Raj hath ka prateekatmak drishya—sinhasan par ahankaari raja, saamne vivash janta, aur peeche khandahar bane mandir tatha tooti nyaay-taraazoo.

राज हठ

न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

क्यों क्या पूछे जनता व्यर्थ,
राजा का बस एक ही रथ।
राज-अहं ही जीत गया,
भाड़ में जनता-समूह गया।

माने जो पद उसे मिले
मुकरे उसपे चले लट्ठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

जनता करे अधर्म कहाए,
राजा करे तो धर्म कहाए।
उलटे काम भी सीधे बनें,
राज-हठ में नियम तनें।
झूठ कहे तो नीति बने,
सच कहे तो गीति तने।

लुच्चों के संग कैसा मेल
कैसा गठजोड़ कैसा गठमठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

लोकतंत्र का नाम धरे,
राज हठ ही काम करे।
जन की इच्छा जाए हार,
ताज कहे तो सब स्वीकार।

नाकाम जमावड़ा
नाकाम इकट्ठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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