कुंडलिनी जागरण ही जीव का चरम लक्ष्य

मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जागृति ही किसी भी जीव का परम लक्ष्य है। मुक्ति जीव के हाथ में नहीं, न ही बंधन में पड़ना उसके नियंत्रण में था। परमात्मा ने जीव को बंधन में डालकर उसे जागृति की अनुभूति देने का अवसर प्रदान किया। परमात्मा का आत्मा बनकर संसार के बंधन में पड़ने का लॉजिक भी तभी बनता है अगर यह माना जाए कि उन्हें प्रेमसुलभ जागृति का अनुभव नहीं था। वे उसी की प्राप्ति के लिए मृत्युलोक में आए। अगर वह उन्हें पहले ही सुलभ होती तो वे क्यों अपना पूर्ण रूप त्यागकर जीवात्मा बन कर दुखों से भरी जीव योनियों में भटकते। बेशक वे खुद नहीं पर उनकी फोटोकॉपी ही जीव बन कर आती है पर लॉजिक तो फिर भी यही लगता। बिना मतलब या फायदे के फोटोकॉपी भी क्यों आती। और जब जीव को जागृति मिल गई तो उसके बन्धन में बने रहने का क्या उद्देश्य रह गया? इससे वह तो खुद ही मुक्त हो गया। लॉजिक तो यही कहता है, शास्त्र क्या कहते हैं, यह अलग बात है। प्रेम की पराकाष्ठा वाली जागृति की अनुभूति स्वयं परमात्मा को भी नहीं, क्योंकि उन्होंने कभी शरीर धारण नहीं किया। चढ़ती ऊर्जा का तूफान केवल शरीर में ही संभव है, और यही प्रेम का मूल स्रोत भी है। जागृति प्रेम से ही प्राप्त होती है। शायद परमात्मा जीव की जागृति को ही अनुभव करके संतुष्ट हो जाते हैं। उनके लिए क्या कुछ संभव नहीं है। वे अनंत हैं।

जीव ने अनगिनत वर्षों तक संसार में दुख झेले हैं। यह उसकी तपस्या का प्रतिफल है, एक ऐसा उपहार जो केवल भक्त जीवों के लिए है, स्वयं परमात्मा के लिए भी नहीं। इसीलिए वे भक्त को अपने से भी बड़ा मानकर उसकी खोज में लगे रहते हैं। यह विचार भक्ति मत से पूरी तरह मेल खाता है और शास्त्रों एवं संतों की शिक्षाओं से भी सहमत है।

मेरा अनुभव बताता है कि जीवन की सांसारिकता बाधा नहीं, बल्कि अवसर है। इसे ध्यानपूर्वक जिया जाए तो जागृति की दिशा में सहज प्रगति संभव है। शरीरविज्ञान दर्शन के समन्वय से यह और भी सुगम हो सकता है। मेरी अपनी यात्रा में, मैंने अभी तक निर्विकल्प समाधि का अनुभव नहीं किया, किंतु जागृति के स्पर्श को समझा है। यह अनुभव प्रेम और ऊर्जा के संतुलन से उपजा है।

मुझे यह भी प्रतीत होता है कि ऊर्जा को उठाने-गिराने की प्रक्रिया मात्र एक स्वाभाविक खेल है। इसे जबरन नियंत्रित करने की आवश्यकता नहीं, बल्कि इसे सहज रूप से स्वीकार करने की जरूरत है। जागृति कोई बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि आंतरिक अनुभव और प्रेम की पराकाष्ठा है।

यदि जागृति अर्थात आत्मज्ञान की बजाय मुक्ति या समाधि ही मुख्य लक्ष्य होता तो इसकी प्राप्ति के लिए विभिन्न आध्यात्मिक पंथ जैसे कि विभिन्न किस्म के योग, तंत्र आदि न बने होते। सभी लोग सिर्फ चुपचाप बैठकर अपने विचारों को साक्षीभाव से देखा करते। सभी हमेशा शांत रहकर दुनियादारी से हटकर जीवन गुजारा करते। मुक्ति तो किसीको दिखती नहीं है पर जागृति तो प्रत्यक्ष की तरह महसूस होती है। जागृति के लिए प्रयास करने से कम से कम जागृति मिलने की तो उम्मीद है ही, मुक्ति भी मिल सकती है। पर अगर जागृति को छोड़कर सिर्फ मुक्ति के लिए ही प्रयास किया गया तो यह भी हो सकता है कि न जागृति मिले और न ही मुक्ति। और मुक्ति मिलने का प्रमाण ही क्या है। आज कोई शांत है तो मुक्त है, पर अगर कल उस पर हमला होता है और वह बचाव की कार्यवाही करता है तो शांति खत्म और मुक्ति भी गायब। यह तो ऐसे ही है कि न माया मिली न राम। अधिकांश लोग मुक्त जैसा बनकर जीवन जीते रहते हैं। उनको देखकर पता ही नहीं चलता कि उनमें जीवन है भी कि नहीं। वे जागृति के लिए भी प्रयास नहीं करते क्योंकि वे इस भ्रम में रहते हैं कि वे तो मुक्त हैं। वे आपको शास्त्रों के उदाहरण देकर इसे एकदम से सही ठहरा देंगे। मुझे तो यह बहुत बड़ा शास्त्रीय छल लगता है। या यह शास्त्रों की अधूरी समझ है। या शास्त्र बाद के लोगों ने लिखे हैं। असली अनुभव करने वाले तो और ही थे।

मैं तो जागृति, कुंडलिनी जागरण, समाधि और आत्मज्ञान को एक ही चीज मानता हूं। कई स्थानों पर इनके अलग अलग अर्थ निकाले जाते हैं या इनके बीच में सूक्ष्म अंतर ढूंढे जाते हैं। मैं इन अव्यवहारिक झमेलों में नहीं पड़ता और न ही मुझे इनकी परवाह है। इनमें समय बर्बाद करने की बजाय अगर अनुभव के लिए समय लगाया जाए तो कुछ तो हासिल हो पाए।

मैंने यह भी अनुभव किया कि ध्यान में ऊर्जा पर अधिक ध्यान देने से ध्यान-प्रतिमा धुंधली पड़ जाती है। अतः ध्यान की मूल छवि को संजोकर रखना ही श्रेष्ठ है। दरअसल ध्यान चित्र पर ध्यान देने से ऊर्जा खुद संतुलित और उर्ध्वगामी हो जाती है मतलब खुद सभी चक्रों को यथावश्यक बल देती है, जबकि केवल ऊर्जा पर ही ध्यान देने से यह कहीं भी जा सकती है, जरूरी नहीं कि ध्यान चित्र को ही पुष्ट करे। मेरी यात्रा अभी जारी है, और मैं इस सत्य को और गहराई से समझने की ओर बढ़ रहा हूँ।

यदि इस अनुभव को अपनाया जाए, तो यह न केवल आत्मिक प्रगति देगा, बल्कि सांसारिक जीवन को भी संतुलित और समृद्ध बना सकता है। जागृति कोई दूरस्थ आदर्श नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण में उपलब्ध सत्य है। यह प्रेम और समर्पण के साथ ही संभव है।

जागरण का मार्ग: आत्मज्ञान और सांसारिक जीवन के बीच संतुलन

जो लोग आत्मज्ञान की झलक पा चुके हैं, उनके लिए यात्रा तुरंत मुक्ति तक नहीं पहुंचती। बल्कि, यह एक गहरा सवाल उठाती है: क्या इस गहरे अनुभव को रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल किया जा सकता है? मेरे अपने अनुभवों ने मुझे अलग-अलग स्तरों से गुज़ारा है—किशोरावस्था से लेकर बाद के वर्षों तक—जिसने आत्मज्ञान, संन्यास और सांसारिक जीवन के प्रति एक अनूठा दृष्टिकोण विकसित किया है।

मन से परे झलक

मेरा पहला महत्वपूर्ण आत्मज्ञान अनुभव किशोरावस्था में एक स्वप्न अवस्था में हुआ। यह एक शक्तिशाली एहसास था—जिसने मुझे अनंत ब्रह्मांड से जोड़ दिया। लेकिन, इसने एक अधूरेपन की भावना छोड़ दी, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि अनुभव परिवर्तनकारी तो था, लेकिन पूर्ण मुक्ति नहीं। वर्षों बाद, कुंडलिनी योग और तांत्रिक साधना के माध्यम से एक और सशक्त जागरण हुआ, जिससे मैं पूरी तरह आत्मविलय की स्थिति में चला गया। इस बार, अधूरेपन की भावना कम थी, लेकिन मैंने स्वयं ही ऊर्जा को वापस नीचे लाने का फैसला किया, क्योंकि मुझे लगा कि यह मुझे संन्यास की ओर ले जा सकता है।

इस ऊर्जा को नियंत्रित करने के निर्णय ने मुझे यह खोजने पर मजबूर किया कि आध्यात्मिक जागरण और सांसारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। कई लोग इस अनुभव के बाद पूर्ण संन्यास को अपना लेते हैं, लेकिन मैं जाग्रत अवस्था में रहते हुए संसार में बने रहने के लिए प्रेरित था।

क्या आत्मज्ञान से मृत्यु के बाद मुक्ति निश्चित है?

एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या जीवन में एक बार आत्मज्ञान की झलक पाने के बाद मृत्यु के बाद मोक्ष निश्चित हो जाता है? विभिन्न परंपराएं इस पर अलग-अलग विचार रखती हैं। कुछ मानते हैं कि आत्मज्ञान का एक भी अनुभव आत्मा पर अमिट छाप छोड़ता है, जिससे मृत्यु के बाद भी मुक्ति की ओर मार्गदर्शन होता है। अन्य मानते हैं कि पूर्ण मुक्ति के लिए इस जागरण की स्थिति को स्थिर बनाए रखना आवश्यक है। मेरे विचार में एक गहरी आत्मज्ञान की झलक मृत्यु के बाद भी सही दिशा देती है, भले ही यह तुरंत मोक्ष न दे।

संन्यास या समावेश?

गहन समाधि जैसे सविकल्प समाधि का अनुभव होने के बाद यह सवाल उठता है कि क्या संन्यास लेना आवश्यक है? क्या कोई संसार में रहते हुए भी इस जागृति को बनाए रख सकता है? प्रारंभ में, मैंने जागरूकता को स्थिर रखते हुए जिम्मेदारियों को निभाने का निर्णय लिया। समय के साथ, मैंने महसूस किया कि मेरी ऊर्जा आज्ञा चक्र पर स्थिर हो गई है, जिससे प्रत्याहार की स्थिति पैदा हो गई—जहां बाहरी संसार के प्रति रुचि कम होती जाती है, लेकिन फिर भी कार्यशील रहा जा सकता है।

हालांकि, इससे निचले चक्रों में सक्रियता कम हो गई, जिससे सांसारिक मामलों में रुचि घटने लगी। इसे संतुलित करने के लिए, मैंने पंचमकार साधना का न्यूनतम प्रयोग किया, इसे भोग नहीं बल्कि आत्म-संतुलन का साधन माना। इस रणनीतिक दृष्टिकोण ने मुझे जाग्रत स्थिति को बनाए रखते हुए सांसारिक जीवन में कार्यरत रहने की क्षमता दी।

क्रिया योग: एक व्यवस्थित दृष्टिकोण

जहां मेरी प्रारंभिक साधना अनौपचारिक और तीव्र थी, वहीं बाद में मैंने क्रिया योग को अपनाया, जो एक अधिक संरचित प्रणाली है। मेरे पहले के प्रयास केवल ऊर्जा को ऊपर उठाने पर केंद्रित थे, जबकि क्रिया योग धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से एक क्रमबद्ध मार्ग प्रस्तुत करता है। हालांकि, मुझे लगा कि मेरे अनुभव पहले से ही इन अवस्थाओं को उत्पन्न कर चुके थे, लेकिन सहज रूप में, न कि निर्धारित चरणों में। अब, क्रिया योग मेरे लिए एक नया रहस्योद्घाटन नहीं बल्कि एक परिष्करण उपकरण है।

हालांकि, एक व्यावहारिक चुनौती भी सामने आई—भोजन के बाद गहरी श्वास क्रियाएं करने से गैस्ट्रिक एसिड और स्लीप एपनिया की समस्या बढ़ने की आशंका लगी। इसे हल करने के लिए मैंने भोजन के 4-5 घंटे बाद अभ्यास करने का निर्णय लिया, जिससे यह आशंका समाप्त हो गई। यह साबित करता है कि आध्यात्मिक साधनाओं को शरीर की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजित करना आवश्यक है।

मुख्य निष्कर्ष

आत्मज्ञान की झलक मृत्यु के बाद भी मार्गदर्शन करती है, लेकिन पूर्ण मोक्ष के लिए इसे स्थिर करना आवश्यक हो सकता है।

संसार में रहते हुए अद्वैत को अपनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए सचेत रहकर संतुलन साधना आवश्यक है। शरीरविज्ञान दर्शन इसमें आश्चर्यजनक रूप में सहायक है, जिसे मैंने अपने लिए बनाया था पर अब यह सबके लिए हर जगह उपलब्ध है।

क्रिया योग एक व्यवस्थित पद्धति है, लेकिन जो पहले से जाग्रत है, उसके लिए यह केवल refinement का कार्य करता है।

ऊर्जा के उच्च चक्रों में स्थिर होने से प्रत्याहार स्वाभाविक रूप से होता है, लेकिन संतुलन के लिए जड़ता को बनाए रखना आवश्यक है।

शारीरिक स्थितियां, जैसे GERD, आध्यात्मिक अभ्यासों को प्रभावित कर सकती हैं, इसलिए उन्हें सावधानीपूर्वक समायोजित करना आवश्यक है।

आगे की राह

अब मेरा ध्यान एक और बड़े अनुभव की तलाश करने पर नहीं बल्कि आत्मज्ञान की स्पष्टता बनाए रखने पर केंद्रित है। न तो पूरी तरह समाधि में लीन होना चाहता हूँ, न ही सांसारिक जीवन में खो जाना चाहता हूँ। मैं संतुलन बनाए रखते हुए अपनी साधना को निरंतर विकसित करने के लिए उत्सुक हूँ।

उन सभी के लिए जो इसी मार्ग पर चल रहे हैं, महत्वपूर्ण यह है कि अपनी ऊर्जा की प्रवृत्तियों को समझें और अपने अभ्यास को इस तरह ढालें कि यह आंतरिक जागृति और बाहरी जीवन दोनों को संतुलित रख सके। सच्ची मुक्ति पलायन में नहीं, बल्कि इस सत्य को अनुभव करने में है कि चाहे संसार में हों या समाधि में, जाग्रत अवस्था अटल बनी रहे।

क्या आत्मबोध की झलक ही सबसे ऊँचा अनुभव है?

क्या किसी जीवित प्राणी के लिए आत्मबोध की झलक (ग्लिम्प्स) ही सबसे उच्चतम अनुभव है? क्या इसे प्राप्त कर लेने का मतलब यह है कि उसने अपनी चरम सीमा पा ली? नहीं, क्योंकि झलक केवल शिखर का स्वाद देती है, लेकिन असली पूर्णता उस शिखर पर टिके रहने में है। जागृति के बाद व्यक्ति को अपने मौलिक स्वभाव में लौटना होता है, जो समाधि या मुक्ति की स्थिति है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि झलक का कोई मूल्य नहीं। यह एक दुर्लभ अनुभव है, जिसे कम से कम एक बार पाना ही जीवन को नई दिशा दे सकता है।

क्या मुक्ति में आत्मबोध की झलक से अधिक आनंद होता है?

जागृति की झलक में प्राण ऊर्जा एक तीव्र विस्फोट की तरह होती है, जिससे आनंद अत्यधिक और अकल्पनीय लगता है। यह प्रेम, भक्ति, रोमांस, सौंदर्य, दिव्यता—सभी को चरम पर पहुँचा देता है। लेकिन यह अनुभव अस्थायी होता है क्योंकि यह शरीर और मन की सीमाओं में बंधा होता है। दूसरी ओर, समाधि में यह ऊर्जा संतुलित रूप में स्थायी रहती है। वहाँ कोई संघर्ष नहीं, कोई गिरावट नहीं, केवल सहज पूर्णता होती है। यह संभव है कि समाधि का आनंद बाहरी रूप से जागृति से कम तीव्र लगे, लेकिन यह कभी समाप्त नहीं होता। जागृति का अनुभव बिजली की कौंध की तरह है, जबकि समाधि सूर्य के समान—शाश्वत और अडिग।

क्या बिना आत्मबोध की झलक के समाधि प्राप्त करने वाले को पछतावा रहेगा?

अगर कोई व्यक्ति सीधे समाधि में प्रवेश कर जाए और उसे आत्मबोध की तीव्र झलक न मिली हो, तो क्या उसे हमेशा यह पछतावा रहेगा कि उसने वह अनुभव नहीं किया? शायद हाँ। इसलिए संतों और शास्त्रों ने कहा है—मुक्ति से पहले प्रेम और पूर्ण समर्पण का चरम अनुभव करो। प्रेम, भक्ति और सौंदर्य की पराकाष्ठा आत्मबोध की झलक को जन्म देती है। यह क्षणिक हो सकती है, लेकिन इससे समाधि भी एक भावशून्य स्थिति नहीं, बल्कि आनंद और प्रेम से भरी पूर्णता बन जाती है।

जीवन में आत्मबोध की झलक क्यों आवश्यक है?

आत्मबोध की झलक केवल आध्यात्मिकता की बात नहीं है, यह जीवन की पूर्णता का अनुभव है। प्रेम और भक्ति का शुद्धतम रूप, गहरी करुणा, और अस्तित्व से असीम जुड़ाव—यह सब उसी झलक से संभव होता है। यह अनुभव हमें यह सिखाता है कि जीवन केवल मुक्त होने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए भी है। केवल बंधन तोड़ने से मुक्ति नहीं मिलती, जब तक कि प्रेम, भक्ति और आनंद का पूर्ण विस्तार न हो जाए।

इसलिए, मेरा विश्वास है कि जीवन में कम से कम एक बार आत्मबोध की झलक पाना, चाहे वह क्षणभर के लिए ही क्यों न हो, सबसे मूल्यवान उपलब्धि हो सकती है। यह हमें न केवल सत्य की झलक देता है, बल्कि उसे जीने की प्रेरणा भी देता है।

पूर्णता का भ्रम

लंबे समय तक, मैं इस सूक्ष्म भ्रम में रहा कि ज्ञान की एक झलक पाने के बाद, मैंने सब कुछ पा लिया है। वह एक पल इतना पूर्ण, इतना अभिभूत करने वाला लगा कि मैंने इसे अंतिम गंतव्य समझ लिया। लेकिन जीवन, अपने परीक्षणों और सबक के साथ-विशेष रूप से शरीरविज्ञान दर्शन के लेंस के माध्यम से-एक गहरी सच्चाई को उजागर करता गया। वह झलक अंत नहीं थी, बल्कि केवल शुरुआत थी। यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है, और आगे का रास्ता जितना मैंने कभी सोचा था, उससे कहीं अधिक लंबा है।

कुंडलिनी जागरण का आनंद बनाम समाधि का आनंद: तीव्रता से परे स्थिरता की खोज

बहुत से साधक जागरण की झलक पाने के बाद सोचते हैं: यदि जागरण का आनंद इतना तीव्र है, तो समाधि, जो कम ऊर्जावान महसूस होती है, वह श्रेष्ठ कैसे हो सकती है? क्या सर्वोच्च आनंद ही अंतिम स्थिति नहीं होनी चाहिए? मैंने अभी समाधि प्राप्त नहीं की है, लेकिन मुझे लगता है कि इसका उत्तर तीव्रता में नहीं, बल्कि स्थिरता, गहराई और स्थायित्व में है।

मेरा अनुभव: जागरण की तीव्रता और उसकी सीमाएँ 

मेरे जागरण के दौरान, मैंने एक जबरदस्त आनंद का उफान महसूस किया, जैसे चेतना अनंत विस्तार में विस्फोट कर गई हो। मेरी सांस स्वाभाविक रूप से रुक गई और मैंने स्वयं का पूर्ण विलय अनुभव किया। लेकिन यह स्थिति इतनी तीव्र थी कि इसे बनाए रखना संभव नहीं था। शरीर की ऊर्जा समाप्त होने लगी और यह अवस्था जल्द ही फीकी पड़ गई। यह लगभग 10 सेकंड तक चली, लेकिन इसका प्रभाव गहरा था। यह चाहे जितनी भी गहरी अनुभूति थी, यह स्थायी मुक्ति नहीं थी। तब मैंने सोचा: क्या हो अगर समाधि इस ऊर्जा विस्फोट के बारे में बिल्कुल भी न हो?

जागरण का उफान: शक्तिशाली लेकिन अस्थायी 

जागरण के क्षण में, ऊर्जा मस्तिष्क की ओर प्रवाहित होती है, जिससे अत्यधिक आनंद, व्यापक विस्तार और गहन जुड़ाव की अनुभूति होती है। लेकिन यह उफान प्राण पर निर्भर करता है, जो शरीर से अधिक ऊर्जा की मांग करता है। यह एक शिखर स्तर का अनुभव है, न कि स्थायी स्थिति। यह बिजली की चमक की तरह है, जो पल भर के लिए सब कुछ प्रकाशित कर देती है, लेकिन फिर गायब हो जाती है, और व्यक्ति इसे फिर से पाने के लिए लालायित रहता है।

समाधि: आनंद का गहरा, शांत सागर

जागरण के विपरीत, समाधि किसी ऊर्जा विस्फोट की स्थिति नहीं होती, बल्कि पूर्ण स्थिरता होती है। मेरे समझ के अनुसार, यह सूक्ष्म लेकिन अत्यधिक संतोषजनक अनुभव है। इसमें कोई ऊर्जा खर्च नहीं होती, कोई बल प्रयोग नहीं होता, कोई उत्तेजना आवश्यक नहीं होती। मन विलीन हो जाता है और अनंत, आत्म-निर्भर आनंद प्रकट होता है। यह जागरण के झटके जितना तीव्र नहीं लग सकता, लेकिन यह कभी समाप्त नहीं होता।

स्थिरता तीव्रता से अधिक शक्तिशाली क्यों है? 

कल्पना करें कि दो प्रकार की रोशनी हैं: जागरण का आनंद = बिजली की चमक – अत्यधिक उज्ज्वल लेकिन क्षणिक। समाधि का आनंद = सूर्य – निरंतर, सहज और अटूट।

तेज ऊर्जा का उफान भ्रम को तोड़ सकता है, लेकिन केवल स्थिर समाधि ही उसे स्थायी रूप से मिटा सकती है। जागरण सत्य दिखाता है; समाधि उसे आपकी वास्तविकता बना देती है।

जागरण से समाधि की यात्रा 

कई साधक केवल केवली कुम्भक (स्वतः सांस रुकना) को बनाए रखने की कोशिश करते हैं, यह सोचकर कि अधिक प्रयास उन्हें समाधि तक ले जाएगा। लेकिन प्रयास प्रतिरोध पैदा करता है। इसके बजाय, व्यक्ति को स्थिरता में समर्पण करना चाहिए, जिससे मन और प्राण स्वाभाविक रूप से शांत हो जाएं। जब सांस अपने आप रुक जाती है, बिना किसी बल के, तब सच्चा केवली कुम्भक सहज रूप से समाधि की ओर ले जा सकता है।

क्या कोई जागरण के बिना सीधे समाधि तक पहुँच सकता है? 

कुछ लोग जागरण की तीव्रता महसूस किए बिना सीधे समाधि में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं। गहरी ध्यान अवस्था मौन ला सकती है, लेकिन सच्ची समाधि के लिए अहंकार का पूर्ण विघटन आवश्यक होता है। बिना जागरण के, मन अभी भी सूक्ष्म अहंकार संरचनाओं से जुड़ा रह सकता है, जिससे उसका पूर्ण अवशोषण संभव नहीं हो पाता। जागरण इन बंधनों को ढीला करता है, जिससे सच्ची समाधि संभव होती है। इसके बिना, व्यक्ति गहरी तंद्रा अवस्था में जा सकता है, लेकिन सच्ची मुक्ति का अपरिवर्तनीय परिवर्तन नहीं हो पाता।

समाधि की वास्तविक श्रेष्ठता 

जागरण एक अनुभव है। समाधि एक अवस्था है। जागरण आता-जाता रहता है। समाधि अटूट होती है। जागरण द्वार खोलता है। समाधि उस द्वार को पार करने की स्थिति है।

भले ही मैंने अभी समाधि प्राप्त नहीं की हो, मुझे विश्वास है कि सच्ची मुक्ति आनंद की खोज में नहीं, बल्कि उस स्थिति में विश्राम करने में है जो कभी समाप्त नहीं होती। शायद समाधि अधिक ऊर्जा के बारे में नहीं, बल्कि कम प्रतिरोध के बारे में है।

क्या कोई जागरण के बिना समाधि प्राप्त कर सकता है, विशेषकर यदि उसमें कम प्राण हो?

यदि किसी के पास जागरण की तीव्रता उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त प्राण न हो, तो क्या इसका मतलब है कि वह कभी समाधि प्राप्त नहीं कर सकता? ऐसा जरूरी नहीं है। यद्यपि ऊर्जा जागरण समाधि की प्राप्ति के लिए एक उत्प्रेरक का काम कर सकता है, लेकिन अंततः समाधि तो एक स्थिरता की अवस्था है, न कि ऊर्जा विस्फोट की। एक साधक, जिसके पास कम प्राण है, फिर भी समाधि तक पहुँच सकता है, यदि वह मौन को गहराई से अपनाए और अहंकार को विलीन कर दे। भले ही जागरण की बिजली न चमके, फिर भी लगातार ध्यान, समर्पण और स्थिरता में लीन होने से मुक्ति का द्वार खुल सकता है।

कुंडलिनी योग बनाम क्रिया योग: अंतर, लाभ और आपके लिए कौन सा बेहतर है?

दोस्तों, क्रिया योग अक्सर चर्चा में रहता है। पर क्या यह पतंजलि योग से भिन है? बिलकुल भी नहीं। क्रिया योग तो पतंजलि योग सूत्रों में ही छुपा हुआ है। शुरु में यम, नियम तो अपनाना ही पड़ेगा तभी तो मन शांत और स्थिर होगा। आसन तो फिर खुद ही लगेगा। क्योंकि चंचल मन वाला आदमी ही दौड़ लगाता है। शांत मन वाला तो चुपचाप बैठकर आराम फरमाता है। जब आदमी बैठेगा तब सांस तो लेगा ही। सांस भी अच्छी तरह से ठोक बजा कर लेगा। चंचल आदमी की तरह डरकर नहीं लेगा। जब प्राण की शक्ति फालतू दौड़ में बरबाद होने से बचेगी, तो वह सांस के लिए ही प्रयुक्त होगी। अच्छी, लंबी और गहरी सांस लेने से उसे आनंद भी आएगा। गहरी सांस से मूलाधार की शक्ति ऊपर चढ़ेगी। उससे दबे विचार उभरेंगे और आत्मा से जुड़ेंगे। दबे विचार का उभरना भी नहीं कह सकते। खिला हुआ फूल बनना कह सकते हैं। मतलब है तो सबकुछ वही पुराना पर वह अब बंद फूल की तरह सम्पीड़ित और अंधकारमय नहीं बल्कि खुले फूल की तरह मुक्त और प्रकाशमान है। इसीलिए चक्रों को कमल पुष्पों का रूप दिया गया है। फूल खिलने से ही आनंद आता है। आम आदमी यहीं रुक जाएगा। पर खास जिज्ञासु आदमी योग को अपनाते हुए सांसों की खूब खींचतान करेेगा। इससे उसकी शक्ति मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्रों को पार कर जाएगी। उसके ऊपर वह शक्ति खुद ऊपर चढ़ेगी। कई योगी लोग ऐसा कहते हैं कि फिर वह नीचे नहीं आएगी पर मुझे लगता है कि बीच-बीच में खींचतान लगानी ही पड़ेगी। क्योंकि स्थायी स्थिति किसी की भी नहीं है, शक्ति की भी नहीं। यह खींचतान गहरे श्वास और प्रश्वास को रोक कर लगती है। बेशक प्रतिदिन का अभ्यास साधारण गहरे प्राणायाम का हो, सांस रोकने का न हो, पर हफ्ते में एक दो दिन तो झटके देने ही पड़ते हैं। अज्ञानरूपी शत्रु का क्या भरोसा, कब हमला कर दे। शत्रु को कमजोर नहीं समझना चाहिए। होता क्या है कि अगर सांसों की खींचतान से शक्ति को हम हमेशा ऊपर ही चढ़ाते रहेंगे तब आज्ञा चक्र में पर्याप्त ध्यान नहीं हो पाएगा। क्योंकि हम प्राणायाम के दौरान रीढ़ की हड्डी पर और चक्रों पर सनसनी पर ध्यान देते हुए शक्ति को ऊपर चढ़ाने में व्यस्त रहेंगे। इसलिए वह शक्ति भौतिक दुनियादारी में खर्च हो जाएगी। इसीलिए कहा है कि जब शक्ति आज्ञा चक्र में पहुंच जाए तो ध्यान शुरु कर दो। जब ध्यान लग गया तब तो वह अपने को खुद बढ़ाता रहेगा क्योंकि वह आनंद है और आनंद खुद सबको अपनी तरफ खींचता है। जब प्राण शक्ति आज्ञा चक्र में पहुंचती है तो खुद पता चल जाता है। महान सत्त्वगुण महसूस होता है। आदमी रूपांतरित सा हो जाता है। सभी दैवीय गुण खुद ही आ जाते हैं। कुछ करने या पढ़ने की जरूरत नहीं होती। पशु पक्षी भी उसे ध्यान और कौतूहल से देखने लग जाते हैं। यही तो सांस और प्राण का कमाल है। इससे प्रत्याहार भी खुद ही होगा। क्योंकि जब आदमी को अंदर ही आनंद मिलेगा तो वह उसके लिए इंद्रियों वाला खर्चीला रास्ता क्यों अपनाएगा? आज्ञा चक्र में तो धारणा, ध्यान, ध्यान, समाधि खुद ही लगते हैं। मतलब ध्यान चित्र बहुत स्पष्ट हो जाता है। कई तांत्रिक किस्म के लोग आज्ञा चक्र तक एकदम से पहुंचने के लिए पंचमकारों का प्रयोग करते हैं। उसके बाद उन्हें छोड़ देते हैं। क्योंकि आज्ञा चक्र का सत्त्वगुण उन्हें उनके प्रयोग से रोकता है। मतलब सीढ़ी से ऊपर चढ़ो और फिर उसे फेंक दो। अगर सीढ़ी लगाकर रखोगे तो फिर गलती से दोबारा नीचे उतर जाओगे। कोई साधक अगर इनका प्रयोग जारी रखता है तो उसे कुंडलिनी जागरण जल्दी से तो मिल जाएगा पर वह उस अनुभव को ज्यादा देर तक झेल नहीं पाएगा। और कुंडलिनी को एकदम से नीचे उतार देगा। क्योंकि पंचमकारों में तमोगुण और रजोगुण होता है, जो सतोगुण को ज्यादा नहीं झेल पाता। फिर भी न होने से तो अच्छा ही है यह क्षणिक अनुभव भी। आज्ञा चक्र का ध्यान अंदर घुसकर दिमाग के बीच में त्रिकोण जैसा बनाता है। इसके तीनों छोरों पर तीन बिंदु हैं। मतलब यह त्रिकोण पतली नाड़ियों की सनसनी रेखाओं और सनसनी बिंदुओं के रूप में महसूस होता है। उसके बीच में श्री बिंदु पर भी ध्यान और संवेदना जमते हैं। श्री बिंदु से थोड़ी सी पीछे को एक सनसनी रेखा और जाती है। वह सहस्रार बिंदु पर खत्म हो जाती है। यही परम दिव्य स्थान है। यही अंतिम लक्ष्य है। यहीं पर मोक्ष मिलता है। वहां पर पीठ से रीढ़ की हड्डी से ऊपर आ रही मूल सनसनी या सुषुम्ना भी जुड़ जाती है। ये सब अभ्यास के अनुभव हैं। ये कोई भौतिक रेखा, बिंदु, त्रिकोण, चक्र आदि नहीं हैं। कई योगी बोलते हैं कि आज्ञा चक्र से सहस्रार चक्र बिंदु तक जाते समय अंधेरमय आकाश, फिर प्रकाशमय गुहा आदि आदि महसूस होते हैं। ये सब अनुभव सुनकर और पढ़कर अजीब लगते हैं। पर अभ्यास जारी रखने पर ये खुद महसूस होते हैं। किसी को बताने की जरूरत नहीं। कई योगी कहते हैं कि योग के समय चक्रों पर या पीठ आदि पर ध्यान नहीं देना चाहिए। बल्कि केवल भ्रुवों के बीच में, आज्ञा चक्र बिंदु पर टिका कर रखना चाहिए। वे भी तो ठीक ही कहते हैं। मुख्य लक्ष्य आज्ञा चक्र ही है। क्यों न सीधे टारगेट पर निशाना लगाएं? बाकि के चक्र खुद ही आज्ञा चक्र से जुड़े होते हैं। इसलिए आज्ञा चक्र के ध्यान से खुद ही अन्य चक्रों का ध्यान भी हो जाता है। सूरज के पीछे भागोगे तो चंदा रास्ते में खुद ही पकड़ में आ जाएगा। केवल चांद को पाने से सूरज नहीं मिलेगा। हां, रास्ता थोड़ा हल्का या आसान हो जाएगा पर समय बहुत लगेगा। क्या पता तब तक आदमी दुनिया में जिंदा भी रहे। ऐसे ही कई लोग चक्रों पर अपना बहुत सा कीमती समय बरबाद करते हैं। जब पतंजलि कहते हैं कि ध्यान से ही परम सिद्धि मिलेगी, तो ध्यान आज्ञा चक्र से नीचे तो होगा नहीं? कई तांत्रिक आज्ञा चक्र पर ध्यान चित्र को संभोग योग से एकदम से बहुत मजबूत कर देते हैं और बहुत जल्दी या यूं कहो कि चमत्कारिक रूप से समाधि और आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। पर बात वही जो पहले कही थी। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। वहां जगमगाता ध्यान चित्र कब सहस्रार में पहुंचकर समाधि बन जाता है, और कब आत्मज्ञान में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। यह इतना जल्दी होता है कि फलां फलां रेखाचित्र, फलां बिंदु, और फलां त्रिकोण को अनुभव करने का मौका ही नहीं मिलता। तभी तो अगर उनसे योग के तरीके और अनुभव के बारे में पूछा जाए तो उन्हें ज्यादा पता नहीं होता। वे तो बस आत्मज्ञान की बात करते हैं और उसे प्राप्त कराने वाले संभोग योग की। उन्हें तो बस फल चाहिए होता है, पेड़ पे चढ़े उनके दुश्मन। पर यह सब के बस की बात भी नहीं है। खैर आत्मज्ञान के बाद जगत के फायदे के लिए वे जानबूझकर सही तरीके से योग करके उसके सभी अनुभव सबको बताते भी हैं। उन्हें अपने लिए तो उनकी जरूरत नहीं, पर जनहित के लिए ही ऐसा करते हैं। यही बोधिसत्व की निशानी है। कई रूढ़ीवादी योगी तो अनुभव को कोहिनूर हीरे की तरह छुपाते हैं। जैसी अनुभव की चमकती रेखा सुषुम्ना के रूप में महसूस होती है, वैसा ही चक्र की जगह पर अनुभव रेखाओं का गोलाकर जाल होता होगा। इसे ही चक्र दर्शन कहते होंगे। पर इनसे फायदा क्या? सीधा आज्ञा चक्र में जाओ और मुक्त हो जाओ।

धारणा ध्यान के बाद सभी योग एकसमान ही हैं। यहां तक पहुंचने के लिए ही विभिन्न उपाय व तकनीकें हैं। हालांकि मूल मकसद तो यही है कि शक्ति चाहिए होती है। इसके लिए कोई मूलाधार से अतिरिक्त शक्ति उठाता है। कोई दुनियादारी छोड़कर शक्ति को बचाता है। तो कोई दुनियादारी में ही अद्वैत भाव रखकर शक्ति को बचाता है। हो गए न तीन किस्म के योग। कुंडलिनी योग या हठ योग, संन्यास योग और कर्म योग। मूल तो ये तीन योग ही हैं। बाकि जितने मर्जी योग बना लो। भक्ति योग भी कर्म योग का ही उप योग है।

मूल क्रिया योग तो यही कहता है कि भ्रूमध्य में ध्यान करते हुए ओम जाप के साथ प्राणायाम के इलावा कुछ नहीं करना है। पर इसको कई बाद के योगियों ने इतना जटिल बना दिया है कि मूल क्रिया योग तो गायब सा ही लगता है। मानसिक ओम जाप की यह खासियत है कि यह भ्रूमध्य पर ध्यान चित्र को मजबूत करता है। 4 से छह बार सांस भरते हुए मन में उच्चारण करो और इतना ही सांस छोड़ते समय। अनुलोम विलोम प्राणायाम करते समय जो एक उंगली की टिप भ्रूमध्य पर टिकी होती है, उससे भी ध्यान को वहां केंद्रित करने में कुछ मदद मिलती है। कई लोग बेचारे उनके झमेले में पड़ कर सारी उम्र चक्रों और सुषुम्ना में ही उलझे रहते हैं। असली ध्यान तक पहुंच ही नहीं पाते। कुछ योगी लोग गजब की साधना करके इन तथाकथित अजीबोगरीब अनुभव रेखाओं, बिंदुओं, त्रिकोणों, प्रकाशों, अंधकारों, गुफाओं, और चक्रों को अनुभव तो कर लेते हैं और किस्म किस्म की सिद्धियां भी हासिल कर लेते हैं। पर आत्मज्ञान से और यहां तक कि असली समाधि से भी कोसों दूर होते हैं। इसीलिए वे आत्मज्ञान का अनुभव नहीं बता पाते और पूछने पर कहते हैं कि गुरु इसे औरों को बताने को मना करते हैं। कई बोलते हैं कि जो कहता है कि उसे आत्मज्ञान हुआ है, उसे नहीं हुआ है, और जो कहता है कि उसे नहीं हुआ है, उसे हुआ है। वे कहते हैं कि अहंकार आने से आत्मज्ञान गायब हो जाता है। पर ऐसा कैसे हो सकता है। अगर कोई अपने गले में लटके हुए अपने जीते हुए पारितोषिक को लोगों को दिखाए तो वह भला कैसे गायब हो जाएगा? माना कि उसे तो कोई चुरा भी सकता है पर आंतरिक अनुभव को तो कोई चुरा भी नहीं सकता। हो सकता है कि कुछ और मतलब हो। खैर हम इस चर्चा में नहीं पड़ना चाहते।

एक हल यह है कि जैसा ठीक लगे वैसा करो पर योग के मुख्य लक्ष्य आज्ञा चक्र में धारणा, ध्यान और समाधि और सहस्रार चक्र में आत्मज्ञान पर भी हमेशा नजर बनी रहे। तकनीकें बदलो, सुधारो, कुछ भी करो पर चलते रहो। खड़े न रहो, एक ही जगह। प्रयोग से समझो और आगे निकलो। हो सकता है कि कोई आदमी दुनिया को कोई नई योग तकनीक ही दे जाए। भ्रूमध्य पर ध्यान का मतलब यह नहीं कि ऊपर को तिरछा या भेंगा देखो पर यह कि अंधेरे में आँखें बंद करके उनके बीच में ध्यान करो। हालांकि आँखें खोलकर तिरछा देखने से भी शक्ति तो ऊपर चढ़ती ही है, पर यह ध्यान नहीं होता। इससे शक्ति ही मूलाधार से ऊपर चढ़ती है। बेशक ध्यान शक्ति से ही होता है। ऐसा शांभवी मुद्रा में किया जाता है। अंधेरे में भ्रूमध्य पर ध्यान करते समय बेशक बीचबीच में बंद आंखों को हिलाते रहो, ताकि आज्ञा चक्र गुम न हो जाए। जितना यह चक्र बाहर है उससे कहीं ज्यादा भीतर को भी है। सीधी सी बात है कि ज्ञान बढ़ाते रहना चाहिए और जरूरत के हिसाब से चलते रहना चाहिए। सिद्धासन से अगर बेचैनी हो तो सिंपल पालथी मार कर सुखासन में बैठ जाओ। कूल्हे के नीचे मोटा सा तकिया रख लो ताकि घुटने में दर्द न होए।

यह जो दीक्षा की बात की जाती है, वह इसीलिए ताकि दीक्षा देने वाले का ध्यान चित्र बन जाए। अगर पहले से ही ध्यान चित्र बना है तो दीक्षा की भी क्या जरूरत है? एक बर एक मंदिर के पुजारी ने मूझसे पूछा कि क्या मैने किसी से मंत्र दीक्षा ली थी? मैंने उनका इरादा भांप कर तपाक से कहा कि मेरे पूज्य दादा जी ही मेरे गुरु हैं। वह बहुत खुश हुए और मुझसे हमेशा के लिए  सद् प्रभावित हो गए।

कुंडलिनी योग से आदमी जागृति और स्वप्न के बीच झूलता रहता है

दोस्तों, खाली दिमाग सच में ही शैतान का घर होता है। इसीलिए मैं हर समय कुछ ना कुछ करता रहता हूं। अगर करने के लिए कुछ ना दिखे तो लिखने लग जाता हूं। मेरा बेटा इसलिए जागकर काम करता है ताकि उसे अच्छे सपने आए। वाह जागृति की दुनिया को नकली और सपने की दुनिया को असली मानता है। उसकी यह बात सुनकर मेरा माथा ठनका। एक नया विचार उमड़ पड़ा  सभी ऋषि मुनी और वेद पुराण भी तो यही कहते हैं। वे कहते हैं कि अनासक्ति और अद्वैत से भरा जीवन ही असली है। सपने में भी तो ऐसा ही जीवन होता है। उसमें दुख सुख सभी लगभग एक जैसे ही महसूस होते हैं। सभी कुछ अनुभव रूप होता है। शुद्ध अनुभव। सभी अनुभव सुख रूप होते हैं। पीछे से शेर दौड़ जाए तो भय होते हुए भी भय नहीं लगता। कोई अगर लड़ने लग जाए तो गुस्सा आके भी गुस्सा नहीं आता। पहाड़ से गिर जाए तो दुख होते हुए भी दुख नहीं होता। अगर राज्य भी मिल जाए तो भी सुख होते हुए भी सुख नहीं होता। मतलब एकसार सुख तो हर जगह होता है, पर भौतिकता वाला प्रदूषित सुख नहीं होता। वह सूक्ष्म अनुभवरूप सुख होता है। भौतिक स्थूल जगत सुख दुख के सूक्ष्म अनुभव को प्रदूषित कर देता है। स्थूल जगत से सुख बढ़ तो जाता है, पर उससे दुख भी बढ़ जाता है। गेंद जितनी ऊपर जाती है, उतनी ही नीचे भी गिरती  है। सुख तो आत्मा का अपना स्वरूप है। पर जगत उसे अपने अधीन करके उस एकसार आत्मसुख में तरंग पैदा करता है। फिर कालांतर में स्थूल जगत के अभाव में वह तरंग नष्ट हो जाती है। इससे बेशक आदमी एकसार या तरंगहीन आत्मसुख में पुनः पहुंच जाता है, पर उस अवस्था में दुखरूप अंधेरा महसूस होता है। ऐसा भ्रम से प्रतीत होता है। असल में ऐसा नहीं होता। यह ऐसे ही है जैसे अपने शरीर के चारों ओर गोल गोल घूमने से या भ्रमण से रुकने के बाद अपने चारों तरफ सब कुछ थोड़ी देर के लिए घूमता हुआ सा महसूस होता है। इसे चक्कर आना भी कहते हैं। इसी से अज्ञान के लिए भ्रम शब्द का इस्तेमाल हुआ है।

दुनिया में रहते हुए भ्रम से तो कोई बच ही नहीं सकता। हां उसे कम जरूर किया जा सकता है। शायद इसीलिए तो लोग दुनिया छोड़कर साधु संन्यासी बनते हैं, ताकि जगत भ्रम को पैदा ही न कर सके। पर इससे यह नुकसान होता है कि इससे आत्मविकास भी नहीं होता। क्योंकि दुनिया इसके लिए जरूरी है। दुनिया को आवश्यक बुराई भी कह सकते हैं इस मामले में। इसीलिए जिन्हें अच्छी तरह से आत्मजागृति मिल गई है, उनका ही संन्यास लेना उचित माना गया है। मतलब वो आत्म विकास के चरम बिंदु पर पहुंच गए हैं, और उन्हें दुनिया में उलझने की कोई अवशयकता नहीं है। वैसे आवश्यकता तो है। पर सिर्फ शरीर को जिंदा रखने के लिए, क्योंकि जब तक पूर्वकर्मों से निर्धारित आयु पूरी नहीं होती, तब तक तो प्रारब्ध कर्म से जुड़े संस्कार परेशान करते ही रहेेंगे। हां, इससे अगले जन्म के लिए संस्कार नहीं बन पाएंगे।

सपना भी तो आत्मसुख को तरंग देता है, पर जागृति अवस्था जितना ज्यादा नहीं। इसीलिए सपने में उस तरंग के हटने पर भ्रम भी जागृत अवस्था जितना नहीं होता। कुछ भ्रम तो होता ही है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है कि दुनिया स्वप्न जैसी है, और इसे स्वप्नवत ही समझना चाहिए। वास्तव में ऐसा ही है क्योंकि भौतिक दुनिया मस्तिष्क के अंदर तो घुसती नहीं है। हम तो केवल उसका सूक्ष्म चित्र ही महसूस कर रहे होते हैं, जैसा स्वप्न में करते हैं। पर उसको स्थूल और भौतिक मान लेने से सारी गड़बड़ हो जाती है। आदमी बेशक सुखतरंग के लालच में ही उसे स्थूल और भौतिक मानता है, ताकि तरंग का सुख ज्यादा मिल सके। उस समय उसे उससे कालांतर में आने वाले दुख का एहसास नहीं होता। दरअसल बड़ी तरंग को ही स्थूल जगत कहते हैं और छोटी तरंग को सूक्ष्म जगत। सिनेमा देखते समय स्थूल कुछ नहीं होता पर कई लोग उससे ज्यादा ही आसक्त हो जाते हैं। मतलब उसमें ज्यादा ही डूब जाते हैं। और उससे भरपुर सुख की तरंग बनाते हैं। इससे परदे पर दिख रहे दृश्य सूक्ष्म होते हुए भी उनके लिए स्थूल बन जाते हैं। इसीलिए तो ऐसा वैसा दृश्य आने पर कई बार थिएटर में हंगामा और तोड़फोड़ भी कर देते हैं। कई लोग स्थूल जगत में रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होते। वे बिल्कुल शांत बने रहते हैं चाहे कुछ भी हो जाए। मतलब
उनके मन में उससे प्रचंड या ताबड़तोड़ तरंगें नहीं बनतीं। उनके लिए स्थूल जगत भी सपाlने की तरह सूक्ष्म होता है। इससे ही वे सुख दुख में एकसमान से बने रहते हैं। पर वही बात है न कि आत्म जागृति के लिए प्रचंड मानसिक तरंगें भी जरूरी होती हैं।

यह दुनिया दोनों तरफ बहने वाली नदी की तरह है। इसीलिए अच्छे से समझ नहीं आती। किसी को यह ऊपर उठाती है, तो किसी को बहाकर नीचे ले जाती है। यह कह सकते हैं कि आसक्तिपूर्ण दुनियादारी को शरीरविज्ञान दर्शन जैसे अद्वैतपरक दर्शनों से शांत भी करते रहना चाहिए। इससे आत्मजागृति भी मिलेगी और भ्रम भी पैदा नहीं होगा। कुंडलिनी योग से यह लाभ मिल सकता है कि उससे अद्वैत भावना के समय महसूस होने वाले समाधि चित्र को धारण करने की शक्ति बढ़ेगी और साथ में मस्तिष्क को ऊर्जा मिलने से दुनियादारी के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना अच्छे से कर पाएंगे। क्योंकि हरेक चक्र किसी न किसी किस्म की दुनियादारी से जुड़ा है, इसलिए हर किस्म के काम के समय कोई न कोई चक्र क्रियाशील हो जाएगा। मतलब उस चक्र तक शक्ति का प्रभाव बढ़ जाएगा। इससे उस काम के साथ शरीरविज्ञान दर्शन की भावना आसान हो जाएगी, क्योंकि सब काम शक्ति से होते हैं। वह अतिरिक्त शक्ति हमें मामूली लग सकती है, पर वह बड़े काम की होती है। प्रतिदिन के कुंडलिनी योग के अभ्यास से सभी चक्रों तक नाड़ियां खुली रहेंगी। जब चक्र तक शक्ति जाएगी तो कुछ न कुछ मस्तिष्क के चक्रों तक भी जाएगी ही, क्योंकि सभी चक्र आपस में जुड़े होते हैं। और मस्तिष्क से ही भावना होती है, द्वैतपरक हो या अद्वैतपरक।

बीच-बीच में शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से आदमी लगातार जागृत अवस्था और स्वप्न के बीच में झूलता रहेगा। इससे दोनों के लाभ मिलेंगे। जागृत अवस्था के भी और स्वप्न अवस्था के भी। जागृत अवस्था वाले लाभों में कुंडलिनी जागरण के साथ भौतिक दुनियादारी वाले लाभ और स्वप्न अवस्था वाले लाभों में संन्यास वाले लाभ शामिल हैं। मतलब कुंडलिनी योग से जागृत अवस्था स्वप्न अवस्था में बदल जाती है। हालांकि उससे स्वप्न भी जागृत अवस्था में बदल जाता है। जब शरीर में थकान हो, अर्थात अक्षमता अर्थात शक्ति की कमी हो तो आदमी की नशे या स्वप्न के जैसी अवस्था हो जाती है। कुंडलिनी योग से शक्ति मिलने पर वह फिर से दुनियादारी में जागृत जैसा हो जाता है। बेशक बाद में उससे परेशान सा होकर वह पुनः  शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से अपनी जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था में बदल देता है, और अपने भ्रम को न्यूनतम कर देता है। उस समय शक्ति तो उसमें होती है। वह अवस्था उस नशे या नींद के जैसी अवस्था नहीं होती, जिसमें शक्ति ही नहीं होती। इसलिए उसकी अतिरिक्त शक्ति समाधि के मानसिक चित्र के रूप में रूपांतरित हो जाती है। मतलब उस अतिरिक्त शक्ति से उसकी समाधि लग जाती है। 

जब शरीर में अपनी वर्तमान अवस्था की भावना की जाती है, तो सांस तेजी से पेट से बाहर निकलती है, खासकर अगर मस्तिष्क में दबाव ज्यादा हो। इससे ऊर्जा फ्रंट चैनल से नीचे उतरने से मस्तिष्क हल्का हो जता है। मुझे महसूस होता है कि यह नीचे गई ऊर्जा मूलाधार से वापिस मुड़कर रीढ़ की हड्डी से होते हुए पुनः मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मतलब ऊर्जा का एक क्लोज सरकट लूप सा बन जाता है। हैरानी यह कि यह ऊपर गई ऊर्जा फिर मस्तिष्क के भार को बढ़ाती नहीं पर हल्का करती है। वैसे भी भार तो ऊर्जा की कमी से बढ़ना चाहिए। शायद मस्तिष्क का पीछे का भाग भावना बनाने में ज्यादा मदद करता है, या यह पूरे मस्तिष्क का मुख्य नियंत्रिक है। इसीलिए इसके पिछले हिस्से को रीढ़ की हड्डी से मिल रही ऊर्जा ज्यादा कारगर होती है। ऐसा भी हो सकता है कि नीचे धकेली गई ऊर्जा ऑक्सीजन से भरी नहीं होती। हृदय चक्र से होकर नीचे गुजरते समय ऑक्सीजन से भरपूर होकर शुद्ध होकर पीठ से ऊपर चढ़ती है। शायद इसीलिए कहते हैं कि ऊर्जा माइक्रोकॉसमिक ऑर्बिट लूप में घूमती रहनी चाहिए। अगर दिमाग में सुस्ती है या कम दबाव है, तो सांस गहरा अंदर भरा जाता है। इससे ऊर्जा ऊपर चढ़कर मस्तिष्क को शक्तिमान कर देती है। मतलब मस्तिष्क में ऊर्जा ही नहीं है तो नीचे क्या उतरेगा। इसीलिए उस समय उसे नीचे से ऊपर चढ़ाने पर ही जोर होता है। यह खुद ही होता है। मतलब जैसे स्थूल भौतिक शरीर संतुलन में रहता है, वैसे ही यह मन को भी बना देता है, अगर सही से इसका ध्यान किया जाए।

कुंडलिनी जागरण भी भौतिक जागृति की तरह ही है। इसे भौतिक जागृत अवस्था का शिखर बिंदु भी कह सकते हैं। क्योंकि इसमें चेतन मन के साथ अवचेतन मन भी जाग जाता है। मतलब कुंडलिनी जागरण के लिए जागृत एवस्था से भी ज्यादा जागना पड़ता है। ऐसा जागृत अवस्था से ही हो सकता है, स्वप्न अवस्था से तो नहीं। हालांकि जागृत अवस्था को स्वप्न अवस्था बनाने से जो शक्ति की बचत होती है उससे इसे प्राप्त किया जा सकता है। मतलब स्वप्न का इसमें भी योगदान है। पर वह स्वप्न शक्तिहीनता वाला या सुस्ती वाला या मजबूरी वाला स्वप्न नहीं पर जानबूझ कर किया गया स्वप्न है। उस अतिरिक्त शक्ति से किसी गुरु, देवता आदि के रूप के मानसिक चित्र का ध्यान किया जाता है। अभ्यास से वह ध्यान इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि वह मानसिक चित्र जाग जाता है। वैसे तो आमतौर पर मानसिक चित्र स्वप्न की अवस्था में होता है, पर कुंडलिनी जागरण के समय वह जागृत अवस्था में आ जाता है। मतलब उस चित्र को बनाने वाली मानसिक तरंग इतनी मजबूत बन जाती है कि वह स्वप्न अवस्था की सीमा को पार कर के जागृत अवस्था के दायरे में प्रविष्ट हो जाता है। उसे जागृत करने वाली शक्ति इतनी ज्यादा होती है कि वह साथ में अवचेतन मन अर्थात आत्मा को भी जगा देती है। इसीलिए सब कुछ अद्वैतपूर्ण अर्थात एक जैसा अर्थात अपना ही रूप लगता है क्योंकि तब पहले वाला सोया हुआ अंधेरानुमा आत्मा जागृत कुंडलिनी चित्र जितना जाग कर उसके जितना ही प्रकाशमान बन जाता है। दरअसल जागृत तो आत्मा ही होता है। मानसिक ध्यान चित्र तो उसे जगाने का माध्यम भर ही है। क्योंकि कुंडलिनी चित्र तो एक मानसिक तरंग है, जो पहले ही एक जागृत अवस्था का रूप है। बेशक वह तरंग इतनी हल्की है कि स्वप्न अवस्था के दायरे में आती है। फिर भी तरंग तो तरंग ही है। स्वप्न अवस्था और जागृत अवस्था की मानसिक तरंगें एक ही चीज हैं, सिर्फ उनमें प्रगाढ़ता का अंतर है, अन्य कुछ नहीं। प्रकाश तो एक ही है, उसे कम करने पर वह बदल तो नहीं जाता। बोलने का मतलब है कि ध्यान चित्र सोया ही कहां था जो जागेगा। सोया हुआ तो अवचेतन मन से जुड़ा हुआ आत्मा होता है जो ध्यान चित्र की सहायता से जागता है। ध्यान चित्र तो शक्ति को मस्तिष्क में पहुंचाने का काम करता है। जब वह शक्ति एक निश्चित सीमा से ऊपर पहुंच जाती है तो वह अवचेतन मन को जगा देती है। इसे हम कुंडलिनी जागरण कहते हैं।

आत्मा ही है जो सोया होता है, और जो कुंडलिनी जागरण के समय जाग जाता है। वास्तव में उसका सुषुप्ति का भ्रम दूर होता है, क्योंकि भ्रम से ही वह सोया हुआ प्रतीत होता है। बेशक कुंडलिनी जागरण के कुछ क्षणों के अनुभव के बाद फिर से सो जाता है, पर वह सुषुप्ति उतनी प्रभावी नहीं रहती जितनी पहले थी क्योंकि अब उसने सच्चाई जान ली है। आदमी का अवचेतन मन उस दग्धबीज की तरह हो जाता है जिसमें नया जीवन या जन्म पैदा करने की शक्ति नहीं रहती। वह आत्मा के प्रकाश से जल गया होता है। जले हुए बीज की तरह वह रहता तो है पर नया जन्म नहीं दे सकता। फिर कहते हैं कि जो कुंडलिनी जागरण के बाद कर्म होंगे, वे तो अवचेतन मन को बनाएंगे ही फल देने के लिए। पर जब अवचेतन मन ही जल गया तब उसमें नए कर्म भी कैसे जुड़ सकते हैं। जब अवचेतन मन के अस्तित्व का आधार ही खत्म हो गया तो नया भी कैसे बनेगा। पर फिर कर्म का फल कैसे मिलेगा। फिर तो आत्मजागृत आदमी कुछ भी पाप कर्म बिना किसी भय के कर सकता है। तो इसके जवाब में कहते हैं कि अवचेतन मन के न रहने से उसकी कर्म और फल के प्रति आसक्ति नहीं रहती। प्रकाश की प्रकाश के प्रति कैसी आसक्ति। प्रकाश के प्रति तो अंधकार की ही आसक्ति होती है। वह तो समय के साथ बहता रहता है। यदि अज्ञानवश या मजबूरी में उससे पाप कर्म हो भी जाएं तो उसे उसका फल जल्दी से और हल्के रूप में मिलता है क्योंकि उसकी आसक्ति भी हल्की ही थी। अगर उसे उस जीवन में फल न मिल सके तो भी वह उन्हें प्रकृति को सौंप कर मुक्त हो जाता है। अब प्रकृति की मर्जी कि वह उसके फल किसको दे। शायद इसीलिए कहते हैं कि महापुरुषों द्वारा किए गए कर्मों का फल पूरी सृष्टि या पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। ऐसे बहुत से धर्म संस्थापकों, धर्मगुरुओं और महान या वैश्विक नेताओं के उदाहरण हैं। क्यों कई धर्म आजतक एक दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं, इसे भी इससे जोड़ा जा सकता है। ये सभी अनुभव और विचार शास्त्रों के हैं, जिनका हम यहां यथासंभव वैज्ञानिक विश्लेषण कर रहे हैं। जब आत्मा प्रकाशित या प्रकाशमान हो गया तब तो हर एक वस्तुचित्र या मनतरंग या पूरी दुनिया अपने जैसे ही लगेगी क्योंकि सभी चीजें प्रकाशमान ही हैं। प्रकाश से प्रकाश की कैसी भिन्नता। यह प्रकाश आम प्रकाश से भी बहुत ऊपर मतलब चेतना का प्रकाश होता है।

कुंडलिनी योग बनाम संन्यास~ एक गहन अन्वेषण

सभी मित्रों को प्रयागराज स्थित महाकुंभ मेले की शुभकामनाएं

दोस्तों इस बार सोचा कि जो कुछ मन में है, उसे लिखता जाऊं, बेशक वह व्यवस्थित पोस्ट न बन पाए? मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि मैं ऐसे ही बैठकर लिखने लग जाता हूं और वह लेख खुद ही एक व्यवस्थित पोस्ट बन जाता है।

महान कुंभ मेले में इस बार कई महान हस्तियां संन्यासी के रूप में दिखीं। उदाहरण के लिए, आईआईटी बाबा जी या गोरख मसानी जी और ममता कुलकर्णी जी। माना कि अधिकांश संन्यासियों को संसार छोड़कर शांति मिली, ज्ञान भी मिला। पर किसी ने भी आत्मज्ञान या कुंडलिनी जागरण मिलने का अनुभव बयां नहीं किया। तो क्या संन्यास सिर्फ शांति और ज्ञान तक ही सीमित रह गया है। सोचा जा सकता है कि कई लोग इसे जगजाहिर नहीं करते। पर यह बात गले नहीं उतरती। अगर वे चमत्कारों से भरी सिद्धियां और शक्तियां सबके साथ साझा कर सकते हैं, तो जागृति के अनुभव को क्यों नहीं। कहीं ना कहीं झोल तो जरुर है। मैं संन्यास परंपरा पर अविश्वास प्रकट नहीं कर रहा हूं। पर इसकी भी अपनी सीमाएं हैं।

संन्यासी लोग आम गृहस्थी लोगों को सादगी, साधना, परोपकार और निर्लिप्तता के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। पर यह पंथ भी पात्र लोगों के लिए ही सुरक्षित रहना चाहिए। अपात्र लोगों के इसमें प्रवेश से यह दूषित भी हो सकता है। पुराने जमाने में गुरु अपने शिष्य की कठोर परीक्षा लेकर आश्वस्त होने पर ही उसे संन्यासी अपनाने की अनुमति देते थे, ऐसे ही नहीं। वैसे तो अखाड़े में प्रवेश के लिए कठिन परीक्षा होती है, इसलिए इसकी गुणवत्ता पर शक नहीं किया जा सकता। अखाड़ों से इतर इधर उधर घूमते हुए और अपनी मनमर्जी के बाबा सबके बारे में भ्रम पैदा करते हैं। हमारे पूज्य दादा जी ने भी एक बार अपने गुरु से संन्यास में दीक्षा के लिए अनुमति मांगी थी। पर गुरु ने यह कहते हुऎ साफ इन्कार कर दिया था कि तब उनके गृहस्थी के दायित्व अधूरे थे। उन्होंने वह सलाह मान ली थी। इसी वजह से वह गृहस्थी में निर्लिप्त रूप से बने रहे। उन्हीं की बदौलत आज हम यहां पर हैं। अगर वे असमय ही संन्यासी बन गए होते तो हम आज हम न होते, न यह ब्लॉग ही होता, न इतनी पुस्तकें और न ही इतना ज्ञान विज्ञान।

संन्यास लेने से मस्तिष्क का भार कम होता है। इससे साधना करने का बल प्राप्त होता है। पर शक्ति की पर्याप्त उपलब्धता न होने से वह साधना अक्सर समय पर सफल नहीं हो पाती। आपको तो पता ही है कि शक्ति स्त्री के साथ जुड़ी होती है, और संन्यास में उसका साथ वर्जित है। या फिर शक्ति की कमी से सफलता मिलने में अनगिनत वर्ष लग जाते हैं। बहुत से लोग तो इस लंबी अवधि तक इंतजार ही नहीं कर सकते, और कई तो बोरिया बिस्तर बांध कर निकल लेते हैं। और कई साधनाभ्रष्ट होकर भांग आदि के नशे की आदत में पड़ जाते हैं। समय तो हर जगह ही चक्रवत चलता है। थोड़े समय के लिए दुनिया छोड़ने से बेशक शांति मिल जाए पर जल्दी ही वह शांति भी बोझ लगने लगती है। वह शांति सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नहीं। निरपेक्ष तो परम शांति ही है जो पूर्ण समाधि लगने पर ही मिलती है। सिर से बोझ हटाने पर भी कुछ समय के लिए सिर हल्का सा लगता है। पर कुछ समय बाद खाली सिर भी बोझ लगने लगता है। और फिर बोझा उठाने का मन करता है। उस थोड़े से सापेक्ष शांति के समय में अगर जागृति मिल गई तो ठीक है, नहीं तो फिर तो गई बात। यह इसलिए क्योंकि उस शांति का समय पूरा होने पर वह फिर से प्रकृति से विवश होकर दुनियादारी का बोझ उठा लेता है। बेशक वह दुनियादारी फिर मठ मंदिर तक ही सीमित है। पर है तो दुनियादारी ही। वहां से बोझ नहीं लिया तो यहां से ले लिया। सुवर्ण का कलश सिर से उतारा तो मिट्टी का उठा लिया।
बात एक ही है।

इस संदर्भ में मुझे योगवासिष्ठ ग्रन्थ की राजा शिखिध्वज की कथा याद आ रही है। वह महान ज्ञानी और योगिनी चुड़ाला का पति था। राजा राज्य छोड़कर जंगल को चला जाता है, और वहां एक गृहस्थ की तरह रहने लगता है। रानी उसे बहुत समझाती है पर उसके ऊपर तो संन्यास का भूत सवार था। सुबह शाम संध्या, तर्पण, देव बलि, यज्ञ, मूर्ति पूजा करना और उनके लिए पूरे दिनभर व्यस्त रहना। उसे जंगल में रहते हुए कई वर्ष बीत गए पर उसे जागृति का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हुआ। उसकी योगिनी पत्नी अपनी योगविद्या से उसका सारा तमाशा देख रही थी। दयावश वह जंगल में आ गई और उसका दुखड़ा सुनकर दयावश उसे समझाने लगी। वह अपने पति से कहने लगी कि जब उन्होंने गृहस्थी छोड़ दी थी तो जंगल में नई गृहस्थी क्यों शुरु की। एक बोझ उतारकर दूसरा बोझ उठाने से कैसे शांति मिलेगी। जो थोड़े समय के लिए सापेक्ष शांति मिली थी, उसमें उन्होंने असली ध्यान साधना नहीं की बल्कि अपनी संचित ऊर्जा नई गृहस्थी बढ़ाने में लगा दी। अब जब उनका मन साधना को कर रहा है तो जंगली गृहस्थी के जंजाल के कारण शक्ति नहीं बची है। समय से चूके तो चुक गए। फिर राजा ने अपनी पत्नि को अपना गुरु बनाया और उसके मार्गदर्शन में योग साधना की। अंततः उसे ज्ञान मिल गया। फिर जब वह उसे अपने साथ वापिस राज्य में ले जाने लगी तो राजा संकोच करने लगा इस डर से कि कहीं वह फिर अज्ञान में न पड़ जाए। तब रानी ने उसे समझाया कि ज्ञान होने के बाद अज्ञान नहीं होता, चाहे आदमी जिस मर्जी सुखभोग को अपनाए। हां एक शर्त है कि निर्लिप्त रहना पड़ता है। रानी की प्रणय विलास की लालसा भी राजा के असमय वन जाने के कारण अधूरी थीं। फिर वे दोनों सुंदर वाटिकाओं, वनों, उपवनों आदि में विविध विमानों से भ्रमण करते हुए और विविध प्रेमालाप करते हुए अपार सुख के साथ अपने राज्य को लौटे। अनगिनत वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य को भोगते हुए वे दोनों मुक्त हो गए। यह इस ग्रन्थ की मुख्य और बहुत सुंदर कथा है, और दर्शाती है कि स्त्रियां भी योग में पुरुषों से कम नहीं बल्कि बढ़कर होती थीं। यह कथा गृहस्थ धर्म की प्रमुखता को भी रेखांकित करती है।

सीमित शांति काल में तंत्रयोग ही जागृति दिला सकता है, पर वह सामाजिक रूप से वर्जित है। बेशक  उसमें वाममार्गियों द्वारा कुंडलिनी योग साधना के लिए मैथुन, मांस और मदिरा का प्रयोग होता है। पर वे समाज से दूर छिपे रहते हैं। ये साधन वेदबाह्य हैं। इसीलिए वामतंत्र के अंतर्गत आते हैं। इसका मतलब है कि गृहस्थ तो संन्यास से भी बेहतर है। क्योंकि वहां चोरी छिप के वाममार्गी साधना भी की जा सकती है। गृहस्थ के लिए तो यह वैसे भी संन्यासी से ज्यादा जरूरी है। क्योंकि उन्हें कालसंयोग से यदाकदा ही बहुत सीमित समय के लिए शांति काल मयस्सर होता है।

प्राचीन काल में एक सज्जन सरकारी नौकरी करते थे। उन्होंने बहुत संघर्षपूर्ण जीवन जिया। क्योंकि काम का बहुत ज्यादा दबाव रहता था। पर उन्होंने अपने मन में और अपने दैनिक जीवन में अध्यात्म की लौ नहीं बुझने दी। कालवश उनका स्थानांतरण सीमित समय के लिए एक निर्जन और सुनसान हिमालयी प्रदेश में हो गया। इससे उनको महान सापेक्ष शांति तो महसूस होनी ही थी। वहां किसी योगी के संपर्क में आने से उन्होंने घोर साधना करके जागृति प्राप्त की। और आम सज्जन से माहायोगी बन गए। फिर तो जल्दी ही उनका स्थानांतरण पुनः तनावभरे क्षेत्र में हो गया। हालांकि उन्होंने जैसे तैसे करके और थोड़ी बहुत करके अपनी साधना जारी रखी। इससे कालांतर में उनके अनेक शिष्य भी बन गए। वे सभी गृहस्थ योग का डंका बजाने लगे। बोलने का मतलब है कि ऐसा बहुतों के साथ होता है। मौके बार बार कम ही मिलते हैं। पर कम से कम एक मौका तो सभी को अपने जीवन में प्राप्त होता ही है।  

कुछ वैज्ञानिक भी कहते हैं ककि दुनियादारी और त्याग के बीच जितना ज्यादा अंतर होता है, उतनी ही ज्यादा अचानक जागृति मिलने की संभावना होती है। मेरे ख्याल से अगर तो जागृति के लिए साधारण प्रयास भी किया जाए, तब भी वह संभावना कई गुना बढ़ जाती है। अगर तो उसमें तांत्रिक शक्ति भी जुड़ी हो, तब तो कहना ही क्या? अगर संसार छोड़कर ही ज्ञान मिला करता, तब तो स्मृतिविहीन या नशेड़ी लोग परम ज्ञानी होते। इनको संसार का कुछ याद नहीं रहता, मतलब इनका संसार पूरा छूटा होता है। पर ज्ञान के लिए और भी बहुत से कारक उत्तरदायी हैं।

इसका मतलब है कि छोड़ने से कुछ नहीं छूटता। असली छोड़ना तो निर्लिप्त होना ही है। मतलब संसार में रहकर भी उससे निर्लिप्त या अनासक्त रहना ही उसे छोड़ना है। इससे दोनों किस्म के सुख एक साथ मिलते हैं। प्रेम आदि गृहस्थ के सुख भी और त्याग आदि संन्यास के सुख भी। गृहस्थ में रहकर हम सुख सुविधाओं का प्रयोग ज्ञानप्राप्ति के लिए भी कर सकते हैं। संन्यास में तो यह भी संभव नहीं है। बेशक सुख सुविधाएं माया मोह में डालने के करण बुरी हैं। पर यह माया मोह से बाहर निकालने में भी तो उपयोगी हो सकती हैं। जिस छुरे से डकैत आतंक मचा सकता है, सब्जी भी तो उसी से काटी जा सकती है। हम यहां किसी पद्धति की किसी से तुलना नहीं कर रहे हैं। न ही हम किसी को अच्छा या बुरा कह रहे हैं। हम केवल वह बता रहे हैं, जहां तक हमारी नजर जाती है। बेशक इसमें दो राय नहीं कि इसके आगे भी बहुत कुछ है।

कुण्डलिनी जागरण और आत्मज्ञान या आत्मबोध के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है

मुझे बिंग एआई से जानकारी मिली कि आत्मज्ञान धीरे धीरे हासिल होता है, किसी योग आदि तकनीक से एकदम से नहीं। पर आत्मज्ञान कहते हैं, अपने को महसूस करने को। बहुत से लोगों ने इसे योग तकनीक से महसूस किया है। मुझे भी परमात्मा की असीम कृपा से सौभाग्यवश तंत्रसहायित कुंडलिनी योग से इसकी मामुली सी झलक महसूस की थी, जिसका वर्णन तथाकथित 10 सैकंड का कुंडलिनी जागरण कह के वर्णित किया गया है इस वेबसाईट पर। दुर्भाग्यवश ज्यादातर लोग इस स्तर तक नहीं पहुंच पाए होंगे और कुंडलिनी क्रियाशीलता या तथाकथित कुंडलिनी जागरण तक ही सीमित कर पाए हों, और वैसा ही वर्णन उन्होंने ऑनलाइन किया हो, जिसे बिंग एआई ने पकड़ लिया हो। शायद चैट जीपीटी वही पकड़ता है जो ज्यादा होता है। उनका कुंडलिनी जागरण भी आत्मज्ञान से निचले स्तर का रहा होगा। जागरण या समाधि के भी स्तर होते हैं। जैसे कोई आदमी जागकर बैठता है, कोई चलता है, कोई दौड़ता है, तो कोई दुनिया जीतता है। इसी तरह कुंडलिनी जागरण की अंतिम पराकाष्ठा ही आत्मज्ञान है। अगर मैं पुराणपाठी गुरु और देवताओं के सान्निध्य और उनकी अप्रत्यक्ष प्रेरणा से साधारण कुंडलिनी जागरण को तांत्रिक बल न देता तो शायद वह कुछ ही क्षणों के लिए पूर्ण रूप से जागृत महसूस न हुई होती। यही पूर्ण जागृति आत्मज्ञान है। मतलब इसमें मन जागकर आत्मा या परमात्मा जितना विस्तृत हो गया है। सिर्फ स्तर का अंतर है, और कुछ नहीं। इसे ही पूर्ण समाधि भी कह सकते हैं। तथाकथित आम भाषा की समाधि भी कुंडलिनी जागरण का बहुत ऊंचा स्तर होता है। वैसे तो हरेक अनुभव किसी न किसी स्तर की समाधि होता है। किसी चीज से जुड़े बिना हम उसे अनुभव ही नहीं कर सकते। पर पूर्ण जागरण मतलब आत्मज्ञान उस तथाकथित या लोकप्रसिद्ध योगसमाधि से भी एक कदम आगे होता है। ज्यादातर मामलों में समाधि को ही योग से प्राप्त होने वाली अंतिम अवधि माना जाता है। यह इसलिए क्योंकि योग की सहायता से समाधि से आगे बहुत कम लोग गए होंगे जिनकी आवाज को अनसुना कर दिया गया होगा। संसार में तो बीन बाजे की ही ज्यादा पूछ होती है। ज्यादातर लोग लोकलाज या घरगृहस्थी की मोहमाया से घरबार न छोड़ सकने के कारण अपनी समाधि को यौनतांत्रिक बल न दे पाए होंगे। शायद इसी वजह से पतंजलि ने भी अपने अष्टांगयोग सूत्र में समाधि को ही योग की अंतिम अवधि मान बैठे हैं। हो सकता है कि वे अल्पसंख्यक योगियों की आवाज न सुन पाए हों। पतंजलि भी यही कहते हैं कि अगर समाधि के बाद ईश्वर के सहारे जीवन जिया जाए , तो उनकी कृपा से आत्मज्ञान भी शीघ्र ही हो जाता है। जो काम आदमी खुद कर सकता है, उसके लिए खुद भी प्रयत्न करना चाहिए, ईश्वर तो ख़ैर हमेशा ही सबकी सहायता करता है। यह अक्सर होता है कि अपने काम की कमी को पूरा करने के लिए भी ईश्वर से मदद मांगी जाती है। मुझे यह भी लगता है कि इसमें गलतफहमी भी हुई है। क्योंकि समाधि का अनुभव तो अक्सर योगसाधना की क्रिया के दौरान होता है, पर जागृति का नहीं। जागृति कहीं सुंदर स्थान जैसे झील के पास, पहाड़ पर, या समारोह आदि में ज्यादा होती है। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उस समय भी नियमित रूप से चल रही वर्तमानकालिक तांत्रिक योगसाधना से इकट्ठी हुई कुंडलिनी ऊर्जा ही जागृति कराती है। क्योंकि तांत्रिक तरीके से ही योगसाधना वैज्ञानिक रूप से निश्चित और अल्प समय में मतलब कुछ महीनों के अंदर आत्मज्ञान करा सकती है, पर साधारण योग से तो पूर्णतः अनिश्चित होता है। क्या पता कितने साल में होए, पूरी उम्र में होए या ताउम्र न होए। ज्यादातर को तो ताउम्र नहीं होता, ऐसा लगता है। लोग बताने से छिपाते हों, यह अलग बात है। पूरी तरह से चमत्कार या विशेष कृपा की जरूरत होती है, जैसा पतंजलि कहते हैं। वैसे यह पतंजलि की मजबूरी भी रही होगी क्योंकि अगर उनकी पुस्तक में तंत्र का उल्लेख किया गया होता, तो शायद वह उस समय के अति आदर्शवादी समाज को ज्यादा स्वीकार्य न होती। एक कामयाब लेखक बनने के लिए कई बार सत्य को ढकना भी पड़ जाता है। इसीलिए मुझे शिव सबसे बड़े देवता लगते हैं, क्योंकि वे खुलकर सत्य सबके सामने रखते हैं। जिसे ऑनलाइन पोर्टल पर उम्र के पड़ाव के साथ धीरे धीरे मिलने वाला बताया गया है, वह आत्मज्ञान नहीं बल्कि आत्मा की विचारों की गंदगी की सफाई है। आत्मा मतलब अपने को जानने में तो कुछ ही क्षण काफी हैं। हम दोस्त को पहचानने में भी कुछ क्षणों से ज्यादा समय नहीं लेते, फिर उस अपने आप को पहचानने में कैसे ज्यादा समय ले सकते हैं, जो सबसे निकट है।

शुभ दीपावली

कुंडलिनी योग जीवन का पार्श्वसंगीत है

दोस्तों, पिछली पोस्ट में शक्तिजल की बात हो रही थी। मुझे तो लगता है कि इंद्र जो बारिश करता है, वह जागृति की ही बारिश है, वही सुषुम्नाशक्ति रूपी वज्र चलाता है। इंद्र की प्रसन्नता मतलब सभी देवताओं की प्रसन्नता या अनुकूलता। यही चढ़दी कला है। मैं यह नहीं कह रहा कि भौतिक वर्षा के साथ इंद्र का संबंध नहीं है। वह भी जरूर है क्योंकि जो भीतर है, वही बाहर भी है। जैसे बारिश होने के लिए सभी देवताओं के साथ से पैदा होने वाली अनुकूल परिस्थितियां चाहिए, वैसे ही जागृति के लिए भी। पुराणों पर प्रेम और विश्वास बना रहे, तो सभी रास्ते खुद ही खुलने लगते हैं। फिर कथा में आया था कि गौतम मुनि ने वरुण देव के वरदान से अक्षय जल पाया। वरुण देवता वेदों के एक प्रमुख देवता हैं। वे जल के अधिपति देवता हैं। जलरूपी शक्ति के बिना गूढ़ आध्यात्मिक वेदों का सही ज्ञान होना संभव नहीं है। वरुणदेव सीमित जल ही दे सकते हैं। ख्वाजा भी सिंधुघाटी सभ्यता का ऐसा ही देवता था, जो समुद्र, नदियों और जल का अधिपति था। मैंने एक भूमिगत जल का पता लगाने वाले आदमी के बारे में सुना था जो काफी सटीक आकलन करता था, और ख्वाजा का सिद्ध उपासक था। वैसे आज भी कई गांवों में ख्वाजा की जलदेव के रूप में पूजा करते हैं। हो सकता है कि वेदों में गुप्त भाषा में वरुणदेव उसके प्रतीक के तौर पर कहा गया हो, जिसकी सहायता से शरीर में शक्तिजल की उपलब्धता बराकरार रहती हो, पर उसके पाठकों या व्याख्याकारों ने उसे भौतिक जल का देवता मान लिया हो। कुछ भी हो, बाहर भीतर में समानता तो है ही, इसलिए एकदूसरे को जरूर प्रभावित करते होंगे। मुझे खुद महसूस होता है कि शुद्ध जल से भरे झील, सरोवर आदि जलस्रोतों के निकट कुंडलिनी शक्ति बहुत अच्छे से घूमने लगती है, क्योंकि दोनों के स्वभाव में बहना है। दोनों में संबंध तो है ही। हिंदुओं और बौद्घों में नागदेवता को भी जल का देवता माना जाता है। कुंडलिनी शक्ति नाड़ी भी नाग की आकृति में होती है। हमारे गांव में नेउआ मतलब दिव्य नाग या सर्प और ख्वाजा दोनों को स्थानीय जल और उसके आसपास उपजी वनस्पति का अधिपति माना जाता था। जो जल के आसपास वनस्पति काटता था, उसे नेऊआ सांप के द्वारा पीछा करने का भय दिखाया जाता था, जिससे वनों का अच्छा सरंक्षण होता था। कई जगह मैंने ख्वाजा को मछली के रूप जैसी मूर्ति में भी देखा। इसका मतलब है कि वरुण, नाग और ख्वाजा आपस में जुड़े हैं और तीनों जलरूपी शक्ति के देवता हैं। यह भी मान्यता है कि ये सिर्फ़ जल ही नहीं देते, बल्कि अन्य दुनियावी समृद्धियां और सुरक्षाएं भी देते हैं। मतलब ये शक्ति के देवता ज्यादा लगते हैं।

इसी तरह इंद्र देव भी वेदों में बहुतायत में वर्णित हैं। जो देव जागृति के लिए जरूरी है, उसका ज्यादा वर्णन होगा ही। क्योंकि वेद का मूल ध्येय जागृति ही है। गुप्त तरीके से शायद इसे ही वर्षा लिखा है। जहां वर्षा है, वहीं कर्म, यज्ञ, धनधान्य और समस्त वैभव हैं। इन्हीं से सब चढ़दी कला में रहते हैं। ऐसी ही अवस्था में जागृति होती है। बेशक इसके भौतिक और आध्यात्मिक दोनों अर्थ हों, पर दूसरा ही ज्यादा सटीक लगता है, क्योंकि वेद अध्यात्म को डील करते हुऐ लगते हैं, न कि भौतिकता को।

मुझे लगता है कि जागरण और आत्मसाक्षात्कार के बीच अंतर है। पहली अवस्था प्रारंभ है, तो दूसरी अवस्था आध्यात्मिक विकास का चरम या अंत। मुझे यह जीपीटी एआई पावर्ड बिंग सर्च से पता चला। कहते हैं कि कईयों की कुंडलिनी बचपन से ही जागृत होती है। अगर कुंडलिनी जागरण पूर्णता होती तो उसके बाद पुनर्जन्म क्यों होता। यह भी हो सकता है कि पूर्णता के अनुभव के बाद भी आत्मा की पूरी सफाई जरूरी हो, जिसके लिए कई बार नया जन्म लेना पड़ता होए। यह भी बोलते हैं कि महान व्यक्तियों जैसे कलाकारों और नेताओं की कुंडलिनी भी जागृत होती है। बिंग एआई निःशुल्क है और सबसे अच्छी जानकारी देने वाला लगा मुझे, हिंदी अंग्रेजी दोनों में। आजकल ब्लॉग लिखने में और शोध करने में एआई से बहुत मदद मिल रही है। जब शरीर के भौतिक संपर्क के बिना आदमी को अंधेरा सा महसूस होता है, तो उसे कहते हैं कि शक्ति सोई हुई है। पर जब अंधेरे के बीच में भी एक ध्यान चित्र हमेशा चमकता है, तब उसे कहते हैं कि शक्ति जागी हुई है। यहां से साधना शुरु होती है, जिससे ध्यानचित्र उत्तरोत्तर चमकता जाता है, मतलब कुंडलिनी शक्ति को ज्यादा से ज्यादा जगाया जाता है। फिर एक समय ऐसा आता है, जब ध्यानचित्र इतना ज्यादा मजबूत हो जाता है कि साधक को अपने और ध्यानचित्र के बीच फर्क ही महसूस नहीं होता, न ही उसे ऐसा लगता है कि वह उसका ध्यान कर रहा है। मतलब इसमें ध्यान करने वाला, ध्यानचित्र, और ध्यान की प्रक्रिया, तीनों एकाकार हो जाते हैं। इसे ही समाधि कहते हैं। इसी के दौरान कभी भी आत्मसाक्षात्कार अर्थात आत्मज्ञान का अनुभव हो सकता है। शायद मैं इसे ही पहले कुंडलिनी जागरण कह के वर्णन कर रहा था। कोई बात नहीं, यह सिर्फ़ शब्दावलियों का अंतर है, अनुभव में कोई अंतर नहीं पड़ता।

पिछली कथा के अनुसार गंगा रूपी शक्तिजल ने देवताओं से इस शर्त पर हमेशा सुषुम्ना में बसे रहने को कहा था कि उसे सर्वाधिक महत्त्व देना होगा। मतलब साफ है कि अगर रोज योग करते हुए सुषुम्ना में बह रही शक्ति को महसूस न किया गया, तो वह धूमिल पड़ जाएगी। मतलब बेशक कुछ भी काम छूट जाए, पर योग नहीं छूटना चाहिए। अक्सर होता यह है कि भैतिक कर्म ही दिखता है, मानसिक या आध्यात्मिक कर्म नहीं। प्राचीन भारत में लोग ज्ञान, भक्ति आदि जैसे मानसिक कर्म में लगे होते थे, जो सबसे बड़ा कर्म है, क्योंकि इसी से मुक्ति और सृष्टि चक्र को सही गति मिलती है। शेष दुनिया विशेषकर पश्चिम में भौतिकता, साफसफाई आदि में ही व्यस्त रहते थे लोग, जो काम के रूप में स्पष्ट नजर आते हैं। वैसे सर्वोत्तम तरीका कर्मयोग है, जिसमें भौतिक कर्म और योगसाधना खुद ही एकसाथ होते रहते हैं।

दरअसल कुंडलिनी योग जीवनरूपी विविध धुनों को जोड़ने वाला बैकग्राउंड म्यूजिक है। जब किसी कारणवश मुख्य संगीत बजना बंद हो जाता है, तो यही पार्श्व संगीत सुखी जीवन के लिए सहारा होता है। जैसे मुख्य संगीत बंद होने से पार्श्व संगीत बहुत तेज लगने लगता है, वैसे ही जीवन की सांसारिक गतिविधियों के शोर के शांत होने से योग का ध्यानचित्र बहुत तेज चमकने लगता है, जिससे वह जागृत भी हो सकता है। संभवतः पुराणों में इसी को गड्ढे में साधना या समुद्र के भीतर बंद व अंधेरे कारागार में साधना आदि की उपमा दी गई है।

ऋषि गौतम की पिछली कथा का एक दूसरा रूपांतर भी है। इसमें गाय के मरने पर गौतम को कुटिल ऋषियों के षड्यंत्र का पता चल जाता है। इससे क्रुद्ध होकर वे उन्हें और उनकी संतानों को शैवधर्म से बहिष्कृत रहने का और उससे नरकगामी बनने का श्राप देते हैं। कहते हैं कि फिर कलियुग उन्हीं के जैसे लोगों से भर गया। उस कथा रूपांतर में उन्हें शिवदर्शन होने का कोई उल्लेख नहीं है। मतलब साफ है कि दुष्ट ऋषियों की साजिश को उन्होंने सकारात्म सकारात्मकता से लेते हुए शिवसाधना नहीं की, बल्कि अपनी संचित ऊर्जा क्रोध में और श्राप देने में लगा दी, इसीलिए उन्हें जागृति नहीं मिली। हरेक क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है।

जाएं तो आखिर जाएं कहां~ एक भावपूर्ण कविता

है कौन यहाँ, है कौन वहाँ 
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।
है नीचे भीड़ बहुत भारी पर
ऊपर मंजिल खाली है।
हैं भीड़ में लोग बहुत सारे
कुछ सच्चे हैं कुछ जाली हैं।
मंजिल ऊपर तो लगे नरक सी
न दाना न पानी है।
निचली मंजिल की भांति न
उसमें अपनी मनमानी है।
है माल बहुत भेजा जाता पर
अंधा गहरा कूप वहाँ।
न यहाँ के ही न वहाँ के रह गए
पता नहीं खो गए कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

नीचे पूरब वाले हैं पर
ऊपर पश्चिम (ही) बसता है।
ऊपर है बहुत महंगा सब कुछ
नीचे सब कुछ सस्ता है।
हैं रचे-पचे नीचे फिरते सब
ऊपर हालत खस्ता है।
बस अपनी अपनी डफली सबकी
अपना अपना बस्ता है।
हैं सारे ग्रह तारे सूने बस
धरती केवल एक जहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

अंधों का इक हाथी है हर
कोई (ही) उसका साथी है।
बहुते पकड़े हैं पूँछ तो कोई
सूंड पैर सिर-माथी है।
सब लड़ते रहते आपस में कह
मैं तो कहाँ, पर तू है कहाँ
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएं कहाँ।

है कटता समय-किराया हरपल
संचित धन ही काम करे।
जा नई कमाई कोष में केवल
खर्च से वो रहती है परे।
है कैसा अजब वपार (व्यापार) है जिसका
तोड़ यहाँ न तोड़ वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है नीचे रोक घुटन भारी पर
ऊपर शून्य हनेरा है।
ऊपर तो भूखे भी रहते पर
नीचे लंगर डेरा है।
है अंधा एक तो इक लंगड़ा
दोनों में कोई प्रीत नहीं।
ले हाथ जो थामे इकदूजे का
ऐसा कोई मीत नहीं।
है कैसी उल्टी रीत है कैसा
उल्टा मंजर जहाँ-तहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएं तो आखिर जाएँ कहाँ।

है बुद्धि तो धन है थोड़ा
पर धन है तो बुद्धि माड़ी।
है बुद्धि बिना जगत सूना
बिन चालक के जैसे गाड़ी।
बस अपने घर की छोड़ कथा हर
इक ही झांके यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

आ~राम तो है सत्कार नहीं
सत्कार जो है आराम नहीं।
है पुष्प मगर वो सुगंध नहीं
है गंध अगर तो पुष्प नहीं।
इस मिश्रण की पड़ताल में मित्रो
भागें हम-तुम किधर कहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।

है कर्म ही आगे ले जाता
यह कर्म ही पीछे को फ़ेंके।
है जोधा नहीँ कोई ऐसा जो
कर्म-तपिश को न सेंके।
न कोई यहाँ, न कोई वहां बस
कर्म ही केवल यहाँ-वहाँ।
है कौन यहाँ, है कौन वहाँ
जाएँ तो आखिर जाएँ कहाँ।
अनुमोदित व सर्वपठनीय भावपूर्ण कविता संग्रह