कुंडलिनी योग उन्नत अनुभूति को बेसिक कॉग्निशन मतलब बुनियादी अनुभूति में बदलता है

दोस्तों, आदमी एक उन्नत प्राणी है। इसमें उन्नतम कॉग्निशन विद्यमान है। पर उन्नत कॉग्निशन का एक दुष्प्रभाव यह है कि इससे आसक्ति पैदा हो जाती है, जिससे आदमी इससे बंध जाता है। यह ऐसे ही है जैसे जीवन रक्षक दवा सबसे ज्यादा मददगार भी होती है, पर उसका दुष्प्रभाव भी सबसे ज्यादा होता है।

हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं में बेसिक कॉग्निशन अर्थात बुनियादी अनुभूति होती है। इसी तरह सभी निम्नतम और सूक्ष्मतम जीवों में भी बेसिक कॉग्निशन होती है। ये सभी, वातावरण के अनुसार अपने को ढालते हैं। जीवित रहने के लिए हमारी तरह ही जीवनचर्या करते हैं। नई चीजें सीखते हैं, और पुरानी चीजों को याद रखते हैं। पर इसके लिए उनमें दिमाग जैसी संरचना नहीं देखी गई है, अभी तक। मतलब कि वे विभिन्न व अनगिनत रासायनिक क्रियाओं की श्रृंखलाओं से नियंत्रित होते हैं। तो क्यों ना उन रासायनिक क्रियाओं को ही उनका दिमाग मान लें। हमारा दिमाग भी तो रासायनिक क्रियाओं से ही चलता है। हो सकता है कि पत्थर, हवा जैसे निर्जीव पदार्थों में भी इससे कमतर स्तर की बेसिक कॉग्निशन हो, जिसे विज्ञान अभी तक समझ नहीं पाया हो। हवा का प्रवाह वातावरण के दबाव से नियंत्रित होता है। तो क्यों ना वायुदाब को हवा का बेसिक कॉग्निशन माना जाए। इसी तरह हर बार एक खास वायुदाब पर हवा की एक खास प्रतिक्रिया होती है। तो क्यों ना इसे वायुदाब की स्मरणशक्ति माना जाए। बेसिक कॉग्निशन के साथ अच्छे और बुरे की भावना नहीं होती। जैसे कि किसी स्थान पर कम वायुदाब होने से हवा का वहां पर प्रविष्ट होना हवा को अच्छा अनुभव नहीं देता। ना ही वहां उच्च वायुदाब होने पर वहां से हवा का रुखसत होना हवा को बुरा अनुभव देता है। इसी तरह जीवाणु को भोजन का कण प्राप्त होने पर खुशी नहीं होती और शत्रु का सामना होने पर उसे दुख नहीं होता। मतलब कि बेसिक कॉग्निशन के साथ राग, द्वेष नहीं होता। वहीं पर उच्च कोगनिशन में वह बीच वाली समान अवस्था राग और द्वेष में बदल जाती है। वैसे ही जैसे एक न्यूट्रॉन एक पॉजिटिव प्रोटॉन और एक नेगेटिव इलेक्ट्रॉन में रूपांतरित हो जाता है। जब दोनों को मिलाया जाए तो फिर से न्यूट्रल न्यूट्रॉन बन जाता है। प्लस और माइनस के चार्ज को अलग-अलग रहते नष्ट नहीं किया जा सकता। यह दोनों तभी नष्ट होंगे, जब आपस में मिलेंगे। इसी तरह हम राग को और द्वेष को अलग, अलग रखकर खत्म नहीं कर सकते। अगर राग और द्वेष को आसक्ति से बनाकर रखेंगे, तो ये अलग-अलग बने रहेंगे और मजबूत होते रहेंगे। जब राग पैदा होगा तो कहीं न कहीं द्वेष भी जरूर पैदा होगा, क्योंकि ये भी विद्युत चार्ज की तरह जोड़ों में पैदा होते हैं, अकेले नहीं। अनासक्ति ही वह सरकट है, जो पॉजिटिव राग और नेगेटिव द्वेष को आपस में जोड़ कर दोनों को खत्म कर देती है। पॉजिटिव को यांग कह लो, और नेगेटिव को यिन कह लो। इनका मिलन ही बहुचर्चित संगम है, अद्वैत है।

कॉग्निशन का विकास एक आवश्यक बुराई की तरह है। जब आदमी केवल हवा, पानी या सूक्ष्म जीव के रूप में था, तब तक उसमें बेसिक कॉग्निशन थी। उसमें न राग था, न द्वेष था। वह तटस्थ होता था। वह न सुखी था, न दुखी था। पर जैसे-जैसे कॉग्निशन विकसित हुई, उसे अच्छे और बुरे का अनुभव होने लगा। इससे उसमें सुख-दुख की उत्पत्ति हुई। जीवन, मरण की उत्पत्ति हुई। पहले ना वह जीता था, ना मरता था। शायद यही वह अनिर्वचनीय मुक्ति है, जिसे पाने की बात वेदों में कही गई है। उसमें ना प्रकाश था, न अंधकार था। मतलब उसमें कुछ भी द्वंद्व नहीं थे। उस स्थिति को ऐसे भी समझ सकते हैं कि उस स्थिति में सब द्वंद्व एकसाथ थे। न्यूट्रॉन में प्रोटोन और इलेक्ट्रॉन दोनों होते हैं, फिर भी दोनों ही नहीं होते। इसी तरह कहते हैं कि परमात्मा में सब कुछ है भी और नहीं भी है।

अब जो वेदों में ब्रह्मांड का वर्णन मानव समाज के जैसा है, और उसमें विभिन्न चेतन देवताओं और राक्षसों आदि का वर्णन भी बिल्कुल मानव समाज के लोगों की की तरह ही है, वह दरअसल बेसिक कॉग्निशन की तरफ लौटने का प्रयास ही लगता है। इसी तरह तंत्र आधारित शरीर विज्ञान दर्शन में जो शरीर का वर्णन ब्रह्मांड और मानव समाज की तरह है, वह भी उसी आदिम बेसिक कॉग्निशन को प्राप्त करने का प्रयास है। दोनों की थीम एक ही है, पर शरीरविज्ञान दर्शन ज्यादा समकालीन और वैज्ञानिक लगता है। हालांकि दोनों ही तरीके एकदूसरे का साथ होने पर ज्यादा अच्छे से काम करते हैं। एक पिछली पोस्ट के अनुसार कुंडलिनी योग से शरीर विज्ञान दर्शन पुष्ट होता है। इसका मतलब है कि कुंडलिनी योग से आधारभूत अर्थात शुद्ध अनुभूति पुष्ट होती है।

तो क्या हम केवल इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन का ही अस्तित्त्व मानेंगे, न्यूट्रॉन का नहीं? मतलब कि क्या हम केवल उन्नत जीवों में ही चेतना का अस्तित्त्व मानेंगे, निम्न जीवों में और जड़ पदार्थों में नहीं? मतलब साफ है कि सृष्टि में ऐसे कोई समय, स्थान और पदार्थ नहीं हैं, जिनमें चेतना नहीं है।

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demystifyingkundalini by Premyogi vajra- प्रेमयोगी वज्र-कृत कुण्डलिनी-रहस्योद्घाटन

I am as natural as air and water. I take in hand whatever is there to work hard and make a merry. I am fond of Yoga, Tantra, Music and Cinema. मैं हवा और पानी की तरह प्राकृतिक हूं। मैं कड़ी मेहनत करने और रंगरलियाँ मनाने के लिए जो कुछ भी काम देखता हूँ, उसे हाथ में ले लेता हूं। मुझे योग, तंत्र, संगीत और सिनेमा का शौक है।

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