न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।
क्यों क्या पूछे जनता व्यर्थ,
राजा का बस एक ही रथ।
राज-अहं ही जीत गया,
भाड़ में जनता-समूह गया।
माने जो पद उसे मिले
मुकरे उसपे चले लट्ठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।
जनता करे अधर्म कहाए,
राजा करे तो धर्म कहाए।
उलटे काम भी सीधे बनें,
राज-हठ में नियम तनें।
झूठ कहे तो नीति बने,
सच कहे तो गीति तने।
लुच्चों के संग कैसा मेल
कैसा गठजोड़ कैसा गठमठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।
लोकतंत्र का नाम धरे,
राज हठ ही काम करे।
जन की इच्छा जाए हार,
ताज कहे तो सब स्वीकार।
नाकाम जमावड़ा
नाकाम इकट्ठ।
न मन्दिर, न मठ,
सबसे ऊपर राज हठ।