कुंडलिनी जागरण दीपावली और राम की योगसाधना रामायण महाकाव्य के मिथकीय रूपक में निरूपित

शुभ दीपावली!

कुंडलिनी देवी सीता और जीवात्मा भगवान राम है

सीता कुंडलिनी ही है जो बाहर से आंखों की रौशनी के माध्यम से वस्तु के चित्र के रूप में प्रविष्ट होती है। वास्तव में शरीर की कुंडलिनी शक्ति नेत्रद्वार से बाहर गई होती है। शास्त्रों में कहा भी है कि आदमी का पूरा व्यक्तित्व उसके मस्तिष्क में रहता है, जो बाह्य इन्द्रियों के रास्ते से बाहर निकलकर बाहरी दुनिया में भटकता रहता है। बाहर हर जगह भौतिक दोषों अर्थात रावण का साम्राज्य है। वह शक्ति उसके कब्जे में आ जाती है, और उसके चंगुल से नहीं छूट पाती। मस्तिष्क में बसा हुआ जीवात्मा अर्थात राम उस बाहरी दुनिया में भटकती हुई सीता शक्ति को लाचारी से देखता है। यही जटायु के भाई सम्पाति के द्वारा उसे अपनी तेज नजर से समुद्र पार देखना और उसका हालचाल राम को बताना है। फिर राम योगसाधना में लग जाता है, और किसी मंदिर वगैरह में बनी देवता की मूर्ति को या वहाँ पर रहने वाले गुरु की खूब संगति करता है, औऱ तन-मन-धन से उनको प्रसन्न करता है। इससे धीरे-धीरे उसके मन में अपने गुरु के चित्र की छाप गहरी होती जाती है, और एक समय ऐसा आता है जब वह मानसिक चित्र स्थायी हो जाता है। यही लँका के राजा रावण से सीता को छुड़ाकर लाना, और उसे समुद्र पर बने पुल को पार कराते हुए अयोध्या पहुंचाना है। प्रकाश की किरण ही वह पुल है, क्योंकि उसीके माध्यम से बाहर का भौतिक चित्र मन के अंदर प्रविष्ट हुआ। मन ही अयोध्या है, जिसके अंदर राम रूपी जीवात्मा रहता है। मन से कोई भी युद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि वह भौतिकता के परे है। हर कोई किसीके शरीर से तो युद्ध कर सकता है, पर मन से नहीं। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि मन को समझा-बुझा कर ही सीधे रास्ते पर लगाना चाहिए, जोरजबरदस्ती या डाँट-डपट से नहीं। टेलीपैथी आदि से भी दूसरे के मन का बहुत कम पता चलता है। वह भी एक अंदाज़ा ही होता है। किसी दूसरे के मन के बारे में पूरी तरह से कभी नहीं जाना सकता। पहले तो राम रूपी जीवात्मा लंबे समय तक बाहर की दुनिया में अर्थात रावण की लँका में भटकते हुए अपने हिस्से को अर्थात सीता माता को दूर से ही देखता रहा। मतलब उसने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अगर वह बाहर गया भी, तो अधूरे मन से गया। अर्थात उसने शक्ति को वापिस लाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। फिर जब राम उसके वियोग से बहुत परेशान हो गया, तब वह दुनियदारी में जीजान से कूद गया। यही राक्षसों के साथ उसके युद्ध के रूप में दिखाया गया है। दरअसल असली और जीवंत जीवन तो युद्धस्तर के जैसा संघर्षमयी और बाह्यमुखी जीवन ही होता है। मतलब कि वह मन रूपी अयोध्या से बाहर निकलकर आँखों की रौशनी के पुल से होता हुआ लँका में प्रविष्ट हो गया। दुनिया में वह पूरे जीजान से व पूरे ध्यान के साथ मेहनत करने लगा। यही तो कर्मयोग है, जो सभी आध्यात्मिक साधनाओं के मूल व प्रारंभ में स्थित है। मतलब कि वह लँका में सीता को ढूंढने लगा। फिर किसी सत्संगति से उसमें दैवीय गुण बढ़ने लगे। मतलब कि अष्टाङ्ग योग के यम-नियमों का अभ्यास उससे खुद ही होने लगा। यह सत्संग राम और राक्षस संत विभीषण की मित्रता के रूप में है। इससे जीवात्मा को कोई वस्तु  बहुत पसंद आई, और वह लगातार उसी एक वस्तु के संपर्क में बना रहने लगा। मतलब कि राम की नजर अपनी परमप्रिय सीता पर पड़ी, और वह उसीके प्रेम में मग्न रहने लगा। मतलब कि इस रूपक कथा में साथ में तंत्र का यह सिद्धांत भी प्रतिपादित किया गया है कि एक स्त्री अर्थात पत्नी ही योग में सबसे ज्यादा सहायक होती है। पुराणों का मुख्य उद्देश्य तो आध्यात्मिक और पारलौकिक है। लौकिक उद्देश्य तो गौण या निम्न है। पर अधिकांश लोग उल्टा समझ लेते है। उदाहरण के लिए, वे इस आध्यात्मिक मिथक से यही लौकिक आचार वाली शिक्षा लेते हैं कि रावण की तरह पराई स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालनी चाहिए। हालांकि यह शिक्षा भी ठीक है, पर वे इसमें छिपे हुए कुंडलिनी योग के मुख्य और मूल उद्देश्य को या तो समझ ही नहीं पाते या फिर नजरअंदाज करते हैं। फिर जीवात्मा के शरीर की पोज़िशन और सांस लेने की प्रक्रिया स्वयं ही इस तरह से एडजस्ट होने लगी, जिससे उसका ज्यादा से ज्यादा ध्यान उसकी प्रिय वस्तु पर बना रहे।  इससे योगी राम का विकास अष्टाङ्ग योग के आसन और प्राणायाम अंग तक हो गया। इसका मतलब है कि राम सीता को दूर से व छिप-छिप कर देखने के लिए कभी बहुत समय तक खड़ा रहता, कभी डेढ़ा-मेढ़ा बैठता, कभी उसे लंबे समय तक सांस रोककर रखनी पड़ती थी, कभी बहुत धीरे से साँसें लेनी पड़ती थी। ऐसा इसलिए था ताकि कहीं दुनिया में उलझे लोगों अर्थात लँका के राक्षसों को उसका पता न चलता, और वे उसके ध्यान को भंग न करते। वास्तव में जो भौतिक वस्तु या स्त्री होती है, उसे पता ही नहीं चलता कि कोई व्यक्ति उसका ध्यान कर रहा है। यह बड़ी चालाकी से होता है। यदि उसे पता चल जाए, तो वह शर्मा कर संकोच करेगी और अपने विविध रूप-रंग व भावनाएं ढंग से प्रदर्शित नहीं कर पाएगी। इससे ध्यान परिपक्व नहीं हो पाएगा। अहंकार पैदा होने से भी ध्यान में क्षीणता आएगी। ऐसा ही गुरु के मामले में भी होता है। इसी तरह मन्दिर में जड़वत खड़ी पत्थर की मूर्ति को भी क्या पता कि कोई उसका ध्यान कर रहा है। क्योंकि सीता के चित्र ने ही राम के मन की अधिकांश जगह घेर ली थी, इसलिए उसके मन में फालतू इच्छाओं और गैरजरूरी वस्तुओं को संग्रह करने की इच्छा ही नहीं रही। इससे अष्टाङ्ग योग का पांचवां अंग, अपरिग्रह खुद ही चरितार्थ हो गया। अपरिग्रह का अर्थ है, वस्तुओं का संग्रह या उनकी इच्छा न करना। फिर इस तरह से योग के इन प्रारंभिक पांच अँगों के लंबे अभ्यास से जीवात्मा के मन में उस वस्तु या स्त्री का चित्र स्थिर हो जाता है। यही योग के धारणा और ध्यान नामक एडवांस्ड व उत्तम अंग हैं। इसका मतलब है कि राम ने लँका के रावण से सीता को छुड़ा लिया, और उसे वायुमण्डल रूपी समुद्र पर बने उसी प्रकाश की किरण रूपी पुल के माध्यम से आँख रूपी समुद्रतट पर पहुंचाया और फिर अंदर मनरूपी अयोध्या की ओर ले गया या जैसा कि रामायण में लिखा गया है कि लँका से उनकी वापसी पुष्पक विमान से हुई। यही समाधि या कुंडलिनी जागरण का प्रारंभ है। इससे उसकी इन्द्रियों के दस दोष नष्ट हो गए। इसे ही दशहरा त्यौहार के दिन दशानन रावण को जलाए जाने के रूप में मनाया जाता है। फिर जीवात्मा ने कुंडलिनी की जागृति के लिए उसे अंतिम व मुक्तिगामी छलांग या एस्केप विलोसिटी प्रदान करने के लिए बीस दिनों तक तांत्रिक योगाभ्यास किया। उस दौरान वह घर पहुंचने के लिए सुरम्य और मनोहर यात्राएं करता रहा। वैसे भी अपने स्थायी घर के ध्यान और स्मरण से कुंडलिनी को और अधिक बल मिलता है, क्योंकि कुंडलिनी स्थायी घर से भी जुड़ी होती है, जैसा मैंने एक पिछले लेख में बताया है। मनोरम यात्राओं से भी कुंडलिनी को अतिरिक्त बल मिलता है, इसीलिए तो तीर्थयात्राएं बनी हैं। उस चौतरफा प्रयास से उसकी कुंडलिनी बीस दिनों के थोड़े समय में ही जागृत हो गई। यही राम का अयोध्या अर्थात कुंडलिनी के मूलस्थान पहुंचना है। यही कुंडलिनी जागरण है। कुंडलिनी जागरण से जो मन के अंदर चारों ओर सात्त्विकता का प्रकाश छा जाता है, उसे ही प्रकाशपर्व दीपावली के रूप में दर्शाया गया है। क्योंकि कुंडलिनी जागरण का प्रभाव समाज में, विशेषकर गृहस्थान में चारों तरफ फैलकर आनन्द का प्रकाश फैलाता है, इसलिए यही अयोध्या के लोगों के द्वारा दीपावली के प्रकाशमय त्यौहार को मनाना है।

कुंडलिनी तंत्र ही अहंकार से बचा कर रखता है

दोस्तों, जागृति के बाद आदमी की बुद्धि का नाश सा हो जाता है। इसे द्वैतपूर्ण भौतिक बुद्धि का नाश कहो तो ज्यादा अच्छा होगा। आध्यात्मिक प्रगति तो वह करता ही रहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भौतिक बुद्धि अहंकार से पैदा होती है। पर जागृति के तुरंत बाद अहंकार खत्म सा हो जाता है। आदमी में हर समय एक समान प्रकाश सा छाया रहता है। नींद की बात नहीं कर रहा। नींद में तो सब को अंधेरा ही महसूस होता है, पर फिर भी जागते हुए एक जैसा प्रकाश रहने के कारण नींद का अंधेरा भी नहीं अखरता। वह भी आनंददायक सा हो जाता है। अहंकार अंधेरे का ही तो नाम है। यह अज्ञान का ही अंधेरा होता है। कई भाग्यशाली लोगों को इस अहंकारविहीन स्थिति में लंबे समय रहने का मौका मिलता है। पर कईयों को दुनिया से परेशानी या अभाव महसूस होने के कारण वे जल्दी ही अहंकार को धारण करने लगते हैं। कई लोग, जो शरीर से पूरी तरह से स्वस्थ होते हैं, वे उन्नत तांत्रिक कुंडलिनी योग के अभ्यास से उस दुनियावी परेशानी के बीच में भी अहंकार से बचे रहते हैं। वे कामचलाऊ बुद्धि को भी धारण करके रखते हैं, और अहंकार को भी अपने पैर नहीं जमाने देते। पर जब शारीरिक दुर्बलता या रोग से सही से तांत्रिक कुंडलिनी योग नहीं कर पाते तो वे भी अहंकार के चंगुल में फंसने लगते हैं। अहंकार की गिरफ्त में आते ही उनकी बुद्धि बुलेट ट्रेन की तरह भागने लगती है। यह भी करना, वह भी करना। यह जिम्मेदारी, वह परेशानी। इस तरह से बुद्धि सैकड़ों कल्पित बहाने बनाते हुए अपने को पूरी तरह से स्थापित कर लेती है। जब अंदर ही अंधेरा बस जाए तो बाहर भी हर जगह अंधेरा ही दिखता रहेगा और आदमी उससे बचने के लिए छटपटाता ही रहेगा। अगर अंदर का अंधेरा मिटा दिया जाए तो बाहर खुद ही मिट जाएगा और आदमी शांति से बैठ पाएगा। काला चश्मा लगाकर बाहर सबकुछ काला ही दिखता है। चश्मा हटा दो तो सबकुछ साफ दिखने लगता है। फिर बुद्धि के भागते ही मन भी कहां पीछे रहने वाला। जब बुद्धि ने अच्छी सी आमदनी पैदा कर दी, तब मन उसे भोगने के लिए ललचाएगा ही। कभी सिनेमा जाने का ख्वाब देखेगा तो कभी पिकनिक का। कभी पहाड़ पर भ्रमण को तो कभी खाने पीने का। कभी यह करने का तो कभी वह करने का। इन ख्वाबों के साथ अन्य और भी अनगिनत विचार उमड़ने लगते हैं। इस तरह मन में पूरा संसार तैयार हो जाता है।

जब आदमी मन के सोचे हुए पर चलने लगता है तो सांसें तो तेज चलेंगी ही। परिश्रम जो लगता है। मतलब आदमी प्राण के स्तर पर पहुंच जाता है। उन सांसो से इंद्रियों में भोगों को भोगने की और उनसे काम करने की शक्ति आ जाती है। पहले पहले उसे भोगों का आनंद इंद्रियों में महसूस होता है, बाहर नहीं। बाद में जब वह भोगी जाने वाली वस्तु पर ज्यादा ध्यान देने लगता है, तब उसे महसूस होता है कि उनसे कुछ सूक्ष्म चीजें निकल कर उसकी इंद्रियों के संपर्क में आती हैं, जिन्हें वे महसूस करती हैं। वे तन्मात्रा ही हैं। फिर भोगी जाने वाली वस्तुओं के ज्यादा ही कसीदे पढ़ने से उसे महसूस होने लगता है कि यह आनंद का अनुभव भोग पदार्थों में ही है। इससे उसका उन पदार्थों से लगाव बढ़ता है, जिससे वह उन पदार्थों का गहराई से अध्ययन करने लगता है। मतलब पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हो जाती है।

हम यहां यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम इस वेबसाइट पर कहीं भी ऐसा नहीं कह रहे हैं कि ऐसा करना चाहिए या ऐसा नहीं करना चाहिए। सबकी अपनी अपनी व्यक्तिगत समस्या और जरूरत होती है, जिसके अनुसार सबको चलना ही पड़ता है। अगर आदमी समझबूझ से खुद कोई फैंसला ले तो ज्यादा अच्छा रहता है बजाय इसके कि उस पर जबरदस्ती थोपा जाए। हमारी संस्कृति में शायद ऐसा होने लग गया था, इसीलिए सैद्धांतिक और वैज्ञानिक ज्ञानविज्ञान का ह्रास हुआ। हम तो केवल सिद्धांत पक्ष को प्रस्तुत करते हैं। सच्चाई का तो पता होना ही चाहिए, उस पर चलना या न चलना व्यक्ति के अपने चुनाव पर निर्भर है। महात्मा बुद्ध कहते हैं कि जिंदगी में उठना गिरना चलता रहता है। पर बुराई इस चीज में है जब आदमी गिरा हुआ हो और यह न समझे कि वह गिरा हुआ है। जिसको अपने गिरे होने का अहसास है वह मौका मिलने पर उठने का प्रयास जरूर करेगा। पर जिसको अपने गिरे होने का अंदाजा ही नहीं है, वह अपनी अवस्था को सामान्य अवस्था या उठी हुई अवस्था मानने के भ्रम में जीता रहेगा और मौका मिलने पर भी उठने का प्रयास नहीं कर पाएगा।

शास्त्रों में ऐसा सब कुछ विशद वर्णन है, पर आजकल उनके बारे में लोगों की समझ विकृत सी हो गई है। एक बार कहीं लिखा हुआ पढ़ा था कि आदरणीय महेश योगी जी भी लगभग ऐसा ही कहते थे। विदेशों में उनकी अच्छी पैठ है। वैसे तो उनके विरोधियों की तरफ से उन पर कुछ आरोप भी लगते रहे हैं। उस लेख के अनुसार भारत में प्राचीन हिंदु संस्कृत विकृत सी हो गई है। मतलब लगता है कि इन वैज्ञानिक तथ्यों को अवैज्ञानिकता, लाचारी, गुलामी, दरिद्रता, रूढ़िवादिता, मूर्खता और कट्टरता जैसे दोषों ने ढक लिया है। वैसे यह अहसास किसी चीज को देखने के नजरिए, आध्यात्मिक और भौतिक विकास के स्तर, सांस्कृतिक परिवेश, देश और काल आदि विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। एक आदमी को एक चीज बुरी लग सकती है, तो दूसरे आदमी को वही चीज अच्छी भी लग सकती है। जिस अहसास की तरफ ज्यादा लोगों का या ज्यादा सत्ता का रुझान होता है, वही समाज या दुनिया में मान्य समझा जाता है। फिर भी इन तथ्यों को इन दोषों से बाहर निकालने की जरूरत है। समय के साथ हर एक संस्कृति के ऊपर दोषारोपण होने लगते हैं। विश्व की अनेकों संस्कृतियां इस वजह से इतिहास बन गई हैं, पर हिंदू संस्कृति पुरानतम संस्कृतियों में होने के बावजूद भी आज तक इसीलिए बच पाई है, क्योंकि समय-समय पर विभिन्न दार्शनिक और समाज सुधारक इस पर लगे दोषारोपण को बाहर निकालने का प्रयास करते आए हैं। आज तो यह दोषारोपण चरम पर लगता है। इसलिए इसको बाहर निकालने के लिए भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले व सकारात्मक बुद्धिजीवियों को आगे आना होगा। वैसे हम यह बता देना चाहते हैं कि हम किसी धर्म वगैरह के साथ नहीं बल्कि सच्चाई के साथ हैं।

कुंडलिनी योग उन्नत अनुभूति को बेसिक कॉग्निशन मतलब बुनियादी अनुभूति में बदलता है

दोस्तों, आदमी एक उन्नत प्राणी है। इसमें उन्नतम कॉग्निशन विद्यमान है। पर उन्नत कॉग्निशन का एक दुष्प्रभाव यह है कि इससे आसक्ति पैदा हो जाती है, जिससे आदमी इससे बंध जाता है। यह ऐसे ही है जैसे जीवन रक्षक दवा सबसे ज्यादा मददगार भी होती है, पर उसका दुष्प्रभाव भी सबसे ज्यादा होता है।

हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं में बेसिक कॉग्निशन अर्थात बुनियादी अनुभूति होती है। इसी तरह सभी निम्नतम और सूक्ष्मतम जीवों में भी बेसिक कॉग्निशन होती है। ये सभी, वातावरण के अनुसार अपने को ढालते हैं। जीवित रहने के लिए हमारी तरह ही जीवनचर्या करते हैं। नई चीजें सीखते हैं, और पुरानी चीजों को याद रखते हैं। पर इसके लिए उनमें दिमाग जैसी संरचना नहीं देखी गई है, अभी तक। मतलब कि वे विभिन्न व अनगिनत रासायनिक क्रियाओं की श्रृंखलाओं से नियंत्रित होते हैं। तो क्यों ना उन रासायनिक क्रियाओं को ही उनका दिमाग मान लें। हमारा दिमाग भी तो रासायनिक क्रियाओं से ही चलता है। हो सकता है कि पत्थर, हवा जैसे निर्जीव पदार्थों में भी इससे कमतर स्तर की बेसिक कॉग्निशन हो, जिसे विज्ञान अभी तक समझ नहीं पाया हो। हवा का प्रवाह वातावरण के दबाव से नियंत्रित होता है। तो क्यों ना वायुदाब को हवा का बेसिक कॉग्निशन माना जाए। इसी तरह हर बार एक खास वायुदाब पर हवा की एक खास प्रतिक्रिया होती है। तो क्यों ना इसे वायुदाब की स्मरणशक्ति माना जाए। बेसिक कॉग्निशन के साथ अच्छे और बुरे की भावना नहीं होती। जैसे कि किसी स्थान पर कम वायुदाब होने से हवा का वहां पर प्रविष्ट होना हवा को अच्छा अनुभव नहीं देता। ना ही वहां उच्च वायुदाब होने पर वहां से हवा का रुखसत होना हवा को बुरा अनुभव देता है। इसी तरह जीवाणु को भोजन का कण प्राप्त होने पर खुशी नहीं होती और शत्रु का सामना होने पर उसे दुख नहीं होता। मतलब कि बेसिक कॉग्निशन के साथ राग, द्वेष नहीं होता। वहीं पर उच्च कोगनिशन में वह बीच वाली समान अवस्था राग और द्वेष में बदल जाती है। वैसे ही जैसे एक न्यूट्रॉन एक पॉजिटिव प्रोटॉन और एक नेगेटिव इलेक्ट्रॉन में रूपांतरित हो जाता है। जब दोनों को मिलाया जाए तो फिर से न्यूट्रल न्यूट्रॉन बन जाता है। प्लस और माइनस के चार्ज को अलग-अलग रहते नष्ट नहीं किया जा सकता। यह दोनों तभी नष्ट होंगे, जब आपस में मिलेंगे। इसी तरह हम राग को और द्वेष को अलग, अलग रखकर खत्म नहीं कर सकते। अगर राग और द्वेष को आसक्ति से बनाकर रखेंगे, तो ये अलग-अलग बने रहेंगे और मजबूत होते रहेंगे। जब राग पैदा होगा तो कहीं न कहीं द्वेष भी जरूर पैदा होगा, क्योंकि ये भी विद्युत चार्ज की तरह जोड़ों में पैदा होते हैं, अकेले नहीं। अनासक्ति ही वह सरकट है, जो पॉजिटिव राग और नेगेटिव द्वेष को आपस में जोड़ कर दोनों को खत्म कर देती है। पॉजिटिव को यांग कह लो, और नेगेटिव को यिन कह लो। इनका मिलन ही बहुचर्चित संगम है, अद्वैत है।

कॉग्निशन का विकास एक आवश्यक बुराई की तरह है। जब आदमी केवल हवा, पानी या सूक्ष्म जीव के रूप में था, तब तक उसमें बेसिक कॉग्निशन थी। उसमें न राग था, न द्वेष था। वह तटस्थ होता था। वह न सुखी था, न दुखी था। पर जैसे-जैसे कॉग्निशन विकसित हुई, उसे अच्छे और बुरे का अनुभव होने लगा। इससे उसमें सुख-दुख की उत्पत्ति हुई। जीवन, मरण की उत्पत्ति हुई। पहले ना वह जीता था, ना मरता था। शायद यही वह अनिर्वचनीय मुक्ति है, जिसे पाने की बात वेदों में कही गई है। उसमें ना प्रकाश था, न अंधकार था। मतलब उसमें कुछ भी द्वंद्व नहीं थे। उस स्थिति को ऐसे भी समझ सकते हैं कि उस स्थिति में सब द्वंद्व एकसाथ थे। न्यूट्रॉन में प्रोटोन और इलेक्ट्रॉन दोनों होते हैं, फिर भी दोनों ही नहीं होते। इसी तरह कहते हैं कि परमात्मा में सब कुछ है भी और नहीं भी है।

अब जो वेदों में ब्रह्मांड का वर्णन मानव समाज के जैसा है, और उसमें विभिन्न चेतन देवताओं और राक्षसों आदि का वर्णन भी बिल्कुल मानव समाज के लोगों की की तरह ही है, वह दरअसल बेसिक कॉग्निशन की तरफ लौटने का प्रयास ही लगता है। इसी तरह तंत्र आधारित शरीर विज्ञान दर्शन में जो शरीर का वर्णन ब्रह्मांड और मानव समाज की तरह है, वह भी उसी आदिम बेसिक कॉग्निशन को प्राप्त करने का प्रयास है। दोनों की थीम एक ही है, पर शरीरविज्ञान दर्शन ज्यादा समकालीन और वैज्ञानिक लगता है। हालांकि दोनों ही तरीके एकदूसरे का साथ होने पर ज्यादा अच्छे से काम करते हैं। एक पिछली पोस्ट के अनुसार कुंडलिनी योग से शरीर विज्ञान दर्शन पुष्ट होता है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी योग से आधारभूत अर्थात शुद्ध अनुभूति पुष्ट होती है।

तो क्या हम केवल इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन का ही अस्तित्त्व मानेंगे, न्यूट्रॉन का नहीं? मतलब कि क्या हम केवल उन्नत जीवों में ही चेतना का अस्तित्त्व मानेंगे, निम्न जीवों में और जड़ पदार्थों में नहीं? मतलब साफ है कि सृष्टि में ऐसे कोई समय, स्थान और पदार्थ नहीं हैं, जिनमें चेतना नहीं है।

कुंडलिनी तंत्र पारलौकिक विद्याओं का मूल आधार है

कामयाब शिक्षा नीति यही है कि उसमें छात्र अपनी मनपसंद के कोई भी विषय चुन सके। विज्ञान का छात्र अध्यात्म, संगीत , योग आदि विषय रख सके और अध्यात्म आदि का छात्र विज्ञान का। इससे आदमी का संपूर्ण विकास होता है, और उसकी हॉबी भी पूरी होती है। हॉबी पूरी होने से वह मुख्य विषय भी अच्छे से पढ़ता है। आजकल ऐसी ही शिक्षा नीति का प्रचलन बढ़ रहा है। मेरा व्यवसाय विज्ञान से संबंधित है पर अध्यात्म का शौक लेखन से पूरा करता हूं।

किसी ने क्वोरा पर प्रश्न पूछा कि क्या आत्मा बिना शरीर के भी सोच सकती है और विकसित हो सकती है। मैंने कहा कि बिल्कुल ऐसा हो सकता है। जब मुझे अपने दिवंगत संबंधी की जीवात्मा का साक्षात्कार हुआ था, तो उसने कहा था कि उसे लग ही नहीं रहा था कि वह मर गया था। मुझे भी बिल्कुल नहीं लग रहा था कि वे व्यक्ति कुछ दिनों पहले मर गए थे, बल्कि ऐसा लग रहा था कि मेरे सामने पहले की तरह स्पष्ट जिंदा थे। यह अलग बात है कि जब मुझे किन्हीं पुरानी स्मृतियों से उनके मरने का अहसास हुआ तो वे उसी पल ओझल भी हो गए। साथ में उसने यह पूछा था कि क्या उसकी वही अवस्था ही मुक्ति की परमावस्था थी। पहली बात, अगर शरीररहित आत्मा में सोचने समझने की शक्ति न होती तो वह ऐसी बातें न करती और ऐसा न पूछती। साथ में संभावित संतुष्टिजनक उत्तर पाकर एकदम से गायब भी नहीं हुई होती। इसका मतलब है कि शरीररहित आत्मा में शारीरिक मन और इंद्रियों के सभी गुण होते हैं, और वे वैसे ही काम करते हैं, जैसे शरीर में। पर शरीर की तरह नहीं। मतलब अदृष्य आत्मा द्वारा ही इंद्रियों द्वारा किए जाने वाले सारे काम किए जाते हैं। आत्मा द्वारा आत्मा की ही मदद से सुना जाता है, देखा जाता है, सोचा जाता है आदि आदि। शायद आत्मा द्वारा दूसरी आत्मा से जुड़कर ही उसके अनुभव सीधे महसूस किए जाते हैं। वह आत्मा मेरी आत्मा से जुड़कर कुछ पूछ रही थी, पर शब्द बोलने वाला कोई नहीं दिख रहा था, न ही शब्द कहीं बाहर से आ रहे थे। शब्द महसूस हो रहे थे पर आत्मा की तरह गहरे और अदृष्य। उनकी अदृष्य आत्मा उनके अदृष्य शब्दों के साथ मुझे अपनी आत्मा से महसूस हो रही थी और मैं भी किन्हीं बाहरी स्थूल शब्दों से जवाब नहीं दे रहा था बल्कि मेरी आत्मा ही शब्द बनकर उनकी आत्मा को बता रही थी। इसका विस्तृत वर्णन मैंने एक पुरानी पोस्ट में किया है। मैं उस आत्मा से जुड़ाव महसूस कर रहा था, इसीसे वह मेरे द्वारा सोची हुई बात को महसूस कर रही थी। सोचना भी साधारण नहीं था बल्कि दिल-आत्मा की गहराई वाली सोच थी। शरीर तो आत्मा को इसलिए मिलता है ताकि वह भौतिक संसार को शरीर के माध्यम से सीधे ही महसूस कर सके, किसी अन्य आत्मा से जुड़ाव की अपेक्षा न रहे। हो सकता है कि आत्मा सीधे भी भौतिक पदार्थों से जुड़कर उन्हें महसूस करती हो, जैसे कि भूतिया महल आदि की घटनाओं से देखने को मिलता है। हालांकि यह जुड़ाव भौतिक शरीर के जुड़ाव से अलग और कमतर होता होगा, क्योंकि अगर एकजैसा जुड़ाव होता तो आत्मा कष्टों और बिमारियों से भरा शरीर धारण ही क्यों करती। जो आत्मा ने कहा कि वह तो मरी ही नहीं, यह सही है क्योंकि मरता कुछ भी नहीं है। अगर कोई कहे कि केवल शरीर मरता है, आत्मा नहीं, वह भी गलत है, क्योंकि शरीर भी नहीं मरता। दरअसल भौतिक शरीर का अस्तित्व भी मन में ही होता है, कहीं बाहर नहीं। शरीर के रूप आकार का जो चित्र मन में बसा होता है, वह कैसे नष्ट हो सकता है। हां, यह चित्र कभी स्थूल तो कभी सूक्ष्म बन सकता है, पर रहता हमेशा है। जैसे कमरे का बल्ब बुझने से थोड़ी देर के लिए गहरा अंधेरा महसूस होता, पर फिर कमरे में थोड़ा दिखने लगता है, ऐसा ही मरने के बाद होता है। पिछले अनगिनत जन्मों के हमारे जितने भी शरीर हुए हैं, उन सभी के चित्र हमारे अवचेतन मन में दर्ज हैं, मतलब अब तक हमारा कोई भी शरीर नहीं मरा है। इसीलिए मुझे उन परिचित व्यक्ति की आत्मा में उनका पिछला सारा बायोडाटा महसूस हुआ, मतलब उसका औसत रूप। उनका उस जन्म का शरीर तो उस सूक्ष्म डेटाबेस का एक छोटा सा अंश था। इसीलिए मैं उन्हें पूरा पहचान पा रहा था क्योंकि उस डेटाबेस की छाप वर्तमान के शरीर पर भी होती है। उनका वह आत्मरूप उनके उस जन्म के शरीर जैसा भी था और उससे भी कहीं ज्यादा। मतलब कि शरीर नष्ट होने से कोई मरता नहीं है पर अपने मूल सूक्ष्म रूप में आ जाता है जिसे अन्य स्थूल शरीर पकड़ नहीं सकते। सूक्ष्म शरीर अपने आप में पूर्ण शरीर है। स्थूल शरीर तो उसे स्थूलता प्रदान करने को मिलता है। जो स्थूल शरीर कर सकता है, वह सब सूक्ष्म शरीर भी कर सकता है। आकार व रफ्तार में अंतर हो सकता है। फिर बोलते हैं कि मनुष्य के मरने पर उसे किसी भी जीव के शरीर के रूप में जन्म मिल सकता है। यह भी सही नहीं लगता। जब कोई मरा ही नहीं है तो जन्म कैसे होगा। शरीर भी दरअसल मन में ही बसा होता है। साथ में, आदमी के इलावा अन्य जानवर अपने शरीर या चेहरे आदि को दर्पण में नहीं देखते रहते। मतलब उनको तो अपनी शक्ल सूरत का भान ही नहीं होता। वे अपने जैसे औरों को देखकर केवल अंदाजा ही लगा सकते हैं अपने बारे में, पर इतना उनमें दिमाग ही नहीं होता। उसके अंदर मन उसी आदमी का होता है जिसका उसके रूप में पुनर्जन्म हुआ। जब मन ही नहीं बदला तो कैसा पुनर्जन्म।

उन दिवंगत आत्मा ने मेरे साथ कई बार संपर्क बनाने की कोशिश की। कई बार उस दौरान मेरे पेट से पानी जैसा गले को आता था और दम घुटता सा लगता था। शायद ऐसा नाड़ी में कुंडलिनी शक्ति के ऊपर चढ़ने से होता था। फिर मैं उन्हें प्रेम और आदरपूर्वक बातें समझाता और दुबारा न आने को कहता। ऐसा लगता कि वह जीवात्मा सब सुनती और बात मानती। दरअसल अन्य आत्मा से जुड़ने के लिए सर्वोत्तम स्वास्थ्य और गहरा योगाभ्यास जरूरी है, जैसा आम जीवन में हमेशा करना संभव नहीं है। प्रारंभ में मैं तांत्रिक कुंडलिनी योगाभ्यास करता था, जिससे ही शायद वह शक्ति प्राप्त हुईं थी। गृहस्थ जीवन में तांत्रिक योगाभ्यास भी हमेशा नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि हमारे शरीर से बहुत सी आत्माएं जुड़ी रहती हों और दुनिया की जानकारियां लेती रहती हों, पर हमें पता ही नहीं चलता। मुझे तो यह भी लगता है कि वे आत्मा मुझे जगाने के लिए आती थी ताकि मेरे महत्त्वपूर्ण अंगों में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक स्तर तक न गिर जाए। मुझे स्पॉन्डिलाइटिस इनफ्लेमेशन की वजह से कई बार गेस्ट्रिक रिफलक्स बढ़ जाता था। वे आत्मा परोपकारी थीं और मेरे प्रति तो बहुत हितैषी थीं, जीवन काल से लेकर ही।

शास्त्रों में भी सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व माना गया है। इसमें मन, बुद्धि, सभी प्राण और सभी इंद्रियां होती हैं। मतलब यह स्थूल शरीर की तरह सभी काम कर सकता है और सभी फल भोग सकता है, पर सूक्ष्म रूप में। इसका मतलब है कि स्थूल संसार से भी कहीं ज्यादा विस्तृत एक सूक्ष्म संसार है, जिसमें सभी कुछ स्थूल संसार की तरह घटित होता रहता है, पर सूक्ष्म रूप में। महान तंत्र योगियों को ही उसका आभास होता है।

कुंडलिनी शक्ति ही अंधेरे से संपूर्ण सृष्टि की रचना करती है

गुप्त कालचक्र मुझे अवचेतन मन का खेल लगता है। आदमी के हरेक अंग से संबंधित सूचना उससे संबंधित चक्र में छुपी होती है। ये पिछले अनगिनत जन्मों की सूचनाएं होती हैं, क्योंकि सभी जीवों के शरीर, उनके क्रियाकलाप, उनसे जुड़ी भावनाएं और चक्र सभी लगभग एकजैसे ही होते हैं, मात्रा में कम ज्यादा का या रूपाकार का अंतर हो सकता है। चक्रों पर ध्यान करने से वे सूचनाएं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रकट होकर मिटती रहती हैं। जब स्थूल मन की सफाई हो जाती है, तब आदमी सूक्ष्म मन की सफाई के लिए खुद ही चक्रसाधना की ओर मुड़ता है। जैसे स्थूल मन की अवस्था समय के साथ प्रतिपल बदलती रहती है, वैसे ही सूक्ष्म अवचेतन मन की भी बदलती रहती है, क्योंकि सूक्ष्म मन भी स्थूल मन का ही प्रतिबिंब है, पर वह हमें नजर नहीं आता। इसीलिए इसे गुप्त कालचक्र कहते हैं। मतलब कि अगर अवचेतन मन पूरा साफ भी कर लिया तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि यह फिर गंदा नहीं होगा। सभी चक्रों का ऊर्जा स्तर बदलता महसूस होता रहेगा चक्रसाधक को। काल के थपेड़ों से कुछ नहीं बच सकता। इसलिए भलाई इसी में है कि जो है, उसे स्वीकार करते रहो हर स्थिति में बराबर और अप्रभावित से बने रहते हुए। यही वैकल्पिक कालचक्र है। यही गुप्तकालचक्र साधना का मुख्य उद्देश्य लगता है मुझे।

कुंडलिनी शक्ति सृष्टि का निर्माण करती है, जो यह कहा जाता है इसका यह अर्थ नहीं लगता कि वह अंतरिक्ष के ग्रह तारों आदि भौतिक और स्थूल पिंडों का निर्माण करती है। बल्कि ज्यादा युक्तियुक्त तो यह अर्थ लगता है कि वह प्रजनक संभोगशक्ति के जैसी है जो एक बच्चे को जन्म देती है और उसके शरीर और मनमस्तिष्क के रूप में संपूर्ण सृष्टि का निर्माण करती है। हालांकि पहले वाली उक्ति भी अप्रत्यक्ष रूप से सही हो सकती है, क्योंकि जो पिंड में है वही ब्रह्मांड में है, पर दूसरी उक्ति तो प्रत्यक्ष, व्यवहारिक व स्पष्ट रूप से सत्य दिखती है।

कई लोग बोल सकते हैं कि संभोग शक्ति तो वंश परंपरा को बढ़ाने के लिए है, उसमें कुंडलिनी कहां से आ गई। आदमी तो कुछ भी मायने निकाल सकता है उस शक्ति के। अगर उसका असली उद्देश्य जानना हो तो पशु को देखना चाहिए। ये अपनी सोच या लक्ष्य के हिसाब से नहीं बल्कि कुदरती प्रेरणा या इंस्टिंक्ट अर्थात स्वाभाविक प्रवृत्ति से ज्यादा चलते हैं। उनके मन में संतानोत्पत्ति का उद्देश्य नहीं होता संभोग को लेकर। वे तो अज्ञान के अंधेरे में संकुचित मन को विस्तार देने के लिए ही संभोग के लिए प्रेरित होते हैं, वह भी तब जब प्राकृतिक अनुकूल परिस्थितियां उन्हें इसके लिए प्रेरित करे, ऐसे तो इसके लिए भी अपनेआप उनमें लालसा पैदा नहीं होती। एक भैंस और भैंसा तभी इसके लिए प्रेरित होंगे जब भैंस मद में अर्थात हीट में होगी जो महीने में एक या दो दिन के लिए आती है। गर्मियों के मौसम में तो वह हीट आना भी बंद हो जाता है। अन्य समय तो दोनों साथ में रहते हुए भी संभोग नहीं करेंगे। पर जब मद में होती है तो जानकार मानते हैं कि भैंस पच्चीस किलोमीटर तक भैंसे को खोजते हुए अकेले निकल सकती है, बेशक वह रास्ते में मर ही क्यों न जाए। आदमी विकसित प्राणी है। वह कुदरती नियमों से लाभ लेना जानता है। तंत्रयोगी एक कदम और आगे है। वह अंधेरे में संकुचित मन की एक ध्यानचित्र के रूप में छोटी सी लौ जलाता है। फिर वह उसे संभोगसहायित योग से इतना ज्यादा बढ़ाता है कि वह जागृत हो जाती है। यही कुंडलिनी जागरण है। अब चाहे ध्यानचित्र के रूप में संकुचित मन को कुंडलिनी कहो या अंधेरे में संकुचित मन को। बात एक ही है क्योंकि वही अंधेरा ध्यानसाधना से विकसित होकर ध्यानचित्र बन जाता है। जो संभोग शक्ति उसे विकसित होने का बल देती है, वह मूलाधार मतलब अंधेरे कुंड में रहती है, इसीलिए इसका नाम कुंडलिनी है। मतलब ध्यानचित्र का कुंडलिनी नाम तभी पड़ा जब उसे संभोग शक्ति अर्थात वीर्यशक्ति का बल मिला। मतलब कुंडलिनी शब्द ही तांत्रिक है। आम आदमी अंधेरे में या अनगिनत क्षुद्र और हल्के विचारों में संकुचित मन के साथ सीधे ही संभोग करता है, जिससे अनगिनत विचारों में वह शक्ति बंट जाती है। इससे उसे दुनियावी विस्तार या तरक्की तो मिल सकती है, पर जागृति के लाभ कम ही मिलते हैं।

जब शक्ति मूलाधाररूपी कुंड के अंधेरे में घुसती है, तभी जीव संभोग की ओर आकृष्ट होता है। हमेशा पूर्ण ज्ञान के प्रकाश में रहने वाले व्यक्ति का तो संभोग का मन ही नहीं करता। मेरे एक खानेपीने वाले एक वरिष्ठ अनुभवी मित्र थे जिन्होंने मुझे एकबार कहा था कि अगर मैं मांसाहार नहीं करूंगा तो संभोग कैसे कर पाऊंगा। मैं उस बात को मन से नहीं मान पाया था। आज मैं उनकी बात में छिपे तंत्र दर्शन को समझ पा रहा हूं। अंधेरा सिर्फ़ खानेपीने से ही पैदा नहीं होता। दुनियादारी में आसक्ति से कर्मशील रहते हुए भी पैदा होता है। मुझे लगता है कि शरीर की बनावट ही ऐसी है कि मस्तिष्क या मन का अंधेरा जैसे जैसे बढ़ता है, वैसे वैसे ही शक्ति नीचे जाती है। सबसे ज्यादा या घुप्प अंधेरे का मतलब है कि शक्ति मूलाधार पर इकट्ठी हो गई है। यह रक्तसंचार ही है जो कुदरतन नीचे की ओर इकट्ठा होता रहता है। मूलाधार तक पहुंचकर शक्ति फिर पीठ से होकर सीधी मस्तिष्क को चढ़ जाती है। मूलाधार पर शक्ति के पहुंचने से स्वाभाविक है कि वहां के यौनांग क्रियाशील हो जाएंगे। कई संयम रखकर उस शक्ति को वापिस ऊपर जाने का मौका देते हैं। कई तांत्रिक विधि से उसे बढ़ा कर फिर बढ़ी हुई मात्रा को ऊपर चढ़ाते हैं, और कई गिरा देते हैं। शक्ति के गिरने से मूलाधार में शक्ति फिर इकट्ठी होने लगती है जिसमें पहले से ज्यादा समय लग जाता है। अच्छी खुराक से वह जल्दी इकट्ठी होती है पर उसमें पापकर्म भी शामिल हो सकता है। साथ में, भोजन को पचाने और उसे शरीर में लगाने में भी ऊर्जा खर्च होती है, मतलब कुल मिलाकर प्राण ऊर्जा की हानि ही होती है। फिर ऐसे ही होगा कि आगे दौड़ और पीछे चौड़। इन साधारण लोकोक्तियों के बड़े गहन अर्थ होते हैं। चौड़ मतलब कुंडलिनी सर्पिणी का कुंडल। मतलब शक्ति पाप के अंधेरे के रूप में सो जाती है, बेशक उसे उस अंधेरे की शक्ति से ही ऊपर चढ़ाया गया हो। पर मुझे लगता है कि उतना पाप खाने पीने से नहीं लगता जितना दुनिया में आसक्तिपूर्ण व्यवहार से लगता है। इसीलिए तो शिव भूतों की तरह खाने पीने वाले दिखते हुए भी मस्तमलंग, निस्संग और निष्पाप बने हुए विचरते रहते हैं। पर जब आदमी का मन या आत्मा इतना साफ हो जाएगा कि उसमें अंधेरा होगा ही नहीं बेशक शक्ति मूलाधार को गई हुई हो, तब क्या होगा। शायद तब बिना संभोग के उसकी शक्ति ऐसे ही घूमती रहेगी। उसे यौनोन्माद भी होगा, इरेक्शन भी होगा, पर वह भौतिक संभोग के प्रति ज्यादा प्रेरित नहीं होगा, क्योंकि उसे महसूस होगा कि उससे शक्ति की हानि है, बेशक कितनी ही सावधानी क्यों न बरती जाए। मुलाधार में शक्ति के समय उसके मन में किसी कामुक स्त्री का चित्र छा सकता है, और सहस्रार में शक्ति के समय किसी गुरु या आध्यात्मिक व्यक्ति या प्रेमी पुरुष का। पर वह दोनों से ही अनासक्त रहते हुए अपने काम में व्यस्त रहेगा, जिससे वह शक्ति उसमें झूलती रहेगी और वह हमेशा आनंद में डूबा रहेगा।

जब ऊर्जा मूलाधार को जाएगी तो मास्तिष्क में तो उसकी कमी पड़ेगी ही जैसे जब बारिश का पानी जमीन में रिसेगा, तो पानी से भरे गढ्ढे सूखेंगे ही। इससे मन में कुछ न कुछ अंधेरा तो छाएगा ही, बेशक आदमी कितना ही ज्यादा शुद्ध और सिद्ध क्यों न बन गया हो। विकारशील दुनिया में इतना सिद्ध कोई नहीं हो सकता जिसका मन मस्तिष्क हमेशा उजाले से भरा रहता हो। आम सांसारिक आदमी के मन का उजाला तो ऊर्जा के सहारे ही है। बिना भौतिक ऊर्जा के उजाला रखने वाला तो कोई अति विरला साधु संन्यासी ही हो सकता है। फिर भी पूरा उजाला तो पूर्ण मुक्ति की अवस्था में में ही होना संभव है, जो शरीर के रहते संभव नहीं है। विकारी शरीर के साथ जुड़े होने पर कोई पूरी तरह कैसे निर्विकार रह सकता है। बैलगाड़ी में बैठने वाला हिचकोलों से कैसे बच सकता है। जो बिना संभोग के ही मन में उजाला बना कर रखते हैं, उन्होंने संभोग से इतर सात्त्विक तकनीकों में महारत हासिल कर ली होती है, जिनसे मूलाधार की ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती रहती है। यह सांसों पर ध्यान, शरीर पर ध्यान, वर्तमान पर ध्यान, चक्रों पर साधारण या बीजमंत्रो के साथ ध्यान, विपश्यना, देवपुजा आदि ही हैं। उदाहरण के लिए चक्रों पर बीजमंत्रों के ध्यान से प्राण खुलते हैं, सांसें खुलती हैं, चेतना और उससे मन विचारों की चमक बढ़ती है, बुद्धि बढ़ती है, और मूलाधार पर ऊपर की तरफ संकुचन बल लगता है। चमक चाहे शरीर के भीतर हो या बाहर, ऊर्जा से ही आती है।

मानसिक अंधेरा भी दो किस्म का होता है। एक खाने पीने, शारीरिक श्रम, नींद, आराम आदि से उत्पन्न अंधेरा होता है। उसमें शरीर में ऊर्जा तो बहुत होती है, पर मन में उसकी कमी होती है, क्योंकि हिंसा, नशे आदि से और दुनियावी आसक्ति के भ्रम के बाद अकेलेपन से मन की चेतना दबी हुई होती है। मतलब साफ़ है कि जब मास्तिष्क में नहीं, तब वह मूलाधार के दायरे में केंद्रित होती है। शरीर के दो ही मुख्य दायरे हैं। एक सहस्रार का तो दूसरा मूलाधार का। ऊर्जा एक दायरे में नहीं तो स्वाभाविक है कि दूसरे दायरे में होगी। अगर सिक्के का हैड नहीं आया तो टेल ही आएगा, अन्य कोई विकल्प नहीं। ऐसी अवस्था में तांत्रिक संभोग से लाभ मिलता है। दूसरी किस्म का अंधेरा वह होता है जिसमें पूरे शरीर में ऊर्जा की कमी होती है। यह तो रोग जैसी या अवसाद जैसी या थकावट जैसी या कमजोरी जैसी अवस्था होती है। इसीलिए इसमें संभोग का मन नहीं करता। अगर करेगा तो बीमार पड़ सकता है, क्योंकि एक तो पहले ही शरीर में ऊर्जा की कमी होती है, दूसरा ऊपर से संभोग में भी ऊर्जा को व्यय कर रहा है। सबको पता है कि घर की छत की टंकी में पानी जीवन के कई काम संपन्न करवाता है। पर पानी को छत तक चढ़ाने के लिए भी ऊर्जा चाहिए और भूमिगत टैंक में भी पानी होना चाहिए। अगर सूखे टैंक में या कम वोल्टेज में पंप चलाएंगे, तो पंप तो खराब होगा ही। वैसे तो तांत्रिक संभोग का भी संत वाला शांत तरीका भी है, जिससे उसमें कम से कम ऊर्जा की खपत होती है, और ज्यादा से ज्यादा ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। मस्तिष्क में ऊर्जा होना सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि वही पूरे शरीर को नियंत्रित करता है। नीचे के चक्रों में, विशेषकर सबसे नीचे के दो चक्रों में ऊर्जा कुछ कम भी रहे तो भी ज्यादा नुकसान नहीं।

कई लोग बोल सकते हैं कि शून्य अंधेरे से विचाररूपी सृष्टि कैसे बनती है। अंधेरे का मतलब ही सूक्ष्म या अव्यक्त या छुपी हुई सृष्टि है। अंधेरा वास्तव में शून्य नहीं होता जैसा अक्सर माना जाता है। असली शून्य तो बौद्धों का शून्य मतलब परब्रह्म परमात्मा ही होता है। सृष्टि बनने के लिए दो चीजें ही चाहिए, अंधेरा और शक्ति अर्थात ऊर्जा। अगर ऊर्जा नहीं है तो अंधेरा सृष्टि के रूप में व्यक्त नहीं हो पाएगा। जीवात्मा के रूप में जो अंधेरा होता है, उसी को सृष्टि के रूप में प्रकट करने के लिए ही उसे शरीर मिलता है, जिससे ऊर्जा मिलती है। यह अलग बात है कि वह योगसाधना से उस सृष्टि को शून्य कर पाएगा या उसी अंधेरे में छुपा देगा या उससे भी ज्यादा आसक्तिमय दुनियादारी से अपने को उससे भी ज्यादा अंधेरे में बदल देगा, जिसके लिए उसे फिर से नया जन्म और नया शरीर प्राप्त करना पड़ेगा। नया शरीर कर्मों के अनुसार मिलेगा। अच्छे कर्म हुए तो मनुष्य शरीर फिर मिल जाएगा जिससे सृष्टि को शून्य करने का मौका पुनः मिल जाएगा। अगर कर्म बुरे हुए तो किसी जानवर का शरीर मिलने से अंधेरे का बोझ कुछ कम तो हो जाएगा पर शून्य नहीं हो पाएगा, क्योंकि जानवर योग नहीं कर सकते। इस तरह पता नहीं फिर कब मौका मिलेगा। यही वेदवाणी कहती है।

वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध कर चुके हैं कि स्थूल भौतिक सृष्टि में भी ऐसा ही होता है। उन्होंने पाया कि अंतरिक्ष में हर जगह वे मूलभूत कण या तरंगें क्वांटम फ्लैकचुएशन के रूप में मौजूद हैं जिनसे सृष्टि का निर्माण होता है। क्योंकि वे बहुत सूक्ष्म और अव्यक्त जैसे हैं इसलिए पकड़ में न आने से अंधेरे के रूप में महसूस होते हैं। उदाहरण के लिए डार्क एनर्जी, डार्क मैटर यह सब अंधेरा ही तो है। जब कहीं से उन्हें ऊर्जा मिलती है तो उनका स्पंदन बढ़ने लगता है जिससे सृष्टि का या स्थूल पदार्थों का निर्माण शुरु हो जाता है। विचारों के लिए तो यह ऊर्जा शरीर से मिलती है पर स्थूल सृष्टि के लिए कहां से मिलती है। इसके बारे में अभी स्पष्टता और एकमतता नहीं दिखती। कुछ कहते हैं कि ब्लैकहोल आदि पिंडों के आपस में टकराने से जो गुरुत्वाकर्षण तरंगें आदि अंतरिक्ष में हलचलें पैदा होती हैं, उसीसे वह ऊर्जा मिलती है। जहां पर अंतरिक्ष में ज्यादा हलचल है, वहां ज्यादा तारों का निर्माण होता पाया गया है। पर सृष्टि की शुरुआत में अंतरिक्ष की सबसे पहली हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह पता नहीं है। शास्त्र तो कहते हैं कि ओम ॐ की आवाज निकली जिससे सृष्टि का निर्माण शुरु हुआ। ओम की ध्वनि एक अंतरिक्ष की तरंग या हलचल ही है। हो सकता है कि उसी ने आगे की हलचलों और निर्माणों का सिलसिला शुरु किया हो। ॐ ध्वनि रूपी हलचल के लिए ऊर्जा कहां से आई, यह प्रश्न अनुत्तरित है। यह शायद परमात्मा की अपनी अचिंत्य शक्ति है, जिसका उत्तर योग के अतिरिक्त विज्ञान से मिल भी नहीं सकता। अगर शक्ति नहीं होगी तो शिव शव की तरह अंधेरा बना रहेगा, व्यष्टि शरीर के अंदर भी और समष्टि शरीर मतलब स्थूल भौतिक सृष्टि में भी।

कुंडलिनी कुंड से जागकर सुदर्शन चक्र रूपी वैकल्पिक कालचक्र को क्रियाशील कर देती है, जिसमें शरीरविज्ञान दर्शन एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र पुस्तक बहुत मदद करती है

कुंडलिनी शब्द को कहते हैं कि यह शास्त्रों में नहीं है। पर कुंड शब्द तो शिवपुराण में बहुत है। संस्कृत भाषा में कान के कुंडल या छल्ले जैसे आकार वाला पुलिंग पदार्थ कुंडली हुआ और ऐसे आकार वाली स्त्रीलिंग वस्तु कुंडलिनी कहलाई। शायद कुंडल शब्द भी कुंड शब्द से बना है। दोनों में संबंध तो साफ दिखता है। कुंड का शाब्दिक अर्थ गोल गढ्ढा है, और कुंडल का अर्थ गोल छल्ला है। दोनों में यही अंतर है कि गड्ढे में धरातल होता है, पर छल्ले में नहीं होता, बाकि तो दोनों समान ही हैं। जैसे हर्ष से हर्षिल बना है वैसे ही कुंड से कुंडल बना हो सकता है। हर्ष मतलब हर्ष से युक्त और कुंडल मतलब कुंड से युक्त। मेरे इस अनुमान की जांच तो कोई संस्कृत व्याकरण विद्वान ही कर सकते हैं, अगर यह लेख पढ़ रहे हैं। कुंड से कुंडल न भी बना हो तो भी कुंडल के जैसे आकार में ढलकर सर्प कुंड अर्थात गढ्ढे में छिप जाता है। इसीलिए कहते हैं कि सांप ने कुंडली लगाई हुई है। जिस गड्ढे में सर्प कुंडली मारकर छिप जाता है, उसे अगर कुंड कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मूलाधार रूपी अंधेरे कुंड में मन की शक्ति सिकुड़ कर ध्यानचित्र के रूप में छिप जाती है। इसीलिए उस शक्ति को कुंडलिनी कहा जाता है। यही सभी चक्रों से होकर ऊपर चढ़ते हुए, फन उठाए नाग के जैसे आकार वाली पीठ और मास्तिष्क की नाड़ी में फैल जाती है। विष्णु ने कुंड में शिवलिंग को स्थापित किया। धार्मिक आस्था से जुड़ा होने के कारण इस बारे ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि कुछ कट्टर हिंदु तो पुराणों की कथाओं को मिथकीय कहने वाले के हिंदु होने पर ही संदेह करने लगते हैं। वैसे अपनी सोच से वे भी सही ही कहते हैं, क्योंकि ये कथाएं मनगढ़ंत नहीं हैं। मिथक भी दो किस्म के होते हैं, एक मनगढ़ंत या निरर्थक किस्म के और एक वैज्ञानिक सत्य पर आधारित या सार्थक किस्म के। पुराणों के मिथक दूसरे किस्म के हैं, मतलब बेशक ये मिथक लगे पर पूरी तरह से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित हैं। इसीलिए हम इनके वैज्ञानिक सत्य को उजागर करते हैं ताकि इन्हें मनगढ़ंत मिथक न समझा जा कर इनका खोया सम्मान वापिस मिल सके। हालांकि आम लौकिक सोच से ऐसा समझ सकते हैं कि देव विष्णु की उपरोक्त शिवलिंग पुकार ऐसी ही है जैसे किसी कुशल तांत्रिक ने यबयुम आसन से उत्पन्न शिवध्यानयुक्त संभोगशक्ति मूलाधार को दी। लिंग पर शिव के ध्यान से ही वह पवित्र होकर शिवलिंग बनता है। देव विष्णु जैसे महान व आदर्श योगियों का तरीका बेशक उन्नत और सात्त्विक हो सकता है, पर सबका मकसद एक ही है, और वह है शक्ति को जागृत करना।

विष्णु एक हजार कमल पुष्पों से शिव की पूजा करने की कोशिश कर रहे थे मतलब सहस्रार चक्र तक शिवध्यानचित्र को मूलाधार से उठाने की कोशिश कर रहे थे मेरुदंड से। एक पुष्प शिव ने माया से छिपा लिया मतलब शिव की माया से मोहित होकर विष्णु अपने अंहकार को शिव को अर्पित नहीं कर पा रहे थे। विष्णु ने धरती पर उस आखिरी पुष्प को हर जगह ढूंढा पर वह नहीं मिला मतलब अंहकार भीतर होता है, बाहर नहीं। बाहर की सारी सृष्टि भी शिव को चढ़ा दें, तो भी चढ़ावा अधूरा ही रहेगा, क्योंकि मास्तिष्क के अंदर बसा अहंकार तो चढ़ाया ही नहीं। विष्णु ने फिर अपना नेत्र चढ़ाया मतलब तीसरे नेत्र मतलब आज्ञा चक्र को जागृत करके वे उसकी शक्ति को फ्रंट चैनल से नीचे उतारकर मूलाधार चक्र तक लाए। उससे वहां स्थित शिव उससे पूर्ण संतुष्ट होकर वहां से सहस्रार चक्र तक चढ़कर पूरी तरह से जागृत हो गए मतलब प्रसन्न होकर उन्होंने विष्णु को अपने दर्शन करा दिए। अंहकार का जंजाल बुद्धि के रूप में बसा हुआ होता है, और बुद्धि का प्रतीक आज्ञाचक्र है। मतलब जो मन की शक्ति बुद्धिवादी सांसारिकता के जंजाल में फंसी थी, वह मुक्त हो कर शिवध्यानचित्र अर्थात कुंडलिनी चित्र को लग गई, जिससे वह जाग गया। फिर शिव ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया, मतलब जो अच्छे दर्शन या शिवदर्शन अर्थात जागृति के बाद सहस्रार चक्र बना, वही सुदर्शन चक्र है। वही दुष्टों व राक्षसों का वध मतलब बुरे विचारों का खात्मा करता है। कई जगह पर उसे दंड की तरह भी दिखाया जाता है, जो सुषुम्ना नाड़ी का द्योतक लगता है।

श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र पर ही गोवर्धन पर्वत को उठाया था मतलब ज्ञानरूप जागृत सहस्रार चक्र से ही स्थूल जगत को इतना हल्का, सूक्ष्म और आकाशरूप बना दिया कि वह ऊपर उठकर शून्य आसमान के बीच में आ गया। इससे ग्वालबाल मतलब इन्द्रियों के वशीभूत आम सांसारिक आदमी दुखों की अंधाधुंध वर्षा से बच सके थे, जो अंहकार रूपी इंद्र के कारण हो रही थी। गाय इंद्रिय को कहते हैं और गाय चराने वाला अर्थात इंद्रियों के संसर्ग से पीड़ित अज्ञानी मानव हुआ। यह ऐसा ही मामला लगता है जैसा रावण के द्वारा कैलाश पर्वत को भुजाओं पर उठाने का है। सुदर्शन चक्र का केवल इच्छामात्र से चलना और प्रहार करके खुद वापिस लौट आना और हमेशा घूमते रहना इसके दिव्य चक्र मतलब सहस्रार चक्र होने की ओर इशारा करता है। इसकी अरे मतलब स्पोकें, धुरी आदि ऋतुओं आदि का संकेत करती हैं। बौद्धों में कालचक्र भी शायद इसे ही कहते हैं। कालचक्र में भी सुदर्शन चक्र के बराबर ही अरे आदि होते हैं जो कि समय, ऋतु आदि की चाल को इंगित करते हैं। दोनों में ही वज्र और विद्युत होती है। यह सुषुम्ना में बहने वाली और जागृति देने वाली ऊर्जा ही है। कालचक्र को भी सुदर्शन चक्र की तरह विष्णु, कृष्ण, शिव आदि से जोड़ा जाता है। दोनों का ही वर्णन वेदशास्त्रों में है। हालांकि कालचक्र का उपयोग मुख्यतः बौद्धों में होता है।

कालचक्र के तीन प्रकार हैं, बाह्य, आभ्यंतर और गुप्त। बाह्य में बाहरी स्थूल ब्रह्मांड, आभ्यंतर में शरीर के अंदर का सूक्ष्म ब्रह्मांड और गुप्त में योग आदि रहस्यमय मुक्तिदायी विद्याएं आती हैं। मुझे लगता है कि एक का पूर्ण ज्ञान होने से तीनों का ज्ञान हो जाता है। बहिर्मुखी आदमी के लिए बाह्य कालचक्र की साधना है। अंतर्मुखी व्यक्ति के लिए आंतरिक कालचक्र और संन्यासी किस्म के व्यक्ति के लिए गुप्त कालचक्र बना है। तीनों से ही ज्ञान और मुक्ति मिलती है। प्रेमयोगी वज्र रचित शरीरविज्ञान दर्शन को एक प्रकार का आंतरिक कालचक्र कह सकते हैं, क्योंकि उसमें शरीर के अंदर के ब्रह्मांड का वर्णन किया गया है। कालचक्र एक मंडल होता है, जिसमें विभिन्न देवताओँ, चिह्नों और आकृतियों को प्रदर्शित किया जाता है। वास्तव में भी तीनों कालचक्रों में भी ऐसे ही विविध रूपरंग वाला संसार है। इसकी साधना से स्वाभाविक है कि सुषुम्ना, सहस्रार और कुंडलिनी आदि जागृत हो जाते हैं, जो फिर दुष्ट विचारों और स्वभावों रूपी राक्षसों का नाश करते हैं। इस मामले में भी कालचक्र और सुदर्शन चक्र एक ही हैं। यह कह सकते हैं कि कालचक्र आम आदमी को मिलता है जबकि विष्णु जैसे परम आदर्श मनुष्य को मिलने वाले कालचक्र को सुदर्शन चक्र कहा गया है। आम आदमी तो केवल अपने ही अज्ञान का नाश करता है जबकि विष्णु और राम, कृष्ण, बुद्ध आदि उनके अवतार अनगिनत भक्त लोगों का अज्ञान नष्ट करते हैं। इसीलिए सुदर्शन चक्र को विशिष्ट कालचक्र कह सकते हैं।

वामन पुराण में  भी इस चक्र को कालचक्र कहा गया है। इसकी बारह स्पोकें बारह महीनों और छः नाभियां छः ऋतुओं को इंगित करती हैं। यह भी कहा जाता है कि मंत्र सहस्रात हुम फट इसकी स्पोकों पर खुदा है। यह एक बौद्ध मंत्र लगता है। सिख भी चक्र को हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे, जिसे सीधे भी और फेंक कर भी चलाया जाता था। कई जगह यह भी आता है कि सुदर्शन चक्र का केंद्र वज्र से बना है। वज्र वही मेरूदंड है, जिससे होकर वज्र शक्ति सहस्रार तक गुजरती है। पूरी तरह से यह लेख अगले लेख को पढ़कर समझ आएगा क्योंकि उसमें शिवपुराण में वर्णित इसकी मूल कथा लिखी जाएगी।

ऋग्वेद में भी सुदर्शन चक्र को कालचक्र कहा गया है। तीनों कालचक्रों से अलग एक चौथा वैकल्पिक कालचक्र भी है, जिसमें मन को समय की चाल से प्रभावित नहीं होने दिया जाता। यही बुद्धत्व और आत्मज्ञान का कालचक्र है। यही अद्वैत है, यही द्वैताद्वैत मतलब द्वैत के बीच रहकर अद्वैत है। यही प्रेमयोगी वज्र कृत शरीरविज्ञान दर्शन नामक तंत्र दर्शन की अवधारणा है। विष्णु का दुष्टविनाशक सुदर्शन चक्र ये ही पूर्व के तीनों कालचक्र हैं, जो समय के थपेड़ों से आम आदमी के मन को द्वैत, अज्ञान और दुख में डालकर उसे बारंबार जन्म मृत्यु के चक्र में डालने वाले हैं। कृपा करने वाला सुदर्शन चक्र चौथा और अंतिम मतलब वैकल्पिक कालचक्र है, जो बेशक समय की रफ्तार से घूमता है, पर आदमी को उसके बीच अद्वैत से रहना सिखाकर उसे सुख समृद्धि और मुक्ति देता है। मारने वाला समय चक्र तो किसी के पास भी हो सकता है, पर बचाने वाला तो विष्णु जैसे आत्मज्ञानी के पास ही हो सकता है। वह तब मिलता है जब सहस्रार चक्र जागृत होता है। यह काल तो चक्र की तरह चलता ही रहता है, कभी नहीं रुकता। जन्म के बाद मृत्यु, मृत्यु के बाद जन्म और फिर मृत्यु। सृष्टि के बाद प्रलय, प्रलय के बाद सृष्टि और फिर प्रलय। ऋतुएं चक्रवत बदलती रहती हैं, सुख दुख चक्रवत आते जाते रहते हैं। इस चक्र से हम भाग नहीं सकते। चक्र को चक्र ही काटता है। वरदायी सुदर्शन या वैकल्पिक चक्र ही बचने का एकमात्र उपाय है। मतलब चक्र के साथ चलते रहो पर उससे अपनी अद्वैतमय शांति भंग न होने दो। यही सुदर्शन चक्र की स्तुति और पूजन है। 

शिशुपाल को सुदर्शन चक्र ने गले से काटा मतलब शिशुपाल के द्वैतपूर्ण व्यवहार से उसकी शक्ति विशुद्धि चक्र से ऊपर नहीं चढ़ी। क्योंकि आदमी गले के विशुद्धि चक्र की शक्ति से बोलता है, तो ऊपर चढ़ती शक्ति को गले ने रोककर गाली गलौज में खत्म कर दिया मतलब गले के पास शक्ति का रास्ता कट गया मतलब गला कट गया। शिशुपाल कृष्ण को बहुत गालियां निकाल रहा था। कुंडलिनी चक्र भी शायद इसीलिए चक्र कहलाते हैं क्योंकि इन पर भी शक्ति का स्तर चक्रवत बदलता रहता है। कभी शक्ति बढ़ते बढ़ते चरम पर पहुंच जाती है, जिसे चक्र का जागृत होना कहते हैं, और फिर घटते घटते न्यूनतम भी पहुंच जाती है। उदाहरण के लिए कभी दिल की भावनाएं उफान पर होती हैं और कभी वह भावशून्य सा हो जाता है। कुछ समय बाद दिल फिर भावनाओं से भर जाता है, जिससे कई बार अच्छी सी कविता का निर्माण भी हो जाता है। ऐसा चक्र चलता रहता है। चक्र जागृत हो गया तो इसका मतलब यह नहीं कि वह हमेशा जागृत रहेगा। उसकी शक्ति घटती बढ़ती रहेगी। इससे घबराना नहीं है और न ही प्रभावित होना है। यही वैकल्पिक कालचक्र है, मतलब बुद्धवादी विकल्प अर्थात कल्पना या दर्शन से कालचक्र के दुष्प्रभाव को ख़त्म करके उससे सद्प्रभाव पैदा करना है। इसी तरह सहस्रार चक्र भी कभी चरम शक्ति पर होता है। उस समय यह पात्र व्यक्ति को ज्ञान या वरदान देकर भौतिक समृद्धि और मुक्ति भी दे सकता है, और पापी व्यक्ति को श्राप देकर उसे भौतिक हानि और बंधन में भी डाल सकता है। फिर सहस्रार चक्र निम्न शक्ति स्तर पर भी होता है, जिस समय श्रीकृष्ण एक आम आदमी की तरह व्यवहार करते थे। सहस्रार की चरम शक्ति की अवस्था होने पर ही वे अवतारी पुरुष की तरह व्यवहार करते थे, और जिस समय सहस्रार चक्र के बाह्य और स्थूल प्रतीक के रूप में उनकी अंगुली पर सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखाया जाता था। आम आदमी तो मन या मस्तिष्क में छिपे सूक्ष्म सहस्रार चक्र को महसूस नहीं कर सकते। जागृत सहस्रार चक्र मतलब सुदर्शन चक्र से ही दिव्यता है, परमात्मता है, पुरुषोत्तमता है।

आदमी बाह्य कालचक्र में ही पैदा होता है और उसमें लंबे समय तक रहते हुए बहुत कुछ सीखता है। यह शुरुवाती अभ्यास का कालचक्र है। फिर उससे उत्पन्न दुखों के थपेड़ों से परेशान होकर उसे आंतरिक कालचक्र के ऊपर अध्यारोपित करने लगता है। मतलब वह अपने मन को यह दिलासा देने लगता है कि जो कुछ विस्तृत ब्रह्मांड में है वही सबकुछ उसके अपने छोटे से शरीर में भी है। मतलब यत्पिंडे तत् ब्रह्माण्डे। ऐसा करना “शरीरविज्ञान दर्शन, एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र, एक योगी की प्रेमकथा” नामक पुस्तक से बहुत आसान हो जाता है। उससे उसे कुछ अद्वैत की अनुभूति होती है जिससे वह काल के थपेड़ों से थोड़ी सुरक्षा महसूस करता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर के अंदर पूरा कालचक्र दौड़ता रहने के बावजूद उसका कोई भी घटक द्वैत के बंधन में नहीं पड़ता। लंबे समय तक उसमें स्थिर रहने के बाद जब वह काफी पवित्र हो जाता है, तब उसकी प्रवृत्ति खुद ही योगसाधना रूपी गुप्त कालचक्र की ओर झुक जाती है। योग करते हुए और आगे बढ़ते हुए वह खुद ही तांत्रिक कुंडलिनी योग की तरफ मुड़ जता है। तंत्र योग से उसकी कुंडलिनी सहस्रार चक्र में जागृत हो जाती है, मतलब वह वैकल्पिक कालचक्र या सुदर्शन चक्र का अधिकारी बन जाता है। फिर भी जब भी वह सहस्रार में ऊर्जा की कमी से इस सर्वोच्च कालचक्र से नीचे आता रहता है तब तांत्रिक ऊर्जा के थोड़े से धक्के से वह आसानी से उसमें पहुंचता रहता है।

अनंत विस्तृत बाह्य कालचक्र अद्वैत सूक्ष्म होता जाता है। पहले वह आंतरिक कालचक्र के स्तर पर पहुंचता है। फिर और सूक्ष्म होकर सात कुंडलिनी चक्रों तक सीमित होकर गुप्त कालचक्र बन जाता है। इसे गुप्त कालचक्र इसलिए कहते हैं क्योंकि सभी इसे महसूस नहीं कर सकते, पर केवल कुंडलिनी योगी ही इसे महसूस करते हैं। फिर जागृति के बाद यह सहस्रार चक्र के बिंदु के स्तर तक सूक्ष्म बनकर वैकल्पिक कालचक्र बन जाता है। कालचक्र शुरु से लेकर अंत तक रहता है, पर पहले वह अज्ञान के बंधन में डालने वाला था, अंत में ज्ञान और मुक्ति देने वाला बन जाता है। यह बेहद कारगर और व्यवहारिक साधना है जिसे जरूर अपनाना चाहिए। सबसे साधारण शब्दों में बोलें तो यह ऐसा है कि भौतिक दुनियादारी के बीचबीच में अपने शरीर को भी अनुभव करते रहना चाहिए, उसके आगे के रास्ते खुद खुलते जाते हैं। योग इसकी आदत डालने के लिए ही बना है। योगासन करते समय प्राणों की क्रियाशीलता से दुनियावी विचार भी आते रहते हैं और साथ में शरीर के विशेष पोज और सांस पर भी ध्यान लगा होता है मतलब बाह्य कालचक्र आंतरिक कालचक्र में रूपांतरित होता रहता है।

कुंडलिनी तंत्र का मूल आधार शिव-लिंग

मित्रों, शिवपुराण की एक कथा के अनुसार एकबार कुछ शिष्यों ने कथावक्ता से पूछा कि क्या शिवलिंग लिंग होने के कारण ही हर जगह पूजित है या कोई अन्य कारण है। इस पर वे एक कथा सुनाते हैं कि दारुक नाम के एक श्रेष्ठ वन में शिवजी के ध्यान में नित्य तत्पर शिवभक्त रहा करते थे। किसी समय वे समिधा लेने वन में गए हुए थे। उसी समय शिव उन्हें शिक्षा देने और उनकी परीक्षा लेने के लिए एक तांत्रिक अवधूत के वेष में आए, जो लिंग को हाथ में धारण कर के दुष्ट चेष्टा कर रहे थे। उनको देखकर ऋषिपत्नियां बहुत डर गईं। और अन्य बेताब और आश्चर्यचकित होकर वहां चली आईं। कुछ अन्य स्त्रियों ने एकदूसरे का हाथ पकड़कर परस्पर आलिंगन किया। कुछ स्त्रियां उस आलिंगन के घर्षण से आनंदमग्न हो गईं। उसी समय ऋषिवर आ गए और उस आचरण को देखकर दुखी और क्रोध से व्याकुल हो गए। वे आपस में कहने लगे, यह कौन है, यह कौन है। जब तांत्रिक अवधूत ने कुछ नहीं कहा तो उन्होंने उसे यह कहते हुए श्राप दिया कि वह वेदविरुद्ध आचरण कर रहा था इसलिए उसका लिंग भूमि पर गिर जाए। ऐसा ही हुआ। उस लिंग ने अग्नि की तरह सामने स्थित सभी वस्तुओं को जला दिया। जहां वह जाता, वहां सबकुछ जला देता। वह पाताल में गया, स्वर्ग में गया, भूमि पर भी सर्वत्र गया, पर कहीं स्थिर नहीं हुआ। सभी लोक व्याकुल हो गए, और वे ऋषिगण भी बहुत दुखी हुए। किसी भी देवता या ऋषि को शांति नहीं मिली। जिन देवों और ऋषियों ने शिव को नहीं पहचाना, वे ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने यह कहते हुए उन्हें खूब लताड़ा कि आम आदमी अगर शिव को न पहचान पाए तो बात समझ आती है पर उनके जैसे ज्ञानी लोग शिव को कैसे नहीं पहचान पाए, और कहा कि अगर देवी पार्वती योनिरूपा बन जाए तो यह स्थिर हो जाएगा। देवी को प्रसन्न करने को यह निम्न विधि उनको बताई। अष्टदल वाला कमल बनाकर उसके ऊपर एक कलश स्थापित कर उसमें दूर्वा तथा यवांकुरों से युक्त तीर्थ का जल भरना चाहिए। फिर वेदमंत्रों के द्वारा उस कुंभ को अभिमंत्रित करना चाहिए। फिर वेदोक्त रीति से उसका पूजन करके शिव का स्मरण करते हुए शतरुद्रीय मंत्रों से कलश के जल से उस शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए। फिर उन्हीं मंत्रों से लिंग का प्रोक्षण मतलब छिड़काव करें, तब वह शांत हो जाएगा। फिर गिरिजायोनि रूपी बाण को स्थापित करके उस पर लिंग को स्थापित करना चाहिए, और फिर उसको अभिमंत्रित करना चाहिए। फिर षोडशोपचार मतलब सोलह किस्म की सामग्रियों से परमेश्वर का पूजन करना चाहिए, और फिर उनकी स्तुति करनी चाहिए। इससे लिंग स्थिर और स्वस्थ हो जाएगा, तथा तीनों लोक विकार से रहित और सुखी हो जाएंगे।

वैसे इस कथा का स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। यह आस्था से जुड़ा हुआ एक संवेदनशील धार्मिक मामला है। इसे खुद ही समझा जा सकता है। हां इतना जरूर कह सकते हैं कि हरेक आदमी अपने यौनसाथी की खोज में कभी न कभी जरूर भटकता है। उस दौरान उसके मन में जो समाधि चित्र बना होता है, वह उसे चिड़चिड़ा सा और जलाभुना सा जरूर बना सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि समाधि के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है, जो किसी नजदीकी साथी के सहयोग से ही मिल सकती है। अष्टदल कमल अनाहत चक्र का प्रतीक है, और प्रेम उस पर ही उपजता है। उस पर तीर्थों के जल से भरे कलश को रखने का मतलब उस पर ध्यान शक्ति को इकट्ठा करके केंद्रित करना है। विभिन्न तीर्थ मतलब विभिन्न चक्र। दूर्वा घास प्रजनन, वृद्धि और विकास का प्रतीक है। यव अंकुर मतलब अंकुरित हुए जौ चढ़दी कला मतलब चहुंमुखी विकास का प्रतीक हैं, क्योंकि उसमें हर किस्म के टॉनिक, विटामिंस और मिनरल्स होते हैं, इसीलिए इसे ग्रीन ब्लड भी कहते हैं। इसका आम भाषा में यही मतलब लगता है कि दिल पर अर्थात प्यार पर अपना सबकुछ न्यौछावर कर देना। जोगी भी ऐसे ही होते हैं, जो घरबार छोड़कर अपने देवता की पूजा अर्चना में लग जाते हैं, और ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। उस कलश के पूजन का मतलब है, हृदय से शक्ति के साथ जुड़े देवरूप आदि ध्यानचित्र का पूजन। जिससे वह ज्यादा प्रकाशित अर्थात प्रसन्न होता है, जैसे किसी आदमी की सेवा से वह आदमी प्रसन्न हो जाता है। वेदमंत्राें से पूजन का मतलब है, उस चित्र को और ज्यादा धार देते हुए और स्पष्ट, शुद्ध और प्रकाशमान बनाना। बीजमंत्र भी ऐसा ही करते हैं। वह मानसिक ध्यान चित्र गुरु, प्रेमिका, देवता, बीजमंत्र आदि किसी का भी हो सकता है। उस पूजित चित्र से मिश्रित शक्ति को फिर अनाहत चक्र से स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्र को उतारा जाता है। यही कलश के जल से उस दिव्य लिंग का अभिषेक है। अभिषेक में पवित्र जलरूपी शक्ति की धारा निरंतर चलती है। प्रोक्षण जल के छिड़काव को कहते हैं। हृदयकलश से शक्ति को सुबहशाम की साधना से बारंबार नीचे उतारना ही ही दिव्य प्रोक्षण है। शतरुद्रीय मंत्र में विभिन्न बीजमंत्र आदि हैं, जो विभिन्न अदृश्य तरंगें छोड़ते हैं, जो आदमी के मन पर अदृश्य दिव्य आध्यात्मिक प्रभाव डालते हैं। वैसे कुदरती बाणलिंग नर्मदा नदी में मिलते हैं, पर लगता है कि कथा में बाण को लिंग के आसन अर्थात पीठ के रूप में कहा गया है। मैंने जब बिंग एआई से पता किया तो उसने जवाब दिया कि एक अभिमंत्रित बाण को जमीन के अंदर गाड़ा जाता है, और उसके ऊपर शिवलिंग को स्थापित किया जाता है। हो सकता है कि यह ठीक कह रहा हो। क्योंकि कई स्थानों पर ऐसे शिवलिंग देखे जाते हैं जिनकी पीठ या आधार ही नहीं होता। पूछने पर वहां के पुजारी आदि बताते हैं कि यह शिवलिंग जमीन में गहराई तक गढ़ा होता है। हो सकता है, जमीन के अन्दर बाण ही उसकी पीठ हो। वैसे पीठ का आकार भी बाण से मिलता जुलता सा होता है। फिर उसके आगे तो आम आदमी की भाषा में तांत्रिक या दैवीय संभोगयोग ही लगता है। वैसे सबकी अपनी अपनी सोच हो सकती है। उससे तीनों लोक मतलब पूरा शरीर शांत और स्वस्थ मतलब अपने शुद्ध आत्मरूप में स्थित हो जाता है, क्योंकि सब लोक शरीर में ही हैं। यह दुनिया में अक्सर देखा जाता है इसीलिए बिगड़े हुए या बिगड़ रहे नौजवानों का विवाह उनके परिवार वाले जल्दी में करते हैं। उसके बाद मैंने बहुत से सुधरते हुए देखे हैं। पर कुछ नहीं भी सुधरते। इसमें उनकी पत्नियों का कसूर भी लगता है मुझे, शायद हालांकि ज्यादा कसूरवार तो पुरुष ही होते हैं। इसीलिए कहा है कि शिवलिंग को पार्वती रूपी पीठ ही धारण कर सकती है। इसीलिए तो स्त्री को अध्यात्मिक संस्कार देना पुरुष से भी ज्यादा जरूरी समझा जाता था, क्योंकि स्त्री ही पूरे परिवार की नींव होती है। मैंने एक व्यस्क आदमी को अपनी निजी राय जाहिर करते सुना था कि अगर पुरुषों का विवाह न हुआ करता तो वे एकदूसरे को कच्चा ही खा जाया करते, क्योंकि पत्नियां ही पुरुषों को नियंत्रित करती हैं। उन्होने खुद अपनी पहली पत्नि की मृत्यु के बाद एक अन्य महिला से विवाह क्रिया हुआ था। बात सही भी है। एक मित्र भी कह रहे थे कि तांत्रिक संभोग तो संभोग ही नहीं लगता, वह तो कोई और ही अति पवित्र अध्यात्मिक कर्म बन जाता है। मुझे लगता है कि मूर्ख, नकारात्मक, असफल और विधर्मी लोग ही दोनों को एक श्रेणी में रखकर अपने दिल की भड़ास निकालते हैं। एक पुस्तक लव स्टोरी ऑफ ए योगी में तो लेखक एक महिला के द्वारा उसके कुंडलिनी जागरण की मुख्य वजह पूछे जाने पर अपना अनुभव प्रश्नकर्ता को चिह्नित करने की बजाय सबको सुनाते हुऐ कहता है कि उसने वज्रशिखा की संवेदना पर कुंडलिनी चित्र का ध्यान करते हुए उसे उसके पूरक अंग में अंदरबाहर करते हुए ही जागृति प्राप्त की, पर जो उसने किया वह संभोग नहीं था। इस पर ऑनलाइन कुंडलिनी ग्रुप पर मौजूद वह प्रश्न पूछने वाली पाश्चात्य या संभवतः अमेरिकन महिला प्रेमभरी हैरानी और कुछ मजाकिया लहजे से उसे पिनपोइंट करते हुए उससे कहती है कि हमारे देश में तो उसे संभोग ही कहते हैं, वह पता नहीं कौनसी अचरजभरी संस्कृति या भूमि से ताल्लुक रखता है। उसके बाद उस विषय पर उस ग्रुप में सबके संवाद बंद हो गए थे, और तंत्र की उपयोगिता का विषय सामने आ गया था, जिसमें जागृति के लिए तंत्र की सर्वाधिक महत्ता को सभी स्वीकार कर रहे थे। मतलब लेखक ने अपने दिल की बात भी रख दी थी और अप्रत्यक्ष तौर पर मुख्य प्रश्न का जवाब भी दे दिया था। वैसे यह कथा मिस्र की अंखिंग तकनीक की तरह भी लग रही है।

मतलब यह साफ है कि इस कथा में विधर्मियों या हिंदु विरोधियों द्वारा फैलाए गए दुष्प्रचार का खंडन किया गया है। ऋषि बहुत दूरदर्शी होते थे। उन्हें पता था कि आने वाले समय में ऐसा हो सकता था। यह कथा भी समाज में घटने वाली आम घटना को दर्शाती है, कोई दिव्य पारलौकिक आदि नहीं। अविवाहित किशोर व्यक्ति ऐसे ही होते हैं। वे मौका मिलने पर युवतियों से लिंगोन्मुखी मजाक करते रहते हैं। उनमें से कोई शिव किस्म का तंत्र का असली हकदार भी होता है। पर लोग तो सबको एक जैसा लंपट बदमाश समझते हैं। कहते हैं कि दाने के साथ घुन भी पिसता है। उन्हें क्या पता कौन सच्चा है और कौन झूठा। इसलिए औरों के साथ वे शैव का भी अपमान करके शाप दे देते हैं, मतलब उसे भी बुरी नजर से देखते हैं। वस्तुतः शैव का लिंग कोई सामान्य लिंग नहीं होता। शैवतंत्र के प्रभाव से वह साक्षात इष्ट देवता होता है। एक प्रकार से साधना के प्रभाव से वह शैव व्यक्ति लिंगरूप बन जाता है। वह जहां भी जाता है, एक किस्म से उसके रूप में उसका इष्टदेवरूपी लिंग ही जा रहा होता है। उस इष्टदेव की नाराजगी सबको परेशान करती है, मतलब जलाती है। ऐसा भी हो सकता है, क्योंकि सारा विश्व लोगों के भटकते मन में है, और उस शैवलिंगरूपी इष्टदेव के सान्निध्य से उनका अपने भटकते मन से मोहभंग हो रहा होता है, इसीको जगत का जलना कहा गया हो सकता है। उस माहेश्वर लिंग को पार्वती के जैसी तंत्रयोगिनी ही सही से धारण कर सकती है, ताकि उसके साथ इष्टदेव रूपी ध्यानचित्र का ध्यान भी हो सके। आम महिला तो ध्यान में सहयोग कर ही नहीं पाएगी। मतलब इससे इष्टदेव नाराज मतलब बिना जागृति के ही रहेगा। बिना जागृति की कुंडलिनी क्रियाशीलता नुकसानदायक भी हो सकती है, क्योंकि वह नियंत्रण से बाहर भी हो सकती है। अनियंत्रित शक्ति सबको जलाएगी ही। जागृति आदमी को शक्ति का असली और पूर्ण रूप दिखाती है। और वह रूप सबसे सुंदर और शक्तिशाली होने पर भी परम शांत होता है। इससे आदमी शांत रहता है, मतलब जागृति के नियंत्रण में रहता है।

यह कथा मुझे शिवपुराण की सबसे सारगर्भित कथा लगी। इस पर कोई जितना चाहे लिख सकता है। ऋषियों ने जो शुरु में पूछा था कि क्या शिवलिंग लिंग होने के कारण ही पूजित है, या कोई अन्य कारण है, इसका उत्तर बहुत सभ्य तरीके से दिया गया है इसमें। यह ऐसा ही है जैसा उत्तर उपरोक्त लेखक ने दिया था। मतलब शिवलिंग सामान्य लौकिक लिंग नहीं है, जैसा कि मूर्ख, दुष्ट, लंपट बदमाश, भौतिकवाद की मोहमाया में उलझे हुए, अति कर्मप्रधान, धर्मविरोधी या सैक्सी किस्म के लोग समझते हैं या बोलते हैं। हैरानी तब होती है जब बहुत से हिंदु भी उनके बहकावे और उकसावे में आ जाते हैं, और वैसा ही समझने लगते हैं। वे सोशल मीडिया आदि पर हर जगह शिवलिंग को शिव के शरीर का अंग समझने पर ही पाबंदी लगा देते हैं, कहने लगते हैं कि यह तो केवल शिव का चिह्न या प्रतीक है, या केवल शिवशक्ति मिलन का प्रतीक है, किसी शारीरिक कर्म आदि का नहीं आदि आदि। वैसे अपनी जगह पर और अध्यात्मवैज्ञानिक सोच के हिसाब वे सही ही कह रहे होते हैं, क्योंकि साधारण सांसारिक वस्तु या अंग जैसी इसमें कोई बात ही नहीं है। उनसे सीखकर बिंग एआई भी ऐसा ही कहता है। इस मामले में अगर विधर्मी लोग अति नीचे गिरते हैं, तो वे तथाकथित हिंदुरक्षक अति ऊपर उठ जाते हैं। व्यावहारिक दुनिया के बीच में अर्थात मध्यमार्ग पर कोई नहीं रहते। अति सर्वत्र वर्जयेत। मध्यमार्ग ही सर्वोत्तम है। इसको एक उदाहरण से समझ सकते हैं। एक ही बंदूक होती है। एक सभ्य आदमी उससे आतंकवादी को मारता है, तो दूसरा सिरफिरा व्यक्ति आम जनता को। इसमें बंदूक का क्या दोष। इसी तरह शिवनियंत्रित शिवलिंग अज्ञानरूपी राक्षस को मारता है, तो इसके विपरीत आमजनप्रयुक्त इसका साधारण रूप ज्ञानरूपी देवता को। एकबार मेरी मुलाकात एक तांत्रिक व्यक्ति से हुई थी, जो मेरे मित्र का मित्र था। उसने कामाक्षी मंदिर में गुरु से दीक्षा ली हुई थी। वह बता रहा था कि उसके सामने एक तांत्रिक ने भीड़ भरी सड़क से गुजर रही आम व अनजानी महिला पर अपनी वशीकरण विद्या चलाई थी, जिससे वह उसके बुलाने पर उसके पीछे आकर उसके साथ कुछ भी करने को तैयार थी। हालांकि वह तो अपनी विद्या का परीक्षण कर रहा था, इसलिए उसने वशीकरण को बंद कर दिया, जिससे वह महिला वापिस अपने रास्ते चली गई। सच्चे तांत्रिक तो कभी गलत काम करते भी नहीं हैं, अगर करते हैं तो सीधे नरक को जाते हैं। बोलने का मतलब है कि उपरोक्त पौराणिक कथा के अन्दर भी कोई ऐसा ही वशीकरण रहस्य छिपा हुआ, क्योंकि पुराने जमाने के लोगों के लिए तो जागृति ही सबसे अहम उपलब्धि हुआ करती थी, जिसके लिए वे सबसे अधिक प्रयास किया करते थे। आजकल तो और भी बहुतेरी विद्याओं और कलाओं का बोलबाला है, जिसके लिए लोग बहुत संघर्ष करते हैं। फिर भी वे पौराणिक विद्याएं अभी भी गुरुपरंपराओं में जीवित हो सकती हैं, जिन्हें यदि राजसहायता मिले तो उन्हें खोजा जा सकता है, और उन्हें भविष्य के लिए संरक्षित किया जा सकता है।

कुण्डलिनी जागरण और आत्मज्ञान या आत्मबोध के बीच में तत्त्वतः कोई अंतर नहीं है

मुझे बिंग एआई से जानकारी मिली कि आत्मज्ञान धीरे धीरे हासिल होता है, किसी योग आदि तकनीक से एकदम से नहीं। पर आत्मज्ञान कहते हैं, अपने को महसूस करने को। बहुत से लोगों ने इसे योग तकनीक से महसूस किया है। मुझे भी परमात्मा की असीम कृपा से सौभाग्यवश तंत्रसहायित कुंडलिनी योग से इसकी मामुली सी झलक महसूस की थी, जिसका वर्णन तथाकथित 10 सैकंड का कुंडलिनी जागरण कह के वर्णित किया गया है इस वेबसाईट पर। दुर्भाग्यवश ज्यादातर लोग इस स्तर तक नहीं पहुंच पाए होंगे और कुंडलिनी क्रियाशीलता या तथाकथित कुंडलिनी जागरण तक ही सीमित कर पाए हों, और वैसा ही वर्णन उन्होंने ऑनलाइन किया हो, जिसे बिंग एआई ने पकड़ लिया हो। शायद चैट जीपीटी वही पकड़ता है जो ज्यादा होता है। उनका कुंडलिनी जागरण भी आत्मज्ञान से निचले स्तर का रहा होगा। जागरण या समाधि के भी स्तर होते हैं। जैसे कोई आदमी जागकर बैठता है, कोई चलता है, कोई दौड़ता है, तो कोई दुनिया जीतता है। इसी तरह कुंडलिनी जागरण की अंतिम पराकाष्ठा ही आत्मज्ञान है। अगर मैं पुराणपाठी गुरु और देवताओं के सान्निध्य और उनकी अप्रत्यक्ष प्रेरणा से साधारण कुंडलिनी जागरण को तांत्रिक बल न देता तो शायद वह कुछ ही क्षणों के लिए पूर्ण रूप से जागृत महसूस न हुई होती। यही पूर्ण जागृति आत्मज्ञान है। मतलब इसमें मन जागकर आत्मा या परमात्मा जितना विस्तृत हो गया है। सिर्फ स्तर का अंतर है, और कुछ नहीं। इसे ही पूर्ण समाधि भी कह सकते हैं। तथाकथित आम भाषा की समाधि भी कुंडलिनी जागरण का बहुत ऊंचा स्तर होता है। वैसे तो हरेक अनुभव किसी न किसी स्तर की समाधि होता है। किसी चीज से जुड़े बिना हम उसे अनुभव ही नहीं कर सकते। पर पूर्ण जागरण मतलब आत्मज्ञान उस तथाकथित या लोकप्रसिद्ध योगसमाधि से भी एक कदम आगे होता है। ज्यादातर मामलों में समाधि को ही योग से प्राप्त होने वाली अंतिम अवधि माना जाता है। यह इसलिए क्योंकि योग की सहायता से समाधि से आगे बहुत कम लोग गए होंगे जिनकी आवाज को अनसुना कर दिया गया होगा। संसार में तो बीन बाजे की ही ज्यादा पूछ होती है। ज्यादातर लोग लोकलाज या घरगृहस्थी की मोहमाया से घरबार न छोड़ सकने के कारण अपनी समाधि को यौनतांत्रिक बल न दे पाए होंगे। शायद इसी वजह से पतंजलि ने भी अपने अष्टांगयोग सूत्र में समाधि को ही योग की अंतिम अवधि मान बैठे हैं। हो सकता है कि वे अल्पसंख्यक योगियों की आवाज न सुन पाए हों। पतंजलि भी यही कहते हैं कि अगर समाधि के बाद ईश्वर के सहारे जीवन जिया जाए , तो उनकी कृपा से आत्मज्ञान भी शीघ्र ही हो जाता है। जो काम आदमी खुद कर सकता है, उसके लिए खुद भी प्रयत्न करना चाहिए, ईश्वर तो ख़ैर हमेशा ही सबकी सहायता करता है। यह अक्सर होता है कि अपने काम की कमी को पूरा करने के लिए भी ईश्वर से मदद मांगी जाती है। मुझे यह भी लगता है कि इसमें गलतफहमी भी हुई है। क्योंकि समाधि का अनुभव तो अक्सर योगसाधना की क्रिया के दौरान होता है, पर जागृति का नहीं। जागृति कहीं सुंदर स्थान जैसे झील के पास, पहाड़ पर, या समारोह आदि में ज्यादा होती है। पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उस समय भी नियमित रूप से चल रही वर्तमानकालिक तांत्रिक योगसाधना से इकट्ठी हुई कुंडलिनी ऊर्जा ही जागृति कराती है। क्योंकि तांत्रिक तरीके से ही योगसाधना वैज्ञानिक रूप से निश्चित और अल्प समय में मतलब कुछ महीनों के अंदर आत्मज्ञान करा सकती है, पर साधारण योग से तो पूर्णतः अनिश्चित होता है। क्या पता कितने साल में होए, पूरी उम्र में होए या ताउम्र न होए। ज्यादातर को तो ताउम्र नहीं होता, ऐसा लगता है। लोग बताने से छिपाते हों, यह अलग बात है। पूरी तरह से चमत्कार या विशेष कृपा की जरूरत होती है, जैसा पतंजलि कहते हैं। वैसे यह पतंजलि की मजबूरी भी रही होगी क्योंकि अगर उनकी पुस्तक में तंत्र का उल्लेख किया गया होता, तो शायद वह उस समय के अति आदर्शवादी समाज को ज्यादा स्वीकार्य न होती। एक कामयाब लेखक बनने के लिए कई बार सत्य को ढकना भी पड़ जाता है। इसीलिए मुझे शिव सबसे बड़े देवता लगते हैं, क्योंकि वे खुलकर सत्य सबके सामने रखते हैं। जिसे ऑनलाइन पोर्टल पर उम्र के पड़ाव के साथ धीरे धीरे मिलने वाला बताया गया है, वह आत्मज्ञान नहीं बल्कि आत्मा की विचारों की गंदगी की सफाई है। आत्मा मतलब अपने को जानने में तो कुछ ही क्षण काफी हैं। हम दोस्त को पहचानने में भी कुछ क्षणों से ज्यादा समय नहीं लेते, फिर उस अपने आप को पहचानने में कैसे ज्यादा समय ले सकते हैं, जो सबसे निकट है।

शुभ दीपावली

कुंडलिनीयोग अतिरिक्त तांत्रिक शक्ति का उपभोग करता है

दोस्तों, शास्त्रों में विशेषकर शिवपुराण में एक कथा आती है कि एकबार देवराज इंद्र भगवान ब्रह्मा और अन्य देवताओं को साथ लेकर कैलाश जाकर भगवान शिव के दर्शन करने की इच्छा से अपने घर से निकले। भगवान शिव को तो यह पता लग ही गया, क्योंकि वे त्रिकालदर्शी हैं। उन्होंने लीला के लिए उनकी परीक्षा लेने की सोची। वे एक जटाधारी अवधूत का वेश बनाकर उनके मार्ग में खड़े हो गए। देवराज इंद्र ने उनसे पूछा कि वे कौन हैं, और उनसे रास्ता छोड़ने के लिए कहा। यह भी पूछा कि क्या शिव उस समय कैलाश पर ही थे। पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उनसे बारबार पूछा गया, फिर भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। अंत में गुस्से में आकर इंद्र ने उनके ऊपर महा घातक अस्त्र वज्र चला दिया। उसी समय शिव अपने असली रूप में आ गए जिससे वज्र उनका कुछ न बिगाड़ सका। शिवजी को इंद्र पर बहुत क्रोध आ रहा था, और वे उसका वध ही करने वाले थे कि ब्रह्मा उनके पैरों में पड़कर उन्हें मनाने लगे। उससे शिव को उन पर दया आ गई। शिव ने उनसे पूछा कि वे अपना गुस्सा कहां डालें। पूर्णयोगी का गुस्सा अगर एकबार बाहर निकल आए तो वह वापिस नहीं लौटता। ब्रह्मा ने उन्हें वह गुस्सा समुद्र में डालने को कहा। उससे समुद्र से जलंधर असुर का जन्म हुआ।

उपरोक्त कथा का अध्यात्मवैज्ञानिक विश्लेषण

शिव का मतलब यहां जागृत व्यक्ति है। इंद्र का मतलब यहां साधारण तांत्रिक या साधारण पंचमकारी है। साधारण तंत्र से जो शक्ति मिलती है, वह कुंडलिनी ध्यान के लिए नहीं, बल्कि दुनियादारी की बढ़ौतरी के लिए इस्तेमाल होती है। इसमें काली तंत्रसिद्धियां जैसे कि मारण, टारण आदि भी शामिल हैं। सम्भवतः इंद्र के द्वारा मारण शक्ति के प्रयोग को ही वज्रप्रहार कहा गया है, क्योंकि जागृति की तरह ऐसी तांत्रिक शक्तियों का मूल स्रोत भी मेरुदंड से गुजरने वाली वज्रशक्ति या सुषुम्नाशक्ति ही प्रतीत होती है। अलौकिक शक्ति को प्राप्त करने का तरीका इससे अलग तो कोई दिखता नहीं शरीर में। पर उससे असली तंत्रयोगी का उसी तरह कुछ नहीं बिगड़ता जैसे जुगनू दीपक का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, उल्टा खुद ही जल सकते हैं। कई बार बहुत से जुगनू इकट्ठे हो जाएं तो उसे थोड़ा ढक जरूर सकते हैं। इसी तरह बहुत शक्तिशाली वज्रशक्ति या बहुत से लोगों द्वारा चलाई गई घृणात्मक तांत्रिक वज्रशक्ति जागृत योगी का कुछ नुकसान भी कर सकती है। ऐसे तो वह अपनी हानि की कोई परवाह न करके सत्य की राह पर चलता रहता है, पर जब उसकी जान पे ही बन आती है, तो फिर आत्मरक्षा के लिए गुस्सा कुदरतन निकलता है, वह जानबूझ कर निकाला गया आम गुस्सा नहीं होता, और न ही वह गुस्से की तरह लगता है। उसका गुस्सा रूपांतरित होकर निकलता है। जैसे कि किसी समाजसुधारक आंदोलन के रूप में या किसी को वरदान के रूप में। वह गुस्सा किसी का अहित नहीं करता, क्योंकि जागृत व्यक्ति से किसी का अहित होता ही नहीं बस तक। अब जलंधर की उत्पत्ति में समाज का कौन सा भला छिपा है, यह तो पता नहीं, पर इंद्र नष्ट होने से बच गया, मतलब सारी सृष्टि नष्ट होने से बच गई, क्योंकि इंद्र देवताओं का राजा है। गुस्सा आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन है। गुस्से से अपना ही शरीर कमजोर या नष्ट होता है, और हमारे अपने शरीर रूपी ब्रह्मांड में इंद्र समेत सारे देवता स्थित हैं। यह कह सकते हैं कि जलंधर मूलाधार को उतरी हुई गुस्से की ऊर्जा है। इसे कहते हैं गुस्सा पी लिया। उस समय तो पी लिया पर बाद में वह मूलाधार से अनैतिक प्रेम प्रसंग के रूप में भी निकल सकता है। यही जलंधर है जो पार्वती और लक्ष्मी के ऊपर आसक्त हो गया था। उसे पतिव्रता वृंदा ही मरने से बचाती थी। इसका मतलब है कि वह पत्नी की सहायता से प्राप्त तंत्रबल से शिव और विष्णु की तरह तेजस्वी हो गया था। वैसे भी उसे शिव का ही अंश माना जाता है। उसने सब देवताओं को पराजित कर दिया था, मतलब वह देवताओं से संचालित प्रकृति के वश में नहीं रह गया था, और सभी को दुख देते हुए भी तंत्रबल से सुखी रहता था। जब विष्णु ने धोखे से वृंदा का शील भंग किया तो उसने आत्मदाह कर लिया और वहां तुलसी का पौधा उग गया। तुलसी हिंदु धर्म का सबसे पवित्र पौधा है जो लगभग हर हिंदु परिवार के आंगन में उगा मिल जाएगा। यह औषधीय और आध्यात्मिक गुणों का भंडार है। मतलब साफ है कि पतिव्रता स्त्री सभी किस्म के मनुष्यों से श्रेष्ठ है जो हर घरपरिवार में होनी चाहिए। पंजाब का जालंधर नाम इसी असुर के नाम से पड़ा है। यहां एक वृंदा का मंदिर भी है। वास्तव में तंत्रयोगी की सफलता में उसकी पत्नि का बड़ा हाथ होता है। पत्नि अगर सहयोग न करे तो देवता भी सहयोग नहीं करते। मुक्ति की राह में असफल होना ही मरना है। वास्तव में जो ध्यान योगी होता है, उसका अतिरिक्त तांत्रिक बल कुंडलिनी ध्यान में खर्च होता रहता है, जिससे किसी का बुरा सोचने व बुरा करने के लिए शक्ति ही नहीं बची रहती। पर जो तांत्रिक आचारों और तकनीकों का इस्तेमाल तो करते हैं पर इष्ट ध्यान नहीं करते, उनमें अतिरिक्त तांत्रिक उर्जा शरीर में जमा हुई रहती है। वही उनसे गलत करवा सकती है। इसे चाहे काला जादू कहो या टोना टोटका या देसी भाषा में नजर लगना या जिहादी किस्म की मानसिकता रखना या खा पी कर हंगामा करना। कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बहुत से संगठनों, राष्ट्रों, धर्मों या संप्रदायों द्वारा अपनी अवैध व अनैतिक बढ़ौत्तरी के लिए इसी अतिरिक्त या अनियंत्रित तांत्रिक ऊर्जा का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है। राक्षस भी इसी से पैदा होते थे, हालांकि मरते भी इसी से ही थे। यह उपयोग के तरीके पर निर्भर करता है। एनर्जी ने रिलीज होना ही होता है। वैसे भी शिव मस्तमलंग हैं। मतलब वे अपने में ही मस्त हैं। इसका मतलब है कि वे अपने में ही सब गुण धारण कर लेते हैं आवश्यकता अनुसार। तभी उन्हे भूतिया कहा जाता है, क्योंकि वे जरूरत पड़ने पर तमोगुण भी स्वीकार कर लेते हैं। शायद इसी से तांत्रिक पंचमकार की अवधारणा हुई है। अन्य लोग तो गुणों के संतुलन के लिए एकदूसरे पर आश्रित रहते हैं। कुछ लोग हमेशा सतोगुणी रहते हैं, जैसे कि विष्णु, तो कुछ तमोगुणी, जैसे असुर और पशु और अन्य कुछ रजोगुणी, जैसे कि ब्रह्मा और इंद्र। ये तीनों किस्म के लोग एकदूसरे पर आश्रित रहते हैं। इसलिए ये एकदूसरे को नाराज या परेशान करने से बचते हैं, जहां तक हो सके। खासकर सतोगुणी लोग, क्योंकि सतोगुण सबसे कमजोर होता है, और इसे अपने भारणपोषण के लिए भी अन्य दोनों गुणों की जरूरत पड़ती है। पर शिव को किसी की कोई परवाह नहीं है। वह अपने आप में पूर्ण सक्षम हैं। इसीलिए वे इंद्र को क्षमा करने के मूढ़ में नहीं होते पर लोकहित के लिए करना पड़ता है, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं, क्योंकि उन्हें किसी की आवश्यकता ही नहीं है। जागृति की अवस्था को सतोगुणी नहीं कह सकते, बेशक यह सतोगुण की प्रचुरता से प्राप्त होती है। इसमें बेशक सतोगुण जैसा प्रकाश होता है पर वह आम दुनियावी सतोगुण से अलग होता है। उसमें तमोगुण के जैसा और रजोगुण के जैसा आभास भी होता है, पर वे भी इन दुनियावी गुणों से अलग लगते हैं। तीनों गुणों का मिश्रण भी नहीं कह सकते क्योंकि बेशक इसका वर्णन करने के लिए इनका सहारा लेना पड़ता होए, और यह इनके मिश्रण की तरह महसूस होता है, पर शास्त्रों के अनुसार यह इनका मिश्रण भी नहीं होता। शायद इसीलिए इसे त्रिगुणातीत या निर्गुण कहा गया है। यह ऐसे है जैसे अगर पानी में चीनी, नींबू और नमक बराबर मात्रा में घोला जाए तो वह पानी सादा लगेगा पर असल में वह शुद्ध सादा जल नहीं होता। इसी तरह अगर तीनों गुण बराबर रहें तो वह अवस्था त्रिगुणातीत लगेगी पर असल में वह आत्मा की शुद्ध त्रिगुणातीत या निर्गुण अवस्था नहीं होती। शायद इसी धोखे के कारण कई आध्यात्मिक नेता अपने आप को भगवान समझ बैठते हैं। इसी वजह से ही जागृति का अनुभव भी दुनियावी अनुभव से अलग स्वरूप वाला नहीं लगता। पर असल में दोनों के बीच में जमीन आसमान का फर्क होता है। जहां जागृति का अनुभव शुद्ध जल की तरह है, वहीं दुनियावी अनुभव नमक, नींबू और चीनी मिश्रित जल की तरह है। तीनों का अनुपात हरपल बदलता रहता है। जब यह बराबर हो जाता है, तब जागृति जैसा प्रकाश और सुख महसूस होता है। योग से इड़ापिंगला अर्थात यिनयांग के संतुलन से ऐसा ही होता है। यह हमें जागृति जैसी अवस्था का आभास देता है। इससे आदमी असली जागृति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित होता है। इन सब बातों का मतलब साफ है कि शिव का तथाकथित तमोगुण उनकी जागृति में बाधक नहीं बल्कि सहायक होता है। वैसे वह तमोगुण नहीं होता पर तमोगुण जैसा लगता है। होता तो वह सतोगुण ही है। शायद सतोगुण के अहंकार को खत्म करके ऐसा होता है। शास्त्रों में भी ऐसा ही कहा है कि सतोगुण से भी जागृति तभी मिलती है, जब उसके प्रति भी अहम भाव नष्ट हो जाता है। अहम नष्ट होने से सतोगुण के रहते हुए भी वह ज्यादा ध्यान में नहीं रहता। उसके प्रति ध्यान या आसक्ति के अभाव से ही वह तमोगुण की तरह भासता है। शिव का तमोगुण ऐसा ही वर्चुअल अर्थात आभासी है, वास्तविक नहीं।

कुंडलिनी जागरण का कोर्स भौतिक दुनियादारी की डिग्री के साथ संलग्न प्रतीत होता है

शायद कुंडलिनी जागरण जैसी वैज्ञानिक और रोमांचकारी घटना को अजीब, सबसे हटकर, अलौकिक, धर्म या संप्रदाय से जुड़ा या आत्मा से ही जुड़ा हुआ दिखाया गया। पता नहीं क्यों आत्मा को लोग पड़ोसी के खेत में उगी मूली समझ लेते हैं। आत्मा तो अपना आप है, सेल्फ है। अंग्रेजी का सेल्फ फिर भी ज्यादा सटीक लगता है। संस्कृत का आत्मन शब्द भी ठीक है, क्योंकि यह अपने आप या सेल्फ के लिए प्रयुक्त शब्द ही है। अन्य भाषाओं में लोग बात का बतंगड़ बना सकते हैं। कुंडलिनी जागरण भौतिक सुखानुभूति का चरम की तरह ही तो है। भौतिक उपलब्धियों के शीर्ष की तरह ही तो है। जब आदमी इसे भौतिक दुनिया से अलग समझता है, तब वह दुनिया से अलगथलग सा रहने लगता है, किसी अलग ही अलौकिक आंनद या जागरण की खोज में, पर दरअसल उसे मिलता कुछ भी नहीं है। किसी जागृत व्यक्ति के बारे में लोग बड़ीबड़ी, हैरानी व पराएपन या अजनबीपन से भरी आंखें करके बोलते हैं कि वह तो भाई दुनियादारी से हटकर बाबाओं वाली विशेष दुनिया का शख्स है। शायद उससे डरते जैसे भी हैं जैसे कोई एलियन से डरता है। वैसे ऐसा है भी और नहीं भी है। यह समाज और संस्कृति पर निर्भर करता है। वैदिक समाज और संस्कृति वालों को वह अपना नायक या प्रेमास्पद लग सकता है, तो अवैदिक तत्त्वों को इसके विपरीत। इसका कारण यह है कि वैदिक संस्कृति जागृति के सबसे करीब और पक्षधर है। अवैदिक लोग तो यह समझते ही नहीं कि जिस भौतिक मौजमस्ती की वे बूंद बूंद की तरफ़ भागे फिरते हैं, मानो उसी भौतिक मस्ती का उसने पूरा घड़ा जैसा ही इकट्ठा पी लिया है। शायद कोई पारलौकिक वगैरह कुछ नहीं। यह इसलिए क्योंकि उन्होंने सुना ही ऐसा है, उन्हें जन्म से लेकर सिखाया ही ऐसा गया है। अगर दुनिया से दूर रहकर जागृति मिलती तब तो सभी बाबाओं को मिलती, पर मुझे तो एक बाबा भी नहीं दिखा आजतक। मैंने बहुत से बाबाओं के बारे में पढ़ा सुना, पर कहीं उन्हें जागृति का अनुभव होते नहीं जान पाया। बहुत से बाबाओं से बात भी की, वे तो जागृति की परिभाषा भी नहीं दे पाए। कल्पना करो कई पर्वतारोही दोस्त एवरेस्ट चढ़ रहे हों। अचानक उनमें से एक बोले कि उसने तो इससे भी बड़ी उंचाई मैदान में रहकर ही छू ली है जागृति के रूप में, पर कोई विश्वास नहीं करेगा। सब बोलेंगे जागृति एक अलग विषय है, और भौतिक उपलब्धि अलग। इससे क्या होता है कि जब आदमी बड़ी भौतिक उपलब्धि भी हासिल कर लेता है, तब भी वह जागृति को प्राप्त करने के लिए प्रेरित नहीं होता, क्योंकि उसने माना ही नहीं कि उसके सारे भौतिक प्रयास एक प्रकार के जागृति को प्राप्त करने के प्रयास ही हैं। वह भौतिक विकास के शिखर पर पहुंचकर भी जागृति से सिर्फ एक कदम दूर होता है अपनी इसी मूर्ख मानयता की वजह से। वह समुद्र में मछली की तरह प्यासा होता है। जो सही मान्यता में स्थित रहता है, उसे भौतिकता के चरम के निकट ही जागृति का अहसास होने लगता है, और तंत्र, योग आदि की सहायता से एक कदम की अंतिम छलांग लगा के उसे पा भी लेता है। जो भेदभाव की गलत मान्यता में रहता है, वह भौतिक दुनियादारी की मौजमस्ती या विकास के चरम के पास पहुंचकर अपनी यात्रा का अंत मान लेता है, और निश्चय करता है कि अब भौतिकता का विषय खतम और अब अध्यात्म का विषय शुरु से प्रारंभ करेगा। मतलब वह पांच में से चार साल की अधूरी डिग्री को संदूक में रखकर पांचवे व अंतिम वर्ष के जागृति के विषय को देखकर बोलता है कि यह तो अध्यात्म का विषय है, इससे उसे क्या मतलब। थोड़े टाइम बाद वह चार साल की डिग्री भी भूल जाता है, और टाइम गैप के कारण उसे पांचवे वर्ष में दाखिला भी नहीं मिल पाता। मजबूरन वह अध्यात्म का विषय नर्सरी केजी से पढ़ना शुरु करता है। सोचो उसे फिर कितना समय लगेगा। संलग्न या अटैचड जागृति के एक साल के आसान कोर्स को छोड़कर वह सत्रह साल की जागृति की डिग्री को चुनता है। जब तक वह मिलती है, तब तक आदमी बूढ़ा हो जाता है। फिर पता नहीं किस जन्म में मिलेगी। जागृति जवान शरीर रहते मिल जाए तो अच्छा है, उसके बाद तो भाई राम भरोसे। ऐसी संकुचित सोच एकदम से नहीं आई है, पुराने पंथों के अंधानुकरण से धीरेधीरे समाज में फैली है। इसलिए पुरानी अच्छी बातों को तो मानना ही चाहिए, पर आदमी को स्वतंत्र सोच का भी होना चहिए। मैं सीमित कट्टरता का विरोधी नहीं हूं। जहां भी मैंने कट्टरता के विरोध की बात की है, उसे अतिकट्टरता का विरोध समझना चाहिए। अब हर जगह अतिअति तो नहीं लगा सकते। ये सब शब्दों के खेल हैं, जो आराम से बात का बतंगड़ बना सकते हैं। कुछ कट्टरता तो धर्म के लिए जरुरी भी होती है। अतिकट्टरता खराब होती है। सारे अमानवीय काम अतिकट्टरता से होते हैं, सीमित या साधारण कट्टरता से नहीं। कट्टरता से आदमी अपने मानवीय नियमधर्म पर दृढ़ता से टिका रहता है। धर्म क्या दुनिया के हर काम के लिए कुछ कट्टरता जरूरी होती है। अगर हिंदुओं में कट्टरता न होती, तो उनके बहुमूल्य वेदपुराण आज तक संरक्षित न रहते, खासकर जैसे हमले उनपर होते आए हैं। किसी देश की संस्कृति, तकनीक व बोलचाल आदि अनगिनत सामाजिक उपलब्धियां कट्टरता से ही संरक्षित रहती हैं, और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे से आगे सौंपी जाती रहती हैं। आजकल हाल यह है कि बेचारे हिंदुओं के द्वारा अपनी और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अपनाई जा रही मामूली सी कट्टरता पर भी प्रश्नचिह्न लगाया जा रहा है, और अन्य अनेक वर्गों की अतिकट्टरता को भी नजरंदाज किया जा रहा है। इस चाल को समझने की जरूरत है। आत्मरक्षा के लिए कुछ तथाकथित कट्टर हिंदु देश में समान नागरिक संहिता की वकालत कर रहे हैं, वहीं हिंदुओं का बड़ा वर्ग अन्य वर्गों की चाल में आकर और कुछ निजी स्वार्थों के लालच में आकर अपने को पूरी तरह कट्टरताहीन साबित करने के लिए उनका विरोध कर रहा है। यही वजह है कि बड़े भारी अंतर से बहुसंख्यक होकर भी हिंदु बंटे हुए हैं, और अपनी सनातन संस्कृति की रक्षा तक नहीं कर पा रहे हैं, उसका विकास तो दूर की बात है। अशुभ कट्टरता ने शुभ कट्टरता को परेशान किया हुआ है। कहते हैं कि बारह वर्ष की साधना के बाद कुंडलिनी जागरण मिलता है। इसका यह मतलब नहीं कि बारह साल तक नाक पकड़कर बैठे रहने से जागृति मिलती है। इसका मतलब यह है कि अगर उपरोक्त सही मान्यता के साथ बारह वर्ष तक युक्तियुक्त ढंग से भौतिक दुनियादारी में रहा जाए, तो तेरहवें वर्ष की साधना से कुंडलिनी जागरण मिल सकता है। यह ऐसे ही होता है, जैसे अगर बीटेक की डिग्री के अंत में छात्रों को बोला जाए कि इसके साथ एमटेक की एक साल की डिग्री भी जोड़ी जा रही है, तो आधे से ज्यादा बच्चे छोड़ के चले जाएंगे, क्योंकि वे उसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। परंतु अगर शुरु से ही चार साल की बीटेकएमटेक इंटीग्रेटिड डिग्री करवाई जाए, तो सभी बच्चे आसानी से कर लेते हैं, क्योंकि वे उसके लिए प्रारंभ से लेकर ही हमेशा मानसिक रूप से तैयार रहे हैं। विश्वास और लगन का महत्त्व जीवन के हरेक क्षेत्र में है। मैंने बचपन में सब तीर्थ किए, जिन्हें चार धाम यात्रा कहते हैं। उस पर भी समय मिलने पर पोस्ट बनाऊंगा। संभवतः इसीलिए जागृति हुई। कई लोग चार दिन योग करके दावा करने लग जाते हैं कि जागृति मिल गई। वो नाड़ियों की हलचल को जागृति मान लेते हैं। माना कि योग करने से जागृति मिलती है, पर सही योगाभ्यास तक पहुंचने के लिए आध्यात्मिक अभ्यास करते हुऐ बहुत लंबा समय लग सकता है। इसीलिए सनातन वैदिक धर्म में विस्तृत आध्यात्मिक प्रक्रियाएं हैं। यह ऐसे ही है जैसे धरती के सबसे बाहरी ऑर्बिट से बाहर अंतरिक्ष में छलांग लगाना बहुत आसान है पर वहां तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। यह अलग बात है कि कोई तेज दिमाग आदमी किसी अनुभवी आदमी से एकदम सीख जाए, पर ऐसे लोग बहुत बिरले होते हैं। शास्त्रों में इन तीर्थों के प्रति विश्वास बनवाया गया है। पूरे भारत में लगभग सभी स्थानों को अध्यात्म कथाओं के साथ जोड़ा गया है। इससे उन स्थानों को दिव्यता मिलती है। विश्वास या मान्यता में बहुत बल है। उल्टी मान्यता से ही अनंत आत्मा सीमित जगत बन जाता है। जब मान्यता को सीधा किया जाता है, तो सीमित जगत दुबारा अपने असली अनंत आत्मरूप में आ जाता है। क्वांटम विज्ञान भी यही सिद्ध करता है कि अगर पदार्थ को खंडखंड या कणरूप मानोगे तो वह वैसा ही दिखेगा, और अगर अखंड या तरंगरूप मानोगे तो वैसा ही दिखेगा, बेशक असली, सुखरूप और मोक्षरूप दूसरे वाला रूप अर्थात अखंड या अद्वैत रूप ही है। मुझे तो लगता है कि जो सनातन धर्म के कर्मकांड हैं, वे दरअसल शरीर में हो रहीं यौगिक चीजें और क्रियाएं हैं, जिन्हें स्थूल रूप देकर स्थूल जगत में स्थूल वस्तुओं और क्रियाओं के रूप में दिखाया जाता है। इसके दो लाभ होते हैं। एक तो दुनियादारी की सभी चीजों व क्रियाओं में दिव्यता आ जाती है, जिससे सबकुछ पूजा ही बन जाता है। मानो तो पत्थर में भी भगवान है, न मानो तो कहीं भी नहीं है। दूसरा, लोगों के अवचेतन मन पर उनका सूक्ष्म प्रभाव लगातार पड़ता रहता है, जिससे लोग अनायास ही योग की तरफ मुड़ते चले जाते हैं। पुराने जमाने में लोगों के पास बहुत सा अतिरिक्त या खाली समय होता था, खासकर भारत में क्योंकि अनाज आदि प्राकृतिक संसाधनो की उपज अच्छी थी और तकनीकी कलिष्टता या उससे उपजा तनाव भी नहीं था। मानसूनी मौसम है भारत का। यहां मानसून में खूब फसल उगा कर लोग भंडारित कर देते होंगे और पूरे साल आराम से बैठकर उसका उपभोग करते होंगे, क्योंकि यहां मानसून के मौसम में ही वर्षा होती है, बाकि पूरे साल खुशनुमा धूप खिली रहती है। इसलिए बहुत सोच समझ कर वेदपुराण लिखे गए होंगे ताकि समाज में स्वीकार हो सकें। उनके ऊपर वादविवाद हुए होंगे, फिर उनके संशोधन भी हुए होंगे। आज तो हर कोई पुस्तक लिख दे रहा है, जिसपे न चर्चा होती है और न वादविवाद। इसलिए इनकी प्रामाणिकता पर वेदपुराणों से ज्यादा संदेह है। सभी मिथक कथाओं का रहस्योद्घाटन आम बुद्धि से नहीं हो सकता। इसका मतलब यह नहीं है कि वे बिल्कुल कपोलकल्पित या बिना किसी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के है। पर जिन बहुत सी मिथक कथाओं का रहस्योद्घाटन इस वैबसाईट पर है, इससे यही सबसे बड़ा संदेश जाता है कि वेदपुराणों की सभी मिथक कथाएं शास्त्रीय, सैद्धांतिक और अध्यात्मवैज्ञानिक हैं। इसलिए विश्वास करने में ही भलाई है क्योंकि विश्वास में बहुत शक्ति है। अन्य धर्मों या संप्रदायों की तरह सनातन हिंदु धर्म किसी एक व्यक्ति ने नहीं बनाया है बल्कि इसे अनगिनत ब्राह्मणों, ऋषियों, योगियों और दार्शनिकों ने अनंत कालखंड की धारा से सींचा है। इसीलिए यह सर्वाधिक लोकतंत्रात्मक धर्म प्रतीत होता है।