कुंडलिनी उच्च रक्तचाप के खिलाफ- तनाव को रोकने और उसे दूर करने के लिए एक रहस्यमय कुंजी; भोजन योग

शरीर में कुंडलिनी प्रवाह के लिए दो प्रमुख चैनल्स होते हैं। एक शरीर के आगे के भाग में है। दूसरा शरीर के पिछले भाग में है। दोनों शरीर के बीचोंबीच गुजरकर शरीर को दो बराबर व सिमेट्रिक जैसे भागों में बांटती हुई नजर आती हैं। एक हिस्सा बायां भाग (स्त्री या यिन) है, और दूसरा दायाँ(पुरुष या यांग) है। इसीसे अर्धनारीश्वर भगवान की अवधारणा हुई है। उस शिव भगवान का बायां भाग स्त्री रूप व दायाँ भाग पुरुष रूप दिखाया गया है। दोनों चैनल्स सभी चक्रों को बीचोंबीच काटते हैं। दोनों सभी चक्रों पर आपस में जुड़े हैं, जिससे बहुत से लूप बनते हैं। सबसे बड़ा लूप तब बनता है जब दोनों चैनल्स मूलाधार और मस्तिष्क चक्र पर आपस में जुड़े होते हैं। वह लूप सभी चक्रों को कवर करता है। कुण्डलिनी लूप पर भ्रमण करती है। और भी बहुत सी नाड़ियाँ इन दो मुख्य चैनल्स से निकलती हैं, जो पूरे शरीर में फैली हुई हैं। हठयोग व ताओवाद में इनका विस्तार से वर्णन है।

शरीर के आगे के भाग का चैनेल

मतिष्क प्यार का उत्पादक और दिल प्यार का एम्पलीफायर

प्यार मस्तिष्क में पैदा होता है। वह खाना खाते समय दिल तक उतर जाता है। तभी तो कहा जाता है कि साथ मिलकर खाने से प्यार बढ़ता है। यह भी कहा जाता है कि दिमाग का रास्ता पेट से होकर गुजरता है। जब स्कूल के दिनों में मेरे दोस्त मेरी काल्पनिक गर्लफ्रैंड का टिफिन दिखाकर मुझे मजाक में खाना खाने के लिए तैयार होने के लिए कहते थे, तब मुझे प्यार की बड़ी तेज व आनन्दमयी अनुभूति होती थी। आनंद तो दिल में ही पैदा होता है, दिमाग में तो बोझ महसूस होता है। कुंडलिनी जागरण व आत्मज्ञान भी तभी होता है जब दिल दिमाग से जुड़ता है। केवल दिमाग में कुंडलिनी जागरण नहीं बल्कि पागलपन ही पैदा हो सकता है। इसीलिए जीभ को तालु से छुआकर कुण्डलिनी को दिमाग से उतारकर दिल तक लाने के लिए कहा जाता है। बेशक उसे दिल से ही लूप बनाकर दिमाग तक ऊपर नीचे घुमाया जाता रहे। इससे दिल और दिमाग आपस में जुड़ जाते हैं। तभी तो कहते हैं कि उसके हुस्न का नशा मेरे दिलोदिमाग पर छा गया, मतलब कि बहुत मजा आया।  

कुंडलिनी भोजन के साथ मुंह से नीचे उतरती है

सीधा सा मतलब है कि टिफिन के खयाल से मेरे मुंह के रस के साथ मेरी कुंडलिनी मेरे दिल तक उतर जाती थी। वह रस या भोजन के कण एक कंडक्टर ज्वाइंट-ग्रीस की तरह दोनों जबड़ों को जोड़ देते थे। उससे होकर कुंडलिनी दिल तक उतरती थी और आनंद व प्यार पैदा करती थी। वहां से कुंडलिनी नाभि चक्र तक उतरती थी, जो वहां खाना पचाकर मुझे शक्ति का एहसास देती थी। तभी तो कहते कि नाभि में गट्स होता है। मैं तो पानी घूंट से मुंह को पूरा भरकर मस्तिष्क व शरीर के बीच बने सबसे मजबूत जोड़ को अनुभव करता हूँ, और वह पानी की घूंट मुझे अमृत के समान लगती है।

भरपेट खाना खाने के बाद यौनसंबंध या सैक्स बनाने की इच्छा

अक्सर देखा जाता है कि ज्यादा खाना खा लेने के बाद सैक्स के लिए मन करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आगे वाले चैनेल से होती हुई कुंडलिनी नाभि चक्र से स्वाधिष्ठान चक्र तक उतर जाती है। कुंडलिनी वहीँ से पीछे मुड़कर ऊपर चढ़ जाती है। मूलाधार तो शरीर को बीचोंबीच विभाजित करने के लिए रखा गया है, ताकि कुंडलिनी चैनेल शरीर के बीचोंबीच सीधी रेखा में खुले। इसीलिए इसका ध्यान भी जरूरी है। हालांकि यह कुंडलिनी को पीछे से ऊपर मोड़ने का काम भी करता है। यह चक्र मलोत्सर्ग से भी जुड़ा है। तभी तो सेक्स के बाद हाजत की अनुभूति होती है और पेट साफ हो जाता है। वास्तव में कुंडलिनी स्वाधिष्ठान चक्र से नीचे उतरकर मूलाधार चक्र पर आ जाती है। दूसरे तरीके से, यदि मूलाधार पर वज्र शिखा का ध्यान किया जाए जो कि वास्तविकता है, तब दोनों सेक्सुअल चक्रों का ध्यान एक साथ हो जाता है और कुंडलिनी भी अच्छी तरह से पीछे मुड़ती है। कई लोग यह भी कहते हैं कि कुंडलिनी आज्ञा चक्र से ही पीछे मुड़कर नीचे उतर जाती है और सहस्रार तो मूलाधार की तरह सेंटरिंग व ध्यान करने के लिए ही है। पर मुझे तो कुंडलिनी को सहस्रार तक ले जाना अधिक आसान और कारगर लगता है। इसी तरह नाक के शिखर, आज्ञा चक्र और सिर पर बालों की चोटी रखने के स्थान से भी शरीर की सेंटरिंग होती है। इसी सेंटरिंग के लिए हिन्दुधर्म में सिर के पिछले भाग में दोनों तरफ के बीचोंबीच एक लंबे बालों की चोटी (शिखा) रखी जाती है।

विज्ञान फ्रंट चैनेल को ढंग से परिभाषित नहीं कर पाया है

मुझे लगता है कि फ्रंट चैनेल परस्पर स्पर्ष की संवेदना से बना है। यह स्पर्श की संवेदना सेल से सेल के कान्टेक्ट से आगे बढ़ती है। वैसे भी खाने का निवाला निगलते समय वह पहले गले के विशुद्धि चक्र में संवेदना पैदा करता है। फिर हृदय के अनाहत चक्र में और पेट में पहुंचने पर नाभि चक्र में संवेदना पैदा करता है। जब ज्यादा खाने से पेट नीचे लटक जाता है तब वह नीचे की ओर दबाव डालकर जननांग क्षेत्र को उत्तेजित करता है जिससे सैक्सुअल स्वाधिष्ठान चक्र क्रियाशील हो जाता है।

शरीर का मेरुदंड वाला चैनेल

सैक्स में सबसे ज्यादा आनंद होता है। जननांगों में सबसे तेज संवेदना पैदा होती है। यह भी सत्य है कि आनंद मस्तिष्क और दिल में एकसाथ तेज अनुभूति से पैदा होता है। इसका मतलब है कि जननांगों से संवेदना एकदम से मस्तिष्क व दिल तक जाती है। पहले वह सीधी मस्तिष्क तक जाती है। दिल तक तो उसे जीभ से उतारना पड़ता है। तांत्रिक संभोग के समय मुंह में भरपूर लार रस बनने से कुंडलिनी चालन/शक्ति चालन को अतिरिक्त सहायता प्राप्त होती है। इससे मस्तिष्क को भी कम थकान होती है। जननांगो से मस्तिष्क तक संवेदना को भेजने का रास्ता मेरुदंड ही है। विज्ञान से भी यह सिद्ध है कि मेरुदंड की नाड़ी जननांगों से सीधी मस्तिष्क तक जुड़ी होती है। विज्ञान के ही अनुसार , प्रत्येक चक्र भी मेरुदंड के माध्यम से ही मस्तिष्क से जुड़ा होता है।

संवेदना का बार-बार नाड़ी लूप में घूमना

जहाँ पहले से नाड़ी विद्यमान है, वहां पर संवेदना नाड़ी से चलती है। अन्य स्थानों पर सेल से सेल के कान्टेक्ट के थ्रू चलती है। मुझे तो लगता है मेरुदंड वाली संवेदना भी शुरु में स्पर्श के अनुभव से ही ऊपर चढ़ती है। इस तरह से नाड़ी लूप में कुण्डलिनी घूमने लगती है। यह नाड़ी लूप ताओवाद के माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट और कुण्डलिनी योग में एकसमान है।

यह नाड़ी लूप अनुभव के दायरे से विलुप्त हो गया, पर कुण्डलिनी अभ्यास से पुनः जागृत हो सकता है

आदमी केवल उन्हीं संवेदनाओं को अनुभव करने लगा , जिनकी उसे भौतिक रूप से सर्वाइव करने के लिए जरूरत थी। शरीर की अन्य संवेदनाओं को वह नजरअंदाज करने लगा। यह आध्यात्मिक नाड़ी लूप भी उन संवेदनाओं में शामिल था। इसलिए समय के साथ यह नाड़ी लूप अदृश्य हो गया। हालांकि अच्छी बात यह है कि लगातार के कुंडलिनी योग के अभ्यास से इस नाड़ी लूप को पुनः जागृत किया जा सकता है।

उलटी जीभ को पेलेट से छुआने पर काम आदि के बोझ से बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर एकदम से घट जाता है

यह मैंने पिछली पोस्ट में भी बताया था। मैं इस तकनीक की कारीगरी को कई बार आजमा चुका हूँ। अब इसका मैं उचित तरीका बताता हूँ। उलटी जीभ का तालु के साथ जितना पीछे हो सके, उतना पीछे फ्लैट और टाइट कांटेक्ट बनाएं। बेशक बहुत पीछे मोड़कर जीभ को परेशान न करें। बिल्कुल दांत के पीछे भी यदि जरा सी उल्टी जीभ लग जाए तो बहुत अच्छा कान्टेक्ट पॉइंट बनता है। इस उल्टे स्पर्श के कारण काउंटर करेंट सिस्टम चालू हो जाता है और कुंडलिनी नीचे उतर जाती है। यह काउंटर करेंट सिस्टम ऐसे ही है जैसे गर्म दूध के गिलास को ठंडे पानी में चारों ओर घुमाओ और ठंडे पानी को विपरीत दिशा में घुमाओ तो दूध एकदम से ठंडा हो जाता है। दूध की गर्मी पानी में एकदम चली जाती है। ऐसा लगता है कि मस्तिष्क पूरे शरीर में फ़ैल गया है। एकबार मुझे गुस्सा आ रहा था। उसी समय मैंने अपनी जीभ तालु से लगाई। मेरा मस्तिष्क शांत हो गया और उसकी एनर्जी हृदय चक्र तक उतर कर दोनों बाजुओं में फैल गई। मेरी बाजुएं लड़ाई के लिए तैयार हो गईं डिफेंसिव मोड में ही, क्योंकि मेरा मस्तिष्क शान्त था और लड़ाई शुरु नहीं करना चाहता था। इसीलिए सच्चे योगी व कुंफू विद्वान डिफेंसिव होते हैं, ऑफेंसिव नहीं। ऐसा उपरोक्त बाजू वाला ब्रांचिंग नाड़ी सिस्टम आगे वाले चैनेल से निकलकर पूरे शरीर में फैला है। ऐसी कल्पना करें कि दिमाग जीभ के माध्यम से गले से जुड़ गया है। वैसे भी गले में अकड़न सी पैदा होगी। मस्तिष्क के बोझ के नीचे उतरने से वह अकड़न विशुद्धि चक्र पर ज्यादा बढ़ जाएगी। थोड़ी देर बाद वह बोझ हृदय चक्र तक पहुंच जाएगा। थोड़ी अधिक देर बाद वह नाभि चक्र तक पहुंच जाता है। ऐसा साफ महसूस होता है कि कोई लहर जैसी दिमाग से नीचे उतरकर नाभि में विलीन हो गई। उसके साथ ही मन एकदम से खाली और हल्का हो जाता है। क्रोध आदि मन के विकार भी शांत हो जाते हैं, क्योंकि ये मन के बोझ से ही पैदा होते हैं। रक्तचाप भी एकदम से घटा हुआ महसूस होता है। कुंडलिनी भी आनंद के साथ नाभि चक्र पर चमकने लगती है। इसीलिए नाभि को सिंक या समुद्र भी कहते हैं, क्योंकि यह आदमी का सारा बोझ सोख लेती है।

जीभ के पिछले हिस्से पर टिप से शुरु होकर जीभ के बीचोंबीच जाती हुई गले के बीच में उतरकर आगे के सभी चक्रों को कवर करने वाली एक पतली नस जैसी महसूस होती है। उसके ऊपर कुंडलिनी चलती है। वह नस ही नरम तालु से टच होने पर कुंडलिनी या अन्य संवेदनाओं या बोझ को दिमाग से नीचे उतारती है। माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट में कुंडलिनी को नहीं अपितु सीधे एनर्जी या संवेदना या बोझ को नाड़ी चैनलों में घुमाया जाता है।

तालाबंदी लोकडाऊन का उल्लंघन करके पलायन कर रहे लोगों का कुंडलिनी से सम्बंध

भोजन के बिना आदमी कई दिनों तक जिंदा रह सकता है। वैसे भी एक बार में ही यदि बहुत सारा खाना खा लिया जाए, तो दो दिन तक दुबारा खाना खाने की जरूरत न पड़े। मेरे एक जाने-पहचाने शख्स थे जो अक्सर एक बार में ही 5 आदमियों का खाना खा लेते थे। विशेषकर वह ऐसा शादी आदि समारोहों में करते थे, जहाँ अच्छा और तला भुना खाना बनता था। फिर वे 5 दिन तक बिना कुछ खाए ही कमरे में सोए रहते थे, और बार-2 पानी पीते रहते थे। वे हंसते भी बहुत थे और पूरा खुलकर हँसते थे। साथ में वे पूरी तरह से मस्त रहते थे। इससे उन्हें खाना पचाने में मदद मिलती थी। इसी तरह, लोकडाऊन की वजह से काम न करने से तो तीन दिन तक एक भारी भोजन से गुजारा चल सकता है। पर भोजन से शरीर के लिए केवल पोषक तत्त्व ही नहीं मिलते, बल्कि मन के बोझ को कम करने वाला व आनन्द प्रदान करने वाला कुंडलिनी लाभ भी मिलता है। इसी कुंडलिनी लाभ के लिए लोग खासकर मजदूर नॉवेल कोरोना (कोविड-19) वायरस लोकडाऊन का उल्लंघन करके घर भाग रहे हैं, भूख से नहीं। वैसे भी अधिकांश मामलों में कैम्पों में मुफ्त का खाना मिल ही रहा है। यदि भोजन केवल शरीर बनाने के लिए चाहिए होता, तब तो मोटे आदमी कई-2 दिनों तक खाना न खाया करते।

कुंडलिनी दोनों दिशाओं में प्रवाहित हो सकती है

सीखने के समय ताओवाद में आगे के फ्रंट चैनल में कुंडलिनी को ऊपर की तरफ चलाया जाता है। मैंने भी एकबार तांत्रिक प्रक्रिया के दौरान फ्रंट चैनेल से ऊपर जाते हुए महसूस किया था। वह एक हेलीकॉप्टर की तरह बड़े सुंदर ढंग से और स्पष्ट रूप से ऊपर उठी थी। उसने सेक्सुअल चक्रों से मस्तिष्क तक पहुंचने में लगभग 5-10 सेकंड का समय लिया था। कुंडलिनी संवेदना एक तरंग की तरह ऊपर उठी। वह जिस क्षेत्र से गुजरी, उस क्षेत्र को प्रफुल्लित करते गई। निचले वाला क्षेत्र सिकुड़ता गया। मतलब कि जैसे ही वह जननांगों से ऊपर उठी, वे एकदम से सिकुड़ गए। पहले वे पूरी तरह से प्रसारित थे।

यद्यपि सबसे सुंदर अनुभूति तब होती है जब कुंडलिनी फ्रंट चैनल से नीचे उतरती है और मूलाधार से वापिस मुड़कर बैक चैनल से ऊपर चढ़ती है। जब एनर्जी मस्तिष्क में पहुंचती है, तब चेहरे की त्वचा पर ऊपर की तरफ खिंचाव लगता है और आंखें भिंच जाती हैं। कानों से ऊपर मस्तिष्क में घुसती हुई सरसराहट या गशिंग फ्लो के जैसी अनुभूति होती है। हो सकता है कि वह खिंचाव के दबाव में रक्त प्रवाह हो। फिर उस गशिंग से भरे दबाव को जीभ से नीचे उतारा जाता है। नीचे आते हुए वह गशिंग कुंडलिनी में बदल जाती हो। मूलाधार से वह फिर ऊपर मुड़ जाती है। रीढ़ की हड्डी का एक फन फैलाए शेषनाग के अनुभव से वह कुंडलिनी संवेदना मस्तिष्क तक पहुंच जाती है। नाग और जीभ का वैसे भी आपस में गहरा अंतरसंबंध है। फिर वही गशिंग और फिर वही प्रोसेस बार बार चलता रहता है।

कुंडलिनी के लिए यौनयोग के विकल्प के रूप में श्वास की विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड या कुंडलिनी पंप); कोरोना काल में तो सही ढंग की व भरपूर साँसें ली ही जानी चाहिए, क्योंकि किसको पता कि कोरोना कब किसकी साँसें छीन ले 

योग में श्वास-प्रश्वास का सर्वाधिक महत्त्व है। सही ढंग से श्वास लेने पर ही योग का अधिकांश सफर तय हो जाता है। तभी तो कहते हैं कि साँस को जीतने से मन पर भी विजय मिल जाती है। सही तरीके की साँस के साथ-2 कुंडलिनी खुद ही चलती रहती है। इसलिए साँस को चक्रों पर घुमाने से कुंडलिनी स्वयं ही घूमने लगती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि ही श्वासयोग का मुख्य भाग है

विपरीतक्रम श्वास विधि को सीखने के लिए सबसे पहले पेट से साँस लेना सीखा जाता है। इसे डायाफ्रेगमेटिक डीप ब्रीथिंग भी कहते हैं। इसमें साँस अंदर भरने पर पेट बाहर की तरफ फूलता है। सांस बाहर छोड़ने पर पेट अंदर की ओर सिकुड़ता है। यदि इससे विपरीत क्रम में पेट की गति हो, तो वह साँस छाती से मानी जाती है। छाती से ली गई साँस से मन चंचल रहता है, और शरीर को भरपूर ऑक्सीजन भी नहीं मिलती।

विपरीतक्रम श्वास विधि में साँस शरीर से बाहर नहीं छोड़ी जाती

भौतिक रूप से यह बात अजीब लग सकती है, क्योंकि साँस तो बाहर निकलेगी ही। परंतु आध्यात्मिक रूप से यह सत्य है। बाहर जाने वाली साँस की सूक्ष्म ध्यानमयी शक्ति को पेट से नीचे की ओर धकेला जाता है। उससे नाभि के नीचे व स्वाधिष्ठान चक्र के आसपास एक संवेदना जैसी पैदा होती है। वह संवेदना वीर्य-निर्माण की प्रक्रिया को उत्तेजित करती है।

अंदर भरी जाने वाली साँस वास्तव में रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ाई जाती है

बाहर जाने वाली साँस से स्वाधिष्ठान चक्र पर वीर्य-संवेदना का बिंदु बनता है। वह संवेदना बाहर छोड़ी गई साँस से पीठ वाले स्वाधिष्ठान चक्र से होती हुई रीढ़ की हड्डी में ऊपर की तरफ चढ़ती है। वह सभी चक्रों से होते हुए सहस्रार तक पहुंच जाती है। उस संवेदना के साथ वीर्य की सूक्ष्म  शक्ति व कुंडलिनी भी होती है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि वास्तव में शरीर के अंदर नीचे की तरफ जाने वाली हवा ऊपर की तरफ जाती है, और ऊपर की तरफ जाने वाली हवा नीचे की तरफ जाती है। इसीलिए इसे विपरीतक्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड) कहते हैं।

मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक फैले हुए शेषनाग के ध्यान से विपरीत-क्रम श्वास विधि आसान हो जाती है

शेषनाग वाली मेरी पिछली पोस्टों के अनुसार शेषनाग ने मूलाधार व स्वाधिष्ठान के ऊपर अपनी कुंडली लगाई हुई है। वह रीढ़ की हड्डी से होकर ऊपर उठा हुआ है, और मस्तिष्क में उसके एक हजार फन हैं। जब हम पेट से साँस भरते हैं, तो वह पीछे की ओर तन कर सीधा व कड़ा हो जाता है, तथा फन उठा लेता है। इसका अर्थ है कि उसके शरीर में साँस ऊपर की ओर चढ़ कर उसके फन तक पहुंची। इससे पूर्वोक्त संवेदना की शक्ति ऊपर की तरफ चली जाती है। जब हम साँस छोड़ते हैं, तब वह आगे की ओर ढीला हो जाता है, और अपना फन नीचे झुका लेता है। ऐसा लगता है कि उसने फुफकार के साथ साँस नीचे की तरफ छोड़ी। साथ में पेट भी अंदर की ओर सिकुड़ कर नीचे की ओर दबाव डालता है। इन सबसे पूर्वोक्त स्वाधिष्ठान बिंदु पर संवेदना बनती है।

विपरीतक्रम श्वास विधि यौनयोग का सर्वोत्तम विकल्प है

कई लोग विभिन्न शारीरिक और मानसिक बाधाओं के कारण यौनयोग नहीं कर पाते। उनके लिए यह विधि सर्वोत्तम है। संन्यासी योगी भी इसी विधि का प्रयोग करते थे। इससे वीर्य की शक्ति मस्तिष्क को आसानी से मिल जाती है।

कुण्डलिनी ही सहस्रार चक्र से नीचे झरने वाले अमृत के रूप में कोरोना (कोविड-19) के खिलाफ काम कर सकती है

यह पोस्ट चिकित्सा विज्ञान का विकल्प नहीं है, अपितु उसकी अनुपूरक है। कृपया कोरोना से लड़ने के लिए डाक्टर की सलाह का पालन अवश्य करते रहें।

मस्तिष्क ही हमारे शरीर का बोस है। वह पूरे शरीर के सुचारु संचालन के लिए पूरे शरीर में सन्देश प्रसारित करता रहता है। कुछ सन्देश होरमोन के रूप में होते हैं, तो कुछ सन्देश नर्व सिग्नल के रूप में होते हैं।

हम उन संदेशों को महसूस नहीं कर सकते, इसलिए हम उन्हें मस्तिष्क में पैदा करके वहां से पूरे शरीर की तरफ बलपूर्वक नहीं धकेल सकते। जिस चीज को हम मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं, हम उसे ही शरीर की तरफ रवाना कर सकते हैं। हम विचारों को मस्तिष्क में महसूस कर सकते हैं। हम उन्हें शरीर के विभिन्न चक्रों तक ध्यान से उतार सकते हैं। इससे भी मस्तिष्क में संदेशवाहक रसायनों के निर्माण को बल मिलता है, जो पूरे शरीर में प्रसारित हो जाते हैं। परन्तु यह बल बहुत कम होता है, क्योंकि कभी-कभार उठने वाले व बदलते विचारों की चमक धुंधली होती है। साथ में, भिन्न-२ विचारों का सहारा लेने से आदमी का मन पैरानोइक या विचलित भी रह सकता है। इस समस्या का हल कुण्डलिनी में निहित है। कुण्डलिनी एकमात्र इष्ट की छवि है, जो रोज के अभ्यास से बहुत चमकीली बनी होती है। उसकी तीव्र चमक से मस्तिष्क में तेजी से रसायन बनते हैं। जब उस कुण्डलिनी को विभिन्न चक्रों तक उतारा जाता है, तब साथ में वे सभी रसायन भी वहां पहुँच जाते हैं, जो शरीर की बहुत मदद करते हैं। एकमात्र छवि का सहारा लेने से आदमी का मन भी विचलित नहीं होता। साथ में, कुण्डलिनी से आध्यात्मिक उन्नति भी प्राप्त होती है, जिससे मुक्ति मिलती है।

कुण्डलिनी ही सहस्रार से झरने वाला अमृत (एम्ब्रोसिया) है

योग शास्त्रों में लिखा है कि चन्द्रमा से पैदा हुए अमृत को सूर्य खाता है। सहस्रार ही वह चंद्रमा है। उसे बिंदु भी कहते हैं। विशुद्धि चक्र सूर्य है। कुण्डलिनी को ही अमृत कहा गया है, क्योंकि वही प्रकाश, आनंद व मुक्ति प्रदान करती है। साथ में, संभवतः कुण्डलिनी कोरोना जैसी प्राणघातक बीमारियों से भी हमारी रक्षा करती है, जैसा कि आगे बताया गया है।

योग साधना में भी यह सिखाया जाता है कि कुण्डलिनी को मूलाधार (शक्ति-उत्पादक चक्र) से उठाकर पीठ (महान नाग) के रास्ते से सहस्रार (नाग का फण) तक उठाना चाहिए। फिर उसे आगे के सभी चक्रों से होकर धीरे-२ नीचे उतारना चाहिए। इसका भी यही अर्थ है।

कुण्डलिनी को सहस्रार से नीचे उतारने के लिए विभिन्न रेखा-चित्रों का सहारा लिया जा सकता है

सिर-गर्दन की बाऊंडरी से बाहर निकलने वाली तिरछी-खड़ी रेखा गलती से बनी है

कुण्डलिनी को इन रेखा-चित्रों की रेखाओं पर घुमाया जाता है, जिससे वह उत्तरोत्तर चमकती जाती है।

कुण्डलिनी को नाग के माध्यम से भी नीचे उतारा जा सकता है

विशुद्धि चक्र से नीचे के चक्रों तक कुण्डलिनी को नाग की सहायता से भी पहुँचाया जा सकता है। विशुद्धि चक्र तक गर्दन सीधी रहती है, परन्तु उसके नीचे के चक्रों के लिए गर्दन को आगे को मोड़कर ठोड़ी को छाती से लगाया जाता है। इसे जालंधर बंध (चिन लौक) कहते हैं। इसके साथ कल्पना की जा सकती है कि नाग अपना फण नीचे करके अनाहत चक्र का चुम्बन कर रहा है। इससे सहस्रार व अनाहत चक्र कुण्डलिनी के पुल से आपस में जुड़ जाते हैं। इसी तरह, सहस्रार और मणिपुर चक्र; सहस्रार और स्वाधिष्ठान चक्र; और सहस्रार व मूलाधार चक्र भी आपस में जुड़ जाते हैं। इससे मस्तिष्क के सारे जैव-रसायन भी कुण्डलिनी के साथ सभी चक्रों पर पहुँच जाते हैं, जिससे शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

कुण्डलिनी से कोरोना के खिलाफ लड़ने में मदद मिल सकती है

पुराने जमाने में एंटीबायोटिकस व वैक्सीन नहीं होती थीं। फिर भी लोग स्वस्थ रहते थे। उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए कुण्डलिनी काफी हद तक जिम्मेदार थी, जो उनके दैनिक जीवन में शामिल होती थी। योगी तो कभी बीमार होते ही नहीं थे।

पुराने जमाने में ही अधिकाँश जानें श्वास-रोगों से जाती थीं। कोरोना वायरस भी श्वास रोग पैदा करता है। श्वास रोग गले के रोगों से शुरू होते हैं। विशुद्धि चक्र गले में ही स्थित है। अमृत का झरना भी सहस्रार से विशुद्धि चक्र तक ही मुख्य रूप से दिखाया जाता है। सीधी सी बात है कि उससे गले के रोग ठीक होते थे, जिससे योगियों की जान बच जाती थी। तभी कुण्डलिनी को अमृत अर्थात जान बचाने वाला कहा गया है।

कुण्डलिनी ही देवी-देवताओं के रूप में रोगों से हमारी रक्षा करती है

पुराने जमाने में विशेष रोग से बचाव के लिए एक विशेष देवता का मंदिर होता था, जैसे कि बच्चों के छोटी माता रोग (small pox) से बचाव के लिए शीतला माता। उस देवी माता का मंदिर बहते पानी के पास, ठंडी जगह पर होता था। मतलब है कि रोग के बुखार को उस ठंडी जगह से ठंडक मिलती थी। आज भी ऐसे बहुत से मंदिर हाई। वास्तव में उन देवी-देवताओं की पूजा से कुण्डलिनी संपुष्ट होती है, जो हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है।    

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कुण्डलिनी ही तांत्रिक सैक्सुअल योग के माध्यम से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियों; चक्रों, और अद्वैत को उत्पन्न करती है।

सभी मित्रों को शिवरात्रि पर्व की बहुत-2 बधाइयां । यह तांत्रिक पोस्ट तंत्र के आदिदेव भगवान शिव व तंत्र गुरु ओशो को समर्पित है।

प्रमाणित किया जाता है कि इस तांत्रिक वैब पोस्ट में किसी की भावना को ठेस पहुंचाने का प्रयास नहीं किया गया है। इसमें तांत्रिक वैबसाइट के अपने स्वतंत्र विचार जनहित में प्रस्तुत किए गए हैं। हम यौनिहिंसा की पुरजोर खिलाफत करते हैं।

कुण्डलिनी ही सबकुछ है। उसी का ध्यान जब शरीर के विशेष बिन्दुओं पर किया जाता है, तब वे बिंदु चक्र कहलाते हैं। उसी को गति देने से जब काल्पनिक मार्ग  बनते हैं, तब वे भी नाड़ियाँ कहलाते  हैं। उसी का ध्यान करने से अद्वैत स्वयं उत्पन्न होता है। इसी तरह अद्वैत का ध्यान करने से कुण्डलिनी स्वयं ही मन में प्रकट हो जाती है।

हमारी रीढ़ की हड्डी में दो आपस में गुंथे हुए सांप बहुत से धर्मों में दिखाए गए हैं। बीच में एक सीधी नाड़ी होती है।

आपस में गुंथे हुए दो नाग यब-युम आसन में जुड़े हुए दो तांत्रिक प्रेमी हैं

जैसा कि आप नीचे दिए गए चित्रों में देख पा रहे हैं। एक नाग पुरुष है, और दूसरा नाग स्त्री है। यह पहले भी हमने बताया है कि मनुष्य का समग्र रूप उसके तंत्रिका तंत्र में ही है, और वह फण उठाए हुए नाग की शक्ल से मिलता-जुलता है। हमारे तंत्रिका  तंत्र का मुख्य भाग मस्तिष्क समेत पीठ (मेरुदंड) में  होता है। इसीलिए हमारी पीठ फण उठाए नाग की तरह दिखती है। क्योंकि कुण्डलिनी (संवेदना) इसी नाग के शरीर (तंत्रिका तंत्र) पर चलती है, इसलिए जिस किसी और रास्ते से भी जब  कुण्डलिनी चलती है, तो अधिकांशतः उस रास्ते को भी नाग का रूप दिया जाता है। वास्तव में  एक नाग एक तांत्रिक प्रेमी की पीठ को रिप्रेसेन्ट करता है, और दूसरा नाग दूसरे तांत्रिक प्रेमी की पीठ को। पुरुष प्रेमी स्त्री के मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी का ध्यान शुरू करता है।  फिर वह कुण्डलिनी को सीधा पीछे लाकर अपने मूलाधार पर स्थापित करता है। इस तरह से दोनों  प्रेमियों के मूलाधार आपस में जुड़ जाते हैं, और एक केन्द्रीय नाड़ी का शाक्तिशाली मूलाधार चक्र बनता है, जिसे चित्र में क्रोस के चिन्ह से मार्क किया गया है। वह केन्द्रीय नाड़ी बीच वाले सीधे दंड के रूप में  दिखाई  गई है, जिसे सुषुम्ना कहते हैं। पुरुष नाग को पिंगला, व स्त्री नाग को इड़ा कहा गया है। फिर पुरुष प्रेमी कुण्डलिनी को ऊपर चढ़ा कर  अपने स्वाधिष्ठान चक्र पर स्थापित करता है। वहां  से वह उसे सीधा आगे ले जाकर स्त्री के स्वाधिष्ठान पर स्थापित करता है। इस तरह से सुषुम्ना का स्वाधिष्ठान भी क्रियाशील  हो जाता है। फिर वह उसे स्त्री के स्वाधिष्ठान से ऊपर चढ़ा कर उसीके मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे इड़ा का मणिपुर सक्रिय हो जाता है। वहां से उसे सीधा पीछे ले जाकर अपने मणिपुर चक्र पर स्थापित करता है। उससे पिंगला का मणिपुर भी सक्रिय हो जाता है। दोनों नाड़ियों के मणिपुर चक्रों के एकसाथ क्रियाशील होने से सुषुम्ना का मणिपुर चक्र स्वयं ही क्रियाशील हो जाता है। इस तरह से यह क्रिया ऐसी ही सहस्रार चक्र तक चलती है। स्त्री प्रेमी भी इसी तरह कुण्डलिनी को चलाती है। इस तरह से दो नाग आपस में गुंथे हुए और ऊपर की ओर जाते हुए प्रतीत होते हैं, तथा सुषुम्ना के माध्यम से सहस्रार तक पहुँच जाते हैं।

कैड्यूसियस का चिन्ह (symbol of caduceus) भी तांत्रिक यौनयोग को ही रेखांकित करता है

इस चिन्ह में दो सांप आपस में इसी तरह गुंथे हुए होते हैं। उनके बीच में एक सीधा स्तम्भ होता है, जिसके शीर्ष पर पंख लगे होते हैं। वास्तव में वे पंख कुण्डलिनी के सहस्रार की तरफ जाने का इशारा करते हैं। वैसे भी जागरण के समय कुण्डलिनी फरफराहट के साथ व ऊपर की ओर भारी दबाव के साथ उड़ती हुई महसूस होती है। वह स्तम्भ नीचे की तरफ टेपर करता है। इसका अर्थ है कि ऊपर चढ़ते हुए कुण्डलिनी  अधिक शक्तिशाली होती जाती है।

अपने ही शरीर में दो लिपटे हुए नाग अपने ही शरीर के तंत्रिका तंत्र के सिम्पैथेटिक व पैरासिम्पैथेटिक भागों की संतुलित हिस्सेदारी को भी इंगित करते हैं

इड़ा को पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह ल्यूनर, शांत, पेसिव, व फैमिनाइन है। पिंगला नाड़ी को सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम कह सकते हैं। वह सोलर, भड़कीला, एक्टिव, व मैस्कुलाइन है। जब दोनों सिस्टम बराबर मात्रा में आपस में मिले हुए होते हैं, तब जीवन में संतुलन व अद्वैत छा जाता है। वैसी स्थिति में भी कुण्डलिनी विकसित होने लगती है, क्योंकि हमने पहले भी कहा है कि अद्वैत के साथ कुण्डलिनी हमेशा ही रहती है। 

(केवल प्रतीकात्मक चित्र)
(केवल प्रतीकात्मक चित्र)

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कुण्डलिनी से रचनात्मक संकल्पों की उत्पत्ति ही भगवान् नारायण (विष्णु) के नाभि कमल से ब्रम्हा (ब्रम्हदेव) की उत्पत्ति बताई गई है

यह प्रमाणित किया जाता है कि हम किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं।

दोस्तों, इस हफ्ते मैं कुछ राईटर-ब्लोक को महसूस कर रहा था। फिर हफ्ता ख़त्म होने को आते ही मुझे अपनी मानवीय जिम्मेदारी का अहसास हुआ। हम सभी को अच्छी, सच्ची और वैज्ञानिक बातों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। यह हम सभी का फर्ज है। हिन्दुवाद कोई धर्म नहीं है। यह एक शुद्ध विज्ञान है। यह मानवतावादी विज्ञान है। यह कुण्डलिनी विज्ञान है। यह आध्यात्मिक मनोविज्ञान है। क्योंकि शरीर और संसार मन के ही अधीन हैं, इससे सिद्ध होता है कि हिन्दुवाद एक भौतिक विज्ञान भी है। इसकी अनेक बातें विज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी हैं। सैंकड़ों सालों से विभिन्न कट्टर धर्मवादियों व अधर्मवादियों द्वारा इसे नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। आज तो वे इसे जड़ से उखाड़ने के लिए चारों और से एकजुट हो गए हैं। इस्लामिक राष्ट्र बनने का तेजी से बढ़ रहा ख़्वाब इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। इसी तरह, विभिन्न धर्मों (इसाई धर्म समेत) द्वारा जबरदस्ती या छलपूर्वक धर्मांतरण इसका दूसरा उदाहरण है। भारत में ये दोनों प्रकार के हिन्दूविरोधी वैचारिक अभियान (एजेंडे) हाल के वर्षों में तेजी से बढ़े हैं। हाल ही में शरजिल इमाम (जेएनयू में आईआईटी ग्रेजुएट और पीएचडी स्कोलर) ने अपने भड़काऊ भाषण के बाद पुलिस के सामने बिना पछतावे के ये बातें कबूली भी हैं।  यदि समय रहते हुए हमने हिन्दुवाद को विज्ञान के साथ प्रस्तुत नहीं किया, तो हमारी आने वाली पीढियां इससे वंचित रह सकती हैं।

हिन्दुवाद का सभी कुछ कुण्डलिनी आधारित है। सारा हिन्दुवाद कुण्डलिनी के चारों और घूमता है। कुण्डलिनी ही इसकी धुरी में है। कुण्डलिनी की प्राप्ति के लिए ही पूरा हिन्दुवाद समर्पित है। इसी प्रकार का एक वैज्ञानिक तथ्य है, कुण्डलिनी और ब्रह्मा-विष्णु के बीच का वैज्ञानिक अंतर्संबंध। इसे हम इस पोस्ट में वर्णित करेंगे।

भगवान् विष्णु/नारायण ही कुण्डलिनी के रूप में हैं

जैसे कि मैंने पूर्व में भी वर्णित किया है कि जैसे भगवान् विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं, उसी प्रकार कुण्डलिनी भी तंत्रिका तंत्र (शेषनाग जैसी आकृति वाले) में विराजमान रहती है। नारायण ही कुण्डलिनी हैं, कुण्डलिनी ही नारायण है। दोनों एक ही हैं। अब चाहे उसे सुवर का, मछली का, कछुए का, देवता का, प्रेमी का, गुरु का आदि किसी का भी रूप दिया जाए। वैसे भी नारायण ने ऐसे अनेकों रूपों में अवतार लिया भी है।

रचनात्मक विचार व संकल्प ही भगवान् ब्रह्मा/ब्रह्मदेव के रूप में हैं

यह वेदों में साफ लिखा है कि सृष्टि के मन को ही ब्रह्मा कहते हैं। वह रचनात्मक समष्टि-मन/ब्रह्मांडीय मन, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है, वही ब्रह्मा है।

कुण्डलिनी से रचनात्मक विचार व संकल्प उत्पन्न होते हैं

जो विचार क्रिया के रूप में प्रकट हो जाएं, वे संकल्प कहलाते हैं। शक्तिशाली विचार को ही संकल्प कहते हैं। एक अकेला व कार्यकारी विचार तभी संकल्प बन सकता है, जब मन में अन्य विचारों का शोरशराबा न हो। मतलब कि जब मन शांत हो। तब मन की शक्ति उस अकेले विचार को लगती है, जिससे वह पुष्ट होकर संकल्प बन जाता है, और रचनात्मक काम को पैदा करता है। मन की शान्ति कुण्डलिनी से ही प्राप्त होती है। यह देखा भी गया है कि बहुत से लोगों की कामयाबी के पीछे कुण्डलिनी ही होती है। किसी गुरु, प्रेमी आदि से प्रेरणा लेकर कामयाबी प्राप्त करने का भी यही अर्थ है कि गुरु आदि की छवि आदमी के मन में लगातार बसी रही। वह चिरस्थायी मानसिक छवि ही तो कुण्डलिनी है। इसका मतलब है कि प्रेरणा से कामयाबी भी कुण्डलिनी के माध्यम से ही मिलती है। ऐसा मैंने खुद अनुभव किया है। वैज्ञानिक तौर से भी सिद्ध हो गया है कि योग (कुण्डलिनी) रचनात्मकता को बढ़ाता है।

कुण्डलिनी की नाभि में ही विचार व संकल्प पैदा होते हैं

नाभि केंद्र को कहते हैं। कुण्डलिनी के ध्यान के साथ विविध नए-पुराने विचार प्रकट होते हैं। उनमें से फालतू विचार शांत हो जाते हैं। उससे लाभदायक विचार ताकतवर बनकर संकल्प बन जाते हैं। इसी प्रकार भगवान् नारायण की नाभि से भगवान् ब्रह्मा (संकल्प-रूप) उत्पन्न होते हुए बताए गए हैं। जब मैं रचनात्मक कामों में व्यस्त रहता था, तब मुझे अपनी कुण्डलिनी से बहुत सहयोग मिलता था। इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि पुराणों में जो भगवान् विष्णु की नाभि से ब्रह्मा की उत्पत्ति बताई गई है, वह कुण्डलिनी से उत्पन्न रचनात्मकता की ही व्याख्या की गई है। ऐसा दोनों मामलों में होता है, क्योंकि जो हमारे शरीर में घटित हो रहा  है, वह सभी कुछ ब्रह्माण्ड में भी वैसा ही घटित हो रहा है।

only indicative image (केवल संकेतात्मक चित्र)

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ਇਸ ਪੋਸਟ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ (ਕੁੰਡਲਨੀ ਤੋਂ ਰਚਨਾਤਮਕ ਮਤਿਆਂ ਦੀ ਪੈਦਾਈਸ੍ਹ ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ (ਵਿਸ਼ਨੂੰ) ਦੇ ਨਾਭੀ ਕੰਵਲ ਤੋਂ ਬ੍ਰਹਮਾ (ਬ੍ਰਹਮਦੇਵਾ) ਦੀ ਪੈਦਾਈਸ੍ਹ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਦੱਸੀ ਗਈ ਹੈ।)

कुण्डलिनी एक नाग की तरह

मित्रो, कुछ हफ्ते पहले मुझे एक प्राचीन नाग-मंदिर में सपरिवार जाने का मौक़ा मिला। वह काफी मशहूर है, और वहां पूरे श्रावण के महीने भर मेला लगता है। उस के गर्भगृह में मूर्तियों आदि के बारे में तो याद नहीं, पर वहां पर नाग का विशाल, रंगीन व दीवार पर पेंट किया गया चित्र दिल को छूने वाला था। वह शेषनाग की तरह था, जिस पर भगवान् नारायण शयन करते हैं। उसके बहुत से फण थे। मुझे वह कुछ जानी-पहचानी आकृति लग रही थी। वहां पर मेरी कुण्डलिनी भी तेजी से चमकने लगी, जिससे मुझे आनंद आने लगा। वह मुझे कुछ रहस्यात्मक पहेली लग रही थी, जिसे मेरा मन अनायास ही सुलझाने का प्रयास करने लगा।

नाग अन्धकार का प्रतीक  

मेरा पहला विश्लेषण यह था कि नारायण (भगवान) आम आदमी को अन्धकार स्वरूप दिखते हैं। माया के भ्रम के कारण उन्हें उनका प्रकाश नजर नहीं आता। इसीलिए अन्धकार के प्रतीक स्वारूप नाग को उनके साथ दिखाया गया है। फिर भी इस विश्लेषण से मैं पूरा संतुष्ट नहीं हुआ।

नाग कुण्डलिनी के प्रतीक के रूप में

मैं योगाइंडियाडॉटकोम की एक पोस्ट पढ़ रहा था। उसमें कुछ लिखा था, जिसका आशय मैंने यह समझा कि मूलाधार पर नाग साढे तीन चक्र/वलय लगाकर स्थित होता है। वह अपनी पूंछ को मुंह से दबा कर रखता है। जब कुण्डलिनी शक्ति उन वलयों से गुजारी जाती है, तब वह सीधा ऊपर उठकर मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक पहुँच जाता है। उसके साथ कुंडलिनी शक्ति भी होती है।

मैंने इससे निष्कर्ष निकाला कि हमारा नाड़ी तंत्र एक फण फैला कर उठे हुए नाग की तरह दिखता है, और उसी की तरह काम करता है। वैज्ञानिक तौर पर, नाड़ियों में संवेदना भी नाग की तरह लहरदार ढंग से ट्रेवल करती है। वज्र उस नाग की पूंछ है। उसे आधा वलय भी कह सकते हैं। अंडकोष वाला क्षेत्र पहला वलय/कुंडल है। उसके बाहर दूसरा घेरा मांस व तंतुओं का है। तीसरा घेरा हड्डी का है, जो मेरुदंड से जुड़ा होता है। जैसे ऊपर उठे हुए नाग की पीठ के निचले हिस्से में अन्दर की दिशा में एक बैंड/मोड़ होता है, वैसे ही हमारी पीठ के निचले हिस्से (नाभि के बिलकुल अपोजिट) में होता है। उसके बाद दोनों बाहर की ओर उभरते जाते हैं, और फिर दोनों में सिर का मोड़ आता है, जो लगभग एकसमान होता है। नाग के कई सिर इसलिए दिखाए गए हैं, क्योंकि हमारा सिर मेरुदंड से कई गुना चौड़ा व मोटा होता है, तुलनात्मक रूप से।

हमारा नाड़ी तंत्र एक नाग की तरह

रीढ़ की हड्डी के अन्दर नाड़ी को भी हम नाग की तरह अनुभव कर सकते हैं। दोनों में समानता मिलेगी। नाड़ियाँ भी  नाग की तरह या रस्सी की  तरह ही होती हैं। वज्र की नाड़ी को नाग की पूंछ समझो। वाही आधा चक्र भी हुई। स्वाधिष्ठान चक्र का सम्वेदना क्षेत्र (जहाँ कुण्डलिनी का ध्यान होता है) नाग का पहला चक्र/कुंडल/घेरा है। आसपास के क्षेत्र की नाड़ियाँ भी वहां जुड़ती हैं, वही नाग का पहला घेरा है। दूसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ वह नाड़ी सैक्रल प्लेक्सस/नाड़ियों के जाल से जुड़ती है। तीसरा घेरा उसे कह सकते हैं, जहाँ सैक्रल प्लेक्सस स्पाईनल कोर्ड से मिलती है। वहां पर वह नाग/स्पाईनल कोर्ड ऊपर को खड़ा हो जाता है, और मोटा भी हो जाता है। पीठ के लम्बर क्षेत्र में उसमें पेट की तरफ गड्ढे वाला एक मोड़ आता है। अगला मोड़ ऊपर आता है, सिर के नजदीक। सिर के अन्दर का नाड़ी-पुंज उस सांप के अनेक फण हैं, जो कि स्पाईनल कोर्ड/नाग-शरीर से जुड़े होते हैं।

हमारे शरीर के कुण्डलिनी चक्र भगवान शेषनाग के शरीर के मुख्य बिंदु

इतना गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। सीधी सी बात है कि पूरा सैक्रल/सेक्सुअल एरिया नाग के चौड़ की तरह मोटा, गोलाकार व परतदार होता है। इसकी सारी संवेदना वज्र/पूंछ की संवेदना के साथ मिलकर ऊपर चली जाती है। जो नाग के मुख्य उभार बिंदु हैं, वे ही शरीर के सात चक्र हैं। वहीँ पर ध्यान के दौरान कुण्डलिनी ज्यादा चमकती रहती है। मूलाधार चक्र पर वज्र की शिखा जुड़ी होती है। आगे के स्वाधिष्ठान चक्र (वज्र के मूल) पर नाग की पूंछ (वज्र) कुंडलाकार रूप में गुथे हुए नाग के उस मुख्य शरीर से जुड़ी होती है, जो जमीन पर होता है। पीछे के स्वाधिष्ठान चक्र पर नाग के ऊपर उठने से लगभग 90 डिग्री का कोण बनता है। पीछे के नाभि चक्र पर नाग के शरीर के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। पीछे के अनाहत चक्र पर नाग के शरीर में उभार आता है। पीछे के विशुद्धि चक्र में नाग के फण के मोड़ का सबसे गहरा बिंदु होता है। उसके ऊपर पीछे के आज्ञा चक्र पर फिर से नाग के सिर/फण का उभार आता है। इसके ऊपर पूरा मस्तिष्क/ मस्तिष्क का सबसे ऊपरी स्थान जहाँ एक कुण्डलिनी संवेदना होती है (सिर के ऊपरी सतह के सबसे आगे वाले व सबसे पीछे वाले भाग के बीचोंबीच; यहाँ एक गड्ढा जैसा महसूस होता है, इसीलिए इसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं) नाग के एक हजार फणों के रूप में होता है। तभी तो उसे सहस्रार (एक हजार भाग वाला) कहते हैं। बीच वाले मुख्य फण पर कुण्डलिनी विद्यमान होती है।

ध्यान के दौरान नाग के साथ कुण्डलिनी-अनुभव

इसी ऊहापोह में मैं एक दिन तांत्रिक  विधि से ध्यान कर रहा था। मैं उपरोक्त तरीकों से नाग का ध्यान करने लगा। मुझे उसकी पूंछ/वज्र-शिखा पर कुंडलिनी उभरती हुई और सांप की तरह सरसराहट के साथ उसके फण/मेरे मस्तिष्क तक जाते हुए महसूस होने लगी। मस्तिष्क में वह काफी तेज, शांत व भगवान नारायण की तरह थी। ऐसा लगा कि जैसे भगवान नारायण ही कुंडलिनी के रूप में शेषनाग के ऊपर विलास कर रहे थे। साथ में मुझे उपरोक्त नाग-मंदिर के जैसी अनुभूति मिली। फिर मैं अध्यात्म में नाग के महत्त्व को समझ सका।

नाग का पूजन

लगभग सभी धर्मों में नाग को पवित्र व पूज्य माना जाता है। नारायण नाग पर शयन करते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर भी नाग विराजमान है। कई धर्मों में दो नाग आपस में लिपटे हुए दिखाए गए हैं। वे संभवतः यब-युम आसन में बंधे हुए दो तांत्रिक जोड़ीदार हैं।

नाग कुण्डलिनी नहीं है

मैंने कुंडलिनी को नाग के रूप में सुन रखा था। पर वह नाग नहीं है। वह नाग के शरीर/तंत्रिका तंत्र/नर्वस सिस्टम पर नाग की तरह चलती है। वैसे ही, जैसे विष्णु भगवान् नाग नहीं हैं, पर वे नाग के ऊपर विहार करते हैं।

नाग कुण्डलिनी को अतीरिक्त बल देता है

जरूरी नहीं कि कुण्डलिनी जागरण नाग के ध्यान से ही हो। प्रेमयोगी वज्र ने  तो नाग का ध्यान नहीं किया था। उसने एकबार कुण्डलिनी को अपने शरीर के अन्दर सीधा ऊपर उठते हुए अनुभव किया था, जैसे एक हैलीकोप्टर हवा में सीधा ऊपर उठता है। नाग के ध्यान से तो केवल उसे उठने के लिए अतिरिक्त बल ही मिलता है। इसीलिए तो अधिकांश बड़े देवी-देवताओं के साथ नाग दिखाया गया होता है।

शेषनाग के सिर पर पृथ्वी

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि शेषनाग/मल्टी हूडिड सर्पेंट ने अपने सिर पर सारी धरती को धारण किया हुआ है। वास्तव में यह शेषनाग हमारा अपना उपरोक्त तंत्रिका तंत्र ही है। सारी धरती हमारे इसी तंत्रिका तंत्र/मस्तिष्क में अनुभव के रूप में ही है। वास्तव में स्थूल और बाहर तो कुछ भी नहीं है। यही अंतिम वाक्य अध्यात्म का मूल मन्त्र है।

संवेदना के ऊपर कुण्डलिनी का आरोपण

हरेक शारीरिक संवेदना नाड़ी से होकर मस्तिष्क को जाती है। जब उस पर कुण्डलिनी/एक विशेष मानसिक चित्र का आरोपण किया जाता है, तब वह भी उसके साथ मस्तिष्क में पहुँच जाती है। शरीर की सर्वाधिक तीव्र व आनंदप्रद संवेदना वज्र-शिखा की है। इसलिए उसपर आरोपित कुण्डलिनी मस्तिष्क में जीवंत हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि कुण्डलिनी मूलाधार में शयन करती है। वास्तव में मूलाधार चक्र में वज्र-शिखा को ही दर्शाया गया है, दोनों एक काल्पनिक रेखा से जुड़ते हुए। उसे ही नाग की पूंछ कहते हैं। आम आदमी में वहां पर कुण्डलिनी सोई हुई होती है। इसका अर्थ है कि वहां पर कुण्डलिनी जागृत नहीं हो सकती। जागरण के लिए उसे मस्तिष्क में ले जाना पड़ता है। नाग ने अपनी पूंछ को मुंह में दबाया होता है। इसका अर्थ है कि कुण्डलिनी वज्र से शुरू होकर वीर्यपात के रूप में वज्र पर ही वापिस आ जाती है, और वहां से बाहर बर्बाद हो जाती है। अपने कुंडल खोलकर नाग के सीधे खड़े होने का मतलब है कि कुण्डलिनी को सीधी दिशा में वज्र शिखा से मेरुदंड से होकर मस्तिष्क तक ले जाया जाता है, बार-2 सैक्सुअल क्षेत्र में घुमाया नहीं जाता। ऐसी भावना की जा सकती है कि पूरे यौन क्षेत्र (जो एक फण उठाए हुए बड़े नाग के जमीनी ढेर/घड़े जैसी आकृति का है) में चारों तरफ से डूबी/सरोबार कुण्डलिनी उससे शक्ति लेकर सीधी ऊपर फण तक चली जाती है। फण/मस्तिष्क पर कुण्डलिनी को मजबूत किया जाता है, और उसे वीर्यपात के रूप में वज्र तक वापिस नहीं उतारा जाता। हालांकि, कुंडलिनी को धीरे-धीरे सामने/आगे के चक्रों के माध्यम से नीचे ले जाया जा सकता है, जिससे वे मजबूत हो जाते हैं। संस्कृत शब्द कुण्डलिनी का अर्थ है, कुंडल/कोइल वाली। अर्थात एक मानसिक आकृति जो कुंडल/नाग पर विराजमान है।

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