त करने का मौका ही नहीं मिलता। वे एकदम से लाखों ग्राहकों तक पहुँच जाती हैं। जब तक उनकी गलती को ठीक करते हुए हल्का सा जवाब बनाया जाता है, तब तक वे पाठकों पर अपना असर दिखा गई होती हैं। ओनलाईन मैगजीन में भी यही दिक्कत होती है।

उपरोक्त पुलवामा-लेख को लिखने वाले 7 लोग हैं। उनमें से 4 लोग तो भारत के ही हैं। उसमें हमलावर आतंकवादियों को नौजवान आत्मघाती कहा गया है। वह लेख आतंकवाद के चेहरे को जवानी के पीछे छुपाने की कोशिश कर रहा है। उन्हें ऐसे पक्षपाती मीडिया के द्वारा मिलिटेंट कहा जाता है, आतंकवादी नहीं। साथ में, बिना प्रमाण के यह कहा गया कि बालाकोट में भारतीय सेना का अभियान संभवतः असफल रहा, और केवल उससे भारतीय सेना को ही नुक्सान हुआ। तथ्य यह है कि पाकिस्तान ने बालाकोट में किसी को जांच ही नहीं करने दी। वहीं पर इटली की एक पत्रकार ने गुप्त सूत्रों के हवाले से बताया कि वहां से कम से कम 30-35 लाशों के बाहर निकलने की पक्की सूचना है। उनमें कई तो मुख्य आतंकवादी भी थे। साथ में, न्यूयार्क टाईम्स का वह लेख कहता है कि मोदी जी ने वह अभियान चुनावी-सफलता के लिए किया। वास्तविकता इसके विपरीत है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने मोदी को चुनाव में हराने के लिए ही पुलवामा में धार्मिक रंग से रंग हुआ आतंकवादी हमला करवाया। मोदी ने तो केवल जवाबी कार्यवाही ही की। मैं यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं किसी राजनीतिक दल विशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। राजनीति में मेरी अधिक दिलचस्पी नहीं है। मैं केवल देश व सच्चाई का पक्ष ले रहा हूँ।

भारत के पास इसके सबूत हैं कि विंग कमांडर अभिनन्दन ने पाकिस्तान का f-16 लड़ाकू विमान गिराया, तब बहुत सी देशी-विदेशी पत्रिकाएँ यह दावा क्यों कर रही हैं कि f-16 को नहीं गिराया गया। यह हथियारों की अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में दलाल मीडिया की तरफ से दुष्प्रचार नहीं, तो क्या है? पाकिस्तान तो इस मामले में झूठ ही बोलेगा, क्योंकि उसने अमरीका के साथ की हुई संधि को तोड़ा है। दुनिया उसकी बात पर कैसे विश्वास कर सकती है? झूठ, हिंसा, षडयंत्र व दुष्प्रचार फैलाने के मामले में तो पाकिस्तान को वैसे भी महारत हासिल है।

इस लेख के छपने के एक दिन बाद ही संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर के खिलाफ लाया गया प्रस्ताव गिर गया। इसका अर्थ है कि दुनिया के बड़े देश आपस में पहले से ही मिले हुए थे। उन्होंने पहले लेख-पत्रिकाओं के माध्यम से आतंकवादियों के पक्ष में माहौल बनाया, जिससे मसूद अजहर को बचाने में अतिरिक्त सहयोग मिल गया। दुनिया के देश आतंकवाद के खिलाफ केवल जुबानी जंग ही लड़ते हैं। असली जंग तो भारत को खुद ही लड़नी होगी। और हाँ, दुर्भाग्य से न्यूजीलेंड में जो ताजा आतंकवादी हमला हुआ, उसे क्या बुद्धिजीवी लोग “भटके हुए लोगों द्वारा धांय-धांय” कह पाएंगे? आखिर आतंकवाद पर दोहरा मापदंड क्यों? यहां तक कि यह प्रतिशोध का मामला भी है। विश्व को यह देखना चाहिए कि आतंकवाद की शुरुआत किससे होती है, और फिर पहले उसे सुधारे।

हाल यह है कि दुर्भाग्य से कुछ दिनों पहले अमरीकी कंपनी बोईंग द्वारा निर्मित इथोपिया एयरलाईन्स का विमान क्रेश हुआ। उसमें 150 से अधिक लोग मारे गए। यह हादसा उसी सेंसर की खराबी की वजह से बताया जा रहा है, जिससे लगभग छः महीने पहले भी एक हादसा हुआ था। यदि समय रहते उसमें सुधार किया गया होता, तो इतने लोगों की जान बच जाती। लगता नहीं है कि न्यूयॉर्क टाईम्स ने इस सम्बन्ध में कोई कड़ा लेख लिखा होगा।

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Blog’s relevance in today’s time

A day before the resolution was to be proposed in the United Nations against Masood Azhar, an article in New York Times has rekindled the international media agenda. In this, a strange and fact less article has been exposed on the Pulwama incident. At the top of that article, the attack was not described as a terrorist attack, but an explosion. Deepawali and Christmas are celebrated with the explosions through the firecrackers. These do not have any harm to life and property. However, in Pulwama’s terrorist attack, more than 40 soldiers became martyred.

Running agendas filled with prejudices by international and eminent media houses is not new. The news is broken up in its favour. I got the honour of Quora Top writer-2018. Along with that, I was given a free subscription of New York Times for one year. I did not like the contents of that magazine. It appeared to me as filled with eccentricity, useless displaying, arrogance, and agenda. I unsubscribed it after a few days. I expressed my desire to my friends that it had been better if the Quora would give me a Bhagwat Puran (a religious text). The New York Times is considered as the world’s premier magazine. It has also received many awards.

Earlier in this magazine, an Indian space scientist was shown entering the room of the International Space-Community with a cow. Once an Indian train was shown as being dragged by an elephant. India is called the country of snake charmers and magicians. It can also be called a country of Yogis. Why negative? Many negative people are sitting within India itself. Seeing them, foreign media seems to adopt the same approach. Laughing and joke can be anything. However, there is a different way of Joke. These grow friendly relationships, do not decrease. It does not generate a sense of inferiority, but helps to be motivated to move forward with self-pride. If the negative side is repeated repeatedly, then it cannot be called as a Joke.

Conversely, the blog does not have any agenda. There is a personal opinion in it. Most of the bloggers are not professionals. Therefore, they do not participate in the blind race of their campaign. Magazines can do anything for the sake of their publicity. They can pollute the minds of the people. People have a blind faith on them. They do not escape from believing these completely. However, any person can even turn the blog down saying it as personal opinion of blogger. Together, a reader can also contradict a blog article with his comment. With this, knowledge of everyone increases progressively. Blog-articles can be edited or corrected at any time unlike the mass-published magazines. The article of the magazine has to be acknowledged even by one who does not want it, because there is no opportunity given to him for its refutation. Additionally, he has purchased it. It is such a thing that “you do not believe or think it, but you will have to believe it”. Magazines are published in millions of copies that are read by readers almost instantly. When a low voiced answer regarding its mistake arrives, till then it has imprinted its effect on the readers.

Seven people wrote the above pulwama-article. 4 of them are from India. In it, the attacking terrorists have been called as the youth suicide-killer. This article is trying to hide the face of terrorism behind youth. They are called militants by such biased media, not terrorists. Together, it was said without proof that the Indian Army’s campaign in Balakot could have been unsuccessful, and only the Indian Army itself was damaged. The fact is that Pakistan did not allow anyone to check in Balakot. On the other hand, a journalist from Italy told from the secret sources that at least 30-35 dead bodies have been confirmed from there. Many of them were also main terrorists. Together, that article from the New York Times says that Modi ji did that campaign for electoral success. The reality is the opposite. It seems that Pakistan used religion-oriented terrorists to attack people in Pulwama to defeat Modi in the elections. Modi has only done counter-response. I want to make it clear that I am not taking any side of any political party. I am not interested in politics. I am only taking the side of the country and the truth.

India has evidence that Wing Commander Abhinandan dropped Pakistan’s F-16 fighter plane, then why do so many native and foreign magazines claim that the f-16 has not been dropped. If this is not propaganda of the broker media in favour of international companies of arms, then what is this? Pakistan will lie in this case because it has broken the treaty with the United States. How can the world believe its point? In matters of spread of lies, violence, conspiracy, propaganda, and ill advances, Pakistan is a master already.

A day after the publication of this article, the proposal brought against the Masood Azhar in the United States fell. This means that the big countries of the world have hands in glove, and they had already met among themselves. At first, they created an atmosphere in favor of the terrorists through the articles-journals, which provided additional support in saving Masood Azhar. The countries of the world fight only the verbal war against the terrorism. The real battle must be fought by India itself. And yes, unfortunately, regarding the latest condemterrorist attack in New Zealand, will the intellectuals be able to say, “Fire play by the strayed people”? After all, why double standards on terrorism? Even that is the case of retaliation. World should see what initiates the terrorism, and then correct that first.

It is a matter of unfortunate time that the crash of the Ethiopia Airlines’ plane that was manufactured by American company Boing occurred a few days ago. More than 150 people died in that. This incidence is being reported because of the same sensor’s malfunction, which resulted in an accident almost six months earlier. If there had been improvement in time, then the lives of so many people would be saved. It does not seem to be that the New York Times wrote a hard article about this.

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अभिनन्दन को अभिनन्दन- Abhinandan (Congratulations) to Abhinandan

अभिनन्दन को अभिनन्दन (please browse down or click here to view this post in English)

भारत-पाकिस्तान की निगरानी के लिए अंतर्राष्ट्रीय (संयुक्त राष्ट्रसंघ) पर्यवेक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है। यदि हुई है, तो वह नाकाफी है, या पक्षपातपूर्ण है। मैं यह बात बता देना चाहता हूँ कि यह बहुत ही ऊंचे स्तर की बात है, जिसकी सम्पूर्ण कूटनीति को समझना मेरे बस की बात नहीं है। फिर भी मैं अपने विचार प्रकट कर रहा हूँ, यह जानने के लिए कि सब कुछ जानते हुए भी संयुक्त राष्ट्रसंघ मूकदर्शक क्यों बना रहता है। तभी तो पाकिस्तान नित-नए झूठ के रंग-बिरंगे बादल उड़ाता रहता है, दुनिया भर में। वह ऐसा हमेशा से ही करता आया है। वह रोज सीजफायर का उल्लंघन करता है, और हमारे रिहायशी इलाकों को अपना निशाना बनाता रहता है, जिसे दुनिया या संयुक्त राष्ट्रसंघ देख ही नहीं पाता। भारत केवल आतंकी शिविरों को ही अपना निशाना बनाता है, सैनिक व नागरिक क्षेत्रों को नहीं। पाकिस्तान केवल सैनिक व नागरिक क्षेत्रों पर ही हमले करता है। और करेगा भी कहाँ, क्योंकि हमारे देश में आतंकवादी हैं ही नहीं।

एक बात जरूर है कि शिमला समझौते के बाद अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। पर यह सवाल भी सच है कि पाकिस्तान ने समझौतों का पालन किया ही कब? जो समझौतों को माने, वह पाकिस्तान ही कैसा? भारत-पाक सीमा पर अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक रखने का पाक का सुझाव भी साजिश से भरा हुआ लगता है। आजकल के अटैक हाईटेक होते हैं। उन पर सड़क पर दौड़ने वाली यूएनओ की गाड़ी कैसे नजर रख पाएगी। एलओसी बहुत बड़ी है। उस पर एकसाथ नजर रखना आसान काम नहीं है। पाकिस्तान को तो वैसे भी झूठ, दुष्प्रचार व साजिश को रचने में महारत हासिल है। ऐसा वह अनगिनत बार कर चुका है। अतः यह कैसे माना जा सकता है कि वह यूएनओ की टीम का ब्रेनवाश नहीं कर देगा? वह तो उन्हें आतंकवादियों का डर दिखा कर उनसे झूठी रिपोर्टें भी बनवा सकता है। जान बचाने के लिए आदमी क्या काम नहीं कर सकता? आजकल तो आकाशीय उपग्रहों का युग है। एलओसी पर उपग्रहों से क्यों नजर नहीं रखी जाती। उसके लिए तो किसी की अनुमति की आवश्यकता भी नहीं है। उस पर खर्चा भी कम आएगा, और त्रुटि की संभावना भी नहीं होगी। आजकल के उपग्रह तो छत के ऊपर लगी पानी की टंकी को भी स्पष्ट दिखा सकते हैं। क्या वे एलओसी का निरीक्षण नहीं कर पाएंगे?

विकिलीक ने खुलासा किया है कि अमरीका को बालाकोट के आतंकवादी-शिविरों के बारे में बहुत पहले से पता था। जब उसे पता था, तब उसने उनको अपना लक्ष्य क्यों नहीं बनाया? उसने भारत को भी उस बारे में सतर्क करते हुए, उसकी सहायता भी क्यों नहीं की। यह एक विचारणीय विषय है। डेविड हेडली जो मुंबई हमले की योजना का हिस्सा था, उसका पता अमरीका को पहले से ही था, पर उसने बताया नहीं। यह सबको पता है कि अमरीका ने रशिया के खिलाफ पाकिस्तान के आतंकवाद को पोषित भी किया था। जब वर्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ, तब अमरीका को समझ आई। देर से आए, दुरस्त आए। जब जागो, तभी सवेरा। परन्तु आतंकवाद के विरुद्ध अमरीका के प्रयास नाकाफी प्रतीत होते हैं। अमरीका ने बच्चे की तरह पाकिस्तान को पाल-पोस कर बड़ा किया है। उससे आतंकवाद भी खुद ही फलता-फूलता गया। अमरीका जैसे चतुर देश की आंख में कोई धूल नहीं झोंक सकता। पाकिस्तान द्वारा उसकी आँखों में धूल झोंकने की बात करना तो एक बहाना मात्र है, सच्चाई कुछ और ही लगती है। हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले के लिए एफ-16 विमान का प्रयोग किया, जिसे परमवीर विंग कमांडर अभिनन्दन ने मार गिराया। पाकिस्तान ने ऐसा करके अमेरिका के साथ की हुई संधि को तोड़ा है। लगता नहीं है कि अमरीका उसके खिलाफ कोई सख्त एक्शन लेगा। यह भी हो सकता है कि यदि अमरीका भारत का खुल कर साथ दे, तो चीन पाकिस्तान का खुल कर साथ देगा। गुपचुप तरीके से तो वह अभी भी दे रहा है। चीन को यह समझ लेना चाहिए कि बुराई का साथ देकर उसका कभी भी भला नहीं हो सकता। प्रकृति बहुत बलवान है, और वह बड़ों-२ को झुका देती है। अमरीका कहता है कि भारतीय सेना को अफगानिस्तान में नियुक्त करना चाहिए। यहाँ हाल यह है कि भारत के 40 से अधिक सैनिक पाकिस्तान ने मार दिए, और अमरीका ने उस पर एक भी हवाई हमला नहीं किया। यदि वह ऐसा करता, तब हम मानते कि भारतीय-सैनिकों का वास्तव में वह हित चाहता है, और अफगानिस्तान में भी वह उन्हें सुरक्षित रहने में मदद करेगा। जब अपने देश भारत में ही भारतीय-सैनिक सुरक्षित नहीं हैं, तब अफगानिस्तान में वे कैसे सुरक्षित रह सकते हैं। वहां पर तो आतंकवादियों का खुला बोलबाला है। अगर पाकिस्तान के पास परमाणु बम है, तो भारत के पास भी है। भारत के पास तो वह हवा, जल व स्थल, तीनों जगह पर तैनात है, और अब तो वे परमाणु-पनडुब्बी पर भी तैनात कर दिए गए हैं। चीन पाकिस्तान की मदद केवल अपने स्वार्थपूर्ण हितों के लिए कर रहा है। वह विश्व के हितों को अनदेखा कर रहा है।

कश्मीर से धारा 370 व धारा 35-ए को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे आतंकवाद का पोषण करती हैं। सिन्धु जल समझौते को भी रद्द कर देना चाहिए। पाकिस्तान भी कोई समझौता नहीं मानता। केवल अपने हिस्से का पानी रोक देने से ही कुछ विशेष नहीं होने वाला है। यदि इसके बदले में चीन भारत का पानी रोकता है, तो उससे विशेष फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा देश है। परन्तु पाकिस्तान तो लगभग प्यासा ही हो जाएगा। पाकिस्तान के साथ कोई भी मैच नहीं खेलना चाहिए। क्रिकेट विश्वकप से भी पाकिस्तान का बहिष्कार करवा देना चाहिए, क्योंकि वहां पर भारत की सबसे अधिक चलती है, और सबसे अधिक कमाई भी भारत से ही होती है। कश्मीर को सेना के हवाले कर देना चाहिए। देशद्रोहियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान हो। उनके लिए व आतंकवादियों के लिए विशेष फास्ट ट्रेक कोर्ट बनाने चाहिए, ताकि कांधार-अपहरण जैसी घटना दुबारा न घटे। यदि मसूद अजहर को तुरंत फांसी दे दी गई होती, तो उसके चेले-चांटे उसे छुड़वाने के लिए हमारे विमान का अपहरण न करते। यह नियम है कि जख्म का इलाज करते समय उसके आसपास के स्वस्थ भाग भी कुछ न कुछ दुष्प्रभावित हो ही जाते हैं। सेना उच्च कोटि के हेलमेट व बुलेटप्रूफ जेकेट पहन कर कश्मीर में घर-2 की तलाशी जारी रखे। भारत ने पाकिस्तान के आतंकी-शिविरों को ध्वस्त करके दुनिया के भले के लिए महान काम किया है। इसलिए बदले में दुनिया के अन्य देशों को भारत के लिए अत्याधुनिक हथियार व सैनिक मुफ्त में मुहैया करवा देने चाहिए, ताकि भारत यह कार्यवाही उत्तम तरीके से जारी रख सके।

देशप्रेम की गहराई में जाने के लिए, इस लिंक पर उपलब्ध पुस्तक को अवश्य पढ़ें

अंत में, वीर अभिनन्दन को अभिनन्दन।

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Abhinandan (Congratulations) to Abhinandan

International (United Nations) supervisors have not been appointed to oversee India-Pakistan. If it has happened, then it is inadequate, or biased. I want to tell you that it is a very high-level thing to talk about, whose whole diplomacy is not under my understanding. Still I am expressing my views, to know why the United Nations remains a mute spectator even knowing everything. Pakistan continues to flutter the colorful clouds of ever new lies around the world. It has always been doing this always. It violates the ceasefire every day, and continues to target our habitats, which the world or the United Nations cannot see. India only targets militant camps, not soldiers and civilian areas. Pakistan attacks only on soldiers and civilian areas. And where will it target, because there are not terrorists in our country.

One thing is certain that the question of international observer does not arise after the Shimla Agreement. However, this question is also true that when Pakistan has followed agreements? Who follows agreements, how can that be a Pakistan? The suggestion of Pakistan to keep an international observer on the Indo-Pak border seems to be full of conspiracy. Nowadays, attacks are high-tech. How to track those from a road-laden UNO car? LOC is too big. Keeping an eye on it together is not easy. Pakistan is well mastered to create lies, misrepresentation, and conspiracy anyway. He has done so many times. So how can it be assumed that it will not brainwash the UNO team? He could also make fake reports through them by showing them the fear of terrorists. What can a man not do to save his life? Nowadays, there is an era of celestial satellites. Why are not satellites put to observe the Loc? There is no need for anyone’s permission for that. There will be less expenditure on that, and there will be no possibility of error. Today’s satellites can also show the water tank on top of the roof clearly. Will not they be able to inspect the Loc?

Wiki leaks have disclosed that America knew about Balakot’s terrorist camps long ago. When it knew this, then why did not it make its goal to destroy those? It also did not warn India about that, leave alone the help. This is a considerable topic. David Headley, who was part of the Mumbai attacks plan, was already in the US, but it did not disclose it. It is known to all that America also funded Pakistan’s terrorism against Russia. When the World Trade Center was attacked, then the US came to understand. When understanding comes late, it comes better. When you wake up, then only the morning is there. However, America’s efforts against terrorism seem insignificant. America has raised Pakistan like a naughty child. From it, terrorism itself flourished. There is no dust in the eye of a clever country like America. Talking of dust in its eyes through Pakistan is only an excuse; the truth seems to be something else. Recently Pakistan used the F-16 aircraft to attack Indian military installations, which Paramveer Wing Commander Abhinandan shot down. Pakistan has broken treaty of its use with America. It does not seem that the US will take some tough action against it. It may also be that if the United States opens his heart towards India fully, then China will open its doors to Pakistan. In secretly, it is still supporting Pakistan. China should understand that it could never be good by supporting evil. Nature is very strong, and it bends even the big gamers. The US says that the Indian army should be appointed in Afghanistan. The situation here is that more than 40 soldiers of India were killed by Pakistan, and the United States did not have an air strike on it. If it had done that, then we would have believed that Indian soldiers really under its security, and even in Afghanistan, it would help them stay safe. When Indian soldiers are not safe in their own country, then how can they stay safe in Afghanistan? There the openness of the terrorists is over and above anywhere else. If Pakistan has nuclear bombs, then India also has it. In India, it is stationed at air, water and space, all three places, and now these have been deployed on nuclear submarines also. China is helping Pakistan only for its selfish interests. It is ignoring the interests of the world.

Section 370 and Section 35-A from Kashmir should be removed immediately because these nurture terrorism. The Sindhu Water Treaty should also be canceled. Pakistan also does not accept any agreement. Only by stopping the water of our own part is nothing special. If China inhibits the water of India in return, it will not make any difference because India is a big country. However, Pakistan will be almost thirsty. No mach should be played with Pakistan. The Cricket World Cup should also boycott Pakistan, because there is India’s largest contribution, and the highest earning is from India only. Kashmir should be handed over to the army. Provision of capital punishment for traitors should be there. For them and for the terrorists, special fast track courts should be created so that incident like Kandahar-abduction does not happen again. If Masud Azhar were hanged immediately, then his disciples would not kidnap our plane to rescue him. It is a rule that while treating the wound, healthy areas around it also get some side effects. Army continues the search of every home in Kashmir by wearing high quality helmets and bulletproof jackets. India has done great work for the good of the world by destroying Pakistan’s terrorist camps. Therefore, in return, other countries of the world should provide state-of-the-art weapons and soldiers for free, so that India can continue this action in a best way.

To go deep into patriotism, be sure to read the book (Hindi) available at the link below

Finally, congratulations to Veer Abhinandan.

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