Meditating Hanuman sits on a mountain ledge at sunrise, gazing toward a luminous vision of Rama in the sky, symbolizing the journey from active devotion to inner spiritual rest.

तुम्हरो भजन राम को पावै

तुम्हरो भजन राम को पावै।
वानर की गति, मनुष्य का ध्यान,
दोनों के संग बने हनुमान।
न केवल वानर, न केवल नर,
दोनों मिलकर हुए एक स्वर।
डाली से डाली, वन से वन,
चलता रहता उसका तन।
टिके रहना रीत नहीं, पर
गति में भी कोई प्रीत नहीं।
फल मिला तो फल ही खाया,
पत्ता मिला तो पत्ता पाया।
कच्चा या फल पका हुआ,
भेद न देखा, काम हुआ।
गले में डाले स्वर्णहार,
क्षण भर पहने वह श्रृंगार।
फिर सहज ही उसको छोड़ दिया,
मन भीतर जैसे मोड़ लिया।
एक डाल छूटी, दूजी थामी,
किसी एक डाल की जगह न मानी।
जितना मिला, उतना ही लिया,
पकड़ा नहीं, आगे हो लिया।
दृष्टि न बांधी एक दिशा में,
देखा जग को हर दिशा में।
क्षण-क्षण बदली उसकी राह,
फिर भी न कहीं जमाई चाह।
यही गति जब मानव धारे,
उसमें जागें विवेक हमारे।
चलना केवल भटकना न हो,
कर्म हो, फिर भी बंधना न हो।
मन जब वस्तुओं में न फंसे,
इच्छा मन को बार-बार न कसे,
जब हाथ करे, पर मन न धरे,
तब अज्ञान को भीतर शक्ति हरे।
बिखरी शक्ति भीतर आए,
ध्यान का दीपक स्वयं जलाए।
जिस छवि को पहले बुलाते थे,
वह मन में स्वयं ही ठहर जाए।
बैठो तो साथ, चलो तो साथ,
जागो तो भी रहे वही बात।
ध्यान न केवल आसन में हो,
जीवन के हर क्षण में हो।
धीरे-धीरे चंचलता थमे,
मन अपने ही केंद्र में जमे।
बाहर गति काम करे,
भीतर चेतना विश्राम धरे।
यहीं समाधि की राह खुलती,
यहीं मन की थकान है ढलती।
जहां न खोज, न कोई काम,
वहीं विश्राम का नाम है राम।
राम केवल नाम नहीं,
भीतर एक धाम कहीं।
जहां चेतना अपने में ठहरे,
बाहर से मानो गूंगे बहरे।
इसीलिए यह वचन महान,
जिसमें छिपा साधना-विज्ञान।
“तुम्हरो भजन राम को पावै,”
हनुमत से राम बन जावै।।
हनुमान गति, हनुमान कर्म,
समर्पण का हनुमान धर्म।
हनुमान शक्ति, पर उसके पार,
कर्म हो पर बिन अहंकार।
यह बात है केवल पढ़ी नहीं,
सोच को लेकर गढ़ी नहीं।
दादागुरु की संगति में रहकर,
वर्षों देखा उनको जीकर।
उनमें गति थी, पकड़ नहीं,
कर्म था, भीतर जकड़ नहीं।
सादगी थी, और गहरा ध्यान,
जीवन में जागा वही विधान।
चाहकर नहीं मैंने अपनाया,
संग ने धीरे-धीरे सिखाया।
जो गुण उनमें सहज समाए,
अनजाने भीतर उतरते जाए।
कर्मयोग ने राह दिखाई,
अद्वैत दृष्टि ने गांठ खुलवाई।
गतिशीलता बनी साधना,
हनुमान की रामाराधना।
सात्त्विक जीवन, सरल विचार,
धीरे-धीरे हल्का भार।
ऊर्जा बाहर कम बिखरी, तो
ध्यान में ही भीतर निखरी।
हनुमान तब अर्थ में आए,
देव नहीं, ये पथ दिखलाए।
वानर ने जो बाहर दिखाई,
शक्ति वही नर-भीतर आई।
वानर पकड़ता, छोड़ देता,
मनुष्य भी बंधन तोड़ देता।
वानर चलता, रुकता नहीं,
मानव भी पहुंचे कहीं से कहीं।
वानर के गुण स्वयं साधना नहीं,
मानव-मन बिन वे अराधना नहीं।
प्रकृति ने जो बाहर दिखाया,
मानव ने उसे भीतर उठाया।
गति से कर्म, कर्म से ध्यान,
ध्यान से होए आत्मज्ञान,
जब सब खोजें शांत हो जाएं,
तब भीतर राम खुद दिख जाएँ।
इसलिए हनुमान से राम तक
अनेक नहीं, एक ही मर्म है।
एक छोर पर जागा कर्म,
दूसरे छोर पर शांत धर्म है।
हनुमान हैं चलती शक्ति,
राम हैं उस शक्ति की मुक्ति।
हनुमत हैं जागृत प्राण,
राम उनका परित्राण।
इसलिए केवल पूजा मत करना,
उनकी गति को जीवन में धरना।
कर्म करो, पर भटको नहीं,
जगत में रहो, पर अटको नहीं।
ऊर्जा को मत व्यर्थ बहाना,
उसे ध्यान में भीतर लाना।
मन को धीरे हल्का करना,
राम को उसके कंधे पे धरना।
तब शायद भेद खुल जाए,
खुद ही कोई गुनगुनाए—
“तुम्हरो भजन राम को पावै,”
हनुमान जियो, राम मिल जावै।
वानर की गति, मनुष्य का ध्यान,
दोनों के संग बने हनुमान।
उससे मन राम में थमे,
जीवन अपने घर में जमे।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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