कुन्डलिनी ही मन के फालतू शोर को शांत करने के लिए सर्वोत्तम हथियार के रूप में

मन के बकवास विचारों की शांति के लिए कुन्डलिनी ध्यान एक सर्वोत्तम तरीका है

मित्रो, मन के बकवास विचारों को शांत करने के लिए अपने अपने नुस्खे बताते हैं लोग। मुझे तो कुंडलिनी ध्यान सबसे अच्छा तरीका लगता है। एकदम से मन का शोर शांत हो जाता है इससे। यह मैं पिछली कई पोस्टों में लगातार वर्णन करता आ रहा हूँ। इसे मैंने कुंडलिनी चक्रों पर प्राण और अपान की आपसी टक्कर का नाम दिया है। यह मानसिक विचारों और आधार चक्रों का एक साथ ध्यान करने जैसा है। पिछली पोस्ट में मैं बता रहा था कि साँस रोकने वाले प्राणायाम से स्ट्रोक और दिल के रोगों से बचाव हो सकता है। मेरा अनुमान सही निकला। मैं इस हफ्ते एक ऑनलाइन आध्यात्मिक बैठक में शामिल हुआ। उसमें यह रिसर्च दिखा रहे थे जिसके अनुसार श्वास व्यायाम से व साँस भरते समय पूरी छाती फैलाने से रक्तचाप कम हो जाता है। हालाँकि मुझे लगता है कि साँस रोकने से रक्तचाप ज्यादा नीचे गिरता है। जब मैं खाली श्वास व्यायाम करता था, तब मुझे इसका अहसास नहीं हुआ, पर जब प्राणायाम साँस रोककर करने लगा तो मेरा रक्तचाप 70-100 तक गिर गया। सामान्य स्तर 80-120 होता है। जब मैंने बैठक में विशेषज्ञ से पूछा कि क्या ऐसा हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि इतना नीचे गिरना तो सामान्य है, पर बहुत ज्यादा नहीं गिरता। बड़ा कुछ बता रहे थे कि रक्तवाहिनी की दीवार में यह रसायन निकलता है, वह अभिक्रिया होती है आदि। मुझे वह ज्यादा समझ नहीं आया। मैं तो काम की बात पकड़ता हूँ। सबसे बड़ी प्रयोगशाला या प्रमाण तो अनुभव ही है। अध्यात्म के क्षेत्र में विज्ञान अनुभव तक ही ज्यादा सीमित रहे, तो ज्यादा अच्छा है। यदि वैज्ञानिक प्रयोग से प्रमाण मिल गया, तो लोग अपने अनुभव के प्रमाण का प्रयोग कम भी कर सकते हैं। मैं वैज्ञानिक प्रयोगों के खिलाफ नहीं हूं, पर यदि कोई किसी बात को सिद्ध करने के लिए अपने अनुभव का हवाला न देकर केवल वैज्ञानिक प्रयोग का हवाला दे, तो उसमें जीवंतता नहीं दिखाई देती। जिसको योग के महत्त्व का पता है, वह बिना वैज्ञानिक प्रयोग के व केवल औरों के अनुभव को प्रमाण मानकर खुद भी उसको अनुभव करने की कोशिश करेगा। फिर मैं बता रहा था कि बड़े पैमाने पर जागृति प्राप्त करने के लिए योगा से भरी हुई वैदिक जीवन परंपरा को अपनाना कितना जरूरी है। एक न एक दिन सभी को जागृत होना पड़ेगा। कब तक सच्चाई को नजरअंदाज करते रहेंगे। बिल्ली के पंजे में फंसा कबूतर अगर आंख बंद कर दे, तो बिल्ली भाग नहीं जाती।

मस्तिष्क के सभी भाव प्राण के रूप में कुन्डलिनी रूपी भगवान को अर्पित हो जाते हैं

जो गीता में भगवान यह कहते हैं कि अपने सभी क्लेश, विचार, सुख, दुख मुझे अर्पण कर। यह कुंडलिनी योग की तरफ इशारा है। भगवान इसमें कुंडलिनी है। प्राण अपान की टक्कर में जो मस्तिष्क का विचार-कचरा व ऊर्जा कुंडलिनी पर डाला जाता है, उससे कुंडलिनी चमकती है। यही वह अर्पण करना या हवन करना है। प्राण को अपान में हवन करने वाला गीता वाला श्लोक भी यही इशारा करता है। प्राण वाला मस्तिष्क-विचार निचले चक्रों पर स्थित अपान वाली कुंडलनी पर डाला जाता है। उससे कुंडलिनी आग भड़कती है। प्राण का प्राण में हवन भी वहीँ लिखा है। उसमें मन में सभी कुछ प्राण है। भगवान के रूप में कुन्डलिनी हृदय चक्र पर है। मन और हृदय दोनों ही स्थानों पर प्राण है। मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि चक्र के ऊपर कुंडलिनी का ज्योतिर्लिंग और शिवबिन्दु के साथ ध्यान करना चाहिए। शायद इसीलिए उन स्थानों का नाम चक्र पड़ा हो, क्योंकि जब पीठ वाले चक्र पर ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग का ध्यान करते हैं, तो उसके काऊंटरपार्ट अगले चक्र पर शिवबिन्दु प्रकट हो जाता है। चक्र खोखले पहिए को भी कहते हैं। 

कुन्डलिनी से ही एक आदर्श जागृति शुरु होनी चाहिये, और कुन्डलिनी पर ही खत्म

मैं यह भी बता रहा था कि यदि ऊर्जा की नदी मूलाधार से मस्तिष्क में पहुंचती है, और उस समय मस्तिष्क में कुंडलिनी प्रभावी न हो, तो वहां के विचार या चित्र बड़ी स्पष्टता से कौंधते हैं, पर जागृत नहीं होते। पर यदि वहाँ ऊर्जा काफी अधिक और ज्यादा समय के लिए बनी रहे, तो जागृति भी हो जाती है। उसमें सभी चीजों के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस होता है, जिसे पूर्ण अद्वैत कहते हैं। पर कोई विशेष चित्र पहचान में नहीं आता, जिससे पूर्ण जुड़ाव शुरु हुआ हो। वह इसलिए भी पहचान में नहीं आता क्योंकि आदमी ने कुंडलिनी के रूप में विशेष मानसिक चित्र साधना के लिए बनाया ही नहीं होता है। मतलब वह कुंडलनी साधना कर ही नहीं रहा होता है। बेशक आध्यात्मिकता को अभिव्यक्त करने के लिए बाद में मन में कुन्डलिनी मजबूत हो जाती है, पर वह कामचलाऊ व अस्थायी लगती है मुझे। स्थायी और असली कुन्डलिनी तो वही लगती है मुझे, जिससे मस्तिष्क में जागृति शुरु होती हुई, और जिसमें खत्म होती हुई दिखती है। उस कुन्डलिनी के स्मरण से वह शुरु होती है। फिर जागृति खत्म होते ही कुन्डलिनी मस्तिष्क से नीचे उतरकर आज्ञाचक्र पर आते दिखती है, और वहाँ से नीचे अनाहत चक्र पर। फिर उसे सभी चक्रों पर आसानी से घुमा सकते हैं। वैसे तो हर प्रकार की जागृति फायदेमंद है, पर मैं कुन्डलिनी से शुरु होने वाली जागृति को सर्वोत्तम कहूँगा।

कुन्डलिनी ऊर्जा का प्रवाह बारी-2 से शरीर के दाएं, बाएं और मध्य भाग में चलता रहता है, नथुनों से बहने वाले श्वास की तरह

योगासन इसलिए किए जाते हैं ताकि कहीं न कहीं कुंडलिनी एनर्जी पकड़ में आ जाए। यह ऊर्जा पूरे शरीर में है। पर यह कभी किसी चक्र पर तो कभी किसी दूसरे चक्र पर ज्यादा प्रभावी होती है। इसलिए पूरे शरीर के जोड़ों के बैंड या मोड़ आदि से यह कहीं न कहीं पकड़ में आ ही जाती है। मुझे इस हफ्ते नया प्रेक्टिकल अनुभव मिला है। ये जो बारी बारी से शरीर के बाएं और दाएं, दोनों किनारों का योगासन किया जाता है, वह बाईं और दाईं मुख्य नाड़ी से ऊर्जा को ऊपर चढ़ाने के लिए किया जाता है। इससे ऊर्जा संतुलित होकर खुद ही बीच वाली नाड़ी में आ जाती है। सीधे ही ऊर्जा को बीच वाली नाड़ी से चढ़ाना कठिन होता है। बाईं नाड़ी को इड़ा, दाईं को पिंगला और बीच वाली नाड़ी को सुषुम्ना कहते हैं। उदाहरण के लिए, जब मैं शलभासन को बाईं भुजा और दायाँ पैर उठाकर करता हूँ, उस समय कुन्डलिनी ऊर्जा इड़ा नाड़ी से ऊपर चढ़कर बाएँ मस्तिष्क को जाती है। वहां से उसे मैं आज्ञा चक्र की ओर तिरछा रीडायरेक्ट करता हूँ। इससे वह नीचे उतरकर और फिर मूलाधार से ऊपर चढ़कर सुषुम्ना में आने की कोशिश करती है। जब उसे दाईं भुजा और बायाँ पैर उठाकर करता हूँ, तब पिंगला से ऊपर चढ़ कर दाएँ मस्तिष्क को जाती है। उसे रीडायरेक्ट करने से लगभग वैसा ही होता है। एक हल्की सी अवेयरनेस आज्ञा चक्र पर भी रखता हूँ। उससे वह ऊर्जा केंद्रीय रेखा में आने की कोशिश करती है। आज्ञा चक्र नाम ही इसलिए पड़ा है क्योंकि यह कुंडलिनी शक्ति को सीधा बीच वाली नाड़ी में चलने की आज्ञा देता है। साथ में, मूलाधार संकुचन पर भी हल्की सी मानसिक नजर रखता हूँ। फिर ऊर्जा को जाने देता हूँ अपनी मर्जी से, वह जहाँ जाना चाहे। मैं देखता हूँ कि वह फिर बड़ी विवेक बुद्धि से खुद ही वहाँ जाती है, जहाँ ऊर्जा की कमी है। वह कमी पूरा होने पर उसके विपरीत भाग में चली जाती है, ताकि ऊर्जा संतुलन बना रहे। फिर बीच वाले चैनल में आ जाती है। वहाँ से वह शरीर के दोनों तरफ के हिस्सों को कवर करने लगती है। ये सभी पीठ व मस्तिष्क के हिस्से होते हैं। वह किसी पाईप में पानी की गश की आवाज की तरह चलती है। इसीलिए नाड़ी नाम भी नदी से ही बना है। शरीर के अगले भाग के हिस्से तब कवर होते हैं, यदि मैं हल्का सा ध्यान तालू को छूती हुई उलटी जीभ पर भी रखूं। तब वह आगे की नाड़ी से नीचे उतरकर नाड़ी लूप में घूमने लगती है।

साँस भरकर रोकने से कुन्डलिनी ऊर्जा पीठ में ऊपर चढ़ती है

योगासन इसीलिए बने हैं, ताकि उनसे नाड़ियों में बहती ऊर्जा का अनुभव होए, तथा उस बहती ऊर्जा से पूरा शरीर सिंचित होकर स्वस्थ रह सके। कर्मयोगी की ऊर्जा तो काम करते हुए खुद भी बहती रहती है, हालाँकि योगा द्वारा बहाव जितनी नहीं। इसकी सख्त जरूरत तो ध्यानयोगी को थी, क्योंकि उन्हें ध्यान लगाने के लिए ज्यादातर समय बैठे रहना पड़ता था। वैसे यह स्पष्ट है कि यदि भौतिक रूप से क्रियाशील रहने वाले लोग भी योगा करे, तो उन्हें भी बहुत लाभ होगा। मैंने इस हफ्ते नई बात नोट की। सांस भर कर रोकने से कुण्डलिनी ऊर्जा अच्छे से पीठ से ऊपर चढ़ रही थी, और वह मस्तिष्क में गशिंग पैदा कर रही थी। यही बात उपरोक्त बैठक में भी बता रहे थे कि साँस भरते हुए सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुड रीढ़ की हड्डी में ऊपर चढ़ता है। कई वैज्ञानिक प्रकार के लोग बोलते हैं कि कुंडलनी ऊर्जा इसी के थ्रू जाती है। पर संशय होता है, क्योंकि कुंडलनी ऊर्जा तो एकदम से ऊपर चढ़ती है, पर सीएसएफ धीरे धीरे चलता है। हो सकता है कि जब वह मस्तिष्क में पहुंच जाता हो, तभी ऊर्जा के ऊपर चढ़ने का आभास होता हो। इसीलिए तो कुछ समय तक श्वास या अन्य योग अभ्यास करने के बाद ही ऊर्जा ऊपर चढ़ती महसूस होती है, एकदम से नहीं। इसीलिए  सांस रोककर योग करने को कहते हैं। हालांकि इसके लिए शायद पहले सांस लेते हुए योग करने का काफी लम्बा अभ्यास का अनुभव चाहिए होता है। सांस भरकर रोककर दरअसल  पिछले मणिपुर चक्र में गड्ढा बनने से ऊर्जा के प्रवाह की दिशा पीठ में ऊपर की ओर होती है। फिर थोड़े ध्यान से वह ऊर्जा गति पकड़ती है। सांस लेने व छोड़ते रहने से ऊर्जा अपनी दिशा लगातार बदलती रहती है, इससे ऊर्जा को पर्याप्त वेग नहीं मिल पाता। सांस भरने से वह ऊपर की ओर चढ़ती है, और सांस छोड़ते हुए नीचे की तरफ उतरती है।

बाइकिंग कुन्डलिनी योगा

मैं इस हफ्ते एक दिन साईकिल पर अपने काम गया। मैंने महसूस किया कि साईकिल की सीट का अगला नुकीला हिस्सा सिद्धासन में पैर कि एड़ी का काम करता है। जब मैं फिसल कर आगे को होता था, तब मेरी कुण्डलिनी ऊर्जा लूप में घूमने लगती थी। इसलिए मोटरसाइकिल पर भी सबसे आगे, फ्यूल टैंक से सट कर बैठने को कहा जाता है। यह मूलाधार पर तेज दबाव के कारण मोटरसाइकिल की सवारी को सुखद बनाता है। दरअसल प्राण तो इधर उधर के दृश्य मस्तिष्क में पड़ने से पहले ही सक्रिय था। मेरे सिर पर लगे हेलमेट ने उसे और ज्यादा सक्रिय कर दिया था। सीट के द्वारा मूलाधार पर दबाव पड़ने से अपान भी सक्रिय हो गया। मस्तिष्क या प्राण पर तो पहले से ही ध्यान था। मूलाधार पर संवेदना से अपान पर भी ध्यान चला गया। अपान पीठ से ऊपर चढ़ने लगा, तो प्राण आगे से नीचे उतरने लगा। कुण्डलिनी चक्र पूरा होकर प्राण और अपान का मिलन भी हुआ। इससे संगम हुआ और कुण्डलिनी लाभ मिला। बाइकिंग कुन्डलिनी योगा पर मैंने एक पहले भी पोस्ट लिखी है। बाइसाइकिल खासकर स्पोर्ट्स वाली और हल्की बाईसाईकिल से मूलाधार चक्र बहुत बढ़िया क्रियाशील होता है। बाइकिंग के बाद जो कई दिन तक आनन्द व हल्कापन सा छाया रहता है, वह इसी वजह से होता है। ध्यान रहे कि साइक्लिंग वाले दिन न ज्यादा, और न कम खाएं। योग के लिए भी ऐसा ही कहा जाता है। वास्तव में ज्यादा पेट भरने से साँसें भी ढंग से नहीं चलतीं, और कुन्डलिनी ऊर्जा भी ढंग से नहीं घूमती। कम खाने से कमजोरी आ सकती है। पेट पर बोझ महसूस नहीं होना चाहिए। मैंने तो यहाँ तक देखा है कि संतुलित मात्रा में खाने के बाद यदि आधा रोटी या दो चार चम्मच चावल भी ज्यादा खा लो, तो भी पेट पर बोझ आ जाता है। इसलिए एकबार भोजन से तृप्ति का एहसास होने पर उठ जाना चाहिए। बाइकिंग योगा जैसा लाभ हमेशा लिया जा सकता है, यदि आदमी को मूलाधार नियंत्रित करने में महारत हासिल हो जाए। यदि केवल मूलाधार को ही ऊपर की तरफ संकुचित करेंगे, तो थकान ज्यादा महसूस होती है। यदि आगे से पीछे तक के मूलाधार क्षेत्र को हल्का सा संकुचित करेंगे तो उसमें मूलाधार भी शामिल हो जाता है, स्वाधिष्ठान चक्र भी, और थकान भी कम महसूस होती है। प्रभाव भी ज्यादा पैदा होगा। निचले क्षेत्र के किसी भी भाग का संकुचन हो, तो भी काम कर जाता है। पर ध्यान रहे, कोई खास दिमागी काम करते हुए जैसे ड्राईविंग या मशीनरी ऑपरेट करते समय ध्यान मस्तिष्क पर ही रहना चाहिए। इससे ऐसा होगा कि मस्तिष्क की अतिरिक्त ऊर्जा नीचे चली जाएगी, जिससे फालतू विचारों से निजात मिलेगी और कार्यकुशलता में इजाफा होगा। यदि पूरा ध्यान नीचे जाने दिया, तो कार्यकुशलता में गिरावट आ सकती है। मैं देखता हूँ कि अविभाज्य प्राणों का विभाजन भी कितनी वैज्ञानिकता से किया गया है। यदि मस्तिष्क ज्यादा क्रियाशील हो तो प्राण व अपान के मिलान से प्राण के साथ कुंडलिनी अनाहत चक्र पर पहुंच जाती है। इसीलिए प्राणों का क्षेत्र ऊपर से नीचे अनाहत चक्र तक कहा गया है। यदि नीचे के, मूलाधार के आसपास के क्षेत्र ज्यादा क्रियाशील हों, और मस्तिष्क विचारशून्य सा हो, तो दोनों के मिलान से कुंडलनी नाभि चक्र पर स्वाधिष्ठान चक्र पर अभिव्यक्त होती है। इसीलिए कहा गया है कि अपान का क्षेत्र नीचे से ऊपर की ओर मणिपुर चक्र तक है। वैसे तो वहाँ समान प्राण का अधिकार बताया गया है, पर वह भी अपान का ही एक हिस्सा लगता है, या वहां अपान प्राण से ज्यादा ताकतवर लगता है। समान नाम ही इसलिए पड़ा है क्योंकि वहां प्राण और अपान का लगभग समान योगदान प्रतीत होता है।

मूलाधार पंप कुन्डलिनी योग का सर्वप्रमुख औजार है

मैंने यह भी नोट किया कि सिर्फ मूलाधार पंप से कुन्डलिनी को आगे के और पीछे के चक्रों पर आसानी से घुमा सकते हैं। पहले कुन्डलिनी मस्तिष्क से हृदय चक्र तक उतरती है। जरूरत के अनुसार चलाए गए मूलाधार पंप से काफी देर वहाँ स्थिर रहती है। फिर वहां से नीचे मणिपुर चक्र को उतरती है। वहाँ भी इसी तरह काफी देर स्थिर रहके वह स्वाधिष्ठान चक्र तक नीचे उतरती है। मैंने महसूस किया कि वह वह वहाँ से सीधे ही पीठ से ऊपर चढ़कर मस्तिष्क में गशिंग पैदा करती है। वैसे कहते हैं कि मूलाधार चक्र से कुन्डलिनी वापिस मुड़ती है। वैसे भी मूलाधार पंप से वह लगातार सक्रिय बना ही रहता है। आज्ञा चक्र पर हल्का ध्यान लगाने से वह गशिंग और भी ज्यादा हो जाती है, और केंद्रीय रेखा में भी आ जाती है। मुझे लगता है वह गशिंग रक्तवाहिनियों में दौड़ रहे रक्त की आवाज होती है। रक्त वाहिनियाँ भी नाड़ी या नदी की तरह होती हैं। वहाँ पर अन्य विचार भी होते हैं, हालाँकि मूलाधार पंप से उनकी ताकत पहले ही कुन्डलिनी को लग चुकी होती है। इसलिए वे कमजोर होते हैं। फिर जब फिर से मूलाधार पंप लगाया जाता है, तो वह कुन्डलिनी फिर मूलाधार चक्र तक पहुंच जाती है, और फिर पीठ से ऊपर चढ़ जाती है। काफी तरोताजा महसूस होता है। इस तरह यह क्रम काफी देर तक चलता है। अब और देखता हूँ कि और आगे क्या होता है। हाँ, फिर थोड़ी देर कुन्डलिनी मस्तिष्क में क्रियाशील रही, मतलब वह सहस्रार चक्र पर आ गई। जब सहस्रार चक्र थक गया तब वह आगे से आज्ञा चक्र को उतर गई। लगभग 5-10 मिनट तक कुन्डलिनी एक चक्र पर रही। जब चक्र लगातार सिकुड़न लगा कर थक जा रहा था, तब कुन्डलिनी अगले चक्र पर आ रही थी। मैं रिवोल्विंग और बैक पीछे को एक्सटेंड होने वाली चेयर पर आराम से अर्धसुषुप्त सी पोजिशन में लेटा था। जरूरत के हिसाब से हिल भी रहा था। जब मैं कोई अन्य काम कर रहा होता था, या उठकर चल रहा होता था, तब कुन्डलिनी एक ही चक्र पर ज्यादा देर ठहर रही थी। ऐसा इसलिए क्योंकि चक्र पर लगातार सिकुड़न न होने से वह चक्र थक नहीं रहा था। 5 मिनट बाद आज्ञा चक्र शिथिल हो गया, और कुन्डलिनी विशुद्धि चक्र को उतर गई। इस बार अगले चक्र के साथ पिछले चक्र भी एकसाथ क्रियाशील हो रहे थे, ऐसा लग रहा था कि एक लाइन से जुड़कर दोनों चक्र एक हो गए थे। चक्र पर कुन्डलिनी भी ज्यादा स्पष्ट लग रही थी। एक चक्र से दूसरे चक्र को कुन्डलिनी का गमन ज्यादा स्पष्ट अनुभव हो रहा था। शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कुन्डलिनी के पहले राऊंड से सभी चक्र तरोताजा व अनवरुद्ध हो गए थे। इस बार उल्टी जीभ को तालु से टच करने से कुन्डलिनी विशुद्धि चक्र पर ज्यादा स्पष्ट थी। लगभग 5 मिनट बाद वह अनाहत चक्र को उतर गई। वहाँ वह मूलाधार पम्प के बिना भी बड़ी देर तक स्पष्ट चमक रही थी। चक्र ऐसे तो लगते नहीं मुझे जैसे कोई सीमांकित पहिया हो। मुझे तो सामान्य क्षेत्र के केंद्र का ही भान होता है। जैसे अनाहत चक्र, हृदय के क्षेत्र का लगभग केंद्र। हाँ, कई बार उस क्षेत्र की सिकुड़न से एक बिंदु जैसा जरूर प्रतीत होता है उस क्षेत्र के बिल्कुल केंद्र में, जहाँ सिकुड़न और ऐंठन सबसे ज्यादा और पिनपॉइंटिड सी प्रतीत होती है। शायद इसी बिंदु को चक्र कहते हैं। हालाँकि यह तेज और काफी देर के ध्यान से बनता है। इस पर कुन्डलिनी तेज चमकती है। आमतौर पर तो कुन्डलिनी ध्यान चक्र क्षेत्र में ही होता है, एगजेक्ट चक्र पर नहीं। जैसे रथ के एक हिस्से का पूरा भार उस हिस्से के पहिए पर रहता है, वैसे ही शरीर के एक पूरे चक्र क्षेत्र की ताकत उस क्षेत्र के चक्र में होती है। उसको तन्दरुस्त करके पूरा क्षेत्र तन्दरुस्त हो जाता है। लगभग 5 या 7 मिनट बाद अनाहत चक्र के थकने पर मेरा पेट अंदर को सिकुड़ता है और एक साँस की हल्की गैस्प सी निकलती है। इसके साथ ही कुन्डलिनी मणिपुर या नाभि चक्र पर पहुंच जाती है। वहाँ लगभग 10 मिनट रही। उसके थकने से कुन्डलिनी शक्ति नीचे कहीं उतरती है। उस को थोड़े ध्यान से ढूंढने पर वह स्वाधिष्ठान चक्र पर सैटल हो गई। फिर वह पीठ से सहस्रार को चढ़ने लगी व आगे से उतरकर वहीं पहुंचने लगी। मूलाधार पंप का रोल यहाँ ज्यादा अहम हो गया। गशिंग के साथ वह लगभग 5 मिनट तक सहस्रार व स्वाधिष्ठान चक्र के बीच झूलती रही। फिर वह मूलाधार चक्र पर टिक गई। फिर वह दुबारा सहस्रार में सेटल हो गई। मस्तिष्क में कुन्डलिनी के इलावा अन्य भी हल्के फुल्के विचार रहते हैं। पर कुन्डलिनी ही ज्यादा प्रभावी रहती है, और उनकी शक्ति भी कुन्डलिनी को मिलती रहती है। अन्य चक्रों पर तो केवल कुन्डलिनी ही रहती है। लगभग 5 मिनट सहस्रार में रहकर वह फिर नीचे उतरने लगी। वह इसी क्रम में पहले आज्ञा चक्र को, फिर विशुद्धि चक्र को उतरी। मुझे फिर किसी जरूरी काम से उठना पड़ा। लगभग डेढ़ घण्टे के करीब यह सिलसिला चलता रहा। मैंने यह भी देखा कि जब कुंडलिनी अपने दूसरे और तीसरे दौर में आधार चक्रों में थी, तब एक मामूली सी जननांग सनसनी पैदा हुई थी, जिसमें एक मामूली सा तरल पदार्थ निकलता महसूस हुआ। एकबार मैंने नोट किया कि मस्तिष्क की यादों की झोली से एक आसक्ति से युक्त आदमी का चित्र प्रकट हुआ। वह मूलाधार पंप से भी नीचे नहीं उतर रहा था। कई बार पंप लगाने पड़े। औसत से ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ी। उसके नीचे उतरने से उसकी शक्ति कुन्डलिनी को लग गई और वह चमकने लगी। इसीलिये कहा जाता है कि कुन्डलिनी योग के अभ्यास से पहले काफी समय तक दैनिक जीवन में अनासक्ति व अद्वैत का अभ्यास होना चाहिए। इससे मन के दोष खुद ही खत्म हो जाते हैं। इससे योग करना भी काफी आसान और मनोरंजक हो जाता है। यही बात मैं पिछ्ली पोस्ट में कह रहा था कि सबसे पहले योग प्रशिक्षण लेने के इछुक को मैं शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक पढ़ने की और उसे कुछ सालों तक जीवन में ढालने की सलाह देता हूँ। उससे जब सच्चाई का पता चलता है, तो आदमी खुद ही अपने शौक से कुन्डलिनी योग सीखने लगता है। वह किसी बाध्यता या डर से ऐसा नहीं करता। इससे वह जल्दी और पूरा सीख जाता है। इसलिए कार्य की सफलता में सबसे बड़ा निर्णायक दृष्टिकोण होता है। 90% योग तो इस सकारात्मक दृष्टिकोण से हो जाता है। बाकि का 10% कुंडलिनी योग से पूरा होता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ, तभी बता रहा हूँ। दरअसल मानवतावादी लाइफस्टाइल व दृष्टिकोण भी नहीं बदलना है। लाइफस्टाइल व दृष्टिकोण तो समसामयिक परिस्थितियों के अनुसार अपनाना ही पड़ता है। केवल यह करना है कि अपनी वर्तमान हालत पर अद्वैत दृष्टिकोण का अतिरिक्त चोला पहनाना है बस। बदलना कुछ नहीं है। आप जैसे हो, बहुत अच्छे हो।

कुन्डलिनी ही बारडो की भयानक अवस्था से बचाती है

आज भी पहले भी वर्णित किए गए एक मित्र द्वारा भेजा गया गीता का श्लोक मेरे दिल को छू गया। मैं उसे यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्रयाणकाले मनसाचलेनभक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥८- १०॥वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है॥10॥इसका अर्थ मुझे यही लगता है, जो मैंने ऊपर वर्णित किया है। मस्तिष्क के विचारों पर ध्यान के साथ भौंहों के बीचोंबीच स्थित आज्ञाचक पर भी ध्यान लगने दो। इससे प्राण केंद्रीय नाड़ी लूप में चलने लगता है, और मस्तिष्क में फालतू विचारों का स्थान कुन्डलिनी ले लेती है। प्राण के साथ कुंडलिनी भी होती है। केंद्रीय चैनल में, कुंडलिनी हमेशा प्राण के साथ रहती है। क्योंकि केंद्रीय चैनल अद्वैत चैनल है, और कुंडलिनी हमेशा अद्वैत के साथ होती है। कुंडलिनी ही तो परमात्मा तक ले जाती है। मुझे लगता है कि हर कोई परमात्मा तक पहुंच सकता है, पर ज्यादातर लोग मृत्यु के बाद के अंधेरे से घबराकर जल्दी ही नया शरीर धारण कर लेते हैं। हालाँकि अच्छा बुरा शरीर उन्हें अपने कर्मों के अनुसार मिलता है। शरीर के चुनाव में शायद उनकी मर्जी नहीं चलती। पर कुंडलिनी योगी को कुंडलिनी के प्रकाश से सहारा मिलता है। इसलिए वह लंबे समय तक परमात्मा में मिलने के लिए प्रतीक्षा कर सकता है। बुद्धिस्ट लोग भी लगभग ऐसा ही मानते हैं। वे मृत्यु के बाद की डरावनी अवस्था को बारडो कहते हैं।

कुन्डलिनी डीएनए को भी रूपांतरित कर देती है

मुझे लगता है कि कुंडलिनी आदमी का डीएनए भी रूपांतरित कर देती है। कुंडलिनी जागरण से ऐसा ज्यादा होता है। यदि मन के विचारों को नीचे उतारा जाए तो वे नीचे के सभी चक्रों पर कुंडलिनी में रूपांतरित हो जाते हैं। वैसे भी शरीर के हरेक सेल में दिमाग होता है। इन बातों की ओर वैज्ञानिक प्रयोग भी कुछ इशारा करते हैं।

कुंडलिनी इंजिन के ईंधन और ऊर्जा स्पार्क प्लग की चिंगारी की तरह है, जो जागृति-विस्फोट पैदा करते हैं

इन कुंडलिनी-विस्फोट घटकों के लिए ध्यान, शिवबिन्दु, मानवरूप देवमूर्ति, शिवलिंग, ज्योतिर्लिंग, साँस रोकने, मस्तिष्क दबाव, स्वयं शिक्षा, सकारात्मक सोच,अनवरत अभ्यास, निष्कामता, लगन, धैर्य, व व्यवस्थित दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है।

मित्रो, पिछली पोस्ट में मैं कुंडलिनी जागरण और उसमें अनुभव होने वाले जुड़ाव के बारे में बात कर रहा था। वह जुड़ाव कुंडलिनी से शुरु होना चाहिये। इसका अर्थ है कि आदमी को सर्वप्रथम कुंडलिनी के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस होना चाहिए, पूर्ण आनन्द व अद्वैत के साथ। उस पैदा हुए अद्वैत से तो फिर सभी चीजों के साथ अपना जुड़ाव महसूस होगा। हालाँकि यह जुड़ाव सेकंडरी होगा, प्राथमिक तो कुंडलिनी के साथ ही माना जाएगा। ऐसा होने से ही कुंडलिनी चित्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन पाएगा, और स्थाई तौर पर क्रियाशील रहेगा। इसका मतलब आप यह समझो कि ऊर्जा साधना/चक्र साधना/नाड़ी साधना आप करते रहो, क्योंकि ये साधनाएं वक्त पड़ने पर कुंडलिनी के काम आएँगी। पर जगाने का प्रयास मानवरूप कुंडलिनी का ही करो। ऊर्जा को कुंडलिनी के पीछे चलना चाहिए, कुंडलिनी को ऊर्जा के पीछे नहीं। इस बारे में मैं अपना अनुभव बताता हूँ। मैं प्रतिदिन कुंडलिनी ध्यान के साथ ऊर्जा साधना करता था। एकदिन अच्छा अवसर मिलते ही मुझे एकदम से अचानक ही कुंडलिनी की बहुत तेज याद आई, और मैं उसमें खोने लगा। तभी मेरी ऊर्जा भी कुंडलिनी का साथ देने के लिए मूलाधार से पीठ से होकर ऊपर चढ़ी और मस्तिष्क में पहुंच गई। मुझे ऐसा लगा क्योंकि मेरा मूलाधार क्षेत्र पूरी तरह से शिथिल हो गया था, हालांकि वह ऊर्जा इतनी तेजी से ऊपर चढ़ी कि उसे महसूस करने का मौका ही नहीं मिला। इसलिए भी मैं ऊर्जा के पीठ से ऊपर चढ़ने का अंदाजा लगा रहा हूँ, क्योंकि मैं लगभग एक महीने से तांत्रिक विधि से कुंडलिनी को पीठ से ऊपर चढ़ाने का अच्छा अभ्यास कर रहा था। इसलिए भी क्योंकि उस समय वहाँ पर महिलाओं का नाच गाना हो रहा था। उससे भी मूलाधार की ऊर्जा उद्दीप्त हुई। यौन माध्यम से उद्दीप्त ऊर्जा पीठ से ही ऊपर चढ़ती है। वह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुंच कर कुंडलिनी से जुड़ गई जिससे कुंडलिनी जागरण हो गया। बोलने का मतलब है कि कुंडलिनी तो खुद ही जागृत होने जा रही थी। उसे केवल ऊर्जा की अतिरिक्त आपूर्ति चाहिए थी। यह इसी तरह है जैसे कि गैस इंजन में पहुंच गई थी, बस उसे धमाका करने के लिए स्पार्क प्लग से एक चिंगारी की जरूरत थी। यदि चिंगारी न मिले तो इंजन में शक्ति का धमाका न होए। इसी तरह, यदि मैं ऊर्जा साधना न कर रहा होता तो कुंडलिनी को ऊर्जा न मिलती, और वह बिना जागृत हुए ही मस्तिष्क से नीचे लौट आती। ऐसा कुंडलिनी का ऊपर-नीचे आने-जाने का चक्र सबके अंदर चलता रहता है, बस ऊर्जा की चिंगारी नहीं दे पाते अधिकांश लोग। कइयों के साथ ऐसा होता है कि ऊर्जा की नदी तो मस्तिष्क में पहुंच जाती है, पर वहाँ कुंडलिनी नहीं होती। उससे मन में बहुत स्पष्टता के साथ चित्र कौंधते हैं, पर जागते नहीं। यह ऐसे ही है कि इंजन में गैस नहीं है, पर स्पार्क लगातार मिल रहे हैं। उससे चिंगारी की थोड़ी चमक तो पैदा होएगी, पर धमाके जितनी विशाल चमक नहीं। इसलिए मुख्य लक्ष्य कुंडलिनी को ही बनाओ, पर ऊर्जा साधना भी करते रहो। यह ऐसा है कि आपने कुंडलिनी की इतनी गहरी याद पैदा करनी है कि आप उसमें कुछ पलों के लिए खो जाओ। यही कुंडलिनी जागरण है। ऐसा समझो कि गुरु या देवता की याद इतनी गहरी पैदा करनी है, जितनी गहरी एक प्रणय प्रेम में डूबे हुए एक प्रेमी को अपनी प्रेमिका की खुद ही पैदा हो जाती है। पर गुरु या देवता की गहरी याद आपके अंदर खुद पैदा नहीं होगी, क्योंकि वहां पर यौन आकर्षण नहीं है। इसलिए आपको यौन आकर्षण जैसा मजबूत आकर्षण पैदा करने के लिए तांत्रिक तकनीकों का सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए उपरोक्त ऊर्जा साधनाएं आपके काम आएँगी। फिर आप कहेंगे कि फिर यौन प्रेमी को ही क्यों न कुंडलिनी बना लिया जाए। पर यह श्रेष्ठ तरीका नहीं है। पहली बात, यौन विकार के कारण यौन कुंडलिनी को जगाना असम्भव के समान है। दूसरी बात, कोई नहीं चाहेगा कि अगला जन्म स्त्री का मिले, क्योंकि स्त्री को पुरुष से ज्यादा कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। आदमी जैसा सोचता है, वह अगले जन्म में वैसा ही बन सकता है। यह अलग बात है कि आजकल के वैज्ञानिक युग में स्त्री व पुरुष समान हैं, बल्कि कई जगह तो स्त्री पुरुष से ज्यादा मजे में है। पर ऐसा युग हमेशा नहीं रहेगा। आज के जैसी वैज्ञानिक सुविधाओं का युग तो असीमित काल का मात्र एक नगण्य जैसा अंश प्रतीत होता है। ये सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं होतीं। ये दृश्य सत्य पर आधारित मेरे अपने अनुभवात्मक विचार हैं, इसमें लैंगिक भेदभाव वाली कोई बात नहीं है, और न होनी चाहिए। ये पर्सनल ब्लॉग है, ख्याति या पैसे के लिए नहीं। वैसे भी, दुनिया में नजर भी आता है और तंत्र सम्प्रदायों में भी यह मान्यता है कि स्त्री केवल पुरुष की सहायता ही कर सकती है कुन्डलिनी जागरण में, स्वयं जागृत नहीं हो सकती। यदि वह यह सहायता करती है, तो अगले जन्म में वह पुरुष बन कर जागृत हो जाती है। वैसे तो तन्त्र सम्प्रदायों में भी बहुत सी महान तांत्रिक महिलाएं हुई हैं, जिन्होनें अपने पुरुष साथी को भी जागृत किया है, और वे खुद भी जागृत हुई हैं। विशेष प्रयास करने वाले अपवाद के मामले तो हर जगह ही मिल जाते हैं। देवी माता का ध्यान तो बहुत से योगी करते ही आए हैं। योगी रामकृष्ण परमहंस माँ काली के उपासक थे। उन्हें ध्यान में काली माता स्पष्ट भौतिक रूप में दिखती थीं। वे उनसे खेलते, बातें करते। पर एक साधारण स्त्री और देवी स्त्री में फर्क है। शायद इसीलिए स्त्री को गुरु बनाए जाने के बारे में शास्त्रों में बहुत कम बताया गया है। वैसे परिवर्तन व विभिन्नता संसार का नियम है। आदमी को जैसे भी उपयुक्त लगे, वैसे ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। साथ में कहा था कि संयोगवश या शक्तिपात आदि से जो बिना प्रयासों के जागृति प्राप्त होती है, वह अल्प व अस्थायी होती है। अल्प का मतलब कि उससे पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलती। ऐसा मन करता है कि एकबार और जागृति मिल जाए। उससे बना कुण्डलिनी चित्र भी कुछ वर्षों के बाद मिटने लगता है। हालांकि ऐसी जागृति आदमी को पूर्ण जागृति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। इससे आदमी योग अभ्यास करने लगता है।

बिंदु शक्ति मूलाधार से सहस्रार की तरफ निर्देशित की जाती है

कुंडलिनी को बिंदु की शक्ति मूलाधार से स्वयं ही मिलती है। यदि किसी को बिंदु नाम से कुंडलिनी का अपमान लगे, तो शिवबिन्दु व ज्योतिर्लिंग या शिवलिंग नाम से ध्यान किया जा सकता है। इससे कुंडलिनी का अपमान भी नहीं होगा, और आदमी को शिव का स्वरूप भी मिलेगा। एकसाथ दो लाभ। एक और बढ़िया तरीका है कि अद्वैत के चिंतन को ही शिवबिंदु का नाम दे दो। इससे जैसे ही कुंडलिनी मन में आएगी, उसे एकदम से बिंदु की शक्ति मिल जाएगी। वैसे भी इस अद्वैतपूर्ण शरीर का मालिक शिव ही है। आदमी तो झूठमूठ का अहंकार करके इसका मालिक बन जाता है। इस तथ्य को शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। कुंडलिनी चक्रों पर शिवबिन्दु के ध्यान से सभी 12 चक्र शिव के बारह ज्योतिर्लिंग बन जाते हैं। ज्योतिर्लिंग शब्द में ज्योति का अर्थ कुंडलिनी की चमक से है। यही 12 ज्योतिर्लिंगों का आध्यात्मिक रहस्य है। इसीलिए मूलाधार को संकुचित करते रहने व वहाँ सिद्धासन में पैर की ऐड़ी का दबाव देने को कहते हैं। दरअसल बिंदु शक्ति को ले जाने वाली वज्र नाड़ी स्वाधिष्ठान चक्र व मूलाधार चक्र से होकर पीठ के बीचोंबीच ऊपर चढ़ती है। वह जननांग से शुरु होती है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है कि कैसे उस कुन्डलिनी नाड़ी को कुंडली लगाए नागिन की तरह दिखाया गया है, और कैसे वह कुन्डली खोलकर खड़ी हो जाती है। दरअसल कुन्डलिनी नागिन के आकार में नहीं है, जैसा कई लोग समझते हैं। यह कुन्डलिनी शक्ति को ले जाने वाली नाड़ी है। कुन्डलिनी नाम इसलिये पड़ा है, क्योंकि वह कुंडली लगाई हुई नागिन के जैसी नाड़ी में कैद रहती है। यह संस्कृत शब्द है। मूलाधार पर दबाव से वह नाड़ी क्रियाशील हो जाती है। इससे जाहिर है कि मूलाधार में जो शक्ति का निवास बताया गया है, वह बिंदु रूप में ही है। उसी बिंदु शक्ति को सहस्रार तक ले जाना होता है जागरण के लिए। वह धीरे धीरे करके रास्ते के सभी चक्रों को जागृत करते हुए भी वहाँ पहुंच सकती है, और सीधी भी। यह अभ्यास के प्रकार पर निर्भर करता है। साधारण अभ्यास से वह धीरे धीरे ऊपर पहुंचती है, पर तांत्रिक अभ्यास से एकदम सीधी सहस्रार में। उस बिंदु शक्ति को केवल आदमी ही ऊपर चढ़ा सकता है, अन्य जीव नहीं। क्योंकि केवल आदमी ही योगाभ्यास कर सकता है। साथ में, विशाल बिंदु शक्ति को झेलने लायक मस्तिष्क केवल आदमी के पास ही है, अन्य जीवों के पास नहीं।

साँस रोकने के बहुत से लाभ हैं

योगा वाली साँसों पर भी पिछली पोस्ट में व्यावहारिक चर्चा कर रहा था। दरअसल जो ड्रैगन को साँसों की आग उगलते हुए दिखाया गया है, वह कुंडलिनी की आग का ही प्रतीक है। उस साँस से जो कुंडलिनी नाड़ी लूप में घूमते हुए चमकती है, उसीको रहस्यात्मक आग के रूप में दर्शाया गया है। आदमी का वास्तविक आकार भी एक ड्रैगन के रूप जैसा ही है। यदि हम रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क को लें, तो एक नाग या ड्रैगन जैसा आकार बनता है। आदमी का असली रूप रीढ़ की हड्डी और मस्तिष्क में ही समाया हुआ है। बाहर के अन्य अंग तो मात्र बाहरी छिलकों की तरह है। इसका वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया था। यह मैंने कहीं पढ़ा नहीं और न ही इसका प्रमाण है मेरे पास, जो नीचे लिखा है। ऐसा लगता है कि साँस रोकने से रक्त वाहिनियों की दीवारों का लचीलापन बढ़ता है। क्योंकि उनकी मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। खुद भी महसूस होता है, जब साँस रोकने से दिमाग की नसों में भारीपन व कड़ापन सा महसूस होता है। पर ऐसा सावधानी से करना चाहिए। बहुत ज्यादा या बहुत देर तक नहीँ। इसीलिए जिन आसनों में पेट अंदर को दबता है, उन्हें साँस बाहर निकालकर रोककर करने को कहते हैं। जैसे कि शीर्षासन, सर्वांगासन, हलासन, नौकासन आदि। जिनमें पेट बाहर को फूलता है, उनमें साँस अंदर भरकर रोकने को कहते हैं। जैसे कि शलभासन, मकरासन, भुजंगासन आदि। वैसे नियंत्रित अवस्था में तो किसी भी आसन में सांस को भरकर या बाहर निकालकर अपनी रुचि के अनुसार रोककर रख सकते हैं। शीर्षासन, सर्वांगासन व हलासन में विशेष ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि उनमें मस्तिष्क में बहुत दबाव पैदा होता है। अगर साँस रोकने से विशेषकर योग के दौरान खून की नसों का लचीलापन बढ़ता है, तो इससे जाहिर है कि इससे स्ट्रोक, व दिल के रोगों से कुछ राहत मिल सकती है। जब तक रिसर्च से प्रूव नहीं होता, तब तक ऐसा विश्वास करके श्वास रोककर योग करते रहने में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी यह तो वैज्ञानिक प्रयोगों से स्पष्ट हो चुका है कि साँस रोकने से दिमाग में ऑक्सीजन का स्तर बदलता रहता है। इसका सीधा सा मतलब है कि खून की नसें सिकुड़ती और फैलती रहती हैं। जाहिर है कि उनके सिकुड़ने से ऑक्सीजन का स्तर घटेगा, और फैलने से बढ़ेगा। कुंडलिनी जागरण के समय मस्तिष्क में काफी दबाव महसूस होता है। उस दबाव को सहने के लिए भी इससे दिमाग की नसें तैयार रहती हैं।

सिर का दबाव ऐसा लगता है कि माथे के किनारों वाली दिमाग की नसें फूली हुई हैं। ऐसे आसन जिसमें सिर शरीर से नीचे हो, उनमें ऐसा ज्यादा लगता है। अभी हाल ही में मेरे एक रिश्तेदार लड़के की ब्रेन हेमरेज से मृत्यु हुई। वह सिर्फ 30 साल का था। अंतर्मुखी, लाडला, परिवार पर ज्यादा ही निर्भर और परिवार के इलावा दूसरों से कम घुलने-मिलने वाला था। कुछ दिनों से उसके सिर में हल्का सा दर्द रह रहा था, और खून की उल्टी के साथ बेहोशी से आधा घण्टे पहले वह सिर की नसों को छूकर बता रहा था कि उसे लग रहा था कि उसकी दिमाग की नसें फूल रही थीं। उसकी माँ को तो हाथ से छूने पर वैसा कुछ नहीं लगा। इसलिए उसे सोकर आराम करने को कहा। आईसीयू में डॉक्टरों ने उसके बचने के सिर्फ 5% चांस बताए। उसका मस्तिष्क बहते और जमे खून के दबाव से पत्थर की तरह सख्त हो गया था। वह सिर्फ डेढ़ दिन ही आईसीयू में जिंदा रह सका। उसे 5 दिन पहले कोरोना वैक्सीन, एस्ट्रोजेनिका आधारित कोविशील्ड भी लगा था। डॉक्टरों ने कहा कि उसे ज्यादा ही इम्मयूनिटी पैदा हो गई थी। इससे डरने की जरूरत नहीं। इससे डरकर वैक्सीन लगाना बन्द नहीं करना चाहिए, जब तक कोई बेहतर वैक्सीन नहीं आ जाती। इससे बहुत सी जानें बची हैं। इसकी तुलना में तो साईड इफेक्ट नगण्य ही हैं। हाँ, सावधान रहकर हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर साइड इफेक्ट लगे, तो डॉक्टर से सम्पर्क में रहना चाहिए। ऐसे जीवनघातक दुष्प्रभाव की संभावना लाखों में केवल 1-2 को ही होती है। अब तो यह भी सामने आया है कि यदि गलती से इंजेक्शन माँस की बजाय खून की नस में लगे, तो भी खून में क्लॉट बन सकते हैं। मैं यह इसलिए बता रहा हूँ कि अगर योग, व्यायाम आदि से उसके दिमाग की नसों में ज्यादा फुलाव को झेलने की शक्ति होती, तो शायद रक्तस्राव न होता या कम रक्तस्राव होता, या एमरजेंसी ट्रीटमेंट से जान बच जाती।

बिंदु का अर्थ एक सुई की नोक जितना स्थान भी होता है

इसे अंग्रेजी में पॉइंट कहते हैं। यह पैन को एक स्थान पर रखकर उसकी स्याही का निशान लगाने से बनता है। पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि बिंदु का अर्थ बूँद होता है। पर इसका दूसरा अर्थ पॉइंट भी होता है। कुंडलिनी भी वास्तव में असीमित क्षेत्र के मन का एक सूक्ष्म स्थान होता है। यदि कागज के एक पृष्ठ या पूरी पुस्तक पर लिखे लेख को मन मान लिया जाए, तो कुंडलिनी सिर्फ एक पॉइंट जितने स्थान में आ जाएगी। एक पॉइंट से पूरे लेख के बारे में जानकारी मिल जाती है कि कौन सा पैन इस्तेमाल हुआ है, और कौन सी स्याही। यहाँ तक भी पता चल सकता है कि लेखक का हस्तलेख कैसा है। इसी तरह एक कुंडलिनी से पूरे मन के स्वभाव का अनुमान लग जाता है। जैसे एक बिंदु के पूर्ण ज्ञान से पूरा लेख नियंत्रित किया जा सकता है, इसी तरह एक कुंडलिनी के संपूर्ण ज्ञान से पूरा मन नियंत्रित हो जाता है। मैं यह उपमा दोनों के बीच में बाहरी सादृश्यता को देखकर दे रहा हूँ, भीतरी को नहीं।

योग सीखने की चीज नहीं, अभ्यास की चीज है

मुझे कई लोग बोलते हैं कि मुझे योग सिखा दो। जिसे 20 सालों को करते हुए मैं थोड़ा सा सीखा हूँ, उसे किसीको एकदम से कैसे सिखा सकता हूँ। योग वास्तव में कोई एक विशेष क्षेत्र की विद्या नहीं है, जिसे एकदम से सिखाया जा सके। यह एक विचारधारा है, एक जीवन दर्शन है, एक लाइफस्टाइल है। यह मन की एक अद्वैतमयी सोच है। इसे आप सकारात्मक सोच भी कह सकते हैं। उस सोच को बना कर रखने और बढ़ाने के लिए आप जो मर्जी तरीका चुन सकते हैं। बहुत से तरीकों का भी एकसाथ इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए पहले सोच पैदा करना जरूरी है। जिसके अंदर सोच ही नहीं है, वह उसे बना के क्या रखेगा, और उसे बढ़ाएगा क्या। सोच तो आदमी के अपने वश में है। इसीलिए प्रकृति ने आदमी को फ्री विल उन्मुक्त चिंतन शक्ति दी है। योग कोई सोच जबरदस्ती नहीं पैदा कर सकता। योग का सहारा उस सोच को बढ़ाने के लिए लिया जा सकता है। जिसके अंदर यह सोच है, उसे कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं। सोच अपना रास्ता खुद ढूंढती है। उन्हें सोच बनाने के लिए मैं शरीरविज्ञान दर्शन पुस्तक पढ़ने को कहता हूँ। उसके बाद उनकी तरफ से कोई संदेश ही नहीं आता। यदि संदेश आता, तो मैं उन्हें कहता कि अब इस सोच को पक्का करने के लिए कुछ सालों तक इस सोच के साथ कर्मयोग के रास्ते पर चलो। सोच को आप कुंडलिनी भी मान सकते हो, क्योंकि दोनों ही मन के विचार हैं। फिर जब कुछ वर्षों के बाद उनका संदेश आता तो मैं उन्हें कुंडलिनी योग के बारे में बताता, व उसके बारे में व्यावहारिक पुस्तकें सुझाता, बेशक वे मेरी लिखी हुई ही हों। यही असली तरीका है योग सीखने का। मैं भी ऐसे ही सीखा हूँ। यदि कोई व्यायाम की तरह का शारीरिक योग ही सीखना चाहे, तो उसके लिए आज बहुत से साधन हर जगह उपलब्ध हैं, ऑनलाइन भी और ऑफलाइन भी। असली योग सीखने में समय लगता है, पूरी उम्र भी लग सकती है। 

आर्यसभ्यता की देवमूर्ति परम्परा से कुन्डलिनी साधना

आर्यन सभ्यता की रीति रिवाजों को देखकर उस समय की महान आध्यात्मिक वैज्ञानिकता वाली सोच का पता चलता है। शिव, गणेश आदि देवता बिल्कुल स्थाई व अजर अमर बना दिए गए थे। मूर्ति कला अपने चरम पर थी। इतनी जीवंत व आकर्षक मूर्तियां बनती थीं, जिनके आगे असली आदमी लज्जित हो जाते थे। असली आदमी, गुरु या प्रेमी से अधिक आसान तो देव मूर्तियों पर ध्यान लगाना होता था। उदाहरण के लिए यदि किसी के मन में शिव मूर्ति का रूप जागृत हो जाए, तो वह कभी नहीं भूल सकता था। वह इसलिए क्योंकि वह मूर्ति विशेष सहेज कर मन्दिर में हमेशा के लिए रखी जाती थी। वैसे भी देश के हरेक स्थान पर शिव मंदिर होने से शिव रूपी कुंडलिनी का कभी विस्मरण नहीं होता था। असली आदमी का तो सीमित जीवन होता है, पर ये देवमूर्तियाँ तो धर्म परंपरा से जुड़कर शाश्वत हो गई हैं। असली आदमी का तो वियोग भी हो सकता है। फिर ध्यान कैसे लगाए। देवमूर्तियां तो हर जगह और हर समय विद्यमान हैं। इसीलिए इनको बहुत सुंदर बनाया जाता था। स्वर्णमूर्ति सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। क्योंकि वह सबसे आकर्षक, चमकदार और दीर्घजीवी होती थी। मैंने कई इतनी सुंदर मूर्तियां इतने जीवंत और सुंदर रूप में देखी हैं, कि आजतक मेरे मन में जीवंत हो जाती हैं। सोचो, जब एक बार देखने पर ही वे मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ सकती हैं, तो बार बार उनका ध्यान करने से वे क्यों मन में जागृत नहीं होएंगी। यदि न भी जागृत होए, तो भी वे आदमी को अनासक्ति व अद्वैत के साथ जीना सिखाती हैं। वे हर हाल में फायदा ही करती हैं। वैसे  भी देव मूर्ति तभी अस्तित्व में आई जब किसीने सबसे पहले उसको मन में जागृत किया और उसे दुनिया के सामने रखा।

कुंडलिनी वाला भला केवल मानसिक कुन्डलिनी ही कर सकती है, कोई स्थूल भौतिक रूप नहीं

आदमी का भला करना तो कुंडलिनी का स्वभाव है, चाहे वह पत्थर के रूप वाली ही क्यों न हो। इसीलिए यह कहावत बनी है कि मानो तो पत्थर में भी भगवान मिल जाते हैं। पर इसका श्रेय कुंडलिनी को न दिया जाकर देवता को दिया जाने लगा। इससे लोगों के मन में देवताओं के प्रति विश्वास बढ़ता गया, जो आज तक है। हालांकि वैज्ञानिक तौर पर मानव भलाई के सारे काम कुंडलिनी कर रही थी। देवताओं को श्रेय दिया जाना उचित भी है, क्योंकि वे वैसे भी भौतिक रूप से भी लोगों का भला करते रहते हैं। जैसे सूर्यदेव रौशनी देते हैं, और जलदेव पानी। हालांकि कुंडलिनी वाला भला तो कुंडलिनी ही कर रही है, देवता नहीं। दोनों प्रकार की भलाई को अपने अपने असली रूप में देखना चाहिए, इकट्ठे जोड़कर नहीं, तभी कुंडलिनी के बारे में भ्रम दूर होगा। इसी तरह, एक आदमी का भला प्रेमी के रूप से बनी उसके मन की कुंडलिनी करती है, उसका प्रेमी नहीं। अगर प्रेमी ही भला कर रहा होता, तो शादी के बाद परस्पर आकर्षण खत्म या कम न होकर बढ़ता। पर होता उल्टा है। दरअसल शादी के बाद जब प्रेमी का भौतिक रूप हर वक्त उपलब्ध हो जाता है, तब मन में उसके रूप की बनी हुई कुंडलिनी मिटने लगती है। इससे कुंडलिनी वाले लाभ खत्म हो जाते हैं। पर आदमी दोष देता है प्रेमी को। प्रेमी तो जैसा पहले था, वैसा ही होता है। इसीलिए भगवान कृष्ण कहते हैं कि राधा उनकी सबसे प्रिय है। राधा से विवाह नहीं, सिर्फ उनका प्रेम ही होता है। बात स्पष्ट है कि कृष्ण के मन में राधा के रूप से बनी शाश्वत कुंडलिनी के कारण ही कृष्ण को राधा सबसे प्रिय है। यदि दोनों का विवाह हो जाता, तो शायद वैसा न होता। क्योंकि भौतिक रूप से तो उनकी पत्नी रुक्मिणी सबसे सुंदर हैं। दरअसल असली और सच्चा प्यार सिर्फ और सिर्फ कुंडलिनी से ही होता है, किसी भौतिक वस्तु से नहीं। “किसीकी याद के सहारे जीना” भी इसी कुंडलिनी के द्वारा किए जाने वाले भले का उदाहरण है। भला सुखी जीवन से बड़ा भला और क्या हो सकता है। शिव का दूसरा रूप पर्वत भी है, जो मैंने एक कविता पोस्ट में सिद्ध किया है। पर्वत आदमी का बहुत भला करते हैं। ये पानी, हवा, ठंडक, फल आदि देते हैं। इसलिए लोगों का देवताओं पर आसानी से ध्यान जम जाता है। इसीलिए ज्यादातर मामलों में देवताओं को ध्यान कुंडलिनी बनाया जाता था। इससे संसार में मानवता भी पनपी रहती थी। वैसे भी कुंडलिनी ही भगवान तक ले जाती है। भगवान तक पहुंचने के लिए सीधी उड़ान सेवा नहीं दिखाई देती। लगता यह अजीब है, पर यह सत्य है। यह मूर्ति विज्ञान है, जिसे जो नहीं समझेगा, वह तो दुष्प्रचार करेगा ही।

कुन्डलिनी या ध्यान-बिंदु के लिए विज्ञानवादी सोच, गहन अन्वेषण, अभ्यास, धैर्य, प्रेमपूर्ण संपर्कों, अध्ययन-चर्चाओं, और गुरु-देवताओं-महापुरुषों-अवतारों औरमन में बने उनके मानसिक चित्रों की आवश्यकता

दोस्तों, मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि साँसें कैसे लेनी चाहिए। इसीको थोड़ा और जारी रखते हैं। मुझे लगातार समर्पित योग करते हुए लगभग चार साल हो गए हैं। उससे पहले भी मैं लगभग 15 सालों से हल्का फुल्का योग प्रतिदिन करता आ रहा हूँ। अब जाकर मुझे लगता है कि मैं साँस लेना सीखा हूँ। वैसे अभी भी सीख ही रहा हूँ। सीखना कभी खत्म नहीं होता। कहना तो आसान है कि सांस लेने को ही योग कहते हैं। पर इसमें लम्बे अभ्यास की आवश्यकता होती है। अब समझा हूँ कि साँस भरने के बाद सांस को कुछ देर रोकने के लिए क्यों कहते हैं। पहले तो मैं इसे फिजूल का काम समझता था। दरअसल जब साँस भरने से प्राण और अपान का आपस में टकराव हो रहा होता है, तो उस टकराव को चरम तक पहुंचने के लिए थोड़ा सा वक़्त लगता है। उस समय साथ में टकराव का चिंतन भी होता रहे, तो और ज्यादा लाभ मिलता है। उससे कुंडलिनी ऊर्जा शक्तिशाली झटके के साथ ऊपर को चढ़कर आगे से नीचे उतरकर एनर्जी लूप में घूमने लगती है। वह एकदम से तरोताजा कर देती है। इसी तरह, साँस को धीरे-धीरे और लंबे समय तक अंदर भरें, ताकि प्राण और अपान अच्छे से आपस में मिल जाए। सांस को भी धीरे धीरे करके बाहर छोड़े, क्योंकि कुंडलिनी ऊर्जा को नीचे उतरते हुए समय लगता है। कुन्डलिनी भौतिक नाड़ियों में भौतिक द्रव्यों के साथ ही तो चलती है। इसलिए नाड़ियों के प्रवाह को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने के लिए समय तो लगेगा ही। इसी तरह साँस पूरा छोड़ने के बाद जितनी देर सम्भव हो, उतनी देर सांस को रोककर रखें। इससे कुंडलिनी पूरा नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र पर जमा हो जाती है, और जैसे ही मूलाधार को संकुचित करते हैं, वह मूलाधार को उतरकर पीठ से सहस्रार को चढ़ जाती है। वहाँ से वह साँस भरते समय प्राण के साथ लगभग हृदय चक्र तक नीचे उतरती है। वहां वह नीचे से आ रहे अपान से टकराकर तेज चमकने लगती है। फिर जब सांस छोड़ते समय छाती व पेट नीचे को उतरते हैं, तो वह भी नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान चक्र पर पहुंच जाती है। फिर से वही पिछली प्रक्रिया रिपीट होती है। इस तरह से एक ऑटोमेटिक मशीन की तरह यह कुंडलिनी चक्र चलता रहता है, और आदमी आनन्द में मग्न रहता है। उलटी जीभ को नरम तालु से टच करके रखने से प्रवाह ज्यादा अच्छा हो जाता है। पेट व छाती को ऊपर नीचे जाते देखते हुए ध्यान करने में अतिरिक्त सहायता मिलती है। कई लोग तो कुन्डलिनी को नाभि और मूलाधार के बीच में ही घुमाते रहते हैं। कई बार ऐसी परिस्थितियां या शरीर के ऐसे पोस्चर होते हैं, जिसमें पेट से न चलकर साँस छाती से चलती है। उस समय साँस भरने पर छाती फूलती है, जो कुंडलिनी मिश्रित अपान को नीचे से ऊपर खींचती है। अंदर जाती हुई साँस के साथ कुंडलिनी मिश्रित प्राण ऊपर से नीचे छाती तक उतर जाता है। छाती में दोनों के टकराव से वहाँ कुंडलिनी ज्यादा स्पष्ट हो जाती है, और साथ में थकान से पैदा तनाव भी दूर हो जाता है। इसी तरह, कई बार अंदर जाती साँस से छाती और पेट दोनों एकसाथ आगे को फूलते हैं। इससे भी कुंडलिनी ऊर्जा पर अच्छा खिंचाव बनता है।

कुंडलिनी सुषुम्ना से ही ऊपर चढ़ती है, यद्यपि अन्य नाड़ियाँ भी इसमें सहयोग करती हैं

जब मेरी पीठ से कुंडलिनी ऊर्जा ऊपर चढ़ती है, तो मैं उसे रोकता नहीं, बेशक वह किसी भी नाड़ी पर या स्थान पर हो। दरअसल पीठ की केंद्रीय रेखा ही सुषुम्ना नाड़ी है। यह पीठ की अन्य दोनों मुख्य किनारे की रेखाओं या नाड़ियों से भी जुड़ी होती है। और भी कोई भी नाड़ी रेखा या बिंदु हो, सबसे जुड़ी होती है। वास्तव में सभी नाड़ियाँ आपस में नाड़ी जालों से जुड़ी होती हैं। तभी तो जब मुझे पीठ में कहीं भी कुंडलिनी ऊर्जा का आभास होता है, तो मैं उस अनुभव को रोकता नहीं हूँ। केवल इसके साथ अगले आज्ञा चक्र पर औऱ मूलाधार संकुचन पर तिरछी नजर बना कर रखता हूँ। ऐसा करने से धीरे से कुंडलिनी फिसलकर सुषुम्ना में आ जाती है, और ऊपर सहस्रार तक जाकर वहाँ से नीचे जाती है और फिर लूप में घूमने लग जाती है। बस ऐसा ध्यान बना रहना चाहिए। कई बार क्या होता है कि यदि कुंडलिनी ऊर्जा पीठ या सिर में बाईं तरफ हो, तो उपरोक्त ध्यान करने से वह पहले दाईं तरफ जाती है, फिर संतुलित होकर बीच वाली सुषुम्ना में फिट हो जाती है। हालांकि ऐसा थोड़े समय ही रहता है, क्योंकि ऊर्जा का वेग जल्दी से घटता रहता है। इसको कुण्डलिनी जागरण समझ कर भ्रमित नहीँ होना चाहिए। यह तो साधारण सी ऊर्जा की गति है, हालाँकि जागरण में भी ऐसा ही घटनाक्रम होता है, पर वह चरम पर होता है। ऐसी ऊर्जा की गति सभी में चली रहती है। पर सब इसे नहीं पहचानते, और न ही इस पर ध्यान देते हैं। इसी से तो आदमी जिंदा रहता है। सम्भवतः प्राणविद्या भी इसी प्राण के प्रवाह से मृत जीव को जिंदा कर सकती है। मैंने एक पुराने दोस्त से सुना था कि उसने इलाहाबाद के कुम्भ मेले में एक तन्त्रयोगी को एक मृत पक्षी को प्राणविद्या से जिंदा करते देखा था। इसके सच झूठ का तो पता नहीं पर हिंदु पुराणों में इससे संबंधित बहुत सी कथाएं हैं। संजीवनी विद्या भी शायद यही प्राण विद्या रही होगी, जिससे राक्षसगुरु शुक्राचार्य देवताओं से लड़े युद्ध में मरे राक्षसों को जिंदा किया करते थे। ऐसी रूपक कथाओं के आधार में कोई न कोई वैज्ञानिक तथ्य जरूर होता है। ये लोगों को योग की तरफ आकर्षित करने के लिए बनाई होती हैं। पर कई लोग इसका उल्टा मतलब लेकर विज्ञान और योग को नकारने लग जाते हैं। ऐसे ही जम्हाई लेना भी ऐसा ही ऊर्जा का प्रवाह है। तभी उससे थकान दूर होती है। आदमी कैसे हाथ ऊपर उठाकर, पीठ व गर्दन को सीधा करके, नाभि की सीध में गड्ढा बनाकर, मुँह खोलकर, आंखें भींचकर, आज्ञाचक को सिकोड़कर कुंडलिनी ऊर्जा को पीठ में ऊपर चढ़कर मस्तिष्क तक पहुंचने में मदद करता है। यही फर्क है कि योगी इसकी गहराई में जाता है कि यह क्या है, कैसे हुआ, क्यों हुआ और इससे कैसे अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। न्यूटन से पहले भी बहुत से लोगों ने पेड़ से सेब गिरते देखा था, पर उसकी गहराई में न्यूटन ही गया। आम आदमी इसे साधारण समझ कर छोड़ देता है। योगी भी एक वैज्ञानिक होता है, खासकर मनोवैज्ञानिक। जम्हाई तरोताजा करने वाला कुदरत का नायाब तोहफा है।

संगम के समय संगम के साथ संगम करने वाले दोनों घटकों पर ध्यान देने की आवश्यकता

पिछली पोस्ट में मैं संध्या आदि संगम कालों और स्थानों के बारे में बात कर रहा था। उन पर ऐसे ही ध्यान देना पड़ता है जैसे प्राण और अपान के टकराव पर, तभी लाभ मिलता है। ऐसे तो मुर्गा संध्या से पहले ही उठ जाता है, उसे संध्या का लाभ क्यों नहीं मिलता। क्योंकि उसकी संध्या में श्रद्धा नहीं है। आदमी यदि तकनीकी पहलू को न समझे, तो कम से कम श्रद्धा तो होनी ही चाहिए। दरअसल संध्या के मध्यम प्रकाश पर ध्यान की स्थिति में दिन की पूरी चमक और रात के पूरे अंधेरे पर भी ध्यान जाता रहना चाहिए, तभी संध्या में दिन और रात की आपस में टक्कर होगी, और आपस में मिश्रित होकर कुंडलिनी की चमक के साथ आंनद पैदा करेंगे। इसी तरह इलाहाबाद के संगम के पानी में बहुत से मेंढ़क और मछलियां रहती हैं, उनकी तो मुक्ति नहीं होती। वहाँ भी ऐसे ही होता है। यह हरेक संगम के बारे में तो है ही, साथ में हरेक धार्मिक रीत के बारे में भी है। इससे पता चलता है कि धर्म के वैज्ञानिक तकनीकी पहलू का ज्ञान कितना जरूरी है। यही ज्ञान ढूंढना इस वेबसाइट का काम है।

योग को खुद योग ही बेहतर सिखाता है

योग-आसनों के बारे में मुझे इस हफ्ते कुछ नए व्यावहारिक अनुभव मिले। मिले तो पहले भी थे, पर इतने स्पष्ट नहीं थे। पहले मैं जल्दी-जल्दी और उथले साँस लेता था। इस बार प्राणायाम की तरह गहरे और धीरे लिए। एकप्रकार से प्राणायाम भी आसनों के साथ होने लगा। एकसाथ दो लाभ। पहले मैं एक पोज़ में 20–30 बार छोटी, जल्दी और उथली साँसें लेता था। पर अब सिर्फ 2-3 बार ही ले पाया। इतना ज्यादा फर्क था। समय के साथ योग खुद अपने आप को सिखाता है। इसलिए जैसे ठीक लगे, वैसे करते रहना चाहिए। हालाँकि मैंने कहीं ब्लॉग में पढ़ा था कि योग गुरु अय्यंगर योग आसनों के साथ ही प्राणायाम भी सिखाते थे। अब पूरी सच्चाई का पता चला। फिर भी सावधान रहना पड़ता है। अपनी सुखपूर्वक सामर्थ्य को नहीं लांघना चाहिए। मेरा ज्यादातर समय योग अभ्यास में ही बीत जाता है। मेरे लिए यह जरूरी भी है। मैं इसके बिना स्वस्थ नहीं रह सकता। मुझे एनकाइलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस, एक ऑटोइम्यून डिसीज है। इसमें आदमी हमेशा हरकत में रहना चाहिए। शरीर के जोड़ों खासकर छाती और पीठ के जोड़ों को जाम होने से बचाने के लिए व थकान पर काबू पाने के लिए नियमित व्यायाम होता रहना चाहिए। अवसाद, व अन्य मानसिक दोषों से बचाव के लिए कुंडलिनी ध्यान, प्राणायाम से लाभ मिलता है। यही इसका मुख्य उपचार है। इसीके बहाने मैं थोड़ा बहुत योग सीख पाया। मन को मनाने के लिए कोई बहाना अच्छा रहता है।

कुन्डलिनी, कर्मयोग और विज्ञान आपसी अंतरंग रिश्ते से जुड़े हैं

लोग अक्सर बोलते हैं कि अध्यात्म विज्ञान का विषय नहीं है। मैं कहता हूँ कि बिल्कुल है। कुंडलिनी जागरण तक तो बहुत ज्यादा है, पर उसके बाद भी काफी है। कुन्डलिनी जागरण के बाद व्यक्तिगत विज्ञान की जगह सार्वभौमिक या ब्रह्मांडीय विज्ञान ले लेता है। इससे उसे अनायास ही अनुकूल परिस्थितियां मिलने लगती हैं, और खुद ही उसका भला होने लगता है। ऐसा कुन्डलिनी की ईश्वरीय शक्ति के कारण होता है। हालाँकि इसकी भी अपनी सीमाएं और बाध्यताएं हैं।  इससे व्यक्तिगत विज्ञान का बोझ थोड़ा हल्का हो जाता है। कुन्डलिनी को प्राप्त करने के लिए और उसे क्रियाशील रखने के लिए कर्मयोग की जरूरत पड़ती है। कर्मयोग उतना ही अच्छा होगा, जितनी अधिक काम की गुणवत्ता व विशेषता होगी। विज्ञान ही कर्मों को गुणवत्ता, विशेषता व उच्चता प्रदान करता है। इसलिए अध्यात्म और विज्ञान साथ-साथ ठीक चलते हैं। मैं खुद विज्ञान का एक सनकी खिलाड़ी हुआ करता था। जहाँ कोई विज्ञान की कल्पना नहीं करता था, मैं वहाँ भी विज्ञान को फिट कर लेता था। मेरे अध्यापक मुझे मजाक में कहते कि दोस्त तू तो हर जगह विज्ञान लड़ा देता है। क्योंकि विज्ञान कुंडलिनी के लिए जरूरी है, इसीलिए विज्ञानपरक खासकर पाश्चात्य प्रकार वाली सभ्यता के लोग कुंडलिनी जिज्ञासु होते हैं। पर उनमें से अधिकांश लोग स्वास्थ्य संबंधी बाहरी योग के विज्ञान को ही समझते हैं। वे ध्यान के विज्ञान को कम समझते हैं। वे जितना दिमाग और एनर्जी बाहरी विज्ञान पर लगाते हैं, उसका थोड़ा भी हिस्सा अगर भीतरी विज्ञान पर लगाएं, तो सारे महान कुंडलिनी योगी बन जाएं। पर अब मनोविज्ञान के रूप में धीरे धीरे कुंडलिनी विज्ञान को समझ रहे हैं। इसीलिए तो ध्यान का कोई संतुष्टिजनक अनुवाद अंग्रेजी में नहीं मिलता। मेडिटेशन या कंसन्ट्रेशन शब्द से काम चलाना पड़ता है। दरअसल मेडिटेशन ध्यान को सुगम बनाने वाली पद्धति है, असली ध्यान नहीं। इसी तरह, कंसन्ट्रेशन का मतलब भौतिक वस्तुओं पर और थोड़े समय तक मन को केंद्रित करना है, एकमात्र मानसिक कुंडलिनी पर नहीँ, और बहुत लंबे समय या पूरे जीवन भर एक ही मानसिक चित्र पर नहीं। इसलिए ध्यान शब्द को अंग्रेजी के शब्दभंडार में शामिल किया जाना चाहिए। संस्कृत का केवल एक ध्यान शब्द ही सारे योग को समेटे हुए है। यह है, तो योग है। यदि यह नहीं है, तो योग नहीँ है। योग की बाकी चीजें तो केवल ध्यान की सहायक भर ही हैं। ध्यान और कुंडलिनी को पर्यायवाची शब्द मान सकते हैं। प्रथम विश्व योगदिवस के आसपास एक ब्लॉग में पढ़ रहा था जिसमें एक भौतिकवादी सज्जन बड़े गर्व से कह रहे थे कि आजकल के भौतिकवादी लोग, खासकर पाश्चात्य प्रकार वाली सभ्यता के लोग योग के बाहरी अंगों तक ही सीमित रहेंगे। वे ध्यान की गहराई तक नहीं जाएंगे। तो अब मैं सोचता हूँ कि फिर उनका कुंडलिनी जागरण कैसे होगा। ध्यान के बिना हो ही नहीँ सकता। बीच-2 में तो विरले लोगों को कुदरती संयोग से खुद भी ध्यान लग जाता है। पर बड़े पैमाने पर जागृति प्राप्त करने के लिए कृत्रिम रूप से ध्यान लगाना ही पड़ेगा। कुआं प्यासे के पास नहीँ जाता, प्यासे को कुएँ के पास जाना पड़ता है। यदि प्यासा आदमी कुएँ के पास न जाए, तो आदमी की जान को ही खतरा है, कुएँ को कुछ नहीं होगा। इसी तरह यदि लोग ध्यान को न अपनाए, तो लोगों का नुकसान है, ध्यान का नहीँ। इसलिए लाइफस्टाइल ही ध्यान वाला बनाना पड़ेगा। प्राचीन वैदिक परम्परा में ऐसा लाइफस्टाइल था। लगता तो ऐसा जीवन चरित्र अजीब है, पर सत्य भी यही है। सत्य को नकारा नहीँ जा सकता। 

कुन्डलिनी को बिंदु मानने से उसका ध्यान आसान हो जाता है

पिछली पोस्ट में मैंने बिंदु को कुंडलिनी रूप बताया था। कुंडलिनी का ध्यान बिंदु के रूप में इसलिए किया जाता है ताकि मूलाधार क्षेत्र में स्थित बिंदु की शक्ति कुंडलिनी को मिलती रहे। इससे महसूस होता है कि कुंडलिनी मूलाधार क्षेत्र पर स्थित मुख्य बिंदु स्थान से किसी नाड़ी के माध्यम से जुड़ गई है, बेशक कुंडलिनी कहीं पर भी क्यों न हो। ऐसा लगता है कि बिंदु ऊर्जा ऊपर चढ़ती हुई कुन्डलिनी को पुष्ट कर रही है। इसे ही आसुत यौन ऊर्जा भी कहते हैं। इससे यौनलिप्सा शांत हो जाती है, क्योंकि उसकी ऊर्जा को कुंडलिनी ने सोख लिया होता है। वैसे तो बिंदु की शक्ति पूरे मस्तिष्क को मिलती है, पर कुंडलिनी का ही ध्यान बिंदु के रूप में इसलिए किया जाता है, ताकि कुंडलिनी चित्र सबसे अधिक प्रभावी बना रहे, और दूसरे विचार इसके आगे दबे रहें। बिंदु एक द्रव पदार्थ है, इसलिए इसका प्रवाह अच्छा होता है। यह कुन्डलिनी के प्रवाह को भी बढ़ा देता है। साथ में मैं बता रहा था कि यदि कुंडलिनी का सही अर्थ समझ में आ गया, तो योग का आधे से अधिक सफर तय हो जाता है। जिस किसी बिरले खुशकिस्मत आदमी को अच्छे प्रेम संपर्क मिलते हैं, उसके मन में खुद ही कुंडलिनी चित्र बन जाता है। वह बेशक दुनियादारी में लाभ दिलाए और मन का चैन दे, पर उसे जगाना बहुत मुश्किल होता है। कई बार यौन प्रेमी के मजबूत चित्र के संयोग और वियोग से सीधा आत्मज्ञान भी मिल सकता है, बिना कुंडलिनी जागरण के। पर ऐसा बहुत ही विरले मामले में होता है। जगाने के लिए तो किसी पसंदीदा व काल्पनिक देवता, पुराने और ब्रह्मलीन गुरु आदि के मानसिक रूप के चित्र को कुंडलिनी बनाकर उसका नियमित ध्यान करना पड़ता है। यह आसान होता है, क्योंकि उनका प्रत्यक्ष भौतिक रूप विद्यमान नहीं होता, इसलिए वह ध्यान में बाधा नहीं पहुंचाता। कई वाममार्गी तांत्रिक अपने मन में इनके चित्र को मजबूत बनाने के लिए यौनसाथी का सहारा लेते हैं। कइयों को यह सहारा पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों के कारण खुद ही मिल जाता है। दुनियादारी के प्रेम संपर्कों से आदमी को लोगों के चित्रों को मन में खुशी से रखने की आदत पड़ी होती है, जिससे उसे योग करते हुए कुंडलिनी ध्यान आसान लगता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे यदि हम साँस रोककर अनाहत चक्र पर कुंडलिनी ध्यान कर रहे हों, तो हम मस्तिष्क के विचारों को नहीं रोकते, बल्कि उसके ध्यान के साथ मूलाधार चक्र का भी ध्यान करते हैं। इससे मस्तिष्क की शक्ति खुद ही नीचे उतरकर अनाहत चक्र पर कुण्डलिनी के रूप में चमकने लगती है। हृदय पर हाथ रखकर वहाँ कुंडलिनी का ध्यान आसान हो जाता है, और सिद्धासन में पैर की एड़ी से मूलाधार चक्र का। इसी तरह, हरेक चक्र पर ध्यान करते समय वहाँ हाथ या अंगुली लगाकर उसे आसान किया जा सकता है।

पतंजलि योगसूत्रों की सार्वभौमिक प्रामाणिकता

कुन्डलिनी खोजने के पीछे मेरा कोई स्वार्थ नहीं छिपा था। मुझे उसकी जरूरत भी नहीं लगती थी, क्योंकि मैं पहले से ही भरपूर आनन्द के साथ अद्वैत भाव वाला जागृत जीवन जी रहा था। हुआ यह कि संयोगवश मुझे कुछ अतिरिक्त समय मिल गया। मेहनती तो मैं था ही, हर समय कुछ न कुछ करता रहता था। उस अतिरिक्त समय में मैंने अध्यात्म के बारे में पढ़ना शुरु किया। पतंजलि योग मुझे समझ आ गया था, पर इश्क-विश्क के और प्राकृतिक रूप वाला। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि बनावटी योगाभ्यास से किसीका मजबूत चित्र मन में कैसे बनाया जा सकता है। प्यार-मुहब्बत में तो वह खुद ही बन जाता है। इसलिए मैंने और भी योग की पुस्तकें पढ़ीं, ऑनलाइन योग मंचों पर चर्चाएं कीं, और साथ में योगाभ्यास भी करता रहा। एक बार तो मैं निराश होकर पतंजलि योगसूत्रों की प्रामाणिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगाने लग गया था। फिर मंच पर एक अमेरिका में बसे भारतीय मूल के एक वृद्ध सज्जन ने मुझे थोड़े गुस्से में टोकते हुए बोला था, “आप ये कैसे कह सकते हैं? सैंकड़ों सालों से लोग उस पुस्तक से फायदा उठाते आए हैं। आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए”। मैंने झूठा स्पष्टीकरण देते हुए अपना बचाव किया था कि मैंने पतंजली के ऊपर संदेह नहीं किया था, पर मैं उनके बारे में कह रहा था, जो पतंजली योगसूत्रों की गलत व्याख्या करते थे। इससे वे संतुष्ट हो गए। शायद इस चर्चा ने भी मुझे इस पुस्तक की तह तक जाने में मदद की हो। तंत्र की पुस्तकें भी पढ़ीं, और उसका भी सहारा लिया। फिर भी मैं मस्त रहता था। कुन्डलिनी का पता चले तो भी ठीक, न पता चले तो भी ठीक। पर मेहनत रँग लाई, और उसका पता चल गया। बेशक मैं उसे ज्यादा देर नहीं झेल पाया। यदि झेल लेता तो शायद आप लोगों को कुछ बताने लायक  रहता ही नहीं। सब एक दिव्य योजना का हिस्सा है। फिर मुझे पता चला कि पतंजलि योगसूत्रों में बिल्कुल पूरा का पूरा सही लिखा है। यद्यपि उसे व्यावहारिक रूप से आम आदमी के लिए समझना मुश्किल है। इसलिए इसमें थोड़ी मदद कर देता हूँ। यह भी पता चला कि आम समाज में योग के बारे में किताबी ज्ञान ज्यादा फैलता है, योगाभ्यास नहीं। पर योग का अधिकांश हिस्सा व्यावहारिक योगाभ्यास ही है। 

कुंडलिनी जागरण मुख्य ध्येय होना चाहिए, ऊर्जा जागरण या सुषुम्ना जागरण नहीं

मुझे लगता है कि अधिकांश लोग जो कुन्डलिनी जागरण का दावा करते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा जागरण या सुषुम्ना जागरण होता है। इसीलिए वे कुन्डलिनी का वर्णन कम, और ऊर्जा का वर्णन ज्यादा करते हैं। कुन्डलिनी जागरण तो बिना सुषुम्ना जागरण के भी हो सकता है। हालांकि ऊर्जा तो सुषुम्ना से होकर ही ऊपर चढ़ती है, पर वह बैकग्राउंड में रहती है, अनुभव में नहीं आती। एकदम से जो ऊर्जा की नदी उनकी पीठ से होकर मूलाधार से सहस्रार तक उनके अनुभव में आती है, वह सुषुम्ना जागरण ही है। जब इतनी ऊर्जा मस्तिष्क में एकसाथ आएगी, तो कोई न कोई चित्र तो वहाँ चमक से कौंधेगा ही। ऐसा ही चित्र एकबार मेरे मस्तिष्क में भी चमका था, जब मेरा क्षणिक सुषुम्ना जागरण हुआ था। इसका विस्तृत वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। वह चित्र एक स्थानीय मन्दिर का था। वह बहुत जीवन्त चित्र था, पर जागरण जैसा नहीं। फिर कुन्डलिनी चित्र भी चमका, पर वह भी जागरण जितना नहीँ था। जागरण के दौरान आदमी कुंडलिनी चित्र के साथ अपना पूर्ण जुड़ाव महसूस करता है, और साथ में महान आनंद व अद्वैत का अनुभव होता है। ज्यादातर लोग ऊर्जा साधना ज्यादा करते हैं, और कुन्डलिनी साधना कम। हालाँकि ये दोनों आपस में जुड़े हैं, पर मुख्य ध्येय तो कुन्डलिनी ही होना चाहिए। कुंडलिनी ही वह मानवीय चित्र है, जो एक सच्चे मित्र की तरह हमेशा साथ देता है। लोक में तो देता ही है, परलोक में भी देता है, क्योंकि यह सूक्ष्म है, जिसकी पहुंच हर जगह है। यही प्रेम और मानवता को बढ़ावा देता है। क्या आपने किसी प्रकाशमान ऊर्जा की नदी को, प्रकाश के चित्र-विचित्र डिसाईनों को किसी का मित्र बन कर सान्त्वना देते देखा है। मन की किसी मनुष्याकृति से पूर्ण जुड़ाव के बिना इस तरह के प्रकाश के अनुभव ऊर्जा जागरण या नाड़ी जागरण या सुषुम्ना जागरण के लक्षण हैं। मेरे को लगता है कि इन चीजों से पूर्ण जुड़ाव या पूर्ण समाधि बहुत कम अनुभव होता है, यदि हो भी जाए तो विशेष लाभ नहीं मिलता। हाँ, इतना जरूर है कि इससे कुंडलिनी साधना में बहुत मदद मिलती है, यदि कोई मदद लेना चाहें तो। मुझे लगता है कि इन चीजों के साथ प्रत्यक्ष और पूर्ण विलय या पूर्ण समाधि के अनुभव के दुर्लभ मामले हैं, और अपूर्ण विलय के साथ कोई तत्काल लाभ नहीं दिखता है। यद्यपि अद्वैतता के कारण प्रत्येक जागृति में अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित वस्तुओं के साथ पूर्ण विलय होता है, लेकिन विलय की मुख्य और प्राथमिक वस्तु तो पसंदीदा मानव रूप ही होना चाहिये, इसमें से सबसे अच्छा ईश्वर रूप है, और दूसरे स्थान पर गुरु रूप है। कृत्रिम ध्यान प्रयासों के बिना अचानक ज्ञानोदय में, जागृति के समय मन में जो कुछ भी विचार या चित्र प्रवाहित होते हैं, उन संबंधित वस्तुओं के साथ आत्मा का प्राथमिक विलय होता है। यदि वह आत्मज्ञान किसी व्यक्ति की सहायता से हुआ है, वह प्रेम सम्बन्धी हो सकता है, तो वह मन में बाद में, कुंडलिनी ध्यान के सभी लाभ देते हुए कुंडलिनी के रूप में विकसित होता है। हालांकि, शक्तिपात आदि के द्वारा, स्वयं के प्रयासों के बिना इस प्रकार का अचानक जागरण कम शक्तिशाली और कम स्थिर प्रतीत होता है। वास्तव में, संबद्ध वस्तुएं या विचार मुख्य लक्ष्य नहीं हैं। ये मुख्य ध्येय नहीं हैं। मुख्य ध्येय तो मनुष्याकृति कुंडलिनी ही है। क्योंकि आदमी का सच्चा साथी आदमी ही होता है, इसलिए मानवरूप में देवता को ही ज्यादातर मामलों में कुंडलिनी बनाया जाता है। योग्य गुरु या महापुरुष या कृष्ण आदि अवतार भी कुंडलिनी बनाए जा सकते हैं। एक खास सम्प्रदाय का एक खास देवता इसलिए होता है, क्योंकि एक ही देवता के सामूहिक ध्यान करने से एक-दूसरे को ध्यान का बल मिलता है। जैसे कि शैव सम्प्रदाय, शाक्त सम्प्रदाय, गणपति के उपासक समाज समूह आदि। राज योग में कोई चक्र नहीं होते हैं, और ऊर्जा चैनल भी नहीं होते हैं। मन में केवल कुंडलिनी ध्यान किया जाता है। वहाँ भी कुण्डलिनी जागरण और कुण्डलिनी सक्रियता इसी प्रकार होती है।इसीलिए कुन्डलिनी का विशद वर्णन करना बहुत जरूरी हो गया था। इसी जरूरत को देखते हुए यह वेबसाइट संसारपटल पर आई।

कुंडलिनी एक सर्वोत्तम गुरु व बिंदु के रूप में है, जो सर्वलिंगमयी देह और कुम्भक प्राणायाम के साथ बहुत पुष्ट होती है

दोस्तों, मेरी पिछली पोस्ट के कथन के सही होने का एक ओर प्रमाण मिल गया। शिवपुराण के अगले ही अध्याय में है कि अग्नि में भस्म होने के बाद संध्या नामक नारी सूर्यमंडल में प्रविष्ट हो गई। उसके वहाँ दो टुकड़े हो गए। ऊपर वाले टुकड़े से सुबह का संध्याकाल बना, और नीचे वाले भाग से शाम का सांध्यकाल बना। फिर लिखा है कि रात और सूर्योदय के बीच का दिन का समय प्रातः संध्या का होता है, और सूर्यास्त व रात्रि के बीच का समय सांयकालीन संध्या का होता है। मैंने पिछली पोस्ट में यह भी लिखा था कि कुंडलिनी कामभाव से बचा कर रखती है। इस पोस्ट में मैं यह बताऊँगा कि कुंडलिनी ऐसा कैसे करती है। 

कुन्डलिनी सेक्सुअल एनर्जी को अपनी ओर आकर्षित करती है

कुन्डलिनी शरीर की एनर्जी को खींचती है। मैंने सेक्सुअल शब्द इसलिए जोड़ा क्योंकि यही एनर्जी शरीर में सर्वाधिक प्रभावशाली है। यह एक चुम्बक की तरह काम करती है। यदि आप किसी चक्र पर कुन्डलिनी का ध्यान करते हो, तो प्राण ऊर्जा खुद ही नाड़ी लूप में घूमने लग जाएगी, और कुन्डलिनी को मजबूत बनाएगी। कई लोग प्राण ऊर्जा को पहले घुमाते हैं, कई लोग कुन्डलिनी का ध्यान चक्र पर पहले करते हैं। दोनों का निष्कर्ष एक ही निकलता है।

वीर्य का तेज कुन्डलिनी को देने से कुन्डलिनी जीवंत हो जाती है

वीर्य का तेज मूलाधार चक्र में होता है। तेज का मतलब चमक व तीखापन होता है। यह बिल्कुल पारे की तरह होता है। तभी तो पारे का शिवलिंग बहुत शक्तिशाली होता है। एक पिछली पोस्ट में मैंने बताया था कि कैसे एक पारद शिवलिंग के पास ध्यान करने से मेरी कुन्डलिनी चमक गई थी।

बिंदु व बिंदु चक्र क्या है

बिंदु उसी वीर्य की बूंद को कहते हैं। बिंदु का शाब्दिक अर्थ भी बूंद ही होता है। बिंदु चक्र सहस्रार व आज्ञा चक्र के बीच में होता है, माथे के बीच से थोड़ा ऊपर पीछे तक। इसे बिंदु चक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि यह सबसे अधिक वीर्य शक्ति प्राप्त करता है। ब्राह्मण लोग यहाँ चोटी बांधते हैं।

ज्योतिर्लिंग की ज्योति शिव के बिंदु से ही है

हिंदुओं में बारह ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हैं। ये शरीर के बारह चक्रों को इंगित करते हैं। वास्तव में 12 चक्र होते हैं। आठवां बिंदु चक्र होता है। नवां, दसवां, ग्यारवां व बारवां चक्र थोड़ी-थोड़ी ऊंचाई के अंतराल पर सिर के ऊपर होते हैं। ये ज्योतिर्लिंग चक्रों की तरह देश के भिन्न-भिन्न स्थानों पर बने हैं। वास्तव में देश भी एक शरीर की तरह काम करता है। इसका पूरा विस्तार पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में है। इन स्थानों पर जो ज्योति है, वह बिंदु के तेज का प्रतीक है। वह बिंदु शिव के लिंग से उत्पन्न होता है। तभी इनका नाम ज्योतिर्लिंग है। बिंदु ने शिवलिंग को शिवचक्रों के साथ जोड़ दिया है। एक प्रकार से कह सकते हैं कि लिंग सभी चक्रों पर स्थापित हो गया है। इसे ही सर्वलिंगमय देह कहते हैं। एक सर्वलिंग स्तोत्र भी है। इसमें देश में स्थित अनगिनत प्रसिद्ध शिवलिंग स्थानों के नाम हैं। यह पूरे शरीर में बिंदु के तेज के व्याप्त होने के बारे में संकेत देता है।

चक्र कुन्डलिनी पर बिंदु तेज का आरोपण सांस रोककर नहीं करना चाहिए

बिंदु तेज के ध्यान के समय साँसें बहुत तेजी से चलने लगती हैं। रक्तचाप भी बढ़ जाता है। उस समय सम्भवतः कोई तेज शारीरिक व मानसिक क्रियाकलाप हो रहा होता है। मानसिक क्रियाकलाप तो कुन्डलिनी की चमक के रूप में प्रत्यक्ष दिखता ही है। यह ऐसे ही है, जैसे बिंदुपात के समय होता है। दिल की धड़कन भी उस समय बढ़ जाती है। यह अभ्यास साँस रोककर नहीँ करना चाहिए। साँस रोकने से हृदय को क्षति पहुंच सकती है। यह ऐसे ही है जैसे कोई बिंदुपात के समय सांस रोकने का प्रयास करे। इससे दम घुटने का और भारी थकान का अनुभव होता है। इसलिए साँस रोककर किसी चक्र पर कुन्डलिनी ध्यान करने के बाद जब सांस सामान्य हो जाए, तभी रिलैक्स होकर चक्र कुन्डलिनी पर बिंदु तेज के आरोपण का ध्यान कर सकते हैं। दिल के रोगी, श्वास रोगी, उच्च रक्तचाप के रोगी भी इस अभ्यास को न करें। यदि करें, तो कम करें, सावधानी व सलाह से करें। कुन्डलिनी चिंतन का सबसे सरल और सुरक्षित तरीका अद्वैत का चिंतन ही है।

बिंदु कुन्डलिनी-रूप ही है

बिंदु और मन आपस में जुड़े होते हैं। दोनों का स्वभाव चमकदार और शक्तिरूप है। तभी तो जब बिंदु क्रियाशील होता है, तब मन में सुंदर और चमकदार विचार आते हैं। इसी बिंदु-क्रियाशीलता के लिए ही प्राणी प्रजनन की ओर आकर्षित होते हैं। कुन्डलिनी भी उसी मन का प्रमुख हिस्सा है। इसलिए वह भी बिंदु से शक्ति प्राप्त करती है। वास्तव में मन का सर्वोच्च शिखर कुंडलिनी जागरण ही है। इसीलिए संक्षेप में कहा जाता है कि जीव कुंडलिनी जागरण के लिए ही सभी क्रियाकलाप, मुख्य रूप से कामदेव संबंधी क्रियाकलाप करता है। कुंडलिनी एक मानसिक चित्र है, जो एकप्रकार से पूरे मन का प्रतिनिधि या सैम्पल पीस है। एक मानसिक चित्र का मतलब यह नहीं कि वह एक स्थिर चित्र ही है। यदि शिव के रूप का मानसिक चित्र है, तो वह पार्वती के साथ भी घूम सकता है, तांडव नृत्य भी कर सकता है, श्मशान में साधना भी कर सकता है, और अन्य जो कुछ भी। इसे प्रतिनिधि इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि इसको वश में करने से पूरा मन वश में हो जाता है, और इसको पूरी तरह हासिल करने से पूरा मन या यूँ कहो कि सबकुछ हासिल हो जाता है। मन में ही सबकुछ है। इसको पूरी तरह हासिल करने से सब कुछ हासिल हो जाता है। कुंडलिनी जागरण या इसे पूर्ण समाधि कह लो, यही कुंडलिनी या मन का पूरी तरह से हासिल होना है। इतनी सुंदर, व्यावहारिक, वैज्ञानिक और अनुभवात्मक परिभाषा आपको कुन्डलिनी की कहीं नहीं मिलेगी। चाहे आप किसी भी पुस्तक में या अन्य प्लेटफार्म पर ढूँढ लो। मुझे भी नहीं मिली थी। इसलिए मैं अंदाजा लगाकर ही कुन्डलिनी साधना करता रहा। जब कुन्डलिनी जागरण हुआ, तब पता चला। पतंजलि के ध्यान और समाधि के बारे में पता था, उसीको लेकर अभ्यास किया। पर कुन्डलिनी के बारे में कहीं नहीं मिला। इसको रहस्य बना कर रखा हुआ था, और इसके बारे में जितने मुंह, उतनी बातें। तब पता चला कि कुन्डलिनी जागरण और पूर्ण समाधि एक ही चीज है। पतंजलि ने जो किसी देवता या गुरु के चित्र या किसी भी प्रिय वस्तु के चित्र का मन में ध्यान करने को कहा है, वह कुंडलिनी ही है।  पुराने जमाने में तो इसे रहस्य बना कर रखने की प्रथा थी, ताकि इसका दुरुपयोग न हो। आज तो मुक्त समाज है। इसी से इस समर्पित कुन्डलिनी वैबसाइट को बनाने की प्रेरणा मिली। इससे जाहिर होता है कि किस हद तक भ्रम विद्यमान है, जैसा पहले मुझे भी था।

चक्रों पर लिंग की अनुभूति

यह अनुभूति तब होती है जब आदमी ने काफी व भारी परिश्रम किया हो, और उसने पेट से योग वाली साँसें काफी ली हों। केवल पेट से साँसें लेने से ही सबकुछ नहीं हो जाता। उसके साथ यह भी ध्यान करना पड़ता है कि साँस भरते समय अंदर जाती हवा के साथ प्राण नीचे जा रहा है, और पेट के आगे की तरफ फूलने से पिछले नाभि चक्र पर जो गड्ढा बनता है, वह अपान को नीचे से ऊपर खींच रहा है। इससे मणिपुर चक्र पर प्राण और अपान आपस में टकराते हैं, और सिकुड़न के साथ संवेदना पैदा करते हैं। प्राण-अपान की टक्कर के बारे में मैंने पिछली एक पोस्ट में बताया है। बाहर जाती हुई साँसों पर ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे प्राण-अपान की टक्कर कमजोर पड़ती है। वह संवेदना और सिकुड़न फिर पीठ से मस्तिष्क तक चढ़ती हुई सभी चक्रों को तरोताजा करती है। वह फिर आगे से नीचे उतरकर आगे के चक्रों, विशेषकर नीचे वाले चक्रों को तरोताजा करती है। इससे ताजगी के अहसास के साथ एक गहरी साँस अंदर जाती है, और फिर साँसें शांत हो जाती हैं। खाली धौंकनी की तरह साँसें भरेंगे, तो इससे तो थकान ही बढ़ेगी। बेशक फायदा तो होगा, पर कम होगा। वैसे भी, परिस्थिति के अनुसार ही सांसें चलती हैं। आदमी गलती करके खुद भी अच्छा सीखता रहता है। कुछ न करने से अच्छा तो गलती करते रहो, पर गलती नुकसानदेह नहीं होनी चाहिये। पर कई बार जोर-जोर की साँसें बन्द ही न होने पर आदमी इमरजेंसी हॉस्पिटल सेक्शन में इस डर से चला जाता है कि कहीं उसके फेफड़े खराब होने से ऑक्सीजन का लेवल डाऊन तो नहीँ हो रहा। मेरे साथ भी एकबार ऐसे ही हुआ था। वास्तव में वह किसी तनाव से व धौंकनी की तरह साँस लेने से होता है। ऐसा लगता है कि साँसों से संतुष्टि ही नहीं हो रही। कहीं भी कुन्डलिनी प्रकट होने पर, यदि उसके ध्यान के साथ एनर्जी लूप का भी ध्यान करो, तो जैसे ही कुन्डलिनी, लूप में घूमने लगती है, वैसे ही लूप में एनर्जी का संचार बढ़ जाता है। एनर्जी कुन्डलिनी के साथ चलती है। वास्तव में, ज्यादातर मामलोँ में थकान के लिए ऑक्सीजन की कमी जिम्मेदार नहीं होती, बल्कि प्राण ऊर्जा का एक चक्र पर इकट्ठा होना होता है। इसे ही चक्र का ब्लॉक होना भी कहते हैं। उस प्राण ऊर्जा को लूप चैनल में चलाने के लिए एक अच्छी सी गहरी सांस भी काफी होती है। एक औऱ नई बात बताऊँ। हम अंगड़ाई प्राण ऊर्जा को रिलोकेट करने और उसे गति देने के लिए ही लेते हैं। इसीलिए अंगड़ाई लेने से थकान दूर होने का अहसास होता है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि हरेक तथ्य की गहराई में जाना चाहिए। ऊपर से ही आधी-अधूरी बात समझने से लाभ की बजाय हानि भी हो सकती है। यही इस कुन्डलिनी समर्पित वेबसाइट का मकसद है। चक्र-लिंग की अनुभूति के लिए एक शर्त यह भी है कि उसका प्रतिदिन का कुन्डलिनी योगाभ्यास अनवरत जारी रहना चाहिए। यह अनुभूति तब ज्यादा बढ़ जाती है, अगर इसके साथ आनन्दमयी रतिक्रीड़ा के साथ बिंदु संरक्षण भी हो। 4-5 दिनों के आराम के बाद ऐसा करने से इस सर्वलिंगमयी अनुभूति की संभावना ज्यादा होती है। यह चक्रों पर मुख्यतः नाभि चक्र, अनाहत चक्र व विशुद्धि चक्र पर तीखी व आनन्दमयी अनुभूति होती है। यह चक्र पर एक आनन्दमयी तेज सिकुड़न की तरह प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि जैसे चक्रों पर बिंदुपात हो रहा हो। वास्तव में चक्र कोई भौतिक संरचना नहीँ हैं। ये शरीर में वे स्थान हैं, जहां शक्ति घनीभूत हो जाती है, और एक आनन्दमयी संवेदना प्रकट करती है। आप चक्रों को शक्ति के जमावड़े अड्डे कह सकते हैं। वैसे भी, सारा खेल संवेदना का ही तो है। साधना से संवेदना को स्थानांतरित किया जा सकता है, और किसी भी चक्र पर संवेदना को पैदा किया जा सकता है।
प्राण और अपान आपस में जितनी तेजी व शक्ति से भिड़ेंगे, उनका मिश्रण उतना ही ज्यादा मजबूत होगा। जितना ज्यादा उनका परस्पर मिलन होगा, उतना ज्यादा कुंडलिनी लाभ प्राप्त होगा। प्राण सत्त्वगुण का और अपान तमोगुण का प्रतीक है। ये दोनों गुण भी इसी तरह मिश्रित होना चाहते हैं। कुछ साल पहले की बात है। मुझे कुछ वीआईपी लोगों के साथ 1-2 दिनों के लिए रहना पड़ा। मन से तो नहीँ चाहता था, क्योंकि वे ज्यादा ही खाने-पीने वाले थे। पर मजबूरी थी। हालांकि ऐसी चीजों के सीमित व नियंत्रित प्रयोग को मैं बुरा नहीं मानता। उनके खाने-पीने के दौरान मुझे उनके साथ बैठना पड़ा। वे तो अनलिमिटेड नॉनवेज खाकर और ड्रिंक करके नशे में धुत्त थे। उससे उस समय जैसे उनकी छुपी हुई तीसरी आंख खुल गई हो। वे मेरे मुंह के बारीक से बारीक भाव को भी आसानी से पढ़ रहे थे। मेरा बुझा हुआ सा मन उन्होंने पकड़ लिया। हल्की-फुल्की बातों को भी उन्होंने अपने खिलाफ समझ लिया। उस समय तो नशे में कुछ नहीं बोले, पर वे काफी समय तक मन में उसकी टीस रखते रहे। दरअसल नशे से और नॉनवेज से आदमी के अंदर बहुत ज्यादा तमोगुण छा जाता है। ऐसे में उसको बाहर से उतना ही ज्यादा सतोगुण देना पड़ता है। उससे जब तमोगुण और सतोगुण का मिलन होता है, तो वह बहुत ज्यादा आनन्द और आध्यात्मिक उन्नति अनुभव करता है, और सतोगुण प्रदान करने वाले का हमेशा के लिए मुरीद बन जाता है। यह लाभ सतोगुण वाले आदमी को भी मिलता है, क्योंकि उसे तमोगुणी से तमोगुण मिलता है। अर्थात दोनों प्रकार के लोगों से परस्पर एकदूसरे का हित स्वयं ही होता है। इसीलिए हिंदु समाज में वर्णव्यवस्था थी। वहाँ ब्राह्मण का गुण सतोगुण होता था, क्षत्रिय का रजोगुण, वैश्य का मिलाजुला और शूद्र का तमोगुण होता था। आज तो आदमी लगातार गुण बदलता रहता है। कभी सतोगुण, कभी रजोगुण और कभी तमोगुण आवश्यकतानुसार धारण कर लेता है। इसलिए हर किसी के वास्तविक गुण के बारे में संशय रहता है। इससे गुण मिलाप अच्छे से नहीं हो पाता, जिससे आध्यात्मिक उन्नति कम होती है। एक बात दिमाग में आई है। मुझे लगता है कि गुण मिलान जैसा कि हिंदू विवाह से पहले किया जाता है, यह वही बात है। यदि दोनों के गुण एक-दूसरे के साथ मिल जाते हैं, तो एक सुखद वैवाहिक जीवन का आगमन होता है, अन्यथा गुणों के टकराव के कारण वैवाहिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।  यह सतोगुण रोमांचित रह के, शालीनता दिखा के, और भी सारे दैवीय गुणों का प्रदर्शन करके प्रदान किया जा सकता है। साथ में उदारता और समर्पण का मानसिक भाव भी होना चाहिए। अहंकार व संकुचित भाव नहीं होना चाहिए। इससे तो वह उल्टा ज्यादा नाराज हो जाएगा। उसे लगेगा कि यह अपना सतोगुण अपने तक ही सीमित रखना चाहता है, मेरे तमोगुण से नहीं मिलाना चाहता। इसके विपरीत, यदि उसके सामने तमोगुण वाले भाव जैसे अवसाद, अरुचि, घृणा आदि दिखाए जाएं, तो उसका तमोगुण और ज्यादा बढ़ जाएगा। इससे वह खुद भी गंभीर अवसाद में जा सकता है। उनके साथ अन्य लोग जो खा-पी कर भी झूठमूठ में ही उनके सामने सतोगुण की एक्टिंग कर रहे थे और उन्हें बढ़िया से मक्खन लगा रहे थे, उनकी बल्ले-बल्ले। ऐसा मेरे साथ कॉलेज में भी कई बार होता था। इससे जाहिर होता है कि दुनिया प्यार से व मिलजुलकर ही अच्छी चलती है। हिन्दू पौराणिक समुद्रमंथन इसका अच्छा उदाहरण है।

मैं कभी पुरुष भाव और महिला भाव दोनों को मन में संतुलित रखता था। तब पुरुष जगत ने मुझे प्रताड़ित किया। अंत में मैंने स्त्री भाव मन से हटा दिया, और विरोधियों को करारा जवाब दिया। नतीजा, मेरा आधा चला गया था। अधूरापन। शादी के बाद मुझे मेरा वो खोया हुआ आधा मिल गया। मैं खुश हूं। चिंता मत करो। आप अकेले पूर्ण हो सकते हैं, या दूसरों की मदद ले सकते हैं। चुनना आपको है। एक ही बात है। हालांकि गुणवत्ता साझाकरण पहली नज़र में अधिक कुशल तरीका प्रतीत होता है।

कुन्डलिनी सर्वोत्तम गुरु है, जो योग में दिशानिर्देशन करती है

मुझे कुम्भक प्राणायाम का किताबी ज्ञान कभी समझ नहीं आया। मुझे तो यह भी ढंग से पता नहीँ था कि सांस रोकने को कुम्भक कहते हैं। कुन्डलिनी ने ही मुझे चक्रों पर सांस रोकने के लिए बाध्य किया, क्योंकि उससे वह बहुत तेजी से चमकती थी। आनन्द छा जाता था। मन हल्का और साफ हो जाता था। मैंने एक पिछली पोस्ट में इसका वर्णन किया है, जहां मैं इसे साँस रोककर प्राण और अपान की टक्कर का नाम दे रहा हूँ। हो सकता है कि उस टक्कर का भी कोई लिटेरल नाम हो। बोलने का मतलब है कि खुद अपने हिसाब से करना चाहिए। फिर जब मैंने कुम्भक नाम को गूगल पर सर्च किया तो पहले ही सर्च पेज पर किताबी ज्ञान तो बहुत मिला, पर किसीका अपना व्यावहारिक अनुभव नहीं था। उदाहरण के लिए वहां लिखा था कि साँसों को झटके से नहीं छोड़ना चाहिए। मैंने तो ऐसा कभी नहीं सोचा। हम क्या दौड़ लगाते हुए साँसों को झटके से नहीं छोड़ते। फेफड़े इतने नाजुक भी नहीं होते। किताबी ज्ञान में कई बातें होती हैं, जिनसे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। यदि झटकों के डर से कोई कुम्भक ढंग से नहीं कर पाया, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसी तरह, मैं ध्यान लगाते समय जरूरत के हिसाब से हिलता डुलता भी हूँ, ताकि बैठने में आसानी हो और कुंडलिनी पर अच्छे से ध्यान लग सके। किताबी ज्ञान में तो खम्भे की तरह बिल्कुल स्थिर रहने को कहा है। हो सकता है कि कोई स्थिर न रह पाने की वजह से ध्यान ही न लगा पाता हो, यह सोचकर कि स्थिरता के बिना ध्यान हो ही नहीं सकता। ऐसी कई बातें हैं, जिनसे भ्रम पैदा हो सकता है। इसलिए पूरा और स्पष्ट लिखना या कहना जरूरी है। योग के मामले में लचीलापन होना जरूरी है। फिर भी अध्ययन से लाभ तो मिलता ही है, चाहे वह किसी भी गुणवत्ता का हो। कुछ न होने से कुछ होना बेहतर है। आज मैंने इसी सतही ज्ञान को पढ़कर योग करते हुए साँस को धीमा व गहरा किया तो बहुत लाभ मिला, बेशक समय कुछ ज्यादा लगा। निष्कर्ष यह निकलता है कि कुन्डलिनी अपने हिसाब से खुद योग सिखाती रहती है। पढ़ने को भी वही प्रेरित करती है। इसलिए यदि कुन्डलिनी का सही मतलब पता चल जाए तो आधे से अधिक योग का सफर तय हो जाता है। यही इस वेबसाइट का मूल उद्देश्य है।

कुंडलिनी साधना के लिए सन्ध्या या संगम का महत्त्व

करोल पर्वत

रति दक्ष की पुत्री और ब्रह्मा की पौत्री है

मित्रों, पिछली पोस्ट कुछ छोटी थी, इस बार लॉन्गरीड आर्टिकल पढ़ने के लिए तैयार हो जाइए। पिछली पोस्ट में मैंने रति को ब्रह्मा की पुत्री कहा था। वास्तव में वह दक्ष की पुत्री है। बात एक ही है, क्योंकि दक्ष ब्रह्मा का मानस पुत्र है। दक्ष का मतलब होता है निपुण। जब आदमी अपने मन में दुनियादारी में निपुणता अर्थात कर्मयोग का संकल्प लेकर उसे अपनाता है, तो उसके मन में एक कुंडलिनी पैदा हो जाती है। यही दक्ष के पसीने से अर्थात कर्मयोग से रति अर्थात कुंडलिनी का जन्म है। यही मैंने पिछली पोस्ट में भी लिखा है कि कुंडलिनी को पहले कर्मयोग से पैदा करके विकसित करना पड़ता है, तब जाकर ही इसका समर्पित तंत्रयोग के साथ सफलतापूर्वक गठजोड़ बनाया जा सकता है।

धर्म विवेक बुद्धि का प्रतीक है

कथा के अनुसार धर्म ने ब्रह्मा को संध्या के प्रति  कामवासना से रोकना चाहा, पर वे नहीं रुके। तब धर्म ने शिव से ब्रह्मा को रोकने के लिए गुहार लगाई। धर्म या विवेक या बुद्धि भी ब्रह्मा का मानस पुत्र ही है। है तो यह भी विचार रूप ही, बेशक बुद्धि को मन से बड़ा कहा जाता हो। यह वास्तव में अच्छे और बुरे का ज्ञान है। पर कामवासनाओं से पीड़ित आदमी अक्सर इसकी बात नहीं सुनता। जब धर्म यह देखता है कि उससे बात नहीं बन रही, तब वह कुंडलिनी रूप शिव को याद करता है। वह उसी समय प्रकट होकर आदमी को गलत काम करने से रोकता है। तभी तो कहते हैं कि ईश्वर या कुंडलिनी बुद्धि से भी परे है। जहाँ बुद्धि या दिमाग भी हार जाता है, वहाँ कुंडलिनी को याद करके लाभ मिलता है। यदि प्रतिदिन के योगाभ्यास से हमेशा ही कुंडलिनी को याद रखा जाए, तब तो कहने ही क्या।

संध्या काल अद्वैत का प्रतीक है

संध्या स्त्री संध्या काल (डस्क और डान) का ही रूपक है, इसकी ओर इशारा वहीँ एक श्लोक से किया गया है, जिसमें लिखा गया है कि कामदेव रति के साथ ऐसे सुशोभित हो रहा था, जैसे संध्या काल में बादल के साथ चमकती बिजली। संध्या शब्द संस्कृत के संधि शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है, जोड़। संध्या में सभी विपरीत भाव जुड़े होते हैं। इस तरह से संध्या ईश्वर या अद्वैत के समतुल्य है। संध्या के समय दिन-रात के संतुलित होने से आदमी भी संतुलित हो जाता है। दरअसल संध्याकाल में दिन और रात के अंश बराबर होते हैं। संध्याकाल में आदमी का बायाँ व दायाँ मस्तिष्क समान चलने लगते हैं। उसके यिन और यांग बराबर हो जाते हैं। उसके दोनों नथुनों से बराबर साँस चलने लगती है। पिछली पोस्ट में जो मैंने प्राण और अपान को जोड़ने की योग तकनीक का वर्णन किया था, वह भी संध्या के तुल्य ही है। दरअसल जहाँ भी दो परस्पर विपरीत भाव आपस में जुड़ते हैं, वहाँ संध्या बन जाता है। उस शांत स्थिति में सभी काम विशेषकर आध्यात्मिक काम ज्यादा सफल होते हैं। संध्याकाल पूजापाठ से इतना ज्यादा जुड़ा है कि पूजा करने को संध्या करना ही कहा जाता है। इसी तरह ग्रहण काल भी एक संध्या काल है। उसमें किए काम कई गुना फल देते हैं। इसलिए कहते हैं कि ग्रहण काल में अच्छे व आध्यात्मिक काम ही करने चाहिए। पुराने समय में राजा लोग एकदम से राज्य छोड़कर तप के लिए वन चले जाया करते थे। वनवास का कुछ दिनों का शुरुआती समय भी उनके लिए महान संध्या काल की तरह होता था। उस समय वे कुंडलिनी साधना करके शीघ्रता से अपनी कुंडलिनी को जगा दिया करते थे। इसी तरह योगसाधना से बने प्रकाशमान चित्त में जो तांत्रिकों के द्वारा पंचमकारों से उत्पन्न अंधकार प्रविष्ट कराया जाता है, उससे भी उत्तम कोटि का बनावटी संध्या काल बनता है। उसमें वे बहुत सी सिद्धियां प्राप्त करते हैं, कुंडलिनी जागरण भी जिनमें एक है। इलाहाबाद के संगम में गंगा और यमुना नदियां मिलती हैं। ये दोनों नदियां परस्पर विपरीत गुणों वाली हैं। इससे बहुत अच्छा संध्या स्थान बनता है। इसिलए संगम को बहुत पवित्र माना जाता है। योगी लोग योग साधना के लिए गहन पहाड़ों व वनों में इसीलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ उन्हें संगम का आभास होता है। कई धर्मों में कन्या को इसीलिए पूजा जाता है क्योंकि कन्या में स्त्री और पुरुष दोनों का संगम होता है।

सांयकालीन संध्या के समय भ्रमण से आनन्द तो मिलता है, पर कुंडलिनी विकास केवल योगी का ही होता है

आदमी के सौंदर्य में वृद्धि हो जाने के कारण वह संध्या काल में आसानी से काम का शिकार बन सकता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि यौन प्रेमी के मन में अपने यौन साथी के रूप की कुंडलिनी बसी होती है। संध्या के समय वह प्रबल रूप में चमकने लगती है। उस समय यदि ऐसा व्यक्ति आचारहीन लोगों की संगति में हो, तो वह यौन कुंडलिनी से प्रेरित कामवासना के प्रभाव में आकर गलत कदम उठा सकता है। उससे उसके मन की कुंडलिनी को भी भारी क्षति पहुंच सकती है। परंतु यदि वह सदाचारी मित्रों व लोगों की संगति में हो, तो उनके प्रभाव में रहते हुए वह गलत कदम उठा ही नहीं पाता। वह कुंडलिनी को वश में कर लेता है, कुंडलिनी के वश में नहीं होता। इससे उसकी कुंडलिनी उत्तरोत्तर वृद्धि करती हुई उसे कुंडलिनी जागरण या सीधे ही आत्मज्ञान तक ले जाती है। इसीलिए संध्या के समय में आध्यात्मिक माहौल में रहने के लिए कहा जाता है। वैसे भी लोग संध्या के समय मॉल पर टहलने निकलते हैं। इधर-उधर के फालतू विचार उमड़ने से आनन्द तो मिलता है, पर उससे सांसारिक द्वैत रूप भ्रम में ही वृद्धि होती है। योगी लोग ऐसे समय में आसानी से पहचाने जा सकते हैं। उनके चेहरे पर कुंडलिनी के प्रभाव से विशेष चमक और शान्ति झलकती है। संध्या के समय मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों के बराबर व दक्षता से चलने से मानसिक शक्ति चरम पर होती है।

संध्या कालीन काम से यदि आम आदमी भ्रम में पड़ता है, तो तंत्रयोगी कुंडलिनी को मजबूत करता है

वास्तव में ब्रह्मा एक आम आदमी ही है। हरेक चीज की उत्पत्ति आदमी के मन में ही होती है। बाहर कुछ नहीं है। ये पर्वत,महासागर, चाँद, सितारे, सब मन की ही उपज हैं। इसी तरह संध्या का समय भी मन में ही बना। संध्या के समय कामभावना जागृत होने का मतलब है, संध्या के ऊपर आसक्त होना। संध्या ने बाद में लज्जा महसूस करते हुए तप करते हुए देहत्याग का विचार किया। इसका मतलब है कि वह अपने असली पवित्र काल के रूप को खोने जा रही थी। फिर ब्रह्मा, शिव आदि देवताओं ने उसकी शादी आध्यात्मिक ऋषि वसिष्ठ से करवा दी। मतलब कि संध्या काल फिर से आध्यात्मिक काम के लिए निर्धारित हो गया। तांत्रिक क्रियाएं इसमें अपवाद हैं। बेशक वे बाहर से भौतिक व सकाम लगें, पर अंदर से वे आध्यात्मिक ही होती हैं। इसीलिए तांत्रिक क्रियाएं भी ज्यादातर संध्या काल में ही की जाती हैं। कामदेव को ब्रह्मा ने भस्म होकर नष्ट हो जाने का श्राप दिया, क्योंकि उसने संध्या काल में ऋषियों और देवताओं को परेशान किया था। तो यह आम आदमी के लिए डर वाली बात है, क्योंकि वे काम के सहारे ही तो जीते हैं। वैसे भी, पूरे दिनभर के कामकाज से आदमी सन्ध्या के समय थका हुआ सा रहता है। इसी तरह सुबह उठकर नींद से पैदा हुई सुस्ती जैसी रहती है। यही संध्या को मिला शिव का वरदान है कि उसे काम परेशान नहीं करेगा। मतलब कि उस समय उनकी भौतिक कामनाएं व यौन कामनाएं नष्ट जैसी हो जाती हैं। एकप्रकार से काम थका हुआ सा होता है, पूरा नष्ट नहीं हुआ होता है। काम का पूर्ण नाश तो तंत्रयोगी ही कर पाते हैं। इसलिए तंत्रयोगियों के लिए यह काल वरदान है, क्योंकि वे अन्ततः काम को नष्ट करके ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। वे अपनी तन्त्र विद्या से पहले काम को पैदा करते हैं, फिर उससे मजबूत बनी कुंडलिनी से उसी काम को नष्ट कर देते हैं। वे काम की शक्ति अपनी कुंडलिनी को देते हैं। आम आदमी काम से उत्पन्न शक्ति को कुंडलिनी में रूपांतरित करने की तकनीक नहीं जानते, इसलिए वह शक्ति रंग-बिरंगे विचारों से भ्रम पैदा करती है। दूसरा अर्थ इससे यह निकलता है कि शिव वरदान के रूप में अपने आप को ही दे देते हैं। शिव मस्त मलंग और शून्य रूप हैं, उनके पास अपने सिवाय देने को है ही क्या। पर जब शिव मिल जाते हैं, तो सबकुछ खुद ही मिल जाता है। शिव कुंडलिनी रूप रति के रूप में हैं। इसलिए कुंडलिनी योग से काम खुद ही नष्ट हो जाता है।

कुंडलिनी काम से शक्ति लेकर अंत में काम को ही नष्ट कर देती है, फिर काम को पुनर्जीवित भी कर देती है

अब काम को ही देख लो। वह रति के प्रति इतना मोहित हो गया कि उसे अपने प्रति ब्रह्मा द्वारा दिए गए श्राप की सुध भी नहीं रही, और वह देवताओं के उकसावे में आकर रति से विवाह करने को राजी हो गया। यह उसके भस्म होने की शुरुआत थी, क्योंकि अंततः रति रूपी कुंडलिनी ने काम को नष्ट तो करना ही है। अब कुंडलिनी को ही शिव नाम दिया गया हो, तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि शिव और शक्ति तत्त्वतः एक ही हैं। शिव ने काम को भस्म किया, मतलब कुंडलिनी ने काम को भस्म किया। अब यदि कोई कहे कि यह कैसे हो सकता है कि रति भी कुंडलिनी है और शिव भी कुंडलिनी है। तो इसका स्पष्टीकरण यह है कि रति दरअसल मन का भाव है, पर शिव वास्तविकता है। वैसे तो दोनों ही मन के भाव हो सकते हैं, पर मैं इन दोनों की आपसी सापेक्षता के हिसाब से बात कर रहा हूँ। मतलब कि सापेक्ष रूप से शिव रति की अपेक्षा ज्यादा वास्तविक है। इसी तरह रति शिव की अपेक्षा ज्यादा भावप्रधान है। यदि शिव मंदिर में रखी मूर्ति के रूप में हैं, तो रति मन में लग रहे उनके ध्यान के रूप में। रति मतलब लगाव। अब शिवपुराण में शिव से ही लगाव होगा, किसी अन्य देवता से नहीं। शिवपुराण में हर जगह शिव का ही ध्यान करने की सलाह दी गई है। इसी तरह  जब शिव-शक्ति का विवाह मतलब कुंडलिनी जागरण होता है, तब काम को पुनः जीवित हो जाने का वरदान मिला है। इसका मतलब है कि जागृति के बाद फिर से आदमी दुनिया में रम जाता है, हालाँकि ज्ञान व अनासक्ति के साथ। जागरण के बाद आदमी को कुछ पाने की चिंता तो होती नहीं, इसलिए वह खुलकर जीना शुरु करता है।

कामदेव के पुष्पबाण आदमी को प्यार-प्यार में ही घायल कर देते हैं

इस कथानक में यह वृत्तान्त रोचक है कि ब्रह्मदेव के मन से उत्पन्न कामदेव के पास पाँच फूलों के बाण या अस्त्र थे। ब्रह्मा या ब्रह्मदेव यहाँ सभी लोगों या जीवों के सामूहिक रूप का पर्याय है, और कामदेव सभी जीवों की सामूहिक कामवासनाओं का पर्याय है। तभी काम और ब्रह्मा के साथ देव शब्द लगा है। यदि एक आदमी की कामवासना की बात होती, तो सिर्फ काम ही कहते। इस तरह से तत्त्वतः तो काम और कामदेव एक ही हैं। कामदेव के ये पाँच बाण हैं, हर्षन मतलब खुश करना, रोचन मतलब पसंद करवाना, मोहन मतलब मोहित करवाना या एक के ही चक्कर में पागल बनवाना, शोषण मतलब शक्ति को सोखना, और मारण मतलब मरवाना। अब यह हैरानी की बात है कि अंतिम तीनों जानलेवा हथियार भी फूलों के ही हैं। तभी तो इन हथियारों से घायल आदमी प्यार-प्यार में ही बहुत कुछ गवां देता है, और उसे इसका आभास तक नहीँ होता।  इससे प्राचीन ऋषियों की व्यावहारिकता, दूरदर्शिता और सूक्ष्मदर्शिता का पता चलता है। इतने अच्छे रूपक बनाने वाले कोई वनवासी नहीँ हो सकते, जैसी कि आम भ्रांत धारणा है। वे दुनियादारी में सबसे ज्यादा कढ़े हुए और गढ़े हुए होते थे।

काम के साथ भावनाओं का अंबार भी चलता है, जिससे आदमी आनंदमयी मस्ती में डूबा रहता है

फिर लिखा है कि जैसे ही ब्रह्मा ने उत्तेजित होकर कामभाव से संध्या की तरफ देखा, वैसे ही उनके शरीर से उन्चास भाव पैदा हो गए। आम आदमी के साथ भी तो ऐसा ही होता है। कामोत्तेजित होने के बाद वह रंग-बिरंगे भाव दिखाने लगता है। वह यारों का यार, बापों का बाप, पुत्रों का पुत्र और पता नहीं क्या-क्या बनने लगता है। वह चारों ओर छा जाता है। ऐसे कौन से भाव हैं, जो उसके अंदर पैदा नहीं होते। मातृ भाव, भगिनी भाव, गुरु भाव, बुजुर्ग भाव, बाल भाव, नवयुवक भाव, पशु-पक्षी भाव, वृक्ष-लता भाव, पर्वत भाव आदि-आदि। ये भाव संध्या के समय ज्यादा उमड़ते हैं, क्योंकि उस समय मन में शांति छाई होती है। भावों में तो बुराई नहीं है, पर आसक्ति में बुराई है। जिस घर में संध्या योग होता है, वहाँ ये कामजनित भाव कुंडलिनी के साथ मिश्रित होकर आसक्ति और दुर्भावना को नष्ट कर देते हैं। केवल शुद्ध प्रेम बचा रहता है। कुंडलिनी और प्रेमभाव एकदूसरे को उत्तरोत्तर बढ़ाते रहते हैं। इसलिए प्रेम करने में बुराई नहीँ है, यदि उसे शुद्ध और आध्यात्मिक बनाया रखा जाए। बल्कि वह प्रेम तो सबसे बड़ा योग है। प्रेम में दीवाना होकर आदमी भावविभोर होकर आनन्दित हो जाता है। इसे आजकल हाईपर या हॉट या रंगीन होना कहते हैं। यही तो काम का आकर्षण है। इसको बहुत सुंदर शैली में व्यवहारिकता, आधुनिकता व वैज्ञानिकता के साथ समझाया गया है, पुस्तक शरीरविज्ञान दर्शन में। बहुत सुंदर रूपक कथाएँ हैं पुराणों में। मुझे लगता है कि कथा सुनाते समय मूल कथा के साथ उसमें दिए गए रूपक के रहस्य को भी डिकोड करके सुनाना चाहिए। इससे श्रोताओं को अधिक लाभ मिलेगा।

संध्या के द्वारा शिव से मांगे गए वरदान काम भाव से बचाव के लिए थे, शुद्ध प्रेमभाव से बचाव के लिए नहीं

ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई लोग काम के डर से संध्या के समय आपस में बातें भी नहीँ करते। सन्ध्या के द्वारा लज्जित होकर तप करने का अर्थ है, लंबे समय तक आध्यात्मिक लोगों द्वारा संध्या के समय आध्यात्मिक साधनाएं करना। इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि उन लोगों ने काम को अपनाया था, शुद्ध प्रेम को नहीं। शुद्ध प्रेम तो अपने आप में तप ही है। संध्या के द्वारा तीन वरदान मांगे गए, जो शिव के द्वारा पूरे किए गए। पहले वरदान, पैदा होते ही किसी जीव में कामवासना पैदा न होने का अर्थ है कि जिस घर मे संध्या वंदन होता है, उस घर मे पैदा हुए बच्चों में उच्च कोटि के आध्यात्मिक संस्कार होते हैं। उनमें जन्म से ही अपने आप ही कुंडलिनी बनी होती है। वह कुंडलिनी उन्हें कामवासना से बचा कर रखती है। या यूँ कहो कि उनकी कुंडलिनी कामभाव को प्रेमभाव में रूपांतरित करती रहती है। दरअसल संध्या के पैदा होते ही कामदेव के प्रभाव से उसपर ब्रह्मा और उनके पुत्र आसक्त हो गए थे। संध्या का समय बहुत छोटा होता है। इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। यह दो प्रकार के विपरीत समयों के संयोग से बनता है। इसलिए इसके बड़े और जवान होने का प्रश्न ही नहीं होता, क्योंकि यह पैदा होते ही विलीन होने लगता है। दूसरा वरदान कि मेरे कुल में कोई भी कामासक्त न होए, इसका भी यही अर्थ है कि बेशक संध्या वंदन करने वाले लोगों के घरों के सदस्य किसी कारणवश कामभाव का प्रदर्शन करें, पर वे कामासक्त नहीँ होते, मतलब कामदेव के प्रभाव में आकर किसीके ऊपर लट्टू नहीँ हो जाते। तीसरा वरदान कि मेरे कुल की सभी स्त्रियां पतिव्रता होएं, इसका अर्थ है कि जो लोग संध्यावंदन करते हैं, उनकी कुंडलिनी बहुत विकसित और मजबूत होती है। इसी कुंडलिनी के कारण ही वे अपनी पत्नियों को पूर्ण संतुष्ट रख पाते हैं। यह तो वैज्ञानिक व तांत्रिक रूप से सत्य है कि यौन संतुष्टि और यौन क्रीड़ाओं पर पूरा नियंत्रण कुंडलिनी से ही प्राप्त होता है। एक वरदान शिव ने संध्या को यह भी दिया कि जो उसकी ओर काम भाव से देखेगा, वह नपुंसक हो जाएगा और उसकी शक्ति नष्ट हो जाएगी। इसका भी यही तात्पर्य है कि जो सन्ध्या के समय भोगों को आसक्ति से या उन्हें कुंडलिनी के बिना भोगेगा, वह मोहमाया के भ्रम में पड़कर अपनी आत्मा के अंधकार को बढ़ाएगा। कुंडलिनी के प्रति रति ही कामभाव या आसक्ति भाव को नियंत्रण में रखती है। सन्ध्या शब्द यहाँ ऐसे सभी समयों के लिए इंगित किया हुआ प्रतीत होता है, जिस समय आदमी सन्तुलित होता है, उसकी इड़ा और पिंगला नाड़ी बराबर चलती है, मन की कुंडलिनी मजबूत होती है, और मन में गहरी शांति छाई होती है। 

प्रेम और काम एकदूसरे को बढ़ाते रहते हैं

हर जगह प्रेम करते रहने से काम भाव में वृद्धि होती है। वह काम भाव जीवनसाथी के साथ मिलकर परिपक्व होकर प्रेम को और अधिक बढ़ाता है। तंत्रयोगी उस कामजनित प्रेम को कुंडलिनी प्रेम में रूपांतरित करते रहते हैं। तंत्रयोगी का केवल एक ही जीवनसाथी या यौनसाथी इसलिए होता है, ताकि कामजनित प्रेम उसकी कुंडलिनी को आसानी से हासिल होता रहे। अय्याश किस्म के आदमी का कामजनित प्रेम बहुत से यौनसाथियों में विभक्त हो जाता है, जिससे वह कुंडलिनी को नहीँ मिल पाता। इसीलिए कहते हैं कि एकपत्नीव्रत सबसे बड़ा व्रत है।इसके अलावा, यह यौन ऊर्जा है जिसकी कुंडलिनी के लिए जरूरत पड़ती है, न कि शारीरिक आकर्षण। बल्कि अतिरिक्त शारीरिक आकर्षण तो व्यक्ति को ऊर्जा के वास्तविक स्रोत से विचलित कर सकता है।

कुंडलिनी ही आदमी की असली सेवियर या रक्षक है

शिव के द्वारा संध्या के ऊपर कामासक्त ब्रह्मा को रोकने का अर्थ है कि आदमी को उस समय कुंडलिनी बचा लेती है। शिव यहाँ कुंडलिनी का प्रतीक है। वैसे भी कुंडलिनी आदमी को बुरे काम करने से रोकती ही है। यदि अनजाने या बहुत मजबूरी में कभी गलत काम हो भी जाए, तो कुंडलिनी उसका प्रायश्चित या पश्चाताप भी करवाती है। शिवपुराण में सभी के लिए शिव का ध्यान करना जरूरी बताया गया है। तो स्वाभाविक है कि ब्रह्मा भी शिव का ध्यान करते थे। इससे शिव उनकी कुंडलिनी बन गए, और कुंडलिनी रूप में वे ही ब्रह्मा को गलत काम से रोकने के लिए प्रकट हुए।

शिवपुराण एक तन्त्र पुराण ही है

शिवपुराण में सभी बातें और कथाएँ तन्त्र से सम्बंधित ही हैं। यह अलग बात है कि अधिकांश लोग उन्हें समझ नहीं पाते, क्योंकि वे रूपकों के रूप में हैं। ऐसा तन्त्र के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया गया था। पुराण वेदों से निकलते हैं। इसका मतलब है कि तन्त्र का प्राचीनतम मूल स्रोत वेद ही हैं। यद्यपि प्रत्यक्ष नियमावली के साथ व्यावहारिक तन्त्र बौद्धों में ही दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि हिंदुओं में तन्त्र की व्यावहारिक प्रथा लुप्त हो गई हो। अभी भी हिन्दुओं में यह प्रचलित है, पर इसे बहुत गुप्त रखा जाता है, जिससे आम लोगों को इसका पता ही नहीं चलता। बौद्धों में भी इसे छिपा कर रखा जाता था। पर आज के इस मरते ग्रह को देखकर कोई पुनर्जीवन देने वाली विद्या छिपाना मानवता के साथ धोखा होगा, ये बात उन्होंने समझ ली है।

उपरोक्त काम व प्रेम से सम्बंधित सिद्धांतों का अनुभवात्मक साक्ष्य

दोस्तों, मैं बहुत से लोगों से गहरा प्रेम करता था। कई। पर अपना जीवन मैंने संयमपूर्वक ही जिया। अब अपनी बड़ाई में ज्यादा भी क्या कहना, पर यदि इससे किसी को लाभ मिलता हो तो इसमें बुरा भी कुछ नहीं है। जैसा भी मैंने इस पोस्ट में बताया है, वह सब मेरे साथ घटित हुआ। यह सब मेरा अपना अनुभवात्मक वर्णन है, कोई पढ़ा-पढ़ाया नहीं। इन्हीं अनुभवों के बीच में मेरा वह क्षणिक आत्मज्ञान व कुंडलिनी जागरण भी शामिल था, जिसका वर्णन होमपेज पर है। बेशक ये कुछ क्षणों के अनुभव थे, पर कुछ न होने से कुछ तो होना बेहतर है। और वैसे भी आत्म जागृति के अनुभव से ज्यादा महत्त्व तो आत्मजागृति से भरी जीवन दिनचर्या का है।

कुंडलिनी ही रति है और कुंडलिनी के द्वारा कामवासना को शांत किया जाना ही रति-कामदेव का विवाह है

Rati-kamadeva

दोस्तों, मुझे प्रतिदिन रहस्यात्मक साहित्य पढ़ने की आदत है। इससे मेरा दायाँ मस्तिष्क क्रियाशील रहता है, क्योंकि रहस्यात्मक कथाओं में लॉजिक लगाना कठिन होता है। हमारा दायाँ मस्तिष्क भी एक सिरफिरे आदमी की तरह मस्त मलंग स्वभाव वाला होता है। हिन्दू पुराणों के कथा-कथानक भी एक पहेली की तरह होते हैं। यदि उन्हें बूझ गए, तो उससे बायाँ मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता है, और यदि नहीँ तो दायाँ मस्तिष्क। मतलब कि वे हर परिस्थिति में फायदा ही करते हैं।ऐसे ही एक कथानक के रहस्य को मैं इस हफ्ते पहचान सका हूँ। मैं प्रतिदिन शिवपुराण का केवल एक पृष्ठ पढ़ता हूँ, मूल संस्कृत में और हिंदी में। मूल संस्कृत का मजा ही कुछ और है। इस हफ्ते मुझे एक महत्त्वपूर्ण तांत्रिक रहस्य हाथ लगा है। इसे मैं यहाँ साझा कर रहा हूँ।

ब्रह्मा द्वारा कामदेव को श्राप देना व रति को उत्पन्न करके उसका विवाह कामदेव से करना

जब ब्रह्मा ने कामदेव की उत्पत्ति की, तब कामदेव को अपने ऊपर गर्व हो गया। वह अपनी शक्ति का परीक्षण ब्रह्मा पर ही करने लगा। इससे ब्रह्मा कामविह्वल होकर अपनी ही पुत्री के श्रृंगार का गुणगान करते हुए उस पर आसक्त हो गए। दरअसल ब्रह्मा द्वारा रचित यह सुंदर सृष्टि ही उसकी वह पुत्री है। कामदेव यहाँ भोगेच्छा का प्रतीक भी है। फिर शिव ने उन्हें रोका। जब उन्हें कामदेव की हरकत का बोध हुआ तो उसे यह कह कर श्राप दे दिया कि यदि उसे अपनी शक्ति का परीक्षण ही करना था तो उनकी पुत्री के सामने ही क्यों किया। वह श्राप था कामदेव का शिवजी के द्वारा भस्म किए जाने का। भगवान शिव तंत्रयोग के सर्वोच्च शिरोमणि हैं, उनके आगे काम भस्मीभूत ही है। फिर ब्रह्मा ने अपने शरीर के पसीने से अपनी रति नाम की एक अन्य पुत्री को उत्पन्न किया। वह सृष्टि में सबसे सुंदर थी। उसका विवाह ब्रह्मा ने कामदेव के साथ कर दिया। कामदेव तो उसके सौंदर्य को देखकर अपनी मोहिनी विद्या को जैसे भूल ही गया।

कामदेव मनुष्य के मन की वासना है और रति कुंडलिनी है

शास्त्रों में भी आता है कि यहाँ तक कि अपनी बेटी और बहन से भी नितांत अकेले में नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि यह काम बहुत प्रबल है। तो इसमें आश्चर्य नहीँ कि ब्रह्मा अपनी पुत्री पर आसक्त हो गए थे। उस काम को वश में करने के लिए उन्होंने कठिन योगाभ्यास किया। उनके पसीने की बूंदें इसी अथक कुंडलिनी-योगाभ्यास की प्रतीक हैं। उसी अथक कुंडलिनी योग से जो कुंडलिनी क्रियाशील या जागृत हुई, वही रति नाम से कही जा रही है। कुंडलिनी को रति नाम इसलिए दिया गया है, क्योंकि यह योग में निरंतर रत रहने से ही मिलती है। रत शब्द एक प्रमुख आध्यात्मिक शब्द है, जैसे ध्यान रत, भक्ति रत आदि। इसका अर्थ लीन भी है। कुंडलिनी किसी के प्यार में या ध्यान में लीन होकर ही मिलती है। रति क्रीड़ा नाम भी इसीसे बना है। क्योंकि कामक्रीड़ा से मन और उसका सबसे प्रिय अंश कुंडलिनी, दोनों प्रफुल्लित होते हैं, इसीलिए कुंडलिनी को रति नाम दिया गया है। यह रूपक के रूप में समझाया गया है, क्योंकि पुराने जमाने में रहस्यात्मक विद्याओं को सीधे तौर पर सार्वजनिक नहीँ किया जाता था। इसीलिए ऐसी कई विद्याओं को गुह्य विद्या भी कहते हैं। कामदेव-रति के कथानक से इस बात का भी पता चलता है कि सृष्टि रचयिता ईश्वर कुंडलिनी योगविद्या के बल से ही अपनी सुंदर रचना के मोहक आकर्षण से अछूता बना रहता है।

कुंडलिनी ने रति के रूप में देवताओं व ऋषियों की काम वासना को अपने नियंत्रण में रखा

जब देवताओं व ऋषियों को इस रहस्य का पता चला कि कुंडलिनी से कामवासना को नियंत्रण में रखा जा सकता है, तब उन्होंने नियमित योगाभ्यास करना शुरु कर दिया। इसीलिए उन्होंने रति के रूप में कुंडलिनी को सबसे सुंदर माना है, क्योंकि कामदेव केवल सुंदर भौतिक वस्तुओं की ओर ही जीव को आकृष्ट करवाता है। रति के आगे कामदेव हार गया। इसका मतलब है कि रति या कुंडलिनी सबसे सुंदर है। वह इतनी सुंदर है कि उसके बहकावे में आकर कई लोग अच्छी खासी गृहस्थी व चमक-दमक वाली दुनिया छोड़कर संन्यासी बन जाते हैं। उसने कामदेव का धंधा ही बंद कर दिया। कामदेव का रति से विवाह करने का अर्थ है कि जैसे एक शादीशुदा आदमी एक स्त्री से बंध कर अन्य स्त्रियों पर नजरें नहीँ डालता, उसी तरह वह भी रति नामक कुंडलिनी के द्वारा बाँध दिया गया।  इस रहस्य का थोड़ा स्पष्टीकरण भी एक श्लोक के माध्यम से वहीँ पर किया गया है, जिसमें लिखा गया है कि कामदेव अपनी प्रियतमा रति को अपने हृदय में ऐसे छुपा कर रखता था, जैसे एक योगी अपनी ब्रह्मविद्या को अपने हृदय में छिपा कर रखता है। अब वास्तविक ब्रह्मविद्या कुंडलिनी ही तो है, क्योंकि वही ब्रह्म तक ले जाती है। योगी को सभी लोग भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में देखते हैं, कभी ख़ुशी में, कभी गम में, कभी अवसाद में, तो कभी प्रफुल्लित अवस्था में। पर वे लोग उसके मन की उस कुँडलिनी को पहचान ही नहीं पाते, जो उसकी इन सभी अवस्थाओं में एक जैसी ही बनी रहती है। इसी तरह रति से विवाहित कामदेव के साथ हमेशा रति बनी रहती है। रति से काम के विवाह का यह मतलब भी है कि एकपत्नीव्रत के साथ सामाजिक पत्नी के साथ तांत्रिक योगाभ्यास करना। तन्त्रयोग साहित्य के अनुसार भी कई वर्षों तक केवल कर्मयोग व साधारण कुंडलिनी योग का अभ्यास करना पड़ता है। उस दौरान रति नामक कुंडलिनी का जन्म होता है, वह बढ़ती है, और यौनावस्था में पहुंच जाती है, मतलब बहुत मजबूत हो जाती है। फिर वह काम के साथ विवाह के योग्य हो जाती है। कुंडलिनी के काफी परिपक्व हो जाने पर ही साधारण कुंडलिनी योग को यौनयोग के साथ मिश्रित रूप में करने का विधान है। यही रति और काम का विवाह है। यदि जल्दबाजी में समयपूर्व ही काम के साथ रति का बालविवाह कर दिया जाए, तो लाभ की अपेक्षा हानि भी हो सकती है। ऐसा तंत्रशास्त्र में साफ तौर पर चेताया गया है। यदि काम-रति के दाम्पत्य युगल से युक्त व्यक्ति काम के आवेश में आ जाए, तो लोग उसे साधारण कामासक्त मान लेते हैं। वे काम के साथ खड़ी उस रति को नहीं देख पाते, जो हमेशा कल्याणकारी होती है। बहुत से तंत्रयोगी इसी कारणवश प्रताड़ित हो जाते हैं। वे भोलेपन में आकर काम-रति का प्रदर्शन करने लगते हैं, पर लोग केवल काम को ही देख पाते हैं, उसके साथ खड़ी रति नामक कुंडलिनी को नहीँ।

दरअसल काम के दायरे में सभी भोग लालसाएँ आ जाती हैं। इसलिए रति नामक कुंडलिनी सबसे विवाह करके उनसे जुड़ जाती है। काम के अर्थ में केवल यौन लालसा को इसलिए लिया जाता है, क्योंकि यह सभी भोग लालसाओं में सबसे प्रभावशाली और मुख्य है।

तंत्रयोगी रति को पैदा करने के लिए कामदेव की ही सहायता लेते हैं

इसे कहते हैं, दुश्मन को दुश्मन के ही तीर से मारना। कामदेव का तीर जगत्प्रसिद्ध है। तंत्रयोगी पंचमकारों की सहायता से अपनी कुंडलिनी को अतिरिक्त मजबूती प्रदान करते हैं। वे दरअसल कामशक्ति को कुंडलिनी शक्ति में रूपांतरित कर देते हैं। 

काम-रति विवाह की वैज्ञानिक व्याख्या

काम के आवेश में मस्तिष्क की ओर रक्त संचार बढ़ जाता है। इसीलिए मन प्रफुल्लित हो जाता है। यदि कोई आदमी कुंडलिनी योगी है, तो जाहिर है कि उसके मस्तिष्क का अधिकांश हिस्सा कुंडलिनी ने अधिगृहीत किया हुआ है। ऐसे में यदि मस्तिष्क में रक्त संचार बढ़ेगा, तो इससे सबसे ज्यादा लाभ कुंडलिनी को ही मिलेगा। क्योंकि कुंडलिनी एक प्रकार से हाई डेफिनिशन रिसोल्यूशन का एक मानसिक चित्र ही है, इसलिए वह बहुत ज्यादा प्राण ऊर्जा का उपभोग कर लेता है। इससे काम का वेग अनायास और जल्दी ही आनन्द के साथ शांत हो जाता है।

कुंडलिनी के बिना विपश्यना या साक्षीभाव साधना या संन्यास योग करना कठिन व अव्यवहारिक प्रतीत होता है

कर्मयोग

दोस्तों, आजकल मेरे मानस पटल पर गीता के बारे में नित नए रहस्य उजागर हो रहे हैं। दरअसल पूरी गीता एक कुंडलिनी शास्त्र ही है। इसे युद्ध के मैदान में सुनाया गया था, इसीलिए इसमें विस्तार न होकर प्रेक्टिकल बिंदु ही हैं। व्यावहारिकता के कारण ही इसमें एक ही बात कई बार और कई तरीकों से बताई लगती है। मेरा शरीरविज्ञान दर्शन अब मुझे पूरी तरह गीता पर आधारित लगता है। हालांकि मैंने इसे स्वतंत्र रूप से, बिना किसी की नकल किए और अपने अनुभव से बनाया था। 

कुंडलिनी ही सभी प्रकार की योग साधनाओं व सिद्धियों के मूल में स्थित है

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥५-७॥
अपने मन को वश में करने वाला, जितेन्द्रिय, विशुद्ध अन्तःकरण वाला और सभी प्राणियों को अपना आत्मरूप मानने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता है॥7॥
उपरोक्त सभी गुण अद्वैत के साथ स्वयं ही रहते हैं। अद्वैत कुंडलिनी के साथ रहता है। इसलिए इस श्लोक के मूल में कुंडलिनी ही है।

आजकल के वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण युग में हरेक आध्यात्मिक उक्ति का वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण दार्शनिक आधार होना जरूरी है

नैव किंचित्करोमीतियुक्तो मन्येत तत्त्ववित्।पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥५-८॥
तत्व को जानने वाला यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ । देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूँघते हुए, खाते हुए, चलते हुए, सोते हुए, साँस लेते हुए ॥8॥
सीधे तौर पर ऐसा मानना आसान नहीं है कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। ऐसा मानने के लिए कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक आधार तो होना ही चाहिये। ऐसा ही उत्तम आधार शरीरविज्ञान दर्शन ने प्रदान किया है। किसी दिव्य प्रेरणा से इसे बनाने की नींव मैंने तब डाली थी, जब क्षणिक व स्वप्नकालीन आत्मज्ञान के बहकावे में आकर मैं अपने काम से जी चुराने लग गया था। मैं अनायास ही संन्यास योग की तरफ बढ़ा जा रहा था। इससे मैं आसपास के संबंधित लोगों से भौतिक रूप से पिछड़ने लग गया था। इस दर्शन ने मुझे दुनियादारी की तरफ धकेला और मेरे कर्मयोग को सफल किया। इसमें वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध किया गया है कि जो कुछ भी आदमी कर रहा है, वह सब हमारे शरीर में भी वैसा ही हो रहा है। जब हमारे शरीर में रहने वाले देहपुरुष अपने को कर्ता नहीं मानते तो हम अपने को कर्ता क्यों मानें। आदमी अपने अवचेतन मन के दायरे में समझे कि उस दार्शनिक पुस्तक के सूक्ष्म रूप की वर्षा हर समय उस पर हो रही है। अवचेतन मन से मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि प्रत्यक्ष या चेतन मन तो दुनियादारी के काम में व्यस्त रहता है, उसे क्यों परेशान करना। उससे त्वरित व चमत्कारिक लाभ होते मैंने स्वयं देखा है। ऐसा चिंतन करते ही आनन्द के साथ कुंडलिनी प्रकट हो जाती है, और आदमी रिलेक्स फील करता है। इसका मतलब है कि इस श्लोक के आधार में भी कुंडलिनी ही है। इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि दरअसल आदमी के मन की कुंडलिनी ही कर्ता और भोक्ता है, आदमी खुद नहीँ। 

यदि शरीरविज्ञान दर्शन के ऐसे चिंतन से मस्तिष्क में दबाव व जड़त्व सा लगे, तो दूसरा तरीका आजमाना चाहिए। इसमें शरीरविज्ञान दर्शन की ओर जरा सा ध्यान दिया जाता है, फिर समयानुसार हरेक परिस्थिति को इसका आशीर्वाद समझ कर स्वीकार कर लेना चाहिए, और प्रसन्न रहना चाहिए।।

सांख्ययोग या संन्यास योग विपासना या विटनेसिंग के समकक्ष है और कर्मयोग कुंडलिनी योग के समकक्ष

संन्यासः कर्मयोगश्चनिःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥५-२॥

श्री कृष्ण भगवान कहते हैं- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के कराने वाले हैं, पर इन दोनों में भी कर्मयोग कर्म-संन्यास से (करने में सुगम होने के कारण) श्रेष्ठ है॥2॥
कर्मयोग व कुंडलिनी योग, दोनों में कुंडलिनी अधिक प्रभावी होती है। इसमें संसार में परिस्थितियों के अनुसार प्रवृत्त रहते हुए कुंडलिनी को ज्यादा अहमियत दी जाती है। यह श्रेष्ठ है, क्योंकि इससे दुनियादारी भी अच्छे से चलती है। बहुत से सर्वोत्तम प्रकार के राजा व प्रशासक कर्मयोगी हुए हैं। संन्यास योग में विचारों के प्रति साक्षीभाव रखकर उन्हें विलीन किया जाता है। अधिकांशतः बुद्धिस्ट लोग इसी तरीके को अपनाते हैं, इसीलिए वे दुनिया से दूर रहकर मठों आदि में अपना ज्यादातर समय बिताते हैं। कई आधुनिक लोग भी अपनी थकान मिटाने के लिए इस तरीके का अल्पकालिक प्रयोग करते हैं।

यह श्लोक अर्जुन जैसे उन लोगों को देखते हुए बना था, जो अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को छोड़कर साक्षीभाव साधना के नाम पर अकर्मक बनना चाहते थे। इस श्लोक ने ऐसे लोगों की आंख खोल दी। उन्हें इस श्लोक के माध्यम से बताया कि सबसे ज्यादा आध्यात्मिक लाभ कर्म करने से प्राप्त होता है, ज्ञानसाधना के नाम पर कर्म छोड़ने से नहीं। ज्ञानसाधना इतनी आसान नहीँ है। हर कोई बुद्ध नहीं बन सकता। यदि ज्ञानसाधना असफल हो जाए तो नरकप्राप्ति की जो बात शास्त्रों में कही गई है, वह सत्य प्रतीत होती है। वैसे तो कर्मयोग असफल नहीं होता। पर यदि किसी कुचक्र से विरले मामले में हो भी जाए तो भी कम से कम स्वर्ग मिलने की संभावना तो है ही, क्योंकि इसमें आदमी ने अच्छे कर्म किए होते हैं।

जो आध्यात्मिक लाभ विटनेसिंग साधना से प्राप्त होता है, वही कुंडलिनी साधना से भी प्राप्त होता है

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानंतद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति॥५-५॥
ज्ञानयोगियों द्वारा जो गति प्राप्त की जाती है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त की जाती है इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को (फल से) एक देखता है, वही ठीक देखता है॥5॥
इस श्लोक का मतलब है कि जो मुक्ति संन्यास योग या विपश्यना से मिलती है, वही कर्मयोग या कुंडलिनी योग से भी मिलती है। मुक्ति से यहाँ तात्पर्य बन्धनकारी विचारों से मुक्ति है। केवल यही आभासिक अंतर है कि विपश्यना या विटनेसिंग से वह मुक्ति ज्यादा प्रतीत होती है। क्योंकि विपश्यना-योगी के अंदर व बाहर, कहीं भी विचारों का तूफान नहीं होता, एक शांत झील की तरह। जबकि कर्मयोगी, समुद्र की तरह बाहर से तूफानी, पर अंदर से शांत होते हैं। यह श्लोक गीता का सर्वोत्तम श्लोक है। अध्यात्म का सम्पूर्ण रहस्य इसमें छिपा है। इसे मैंने खुद अनुभव किया है। कर्मयोग से ही मैं सांख्ययोग तक पहुंचा। यह अलग बात है कि मैं अब भी कर्मयोग को ही महत्त्व देता हूँ। साधारण लोगों को दोनों प्रकार के योग अलग-अलग दिखाई देते हैं, पर दोनों अंदर से एकसमान है, और एकसमान फल प्रदान करते हैं। कर्मयोग ज्यादा प्रभावी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो विचारों की आनन्दमयी शून्यता संन्यास योग से प्राप्त होती है, वही कर्मयोग से भी प्राप्त होती है। इन दोनों में कर्मयोग की अतिरिक्त विशेषता यह है कि बेशक इसमें अंदर से मन की आनंदमयी व कुंडलिनीमयी शून्यता हो, पर बाहर से दुनियादारी के सभी काम सर्वोत्तम ढंग से होते रहते हैं। यह समुद्र की प्रकृति से मेल खाता है, बाहर से तूफानी, जबकि अंदर से शांत।

कई लोग कर्मयोग और संन्यास योग, दोनों के मिश्रण का प्रयोग करते हैं। वे काम के मौकों पर कर्मयोग पर ज्यादा ध्यान देते हैं, और काम के अभाव में संन्यास योग पर। मैंने भी इस तरीके को आजमाया था। पर मुझे लगता है कि पूर्ण कर्मयोग ही सर्वश्रेष्ठ है। वास्तव में काम की कमी कभी हो ही नहीँ सकती।

दुनियादारी में उलझे व्यक्ति के लिए विटनेसिंग साधना के बजाय कुंडलिनी साधना करना अधिक आसान है

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्मनचिरेणाधिगच्छति॥५-६॥

परन्तु हे वीर अर्जुन! कर्मयोग के बिना (कर्म-) संन्यास कठिन है और कर्मयोग में स्थित मुनि परब्रह्म को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है॥6॥
इस श्लोक का अभिप्राय है कि जब कर्मयोग या कुंडलिनी योग से कुंडलिनी जागरण हो जाता है, तभी हम विचारों का असली संन्यास कर सकते हैं। यदि कुन्डलिनी क्रियाशील भी बनी रहे, तो भी काम चल सकता है। कुंडलिनी जागरण दुनियादारी का उच्चतम स्तर है। इससे मन दुनिया से पूरी तरह तृप्त और संतुष्ट हो जाता है। इसलिए इसके बाद विचारों का त्याग करना बहुत आसान या यूँ कह सकते हैं कि स्वचालित या स्वाभाविक ही हो जाता है। इसके बिना, मन दुनिया में ही रमा रहना चाहता है, क्योंकि उसे इसका पूर्ण रस नहीँ मिला होता है। इसीलिए तो बहुत से बौद्ध भिक्षु व अन्य धर्मों के संन्यासी दुनिया से दूर रहकर एकांत में साधना करना अधिक पसंद करते हैं। इसीसे वे अपने मन को दुनिया के प्रलोभन से बचाकर रख पाते हैं। इससे विपश्यना या विटनेसिंग या संन्यास योग या सांख्ययोग के लिए कुंडलिनी क्रियाशीलता व कुंडलिनी जागरण के महत्त्व का साफ पता चलता है। विपासना, विपश्यना, विटनेसिंग, साक्षीभाव, संन्यास योग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग, ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं

श्रीमद्भागवत गीता की विस्मयकारी व्यावहारिकता

मुझे लगता है कि गीता के आध्यात्मिक सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से अपने दैनिक जीवन में लागू किया जाना चाहिए, अन्यथा मात्र इसे पढ़ने या इसके दैनिक जप करने से कोई विशेष फायदा प्रतीत नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति कर्मयोग के रहस्य को व्यावहारिक रूप से समझता है, तो उसे बहुत ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं है।

कुंडलिनी ही आध्यात्मिक मुक्ति के लिए पर्याप्त प्रतीत होती है

श्रीमद्भागवत गीता

मित्रों, मैंने पिछ्ली पोस्ट में ऑनलाइन गीता से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण पोस्ट डाली थी। उसमें कुंडलिनी योग का पूरा रहस्य किस तरह गीता के दो श्लोकों में छिपा हुआ है, यह बताया गया था। आज मैं इस पोस्ट में गीता में छिपा दूसरा योग रहस्य साझा कर रहा हूँ। 

गीता के पांचवें अध्याय के 18वें व 19वें श्लोक में आध्यात्मिक मुक्ति का रहस्य छिपा हुआ है

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥५-१८॥
ऐसे ज्ञानी जन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान देखते हैं॥18॥

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥५-१९॥
जिनका मन सम भाव में स्थित है, उनके द्वारा यहाँ संसार में ही लय(मुक्ति) को प्राप्त कर लिया गया है; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं॥19॥

उपरोक्त दोनों श्लोकों से स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए न तो कुंडलिनी जागरण की आवश्यकता है और न ही आत्मज्ञान की। मुक्ति तो केवल समदर्शिता या अद्वैत से ही मिलती है। तो फिर लोग अद्वैत को छोड़कर आध्यात्मिक जागृति की तरफ ही क्यों भागते हैं। यह इसलिए क्योंकि जागृति के बाद अद्वैतभाव को बना कर रखना थोड़ा आसान हो जाता है। पर ऐसा थोड़े समय, लगभग 3-4 सालों तक ही होता है। उसके बाद आदमी अपने आध्यात्मिक जागरण को काफी भूलने लग जाता है। यदि विभिन्न आध्यात्मिक तरीकों से उच्च कोटि के अद्वैत को निरंतर बना कर रखा जाए, तो वह जागरण के तुल्य ही है। विभिन्न कुंडलिनी साधनाओं से यदि कुंडलिनी को क्रियाशील रखा जाए तो अद्वैत भाव निरंतर बना रहता है, क्योंकि जहाँ कुंडलिनी होती है, वहाँ अद्वैत रहता ही है। कुंडलिनी जागरण के समय पूर्ण अद्वैत भाव व आनन्द की अनुभूति भी यही सिद्ध करती है कि जहाँ कुंडलिनी है, वहाँ अद्वैत या समदर्शिता और आनन्द भी है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि बेशक गीता में कुंडलिनी का नाम न लिया गया हो, पर गीता एक कुंडलिनीपरक शास्त्र ही है।

कुंडलिनी या कुंडलिनी जागरण में से किसको ज्यादा अहमियत देनी चाहिए

कुंडलिनी को ही ज्यादा अहमियत देनी चाहिए। क्योंकि यदि कुंडलिनी क्रियाशील बनी रहती है, तो कुंडलिनी जागरण की ज्यादा आवश्यकता नहीँ। यदि वह हो जाए तो भी अच्छा, और यदि न होए तो भी अच्छा। वैसे भी समय आने पर कुंडलिनी जागरण अपने आप हो ही जाता है, यदि कुंडलिनी साधना निरंतर बना कर रखी जाए। पर यदि आदमी कुंडलिनी साधना को छोड़कर दिग्भ्रमित हो जाए, और कुंडलिनी जागरण के चित्र-विचित्र क्रियाओं के पीछे भागने लगे, तो इसकी पूरी संभावना है कि उसे न तो कुंडलिनी मिलेगी और न ही कुंडलिनी जागरण। वैसे भी, कुंडलिनी जागरण के बाद भी कुंडलिनी साधना को निरंतर रूप से जारी रखना ही पड़ता है। तो फिर क्यों न जागरण से पहले भी उसे निरन्तर जारी रखा जाए। इससे जाहिर होता है कि असली शक्ति तो कुंडलिनी क्रियाशीलता में ही है। कुंडलिनी क्रियाशीलता मतलब कुंडलिनी भाव के साथ आदमी की जगत में पूर्ण व्यावहारिक व मानवीय क्रियाशीलता बनी रहना। जागरण तो केवल कुंडलिनी साधना के प्रति अटूट विश्वास पैदा करता है, और निरन्तर उसे बनाकर रखवाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुंडलिनी जागरण कुंडलिनी की आध्यात्मिक शक्ति का साक्षात वैज्ञानिक प्रमाण है। कुंडलिनी जागरण की दूसरी कमी यह है कि उसे प्राप्त करने के लिए आदमी का स्वस्थ व जवान होना बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुंडलिनी जागरण के लिए बहुत अधिक प्राणशक्ति की आवश्यकता पड़ती है। इसका मतलब है कि दुनियादारी में डूबे हुए, वृद्ध और बीमार लोगों को कुंडलिनी जागरण होने की संभावना बहुत कम होती है। पर वे कुंडलिनी साधना का लाभ उठा सकते हैं। एक तथ्य और है कि कुंडलिनी जागरण उस समय होता है, जिस समय आदमी को न तो उसे प्राप्त करने की इच्छा हो, औऱ न ही उसके प्राप्त होने की उम्मीद हो। इसलिए कुंडलिनी साधना से कुंडलिनी क्रियाशीलता बनाए रखना ही पर्याप्त है। उपरोक्त सभी तथ्यों व सिद्धांतों को शरीरविज्ञान दर्शन नामक पुस्तक में वैज्ञानिक, व्यावहारिक व अनुभवात्मक तौर पर समझाया गया है।

कुंडलिनी योग का निरूपण करती हुई श्रीमद्भागवत गीता

श्रीकृष्णेन गीता

मित्रों, एक मित्र ने मुझे कुछ दिनों पहले व्हाट्सएप पर ऑनलाइन गीता भेजना शुरु किया। एक श्लोक सुबह और एक शाम को प्रतिदिन भेजता है। उसमें मुझे बहुत सी सामग्री मिली जो कुंडलिनी और अद्वैत से सम्बंधित थी। कुछ ऐसे बिंदु भी मिले जिनके बारे में समाज में भ्रम की स्थिति भी प्रतीत होती है। वैसे तो गीता के संस्कार मुझे बचपन से ही मिले हैं। मेरे दादाजी का नाम गीता से शुरु होता था, और वे गीता के बहुत दीवाने थे। मैंने भी गीता के ऊपर विस्तृत टीका पढ़ी थी। पर पढ़ने और कढ़ने में बहुत अंतर होता है।

गीता के चौथे अध्याय के 29वें श्लोक में तांत्रिक कुंडलिनी योग का वर्णन

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४-२९॥

इस श्लोक की पहली पंक्ति का शाब्दिक अर्थ है कि कुछ योगी अपान वायु में प्राणवायु का हवन करते हैं। प्राण वायु शरीर में छाती से ऊपर व्याप्त होता है। अपान वायु स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र के क्षेत्रों में व्याप्त होता है। जब आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र पर एकसाथ ध्यान किया जाता है, तब स्वाधिष्ठान चक्र पर प्राण और अपान इकट्ठे हो जाते हैं। इससे स्वाधिष्ठान चक्र पर कुंडलिनी चमकने लगती है। योग में स्वाधिष्ठान की जगह पर मणिपुर चक्र को भी रखते हैं। फिर प्राण और अपान का हवन समान वायु में होता है। फिर भी इसे अपान में प्राण का हवन ही कहते हैं, क्योंकि अपान वहाँ से प्राण की अपेक्षा ज्यादा नजदीक होता है। कई बार एक ही चक्र का, सहस्रार का या आज्ञा चक्र का ध्यान किया जाता है। फिर हल्का सा ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र का या मूलाधार चक्र का किया जाता है। इससे ऊपर का प्राण नीचे आ जाता है, और वह अपान बन जाता है। एक प्रकार से अपान प्राण को खा जाता है, वैसे ही जैसे अग्नि समिधा या हविष्य को खा जाती है। इसीलिए यहाँ अपान में प्राण का हवन लिखा है। राजयोगी प्रकार के लोग सांसारिक आधार को अच्छी तरह से प्राप्त करने के लिए इस भेंट को अधिक चढ़ाते हैं, क्योंकि उनके वैचारिक स्वभाव के कारण उनके शीर्ष चक्रों में बहुत ऊर्जा होती है।
इस श्लोक की दूसरी पंक्ति का शाब्दिक अर्थ है कि कुछ दूसरे लोग प्राण में अपान का हवन करते हैं। जब आज्ञा चक्र, अनाहत चक्र और मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र का एकसाथ ध्यान किया जाता है, तब अनाहत चक्र पर प्राण और अपान इकट्ठे हो जाते हैं। क्योंकि आज्ञा चक्र के साथ अनाहत चक्र पर भी प्राण ही है, इसीलिए कहा जा रहा है कि अपान का हवन प्राण अग्नि में करते हैं। इसमें भी कई बार दो ही चक्रों का ध्यान किया जाता है। पहले मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान किया जाता है। फिर हल्का सा ध्यान सहस्रार या आज्ञा चक्र की तरफ मोड़ा जाता है। इससे नीचे का अपान एकदम से ऊपर चढ़ कर प्राण में मिल जाता है। इसे ही अपान का प्राण में हवन लिखा है। ध्यान रहे कि कुंडलिनी ही प्राण या अपान के रूप में महसूस होती है। तांत्रिक प्रकार के लोग इस प्रकार की भेंट अधिक चढ़ाते हैं, क्योंकि उनके नीचे के चक्रों में बहुत ऊर्जा होती है। इससे उन्हें कुंडलिनी सक्रियण और जागरण के लिए आवश्यक मानसिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
तीसरी और चौथी पंक्ति का शब्द है कि प्राणायाम करने वाले लोग प्राण और अपान की गति को रोककर, मतलब प्रश्वास और निश्वास को रोककर ऐसा करते हैं। योग में यह सबसे महत्त्वपूर्ण है। वास्तव में यही असली और मुख्य योग है। अन्य क्रियाकलाप तो केवल इसके सहायक ही हैं। प्रश्वास अर्थात अंदर साँस भरते समय प्राण मेरुदंड से होकर ऊपर चढ़ता है। उसके साथ कुंडलिनी भी। निःश्वास अर्थात साँस बाहर छोड़ते समय प्राण आगे की नाड़ी से नीचे उतरता है, मतलब वह अपान को पुष्ट करता है। इसके साथ कुंडलिनी भी नीचे आ जाती है। फिर प्रश्वास के साथ दुबारा पीछे की नाड़ी से ऊपर चढ़ता है। यह चक्र चलता रहता है। इससे कुंडलिनी एक जगह स्थिर नहीं रह पाती, जिससे उसका सही ढंग से ध्यान नहीं हो पाता। प्राण को तो हम रोक नहीं सकते, क्योंकि यह नाड़ियों में बहने वाली सूक्ष्म शक्ति है। हाँ, हम प्राणवायु या साँस को रोक सकते हैं, जिससे प्राण जुड़ा होता है। इस तरह साँस प्राण के लिए एक हैन्डल का काम करता है। जब साँस रोकने से प्राण स्थिर हो जाता है, तब हम उसे या कुंडलिनी को ध्यान से नियंत्रित गति दे सकते हैं। साँस लेते समय हम उसे ध्यान से ज्यादा नियंत्रित नहीं कर सकते, क्योंकि साँसे उसे इधर-उधर नचाती रहती हैं। अंदर जाती हुई साँस के साथ प्राण और कुँडलिनी पीठ की नाड़ी से ऊपर चढ़ते हैं, और बाहर जाती हुई साँस के साथ आगे की नाड़ी से नीचे उतरते हैं। साँस को रोककर प्राण और कुंडलिनी दोनों रुक जाते हैं। कुंडलिनी के रुकने से मन भी स्थिर हो जाता है, क्योंकि कुंडलिनी मन का ही एक प्रायोगिक अंश जो है। पूरे मन को तो हम एकसाथ काबू नहीं कर सकते, इसीलिए कुंडलिनी के रूप में उसका एक एक्सपेरिमेंटल टुकड़ा या सैम्पल टुकड़ा लिया जाता है। इसी वजह से तो कुंडलिनी योग के बाद मन की स्थिरता व शांति के साथ आनन्द महसूस होता है। प्राण एक ही है। केवल समझाने के लिए ही जगह विशेष के कारण उसे झूठमूठ में विभक्त किया गया है, जिसे प्राण, अपान आदि। प्राण और अपान को किसी चक्र पर, कल्पना करो मणिपुर चक्र पर आपस में भिड़ाने के लिए साँस को रोककर मुख्य ध्यान मणिपुर चक्र पर रखा जाता है, और साथ में तिरछा ध्यान आज्ञा चक्र और मूलाधार पर भी रखा जाता है। इससे ऊपर का प्राण नीचे और नीचे का अपान ऊपर आकर मणिपुर चक्र पर आपस में भिड़ जाते हैं। इससे वहाँ कुंडलिनी उजागर हो जाती है। हरेक चक्र पर इन दोनों को एक बार बाहर साँस छोड़कर व वहीँ रोककर भिड़ाया जाता है, और एक बार साँस भरकर व वहीं रोककर भिड़ाया जाता है। यह ध्यान में रखना चाहिए कि साँस को अपनी सामर्थ्य से अधिक देर तक नहीं रोकना चाहिए। अपनी बर्दाश्त की सीमा को लांघने से मस्तिष्क को हानि पहुंच सकती है।

बीच वाले चक्र पर हाथ रखकर ध्यान लगाने में मदद मिलती है। इसी तरह, सिद्धासन में बैठने पर एक पैर की एड़ी के दबाव से मूलाधार पर दबाव की संवेदना महसूस होती है, और दूसरे पैर से स्वाधिष्ठान चक्र पर। इस संवेदना से भी चक्र के ध्यान में मदद मिलती है। पर याद रखो कि पूर्ण सिद्धासन से कई बार घुटने में दर्द होती है, खासकर उस टांग के घुटने में जिसकी ऐड़ी स्वाधिष्ठान चक्र को स्पर्श करती है। इसलिए ऐसी हालत में अर्ध सिद्धासन लगाना चाहिए। इसमें केवल एक टांग की एड़ी ही मूलाधार चक्र को स्पर्श करती है। दूसरी टांग पहली टांग के ऊपर नहीं बल्कि जमीन पर नीचे आराम से टिकी होती है। घुटनों के दर्द की लंबी अनदेखी से उनके खराब होने की संभावना भी बढ़ जाती है।

गीता के चौथे अध्याय के 30वें श्लोक में राजयोग का निरूपण

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।सर्वेऽप्येते यज्ञविदोयज्ञक्षपितकल्मषाः॥४-३०॥

इस श्लोक का शाब्दिक अर्थ है कि नियमित आहार-विहार वाले लोग प्राणों का प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं॥30॥

नियमित आहार-विहार वाले योगी राजयोगी होते हैं। ये तांत्रिक पंचमकारों का आश्रय नहीं लेते। इसलिए इनके शरीर के निचले भागों में स्थित चक्र कमजोर होते हैं, वहाँ पर प्राणशक्ति या अपान की कमी से। ये मस्तिष्क से हृदय तक ही, शरीर के ऊपर के चक्रों में कुंडलिनी का ध्यान करते हैं। ये मुख्यतया ध्यान का त्रिभुज बनाते हैं। उस त्रिभुज का एक बिंदु सहस्रार चक्र होता है, दूसरा बिंदु आगे का आज्ञा चक्र होता है, और तीसरा बिंदु पीछे का आज्ञा चक्र होता है। इसमें एक बिंदु पर खासकर आगे के आज्ञा चक्र पर सीधा या मुख्य ध्यान लगा होता है, और बाकि दोनों चक्रों पर तिरछा या गौण ध्यान। बिंदुओं को आपस में बदल भी सकते हैं। इसी तरह त्रिभुज दूसरे चक्रों को लेकर भी बनाया जा सकता है। तीनों बिंदुओं का प्राण त्रिभुज के मुख्य ध्यान बिंदु पर इकट्ठा हो जाता है, और वहाँ कुंडलिनी चमकने लगती है। इन त्रिभुजों में टॉप का बिंदु अधिकांशतः सहस्रार चक्र ही होता है। दरअसल, त्रिभुज या खड़ी रेखा को चारों ओर से आस-पास के क्षेत्रों से प्राण को अपनी रेखाओं केंद्रित करने के लिए बनाया गया है। कोई एक साथ बड़े क्षेत्र का ध्यान नहीं कर सकता। त्रिभुज पर स्थित प्राण की अधिक सघनता के लिए इसके तीन शंक्वाकार बिन्दुओं का चयन किया जाता है। इन तीन बिन्दुओं में से एक बिंदु पर मुख्य ध्यान केन्द्रित करके प्राण को उस एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जाता है। अंत में, हमें कुंडलिनी के साथ-साथ उस एक बिंदु पर अत्यधिक एकाग्र या सघन प्राण मिलता है, जिससे वहाँ कुंडलिनी चमकने लगती है। इसी तरह, सीधी रेखा, कल्पना करो मूलाधार, मणिपुर और आज्ञा चक्र बिंदुओं को आपस में जोड़ने वाली रेखा के साथ भी ऐसा ही होता है। पहले रेखा के चारों ओर के शरीर का प्राण रेखा पर केंद्रित किया जाता है। फिर रेखा का प्राण इन तीनों चक्र बिंदुओं पर केंद्रित किया जाता है। फिर तीनों बिंदुओं का प्राण उस चक्र बिंदु पर इकट्ठा हो जाता है, जिस पर मुख्य ध्यान लगा होता है। अन्य दोनों बिंदुओं पर गौण या तिरछा ध्यान लगा होता है। यह एक अद्भुत आध्यात्मिक मनोविज्ञान है।

ईसाई धर्म में प्राण-अपान संघ

जीवित यीशु ने उत्तर दिया और कहा: “धन्य है वह मनुष्य जिसने इन बातों को जाना। वह स्वर्ग को नीचे ले आया, उसने पृथ्वी को उठा लिया और उसे स्वर्ग में भेज दिया, और वह बीच का बन गया, क्योंकि यह कुछ भी नहीं है। मुझे लगता है कि स्वर्ग प्राण है जिसे ऊपर वर्णित अनुसार नीचे लाया गया है। इसी तरह, पृथ्वी अपान है जो ऊपर उठाया गया है। मध्य दोनों का मिलन है। वहां उत्पादित “कुछ भी नहीं” कुंडलिनी ध्यान से उत्पन्न मन की स्थिरता ही है, जो अद्वैत के साथ आती है। अद्वैत के साथ मन की स्थिरता “कुछ भी नहीं” के बराबर ही है। प्राण को स्वर्ग इसलिए कहा गया है क्योंकि यह शरीर के ऊपरी चक्रों में व्याप्त रहता है, और ऊपरी चक्रों का स्वभाव स्वर्गिक लोकों के जैसा ही है, और ऐसा ही अनेक स्थानों पर निरूपित भी किया जाता है। इसी तरह अपान को पृथ्वी इसलिए कहा है क्योंकि यह शरीर के निचले चक्रों विशेषकर मूलाधार में व्याप्त रहता है। इन निचले चक्रों को घटिया या नारकीय लोकों की संज्ञा भी दी गई है। मूलाधार को पृथ्वी की उपमा दी गई है, क्योंकि इसके ध्यान से आदमी अच्छी तरह से जमीन या भौतिक आयाम से जुड़ जाता है, अर्थात यह आदमी को आधार प्रदान करता है। इसीलिए इसका नाम मूल और आधार शब्दों को जोड़कर बना है। धरती भी जीने के लिए और खड़े रहने के लिए सबसे बड़ा आधार प्रदान करती है। इस कोडेक्स के स्रोत तक निम्नलिखित लिंक पर पहुँचा जा सकता है-

The Gaian Mysteries Of Gnosis – The Bruce Codex

कुंडलिनी विज्ञान ही अधिकांश धार्मिक मान्यताओं की रीढ़ है


इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी-मार्ग

मित्रो, कुंडलिनी विज्ञान सभी धर्मों की रीढ़ है। सभी धार्मिक मान्यताएं इस पर आधारित है। आज मैं हिन्दू धर्म की कुछ परंपरागत मान्यताओं का उदाहरण देकर इस सिद्धान्त को स्पष्ट करूंगा। साथ में, कुंडलिनी योग के कुछ व्यावहारिक बिंदुओं पर भी प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा। हालांकि ये मान्यताएं तुच्छ लगती हैं, पर ये कुंडलिनी योग का बहुत बड़ा व व्यावहारिक संदेश देती हैं।

दोनों पैरों की ठोकर से कुंडलिनी को केंद्रीकृत करना

इस मान्यता के अनुसार यदि किसी आदमी के पैर की ऐड़ी को पीछे से किसी अन्य आदमी के पैर से ठोकर लग जाए तो दूसरे पैर को भी उसी तरह ठोकर मारनी पड़ती है। उससे दोनों लोगों का शुभ होता है। दरअसल एक तरफ के पैर की ठोकर से कुंडलिनी शरीर के उस तरफ अधिक क्रियाशील हो जाती है, क्योंकि कुंडलिनी संवेदना का पीछा करती है। जब शरीर के दूसरी तरफ के पैर में भी वैसी ही संवेदना पैदा होती है, तब कुंडलिनी दूसरी तरफ जाने लगती है। इससे वह शरीर के केंद्र अर्थात सुषुम्ना नाड़ी में आ जाती है। इससे आदमी संतुलित हो जाता है, जिससे उसका हर प्रकार से शुभ होता है। दूसरे आदमी को भी इस प्रभाव का लाभ मिलता है, क्योंकि जैसा कर्म, वैसा फल। मैंने यह खुद होते देखा है।

एक या ऑड छींक अशुभ, पर दो या ईवन छींकें शुभ मानी जाती हैं

इसके पीछे भी यही कुंडलिनी सिद्धांत काम करता है। एक छींक की संवेदना से दिमाग का एक ही तरफ का हिस्सा क्रियाशील होता है। कल्पना करो कि बायाँ हिस्सा क्रियाशील हुआ। इसका मतलब है कि उस समय आदमी की सोच सीमित, लीनियर या लॉजिकल थी। क्योंकि दिमाग के दोनों हिस्से आपस में लगातार कंम्यूनिकेट करते रहते हैं, इसलिए यह पक्का है कि वह दाएँ हिस्से को सतर्क कर देगा। जब दूसरी छींक आती है, तो उससे दिमाग का दायाँ हिस्सा क्रियाशील हो जाता है। उससे आदमी की सोच असीमित या इलॉजिकल हो जाती है। इससे कुंडलिनी या अवेयरनेस दिमाग के दोनों हिस्सों में घूमकर दिमाग के बीच में केंद्रित हो जाती है। इसी केंद्रीय रेखा पर सहस्रार और आज्ञा चक्र विद्यमान हैं। इससे पूर्णता, संतुलन और आनन्द का अनुभव होता है। 

मस्तिष्क में अंदरूनी विवाह ही अर्धनारीश्वर का रूप या शिवविवाह है

मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ भाग बारी-2 से काम करते रहते हैं। ऐसा उनके बीच के स्थाई संपर्क मार्ग से होता है। इस न्यूरोनल या नाड़ी मार्ग को कॉर्प्स कॉलोसम कहते हैं। जिनमें किसी रोग आदि के कारण नहीं होता, वे लगातार मस्तिष्क के एक ही हिस्से से बड़ी देर तक काम करते रहते हैं। उनमें आपसी तालमेल न होने के कारण वे अपने काम ढंग से नहीं कर पाते। सामान्य व्यक्ति में कुछ देर तक बायाँ मस्तिष्क काम करता है। वह तर्कपूर्ण, सीमित, व व्यावहारिक दायरे में रहकर कुशलता से रोजमर्रा के काम करवाता है। थोड़ी देर में ही वह विचारों की चकाचौंध से थक जाता है। फिर शरीर दाएँ मस्तिष्क के नियंत्रण में आ जाता है। उसकी कार्यशैली आकाश की तरह असीमित, तर्कहीन, व खोजी स्वभाव की होती है। क्योंकि इसमें आदमी को सीमित दायरे में बांधने वाले विचारों की चकाचौंध नहीं होती, इसलिए यह अंधकार लिए होता है। इसमें रहकर जैसे ही आदमी की विचारों की पुरानी थकान खत्म होती है, वैसे ही यह हिस्सा बन्द हो जाता है, और बायाँ हिस्सा फिर से चालू हो जाता है। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। कार्य के आधिपत्य को आपस में परिवर्तित करने का समय अंतराल आदमी की सतर्कता और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के अनुसार बदलता रह सकता है। अब बात आती है, मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को एकसाथ समान रूप से क्रियाशील करने की। यही कुंडलिनी का केंद्रीय रेखा या सुषुम्ना में आना है। इससे कुंडलिनी शक्ति मतलब प्राण शक्ति दोनों हिस्सों में बराबर बंट जाती है, और पूरे मस्तिष्क को क्रियाशील कर देती है। ऐसा ही कुंडलिनी जागरण के समय भी महसूस होता है, जब किसी विशेष क्षेत्र की बजाय पूरा मस्तिष्क समान रूप में चेतन, क्रियाशील और कम्पायमान हो जाता है। इसे हम अर्धनारीश्वर का आंतरिक मिलन या शिवविवाह भी कह सकते हैं। यह भी कह सकते हैं, शरीर के बाएँ भाग का विवाह दाएँ भाग से हो गया है। हिंदु धर्म में अर्धनारीश्वर नामक शिव के बाएं भाग को स्त्री और आधे दाएँ भाग को पुरुष के रूप में दिखाया गया है। कुंडलिनी चित्र बाएँ मस्तिष्क में रहने का ज्यादा प्रयास करता है, इसीलिए कुंडलिनी को स्त्री रूप दिया गया है। आप खुद देखिए, हर किसी के मन में चकाचौंध से भरे विचारों के पूल के अंदर हमेशा डूबे रहने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को दाएँ मस्तिष्क के खाली आकाश में जागरूकता को स्थानांतरित करने के नियमित अभ्यास के माध्यम से दूर किया जाना ही लक्ष्य है। कुंडलिनी योग के माध्यम से इसे केंद्र में लाने की कोशिश की जाती है। कुंडलिनी के केन्द्रीभूत होने से ही एक आदमी पूर्ण मानव बनता है। इससे उसमें तार्किक व्यावहारिकता भी रहती है, और साथ में अतार्किक भावप्रधानता व खोजीपना भी। इसका अर्थ है कि वहाँ अद्वैत उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि अद्वैत के बिना दो विरोधी गुणों का साथ रहना सम्भव ही नहीं है। इसी तरह, सीधे तौर पर शरीरविज्ञान दर्शन या पुराणों से अद्वैत भाव बना कर रखने से मन में कुंडलिनी की स्पष्टता बढ़ जाती है। मन में दो विरोधी गुणों को एकसाथ बना कर रखने के लिए या कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को बना कर रखने के लिए बहुत अधिक प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसीलिए मैंने पिछ्ली पोस्ट में योग के लिए संतुलित आहार व संतुलित जीवन पर बहुत जोर दिया है। शुरु-2 में मैं कुंडलिनी योग करते समय मस्तिष्क में सहस्रार चक्र व आज्ञा चक्र के स्तर पर कुंडलिनी को सिर में चारों ओर ऐसे घुमाता था, जैसे एक किसान गोलाकार खेत में हल चला रहा हो। उससे मेरा पूरा मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता था, और आनन्द के साथ कुंडलिनी केन्द्रीभूत हो जाती थी। मैंने यह भी देखा कि एक नाक से जल खींचकर दूसरे नाक से निकालने पर भी कुंडलिनी को केन्द्रीभूत होने में मदद मिलती है। इसे जलनेती कहते हैं। इसके लिए जल गुनगुना गर्म और हल्का नमकीन होना चाहिए, नहीं तो सादा और ठंडा जल नाक की म्यूकस झिल्ली में बहुत चुभता है। 

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ ही कुंडलिनी जागरण के लिए मूलभूत नाड़ियाँ हैं

कुंडलिनी योग के अभ्यास के दौरान पीठ में तीन नाड़ियों की अनुभूति होती है। नाड़ियाँ वास्तव में सूक्ष्म संवेदना मार्ग हैं, जो केवल अनुभव ही की जा सकती हैं। भौतिक रूप में तो मुझे ये शरीर में नजर आती नहीं। हो सकता है कि ये भौतिक रूप में भी हों। यह एक रिसर्च का विषय है। एक नाड़ी पीठ के बाएं हिस्से से होकर ऊपर चढ़ती है, और बाएँ मस्तिष्क से होते हुए आज्ञा चक्र पर समाप्त हो जाती है। दूसरी नाड़ी भी इसी तरह पीठ के व मस्तिष्क के दाएँ हिस्से से गुजरते हुए आज्ञा चक्र पर ही पूर्ण हो जाती है। एक इसमें इड़ा और दूसरी पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के बिल्कुल बीच में और ठीक रीढ़ की हड्डी के बीच में से तीसरी नाड़ी पीठ व मस्तिष्क के बीचोंबीच होती हुई सहस्रार तक जाती है। यह सुषुम्ना नाड़ी है। सामान्य आरेखों के विपरीत, मुझे इड़ा और पिंगला पीठ में अधिक किनारों पर मिलती हैं। यह एक कम अभ्यास का प्रभाव हो सकता है। दरअसल, योग में दार्शनिक सिद्धांतों से ज्यादा भावना या अनुभव मायने रखता है। कुंडलिनी जागरण इसी नाड़ी से चढ़ती हुई कुंडलिनी से होता है। यदि कुंडलिनी इड़ा या पिंगला नाड़ी से होकर भी ऊपर चढ़ रही हो, तब भी उसे रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी हर हालत में फायदेमंद ही होती है। उसे जबरदस्ती सुषुम्ना में धकेलने का भी प्रयास करना चाहिए, क्योंकि कुंडलिनी जबरदस्ती को ज्यादा पसंद नहीं करती। कुंडलिनी अपने प्रति समर्पण से खुश होती है। जब वह इड़ा या पिंगला से चढ़ रही हो, तब उसके ध्यान के साथ मूलाधार या स्वाधिष्ठान चक्र व आज्ञा चक्र का भी एकसाथ ध्यान करना चाहिए। इससे वह एकदम सुषुम्ना में आ जाती है, या थोड़ी देर के लिए पीठ के दूसरे किनारे की नाड़ी में चढ़ने के बाद सुषुम्ना में चढ़ने लगती है। इससे कुंडलिनी सहस्रार में प्रकाशित होने लगती है। इसके साथ, शरीर व मन के संतुलन के साथ आनन्द की प्राप्ति भी होती है। कुंडलिनी को सहस्रार से नीचे आज्ञा चक्र को नहीं उतारा जाता, इसीलिए सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में चित्रित किया जाता है। वास्तव में कुंडलिनी को सहस्रार में रखना व उधर जागृत करना ही कुंडलिनी योग का सर्वप्रमुख ध्येय है। इसीसे सभी आध्यात्मिक गुण प्रकट होते हैं। सहस्रार चक्र पिंड को ब्रह्मांड से जोड़ता है। यह सबसे अधिक आध्यात्मिक चक्र है, जो एक तरफ आत्मा से जुड़ा होता है, और दूसरी तरफ परमात्मा से। सहस्रार में कुंडलिनी के दबाव को झेलने की बहुत क्षमता होती है। ऐसा लगता है कि कुंडलिनी से सहस्रार की खारिश मिट रही है, और मजा आ रहा है। फिर भी यदि वहां असहनीय दबाव लगे, तो कुंडलिनी को आज्ञा चक्र तक व आगे की नाड़ी से शरीर में नीचे उतार सकते हैं। हालांकि, यह इडा या पिंगला के माध्यम से नीचे लाने की तुलना में अधिक कठिन और गड़बड़ वाला दिखाई देता है। हालाँकि उल्टी जीभ को नरम तालु से छुआ कर रखने से इसमें मदद मिलती है। इसीलिए इड़ा और पिंगला का अंत आज्ञा चक्र में चित्रित किया गया है, पर सुषुम्ना नाड़ी का अंत सहस्रार चक्र में दिखाया गया है। यदि आप मूलाधार और आज्ञा चक्र पर एकसाथ ध्यान लगाओ, तो कुंडलिनी का संचार इड़ा नाड़ी से होता है। यदि आप स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र का एकसाथ ध्यान करो, तो कुंडलिनी का संचरण पिंगला नाड़ी से होता है। चित्र में भी ऐसा ही दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि आज्ञा चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र, तीनों का एकसाथ ध्यान करने से कुंडलिनी का संचरण सुषुम्ना नाड़ी से ही होगा या वह सीधी ही सहस्रार तक पहुंच जाएगी। ऐसा चित्र में दिखाया भी गया है। आप देख सकते हैं कि सुषुम्ना नाड़ी की भागीदारी के बिना ही कुंडलिनी सहस्रार चक्र तक पहुंच गई है। इड़ा और पिंगला से कुंडलिनी एकसाथ आज्ञा चक्र तक आई। वहाँ से वह बाएँ और दाएँ मस्तिष्क से ऊपर चढ़ कर सहस्रार पर इकट्ठी हो जाती है। ऐसा महसूस भी होता है। दोनों तरफ के मस्तिष्क में दबाव से भरी मोटी लहर ऊपर जाती और सहस्रार में जुड़ती महसूस होती है। तभी चित्र में इन दोनों लघु नाड़ियों को मोटी पट्टी के रूप में दिखाया गया है। जब कुंडलिनी को आगे की नाड़ी से नीचे उतारना होता है, तब इन्हीं पट्टीनुमा नाड़ियों से इसे सहस्रार से आज्ञा चक्र तक उतारा जाता है, और वहाँ से नीचे। आपने भी देखा होगा, जब आदमी मानसिक रूप से थका होता है, तो वह अपने माथे को मलता है, और अपनी आँखों को भींचता है। इससे उसे माथे के दोनों किनारों से गशिंग या उफनते हुए द्रव की पट्टी महसूस होती है। उससे वह मानसिक रूप से पुनः तरोताजा हो जाता है। ये इन्हीं नाड़ियों की क्रियाशीलता से अनुभव होता है। आप इसे अभी भी करके अनुभव कर सकते हो। वास्तविक व त्वरित दैनिक अभ्यास के दौरान कोई नाड़ी महसूस नहीं होती। केवल ये चार चक्र महसूस होते हैं, और कुंडलिनी सहस्रार चक्र में महसूस होती है। इड़ा नाड़ी अर्धनारीश्वर देव के स्त्री भाग का प्रतिनिधित्व करती है। पिंगला नाड़ी उनके आधे और पुरुष भाग का प्रतिनिधित्व करती है। सुषुम्ना नाड़ी दोनों भागों के मिलन या विवाह का द्योतक है। मूलाधार से मस्तिष्क तक सबसे ज्यादा ऊर्जा का वहन सुषुम्ना नाड़ी करती है। तभी तो तांत्रिक योग के समय सहस्रार का ध्यान करने से मूलाधार एकदम से संकुचित और शिथिल हो जाता है। दैनिक लोकव्यवहार में आपने भी महसूस किया होगा कि जब मस्तिष्क किसी और ही काम में व्यस्त हो जाता है, तो कामोत्तेजना एकदम से शांत हो जाती है। बेशक वह ऊर्जा सुषुम्ना से गुजरते हुए नहीं दिखती, पर सहस्रार तक उसके गुजरने का रास्ता सुषुम्ना से होकर ही है। सुषुम्ना से ऊर्जा का प्रवाह तो यौगिक साँसों के विशेष और लम्बे अभ्यास से अनुभव होता है। वह भी केवल कुछ क्षणों तक ही अनुभव होता है, जैसा आसमानी बिजली गिरने का अनुभव क्षणिक होता है। पर इसको अनुभव करने की आवश्यकता भी नहीं। महत्त्वपूर्ण तो कुंडलिनी जागरण है, जो इसके अनुभव के बिना ही होता है। यदि आप सीधे ही फल तक पहुंच पा रहे हो, तो पेड़ को देखने की क्या जरूरत है। सम्भवतः इसी से यह कहावत बनी हो, “आम खाओ, पेड़ गिनने से क्या लाभ”। इड़ा और पिंगला से भी ऊर्जा आज्ञा चक्र तक ऊपर चढ़ती है, पर सुषुम्ना जितनी नहीं।