कुण्डलिनी योग से मनोमय कोष रूपी पतंग प्राणमय कोष और अन्नमय कोष रूपी माँझे और चकरी से जुड़कर विज्ञानमय कोष रूपी उड़ान भरकर आनंदमय कोष रूपी मजा देती है

होता क्या है कि जब योग करते समय अन्नमय शरीर और प्राणमय शरीर के क्रियाशील होते ही मनोमय शरीर क्रियाशील होता रहता है, तब यह विश्वास पक्का होता रहता है कि मनोमय शरीर बेशक बाहरी और अनंत अंतरिक्ष में फैला महसूस होए, पर वह हमारे शरीर से जुड़ा हमारा ही स्वरूप है। हालांकि दुनियादारी के सभी कामों, खेलों, व व्यायामों के दौरान भी अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और मनोमय कोष एकसाथ सक्रिय हो जाते है, पर वे इतनी तेजी से सक्रिय होते हैं कि उनकी आपस में एकत्व भावना करने का मौका ही नहीं मिलता। साथ में आदमी का ध्यान काम की पेचीदगी, उससे जुड़ी तकनीक, उससे जुड़े फल पर और अन्य लौकिक दुनियादारी पर भी रहता है, जिससे भी एकत्व की भावना की तरफ ध्यान नहीं जाता। वैसे भी एकत्व की भावना द्वैत से भरी दुनियादारी की विरोधी है। दो विरोधी चीजें साथ नहीं रह सकतीं। जल और अग्नि साथ नहीं रह सकते। मनोमय शरीर के प्रति इसी आत्मभावना से विज्ञानमय शरीर भी क्रियाशील हो जाता है। दुनियादारी का हर किस्म का ज्ञान साधारण ज्ञान की श्रेणी में आता है। किसी को डॉक्टरी का ज्ञान है, किसी को दर्जी का, किसी को नाई का, किसी को अध्यापन का, किसी को उपदेश देने का, किसी को यज्ञ या कर्मकांड करने या अन्य धार्मिक परम्परा निभाने का है। सब साधारण ज्ञान में आते हैं क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए और लौकिक व्यवहार के लिए हैं। विशेष ज्ञान या विज्ञान इन सबसे हटकर व अकेला है, जो न तो जीविकोपार्जन के लिए है, और न ही लौकिक व्यवहार की सिद्धि के लिए है, बल्कि केवल आत्मा की पूर्ण व प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए है। विज्ञानमय शरीर का मतलब ही विशेष ज्ञान वाला शरीर है। इसमें स्थित होने पर साधक को ऐसा महसूस होता है कि वह स्थूल शरीर, प्राण, और मन का मिलाजुला रूप माने संघातमात्र है। जैसा मैंने पिछली पोस्ट में भी पतंग के उदाहरण से स्पष्ट किया था। अगर भटकते मन को अपना आत्मरूप न भी समझ सको तो यह तो समझ ही सकते हैं कि वह शरीर से साँस के माध्यम से ऐसे ही जुड़ा है जैसे एक पतंग मांझे के माध्यम से गट्टू या चकरी से जुड़ी होती है। पतंग उड़ाने का बहुत मजा आएगा। कभी बादलों के ऊपर, कभी दूर देश, कभी दूर ग्रह या तारे पर, कभी दूसरे ब्रह्माण्ड में, कभी परलोक में, तो कभी बिल्कुल पास में या चकरी में लिपटी हुई, कभी आँखों से ओझल होगी और सिर्फ चकरी और धागा ही नजर आएगा, फिर एकदम कहीं प्रकट हो जाएगी, कभी तूफ़ान में जैसी फँसी हुई बेढंगी उड़ेगी और बेढंगी दिखेगी, इस तरह अनंत आकाश में वह हर जगह उड़ेगी, पर हमेशा जुड़ी रहेगी शरीर के चक्रोँ के साथ। शायद चकरी से ही चक्र नाम पड़ा हो। हाहा। अब मनोवैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि सूक्ष्मशरीर स्थूलशरीर के साथ एक चांदी के धागे से जुड़ा होता है। यह धागा नाभि से जुड़ा होता है। जैसे मांझा चकरी से बँधा होता है, वैसे ही योगा सांस नाभि से ही चलती है। सीधी सी बात है, अनुभव रूपी पतंग हमेशा अपने से अर्थात आत्मा से अर्थात अपने शरीर से जुड़ी हुई है। सम्भवतः इसीलिए नाभि चक्र को आदमी के शरीर का केंद्र बिंदु कहते हैं। नाभि पर एक अंदर की तरफ भिंचाव सा महसूस भी होता है, जब सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर का ध्यान भी किया जाता है। सम्भवतः नाभि चक्र से ही पतंग की चकरी का नाम पड़ा हो। उससे भौतिक दुनिया का प्रकाश आत्मा को मिलेगा ही, क्योंकि आत्मभावना जुड़ी है सबके साथ। फिर पूर्वोक्तानुसार आनंद भी पैदा होगा ही और कुण्डलिनी भी अभिव्यक्त होगी ही, क्योंकि कुण्डलिनी चित्र ही ऐसी भौतिक वस्तु है, जो ध्यान के माध्यम से आत्मा से सबसे ज्यादा जुड़ी होती है। मतलब कुण्डलिनी आत्मा से भौतिक दुनिया के जुड़ाव की प्रतिनिधि है। विशेष ज्ञान या विज्ञान के विपरीत साधारण ज्ञान दुनियादारी के मामले में होता है। ज्ञान जल्दी ही अज्ञान में परिवर्तित हो जाता है अगर उसे विज्ञान का साथ प्राप्त न हो। यह साइंस वाला विज्ञान नहीं है। प्राणमय शरीर का मतलब साँस पर ही ध्यान नहीं है, पर साँस से उत्पन्न शरीर की गति और शरीर के अन्य हिलने-डुलने पर ध्यान भी है। इस मामले में पैदल चलना एक सर्वोत्तम अध्यात्मवैज्ञानिक व्यायाम लगता है। इसमें पूरे शरीर पर, उसकी गति पर, उसकी संवेदनाओं पर और सांसों पर अच्छे से ध्यान जाता है। साथ में मन में भी सात्विकता के साथ विचारों की क्रियाशीलता भी काफी अच्छी होती है।

कुण्डलिनीयोग एक अध्यात्मवैज्ञानिक मशीन के रूप में

मनोमय शरीर भी आदमी खुद ही होता है। वह कोई और नहीं होता। वह बहुत विस्तृत होता। जब उसे अपने आप के रूप में अनुभव किया जाता है, तब वह क्षीण होने लगता है, और कुण्डलिनी छवि का रूप लेने लगता है। खालीपन, हल्कापन और आनंद सा भी महसूस होता है। इसी तरह, दरअसल ज्ञान आत्मा का होता है। पर विज्ञान मतलब विशेष ज्ञान तब होता है, जब आत्मा के साथ मन मतलब मनोमय शरीर भी जुड़ जाता है। मन आत्मा का ही विशेष रूप है। इसलिए मन का ज्ञान जब आत्मा के विशेष ज्ञान के रूप में किया जाता है, तब यही विज्ञानमय कोष है। मन का साधारण व पराई वस्तु के रूप में ज्ञान तो मनोमय कोष है। पर जब उसे ही अपना रूप समझा जाता है, तब यही विज्ञानमय कोष है। यह भी शरीर से जुड़ा हमारा ही भाग या कोष है, पर लगता है जैसे बाहर अनंत दिशाओं और दूरियों में फैला है। दरअसल आदमी एक उड़ती हुई पतंग की तरह है। मन उड़ने वाला रंगीन कागज है, इसके शरीर से जुड़े होने की भावना डोर है, और शरीर उस डोर को पकड़ने वाला है। जब तक डोर है, तभी तक पतंग सलामत है, नहीँ तो भटक कर नष्ट हो जाएगी। एक जगह मैंने बस के डेशबोर्ड पर लिखा हुआ पढ़ा था कि मन एक पैराशूट की तरह है, यह तभी अच्छे से काम करता है, जब यह खुला हुआ होता है। शायद इसका भी यही अर्थ है। शास्त्रों में इसे ऐसे कहा है कि मन को दृष्य रूप न समझकर द्रष्टा रूप समझना है। साक्षीभाव भी यही है, बल्कि इसका ही हल्का और आसान तरीका है। जब आत्मा मन को चुपचाप साक्षी बनकर देखता है, तब भी मन की ध्यान छवि अभिव्यक्त होने लगती है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि मन आत्मा का ही विशेष रूप है, मतलब मन विज्ञान रूप है। मन तभी तक है, जब तक इसे बाहरी या पराया समझा जाए। जब इसे अपना आत्मरूप समझा जाता है, तब यह हल्का पड़ने लगता है। घर की मुर्गी दाल बराबर। महत्त्वबुद्धि बाहरी या पराई चीज के लिए होती है, अपनी चीज या अपने लिए नहीं। इसमें मन नष्ट नहीँ होता, बल्कि महत्त्वहीन सा होकर धीमा पड़ जाता है। इससे आनंद पैदा होता है। पहले की भटकी हुई अवस्था में मन ने जो अतिरिक्त शक्ति ली हुई थी, वह कुण्डलिनी छवि को मिल जाती है। इससे आनंद में और इजाफा होता है, क्योंकि कुण्डलिनी छवि लम्बे समय तक बने रहकर बिना आदमी के दार्शनिक प्रयास के खुद ही भटकते मन की अतिरिक्त चर्बी उतारकर चूसती रहती है, जिससे आनंद लम्बे समय तक, और पहुंचे हुए कुण्डलिनी योगियों में तो स्थायी ही बना रहता है। मन की हल्की वृत्ति सत्त्वगुणरूप है। इसलिए मन के  क्षीण होने से जो मनमिश्रित अंधेरा जैसा पैदा होता है, उसे सतोगुणी अविद्या कहते हैं, जैसा पिछली पोस्ट में बताया गया था। इसी से इसमें आनंद होता है। यही आनंदमय कोष है। इसके विपरीत मन का बिल्कुल नष्ट होना तमोगुणरूप है, और मन का पूरे वेग में होने से उसका वास्तविक जैसा लगना रजोगुणरूप है। इनके साथ जुड़ा अविद्यारूपी अंधेरा क्रमशः तमोगुणी अविद्या और रजोगुणी अविद्या है। पहली अवस्था में दुःख और दूसरी अवस्था में सुख होता है, आनंद नहीँ। सुख और दुःख एकदूसरे से जिन्दा रहते हैं। आनंद सुख व दुःख से परे है, और हमेशा एक जैसा बना रहता है। आनंद को सुख और दुःख का मिश्रित रूप भी कह सकते हैं, क्योंकि इसमें मन और अंधेरा दोनों बराबर संतुलन में एकसाथ रहते हैं। रजोगुण में मन बहुत भड़कीला होता है, जिसके साथ अंधेरा बिल्कुल नहीँ रहता, इसलिए यह सुख है। जब मन थककर बैठ जाता है, तब पूरी तरह से बेजान सा हो जाता है, जिससे मस्तिष्क में घुप्प अंधेरा छा जाता है। यह दुःख है। यही घोर तमोगुण भी है। सुख और दुःख का चक्र चलता रहता है, जिससे आत्मा की सफाई नहीं होती। मुझे अपनी प्रारम्भिक पुस्तक के समय इसका इतना गहरा विश्लेषण पता नहीं था, हालांकि ऐसा व्यावहारिक अनुभव जरूर था। उसमें मैंने इसे ऐसे लिखा है कि अनासक्ति से ही आनंद पैदा होता है। बात सही भी है। अनासक्ति से मन धीमे और संतुलित चलता है। वैसे आसक्ति औरों के प्रति ही होती है, अपने प्रति नहीँ। इसलिए मन को आत्मा समझने से अनासक्ति खुद पैदा होती है। मैंने अनासक्ति सिद्धांत के बहुत से उदाहरण दिए थे। जैसे कि आनंद मदिरा से नहीं बल्कि उससे मन के धीमा होने से होता है, जो अनासक्ति व सत्त्वगुण का लक्षण है। इसी तरह आनंद मांसभक्षण से नहीं बल्कि उससे उत्पन्न जीवन के प्रति नश्वर बुद्धि से पैदा वैराग्य से उत्पन्न अनासक्ति से पैदा होता है। ऐसे बहुत से उदाहरण दिए थे।

कुण्डलिनी योग से यही प्रभाव पैदा होता है। अनासक्ति अर्थात अद्वैत और कुण्डलिनी साथसाथ रहते हैं। इसलिए कुण्डलीनियोग से कुण्डलिनी छवि के मन में रहने पर आनंद पैदा होता है। अतः कुण्डलीनियोग एक अध्यात्मवैज्ञानिक मशीन या तकनीक या ट्रिक की तरह है, जो अनासक्ति के दार्शनिक झमेले से बचाते हुए स्वचालित रूप से अनासक्ति का प्रभाव पैदा करता है। इसका उदाहरण मैं अपने से देता हूँ। मैंने बहुत पैसा खर्च करके कुछ विकासात्मक काम किए थे। पर कुछ अटल कारणों से उनमें से कुछ चीजें छूट गईं और कुछ में घाटा हुआ। मुझे पछतावा भी हुआ और नहीं भी, क्योंकि चलना ही जीवन है। जब आदमी बाहर नजर घुमाए रखता है तब वह अपनी चीज से संतुष्ट नहीँ होता। उससे उसका अपना आनंद भी गायब हो जाता है। मैं डिस्टर्ब सा रहने लगा। मैंने कहीं से कुण्डलिनी योग सीखा और सोचा कि सब ठीक हो जाएगा। योग से मेरा खोया हुआ आनंद लौट आया, वह भी सूद समेत। मैंने आध्यात्मिक उन्नति भी बहुत की। उस समय तो इसके आधारभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का पता नहीं था, पर आज इसका पता चला है। कुण्डलिनी एक चमत्कारिक मानसिक ध्यान छवि है, जो एक स्वचालित यंत्र की तरह हर प्रकार से लाभ करती है। हुआ क्या कि कुण्डलिनी ने मेरे भटके हुए मन की शक्ति हर ली। इससे कुण्डलिनी की सहायता से अनायास ही मेरा मनोमय कोष विज्ञानमय कोष में बदल गया। विज्ञानमय कोष आनंदमय कोष में तब्दील हो गया। उक्त विकासात्मक दुनियादारी से मेरे प्रारम्भिक तीनों कोष बहुत विकसित हो गए थे। वैसे तो अद्वैत की सहायता से विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष को भी मैं इनके साथ विकसित कर रहा था, पर अंतिम दो कोशोँ को रॉकेट गति कुण्डलिनी योग से ही मिली जिससे कुण्डलिनी जागरण की तथाकथित मामुली सी झलक भी मिली थी।

कुण्डलिनी योग आनंदमय कोष के साथ शरीर के सभी कोषों को एकसाथ खोलता है

शास्त्रों के अनुसार हमारी स्थूल देह का नाम अन्नमय कोष है, जो कि मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है। शरीर में स्थित पांच वायु और पांच कर्मेंन्द्रियों के समूह को प्राणमय कोष कहते हैं। मन सहित पांचों ज्ञानेनिद्रियों के समूह को मनोमय कोष कहा गया है। बुद्धितत्व युक्त पांचोँ ज्ञानेंद्रियों के समूह को विज्ञानमय कोष कहते हैं। सबसे भीतरी और सूक्ष्म कोष आनंदमय कोष है, वह सत्वगुणी अविद्या से संचालित है। परन्तु आत्मा इन सब से अछूती है। इसका थोड़ा विश्लेषण करते हैं। स्थूल शरीर मतलब अन्नमय कोष तो सबके प्रत्यक्ष है ही। कर्मेंन्द्रियों को प्राणमय कोष में इसलिए लिया गया है, क्योंकि प्राणों का सबसे पहले स्पष्ट प्रभाव कर्म-इन्द्रियों पर ही नजर आता है। कुण्डलिनी योग के दौरान जब प्राण को विशेष चक्र पर केंद्रित करते हैं, तो वहाँ सिकुड़न जैसी हलचल होती है, और उससे जुड़ी कर्मेंन्द्रियों को शक्ति मिलती है। तभी तो व्यायाम, खेल, दौड़ व भारी काम से सांस तेज चलती है, जिससे कर्मेंन्द्रियों को प्राणों का संचार बढ़ता है। मानसिक काम से वैसी साँस नहीँ फूलती, इसलिए इसे मनोमय कोष में रखा गया है। दूरदर्शन देखते और सुनते समय साँस नहीँ फूलती। किसी भोजन को सूंघते और चखते हुए या उसको स्पर्श करते हुए भी साँस नहीँ फूलती। इसीलिए त्वचा, आँख, कान, नाक और जिव्हा पांचोँ को ज्ञानेंद्रियों में रखा गया है। मतलब ये कर्मप्रधान की अपेक्षा ज्ञानप्रधान हैं। कर्म तो इनसे भी होता है। जननेन्द्रिय को भी कर्मेंन्द्रिय में रखा गया है, क्योंकि इसके प्रयोग से भी साँस फूलती है। गुदा इन्द्रिय को भी कर्मप्रधान कर्मेंन्द्रियों के साथ रखा गया है। पांचोँ ज्ञानेंन्द्रियों को मन के साथ इसलिए मनोमय कोष में रखा जाता है, क्योंकि इनसे संवेदनाओं के अनुभव से मन क्रियाशील हो जाता है। सुंदर दृश्य देखने से या सुंदर संगीत सुनने से मन में सुंदर विचार आते हैं। विचारों को साधारण ज्ञान कह सकते हैं। विशेष ज्ञान बुद्धि के सहयोग से ही पैदा होता है। जैसे कार के शोरूम में बहुत से साधारण विचार आते हैं। आदमी जब बुद्धि से कार खरीदने का निर्णय लेता है, तो उसकी खरीद से जुड़े विचार ज्यादा ताकतवर, प्रभावशाली, व्यावहारिक और कर्मप्रेरक होते हैं। ‘वि’ मतलब विशेष, इसलिए विज्ञान मतलब विशेष ज्ञान। इससे आनंद पैदा होता है। कार का मालिक बन कर किसको आनंद नहीं होता। वह आनंदमय कोष से महसूस होता है। दरअसल आनंद बिना लहरों की शुद्ध आत्मा में महसूस होता है। विज्ञान और कर्म की ताकतवर व्यक्त लहरों से सूक्ष्मशरीर में ताकतवर छाप पड़ती है। उस छाप को ही सत्त्वगुणी अविद्या कहा गया है। मतलब कार खरीदने की क्रिया को आप सत्त्वगुणप्रधान कह लो, क्योंकि यह काम आराम से, आनंद से, तसल्ली से, इंसानियत से और शिष्टाचार से होता है। इसलिए इससे जो छाप सूक्ष्मशरीर अर्थात अविद्या अर्थात विशेष अँधेरे पर पड़ती है, वह भी वैसी ही होती है। सीमित समय के लिए ही इस छाप का प्रभाव शेष अनंत सूक्ष्मशरीर के मुकाबले ज्यादा होती है, क्योंकि यह छाप ताज़ा होती है, बाद में तो यह सूक्ष्मशरीर में मौजूद अनगिनत छापों में घुलमिलकर उनकी तरह साधारण बन जाती है। इसीलिए भौतिकता से मिला आनंद हमेशा के लिए नहीँ रहता। दूसरे उदाहरण के लिए आप कल्पना करो कि आप परिवार व किसी अच्छे रिश्तेदार के साथ सुंदर कार से पहुंच कर किसी सुंदर रिसोर्ट में बैठे हैं। बाहर लॉन में आरामदायक कुर्सी पर धूप सेंक रहे हैँ। सामने कांच के गोल टेबल पर पीने के लिए शुद्ध जल है। और भी खाने-पीने के लिए आर्डर पर एकदम मिल जाता है। नजदीक में आपका परिवार आनंद से टहल रहा है। बच्चे सामने पार्क में खेल रहे हैं। सामने ही स्विमिंग पूल है। आप लंबी और धीमी सांस लेते हुए सुस्ता रहे हैं। आपको अपनी आत्मा के अँधेरे में बहुत बढ़िया आनंद महसूस होगा। है तो वह आम अँधेरे की तरह ही जिसे अविद्या कहा गया है, पर वह अन्य सामान्य अंधेरों के विपरीत आनंद से भरा होगा। यह इसलिए क्योंकि यह अंधेरा स्वयं की सत्ता और अस्तित्व से भरा होगा। यह सत्त्वगुणी अंधेरा है। मतलब सत्ता बढ़ाने वाली सारी सुविधाएं आपको सामने उपलब्ध हैं, पर आप अविद्या में आनंद का मजा ले रहे हैं। आदमी की सुखसुविधा भोगने की भी सीमा है। उससे थकने के बाद सत्त्वगुणी अविद्या से ही आनंद मिलता है। दरअसल आनंद का स्रोत सत्त्वगुणी अविद्या ही है, सीधे तौर पर सुखसुविधा नहीँ। अविद्या मतलब विद्या या ज्ञान का निषेध है। इसलिए यह अज्ञान का अंधेरा ही है। आपको सत्त्वगुणी अविद्या का एक और उदाहरण देता हूँ। मानलो आप ऐसी जगह पर हैं, जहाँ से एक तरफ मैदानी क्षेत्र शुरु होता है। आपके सामने दूसरी तरफ पर्वतमाला दिख रही है। आपको उस मिश्रित जैसे मैदानी भाग में शुद्ध मैदानी भाग से भी ज्यादा आनंद आएगा, क्योंकि सामने का दुर्गम व कठिनाइयों से भरा पर्वत आप की सत्ता को सापेक्ष रूप से वास्तविक सत्ता से भी ज्यादा बढ़ा हुआ महसूस कराएगा। ऐसी ही एक जगह है आनंदपुर। सम्भवतः इसी विशेष आनंद के कारण इसका यह नाम पड़ा है। यहाँ पर सिख धर्म का प्रसिद्ध गुरुद्वारा आनंदपुर साहब स्थित है। सत्त्वगुणी अविद्या के विपरीत जो अंधेरा गुस्से, डर, अभाव, चिंता आदि के साथ पैदा होता है, उसमें आनंद नहीँ होता। इनमें अविद्या का अंधेरा स्व-अस्तित्व के विरुद्ध होता है। एक ही अंधेरा अलगअलग परिस्थितियों में अलगअलग ढंग से महसूस होता है। यह रोचक मनोविज्ञान है।आनंदमय कोष से भी एक कदम ज्यादा गहराई में पूर्ण शुद्ध आत्मा है। इसके साथ आनंद जैसा कोई शब्द नहीं जुड़ा है, क्योंकि यह अनिर्वचनीय है, आनंद से भी ऊपर। अधिकांश लोग आनंदमय कोष के ब्लिस या आनंद को शुद्ध आत्मा जानकर उससे मोहित हुए रहते हैं, और आत्मजागृति के लिए विशेष प्रयास नहीँ करते। शुद्ध आत्मा में स्थूल जगत की कोई छाप नहीं होती। इसलिए यह अपने मूलरूप में पूर्ण प्रकाशमान होता है। दरअसल प्रकाश शब्द भी लौकिक है, आत्मा इससे भी परे होता है। इसीलिए आत्मा को सबसे अप्रभावित अर्थात अछूता कहा गया है।

सभी कोष बारीबारी से और क्रमवार ही अच्छे खुलते हैं, जैसे किसी महल के सुरक्षा घेरे लांघे जाते हैं। बचपन में खाने-पीने से अन्नमय कोष विकसित होकर खुल जाता है। खेलकूद, व्यायाम और विभिन्न कामों को सीखने से प्राणमय कोष विकसित होकर खुल जाता है। फिर माध्यमिक विद्यालय स्तर की ऊँची कक्षाओं में पहुंच कर वह जटिल व विशेष विषय वाली शिक्षा को ग्रहण करते हुए मनोमय कोष को खोलता है। महाविद्यालय या विश्वविद्यालय स्तर पर तकनीकी और व्यावहारिक शिक्षा लेकर वह विज्ञानमय कोष को खोलता है। फिर नौकरी या व्यापार करते हुए वह धन कमाने लगता है, और विज्ञानमय कोष की सहायता से आनंदमय कोष को खोलता है। उसको भी पूरा विकसित करके वह तांत्रिक कुण्डलिनी योग की तरफ खुद ही आकर्षित होकर उससे आत्मा तक पहुंचने का प्रयास करता है।

कुण्डलिनी योग से वैसे सभी कोष एकसाथ भी खुल सकते हैं। योगासन व प्राणायाम से भूख लगती है, और शरीर स्वस्थ रहता है। इससे अन्नमय कोष खुला रहता है। प्राणायाम से प्राणमय कोष खुला रहता है। प्राणमय कोष खुलने से मनोमय कोष खुलता है। फिर चक्रोँ पर कुण्डलिनी ध्यान से विज्ञानमय कोष खुल जाता है। विज्ञानमय कोष खुलने से आनंदमय कोष खुद ही खुल जाता है। अंत में कुण्डलिनी जागृत होने से आदमी आत्मा तक भी पहुंच जाता है।

आनंदमय कोष को लाँघने का आसान तरीका बताता हूँ। आराम से धूप में कुर्सी पर बैठें। पूरे शरीर को देखते हुए उसका ध्यान करें। इससे अन्नमय कोष खुलेगा। निद्रा देवी का ध्यान करके और नींद शब्द का मानसिक उच्चारण करते हुए मस्तिष्क को ढीला व तनावरहित कर दें। गहरी साँस आएगी। उस पर ध्यान दें। धीमी और गहरी सांसें चलने लगेंगी। उससे प्राणमय कोष खुलेगा। उससे मन में पुरानी यादों के साथ अन्य विचार जागेंगे। इससे मनोमय कोष खुलेगा। फिर बुद्धि से निश्चय करके उन पर साक्षीभाव रखते हुए शरीर पर, सांसों पर और निद्रा पर ध्यान जारी रखेंगे। इससे विज्ञानमय कोष जागेगा। थोड़ी देर में विचार आत्मा में विलीन हो जाएंगे। इससे मन में विचारशून्यता का अंधेरा जैसा महसूस होगा। इसे सत्त्वगुणी अविद्या कहेंगे। यह इसलिए क्योंकि यह जानबूझकर पवित्र सत्त्वगुण से पैदा की गई। यह रजोगुणी अविद्या की तरह लड़ाई-झगड़े या जीवन के रोजाना के संघर्ष से पैदा नहीँ हुई। न ही यह नशे, आमिष आदि से पैदा तमोगुण से पैदा हुई। सत्त्वगुणी अँधेरे से आनंद महसूस होने से आनंदमय कोष भी खुल जाएगा। लगभग एक घंटे में यह पूरी साधना हो जाएगी। आनंदमय कोष के खुले होने पर यदि आदमी लगभग एक-दो घंटे तक तांत्रिक कुण्डलिनीयोग का अभ्यास भी करता रहे, तो कुण्डलिनी जागरण के रूप में आत्मा की तरफ भी बढ़ता रहेगा।

मृत्यु अटल सत्य है। पर मरना किसीके लिए कला है, तो किसी के लिए किस्मत है। कोई सतोगुणी अविद्या के माध्यम से सुख और आनंद से मरता है, तो किसी को मजबूरन रजोगुणी और तमोगुणी अविद्या के पाले पड़कर बहुत दुःख और कष्ट के साथ मरना पड़ता है।

गांव शहर में भी बसता, तन से न सही मन से मानें

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हम गाँवों के गबरू हैं तुम सा 
शहर में जीना क्या जानें।
है गांव शहर में भी बसता तन
से न सही मन से मानें।
बस सूखी रोटी खाई है तुम सा शहद
में पला नहीं।
हमने न झेली न टाली ऐसी भी
कोई बला नहीं।
हमने न पेड़ से खाया हो फल
ऐसा कोई फला नहीं।
तब तक सिर को दे मारा है जब
तलक पहाड़ भी टला नहीं।
सिर मत्थापच्ची करते जब तुम
थे भरते लंबी तानें।
हम गाँवों -----
दिल-जान से बात हमेशा की तुम
सी घुटन में जिया नहीं।
है प्यार बाँट कर पाया भी नफ़रत
का प्याला पिया नहीं।
इक काम जगत में नहीं कोई भी
हमने है जो किया नहीं।
है मजा नहीं ऐसा कोई भी
हमने हो जो लिया नहीं।
फिर अन्न-भरे खेतों में खड़ के
दाना-दाना क्यों छानें।
हम गाँवों के ----
है इज्जत की परवाह नहीं
बेइज्जत हो कर पले बढ़े।
अपनों की खातिर अपने सर
सबके तो ही इल्जाम मढ़े।
कागज की दुनिया में खोकर भी
वेद-पुराण बहुत ही पढ़े।
हैं असली जग में भी इतरा कर
खूब तपे और खूब कढ़े।
बस बीज को बोते जाना था कि
स्वर्ण कलश मिलते न गढ़े
इस सोच के ही बलबूते हम तो
हर पल निशदिन आगे बढ़े।
फिर छोटा मकसद ठुकरा कर हम
लक्ष्य बड़ा क्यों न ठानें।
हम गाँवों के -----
जो शहर न होते फिर अपनी हम
काबिलियत को न पाते।
रहते अगर न वहाँ तो क्या है
घुटन पता कैसे पाते।
न लोकतंत्र से जीते गर ये
नियम-व्यवस्था न ढाते।
फिर बेर फली तरु न भाते गर
भेल पकौड़े न खाते।
हम साइलेंट जोन में न बसते तो
घाट मुरलिया न गाते।
हम रिमझिम स्नान भी न करते गर
नगर में न तनते छाते।
है रात के बाद सुबह आती तम से ही
लौ दमखम पाती।
है सुखदुख का चरखा चलता वह
न देखे जाति-पाति।
फिर अहम को अपने छोड़ के हम यह
सत्य नियम क्यों न मानें।
हम गाँवों ----
है ढोल-गंवार यही कहते बस
तुलसी ताड़न-अधिकारी।
है अन्न उगाता जो निशदिन वो
कैसे है कम अधि-कारी।
जो दुनिया की खातिर जाता हो
खेतों पर ही बलिहारी।
वो कम कैसे सबसे बढ़कर वो
तो मस्ती में अविकारी।
फिर ऊंच-नीच ठुकरा क्यों न हम
इक ही अलख को पहचानें।
हम गाँवों ---

कुंडलिनी योग बनाम परमाणु विश्वयुद्ध

कुंडलिनी ऊर्जा ही नीलकंठ शिव महादेव के हलाहल विष को नष्ट करती है

दोस्तों, मैं हाल ही में एक स्थानीय मेले में गया। वहाँ मैं ड्रेगन ट्रेन को निहारने लगा। उसका खुले दांतों वाला मुंह दिखते ही मेरे अंदर ऊर्जा मुलाधार से ऊपर उठकर घूमने जैसी लग जाती थी। हालांकि यह हल्का आभास था, पर आनंद पैदा करने वाला था, लगभग वैसा ही जैसा शिवलिंगम के दर्शन से महसूस होता है। स्थानीय संस्कृति के अनुसार बाहरी अभिव्यक्ति के तरीके बदलते रहते हैं, पर मूल चीज एक ही रहती है। इसी के संबंध में मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे गुस्से आदि से कुंडलिनी शक्ति मस्तिष्क से नीचे उतरकर यौद्धा अंगों को चली जाती है। इससे मस्तिष्क में स्मरण शक्ति और भावनाएं क्षीण हो जाती हैं। भावनाएँ बहुत सारी ऊर्जा को खाती हैं। इसीलिए तो तीखी भावनाओं या भावनात्मक आघात के बाद आदमी अक्सर बीमार पड़ जाता है। आपने सुना होगा कि फलां आदमी अपने किसी प्रिय परिचित को खोने के बाद बीमार पड़ गया या चल बसा। गहरे तनाव के दौरान दिल का दौरा पड़ना तो आजकल आम ही हो गया है। शरीरविज्ञान दर्शन से अनियंत्रित भावनाओं पर लगाम लगती है। उपरोक्त मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ड्रेगन के ध्यान से या उसको अपने शरीर पर आरोपित करने से कुंडलिनी शक्ति विभिन्न चक्रोँ पर उजागर होने लगती है। सम्भवतः बुद्धिस्टों के रैथफुल डाइटि भी इसी सिद्धांत से कुंडलिनी की मदद करते हैं। दरअसल विभिन्न धर्मशास्त्रों में जो आचार शिक्षा दी जाती है, उसके पीछे यही कुंडलिनी विज्ञान छुपा है। सत्य बोलो, चोरी न करो, क्रोध न करो, मीठा बोलो, हमेशा प्रसन्न व हँसमुख रहो, आसक्ति न करो आदि वचन हमें अवैज्ञानिक लगते हैं, पर इनके पीछे की वजह बहुमूल्य ऊर्जा को बचा कर उसे कुंडलिनी को उपलब्ध कराना ही है, ताकि वह जल्दी से जल्दी जागृत हो सके। कइयों को इसमें केवल स्वास्थ्य विज्ञान ही दिखता है, पर इसमें आध्यात्मिक विज्ञान भी छुपा होता है। ड्रेगन, शेर आदि हिंसक जीवों की ऊर्जा जब मस्तिष्क से नीचे उतरती है, तब सबसे पहले चेहरे, जबड़े और गर्दन पर आती है। इसीलिए तो क्रोध भरे मुख से गुर्राते हुए ये जबड़े और गर्दन की कलाबाजी पूर्ण गतियों से शिकार के ऊपर टूट पड़ते हैं। फिर कुछ अतिरिक्त ऊर्जा आगे की टांगों पर भी आ जाती है, जिससे ये शिकार को कस कर पकड़ लेते हैं। जब इन क्रियाओं से दिल थक जाता है, तब अतिरिक्त ऊर्जा दिल को भी मिलती है। उसके बाद ऊर्जा पेट को पहुंचती है, जिससे भूख बढ़ती है। इससे वह और हमलावर हो जाता है, क्योंकि वहाँ से ऊर्जा बैक चैनल से वापिस ऊपर लौटने लगती है, और टॉप पर पहुंचकर एकदम से जबड़े को उतर जाती है। जब इतनी मेहनत के बाद भी शिकार काबू में न आकर भागने लगता है, तो ऊर्जा टांगों में पहुंच कर शिकारी को उसके पीछे भगाने लगती है। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा मस्तिष्क को वापिस चली जाती है, और शिकारी पशु थक कर बैठ जाता है। फिर वह अपनी ऊर्जा को नीचे उतारने के लिए चेहरे को विकृत नहीं करता क्योंकि तब उसे पता लग जाता है कि इससे कोई फायदा नहीं होने वाला। वह इतना थक जाता है कि उसके पास ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा नहीं बची होती। ऊर्जा उतारने के लिए भी ऊर्जा चाहिए होती है। इसीलिए उस समय वह गाय की तरह शांत, दयावान, अहिंसक और सदगुणों से भरा लगता है, उसकी स्मरणशक्ति और शुभ भावनाएँ लौट आती हैं, क्योंकि उस समय उसका मस्तिष्क ऊर्जा से भरा होता है। यह अलग बात है कि मस्तिष्क से नीचे उतरी हुई ऊर्जा उसे अंधकार के रूप में महसूस होती है, कुंडलिनी चित्र के रूप में नहीं, क्योंकि निम्न जीव होने से उसमें दिमाग़ भी कम है, और वह कुंडलिनी योगी भी नहीं है। दरअसल जो शिव ने विष ग्रहण करके उसे गले में फँसा कर रखा था, वह आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त ऊर्जा ही है। विष का पान किया, मतलब आम दुनिया की बुरी बातें और बुरे दृश्य नकारात्मक ऊर्जा के रूप में कानों और आँखों आदि से अंदर प्रविष्ट हो गए। वह नकारात्मक ऊर्जा जब विशुद्धि चक्र पर पहुंचती है, तब वह कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित होकर वहाँ लम्बे समय तक फंसी रहती है। इसकी वजह है गर्दन की स्थिति और बनावट। गर्दन सिर और धड़ के जोड़ की तरह है, जो सबसे ज्यादा गतिशील है। जैसे पाईप आदि के बीच में स्थित लचीले और मुलायम जोड़ों पर पानी या उसमें मौजूद मिट्टी आदि जम कर फंस जाते हैं, उसी तरह गर्दन में ऊर्जा फंसी रह जाती है। इसीलिए तो भगवान शिव से वह विष न तो उगलते बना और न ही निगलते, वह गले में ही फंसा रह गया, इसीलिए शिव नीलकंठ कहलाते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जिसने विशुद्धि चक्र को सिद्ध कर दिया, उसने बहुत कुछ सिद्ध कर लिया। दरअसल अगर कुंडलिनी शक्ति को गले से नीचे के किसी चक्र पर उतारा जाए, तो वह एकदम से घूम कर दुबारा मस्तिष्क में पहुंच जाती है, और वहाँ तनाव के दबाव को बढ़ाती है। हालांकि फिर ज्यादातर मामलों में वह सकारात्मक या अद्वैतात्मक कुंडलिनी ऊर्जा के रूप में महसूस होती है, नकारात्मक या द्वैतात्मक ऊर्जा के रूप में नहीं। हृदय चक्र पर भी काफी देर तक स्थिर रहती है, नाभि चक्र और उसके नीचे के चक्रोँ से तो पेट की सिकुड़न के साथ एकदम वापिस मुड़ने लगती है। यद्यपि फिर यह सकारात्मक कुंडलिनी ऊर्जा है, लेकिन मस्तिष्क में इसके वापस बुरे विचारों में परिवर्तित होने की संभावना तब भी बनी ही रहती है। वह ऊर्जा योद्धा अंगों से उठापटक भी करवा सकती है। इसीलिए उसे गले के विशुद्धि चक्र पर रोककर रखा जाता है। मतलब कि अगर भगवान शिव तनाव रूपी जहर को गले से नीचे उतारकर पी जाए, तो वे विनाशकारी तांडव नृत्य से दुनिया में तबाही भी मचा सकते हैं, या वह रूपांतरित जहर उनके पेट से चूस लिया जाएगा, और वह रक्त में मिलकर पुनः मस्तिष्क में पहुंच जाएगा। मस्तिष्क में  जहर पहुंचने का अर्थ है, अज्ञानरूपी या मनोदोष रूपी अंधकार के रूप में मृत्यु की सम्भावना। मनोदोषों से दुनिया में फिर से तबाही का खतरा पैदा हो जाएगा। सम्भवतः कुंडलिनी शक्ति भोजन के साथ पेट में पहुंचती है, और वहाँ से इसी तरह मस्तिष्क में पहुंच जाती है। हालांकि, तथाकथित विकृत ऊर्जा रूपी जहर पीने के बाद, मस्तिष्क में पुन: अवशोषण के साथ, थोड़े अतिरिक्त विचारशील प्रयास के साथ लंबे समय तक इसके कुंडलिनी ऊर्जा में रूपांतरित बने रहने की अधिकतम संभावना होती है। शिव जहर को उगल भी नहीं सकते, क्योंकि अगर वे उसे बाहर उगलते हैं तो भी उससे जीवों का विनाश हो सकता है। आदमी के मस्तिष्क की दुर्भावनाएं यदि बदजुबानी, गुस्से, बुरी नजर या मारपीट आदि के रूप में बाहर निकल जाएं, तो स्वाभाविक रूप से वे अन्य लोगों और जीवजंतुओं का अहित ही करेंगी। उससे समाज में आपसी वैमनस्य और हिंसा आदि दोष फैलेंगे। इसीलिए लोग कहते हैं कि फलां आदमी को गुस्सा तो बहुत आया पर वह उसे पी गया। दरअसल गुस्सा पीआ नहीं जाता, उसे गले में अटकाकर रखा जाता है, पीने से तो वह फिर से दिमाग़ में पहुंच जाएगा। इसीलिए कई लोगों को आपने परेशान होकर कहते हुए सुना होगा, मेरे तो गले तक आ गई। दरअसल कमजोर वर्ग के लोग ऐसा ज्यादा कहते हैं, क्योंकि न तो वे परेशानी को निगल सकते हैं, और न ही उगल सकते हैं, लोगों के द्वारा बदले में सताए जाने के डर से। दरअसल वे सबसे खुश होते हैं भोले शंकर की तरह, परेशानी को गले में फँसाए रखने के कारण। वे परेशान नहीं होते, परेशानी का उचित प्रबंधन करने के कारण। परेशान वे औरों को लगते हैं, क्योंकि उन्हें परेशानी को प्रबंधित करना नहीं आता। बहुत से लोगों को नीले गले वाले शिव बेचारे लग सकते हैं, पर बेचारे तो वे लोग खुद हैं, जो उन्हें समझ नहीं पाते। शिव किसीके डर की वजह से विष को गले में धारण नहीं करते, बल्कि अपने पुत्र समान सभी जीवों के प्रति दया के कारण ऐसा करते हैं। भगवान शिव सारी सृष्टि को बनाते और उसका पूरा कार्यभार सँभालते हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि उनका दिमाग़ भी तनाव और अवसाद से भर जाता होगा। वह तनाव गुस्से के रूप में दुनिया के ऊपर न निकले, इसीलिए वे तनाव रूपी विष को अपने गले में धारण करके रखते हैं। क्योंकि रक्त का रंग भी लाल-नीला ही होता है, जो शक्ति का परिचायक है, इसीलिए उनका गला नीला पड़ जाता है। वे एक महान योगी की तरह व्यवहार करते हैं।

समुद्र मंथन या पृथ्वी-दोहन मानसिक दोषों के रूप में विष उत्पन्न करता है, जिसे शिव जैसे महापुरुषों द्वारा पचाया या नष्ट किया जाता है

कहते हैं कि वह हलाहल विष समुद्रमंथन के दौरान निकला था। उसमें और भी बहुत सी ऐश्वर्यमय चीजें निकली थीं। समुद्र का मतलब संसार अर्थात पृथ्वी है, मंथन का मतलब दोहन है, ऐश्वर्यशाली चीजें आप देख ही रहे हैं, जैसे कि मोटरगाड़ियां, कम्प्यूटर, हवाई जहाज, परमाणु रिएक्टर आदि अनगिनत मशीनें। आज भी ऐसा ही महान मंथन चल रहा है। अनगिनत नेता, राष्ट्रॉध्यक्ष, वैश्विक संस्थाएं, वैज्ञानिक और तकनीशियन समुद्रमंथन के देवताओं और राक्षसों की तरह है। इस आधुनिक समुद्रमंथन से पैदा क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार आदि मन के दोषों के रूप में पैदा होने वाले विष को पीने की हिम्मत किसी में नहीं है। दुनिया दो धड़ों में बंट गई है। एकतरफ तथाकथित राक्षस या तानाशाह लोग हैं, तो दूसरी तरफ तथाकथित देवता या लोकतान्त्रिक लोग हैं। इसीलिए पूरी दुनिया आज परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। सभी को इंतजार है कि किसी महापुरुष के रूप में शिव आएंगे और इस विष को पीकर दुनिया को नष्ट होने से बचाएंगे।

आज के समय में जिम व्यायाम के साथ योग बहुत जरूरी है

बहुत सी खबरें सुनने को मिल रही हैं कि फलां कलाकार या सेलिब्रिटी या कोई अन्य जिम व्यायाम करते हुए दिल के दौरे का शिकार होकर मर गया। मुझे लगता है कि वे पहले ही तनाव से भरे जीवन से गुजर रहे होते हैं। इससे उनके दिल पर पहले ही बहुत बोझ होता है। फिर बंद कमरे जैसे घुटन भरे स्थान पर भारी व्यायाम से वह बोझ और बढ़ जाता है, जिससे अचानक दिल का दौरा पड़ जाता है। पहले योग से तनाव को कम कर लेना चाहिए। उसके बाद ही भौतिक व्यायाम करना चाहिए, अगर जरूरत हो तो, और जितनी झेलने की क्षमता हो। योग से नाड़ियों में ऊर्जा घूमने लगती है। जीभ और तालु के आपसी स्पर्श के सहयोग से वह आसानी से मस्तिष्क से गले को या नीचे के अन्य चक्र को उतरती है, विशेषकर जब साथ में शरीरविज्ञान दर्शन की भी मन में भावना हो। शरीरविज्ञान दर्शन से मानसिक कुंडलिनी चित्र प्रकट होता है, और इसके साथ तालु-जीभ के परस्पर स्पर्ष के ध्यान से कुंडलिनी ऊर्जा अपने साथ ले जाता हुआ वह चित्र मस्तिष्क के दबाव को न बढ़ाता हुआ आगे के चैनल से होता हुआ किसी भी अनुकूल चक्र पर चमकने लगता है। इससे कुंडलिनी ऊर्जा व्यर्थ की बातचीत में बर्बाद न होकर विशुद्धि चक्र को भी पुष्ट करती है।

मस्तिष्क की ऊर्जा के सिंक या अवशोषक के रूप में विशुद्धि चक्र

ठंडे जल से नहाते समय जब नीचे से चढ़ती हुई ऊर्जा से मस्तिष्क का दबाव बढ़ जाता है या सिरदर्द जैसा होने लगता है, तब नीचे से आ रही ऊर्जा विशुद्धि चक्र पर कुंडलिनी प्रकाश और सिकुड़न के साथ घनीभूत होने लगती है। ऐसा लगता है कि नीचे का शरीर आटा चक्की का निचला पाट है, मस्तिष्क ऊपर वाला पाट है और विशुद्धि चक्र वह बीच वाला छोटा स्थान है, जिस पर दाना पिस रहा होता है। या ऊर्जा सीधी भी विशुद्धि चक्र को चढ़ सकती है, मस्तिष्क में अनुभव के बिना ही। जिसे ताउम्र प्रतिदिन गंगास्नान का अवसर प्राप्त होता था, उसे सबसे अधिक भाग्यवान, पुण्यवान और महान माना जाता था। “पंचस्नानी महाज्ञानी” कहावत भी शीतजल स्नान की महत्ता को दर्शाती है। गंगा के बर्फीले ठन्डे पानी में साल के सबसे ठंडे जनवरी (माघ) महीने के लगातार पांच पवित्र दिनों तक हरिद्वार के भिन्न-भिन्न पवित्र घाटों पर स्नान करना आसान नहीं है। आदमी में काफी योग शक्ति होनी चाहिए। पर यह जरूर है कि जिसने ये कर लिए, उसकी कुंडलिनी क्रियाशील होने की काफी सम्भावना है। इसीलिए कहते हैं कि ऐसे स्नान करने वाले को लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं, मुक्ति भी नहीं। ठंडे पानी से नहाने वाले व ठंडे स्थानों में रहने वाले लोग इसके विशुद्धि चक्र प्रभाव की वजह से बहुत ओजस्वी और बातचीत में माहिर लगते हैं। यह ध्यान रहे कि ठंडे पानी का अभ्यास भी अन्य योगाभ्यासों की तरह धीरेधीरे ही बढ़ाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य को कोई हानि न पहुंचे। जिस दिन मन न करे, उस दिन नहीं नहाना चाहिए। अभ्यास और सहजता का नाम ही योग है। यकायक और जबरदस्ती योग नहीं है। अगर किसी दिन ज्यादा थकान हो तो न करने से अच्छा योगाभ्यास धीरे और आराम से करना चाहिए। इससे आदमी सहज़ योगी बनना सीखता है। किसी दिन कमजोरी लगे या मन न करे तो उस दिन अन्य धार्मिक गतिविधियों को छोड़ा भी जा सकता है, मूलभूत हठ योगाभ्यास को नहीं, क्योंकि योग सांसों या प्राणों से जुड़ा होने के कारण जीवन का मूल आधार ही है, जबकि अन्य गतिविधियां ऐड ऑन अर्थात अतिरिक्त हैं। होता क्या है कि बातचीत के समय मन में उमड़ रही भावनाएं और विचार विशुद्धि चक्र पर कैद जैसे हो जाते हैं, क्योंकि उस समय विशुद्धि चक्र क्रियाशील होता है। जब योग आदि से पुनः विशुद्धि चक्र को क्रियाशील किया जाता है, तब वे वहाँ दबे विचार व भावनाएँ बाहर निकल कर नष्ट हो जाती हैं, जिससे शांति महसूस होती है, और आदमी आगे की नई कार्यवाही के लिए तरोताज़ा हो जाता है। यह ऐसे ही है, जैसे खाली ऑडियो रिकॉर्डर में ऑडियो कैसेट को घुमाने से उस पर आवाज दर्ज हो जाती है। जब उस लोडिड कैसेट को पुनः उसी तरह घुमाया जाता है, तो वह दबी हुई आवाज गाने के रूप में बाहर आ जाती है, जिसे हम सब सुनते हैं। इसी तरह सभी चक्रोँ पर होता है। यह मुझे बहुत बड़ा चक्र रहस्य लगता है, जिसके बारे में एक पुरानी पोस्ट में भी बात कर रहा था।

श्री शब्द एक महामंत्र के रूप में (धारणा और ध्यान में अंतर)

जिंदगी की भागदौड़ में यदि शरीरविज्ञान दर्शन शब्द का मन में उच्चारण न कर सको, तो श्रीविज्ञान या शिवविज्ञान या शिव या शविद या केवल श्री का ही उच्चारण कर लो, कुंडलिनी आनंद और शांति के साथ क्रियाशील हो जाएगी। श्री शब्द में बहुत शक्ति है, इसी तरह श्री यंत्र में भी। सम्भवतः यह शक्ति शरीरविज्ञान दर्शन से ही आती है, क्योंकि श्री शब्द शरीर से निकला हुआ शब्द और उसका संक्षिप्त रूप लगता है। श्री शब्द सबसे बड़ा मंत्र लगता है मुझे, क्योंकि यह बोलने में सुगम है और एक ऐसा दबाव पैदा करता है, जिससे कुंडलिनी क्रियाशील होने लगती है। सम्भवतः इसीलिए किसी को नाम से सम्बोधित करने से पहले उसके साथ श्री लगाते हैं। इसी तरह धार्मिक अवसरों व क्रियाकलापों को श्री शब्द से शुरु किया जाता है। इसी तरह शिव भी शरीर से मिलता जुलता शब्द है, शव भी। इसीलिए शक्तिहीन शिव को शव भी कहते हैं। अति व्यस्तता या शक्तिहीनता की अवस्था में केवल “श” शब्द का स्मरण भी धारणा को बनाए रखने के लिए काफी है। मन की भावनात्मक अवस्था में इसके स्मरण से विशेष लाभ मिलता है। “श” व “स” अक्षर में बहुत शक्ति है। इसीलिए श अक्षर से शांति शब्द बना है। श अक्षर के स्मरण से भी शांति मिलती है और कुंडलिनी से भी। श अक्षर से कुंडलिनी मस्तिष्क के नीचे के चक्रोँ मुख्यतः हृदय चक्र पर क्रियाशील होने लगती है। इससे आनंद के साथ शांति भी मिलती है, और मस्तिष्क का बोझ हल्का हो जाने से काम, क्रोध आदि मन के जंगी दोष भी शांत हो जाते हैं। इसी तरह श अक्षर से ही शक्ति शब्द बना है, जो कुंडलिनी का पर्याय है। यह संस्कृत भाषा का विज्ञान है। आपने संस्कृत मंत्र स्वस्तिवाचन के बाद चारों ओर शांति का माहौल महसूस किया ही होगा। यह सामूहिक रूप में गाया जाता है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि की मंगलकामना की जाती है। ज्ञान होने पर भी उसका लाभ क्यों नहीं मिलता? क्योंकि हम ज्ञान की धारणा बना कर नहीं रखते। मैं ध्यान करने को नहीं बोल रहा। व्यस्त जीवन के दौरान ध्यान कर भी नहीं सकते। धारणा तो बना सकते हैं। धारणा और ध्यान में अंतर है। ध्यान का मतलब है उसको लगातार सोचना। इससे ऊर्जा का व्यय होता है। धारणा का मतलब है उस पर विश्वास या आस्था या उस तरफ सोच का झुकाव रखना। इसमें ऊर्जा व्यय नहीं होती। जब उपयुक्त समय कभी जिंदगी में प्राप्त होता है, तो धारणा एकदम से ध्यान में बदल जाती है और तनिक योगाभ्यास से समाधि तक ले जाती है। धारणा जितनी मजबूती से होगी और जितने लम्बे समय तक होगी, ध्यान उतना ही मजबूत और जल्दी लगेगा। पतंजलि ने भी अपने सूत्रों में धारणा से ध्यान स्तर का प्राप्त होना बताया है। मेरे साथ भी ठीक ऐसे ही हुआ। मैं शरीरविज्ञान दर्शन नामक अद्वैत दर्शन पर धारणा बना कर रखता था पर समय और ऊर्जा की कमी से ध्यान नहीं कर पाता था। इनकी उपलब्धता पर वह धारणा ध्यान में बदल गई और ====बाकि का सफर आपको पता ही है (कि क्या होता है )। अद्वैत की धारणा अप्रत्यक्ष रूप में कुंडलिनी की धारणा ही होती है, क्योंकि अद्वैत और कुंडलिनी साथसाथ रहने की कोशिश करते हैं। ध्यान प्रत्यक्ष रूप में, मतलब जानबूझकर कुंडलिनी का किया जाता है, जिसमे कुंडलिनी जागरण प्राप्त होता है।

रूपान्तरण से आदमी पुरानी चीजों को भूलता नहीं हैं, अपितु उन्हें सकारात्मकता के साथ अपनाता है

योग खुद कोई रूपान्तरण नहीं करता। यह अप्रत्यक्ष रूप से खुद होता है। योग से मन का कचरा बाहर निकलने से मन खाली और तरोताज़ा हो जाता है। इससे मन नई चीजों को ग्रहण करता है। नई चीजों में भी अच्छी चीजें और आदतें ही ग्रहण करता है, क्योंकि योग से सतोगुण बढ़ता है, जो अच्छी चीजों को ही आकर्षित करता है। कई लोगों को लगता होगा कि योग से रूपान्तरण के बाद आदमी इतना बदल जाता है कि उसके पुराने दोस्त व परिचित उससे बिछड़ जाते हैं, उसके मन में पुरानी यादें मिट जाती हैं, वह अकेला पड़ जाता है वगैरह वगैरह। पर दरअसल बिल्कुल ऐसा नहीं होता। रहता उसमें सबकुछ है, पर उसे उनके लिए वह क्रेविंग या छटपटाहाट महसूस नहीं होती, जो कि रूपान्तरण से पहले होती है। उनके लिए उसके मन में विकार नहीं होते, जैसे कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर। इसका मतलब है कि फिर पुराने दुश्मन भी उसे दोस्त लगने लगते हैं। अगर ऐसा रूपान्तरण सभी के साथ हो जाए, तो दुनिया से लड़ाई-झगड़े ही खत्म हो जाएं। अगर ऐसा ही रूपान्तरण सभी देशों या राष्ट्रध्यक्ष लोगों के साथ हो जाए, तो युद्ध वगैरह कथा-कहानियों तक ही सीमित रह जाएंगे।

कुंडलिनी जागरण से आत्मा की पारलौकिक परमावस्था का पता नहीं चलता 

मित्रो, मैं कुछ दिन पहले रिलेक्स होने के लिए इस कड़ी गर्मी में दिन की धूप में छतरी लेकर बाहर निकला। चारों तरफ गलियों की सड़कों का जाल था, पर छायादार पेड़ कम थे। जहाँ थे, वहाँ उनके नीचे चबूतरे नहीं बने थे बैठने के लिए। पूरी कॉलोनी में तीन-चार जगह  चबूतरे वाले पेड़ थे। मैं बारी-बारी से हर चबूतरे पर बैठता रहा, और आसपास से आ रही कोयल की संगीतमयी आवाज का आनंद लेता रहा। गाय और बैल मेरे पास आ-जा रहे थे, क्योंकि उनको पता था कि मैं उनके लिए आटे की पिन्नियां लाया था। अच्छा है, अगर सैरसपाटे के साथ कुछ गौसेवा भी होती रहे। एक छोटे चबूतरे पर पेड़ से सटा हुआ एक पत्थर था। मैं उसपे बैठा तो मेरा खुद ही एक ऐसा आसन लग गया, जिसमें मेरा स्वाधिष्ठान चक्र पेड़ को मजबूती से छू रहा था, और पीठ पेड़ के साथ सीधी और छाती के पीछे पीठ की हड्डी पेड़ से सटी हुई थी। इससे मेरे मन में वर्षों पुरानी रंगबिरंगी भावनाएं उमड़ने लगीं। बेशक पुरानी घटनाओं के दृश्य मेरे सामने नहीं थे, पर उनसे जुड़ी भावनाएँ बिल्कुल जीवंत और ताज़ा थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कि वे भावनाएं सत्य हों और उस अनुभव के समय वर्तमान में ही बनी हों। यहाँ तक कि अपने असली घटनाकाल में भी वे भावनाएँ उतनी सूक्ष्म और प्रत्यक्ष रूप में अनुभव नहीं हुई थीं, जितनी उस स्मरणकाल में अनुभव हो रही थीं। भावनाओं के साथ आनंद तो रहता ही है। असल में भावनाएँ ही घटनाओं का सार या चेतन आत्मा होती है। भावना के बिना तो घटना निष्प्राण और निर्जीव होती है। सम्भवतः स्वाधिष्ठान चक्र को इसीलिए इमोशनल बेगेज या भावनाओं का थैला भी कहते हैं। वैसे तो सभी चक्रोँ के साथ विचारात्मक भावनाएँ जुड़ी होती हैं। स्वाधिष्ठान चक्र से इसलिए ज्यादा जुड़ी होती हैं, क्योंकि सम्भोग सबसे बड़ा अनुभव है, और उसी अनुभव के लिए आदमी अन्य सभी अनुभव हासिल करता है। मतलब कि सम्भोग का अनुभव हरेक अनुभव पर हावी होता है। विज्ञान भी इस बात को मानता है कि सम्भोग ही जीवन के हरेक पहलू के विकास के लिए मूल प्रेरक शक्ति है। क्योंकि स्वाधिष्ठान चक्र सम्भोग का केंद्र है, इसलिए स्वाभाविक है कि उससे सभी भावनाएं जुड़ी होंगी। 

किसी भी चीज में रहस्य इसलिए लगता है, क्योंकि हम उसे समझ नहीं पाते, नहीं तो कुछ भी रहस्य नहीं है। जो कुछ समझ आ जाता है, वह विज्ञान ही लगता है। पूरी सृष्टि हाथ पे रखे आंवले की तरह सरल और प्रत्यक्ष है, यदि लोग योग विज्ञान के नजरिए से इसे समझें, अन्यथा इसके झमेलों का कोई अंत नहीं है।

मूलाधार को ग्राउंडिंग चक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि वह मस्तिष्क को ऐसे ही अपने से जोड़ता है, जैसे पेड़ की जड़ पेड़ को अपने से जोड़कर रखती है। मूल का शाब्दिक अर्थ ही जड़ होता है। जैसे जड़ मिट्टी के सहयोग से अपनी ऊर्जा पैदा करके पेड़ को पोषण भी देती है और खुद भी पेड़ के पत्तों से अतिरिक्त ऊर्जा को अपनी ओर नीचे खींचकर खुद भी मजबूत बनती है, उसी तरह मूलाधार भी सम्भोग से अपनी ऊर्जा पैदा करके मस्तिष्क को ऊर्जा की आपूर्ति भी करता है, और मस्तिष्क में निर्मित फालतू विचारों की ऊर्जा को अपनी तरफ नीचे खींचकर खुद भी ताकतवर बनता है।

फिर एक दिन मैं फिर से उसी पुरानी झील के किनारे गया। एक पेड़ की छाँव में बैठ गया। मुझे अपनी सेहत भी ठीक नहीं लग रही थी, और मैं थका हुआ सा महसूस कर रहा था। लग रहा था कि जुकाम के वायरस का हमला हो रहा था मेरे ऊपर, क्योंकि एकदम से मौसम बदला था। अचानक भारी बारिश से भीषण गर्मी के बीच में एकदम से कड़ाके की ठंड पड़ी थी। उससे स्वाभाविक है कि मन भी कुछ बोझिल सा था। सोचा कि वहाँ शांति मिल जाए। गंगापुत्र भीष्म पितामह भी इसी तरह गंगा नदी के किनारे जाया करते थे शांति के लिए। मुझे तो लगता है कि यह एक रूपक कथा है। क्योंकि भीष्म पितामह आजीवन ब्रह्मचारी थे, इसलिए स्वाभाविक है कि उनकी यौन ऊर्जा बाहर की ओर बर्बाद न होकर पीठ की सुषुम्ना नाड़ी से ऊपर चढ़ती थी। इसे ही ही भीष्म पितामह का बारम्बार गंगा के पास जाना कहा गया है। गंगा नदी सुषुम्ना नाड़ी को कहा जाता है। क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी अपनी ऊर्जा रूपी दुग्ध से बालक रूपी कुंडलिनी-मन का पोषण-विकास करती है, इसीलिए गंगारूपी सुषुम्ना को माँ कहा गया है। थोड़ी देर बाद मैं मीठी और ताज़ा हवा की लम्बी सांस लेते हुए उस पर ध्यान देने लगा। इससे पुराने भावनात्मक विचार मन में ऐसे उमड़ने लगे, जैसे तेज हवा चलने पर आसमान में धूल उमड़ आती है। अगर आदमी धूल को देखने लगे, तो उसका दम जैसा घुटता है, और मन उदास हो जाता है। यदि उस पर ध्यान न देकर केवल हवा को महसूस करे, तो वह प्रसन्नचित हो जाता है। मैंने भी उन विचारों की धूल पर ध्यान देना बंद कर दिया, और सांसों पर ध्यान देने लगा। विचार तो तब भी थे, पर तब परेशान नहीं कर रहे थे। सांस और विचार हमेशा साथ रहते हैं। आप उन्हें अलग नहीं कर सकते, ऐसे ही जैसे हवा और धूल साथ रहते हैं। हवा है, तो धूल भी है, और धूल है तो हवा भी है। अगर आप धूल हटाने के लिए दीवार आदि लगा दो, तो वहाँ हवा भी नहीं आएगी। इसी तरह यदि आप बलपूर्वक विचारों को दबाएंगे, तो सांस भी दब जाएगी। और ये आप जानते ही हैँ कि सांस ही जीवन है। इसलिए विचारों को दबाना नहीं है, उनसे ध्यान हटाकर सांसों पर केंद्रित करना है। विचारों को आतेजाते रहने दो। जैसे धूल के कण थोड़ी देर उड़ने के बाद एकदूसरे से जुड़कर या नमी आदि से भारी होकर नीचे बैठने लगते हैँ, उसी तरह विचार भी श्रृंखलाबद्ध होकर मन के धरातल में गायब हो जाते हैं। बस यह करना है कि उन विचारों की धूल को ध्यान रूपी छेड़ा नहीं देना है। बाहर के विविध दृश्य नजारे और आवाजें मन के धरातल को मजबूत करते हैँ, जिससे फालतू विचार उसपे लैंड करते रह सकें। इसीलिए लोग ऐसे कुदरती नजारों की तरफ भागते हैं। जैसे धूल का कुछ हिस्सा आसमान में दूर गायब हो जाता है और बाकि ज्यादातर हिस्सा फिर से उसी जमीं पर बैठता है, इसी तरह विचारों के उमड़ने से उनका थोड़ा हिस्सा ही गायब होता है, बाकि बड़ा हिस्सा पुनः उसी मन के धरातल पर बैठ जाता है। इसीलिए तो एक ही किस्म के विचार लम्बे समय तक बारबार उमड़ते रहते हैं, बहुत समय बाद ही पूरी तरह गायब हो पाते हैं। बारीक़ धूल जैसे हल्के विचार जल्दी गायब हो जाते हैं, पर मोटी धूल जैसे आसक्ति से भरे स्थूल विचार ज्यादा समय लेते हैं। इसीलिए यह नहीं समझना चाहिए कि एकबार के साक्षीभाव से विचार गायब होकर मन निर्मल हो जाएगा। लम्बे समय तक साधना करनी पड़ती है। आसान खेल नहीं है। इसलिए जिसे जल्दी हो और जो इंतजार न कर सके, उसे  साधना करने से पहले सोच लेना चाहिए। वैसे भी मुझे लगता है कि यह दुनिया से कुछ दूरी बनाने वाली साधना उन्हीं लोगों के लिए योग्य है, जो अपनी कुंडलिनी को जागृत कर चुके हैं, या जो दुनिया के लगभग सभी अनुभवों को हासिल कर चुके हैं। आम लोग तो इससे गुमराह भी हो सकते हैं। आम लोगों के लिए तो व्यावहारिक कर्मयोग ही सर्वोत्तम है। हालांकि जो लोग एकसाथ विविध साधना मार्गों पर चलने की सामर्थ्य और योग्यता रखते हैं, उनके लिए ऐसी कोई पाबंदी नहीं। थोड़ी ही देर में मेरा शरीर खुद ही भिन्न-भिन्न सिटिंग पोज बनाने लगा, ताकि कुंडलिनी ऊर्जा को मूलाधार चक्र से ऊपर चढ़ने में आसानी हो। स्वतोभूत योगासनों को मैंने पहली बार ढंग से महसूस किया, हालांकि घर में बिस्तर पर रिलेक्स होते हुए मेरे आसन लगते ही रहते हैं, ख़ासकर शाम के 5-6 बजे के बीच। सम्भवतः ऐसा दिनभर की थकान को दूर करने के लिए होता है, संध्या का ऊर्जावर्धक प्रभाव भी होता है साथ में। तो लगभग सुबह के थकानरहित समय में झील के निकट मेरी कुंडलिनी ऊर्जा का उछालें मारने का मतलब था कि मेरी थकान काम के बोझ से नहीं हुई थी, बल्कि किसी आसन्न रोग की वजह से थी। वह उसका एडवांस में इलाज करने के लिए आई थी। कुंडलिनी ऊर्जा इंटेलिजेंट होती है, इसलिए सब समझती है। विचारों के प्रति साक्षीभाव के साथ कुछ देर तक लम्बी और गहरी साँसे लेने से कुंडलिनी ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने वाला दबाव तैयार हो गया था। जूते के सोल की पिछली नोक की हल्की चुभन से मूलाधार चक्र आर्गेस्मिक आनंदमयी संवेदना के साथ बहुत उत्तेजित हुआ, जिससे कुंडलिनी ऊर्जा उफनती नदी की तरह ऊपर चढ़ने लगी। विभिन्न चक्रोँ के साथ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना  नाड़ियों में आर्गेस्मिक आनंदमयी संवेदना महसूस होने लगी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कुंडलिनी ऊर्जा से पूरा शरीर रिचार्ज हो रहा था। साँसें भी आर्गेस्मिक आनंद से भर गई थीं। कुंडलिनी के साथ आगे के आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और वज्र शिखा के संयुक्त ध्यान से ऊर्जा आगे से नीचे के हिस्से में उतरकर सभी चक्रोँ के साथ पूरे शरीर को शक्तियुक्त कर रही थी। दरअसल आमधारणा के विपरीत मूलाधार चक्र में अपनी ऊर्जा नहीं होती, बल्कि उसे संभोग से ऊर्जा मिलती है। मूलाधार को रिचार्ज किए बगैर ही अधिकांश लोग वहाँ से ऊर्जा उठाने का प्रयास उम्रभर करते रहते हैं, पर कम ही सफल हो पाते हैं। सूखे कुएँ में टुलु पम्प चलाने से क्या लाभ। मूलाधार के पूरी तरह डिस्चार्ज होने के बाद यौन अंगों, विशेषकर प्रॉस्टेट का दबाव बहुत कम या गायब हो जाता है। उससे फिर से मन सम्भोग की तरफ आकर्षित हो जाता है, जिससे मूलाधार फिर से रिचार्ज हो जाता है। वैसे तो योग आधारित साँसों से भी मूलाधार चक्र शक्ति से आवेशित हो जाता है, जो संन्यासियों के लिए एक वरदान की तरह ही है। चाय से प्रॉस्टेट समस्या बढ़ती है, ऐसा कहते हैं। दरअसल चाय से मस्तिष्क में रक्तसंचार का दबाव बढ़ जाता है, इसीलिए तो चाय पीने से सुहाने विचारों के साथ फील गुड महसूस होता है। इसका मतलब है कि फिर यौन अंगों से ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने वाला चुसाव नहीं बनेगा। इससे कुंडलिनी ऊर्जा घूमेगी नहीं, जिससे यौन अंगों समेत पूरे शरीर के रोगी होने की सम्भावना बढ़ेगी। उच्च रक्तचाप से भी ऐसी ही सैद्धांतिक वजह से प्रॉस्टेट की समस्या बढ़ती है। ऐसा भी लगता है कि प्रॉस्टेट की इन्फेलेमेशन या उत्तेजना भी इसके बढ़ने की वजह हो सकती है। स्वास्थ्य वैज्ञानिक भी ऐसा ही अंदेशा जता रहे हैं। जरूरत से ज्यादा तांत्रिक सम्भोग से प्रॉस्टेट उत्तेजित हो सकती है। तांत्रिक वीर्यरोधन से एक चुसाव भी पैदा हो सकता है जिससे संक्रमित योनि का गंदा स्राव प्रॉस्टेट तक भी पहुंच सकता है, जिससे प्रोस्टेट में इन्फेलेमेशन और संक्रमण पैदा हो सकता है। इसे एंटीबायोटिक से ठीक करना भी थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इसीलिए खूब पानी पीने को कहा जाता है, ताकि गंदा स्राव मूत्रनाल से बाहर धुल जाए। योनि-स्वास्थ्य का भी भरपूर ध्यान रखा जाना चाहिए। वैसे आजकल प्रोस्टेट की हर समस्या का इलाज है, प्रोस्टेट कैंसर का भी, यदि समय रहते जाँच में लाया जाए। क्योंकि पुराने जमाने में ऐसी सुविधाएं नहीं थीं, इसीलिए तंत्र विद्या को गुप्त रखा जाता था। इस ब्लॉग की एक पुरानी पोस्ट में कबूतर बने अग्निदेव को दिए माता पार्वती के श्राप को जो दिखाया गया है, जिसमें वे उसे उसके द्वारा किए घृणित कार्य की सजा के रूप में उसे लगातार जलन महसूस करने का शाप देती हैं, वह सम्भवतः प्रॉस्टेट के संबंध में ही है। योगी इस जलन की ऊर्जा को कुंडलिनी को देने के लिए पूर्ण सिद्धासन लगाते हैं। इसमें एक पाँव की एड़ी से मूलाधार पर दबाव लगता है, और दूसरे पाँव की एड़ी से आगे के स्वाधिष्ठान चक्र पर। इसलिए यह अर्ध सिद्धासन से बेहतर है क्योंकि अर्धसिद्धासन में दूसरा पैर भी जमीन पर होने से स्वाधिष्ठान पर नुकीला जैसा संवेदनात्मक और आर्गेस्मिक दबाव नहीं लगता। इससे स्वाधिष्ठान की ऊर्जा बाहर नहीं निकल पाती। कुंडलिनी ऊर्जा के घूमते रहने से यह यौनता-आधारित सिलसिला चलता रहता है, और आदमी का विकास होता रहता है। हालांकि यह सिलसिला साधारण आदमी में भी चलता है, पर उसमें इसका मुख्य लक्ष्य द्वैतपूर्ण दुनियादारी से संबंधित ही होता है। जबकि कुंडलिनी योगी का लक्ष्य कुंडलिनी युक्त अद्वैतपूर्ण जीवनयापन होता है। साधारण आदमी में बिना किसी प्रयास के ऊर्जा चढ़ती है, इसलिए यह प्रक्रिया धीमी और हल्की होती है। जबकि कुंडलिनी योगी अपनी इच्छानुसार ऊर्जा को चढ़ा सकता है, क्योंकि अभ्यास से उसे ऊर्जा नाड़ियों का और उन्हें नियंत्रित करने का अच्छा ज्ञान होता है, जिससे शक्ति उसके वश में आ जाती है। तांत्रिक योगी तो इससे भी एक कदम आगे होता है। इसीलिए तांत्रिकों पर सामूहिक यौन शोषण के आरोप भी लगते रहते हैं। वे कठोर तांत्रिक साधना से शक्ति को इतना ज्यादा वश में कर लेते हैं कि वे कभी सम्भोग से थकते ही नहीं। ऐसा ही मामला एक मेरे सुनने में भी आया था कि एक हिमालयी क्षेत्र में मैदानी भूभाग से आए तांत्रिक के पास असली यौन आनंद की प्राप्ति के लिए महिलाओं की पंक्ति लगी होती थी। कुछ लोगों ने हकीकत जानकर उसे पीटा भी, फिर पता नहीं क्या हुआ। तांत्रिकों के साथ यह बहुत बड़ा धोखा होता है। आम लोग उनके कुंडलिनी अनुभव को नहीं देखते, बल्कि उनकी साधना के अंगभूत घृणित खानपान और आचार-विचार को देखते हैं। वे आम नहीं खाते, पेड़ गिनते हैं। इससे वे उनका अपमान कर बैठते हैं, जिससे उनकी तांत्रिक कुंडलिनी वैसे लोगों के पीछे पड़ जाती है, और उनका नुकसान करती है। इसी को देवता का खोट लगना, श्राप लगना, बुरी नजर लगना आदि कहा जाता है। इसीलिए तांत्रिक साधना को, विशेषकर उससे जुड़े तथाकथित कुत्सित आचारों-विचारों को गुप्त रखा जाता था। साधारण लोक परिस्थिति में भी तो लोग तांत्रिक विधियों का प्रयोग करते ही हैं, पर वे साधारण सम्भोग चाहते हैं, यौन योग नहीं। शराब से शबाब हासिल करना हो या मांसभक्षण से यौनसुख को बढ़ाना हो, सब में यही सिद्धांत काम करता है। ऐसी चीजों से दिमाग़ के विचार शांत होने से दिमाग़ में एक वैक्यूम पैदा हो जाता है, जो मूलाधार से ऊर्जा को ऊपर चूसता है। इससे आगे के चैनल से ऊर्जा नीचे आ जाती है। इससे ऊर्जा घूमने लगती है, जिससे सभी अंगों के साथ मूलाधार से जुड़े अंग भी पुनः सक्रिय और क्रियाशील हो जाते हैं। मुझे तो लगता है कि बीयर पीने से जो पेशाब खुल कर आता है, वह इससे यौनांगों का दबाव कम होने से ही आता है, न कि इसमें मौजूद पानी से, जैसा अधिकांश लोग समझते हैं। सीधे पानी पीने से तो पेशाब इतना नहीं खुलता, चाहे जितना मर्जी पानी पी लो। अल्कोहल का प्रभाव मिटने पर पुनः दबाव बन जाए, यह अलग बात है। अब कोई यह न समझ ले कि अल्कोहल से कुंडलिनी ऊर्जा को घूमने में मदद मिलती है, इसलिए यह स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है। हाहाहा। टेस्टॉस्टिरोन होर्मोन ब्लॉकर से इसलिए प्रॉस्टेट दबाव कम होता है, क्योंकि उससे इस होर्मोन की यौनाँग प्रेरक शक्ति क्षीण हो जाती है। इसके विपरीत, बहुत से आदर्शवादी पुरुष अपनी स्त्री को संतुष्ट नहीं कर पाते। मुझे मेरा एक दोस्त बता रहा था कि एक आदर्शवादी और संत प्रकार के उच्च सरकारी प्रोफेसर की पत्नि जो खुद भी एक सरकारी उच्च अधिकारी थी, उसने अपने कार्यालय से संबंधित एक बहुत मामूली से अविवाहित नवयुवक कर्मचारी से अवैध संबंध बना रखे थे। जब उन्हें इस बात का पता पुख्ता तौर पर चला, तो उनको इतना ज्यादा भावनात्मक सदमा लगा कि वे बेचारे सब कुछ यहीं छोड़कर विदेश चले गए, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि एक औरत को जब अश्लीलता का चस्का लग जाए तो उसे उससे पीछे हटाना बहुत मुश्किल है, हालांकि असम्भव नहीं है। हालांकि एक औरत के लिए व उसके अवैध प्रेमी के लिए ऐसा करना बहुत नुकसानदायक हो सकता है, विशेषकर यदि उसका असली प्रेमी या पति सिद्ध प्रेमयोगी हो। शिवपुराण के अनुसार जब शिव और पार्वती का विवाह हो रहा था, तो ब्रह्मा उस विवाह में पुरोहित की भूमिका निभा रहे थे। शिवपार्वती से पूजन करवाते समय ब्रह्मा की नजर पार्वती के पैर के नख पर पड़ गई। उसे वे मोहित होकर देखते ही रहे और पार्वती पर कमासक्त हो गए। इससे उनका वीर्यपात हो गया। शिव को इस बात का पता चल गया। इससे शिव इतने ज्यादा क्रोधित हुए कि प्रलय मचाने को तैयार हो गए। बड़ी मुश्किल से देवताओं ने उन्हें मनाया, फिर भी उन्होंने ब्रह्मा को भयंकर श्राप दे ही दिया। प्रलय तो टल गई पर ब्रह्मा की बहुत बड़ी दुर्गति हुई। यदि पार्वती के मन में भी विकार पैदा हुआ होता, और वह ब्रह्मा के ऊपर कमासक्त हुई होती, तो उसे भी शिव की कुंडलिनी शक्ति दंड देती। यदि वह शिव की अतिनिकट संगति के कारण उस दंड से अप्रभावित रहती, तो उस दंड का प्रभाव उससे जुड़े कमजोर मन वाले उसके नजदीकी संबंधियों पर पड़ता, जैसे उसकी होने वाली संतानेँ आदि। ऐसा सब शिव की इच्छा के बिना होता, क्योंकि कौन अपनी पत्नि को दंड देना चाहता है। दरअसल कुंडलिनी खुद ही सबकुछ करती है। यदि ऐसा कुत्सित कुकर्म अनजाने में हो जाए तो इसका प्रायश्चित यही है कि दोनों अवैध प्रेमी मन से एकदूसरे को भाई-बहिन समझें और यदि कभी अपनेआप मुलाक़ात हो जाए, तो एक दूसरे को भाई-बहिन कह कर सम्बोधित करें, और सच्चे मन से कुंडलिनी से माफी मांगे, ऐसा मुझे लगता है। जो हुआ, सो हुआ, उसे भूल जाएं। आगे के लिए सुधार किया जा सकता है। मेरे उपरोक्त ऊर्जा-उफान से मुझे ये लाभ मिला कि एकदम से मुझे छीकें शुरु हो गईं, और नाक से पानी बहने लगा, जिससे जुकाम का वायरस दो दिन में ही गायब हो गया। गले तक तो वह लगभग पहुंच ही नहीं पाया। दरअसल वह कुंडलिनी ऊर्जा वायरस के खिलाफ इसी सुरक्षा चक्र को मजबूती देने के लिए उमड़ रही थी। इसी तरह एकबार कई दिनों से मैं किसी कारणवश भावनात्मक रूप से चोटिल अवस्था में था। शरीरविज्ञान दर्शन की भावना से कुंडलिनी मुझे स्वस्थ भी कर रही थी, पर कामचलाऊ रूप में ही। फिर एक दिन तांत्रिक कुंडलिनी योग की शक्ति से कुंडलिनी ऊर्जा लगातार मेरे दिल पर गिरने लगी। मैं मूलाधार, स्वाधिष्ठान और आज्ञा चक्र और नासिकाग्र के साथ छाती के बाईं ओर स्थित दिल पर भी ध्यान करने लगा। इससे दोनों कुंडलिनी चैनल भी महसूस हो रहे थे, और साथ में उससे दिल की ओर जाती हुई ऊर्जा भी और फिर पुनः नीचे उसी केंद्रीय चैनल में उसे जुड़ते हुए महसूस कर रहा था। यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा, जिससे मेरी यौन कुंडलिनी ऊर्जा से मेरा दिल बिल्कुल स्वस्थ हो गया। बाद में यह मेरे व्यवहार में एकाएक परिवर्तन से और लोगों के मेरे प्रति सकारात्मक व्यवहार से भी सिद्ध हो गया।

चलो, फिर से अध्यात्म की तरफ लौटते हैं। वैसे अध्यात्म भी दुनियादारी के बीच ही पल्लवित-पुष्पित होता है, उससे अलग रहकर नहीं, ऐसे ही जैसे सुंदर फूल काँटों के बीच ही उगते हैं। कांटे ही फूलों की शत्रुओं से रक्षा करते हैं। मैं पिछली पोस्ट में जो प्रकृति-पुरुष विवेक के बारे में बात कर रहा था, उसे अपने समझने के लिए थोड़ा विस्तार दे रहा हूँ, क्योंकि कई बार मैं यहाँ अटक जाता हूँ। चाहें तो पाठक भी इसे समझ कर फायदा उठा सकते हैं। वैसे है यह पूरी थ्योरी ही, प्रेक्टिकल से बिल्कुल अलग। हाँ, थ्योरी को समझ कर आदमी प्रेक्टिकल की ओर प्रेरित हो सकता है। जब कुछ क्षणों के लिए मुझे कुंडलिनी-पुरुष अपनी आत्मा से पूर्णतः जुड़ा हुआ महसूस हुआ, मतलब कि जब मैं प्रकृति से मुक्त पुरुष बन गया था, तब ऐसा नहीं था कि उस समय प्रकृति रूपी विचार और दृश्य अनुभव नहीं हो रहे थे। वे अनुभव हो रहे थे, और साथ में कुंडलिनी चित्र भी, क्योंकि वह भी तो एक विचार ही तो है। पर वे मुझे मुझ पुरुष के अंदर और उससे अविभक्त ऐसे महसूस हो रहे थे, जैसे समुद्र में लहरें होती हैं। इसका मतलब है कि वे उस समय प्रकृति रूप नहीं थे, क्योंकि उनकी पुरुष रूप आत्मा से अलग अपनी कोई सत्ता नहीं थी। आम साधारण जीवन में तो प्रकृति की अपनी अलग सत्ता महसूस होती है, हालांकि ऐसा मिथ्या होता है पर भ्रम से सत्य लगता है। दुनियादारी झूठ और भ्रम पर ही टिकी है। दरअसल कुंडलिनी चित्र अर्थात मन पुरुष और प्रकृति के मेल से बना होता है। जब वह निरंतर ध्यान से अज्ञानावृत आत्मा से एकाकार हो जाता है, तब वह शुद्ध अर्थात पूर्ण पुरुष बन पाता है। मतलब कि तब ही वह प्रकृति के बंधन से छूट पाता है। पूर्ण और शुद्ध पुरुष का असली अनुभव परमानंद स्वरूप जैसा होता है। इससे स्वाभाविक है कि उसके पूर्ण अनुभव के साथ भी तो मन के विचार चित्र तो उभरेंगे ही। पर तब वे ऐसे मिथ्या या आभासी महसूस होंगें जैसे चूने के ढेर में खींची लकीरें। मतलब उनकी सत्ता नहीं होगी, केवल पुरुष की सत्ता होगी। इसीलिए तो उस कुंडलिनी जागरण के चंद क्षणों में परमानंद के साथ सब कुछ पूरी तरह एक सा ही महसूस होता है, सबकुछ अद्वैत। जीवित मनुष्य में आनंद के साथ मन के विचार बंधे होते हैं। आनंद के साथ विचार आएंगे ही आएंगे। इस तरह से पूर्ण निर्विचार अवस्था के साथ आत्मरूप का अनुभव असम्भव के समान ही है जीवित अवस्था में। वैसे साधना की वह सर्वोच्च अवस्था होती है। वहाँ तक असंख्य आत्मज्ञानियों में केवल एक-आध ही पहुंच पाता है। उसीके पारलौकिक अनुभव को वेदों में लिखा गया है, जिसे आप्तवचन कहते हैं। उस पर विश्वास करने के इलावा पूर्ण मुक्त आत्मा की पारलौकिक अवस्था को जानने का कोई तरीका नहीं है। ऐसा नहीं है कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी इस परमावस्था को प्राप्त नहीं कर सकता। वह कर सकता है, पर जानबूझकर नहीं करता। इसकी मुख्य वजह है परमावस्था का अव्यवहारिक होना। यह अवस्था संन्यास की तरह होती है। इस अवस्था में आदमी प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में भौतिक रूप से पिछड़ जाता है। यहाँ तक कि खाने के भी लाले पड़ सकते हैं। अभी मानव समाज इतना विकसित नहीं हुआ है कि इस अवस्था के योग्य उम्मीदवारों के भरणपोषण और सुरक्षा का उत्तरदायित्व संभाल सके। सम्भवतः प्राचीन भारत में कोई ऐसी कार्यप्रणाली विकसित कर ली गई थी, तभी तो उस समय संन्यासी बाबाओं का बोलबाला हुआ करता था। पर आज के तथाकथित आधुनिक भारत में ऐसे बाबाओं की हालत बहुत दयनीय प्रतीत होती है। प्राचीन भारत में समाज का, विशेषकर समाज के उच्च वर्ग का पूरा जोर कुंडलिनी जागरण के ऊपर होता था। यह सही भी है, क्योंकि कुंडलिनी ही जीवविकास की अंतिम और सर्वोत्तम ऊंचाई है। हिन्दुओं की अनेकों कुंडलिनी योग आधारित परम्पराओं में उपनयन संस्कार में पहनाए जाने वाले जनेऊ अर्थात यग्योपवीत के पीछे भी कुंडलिनी सिद्धांत ही काम करता है। इसे ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। इसका मतलब है ब्रह्म अर्थात कुंडलिनी की याद दिलाने वाला धागा। कई लोग कहते हैं कि यह बाईं बाजू की तरफ फिसल कर काम के बीच में अजीब सा व्यवधान पैदा करता है। सम्भवतः यह अंधे कर्मवाद से बचाने का एक तरीका हो। यह भी लगता है कि इससे यह शरीर के बाएं भाग को अतिरिक्त बल देकर इड़ा और पिंगला नाड़ियों को संतुलित करता है, क्योंकि बिना जनेऊ की साधारण परिस्थिति में आदमी का ज्यादा झुकाव दाईं तरफ ही होता है। इसे शौच के समय तब तक दाएं कान पर लटका कर रखा जाता है, जब तक आदमी शौच से निवृत होकर जल से पवित्र न हो जाए। इसके दो मुख्य लाभ हैं। एक तो यह कि शौच-स्नान आदि के समय क्रियाशील रहने वाले मूलाधार चक्र की शक्तिशाली ऊर्जा कुंडलिनी को लगती रहती है, और दूसरा यह कि आदमी की अपवित्र अवस्था का पता अन्य लोगों को लगता रहता है। इससे एक फायदा यह होता है कि इससे शौच के माध्यम से फैलने वाले संक्रामक रोगों से बचाव होता है, और दूसरा यह कि शौच जाने वाले आदमी की शक्तिशाली कुंडलिनी ऊर्जा का लाभ उसके साथ उसके नजदीकी लोगों को भी मिलता है, क्योंकि इससे वे उस ऊर्जा का गलत मतलब निकालने से होने वाले अपने नुकसान से बचे रह कर कुंडलिनी लाभ प्राप्त करते हैं। इसी तरह कमर के आसपास बाँधी जाने वाली मेखला से नाभि चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र स्वस्थ रहते हैं, जिससे पाचन सामान्य बना रहता है, और प्रॉस्टेट जैसी समस्याओं से भी बचाव होता है। यह अलग बात है कि क्रूर और अत्याचारी मुगल हमलावर औरंगजेब जनेऊ के कुंडलिनी विज्ञान को न समझते हुए प्रतिदिन तब खाना खाता था, जब तथाकथित काफ़िर लोगों के गले से सवा मन जनेऊ उतरवा लेता था। अफ़सोस की बात कि आज के वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक युग में भी विशेष वर्ग के लोग उसे अपना रोल मॉडल समझते हैं।

कुंडलिनी शक्ति गाड़ी है, तो संस्कार उसको दिशानिर्देश देने वाला ड्राइवर~द कश्मीर फाइल्स फिल्म का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

दोस्तों, इस हफ्ते मैंने बड़े पर्दे पर ‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म देखी। यह पहली फ़िल्म देखी जो कि सच्ची घटनाओं पर हूबहू आधारित है। ज्यादातर ऐसी ही फिल्में बननी चाहिए, ताकि मनोरंजन के साथसाथ सामाजिक उत्थान भी हो सके। यह फ़िल्म सभी को देखनी चाहिए। इस फ़िल्म में धार्मिक कट्टरवाद और जेहादी बर्बरता का जीवंत चित्रण किया गया है। साथ में, मैं मेडिटेशन के लिए एक झील के पास भी गया। वैसे मैं रोजमर्रा के तनाव व उससे उत्पन्न थकान को दूर करने के लिए गया था, मेडिटेशन तो खुद ही हो गई। मैं पथरीली घास पर विभिन्न शारीरिक पोस्चरों या बनावटों के साथ लम्बे समय तक बैठे और लेटे रहकर झील को निहारता रहा। आती-जाती साँसों पर, उससे उत्पन्न शरीर की, मुख्यतः छाती व पेट की गति पर ध्यान देता रहा। मन के विचार आ-जा रहे थे। विविध भावनाएं उमड़ रही थीं, और विलीन हो रही थीं। मैं उन्हें साक्षीभाव से निहार रहा था, क्योंकि मेरा ध्यान तो साँसों के ऊपर भी बंटा हुआ था, और आसपास के अद्भुत कुदरती नजारों पर भी। सफेद पक्षी झील के ऊपर उड़ रहे थे। बीच-बीच में वे पानी की सतह पर जरा सी डुबकी लगाते, और कुछ चोंच से उठाकर उड़ जाते। सम्भवतः वे छोटी मछलियां थीं। बड़ी मछली के साथ कई बार कोई पक्षी असंतुलित जैसा होकर कलाबाजी सी भी दिखाता। एकबार तो एक पक्षी की चोंच से मछली नीचे गिर गई। वह तेजी से उसका पीछा करते हुए दुबारा से उसे पानी में से पकड़कर ऊपर ले आया और दूर उड़ गया। विद्वानों ने सच ही कहा है कि जीवो जीवस्य भोजनम। एक छोटी सी काली चिड़िया नजदीक ही पेड़ पर बैठ कर मीठी जुबान में चहक रही थी, और इधर-उधर व मेरी तरफ देखते हुए फुदक रही थी, जैसे कि मेरे स्वागत में कुछ सुना रही हो। मुझे उसमें अपनी कुंडलिनी एक घनिष्ठ मित्र की तरह नजर आई। मुझे आश्चर्य हुआ कि इतने छोटे जीव भी किस तरह जीवन और प्रकृति के प्रति आशान्वित और सकारात्मक होते हैं। वे भी अपनी जीवनयात्रा पर बेधड़क होके चले होते हैं। झील के पानी की तट से टकराने की हल्की आवाज को मैं अपने अंदर, अपनी आत्मा के अंदर महसूस करने लगा। चलो कुछ तो आत्मा की झलक याद आई। आजकल ऐसे प्राकृतिक स्थानों की भरमार है, जहाँ लोगों की भीड़ उमड़ी होती है। पर ऐसे निर्जन हालांकि सुंदर प्राकृतिक स्थल कम ही मिलते हैं। कई दूरदराज के लोग जब ऐसी जगहों को पहली बार देखते हैं, तो भावविभोर हो जाते हैं। कई तो शांति का भरपूर लुत्फ उठाने के लिए वहाँ टैंट लगा कर दिन-रात लगातार कई दिनों तक रहना चाहते हैं। हालांकि मैं तो थोड़ी ही देर में शांत, तनावमुक्त और स्वस्थ हो गया, जिससे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेने का विचार ही छोड़ दिया। खैर मैं फिल्म द कश्मीर फाइल्स के बारे में बात कर रहा था। इसका एक सीन जो मुझे सबसे ज्यादा भावनात्मक लगा, वह है पुष्कर बने अनुपम खेर का दिल्ली की गर्मी में कश्मीर की बर्फ की ठंड महसूस करना। वह अपने पोते को हकीकत बता रहा होता है कि कैसे आजादी के नारे लगाते हुए जेहादी भीड़ ने उन्हें मारा और भगाया था, इसलिए उसे ऐसे लोगों के नारों के बहकावे में नहीं आना चाहिए। वह बूढ़ा होने के कारण उसे समझाते हुए थक जाता है, जिससे वह कांपने लगता है। काँपते हुए वह चारों तरफ नजर घुमाते हुए कश्मीरी भाषा में बड़ी भावपूर्ण आवाज में कहता है कि लगता है कि बारामुला में बर्फ पड़ गई है, अनन्तनाग में बर्फ पड़ गई है, आदि कुछ और ऊंची पहाड़ियों का नाम लेता है। फिर उसका पोता उसे प्यार व सहानुभूति के साथ गले लगाकर उसे स्थिर करता है। गहरे मनोभावों को व्यक्त करने का यह तरीका मुझे बहुत अच्छा लगा। कश्मीरी भाषा वैसे भी बहुत सुंदर, प्यारी और भावपूर्ण भाषा है। इस फ़िल्म के बारे में समीक्षाएं, चर्चाएं और लेख तो हर जगह विस्तार से मिल जाएंगे, क्योंकि आजकल हर जगह इसीका बोलबाला है। मैं तो इससे जुड़े हुए आधारभूत मनोवैज्ञानिक सिद्धांत पर प्रकाश डालूंगा। हम हर बार की तरह इस पोस्ट में भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि हम न तो किसी धर्म के विरोधी हैं, और न ही पक्षधर हैं। हम असली धर्मनिरपेक्ष हैं। हम सत्य व मानवता ढूंढते हैं, चाहे कहीं भी मिल जाए। सत्य पर चलने वाला बेशक शुरु में कुछ दिक्कत महसूस करे, पर अंत में जीत उसीकी होती है। हम तो धर्म के मूल में छिपे हुए कुंडलिनी रूपी मनोवैज्ञानिक तत्त्व का अन्वेषण करते हैं। इसीसे जुड़ा एक प्रमुख तत्त्व है, संस्कार।

हिंदु दर्शन के सोलह संस्कार

दोस्तों, हम हिंदु धर्म के बजाय हिंदु दर्शन बोलना पसन्द करेंगे, क्योंकि यह एक आध्यात्मिक मनोविज्ञान लगता है मुझे। दर्शन भी एक मनोविज्ञान या विज्ञान ही लगता है मुझे। इसके सोलह संस्कार आदमी के जन्म लेते ही शुरु हो जाते हैं, और मरते दम तक होते रहते हैं। मृत्यु भी एक संस्कार है, अंतिम संस्कार। हरेक संस्कार के समय कुछ आध्यात्मिक क्रियाएँ की जाती हैं। ये इस तरह से बनाई गई होती हैं कि ये अवचेतन मन पर अपना अधिक से अधिक प्रभाव छोड़े। इससे अवचेतन मन पर संस्कार का आरोपण हो जाता है, जैसे खेत में बीज का रोपण होता है। जैसे समय के साथ जमीन के नीचे से बीज अंकुरित होकर पौधा बन जाता है, उसी तरह कुंडलिनी रूपी अध्यात्म का संस्कार भी अवचेतन मन की गहराई से बाहर निकल कर कुंडलिनी क्रियाशीलता और कुंडलिनी जागरण के रूप में उभर कर सामने आता है। दरअसल संस्कार कुंडलिनी के रूप में ही बनता है। कुंडलिनी ही वह बीज है, जिसे संस्कार समारोह के माध्यम से अवचेतन मन में प्रविष्ट करा दिया जाता है। इस प्रकार, संस्कार समारोह की अच्छी मानवीय शिक्षाएँ भी कुंडलिनी के साथ अवचेतन मन में प्रविष्ट हो जाती हैं, क्योंकि ये इसके साथ जुड़ जाती हैं। इस प्रकार कुंडलिनी और मानव शिक्षाओं का मिश्रण वास्तव में संस्कार है। कुंडलिनी वाहक है, और मानव शिक्षाएं वाह्य हैं अर्थात उनको ले जाया जाता है। समय के साथ दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं, और कुण्डलिनी जागरण और मानव समाज की मानवता को एक साथ संभव बनाते हैं। ये संस्कार समारोह मनुष्य की उस जीवन-अवस्था में किए जाते हैं, जिस समय वह बेहद संवेदनशील हो, और उसके अवचेतन मन में संस्कार-बीज आसानी से और पक्की तरह से बैठ जाएं। उदाहरण के लिए विवाह संस्कार। मुझे लगता है कि यह सबसे बड़ा संस्कार होता है, क्योंकि अपने विवाह के समय आदमी सर्वाधिक संवेदनशील होता है। इसी तरह जन्म-संस्कार भी बहुत प्रभावी होता है, क्योंकि अपने जन्म के समय आदमी अंधेरे की गहराइयों से पहली बार प्रकाश में आया होता है, इसलिए वह बेहद संवेदनशील होता है। उपनयन संस्कार आदमी की किशोरावस्था में उस समय किया जाता है, जिस समय उसके यौन हारमोनों के कारण उसका रूपांतरण हो रहा होता है। इसलिए आदमी की यह अवस्था भी बेहद संवेदनशील होती है। संस्कार समारोह अधिकांशतः आदमी की उस अवस्था में किए जाने का प्रावधान है, जब उसमें यौन ऊर्जा का माहौल ज्यादा हो, क्योंकि वही कुंडलिनी को शक्ति देती है। जन्म के संस्कार के समय माँ-बाप की यौन ऊर्जा का सहारा होता है। ‘जागृति की इच्छा’ रूप वाला छोटा सा संस्कार भी कालांतर में आदमी को कुंडलिनी जागरण दिला सकता है, क्योंकि बीज की तरह संस्कार समय के साथ बढ़ता रहता है। इसीको गीता में इस श्लोक से निरूपित किया गया है, “स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात”, अर्थात इस धर्म का थोड़ा सा अनुष्ठान भी महान भय से रक्षा करता है। कुंडलिनी योग के संस्कार को ही यहाँ ‘इस धर्म का थोड़ा सा अनुष्ठान’ कहा गया है।

कुंडलिनी संस्कारों के वाहक के रूप में काम करती है

संस्कार समारोह के समय विभिन्न आध्यात्मिक प्रक्रियाओं से अद्वैत का वातावरण पैदा किया जाता है। अद्वैत के बल से मन में कुंडलिनी मजबूत होने लगती है। उस कुंडलिनी की मूलाधार-वासिनी शक्ति से दिमाग बहुत संवेदनशील और ग्रहणशील अर्थात रिसेप्टिव बन जाता है। ऐसे में जो भी शिक्षा दी जाती है वह मन में अच्छी तरह से बैठ जाती है, और यहाँ तक कि अवचेतन मन तक दर्ज हो जाती है। कुंडलिनी से मन आनन्द से भी भर जाता है। इसलिए जब भी आदमी आनन्दित होता रहता है, तब -तब कुंडलिनी भी उसके मन में आती रहती है, और पुराने समय में उससे जुड़ी शिक्षाएं भी। इस तरह वे शिक्षाएं मजबूत होती रहती हैं। आनंद और कुंडलिनी साथसाथ रहते हैं। दोनों को ही मूलाधार से शक्ति मिलती है। आनन्द की तरफ भागना तो जीवमात्र का स्वभाव ही है। 

शक्ति के साथ अच्छे संस्कार भी जरूरी हैं

शक्ति रूपी गाड़ी को दिशा निर्देशन देने का काम संस्कार रूपी ड्राइवर करता है। हिन्दू धर्म में सहनशीलता, उदारता, अहिंसा आदि के गुण इसी वजह से हैं, क्योंकि इसमें इन्हीं गुणों को संस्कार के रूप में मन में बैठाया जाता है। जिस धर्म में लोगों को जन्म से ही यह सिखाया और प्रतिदिन पढ़ाया जाता है कि उनका धर्म ही एकमात्र धर्म है, उनका भगवान ही एकमात्र भगवान है, वे चाहे कितने ही बुरे काम कर लें, वे जन्नत ही जाएंगे, और अन्य धर्मों के लोग चाहे कितने ही अच्छे काम क्यों न कर लें, वे हमेशा नरक ही जाएंगे, और उनका धर्म स्वीकार न करने पर अन्य धर्म के लोगों को मौका मिलते ही बेरहमी से मार देना चाहिए, उनसे इसके इलावा और क्या अपेक्षा की जा सकती है। वे कुंडलिनी शक्ति का दुरुपयोग करते हैं, क्योंकि उनके मन में जमे हुए अमानवीय संस्कार उस शक्ति की सहायता से उन्हें गलत रास्ते पर धकेलते रहते हैं। इससे अच्छा तो कोई संस्कार मन में डाले ही न जाएं, अर्थात किसी धर्म को न माना जाए मानव धर्म को छोड़कर। जब मानव बने हैं, तो जाहिर है कि मानवता खुद ही पनपेगी। फिर खुद ही मानवीय संस्कार मन में उगने लगेंगे। बुद्ध कहते हैं कि यदि कांटे बोना बंद करोगे, तो फूल खुद ही उग आएंगे। कुंडलिनी शक्ति हमेशा अच्छाई की ओर ले जाती है। पर यदि ज़बरदस्ती ही, और कुंडलिनी के लाख प्रतिरोध के बाद भी यदि बारम्बार बुराइयां अंदर ठूंसी जाए, तो वह भी भला कब तक साथ निभा पाएगी। दोस्तो, सुगन्ध फैलाने वाले गेंदे के फूल के चारों ओर विविध बूटियों से भरा हुआ रंगबिरंगा जंगल उग आता है, जबकि लैंटाना या लाल फूलनू या फूल-लकड़ी जैसी जहरीली बूटी चारों तरफ बढ़ते हुए हरेक पेड़-पौधे का सफाया कर देती है, और अंत में खुद भी नष्ट हो जाती है। मैं शिवपुराण में पढ़ रहा था कि जो शिव का भक्त है, उसका हरेक गुनाह माफ हो जाता है। इसका मतलब है कि ऐसे कट्टर धर्म शिवतंत्रसे ही निकले हैं। तन्त्र में और इनमें बहुत सी समानताएं हैं। इन्हें अतिवादी तन्त्र भी कह सकते हैं। इससे जुड़ी एक कॉलेज टाइम की घटना मुझे याद आती है। एक अकेला कश्मीरी मुसलमान पूरे होस्टल में। उसी से पूरा माहौल बिगड़ा जैसा लगता हुआ। जिसको मन में आया, पीट दिया। माँस-अंडों के लिए अंधा कुआँ। शराब-शबाब की रंगरलियां आम। कमरे में तलवारें छुपाई हुईं। पेट्रोल बम बनाने में एक्सपर्ट। एकबार सबके सामने उसने चुपके से अपनी अलमारी से निकालकर मेरे गर्दन पर तलवार रख दी। मैं उसकी तरफ देखकर हंसने लगा, क्योंकि मुझे लगा कि वो मजाक कर रहा था। वह भी मक्कारी की बनावटी हंसी हंसने लगा। फिर उसने तलवार हटा कर रख दी। मेरे एक प्रत्यक्षदर्शी दोस्त ने बाद में मुझसे कहा कि मुझे हंसना नहीं चाहिए था, क्योंकि वह एक सीरियस मेटर था। मुझे कभी इसका मतलब समझ नहीं आया। हाँ, मैं उस दौरान जागृति और कुंडलिनी के भरपूर प्रभाव में आनन्दमग्न रहता था। इससे जाहिर होता है कि इस तरह के मजहबी कट्टरपंथी वास्तविक आध्यात्मिकता के कितने बड़े दुश्मन होते हैं। जरा सोचो कि जब सैंकड़ों हिंदुओं के बीच में अकेला मुसलमान इतना गदर मचा सकता है, तो कश्मीर में बहुसंख्यक होकर उन्होंने अल्पसंख्यक कश्मीरी हिंदुओं पर क्या जुर्म नहीं किए होंगे। यह उसी के आसपास का समय था। यही संस्कारों का फर्क है। शक्ति एक ही है, पर संस्कार अलग-अलग हैं। इसलिए शक्ति के साथ अच्छे संस्कारों का होना भी बहुत जरूरी है। यही ‘द कश्मीर फाइल्स फ़िल्म’ में दिखाया गया है। यह फिल्म नित-नए कीर्तिमान स्थापित करती जा रही है।

कुंडलिनी शक्ति ही माता सीता है, और उसका बहिर्गमन ही दशानन रावण के द्वारा सीताहरण है

मित्रो, मैं पिछले ब्लॉग लेख में बता रहा था कि किस तरह रामायण कुंडलिनी योग के रूपकात्मक वर्णन की तरह प्रतीत होती है। इस लेख में हम इसको थोड़ा विस्तृत परिपेक्ष्य में देखेंगे।

शरीर में कुंडलिनी शक्ति ही माता सीता है, और उसका बहिर्गमन ही दशानन रावण के द्वारा सीताहरण है

राक्षस रावण के दस सिर दस दोषों के प्रतीक हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियों के दोष, और पांच कर्मेंद्रियों के दोष। उन दोषों ने कुंडलिनी शक्ति को बहिर्मुख किया हुआ था। इससे कुंडलिनी शक्ति शरीर से बाहर निकलकर संसार में भटकी हुई थी। भौतिक संसार में भटकते हुए वह उन दोषों के हित में काम कर रही थी, जिससे वे दोष और ज्यादा ताकतवर हुए जा रहे थे। विभिन्न सांसारिक इच्छाओं को पैदा करके वह काम दोष को बलवान बना रही थी। लड़ाई-झगड़े करा कर वह क्रोध दोष को बल दे रही थी। ज्यादा से ज्यादा पाने की इच्छा पैदा करके वह लालच को बढ़ा रही थी। सुंदर वस्तुओं के पीछे शरीर को भगा कर वह मोह दोष को बढ़ा रही थी। नशा वगैरह करवाकर वह मद को बढ़ा रही थी, और दूसरे की संपत्ति पर बुरी नजर डलवाकर मत्सर दोष को बढ़ा रही थी। इसी तरह से वह कर्मेन्द्रियोके पांच दोषों को भी बढ़ा रही थी। वह शक्ति ही माता सीता है। दस दोषों के द्वारा उस कुंडलिनी शक्ति को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने को ही दशानन रावण के द्वारा माता सीता को चुराने के रूप में लिखा गया है। 

सहस्रार चक्र में आत्मा और कुंडलिनी का मिलन ही राम और सीता के मिलन के रूप में दर्शाया गया है

कुंडलिनी शक्ति के द्वारा बाहरी भौतिक जगत में भी अनासक्ति के साथ विविध क्रियाकलाप करना ही माता सीता का रावण से दूर और उसके प्रति अनासक्त बने रहना है। तीव्र कुंडलिनी योग के माध्यम से कुंडलिनी शक्ति का शरीर में अंदर की तरफ लौटना और सहस्रार में प्रविष्ट होकर जीवात्मा से उसका मिलना ही माता सीता से भगवान राम का पुनर्मिलन है। सहस्रार में कुंडलिनी और जीवात्मा के मिलन से दसों इन्द्रियों के दोषों का नष्ट होना ही भगवान राम के द्वारा सीता की सहायता से दशानन रावण का वध करना है। भारतवर्ष शरीर है, लंका शरीर के बाहर का भौतिक जगत, और उनके बीच में समुद्र दोनों के बीच का विभाजनकारी क्षेत्र है। बाहर की दुनिया कभी भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। हम दुनिया को महसूस नहीं करते हैं, लेकिन हम केवल अपने दिमाग के अंदर बाहरी दुनिया की अनुमानित छवि महसूस करते हैं। इसलिए दोनों क्षेत्रों के बीच महान महासागर को उनकी पूर्ण पृथकता दिखाने के लिए चित्रित किया गया है। राम का समुद्र में एक पुल के माध्यम से लंका पहुंचना प्रतीकात्मक है, क्योंकि हम किसी क्षेत्र तक पहुंचे बिना वहाँ से किसी चीज को वापस नहीं ला सकते हैं। उन्होंने और उनकी सेना ने नावों का नहीं, बल्कि एक पुल का इस्तेमाल किया। इसका मतलब है कि हमारा मस्तिष्क वास्तव में बाहरी दुनिया तक नहीं पहुंचता है, लेकिन मस्तिष्क में प्रवेश करने वाली रोशनी और ध्वनियों के रूप में पुल के माध्यम से जानकारी प्राप्त करता है।

सभी पुराण कुंडलिनी योग का मिथकीय व रूपात्मक वर्णन करते हैं

पुराने समय में अशिक्षा और पिछड़ेपन का बोलबाला होता था। कुंडलिनी योग अति सूक्ष्म व आध्यात्मिक विज्ञान से जुड़ा हुआ विषय था। उस समय स्थूल विज्ञान भी आम लोगों की समझ से परे होता था, कुंडलिनी योग जैसा सूक्ष्म व पारलौकिक विज्ञान उन्हें कैसे समझ आ सकता था। इसलिए कुंडलिनी योग का ज्ञान केवल सम्पन्न वर्ग के कुछ गिनेचुने लोगों को ही होता था। वे चाहते थे कि आम लोग भी उसे प्राप्त करते, क्योंकि आध्यात्मिक मुक्ति पर मानवमात्र का अधिकार है। पर वे उन्हें सीधे तौर पर कुंडलिनी योग को समझाने में सफल नहीं हुए। इसलिए उन्होंने कुंडलिनी योग को रूपात्मक व मिथकीय कथाओं के रूप में ढाला, ताकि लोग उन्हें रुचि लेकर पढ़ते, इससे धीरे-धीरे ही सही, कुंडलिनी योग की तरफ उनका झुकाव पैदा होता गया। उन कथाओं के संग्रह पुराण बन गए। उन पुराणों को पढ़ने से अनजाने में ही लोगों के अंदर कुंडलिनी का विकास होने लगा। इससे उन्हें आनन्द आने लगा, जिससे उन्हें पुराणों की लत लग गई। इतने प्राचीन ग्रँथों के प्रति तब से लेकर आज के आधुनिक युग तक जो लोगों का आकर्षण है, यह इसी कुंडलिनी-आनन्द के कारण प्रतीत होता है। पुराण पढ़ने व सुनने वाले लोगों के बीच में जिसका दिमाग तेज होता था, वह एकदम से कुंडलिनी योग को पकड़ कर अपनी कुंडलिनी को जागृत भी कर लेता था। इस तरह से पुराण प्राचीन काल से लेकर मानवता की अप्रतिम सेवा करते आ रहे हैं।

अध्यात्म में रूपकता का महत्त्व

रूपकों से आध्यात्मिक विषयों को भौतिकता, सरलता, रोचकता, सामाजिकता और वैज्ञानिकता मिलती है। इसके बिना अध्यात्म बहुत नीरस होता। कई लोग अनेक प्रकार के कुतर्कों से रूपकता का विरोध करते हैं। इसे रूढ़िवादिता, कपोल कल्पनाशीलता आदि माना जाता है। बेशक आजके विज्ञानवादी युग में ऐसा लगता हो, पर प्राचीन काल में रूपकों ने मानवमात्र को बहुत लाभ पहुंचाया है। यदि शिव के स्थान पर निराकार ब्रह्म कहा जाए तो कितना उबाऊ लगेगा। मस्तिष्क और सहस्रार शब्द में वो सरसता कहाँ है, जो उनकी जगह पर हिमालय पर्वत और कैलाश पर्वत लिखने से प्राप्त होती है। पर मैं यह बता दूं कि शिवपुराण में जो पर्वतों का उल्लेख है वह प्रतीकात्मक या रूपात्मक ही लगता है। ऐसा नहीं है कि केवल पर्वतों में ही कुंडलिनी जागरण होता हो। हाँ, पर्वत उसमें थोड़ी अधिक मदद जरूर करते हैं। वहां शान्ति होती है। पर वहाँ ऑक्सीजन की व अन्य सुविधाओं की कमी भी होती है। इससे अधिकांश प्राण ऐसे भौतिक कष्टों से निजात दिलाने में ही खर्च हो जाते हैं। इसलिए मैदान व पहाड़ का मिश्रण सबसे अच्छा है। मैदानों की सुविधाओं में खूब सारा प्राण इकठ्ठा कर लो, और उसे कुंडलिनी को देने के लिए थोड़े समय के लिए पर्वत पर चले जाओ। पुराने जमाने मे लोग ऐसा ही करते थे। इसी तरह कुंडलिनी शब्द भी उतना रोचक नहीं लगता, जितना उसकी जगह पर माता पार्वती या सीता लगता है। फिर भी आजकल के तथाकथित आधुनिक व बुद्धिप्रधान समाज की ग्राह्यता के लिए आध्यात्मिक रूपकता को रहस्योद्घाटित करते हुए यथार्थ भी लिखना पड़ता है। 

राम से बड़ा राम का नाम~भक्तिगीत कविता

जग में सुंदर हैं सब काम
पर मिल जाए अब आ~राम।
बोलो राम राम राम
राम से बड़ा राम का नाम।१।
दीपावली मनाएं हम
खुशियां खूब लुटाएं हम।
आ~राम आ~राम रट-रट के
काम को ब्रेक लगाएं हम।२।
मानवता को जगाएँ हम
दीप से दीप जलाएँ हम।-2
प्रेम की गंगा बहाएं हम-2
नितदिन सुबहो शाम।३।
बोलो राम राम राम
राम से बड़ा राम का नाम।-2
जग में------
वैर-विरोध को छोड़ें हम
मन को भीतर मोड़ें हम।
ज्ञान के धागे जोड़ें हम
बंधन बेड़ी तोड़ें हम।४।
दिल से राम न बोलें हम
माल पराया तोलें हम।-2
प्यारे राम को जपने का-2
ऐसा हो न काम।५।
बोलो राम राम राम
राम से बड़ा राम का नाम।-2
जग में------
मेहनत खूब करेंगे हम
रंगत खूब भरेंगे हम।
मन को राम ही देकर के
तन से काम करेंगे हम।६।
अच्छे काम करेंगे हम
अहम-भ्रम न भरेंगे हम।-2
बगल में शूरी रखकर के-2
मुँह में न हो राम।७।
बोलो राम राम राम
राम से बड़ा राम का नाम।-2
जग में------
भाईचारा बाँटें हम
शिष्टाचार ही छांटें हम।
रूढ़ि बंदिश काटें हम
अंध-विचार को पाटें हम।८।
धर्म विभेद करें न हम
एक अभेद ही भीतर हम।-2
कोई शिवजी कहे तो कोई-2
दुर्गा कृष्ण या राम।९।
बोलो राम राम राम
राम से बड़ा राम का नाम।-2
जग में------
धुन प्रकार~ जग में सुंदर हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम [भजनसम्राट अनुप जलोटा गीत]
साभार~भीष्म🙏@bhishmsharma95
राम से बड़ा राम का नाम

कुंडलिनी विभिन्न देवताओं, शिव ब्रह्मरूप अखंड ऊर्जा, सहस्रार चक्र वटवृक्ष और मस्तिष्क कैलाश पर्वत के रूप में दर्शाए गए हैं

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि ‘चक्र’ नाम कैसे पड़ा है। दरअसल चक्र का शाब्दिक अर्थ भी पहिया ही होता है। उदाहरण के लिए रथचक्र, जलचक्र आदि। यह भी बताया कि चक्र को ऊर्जा का केंद्र क्यों कहा गया है। चक्र के बारे में ऐसा तो हर जगह लिखा होता है, पर यह साबित नहीं किया होता है कि ऐसा क्यों कहा गया है। इससे रहस्यात्मकता की बू आती है। मैंने इसे वैज्ञानिक व अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया कि ऐसा क्यों कहा जाता है। इसीलिए इस वेबसाइट का नाम “कुंडलिनी रहस्योद्घाटन” है। यह भी मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के मिश्रण से कुंडलिनी कैसे बनती है। दरअसल प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के इसी मिश्रित रूप को ही कुंडलिनी कहते हैं। यह कुंडलिनी की सबसे छोटी परिभाषा है। इसे ही टाईम-स्पेस मिश्रण भी कहते हैं। प्राण ऊर्जा टाईम का प्रतिनिधित्व करती है, और मनस ऊर्जा स्पेस का प्रतिनिधित्व करती है। इस पोस्ट में मैं बताऊंगा कि सहस्रार चक्र को शिव के निवास स्थान या कैलाश के वटवृक्ष के रूप में कैसे निरूपित किया गया है।

दक्षयज्ञ से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं द्वारा कैलाश गमन

भगवान विष्णु दक्ष से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं सहित कैलाश पर्वत पर गए। वह कैलाश पर्वत मनुष्यों के इलावा किन्नरों, अप्सराओं और योगसिद्ध महात्माओं से सेवित था। वह बहुत ऊंचा था। वह चारों ओर से मणिमय शिखरों से सुशोभित था। वह अनेक प्रकार की धातुओं से विचित्र जान पड़ता था। वह अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं से भरा था। वह अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों व झरनों से परिव्याप्त था। उसके शिखर पर सिद्धांगनाएँ अपने-अपने पतियों के साथ विहार करती थीं। वह अनेक प्रकार की कन्दराओं, शिखरों तथा अनेक प्रकार के वृक्षों की जातियों से सुशोभित था। उसकी कांति चांदी के समान श्वेतवर्ण की थी। वह पर्वत बड़े-बड़े व्याघ्र आदि जंतुओं से युक्त, भयानकता से रहित, सम्पूर्ण शोभा से सम्पन्न, दिव्य तथा अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न करने वाला था। वह पर्वत पवित्र गंगा नदी से घिरा हुआ और अत्यंत निर्मल था। उस कैलाश पर्वत के निकट शिव के मित्र कुबेर की अलका नाम की दिव्य नगरी थी। उसी पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक दिव्य वन था, जो दिव्य वृक्षों से शोभित था, और जहाँ पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। उस पर्वत के बाहर से नन्दा और अलकनन्दा नामक दिव्य व पावन सरिताएं बह रही थीं, जो दर्शन मात्र से ही पापों का नाश करती हैं। देव स्त्रियां प्रतिदिन अपने लोक से आकर उन नदियों का जल पीतीं हैं, और स्नान करके रति से आकृष्ट होकर पुरुषों के साथ विहार करती हैं। फिर उस अलकापुरी और सौगंधिक वन को पीछे छोड़कर, आगे की ओर जाते हुए उन देवताओं ने समीप में ही शंकर जी के वट वृक्ष को देखा। वह वटवृक्ष उस पर्वत के चारों ओर छाया फैलाए हुए था। उसकी शाखाएं तीन ओर फैली हुई थीं। उसका घेरा सौ योजन ऊंचा था। वह घौंसलों से रहित और ताप से वर्जित था। उसका दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। वह अत्यंत रमणीय, परम पावन, शिवजी का योग स्थल, दिव्य, योगियों के द्वारा सेवन या निवास योग्य, तथा अति उत्तम था। महायोगमयी व मुमुक्षु लोगों को शरण देने वाले उस वटवृक्ष के नीचे बैठे शिवजी को देवताओं ने देखा। शिवभक्ति में लीन, शांत तन-मन वाले, व महासिद्ध जो ब्रह्मा के पुत्र सनक आदि हैं, वे प्रसन्नता के साथ उन शिव की उपासना कर रहे थे। उनके मित्र कुबेर, जो गुह्यकों व राक्षसों के पति हैं, वे अपने परिवार व सेवकों के साथ उनकी विशेष रूप से सेवा कर रहे थे। वे परमेश्वर शिव तपस्वियों के मनपसंद सत्यरूप को धारण किए हुए थे। वे वात्सल्य भाव से विश्वभर के मित्र लग रहे थे, और भस्म आदि से सुसज्जित थे। वे कुशासन पर बैठे हुए थे, और नारद आदि के पूछने पर सभी श्रोता सज्जनों को ज्ञान का उपदेश दे रहे थे। वे अपना बायाँ चरण अपनी दाईं जांघ पर, और बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर रखी कलाई में रुद्राक्ष की माला डाले हुए सत्य-सुंदर तर्क मुद्रा में विराजमान थे।  वे सर्वोच्च ज्ञान की बात बताते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति कर्म से नहीं, अपितु ज्ञान से होती है। इसलिए अद्वैत ज्ञान के साथ कर्म करना चाहिए, मतलब कि कर्मयोग करना चाहिए। जो लोग उनमें, ब्रह्मा और विष्णु में भेद करते हैं, वे नरक को जाते हैं। मतलब कि भगवान शिव भेददृष्टि को नकारते हैं।

कैलाश पर्वत व मस्तिष्क की परस्पर समकक्षता

कैलाश पर्वत मस्तिष्क है। वहाँ पर आम लोग-बाग, अप्सराएं और नाच-गाना करने वाले कलाकार तो भोगविलास करते ही हैं, ऋषि-मुनि भी वहीँ पर ध्यान का आनंद प्राप्त करते हैं। यह मानव शरीर में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। मणिमय शिखरों का मतलब इसकी अखरोट के जैसी आकृति से बने अनेकों रिज या उभार हैं, जो मन के चमकीले विचारों व संकल्पों से चमकते रहते हैं। अनेक प्रकार की धातुओं का मतलब इसके किस्म-किस्म की संरचनाओं व रँगों वाले भाग हैं, जैसे कि खोपड़ी की हड्डी, उसके नीचे व्हाईट मैटर, उसके नीचे ग्रे मैटर, तरलता-पूर्ण नरम आंखें, कान, नाक, दांत आदि। मस्तिष्क का अंदरूनी भाग भी किस्म-किस्म के आकारों व रंगों में बंटा है, जैसे कि पॉन्स, हिप्पोकैम्पस, पिनियल ग्लैंड आदि। अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं का मतलब विभिन्न प्रकार के बाल हैं, जैसे कि सिर के बाल, दाढ़ी के बाल, मूँछ के बाल, कान के बाल, नाक के बाल आदि। यहाँ तक कि मस्तिष्क के अंदर भी रेशेदार माँस होता है, जिसे नर्व फाइबर कहते हैं। इससे लगता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि मानव शरीर की एनाटोमी का भी अच्छा ज्ञान रखते थे। इसका विशद वर्णन आयुर्वेद में है। अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों का मतलब बालों में पाए जाने वाले सूक्ष्म परजीवी ही हैं। अनेक प्रकार के झरनों का मतलब आँखों, कानों व मुंह आदि की ग्रन्थियों से निकलने वाला जैविक स्राव ही है। इसके शिखरों पर सिद्धांगनाओं के विहार करने का मतलब तंत्र योगिनियों के द्वारा तांत्रिक रोमांस करना ही है, जिससे वे महान आनन्द प्राप्त करती हैं। आनन्द का स्थान तो मस्तिष्क ही है। अनेक प्रकार की कन्दराएँ मस्तिष्क के आसपास अनेक प्रकार के छिद्र हैं, जैसे कि आँख, नाक, कान आदि। शिखरों व वृक्षों के बारे में तो ऊपर बता ही दिया है। उस पर्वत के चांदी की तरह होने का मतलब मस्तिष्क के चेतना से भरे चमकीले विचार ही हैं। व्याघ्र जैसे जंतुओं का मतलब जू, पिस्सू की तरह सूक्ष्म मांसाहारी परजीवी ही हैं, जो बालों की नमी में छिपे रह सकते हैं। ‘भयानकता से रहित’ मतलब उन जंतुओं से भय नहीँ लगता था। दिव्यता तो मस्तिष्क में है ही। सभी दिव्य भाव मस्तिष्क की क्रियाशीलता के साथ ही हैं। कुंडलिनी जागरण सबसे दिव्य है, इसीलिए उसमें मस्तिष्क की क्रियाशीलता चरम पर होती है। इसी तरह मस्तिष्क आश्चर्य का नमूना भी है। इसमें जीवन या चेतना की उत्पत्ति होती है। वैज्ञानिक आज तक इस पहेली को नहीं सुलझा सके हैं। गँगा नदी यहाँ सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है। क्योंकि वह सहस्रार को सिंचित करती है, जिससे पूरा मस्तिष्क जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसे पूरे पर्वत को घेरने वाली कहा है। यह पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा से निर्मल कर देती है। शिव के मित्र कुबेर की नगरी अलकापुरी आज्ञा चक्र को कहा गया है। “अलका” शब्द संस्कृत के अलक्षित व हिंदी के अलख शब्दों से बना है। इस चक्र से अदृश्य कुंडलिनी के दर्शन होते हैं। इसीलिए इसे तीसरी आंख भी कहते हैं। दरअसल जब आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाया जाता है, तो सहस्रार पर कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। क्योंकि शिवपुराण में शिव ही कुंडलिनी के रूप में हैं, इसीलिए आज्ञाचक्र के अभिमानी देवता कुबेर को शिव का मित्र बताया गया है। अगर यहाँ अखण्ड ऊर्जा को ही शिव माना गया है, तब भी कुबेर शिव के मित्र सिद्ध होते हैं, क्योंकि कुंडलिनी से ही अखण्ड ऊर्जा प्राप्त होती है।आज्ञाचक्र बुद्धि का प्रतीक है। इसलिए स्वाभाविक है कि आज्ञाचक्र धनसंपदा से जुड़ा है, क्योंकि बुद्धि से ही संपदा अर्जित होती है। इसीलिए इसके देवता कुबेर सृष्टि में सबसे धनी हैं। उस पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक वन है। क्योंकि इसका वर्णन अलकापुरी के एकदम बाद हो रहा है, इसका मतलब है कि वह वन उसके निकट ही है। वह तो नाक ही है। उसके अंदर ही सुगंधिका अनुभव होता है, इसलिए माना गया है कि सुगंधि की उत्पत्ति उसीमें हो रही है। क्योंकि सुगंधि वृक्षों और पुष्पों से ही उत्पन्न होती है, इसलिए नाक को वन का रूप दिया गया है। उस वन को दिव्य इसलिए कहा है, क्योंकि वह आकार में इतना छोटा होकर भी दुनिया भर की सभी दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराता है। साधारण वन तो ऐसा नहीं कर सकता। उसमें स्थित रोमों को ही दिव्य वृक्ष माना जा सकता है। इन्हें दिव्य इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि आकार में इतना छोटा और कम संख्या में होने पर भी वे दुनिया भर की दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। वे गंध-ग्राही कोशिकाओं को सुरक्षा देते हैं। हो सकता है कि पौराणिक युग में नासिका-रोम को ही सुगन्धि के लिए एकमात्र जिम्मेदार माना जाता हो। उस वन में पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। वह ध्वनि दरअसल श्वास-प्रश्वास की धीमी आवाज ही है। इसे मीठी आवाज तो नहीं कही जा सकती। इसीलिए इसे अद्भुत कहा है। उस पर्वत के बाहर नन्दा और अलकनन्दा नामक दो नदियां इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही हैं। मस्तिष्क के साथ रीढ़ की हड्डी जुड़ी होती है। रीढ़ की हड्डी को यदि नीचे के पर्वत कहेंगे, तो मस्तिष्क शीर्ष के पर्वत शिखर से बना है। उसमें सुषुम्ना बहती है। उसे गंगा कहा गया है। इड़ा नाड़ी रीढ़ की हड्डी के बाहर बाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी दुनियादारी का भौतिक, सीमित, तार्किक या लॉजिकल व जजमेंटल या नुक्ताचीनी वाला आनन्द लेता है। इसीलिए इसका नाम नन्दा है। दूसरी नाड़ी जो पिंगला है, वह मेरुदंड रूपी पर्वत के दाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी आध्यात्मिक जैसा, शून्य या स्पेस या आकाश जैसा, अंधेरे जैसा, तर्कहीन या इलॉजिकल जैसा, असीमित जैसा, ननजजमेंटल जैसा आनन्द लेता है। इसका नाम अलकनन्दा है। जैसा ऊपर बताया, अलक शब्द अलख या अलक्षित का सूचक है। क्योंकि आकाश अनन्त होने से अलक्षित ही है, इसीलिए इसका नाम अलकनन्दा है, मतलब अलक्षित का आनन्द। दोनों नदियों के दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं। अकेली नदी की बात नहीं हो रही, बल्कि दोनों नदियों की एकसाथ बात हो रही है। इसका मतलब है कि बाएं और दाएं मस्तिष्क के एकसाथ क्रियाशील होने से अद्वैत उत्पन्न होता है, जो निष्पापता रूप ही है। द्वैत ही सबसे बड़ा पाप है, और अद्वैत ही सबसे बड़ी निष्पापता। देव-स्त्रियों से मतलब यहाँ अच्छे व संस्कारवान घर की कुलीन स्त्रियां हैं। क्योंकि वे संपन्न होती हैं, इसलिए वे दुनियादारी के झमेले में ज्यादा नहीं फँसती। इससे वे अद्वैत के आनन्द में डूबी रहती हैं। इसी अद्वैत के आनन्द को उनके द्वारा दोनों नदियों के जल को पीने के रूप में दर्शाया गया है। वे सुंदर व सुडौल शरीर वाली होती हैं। नहाते समय कुंडलिनी ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती है, जैसा मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था। ऐसा ही उन देव स्त्रियों के साथ भी होता है। मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ने से उनका मूलाधार ऊर्जाहीन सा हो जाता है। मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही वे रति की ओर आकर्षित होती हैं, और पुरुषों के साथ विहार करती हैं। एक अन्य रूपक के अनुसार, देवस्त्रियाँ सुंदर व मानवीय विचारों की प्रतीक हैं। ऐसे विचार अद्वैत भाव के साथ होते हैं, मतलब इनके साथ इड़ा और पिंगला, दोनों नाड़ियाँ बहती हैं। जब ये दोनों नाड़ियाँ बहुत तेजी से बहती हैं, तभी दिव्य कामभाव जागृत होता है। ऐसा मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही होता है, क्योंकि अद्वैत से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ती रहती है। अद्वैत भाव से मस्तिष्क में अभौतिक कुंडलिनी चित्र का विकास होने लगता है। उसके लिए बहुत ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इंद्रियों की पहुंच से बाहर होने के कारण, आम मानसिक चित्रों की तरह इसको मजबूत करने के लिए शारीरिक इंद्रियों का सहयोग नहीं मिलता। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। उस स्थिति में की गई रति क्रीड़ा बहुत आनन्ददायक व आत्मा का विकास करने वाली होती है, मतलब कि इससे ऊर्जा सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर सहस्रार में पहुंच जाती है। इस अतिरिक्त ऊर्जा से कुंडलिनी के साथ मस्तिष्क का भी अच्छा विकास होता है। इसीलिए कहते हैं कि मानव जाति के त्वरित विकास के लिए कुंडलिनी बहुत जरूरी है। उपरोक्त कुण्डलिनीपरक रतिक्रिया को तांत्रिक रतिक्रीड़ा भी कह सकते हैं। जब आदमी दुनियादारी से दूर हो, और ऊर्जा की कम खपत के कारण उसकी ऊर्जा की संचित मात्रा पर्याप्त हो, और वह पहले से ही सुषुम्ना में बह रही हो, वह तो साधु वाली स्थिति होती है। उसमें रतिक्रीड़ा के प्रति ज्यादा मन नहीं करता। देवलोक से वे स्त्रियां आती हैं, मतलब मस्तिष्क से वे मानवीय विचार बाहर आते हैं, और अद्वैत भाव के साथ दुनियादारी के काम निभाने लगते हैं। इसे ही देवस्त्रियों द्वारा नन्दा और अलकनन्दा नदियों में स्नान करना कहा गया है। देवता व देवियाँ वैसे भी अद्वैत भाव के प्रतीक होते हैं। साधारण लोगों में यह ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रभाव कम होता है। इसलिए उनकी कामुक भावना क्षणिक सुखदायी ही होती है, जिसे कामवासना कहते हैं। उनमें द्वैत भाव होने के कारण उनके मन में कुंडलिनी नहीं होती। इसलिए ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता न होने से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर नहीँ चढ़ती। इसीलिए इसमें मूलाधार की ऊर्जा का रक्षण नहीं बल्कि क्षरण होता है। मस्तिष्क में ही दिव्यता होती है।  सौगंधिक वन और अलकापुरी को लाँघ कर आगे बढ़ने पर वे सभी देवता एक वटवृक्ष के पास पहुंचते हैं, जिसकी शाखाएं पूरे पर्वत पर फैल कर छाया पहुंचाए हुए थीं। दरअसल कुंडलिनी को ही उन सभी देवताओं के रूप में दर्शाया गया है। मन में पूरी सृष्टि बसी हुई है। इसका मतलब है कि मन में सभी देवता बसे हुए हैं, क्योंकि देवता ही सृष्टि को चलाते हैं, और पूरी सृष्टि के रूप में भी हैं। एकमात्र कुंडलिनी चित्र या ध्यान चित्र के अंदर पूरा मन ऐसे ही समाया हुआ होता है, जैसे एक चीनी के दाने में चीनी की पूरी बोरी या गन्ने का पूरा खेत समाया होता है। किसी को अगर चीनी के दर्शन कराने हो, तो हम पूरी बोरी चीनी न उठाकर एक दाना चीनी का ले जाते हैं। इससे काम काफी आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से चीनी की बोरी को एक फुट ऊंचा उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से एक चीनी के दाने को हजारों फुट ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम चीनी की बोरी से होगा, वही काम चीनी के एक दाने से भी हो जाएगा। इसी तरह यदि शिव से मिलाने के लिए सहस्रार तक मन को ले जाना हो, तो हम मन की पूरी दुनिया को न ले जाकर केवल कुंडलिनी को ले जाते हैं। इससे शिव-मन या शिव-जीव के मिलाप का काम बेहद आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से पूरे मन को मूलाधार से स्वाधिष्ठान चक्र तक भी ऊंचा नहीं उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से कुंडलिनी को सहस्रार तक ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम असंख्य चित्रों के ढेर को समेटे मन से होगा, वही काम उस ढेर में से छांटे गए एकमात्र कुंडलिनी चित्र से भी हो जाएगा। कुंडलिनी के स्थान पर बहुत सारे देवता इसलिए दिखाए गए हैं, ताकि इससे इस मनोवैज्ञानिक आख्यान को रोचकता व रहस्यात्मकता मिल सके। वटवृक्ष ही सहस्रार है, क्योंकि सहस्रार पूरे मस्तिष्क से नाड़ियों के माध्यम से जुड़ा है। उन नाड़ियों को सहस्रार चक्र रूपी वृक्ष की शाखाएं कह सकते हैं। उसकी शाखाएँ तीन ओर फैली हुई थीं, इसका मतलब है कि सहस्रार से बाएं मस्तिष्क, दाएँ मस्तिष्क और आगे व फिर नीचे फ्रंट चैनल, तीन दिशाओं में ऊर्जा प्रसारित होती है। पीछे व वहाँ के नीचे स्थित बैक चैनल से तो उसे ऊर्जा मिल रही है। यह चौथी दिशा में है, जिसे हम उस वृक्ष का तना या जड़ कह सकते हैं। ऊर्जा हमेशा जड़ से शाखाओं की तरफ ही बहती है। उसका ऊपरी विस्तार 100 योजन ऊँचा बताया गया है, जो लगभग एक हजार मील की दूरी है। यह बहुत ऊँचाई है, जो बाहरी अंतरिक्ष तक फैली है। दरअसल इसका मतलब है कि सहस्रार चक्र उस अखंड ऊर्जा से जुड़ा हुआ है, जो अनन्त आकाश में फैली हुई है। सहस्रार का शाब्दिक अर्थ भी एक हजार शाखाओं वाला है, सम्भवतः इसीलिए यह संख्या ली गई हो। वह घोंसलों से वर्जित है, मतलब वहाँ कोई सामान्य जीव नहीं पहुंच सकता। वह ताप से वर्जित है, मतलब अत्यंत शांत सहस्रार चक्र है। जिस द्वैत से ताप पैदा होता है, वह वहाँ था ही नहीं। वह अत्यंत रमणीय था। इसका मतलब है कि सभी स्थानों की रमणीयता सहस्रार के कारण ही होती है। रमणीय स्थानों पर ऊर्जा सहस्रार में घनीभूत हो जाती है, इसीलिए वे स्थान रमणीय लगते हैं। तभी तो आपने देखा होगा कि रमणीय स्थान पर घूमने के बाद शरीर में थकावट होने से कुछ समय काम करने को ज्यादा मन नहीं करता। यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर की अधिकांश ऊर्जा सहस्रार को चली गई होती है। रमणीय स्थान पर घूमने के बाद आदमी तरोताजा व निर्मल सा हो जाता है। ऐसा लगता है कि पापों का पुराना बोझ हट गया है।इसीलिए दुनियादारी में पर्यटन का इतना ज्यादा क्रेज होता है। विभिन्न तीर्थ स्थल भी इसी रमणीयता के आध्यात्मिक गुण का फायदा उठाते हैं। ऐसा सब सहस्रार चक्र के कारण ही होता है। इसीलिए इसे परम पावन कहा है। उस वृक्ष का दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं। अनुभव से भी यह साफ विदित होता है कि हिंसा आदि कर्मों से कुंडलिनी चेतना नीचे गिरती है, और मानवता रूपी पुण्य कर्मों से ऊपर चढ़ती है। वह दिव्य था। सारी दिव्यता सहस्रार चक्र में ही तो होती है। दिव्य शब्द दिवा या प्रकाश से बना है। प्रकाश का मूल सहस्रार और उससे जुड़ी अखंड ऊर्जा ही है। वह योगमयी था तथा योगियों व शिव का प्रिय निवास स्थान था। शिव भी तो योगी ही हैं। ब्रह्म या एनेर्जी कँटीन्यूवम से जुड़ाव या योग सहस्रार में ही सम्भव होता है। जाहिर है कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु लोग वहीँ जाएंगे, क्योंकि सहस्रार में ही सीमित चेतना से छुटकारा सम्भव है। उस वृक्ष के मूल में शिव बैठे थे। ब्रह्म या अखंड ऊर्जा या एनर्जी कँटीन्यूवम को भी यहाँ शिव ही कहा है। वे तपस्वियों को प्रिय लगने वाले वेष में थे। मतलब कि वे अद्वैत रूप अखण्ड ऊर्जा के रूप में थे, जो तपस्वियों को अच्छी लगती है। द्वैत में डूबे साधारण लोग कहाँ उसे पसंद करने लगे। ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार आदि ऋषि जो हमेशा ब्रह्मध्यान में लीन रहते हैं, उन्हें शिव की उपासना करते हुए इसलिए बताया गया है, क्योंकि शिव सृष्टि के सबसे बड़े तन्त्रयोगी भी हैं। आज्ञा चक्र व मूलाधार पर ध्यान केंद्रित करने से मस्तिष्क की ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सहस्रार में आ जाती है। इसे ही कुबेर द्वारा अपने गुह्यक सेवकों और परिवारजनों के साथ शिव की सेवा करना बताया गया है। गुह्यक यहाँ मूलाधार का प्रतीक हैं, क्योंकि मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में जुड़े होते हैं। गुह्यक भी मूलाधार की तरह ही डार्क तमोगुणी जैसे होते हैं। कुबेर के परिवारजन मस्तिष्क में चारों ओर बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा के प्रतीक हैं। परिवारजन परिवार के मुखिया के ही वश में होते हैं। वात्सल्य भाव तो शिव में होगा ही। अनन्त चेतना के स्वामी शिव को हमारे जैसे सीमित चेतना वाले प्राणी बच्चे ही लगेंगे। वे भस्म लगाए हुए थे। भस्म वैराग्य, सार और निष्ठा का प्रतीक है। सारे विश्व का निचोड़ भस्म में निहित है। अखण्ड ऊर्जा में रमण करने वाले शिव को जगत नामक सीमित ऊर्जा कहाँ रास आएगी। अनेक लोग शिव से ही तंत्रयोग की प्रेरणा लेते हैं और कुंडलिनी जागरण प्राप्त करते हैं। इसे ही शिव के द्वारा ज्ञानोपदेश के रूप में दर्शाया गया है।