कुण्डलिनी से पर्यावरण-सुरक्षा

हमारे पर्यावरण का मौजूदा हाल

आजकल पर्यावरण तेजी से विनाश की तरफ जा रहा है। हर जगह पर्यावरण को प्रदूषित किया जा रहा है। हरेक व्यक्ति पर्यावरण को प्रदूषित करने में लगा हुआ है। आदमी की इच्छाओं पर लगाम ही नहीं लग रही है। भौतिक वस्तुओं का अंधाधुंध निर्माण हो रहा है, जिसके लिए पर्यावरण का व्यापक दोहन किया जा रहा है। हरेक वास्तु आज विषैली हो गई है। प्राकृतिक आपदाओं व प्रदूषण से लोग असमय मौत के शिकार हो रहे हैं।

प्राचीन जनजीवन में पर्यावरण-सुरक्षा

हमारा प्राचीन जनजीवन एक पर्यावरण-मित्र जनजीवन था। पर्यावरण को देवताओं की तरह पूजा जाता था। पर्वतों, नदियों, सागरों, वृक्षों, वनों समेत सभी वस्तुओं को देवता मानकर पूजा जाता था। कई तथाकथित आधुनिक लोग कहते हैं कि पुराने समय के लोगों में दिमाग की कमी होती थी, इसलिए वे तकनीक में पिछड़े हुए थे। परन्तु वास्तविकता यह है कि वे दिमाग के मामले में आज के लोगों से भी ज्यादा तेज होते थे। तभी तो वे स्वावलंबी होकर अपना जीवन जंगल में भी सुखपूर्वक बिता लेते थे। आज के अधिकाँश लोग तकनीक के बिना अपना जीवन जी ही नहीं सकते। प्राचीन लोग तकनीक का इस्तेमाल इसलिए नहीं करना चाहते थे, क्योंकि उससे पर्यावरण को नुक्सान पहुंचता था।

प्राचीन युग में पर्यावरण की सुरक्षा में कुण्डलिनी का योगदान

जैसा कि हमने ऊपर कहा है कि पुराने जमाने के लोग सभी वस्तुओं को देवता मानते थे। उदाहरण के लिए, आर्यों को ही देख लें। वे प्रकृति के पुजारी थे। सृष्टि की प्रत्येक वस्तु को उन्होंने सुन्दर देवता का रूप दिया हुआ था, जैसे कि वायु देव, जल देव, सूर्य देव, अग्नि देव आदि। आज भी वैदिक अनुष्ठानों में इन सभी देवताओं के पूजन की परम्परा है। इसी तरह की परम्परा प्राचीन मिस्र व सेल्टिक समाज में भी थी। लगभग सभी देशों में यह परम्परा किसी न किसी रूप में रही है। इससे पर्यावरण को लम्बे समय तक बचाने में काफी मदद मिली।

प्राकृतिक वस्तुओं की पूजा का अर्थ ही अद्वैत की पूजा है। क्योंकि तनिक चिंतन करने पर सभी वस्तुओं की आत्मा अद्वैत ही प्रतीत होती है। वे हैं भी, और नहीं भी हैं। वे काम करती भी हैं, और नहीं भी करती हैं। उन्हें फल मिलता भी है, और नहीं भी मिलता है। वे प्रकाश-रूप भी हैं, और अन्धकार-रूप भी, और दोनों से रहित भी हैं। इसका अर्थ है कि प्राचीन लोगों के मन में कुण्डलिनी का निवास हुआ करता था, क्योंकि अद्वैतभाव और कुण्डलिनी मन में साथ-२ रहते हैं। तभी तो प्राचीन युग में कुण्डलिनी का बहुत बोलबाला हुआ करता था, और विश्व के सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में इसका जिक्र जरूर मिलता है।

कुण्डलिनी पर्यावरण को कैसे बचाती है

अधिकाँश लोग अपने मन के वश में होते हैं। मन तो बन्दर की तरह होता है। वह अपने साथ उनको भी नचाता रहता है। वे मन के गुलाम होते हैं, और मन का साथ नहीं छोड़ सकते। उनकी सत्ता मन की सत्ता के साथ जुड़ी होती है। मन के नष्ट होने से वे भी अपने को नष्ट महसूस करते हैं। उनका मन भौतिक दुनिया के आश्रित होता है। यदि मन को भौतिक काम-धंधे न मिले, तो वह मरने लगता है। इसलिए वह बिना जरूरत के ही नए-२ काम-धंधे ढूँढता रहता है। वह पर्यावरण को हानि पहुंचाने से भी नहीं कतराता, क्योंकि द्वैतभाव के कारण उसे पर्यावरण में देवता/कुण्डलिनी नहीं दिखाई देती। उसे पर्यावरण में केवल अन्धकार दिखाई देता है। इस तरह से पर्यावरण को क्षति पहुँचती है।

इसके विपरीत, एक कुण्डलिनी योगी का मन कुण्डलिनी के आश्रित रहता है। वह कुण्डलिनी से जीवन-शक्ति लेता रहता है। उसे भौतिक काम-धंधों से जीवन-शक्ति लेने की कोई जरूरत नहीं होती। इसलिए वह अपनी जरूरत के कम से कम काम-धंधों में ही मस्त रहता है, और फालतु के काम-धंधों में नहीं उलझता। अपनी जरूरत के काम भी वह पर्यावरण को हानि पहुंचाए बिना निपटाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसकी नजर में हर जगह कुण्डलिनी है। यह तो सिद्ध ही है कि सृष्टि में हर जगह अद्वैत तत्त्व विद्यमान है, और यह भी कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी भी रहती है।

प्रेमयोगी वज्र का अपना अनुभव

क्षणिक आत्मज्ञान के बाद वह अकर्मक जैसा बन गया था। हर समय वह कुण्डलिनी के ध्यान में मस्त रहता था। उसे कुण्डलिनी से भरपूर जीवन मिलता रहता था। उसे कोई काम करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती थी। काम करने से तो उसकी कुण्डलिनी को नुक्सान भी पहुँचता था। बहुत जरूरी होने पर ही वह काम करता था। काम को वह अद्वैत के साथ करता था, ताकि उसकी कुण्डलिनी को कम से कम नुकसान पहुंचता। वह पर्यावरण के प्रति काफी सचेत व प्रकृति-प्रेमी बन गया था। अधिकाँश समय वह प्रकृति के बीच में बैठकर अकेले ही गुजारता था। औरों के, बिना जरूरत के काम उसे पागलपन की तरह लगते थे। यद्यपि कई ऐसे काम मजबूरी में उसे भी करने पड़ते थे, ताकि वह सभी के साथ चल सकता। इससे जाहिर है कि एक कुण्डलिनी योगी से समाज की व्यवस्था पर विशेष फर्क नहीं पड़ता। पर्यावरण संरक्षण के लिए यह जरूरी है कि अधिकाँश लोग कुण्डलिनी योगी बनें।  

   इसी सन्दर्भ में प्रकृति के प्रति लगाव, प्रकृति से प्रेम भी एक योग है। परोक्ष रूप में यह प्रकृति ही परमात्मा का स्वरूप है ।

योग एक प्रकृति प्रेम-(विश्व पर्यावरण दिवस पर संदर्भित)

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पहाड़ों में कुण्डलिनी

मित्रो, पहाड़ों का अपना एक अलग ही आकर्षण है। वहां पर मन प्रफुल्लित, साफ, हल्का, शांत व आनंदित हो जाता है। पुराना जीवन रंग-बिरंगे विचारों के रूप में मस्तिष्क में उमड़ने लगता है, जिससे बड़ा ही आनंद महसूस होता है। चिंता, अवसाद व तनाव दूर होने लगते हैं। गत जीवन के मानसिक जख्म भरने लगते हैं। प्रेमयोगी वज्र को भी अपने व्यावसायिक उत्तरदायित्वों के कारण कुछ वर्षों तक ऊंचे पहाड़ों में रहने का मौक़ा मिला था। उसे वहां के लोगों से व प्राकृतिक परिवेश से भरपूर प्यार, सहयोग व सम्मान मिला।

पहाड़ों में अपने आप विपासना साधना होती रहती है

उपरोक्त तथ्यों से जाहिर है कि पहाड़ों में विपासना के लिए सर्वाधिक अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद होती हैं। यदि आदमी योग आदि के माध्यम से अपना बल भी लगाए, तब तो शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है। प्रेमयोगी वज्र को भी उपरोक्त मानसिक सद्प्रभावों का अनुभव पहाड़ों के इसी गुण के कारण हुआ।

कुण्डलिनी ही पहाड़ों में स्वयम्भूत विपासना को पैदा करती है

आश्चर्य की बात है कि प्रेमयोगी वज्र की मानसिक कुण्डलिनी, जो पहले दब जैसी गई थी, वह पहाड़ों में बहुत मजबूत हो गई थी। वह तांत्रिक कुण्डलिनी थी, और उसकी मानसिक प्रेमिका के रूप में थी। उसके साथ ही उसकी मानसिक गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी भी वहां पर ज्यादा चमकदार बन गई थी। पर उसने देखा कि पहाड़ों के लोग प्रेमिका के रूप वाली कुण्डलिनी को बहुत ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी की अपेक्षा। गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को वहां के पंडित वर्ग के आध्यात्मिक लोग ज्यादा महत्त्व दे रहे थे, यद्यपि प्रेमिका की कुण्डलिनी के साथ ही, अकेली गुरु के रूप वाली कुण्डलिनी को नहीं। इसका कारण यह है कि पहाड़ मन के काम-रस या श्रृंगार-रस को उत्तेजित करते हैं। इसी वजह से तो काम शास्त्रों में ऊंचे पहाड़ों का सुन्दर वर्णन बहुतायत में पाया जाता है। उदाहरण के लिए विश्वप्रसिद्ध साहित्यिक रचना “मेघदूत”।

दूसरा प्रमाण यह है कि मैदानी भागों में कुण्डलिनी योग साधना के बाद जब प्रेमयोगी वज्र पर्वत-भ्रमण पर गया, तब पहाड़ों में उसकी कुण्डलिनी प्रचंड होकर जागृत हो गई, जैसा कि इस वैबसाईट के “गृह-2” वैबपेज पर वर्णित किया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान का अनुभव भी पहाड़ों में ही हुआ था, जो उसने इस वैबसाईट के “गृह-2” वेबपेज पर वर्णित किया है । इसी वजह से तो अनादिकाल से लेकर योग साधक शीघ्र सिद्धि के लिए मैदानों से पहाड़ों की तरफ पलायन करते आए हैं।

पहाड़ों में कुण्डलिनी क्यों चमकने लगती है?

वास्तव में, पहाड़ देवता की मूर्ति की तरह काम करते हैं। तभी तो कई धर्मों में पहाड़ को देवता माना गया है। एक प्रकार से देवता की मूर्ति पहाड़ के रूप में प्रतिक्षण आँखों के सामने विद्यमान रहती है। पहाड़ मैं विद्यमान अद्वैत तत्त्व आदमी के मन में भी अद्वैतभाव पैदा कर देता है। उस अद्वैत के प्रभाव से कुण्डलिनी मन-मंदिर में छा जाती है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी न भी हो, तो भी अद्वैतभाव से बहुत से आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं। साथ में, उससे धीरे-२ कुण्डलिनी भी बनना शुरू हो जाती है।

यह बात इस वैबसाईट में पहले भी सिद्ध की जा चुकी है कि सृष्टि के कण-कण में अद्वैत तत्त्व विद्यमान है। वास्तव में, वही भगवान् है। इसे समझने के लिए सबसे बढ़िया पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन” है।

मौन, ध्यान एवं जप आदि कार्यों के लिए एकांत की जरूरत होती है और इसके लिए पहाड़ों से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता।

क्यों बनाए गए हैं ऊंचे पहाड़ों पर देवी नंदिर, आखिर क्या है इसका रहस्य?

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कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही असली समर्पण है

सभी धर्मों में ईश्वर के प्रति समर्पण/सरेंडर पर बहुत जोर दिया गया है। वास्तव में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण ही ईश्वर के प्रति समर्पण है। ईश्वर निराकार है। उसे कोई देख नहीं सकता, जान नहीं सकता, और न ही उसे कोई अनुभव कर सकता है। जिसका कोई अता-पता ही नहीं है, उसके प्रति कोई कैसे समर्पित हो सकता है? वास्तव में कुण्डलिनी ही ईश्वर का छोटा रूप है, जो जानने में आ सकता है। यह कुण्डलिनी क्राइस्ट के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, भगवान् राम के मानसिक चित्र के रूप में हो सकती है, किसी के मन में उसके अपने गुरु/मित्र/प्रेमी के चित्र के रूप में हो सकती है आदि-2।

अद्वैत के प्रति समर्पित होने का अर्थ भी कुण्डलिनी के प्रति समर्पित होना ही है

जैसा कि हमने पहले भी बताया है की अद्वैत और कुण्डलिनी साथ-2 रहते हैं । एक के बढ़ने से दूसरा स्वयं ही बढ़ जाता है। अनासक्ति भी अद्वैत का ही रूप है। इसका सीधा सा अर्थ है की ईश्वर सीधे नहीं, अपितु अद्वैत/अनासक्ति/साक्षीभाव {साक्षी भाव से अद्वैत व अनासक्ति बढ़ते हैं}/कुण्डलिनी के रूप में रहता है। ये चारों भाव एकसमान ही हैं, क्योंकि एक के भी बढ़ने से अन्य भाव स्वयं बढ़ने लगते हैं। यदि सभी भाव एकसाथ बढ़ाए जाएं, तब तो और भी अच्छा, क्योंकि तब बहुत तेज आध्यात्मिक प्रगति होती है।

प्रेमयोगी वज्र ने जब शरीरविज्ञान दर्शन के माध्यम से अद्वैत को लम्बे समय तक अपनाया, तब उसमें बहुत से आध्यात्मिक गुण बढ़ोत्तरी को प्राप्त हुए, और कुण्डलिनी भी परिवृद्ध हुई, जो अंततः जागृत हो गई।

ईश्वर के प्रति समर्पण से कुण्डलिनी के प्रति समर्पण स्वयं ही हो जाता है

वास्तव में भगवान् के ध्यान से भी कुण्डलिनी का ही ध्यान होता है। निराकार भगवान् के ध्यान से अद्वैत का ध्यान स्वयं ही हो जाता है, क्योंकि भगवान् सभी स्थितियों में एकसमान हैं। और यह निर्विवाद सत्य है कि अद्वैत के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं ही होने लगता है। इससे भी सिद्ध हो जाता है कि ईश्वर के प्रति समर्पण स्वयं ही अप्रत्यक्ष रूप में कुण्डलिनी के प्रति समर्पण बन जाता है। फिर क्यों न सीधे ही कुण्डलिनी-साधना की जाए।

इसीलिए कहा जाता है कि गुरु भगवान् से बढ़कर हैं

गुरु गोबिंद दोनों मिले, काके परूं पाए।
बलिहारी गुरु आपकी, गोबिंद दियो मिलाए।।

तुलनात्मक रूप से गुरु को भगवान् से बढ़कर बताया गया है, क्योंकि भगवान की प्राप्ति गुरु से ही तो होती है। कुण्डलिनी वास्तव में गुरु/प्रेमी की मन में बसी हुई छवि/कुण्डलिनी ही तो है। इससे भी सिद्ध होता है कि कुण्डलिनी के प्रति समर्पण अधिक आसान, मानवीय, व्यावहारिक व कारगर होता है।  

हिंदु धर्म और इस्लाम एक ही बात बोलते हैं

इस्लाम धर्म में अल्लाह/निराकार ईश्वर के प्रति समर्पण पर जोर दिया गया है। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म में मुख्यतः साकार ईश्वर/मूर्ति/कुण्डलिनी के प्रति समर्पण पर अधिक जोर दिया गया है। ऊपर हमने यह भी सिद्ध कर दिया है कि निराकार ईश्वर के ध्यान से कुण्डलिनी का ध्यान स्वयं होने लगता है। इसी तरह, कुण्डलिनी/मूर्ति का ध्यान करने से निराकार ईश्वर/अल्लाह का ध्यान स्वयं ही हो जाता है। साथ में, इससे यह भी स्वयं सिद्ध हो जाता है कि इस्लाम में मूर्ति/कुण्डलिनी-पूजा का विरोध वास्तविक नहीं, अपितु काल्पनिक है, जो किसी गलतफहमी के कारण पैदा हुआ है।  

इसीलिए आजकल के बौद्धिक युग में हर जगह कुण्डलिनी योग का बोलबाला है।

और अज्ञानी गुरु भी कभी काम आ सकता है, अगर आप समर्पण कर दें। क्योंकि समर्पण करना ही घटना है, गुरु तो सिर्फ बहाना है।

ओशो प्रवचन- समर्पण की छलांग

मां कुंडलिनी के सम्मुख पूर्ण समर्पण की भावना भी रखनी चाहिए ।

आंतरिक शक्ति को जगाएं- speakingtree.in

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कुण्डलिनी-ध्यान का मनोविज्ञान

मस्तिष्क में कुण्डलिनी का ध्यान

सीधे तौर पर हम मस्तिष्क में कुण्डलिनी के ऊपर ज्यादा देर तक गहरा ध्यान नहीं लगा सकते। ऐसा करने से मस्तिष्क में दबाव बढ़ जाता है, जिससे बेचैनी पैदा होती है, और चक्कर भी आ सकता है। मस्तिष्क के दबाव में होने से रोजमर्रा के काम-काज दुष्प्रभावित होने लगते हैं। याददाश्त घट सी जाती है। सांसारिक कार्यों में मन नहीं लगता। मन व शरीर में थकान जैसी रहती है। सिर घूमता हुआ जैसा महसूस होता है। अनभ्यस्त होने पर इससे मस्तिष्क को हानि पहुँचने का डर भी बना रहता है, जिससे अल्जाईमर जैसे मस्तिष्क के रोग भी पैदा हो सकते हैं।

निचले चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान

उपरोक्त समस्या का हल चक्र-साधना से किया गया है। इसमें कुण्डलिनी का ध्यान शरीर के निचले चक्रों पर किया जाता है। चक्रों पर ध्यान की मात्रा ऊपर की तरफ बढ़ती रहती है। इसीलिए तो कुण्डलिनी-योगी मूलाधार से प्रारम्भ करते हैं, ताकि धीरे-२ अभ्यस्त हो सकें।

वैदिक संस्कृति में कुण्डलिनी का ध्यान प्रकृति के अन्दर किया जाता था

प्राचीन वैदिक युग में जन-जीवन बहुत अस्त-व्यस्त होता था। बहुत सी समस्याएँ होती थीं। उससे आदमी बहिर्मुखी व भौतिकवादी होता था। कोई मशीनें नहीं होती थीं। सभी काम हाथों से करने पड़ते थे। जंगली जानवरों का आतंक होता था। वैसी परिस्थिति में आम जन-मानस के लिए गहरा ध्यान करना संभव नहीं था। इसीलिए उन्होंने प्रकृति की पूजा करना प्रारम्भ किया, तथा कुण्डलिनी का ध्यान प्राकृतिक पदार्थों के भीतर किया। सूर्यदेव, वायुदेव, अग्निदेव आदि के रूप में इसके बहुत से उदाहरण हैं। उस प्रणाली में कुण्डलिनी मस्तिष्क से सर्वाधिक दूरी पर स्थित होती थी, जिससे उसका ध्यान बहुत सरल होता था। प्रकृति के बीच में पल-बढ़ रहे मनुष्य को उसका लाभ भी अनायास ही मिलता रहता था।

मूर्ति-परम्परा ने ध्यान को और अधिक बढ़ाने में मदद की

धीरे-२ मनुष्य विकसित होता गया, जिससे उसके लिए बहुत सा अतिरिक्त समय उपलब्ध हो गया। उससे मूर्तिवाद का जन्म हुआ। अब मनुष्य प्रकृति से दूर रहकर, एकांत में भी ध्यान लगा सकता था। मूर्ति-ध्यान के स्थान मंदिरों के रूप में उभर आए। देवमूर्ति के ऊपर ध्यान अधिक लगता था, क्योंकि वह मस्तिष्क के अधिक निकट होती थी, और उसकी बनावट मनुष्य की तरह होती थी।

कुण्डलिनीयोग की शुरुआत से ध्यान को पंख लग गए

कालान्तर में मनुष्य ने इतना अधिक विकास कर लिया था कि उसके द्वारा जुटाए गए अतिरिक्त अन्न से व अतिरिक्त संसाधनों से उसके भण्डार भर गए थे। इससे वह लम्बे समय तक गहन ध्यान-साधना कर सकता था। इसलिए कुण्डलिनी-योग की खोज हुई। उसमें शरीर के विभिन्न भागों/चक्रों पर कुण्डलिनी का ध्यान करना होता था। कुण्डलिनी की मस्तिष्क से दूरी बहुत अधिक घट गई थी, और कुण्डलिनी व्यक्ति के अपने ही शरीर में पहुँच गई थी। इससे ध्यान को असीमित ऊँचाई मिली, जो सहस्रार चक्र में अपने चरम पर पहुँच गई, कुण्डलिनी-जागरण के रूप में।

ध्यान सदैव मस्तिष्क में ही लगता है

चाहे कहीं भी कुण्डलिनी का ध्यान कर लो, वह होता तो मस्तिष्क में ही है, क्योंकि मस्तिष्क ही सभी अनुभवों का स्थान है। यह अलग बात है कि कुण्डलिनी मस्तिष्क/सहस्रार के जितनी नजदीक होती है, उस पर ध्यान उतना ही मजबूत लगता है।

आज के युग में हर प्रकार के व्यक्ति के लिए उपयुक्त साधना-पद्धति मौजूद है

आज विविधताओं वाला युग है। कई लोग बहुत व्यस्त हैं। उनके लिए वैदिक संस्कृति वाला कुण्डलिनी-ध्यान (कर्मयोग) उपलब्ध है। जिनके पास थोड़ा अतिरिक्त समय है, उनके लिए देव-मूर्तियों पर ध्यान लगाने के लिए बहुत से मंदिर मौजूद हैं। जिनके पास सर्वाधिक अतिरिक्त समय है, उनके लिए पूर्ण विकसित कुण्डलिनी योग भी उपलब्ध है।

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सौंदर्य के आधार के रूप में कुंडलिनी

सुन्दरता क्या है

यह अक्सर कहा जाता है कि सुन्दरता किसी दूसरे में नहीं, अपितु अपने अन्दर होती है। ध्यान योग से यह बात बखूबी सिद्ध हो जाती है। सुन्दर वस्तु को इसलिए सुन्दर कहा जाता है क्योंकि वह हमारे मन में आनंद के साथ लम्बे समय तक दृढ़तापूर्वक बसने की सामर्थ्य रखती है। मन में वैसी आकर्षक व स्थायी छवि को ही कुण्डलिनी भी कहते हैं।

सुन्दर वस्तु के प्रति अनायास ध्यान

लम्बे समय तक मन में बैठी हुई वस्तु की तरफ ध्यान स्वयं ही लगा रहता है। इससे अनादिकाल से लेकर मन में दबे पड़े चित्र-विचित्र विचार व रंग-बिरंगी भावनाएं उमड़ती रहती हैं। उनके प्रति साक्षीभाव व अनासक्ति-भाव स्वयं ही विद्यमान रहता है, क्योंकि मन में बैठी हुई उपरोक्त वस्तु निरंतर अपनी ओर व्यक्ति का ध्यान खींचती रहती है। इससे वे भावनामय विचार क्षीण होते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उत्तरोत्तर शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। अंततः व्यक्ति पूर्ण शून्यता या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है।

सबसे अधिक सुन्दर वस्तु

लौकिक परिपेक्ष्य में एक सर्वगुणसंपन्न स्त्री को एक उसके योग्य व उसके रुचिकर पुरुष के लिए सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि वैसी स्त्री का चित्र वैसे पुरुष के मन में सर्वाधिक मजबूती से बस जाता है। दोनों के बीच में प्रतिदिन के संपर्क से वह चित्र मजबूती प्राप्त करता रहता है। अंततः वह इतना अधिक माजबूत व स्थायी बन जाता है कि वह एक योग-समाधि का रूप ले लेता है। यदि बीच में स्वस्थ आकर्षण में (सच्चे प्यार में) खलल पड़े, तो मानसिक चित्र कमजोर भी पड़ सकता है। ऐसा जरूरत से ज्यादा इंटरेक्शन, शारीरिक सम्बन्ध आदि से हो सकता है। लौकिक व्यवहार में यह नजर भी आता है कि विवाह के बाद परस्पर आकर्षण कम हो जाता है। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती रहें, तो ऐसे यिन-यांग आकर्षण को समाधि व आत्मज्ञान के स्तर तक पहुँचाने के लिए २ साल काफी हैं। ऐसे ही बहुत सारे मामलों में हैरान कर देने वाली अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ईश्वर पर व अच्छे कर्मों पर बरबस ही विश्वास हो जाता है।

सुन्दरता की प्राप्ति सांसारिक वस्तुओं पर नहीं, अपितु अच्छे कर्मों व ईश्वर-कृपा पर निर्भर

कई लोगों के पिछले कर्म अच्छे नहीं होते, और उन पर  ईश्वर की कृपा भी नहीं होती। ऐसे लोगों को ऐसा मजबूत यिन-यांग आकर्षण उपलब्ध ही नहीं होता। कई लोगों को यदि उपलब्ध हो भी जाता है, तो भी अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण वह लम्बे समय तक स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे में समाधि नहीं लग पाती। बहुत से लोग वर्तमान में बहुत अच्छे कर्म कर रहे होते हैं। वे सदाचारी होते हैं। वे बड़ों-बूढ़ों को व गुरुओं को प्रसन्न रखते हैं, एवं उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। वे उनके सामने नतमस्तक बने रहते हैं। वे सभी कठिनाईयों व दुर्व्यवहारों को प्रसन्नता के साथ सहते हैं। इससे उनके मन में अपने गुरुओं, वृद्धों व परिवारजनों की छवियाँ बस जाती हैं। उनमें से कोई अनुकूल छवि उनकी कुण्डलिनी बन जाती है। कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को पुष्ट करने वाला यिन-यांग आकर्षण भी कई किस्मत वालों को प्राप्त हो जाता है।

अवसरों से रहित लोगों के लिए कुण्डलिनी-योग एक बहुत बड़ी राहत

जिन अधिकाँश व बदकिस्मत लोगों को प्राकृतिक रूप से भरपूर ध्यान का अवसर नहीं मिलता, उन्हीं के लिए कुण्डलिनी योग बनाया गया है, मुख्य रूप से। कई हतोत्साहित व निराशावादी लोग इसे “रेत में से तेल निकालने” की संज्ञा भी देते हैं। यद्यपि यह अब सच्चाई है कि रेत में भी तेल (पैट्रोल) होता है। इसमें उपयुक्त समय पर तंत्र के प्रणय-योग के सम्मिलन से यह बहुत आसान, व्यावहारिक व कारगर बन जाता है।

बनावटी प्यार

किसी विशेष वस्तु से प्रतिदिन  के लौकिक प्यार की कमी को मेडीटेशन से पूरा करना भी एक जादुई कारीगरी ही है। इसे हम “प्रेम का कृत्रिम निर्माण (synthesis of love)” भी कह सकते हैं। योग एक ऐसी फैक्टरी है, जो प्रेम का कृत्रिम उत्पादन करती है। यह कारीगरी मुझे बचपन से लेकर प्रभावित करती आई है। इससे लौकिक प्यार की तरह पतन की भी सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वस्तु से सारा इंटरेक्शन मन में ही तो होता है। अति तो इन्द्रियों से ही होती है हमेशा।

सुन्दरता सापेक्ष व आभासिक होती है

यदि सुन्दरता निरपेक्ष होती, तो एक सुन्दर स्त्री सभी प्रकार के लोगों को एकसमान सुन्दर लगा करती, और हिंसक जानवर भी उसके पीछे लट्टू हो जाया करते। इसी तरह, यदि सुन्दरता भौतिक रूप-आकार पर निर्भर होती, तब योग से प्रवृद्ध की गई वृद्ध गुरु व काली माता (बाहरी तौर पर कुरूप व डरावनी) के रूप की कुण्डलिनी सबसे अधिक सुन्दर न लगा करती, और वह योगी के मन में सबसे ज्यादा मजबूती से न बस जाया करती।

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द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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गुरु के बारे में एक आधारभूत रहस्योद्घाटन

गुरु क्या है

गुरु वह विलक्षण व्यक्तित्व है, जिस पर विश्वास है, जिससे प्रेम है, और जो अपने से कहीं अधिक महत्त्वशाली प्रतीत होते हैं। संस्कृत शब्द “गुरु” का अर्थ ही भारी या बड़ा है।

क्या एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है

काफी हद तक एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है, यद्यपि अधिकाँश मामलों में पूर्णरूप से गुरु नहीं बन सकता। वैसे कुछ अपवाद तो हर जगह ही देखने को मिल जाते हैं। अधिकांशतः प्रेमी के प्रति आदरभाव कम होता है, और उसके प्रति महत्त्वबुद्धि भी कम होती है। उससे प्रेमी का चित्र मन में अच्छी तरह से नहीं बैठता। गुरु के प्रति तो प्रेम के साथ आदरभाव व महत्त्वबुद्धि दोनों का होना आवश्यक है। इसीलिए गुरु अधिकांशतः आयु में वृद्धावस्था के करीब होते हैं। इससे वे ज्ञानी, ध्यानी, सम्मानित व योगसाधक होते हैं। वे आध्यात्मिक कर्मकांड करने वाले, व देवता के पुजारी होते हैं। वे साधारण व सात्विक जीवन जीने वाले होते हैं। वे सर्वप्रिय, मृदुभाषी, संतुलित, अहिंसक व कट्टरता से रहित होते हैं। उनके मन-मंदिर में सभी सद्गुणों का वास होता है। वे मन के दोषों से रहित, अनासक्त व अद्वैतशील होते हैं। गुरु के प्रति उपरोक्त आदरबुद्धि व महत्त्वबुद्धि के कारण उनका लीलामय रूप शिष्य के मन में पक्की तरह से बैठ जाता है, और लम्बे समय तक बना रहता है।

गुरु में दिव्य गुणों का होना आवश्यक है

ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी स्वयं दिव्य है और दिव्य गुणों का उत्पादन करती है। इसलिए, गुरु की दिव्यता एक व्यक्ति के दिमाग में कुंडलिनी को मजबूत करने में बेहतर रूप से मदद करती है। इसके अलावा, देवत्व भगवान के अनुग्रह को भी आकर्षित करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान भी देवत्व से भरे हुए हैं। भगवान की कृपा भी कुंडलिनी वृद्धि में एक महत्वपूर्ण कारक है।

गुरु व प्रणय-प्रेमी एक दूसरे के पूरक के रूप में

गुरु व प्रणय-प्रेमी की जुगलबंदी तंत्र का एक अभिन्न व आधारभूत हिस्सा है। तंत्र के अनुसार, गुरु व प्रणय-प्रेमी/प्रेमिका के बीच में किसी भी प्रकार से सम्बन्ध या संपर्क बना रहना चाहिए। कई आध्यात्मिक आकांक्षी प्रेमी के साथ भी और गुरु के साथ भी एकसाथ मजबूत संबंध (मानसिक या शारीरिक या दोनों) बना कर रखते हैं। यह भी स्वयं ही प्रेमी और गुरु की मानसिक छवियों के परस्पर मिलन का कारण बनता है। उससे गुरु के प्रति बनी हुई आदरबुद्धि प्रणय-प्रेमी के ऊपर स्थानांतरित हो जाती है, और प्रणय-प्रेमी के प्रति किया गया प्रणय-प्रेम गुरु के ऊपर शुद्ध प्रेम के रूप में स्थानांतरित हो जाता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे एक अँधा और एक लंगड़ा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। आमतौर पर गुरु की वृद्धावस्था के कारण उनके प्रति उतना मजबूत व आकर्षण से भरा हुआ प्रेम पैदा नहीं होता, जितना कि एक यौनप्रेमी के प्रति होता है। इसी तरह, एक यौनप्रेमी के प्रति उतनी आदरबुद्धि नहीं होती, जितनी एक वृद्ध गुरु के प्रति होती है। इसका कारण यह है कि अधिकांशतः प्रणय-प्रेमी भौतिकवादी, कम आयु वाला, कम अनुभव वाला, कम योग्यता वाला, कम योगसाधना करने वाला, कम गुणों वाला, मन के दोषों से युक्त व द्वैतशील होता है।

दो कुण्डलिनियों का एकसाथ निर्माण, व विकास

गुरु व प्रेमी के निरंतर संपर्क से, दोनों के लीलामय रूपों की कुण्डलिनियां (स्पष्ट व स्थायी मानसिक चित्र) एकसाथ विकसित होती रहती हैं। वे दोनों एक-दूसरे को शक्ति देती रहती हैं। भौतिक माहौल में प्रेमी की व अध्यात्मिक माहौल में गुरु की कुण्डलिनी अधिक विकसित होती है। अनुकूल परिस्थितियों के अनुसार, दोनों में से कोई भी कुण्डलिनी पहले जागृत हो सकती है। अधिकाँशतः गुरु के रूप की कुण्डलिनी ही जागृत होती है, प्रणय-प्रेमी की कुण्डलिनी तो उसकी सहायक बन कर रह जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्ण मानसिक मिलन तो गुरु के साथ ही संभव है। प्रणय-प्रेमी से सम्बंधित शारीरिक उत्तेजना उसके रूप की कुण्डलिनी से एकाकार होने (कुण्डलिनी जागरण) की राह में रोड़ा बन जाती है। यह सारा कुछ ठीक इसी तरह ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ, जो इस वेबसाईट का नायक है।

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