कुण्डलिनी जागरण के लिए पंचमकारों (मदिरा, माँस, मैथुन, मत्स्य व मुद्रा) का प्रयोग

कुण्डलिनी के लिए पंचमकारों का प्रयोग एक विवादित विषय रहा है। हम न तो इसकी अनुशंसा करते हैं, और न ही इसका खंडन। हम केवल इसके आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक पहलू पर विचार कर रहे हैं।

पंचमकारों से अद्वैत भाव को विकसित करने का अवसर प्राप्त होता है

वैसे तो पंचमकारों से द्वैतभाव में ही वृद्धि होती है। मदिरा को ही लें। इससे आदमी अंधकार व प्रकाश में बंट जाता है। इसी तरह से, माँस से हिंसा/क्रोध व अहिंसा/शान्ति में विभक्त हो जाता है। मैथुन से वह रोमांच व अवसाद के बीच में झूलने लगता है। मुद्रा किसी विशेष आसन, चिन्ह आदि के साथ लम्बे समय तक बैठने को कहते हैं। इससे आदमी आलस या निकम्मेपन और मेहनत की स्थिति के बीच में बंट जाता है। यह निर्विवादित सत्य है कि द्वैत में ही अद्वैत पनप सकता है। समुद्र की गंभीरता उसकी लहरों के ही आश्रित है। यदि समुद्र में लहरें गगनचुंबी हिचकोले न मारा करतीं, तो कौन कहता कि आज समुद्र शांत या निश्चल है। इसलिए अद्वैत द्वैत के ही आश्रित है। यदि मूल भाव द्वैत ही नहीं होगा, तो उसको नकारने वाला “अ” अक्षर हम उसके साथ कैसे जोड़ पाएंगे। जो चीज है ही नहीं, उसे हम कैसे नकार सकते हैं। यदि द्वैत ही नहीं होता, तो हम उसे कैसे नकार पाते। इसलिए पंचमकारों से दो प्रकार के प्रभाव पैदा होते हैं। जो आदमी उनसे पैदा हुए द्वैत को पूर्णतः स्वीकार करके उसी में रम जाते हैं, वो अपनी कुण्डलिनी को भूल जाते हैं। जो लोग पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत को शुरु में स्वीकार करके उसे चालाकी से अद्वैत में रूपांतरित करते रहते हैं, वे कुण्डलिनी योगी बन कर अपनी कुण्डलिनी को मजबूत करते हैं। यह निर्विवादित व सबके द्वारा अनुभूत तथ्य है कि कुण्डलिनी और अद्वैत सदैव साथ रहते हैं। दोनों में से एक चीज को बढ़ाने पर दूसरी चीज खुद ही बढ़ जाती है।

वास्तव में अद्वैत केवल द्वैत के साथ ही रह सकता है, अकेले में नहीं। इसलिए “अद्वैत” का असली अर्थ “द्वैताद्वैत” है।

पंचमकारों का पूजन

सेवन से पहले पंचमकारों का विधिवत पूजन किया जाता है। यह बुद्धिस्ट तंत्र और हिंदु वाममार्गी आध्यात्मिक प्रणाली में आज भी आम प्रचलित है। पंचमकारों में कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है, और उन्हें बहुत सम्मान दिया जाता है। उनके सेवन के समय भी जितना हो सके, कुण्डलिनी व अद्वैत का ध्यान किया जाता है। जब तक शरीर पर पंचमकारों का प्रभाव रहे, तब तक कोशिश करनी चाहिए कि कुंडलिनी व अद्वैत का ध्यान बना रहे। इससे क्या होता है कि जब दैनिक जीवन में उन पंचमकारों का प्रभाव पैदा होता है या यूँ कहें कि जब उनका फल मिलता है, तब कुण्डलिनी स्वयं ही विवर्धित रूप में ध्यानपटल पर आ जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कि पैसा जमा करने पर वह ब्याज जुड़ने से बढ़ता रहता है।

पंचमकारों का प्रयोग न्यूनतम मात्रा के साथ अधिकतम कुण्डलिनी लाभ के लिए किया जा सकता है

आम बोलचाल की भाषा में पंचमकार पाप रूप ही हैं। इसलिए इनसे दुखदायी फल भी अवश्य मिलता है, क्योंकि कर्म का फल तो मिल कर ही रहता है। उस बुरे फल से अपने शरीर व मन को बचाने के लिए इनका न्यूनतम सेवन किया जा सकता है। इनको अधिकतम कुण्डलिनी या अद्वैत भाव से जोड़कर अधिकतम आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जो लोग पहले से ही पंचमकारों का प्रयोग गलत तरीके से करते हैं, वो अपना तरीका सुधार सकते हैं। जो लोग इसे शुरु करना चाहते हैं, हम उन्हें योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही ऐसा करने की सलाह देते हैं। 

एक पुस्तक जो पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत भाव को जादुई तरीके से अद्वैतभाव में रूपांतरित कर देती है

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”। इस पुस्तक को एमेजॉन की एक गुणवत्तापूर्ण समीक्षा में फाइव स्टार के साथ सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्कृष्ट व सबके द्वारा पढ़ा जाने योग्य आंकलित किया गया है। इसमें चिकित्सा विज्ञान के अनुसार हमारे अपने शरीर में संपूर्ण ब्रम्हांड को दर्शाया गया है। इसको पढ़ने से सारा द्वैतभाव अद्वैतभाव में रूपांतरित हो जाता है, और आनंद के साथ कुंडलिनी परिपुष्ट हो जाती है। योगसाधना से तो अतिरिक्त लाभ मिलता ही है। पंचमकारिक तंत्र को “सब कुछ” या “कुछ नहीं” साधना भी कहते हैं। इससे यदि कुंडलिनी जागरण मिल गया तो सब कुछ मिल गया, अगर नहीं मिला तो कुछ नहीं मिला और यहां तक कि नर्क भी जाना पड़ सकता है।

कुंडलिनी असफल प्रेम प्रसंग के विरुद्ध बेहतरीन सुरक्षाकवच है

दोस्तों, आजकल असफल प्रेम के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अविश्वास, भावनाओं की बेकद्री, रिश्तों में गलतफहमियां, स्वार्थ व धोखेबाजी आदि मानव स्वभाव की बुराइयां हैं। असफल प्रेम का सदमा आदमी के पूरे शरीर व मन को झकझोरने वाला होता है। इससे बचने के लिए कुंडलिनी योग एक सर्वोत्तम साधन है। इसलिए आजकल सभी को कुंडलिनी योग करना चाहिए, क्योंकि किसी न किसी रूप में सभी लोग प्रेम के सताए हुए हैं। 

प्रेमी का शरीर आदमी के चक्रों में बस जाता है

आदमी का अपने प्रेमी के साथ बहुत गहरा जुड़ाव पैदा हो जाता है। प्रेमी का आदमी के मन में लगातार स्मरण बना रहता है। भोजन करते समय स्मरण से प्रेमी का शरीर आदमी के आगे के तालु, विशुद्धि, अनाहत और मणिपुर चक्रों पर बस जाता है। भावनामय होने पर वह अनाहत चक्र पर मजबूत हो जाता है। यौन उत्तेजना होने पर वह मन से नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान व मूलाधार चक्रों पर आ जाता है। वहाँ से वह मेरुदंड से ऊपर चढ़कर फिर से मस्तिष्क के सहस्रार चक्र में पहुंच जाता है। इससे आदमी के पीछे वाले चक्रों पर भी वह चित्र स्थापित हो जाता है। गहन चिंतन करते समय प्रेमी का चित्र आज्ञा चक्र में पहुंच जाता है। एक प्रकार से प्रेमी का चित्र कुंडलिनी बन जाता है, और कुंडलिनी योग अनजाने में ही चलता रहता है। यह प्रक्रिया बहुत धीमी और कुदरती होती है, इसलिए इसका आभास भी नहीं होता और प्रेमी का चित्र भी बहुत ज्यादा मजबूती से शरीर के सभी चक्रों पर जम जाता है।

कुंडलिनी योग से बनी हुई बनावटी कुंडलिनी प्रेमी के चित्र को रिप्लेस कर देती है

गुरु या देव रूप की कृत्रिम कुंडलिनी को प्रतिदिन के कुंडलिनी योग अभ्यास से चक्रों पर दृढ़ कर दिया जाता है। इससे प्रेमी के रूप वाली कुदरती कुंडलिनी चक्रों से हटने लगती है। इससे आदमी को असफल प्रेम के सदमे से राहत मिलती है। साथ में, कुंडलिनी योगी भविष्य के लिए भी असफल प्रेम के सदमे से सुरक्षित हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसके चक्रों पर बनावटी कुंडलिनी पहले से ही डेरा डाले हुए होती है। इससे वहाँ पर प्रेम की कुदरती कुंडलिनी अपना डेरा नहीं जमा पाती। 

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कृत्रिम कुंडलिनी योग करते समय प्रेमी की छवि का भी कुंडलिनी के रूप में ध्यान किया जा सकता है। हालांकि, कुंडलिनी के कमजोर होने और कई सामाजिक समस्याओं से बचने के लिए प्रेमी के संबंध में उचित शारीरिक संयम रखा जाना चाहिए। जब प्रेमी की छवि का मन में पूर्ण प्रदर्शन हो जाता है तब वह संतुष्ट हो जाता है, जिससे प्रेमी के लिए वासना या लालसा स्वयं ही घट जाती है। इसके बाद, कुंडलिनी भी कमजोर हो जाती है। यह प्रक्रिया उस कुंडलिनी के जागरण या अन्य कुंडलिनी, मुख्य रूप से गुरु या देवता के मानसिक रूप के त्वरित विकास व जागरण के लिए अहम भूमिका प्रदान करती है।

असफल प्रेम से उत्पन्न सदमे के इलाज के लिए और उससे बचाव के लिए हिंदी में लिखित पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” सर्वोत्तम प्रतीत होती है।

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कुंडलिनी योगसाधना से उत्पन्न शक्ति या उर्जा को स्तरोन्नत करती है

दोस्तों, मैं इस पोस्ट में कुंडलिनी से जुड़ा हुआ सबसे बड़ा रहस्य उजागर करने जा रहा हूँ। योग साधना से जिस चीज को बढ़ाया जाता है, उसको भिन्न-2 स्थानों पर भिन्न-2 नाम दिए गए हैं। कहीं इसे ऊर्जा, कहीं पर संवेदना, कहीं पर प्रकाश, और कहीं पर कुंडलिनी कहा जाता है। वास्तव में ये सभी नाम सही हैं। ये सभी नाम एक ही साधना का वर्णन ऐसे कर रहे हैं, जैसे बहुत से अंधे एक हाथी का वर्णन उसके एक-2 अंग से करते हैं।

संवेदना-ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का मेरा अपना अनुभव

मैंने पिछली पोस्ट में बताया था कि भावनात्मक सदमे से कैसे मेरी संवेदना-ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक लगातार प्रवाहित हो रही थी। वह प्रकाशमान ऊर्जा एक पुल की तरह लग रही थी, जो इन दोनों चक्रों को आपस में जोड़ रही थी। इसका अर्थ है कि मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुल गई थी। वास्तव में यह ऊर्जा एक खारिश की अनुभूति जैसी ही साधारण सेंसेशन थी, पर बहुत घनीभूत थी। मैं पहले ऐसे ऊर्जा चैनेल पर कम ही विश्वास करता था, पर इस अनुभव से मेरा विश्वास पक्का हो गया। यह ऊर्जा प्रवाह लगभग 10 सेकेंड तक बना रहा, जिसके दौरान मुझे एक अति प्रकाशमान मंदिर का साक्षात अनुभव हुआ। जैसे कि मैं उस मंदिर से जुड़कर एकाकार हो गया था। फिर मेरी कुंडलिनी मेरे उस अनुभव क्षेत्र में आई, और मैं उससे एकाकार हो गया। यद्यपि यह पूर्ण एकाकार नहीं था। अर्थात यह खंडित या अल्प कुंडलिनी जागरण था, पूर्ण नहीं। सम्भवतः ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मेरी सुषुम्ना पूरी तरह नहीं खुली थी, और ज्यादा समय तक खुली नहीं रही। 

कुंडलिनी से एकाकार होने के अतिरिक्त लाभ

जिस समय संवेदना ऊर्जा मूलाधार से सहस्रार तक सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित हो रही हो, उस समय जो मानसिक चित्र बनता है, वह उतना तीव्र व स्पष्ट होता है कि आदमी उससे जुड़कर एकाकार हो जाता है। उससे आदमी को जीवन का वह सबसे बड़ा सुख मिलता है, जो कि सम्भव है। उससे आदमी संतुष्ट हो जाता है। उससे वह जीवन के प्रति अनासक्त होकर अद्वैतशील बन जाता है। उससे उसके मन में कुंडलिनी का बसेरा हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के साथ कुंडलिनी सदैव रहती है। यदि आदमी पहले से ही कुंडलिनी साधना कर रहा हो, तब सुषुम्ना प्रवाह के दौरान अन्य चित्रों की बजाय कुंडलिनी का चित्र बनता है, और उससे आदमी एकाकार हो जाता है। इससे कुंडलिनी को अतिरिक्त शक्ति मिल जाती है। यदि प्रारंभ से ही संवेदना के साथ कुंडलिनी को जोड़ा जाता रहे, तब दोनों एक दूसरे को बढ़ाते रहते हैं। सुषुम्ना प्रवाह के दौरान जब कुंडलिनी मेरे मन में आई, तब मुझे उसके साथ मंदिर से अधिक जुड़ाव महसूस हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रोज के कुंडलिनी ध्यान से मैं कुंडलिनी के साथ जीने का अभ्यस्त हो गया था। इन बातों से सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण साधना कुंडलिनी योग ही है।

यदि चक्र अवरोधित न हों, तो सुषुम्ना के ऊर्जा प्रवाह के अनुभव के बिना ही कुंडलिनी जागरण होता है, और वह जागरण संपूर्ण होता है

उपरोक्त तथ्य को सिद्ध करने के लिए मैं अपना ही उदाहरण देता हूँ। अपने आत्मज्ञान के अनुभव के दौरान मैं सपने में दिख रहे दृश्य के साथ एकाकार हुआ था, किसी विशेष कुंडलिनी चित्र के साथ नहीं। परंतु उसके बाद मेरी वह महिला मित्र कुंडलिनी के रूप में मेरे मन में दृढ़ता से संलग्न हो गई थी, जिसकी सर्वाधिक सहायता से मैं उस आत्मज्ञान के अनुभव तक पहुंचा था।

उसके कई वर्षों बाद मैं कुंडलिनी साधना करने लगा। मैंने उन्हीं वृद्ध आध्यात्मिक पुरुष को अपनी कुंडलिनी बनाया हुआ था। उस दौरान जब मेरी सुषुम्ना खुली और उसमें ऊर्जा का प्रवाह हुआ (यद्यपि मुझे वह प्रवाह अनुभव नहीं हुआ, क्योंकि मेरे सभी चक्र अनब्लॉक थे, इसी वजह से वह जागरण संपूर्ण था, यद्यपि मैंने डर कर उसे एकदम नीचे उतार दिया), तब कुंडलिनी चित्र मेरे मन में प्रकट हुआ और मैं उससे पूरी तरह से एकाकार हो गया। हालांकि बैकग्राउंड के अन्य दृष्यों से भी मैं एकाकार ही था, पर मुख्य तो कुंडलिनी ही थी। इसी तरह, आत्मज्ञान के समय भी मुझे पीठ में एनर्जी फलो का भान नहीं हुआ, इसीलिए वह जागरण भी पूर्ण शक्तिशाली लग रहा था।

विशेष प्रकार का श्वास होने पर ही सुषुम्ना नाड़ी खुलती है

कहते हैं कि जब श्वास डायफ्रागमेटिक अर्थात एब्डोमिनल, गहरी, धीमी और बिना आवाज के चले; तभी सुषुम्ना के खुलने की ज्यादा संभावना होती है। मेरे भावनात्मक सदमे के दौरान मेरी सांसें बिल्कुल ऐसी ही हो गई थीं। इसीसे मेरी सुषुम्ना नाड़ी खुली। इससे यह जनप्रचलित बात सिद्ध हो जाती है कि सांसों के नियमन से ही योग होता है। 

सुषुम्ना के थ्रू एनर्जी राईज के लिए मूलाधार और सहस्रार चक्र के बीच में बहुत ज्यादा विभवांतर अर्थात पोटेंशियल डिफरेंस पैदा होना चाहिए

भावनात्मक सदमे से ये फायदा हुआ कि मेरा मस्तिष्क फुली डिस्चार्ज होकर नेगेटिव पोटेंशियल में आ गया था। मूलाधार तांत्रिक योगसाधना के कारण फुली पोसिटिव पोटेंशियल में था। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में बहुत ज्यादा पोटेंशियल डिफरेंस पैदा हुआ। इससे मूलाधार और सहस्रार के बीच में सेंसेशनल इलेक्ट्रिक स्पार्क पैदा हुआ, जिसे हम एनर्जी राइज कह रहे हैं।

और हां, पूर्व पोस्ट में जिस मित्र से मुझे भावनात्मक सदमा मिला था, उससे प्यारा समझौता हो गया है। सप्रेम।

कुण्डलिनी प्रोमोशन

दोस्तों, इस हफ्ते मैं पिछ्ली पोस्ट को संपादित और अपडेट करने में व्यस्त रहा। पिछली पोस्ट का विषय महत्त्वपूर्ण था। उससे बहुत सी गलतफहमियां पैदा हो रही थीं। यदि उन्हें पहले ही दूर किया जाता तो पोस्ट बहुत बड़ी हो जाती। इसलिए पोस्ट की लंबाई और उसके विषय के विस्तार के बीच में संतुलन बनाना पड़ा। मेरे एक मित्र ने उन कमियों की ओर ध्यान दिलाया, इसलिए मैंने उनका नाम सह संपादक के तौर पर डाला है। लेखक की यह जिम्मेदारी बनती है कि उसके द्वारा लिखित विषय से कोई गलतफहमी पैदा न हो।साथ में आज की पोस्ट प्रोमोशनल है। आजकल इस वेबसाइट की सबसे महत्वपूर्ण, आधारभूत और महत्त्वाकांक्षी पुस्तक पर बड़ा भारी डिस्काउंट ऑफर चल रहा है, जो 29 जून को समाप्त हो रहा है। विस्तृत जानकारी के लिए निम्नलिखित प्रोमो चित्र को क्लिक करें।

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कुण्डलिनी सर्ज (लहर) के लिए बाई-साईकलिंग (बाईकिंग) योग

भीष्म एवं हृदयेश

लोग सोचते हैं कि रोजाना की व्यस्त जीवनशैली से कुण्डलिनी साधना में बाधा पहुँचती है। पर ऐसा नहीं होता। व्यस्त काम-काज से कुण्डलिनी बहुत तेजी से ऊपर चढ़ती है। योग से रोजाना के कामकाज को करने की शक्ति भी मिलती है। कामकाज और योग, दोनों एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। 3 दिन की साईकलिंग से मेरी कुण्डलिनी मूलाधार से मस्तिष्क तक पहुँच गई। भारी गर्मी के बीच, एकदम से इतना ज्यादा बाईसाईकल मैं इसलिए चला सका, क्योंकि मेरा मन और शरीर रोजाना के कुण्डलिनी योगाभ्यास से फिट व तंदरुस्त थे।

मेरा बाई-साईकलिंग योग का अनुभव

इस हफ्ते आंशिक कोरोना-लौकडाऊन की वजह से मैंने साईकल पर ही अपने दफ्तर को आना-जाना शुरू किया। एक दिन का कुल 20 किलोमीटर का सफर हो जाता था। पहले दिन मैंने नोटिस किया कि मेरे मूलाधार पर बड़ी तेज व दबाव से भरी हुई संवेदना थी। वह संवेदना वैसी ही थी, जैसी सीमेन रिटेंशन से महसूस होती है। ऐसा लगता था जैसे कि मेरे मूलाधार चक्र पर किसी ने आगे से नुकीले चमड़े के जूते से गहरी किक मार दी हो, और उसके बाद मीठा व गहरा दर्द हो रहा हो। उससे मैं दिन के समय कुछ हल्का सा बेचैन रहने लगा। योग करते समय वह संवेदना फिर बढ़ जाती थी। मैं उस संवेदना को बार-२ पीठ से ऊपर चढ़ाने की कोशिश करता था। प्राणायाम के साथ पीठ के शेषनाग का चिंतन करने से वह संवेदना कुछ ऊपर जाती हुई लगती थी। इस प्राणायाम का वर्णन मैंने “बैकवार्ड फ्लो” व ‘शेषनाग’ वाली पुरानी पोस्ट में किया है। जब वह दर्द जैसी संवेदना ऊपर चढ़ती थी, तब पीठ में जगह-२ ऐंठन जैसी मीठी दर्द महसूस होती थी। उसी पर ही कुन्डलिनि चित्र भी प्रकट हो जाता था। दो दिन तक ऐसे ही चलता रहा। तीसरे दिन वह संवेदना मेरे पिछले अनाहत चक्र पर आ गई। ऐसा लगने लगा कि जैसे किसी ने चमड़े के पैने जूते से मेरे पिछले अनाहत चक्र पर गहरी किक मारी है, जिसके बाद उस पर मीठी व गहरी दर्द पैदा हो रही है। उससे मूलाधार का दबाव और वहां की संवेदना गायब हो गई। मणिपुर चक्र को संवेदना ने बायपास किया। इसका मतलब था कि मणिपुर चक्र ब्लोक नहीं था। जो चक्र ब्लॉक होता है, उसी पर वह मीठा दर्द महसूस होता है। एक दिन के बाद वह संवेदना गर्दन से होकर ऊपर चढ़ने लगी। फिर वह मीठी दर्द व अकड़न गर्दन के पिछले भाग के केंद्र (विशुद्धि चक्र) में महसूस होने लगी। उसी दिन मेरे मूलाधार को बाहर से किसी वजह से और संवेदना मिली। संवेदना आसानी से ऊपर चढ़ गई, क्योंकि मूलाधार पिछले फ्लो से अनब्लौक हो गया था। वह गर्दन की संवेदना से मिल गई और उसे मजबूत बना दिया। अनाहत चक्र की संवेदना गायब हो गई। अगले दिन, गर्दन से वह संवेदना मस्तिष्क में पहुँचने लगी, जिससे सिर हल्का परन्तु एनर्जी सर्ज के समय भारी लगने लगा। मैं दिन के समय कुर्सी पर बैठा था, और मुझे नींद की 4-5 मिनट की झपकी आ गई। जब मैं ऊपर उठा तो एनर्जी सर्ज पूरे वेग से पूरे मस्तिष्क में छा रही थी। दिमाग भारी व दबावयुक्त था। ऐसा लग रहा था कि उसमें मधुमक्खी के झुण्ड उड़ रहे हैं। यद्यपि आनंद भी आ रहा था। उससे कामकाज में दखलंदाजी न हो, इसके लिए मैंने उलटी जीभ को तालु से छुआ दिया। उससे एकदम से वह संवेदना की सर्ज आगे से नीचे उतर कर मेरे अगले अनाहत चक्र पर आ गई। उससे मेरा दिमाग एकदम से शांत हो गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। हृदय में कुण्डलिनी मजबूती से प्रकट हो गई, और वह आनंद से प्रफुल्लित हो गया। मस्तिष्क में केवल एनर्जी थी, कुण्डलिनी तो दिल में ही प्रकट हुई। इससे सिद्ध हुआ कि प्रेम दिल में ही बसता है। यह कोई आश्चर्य वाली चमत्कारिक घटना नहीं है, अपितु शरीर की सामान्य सी शरीरविज्ञान से जुडी हुई घटना है। इस प्रकार का कुण्डलिनी प्रवाह योगी के जीवन में इसी तरह से जीवनभर चलता रहता है। कुण्डलिनी जागरण तभी होता है, जब उसके लिए बहुत सी अनुकूल परिस्थितियाँ हों, और चक्र ब्लॉक न हों। जिस समय एनर्जी सर्ज मेरे दिमाग में छा रही थी, यदि उस समय मुझे किसी भी कारण से कुण्डलिनी की गहरी याद आ गई होती, तो पुनः कुण्डलिनी जागरण के लिए यह एक अनुकूल परिस्थिति होती। वास्तव में, मस्तिष्क में वह प्राणों का सर्ज था, क्योंकि उसमें कुण्डलिनी नहीं थी। विपरीत रूप से, कुण्डलिनी से भी प्राणों का सर्ज पैदा हो सकता है। वैसे में कुण्डलिनी की गहरी याद दिमाग में खुद ही प्राणों का सर्ज पैदा करती है। उसके साथ कुण्डलिनी खुद ही जुडी होती है, क्योंकि कुण्डलिनी ने ही तो वह प्राणों का सर्ज (महान लहर/जमघट) पैदा किया हुआ होता है। वैसी स्थिति में कुण्डलिनी जागरण हो जाता है। ऐसा ही कुण्डलिनी जागरण मुझे लगभग 3 साल पहले हुआ था, जिसका वर्णन मैंने इस वैबसाईट के होमपेज पर किया है।

बाईकिंग या साईकलिंग योग डायाफ्रागमैटिक साँसों को उत्तेजित करता है

मुझे लगता है कि साईकल चलाते समय पेट से गहरे सांस लेने से मेरा मूलाधार चक्र ज्यादा ही उत्तेजित हो गया था। स्पोर्ट्स बाईक में पीठ का पोस्चर अपनी प्राकृतिक अवस्था में होता है, और उसकी पतली सीट के दबाव से मूलाधार चक्र भी उत्तेजित होता रहता है। साथ में, पीठ में सांस लेते व छोड़ते हुए शेषनाग के चिंतन से मेरे मूलाधार को और अधिक शक्ति मिली। उससे मूलाधार में वीर्य शक्ति संचित होने लगी। उससे बैकवार्ड फ्लो भी चालू हो गया, जिससे मूलाधार में संचित एनर्जी पीठ में ऊपर चढ़ने लगी। मूलाधार की संवेदना वैसी ही थी, जैसी यौन-ऊर्जा के रक्षण से पैदा होती है। साथ में, वह संवेदना यौनसंबंध के लिए भी प्रेरित कर रही थी। शायद यही वजह है कि कामकाज में एक्टिव लोग सेक्सुअल रूप से भी एक्टिव होते हैं। मैं मुंह और जीभ को कस कर बंद रखता था, और जीभ की अधिकाँश सतह को तालु से कसकर चिपका कर रखता था। मैं उसका चिंतन एक पिलर के टॉप की स्लैब से करता था जिससे मस्तिष्क फ्रंट पिलर या एनर्जी चैनल से जुड़ा होता था। उससे साईकलिंग के समय उमड़ने वाले दिमाग के फालतू विचार नीचे उतरकर शरीर को एनर्जी देते रहते थे। उससे मन भी शांत रहता था, और थकावट भी नहीं होती थी।

अगले दिन मेरी कुण्डलिनी एनर्जी मणिपुर चक्र तक लौट आई थी

अगले दिन मेरी गहरी व मीठी दर्द पीछे के मणिपुर चक्र पर आ गई। संभवतः वह आगे के अनाहत चक्र से आगे के मणिपुर चक्र तक नीचे उतरी थी। आगे से वह पीछे के मणिपुर चक्र तक आ गई थी। वास्तव में इसी मीठी दर्द को एनर्जी कहते हैं। यही नाड़ी लूप में घूमती है। जब इस दर्द के साथ सबसे मजबूत व पसंदीदा मानसिक चित्र मिश्रित हो जाता है, तब वही एनेर्जी कुण्डलिनी कहलाती है। मुझे ऐसा भी लगा कि पीछे के चक्रों पर खाली एनेर्जी ज्यादा प्रभावी रहती है, जबकि आगे के चक्रों पर कुण्डलिनी ज्यादा प्रभावी रहती है। पीठ में जगह-२ बनने वाले मोड़ या बैंड उस एनेर्जी का निर्माण करते हैं, जिसके साथ कुण्डलिनी चित्र मिश्रित किया जाता रहता है।

कुण्डलिनी जागरण आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यावश्यक नहीं है

कुण्डलिनी जागरण का योगदान यही है कि यह साधक के मन में कुण्डलिनी योगसाधना के प्रति अटूट विशवास पैदा करता है। उससे साधक प्रतिदिन के तौर पर हमेशा ही कुण्डलिनी योगसाधना करता रहता है। इस प्रकार से, यदि कोई व्यक्ति हमेशा ही सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना करता रहे, तो एक प्रकार से उसकी कुण्डलिनी जागृत ही मानी जाएगी। हालांकि सही तरीके से कुण्डलिनी योगसाधना सीखने के लिए उसे योग्य गुरु की जरूरत पड़ेगी। एक प्रकार से, यह वैबसाईट भी एक गुरु (ई-गुरु) का ही काम कर रही है।    

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कुंडलिनी योग के लिए बच्चों के द्वारा अंगूठा चूसना- एक अद्भुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान

दोस्तों, जैसा कि मैंने पिछली पोस्टों में भी बताया कि मुख (ओरल केविटी) एक कुण्डलिनी स्विच की तरह काम करता है। जैसे ही ओरल केविटी की छत इसके फर्श के साथ सीधे संपर्क में आती है, वैसे ही वह स्विच ऑन हो जाता है। खाना खाते समय जब मुंह भोजन से भरा होता है, तब दोनों सतहों के बीच में संपर्क बन जाता है। इसी तरह, मुंह के पानी से भरे होने पर भी बहुत अच्छा संपर्क बनता है। तभी तो खाना खाने के बाद और पानी पीने के बाद बहुत रिलीफ मिलता है। यहाँ तक कि किसिंग से भी ऐसा ही होता है। उसमें भी मुंह की लार संपर्क बनाने का काम करती है। योगी लोगों ने इस सिद्धांत का पूरा फायदा उठाने के लिए जीभ को तालू से छुआने की तकनीक बनाई। साथ में, उस तकनीक के साथ उन्होंने कुण्डलिनी को भी जोड़ दिया।

बच्चे कुदरती तौर पर सबसे बड़े योगी होते हैं

मैंने ऐसा पहले भी लिखा था। बच्चों से ही योग की शुरुआत हुई। बच्चों से ही लोगों ने योग सीखा। बहुत से ऐसे योगियों के उदाहरण हैं, जो उम्र में बच्चे थे। शुकदेव, बाबा बालक नाथ ऐसे ही योगी-बच्चों के उदाहरण हैं, जिनकी योग-साधना का आजतक लोग लोहा मानते हैं। वास्तव में योग की नींव बच्चे में पेट के अन्दर ही पड़ जाती है।

बच्चों में कुण्डलिनी स्विच को ओन करने की प्रवृत्ति नैसर्गिक होती है

बच्चे माँ के पेट में ही अपना अंगूठा चूसने लग जाते हैं। जाहिर है कि पेट में उन्हें बहुत परेशानी होती है। छोटी सी जगह में कैद होकर वे अपने विचारों में बेबस होकर उलझे रहते हैं। इससे उन्हें क्रोध, भय, अवसाद आदि मानसिक विकारों का लगातार सामना करना पड़ता है। उसी से बचने के लिए वे अंगूठा चूसते हैं। अंगूठा मुंह की दोनों सतहों को आपस में जोड़ देता है। साथ में, लार भी यह काम करती है। यह प्रवृत्ति 4 साल की उम्र तक तो बच्चों में ठीक है, पर इसके बाद उससे मुंह की बनावट बिगड़ सकती है। तभी बहुत से लोग कहते हैं की बड़े बच्चों को डांटकर नहीं, बल्कि योग सिखा कर इस आदत को मिटाया जा सकता है।

एनेर्जी स्विच के ऑन होने से कुण्डलिनी लाभ कैसे मिलता है

मुंह के एनेर्जी स्विच के ऑन होने से दिमाग का बोझ नीचे उतर जाता है। तभी तो कहते हैं कि बोझ उतर गया, यह नहीं कहते कि बोझ चढ़ गया। इससे दिमाग के विचारों से आसक्ति हट जाती है। इससे मन में अद्वैत की शान्ति छा जाती है। शान्ति से मन में बनने वाली खाली जगह को भरने के लिए कुण्डलिनी खुद ही प्रकट हो जाती है। योगी कुण्डलिनी के व नाड़ी चैनलों के बलपूर्वक ध्यान से आम लोगों से अधिक कुण्डलिनी लाभ प्राप्त करते हैं।

गुस्से को कैसे घूँटा जा सकता है

आमतौर पर लोग कहते हैं कि मैं गुस्से को पी गया या उसने गुस्से को घूँट लिया। कई लोग गुस्से के समय कुछ घूंटने का प्रयास करते हैं। उससे दिमाग का बोझ लार के माध्यम से गले के नीचे उतर जाता है। वैसे भी गुस्से के समय लोग दांत भींचते हैं, ताकि वे गुस्से को काबु में करके अच्छी तरह से लड़ सकें। कई लोग लड़ाई से दूर हटने के लिए ऐसा करते हैं। ऐसा करने से मुंह की दोनों सतहें जीभ के माध्यम से टाईट होकर आपस में जुड़ जाती हैं।

मौन व्रत से कुण्डलिनी स्विच कैसे ऑन रहता है

मौन धर्म के पीछे भी यही कुण्डलिनी स्विच का सिद्धांत काम करता है। चुप रहने से दांत टाईट जुड़े होते हैं, और मुंह के अन्दर भी गैप नहीं रहता। बोलने से वह गैप बढ़ जाता है, और दिमाग का बोझ नीचे उतरकर दिमाग को नुकसान नहीं पहुंचा पाता है। मुझे खुद मौन रहने से अपना आत्मज्ञान व कुण्डलिनी जागरण पुनः याद आ जाता था। बिना अवेयरनेस के बोलने से मैं उन्हें भूल जाता था। जीभ खुद ही दांतों के पीछे तालू से टच रहती है।  

कोरोना लोकडाऊन के दौरान मजदूरों के पैदल पलायन के समय उनके साथ भटक रहे मासूम बालकों को देखकर निराशा होती है।

कुंडलिनी स्विच; कुंडलिनी योग (खेचरी मुद्रा) और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट का तुलनात्मक अध्ययन

योग संसार में अक्सर कहा जाता है कि योग करते समय जीभ की शिखा को मुंह के अंदर पीछे वाले नरम तालु से छुआ कर रखना चाहिए। यह प्राचीन तकनीक आज के कोरोना (कोविड-19) काल में भारी तनाव के बोझ को दूर करने के लिए अद्भुत साबित हो सकती है। आज हम इसके मनोवैज्ञानिक और शरीर वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करेंगे।

जीभ को तालु से छुआने से कुंडलिनी स्विच ऑन हो जाता है, जिससे कुंडलिनी परिपथ पूरा हो जाता है

मुझे पहले ऐसा विशेष महसूस नहीं होता था। परन्तु जब मुझे कुंडलिनी योग करते हुए 2-3 साल बीत गए, तब मुझे इसके महत्व का पूरा अनुभव हुआ। जब मेरी जीभ ऊपर और पीछे को मुड़कर सॉफ्ट पेलेट की मालिश करती थी, तब मुझे ऐसा लगता था कि वह मेरे दिमाग को नीचे की तरफ चूस रही थी। सॉफ्ट पेलेट एक फिसलन भरे नरम गद्दे की तरह लगा, जिस पर जीभ को उरे-परे फिसलाने से बड़ी सुखद अनुभूति हुई। फिर दिमाग के रस के साथ मेरी कुण्डलिनी भी जीभ के पीछे से होती हुई नीचे गले तक उतर गई। वहां से अनाहत चक्र, फिर मणिपुर चक्र, और अंत में स्वाधिस्ठानचक्र-मूलाधार चक्र पर पहुंच कर सांसों की शक्ति से पीछे से ऊपर की ओर चली गयी। रीढ़ की हड्डी से होते हुए सभी चक्रों को भेदते हुए वह फिर मस्तिष्क तक पहुंच गई। वहां से फिर जीभ से होकर नीचे आ गई। इस तरह से कुंडलिनी परिपथ चालू हो गया, और कुंडलिनी पूरे शरीर में गोल-गोल घूमने लगी। इस प्रक्रिया में शरीर की सेंटरिंग (केन्द्रीकरण) का भी योगदान होता है, जिसका जिक्र हम आने वाली पोस्टों में करेंगे।

कुण्डलिनी स्विच के ऑन होने से दिमाग में हल्कापन महसूस होता है

जैसे ही कुंडलिनी स्विच से होकर मेरे दिमाग का रस या बोझ (कुंडलिनी) नीचे उतरा, वैसे ही मेरा दिमाग एकदम हल्का व शांत हो गया। जब कुंडलिनी पीछे से चढ़कर दिमाग तक पहुंची, दिमाग फिर भारी हो गया।इस तरह वह भारी-हल्का होता रहा और शक्ति पूरे शरीर में घूमने लगी।

खेचरी मुद्रा और माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में जीभ को तालु से छुआया जाता है

बहुत से लोग सोचते हैं कि माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में ही कुंडलिनी स्विच का वर्णन है, तथा उसने ही कुंडलिनी योग को पूर्ण किया। उससे पहले कुंडलिनी योग से कुण्डलिनी दिमाग में अटकी रहती थी और दिमागी परेशानियां पैदा करती थी। वास्तव में योग की खेचरी मुद्रा में कुंडलिनी स्विच का विस्तार से वर्णन है। उसमें तो जीभ के जोड़ को काटकर जीभ को इतना लंबा कर दिया जाता है कि वह पीछे मुड़कर नाक को जाने वाले सुराख में घुस जाती है। उससे कुंडलिनी स्विच परमानेंटली ऑन हो जाता है, जिससे योगी हमेशा कुंडलिनी के आनंद में झूमने लगता है। यद्यपि इस तरीके को करने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि इससे स्वास्थ्य व जीवन शैली को भारी जोखिम उठाना पड़ सकता है।

माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट व कुंडलिनी योग भिन्न-2 परिस्थितियों के लिए हैं

कुंडलिनी जागरण दिमाग में ही होता है, अन्य चक्रों में नहीं। इसलिए यह सिद्ध है कि कुंडलिनी योगी को जल्दी कुंडलिनी जागरण होता था। प्राचीन भारत में बहुत शांतिपूर्ण और आरामदायक जीवनशैली होती थी। वातावरण व जलवायु भी विश्व में सर्वोत्तम होते थे। इसलिए वहां के योगी अपने दिमाग में कुंडलिनी का बोझ अच्छी तरह से झेल लेते थे। अधिकांश योगियों को कुंडलिनी स्विच की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। मुझे भी कुंडलिनी जागरण के लिए इसकी जरूरत नहीं पड़ी थी।पर आज मैं इसकी जरूरत महसूस करता हूँ, क्योंकि अब मेरे दिमाग में दूसरे कामों का बोझ बढ़ गया है।

कुंडलिनी स्विच से बहुत से स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं

सुबह-2 जब कई बार मेरा बॉवेल प्रेशर नहीँ बनता, तब मैं कुंडलिनी योग के बाद कुंडलिनी स्विच को ऑन करता हूँ। मैं कुंडलिनी का परिपथ नाभि चक्र तक बनाता हूँ। कुंडलिनी आगे के नाभि चक्र से पीछे घुसती है और पीछे वाले नाभि चक्र से होकर ऊपर चढ़ जाती है। जल्दी ही मेरी अंतड़ियों में हलचल शुरु हो जाती है, और मेरा पेट साफ हो जाता है।

कुण्डलिनी स्विच के पीछे छिपा हुआ शरीर विज्ञान

खाना खाते समय हमारी जीभ बार-2 तालु को छूती है। उससे दिमाग की ऊर्जा जीभ के रास्ते से होकर नाभि चक्र तक पहुंच कर खाना पचाने में मदद करती है। इसीलिए खाना खाने के बाद रक्तचाप भी कम हो जाता है, और आदमी दिमाग में हल्कापन महसूस करता है।

एम्ब्रोसिया, नेक्टर, अमृत, एलिकसिर ऑफ़ गॉड, लव पोशन, सीएसएफ आदि नाम कुण्डलिनी स्विच से जुड़े हैं

कुछ अभ्यास के बाद मैंने सॉफ्ट पेलेट से एक मीठा-नमकीन व जैली जैसा रस चखा। वह आनंद के साथ दिमाग का बोझ घटने से पैदा होता है। उसे उपरोक्त नामों से भी जाना जाता है।

कुंडलिनी सभी प्रकार के अनुभवों को सुरक्षित रूप से झेलने की शक्ति देती है; और कुण्डलिनी जागरण तो सबसे बड़ा अनुभव है, जिसके आगे सभी अनुभव बौने हैं; प्रेत आत्मा से सामना होने की कुछ घटनाएं

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने ड्रीम विजिटेशन के बारे में बताया था। इस पोस्ट में मैं उससे संबंधित अपने अनुभवों के बारे में बताऊंगा।

आदमी (आत्मा) की मृत्यु नहीं होती, वह केवल रूप बदलता रहता है

आज से दो वर्ष पहले मेरी दादी जी का देहांत हो गया था। बुढ़ापा मृत्यु का मुख्य कारण रहा, हालांकि उसमें एक अनजानी सी लंबी बीमारी का भी योगदान था। यह भी संयोग ही है कि उन्हें श्वासरोग की भी समस्या थी, और कोरोना(कोविड-19) भी श्वासरोग ही फैला रहा है। बहुत से शारीरिक व मानसिक कष्टों के बीच में उन्होंने अपने प्राण छोड़े। स्वभाव से वे कोमल, भावनाप्रधान, सुखप्रधान व भीरु स्वभाव की थीं। कई बार तो वे अपनेपन की मोहमाया से ग्रस्त लगती थीं, पर वे उसे प्रेमभावना कहती थीं। दयालु, मानवतापूर्ण व ममतामयी स्वभाव की मूर्ति थीं। मेहनती थीं और अच्छे-बुरे की अच्छी परख रखती थीं। अपनों के सुख व भले के लिए चिंतित रहा करती थीं। वे बच्चों से बहुत प्यार करती थीं। बच्चों को वे जरा भीडांटने नहीं देती थीं, उन्हें गुस्से में हाथ भी लगाना तो दूर की बात रही। वे पालतु जानवरों की भी बहुत देखरेख रखती थीं। वे बहुत सोच-विचार करा करती थीं। मरने से और उसके बाद की दुर्गति से बहुत डरती थीं। उनकी मृत्यु के लगभग 15 दिन बाद मेरी उनसे सपने में मुलाकात हुई। अजीब सा शांतिपूर्ण अंधेरा था। मुट्ठी में भरने लायक घना अंधेरा था। पर आम अंधेरे के विपरीत उसमें चमक थी चमकीले काजल की तरह। वह मोहमाया या अज्ञान से दबी हुई आत्मा की स्वाभाविक चमक होती है। उस अंधेरे के रूप में भी मैं उन्हें स्पष्ट पहचान रहा था। इसका मतलब है कि उस अंधेरे में उनके रूप की एनकोडिंग थी। मतलब कि किसी आदमी की आत्मा का अंधेरा उसके गुण और रूप के अनुसार होता है। उसी अंधेरे से अगले जन्म में वही गुण और कर्म फिर से प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि सभी अंधेरे एक जैसे नहीं होते।

उनका वह रूप मुझे अच्छा लगा। वह आकाश की तरह पूरा खुला हुआ और विस्तृत था। वह मुझे अपनी क्षणिक आत्मज्ञान की अनुभूति की तरह लगा। परन्तु उसमें प्रकाश व आनंद वाला गुण किसी चीज के दबाने से ढका हुआ जैसा लग रहा था। शायद यही दबाव अज्ञान, आसक्ति, द्वैत, मोहमाया, कर्मसंस्कार आदि के नाम से जाना जाता है। ऐसा लगा जैसे ग्रहण काल में आसमान के आकार का सूर्य पूरा ढका हुआ हो, और नीचे का प्रकाश उस काले आसमान को कुछ अजीब सी या चमकीले काजल जैसी चमक देता हुआ बाहर की तरफ उमड़ना चाह रहा हो। इसे ही अज्ञान के पर्दे से आत्मा का ढकना कहते हैं। इसे ही अज्ञान रूपी बादल से आत्मा रूपी सूर्य का ढकना भी कहते हैं।

मैंने उनसे उनका हालचाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वहाँ पर तो ऐसी-वैसी कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने मेरा हाल पूछा तो मैंने कहा कि मैं ठीक था। उन्होंने कहा, “मैं तो वैसे ही डरती थीं  कि मरने के बाद पता नहीं क्या होता होगा। पर मैं तो यहाँ ठीक हूँ”। उन्हें वह स्थिति कुछ शक के साथ पूर्ण जैसी लग रही थी, पर मुझे उसमें कमी लग रही थी। शायद वे उस स्थिति को भगवान ही समझ रही हों। शायद वह उस स्थिति के बारे में जानने के लिए मुझसे संपर्क कर रही हों। मैंने प्रसन्न मुद्रा में आसमान की तरफ ऊपर हाथ उठाकर और ऊपर देखते हुए उन्हें उनके अंत समय के निकट कहा भी था कि वे सबसे ऊपर के आकाश लोक में जाएंगी, जिसे उन्होंने गौर से व विश्वास के साथ सुना था। ऐसा मैंने उनके ऐसा पूछने पर कहा था कि उस लाईलाज बिमारी के बाद वह कहाँ जा रही थीं। उनके उस विश्वास की एक वजह यह भी थी कि मेरे दादाजी ने लगभग 25 वर्ष पहले उन्हें मेरे सामने मेरे आत्मज्ञान के बारे में प्रसन्नता व बड़े आत्मगौरव के साथ बताया था। मेरी कुंडलिनी के निर्माण में मेरे दादाजी का बहुत बड़ा योगदान रहा था।

फिर उस ड्रीम विजिटेशन में मेरी दादीजी ने मुझसे कहा, “तेरे बहुत से अहितचिंतक पीठ पीछे तेरे विरुद्ध बोल रहे हैं”। तो मैंने उनसे कहा, “आप भगवान के बहुत नजदीक हो, इसलिए कृपया उनसे स्थिति सामान्य करने के लिए प्रार्थना करो”। उन्होंने कहा, “ठीक है”। मैं उस समय प्रतिदिन कुण्डलिनी योग कर रहा था। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी (अद्वैत) मृत्यु के बाद ईश्वर की तरफ ले जाती है।

प्रेतात्मा के द्वारा भगवान का स्मरण करना बहुत बड़ी बात है, क्योंकि उस समय वह पूरी तरह से भूखी-प्यासी व आश्रय विहीन होती है। हो सकता है कि उससे उन्हें भगवान की तरफ गति मिल गई हो। आश्चर्य की बात है कि जिस स्थान पर उन प्रेतात्मा के लिए धार्मिक रीति के अनुसार जल का कलश रखा हुआ था, वहीं पर उनसे मुलाकात हुई। वहां पर एक शिवलिंग टेलीफोन सेट का काम कर रहा था, जिसके माध्यम से उनसे बात हो रही थी। बड़ी स्पष्ट,भावपूर्ण व जीवंत आवाज थी उनकी। वह मुंह से निकली हुई आवाज नहीं थी। वह सीधी उनकी आत्मा से आ रही थी और मेरी आत्मा को छू रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई स्विच दबा और मैं शरीर रहित आयाम में प्रविष्ट हो गया था। फिर मैंने परिवार के और सदस्यों से उनकी बात करानी चाही। पर वे लोग उन्हें मरा हुआ मान रहे थे। फिर मुझे भी उनके मरे हुए होने का भान हुआ। मैं तनिक दुखी होकर विलाप करने लगा और थोड़ा डर सा गया। उससे वह आत्मा ओझल हो गई और मैं एकदम से आत्मा के आयाम से बाहर आ गया।

प्रियजनों की आत्मा आने वाले खतरे का बोध भी करवाती है

कुछ महीनों बाद मैंने उन्हें बड़ी भयावह अवस्था में देखा। वह शायद वैसी ही स्थिति थी, जैसी उन्होंने अपनी मृत्यु के समय महसूस की होगी। मैंने उन्हें अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में मृत रूप में जीवित बैठे देखा। वह बड़ा विचित्र व क्लेशपूर्ण अनुभव था। शायद वह मुझे अगले दिन होने वाली दुर्घटना के बारे में बताना चाह रही हों, पर बोल नहीं पा रही हों। अगले दिन मेरे कमरे की खिड़की पर एक जहरीला कोबरा सांप था, जिससे मेरा कर्मचारी बाल-बाल बच गया।

एकबार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को फिर से भगवान की याद दिलाई

वह किसी रिश्तेदार के यहाँ आराम से सबके साथ बाहर बैठी थीं। मेरी मुलाकात होने पर मैंने उन्हें ईश्वर की याद दिलाई। वह धीरे-2 भवन के अंदर को सरक गईं और ओझल हो गईं। उनका रूप पहले से कुछ अधिक स्वच्छ लग रहा था। सूक्ष्म शरीर भगवान के तेज को ज्यादा देर सहन नहीं कर सकता।

अंतिम बार मैंने उन सूक्ष्म शरीर को बहुत निर्मल देखा

वे मेरे पुश्तैनी घर के मुख्य गेट से बरामदे में प्रविष्ट हो रही थीं। उन्होंने उज्ज्वल सफेद कपड़े पहन रखे थे। वे बहुत निर्मल, शान्त व आनन्दमयी लग रही थीं। उनसे मिल कर मेरा रोम-2 खिल उठा। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ गया था। मैंने कहा कि मैं हरिद्वार गया था। हरिद्वार भगवान का सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। यह विश्वप्रसिद्ध योग राजधानी ऋषिकेश के नजदीक स्थित है। वे मुस्कुराते हुए व मुझसे यह पूछते हुए भवन के अंदर प्रविष्ट हुईं कि क्या मैं उससे पहले हरिद्वार नहीं गया था। उनका पूछने का मतलब था कि मैं पहले भी तो हरिद्वार गया हुआ था।

जब मेरे चाचा का सूक्ष्म शरीर मुझे चेतवानी देने आया था

उससे कुछ समय पहले मेरे चाचा की मृत्यु हाईपर थायरेडिसम बीमारी के कारण अचानक हृदय गति रुकने से हुई थी। वे बड़े मिलनसार व सामाजिक होते थे। ड्रीम विजिटेशन में मुझे वे अपनी मित्रमण्डली के साथ होहल्ला व हंसी मजाक करते हुए एक विचित्र सी अंधेरी पर शांत गुफा के अंदर चलते मिले। मैं और मेरी 5 साल की बेटी भी कुछ अजीब, चन्द्रमा की रौशनी से मिश्रित अंधेरे वाली और आनंद वाली जगह पर कुछ सीढ़ियां चढ़ कर उनके पीछे चल दिए। गुफा के दूसरे छोर पर बहुत तेज स्वर्ग के जैसा प्रकाश था। चाचा ने मुझसे मुस्कुराते हुए अपने साथ चलने के लिए पूछा। मैंने अनहोनी की आशंका से मना कर दिया। मेरी बेटी को वह नजारा बड़ा भा रहा था, इसलिए वह उनके साथ चलने के लिए जिद करने लगी। मैंने उसे बलपूर्वक रोका और हम गुफा से बाहर वापिस लौट आए। अगले दिन मेरी कार सड़क से बाहर निकलने से बाल-2 बच गई। साथ बैठी हुई मेरी फैमिली ने मुझे समय रहते चेता दिया था।

अपरिचित की आत्मा भी ड्रीम विजिटेशन में सहायता माँग सकती है

मेरे एक रिश्तेदार के लड़के को सपने में एक मंदिर के साधु बार-2 आकर अपना अंतिम संस्कार करने के लिए कहते थे। खोजबीन करने पर पता चला कि उन साधु की हत्या हो गई थी और उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था। मेरे उन रिश्तेदार ने साधु का पुतला बनवाया और उसका विधिवत अंतिम संस्कार करवाया। उसके बाद उन साधु का सपने में आना बंद हो गया। मैं उस बात पर यकीन नहीं करता था। पर अपने खुद के उपरोक्त ड्रीम विजिटेशन के अनुभव के बाद वैसी अलौकिक घटनाओं पर विश्वास होने लग गया।

कुण्डलिनी से प्रेमी की मृत आत्मा का ईश्वर अर्थात मुक्ति की ओर दिशा निर्देशन; कुंडलिनी योग द्वारा ड्रीम विजिटेशन में सहायता प्राप्त होना

कोरोना महामारी(कोविड-19) के कारण बहुत सी आत्माएं अपने-2 शरीरों से विदा ले रही हैं। सभी आत्माएं अपने सूक्ष्म शरीर के अनुसार नया जन्म लेंगीं।कुछ आत्माएं मुक्त भी हो जाएंगीं। मुझे लगता है कि यह अपनी सोच के अनुसार होता है। मरने के बाद सूक्ष्म शरीर खुद ही धीरे-2 साफ होता रहता है। कुछ आत्माओं का शुरुआती अंधेरे में दम घुटने लगता है, और वे लंबा वेट नहीं कर सकतीं। इसलिए वे शरीर ग्रहण कर लेती हैं। मृत्यु के बाद की उस डरावनी स्थिति को”तिब्बतन बुक ऑफ डैडस” में बारडो कहा गया है। बारडो की स्थिति में बड़े डरावने अनुभव होते हैं। उनसे डरना नहीं चाहिए, तथा यह मान कर चलना चाहिए कि वे असली नहीं हैं, बल्कि सब मन में हो रहे हैं। कुण्डलिनी योग की अद्वैत शक्ति से उस बारडो अवस्था को पार करने में बहुत मदद मिलती है।


ड्रीम विजिटेशन साधारण स्वप्नों से अलग होते हैं


भावनाप्रधान लोगों का अपने प्रियजनों से गहरा दिल का रिश्ता बना होता है। वे मृत्यु के बाद भी प्रेमी जनों से मेलजोल बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए वे प्रेमीजनों के सपनों में अक्सर प्रकट होते रहते हैं। इसे ड्रीम विजिटेशन कहते हैं। कई बार वे सहायता मांगने आते हैं, और कई बार सहायता प्रदान करने। उन प्रेमीजनों में अधिकांशतः परिवार के लोग या रिश्तेदार होते हैं। ज्यादातर मामलों में शरीर विहीन आत्मा अपने एक ही परम प्रिय और परम विश्वसनीय आदमी को चुनती है। इसीलिए वह एक ही आदमी के सपने में बार-2 आती रहती है। ऐसा कुण्डलिनी सिद्धांत के अनुसार ही होता है।

मृत आत्मा का साक्षात्कार साधारण स्वप्न से अलग होता है

इसमें ऐसा लगता है कि सचमुच के जीवित आदमी से मुलाकात हो रही है। यहाँ तक कि वह जीवित आदमी से भी ज्यादा वास्तविक लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिस कोड रूप में उस आत्मा के पिछले और आगे होने वाले जन्मों और शरीरों का ब्यौरा छुपा होता है, उस मूलभूत कोड (सूक्ष्म शरीर) से साक्षात्कार हो रहा होता है। ड्रीम विजिटेशन के समय डरना नहीं चाहिए। आगे के लिए भी मन पक्का कर लेना चाहिए, क्योंकि वह आत्मा बार-2 सपने में आती है।धीरे-2 आदत पड़ जाती है।अभ्यास होने पर तो आत्मा के साथ लंबे समय तक बातें की जा सकती हैं, नहीं तो वह शीघ्र ही ओझल हो जाती है। कुण्डलिनी योग साधना की अद्वैत शक्ति से उस डर पर विजय पाने में मदद मिलती है।

आत्माओं को नया शरीर अपने सूक्ष्म शरीर के अंधेरे के अनुसार छोटा या बड़ा मिलता है

जो आत्माएं बारडो के अंधेरे के छंटने का जितना लंबा वेट करती हैं, उन्हें उतना ही अच्छा शरीर मिलता है। कई आत्माएं बहुत साफ हो जाती हैं, इसलिए वे देवता बन जाती हैं। बहुत कम सहनशील व खुशनसीब आत्माएं जो पूरी तरह से अपनी सफाई का वेट कर लेती हैं, केवल वे ही मुक्त होकर ईश्वर में मिल जाती हैं। इसलिए परिस्थिति व विश्वास के अनुसार यह गैर हिंदू मत भी सत्य है कि आदमी का पुनर्जन्म नहीं होता, और यह हिंदु मत भी सत्य है कि मृत्यु के बाद आदमी का पुनर्जन्म होता है। हालांकि मुक्त होने के लिए अच्छे कर्मों का होना भी जरूरी होता है। यदि ऐसा न होता तब तो महाप्रलय काल में सभी आत्माएं अपने आप मुक्त हो जातीं। उस काल में तो करोड़ों वर्षों तक शरीर नहीं मिलता। वेद कहते हैं कि उस काल में भी आत्मा आप अपने आप मुक्त नहीं होती। दूसरी बात वेदों में यह भी कही गई है कि मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण होने से मुक्ति मिल जाती है। पर यह भी सत्य है कि जीवन भर शुभ कर्म करने से ही मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण हो पाता है। इसका मतलब है कि शुभ कर्मों की कतई अनदेखी नहीं करनी चाहिए।

अगली पोस्ट में मैं अपने ड्रीम विजिटेशन के उन निजी अनुभवों के बारे में बताऊंगा जिनसे मैंने उपरोक्त तथ्य निकाले हैं।

कुंडलिनी के लिए यौनयोग के विकल्प के रूप में श्वास की विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड या कुंडलिनी पंप); कोरोना काल में तो सही ढंग की व भरपूर साँसें ली ही जानी चाहिए, क्योंकि किसको पता कि कोरोना कब किसकी साँसें छीन ले 

योग में श्वास-प्रश्वास का सर्वाधिक महत्त्व है। सही ढंग से श्वास लेने पर ही योग का अधिकांश सफर तय हो जाता है। तभी तो कहते हैं कि साँस को जीतने से मन पर भी विजय मिल जाती है। सही तरीके की साँस के साथ-2 कुंडलिनी खुद ही चलती रहती है। इसलिए साँस को चक्रों पर घुमाने से कुंडलिनी स्वयं ही घूमने लगती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि ही श्वासयोग का मुख्य भाग है

विपरीतक्रम श्वास विधि को सीखने के लिए सबसे पहले पेट से साँस लेना सीखा जाता है। इसे डायाफ्रेगमेटिक डीप ब्रीथिंग भी कहते हैं। इसमें साँस अंदर भरने पर पेट बाहर की तरफ फूलता है। सांस बाहर छोड़ने पर पेट अंदर की ओर सिकुड़ता है। यदि इससे विपरीत क्रम में पेट की गति हो, तो वह साँस छाती से मानी जाती है। छाती से ली गई साँस से मन चंचल रहता है, और शरीर को भरपूर ऑक्सीजन भी नहीं मिलती।

विपरीतक्रम श्वास विधि में साँस शरीर से बाहर नहीं छोड़ी जाती

भौतिक रूप से यह बात अजीब लग सकती है, क्योंकि साँस तो बाहर निकलेगी ही। परंतु आध्यात्मिक रूप से यह सत्य है। बाहर जाने वाली साँस की सूक्ष्म ध्यानमयी शक्ति को पेट से नीचे की ओर धकेला जाता है। उससे नाभि के नीचे व स्वाधिष्ठान चक्र के आसपास एक संवेदना जैसी पैदा होती है। वह संवेदना वीर्य-निर्माण की प्रक्रिया को उत्तेजित करती है।

अंदर भरी जाने वाली साँस वास्तव में रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ाई जाती है

बाहर जाने वाली साँस से स्वाधिष्ठान चक्र पर वीर्य-संवेदना का बिंदु बनता है। वह संवेदना बाहर छोड़ी गई साँस से पीठ वाले स्वाधिष्ठान चक्र से होती हुई रीढ़ की हड्डी में ऊपर की तरफ चढ़ती है। वह सभी चक्रों से होते हुए सहस्रार तक पहुंच जाती है। उस संवेदना के साथ वीर्य की सूक्ष्म  शक्ति व कुंडलिनी भी होती है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि वास्तव में शरीर के अंदर नीचे की तरफ जाने वाली हवा ऊपर की तरफ जाती है, और ऊपर की तरफ जाने वाली हवा नीचे की तरफ जाती है। इसीलिए इसे विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड) कहते हैं।

मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक फैले हुए शेषनाग के ध्यान से विपरीत-क्रम श्वास विधि आसान हो जाती है

शेषनाग वाली मेरी पिछली पोस्टों के अनुसार शेषनाग ने मूलाधार व स्वाधिष्ठान के ऊपर अपनी कुंडली लगाई हुई है। वह रीढ़ की हड्डी से होकर ऊपर उठा हुआ है, और मस्तिष्क में उसके एक हजार फन हैं। जब हम पेट से साँस भरते हैं, तो वह पीछे की ओर तन कर सीधा व कड़ा हो जाता है, तथा फन उठा लेता है। इसका अर्थ है कि उसके शरीर में साँस ऊपर की ओर चढ़ कर उसके फन तक पहुंची। इससे पूर्वोक्त संवेदना की शक्ति ऊपर की तरफ चली जाती है। जब हम साँस छोड़ते हैं, तब वह आगे की ओर ढीला हो जाता है, और अपना फन नीचे झुका लेता है। ऐसा लगता है कि उसने फुफकार के साथ साँस नीचे की तरफ छोड़ी। साथ में पेट भी अंदर की ओर सिकुड़ कर नीचे की ओर दबाव डालता है। इन सबसे पूर्वोक्त स्वाधिष्ठान बिंदु पर संवेदना बनती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि यौनयोग का सर्वोत्तम विकल्प है

कई लोग विभिन्न शारीरिक और मानसिक बाधाओं के कारण यौनयोग नहीं कर पाते। उनके लिए यह विधि सर्वोत्तम है। संन्यासी योगी भी इसी विधि का प्रयोग करते थे। इससे वीर्य की शक्ति मस्तिष्क को आसानी से मिल जाती है।