राज हठ

न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

क्यों क्या पूछे जनता व्यर्थ,
राजा का बस एक ही रथ।
राज-अहं ही जीत गया,
भाड़ में जनता-समूह गया।

माने जो पद उसे मिले
जो मुकरे उसपे चले लट्ठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

जनता करे कहाए अधर्म
राजा करे तो महान धर्म।
उलटे काम भी सीधे बनें,
राज-हठ में नियम तनें।
झूठ कहे तो नीति बने,
सच कहे तो गीति तने।

लुच्चों के संग कैसा मेल
कैसा गठजोड़ कैसा गठमठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

लोकतंत्र का नाम धरे,
राज हठ ही काम करे।
जन की इच्छा जाए हार,
ताज कहे तो सब स्वीकार।

नाकाम जमावड़ा
नाकाम इकट्ठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

Transliterated version

raaj hath

Na mandir, na math,
Sabse upar raaj hath.

Kyon kya poochhe janta vyarth,
Raja ka bas ek hi rath.
Raaj-aham hi jeet gaya,
Bhaad mein janta-samooh gaya.

Maane jo pad use mile
Mukre uspe chale latth.
Na mandir, na math,
Sabse upar raaj hath.

Janta kare adharm kahaye,
Raja kare to dharm kahaye.
Ulte kaam bhi seedhe banen,
Raaj-hath mein niyam tanen.
Jhooth kahe to neeti bane,
Sach kahe to geeti tane.

Luchchon ke sang kaisa mel
Kaisa gathjod kaisa gathmath.
Na mandir, na math,
Sabse upar raaj hath.

Loktantra ka naam dhare,
Raaj hath hi kaam kare.
Jan ki ichchha jaaye haar,
Taaj kahe to sab sweekaar.

Naakaam jamaavda,
Naakaam ikatth.
Na mandir, na math,
Sabse upar raaj hath.

तुम्हरो भजन राम को पावै

तुम्हरो भजन राम को पावै।
वानर की गति, मनुष्य का ध्यान,
दोनों के संग बने हनुमान।
न केवल वानर, न केवल नर,
दोनों मिलकर हुए एक स्वर।
डाली से डाली, वन से वन,
चलता रहता उसका तन।
टिके रहना रीत नहीं, पर
गति में भी कोई प्रीत नहीं।
फल मिला तो फल ही खाया,
पत्ता मिला तो पत्ता पाया।
कच्चा या फल पका हुआ,
भेद न देखा, काम हुआ।
गले में डाले स्वर्णहार,
क्षण भर पहने वह श्रृंगार।
फिर सहज ही उसको छोड़ दिया,
मन भीतर जैसे मोड़ लिया।
एक डाल छूटी, दूजी थामी,
किसी एक डाल की जगह न मानी।
जितना मिला, उतना ही लिया,
पकड़ा नहीं, आगे हो लिया।
दृष्टि न बांधी एक दिशा में,
देखा जग को हर दिशा में।
क्षण-क्षण बदली उसकी राह,
फिर भी न कहीं जमाई चाह।
यही गति जब मानव धारे,
उसमें जागें विवेक हमारे।
चलना केवल भटकना न हो,
कर्म हो, फिर भी बंधना न हो।
मन जब वस्तुओं में न फंसे,
इच्छा मन को बार-बार न कसे,
जब हाथ करे, पर मन न धरे,
तब अज्ञान को भीतर शक्ति हरे।
बिखरी शक्ति भीतर आए,
ध्यान का दीपक स्वयं जलाए।
जिस छवि को पहले बुलाते थे,
वह मन में स्वयं ही ठहर जाए।
बैठो तो साथ, चलो तो साथ,
जागो तो भी रहे वही बात।
ध्यान न केवल आसन में हो,
जीवन के हर क्षण में हो।
धीरे-धीरे चंचलता थमे,
मन अपने ही केंद्र में जमे।
बाहर गति काम करे,
भीतर चेतना विश्राम धरे।
यहीं समाधि की राह खुलती,
यहीं मन की थकान है ढलती।
जहां न खोज, न कोई काम,
वहीं विश्राम का नाम है राम।
राम केवल नाम नहीं,
भीतर एक धाम कहीं।
जहां चेतना अपने में ठहरे,
बाहर से मानो गूंगे बहरे।
इसीलिए यह वचन महान,
जिसमें छिपा साधना-विज्ञान।
“तुम्हरो भजन राम को पावै,”
हनुमत से राम बन जावै।।
हनुमान गति, हनुमान कर्म,
समर्पण का हनुमान धर्म।
हनुमान शक्ति, पर उसके पार,
कर्म हो पर बिन अहंकार।
यह बात है केवल पढ़ी नहीं,
सोच को लेकर गढ़ी नहीं।
दादागुरु की संगति में रहकर,
वर्षों देखा उनको जीकर।
उनमें गति थी, पकड़ नहीं,
कर्म था, भीतर जकड़ नहीं।
सादगी थी, और गहरा ध्यान,
जीवन में जागा वही विधान।
चाहकर नहीं मैंने अपनाया,
संग ने धीरे-धीरे सिखाया।
जो गुण उनमें सहज समाए,
अनजाने भीतर उतरते जाए।
कर्मयोग ने राह दिखाई,
अद्वैत दृष्टि ने गांठ खुलवाई।
गतिशीलता बनी साधना,
हनुमान की रामाराधना।
सात्त्विक जीवन, सरल विचार,
धीरे-धीरे हल्का भार।
ऊर्जा बाहर कम बिखरी, तो
ध्यान में ही भीतर निखरी।
हनुमान तब अर्थ में आए,
देव नहीं, ये पथ दिखलाए।
वानर ने जो बाहर दिखाई,
शक्ति वही नर-भीतर आई।
वानर पकड़ता, छोड़ देता,
मनुष्य भी बंधन तोड़ देता।
वानर चलता, रुकता नहीं,
मानव भी पहुंचे कहीं से कहीं।
वानर के गुण स्वयं साधना नहीं,
मानव-मन बिन वे अराधना नहीं।
प्रकृति ने जो बाहर दिखाया,
मानव ने उसे भीतर उठाया।
गति से कर्म, कर्म से ध्यान,
ध्यान से होए आत्मज्ञान,
जब सब खोजें शांत हो जाएं,
तब भीतर राम खुद दिख जाएँ।
इसलिए हनुमान से राम तक
अनेक नहीं, एक ही मर्म है।
एक छोर पर जागा कर्म,
दूसरे छोर पर शांत धर्म है।
हनुमान हैं चलती शक्ति,
राम हैं उस शक्ति की मुक्ति।
हनुमत हैं जागृत प्राण,
राम उनका परित्राण।
इसलिए केवल पूजा मत करना,
उनकी गति को जीवन में धरना।
कर्म करो, पर भटको नहीं,
जगत में रहो, पर अटको नहीं।
ऊर्जा को मत व्यर्थ बहाना,
उसे ध्यान में भीतर लाना।
मन को धीरे हल्का करना,
राम को उसके कंधे पे धरना।
तब शायद भेद खुल जाए,
खुद ही कोई गुनगुनाए—
“तुम्हरो भजन राम को पावै,”
हनुमान जियो, राम मिल जावै।
वानर की गति, मनुष्य का ध्यान,
दोनों के संग बने हनुमान।
उससे मन राम में थमे,
जीवन अपने घर में जमे।

परमात्मा तो पता नहीं पर,कण-कण रहता तू है जरूर

काफी दिनों से मौन था कविता-मन, आज फिर मन बोला — और कविता बन गई।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।

मूलकणों ने सबकुछ देखा जो,
कुछ देख रहा है तू।
काम भी सारे करते हैं वो,
जो कुछ भी करता है तू।।
काम, क्रोध और लोभ, मोह,
मत्सर के जैसे सारे भाव।
सारे मूल कणों में रहते,
जैसे दिखलाता है तू।।
वो तो भवबंधन से दूर,
तुझको इसका क्यों सरूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।

मूल कणों का वंशज है तू,
वे ही ब्रह्मा-प्रजापति।
उनके बिना न जन्म हो तेरा,
न ही कोई कर्म-गति।।
वे ही तेरे कर्ता-धर्ता,
वे ही हैं पालनहारी।
वे ही हैं शरणागत-वत्सल,
रक्षक, स्वामी, और पति।।
अहंकार बिल्कुल न उनमें,
पर तुझको किसका गरूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।

सृष्टि के आदि में बनते,
परम पिता परमात्मा से।
परमात्मा तो दिख नहीं सकते।
वे ही निकटतम आत्मा से।।
बना के मूर्ति पूजो या फिर,
ऐसे ही चिंतन करो।
सबकुछ कर भी अछूते रहते,
तुम भी ऐसा जतन करो।।
झांका करो उन्हें भी नित पल,
रहो न दुनिया में मगरूर।।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।

योग से ऐसा चिंतन होता,
सुलभ किसी से छिपा नहीं।
कर्म ही है आधार योग का,
वाक्य कहां ये लिपा नहीं।।
क्वांटम दर्शन निर्मित कर लो,
अपने या जग हित खातिर।
चमत्कार देखो फिर कैसे,
हार के मन झुकता शातिर।।
मेरा दर्शन न सही पर,
अपना तो गढ़ लो हजूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।।

डाक्टर हो या हो इंजिनीयर,
नियम समान ही रहते हैं।
अच्छे चिंतन बिना अधूरे,
काम हमेशा रहते हैं।।
कर्म से स्वर्ग तो मिल सकता है,
मुक्ति बिना न चिंतन के।।
यूनिवर्सटी शिक्षा दे सकती।
ज्ञान बिना न संतन के।।
उसके आगे सब समान हैं,
गडकरी हो या हो थरूर।
परमात्मा तो पता नहीं पर,
कण-कण रहता तू है जरूर।

🌸 मेरी नई कविता प्रकाशित 🌸

मुझे खुशी है कि मेरी कविता

“परमात्मा तो पता नहीं, पर कण-कण रहता तू है जरूर”

एक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी साहित्यिक पत्रिका साहित्य कुञ्ज में प्रकाशित हुई है, जो मूलतः कनाडा से प्रकाशित होती है।

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बाबा बाबा कहते हैं

बाबा बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।

बाबा गर अच्छा लगता तो,
चलते उसके कदमों पर।
छोड़ के माया मोह जगत का,
पिंड अपना खुद अर्पण कर।
छोड़ के घर छूटा करता तो,
स्मृति-रोगी बाबे होते।
भांग-नशे में डूबे रहकर,
भंगड़ भी पूजित होते।
माना बुरा पकड़ना है पर,
छोड़ना भी तो बात बुरी।
क्यों न निकट में रहकर भी हम,
सबसे रखें उचित दूरी।
दोनों का संतुलित मिश्रण ही,
असली दुनिया असली त्याग।
दोनों से दोनों मिल जाते,
असली प्रेम और विराग।
जा-जा-जा-जा कहते हैं खुद,
दुनिया में आ रहते हैं।
बाबा-बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।

जगत-त्याग से शक्ति मिलती,
बात किसी से छिपी नहीं।
सिर का बोझ हटा लेने से,
राहत किसको मिली नहीं?
खाली सिर भी भार लगा जब,
पुनः बोझ को रख लेते।
बाबा बन के थक जाने पर,
पुनः गृहस्थ परख लेते।
खाली सिर की शक्ति से,
सोना या चांदी पा लेता।
बाबा कोई पूर्ण को कोई,
उसके पथ को पा लेता।
कोई भांग-चरस में रहकर,
चिलम लगाता है भर भर।
दुनिया में देखा जाता,
खाली दिमाग शैतान का घर।
स्थायी कोई स्थिति नहीं है,
दुनिया हो या मठ-मंदिर।
पुनः जगत में आना पड़ता,
खिले ना पुष्प अगर अंदर।
आईआईटी हो या आईआईएम,
नियम हमेशा रहते हैं।
बाबा-बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।

दुनिया हो या हो आनन,
चक्र हमेशा चलता है।
सबको हर जीवन-हालत में,
हर इक मौका मिलता है।
मौका चूके जो दुनिया में,
वह वन में कैसे पाए।
सुविधा में न जा पाए जो,
दुविधा में कैसे जाए।
उस तक जाना बात दूर की,
इस तक भी कैसे जाए।
शक्ति से ही होता सब कुछ,
वन में ये कैसे आए।
हारे हुऎ खिलाड़ी अक्सर,
पिच को दोषी कहते हैं।
बाबा-बाबा कहते हैं खुद,
वीआईपी बन रहते हैं।
साभार~🙏 भाव सुमन ~एक आधुनिक काव्यसुधा सरस
#Kavita, #Poetry, #ViralPoem,  #HindiKavita.

नाच

नाच नचाए ये कैसा
सब मुंह पैसा ही पैसा।

भरी दुपहरी गरमी के दिन,
ठेला लोग चलाते हैं।
किसम किसम के उद्योगों में,
अपनी देह जलाते हैं।।

कुछ जीते जी हासिल करते
कुछ इस पे मर जाते हैं।
भटकी आत्मा के जैसे वो,
कम ही शांति पाते हैं।।

अचरज-करतब क्यों ऐसा,
कहीं नहीं देखा जैसा।
नाच नचाए ये कैसा,
सब मुंह पैसा ही पैसा।।

डाकू-चोर बनाए कुछ को,
शातिर कुछ को गजब का।
कुछ से हमला युद्घ कराए,
आम-जैसा या अजब का।।

मानवता की बलि चढ़ा कर,
पूजा इसकी करते हैं।
परमेश्वर की पदवी देकर,
रह-रह इससे डरते हैं।।

क्या है नायक क्या खलनायक,
कोई न इसके जैसा।
नाच नचाए ये कैसा,
सब मुंह पैसा ही पैसा।।

पैसे से पैसा आता बिन,
पैसे ये आए कैसे।
भेड़ अकेले न रह ढूंढे,
झुंडों को अपने जैसे।।

कुछ छोटे रह जाते हैं कुछ,
सागर जैसे बन जाते।
बुद्धि जितनी ताकत जितनी,
उतने ही बढ़-चढ़ जाते।।

कुछ अपने रोगों से सबको,
रोग-युक्त कर देते हैं।
संग-अपने अपने झुंडों को,
श्वास-मुक्त कर देते हैं।।

कोई आम खिलाड़ी है न,
धावक ही ऐसा-वैसा।
नाच नचाए ये कैसा,
सब मुंह पैसा ही पैसा।।

अपनी प्राप्ति करवाने को,
धरम के काम कराता है।
टेढ़ी चाल से चलकर हरदम,
परमेश्वर तक जाता है।।

जीवन के शतरंज में इसको,
जो कोई भी जान गया।
तय है जीत उसी की हरदम,
भीषम इसको मान गया।।

न अपना न पर कोई भी,
इसका 'जैसे को तैसा'।
नाच नचाए ये कैसा,
सब मुंह पैसा ही पैसा।।

पाते कर-भोगी इनसाफ,
करदाता रह जाते हैं।
भेड़ की न सुन ऊन पे ही नित,
दावे ठोके जाते हैं।।

नाचो-गाओ मौज मनाओ,
'गूंगे का गुड़' ये कैसा।
नाच नचाए ये कैसा,
सब मुंह पैसा ही पैसा।।

वो गाने न दिखते हमको नित जिनको पक्षी गाते

इस आनंदपूर्ण कविता को कभी मैं अपने रात्रिनिद्रागत जीवंत स्वप्न में किसी मित्र के साथ गा रहा था जिसकी शुरुआती दो पंक्तियां ही मैं याद रख पाया था, जिसे मैंने उसी समय जाग कर लिख लिया था। बाद में समय मिलने पर मैंने इस कविता को पूरा भी कर लिया था।

वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।

सुंदर झील किनारे चींचीं
किसको नहीं सुहाती है।
मीठी पवन की वो लहरी जो
मन के भाव बहाती है।।
सारस बन उड़ जाए ऊपर
निखिल जगत पर छा जाए।
मन का पंछी तोड़ के बंधन
मुक्त गगन ही हो जाए।।
गीत सुरीले बोल रसीले
हृदय-धरा से न जाते।
वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।।

चींचीं नहीं समझ आती पर
फिर भी गहरी बात करे।
बोली जो खग की समझे वो
कर्ण-शहद दो-गुना भरे।।
कागभाषी~ बड़े दुनिया में
असली अच्छा कोई कहे।
बहुते तो पंछी-बोली को
मुख अपना दे वही कहे।।
असली वक्ता असली पाठी
ढूंढे नहीं धरे जाते।
वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।।

पंछी जल पर बस जाते पंक्ति
बन कर पीते-खाते।
सुबह कहीं से आते हैं फिर
घर की ओर चले जाते।।
चींचीं-चकचक सिखा-सिखा कर
क्या है डूब तो क्या है तैर।
दर्पण सबको रोज दिखा कर
क्या है बंधन क्या है सैर।।
अनपढ़ जालम न समझे जो
हा-हा कर हैं भ~गाते।।
वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।

अपने पोत बढ़ाते लोग
अपने गोत बढ़ाते लोग।
निकट से नाव लगे पर सबका
बड़ा है जगजलधि का रोग।।
हंस-मत्स्य बिन लटरं-पटरं
सरपट दौड़े पार करे।
मूरख भारी लश्कर के संग
उसमें डूबे और मरे।।
जीवनरक्षक नाव जो बनकर
मंझधारी को बचा पाते।
वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।।

कूकू-वेदपुराण छा गए
अद्भुत साउंड-रेकॉर्डर बन।
बिन बिजली बिन बाती के जो
युगों तलक करते छनछन।।
अंडे फूटे शास्त्रों के जब
गहरा हर्षोल्लास हुआ।
चींचीं बोली किलकारी से
छूमंतर जग-त्रास हुआ।।
वही लिख गए दुनिया को जो
लौट गए पाते-पाते।
वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।।

कागभुषुन्डी रुकते पल भर
ज्ञान चखा कर उड़ जाते।
भक्त जटायु राम-मिलन को
प्राण-बलि हैं दे जाते।
गरुड़ जटायु शुक-उल्लू खग
सब ज्ञानी माने जाते।
कुछ पुराण की रचना करते
कुछ सुर-वाहन बन जाते।।
कलियुग में तो बका~सुर ही
सत्कारे पूजे जाते।
वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।।

यह गाते~ वह गाते
वीणा संग आते-जाते।
दुनिया में झंकार मचा के
अजब जगत को तुर जाते।।
तुकाराम नानक रहीम हो
सब सुनने-में-ही आते।
आए थे जो धरा पे संतन
अब दिखते उड़ते जाते।।
गीत बहुत हैं लोकों में पर
पुतलों से ही-सुने जाते।
वो गाने न दिखते हमको
नित जिनको पक्षी गाते।।

Happy Guru Nanak Dev Ji Jayanti

जाएं तो आखिर जाएं कहां~ एक भावपूर्ण कविता

है कौन यहाँ, है कौन वहाँ 
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।
है नीचे भीड़ बहुत भारी पर
ऊपर मंजिल खाली है।
हैं भीड़ में लोग बहुत सारे
कुछ सच्चे हैं कुछ जाली हैं।
मंजिल ऊपर तो लगे नरक सी
न दाना न पानी है।
निचली मंजिल की भांति न
उसमें अपनी मनमानी है।
है माल बहुत भेजा जाता पर
अंधा गहरा कूप वहाँ।
न यहाँ के ही न वहाँ के रह गए
पता नहीं खो गए कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

नीचे पूरब वाले हैं पर
ऊपर पश्चिम (ही) बसता है।
ऊपर है बहुत महंगा सब कुछ
नीचे सब कुछ सस्ता है।
हैं रचे-पचे नीचे फिरते सब
ऊपर हालत खस्ता है।
बस अपनी अपनी डफली सबकी
अपना अपना बस्ता है।
हैं सारे ग्रह तारे सूने बस
धरती केवल एक जहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

अंधों का इक हाथी है हर
कोई (ही) उसका साथी है।
बहुते पकड़े हैं पूँछ तो कोई
सूंड पैर सिर-माथी है।
सब लड़ते रहते आपस में कह
मैं तो कहाँ, पर तू है कहाँ
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

है कटता समय-किराया हरपल
संचित धन ही काम करे।
जा नई कमाई कोष में केवल
खर्च से वो रहती है परे।
है कैसा अजब वपार (व्यापार) है जिसका
तोड़ यहाँ न तोड़ वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है नीचे रोक घुटन भारी पर
ऊपर शून्य हनेरा है।
ऊपर तो भूखे भी रहते पर
नीचे लंगर डेरा है।
है अंधा एक तो इक लंगड़ा
दोनों में कोई प्रीत नहीं।
ले हाथ जो थामे इकदूजे का
ऐसा कोई मीत नहीं।
है कैसी उल्टी रीत है कैसा
उल्टा मंजर जहाँ-तहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है बुद्धि तो धन है थोड़ा
पर धन है तो बुद्धि माड़ी।
है बुद्धि बिना जगत सूना
बिन चालक के जैसे गाड़ी।
बस अपने घर की छोड़ कथा हर
इक ही झांके यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

आ~राम तो है सत्कार नहीं
सत्कार जो है आराम नहीं।
है पुष्प मगर वो सुगंध नहीं
है गंध अगर तो पुष्प नहीं।
इस मिश्रण की पड़ताल में मित्रो
भागें हम-तुम किधर कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

है कर्म ही आगे ले जाता
यह कर्म ही पीछे को फ़ेंके।
है जोधा नहीँ कोई ऐसा जो
कर्म-तपिश को न सेंके।
न कोई यहाँ, न कोई वहां बस
कर्म ही केवल यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।
अनुमोदित व सर्वपठनीय भावपूर्ण कविता संग्रह

गांव शहर में भी बसता, तन से न सही मन से मानें

Featured image as Painting by Kritika

हम गाँवों के गबरू हैं तुम सा 
शहर में जीना क्या जानें।
है गांव शहर में भी बसता तन
से न सही मन से मानें।
बस सूखी रोटी खाई है तुम सा शहद
में पला नहीं।
हमने न झेली न टाली ऐसी भी
कोई बला नहीं।
हमने न पेड़ से खाया हो फल
ऐसा कोई फला नहीं।
तब तक सिर को दे मारा है जब
तलक पहाड़ भी टला नहीं।
सिर मत्थापच्ची करते जब तुम
थे भरते लंबी तानें।
हम गाँवों -----
दिल-जान से बात हमेशा की तुम
सी घुटन में जिया नहीं।
है प्यार बाँट कर पाया भी नफ़रत
का प्याला पिया नहीं।
इक काम जगत में नहीं कोई भी
हमने है जो किया नहीं।
है मजा नहीं ऐसा कोई भी
हमने हो जो लिया नहीं।
फिर अन्न-भरे खेतों में खड़ के
दाना-दाना क्यों छानें।
हम गाँवों के ----
है इज्जत की परवाह नहीं
बेइज्जत हो कर पले बढ़े।
अपनों की खातिर अपने सर
सबके तो ही इल्जाम मढ़े।
कागज की दुनिया में खोकर भी
वेद-पुराण बहुत ही पढ़े।
हैं असली जग में भी इतरा कर
खूब तपे और खूब कढ़े।
बस बीज को बोते जाना था कि
स्वर्ण कलश मिलते न गढ़े
इस सोच के ही बलबूते हम तो
हर पल निशदिन आगे बढ़े।
फिर छोटा मकसद ठुकरा कर हम
लक्ष्य बड़ा क्यों न ठानें।
हम गाँवों के -----
जो शहर न होते फिर अपनी हम
काबिलियत को न पाते।
रहते अगर न वहाँ तो क्या है
घुटन पता कैसे पाते।
न लोकतंत्र से जीते गर ये
नियम-व्यवस्था न ढाते।
फिर बेर फली तरु न भाते गर
भेल पकौड़े न खाते।
हम साइलेंट जोन में न बसते तो
घाट मुरलिया न गाते।
हम रिमझिम स्नान भी न करते गर
नगर में न तनते छाते।
है रात के बाद सुबह आती तम से ही
लौ दमखम पाती।
है सुखदुख का चरखा चलता वह
न देखे जाति-पाति।
फिर अहम को अपने छोड़ के हम यह
सत्य नियम क्यों न मानें।
हम गाँवों ----
है ढोल-गंवार यही कहते बस
तुलसी ताड़न-अधिकारी।
है अन्न उगाता जो निशदिन वो
कैसे है कम अधि-कारी।
जो दुनिया की खातिर जाता हो
खेतों पर ही बलिहारी।
वो कम कैसे सबसे बढ़कर वो
तो मस्ती में अविकारी।
फिर ऊंच-नीच ठुकरा क्यों न हम
इक ही अलख को पहचानें।
हम गाँवों ---

काम तो है आ~राम को, योगा के विश्राम को

चूल्हा कैसे जलेगा
जीवन कैसे चलेगा।
आज का दिन तो चल पड़ा पर
कल कैसे दिन ढलेगा।
चूल्हा कैसे जलेगा।

बचपन बीता खेलकूद में
सोया भरी जवानी में।
सोचा उमर कटेगी यूँ ही
अपनी ही मनमानी में।
नहीं विचारा पल भर को भी
वक़्त भी ऐसे छलेगा।
चूल्हा कैसे ----

सोचा था कुछ काम करेंगे
खून पसीना एक करेंगे।
पढ़ लिख न पाए तो भी तो
भूखे थोड़ा ही मरेंगे।
सोचा नहीं हमारे हक से
पेट मशीन का पलेगा।
चूल्हा कैसे ----

नायाबी न थमी है, पर
काम की फिर भी कमी है।
काम वहाँ पर नहीं है मिलता
जहाँ गृहस्थी जमी है।
गृहसुख त्याग के इस मानुष का
पैसा कैसे फलेगा।
चूल्हा कैसे-----

काश कि ऐसा दिन होता सब
को पैसा मुमकिन होता।
उसके ऊपर वो पाता जो
जितना भी दाना बोता।
झगड़े मिटते इससे क्यों नर
इक-दूजे संग खलेगा।
चूल्हा कैसे ----

काम तो है आ~राम को
योगा के विश्राम को।~2
इसके पीछे उमर कट गई
आखिर कब ये फलेगा।
चूल्हा कैसे ---

अब तो पुष्प खिलने दो, अब तो सूरज उगने दो~कुंडलिनी रूपकात्मक आध्यात्मिक कविता

अब तो पुष्प खिलने दो

अब तो सूरज उगने दो।

भौँरा प्यासा घूम रहा

हाथी पगला झूम रहा।

पक्षी दाना चौँच में लेके

मुँह बच्चे का चूम रहा।

उठ अंगड़ाई भरभर के अब

नन्हें को भी जगने दो।

अब तो पुष्प--

युगों युगों तक घुटन में जीता

बंद कली बन रहता था।

अपना असली रूप न पाकर

पवनवेग सँग बहता था।

मिट्टी खाद भरे पानी सँग

अब तो शक्ति जगने दो।

अब तो पुष्प ---

लाखों बार उगा था पाकर

उपजाऊ मिट्टी काया।

कंटीले झाड़ों ने रोका या

पेड़ों ने बन छाया।

खिलते खिलते तोड़ ले गया

जिसके भी मन को भाया।

हाथी जैसे अभिमानी ने

बहुत दफा तोड़ा खाया।

अब तो इसको बेझिझकी से

अपनी मंजिल भजने दो।

अब तो पुष्प--

अबकी बार न खिल पाया तो

देर बहुत हो जाएगी।

मानव के हठधर्म से धरती

न जीवन दे पाएगी।

करो या मरो भाव से इसको

अपने काम में लगने दो।

अब तो पुष्प --

मौका मिला अगर फिर भी तो

युगों का होगा इंत-जार।

धीमी गति बहुत खिलने की

एक नहीं पंखुड़ी हजार।

प्रतिस्पर्धा भी बहुत है क्योंकि

पूरी सृष्टि खुला बजार।

बीज असीमित पुष्प असीमित

चढ़ते मंदिर और मजार।

पाखण्डों ढोंगों से इसको

सच की ओर भगने दो।

अब तो पुष्प खिलने दो

अब तो सूरज उगने दो।