ढाई आखर प्रेम का पढ़ ले जो कोई वो ही ज्ञानी

बोल नहीं सकता कुछ भी मैं
घुटन ये कब तुमने जानी।
चला है पदचिन्हों पर मेरे
मौनी हो या फिर ध्यानी।

मरने की खातिर जीता मैं
जीने को मरते हो तुम।
खोने का डर तुमको होगा
फक्कड़ का क्या होगा गुम।
हर पल एकनजर से रहता
लाभ हो चाहे या हानि।
बोल नहीं सकता ----

मेरे कंधों पर ही तुमने
किस्मत अपनी चमकाई।
मेरे ही दमखम पर तुमने
धनदौलत इतनी पाई।
निर्विरोध हर चीज स्वीकारी
फूटी-कौड़ी जो पाई।
खाया सब मिल-बाँट के अक्सर
बन इक-दूजे संग भाई।
कर्म-गुलामी की पूरी, ले
कुछ तिनके दाना-पानी।
बोल नहीं---

तेज दिमाग नहीं तो क्या गम
तेज शरीर जो पाया है।
सूंघे जो परलोक तलक वो
कितनी अद्भुत काया है।
मेरा इसमें कुछ नहीं यह
सब ईश्वर की माया है।
हर-इक जाएगा दुनिया से
जो दुनिया में आया है।
लगती तो यह छोटी सी पर
बात बड़ी और सैयानी।
बोल नहीं---

हूँ मैं पूर्वज तुम सबका पर
मेरा कहा कहाँ माना।
क़ुदरत छेड़ के क्या होता है
तुमने ये क्यों न जाना।
याद करोगे तुम मुझको जब
याद में आएगी नानी।
बोल--

मरा हमेशा खामोशी संग
तुम संग भीड़ बहुत भारी।
तोड़ा हर बंधन झटक कर
रिश्ता हो या फिर यारी।
मुक्ति के पीछे भागे तुम
यथा-स्थिति मुझे प्यारी।
वफा की रोटी खाई हरदम
तुमको भाए गद्दारी।
कर-कर इतना पाप है क्योंकर
जरा नहीं तुमको ग्लानि।
बोल नहीं---

लावारिस बन बीच सड़क पर
तन मेरा ठिठुरता है।
खुदगर्जी इन्सान की यारो
कैसी मन-निष्ठुरता है।
कपट भरे विवहार में देखो
न इसका कोई सानी।
बोल नहीं---

रोटी और मकान बहुत है
कपड़े की ख्वाइश नहीं।
शर्म बसी है खून में अपने
अंगों की नुमाइश नहीं।
बेहूदे पहनावे में तुम
बनते हो बड़े मानी।
बोल नहीं----

नशे का कारोबार करूँ न
खेल-मिलावट न खेलूँ।
सारे पुट्ठे काम करो तुम
मार-कूट पर मैं झेलूँ।
क्या जवाब दोगे तुम ऊपर
रे पापी रे अभिमानी।
बोल नहीं----

पूरा अपना जोर लगाता
जितना मेरे अंदर हो।
मेरा जलवा चहुँ-दिशा में
नभ हो या समंदर हो।
बरबादी तक ले जाने की
क्यों तुमने खुद को ठानी।
बोल नहीं सकता--

खून से सींचा रे तुझको फिर
भूल गया कैसे मुझको।
रब मन्दिर मेरे अंदर फिर
भी न माने क्यों मुझको।
लीला मेरी तुझे लगे इक
हरकत उल्टी बचकानी।
बोल नहीं---

कुदरत ने हम दोनों को जब
अच्छा पाठ पढ़ाया था।
भाई बड़ा बना करके तब
आगे तुझे बढ़ाया था।
राह मेरी तू क्या सुलझाए
खुद की जिससे अनजानी।
बोल नहीं--

लक्ष्य नहीं बेशक तेरा पर
मुंहबोला वह है मेरा।
मकड़जाल बुन बैठा तू जो
उसने ही तुझको घेरा।
याद दिलाऊँ लक्ष्य तुम्हारा
बिन मस्तक अरु बिन बानी।
बोल नहीं---

प्यार की भाषा ही समझूँ मैं
प्यार की भाषा समझाऊँ।
प्यार ही जन्नत प्यार ही ईश्वर
प्यार पे बलिहारी जाऊँ।
ढाई आखर प्रेम का पढ़ ले
जो कोई वो ही ज्ञानी।
बोल नहीं--
@bhishmsharma95

कुंडलिनी पुरुष के रूप में भगवान कार्तिकेय का लीला विलास

मित्रो, मुझे भगवान कार्तिकेय की कथा काफी रोचक लग रही है। इसमें बहुत से कुंडलिनी रहस्य भी छिपे हुए लगते हैं। इसलिए हम इसे पूरा खंगालेंगे। शिवपुराण के अनुसार ही, फिर सरकंडे पर जन्मे उस बालक को ऋषि विश्वामित्र ने देखा। बालक ने उन्हें अपना वेदोक्त संस्कार कराने के लिए कहा। जब विश्वामित्र ने कहा कि वे क्षत्रिय हैं, ब्राह्मण नहीं, तब कार्तिकेय ने उनसे कहा कि वे उसके वरदान से ब्राह्मण हो गए। फिर उन्होंने उसका संस्कार किया। तभी वहाँ छः कृत्तिकाएँ आईं। जब वे उस बालक को लेकर लड़ने लगीं, तो वह छः मुंह बनाकर छहों का एकसाथ स्तनपान करने लगा। अग्निदेव ने भी उसे अपना पुत्र कहकर उसे शक्तियां दीं। उन शक्तियों को लेकर वह करौंच पर्वत पर चढ़ा और उसके शिखर को तोड़ दिया। तब इंद्र ने नाराज होकर उस पर वज्र से कई प्रहार किए, जिनसे शाख, वैशाख और नैगम तीन पुरुष पैदा हुए और वे चारों इंद्र को मारने के लिए दौड़ पड़े। कृत्तिकाओं ने अपना दूध पिलाकर कार्तिकेय को पाला पोसा, और जगत की सभी सुख सुविधाएं उसे दीं। उसे उन्होंने दुनिया की नजरों से छिपाकर रखा कि कहीं उस प्यारे नन्हें बालक को कोई उनसे छीन न लेता। 
पार्वती ने शंकित होकर शिव से पूछा कि उनका अमोघ वीर्य कहाँ गया। उसे किसने चुराया। वह निष्फल नहीं हो सकता। भगवान शिव जब पार्वती के साथ व अन्य देवताओं के साथ अपनी सभा में बैठे थे, तो उन्होंने सभी देवताओं से इस बारे पूछा। उन्होंने कहा कि जिसने भी उनके अमोघ वीर्य को चुराया है, वह दण्ड का भागी होगा, क्योंकि जो राजा दण्डनीय को दण्ड नहीं देता, वह लोकनिंदित होता है। सभी देवताओं ने बारी-बारी से सफाई दी, और वीर्यचोर को भिन्न-भिन्न श्राप दिए। तभी अग्निदेव ने कहा कि उन्होंने वह वीर्य शिव की आज्ञा से सप्तऋषियों की पत्नियों को दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने वह हिमालय को दे दिया। हिमालय ने बताया कि वह उसे सहन नहीं कर पाया और उसे गंगा को दे दिया। गंगा ने कहा कि उस असह्य वीर्य को उसने सरकंडे की घास में उड़ेल दिया। वायुदेव बोले कि उसी समय वह वीर्य एक बालक बन गया। सूर्य बोले कि रोते हुए उस बालक को देख न सकने के कारण वह अस्ताचल को चला गया। चन्द्रमा बोला कि कृत्तिकाएँ उसे अपने घर ले गईं। जल बोला कि उस बालक को कृत्तिकाओं ने स्तनपान कराके बड़ा किया है। संध्या बोली कि कृत्तिकाओं ने प्रेम से उसका पालन पोषण करके कार्तिक नाम रखा है। रात्रि बोली कि वे कृत्तिकाएँ उसे अपनी आँखों से कभी दूर नहीं होने देतीं। दिन बोला कि वे कृत्तिकाएँ उसे श्रेष्ठ आभूषण पहनाती हैं, और स्वादिष्ट भोजन कराती हैं। इससे शिवपार्वती, दोनों बड़े खुश हुए, और समस्त जनता भी। तब शिव के गण दिव्य विमान लेकर कृतिकाओं के पास गए। जब कृतिकाओं ने उसे देने से मना किया तो गणों ने उन्हें शिवपार्वती का भय दिखाया। कृत्तिकाएँ डर गईं तो कार्तिकेय ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि उसके होते हुए उन्हें डरने की आवश्यकता नहीं। उन्होंने रोते हुए कार्तिकेय को हृदय से लगाकर उसीसे पूछा कि वह कैसे उन अपनी दूध पिलाने वाली माताओं से अलग हो पाएगा, जो एकपल के लिए भी उसे अपनी नजरों से ओझल नहीं होने देतीं। कार्तिकेय ने कहा कि वह उनसे मिलने आया करेगा। दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर कार्तिकेय शिवपार्वती के पास कैलाश पर आ गया। हर्षोल्लास का पर्व मनाया गया। शिवपार्वती ने उसे गले से लगा लिया। कार्तिकेय के दिव्य तेज से प्रभावित होकर बहुत से लोग उसके भक्त बन कर उसकी स्तुति करने लगे। वे उसे शिव की प्राप्ति कराने वाला और जन्ममरण से मुक्ति देने वाला कहते। वे उसे अपना सबसे प्रिय इष्टदेव कहते। एक आदमी का यज्ञ के लिए बंधा बकरा कहीं भाग गया था। सबने उसे ब्रह्मांड में हर जगह ढूंढा, पर वह नहीं मिला। फिर वह आदमी भगवान कार्तिकेय के पास आकर उनसे प्रार्थना करने लगा कि वे ही उस बकरे को ला सकते हैं, नहीं तो उसका अजमेध यज्ञ नष्ट हो जाएगा। कार्तिकेय ने वीरबाहु नामक गण को पैदा करके उसे वह काम सौंपा। वह उसे ब्रह्मांड के किसी कोने से बांध कर ले आया और कार्तिकेय के समक्ष उस आदमी को सौंप दिया। कार्तिकेय ने उसपर पानी छिड़कते हुए उससे कहा कि वह बकरा बलिवध के योग्य नहीं, और उसे उस आदमी को दे दिया। वह कार्तिकेय को धन्यवाद देकर चला गया।

उपर्युक्त कुंडलिनी रूपक का रहस्योद्घाटन

विश्वामित्र ने कुंडलिनी का अनुभव किया था। वे क्षत्रिय थे पर कुंडलिनी के अनुभव से उनमें ब्रह्मतेज आ गया था। उसी कुंडलिनी पुरुष अर्थात कार्तिकेय के अनुभव से ही वे ब्रह्मऋषि बने। कुंडलिनी से ब्रह्मऋषित्व है, जाति या धर्म से ही नहीं। कार्तिकेय का संस्कार करने का मतलब है कि उन्होंने कुंडलिनी पुरुष को अपनी योगसाधना से प्रतिष्ठित किया। छः कृत्तिकाएँ छः चक्र हैं। कुंडलिनी पुरुष अर्थात कुंडलिनी चित्र कभी किसी एक चक्र पर तो कभी किसी अन्य चक्र पर जाता हुआ सभी चक्रों पर भ्रमण करता है। इसीको उनका आपस में लड़ना कहा गया है। फिर योगी ने तीव्र योगसाधना से उसे सभी चक्रों पर इतनी तेजी से घुमाया कि वह सारे चक्रों पर एकसाथ स्थित दिखाई दिया। यह ऐसे ही है कि यदि कोई जलती मशाल को तेजी से चारों ओर घुमाए, तो वह पूरे घेरे में एकसाथ जलती हुई दिखती है। इसीको कार्तिकेय का छः मुख बनाना और एकसाथ छहों कृत्तिकाओं का दूध पीना कहा गया है। चक्रों पर कुंडलिनी पुरुष के ध्यान से उसे बल मिलता है। इसे ही कार्तिकेय का दूध पीना कहा गया है। रोमांस से सम्बंधित विषयों को ‘हॉट’ भी कहा जाता है। इसलिए उन विषयों पर अग्निदेव का आधिपत्य रहता है। क्योंकि कुंडलिनी पुरुष की उत्पत्ति इन्हीं विषयों से हुई, इसीलिए वह अग्निदेव का पुत्र हुआ। उत्पत्ति होने के बाद भी कुंडलिनी पुरुष को तांत्रिक योग से बल मिलता रहा, जिसमें प्रणय प्रेम की मुख्य भूमिका होती है। इसीको अग्निदेव के द्वारा कार्तिकेय को बल देना कहा गया है। फिर कुंडलिनी उससे शक्ति लेकर आज्ञाचक्र के ऊपर आ गई। मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में सीधे जुड़े हुए दिखाए जाते हैं। इसको कार्तिकेय का क्रौंच पर्वत पर चढ़ना बताया गया है। क्रौं से मिलता जुलता सबसे नजदीकी शब्द क्रांति है। क्रांतिकारी चक्र आज्ञा चक्र को भी कह सकते हैं। आज्ञाचक्र एक बुद्धिप्रधान चक्र है। क्रांति बुद्धि से ही होती है, मूढ़ता से नहीं। क्रौंच पर्वत के शिखर को तोड़ता है, मतलब तेज, जजमेंटल और द्वैतपूर्ण बुद्धि को नष्ट करता है। अहंकार से भरा जीवात्मा कुंडलिनी को सहस्रार में जाने से रोकना चाहता है। उसी अहंकार को इंद्र कहा गया है। उसके द्वारा कुंडलिनी को रोकना ही उसके द्वारा कार्तिकेय पर वज्र प्रहार है। कुंडलिनी आज्ञाचक्र पर तीन नाड़ियों से आती है। ये नाड़ियां हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना। इससे कुंडलिनी आज्ञा चक्र से नीचे आती रहती है, और तीनों नाड़ियो से फिर से ऊपर जाती रहती है। इससे वह बहुत शक्तिशाली हो जाती है। यही वज्र प्रहार से कार्तिकेय से तीन टुकड़ों का अलग होना है। शाख इड़ा है, वैशाख पिंगला है, नैगम सुषुम्ना है। शाखा से जुड़ा नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि ये दोनों नाड़ियां टहनियों की तरह हैं। मूल वृक्ष सुषुम्ना है, इसलिए उसे नैगम नाम दिया गया है। सभी निगमों अर्थात धर्मशास्त्रों का निचोड़ सुषुम्ना ही है, इसीलिए नैगम नाम दिया गया। कुंडलिनी पुरुष अर्थात कार्तिकेय के साथ ये तीनों पुरुष इंद्र को मारने दौड़ पड़े, मतलब कुंडलिनी सहस्रार की ओर अग्रसर थी, जिससे इंद्र रूपी अहंकार का नाश होना था। सभी लोग कार्तिक की ऐसे स्तुति कर रहे हैं, जैसे कुंडलिनी पुरुषरूप देवता की स्तुति की जाती है। कुंडलिनी तांत्रिक क्रियाओं से भी शक्ति प्राप्त कर सकती है। ऐसा तब ज्यादा होता है जब कुंडलिनी की तीव्र अभिव्यक्ति के साथसाथ शारिरिक श्रम भी खूब किया जाता है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी ही तांत्रिक यज्ञों को सफल बनाती है। कार्तिकेय के द्वारा पैदा किए गए वीरबाहु नामक गण के द्वारा बलि के बकरे को ढूंढ कर यज्ञ को पूर्ण करना इसी सिद्धांत को दर्शाता है। वीरबाहु का मतलब है, ऐसा व्यक्ति, जो अपनी भुजाओं की शक्ति के कारण ही वीर है। यह श्रमशीलता का परिचायक है। अधिकांशतः कुंडलिनी शक्ति के प्रतीकों से ही संतुष्ट हो जाती है, शक्ति के लिए हिंसा की जरूरत ही नहीं पड़ती। इससे यह तातपर्य भी निकलता है कि कम से कम हिंसा और अधिक से अधिक आध्यात्मिक लाभ। तंत्र के नाम पर नाजायज हिंसा का विरोध करने के लिए ही यह दिखाया गया है कि कार्तिकेय ने बकरे पर जल का छिड़काव करके उसे छोड़ देने के लिए कहा। यह हिंसा का प्रतीकात्मक स्वरूप ही है। शेष अगले हफ्ते।

हँस चुगे जब दाना-दुनका, कवूआ मोती खाता है~ समकालीन सामाजिक परिस्थितियों पर आधारित एक आलोचनात्मक, कटाक्षपूर्ण व व्यंग्यात्मक कविता-गीत

ज्ञानीजन कहते दुनिया में
ऐसा कलियुग आता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।

ज्ञानी-ध्यानी ओझल रहते
काल-सरित के संग न बहते।
शक्ति-हीनता के दोषों को
काल के ऊपर मढ़ते रहते।
मस्तक को अपने बलबूते
बाहुबली झुकाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

खूब तरक्की है जो करता
नजरों में भी है वो खटकता।
होय पलायित बच जाता या
दूर सफर का टिकट है कटता।
अच्छा काम करे जो कोई
वो दुनिया से जाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

अपनी डफली राग भी अपना
हर इक गाना गाता है।
कोई भूखा सोए कोई
धाम में अन्न बहाता है।
दूध उबाले जो भी कोई
वही मलाई खाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

संघे शक्ति कली-युगे यह
नारा सबको भाता है।
बोल-बोल कर सौ-दफा हर
सच्ची बात छुपाता है।
भीड़ झुंड बन चले जो कोई
वही शिकार को पाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जितने ढाबे उतने बाबे
हर-इक बाबा बनता है।
लाठी जिसकी भैंस भी उसकी
मूरख बनती जनता है।
शून्य परीक्षा हर इक अपनी
पीठ को थप-थपाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

करतब-बोध का ठेका देता
कोई भी तब पेन न लेता।
मेल-जोल से बात दूर की
अपना भी न रहता चेता।
हर इक अपना पल्ला झाड़े
लदे पे माल चढ़ाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

शिष्टाचार किताबी होता
नौटँकी खिताबी होता।
भीतर वाला सोया होता
सर्व-धरम में खोया होता।
घर के भीतर सेंध लगाकर
घरवाले को भगाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

मेहनत करे किसान बिपारी
खूब मुनाफा पाता है।
बैठ-बिठाय सिंहासन पर वो
पैसा खूब कमाता है।
देकर करज किसानों को वह
अपना नाच नचाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जात-धरम को ऊपर रख कर
हक अपना जतलाता है।
शिक्षा-दीक्षा नीचे रख कर
शोषित वह कहलाता है।
निर्धन निर्धनता को पाए
पैसे वाला छाता है।
हँस चुगे जब दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----
साभार~@bhishmsharma95🙏

गाने के लिए उपयुक्त वैकल्पिक रचना (मामूली परिवर्तन के साथ)~हँस चुगे है दाना-दुनका, कवूआ मोती खाता है

ज्ञानीजन कहते जगत में
ऐसा कलियुग आता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।

ज्ञानी-ध्यानी ओझल रहते
काल-सरित तट रहते हैं।
शक्ति-हीनता के दोषों को
काल के ऊपर मढ़ते हैं।
मस्तक को अपने बलबूते-2
बाहु-बली झुकाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

खूब तरक्की करता है जो
आँखों में वो खटकता है।
होय पलायित बच जाता जां
दूर-टिकट तब कटता है।
अच्छा काम करे जो कोई-2
वो दुनिया से जाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

अपनी डफली राग भी अपना
हर इक गाना गाता है।
कोई भूखा सोए कोई
धाम में अन्न बहाता है।
दूध उबाले है जो कोई-2
वो ही मलाई खाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

संघे शकती कली-युगे यह
नारा सबको भाता है।
बोल-बोल के सौ-दफा हर
सच्ची बात छुपाता है।
भीड़-झुंड चलता जो कोई-2
वो ही शिकारी पाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जितने ढाबे उतने बाबे
हर-इक बाबा बनता है।
लाठी जिसकी भैंस भी उसकी
मूरख बनती जनता है।
शून्य परीक्षा हर इक अपनी-2
पीठ को थप-थपाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

करतब का ठेका देता है
पेन न कोई लेता है।
मेल-जोल से बात दूर की
अपना भी न चेता है।
हर इक अपना पल्ला झाड़े-2
लदे पे माल चढ़ाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

शिष्टाचार किताबी होता
नौटँकी व खिताबी है।
भीतर वाला सोया होता
सर्व-धरम में खोया है।
घर के भीतर सेंध लगाकर-2
घरवाले को भगाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

मेहनत करे किसान बिपारी
पैसा खूब कमाता है।
बैठ-बिठाय सिंहासन पर वो
खूब मुनाफा पाता है।
देकर करज किसानों को वो-2
अपना नाच नचाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----

जात-धरम को ऊपर रख कर
हक अपना जतलाता है।
शिक्षा-दीक्षा नीचे रख कर
शोषित वह कहलाता है।
निरधन निरधनता को पाए-2
पैसे वाला छाता है।
हँस चुगे है दाना-दुनका
कवूआ मोती खाता है।
ज्ञानीजन----
ए जी रे---
ए जी रे---

धुन प्रकार~रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलियुग आएगा---

साभार~@bhishmsharma95🙏

कुंडलिनी और ब्रह्ममुहूर्त के अन्तर्सम्बन्ध से भूतों का विनाश


सभी मित्रों को गुरु नानक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

कालरात्रि के चाँद गुरु नानक देव

मित्रो, इस वर्ष के गुरु नानक दिवस के उपलक्ष्य में अपने सिख भाई व पड़ौसी के यहाँ प्रभात-फेरी कथा में जाने का मौका मिला। बड़े प्यार और आदर से निमंत्रण दिया था, इसलिए कुंडलिनी की प्रेरणा से सुबह के चार बजे से पहले ही आंख खुल गई। जैसे ही तैयार होकर कथा में पत्नी के साथ पहुंचा, वैसे ही गुरुद्वारा साहिब से ग्रन्थ साहिब भी पहुंच गए। ऐसा लगा कि जैसे मुझे ही सेवादारी के लिए विशेष निमंत्रण मिला था। बहुत ही भावपूर्ण व रोमांचक दृश्य था। सुबह साढ़े चार बजे से लेकर साढ़े पांच बजे तक मधुर संगीत के साथ शब्द कीर्तन हुआ। अच्छा लगा। यह समय ब्रह्ममुहूर्त के समय के बीचोंबीच था, जो लगभग 4 बजे से 6 बजे तक रहता है। ऐसा लगा कि हम पूरी रातभर कीर्तन कर रहे हों। ऐसा ब्रह्ममुहूर्त की उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण ही लगता है। इसीलिए आध्यात्मिक साधना के लिए यही समय सर्वोपरि निश्चित किया गया है। ब्रह्ममुहूर्त में आध्यात्मिक साधना से कुंडलिनी चरम के करीब पहुंच जाती है। मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा। कथा-कीर्तन के अंत में हल्का जलपान भी हुआ। आदमी हर पल कुछ न कुछ सीखता है। सिख मतलब सीख। इससे सिद्ध हो जाता है कि यह धर्म अत्याधुनिक और वैज्ञानिक भी है, क्योंकि आजकल सीखने का ही तो युग है। इसी तरह से इसमें सेवादारी का भी बड़ा महत्त्व है। आजकल का उपभोक्तावाद, व्यावसायिक व प्रतिस्पर्धा का युग जनसेवा या पब्लिक सर्विस का ही तो युग है। आत्मसुरक्षा का भाव तो इस धर्म के मूल में है। यह भाव भी आजकल बहुत प्रासंगिक है, क्योंकि हर जगह झूठ-फरेब, और अत्याचार का बोलबाला दिखता है। ब्रह्ममुहूर्त के बारे में सुना तो बहुत था, पर खुद अच्छी तरह से अनुभव नहीं किया था। लोगों को जो इसकी शक्ति का पता नहीं चलता, उसका कारण यही है कि वे ढंग से साधना नहीं करते। शक्ति के पास बुद्धि नहीं होती। बुद्धि आत्मा या विवेक के पास होती है। यदि शक्ति के साथ विवेक-बुद्धि का दिशानिर्देशन है, तभी वह आत्मकल्याण करती है, नहीं तो उससे विध्वंस भी संभव है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान को देख सकते हैं। सूत्रों के अनुसार पाकिस्तानी सेना निर्दोष व निहत्थी जनता को मारती है। कई बार यह देश कम, और दुष्प्रचार करने वाली मशीन ज्यादा लगता है। बन्दर के हाथ उस्तरा लग जाए, तो अंजाम कुछ भी हो सकता है। शक्ति तो एक धक्का है। यदि मन में पहले से ही कचरा है, तो शक्ति से उसीको धक्का मिलेगा, जिससे वह और ज्यादा फैल जाएगा। इससे तो आदमी ब्रह्ममुहूर्त में जागने से भी तौबा करेगा। यदि मन में कुंडलिनी है, तो विकास का धक्का कुंडलिनी को ही मिलेगा। मेरा जन्म से ही एक हिंदु परिवार से सम्बन्ध रहा है। मेरे दादाजी एक प्रख्यात हिंदु पुरोहित थे। मैंने कई वर्षों तक उनके साथ एक शिष्य की तरह काम किया है। लगता है कि वे अनजाने में ही मेरे गुरु बन गए थे। मुझे तो हिंदु धर्म और सिख धर्म एकजैसे ही लगे। दोनों में धर्मध्वज, ग्रन्थ और गुरु का पूजन या सम्मान समान रूप से किया जाता है। दरअसल, भीतर से सभी धर्म एकसमान हैं, कुछ लोग बाहर-2 से भेद करते हैं। तंत्र के अनुसार, कुंडलिनी ही गुरु है, और गुरु ही कुंडलिनी है। हाँ, क्योंकि सिक्ख धर्म धर्मयौद्धाओं से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें पारम्परिक हिंदु धर्म की अपेक्षा थोड़ी ज्यादा संक्षिप्तता, व्यावहारिकता और कट्टरता होना स्वाभाविक ही है। पर वह भी कुछ विशेष धर्मों के सामने तो नगण्यतुल्य ही है। हालांकि सिक्ख धर्म बचाव पक्ष को लेकर बना है, आक्रामक पक्ष को लेकर नहीं। यदि कभी आक्रामक हुआ भी है, तो अपने और हिंदु धर्म के बचाव के लिए ही हुआ है, अन्यथा नहीं। मैं यहाँ किसी धर्मविशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। केवल मानवीय सत्य को स्पष्ट कर रहा हूँ। युक्तिपूर्ण विचार व लेखन से सत्य ज्यादा स्पष्ट हो जाता है। कुछ न कुछ कट्टरता तो सभी धर्मों में है। कुछ सकारात्मक कट्टरता तो धर्म के लिए जरूरी भी है, पर यदि वह मानवता और सामाजिकता के दायरे में रहे, तो ज्यादा बेहतर है, जिसके लिए सिक्ख धर्म अक्सर जाना और माना जाता है। मध्ययुग में जिस समय जेहादी आक्रांताओं के कारण भारतीय उपमहाद्वीप अंधेरे में था, उस समय ईश्वर की प्रेरणा से पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा की तरह गुरु नानकदेव का अभ्युदय हुआ था, जिसने भयजनित अंधेरे को सुहानी चांदनी में तब्दील कर दिया था।

भगवान शिव भूतों से भरी रात के बीच में पूर्ण चन्द्रमा की तरह प्रकाशमान रहते हैं

किसी धार्मिक क्रियाकलाप में प्रकाशमान भगवान के साथ उसका साया अंधेरा भी प्रकट हो सकता है। क्योंकि प्रकाश और अंधकार साथसाथ रहते हैं। अंधेरे को शिव का भूतगण समझकर सम्मानित करना चाहिए, क्योंकि वह शिव के साथ ही आया। चान्द के साथ रात तो होती ही है। उससे डरना नहीं चाहिए। इससे शक्तिशाली अद्वैत पैदा होता है, जो  कुंडलिनी जागरण में सहायक होता है। दरअसल धार्मिक विद्वेष के लिए यही भूत जिम्मेदार होते हैं, शिव नहीं। आपने भी देखा या सुना ही होगा कि अमुक आदमी बहुत ज्यादा धार्मिक बनने के बाद अजीब सा हो गया। कई बार आदमी गलत काम भी कर बैठता है। मेरा एक रिश्तेदार है। वह गाँव के ही अपने एक मित्र के साथ निरन्तर धार्मिक चर्चाएँ करता रहता था। उन दोनों को इकट्ठा देखकर गांव की महिलाएं उनका मजाक उड़ाते हुए आपस में बतियाने लगतीं कि देखो सखियो, अब श्रीमद्भागवत पुराण का कथा-प्रवचन शुरु होने वाला है। कुछ समय बाद मेरे रिश्तेदार के उस मित्र ने अचानक आत्महत्या कर ली, जिससे सभी अचम्भित हो गए, क्योंकि उसमें अवसाद के लक्षण नहीं दिखते थे। अति सर्वत्र वर्जयेत। हो सकता है कि सतही धार्मिकता ने एक पर्दे का काम किया, और उसके अवसाद को ढक कर रखा। उस अपूर्ण धार्मिकता ने उसके मुंह पर नकली मुस्कान पैदा कर दी। हो सकता है कि अगर वह अधूरी आध्यात्मिकता का चोला न पहनता, तो लोग उसके अंदरूनी अवसाद के लिए जिम्मेदार समस्या को जान जाते, और उसे उससे अवगत कराते और उसका हल भी सुझाते। उससे वह घातक कदम न उठाता। तभी तो कहा गया है कि लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। इसके विपरीत अगर उसने आध्यात्मिकता को पूर्णता के साथ अपनाया होता, तो उसका अवसाद तो मिट ही जाता, साथ में उसे कुंडलिनी जागरण भी प्राप्त हो जाता। धार्मिकता या आध्यात्मिकता की चरमावस्था व पूर्णता तांत्रिक कुंडलिनी योग में ही निहित है। तांत्रिक कुण्डलिनी योग सिर्फ एक नाम या प्रतीक या तरीका है एक मनोवैज्ञानिक तथ्य का। इस आध्यात्मिक व मनोवैज्ञानिक सिद्धांत को धरातल पर उतारने वाले अन्य नाम, प्रतीक या तरीके भी हो सकते हैं। हिंदु ही क्यों, अन्य धर्म भी हो सकते हैं। ऐसा है भी, पर उसे हम समझते नहीं, पहचानते नहीं। जब सभी धर्मों व जीवनव्यवहारों का वैज्ञानिक रूप से गम्भीर अध्ययन किया जाएगा, तभी पूरा पता चल पाएगा। इसलिए जब तक पता नहीं चलता, तब तक हिंदु धर्म के कुंडलिनी योग से काम चला लेना चाहिए। हमें पीने के लिए शुद्ध जल चाहिए, वह जहां मर्जी से आए, या उसका जो मर्जी नाम हो। अध्यात्म की कमी का कुछ हल तंत्र ने तो ढूंढा था। उसने भूतबलि को पंचमकार के एक अंग के रूप में स्वीकार किया। यह गौर करने वाली बात है कि सिक्ख धर्म मे पंचककार होते हैं। ये पाँच चीजें होती हैं, जिनके नाम क अक्षर से शुरु होते हैं, और जिन्हें एक सिक्ख को हमेशा साथ रखना पड़ता है। ये पाँच चीजें हैं, केश, कड़ा, कंघा, कच्छा और कटार। इससे ऐसा लगता है कि उस समय वामपंथी तंत्र का बोलबाला था, जिससे पंचमकार की जगह पँचककार प्रचलन में आया। भूतबलि, मतलब भूत के लिए बलि। इससे भूत संतुष्ट होकर शांत हो जाते हैं। एकबार मुझे कुछ समय के लिए ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने का मौका मिला। वहाँ पर घर-घर में जब देवता बुलाया जाता है, तो उसे पशुबलि भी दी जाती है। पूछने पर वहाँ के स्थानीय लोगों ने बताया कि वह बलि देवता के लिए नहीं, बल्कि उसके साथ आए वजीर आदि अनुचरों के लिए होती है। देवता का आहार-विहार तो सात्विक होता है। तो वे अनुचर एकप्रकार से शिवगण या भूत ही हुए, और देवता शिव हुए। आजकल भी इसी तर्ज पर बहुत से चतुर लोग दफ्तर के बाबुओं को खुश करके बहुत से काम निकाल लेते हैं, अधिकारी बस देखते ही रह जाते हैं। दरअसल बलिभोग ऊर्जा के भंडार होते हैं। उसमें तमोगुण भी होता है। ऊर्जा और तमोगुण के शरीर में प्रविष्ट होने से जरूरत से ज्यादा बढ़ा हुआ सतोगुण संतुलित हो जाता है, और मन में एक अद्वैत सा छा जाता है। संतुलन जरूरी है। जरूरत से ज्यादा ऊर्जा और तमोगुण से भी काम खराब हो जाता है। अद्वैत भाव को धारण करने के लिए भी शरीर को काफी ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अद्वैत भाव पैदा होने से फिर से सतोगुण बढ़ने लगता है। तमोगुण की सहायता से सतोगुण को पैदा करना, वामपंथी शैवों व तांत्रिकों का सम्भवतः यही एक दिव्य फार्मूला है। मूलाधार चक्र तमोगुण का प्रतीक है, और सहस्रार चक्र सतोगुण का प्रतीक है। पहले तमोगुण से कुंडलिनी को मूलाधार पर आने दिया जाता है। फिर तांत्रिक कुंडलिनी योग से उसे सहस्रार तक सीधे ही उठाया जाता है। उससे एकदम से सतोगुण बढ़ जाता है, हालांकि संतुलन या अद्वैत के साथ। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को मन में बना कर रखने के अनगनित लाभों में से गुण-संतुलन का लाभ भी एक है। क्योंकि कुंडलिनी पूरे शरीर में माला के मनके की तरह घूमते हुए तीनों गुणों का संतुलन बना कर रखती है। सारा खेल ऊर्जा या शक्ति का ही है। तभी तो कहते हैं कि शक्ति से ही शिव मिलता है। वैसे ऊर्जा और गुण-संतुलन या अद्वैत को प्राप्त करने के और भी बहुत से सात्विक तरीके हैं, जिनसे अध्यात्म शास्त्र भरे पड़े हैं। ऐसी ही एक आधुनिक पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन~एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र”। भूत तब प्रबल होकर परेशान करते हैं, जब शिव का ध्यान या पूजन ढंग से नहीं किया जाता। जब इसके साथ अद्वैत भाव जुड़ जाता है, तब वे शांत होकर गायब हो जाते हैं। दरअसल वे गायब न होकर प्रकाशमान शिव में ही समा जाते हैं। भूत एक छलावा है। भूत एक साया है। भूत का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। भूत मन का भ्रम है, जो दुनिया की मोहमाया से पैदा होता है। इसका मतलब है कि भूत अद्वैतभाव रखना सिखाते हैं। इसलिए वे शिव के अनुचर ही हुए, क्योंकि वे सबको अपने स्वामी शिव की तरह अद्वैतरूप बनाना चाहते हैं। उन्हें अपने स्वामी शिव के सिवाय कुछ भी अच्छा नहीं लगता। शिवपुराण में इस रूपक को कथाओं के माध्यम से बड़ी मनोरंजकता से प्रस्तुत किया गया है। इन्हीं भूतों को बौद्ध धर्म में रैथफुल डाईटी कहते हैं, जो ज्ञानसाधना के दौरान साधक को परेशान करते हैं। इनको डरावनी आकृतियों के रूप में चित्रित किया जाता है। 

हे! पर्वतराज करोल [भक्तिगीत-कविता]

King Mount Karol 【Parvatraj Karol】 rising with Sun
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

सुबह-सवेरे जब भी उठता
तू ही सबसे पहले दिखता।
सुबह-सवेरे जब भी उठता
तू ही सबसे पहले दिखता।
सूरज का दीपक मस्तक पर
ले के जग को रौशन करता।
सूरज का दीपक मस्तक पर
ले के जग को रौशन करता।
सूरज को डाले जल से तू
सूरज को डाले जल से तू
सूरज संग नहाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

काम बोझ से जब भी थकता
सर ऊपर कर तुझको तकता।
काम बोझ से जब भी थकता
सर ऊपर कर तुझको तकता।
दर्शन अचल वदन होने से
काम से हरगिज़ न रुक सकता।
दर्शन अचल वदन होने से
काम से हरगिज़ न रुक सकता।
कर्मयोग का पावन झरना
कर्मयोग का पावन झरना
पल-पल तूने बहाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

बदल गए सब रिश्ते नाते
बदल गया संसार ये सारा।
बदल गए सब रिश्ते नाते
बदल गया संसार ये सारा।
मित्र-मंडली छान के रख दी
हर-इक आगे काल के हारा।
मित्र-मंडली छान के रख दी
हर-इक आगे काल के हारा।
खुशकिस्मत हूँ तेरे जैसा
खुशकिस्मत हूँ तेरे जैसा
मीत जो मन का पाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

सबसे ऊंचे पद पर रहता
कहलाए देवों का दे-वता।
सबसे ऊंचे पद पर रहता
कहलाए देवों का दे-वता।
उठकर मूल अधार से प्राणी
रोमांचित मस्तक पर होता।
उठकर मूल अधार से प्राणी
रोमांचित मस्तक पर होता।
सब देवों ने मिलकर तेरा 
सब देवों ने मिलकर तेरा
प्यारा रूप बनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

जटा बूटियाँ तेरे अंदर
नाग मोरनी मानुष बंदर।
जटा बूटियाँ तेरे अंदर
नाग मोरनी मानुष बंदर।
गंगा नद नाले और झरने
नेत्र तीसरा भीषण कन्दर।
गंगा नद नाले और झरने
नेत्र तीसरा भीषण कन्दर।

चन्द्र मुकुट पर तोरे सोहे
बरबस ही मोरा मन मोहे।
चन्द्र मुकुट पर तोरे सोहे
बरबस ही मोरा मन मोहे।
उपपर्वत नीचे तक जो है
नंदी वृष पर बैठे सो है।
उपपर्वत नीचे तक जो है
नंदी वृष पर बैठे सो है।

बिजली सी गौरा विराजे
कड़कत चमकत डमरू बाजे।
बिजली सी गौरा विराजे
कड़कत चमकत डमरू बाजे।
आंधी से हिलते-डुलते वन
नटराजन के जैसे साजे।
आंधी से हिलते-डुलते वन
नटराजन के जैसे साजे।

बाघम्बर बदली का फूल
धुंध बनी है भस्म की धूल।
बाघम्बर बदली का फूल
धुंध बनी है भस्म की धूल।
गणपत जल बन बरसे ऊपर
ऋतु मिश्रण का है तिरशूल।
गणपत जल बन बरसे ऊपर
ऋतु मिश्रण का है तिरशूल।

मन-भावन इस रूप में तेरे
मन-भावन इस रूप में तेरे
शिव का रूप समाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।
-हृदयेश बाल🙏🙏bhishm

कुण्डलिनी ही जैव विकास का मुख्य उद्देश्य है

मित्रो, मैंने पिछ्ली एक पोस्ट में बताया था कि मैंने अपने मन की चेतना के स्तर के अनुसार कुंडलिनी को विभिन्न चक्रों पर अनुभव किया। ज्यादा चेतना होने पर कुंडलिनी ऊपर के चक्रों पर आई, तथा कम चेतना होने पर नीचे के चक्रों पर आई। वास्तव में चेतना का स्तर शुद्ध मन से मापा जाता है, बाह्य इंद्रियों से संयुक्त मन से नहीं। बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से तो सभी लोग और बहुत से अन्य जीव चेतना से भरे होते हैं। मरने के बाद तो बाह्य इन्द्रियाँ रहती नहीं हैं। उस समय तो शुद्ध मन की सूक्ष्म चेतना ही काम आती है। आँखों से कुछ देखते समय मन में चेतना की बाढ़ सी महसूस होती है। वह चेतना आँखों के बल से पैदा होती है, मन के अपने बल से नहीँ। इसी तरह अन्य बाह्य इंद्रियों के मामले में भी समझना चाहिये। जैसे-जैसे मन की काबलियत भीतर से भीतर जाते हुए सूक्ष्मता में चेतना प्रकट करने की बढ़ती है, वैसे-वैसे ही वह मुक्ति के अधिक योग्य बनता जाता है। कुण्डलिनी उसकी इसी योग्यता को बढ़ाती है। कुंडलिनी ध्यान के समय आँखें बंद होने के साथ लगभग सभी बाह्य इंद्रियों के दरवाजे बंद होते हैं। फिर भी योग ध्यान की शक्ति से मन में प्रज्वलित हो रही कुंडलिनी में इतनी चेतना आ जाती है, जितनी बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से भी नहीं आती। वर्षों के ऐसे लगातार अभ्यास से बिना कुण्डलिनी के शांत, विचाररहित मन में भी इतनी ही चेतना आ जाती है। इसे ही आत्मज्ञान कहते हैं। दरअसल मन भी बाह्य इन्द्रियों का एक सूक्ष्म रूप ही है।  विचाररहित मन को ही अक्सर आत्मा कहा जाता है। 

वास्तव में विकसित हो रहे जीवों के रूप में कुंडलिनी ही विकसित हो रही होती है। दरअसल कुंडलिनी मन का ही द्योतक है। कुंडलिनी ही सबसे उच्च स्तर का मानसिक विचार है। इसलिए हम कुंडलिनी की चेतना के स्तर से मन की चेतना का स्तर नाप सकते हैं।

कुंडलिनी के काम करने के लिए उसी न्यूरोनल ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो मस्तिष्क या दिमाग के काम करने के लिए आवश्यक होती है। उस न्यूरोनल ऊर्जा को प्राण ऊर्जा या प्राणशक्ति द्वारा उत्तेजित किया जाता है, जो पूरे शरीर की सामान्यीकृत ऊर्जा है। तो दोनों एक ही ईंधन से प्रेरित होते हैं इसीलिए दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। लेकिन सृजन का मुख्य उद्देश्य जीव को अंतिम स्थिति प्रदान करना है। यह कुंडलिनी द्वारा किया जाता है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी विकास ही सृजन का प्राथमिक लक्ष्य है, मस्तिष्क का विकास नहीं। मस्तिष्क का विकास अनिच्छा से खुद ही होता है। यह सह-प्रभाव के रूप में है, यद्यपि यह कुप्रभाव भी बन सकता है, यदि इसे गलत दिशा में लगाया जाए। कई पुरानी सभ्यताओं ने इस तथ्य को अच्छी तरह से समझा और कुंडलिनी पर मुख्य ध्यान रखा। तभी तो उस समय विभिन्न आध्यात्मिक पद्धतियों का बोलबाला था। आज, कुंडलिनी-घटनाऐं दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं, क्योंकि आज के युग का मस्तिष्क विकास भी अप्रत्यक्ष रूप से कुंडलिनी विकास का कारण बन रहा है। इसलिए, कुंडलिनी विकास और मस्तिष्क या विश्व विकास को एक साथ करना ही सबसे अच्छा तरीका है, ताकि कम से कम समय में कुंडलिनी जागरण हो सके। इसके लिए कर्मयोग भी एक अच्छा तरीका है।

कुंडलिनी चेतना के विकास का पैमाना है। कुण्डलिनी के सुषुप्त होने का अर्थ है कि मन सोया हुआ है। सोया इसलिए कहते हैं क्योंकि मन की चेतना कभी खत्म नहीं होती, केवल अप्रकट हो जाती है अर्थात सो जाती है। उस समय चेतन मन के स्थान पर अंधेरा ही होता है। आत्मज्ञान के बाद कुंडलिनी लगातार मन में उच्च चेतना के साथ छाई रहती है, जिसे हम समाधि कहते हैं। इसे कुंडलिनी के पूर्ण जागरण की सबसे क़रीबी अवस्था कह सकते हैं। इन दोनोँ विपरीत छोरों के बीच में अधिकांश जीव होते हैं। उनकी कुंडलिनी की चेतना का बल्ब कभी जलता रहता है, कभी धीमा पड़ जाता है, तो कभी बुझ जाता है।

कुण्डलिनी विकास के रूप में जीव विकास

योग के बारे में सुनने में आता है कि कुण्डलिनी (नाड़ी-ऊर्जा) ही विभिन्न जीवों के रूप में ऊपर चढ़ती रहती है। सबसे निम्न जीवों में व पेड़-पौधों में यह मूलाधार में सुषुप्त रहती है। इसे कुंडलिनी शक्ति या प्राण शक्ति भी कहते हैं। वास्तव में, उनमें भी यह शरीर को बनाए रखने के लिए जीव द्वारा अनुभव किए बिना ही पृष्ठभूमि में हमेशा काम करती रहती है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी जब सोया होता है, तब उसकी चेतना लुप्त होती है, पर वह शरीर को जीवित रखने वाले सभी काम तब भी कर रही होती है। यह पूरे शरीर में वितरित रहती है, लेकिन इसे मूलाधार चक्र में निवसित कहा जाता है, क्योंकि यह इसके विकास और पोषण का मुख्य स्थान है। यह ऐसा ही है, जैसे कि एक आदमी दुनिया में हर जगह भटक सकता है, लेकिन वह अपने विकास, पोषण और आराम(नींद) को मुख्य रूप से अपने घर पर ही प्राप्त करता है। साथ में, कुण्डलिनी मूलाधार चक्र से ही अपनी लम्बी यात्रा शुरु करती है। अचेतन मन और मूलाधार चक्र, दोनों को समान कहा जाता है, और दोनों को सबसे बुरी भावनाओं से जोड़ा जाता है। आगे जो कहा गया है कि कुंडलिनी की शुरुआत मूलाधार चक्र से ही होती है, इसका अर्थ है कि प्रकाश की ओर यात्रा अंधेरे से ही शुरू होती है। उससे थोड़े विकसित जीवों में यह मूलाधार में अत्यल्प जागृत अवस्था में आ जाती है। इन्हें उभयलिंगी या हेर्मैप्रोडिटिक कहा जा सकता है। सम्भवतः इसी स्तर पर पूर्ण आत्मा सहस्रार से गिरकर मूलाधार के गड्ढे में फंस कर सो गई थी। इसीलिए तो उस जीव का यिन या स्त्री और यांग या पुरुष रूप में विभाजन हुआ, ताकि एक-दूसरे के प्रति आकर्षण से आत्मा मूलाधार से ऊपर चढ़ते हुए पुनः सहस्रार में प्रविष्ट हो सके। मूलाधार के वर्चस्व वाले सबसे निम्न जीवों के पास अपशिष्ट शरीर उत्पादों के उन्मूलन के अलावा बाहरी ऊर्जावान कार्य करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह गुदा द्वार के पास स्थित मूलाधार चक्र का कार्य है। इसलिए उनकी कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार चक्र में केंद्रित कहा जाता है। उससे विकसित जीवों में यह स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ जाती है।  यहां जीव का यौन विभाजन होता है और वह यौन आकर्षण के साथ यौन इच्छा महसूस करने लगता है। तभी तो देखा जाता है कि निम्न जीवों में प्रजनन की गति बहुत तेज होती है। उसमें उनकी अधिकांश ऊर्जा का व्यय हो जाता है। यह कुंडलिनी या जीव विकास के लिए अद्भुत बल प्रदान करता है। यह बल आज के विकसित मानव में भी लगातार काम कर रहा है। मध्यम विकसित जीवों में यह नाभि चक्र में आ जाती है। तभी तो अधिकांश निम्न जीव रात-दिन खाने में ही लगे रहते हैं। उच्च कोटि के प्राणी में जैसे सम्भवतः गाय में व प्रेममयी मनुष्य में यह हृदय चक्र में आ जाती है। संभवतः तभी तो गाय वात्सल्य स्नेह से भरी हुई होती है। गाय में पाचन का अधिकांश काम सूक्ष्म जीव करते हैं, इसलिए ऊर्जा की काफी बचत हो जाती है। बबून, गोरिल्ला आदि जैसे प्राइमेट्स में, कुंडलिनी ऊर्जा आगे उनकी भुजाओं या फ़ॉर्लिम्ब्स तक चली जाती है, इसीलिए वे अधिकतम रूप से अपने फ़ॉर्लिम्ब फ़ंक्शन का उपयोग करते हैं। इसी तरह, कोयल जैसे सुंदर गायन करने वाले पक्षी में, गले के चक्र में कुंडलिनी ऊर्जा को केंद्रित कहा जा सकता है। डॉल्फिन जैसे विश्लेषणात्मक कौशल वाले बुद्धिमान जानवरों में, इसे आज्ञा चक्र तक आने वाला कहा जा सकता है। यह मानव में ही सहस्रार चक्र तक आ सकती है, वह भी उचित मस्तिष्क-अभ्यास के साथ, क्योंकि केवल वही इसे जागृत कर सकता है, और जागरण का स्थान भी केवल सहस्रार ही है। सबसे उच्च कोटि के मनुष्य में यह सहस्रार में पूर्ण रूप से जाग जाती है।

कुंडलिनी के सात चक्र सात लोकों क़े रूप में हैं

शास्त्रों में ऊपर के सात लोकों का वर्णन आता है। ये सात लोक सात चक्रों के रूप में हैं। सबसे निम्न लोक मूलाधार चक्र है, क्योंकि उस स्तर के जीवों में सबसे कम चेतना होती है। उसके ऊपर के लोकों या चक्रों में जाते हुए चेतना का स्तर बढ़ता रहता है। सहस्रार में यह स्तर सर्वाधिक होता है। कुंडलिनी जागरण अर्थात शिव और शिवा के मिलन के समय चेतना का स्तर पूर्ण हो जाता है, जिससे उसे शिवलोक या ब्रह्मलोक कहते हैं। वैसे तो मूलाधार के नीचे भी पाताल के सात लोक बताए गए हैं। उनमें भी चेतना क्रमशः नीचे की ओर गिरती रहती है। इन लोकों में अधिकांशतः राक्षसों का का निवास बताया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनकी चेतना का स्तर इतना अधिक गिर गया होता है कि ये देवताओं, साधुओं व उच्च चेतना वाले अन्य जीवों से द्रोह करते रहते हैं। धरती को मूलाधार चक्र के समकक्ष माना गया है। ऊपर के आसमान के लोक उच्च लोक हैं, जबकि धरती के नीचे पाताल लोक हैं।

आदमी का सीधा खड़ा होना और पीठ में गड्ढा बनना भी जैव विकास श्रृंखला की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है

मैंने एक पुरानी पोस्ट में बताया था कि कैसे अपनी नई कार में बैठकर मुझे उसे चलाते हुए लगातार अपनी पीठ सीधी और नेचरल पोस्चर में रखनी पड़ती थी, क्योंकि उसका लेगस्पेस हल्का सा कम लग रहा था। उससे मेरी कुंडलिनी को जागृत करने वाली और पीठ में ऊपर चढ़ने वाली शक्ति मिली। लोग कह सकते हैं कि अगली दोनों टांगों का हाथ की तरह प्रयोग करने के लिए ही आदमी सीधा खड़ा हुआ। पर ऐसा तो गोरिल्ला आदि प्राइमेट भी करते हैं। आदिमानव भी ऐसा करते थे। उनकी पीठ तो बिल्कुल सीधी नहीं होती, और न ही हाथों का प्रयोग करने के लिए जरूरी लगती है। फिर विकसित आदमी की ही पीठ क्यों सीधी हुई। ऐसा दरअसल कुण्डलिनी को मूलाधार से मस्तिष्क तक आसानी से व निपुणता से चढ़ाने के लिए हुआ। कुंडलिनी आकाश की तरह सूक्ष्म होती है। इसका स्वभाव ऊपर की तरफ उठना होता है। तभी तो कुंडलिनी जागरण के समय लगता है कि कुंडलिनी ऊपर की तरफ तेजी व शक्ति से उड़ रही है। फिर कह सकते हैं कि फिर नाभि की सीध में पीठ में गड्ढा क्यों बना। वास्तव में वह रोलर कोस्टर के गड्ढे की तरह काम करता है। वह प्रश्वास की शक्ति से कुंडलिनी एनर्जी को मूलाधार से चूसकर अपने अंदर जमा करता रहता है। फिर काम करते हुए या योग करते हुए आदमी जब आगे की तरफ झुकता है, वह वेग को पकड़कर तेजी से दिमाग की तरफ ऊपर भाग जाती है। गर्दन के केंद्र पर जो विशुद्धि चक्र है, वहाँ भी एक ऐसा ही छोटा सा गड्ढा बनता है। वह भी इसी तरह निःश्वास की शक्ति से अनाहत चक्र पर इकट्ठी हुई कुंडलिनी एनर्जी को मूमेंटम प्रदान करके उसे ऊपर धकेलता है। इसी तरह, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर यौन ऊर्जा भंडारित होती है, जिसे ही योग के दौरान पीठ में ऊपर चढ़ाया जाता है।

काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है

उभयलिंगी जीव में यिन और यांग एक ही शरीर में इकट्ठे होते थे। इसका मतलब है कि वे पूर्ण आत्मा ही थे। क्योंकि उनमें विकास के लिए अपनी अलग इच्छा नहीँ थी, इसलिए उनका विकास अन्य कुदरती व जड़ वस्तुओं जैसे पहाड़, मिट्टी, आकाशीय पिंडों की तरह होता था। उस विकास की गति कुदरती और धीमी थी। फिर लिंग के विभाजन के साथ यिन-यांग का भी विभाजन हो गया। पुरुष वर्ग में यांग और स्त्री वर्ग में यिन की बहुलता हो गई। इस विभाजन से जीव को अपने अंदर अपूर्णता का अहसास हुआ। सम्भवतः इसी स्तर पर जीवात्मा की उत्पत्ति हुई। वह यिन और यांग को इकठ्ठा करके पूर्ण होने का प्रयास करने लगा। इससे काम भाव की उत्पत्ति हुई। इससे जीवों के पुरुष वर्ग और स्त्री वर्ग के बीच में परस्पर तीव्र आकर्षण पैदा हुआ। इसी काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है, क्योंकि इससे सबसे अधिक अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे कुण्डलिनी का विकास सबसे मजबूती और तेजी से होता है। यह हमने पिछली बहुत सी पोस्टों में अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया है कि अद्वैत, कुंडलिनी और आनंद साथ साथ रहते हैं। इसने विकास को कृत्रिमता और तेज गति प्रदान की। आज भी यह तांत्रिक कुण्डलिनी योग के रूप में मनुष्य को मुक्ति रूपी पूर्णता की प्राप्ति के लिए विकास श्रृंखला की अंतिम छलाँग लगाने में मदद कर रहा है। यह मूलाधार चक्र पर स्थित यिन (शक्ति) को सहस्रार में स्थित यांग (शिव) के साथ जोड़ता है। भारतीय दर्शन में यिन को प्रकृति और यांग को पुरुष कहा जाता है। यिन-यांग के मिलन से अद्वैत भाव पैदा होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को विकसित करता है। ऐसा नहीं है कि यिन-यांग का आकर्षण केवल स्त्री-पुरुष का ही आकर्षण होता है। यह किन्हीं भी विपरीत भावों के बीच में हो सकता है। मूलाधार अंधेरे, निम्नता, अज्ञान, घृणा आदि सभी निम्न भावों का प्रतीक है। इनके विपरीत सहस्रार प्रकाश, उच्चता, ज्ञान, प्रेम आदि सभी उच्च भावों का प्रतीक है। इसीलिए इन दोनों पर एकसाथ कुन्डलिनी ध्यान से तीव्र अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे सहस्रार में कुंडलिनी चमकने लगती है। यौन आकर्षण का मुख्य कार्य यही है कि इससे मूलाधार और सहस्रार चक्र तरोताजा और बलवान हो जाते हैं।

कुंडलिनी ही एक अधिकारी को सच्चा अधिकारी बनाती है

दोस्तों, अधिकारी मुझे बचपन से ही अच्छे लगते हैं। मुझे उनमें एक देवता का रूप नजर आता था। उनमें मुझे एक अपनेपन और सुरक्षा की भावना नजर आती थी। बदले में, अधिकारियों का भी मेरे प्रति एक विशेष प्रेम होता था। अधिकारी का जीवन जीते हुए अब मुझे यह समझ आ रहा है कि ऐसा क्यों होता था। 

अधिकारी देवता की तरह अद्वैतशील होते हैं

एक अधिकारी काम करते हुए भी कुछ काम नहीं करता। तभी तो कहा जाता है कि अधिकारी कुछ काम नहीं करते। वास्तव में एक अधिकारी सभी काम अद्वैत के साथ करता है।अद्वैत के साथ किया गया काम काम नहीं रह जाता। वही औरों से काम करवा सकता है, जो खुद न तो काम करता है, औऱ न ही निकम्मा रहता है। यह ऐसे ही है जैसे कि पानी की मझदार में न फंसा हुआ व्यक्ति ही पानी में फंसे हुए दूसरे व्यक्ति को पानी से बाहर निकाल सकता है। औरों से काम करवाना भी एक काम ही है। अद्वैत के साथ रहने से एक अधिकारी के काम न तो काम बने रहते हैं, और न ही निकम्मापन। एक प्रकार से उसके सारे काम काम की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं। यदि अधिकारी खाली बैठा रहे, तो वह निकम्मा कहलाएगा। निकम्मापन भी काम के ही दायरे में आता है, क्योंकि काम और निकम्मापन दोनों एक-दूसरे के सापेक्ष हैं, और एक-दूसरे से शक्ति प्राप्त करते हैं। इसलिए काम के दायरे से बाहर होने के लिए यह जरूरी है कि वह अद्वैत के साथ लगातार काम करता रहे। क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ रहते हैं, इसलिए प्रत्यक्ष तौर पर भी कुंडलिनी का सहारा लिया जा सकता है। तभी वह अपने अधीनस्थ लोगों से उत्तम श्रेणी का भरपूर काम ले सकता है।

देवताओं के सर्वोच्च अधिकारी भगवान गणपति भी अद्वैत की साक्षात मूर्ति हैं

भगवान गणेश जी को गणनायक, गणपति, गणनाथ, विघ्नेश आदि नामों से भी जाना जाता है। ये सभी नाम नेतृत्व के हैं। इसीलिए वे सभी देवताओं से पहले पूजे जाते हैं। शास्त्रों ने उन्हें विशेष रूप दिया है। उनका मुँह वाला भाग एक हाथी का है, और बाकी शरीर एक मनुष्य का है। यह रूप अद्वैत का परिचायक है। यह सुंदरता और कुरूपता के बीच के अद्वैत को इंगित करता है। यह उस शक्तिशाली अद्वैत को दर्शाने का एक प्रयास है, जो जानवर और मनुष्य के सहयोग से पैदा होता है। हाथी स्वयं भी अद्वैत भाव का परिचायक होता है। उसमें एक अद्वैतशील संत के जैसी मस्ती और बेफिक्री होती है। हाथी कामभाव व उससे संबंधित मूलाधार चक्र का भी परिचायक है, जो एक नायक या नेता के जैसे सबसे महत्त्वपूर्ण और सर्वप्रथम स्थान पर आता है।

एक सच्चे अधिकारी और कुंडलिनी योगी के बीच समानता

दोनों ही प्रकार के लोग अद्वैतशील होते हैं। दोनों में ही अनासक्ति होती है। दोनों ही हर समय आनन्दित और हंसमुख रहते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि कुंडलिनी योग से अधिकारी में निपुणता की कमी पूरी हो सकती है। इसलिए एक अधिकारी को कुण्डलिनी योग जरूर करना चाहिए। प्रेम प्रसंग से भी कुंडलिनी/अद्वैत का विकास होता है। तभी आपने देखा होगा कि अधिकांश अधिकारी वर्ग के लोग इश्क-मोहब्बत के कुछ ज्यादा ही दीवाने होते हैं।

एक अधिकारी के लिए “शरीरविज्ञान दर्शन” जैसे अद्वैत दर्शन की अहमियत

हिन्दू शास्त्र और पुराण अद्वैत की भावना का विकास करते हैं। इसलिए एक अधिकारी को प्रतिदिन उन्हें पढ़ना चाहिए। इसी कड़ी में प्रेमयोगी वज्र ने “शरीरविज्ञान दर्शन” नामक पुस्तक की रचना की है। उसे लोग आधुनिक पुराण भी कहते हैं, क्योंकि वह पूरी तरह से वैज्ञानिक है। कम से कम उसे पढ़ने में तो संकोच नहीं होना चाहिए। 

अद्वैत से ही काम करने की प्रेरणा मिलती है

यह आमतौर पर देखा जाता है कि अद्वैतशील आदमी के काम के आनंद और मस्ती को देखकर बाकी लोग भी काम करने लग जाते हैं। यदि कभी काम के लिए बोलना भी पड़ जाए तो वह इतनी मित्रता व प्यार से होता है कि वह आदेश प्रतीत नहीं होता। एक प्रकार से वह बोलना भी न बोलने के बराबर ही हो जाता है। असली अधिकारी का गुण भी यही है कि उसके संपर्क में आते ही लोग खुद ही अच्छे ढंग से काम करने लग जाते हैं। लोगों में अपनी अलग ही विकास की सोच पैदा हो जाती है। लोग अपने काम से आनन्दित और हँसमुख होने लगते हैं। यदि काम करवाने के लिए अधिकारी को बोलना पड़े या आदेश देना पड़े, तो इसका मतलब है कि अधिकारी के अद्वैतशील व्यवहार में कमी है। वास्तव में अधिकारी बोलते हुए भी नहीं बोलते, और आदेश देते हुए भी आदेश नहीं देते। सच्चे अधिकारी गजब के कलाकार होते हैं।

कुंडलिनी ही जादूगर का वह तोता है, जिसमें उसकी जान बसती है

दोस्तों, रशिया में एक कहावत है कि जादूगर की जान उसके तोते में बसती है। यह बात पूर्णतः सत्य न भी हो, तो भी इसका मैटाफोरक महत्त्व है। कुंडलिनी ही वह तोता है, जिससे जादूगर को शक्ति मिलती रहती है।

किसी भी चीज को कुंडलिनी बनाया जा सकता है

जादूगर एक तोते को कुंडलिनी बनाता है। तोता रंगीन व सुंदर होता है, इसलिए आसानी से ध्यानालम्बन या ध्यान-कुंडलिनी बन जाता है। तोता एक मैटाफोर भी हो सकता है। तोते का अर्थ कोई सुंदर रूप वाली चीज भी हो सकता है। जैसे कि प्रेमी, गुरु या कोई अन्य सुंदर चीज। सुंदर चीज से आसानी से प्यार हो जाता है और वह मन में बस जाती है। जादूगर योगी का मैटाफोर भी हो सकता है। जैसे योगी की शक्तियां उसकी कुंडलिनी के कारण होती हैं, वैसे ही जादूगर की शक्तियां उसके तोते के आश्रित होती हैं।


जादूगर/योगी अपने तोते/कुंडलिनी की सहायता से ही भ्रमजाल फैलाता है


जैसे योगी अपनी कुंडलिनी से अद्वैत को प्राप्त करता है, वैसे ही जादूगर अपने तोते से अद्वैत प्राप्त करता है। जादूगर जब भ्रम के जादू को फैलाता है, तब अद्वैत की शक्ति से ही वह भ्रम के जाल में नहीं फंसता। वैसा ही योगी भी करता है। आम लोग योगी की दुनियावी लीलाओं से भ्रमित होते रहते हैं, परंतु वह स्वयं भ्रम से अछूता रहता है।


तोते/कुंडलिनी के मरने से जादूगर/योगी निष्क्रिय सा हो जाता है


इसीसे भावनात्मक सदमा लगता है, जैसा कि मैंने पिछली पोस्टों में बयान किया है। वास्तव में, तोते/कुंडलिनी के साथ जादूगर/योगी का पूरा जीवनक्रम जुड़ा होता है। तोते/कुंडलिनी के नष्ट होने से उससे जुड़ी सारी घटनाएं, यादें व मनोवृत्तियां नष्ट सी हो जाती हैं। इससे वह घने अंधेरे में पूरी तरह से शांत सा हो जाता है। इसे भावनात्मक सदमा कहते हैं। इसे ही पतंजलि की असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसी परिस्थिति में कुंडलिनी जागरण हो सकता है। यदि इसे कुछ लंबे समय तक धारण किया जाए, तो आत्मज्ञान भी प्राप्त हो सकता है। औसतन लगभग छः महीने के अंदर आत्मज्ञान हो सकता है। इस स्थिति को संभालने के लिए यदि योग्य गुरु का सहयोग मिले, तो भावनात्मक सुरक्षा मिलती है।

ईश्वर सबसे बड़ा जादूगर है, जो तोते/कुंडलिनी से इस दुनिया के जादू को चलाता रहता है

हिंदु समेत विभिन्न धर्मों में ईश्वर को एक जादूगर या ऐंद्रजालिक माना गया है, जो अपने जादू या इंद्रजाल को खुले आसमान में फैलाता है। उससे यह दुनिया बन जाती है। वह पूर्ण अद्वैतशील है। इससे स्वयं सिद्ध हो जाता है कि उसके साथ उसकी कुंडलिनी (तोता) भी रहती है। उसी तोते को मायाशक्ति कहा गया है।

कुंडलिनी जागरण के लिए भावनात्मक सदमे की आवश्यकता

दोस्तों, मान्यता है कि भावनात्मक सदमे से भी कुंडलिनी जागरण होता है। यदि पहले से ही कुंडलिनी योग किया जा रहा हो, तब तो वह ज्यादा प्रभावी हो जाता है। आज मैं इसी से संबंधित अपना ताजा अनुभव बताऊंगा।

27 साल बाद व्हाट्सएप पर मुलाकात

सीनियर सेकंडरी स्कूल एजुकेशन के बाद कई सहपाठियों से पहली बार मुलाकात 27 साल बाद व्हाट्सएप पर हुई। अच्छा लग रहा था। पुरानी भावनाओं पर हरियाली छा रही थी। उसी क्लास के दौरान मेरी कुंडलिनी सबसे तेजी से विकसित हुई थी। कुंडलिनी का दूसरा नाम प्रेम भी है। सीधी सी बात है कि ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ मेरा अच्छा प्रेमपूर्ण संबंध था। ग्रुप मैंने शुरु किया था, हालांकि सदस्यों को जोड़ने का अधिकांश काम एक अनुभवी सदस्या ने किया था। कुछ दिन ग्रुप अच्छा चला। कुंडलिनी का मनोविज्ञान समझने के लिए मैं एक भावनात्मक सदस्या के बारे में विस्तार से जानना चाहता था। लेखन का औऱ कुंडलिनी रिसर्च का मुझे पहले से ही शौक है। सदस्या ने मेरा मेसेज पढ़ा और ट्यूशन आदि के लिए आए बच्चों की पढ़ाई खत्म होने के बाद बात करने का भरोसा उदासीन भाव के साथ दिया। यद्यपि वह पढ़ाई आज तक खत्म नहीं हो सकी। मैंने मान लिया कि पारिवारिक या अन्य मनोवैज्ञानिक कारणों से उसने ठीक ही किया होगा। क्योंकि विश्वास ही कुंडलिनी की पहचान है। पर मुझे उससे भावनात्मक सदमा लगा। वैसा भावनात्मक सदमा मुझे 2-3 बार पहले भी लग चुका था। वास्तव में ऐसा धोखा तब होता है, जब हम मन के संसार को असली मानने लगते हैं। पर वास्तव में दोनों में बहुत अंतर हो सकता है। मन में जो आपका सबसे बड़ा मित्र है, वह असल जीवन में आपका सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि प्रेम ही सबसे बड़ा मित्र है, और प्रेम ही सबसे बड़ा शत्रु भी है। एक पालतु पशु अपने मालिक से बहुत ज्यादा प्रेम करता है, और उससे दूर नहीं होना चाहता, पर वही मालिक उसे कसाई के हाथों सौंप देता है। तभी तो कहते हैं कि प्यार या विश्वास अंधा भी होता है। 

मानसिक आघात के बाहरी लक्षणों का पैदा होना

उस आघात से मैं बहुत सेंसिटिव व इमोशनल हो गया था। मैं ग्रुप में कुछ न कुछ लिखे जा रहा था। अन्य सदस्यों की छोटी-2 बातें मुझे चुभ रही थीं। इस वजह से मैंने दो सदस्यों को ग्रुप से निकाल दिया। उससे नाराज होकर एडमिन सदस्या भी निकल गई। हालाँकि मैंने उन्हें उसी समय दुबारा ग्रुप में शामिल कर दिया औऱ कहा कि वे चाहें तो निकाले गए सदस्यों को दुबारा दाखिल कर दें। मैं इमोशनल तो था ही , उससे मुझे उसके बाहर निकलने में भी पार्शियलिटी की बू आई, जिससे मेरा मन और डिस्टर्ब हो गया। उसके बाद उपरोक्त ट्यूशन मैडम जी भी बिना वजह बताए ग्रुप छोड़कर चली गईं। एक-एक करके लोग ग्रुप से बाहर जाने लगे। मैं ग्रुप से बाहर होने के उनके दुख को महसूस करने लगा। वही वजह बता कर मैंने भी भावनात्मक आवेश में आकर ग्रुप से किनारा कर लिया। हालांकि ऐसा चलता रहता है सोशल मीडिया में, पर यहाँ पर कुंडलिनी से जुड़ी संवेदनशीलता की बात हो रही है। उस शाम को मैं काफी रोया। रात को मुझे अपने सिरहाने के के नीचे रुमाल रखना पड़ा। दरअसल वो आँसू खुशी के थे, जो लंबे अरसे बाद दोस्तों से मिलकर आ रहे थे। मेरे पूरे शरीर और मन में थकान छा गई। मेरी पाचन प्रणाली गड़बड़ा गई। 

भावनात्मक सदमे के दौरान कुंडलिनी सर्ज

उसी भावनात्मक आघात वाली शाम को मेरी एनर्जी बार-2 मेरी पीठ से चढ़कर शरीर के आगे के भाग से नीचे उतर रही थी, एक बंद लूप में। कभी-कभी उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी भी जुड़ जाती थी। रात को नींद में अचानक बहुत सारी एनर्जी मेरी पीठ में ऊपर चढ़ी। उसके साथ में ऐसा स्वप्न आया कि मैं बहुत बड़े औऱ सुंदर मंदिर के द्वार से अंदर प्रविष्ट हो रहा हूँ। वह एनर्जी मेरे मस्तिष्क में समा रही थी। विशेष बात यह थी कि उस एनर्जी से मेरे मस्तिष्क में बिल्कुल भी दबाव पैदा नहीं हो रहा था, जैसा अक्सर होता है। शायद कई दिनों तक भरपूर नींद लेने से मेरा मस्तिष्क तरोताजा हो गया था। दूसरी वजह यह थी कि भावनात्मक सदमे से दिमाग खाली सा हो गया था। फिर मस्तिष्क में उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी जुड़ गई। वह कुंडलिनी जागरण जैसा अनुभव था, यद्यपि उसके स्तर तक नहीं पहुंच सका। 

कुंडलिनी के बारे में वर्णन केवल इसी वैबसाइट में मिलेगा

मैंने हर जगह अध्ययन किया। हर जगह केवल एनर्जी का ही वर्णन है, कुंडलिनी का कहीं नहीं। अधिकांश जगह एनर्जी को ही कुंडलिनी माना गया है। पर दोनों में बहुत अंतर है। बिना कुंडलिनी की एनर्जी तो वैसी भारतीय मिसाइल है, जिस पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित नहीं है। विशेष चीज, जो प्यार की निशानी है, और मानवता का असली विकास करने वाली है, वह कुंडलिनी ही है। एनर्जी तो केवल कुंडलिनी को जीवन्तता प्रदान करने का काम करती है। इस वेबसाइट के इलावा यदि कहीं कुंडलिनी का वर्णन है, तो वह “पतंजलि योगसूत्र” पुस्तक है। उसमें कुंडलिनी को ध्यानालम्बन कहा गया है। अधिकांश लोगों के मन में कुंडलिनी व शक्ति (एनर्जी) के स्वभाव के बीच में कन्फ्यूजन बना रहता है।

एक पुस्तक जिसने मुझे हर बार भावनात्मक सदमे से बचाया और उससे बाहर निकलने में मेरी मदद की

वह पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन”, जो इस वेबसाइट के “शॉप (लाईब्रेरी)” वेबपेज पर उपलब्ध है। विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं।

अद्वैत भाव के साथ मदिरा ही सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ है

उपरोक्त पुस्तक के साथ मदिरा ने मेरे रूपांतरण के साथ मेरी कुंडलिनी या आत्मा का विकास भी किया। खाली मदिरा कुंडलिनी को हानि पहुंचाती है। इस भावना के साथ थोड़ी सी मदिरा का भी बहुत ज्यादा असर होता था, और मदिरा की लत भी नहीं लगती थी। इसका अर्थ है कि पुराने समय में जो सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ बताया गया है, वह अद्वैत भावना वाले विधिविधान के साथ व उचित मात्रा में सेवन की गई उच्च कोटि की मदिरा ही है, कोई अन्य जादुई द्रव नहीं। देवता भी इसका पान करते हैं। 

प्रेम या सम्मान, दोनों में से एक से संतुष्ट हो जाते।
अन्यथा अपनी भावनाओं के भंडार की राह को प्रकाशित कर देते, हम स्वयं ही अन्वेषण कर लेेते।।

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कुण्डलिनी एक नाग की तरह

मित्रो, कुछ हफ्ते पहले मुझे एक प्राचीन नाग-मंदिर में सपरिवार जाने का मौक़ा मिला। वह काफी मशहूर है, और वहां पूरे श्रावण के महीने भर मेला लगता है। उस के गर्भगृह में मूर्तियों आदि के बारे में तो याद नहीं, पर वहां पर नाग का विशाल, रंगीन व दीवार पर पेंट किया गया चित्र दिल को छूने वाला था। वह शेषनाग की तरह था, जिस पर भगवान् नारायण शयन करते हैं। उसके बहुत से फण थे। मुझे वह कुछ जानी-पहचानी आकृति लग रही थी। वहां पर मेरी कुण्डलिनी भी तेजी से चमकने लगी, जिससे मुझे आनंद आने लगा। वह मुझे कुछ रहस्यात्मक पहेली लग रही थी, जिसे मेरा मन अनायास ही सुलझाने का प्रयास करने लगा।

नाग अन्धकार का प्रतीक  

मेरा पहला विश्लेषण यह था कि नारायण (भगवान) आम आदमी को अन्धकार स्वरूप दिखते हैं। माया के भ्रम के कारण उन्हें उनका प्रकाश नजर नहीं आता। इसीलिए अन्धकार के प्रतीक स्वारूप नाग को उनके साथ दिखाया गया है। फिर भी इस विश्लेषण से मैं पूरा संतुष्ट नहीं हुआ।

नाग कुण्डलिनी के प्रतीक के रूप में

मैं योगाइंडियाडॉटकोम की एक पोस्ट पढ़ रहा था। उसमें कुछ लिखा था, जिसका आशय मैंने यह समझा कि मूलाधार पर नाग साढे तीन चक्र/वलय लगाकर स्थित होता है। वह अपनी पूंछ को मुंह से दबा कर रखता है। जब कुण्डलिनी शक्ति उन वलयों से गुजारी जाती है, तब वह सीधा ऊपर उठकर मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक पहुँच जाता है। उसके साथ कुंडलिनी शक्ति भी होती है।

मैंने इससे निष्कर्ष निकाला कि हमारा नाड़ी तंत्र एक फण फैला कर उठे हुए नाग की तरह दिखता है, और उसी की तरह काम करता है। वैज्ञानिक तौर पर, नाड़ियों में संवेदना भी नाग की तरह लहरदार ढंग से ट्रेवल करती है। वज्र उस नाग की पूंछ है। उसे आधा वलय भी कह सकते हैं। अंडकोष वाला क्षेत्र पहला वलय/कुंडल है। उसके बाहर दूसरा घेरा मांस व तंतुओं का है। तीसरा घेरा हड्डी का है, जो मेरुदंड से जुड़ा होता है। जैसे ऊपर उठे हुए नाग की पीठ के निचले हिस्से में अन्दर की दिशा में एक बैंड/मोड़ होता है, वैसे ही हमारी पीठ के निचले हिस्से (नाभि के बिलकुल अपोजिट) में होता है। उसके बाद दोनों बाहर की ओर उभरते जाते हैं, और फिर दोनों में सिर का मोड़ आता है, जो लगभग एकसमान होता है। नाग के कई सिर इसलिए दिखाए गए हैं, क्योंकि हमारा सिर मेरुदंड से कई गुना चौड़ा व मोटा होता है, तुलनात्मक रूप से।

हमारा नाड़ी तंत्र एक नाग की तरह

रीढ़ की हड्डी के अन्दर नाड़ी को भी हम नाग की तरह अनुभव कर सकते हैं। दोनों में समानता मिलेगी। नाड़ियाँ भी  नाग की तरह या रस्सी की  तरह ही होती हैं। वज्र की नाड़ी को नाग की पूंछ समझो। वाही आधा चक्र भी हुई। स्वाधिष्ठान चक्र का सम्वेदना क्षेत्र (जहाँ कुण्डलिनी का ध्यान होता है) नाग का पहला चक्र/कुंडल/घेरा है। आसपास के क्षेत्र की नाड़ियाँ भी वहां जुड़ती हैं, वही नाग का पहला घेरा है। दूसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ वह नाड़ी सैक्रल प्लेक्सस/नाड़ियों के जाल से जुड़ती है। तीसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ सैक्रल प्लेक्सस स्पाईनल कोर्ड से मिलती है। वहां पर वह नाग/स्पाईनल कोर्ड ऊपर को खड़ा हो जाता है, और मोटा भी हो जाता है। पीठ के लम्बर क्षेत्र में उसमें पेट की तरफ गड्ढे वाला एक मोड़ आता है। अगला मोड़ ऊपर आता है, सिर के नजदीक। सिर के अन्दर का नाड़ी-पुंज उस सांप के अनेक फण हैं, जो कि स्पाईनल कोर्ड/नाग-शरीर से जुड़े होते हैं।

हमारे शरीर के कुण्डलिनी चक्र भगवान शेषनाग के शरीर के मुख्य बिंदु

इतना गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। सीधी सी बात है कि पूरा सैक्रल/सेक्सुअल एरिया नाग के चौड़ की तरह मोटा, गोलाकार व परतदार होता है। इसकी सारी संवेदना वज्र/पूंछ की संवेदना के साथ मिलकर ऊपर चली जाती है। जो नाग के मुख्य उभार बिंदु हैं, वे ही शरीर के सात चक्र हैं। वहीँ पर ध्यान के दौरान कुण्डलिनी ज्यादा चमकती रहती है। मूलाधार चक्र पर वज्र की शिखा जुड़ी होती है। आगे के स्वाधिष्ठान चक्र (वज्र के मूल) पर नाग की पूंछ (वज्र) कुंडलाकार रूप में गुथे हुए नाग के उस मुख्य शरीर से जुड़ी होती है, जो जमीन पर होता है। पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र पर नाग के ऊपर उठने से लगभग 90 डिग्री का कोण बनता है। पीछे के नाभि चक्र पर नाग के शरीर के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। पीछे के अनाहत चक्र पर नाग के शरीर में उभार आता है। पीछे के विशुद्धि चक्र में नाग के फण के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। उसके ऊपर पीछे के आज्ञा चक्र पर फिर से नाग के सिर/फण का उभार आता है। इसके ऊपर पूरा मस्तिष्क/ मस्तिष्क का सबसे ऊपरी स्थान जहाँ एक कुण्डलिनी संवेदना होती है (सिर के ऊपरी सतह के सबसे आगे वाले व सबसे पीछे वाले भाग के बीचोंबीच; यहाँ एक गड्ढा जैसा महसूस होता है, इसीलिए इसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं) नाग के एक हजार फणों के रूप में होता है। तभी तो उसे सहस्रार (एक हजार भाग वाला) कहते हैं। बीच वाले मुख्य फण पर कुण्डलिनी विद्यमान होती है।

ध्यान के दौरान नाग के साथ कुण्डलिनी-अनुभव

इसी ऊहापोह में मैं एक दिन तांत्रिक  विधि से ध्यान कर रहा था। मैं उपरोक्त तरीकों से नाग का ध्यान करने लगा। मुझे उसकी पूंछ/वज्र-शिखा पर कुंडलिनी उभरती हुई और सांप की तरह सरसराहट के साथ उसके फण/मेरे मस्तिष्क तक जाते हुए महसूस होने लगी। मस्तिष्क में वह काफी तेज, शांत व भगवान नारायण की तरह थी। ऐसा लगा कि जैसे भगवान नारायण ही कुंडलिनी के रूप में शेषनाग के ऊपर विलास कर रहे थे। साथ में मुझे उपरोक्त नाग-मंदिर के जैसी अनुभूति मिली। फिर मैं अध्यात्म में नाग के महत्त्व को समझ सका।

नाग का पूजन

लगभग सभी धर्मों में नाग को पवित्र व पूज्य माना जाता है। नारायण नाग पर शयन करते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर भी नाग विराजमान है। कई धर्मों में दो नाग आपस में लिपटे हुए दिखाए गए हैं। वे संभवतः यब-युम आसन में बंधे हुए दो तांत्रिक जोड़ीदार हैं।

नाग कुण्डलिनी नहीं है

मैंने कुंडलिनी को नाग के रूप में सुन रखा था। पर वह नाग नहीं है। वह नाग के शरीर/तंत्रिका तंत्र/नर्वस सिस्टम पर नाग की तरह चलती है। वैसे ही, जैसे विष्णु भगवान् नाग नहीं हैं, पर वे नाग के ऊपर विहार करते हैं।

नाग कुण्डलिनी को अतीरिक्त बल देता है

जरूरी नहीं कि कुण्डलिनी जागरण नाग के ध्यान से ही हो। प्रेमयोगी वज्र ने  तो नाग का ध्यान नहीं किया था। उसने एकबार कुण्डलिनी को अपने शरीर के अन्दर सीधा ऊपर उठते हुए अनुभव किया था, जैसे एक हैलीकोप्टर हवा में सीधा ऊपर उठता है। नाग के ध्यान से तो केवल उसे उठने के लिए अतिरिक्त बल ही मिलता है। इसीलिए तो अधिकांश बड़े देवी-देवताओं के साथ नाग दिखाया गया होता है।

शेषनाग के सिर पर पृथ्वी

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि शेषनाग/मल्टी हूडिड सर्पेंट ने अपने सिर पर सारी धरती को धारण किया हुआ है। वास्तव में यह शेषनाग हमारा अपना उपरोक्त तंत्रिका तंत्र ही है। सारी धरती हमारे इसी तंत्रिका तंत्र/मस्तिष्क में अनुभव के रूप में ही है। वास्तव में स्थूल और बाहर तो कुछ भी नहीं है। यही अंतिम वाक्य अध्यात्म का मूल मन्त्र है।

संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी का आरोपण

हरेक शारीरिक संवेदना नाड़ी से होकर मस्तिष्क को जाती है। जब उस पर कुण्डलिनी/एक विशेष मानसिक चित्र का आरोपण किया जाता है, तब वह भी उसके साथ मस्तिष्क में पहुँच जाती है। शरीर की सर्वाधिक तीव्र व आनंदप्रद संवेदना वज्र-शिखा की है। इसलिए उसपर आरोपित कुण्डलिनी मस्तिष्क में जीवंत हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में शयन करती है। वास्तव में मूलाधार चक्र में वज्र-शिखा को ही दर्शाया गया है, दोनों एक काल्पनिक रेखा से जुड़ते हुए। उसे ही नाग की पूंछ कहते हैं। आम आदमी में वहां पर कुण्डलिनी सोई हुई होती है। इसका अर्थ है कि वहां पर कुण्डलिनी जागृत नहीं हो सकती। जागरण के लिए उसे मस्तिष्क में ले जाना पड़ता है। नाग ने अपनी पूंछ को मुंह में दबाया होता है। इसका अर्थ है कि कुण्डलिनी वज्र से शुरू होकर वीर्यपात के रूप में वज्र पर ही वापिस आ जाती है, और वहां से बाहर बर्बाद हो जाती है। अपने कुंडल खोलकर नाग के सीधे खड़े होने का मतलब है कि कुण्डलिनी को सीधी दिशा में वज्र शिखा से मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक ले जाया जाता है, बार-2 सैक्सुअल क्षेत्र में घुमाया नहीं जाता। ऐसी भावना की जा सकती है कि पूरे यौन क्षेत्र (जो एक फण उठाए हुए बड़े नाग के जमीनी ढेर/घड़े जैसी आकृति का है) में चारों तरफ से डूबी/सरोबार कुण्डलिनी उससे शक्ति लेकर सीधी ऊपर फण तक चली जाती है। फण/मस्तिष्क पर कुण्डलिनी को मजबूत किया जाता है, और उसे वीर्यपात के रूप में वज्र तक वापिस नहीं उतारा जाता। हालांकि, कुंडलिनी को धीरे-धीरे सामने/आगे के चक्रों के माध्यम से नीचे ले जाया जा सकता है, जिससे वे मजबूत हो जाते हैं। संस्कृत शब्द कुण्डलिनी का अर्थ है, कुंडल/कोइल वाली। अर्थात एक मानसिक आकृति जो कुंडल/नाग पर विराजमान है।

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