सौंदर्य के आधार के रूप में कुंडलिनी

सुन्दरता क्या है

यह अक्सर कहा जाता है कि सुन्दरता किसी दूसरे में नहीं, अपितु अपने अन्दर होती है। ध्यान योग से यह बात बखूबी सिद्ध हो जाती है। सुन्दर वस्तु को इसलिए सुन्दर कहा जाता है क्योंकि वह हमारे मन में आनंद के साथ लम्बे समय तक दृढ़तापूर्वक बसने की सामर्थ्य रखती है। मन में वैसी आकर्षक व स्थायी छवि को ही कुण्डलिनी भी कहते हैं।

सुन्दर वस्तु के प्रति अनायास ध्यान

लम्बे समय तक मन में बैठी हुई वस्तु की तरफ ध्यान स्वयं ही लगा रहता है। इससे अनादिकाल से लेकर मन में दबे पड़े चित्र-विचित्र विचार व रंग-बिरंगी भावनाएं उमड़ती रहती हैं। उनके प्रति साक्षीभाव व अनासक्ति-भाव स्वयं ही विद्यमान रहता है, क्योंकि मन में बैठी हुई उपरोक्त वस्तु निरंतर अपनी ओर व्यक्ति का ध्यान खींचती रहती है। इससे वे भावनामय विचार क्षीण होते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति उत्तरोत्तर शून्यता की ओर बढ़ता जाता है। अंततः व्यक्ति पूर्ण शून्यता या आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है।

सबसे अधिक सुन्दर वस्तु

लौकिक परिपेक्ष्य में एक सर्वगुणसंपन्न स्त्री को एक उसके योग्य व उसके रुचिकर पुरुष के लिए सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है। ऐसा इसीलिए है क्योंकि वैसी स्त्री का चित्र वैसे पुरुष के मन में सर्वाधिक मजबूती से बस जाता है। दोनों के बीच में प्रतिदिन के संपर्क से वह चित्र मजबूती प्राप्त करता रहता है। अंततः वह इतना अधिक माजबूत व स्थायी बन जाता है कि वह एक योग-समाधि का रूप ले लेता है। यदि बीच में स्वस्थ आकर्षण में (सच्चे प्यार में) खलल पड़े, तो मानसिक चित्र कमजोर भी पड़ सकता है। ऐसा जरूरत से ज्यादा इंटरेक्शन, शारीरिक सम्बन्ध आदि से हो सकता है। लौकिक व्यवहार में यह नजर भी आता है कि विवाह के बाद परस्पर आकर्षण कम हो जाता है। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती रहें, तो ऐसे यिन-यांग आकर्षण को समाधि व आत्मज्ञान के स्तर तक पहुँचाने के लिए २ साल काफी हैं। ऐसे ही बहुत सारे मामलों में हैरान कर देने वाली अनुकूल परिस्थितियों को देखकर ईश्वर पर व अच्छे कर्मों पर बरबस ही विश्वास हो जाता है।

सुन्दरता की प्राप्ति सांसारिक वस्तुओं पर नहीं, अपितु अच्छे कर्मों व ईश्वर-कृपा पर निर्भर

कई लोगों के पिछले कर्म अच्छे नहीं होते, और उन पर  ईश्वर की कृपा भी नहीं होती। ऐसे लोगों को ऐसा मजबूत यिन-यांग आकर्षण उपलब्ध ही नहीं होता। कई लोगों को यदि उपलब्ध हो भी जाता है, तो भी अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण वह लम्बे समय तक स्थिर नहीं रह पाता। ऐसे में समाधि नहीं लग पाती। बहुत से लोग वर्तमान में बहुत अच्छे कर्म कर रहे होते हैं। वे सदाचारी होते हैं। वे बड़ों-बूढ़ों को व गुरुओं को प्रसन्न रखते हैं, एवं उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। वे उनके सामने नतमस्तक बने रहते हैं। वे सभी कठिनाईयों व दुर्व्यवहारों को प्रसन्नता के साथ सहते हैं। इससे उनके मन में अपने गुरुओं, वृद्धों व परिवारजनों की छवियाँ बस जाती हैं। उनमें से कोई अनुकूल छवि उनकी कुण्डलिनी बन जाती है। कई बार अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी को पुष्ट करने वाला यिन-यांग आकर्षण भी कई किस्मत वालों को प्राप्त हो जाता है।

अवसरों से रहित लोगों के लिए कुण्डलिनी-योग एक बहुत बड़ी राहत

जिन अधिकाँश व बदकिस्मत लोगों को प्राकृतिक रूप से भरपूर ध्यान का अवसर नहीं मिलता, उन्हीं के लिए कुण्डलिनी योग बनाया गया है, मुख्य रूप से। कई हतोत्साहित व निराशावादी लोग इसे “रेत में से तेल निकालने” की संज्ञा भी देते हैं। यद्यपि यह अब सच्चाई है कि रेत में भी तेल (पैट्रोल) होता है। इसमें उपयुक्त समय पर तंत्र के प्रणय-योग के सम्मिलन से यह बहुत आसान, व्यावहारिक व कारगर बन जाता है।

बनावटी प्यार

किसी विशेष वस्तु से प्रतिदिन  के लौकिक प्यार की कमी को मेडीटेशन से पूरा करना भी एक जादुई कारीगरी ही है। इसे हम “प्रेम का कृत्रिम निर्माण (synthesis of love)” भी कह सकते हैं। योग एक ऐसी फैक्टरी है, जो प्रेम का कृत्रिम उत्पादन करती है। यह कारीगरी मुझे बचपन से लेकर प्रभावित करती आई है। इससे लौकिक प्यार की तरह पतन की भी सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वस्तु से सारा इंटरेक्शन मन में ही तो होता है। अति तो इन्द्रियों से ही होती है हमेशा।

सुन्दरता सापेक्ष व आभासिक होती है

यदि सुन्दरता निरपेक्ष होती, तो एक सुन्दर स्त्री सभी प्रकार के लोगों को एकसमान सुन्दर लगा करती, और हिंसक जानवर भी उसके पीछे लट्टू हो जाया करते। इसी तरह, यदि सुन्दरता भौतिक रूप-आकार पर निर्भर होती, तब योग से प्रवृद्ध की गई वृद्ध गुरु व काली माता (बाहरी तौर पर कुरूप व डरावनी) के रूप की कुण्डलिनी सबसे अधिक सुन्दर न लगा करती, और वह योगी के मन में सबसे ज्यादा मजबूती से न बस जाया करती।

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द्वैत और अद्वैत दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में

द्वैत क्या है?

दुनिया की विविधताओं को सत्य समझ लेना ही द्वैत है। दुनिया में विविधताएं तो हमेशा से हैं, और सदैव रहेंगी भी, परन्तु वे सत्य नहीं हैं। दुनिया में जीने के लिए विविधताओं का सहारा तो लेना ही पड़ता है। फिर भी उनके प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

अद्वैत क्या है?

उपरोक्तानुसार, दुनिया की विविधताओं के प्रति असत्य बुद्धि या अनासक्ति को ही अद्वैत कहते हैं। वास्तव में द्वैताद्वैत को ही संक्षिप्त रूप में द्वैत कहते हैं। अद्वैत अकेला नहीं रह सकता। यह एक खंडन-भाव है। अर्थात यह द्वैत का खंडन करता है। यह खंडन “द्वैत” से पहले लगने वाले “अ” अक्षर से होता है। जब द्वैत ही नहीं रहेगा, तब उसका खंडन कैसे किया जा सकता है? इसलिए जाहिर है कि द्वैत व अद्वैत दोनों साथ-२ रहते हैं। इसीलिए अद्वैत का असली नाम द्वैताद्वैत है।

एक ही व्यक्ति के द्वारा द्वैत व अद्वैत का एकसाथ पालन

ऐसा किया जा सकता है। यद्यपि ऐसा जीवनयापन विरले लोग ही ढंग से कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए बहुत अधिक शारीरिक व मानसिक बल की आवश्यकता पड़ती है। इससे लौकिक कार्यों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो सकती है, यदि सतर्कता के साथ उचित ध्यान न दिया जाए।

द्वैताद्वैत को बनाए रखने के लिए श्रमविभाजन

ऐसा विकसित सभ्यताओं में होता है, व बुद्धिमान लोगों के द्वारा किया जाता हहै। वैदिक सभ्यता भी इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें द्वैतमयी लौकिक कर्मों का  उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर होता है, और अद्वैतमयी धार्मिक क्रियाकलापों  का उत्तरदायित्व एक भिन्न श्रेणी के लोगों पर। वैदिक संस्कृति की जाति-परम्परा  इसका एक अच्छा उदाहरण है। इसमें ब्राम्हण श्रेणी के लोग पौरोहित्य (धार्मिक कार्य) का कार्य करते हैं, और अन्य शेष तीन श्रेणियां विभिन्न लौकिक कार्य करती हैं।

द्वैताद्वैत में श्रम-विभाजन के लाभ

इससे व्यक्ति पर कम बोझ पड़ता है। उसे केवल एक ही प्रकार का भाव बना कर रखना पड़ता है। इससे परस्पर विरोधी भावों के बीच में टकराव पैदा नहीं होता। इसलिए कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ जाती है। वैसे भी दुनिया में देखने में आता है कि जितना अधिक द्वैत होता है, कार्य उतना ही अच्छा होता है। अद्वैतवादी के अद्वैतभाव का लाभ द्वैतवादी को मिलता रहता है, और द्वैतवादी के द्वैतभाव का लाभ अद्वैतवादी को मिलता रहता है।  यह ऐसे ही होता है, जैसे एक लंगड़ा और एक अंधा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यद्यपि इसमें पूरी सफलता के लिए दोनों प्रकार के वर्गों के बीच में घनिष्ठ व प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए।

गुरु-शिष्य का परस्पर सम्ब्बंध भी ऐसा ही द्वैताद्वैत-सम्बन्ध है

प्रेमयोगी वज्र को भी इसी श्रमविभाजन का लाभ मिला था। उसके गुरू (वही वृद्धाध्यात्मिक पुरुष) एक सच्चे ब्राम्हण-पुरोहित थे। प्रेमयोगी वज्र स्वयं  एक अति  भौतिकवादी व्यक्ति तथा। दोनों के बीच में लम्बे समय तक नजदीकी व प्रेमपूर्ण  सम्बन्ध बने रहे। इससे प्रेमयोगी वज्र का द्वैत उसके गुरु को प्राप्त हो गया, और गुरु  का अद्वैत उसको प्राप्त हो गया। इससे दोनों का द्वैताद्वैत अनायास ही  सिद्ध हो गया, और दोनों मुक्त हो गए। इसके फलस्वरूप प्रेमयोगी वज्र को क्षणिक आत्मज्ञान के साथ क्षणिक कुण्डलिनीजागरण की उपलब्धि भी अनायास ही हो गई। साथ में, उसकी कुण्डलिनी तो उसके पूरे जीवन भर क्रियाशील बनी रही।

यही द्वैताद्वैत समभाव ही सर्वधर्म समभाव है

कोई धर्म द्वैतप्रधान होता है, तो कोई धर्म अद्वैतप्रधान होता है। इसीलिए दोनों प्रकार के धर्मों के बीच में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहने चाहिए। इससे दोनों एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते रहते हैं। इससे वास्तविक द्वैताद्वैत भाव पुष्ट होता है। विरोधी भावों के बीच में परस्पर समन्वय ही वैदिक संस्कृति की सफलता के पीछे एक प्रमुख कारण था। शरीरविज्ञान दर्शन में इसका विस्तार के साथ वर्णन है।

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गुरु के बारे में एक आधारभूत रहस्योद्घाटन

गुरु क्या है

गुरु वह विलक्षण व्यक्तित्व है, जिस पर विश्वास है, जिससे प्रेम है, और जो अपने से कहीं अधिक महत्त्वशाली प्रतीत होते हैं। संस्कृत शब्द “गुरु” का अर्थ ही भारी या बड़ा है।

क्या एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है

काफी हद तक एक प्रेमी गुरु का रूप ले सकता है, यद्यपि अधिकाँश मामलों में पूर्णरूप से गुरु नहीं बन सकता। वैसे कुछ अपवाद तो हर जगह ही देखने को मिल जाते हैं। अधिकांशतः प्रेमी के प्रति आदरभाव कम होता है, और उसके प्रति महत्त्वबुद्धि भी कम होती है। उससे प्रेमी का चित्र मन में अच्छी तरह से नहीं बैठता। गुरु के प्रति तो प्रेम के साथ आदरभाव व महत्त्वबुद्धि दोनों का होना आवश्यक है। इसीलिए गुरु अधिकांशतः आयु में वृद्धावस्था के करीब होते हैं। इससे वे ज्ञानी, ध्यानी, सम्मानित व योगसाधक होते हैं। वे आध्यात्मिक कर्मकांड करने वाले, व देवता के पुजारी होते हैं। वे साधारण व सात्विक जीवन जीने वाले होते हैं। वे सर्वप्रिय, मृदुभाषी, संतुलित, अहिंसक व कट्टरता से रहित होते हैं। उनके मन-मंदिर में सभी सद्गुणों का वास होता है। वे मन के दोषों से रहित, अनासक्त व अद्वैतशील होते हैं। गुरु के प्रति उपरोक्त आदरबुद्धि व महत्त्वबुद्धि के कारण उनका लीलामय रूप शिष्य के मन में पक्की तरह से बैठ जाता है, और लम्बे समय तक बना रहता है।

गुरु में दिव्य गुणों का होना आवश्यक है

ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी स्वयं दिव्य है और दिव्य गुणों का उत्पादन करती है। इसलिए, गुरु की दिव्यता एक व्यक्ति के दिमाग में कुंडलिनी को मजबूत करने में बेहतर रूप से मदद करती है। इसके अलावा, देवत्व भगवान के अनुग्रह को भी आकर्षित करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान भी देवत्व से भरे हुए हैं। भगवान की कृपा भी कुंडलिनी वृद्धि में एक महत्वपूर्ण कारक है।

गुरु व प्रणय-प्रेमी एक दूसरे के पूरक के रूप में

गुरु व प्रणय-प्रेमी की जुगलबंदी तंत्र का एक अभिन्न व आधारभूत हिस्सा है। तंत्र के अनुसार, गुरु व प्रणय-प्रेमी/प्रेमिका के बीच में किसी भी प्रकार से सम्बन्ध या संपर्क बना रहना चाहिए। कई आध्यात्मिक आकांक्षी प्रेमी के साथ भी और गुरु के साथ भी एकसाथ मजबूत संबंध (मानसिक या शारीरिक या दोनों) बना कर रखते हैं। यह भी स्वयं ही प्रेमी और गुरु की मानसिक छवियों के परस्पर मिलन का कारण बनता है। उससे गुरु के प्रति बनी हुई आदरबुद्धि प्रणय-प्रेमी के ऊपर स्थानांतरित हो जाती है, और प्रणय-प्रेमी के प्रति किया गया प्रणय-प्रेम गुरु के ऊपर शुद्ध प्रेम के रूप में स्थानांतरित हो जाता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे एक अँधा और एक लंगड़ा एक-दूसरे की सहायता करते हैं। आमतौर पर गुरु की वृद्धावस्था के कारण उनके प्रति उतना मजबूत व आकर्षण से भरा हुआ प्रेम पैदा नहीं होता, जितना कि एक यौनप्रेमी के प्रति होता है। इसी तरह, एक यौनप्रेमी के प्रति उतनी आदरबुद्धि नहीं होती, जितनी एक वृद्ध गुरु के प्रति होती है। इसका कारण यह है कि अधिकांशतः प्रणय-प्रेमी भौतिकवादी, कम आयु वाला, कम अनुभव वाला, कम योग्यता वाला, कम योगसाधना करने वाला, कम गुणों वाला, मन के दोषों से युक्त व द्वैतशील होता है।

दो कुण्डलिनियों का एकसाथ निर्माण, व विकास

गुरु व प्रेमी के निरंतर संपर्क से, दोनों के लीलामय रूपों की कुण्डलिनियां (स्पष्ट व स्थायी मानसिक चित्र) एकसाथ विकसित होती रहती हैं। वे दोनों एक-दूसरे को शक्ति देती रहती हैं। भौतिक माहौल में प्रेमी की व अध्यात्मिक माहौल में गुरु की कुण्डलिनी अधिक विकसित होती है। अनुकूल परिस्थितियों के अनुसार, दोनों में से कोई भी कुण्डलिनी पहले जागृत हो सकती है। अधिकाँशतः गुरु के रूप की कुण्डलिनी ही जागृत होती है, प्रणय-प्रेमी की कुण्डलिनी तो उसकी सहायक बन कर रह जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्ण मानसिक मिलन तो गुरु के साथ ही संभव है। प्रणय-प्रेमी से सम्बंधित शारीरिक उत्तेजना उसके रूप की कुण्डलिनी से एकाकार होने (कुण्डलिनी जागरण) की राह में रोड़ा बन जाती है। यह सारा कुछ ठीक इसी तरह ही प्रेमयोगी वज्र के साथ भी हुआ, जो इस वेबसाईट का नायक है।

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देवपूजा में कुंडलिनी

सभी धार्मिक गतिविधियाँ कुण्डलिनी में वैसे ही समा जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में। जब हम किसी देवी-देवता की पूजा कर रहे होते हैं, तब हम अप्रत्यक्ष रूप से कुण्डलिनी की ही पूजा कर रहे होते हैं। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार देवता की मूर्ति, चित्र आदि के रूप में स्थित मानव-देह में अद्वैतशाली देहपुरुष विद्यमान होते हैं। अतः देवता की पूजा से उनकी पूजा स्वतः ही हो जाती है। उससे पूजा करने वाले व्यक्ति के मन में अद्वैतभाव पुष्ट हो जाता है। शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सिद्धांत है कि कुण्डलिनी व अद्वैत साथ-२ रहते हैं। अतः देवपूजन से कुण्डलिनी-पूजन स्वयं ही हो जाता है, जिससे कुण्डलिनी क्रियाशील होकर विकसित होती रहती है, और कभी भी अनुकूल परिस्थितियों को पाकर जागृत भी हो सकती है।

यदि हम देव-मूर्ति में देहपुरुषों की सत्ता को न भी मानें, तब भी कोई बात नहीं। क्योंकि प्रकृति की सभी चीजें जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वे जड़ (निर्जीव) नहीं, अपितु अद्वैतभाव के साथ चेतन (सजीव) होती हैं। प्रकृति के सभी अणु-परमाणु या मूलकण मूर्ति में भी विद्यमान होते हैं। अतः देव-मूर्ति के पूजन से सम्पूर्ण अद्वैतमयी प्रकृति की पूजा स्वयं ही हो जाती है। देहपुरुष की सत्ता की वैज्ञानिक कल्पना तो सम्पूर्ण प्रकृति व मानवाकार मूर्ति के बीच में पूर्ण समानता को प्रदर्शित करने के लिए ही की गई है। इससे अद्वैतभाव की प्रचंडता भी बढ़ जाती है।

जैसे ही मूर्ति-पूजन के साथ कुण्डलिनी प्रकट हो जाती है, तथा पूजन व कुण्डलिनी के बीच के सम्बन्ध का तनिक विचार कर लिया जाता है, वैसे ही पूजन पर ध्यान देने से वह ध्यान कुण्डलिनी को स्वयं ही लगता रहता है। उससे कुण्डलिनी उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उदाहरण के लिए, देव-मूर्ति के सामने घंटी बजाने से व घंटी की आवाज पर ध्यान लगाने से, व ऐसा समझने से कि वह आवाज देवमूर्ति में स्थित कुण्डलिनी की सेवा कर रही है, स्वयं ही बीच-२ में कुण्डलिनी पर ध्यान लगता रहता है। ऐसा ही तब भी होता है, जब पितरों का पूजन किया जा रहा होता है। क्योंकि पितरों की देह भी देवता या प्रकृति की तरह शुद्ध, निर्विकार व अद्वैतवान होती है।

इसका अर्थ है कि जिसे कुण्डलिनी का ज्ञान नहीं है, उसे पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। एक कुण्डलिनी-योगी ही उत्तम प्रकार का पुजारी सिद्ध हो सकता है।

यदि किसी के मन में कुण्डलिनी नहीं बनी हुई है, तो उसके द्वारा की गई पूजा उलटी भी पड़ सकती है। पूजा से उसके मन में चित्र-विचित्र प्रकार के विचार उठेंगे, क्योंकि पूजा से शान्ति व मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। इससे पूजा की शक्ति घटिया किस्म के विचारों को भी मिल सकती है, जो हानि पहुंचा सकते हैं। जो पूजा-शक्ति कुण्डलिनी-रूपी एकाकी व लाभदायक विचार को पुष्ट कर सकती है, वह विचारों के हानिकारक झमेले को भी पुष्ट कर सकती है। इसीलिए कहते हैं कि पुजारी या गुरु का योग्य होना बहुत जरूरी है।

मैं अपने दादा के साथ लोगों के घरों में वैदिक पूजा-पाठ कराने जाया करता था। उस पूजा से मेरी पहले से विद्यमान तांत्रिक कुण्डलिनी बहुत अधिक बलवान हो जाया करती थी। उससे मुझे बहुत अधिक आनंद के साथ भरपूर सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती थी। वह शक्ति वैसी ही यजमान को भी प्राप्त हो जाया करती थी, क्योंकि वे मेरे दादा के साथ मेरे प्रति भी प्रेमभाव सहित आदर-बुद्धि व सेवाभाव रख रहे होते थे।

इसी तरह प्रत्येक कर्म भी बड़ी आसानी से पूजा बन सकता है, यदि शरीरविज्ञान दर्शन के अनुसार यह सत्य सिद्धांत समझा जाए कि प्रत्येक कर्म अद्वैतशाली देहपुरुष की प्रसन्नता के लिए ही किया जाता है।

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कुण्डलिनी व मूर्तिपूजा के बीच में परस्पर सम्बन्ध

कुण्डलिनी को क्रियाशील व जागृत करने के लिए कुण्डलिनी के साथ बहुत लम्बे समय तक सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना पड़ता है। अधिकांशतः ऐसा एक ही जीवनकाल में संभव नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक है कि कुण्डलिनी के स्मरण वाला संस्कार एक आदमी को उसके जन्म से ही मिल जाए। यहाँ तक कि जब वह माता के गर्भ में हो, तभी से मिलना शुरू हो जाए। इसको संभव बनाने के लिए ही इष्टदेव को कल्पित किया गया है। वह कल्पित रूप सदा से सभी के लिए एक जैसा होता है। इससे उस इष्टदेव को मानने वाले परिवार में उस इष्टदेव के स्मरण से सम्बंधित संस्कार वंश परम्परा के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहता है। इसीलिए शैव सम्प्रदाय के लोगों के लिए शिव के रूप का ध्यान करना आसान हो जाता है। उसी ध्यान-शक्ति से एक शैव के मन में बसने वाला शिव उसकी कुण्डलिनी बन जाता है, जो अंततः कुण्डलिनी-जागरण के रूप में जीवंत भी हो सकता है। यदि दूरदर्शी ऋषियों के द्वारा शिव को निश्चित रूप न दिया गया होता, तो शिव का ध्यान उत्तरोत्तर न बढ़कर बार-२ टूटता रहता।

मान लो, किसी आदमी नि शिव को जटाधारी माना होता, और उसके पुत्र ने शिव को जटाहीन माना होता, तो क्या होता? वैसे में पिता के द्वारा अर्जित ध्यान पुत्र को प्राप्त न होता। वह अपना ध्यान स्वयं ही शुरू से इकट्ठा करता, जिससे उसे बहुत थोड़ा ही लाभ मिलता। उसे जो लाभ मिलता, वह यह होता कि उससे उसके जीवन में अल्प मात्रा में ही अद्वैत व अनासक्ति-भाव उत्पन्न होते। उससे प्रचंड अनासक्ति व अद्वैत के साथ कुण्डलिनी-जागरण न मिलता।

देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देव शंकर हैं। इसीलिए उन्हें देवों के देव महादेव कहा जाता है। उन्हें एक निश्चित रूप प्रदान किया गया है। उनके गले में सर्प की माला है। उनके सिर पर लम्बी-२ जटाएं हैं। उनके मस्तक पर आधा चन्द्रमा विराजमान है। उनकी जटाओं से गंगा नदी निकल रही है। उनके माथे पर तीन समानांतर रेखाओं के रूप में तिलक है, जिसे त्रिपुंड कहा जाता है। कई जगह उनके भ्रूमध्य में खुला हुआ तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। वे भस्म से लिपटे हुए हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल है, और एक हाथ में डमरू है। वे बैल की सवारी करते हैं। वे बाघ का चर्म ही ओढ़ते हैं, अन्य कोई वस्त्र नहीं पहनते हैं। वे सुन्दर हैं। उनके नयन-नक्श संतुलित व त्रुटिरहित हैं। उनका मुख कान्तिमान व आकर्षक है। उनका शरीर सुडोल व संतुलित है। वे मध्यम गोरे रंग के हैं। उनकी चाल-ढाल अद्वैत, अनासक्ति, व वैराग्य से भरी हुई है।

इसी तरह अन्य देवी-देवताओं को भी निश्चित रूप व आकार प्रदान किए गए हैं। साथ में, उन्हें निश्चित भाव-भंगिमाएं व आचार-विचार भी प्रदान किए गए हैं। गणेश को मूषक की सवारी करने वाला, लड्डू खाने वाला, व हाथी के जैसे मुख वाला बताया गया है। इसी तरह, नौ देवियों को भी भिन्न-२ परिचय दिए गए हैं।

इसी सिद्धांत के अनुसार अपने पूर्वज या पारिवारिक वृद्ध (पितामह आदि) को गुरु बनाना अधिक लाभप्रद है। क्योंकि एक व्यक्ति उनके साथ जन्म से लेकर परिचित व सौहार्दपूर्ण बना होता है, इसलिए उन्हें मन में बैठाना सर्वाधिक सरल होता है। वही मानसिक मूर्ति फिर लगातार के अभ्यास से कुण्डलिनी बन कर क्रियाशील व जागृत हो सकती है।

देव-मूर्ति पुराने मित्रों, परिचितों व पूर्वजों से भी जुड़ी होती है। जब कोई उन चिर परिचितों की समकालीन देव-मूर्ति से पुनः संपर्क साधता है, तब उन चिर-परिचितों की याद पुनः ताजा हो जाती है। उनमें से सर्वाधिक प्रभावशाली स्मरण बार-२ के अभ्यास से स्थायी स्मरण (कुण्डलिनी) के रूप में मन में उभर सकता है। विज्ञान की भाषा में इसे कंडीशंड रिफ्लेक्स (conditioned reflex) कहते हैं। इसके अनुसार जब दो वस्तुएं मन में एकसाथ बैठ गई हों, तो दोनों वस्तुएं आपस में जुड़ जाती हैं। जब कभी एक वस्तु का स्मरण किया जाता है, तो उससे जुड़ी हुई दूसरी वस्तु का स्मरण स्वयं ही हो जाता है। यह उस जैविक घटना की तरह है, जब एक गाय अपने बछड़े को देखकर अपना दूध छोड़ने लगती है। इस प्रकार से देव-मूर्तियाँ सामाजिक कंडिशनर (social conditioner) या सामाजिक संपर्कसूत्र (social link) का काम करती हैं। अपने प्रिय व परिचित जनों की याद बनाए रखने में ये अहम् भूमिका निभाती हैं। यही बात अन्य सभी निर्धारित किए गए धार्मिक विधि-विधानों के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यद्यपि देव-मूर्तियाँ इनमें मुख्य हैं, क्योंकि वे मानवाकार, सुन्दर, सहज सुलभ, सर्वसुलभ, व आकर्षक होती हैं।

अगर किसी को मूर्ति पूजा से प्रत्यक्ष लाभ नहीं दिखता है, तो भी इसकी मदद से ध्यान और गहरी भावना की एक अच्छी आदत पड़ जाती है। यह मानवता के समग्र विकास में मदद करता है। यह सब प्रेमयोगी वज्र के साथ हुआ, तभी तो वह क्षणिक आत्मज्ञान व क्षणिक कुण्डलिनी जागरण को अनुभव कर पाया। दरअसल, वैदिक काल में देवताओं को उनके शुद्ध प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था। बाद में, इनमें से कई देवताओं को मानव समाज में चल रहे सामाजिक सुधारों के साथ मानव रूप दिया गया, जो ज्ञान-विज्ञान सम्मत भी है।

प्राकृतिक चीजें अद्वैतशाली व अनासक्त होती हैं, तभी तो प्रकृति के बीच में आनंददायक शान्ति का अनुभव होता है। वास्तव में, देव-मूर्तियाँ घर के सीमित स्थान के लिए निर्मित किए गए, विराट प्रकृति के सूक्ष्म रूप ही हैं। शास्त्रों के वचनों से व वैज्ञानिक दर्शन “शरीरविज्ञान दर्शन” से भी यह प्रमाणित ही है कि जो कुछ भी इस बाह्य व विराट प्रकृति में है, वह सभी कुछ इस मानव शरीर के अन्दर भी वैसा ही है।

अब बात आती है, धर्म-परिवर्तन के बारे में। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तो अपने धर्म का त्याग कभी नहीं करना चाहिए। क्योंकि धर्म परिवर्तन करने से अपने कुलधर्म से जुड़ी हुई चिर-परिचित लोगों व वस्तुओं की यादें गायब हो जाती हैं, और कुण्डलिनी-विकास का अच्छा अवसर हाथ से छूट जाता है। शास्त्रों में भी आता है, श्रेयो स्वधर्मो विगुणोपि, परधर्मो भयावहः। अर्थात, अपना धर्म कम गुणों वाला होने पर भी कल्याणकारी है, दूसरों का धर्म तो भयावह है। इसका यह अर्थ नहीं है कि कट्टर धार्मिक होना चाहिए, या दूसरे धर्मों को नहीं मानना चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि सभी मानवीय धर्मों को मानते हुए, अपने धर्म को ही मुख्य बना कर रखना चाहिए। यह ध्यान में रहना चाहिए कि यह बात योग पर लागू नहीं होती, क्योंकि योग कोई विशेष धर्म नहीं है। योग तो एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान है, जो सभी धर्मों का एक अभिन्न अंग है।

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शिव-अराधना से सर्वधर्मसमभाव- Love and brotherhood between all religions through Shiva-worship

पावन शिवरात्रि के अवसर पर सभी मित्रों को बहुत-२ शुभकामनाएं। (please browse down or click here to view this post in English)

आशुतोष शंकर बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि उनके द्वारा उपदिष्ट तंत्र-साधना अतिशीघ्र मुक्ति प्रदान करती है। तंत्रसाधना हमारे दैनिक जीवन की गतिविधियों को आध्यात्मिक रूप देकर ही बनी है। उदाहरण के लिए निपुण तंत्रयोगियों का शरीर स्वयं ही मुड़ता, सिकुड़ता, फैलता व ऊपर की ओर उठता हुआ सा रहता है। ऐसा कुण्डलिनी को चक्रों पर स्थापित करने के लिए स्वयं ही होता रहता है। जब थकान होती है या कन्फ्यूजन होता है, तब भी ऐसा होता है, जिससे कुण्डलिनी मस्तिष्क-चक्र पर स्वयं ही प्रतिष्ठित हो जाती है। उससे एकदम चैन के साथ एक लम्बी सांस शरीर के अन्दर स्वयं ही प्रविष्ट होती है। नींद आने पर या बोरियत होने पर शरीर के उठने जैसे (अंगड़ाई) के साथ जम्हाई आने के पीछे भी यही रहस्य छिपा हुआ है।

शिव की मूर्ति मानवाकार होती है। इसका अर्थ है कि उस मूर्ति के अन्दर की कोशिकाएं (देहपुरुष) भी वैसी ही होती हैं, जैसी हमारे अपने शरीर के अन्दर की। इसका अर्थ है कि शिवमूर्ति की पूजा के समय हम उसमें स्थित देहपुरुष की ही पूजा कर रहे होते हैं। उस अद्वैतस्वरूप देहपुरुष को हमने अपनी मानसिक कुण्डलिनी का रूप दिया होता है। सीधा सा अर्थ है कि शिव-पूजन से भी कुण्डलिनी ही पुष्ट होती है। कुण्डलिनी-रूपी मानसिक चित्र किसी की व्यक्तिगत रुचि के अनुसार शिव का रूप लिए हुए भी हो सकता है, गुरु का रूप लिए भी हो सकता है, या प्रेमी / प्रेमिका का रूप लिए भी हो सकता है। कई बार तो कुण्डलिनी-चित्र शिव के जैसी वेशभूषा में भी अनुभव होता है, जैसे की बैल पर सवार, गले में सर्प की माला के साथ व डमरू के साथ, एक औघड़ तांत्रिक की तरह आदि-2। ऐसा शिव-पूजन के प्रभाव से होता है।

भगवान शिव दुनिया के सभी लोगों व धर्मों के आराध्य हैं। शिव-पूजन से दुनिया में सर्वधर्मसमभाव स्थापित हो सकता है। इससे धार्मिक उन्माद, कट्टरपंथ, व आतंकवाद पर रोक लग सकती है। सभी धर्म व दर्शन शिव से ही निकले हैं। इसका प्रमाण है कि भगवान शिव खान-पान के मामले में, पूजा के विधि-विधान के मामले में किसी से भेदभाव नहीं करते। उन्हें भूत-प्रेतों जैसे लोग भी उतने ही प्रिय हैं, जितने देवता जैसे लोग। वे सभी को प्रेम से व समान भाव से स्वीकार करते हैं, चाहे कोई किसी भी धर्म आदि का क्यों न हो। उनके द्वारा प्रदत्त तांत्रिक-साधना से यह स्पष्ट हो जाता है। शिवप्रदत्त तांत्रिक साधना ही सर्वाधिक वैज्ञानिक, प्रासंगिक, आधुनिक, सामाजिक, कर्मठतापूर्ण व मानवतापूर्ण है।

शिव-शक्ति अवधारणा सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में मानी जाती है। जो सत्य है, वह शिव है। वही पूर्ण है। उसमें सभी भाव-अभाव हैं। उसमें स्त्रीभाव व पुरुषभाव, दोनों एकसाथ विद्यमान हैं। एक प्रकार से शिव का स्वरूप मनुष्य के उस रूप के करीब है, जिसमें वह समाधि में स्थित रहता है। यह सभी जानते हैं कि सर्वाधिक मजबूत समाधि तांत्रिक यौनसंबंध के साथ ही लगती है। अतः एक ही भगवान शिव को शिव-पार्वती के रूप में काल्पनिक रूप से विभक्त किया गया है, ताकि समझने में आसानी हो। वास्तव में शिव-पार्वती सदैव एकाकार ही हैं, इससे यह भी कल्पित हो जाता है कि शिव-पार्वती सदैव पूर्णरूप से तांत्रिक-साधना में लीन रहते हैं। शिवलिंग इस साधना का प्रतीक है।

रशिया में भी इसी तरह की एक लोककथा प्रचलित है कि आदमी कभी पूर्ण हुआ करता था। उससे देवताओं का राजा डर गया और उसने आदमी को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक हिस्सा पुरुष बना, और एक हिस्सा स्त्री बना। तभी से लेकर दोनों हिस्से एकाकार होने के लिए व्याकुल होते रहते हैं, ताकि पुनः पूर्ण होकर देवताओं पर राज कर सकें।

कई लोगों को शंका हो सकती है कि शिव तो हमेशा ही तांत्रिक साधना में लीन रहते हैं, फिर उन्हें कामारि, यह नाम क्यों दिया गया है? वास्तव में, एक तांत्रिक ही यौन-दुर्भावना को जीत सकता है। यौनता से दूर भागने वाला आदमी यौन-दुर्भावना को नहीं जीत सकता। उसके अन्दर यौनता के प्रति इच्छा बहुत बलवान होती है, बेशक वह बाहर से उससे अछूता होने का दिखावा करता रहे। काम को वही जीत सकता है, जो काम के रहस्य को समझता हो। काम के रहस्य को एक सच्चे तांत्रिक से अधिक कोई नहीं समझ सकता।

भगवान शिव को भूतनाथ भी इसीलिए कहते हैं, क्योंकि वह उन तांत्रिकों का नाथ भी होता है, जो बाहर के आचारों-विचारों से भूत-प्रेत की तरह ही प्रतीत होते हैं। यद्यपि अन्दर से वे शिव की तरह ही पूर्ण होते हैं।

भगवान शिव को भोला इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह अपनी नित्य तांत्रिक-साधना के बल से पूर्ण अद्वैत-भाव में स्थित रहते हैं। अर्थात वे एक बच्चे की तरह होते हैं। उनके लिए काष्ठ, लोष्ठ व स्वर्ण आदि सब कुछ एकसमान है। यद्यपि वे जीवन-व्यवहार के लिए ही बाहर से भेदभाव का प्रदर्शन करते हैं, अन्दर से नहीं।

मुझे एक बार भगवान स्शिव स्वप्न में दिखे थे। वे एक ऊंचे चबूतरे जैसी जगह पर बैठे हुए थे। वे कुछ गंभीर यद्यपि शांत लग रहे थे, एक औघड़ व अर्धवृद्ध तांत्रिक की तरह। साथ में वे मस्त-मौले जैसे भी लग रहे थे। फिर भी, उनका पहरावा शिव के जैसा लग रहा था। उनके चारों तरफ बहुत से भूत-प्रेत धूम-धड़ाके व जोर के हो-हल्ले के साथ नाच-गा रहे थे। वह आवाज जोर की व स्पष्ट थी। वह विशेष, रोमांचकारी, व संगीतमयी आवाज (खासकर ढोल की डिगडिगाहट) मुझे आजतक कुछ याद सी आ जाती है। उन भूत-प्रेतों से तनिक भी डर नहीं लग रहा था, अपितु बहुत आनंद आ रहा था। ऐसा लगा कि मेरे कुछ जानने में आने वाले व दिवंगत लोग भी उस भूत-प्रेतों के टोले में शामिल हो गए थे। उस स्वापनिक घटना से मेरी कुण्डलिनी को बहुत शक्ति मिली, और उसके लगभग डेढ़ से दो वर्षों के बाद वह जागृत भी हो गई।

इसी तरह, लगभग 30 वर्ष पूर्व मैं अपने चाचा की बरात के साथ जा रहा था। एक बड़े पहाड़ के नीचे से गुजरते हुए मुझे भगवान शिव एक अर्धवृद्ध के रूप में शांति से एक बड़ी सी चट्टान पर पालथी लगा कर बैठे हुए दिखे। वहां पर लोग फूल-पत्ते चढ़ा रहे थे, क्योंकि उसके थोड़ा ऊपर व पेड़ों के पीछे एक शिव-पार्वती का मंदिर था, जो वहां से दिखाई नहीं देता था। मैंने भी पत्ते चढ़ाए, तो मुझे उन्होंने प्रसाद के रूप में कुछ दिया, शायद चावल के कुछ दाने थे, या वहीँ से कुछ पत्ते उठाकर दे दिए थे। मुझे पूरी तरह से याद नहीं है। वे मुस्कुराते हुए, कुछ गंभीर जैसे, साधारण वेशभूषा में, व एक औघड़-गुरु के जैसे लग रहे थे। फिर भी वे एक साधारण मनुष्य ही लग रहे थे। तभी तो शायद मैंने उनसे बात नहीं की। वैसे भी, तंग पगडंडी पर लोगों की लम्बी पंक्ति में जल्दी-२ चलते हुए बात करने का समय ही नहीं था।

भगवान शिव की महिमा का कोई अंत नहीं है, पर निष्कर्ष के रूप में यही कह सकते हैं, शिव है तो सब कुछ है; शिव नहीं है तो कुछ नहीं है।

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Best wishes to all friends on the occasion of holy Shivratri.

Ashutosh Shankar becomes happy very easily. It means that the tantra-oriented technique provided by him gives liberation very quickly. The tantric techniques are made of the simple activities of our daily lives by giving those a spiritual shape. For example, the body of skilled tantric turns, shrinks, spreads and remains rising upward (tucking) itself. Such happen for kundalini to be installed on the chakras itself. When there is fatigue or confusion, this happens, due to which the Kundalini becomes distinguished itself on the cerebral chakra. With this, a long breath is drawn inside the body itself with a sudden relief. This secret is hidden behind the yawning with the body’s rise (body tucking up), when it comes to relieve of sleep or boredom.

Shiva’s idol is a human-form. It means that the cells (dehpurush) inside the body of that idol are also similar, as those in the inside of our own body. It means that while worshiping Shiva-idol, we are worshiping the non-dual dehpurush inside it. We have given the form of our mental Kundalini to that  dehpurush having non-dual attitude. It means straightforward that the Kundalini becomes strong even from Shiva-worship. Kundalini (mental image) can be having a form of Shiva according to somebody’s personal interest, can also be the form of a guru, or the form of boyfriend / girlfriend too. Many times, Kundalini-image is also experienced in Shiva-like costumes, such as one riding a bull, with a snake’s necklace and with a damroo (special drum), like a soft tantric etc. This happens with the influence of Shiva-Pooja (worship).

Lord Shiva is adorable of all people and religions of the world. Shiva-poojan can establish universal harmony in the world. It can prevent religious mania, fundamentalism, and terrorism. All religions and philosophies have come from Shiva. Its proof is that Lord Shiva does not discriminate against anyone in the case of eating-drinking and in the case of law and order of worship. He loves the people who are like the ghosts just equal to those people who are like God. He accepts all with love and with the same emotion, no matter how religious one is or what type the religion one has. It is clear from the tantric-sadhana given by him. Shiva-provided Tantric Sadhana is the most scientific, relevant, modern, social, productive, and humanistic.

Shiva-Shakti concept is considered in some form in all religions. That which is truth that is Shiva. That is the whole thing. There are all emotions in it. In it, both femininity and maleness are present together. In a sense, the nature of Shiva is close to that form of man, in which he lives in Samadhi. All of us know that the strongest Samadhi (meditation) seems to be accompanied by tantric sexual intercourse. Therefore, the only Lord Shiva has been conceptually divisible in the form of Shiva-Parvati that is easy to understand. In fact, Shiva-Parvati is always united as one, but it is also assumed that Shiva-Parvati are always completely absorbed in tantric-sadhana. Shiva lingam is a symbol of this sadhana.

In Russia, a similar folktale is prevalent that a man used to be perfect. From him the king of the gods was scared and he divided the man into two halves. One part is made of man, and one part becomes a woman. From then on, both sides are anxious to be united, so that they can rule over the gods once they are completed again.

Many people may doubt that Shiva is always absorbed in Tantric meditation, then why he has been given this name as kamari? In fact, only a tantric can conquer sex-malice. A man escaping sexuality cannot win sexually ill thought. His desire for sex in him is very strong, of course, he pretends to be untouched from the outside. Only one can win the sexuality, who understands its secret. Nobody can understand the secret of sexuality more than a true tantric.

Bhootnath (lord of ghosts) is also a name given to Lord Shiva, because he is also the master of those tantrics, who seem to be like ghosts from outside. Although from inside they are fulfilled just like Shiva.

Lord Shiva is also called as Bhola (innocent), because he is situated in full Advaita Bhava (non-dual attitude) with the force of his daily Tantric-Sadhana. That is, he is like a child. For him wood, lumber, and gold etc. everything is the same. Although he demonstrates discrimination from outside to live a mundane life-style, not having it inwardly.

I once saw Lord Shiva in my dream. He was sitting at a place like a table-type rock. He looked somewhat quiet though, like a soft, and semi-old Tantric. Together he seemed like a mast man (easy going). Even so, his dress looked like Shiva. Around him, many of the ghosts were dancing, singing with loud, and mast sound. That voice was loud and clear. That particular exhilarating musical voice (especially low pitch beats of the drum) makes me remember that a little today. I was not feeling frightened at all from those ghosts, but I was feeling very happy and a bliss. It seemed that the people who came to know me and were the departed ones also joined the group of those ghosts. My Kundalini got very much power from that automatic incident, and after about one and half a year to two years, she became awakened too.

Likewise, about 30 years ago, I was going with my uncle’s marriage procession. Passing under a big mountain, I saw Lord Shiva sitting in squatting posture in peace on a big rock in the form of a half-old man. There people were offering flowers and leaves, because there was a Shiva-Parvati temple behind the trees and a little above that place, which was not visible from there. I also offered him the leaves, then he gave me something in the form of a gift maybe that was in the form of some grains of rice or he picked up some leaves. I do not remember completely. He was smiling, looking like something serious, in ordinary costumes, and like a softhearted guru. Yet he seemed to be an ordinary man. Then maybe I did not talk to him. Anyway, there was no time to talk about while moving in the long line of people on the tight footpath for early running.

There is no end to the glory of Lord Shiva, but in the form of conclusions it can be said, Shiva is everything; if there is no Shiva, then there is nothing.

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Mahishasur mardini (goddess, killer of demon mahishasur)-महिषासुर मर्दिनी

Mahishasur mardini (कृपया इस पोस्ट को हिंदी में पढ़ने के लिए नीचे ब्राऊस करें या इस वाक्य के लिंक पर क्लिक करें)

Mahishasur was a great demon in prehistoric ages. He was having nature and appearance that of a male Buffalo. He used to appear as a divine and smart human being or as a male Buffalo as per his willingness. His army and followers of Buffalo race were too strong to be defeated even by the gods / demigods / devatas. He had captured all the territories including the divine and astral ones. He was torturing everyone. Ordinary people went to the doorsteps of gods, but they were unable to help those and were themselves too badly affected for the demon was not allowing them to work for the development of human race, most intelligent of all the creatures. Ultimately all gods became gathered and went to the doorstep of super god Bramha. He along with those went to another super god Shiva. He finding himself unable to help those went to last and topmost super god Vishnu along with them. Vishnu told them the importance of unity. All gods and super gods expressed out their individual powers. Those all individual powers were then united together and came out in the form of a super power in the appearance of a too beautiful, powerful and divine goddess called as Durga. She warned the demon many times but he took her lightly. Ultimately she killed him thus opening the way for the development of humanity and divinity.
This is a classical pauranik story of Hindu religious literature. We can take it into original scientific form. Mahishasur demon was the prehistoric dinosaur kingdom when Buffalo-mouthed reptilians used to roam the earth, hindering the human evolution by the natural elements / gods. No separate / lonely natural element was able to detain those. So in embodied / body less human spirits went to the personified heads of those natural elements / gods to help them for their embodied expression. Those natural elements ultimately joined together and made a most favorable condition for their destruction in the form of that scientifically proved drastic and prehistoric meteorite-hit that pushed dinosaurs to extinction. The flashing light of that meteorite was considered as the most beautiful goddess that was made through the so rare incidence of union of all of the favorable climatic conditions as union of individual powers of all the climate controlling natural elements / gods. May be that small meteorite-hits also occured before that drastic one as the signs of warning from the goddess.
This proves that ancient pauranik stories are just only the personified descriptions of the real and scientific world around us. This has only been done with a motive to produce functional non duality that leads to kundalini awakening with sustained practice. So these puranas should be regularly read, understood and that’s non dual attitude attached with one’s own individual life.
Premyogi vajra has made a Tantric book in Hindi, in which he has described universe existing inside our own body in a Purana-style. He has taken help of medical science for this. He has correlated everything happening inside our own human body with our gross social life. It’s already proved that whatever there is inside the universe, that everything is present inside our own body. His book appears more interesting than Purana today for he has written everything that’s scientifically proved, so in an easy form to comprehend. I have myself read it and found it suddenly transforming and spiritually elevating. It’s an extraordinary, incomparable and wonderful book. Detailed description of this book is available here at-

The non dual, tantric, Kundalini yoga technique (the real meditation), and spiritual Enlightenment explained, verified, clarified, simplified, justified, taught, guided, defined, displayed, summarized, and proved in an experiential, philosophical, practical, humanely, scientific and logical way best over

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महिषासुर प्रागैतिहासिक युग में एक महान दैत्य था। वह पुरुष बफेलो / भैंसे के जैसे स्वभाव व उसीकी जैसी शक्ल का था। वह अपनी इच्छा के अनुसार कभी एक दिव्य और स्मार्ट / सुन्दर इंसान और कभी एक भैंसे के रूप में दिखाई देता था। भैंस-वंश की उसकी सेना और उसके अनुयायी देवताओं द्वारा भी पराजित होने के लिए नहीं बने थे। उन्होंने दिव्य और सूक्ष्म लोकों सहित सभी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। वह महिषराज हर किसी को यातना दे रहा था। साधारण लोग देवताओं के दरवाजे पर सहायता के लिए गए, लेकिन वे उन लोगों की मदद करने में असमर्थ थे और उन राक्षसों से खुद भी बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जिससे उन्हें उस मानव जाति के विकास के लिए काम करने की इजाजत नहीं मिल पा रही थी, जो सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान होती है। आखिरकार सभी देवता इकट्ठे हो गए और सुपर गॉड / महा देवता ब्रह्मा के द्वार पर गए। वे उनके साथ एक और सुपर भगवान शिव के पास गए। उन्होंने भी खुद को उन लोगों व देवताओं की सहायता करने में असमर्थ पाया, अतः वे भी उनके साथ अंतिम और शीर्ष सुपर भगवान विष्णु के पास चले गए। विष्णु ने उन्हें एकता के महत्व के बारे में बताया। सभी देवताओं और सुपर देवताओं ने अपनी व्यक्तिगत शक्तियों को अभिव्यक्त किया। फिर उन सभी व्यक्तिगत शक्तियों को एक साथ एकजुट किया गया, जिससे एक बहुत ही शक्तिशाली, सुन्दर, मनुष्याकृत और दिव्य देवी के रूप में एक सुपर पावर उत्पन्न हुई, जिसे दुर्गा कहा जाता था। उसने राक्षस को कई बार चेतावनी दी लेकिन उसने उसे हल्के में लिया। आखिरकार उसने मानवता और दिव्यता के विकास के लिए रास्ता खोलने के लिए उसे मार डाला।

यह हिंदू धार्मिक साहित्य की शास्त्रीय पौराणिक कहानी है। हम इसे मूल वैज्ञानिक रूप में ले सकते हैं। महिषासुर राक्षस का साम्राज्य प्रागैतिहासिक डायनासौर का साम्राज्य ही था, जब महिषमुख सरीसृप पृथ्वी के चारों ओर घूमते थे, और प्राकृतिक तत्वों / देवताओं द्वारा मानव विकास में बाधा डालते थे। कोई अकेला प्राकृतिक तत्व उनको रोकने में सक्षम नहीं था। तो देहरहित मानव आत्माओं ने उन प्राकृतिक तत्वों के मनुष्याकृत प्रमुखों / देवताओं से अपनी मानवीय अभिव्यक्ति के लिए सहायता माँगी। वे सभी प्राकृतिक तत्व / जल, वायु, अग्नि आदि आखिरकार एक साथ शामिल हो गए और वैज्ञानिक रूप से साबित प्रागैतिहासिककाल की कठोर उल्कापिंड-टक्कर के रूप में उन्होंने उन दैत्यों के विनाश के लिए सबसे अनुकूल स्थितियां बनाईं, जो अंततः डायनासोर को विलुप्त कर पाईं। उस उल्कापिंड की चमकती रोशनी को सबसे खूबसूरत / दिव्य व शक्तिशाली देवी माना गया, जो सभी अनुकूल जलवायु-स्थितियों के संघ की इतनी दुर्लभ घटना के माध्यम से अंतरिक्ष से धरती की ओर गिराया गया था। वास्तव में  ऐसी अति दुर्लभ घटना करोड़ों वर्षों में, सभी जलवायु नियंत्रक प्राकृतिक तत्वों / देवताओं की व्यक्तिगत शक्तियों के संघ से ही होती है। हो सकता है कि उससे पहले भी छोटे-२ उल्कापात हुए हों, जो उस दैत्य को देवी के द्वारा दी गई अंतिम चेतावनी के रूप में माने जा रहे हों।

यह साबित करता है कि प्राचीन पौराणिक कहानियां हमारे आस-पास की वास्तविक और वैज्ञानिक दुनिया के केवल personified / मनुष्याकृत वर्णन ही हैं। ऐसा केवल कार्यात्मक अद्वैत को पैदा करने के उद्देश्य से किया गया है, जो निरंतर अभ्यास के साथ कुंडलिनी जागृति को उत्पन्न करता है। इसलिए इन पुराणों को नियमित रूप से पढ़ा जाना चाहिए, समझ लिया जाना चाहिए और इनसे उत्पन्न अद्वैत-दृष्टिकोण को अपने वर्तमान के अपने व्यक्तिगत जीवन से जोड़ा जाना चाहिए।

प्रेमयोगी वज्र ने हिंदी में एक तांत्रिक पुस्तक बनाई है, जिसमें उन्होंने पुराण-शैली में अपने शरीर के अंदर मौजूद ब्रह्मांड का वर्णन किया है। उन्होंने इसके लिए चिकित्सा विज्ञान की मदद ली है। उन्होंने अपने स्वयं के मानव शरीर के भीतर होने वाली हर चीज को हमारे अपने सकल सामाजिक जीवन के साथ सहसंबंधित किया है। यह पहले ही साबित होया हुआ है कि ब्रह्मांड के अंदर जो कुछ भी है, वह सब हमारे अपने शरीर के अंदर भी वैसा ही मौजूद है। उनकी आधुनिक पुस्तक प्राचीन पुराण की तुलना में अधिक दिलचस्प व व्यावहारिक प्रतीत होती है, क्योंकि उन्होंने वही सब कुछ लिखा है जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है और समझने में बहुत आसान है। मैंने खुद इसे पढ़ लिया है और इससे मैंने अपने आपको अचानक ही रूपांतरित सा व आध्यात्मिक रूप से उन्नत सा महसूस किया। यह एक आश्चर्यजनक, अनुपम व अविस्मरणीय पुस्तक है। इस पुस्तक का विस्तृत विवरण यहां उपलब्ध है-

अद्वैतपूर्ण, तांत्रिक, कुंडलिनी योग तकनीक (असली ध्यान), और आत्मज्ञान को एक अनुभवपूर्ण, दार्शनिक, व्यावहारिक, मानवीय, वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से; सबसे अच्छे रूप में समझने योग्य, सत्यापित, स्पष्टीकृत, सरलीकृत, औचित्यीकृत, सीखने योग्य, निर्देशित, परिभाषित, प्रदर्शित, संक्षिप्त, और प्रमाणित किया गया है

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