हे! पर्वतराज करोल [भक्तिगीत-कविता]

King Mount Karol 【Parvatraj Karol】 rising with Sun
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

सुबह-सवेरे जब भी उठता
तू ही सबसे पहले दिखता।
सुबह-सवेरे जब भी उठता
तू ही सबसे पहले दिखता।
सूरज का दीपक मस्तक पर
ले के जग को रौशन करता।
सूरज का दीपक मस्तक पर
ले के जग को रौशन करता।
सूरज को डाले जल से तू
सूरज को डाले जल से तू
सूरज संग नहाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

काम बोझ से जब भी थकता
सर ऊपर कर तुझको तकता।
काम बोझ से जब भी थकता
सर ऊपर कर तुझको तकता।
दर्शन अचल वदन होने से
काम से हरगिज़ न रुक सकता।
दर्शन अचल वदन होने से
काम से हरगिज़ न रुक सकता।
कर्मयोग का पावन झरना
कर्मयोग का पावन झरना
पल-पल तूने बहाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

बदल गए सब रिश्ते नाते
बदल गया संसार ये सारा।
बदल गए सब रिश्ते नाते
बदल गया संसार ये सारा।
मित्र-मंडली छान के रख दी
हर-इक आगे काल के हारा।
मित्र-मंडली छान के रख दी
हर-इक आगे काल के हारा।
खुशकिस्मत हूँ तेरे जैसा
खुशकिस्मत हूँ तेरे जैसा
मीत जो मन का पाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

सबसे ऊंचे पद पर रहता
कहलाए देवों का दे-वता।
सबसे ऊंचे पद पर रहता
कहलाए देवों का दे-वता।
उठकर मूल अधार से प्राणी
रोमांचित मस्तक पर होता।
उठकर मूल अधार से प्राणी
रोमांचित मस्तक पर होता।
सब देवों ने मिलकर तेरा 
सब देवों ने मिलकर तेरा
प्यारा रूप बनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।

जटा बूटियाँ तेरे अंदर
नाग मोरनी मानुष बंदर।
जटा बूटियाँ तेरे अंदर
नाग मोरनी मानुष बंदर।
गंगा नद नाले और झरने
नेत्र तीसरा भीषण कन्दर।
गंगा नद नाले और झरने
नेत्र तीसरा भीषण कन्दर।

चन्द्र मुकुट पर तोरे सोहे
बरबस ही मोरा मन मोहे।
चन्द्र मुकुट पर तोरे सोहे
बरबस ही मोरा मन मोहे।
उपपर्वत नीचे तक जो है
नंदी वृष पर बैठे सो है।
उपपर्वत नीचे तक जो है
नंदी वृष पर बैठे सो है।

बिजली सी गौरा विराजे
कड़कत चमकत डमरू बाजे।
बिजली सी गौरा विराजे
कड़कत चमकत डमरू बाजे।
आंधी से हिलते-डुलते वन
नटराजन के जैसे साजे।
आंधी से हिलते-डुलते वन
नटराजन के जैसे साजे।

बाघम्बर बदली का फूल
धुंध बनी है भस्म की धूल।
बाघम्बर बदली का फूल
धुंध बनी है भस्म की धूल।
गणपत जल बन बरसे ऊपर
ऋतु मिश्रण का है तिरशूल।
गणपत जल बन बरसे ऊपर
ऋतु मिश्रण का है तिरशूल।

मन-भावन इस रूप में तेरे
मन-भावन इस रूप में तेरे
शिव का रूप समाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
जब जग ने ठुकराया
तू-ने अपनाया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल
तेरा अद्भुत साया।
हे! पर्वतराज करोल।
-हृदयेश बाल🙏🙏bhishm

कुण्डलिनी ही जैव विकास का मुख्य उद्देश्य है

मित्रो, मैंने पिछ्ली एक पोस्ट में बताया था कि मैंने अपने मन की चेतना के स्तर के अनुसार कुंडलिनी को विभिन्न चक्रों पर अनुभव किया। ज्यादा चेतना होने पर कुंडलिनी ऊपर के चक्रों पर आई, तथा कम चेतना होने पर नीचे के चक्रों पर आई। वास्तव में चेतना का स्तर शुद्ध मन से मापा जाता है, बाह्य इंद्रियों से संयुक्त मन से नहीं। बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से तो सभी लोग और बहुत से अन्य जीव चेतना से भरे होते हैं। मरने के बाद तो बाह्य इन्द्रियाँ रहती नहीं हैं। उस समय तो शुद्ध मन की सूक्ष्म चेतना ही काम आती है। आँखों से कुछ देखते समय मन में चेतना की बाढ़ सी महसूस होती है। वह चेतना आँखों के बल से पैदा होती है, मन के अपने बल से नहीँ। इसी तरह अन्य बाह्य इंद्रियों के मामले में भी समझना चाहिये। जैसे-जैसे मन की काबलियत भीतर से भीतर जाते हुए सूक्ष्मता में चेतना प्रकट करने की बढ़ती है, वैसे-वैसे ही वह मुक्ति के अधिक योग्य बनता जाता है। कुण्डलिनी उसकी इसी योग्यता को बढ़ाती है। कुंडलिनी ध्यान के समय आँखें बंद होने के साथ लगभग सभी बाह्य इंद्रियों के दरवाजे बंद होते हैं। फिर भी योग ध्यान की शक्ति से मन में प्रज्वलित हो रही कुंडलिनी में इतनी चेतना आ जाती है, जितनी बाह्य इन्द्रियों के सहयोग से भी नहीं आती। वर्षों के ऐसे लगातार अभ्यास से बिना कुण्डलिनी के शांत, विचाररहित मन में भी इतनी ही चेतना आ जाती है। इसे ही आत्मज्ञान कहते हैं। दरअसल मन भी बाह्य इन्द्रियों का एक सूक्ष्म रूप ही है।  विचाररहित मन को ही अक्सर आत्मा कहा जाता है। 

वास्तव में विकसित हो रहे जीवों के रूप में कुंडलिनी ही विकसित हो रही होती है। दरअसल कुंडलिनी मन का ही द्योतक है। कुंडलिनी ही सबसे उच्च स्तर का मानसिक विचार है। इसलिए हम कुंडलिनी की चेतना के स्तर से मन की चेतना का स्तर नाप सकते हैं।

कुंडलिनी के काम करने के लिए उसी न्यूरोनल ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो मस्तिष्क या दिमाग के काम करने के लिए आवश्यक होती है। उस न्यूरोनल ऊर्जा को प्राण ऊर्जा या प्राणशक्ति द्वारा उत्तेजित किया जाता है, जो पूरे शरीर की सामान्यीकृत ऊर्जा है। तो दोनों एक ही ईंधन से प्रेरित होते हैं इसीलिए दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। लेकिन सृजन का मुख्य उद्देश्य जीव को अंतिम स्थिति प्रदान करना है। यह कुंडलिनी द्वारा किया जाता है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी विकास ही सृजन का प्राथमिक लक्ष्य है, मस्तिष्क का विकास नहीं। मस्तिष्क का विकास अनिच्छा से खुद ही होता है। यह सह-प्रभाव के रूप में है, यद्यपि यह कुप्रभाव भी बन सकता है, यदि इसे गलत दिशा में लगाया जाए। कई पुरानी सभ्यताओं ने इस तथ्य को अच्छी तरह से समझा और कुंडलिनी पर मुख्य ध्यान रखा। तभी तो उस समय विभिन्न आध्यात्मिक पद्धतियों का बोलबाला था। आज, कुंडलिनी-घटनाऐं दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं, क्योंकि आज के युग का मस्तिष्क विकास भी अप्रत्यक्ष रूप से कुंडलिनी विकास का कारण बन रहा है। इसलिए, कुंडलिनी विकास और मस्तिष्क या विश्व विकास को एक साथ करना ही सबसे अच्छा तरीका है, ताकि कम से कम समय में कुंडलिनी जागरण हो सके। इसके लिए कर्मयोग भी एक अच्छा तरीका है।

कुंडलिनी चेतना के विकास का पैमाना है। कुण्डलिनी के सुषुप्त होने का अर्थ है कि मन सोया हुआ है। सोया इसलिए कहते हैं क्योंकि मन की चेतना कभी खत्म नहीं होती, केवल अप्रकट हो जाती है अर्थात सो जाती है। उस समय चेतन मन के स्थान पर अंधेरा ही होता है। आत्मज्ञान के बाद कुंडलिनी लगातार मन में उच्च चेतना के साथ छाई रहती है, जिसे हम समाधि कहते हैं। इसे कुंडलिनी के पूर्ण जागरण की सबसे क़रीबी अवस्था कह सकते हैं। इन दोनोँ विपरीत छोरों के बीच में अधिकांश जीव होते हैं। उनकी कुंडलिनी की चेतना का बल्ब कभी जलता रहता है, कभी धीमा पड़ जाता है, तो कभी बुझ जाता है।

कुण्डलिनी विकास के रूप में जीव विकास

योग के बारे में सुनने में आता है कि कुण्डलिनी (नाड़ी-ऊर्जा) ही विभिन्न जीवों के रूप में ऊपर चढ़ती रहती है। सबसे निम्न जीवों में व पेड़-पौधों में यह मूलाधार में सुषुप्त रहती है। इसे कुंडलिनी शक्ति या प्राण शक्ति भी कहते हैं। वास्तव में, उनमें भी यह शरीर को बनाए रखने के लिए जीव द्वारा अनुभव किए बिना ही पृष्ठभूमि में हमेशा काम करती रहती है। यह ऐसे ही है, जैसे एक आदमी जब सोया होता है, तब उसकी चेतना लुप्त होती है, पर वह शरीर को जीवित रखने वाले सभी काम तब भी कर रही होती है। यह पूरे शरीर में वितरित रहती है, लेकिन इसे मूलाधार चक्र में निवसित कहा जाता है, क्योंकि यह इसके विकास और पोषण का मुख्य स्थान है। यह ऐसा ही है, जैसे कि एक आदमी दुनिया में हर जगह भटक सकता है, लेकिन वह अपने विकास, पोषण और आराम(नींद) को मुख्य रूप से अपने घर पर ही प्राप्त करता है। साथ में, कुण्डलिनी मूलाधार चक्र से ही अपनी लम्बी यात्रा शुरु करती है। अचेतन मन और मूलाधार चक्र, दोनों को समान कहा जाता है, और दोनों को सबसे बुरी भावनाओं से जोड़ा जाता है। आगे जो कहा गया है कि कुंडलिनी की शुरुआत मूलाधार चक्र से ही होती है, इसका अर्थ है कि प्रकाश की ओर यात्रा अंधेरे से ही शुरू होती है। उससे थोड़े विकसित जीवों में यह मूलाधार में अत्यल्प जागृत अवस्था में आ जाती है। इन्हें उभयलिंगी या हेर्मैप्रोडिटिक कहा जा सकता है। सम्भवतः इसी स्तर पर पूर्ण आत्मा सहस्रार से गिरकर मूलाधार के गड्ढे में फंस कर सो गई थी। इसीलिए तो उस जीव का यिन या स्त्री और यांग या पुरुष रूप में विभाजन हुआ, ताकि एक-दूसरे के प्रति आकर्षण से आत्मा मूलाधार से ऊपर चढ़ते हुए पुनः सहस्रार में प्रविष्ट हो सके। मूलाधार के वर्चस्व वाले सबसे निम्न जीवों के पास अपशिष्ट शरीर उत्पादों के उन्मूलन के अलावा बाहरी ऊर्जावान कार्य करने के लिए कुछ भी नहीं है। यह गुदा द्वार के पास स्थित मूलाधार चक्र का कार्य है। इसलिए उनकी कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार चक्र में केंद्रित कहा जाता है। उससे विकसित जीवों में यह स्वाधिष्ठान चक्र तक ऊपर चढ़ जाती है।  यहां जीव का यौन विभाजन होता है और वह यौन आकर्षण के साथ यौन इच्छा महसूस करने लगता है। तभी तो देखा जाता है कि निम्न जीवों में प्रजनन की गति बहुत तेज होती है। उसमें उनकी अधिकांश ऊर्जा का व्यय हो जाता है। यह कुंडलिनी या जीव विकास के लिए अद्भुत बल प्रदान करता है। यह बल आज के विकसित मानव में भी लगातार काम कर रहा है। मध्यम विकसित जीवों में यह नाभि चक्र में आ जाती है। तभी तो अधिकांश निम्न जीव रात-दिन खाने में ही लगे रहते हैं। उच्च कोटि के प्राणी में जैसे सम्भवतः गाय में व प्रेममयी मनुष्य में यह हृदय चक्र में आ जाती है। संभवतः तभी तो गाय वात्सल्य स्नेह से भरी हुई होती है। गाय में पाचन का अधिकांश काम सूक्ष्म जीव करते हैं, इसलिए ऊर्जा की काफी बचत हो जाती है। बबून, गोरिल्ला आदि जैसे प्राइमेट्स में, कुंडलिनी ऊर्जा आगे उनकी भुजाओं या फ़ॉर्लिम्ब्स तक चली जाती है, इसीलिए वे अधिकतम रूप से अपने फ़ॉर्लिम्ब फ़ंक्शन का उपयोग करते हैं। इसी तरह, कोयल जैसे सुंदर गायन करने वाले पक्षी में, गले के चक्र में कुंडलिनी ऊर्जा को केंद्रित कहा जा सकता है। डॉल्फिन जैसे विश्लेषणात्मक कौशल वाले बुद्धिमान जानवरों में, इसे आज्ञा चक्र तक आने वाला कहा जा सकता है। यह मानव में ही सहस्रार चक्र तक आ सकती है, वह भी उचित मस्तिष्क-अभ्यास के साथ, क्योंकि केवल वही इसे जागृत कर सकता है, और जागरण का स्थान भी केवल सहस्रार ही है। सबसे उच्च कोटि के मनुष्य में यह सहस्रार में पूर्ण रूप से जाग जाती है।

कुंडलिनी के सात चक्र सात लोकों क़े रूप में हैं

शास्त्रों में ऊपर के सात लोकों का वर्णन आता है। ये सात लोक सात चक्रों के रूप में हैं। सबसे निम्न लोक मूलाधार चक्र है, क्योंकि उस स्तर के जीवों में सबसे कम चेतना होती है। उसके ऊपर के लोकों या चक्रों में जाते हुए चेतना का स्तर बढ़ता रहता है। सहस्रार में यह स्तर सर्वाधिक होता है। कुंडलिनी जागरण अर्थात शिव और शिवा के मिलन के समय चेतना का स्तर पूर्ण हो जाता है, जिससे उसे शिवलोक या ब्रह्मलोक कहते हैं। वैसे तो मूलाधार के नीचे भी पाताल के सात लोक बताए गए हैं। उनमें भी चेतना क्रमशः नीचे की ओर गिरती रहती है। इन लोकों में अधिकांशतः राक्षसों का का निवास बताया गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनकी चेतना का स्तर इतना अधिक गिर गया होता है कि ये देवताओं, साधुओं व उच्च चेतना वाले अन्य जीवों से द्रोह करते रहते हैं। धरती को मूलाधार चक्र के समकक्ष माना गया है। ऊपर के आसमान के लोक उच्च लोक हैं, जबकि धरती के नीचे पाताल लोक हैं।

आदमी का सीधा खड़ा होना और पीठ में गड्ढा बनना भी जैव विकास श्रृंखला की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है

मैंने एक पुरानी पोस्ट में बताया था कि कैसे अपनी नई कार में बैठकर मुझे उसे चलाते हुए लगातार अपनी पीठ सीधी और नेचरल पोस्चर में रखनी पड़ती थी, क्योंकि उसका लेगस्पेस हल्का सा कम लग रहा था। उससे मेरी कुंडलिनी को जागृत करने वाली और पीठ में ऊपर चढ़ने वाली शक्ति मिली। लोग कह सकते हैं कि अगली दोनों टांगों का हाथ की तरह प्रयोग करने के लिए ही आदमी सीधा खड़ा हुआ। पर ऐसा तो गोरिल्ला आदि प्राइमेट भी करते हैं। आदिमानव भी ऐसा करते थे। उनकी पीठ तो बिल्कुल सीधी नहीं होती, और न ही हाथों का प्रयोग करने के लिए जरूरी लगती है। फिर विकसित आदमी की ही पीठ क्यों सीधी हुई। ऐसा दरअसल कुण्डलिनी को मूलाधार से मस्तिष्क तक आसानी से व निपुणता से चढ़ाने के लिए हुआ। कुंडलिनी आकाश की तरह सूक्ष्म होती है। इसका स्वभाव ऊपर की तरफ उठना होता है। तभी तो कुंडलिनी जागरण के समय लगता है कि कुंडलिनी ऊपर की तरफ तेजी व शक्ति से उड़ रही है। फिर कह सकते हैं कि फिर नाभि की सीध में पीठ में गड्ढा क्यों बना। वास्तव में वह रोलर कोस्टर के गड्ढे की तरह काम करता है। वह प्रश्वास की शक्ति से कुंडलिनी एनर्जी को मूलाधार से चूसकर अपने अंदर जमा करता रहता है। फिर काम करते हुए या योग करते हुए आदमी जब आगे की तरफ झुकता है, वह वेग को पकड़कर तेजी से दिमाग की तरफ ऊपर भाग जाती है। गर्दन के केंद्र पर जो विशुद्धि चक्र है, वहाँ भी एक ऐसा ही छोटा सा गड्ढा बनता है। वह भी इसी तरह निःश्वास की शक्ति से अनाहत चक्र पर इकट्ठी हुई कुंडलिनी एनर्जी को मूमेंटम प्रदान करके उसे ऊपर धकेलता है। इसी तरह, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर यौन ऊर्जा भंडारित होती है, जिसे ही योग के दौरान पीठ में ऊपर चढ़ाया जाता है।

काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है

उभयलिंगी जीव में यिन और यांग एक ही शरीर में इकट्ठे होते थे। इसका मतलब है कि वे पूर्ण आत्मा ही थे। क्योंकि उनमें विकास के लिए अपनी अलग इच्छा नहीँ थी, इसलिए उनका विकास अन्य कुदरती व जड़ वस्तुओं जैसे पहाड़, मिट्टी, आकाशीय पिंडों की तरह होता था। उस विकास की गति कुदरती और धीमी थी। फिर लिंग के विभाजन के साथ यिन-यांग का भी विभाजन हो गया। पुरुष वर्ग में यांग और स्त्री वर्ग में यिन की बहुलता हो गई। इस विभाजन से जीव को अपने अंदर अपूर्णता का अहसास हुआ। सम्भवतः इसी स्तर पर जीवात्मा की उत्पत्ति हुई। वह यिन और यांग को इकठ्ठा करके पूर्ण होने का प्रयास करने लगा। इससे काम भाव की उत्पत्ति हुई। इससे जीवों के पुरुष वर्ग और स्त्री वर्ग के बीच में परस्पर तीव्र आकर्षण पैदा हुआ। इसी काम भाव का जीवविकास में सबसे ज्यादा योगदान है, क्योंकि इससे सबसे अधिक अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे कुण्डलिनी का विकास सबसे मजबूती और तेजी से होता है। यह हमने पिछली बहुत सी पोस्टों में अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया है कि अद्वैत, कुंडलिनी और आनंद साथ साथ रहते हैं। इसने विकास को कृत्रिमता और तेज गति प्रदान की। आज भी यह तांत्रिक कुण्डलिनी योग के रूप में मनुष्य को मुक्ति रूपी पूर्णता की प्राप्ति के लिए विकास श्रृंखला की अंतिम छलाँग लगाने में मदद कर रहा है। यह मूलाधार चक्र पर स्थित यिन (शक्ति) को सहस्रार में स्थित यांग (शिव) के साथ जोड़ता है। भारतीय दर्शन में यिन को प्रकृति और यांग को पुरुष कहा जाता है। यिन-यांग के मिलन से अद्वैत भाव पैदा होता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को विकसित करता है। ऐसा नहीं है कि यिन-यांग का आकर्षण केवल स्त्री-पुरुष का ही आकर्षण होता है। यह किन्हीं भी विपरीत भावों के बीच में हो सकता है। मूलाधार अंधेरे, निम्नता, अज्ञान, घृणा आदि सभी निम्न भावों का प्रतीक है। इनके विपरीत सहस्रार प्रकाश, उच्चता, ज्ञान, प्रेम आदि सभी उच्च भावों का प्रतीक है। इसीलिए इन दोनों पर एकसाथ कुन्डलिनी ध्यान से तीव्र अद्वैतभाव पैदा होता है, जिससे सहस्रार में कुंडलिनी चमकने लगती है। यौन आकर्षण का मुख्य कार्य यही है कि इससे मूलाधार और सहस्रार चक्र तरोताजा और बलवान हो जाते हैं।

कुंडलिनी ही एक अधिकारी को सच्चा अधिकारी बनाती है

दोस्तों, अधिकारी मुझे बचपन से ही अच्छे लगते हैं। मुझे उनमें एक देवता का रूप नजर आता था। उनमें मुझे एक अपनेपन और सुरक्षा की भावना नजर आती थी। बदले में, अधिकारियों का भी मेरे प्रति एक विशेष प्रेम होता था। अधिकारी का जीवन जीते हुए अब मुझे यह समझ आ रहा है कि ऐसा क्यों होता था। 

अधिकारी देवता की तरह अद्वैतशील होते हैं

एक अधिकारी काम करते हुए भी कुछ काम नहीं करता। तभी तो कहा जाता है कि अधिकारी कुछ काम नहीं करते। वास्तव में एक अधिकारी सभी काम अद्वैत के साथ करता है।अद्वैत के साथ किया गया काम काम नहीं रह जाता। वही औरों से काम करवा सकता है, जो खुद न तो काम करता है, औऱ न ही निकम्मा रहता है। यह ऐसे ही है जैसे कि पानी की मझदार में न फंसा हुआ व्यक्ति ही पानी में फंसे हुए दूसरे व्यक्ति को पानी से बाहर निकाल सकता है। औरों से काम करवाना भी एक काम ही है। अद्वैत के साथ रहने से एक अधिकारी के काम न तो काम बने रहते हैं, और न ही निकम्मापन। एक प्रकार से उसके सारे काम काम की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं। यदि अधिकारी खाली बैठा रहे, तो वह निकम्मा कहलाएगा। निकम्मापन भी काम के ही दायरे में आता है, क्योंकि काम और निकम्मापन दोनों एक-दूसरे के सापेक्ष हैं, और एक-दूसरे से शक्ति प्राप्त करते हैं। इसलिए काम के दायरे से बाहर होने के लिए यह जरूरी है कि वह अद्वैत के साथ लगातार काम करता रहे। क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी हमेशा साथ रहते हैं, इसलिए प्रत्यक्ष तौर पर भी कुंडलिनी का सहारा लिया जा सकता है। तभी वह अपने अधीनस्थ लोगों से उत्तम श्रेणी का भरपूर काम ले सकता है।

देवताओं के सर्वोच्च अधिकारी भगवान गणपति भी अद्वैत की साक्षात मूर्ति हैं

भगवान गणेश जी को गणनायक, गणपति, गणनाथ, विघ्नेश आदि नामों से भी जाना जाता है। ये सभी नाम नेतृत्व के हैं। इसीलिए वे सभी देवताओं से पहले पूजे जाते हैं। शास्त्रों ने उन्हें विशेष रूप दिया है। उनका मुँह वाला भाग एक हाथी का है, और बाकी शरीर एक मनुष्य का है। यह रूप अद्वैत का परिचायक है। यह सुंदरता और कुरूपता के बीच के अद्वैत को इंगित करता है। यह उस शक्तिशाली अद्वैत को दर्शाने का एक प्रयास है, जो जानवर और मनुष्य के सहयोग से पैदा होता है। हाथी स्वयं भी अद्वैत भाव का परिचायक होता है। उसमें एक अद्वैतशील संत के जैसी मस्ती और बेफिक्री होती है। हाथी कामभाव व उससे संबंधित मूलाधार चक्र का भी परिचायक है, जो एक नायक या नेता के जैसे सबसे महत्त्वपूर्ण और सर्वप्रथम स्थान पर आता है।

एक सच्चे अधिकारी और कुंडलिनी योगी के बीच समानता

दोनों ही प्रकार के लोग अद्वैतशील होते हैं। दोनों में ही अनासक्ति होती है। दोनों ही हर समय आनन्दित और हंसमुख रहते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि कुंडलिनी योग से अधिकारी में निपुणता की कमी पूरी हो सकती है। इसलिए एक अधिकारी को कुण्डलिनी योग जरूर करना चाहिए। प्रेम प्रसंग से भी कुंडलिनी/अद्वैत का विकास होता है। तभी आपने देखा होगा कि अधिकांश अधिकारी वर्ग के लोग इश्क-मोहब्बत के कुछ ज्यादा ही दीवाने होते हैं।

एक अधिकारी के लिए “शरीरविज्ञान दर्शन” जैसे अद्वैत दर्शन की अहमियत

हिन्दू शास्त्र और पुराण अद्वैत की भावना का विकास करते हैं। इसलिए एक अधिकारी को प्रतिदिन उन्हें पढ़ना चाहिए। इसी कड़ी में प्रेमयोगी वज्र ने “शरीरविज्ञान दर्शन” नामक पुस्तक की रचना की है। उसे लोग आधुनिक पुराण भी कहते हैं, क्योंकि वह पूरी तरह से वैज्ञानिक है। कम से कम उसे पढ़ने में तो संकोच नहीं होना चाहिए। 

अद्वैत से ही काम करने की प्रेरणा मिलती है

यह आमतौर पर देखा जाता है कि अद्वैतशील आदमी के काम के आनंद और मस्ती को देखकर बाकी लोग भी काम करने लग जाते हैं। यदि कभी काम के लिए बोलना भी पड़ जाए तो वह इतनी मित्रता व प्यार से होता है कि वह आदेश प्रतीत नहीं होता। एक प्रकार से वह बोलना भी न बोलने के बराबर ही हो जाता है। असली अधिकारी का गुण भी यही है कि उसके संपर्क में आते ही लोग खुद ही अच्छे ढंग से काम करने लग जाते हैं। लोगों में अपनी अलग ही विकास की सोच पैदा हो जाती है। लोग अपने काम से आनन्दित और हँसमुख होने लगते हैं। यदि काम करवाने के लिए अधिकारी को बोलना पड़े या आदेश देना पड़े, तो इसका मतलब है कि अधिकारी के अद्वैतशील व्यवहार में कमी है। वास्तव में अधिकारी बोलते हुए भी नहीं बोलते, और आदेश देते हुए भी आदेश नहीं देते। सच्चे अधिकारी गजब के कलाकार होते हैं।

कुंडलिनी ही जादूगर का वह तोता है, जिसमें उसकी जान बसती है

दोस्तों, रशिया में एक कहावत है कि जादूगर की जान उसके तोते में बसती है। यह बात पूर्णतः सत्य न भी हो, तो भी इसका मैटाफोरक महत्त्व है। कुंडलिनी ही वह तोता है, जिससे जादूगर को शक्ति मिलती रहती है।

किसी भी चीज को कुंडलिनी बनाया जा सकता है

जादूगर एक तोते को कुंडलिनी बनाता है। तोता रंगीन व सुंदर होता है, इसलिए आसानी से ध्यानालम्बन या ध्यान-कुंडलिनी बन जाता है। तोता एक मैटाफोर भी हो सकता है। तोते का अर्थ कोई सुंदर रूप वाली चीज भी हो सकता है। जैसे कि प्रेमी, गुरु या कोई अन्य सुंदर चीज। सुंदर चीज से आसानी से प्यार हो जाता है और वह मन में बस जाती है। जादूगर योगी का मैटाफोर भी हो सकता है। जैसे योगी की शक्तियां उसकी कुंडलिनी के कारण होती हैं, वैसे ही जादूगर की शक्तियां उसके तोते के आश्रित होती हैं।


जादूगर/योगी अपने तोते/कुंडलिनी की सहायता से ही भ्रमजाल फैलाता है


जैसे योगी अपनी कुंडलिनी से अद्वैत को प्राप्त करता है, वैसे ही जादूगर अपने तोते से अद्वैत प्राप्त करता है। जादूगर जब भ्रम के जादू को फैलाता है, तब अद्वैत की शक्ति से ही वह भ्रम के जाल में नहीं फंसता। वैसा ही योगी भी करता है। आम लोग योगी की दुनियावी लीलाओं से भ्रमित होते रहते हैं, परंतु वह स्वयं भ्रम से अछूता रहता है।


तोते/कुंडलिनी के मरने से जादूगर/योगी निष्क्रिय सा हो जाता है


इसीसे भावनात्मक सदमा लगता है, जैसा कि मैंने पिछली पोस्टों में बयान किया है। वास्तव में, तोते/कुंडलिनी के साथ जादूगर/योगी का पूरा जीवनक्रम जुड़ा होता है। तोते/कुंडलिनी के नष्ट होने से उससे जुड़ी सारी घटनाएं, यादें व मनोवृत्तियां नष्ट सी हो जाती हैं। इससे वह घने अंधेरे में पूरी तरह से शांत सा हो जाता है। इसे भावनात्मक सदमा कहते हैं। इसे ही पतंजलि की असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं। इसी परिस्थिति में कुंडलिनी जागरण हो सकता है। यदि इसे कुछ लंबे समय तक धारण किया जाए, तो आत्मज्ञान भी प्राप्त हो सकता है। औसतन लगभग छः महीने के अंदर आत्मज्ञान हो सकता है। इस स्थिति को संभालने के लिए यदि योग्य गुरु का सहयोग मिले, तो भावनात्मक सुरक्षा मिलती है।

ईश्वर सबसे बड़ा जादूगर है, जो तोते/कुंडलिनी से इस दुनिया के जादू को चलाता रहता है

हिंदु समेत विभिन्न धर्मों में ईश्वर को एक जादूगर या ऐंद्रजालिक माना गया है, जो अपने जादू या इंद्रजाल को खुले आसमान में फैलाता है। उससे यह दुनिया बन जाती है। वह पूर्ण अद्वैतशील है। इससे स्वयं सिद्ध हो जाता है कि उसके साथ उसकी कुंडलिनी (तोता) भी रहती है। उसी तोते को मायाशक्ति कहा गया है।

कुंडलिनी जागरण के लिए भावनात्मक सदमे की आवश्यकता

दोस्तों, मान्यता है कि भावनात्मक सदमे से भी कुंडलिनी जागरण होता है। यदि पहले से ही कुंडलिनी योग किया जा रहा हो, तब तो वह ज्यादा प्रभावी हो जाता है। आज मैं इसी से संबंधित अपना ताजा अनुभव बताऊंगा।

27 साल बाद व्हाट्सएप पर मुलाकात

सीनियर सेकंडरी स्कूल एजुकेशन के बाद कई सहपाठियों से पहली बार मुलाकात 27 साल बाद व्हाट्सएप पर हुई। अच्छा लग रहा था। पुरानी भावनाओं पर हरियाली छा रही थी। उसी क्लास के दौरान मेरी कुंडलिनी सबसे तेजी से विकसित हुई थी। कुंडलिनी का दूसरा नाम प्रेम भी है। सीधी सी बात है कि ग्रुप के सभी सदस्यों के साथ मेरा अच्छा प्रेमपूर्ण संबंध था। ग्रुप मैंने शुरु किया था, हालांकि सदस्यों को जोड़ने का अधिकांश काम एक अनुभवी सदस्या ने किया था। कुछ दिन ग्रुप अच्छा चला। कुंडलिनी का मनोविज्ञान समझने के लिए मैं एक भावनात्मक सदस्या के बारे में विस्तार से जानना चाहता था। लेखन का औऱ कुंडलिनी रिसर्च का मुझे पहले से ही शौक है। सदस्या ने मेरा मेसेज पढ़ा और ट्यूशन आदि के लिए आए बच्चों की पढ़ाई खत्म होने के बाद बात करने का भरोसा उदासीन भाव के साथ दिया। यद्यपि वह पढ़ाई आज तक खत्म नहीं हो सकी। मैंने मान लिया कि पारिवारिक या अन्य मनोवैज्ञानिक कारणों से उसने ठीक ही किया होगा। क्योंकि विश्वास ही कुंडलिनी की पहचान है। पर मुझे उससे भावनात्मक सदमा लगा। वैसा भावनात्मक सदमा मुझे 2-3 बार पहले भी लग चुका था। वास्तव में ऐसा धोखा तब होता है, जब हम मन के संसार को असली मानने लगते हैं। पर वास्तव में दोनों में बहुत अंतर हो सकता है। मन में जो आपका सबसे बड़ा मित्र है, वह असल जीवन में आपका सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। इससे साफ जाहिर है कि प्रेम ही सबसे बड़ा मित्र है, और प्रेम ही सबसे बड़ा शत्रु भी है। एक पालतु पशु अपने मालिक से बहुत ज्यादा प्रेम करता है, और उससे दूर नहीं होना चाहता, पर वही मालिक उसे कसाई के हाथों सौंप देता है। तभी तो कहते हैं कि प्यार या विश्वास अंधा भी होता है। 

मानसिक आघात के बाहरी लक्षणों का पैदा होना

उस आघात से मैं बहुत सेंसिटिव व इमोशनल हो गया था। मैं ग्रुप में कुछ न कुछ लिखे जा रहा था। अन्य सदस्यों की छोटी-2 बातें मुझे चुभ रही थीं। इस वजह से मैंने दो सदस्यों को ग्रुप से निकाल दिया। उससे नाराज होकर एडमिन सदस्या भी निकल गई। हालाँकि मैंने उन्हें उसी समय दुबारा ग्रुप में शामिल कर दिया औऱ कहा कि वे चाहें तो निकाले गए सदस्यों को दुबारा दाखिल कर दें। मैं इमोशनल तो था ही , उससे मुझे उसके बाहर निकलने में भी पार्शियलिटी की बू आई, जिससे मेरा मन और डिस्टर्ब हो गया। उसके बाद उपरोक्त ट्यूशन मैडम जी भी बिना वजह बताए ग्रुप छोड़कर चली गईं। एक-एक करके लोग ग्रुप से बाहर जाने लगे। मैं ग्रुप से बाहर होने के उनके दुख को महसूस करने लगा। वही वजह बता कर मैंने भी भावनात्मक आवेश में आकर ग्रुप से किनारा कर लिया। हालांकि ऐसा चलता रहता है सोशल मीडिया में, पर यहाँ पर कुंडलिनी से जुड़ी संवेदनशीलता की बात हो रही है। उस शाम को मैं काफी रोया। रात को मुझे अपने सिरहाने के के नीचे रुमाल रखना पड़ा। दरअसल वो आँसू खुशी के थे, जो लंबे अरसे बाद दोस्तों से मिलकर आ रहे थे। मेरे पूरे शरीर और मन में थकान छा गई। मेरी पाचन प्रणाली गड़बड़ा गई। 

भावनात्मक सदमे के दौरान कुंडलिनी सर्ज

उसी भावनात्मक आघात वाली शाम को मेरी एनर्जी बार-2 मेरी पीठ से चढ़कर शरीर के आगे के भाग से नीचे उतर रही थी, एक बंद लूप में। कभी-कभी उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी भी जुड़ जाती थी। रात को नींद में अचानक बहुत सारी एनर्जी मेरी पीठ में ऊपर चढ़ी। उसके साथ में ऐसा स्वप्न आया कि मैं बहुत बड़े औऱ सुंदर मंदिर के द्वार से अंदर प्रविष्ट हो रहा हूँ। वह एनर्जी मेरे मस्तिष्क में समा रही थी। विशेष बात यह थी कि उस एनर्जी से मेरे मस्तिष्क में बिल्कुल भी दबाव पैदा नहीं हो रहा था, जैसा अक्सर होता है। शायद कई दिनों तक भरपूर नींद लेने से मेरा मस्तिष्क तरोताजा हो गया था। दूसरी वजह यह थी कि भावनात्मक सदमे से दिमाग खाली सा हो गया था। फिर मस्तिष्क में उस एनर्जी के साथ कुंडलिनी जुड़ गई। वह कुंडलिनी जागरण जैसा अनुभव था, यद्यपि उसके स्तर तक नहीं पहुंच सका। 

कुंडलिनी के बारे में वर्णन केवल इसी वैबसाइट में मिलेगा

मैंने हर जगह अध्ययन किया। हर जगह केवल एनर्जी का ही वर्णन है, कुंडलिनी का कहीं नहीं। अधिकांश जगह एनर्जी को ही कुंडलिनी माना गया है। पर दोनों में बहुत अंतर है। बिना कुंडलिनी की एनर्जी तो वैसी भारतीय मिसाइल है, जिस पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित नहीं है। विशेष चीज, जो प्यार की निशानी है, और मानवता का असली विकास करने वाली है, वह कुंडलिनी ही है। एनर्जी तो केवल कुंडलिनी को जीवन्तता प्रदान करने का काम करती है। इस वेबसाइट के इलावा यदि कहीं कुंडलिनी का वर्णन है, तो वह “पतंजलि योगसूत्र” पुस्तक है। उसमें कुंडलिनी को ध्यानालम्बन कहा गया है। अधिकांश लोगों के मन में कुंडलिनी व शक्ति (एनर्जी) के स्वभाव के बीच में कन्फ्यूजन बना रहता है।

एक पुस्तक जिसने मुझे हर बार भावनात्मक सदमे से बचाया और उससे बाहर निकलने में मेरी मदद की

वह पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन”, जो इस वेबसाइट के “शॉप (लाईब्रेरी)” वेबपेज पर उपलब्ध है। विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर जाएं।

अद्वैत भाव के साथ मदिरा ही सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ है

उपरोक्त पुस्तक के साथ मदिरा ने मेरे रूपांतरण के साथ मेरी कुंडलिनी या आत्मा का विकास भी किया। खाली मदिरा कुंडलिनी को हानि पहुंचाती है। इस भावना के साथ थोड़ी सी मदिरा का भी बहुत ज्यादा असर होता था, और मदिरा की लत भी नहीं लगती थी। इसका अर्थ है कि पुराने समय में जो सोमरस या एलिकसिर ऑफ़ लाइफ बताया गया है, वह अद्वैत भावना वाले विधिविधान के साथ व उचित मात्रा में सेवन की गई उच्च कोटि की मदिरा ही है, कोई अन्य जादुई द्रव नहीं। देवता भी इसका पान करते हैं। 

प्रेम या सम्मान, दोनों में से एक से संतुष्ट हो जाते।
अन्यथा अपनी भावनाओं के भंडार की राह को प्रकाशित कर देते, हम स्वयं ही अन्वेषण कर लेेते।।

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कुण्डलिनी एक नाग की तरह

मित्रो, कुछ हफ्ते पहले मुझे एक प्राचीन नाग-मंदिर में सपरिवार जाने का मौक़ा मिला। वह काफी मशहूर है, और वहां पूरे श्रावण के महीने भर मेला लगता है। उस के गर्भगृह में मूर्तियों आदि के बारे में तो याद नहीं, पर वहां पर नाग का विशाल, रंगीन व दीवार पर पेंट किया गया चित्र दिल को छूने वाला था। वह शेषनाग की तरह था, जिस पर भगवान् नारायण शयन करते हैं। उसके बहुत से फण थे। मुझे वह कुछ जानी-पहचानी आकृति लग रही थी। वहां पर मेरी कुण्डलिनी भी तेजी से चमकने लगी, जिससे मुझे आनंद आने लगा। वह मुझे कुछ रहस्यात्मक पहेली लग रही थी, जिसे मेरा मन अनायास ही सुलझाने का प्रयास करने लगा।

नाग अन्धकार का प्रतीक  

मेरा पहला विश्लेषण यह था कि नारायण (भगवान) आम आदमी को अन्धकार स्वरूप दिखते हैं। माया के भ्रम के कारण उन्हें उनका प्रकाश नजर नहीं आता। इसीलिए अन्धकार के प्रतीक स्वारूप नाग को उनके साथ दिखाया गया है। फिर भी इस विश्लेषण से मैं पूरा संतुष्ट नहीं हुआ।

नाग कुण्डलिनी के प्रतीक के रूप में

मैं योगाइंडियाडॉटकोम की एक पोस्ट पढ़ रहा था। उसमें कुछ लिखा था, जिसका आशय मैंने यह समझा कि मूलाधार पर नाग साढे तीन चक्र/वलय लगाकर स्थित होता है। वह अपनी पूंछ को मुंह से दबा कर रखता है। जब कुण्डलिनी शक्ति उन वलयों से गुजारी जाती है, तब वह सीधा ऊपर उठकर मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक पहुँच जाता है। उसके साथ कुंडलिनी शक्ति भी होती है।

मैंने इससे निष्कर्ष निकाला कि हमारा नाड़ी तंत्र एक फण फैला कर उठे हुए नाग की तरह दिखता है, और उसी की तरह काम करता है। वैज्ञानिक तौर पर, नाड़ियों में संवेदना भी नाग की तरह लहरदार ढंग से ट्रेवल करती है। वज्र उस नाग की पूंछ है। उसे आधा वलय भी कह सकते हैं। अंडकोष वाला क्षेत्र पहला वलय/कुंडल है। उसके बाहर दूसरा घेरा मांस व तंतुओं का है। तीसरा घेरा हड्डी का है, जो मेरुदंड से जुड़ा होता है। जैसे ऊपर उठे हुए नाग की पीठ के निचले हिस्से में अन्दर की दिशा में एक बैंड/मोड़ होता है, वैसे ही हमारी पीठ के निचले हिस्से (नाभि के बिलकुल अपोजिट) में होता है। उसके बाद दोनों बाहर की ओर उभरते जाते हैं, और फिर दोनों में सिर का मोड़ आता है, जो लगभग एकसमान होता है। नाग के कई सिर इसलिए दिखाए गए हैं, क्योंकि हमारा सिर मेरुदंड से कई गुना चौड़ा व मोटा होता है, तुलनात्मक रूप से।

हमारा नाड़ी तंत्र एक नाग की तरह

रीढ़ की हड्डी के अन्दर नाड़ी को भी हम नाग की तरह अनुभव कर सकते हैं। दोनों में समानता मिलेगी। नाड़ियाँ भी  नाग की तरह या रस्सी की  तरह ही होती हैं। वज्र की नाड़ी को नाग की पूंछ समझो। वाही आधा चक्र भी हुई। स्वाधिष्ठान चक्र का सम्वेदना क्षेत्र (जहाँ कुण्डलिनी का ध्यान होता है) नाग का पहला चक्र/कुंडल/घेरा है। आसपास के क्षेत्र की नाड़ियाँ भी वहां जुड़ती हैं, वही नाग का पहला घेरा है। दूसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ वह नाड़ी सैक्रल प्लेक्सस/नाड़ियों के जाल से जुड़ती है। तीसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ सैक्रल प्लेक्सस स्पाईनल कोर्ड से मिलती है। वहां पर वह नाग/स्पाईनल कोर्ड ऊपर को खड़ा हो जाता है, और मोटा भी हो जाता है। पीठ के लम्बर क्षेत्र में उसमें पेट की तरफ गड्ढे वाला एक मोड़ आता है। अगला मोड़ ऊपर आता है, सिर के नजदीक। सिर के अन्दर का नाड़ी-पुंज उस सांप के अनेक फण हैं, जो कि स्पाईनल कोर्ड/नाग-शरीर से जुड़े होते हैं।

हमारे शरीर के कुण्डलिनी चक्र भगवान शेषनाग के शरीर के मुख्य बिंदु

इतना गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। सीधी सी बात है कि पूरा सैक्रल/सेक्सुअल एरिया नाग के चौड़ की तरह मोटा, गोलाकार व परतदार होता है। इसकी सारी संवेदना वज्र/पूंछ की संवेदना के साथ मिलकर ऊपर चली जाती है। जो नाग के मुख्य उभार बिंदु हैं, वे ही शरीर के सात चक्र हैं। वहीँ पर ध्यान के दौरान कुण्डलिनी ज्यादा चमकती रहती है। मूलाधार चक्र पर वज्र की शिखा जुड़ी होती है। आगे के स्वाधिष्ठान चक्र (वज्र के मूल) पर नाग की पूंछ (वज्र) कुंडलाकार रूप में गुथे हुए नाग के उस मुख्य शरीर से जुड़ी होती है, जो जमीन पर होता है। पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र पर नाग के ऊपर उठने से लगभग 90 डिग्री का कोण बनता है। पीछे के नाभि चक्र पर नाग के शरीर के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। पीछे के अनाहत चक्र पर नाग के शरीर में उभार आता है। पीछे के विशुद्धि चक्र में नाग के फण के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। उसके ऊपर पीछे के आज्ञा चक्र पर फिर से नाग के सिर/फण का उभार आता है। इसके ऊपर पूरा मस्तिष्क/ मस्तिष्क का सबसे ऊपरी स्थान जहाँ एक कुण्डलिनी संवेदना होती है (सिर के ऊपरी सतह के सबसे आगे वाले व सबसे पीछे वाले भाग के बीचोंबीच; यहाँ एक गड्ढा जैसा महसूस होता है, इसीलिए इसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं) नाग के एक हजार फणों के रूप में होता है। तभी तो उसे सहस्रार (एक हजार भाग वाला) कहते हैं। बीच वाले मुख्य फण पर कुण्डलिनी विद्यमान होती है।

ध्यान के दौरान नाग के साथ कुण्डलिनी-अनुभव

इसी ऊहापोह में मैं एक दिन तांत्रिक  विधि से ध्यान कर रहा था। मैं उपरोक्त तरीकों से नाग का ध्यान करने लगा। मुझे उसकी पूंछ/वज्र-शिखा पर कुंडलिनी उभरती हुई और सांप की तरह सरसराहट के साथ उसके फण/मेरे मस्तिष्क तक जाते हुए महसूस होने लगी। मस्तिष्क में वह काफी तेज, शांत व भगवान नारायण की तरह थी। ऐसा लगा कि जैसे भगवान नारायण ही कुंडलिनी के रूप में शेषनाग के ऊपर विलास कर रहे थे। साथ में मुझे उपरोक्त नाग-मंदिर के जैसी अनुभूति मिली। फिर मैं अध्यात्म में नाग के महत्त्व को समझ सका।

नाग का पूजन

लगभग सभी धर्मों में नाग को पवित्र व पूज्य माना जाता है। नारायण नाग पर शयन करते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर भी नाग विराजमान है। कई धर्मों में दो नाग आपस में लिपटे हुए दिखाए गए हैं। वे संभवतः यब-युम आसन में बंधे हुए दो तांत्रिक जोड़ीदार हैं।

नाग कुण्डलिनी नहीं है

मैंने कुंडलिनी को नाग के रूप में सुन रखा था। पर वह नाग नहीं है। वह नाग के शरीर/तंत्रिका तंत्र/नर्वस सिस्टम पर नाग की तरह चलती है। वैसे ही, जैसे विष्णु भगवान् नाग नहीं हैं, पर वे नाग के ऊपर विहार करते हैं।

नाग कुण्डलिनी को अतीरिक्त बल देता है

जरूरी नहीं कि कुण्डलिनी जागरण नाग के ध्यान से ही हो। प्रेमयोगी वज्र ने  तो नाग का ध्यान नहीं किया था। उसने एकबार कुण्डलिनी को अपने शरीर के अन्दर सीधा ऊपर उठते हुए अनुभव किया था, जैसे एक हैलीकोप्टर हवा में सीधा ऊपर उठता है। नाग के ध्यान से तो केवल उसे उठने के लिए अतिरिक्त बल ही मिलता है। इसीलिए तो अधिकांश बड़े देवी-देवताओं के साथ नाग दिखाया गया होता है।

शेषनाग के सिर पर पृथ्वी

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि शेषनाग/मल्टी हूडिड सर्पेंट ने अपने सिर पर सारी धरती को धारण किया हुआ है। वास्तव में यह शेषनाग हमारा अपना उपरोक्त तंत्रिका तंत्र ही है। सारी धरती हमारे इसी तंत्रिका तंत्र/मस्तिष्क में अनुभव के रूप में ही है। वास्तव में स्थूल और बाहर तो कुछ भी नहीं है। यही अंतिम वाक्य अध्यात्म का मूल मन्त्र है।

संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी का आरोपण

हरेक शारीरिक संवेदना नाड़ी से होकर मस्तिष्क को जाती है। जब उस पर कुण्डलिनी/एक विशेष मानसिक चित्र का आरोपण किया जाता है, तब वह भी उसके साथ मस्तिष्क में पहुँच जाती है। शरीर की सर्वाधिक तीव्र व आनंदप्रद संवेदना वज्र-शिखा की है। इसलिए उसपर आरोपित कुण्डलिनी मस्तिष्क में जीवंत हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में शयन करती है। वास्तव में मूलाधार चक्र में वज्र-शिखा को ही दर्शाया गया है, दोनों एक काल्पनिक रेखा से जुड़ते हुए। उसे ही नाग की पूंछ कहते हैं। आम आदमी में वहां पर कुण्डलिनी सोई हुई होती है। इसका अर्थ है कि वहां पर कुण्डलिनी जागृत नहीं हो सकती। जागरण के लिए उसे मस्तिष्क में ले जाना पड़ता है। नाग ने अपनी पूंछ को मुंह में दबाया होता है। इसका अर्थ है कि कुण्डलिनी वज्र से शुरू होकर वीर्यपात के रूप में वज्र पर ही वापिस आ जाती है, और वहां से बाहर बर्बाद हो जाती है। अपने कुंडल खोलकर नाग के सीधे खड़े होने का मतलब है कि कुण्डलिनी को सीधी दिशा में वज्र शिखा से मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक ले जाया जाता है, बार-2 सैक्सुअल क्षेत्र में घुमाया नहीं जाता। ऐसी भावना की जा सकती है कि पूरे यौन क्षेत्र (जो एक फण उठाए हुए बड़े नाग के जमीनी ढेर/घड़े जैसी आकृति का है) में चारों तरफ से डूबी/सरोबार कुण्डलिनी उससे शक्ति लेकर सीधी ऊपर फण तक चली जाती है। फण/मस्तिष्क पर कुण्डलिनी को मजबूत किया जाता है, और उसे वीर्यपात के रूप में वज्र तक वापिस नहीं उतारा जाता। हालांकि, कुंडलिनी को धीरे-धीरे सामने/आगे के चक्रों के माध्यम से नीचे ले जाया जा सकता है, जिससे वे मजबूत हो जाते हैं। संस्कृत शब्द कुण्डलिनी का अर्थ है, कुंडल/कोइल वाली। अर्थात एक मानसिक आकृति जो कुंडल/नाग पर विराजमान है।

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कुण्डलिनी द्वारा सुरक्षा की भावना के विकास के माध्यम से दंगों की रोकथाम

आजकल अधिकाँश लोगों में जरुरत से ज्यादा असुरक्षा की भावना बढ़ गई है। जो लोगों के पास है, उसका वे पूरा आनंद उठा ही नहीं पाते हैं। इसका कारण यही है कि वे भविष्य की चिंता अधिक करते हैं। लोगों के अन्दर भविष्य के मामले में असुरक्षा की भावना इस कदर बढ़ गई है कि वे हिंसक होकर अपने वर्तमान को बिगाड़ने पर तुल गए हैं। उदाहरण के लिए, भारत की संसद से पारित किए गए एक बिल को ही लें। इस बिल का नाम नागरिकता संशोधन विधेयक / सीएए (citizen amendment act/ CAA) है। इस बिल में पड़ौसी देशों में प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान है। ये पड़ौसी देश वही हैं, जो धर्म के नाम पर भारत से अलग हुए थे। वे देश तो इस्लामिक राष्ट्र बन गए, पर भारत धर्मनिरपेक्ष (यद्यपि मुस्लिम तुष्टिकरण के साथ) देश बना रहा।

उपरोक्त बिल के विरोध के लिए भारत के मुस्लिम भाइयों को स्वार्थपरक राजनेताओं व बुद्धिजीवियों द्वारा धर्म के नाम पर भड़काया जा रहा है। वे इसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका मानना है कि वर्तमान में तो यह बिल उचित और मानवतावादी है। उनके मन का डर तो केवल अनजाने भविष्य के प्रति आशंकाओं (एनआरसी / NRC बिल आदि) को लेकर है। ऐसे लोग क़ानून से बच नहीं पाएंगे।

भविष्य से सम्बंधित सुरक्षा की भावना के मामले में पशु मनुष्य से बेहतर हैं

मैं पिछले गर्मी के मौसम में अपनी पत्नी के साथ सायं भ्रमण कर रहा था। वहां हम एक घास के मैदान में बने एक बैंच पर बैठ गए। वहां पर एक गाय बैठी थी, जो बड़े आराम से जुगाली कर रही थी। ऐसा लग रहा था कि दुनिया के सारे सुख उसे उस समय मिले हुए थे। वह प्रसन्न थी। उसके चेहरे पर अपने निकट भविष्य की चिंता जरा भी नजर नहीं आ रही थी। कुछ ही महीनों में कड़ाके की ठण्ड पड़ने वाली थी। वह बेघर थी, इसलिए स्वाभाविक था कि दो महीने की सर्दियों की रातों का ख्याल ही उसके होश उड़ा देता। पर वह उससे बेखबर होकर अपनी मौजूदा स्थिति का भरपूर लुत्फ उठा रही थी। कोई आदमी होता, तो पूरा गर्मियों का मौसम डर-२ के गुजरता। वह आने वाली सर्दियों की चिंता में डूबा रहता, और गर्मियों की सुहानी रातों का जरा भी आनंद न ले पाता। अपने विश्लेषण करने वाले दिमाग पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से ऐसा ही होता है। ऐसे झूठे दिमागी जंजालों से बचने के लिए अद्वैत और कुण्डलिनी का सहारा लेना चाहिए।

कुण्डलिनी से सुरक्षा की भावना कैसे बढ़ती है?

कुण्डलिनी योग से मन की कुण्डलिनी मजबूत होती है। उससे अद्वैत भाव मजबूत होता है। अद्वैत भाव के मजबूत होने से आदमी को सभी कुछ एकसमान लगता है। इससे उसके मन में किसी ख़ास चीज के प्रति आसक्ति नहीं रहती। वह किसी ख़ास चीज को प्राप्त करने के लिए छटपटाता नहीं है। इसी वजह से वह किसी भी परिस्थिति का विरोध नहीं करता। यदि कभी करता भी है, तो शांतिपूर्वक ढंग से करता है। मानवता, अहिंसा, और शांति तो कुण्डलिनी योगी के अन्दर सबसे प्रमुख गुण होते हैं। कुण्डलिनी इंसान को इंसान बनाती है।

कुण्डलिनी समस्याओं से कैसे बचाती है?

कुण्डलिनी आदमी को नियंत्रित रखती है। वह आदमी को भड़कने नहीं देती। वह आदमी के धीरज को बढ़ाती है। उससे अद्वैत व शान्ति का अनुभव होता है। उससे दिमाग अच्छी तरह से व सकारात्मक रूप से काम करने लगता है। उससे समस्या को सुलझाने में मदद मिलती है। कुण्डलिनी पूरे शरीर में घूमती रहती है, जिससे पूरा शरीर स्वस्थ रहता है। उससे आदमी का शरीर बलवान और मेहनती बनता है। उससे भी समस्याएँ सुलझने लगती हैं।

यह सत्य सिद्धांत है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है। कुण्डलिनी से आदमी बुरे काम कर ही नहीं पाता। उससे उसे भविष्य में बुरे फल मिलने की सम्भावना नहीं रहती। उससे भविष्य की समस्याएँ रुक जाती हैं।

कुण्डलिनी योग एक वैज्ञानिक और प्राकृतिक धर्म

इतिहास गवाह है कि अधर्म ने मानवता का उतना नुक्सान नहीं किया है, जितना धर्म ने किया है। सबसे पहला, प्राकृतिक और मानवतावादी धर्म कुण्डलिनी योग ही था। उसको किसी विशेष स्थान से सम्बन्ध रखने वाले और विशेष विचारधारा वाले लोगों के संगठन ने अपनाया। उससे हिन्दु धर्म बन गया। कुछ दूसरे स्थानों पर रहने वाले लोगों के विभिन्न संगठनों ने हिन्दु धर्म का विरोध करने वाले कुछ विभिन्न धर्म बना लिए। परन्तु वे इस गलतफहमी में रहे कि कुण्डलिनी योग हिन्दु धर्म की खोज है। वे आज तक इसी भ्रम में हैं। इसीलिए वे कुण्डलिनी योग को अपनाने में हिचकिचाते हैं। परन्तु वास्तविकता यह है कि कुण्डलिनी योग पूरी तरह से वैज्ञानिक, बेरंग और कुदरती है। कुण्डलिनी योग के बिना तो कोई भी धर्म अधूरा है।

प्रेमयोगी वज्र के जीवन में कुण्डलिनी का योगदान

वह एक बिलकुल साधारण आदमी था। जब से उसे कुण्डलिनी का साथ मिला, तभी से वह तरक्की करने लगा। उसे तो कुण्डलिनी का बहुत सहयोग मिला। वास्तव में भगवान् कुण्डलिनी के माध्यम से ही सहायता करता है। उसी की सहायता से वह उच्च अध्ययन कर पाया। उसी की सहायता से वह उच्च भावना के साथ लोगों की सेवा कर पाया। उसी की वजह से वह उच्च स्तर का जीवन जी पाया। उसी की वजह से वह अनेक प्रकार की समस्याओं से बच पाया, और अनेक प्रकार की समस्याओं पर काबू पा पाया।

वह एक बार अपने घर समेत अपनी सारी संपत्तियों को छोड़कर घर से बहुत दूर चला गया। इससे उसकी भविष्य की सभी चिंताएं मिट गईं। उस नए व वीरान स्थान पर उसे अपनी असुरक्षा की भावना बिलकुल भी महसूस नहीं हुई। इससे उसे शान्ति मिली और वह कुण्डलिनी के बारे में अध्ययन करने लगा, और कुण्डलिनी योग करने लगा। एक साल के अन्दर ही उसकी कुण्डलिनी जागृत हो गई। कुण्डलिनी जागरण का अर्थ है, दुनिया के सभी सुखों की एकसाथ प्राप्ति। इससे मन पूरी तरह से तृप्त और संतुष्ट हो जाता है।

सीधा सा अर्थ है कि भविष्य को लेकर चिंता और असुरक्षा की भावना झूठी होती है। उनसे कुछ प्राप्त नहीं होता है, बल्कि जो अपने पास होता है, वह भी चला जाता है। इनसे जितना बचा जा सके, बचना चाहिए।

कुण्डलिनी ही वास्तविक धर्मनिरपेक्षता है

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप पाएंगे एक देशप्रेम से भरी हुई, वैज्ञानिक , फिक्शन से भरी और अनौखी पुस्तक, जिसे हर किसी को जरूर पढ़ना चाहिए।

शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)

कुण्डलिनी की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने वाली निम्नलिखित पुस्तक अनुमोदित की जाती है।

कुण्डलिनी विज्ञान- एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान

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कुण्डलिनी से सुहाने सपने

दोस्तों, अब मुझे हर हफ्ते नई पोस्ट लिखने के लिए खुद ही हिंट मिल जाती है, और नई घटना भी। आज रात को मैंने एक तंत्र से सम्बंधित स्वप्न देखा। वह जीवंत, स्पष्ट व असली लग रहा था। वह स्वप्न सुबह के समय आया। ऐसा लग रहा था कि वह मेरी किसी पूर्वजन्म की घटना पर आधारित रहा होगा। तभी तो मैं उसमें भावनात्मक रूप से बहुत ज्यादा बह गया था, और मुझे आनंद भी आया। उस स्वप्न से प्राचीनकाल के तंत्र के बारे में मेरे मन में तस्वीर स्पष्ट हो गई। वैसे भी एक कुण्डलिनी योगी का पुरानी या अपने पूर्वजन्मों की घटनाओं से सामना उसके स्वप्न में होता ही रहता है। वे सारे स्वप्न बहुत मीनिंगफुल होते हैं।

प्राचीनकाल में तंत्र बहुत उन्नत था

उस सपने में मैंने देखा कि मैं अपने परिवार सहित एक ऊंचे पहाड़ के किसी पर्यटक स्थल जैसे स्थान पर था, जहां पर चहल-पहल थी, व बहुत आनंद आ रहा था। कुछ पुराने परिचितों से भी वहां मेरी मुलाक़ात हुई। उस पहाड़ की तलहटी एक मैदानी जैसे भूभाग से जुड़ी हुई थी। उस जोड़ पर एक विशालकाय मंदिर जैसा स्थान था। हम नीचे उतर कर उस मंदिर परिसर में प्रविष्ट हो गए। चारों और बहुत सुन्दर चहल-पहल थी। बहुत आनंद आ रहा था। परिसर में एक प्रकाशमान गुफा जैसी संरचना भी थी, जिसके अन्दर भी बाजार सजे हुए थे। मेरी पत्नी उसमें घुमते-फिरते और शौपिंग करते हुए कहीं मुझसे खो गई थी। मैं उसे भी खोज रहा था। उस खोजबीन में मैंने मंदिर के बहुत से कमरे देखे, जो लाइन में थे. हालांकि कुछ कमरे सीढ़ियों से कुछ ऊपर चढ़कर भी थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कि सारा मंदिर परिसर किसी विशालकाय छत के नीचे था। नीचे की पंक्ति के एक कमरे में मैं घुस गया। वहां पर बहुत से लोग नीचे, एक दरी पर बैठे थे। वहां पर बीच में जैसे मैंने अपना बैग पीठ से उतार कर रख दिया, और मैं भी बैठ गया। तभी एक महिला अन्दर आई, और मुझे बड़े प्यार व अपनेपन से अपने साथ, गलियों से होते हुए, सीढ़ियों के ऊपर के एक कमरे तक ले गई। उससे कुछ पुरानी जान-पहचान भी महसूस हो रही थी, पर वह स्पष्ट नहीं थी। शायद इसीलिए मुझे उसके साथ आनंद आ रहा था। एक-दो स्थान पर उसने मुझे अपना स्पर्श भी करवाया। वह उस कमरे में एक कुर्सी पर बैठ गई। उसके सामने मेज पर बहुत से कागजात पड़े थे। उसके समीप ही दो-चार पुरुष लोग भी कुर्सियों पर बैठे हुए थे। महिला ने किसी बीमा जैसी योजना के कुछ कागजात जैसे दिखाए, और मुझसे कहा कि मेरी पत्नी ने उस योजना के लिए हामी भरी थी। मैं मुकरने लगा, तो उसके चेहरे पर कुछ हलकी मायूसी जैसी दिखी। तभी वे लोग कुछ अन्य ग्राहकों का काम निपटाने लगे, जिससे मैं मौक़ा पाकर वहां से खिसक गया। मैं वापिस उसी कमरे में आ गया, जहां पहले बैठा था, क्योंकि मैं अपना बैग वहीं भूल गया था। पर मुझे अपना बैग वहां नहीं मिला। मैं काफी उदास हुआ, क्योंकि उसमें कुछ अन्य जरूरी चीजों के साथ मेरा महँगा किन्डल ई-रीडर भी था। मैं बहुत निराश होकर बैग खोजने लगा। मैंने कई कमरों में तलाश की, यह सोचकर कि कहीं मैं दूसरे कमरों में तो नहीं बैठा। मैं फिर बीच वाली खुली लॉबी में गया, जिसके अन्दर वे कमरे खुलते थे। वह एक रेलवे स्टेशन की तरह बहुत खुली-डुली जगह थी, जहाँ पर काफी चहल-पहल थी। वहां एक-दो पुलिस वाले भी सीमेंट के बेंच पर बैठे हुए थे। उनसे पूछा, तो उन्होंने लापरवाही से व मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए कहा कि मेरा बैग कभी नहीं मिलेगा, और उसे किसी ने उठा लिया होगा। मैंने फिर से उसी कमरे का दरवाजा खोला, जहां मैं बैठा हुआ था। वहां पर दो भद्र पुरुष नाईट सूट में मदिरा पीने का आनंद ले रहे थे। वे दोनों पालथी लगा कर आराम से बैठे फुए थे। वे मध्यम कद-काठी के और कुछ सांवले लग रहे थे। मदहोशी की ख़ुशी की मुस्कान उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि मेरा बैग वहीं कमरे में पड़ा था। मैं बहुत खुश हुआ और उनसे कहा कि शराब से आपके अन्दर ज्ञान की आँख खुली, जिससे आप मेरा बैग ढूंढ सके। वे बहुत खुश होकर मुस्कुराने लगे, और एक पेग हाथ में पकड़ कर मुझसे बोले कि मैं भी उसे देवी माता के नाम पर पी लेता। मैंने उन्हें मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहा, और चल दिया। यद्यपि मेरा मन लगातार कर रहा था कि मैं एक पेग देविमाता के नाम पर लगा लेता। परन्तु मैं उन्हें मना कर चुका था, इसलिए वापिस नहीं मुड़ना चाहता था। परिसर से बाहर निकल कर ही दुकानों की एक कतार लगी हुई देखी। मैं एक मिठाई की दुकान में कुछ मिठाई खरीदने के लिए घुस गया। वहां पर दुकान के शुरू में ही खड़े मुझे कुछ चिर-परिचित दोस्त मिले, जो ख़ुशी के साथ शराब के बारे में कुछ आपसी बातें करने लगे। मैंने कहा कि ऐसी बातें न करो, नहीं तो मेरा मन भी देवी माता के नाम पर एक पेग लगाने का कर जाएगा। ऐसा सुनकर सब हंसने लगे। उन दुकानों की कतार वाली सड़क चढ़ाई की दिशा में बाहर जा रही थी। कुछ चढ़ाई चढ़ कर मैं निचले तरफ की एक दुकान के सीमेंट से बने पक्के प्लेटफोर्म पर चढ़ गया। तभी मुझे विचित्र व दिल को छूने वाले गाजे-बाजे/संगीत की आवाजें सुनाई देने लगीं। वह सजे हुए रथ पर देवी माता की झांकी निकल रही होगी। मैं देवी माता के प्यार मैं इतना बह गया कि मेरी आँखों में प्रेम के आंसुओं की बाढ़ आ गई, और मैं हलकी आवाज में रुक-२ कर रोने लगा। मैं बार-बार अपनी दाहिनी बाजू को फोल्ड करके, उससे अपनी आँखों को पोंछ रहा था, और आँखों को ढक भी रहा था। वह मैं इसलिए कर रहा था, ताकि कोई मुझे रोता हुआ जानकार अजीब न समझे, और उससे मेरे प्यार की भावना में बहने में रुकावट न पैदा हो। फिर मैंने सोचा कि उस अजनबी स्थान पर मुझे कोई नहीं पहचानता होगा। इसलिए मैं खुले दिल से जोर-जोर से रोने लगा। तभी मुझे एक लेटा हुआ भक्त सड़क पर दिखा, जो रोल होकर ऊपर की तरफ आ रहा था। वह देवी माता का कोई महान भक्त होगा। वह भी मध्यम से सांवले रंग का था। उसने खड़े होकर मुझे बड़ी-बड़ी व भावपूर्ण आँखों से देखा, और वह भी मानो भावना में बह गया। तभी मैंने देखा कि एक सांवले व ताकतवर आदमी ने एक बकरी के बच्चे को एक हाथ से सीधा अपने सिर से भी ऊपर, गले से पकड़ कर उठाया हुआ था, और उसे देवी माता की भक्ति के साथ मिश्रित क्रोध व हिंसक भाव के साथ देख रहा था। किड मिमिया रहा था। उसका दूसरा हाथ सीधा नीचे की ओर था, जिसमें उसने एक बड़ा सा खंजर पकड़ा हुआ था। वह बार-बार देवी माता का नाम ले रहा था। मैं पीछे हट कर दुकान की ओट में आ गया, ताकि वह निर्दयी दृश्य मुझे न दिखता। थोड़ी देर बाद, मैं आगे को खिसका ताकि मैं देख सकता कि क्या वहां पर किड के जुदा किए हुए धड़ और सिर थे, और चारों तरफ फैला हुआ खून था। परन्तु वहां पर सभी किड पहले की तरह ज़िंदा थे, और ख़ुशी से हिल-डुल रहे थे। उससे मैंने चैन की सांस ली, और ख़ुशी महसूस की। शायद सांकेतिक रूप में ही देवी माता को भेंट चढ़ा दी गई थी। तभी अलार्म बजा, और मेरा स्वप्न टूट गया।

उस स्वप्न से मुझे प्राचीनकाल के उन्नत तंत्र, विशेषकर काले तंत्र के बारे में स्पष्ट अनुभूति हुई। प्राचीनकाल में तंत्र एक उन्नत विज्ञान के रूप में था, और जन-जन में व्याप्त था। परन्तु उसके साथ हिंसा, व्यभिचार आदि के बहुत से दोष भी बढ़ जाते थे, विशेषतः जब उसे उचित तरीके से नहीं अपनाया जाता था। तंत्र के दुरूपयोग के कारण ही इसकी अवनति हुई। इस्लाम भी एक प्रकार का अतिवादी तंत्र ही है। यह इतना कट्टर है कि लोग इस बारे बात करने से भी कतराते हैं। इसीलिए यह जस का तस बना हुआ है। हिन्दु तंत्र में भी प्राचीनकाल में नरबली की प्रथा था, परन्तु उसका व्यापक विरोध होने पर उसे बंद कर दिया गया।

प्रेमयोगी वज्र का तंत्र सम्बंधित अपना अनुभव

उसने कुण्डलिनी के विकास के लिए किसी विशेष तंत्र का सहारा नहीं लिया। उसने वही काम किए, जो दूसरे सामान्य लोग भी करते हैं, पर उसने उन कामों को अद्वैतपूर्ण/तांत्रिक दृष्टिकोण के साथ किया। यही तरीका उचित भी है। इससे तंत्र का दुरुपयोग नहीं होता।    

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कुण्डलिनी के साथ पशु-प्रेम

यह सर्वविदित है कि कुण्डलिनी प्रेम का प्रतीक है। कुण्डलिनी समर्पण का प्रतीक है। कुण्डलिनी श्रद्धा-विश्वास का प्रतीक है। कुण्डलिनी स्वामीभक्ति का प्रतीक है। कुण्डलिनी सेवाभाव का प्रतीक है। कुण्डलिनी परहितकारिता का प्रतीक है। कुण्डलिनी आज्ञापालन का प्रतीक है। कुण्डलिनी सहनशक्ति का प्रतीक है। ये कुण्डलिनी के साथ रहने वाले मुख्य गुण हैं। अन्य भी बहुत से गुण कुण्डलिनी के साथ विद्यमान रहते हैं। यदि हम गौर करें, तो ये सभी मुख्य गुण पशुओं में भी विद्यमान होते हैं। इनमें से कई गुण तो उनमें मनुष्यों से भी ज्यादा मात्रा में प्रतीत होते हैं।  इससे यह अर्थ निकलता है कि पशु कुण्डलिनी-प्रेमी होते हैं। आइये, हम इसकी विवेचना करते हैं।

कुण्डलिनी स्वामीभक्ति का प्रतीक है

आजतक कुत्ते से ज्यादा स्वामीभक्ति किसी प्राणी में नहीं देखी गई है। ऐसे बहुत से  उदाहरण हैं, जब कुत्ते ने अपने मालिक के लिए जान तक दे दी है। इसका अर्थ है कि कुत्ते के मन में अपने मालिक के व्यक्तित्व की छवि स्थाई और स्पष्ट रूप से बसी हुई होती है। वह छवि कुत्ते के मन के लिए एक खूंटे की तरह काम करती है। इससे कुत्ता आपने विचारों और क्रियाकालापों के प्रति अनासक्ति भाव या साक्षी भाव प्राप्त करता रहता है। उससे कुत्ते को आनंद प्राप्त होता रहता  है। उस कुण्डलिनी छवि के महत्त्व को वह कभी नहीं भूलता, यहाँ तक कि उसके लिए जान तक दे सकता है। इसके विपरीत, बहुत से मनुष्य अपने मालिक के प्रति वफादारी नहीं निभा पाते। इससे सिद्ध  हो जाता है कि कुत्ता  मनुष्य से भी ज्यादा कुण्डलिनी प्रेमी होता है।

कुण्डलिनी सेवा भाव का प्रतीक है

उदाहरण के लिए, गाय को ही लें। वह हमें दूध देकर हमारी सेवा करती है। अधिकतर गौवें अपनी देख-रेख करने वाले मालिक के पास ही दूध देती हैं। दूसरा कोई जाए, तो वे जोर की लात भी टिका सकती हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि गाय के मन में अपने मालिक की छवि बस जाती है, जो  उसके लिए कुण्डलिनी का काम करती है।  एक आदमी  तो अपने मालिक को कभी भी छोड़ सकता है, परन्तु गाय ऐसा कभी नहीं करती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि पशु मनुष्य से भी ज्य्यादा नैष्ठिक कुण्डलिनी भक्त होते हैं।

यह अलग बात है कि दिमाग की कमी के कारण पशु मनुष्य की तरह मालिक (कुण्डलिनी) को बारम्बार बदल भी नहीं सकता। अधिकाँश मनूश्य तो अपने दिमाग पर इतना घमंड करने लग जाते हैं कि कुण्डलिनी के परिपक्व होने से पहले ही उसे बदल देते हैं। ऐसी स्थिति से तो पशु वाली स्थिति ही बेहतर प्रतीत होती है। एक बात और है। पालतु पशु को जब आदमी द्वारा संरक्षण व भोजन प्राप्त होता है, तभी उसे कुण्डलिनी को ज्यादा बढ़ाने का अवसर मिलता है।

कुण्डलिनी परहितकारिता का प्रतीक है

इसी तरह, विभिन्न पशु-पक्षी विभिन्न प्रकार  के उत्पाद देकर मनुष्य का भला करते  रहते हैं। ऐसा उनके मनुष्य के प्रति प्रेम से ही सम्भव  हो सकता है। माता प्रेम के वशीभूत होकर ही अपने बच्चे को दूध पिलाती है। यह भी सत्य है कि प्रेम केवल कुण्डलिनी से ही होता है। यह अलग बात है कि पशु उसे बोलकर बता नहीं सकता। यदि प्रेम न भी हो, तो भी किसी का हित करते हुए स्वयं ही उससे प्रेम हो जाता है। यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी कुण्डलिनी-प्रेमी होते हैं, क्योंकि वे भी सदैव परहित में लगे रहते हैं।

कुण्डलिनी आज्ञापालन का प्रतीक है

हम उसी की आज्ञा का पालन सबसे अधिक तत्परता के साथ करते हैं,  जो हमारे मन में सबसे अधिक बसा होता है, जो हमें सबसे अधिक महत्त्वशाली लगता है, और जिस पर हमें सबसे अधिक विश्वास होता है। वही हमारी कुण्डलिनी के रूप में होता है। वही आनंद का स्रोत भी होता है। अपनी मालिक की आज्ञा का पालन कुत्ते बहुत बखूबी करते हैं। कुत्ते में तो दिमाग भी इंसान से कम होता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि कुत्ता केवलमात्र कुण्डलिनी से ही आज्ञापालन के लिए प्रेरित होता है, अन्य लॉजिक से नहीं। आदमी तो दूसरे भी बहुत से लॉजिक लगा लेता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि एक कुत्ता भी कुण्डलिनी की अच्छी समझ रखता है।

इन बातों का उद्देश्य मनुष्य को गौण सिद्ध करना नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य जीव-विकास की सीढ़ी पर सबसे ऊपर है। यहाँ बात केवल कुण्डलिनी के बारे में हो रही है।

कुण्डलिनी कर्तव्यपालन का प्रतीक है

एक बैल यदि अस्वस्थ भी हो, तो भी वह खेत में हल चलाने से पीछे नहीं हटता। इसी तरह, यदि उसका मूड ऑफ़ हो, तो भी वह अपने कदम पीछे नहीं हटाता। यह अलग बात है, यदि वह हल चलाते-२ हांफने लगे या नीचे गिर जाए। इसका सीधा सा अर्थ है कि बैल भी कुण्डलिनी प्रेमी होता है। उसका रोजमर्रा का काम व उसके मालिक का व्यक्तित्व उसके मन में एक मजबूत कुण्डलिनी के रूप में बस जाता है, जिसे वह नजरअंदाज नहीं कर पाता। अपने आनंद के स्रोत को भला कौन बुद्धिमान प्राणी छोड़ना चाहे। इसी तरह, सहनशक्ति के मामले में बभी समझ लेना चाहिए।

पशुओं के कुण्डलिनी प्रेम के बारे में प्रेमयोगी वाज्र का आपना अनुभव

उसका ब्बच्पन पालतु पशुओं से भरे-पूरे परिवार में बीता था। पशुओं के मन के भाव पढ़ने में उसे बहुत मजा आता था। जंगल में बैलों का खेल-२ में आपस में भिड़ना उसे रोमांचित कर देता था। मवेशियों का जंगल के घास से पेट भर जाने के बाद अपने बाड़े की तरफ दौड़ लगाना एक अलग ही रोमांच पैदा करता था। एक गाय बड़ी नटखट, चंचल व साथ में दुधारू भी थी। वह एक नेता की तरह सभी मवेशियों के आगे-२ चला करती थी। सभी मवेशी उसे सींग मारने को आतुर रहते थे, इसलिए वह अकेले में ही चरा करती थी। वह जंगल के डर से उनकी नजरों से दूर भी नहीं जाती थी। उसकी बछिया भी वैसी ही निकली। वह देखने में भी बहुत सुन्दर थी। जंगल से बाड़े की तरफ पहाड़ी से नीचे उतरते समय वह पूंछ खड़ी करके बड़ी तेजी से कुदकते हुए भागती, और कुछ दूर जाकर पीछे से आने वाले  मवेशियों का इन्तजार करते हुए खड़ी होकर बार-२ गर्दन मोड़कर पीछे देखने लग जाती। जब वे नजदीक आते, तब फिर से दौड़ पड़ती।

जब प्रेमयोगी वज्र की कुण्डलिनी बलवान होती थी, तब सभी मवेशी उसके आसपास चरने के लिए आ जाया करते थे। कोई मवेशी उसे कान टेढ़े करके बड़े आश्चर्य से व प्रेम से देखने लग जाते थे। कई तो उसे चाटने भी लग जाते थे। वे उसे बार-२ सूंघते, और आनंदित हो जाते। शायद उन्हें कुण्डलिनी के साथ विद्यमान सबलीमेटिड वीर्य की खुशबू भी उसके रोमछिद्रों से निकली हुई महसूस होती थी। कुण्डलिनी जागरण के आसपास (प्राणोत्थान के दौरान) भी पशुओं के संबंध में उसका ऐसा ही अनुभव रहा। कई बार तो खूंटे से बंधीं कमजोर दिल वाली भैंसें उसे अचानक अपने पास पाकर डर सी भी जाती थीं, और फिर अचानक प्यार से सूंघने लग जाती थीं। ज्यादातर ऐसा उन्हीं के साथ होता था, जो क्रोधी, सींग मारने वाली, और दूध देने में आनाकानी करने वाली होती थीं। इसका सीधा सा मतलब है कि वे कुण्डलिनी से कम परिचित होती थीं।

पशुओं के बीच में रहने से कुण्डलिनी विकास

प्रेमयोगी वज्र ने यह महसूस किया कि पशुओं, विशेषकर जंगल में खुले घूमने वाले, पालतु, व गाय जाति के मवेशियों के बीच में रहकर कुण्डलिनी ज्यादा स्पष्ट रूप से विकसित हो जाती थी। पशु स्वभाव से ही प्रकृति प्रेमी होते हैं। प्रकृति में तो हर जगह अद्वैतरूपा कुण्डलिनी विद्यमान है ही। इसलिए कुण्डलिनी प्रेमी को पशुओं से भी प्रेम करना चाहिए।

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