कुंडलिनी के लिए शिवलिंग के रूप वाले गुम्बदाकार या शंक्वाकार पर्वत का महत्त्व: वर्ष 2020 की अंतिम ब्लॉग पोस्ट

Image by Shalu, Subathu

नया साल चमक और आशा से भरा हो ताकि अंधेरा और उदासी आप से दूर रहें। नववर्ष 2021 की शुभकामना!

दोस्तों, करोल पहाड़ हिमालय का एक बेहद आकर्षक पहाड़ है। यह शिवलिंग के जैसे आकार का है। मैदानी क्षेत्रों से ऊपर चढ़ते समय यह ऊंचे पहाड़ों के प्रवेशद्वार पर स्थित प्रतीत होता है। मेरी कुंडलिनी से जुड़े इसके योगदान पर वैज्ञानिक चर्चा हम आज इस पोस्ट में करेंगे।

करोल पहाड़ के साथ मेरा आजन्म रिश्ता

मैं इसी पहाड़ की नजर में पैदा हुआ, और इसीके सामने बड़ा हुआ। यह आसपास के क्षेत्र में सबसे ऊंचा पहाड़ एक साक्षी की तरह हर समय मेरे सामने खड़ा रहा। यह हमेशा मेरे कर्मों की गवाही देता रहा, और मुझे सन्मार्ग पर प्रेरित करता रहा। इसने मुझे कभी अहंकार नहीं करने दिया। जैसे ही मुझे कभी थोड़ा सा भी अहंकार होने लगता था, तो वह कहता था, “मैं तो सबसे बड़ा और ऊँचा हूँ, फिर भी मैं कभी अहंकार नहीं करता; फिर तू मेरे सामने कीड़े जितना छोटा होकर भी क्यों अहंकार कर रहा है”। उसके इस ताने से मेरा अहंकार समाप्त हो जाता था। उससे मेरे मन की कुंडलिनी चमकने लग जाती थी। इस पहाड़ पर मेरा आना-जाना लगा रहता था, क्योंकि मेरे ज्यादातर मित्र, रिश्तेदार व आजीविका के साधन इसी पहाड़ पर होते थे। प्रतिदिन सुबह जब मैं सूर्य को जल चढ़ा रहा होता था, तब वह इसी पहाड़ के पीछे से उग रहा होता था। इससे वह पूजा का जल उस पहाड़ को भी स्वयं ही लग जाता था। इससे अनजाने में ही वह पहाड़ मेरा इष्ट देवता और मित्र बन गया था।

समय के साथ करोल पहाड़ के साथ मेरी कुंडलिनी मजबूती से जुड़ती गई

सूर्य को जल देते समय मेरे मन में उमड़ने वाली कुण्डलिनी करोल पहाड़ के साथ स्वयं ही जुड़ती गई। सूर्य की तरफ तो सीधा देखा नहीं जा सकता, और न ही सूर्य देव दिनभर नजरों के सामने रहते हैं। परन्तु वह पहाड़ तो हमेशा नजरों के सामने रहता था। उसकी तरफ देर तक सीधी नजर से भी देखा जा सकता था। काम करते हुए जरा सा सिर ऊपर उठाता, तो वह पहाड़ अनायास ही दृष्टिपटल पर आ जाता था, और उसके साथ ही उससे जुड़ी हुई मेरी कुंडलिनी भी। इस तरह से मेरी कुण्डलिनी मेरे जीवनभर मेरे साथ लगातार बनी रही, और उत्तरोत्तर बढ़ती रही। परिणामस्वरूप, मुझे गुरुकृपा से क्षणिक आत्मज्ञान भी उसी खूबसूरत पहाड़ के नजारे के साथ मिला, और कुंडलिनी जागरण भी उसीके चरणों की छत्रछाया में जाकर मिला।

करोल पहाड़ का शिवलिंग के जैसा आकार भी मेरी तांत्रिक कुंडलिनी के विकास में सहायक बना

शिवपुराण में शिवलिंग की आकृति का बहुत ज्यादा आध्यात्मिक महत्त्व बताया गया है। वहाँ शिवलिंग की पूजा को सबसे श्रेष्ठ माना गया है। जरा सोचो कि जब छोटे से घरेलू आकार के शिवलिंग का इतना ज्यादा महत्त्व है, तब शिवलिंग के आकार वाले पहाड़ का महत्त्व क्योंकर नहीं होगा। इससे तो महत्त्व कई गुना बढ़ जाएगा, क्योंकि पहाड़ की विशालता, अचलता, अमरता, और अहंकारविहीनता के कारण उसके प्रति आदरबुद्धि वैसे भी ज्यादा होती है। तभी तो पहाड़ को देवता भी माना जाता है। इसी वजह से ही लोग साधना के लिए सुरम्य पहाड़ों की ओर जाते हैं। वैसे तो विभिन्न कोणों से देखने पर वह पहाड़ विभिन्न आकृतियों में दिखाई देता था, यद्यपि उसकी शिवलिंग के जैसी सुंदर आकृति तो मेरे घर व आसपास के क्षेत्र से ही ज्यादा दिखाई देती थी। इसका मतलब है कि वास्तविक आकृति का उतना महत्त्व नहीं है, जितना कि आकृति के भान होने का है। शिवलिंग के सूक्ष्म तांत्रिक महत्त्व के कारण ही मंदिर के शिखर कुछ शंक्वाकार या गुम्बदाकार लिए होते हैं। यह आकार वास्तव में मूलाधार से जुड़ा होता है, और उसी की शक्ति लिए होता है। कैलाश पर्वत का रूप भी ऐसा ही है, और संभवतः तंत्र के सर्वाधिक अनुरूप है। तभी तो यहाँ पर साक्षात शिव का निवास बताया गया है। इसी वजह से बहुत से लोग करोल पहाड़ को मिनी कैलाश कहकर भी संबोधित करते हैं।

पहाड़ एक साधना में लीन मनुष्य की तरह होता है

इसी वजह से तो पहाड़ के रूप को भगवान शिव के रूप के साथ जोड़ा गया है। उसकी वनस्पति शिव की जटाएं हैं। उससे निकलते नदी-नाले व झरने शिव की जटा से निकलती गंगा नदी है। उस पर उगता चाँद शिव के मस्तक का खूबसूरत अर्धचंद्र है। उसके अंदर बसने वाले लोग व वन्य जीवजंतु शिव के ऊपर लिपटे नाग के रूप में हैं। उसका वनस्पतिविहीन व पथरीला भूभाग शिव के शरीर के नग्न भाग के रूप में है।

पहाड़ का अपना स्वरूप कुंडलिनी जागरण के दौरान की अवस्था है

यह अवस्था भाव, अभाव, व पूर्णभाव का मिश्रित रूप है। नशे आदि की अवस्था में भी भाव व अभाव दोनों एकसाथ होते हैं, परंतु उसमें पूर्णभाव नहीं होता। पर्वत की आत्मा में अभाव की अवस्था अद्वैत व जजमेंट से रहित चेतना के रूप में है, भाव की अवस्था अस्तित्व के आनंद के रूप में है, और पूर्णभाव की अवस्था पूर्ण अस्तित्व के परमानन्द के रूप में है। यह पूर्णभाव सर्वोच्च अनुभव के रूप में है। इसे भावाभावहीनता (न भाव, न अभाव) के रूप में भी जाना जा सकता है। पर्वत की ही तरह अन्य सभी निर्जीव पदार्थ भी जागती हुई कुण्डलिनी के रूप में पूर्णजीवन के रूप में हैं, निर्जीव नहीं। तभी तो कुंडलिनी जागरण के दौरान सभी कुछ अपने जैसा और एकसमान लगता है। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत के इसी सर्वव्यापी रूप को समझा था, इसीलिए वे इंद्र देवता के कोप से बच पाए और व्रज के ग्रामीणों को भी बचा पाए। ग्रामीण तो गोवर्धन पर्वत को अपना स्थानीय देवता मानते थे, जो सीमित व अलग-थलग रूप वाला था। यह कथा मुझे एक रूपक की तरह भी लगती है। इंद्र विकास व संसाधनों के अहंकार से युक्त शहरवासियों व मैदानी भूभाग में रहने वाले लोगों का प्रतीक है। गोवर्धन पर्वत गांव की हरी-भरी वादियों का प्रतीक है। व्रजवासी एक अनपढ़, ग्रामीण, पहाड़ी, पिछड़े, अन्धविश्वासी व संकुचित सोच के अहंकारी आदमी का प्रतीक है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि अहंकार शहरवासी और ग्रामवासी, दोनों में है। यद्यपिशहरी में उच्चता व कृत्रिमता का अहंकार है, और ग्रामीण में निम्नता व प्रकृति का। ये दोनों प्रकार के अहंकार आपस में टकराते हैं। इन दोनों प्रकार के अहंकारों से रहित आदमी ज्ञानी कृष्ण की तरह है, जो इन दोनों प्रकार के लोगों के साथ मिश्रित होकर भी उनके दुष्प्रभावों से अछूता रहता है।

कुंडलिनी योगसाधना की सर्वश्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए ही शिवपुराण में शिव-केतकी की कथा के रूपक का वर्णन आता है

दोस्तों, आओ थोड़ा कुंडलिनी ध्यान कर लेते हैं। पिछली पोस्ट में मैंने जो शिव-केतकी की कथा कही थी, वह पुराणों में लिखित रूपकों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पुराण ऐसे रूपकों से भरे हुए हैं। रूपकों की सहायता से प्रस्तुत विषय अच्छी तरह से समझ में आ जाता है, और अच्छी तरह से याद रहता है। अधिकांश आध्यात्मिक ज्ञान मन की सीमा से बाहर होता है, और प्रत्यक्ष अनुभव की वस्तु है। इसलिए उसे रूपकों में ढालकर मन के दायरे में लाया जाता है। 

पूर्वोक्त प्रकाशमान स्तंभ के ओर-छोर की खोज करने के लिए ब्रह्मा ऊपर की ओर और भगवान विष्णु नीचे की ओर भागे थे

पूर्वोक्त कथा में हमने विष्णु को ऊपर की ओर तथा ब्रह्मा को नीचे की ओर जाते दिखाया था। पर वास्तविकता इसके विपरीत थी। वैसे इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। रूपकों को हम किसी भी तरफ को ढाल सकते हैं। सत्य का अनुभव तो वही रहता है। रूपक सत्य को नहीं बदल सकते। रूपकों का अपना कोई गणित नहीं होता। रूपक तो केवल सत्य को समझाने के लिए बनाए गए होते हैं। रूपक की इस विपरीत स्थिति में हम सत्य के अनुभव को निम्नलिखित तरीक़े से ढाल सकते हैं। ब्रह्मा प्रकार के लोग क्योंकि अंधाधुंध निर्माण कार्य करवाते हैं, इसलिए वे अपने सकाम कर्मों के फलस्वरूप विभिन्न उच्च लोकों को प्राप्त करते हैं। वे सहस्रार रूपी परम लोक को प्राप्त नहीं करते, क्योंकि वे जगत के प्रति आसक्त होते हैं। इसलिए वे कुंडलिनी योगसाधना नहीं कर पाते। यदि करते हैं, तो वह शीघ्र फलदायी नहीं होती। बाकि तो पूर्वोक्त रूपक में सब ठीक है। इसी तरह, विष्णु प्रकार के लोग नम्रता के, गहन अन्वेषण के, और ज्ञान चिंतन के प्रतीक होते हैं। वे नीचे के लोकों में रहने वाले दीन दुखी लोगों की सेवा में जुट जाते हैं। उनमें भी जगत के पालन और रक्षण का अहंकार आ जाता है। फिर भी वे अपनी झूठी शेखी नहीं बघारते, और न ही अपने प्रभाव का ज्यादा ढिंढोरा पीटते हैं। इसलिए उन्हें नीचे के लोकों या चक्रों में जाने वाला बताया गया है। इसी कारण से उनकी भी कुंडलिनी योग साधना आसानी से सफल नहीं होती। बाकि तो रूपक में सब ठीक ही है। असली तांत्रिक कुंडलिनी योगी तो भगवान शिव की तरह मस्तमौले होते हैं। उन्हें दुनियादारी का कोई फिक्र-फाका नहीं होता। वे अपनी कुंडलिनी के साथ मस्त और आनन्दमग्न होते हैं। वे तांत्रिक साधना से बढ़ाई गई अपनी एनर्जी को दुनियादारी में बर्बाद न करके उससे अपनी कुंडलिनी को जागृत करते हैं। वे ज्यादा पाने की चाहत में नहीं भागते। जो उन्हें मिल जाता है, उसी में संतुष्ट हो जाते हैं। भगवान शिव के पास भी एक बाघम्बर, एक मृगचर्म, एक त्रिशूल, एक सर्प, एक बैल और पार्वती माता के सिवाय कुछ नहीं होता। वे इन्हीं में खुश रहते हुए गहन व आनन्दमयी ध्यान साधना में डूबे रहते हैं।

केतकी का पुष्प ऐसे लोगों का प्रतीक है, जो भगवान के साथ रहकर भी उसे नहीं पहचानते

कथा में आता है कि केतकी का सफेद पुष्प भगवान शिव के मस्तक से नीचे गिरा था, पर वह भी उस ज्योति स्तंभ का आदि-अंत नहीं जानता था। केतकी की तरह साफ-सुथरी छवि वाले लोग भी उन पुजारियों की तरह हैं, जो लगातार मन्दिरों में रहकर भी भगवान को नहीं जानते। आम जनता उन पर विश्वास करती है, इसलिए ब्रह्मा प्रकार के लोग इस बात का नाजायज फायदा उठाते हैं। वे पैसे के दम पर उनसे अपना गुणगान करवाते हैं, और जतवाते हैं कि वे सबकुछ अर्थात भगवान को जानते हैं। बाकी तो रूपक में सब वैसा ही है।

कुंडलिनी ही हिंदू पुराणों की सर्वप्रमुख विषयवस्तु है: शिव व केतकी के फूल की कहानी

दोस्तों, पिछली पोस्ट में मैंने शिवपुराण की एक कथा के बारे में बताया था, जो कि तंत्रशास्त्र के रहस्य का आधारबिंदु है। उसे केतकी के फूल की कहानी कहते हैं। इस पोस्ट में मैं उस कहानी की गहराई से व्याख्या करूँगा।

क्या है केतकी के फूल की कहानी

शिवपुराण के अनुसार एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच में झगड़ा हो गया था। भगवान ब्रह्मा कहने लगे कि उन्होंने सारे संसार का निर्माण किया है, इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। दूसरी ओर, भगवान विष्णु कहने लगे कि वे ही सारे संसार का पालन और रक्षण करते हैं, इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। जब उनके झगड़े से चारों ओर उथल-पुथल मच गयी, तब उन दोनों के बीच में एक ज्योतिर्मय स्तंभ प्रकट हुआ। आकाशवाणी से आवाज हुई कि जो सबसे पहले इसके ओर-छोर का पता लगाएगा, वही सबसे बड़ा है। भगवान विष्णु ऊपर की तरफ चल पड़े, और भगवान ब्रह्मा नीचे की ओर। परंतु दोनों ही उसके छोर का पता नहीं लगा पाए और खाली हाथ वापिस लौट आए। विष्णु ने अपनी असफलता की सच्ची कहानी ब्रह्मा को बयान कर दी, परंतु ब्रह्मा भगवान विष्णु से झूठ बोलने लगे। ब्रह्मा ने कहा कि वे उसके छोर को छूकर वापिस आए थे। ब्रह्मा ने केतकी के सफेद फूल को साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया। तभी इस झूठ से नाराज होकर भगवान शिव वहाँ प्रकट हो गए। उन्होंने कहा कि वे ही सबसे बड़े हैं तथा उनके सिवाय कोई दूसरा इसके आदि-अंत को नहीं जान सका है। केतकी के झूठ से नाराज होकर शिव ने उसको शाप दिया कि वह कभी उनकी पूजा में शामिल नहीं किया जाएगा। साथ में, ब्रह्मा को भी शाप दिया कि कहीं भी उनका मंदिर नहीं होगा, और न ही उनकी पूजा की जाएगी।

शिव-केतकी की कहानी का तांत्रिक रहस्य

ब्रह्मा और केतकी के फूल किसके प्रतीक हैं

वास्तव में उपरोक्त कथा मैटाफोरिक है, और कुंडलिनी योग की सर्वश्रेष्ठता की ओर इशारा कर रही है। ब्रह्मा उन लोगों का प्रतीक है, जो अंधाधुंध निर्माणकार्य से प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अहंकार का सहारा लेने वाले बिजनेसमैन, नेता और नकली धर्मगुरु इसी प्रकार के लोग होते हैं। रजोगुणी यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान करवाने वाले लोग भी इनमें शामिल हैं। उनके अंदर अहंकार पैदा हो जाता है, और वे अपने आप को सबसे बड़ा समझने लगते हैं। उनके पास धन की कोई कमी नहीं होती, इसलिए वे समाज के प्रतिष्ठित व साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को और पत्रकारों को खरीद लेते हैं। केतकी का सफेद फूल ऐसे ही लोगों का परिचायक है। वे ऐसे लोगों से अपना भरपूर गुणगान करवाते हैं, और असली भगवान को अनदेखा करके खुद भगवान बन बैठते हैं। इसीलिए ऐसी साफ सुथरी व सफेद छवि वाले कपटी लोग भगवान शिव को प्रसन्न नहीं कर पाते। उन्हें प्रसन्न करने के लिए तो बच्चे की तरह भोले बनना पड़ता है। तभी तो शिव को भोलेनाथ या भोले बाबा भी कहते हैं। तांत्रिक भी भोले ही होते हैं। ब्रह्मा जैसी छवि वाले उपरोक्त लोग भी लोगों से सच्चा सम्मान नहीं प्राप्त कर पाते। उनके प्रभाव के डर से ही लोग उन्हें झूठा सम्मान देते हैं। जैसे भगवान ब्रह्मा स्तंभ का निचला छोर ढूंढते हैं, वैसे ही उनकी तरह के लोगों का झुकाव भी नीचे अर्थात तमोगुण की तरफ ज्यादा होता है। तमोगुण मदिरा, माँस आदि के अनियंत्रित उपभोग के रूप में हो सकता है। वे ब्रह्मा की तरह ही रजोगुणी होते हैं। रजोगुण का झुकाव तमोगुण की तरफ ज्यादा होता है। वे बहुत नीचे के लोकों या चक्रों तक पहुंच जाते हैं, पर सबसे नीचे के लोक अर्थात मूलाधार चक्र तक नहीं पहुंच पाते। इसका सीधा सा अर्थ है कि वे मूलाधार चक्र पर कुंडलिनी को जगा नहीं पाते। यदि मूलाधार चक्र पर भी कुंडलिनी जागृत हो जाए, तो वह सभी चक्रों या लोकों को भेदते हुए सीधी सहस्रार में चली जाती है, और वहाँ भी जागृत हो जाती है। पर ऐसा तांत्रिक लोग ही कर सकते हैं, साधारण लोग नहीं।

भगवान नारायण सेवादारों व दानवीरों के प्रतीक हैं

समाज के कुछ लोग जनता की सेवा से सीधे जुड़े होते हैं। उनमें सेवादार और दानवीर मुख्य होते हैं। सात्विक धर्म-कर्म आदि करने वाले लोग भी इनमें शामिल हैं। अनेक प्रकार की मानसिक साधनाएं करने वाले लोग भी ऐसे ही होते हैं। हालाँकि वे भोले होते हैं, पर फिर भी वे ज्योतिर्मय स्तंभ का छोर नहीं ढूंढ पाते। वे स्तंभ पर ऊपर की ओर जाते हैं, क्योंकि वे सत्त्वगुणी होते हैं। उनके अंदर मन के दोष नहीं होते। अहंकार भी उनमें कम होता है। वे काफी ऊपर के लोकों या चक्रों तक चले जाते हैं, पर सर्वोच्च लोक या सहस्रार तक नहीं पहुंच पाते। इसका अर्थ है कि वे भी कुंडलिनी को जागृत नहीं कर पाते। फिर शिव ने कहा कि वे ही इसे जानते हैं। साथ में कहा कि इसलिए वे ही सबसे बड़े हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि शिवभक्त तांत्रिक ही अपनी कुंडलिनी को जागृत कर पाते हैं।

ज्योतिर्मय स्तंभ सुषुम्ना नाड़ी का और विभिन्न लोक विभिन्न चक्रों के प्रतीक हैं

वास्तव में सारा संसार हमारे अपने मनुष्य शरीर में बसा हुआ है, “यतपिण्डे तत्ब्रह्मांडे” के अनुसार। ऐसा ही “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” पुस्तक में भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया गया है। जो कथा में विभिन्न ऊपरी और निचले लोक कहे गए हैं, वे हमारे शरीर की रीढ़ की हड्डी में स्थित चक्र ही हैं। जो प्रकाशमय स्तम्भ है, वह सुषुम्ना नाड़ी है। वह भी चमकदार संवेदना के रूप में होती है। वह मूलाधार चक्र से अर्थात सबसे निचले लोक से सहस्रार चक्र अर्थात सबसे ऊपर के लोक तक गुजरती है। बीच में अनेक प्रकार के लोक अर्थात चक्र आते हैं। उसका लघु रूप लिंग या वज्र है। वही उस स्तंभ का सबसे प्रमुख भाग होता है, क्योंकि वहीँ से प्रकाशमय संवेदना स्तंभ उत्पन्न होता है।

कुंडलिनी जागरण के लिए भगवान शिव लिंग को मूर्ति से अधिक श्रेष्ठ मानते हैं

यह प्रमाणित किया जाता है कि इस वेबसाईट के अंतर्गत हम सभी किसी भी धर्म का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं। हम केवल धर्म के वैज्ञानिक और मानवीय अध्ययन को बढ़ावा देते हैं। यह वैबसाइट तांत्रिक प्रकार की है, इसलिए इसके प्रति गलतफहमी नहीं पैदा होनी चाहिए। पूरी जानकारी व गुणवत्ता के अभाव में इस वेबसाईट में दर्शाई गई तांत्रिक साधनाएं हानिकारक भी हो सकती हैं, जिनके लिए वैबसाइट जिम्मेदार नहीं है।

इससे भगवान शिव की तथाकथित तन्त्रेश्वरता स्पष्ट जाती है। वे अपने लिंग को अपना निर्गुण रूप और अपनी मूर्ति को सगुण रूप मानते हैं। लिंग उस विराट स्तंभ का लघु रूप है, जो अधोलोकों को ऊर्ध्वलोकों से जोड़ता है। ब्रह्मा और विष्णु इसका आदि-अंत नहीं ढूंढ सके थे। इसी तरह लिंग भी मूलाधार को सहस्रार से जोड़ता है। यौनतंत्र का सारा रहस्य शिवपुराण के इसी कथानक में छिपा है। यदि शिव की मूर्ति पर या मस्तिष्क में बने शिव के चित्र पर सीधा ध्यान लगाया जाएगा, तो वह ज्यादा प्रभावी नहीं होगा। परंतु यदि वज्र पर शिव के चित्र का ध्यान किया जाएगा, तो वह वहाँ से सीधा मस्तिष्क या सहस्रार में पहुंचेगा, और तुलनात्मक रूप में वहाँ बहुत ज्यादा प्रभावी व स्थायी बना रहेगा। शिव का चित्र यहां कुंडलिनी का प्रतीक है। कुंडलिनी के रूप में अन्य कुछ भी चित्र या संवेदना हो सकती है। वैसे तो भगवान शिव ने अपने लिंग और मूर्ति, दोनों की एकसाथ आराधना करने को कहा है, परन्तु अधिक श्रेष्ठ लिंग को माना है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न सनातन धार्मिक परंपराओं से कुंडलिनी का विकास ही हो पाता है, परंतु उसके जागरण के लिए तंत्र का सहारा लेना ही पड़ता है। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि यदि शिव के मानवीय रूप-आकार का पता ही नहीं होगा, तो लिंग पर भी उसका ध्यान कैसे हो पाएगा। शिव के मानवीय रूपाकार का पता तो उसकी मूर्ति से ही चलता है। इसीलिए अधिकांश मंदिरों में मूर्तियों के साथ शिवलिंग भी जरूर होता है। इसी तरह एक असली तांत्रिक सनातन धार्मिक परंपराओं का विरोधी नहीं, अपितु सहयोगी होता है।

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कुंडलिनी और मन्दिर का परस्पर सहयोगात्मक संबंध

दोस्तों, इसी हफ्ते मुझे एक नया कुंडलिनी अनुभव मिला। नया तो इसे नहीं भी कह सकते हैं, नए रूप में कह सकते हैं। कुंडलिनी तंत्र और सनातन धर्म के बीच में बहुत अधिक सहयोगात्मक रिश्ता है। इस पोस्ट में हम इसी पर चर्चा करेंगे। 

मंदिर में कुंडलिनी को ऊर्ध्वात्मक गति मिलती है

एक-दो दिन से मैं कुछ मन की बेचैनी और चंचलता महसूस कर रहा था। मेरे फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र पर एक दबाव जैसा बना हुआ था।ऐसा1लग रहा था कि कुंडलिनी वहां पर अटकी हुई थी। योग से थोड़ा रिलीफ मिल जाता था, फिर भी दबाव बना हुआ था। मैं एक बड़े समारोह के लिए एक बड़े मंदिर की बगल में स्थित दुकान पर फूलों के गुलदस्तों की बुकिंग कराने के लिए गया। जब वापिस आया तो अपनी बाइक वहीँ भूल आया। बाइक की याद मुझे मन्दिर के पास आई। मैं यह सोचकर मंदिर के अंदर प्रविष्ट हुआ कि भगवान का वही आदेश था। मंदिर के दरवाजों पर ताले लगे हुए थे। इसलिए मैं बाहर के लंबे-चौड़े संगमरमर से बने खुले आंगन में टहलने लगा। वहाँ पर मुझे मस्तिष्क में कुंडलिनी का स्मरण हो आया। उसी के साथ स्वाधिष्ठान का कुंडलिनी-दबाव भी ऊपर चढ़ते हुए महसूस हुआ। वहाँ पर कुछ लोग उरे-परे आ-जा रहे थे। मैं उनके रास्ते से हटकर एकांत में एक शीशे की दीवार के साथ बने संकरे प्लेटफार्म पर बैठ गया। मेरा शरीर खुद ही ऐसी पोजीशन बनाने की कोशिश कर रहा था, जिससे स्वाधिष्ठान चक्र की कुंडलिनी पर ऊपर की तरफ खिंचाव लगता। मैंने अपनी पीठ का फन फैलाए हुए नाग के रूप में ध्यान किया। मेरी कुंडलिनी वज्र से शुरु होकर रियर अनाहत चक्र तक एक संवेदनात्मक नस या चैनल के रूप में आ रही थी। बैकवार्ड फ्लो मैडिटेशन तकनीक भी इसमें मेरी मदद कर रही थी। मस्तिष्क के विचारों को मैं कुंडलिनी के रूप में आगे से होकर फ्रंट अनाहत चक्र तक पहुंचता हुआ महसूस कर रहा था। इससे अनाहत चक्र पर ऊपर का प्राण और नीचे का प्राण (अपान) आपस में टकरा कर चमकती कुंडलिनी को प्रकट कर रहे थे। तभी मेरी बाहर गई पत्नी का फोन भी आया, जो शायद अदृश्य टेलीपैथी से ही हुआ होगा। उससे मुझे और अधिक बल मिला। उससे फ्रंट स्वाधिष्ठान चक्र का दबाव समाप्त हो गया। मेरी साँसें तेज व गहरी चलने लगीं। वे साँसे मुझे बहुत सुकून दे रही थीं। कुंडलिनी से संबंधित सारी प्राण शक्ति मेरे अनाहत चक्र को मिली। उससे मेरा हृदय प्रफुल्लित हो गया, और मैं तरोताजा होकर बाइक पर वापिस घर लौट आया, और खुशी-खुशी अपने कामों में जुट गया। बड़े-बड़े मंदिरों को बनाने के पीछे एक नया कुंडलिनी-रहस्य उजागर हो गया था।

स्वाधिष्ठान चक्र पर दबाव बनने का मुख्य कारण सीमेन रिटेंशन होता है

ऐसा यौनसंबंध से परहेज करने से भी हो सकता है, पॉर्न देखने से भी हो सकता है, और अपूर्ण तांत्रिक यौनयोग से भी। इसलिए उचित योगसाधना से इस दबाव को ऊपर चढ़ाते रहना चाहिए। मस्तिष्क तक इसे पहुंचाने से यदि सिरदर्द या मस्तिष्क में दबाव लगे, तो पूर्वोक्त ढंग से अनाहत चक्र तक ही इसे चढ़ाना चाहिए।

कुंडलिनी वाहक के रूप में हजार फनों वाला शेषनाग

दोस्तों, लम्बी पोस्ट लिखने की प्रतीक्षा में अपने छोटे अनुभवों को लिखने का मौका भी नहीं मिलता। इसलिए मैंने सोचा है कि कुंडलिनी से संबंधित इधर-उधर के छोटे-मोटे विचार ही लिखा करूंगा। इससे कुंडलिनी से लगातार जुड़ाव बना रहेगा, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए बहुत जरूरी है। वैसे भी व्यस्त जीवन में एकसाथ लंबी पोस्ट लिखना संभव भी नहीं है।

मस्तिष्क के दबाव को नीचे उतारने से कुंडलिनी भी नीचे उतर जाती है

जैसे ही अपनी वर्तमान स्थिति को देहपुरुष की तरह अद्वैतमयी समझा जाता है, वैसे ही मस्तिष्क में कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। उससे मस्तिष्क में एक दबाव सा पैदा हो जाता है। उस दबाव को नीचे उतारने के लिए जीभ को तालु के साथ दबा कर रखा जाता है, और कुछ न बोलते हुए मुँह बंद रखा जाता है। साथ में कुंडलिनी ऊर्जा के नीचे उतरने का चिंतन किया जाता है। ऐसा चिंतन भी किया जाता है कि दिमाग का दबाव फ्रंट चैनल से नीचे उतर रहा है। उससे दिमाग हल्का हो जाता है, और दबाव के साथ कुंडलिनी भी नीचे उतर कर किसी उपयुक्त चक्र पर बैठ जाती है। वह फिर दिमाग से लगातार आ रहे दबाव से उत्तरोत्तर चमकती रहती है। उसी दबाव को प्राण भी कहते हैं। दिमाग के खाली या हल्का हो जाने पर मूलाधार चक्र से कुंडलिनी ऊर्जा बैक चैनल से दिमाग तक चढ़ जाती है। पहले की पोस्ट में कहे गए मानसिक आघात से भी ऐसा ही होता है। मानसिक आघात से दिमाग पूरा खाली जैसा हो जाता है, और कुंडलिनी शक्ति पूरे वेग से पीठ में ऊपर चढ़ जाती है, अर्थात सुषुम्ना खुल जाती है। तांत्रिक मदिरापान से भी कई बार ऐसा ही होता है। उससे भी दिमाग खाली जैसा हो जाता है। इस तरह से कुण्डलिनी लूप पूरा हो जाता है, और कुंडलिनी चक्रवत घूमती रहती है। इसे माइक्रोकोस्मिक ऑर्बिट भी कहते हैं। इससे यौन कामुकता का आवेग भी शांत हो जाता है, क्योंकि उसकी एनर्जी कुंडलिनी को लग जाती है। स्त्री में भी पूर्णतः ऐसा ही होता है। जैसा कि पुरानी पोस्ट में बताया गया है कि उनका वज्र तुलनात्मक रूप से लघु परिमाण वाला होता है, जो शरीर-कमल के कुछ अंदर समाहित होता है। यह तंत्र साधना की एक प्रमुख तकनीक है।

शेषनाग का बीच वाला फन सबसे लंबा है

पुरानी पोस्ट में भी मैंने बताया था कि शेषनाग को वज्र से लेकर रीढ़ की हड्डी से होते हुए मस्तिष्क तक लिटाने पर वज्र-संवेदना आसानी से सहस्रार तक पहुंच जाती है। उसका मुख्य लक्षण है, एकदम से वज्र का संकुचित हो जाना। उससे पीठ के केंद्र में संवेदना की सरसराहट सी महसूस होती है। पूरे नाग का एकसाथ ध्यान करना पड़ता है। वास्तव में, संवेदना में चाल का और स्थान बदलने का गुण होता है। शेषनाग के एक हजार फन हैं, जो पूरे मस्तिष्क को कवर करते हैं। उसका केंद्रीय फन सबसे मोटा और लम्बा दिखाया जाता है। वही केंद्रीय फन सर्वाधिक क्रियाशील प्रकार का है। इससे कुंडलिनी उसी में चलती है। वास्तव में संवेदना/कुंडलिनी की सेंटरिंग के लिए ऐसा किया गया है। इससे कुंडलिनी पूरी तरह से सेंट्रल लाइन में चलती है। वह केंद्रीय फन नीचे झुक कर भौंहों के बीच में स्थित आज्ञा चक्र को भी चूमता रहता है। इससे कुंडलिनी आज्ञा चक्र में पहुंच कर वहाँ दबाव के साथ आनन्द पैदा करती है। कई बार कुंडलिनी सीधी आज्ञा चक्र तक पहुंच जाती है। वैसे भी, हठयोग की एक मुख्य नाड़ी, वज्र नाड़ी को आज्ञा चक्र तक जाने वाली बताया गया है। आज्ञा चक्र से कुंडलिनी जीभ से होते हुए सबसे अच्छी तरह से नीचे उतरती है। सिर को और पीठ को इधर-उधर हिलाने से शेषनाग भी इधर-उधर हिलता-डुलता प्रतीत होना चाहिए। उससे और अधिक कुंडलिनी-लाभ मिलता है।

शेषनाग को क्षीर महासागर में दिखाया गया है, और उसके एक हजार फन भगवान विष्णु के सिर पर फैले हुए हैं

चित्र में ऐसा ही दिखाया गया है। वास्तव में हमारा शरीर भी एक सूक्ष्म क्षीर सागर ही है। इस शरीर में 70 % से अधिक पानी है, जो चारों ओर फैला हुआ है। वह पानी खीर के दूध की तरह ही पौष्टिक है। उसी शरीर के दुधिया पानी के बीच में उपरोक्त शेषनाग अपने फन उठाकर बैठा है। आदमी का सिर उसके एक हजार फनों के रूप में है।

कुंडलिनी के लिए सेंटरिंग क्यों जरूरी है

दोस्तों, हरेक वस्तु की एनर्जी उसके केंद्र में होती है। इसे सेंटर ऑफ मास या सेंटर ऑफ ग्रेविटी भी कहते हैं। इसी तरह शरीर की एनर्जी उसकी केंद्रीय रेखा पर सर्वाधिक होती है। इसीलिए कुंडलिनी को उस रेखा पर घुमाया जाता है, ताकि वह अधिक से अधिक शक्ति प्राप्त कर सके। मुझे पूरे सूर्य में कुंडलिनी का ध्यान करना मुश्किल लग रहा था। पर जब मैंने सूर्य की सतही केंद्रीय रेखा पर ध्यान लगाया, तो वह आसानी से व मजबूती से लग गया। इन सभी बातों से पता चलता है कि कुंडलिनी का मनोविज्ञान भी भौतिक विज्ञान की तरह ही प्रमाणित सिद्ध होता है।

कुंडलिनी के लिए ही तांत्रिक भैरव नाथ ने माता वैष्णो देवी का अपमान किया था

दोस्तों, हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थल वैष्णो देवी के मूल में एक कथा आती है कि तांत्रिक भैरव नाथ कन्या वैष्णो के पीछे भागा था। वह उसके माध्यम से अपनी मुक्ति प्राप्त करना चाहता था (सम्भवतः तांत्रिक यौन-योग के माध्यम से)। ऐसा वह अपनी कुंडलिनी को जागृत करके करना चाहता था। कन्या वैष्णो उसकी अच्छी मंशा को नहीं समझ सकी और क्रोध में आकर काली बन गई और उसका वध करने लगी। तब भैरव को उसकी दिव्यता का पता चला और वह उससे क्षमा मांगने लगा। वैष्णो को भी उसकी अच्छी मंशा का पता चल गया। सम्भवतः उसे पछतावा भी हुआ कि उसने अनजाने में एक महाज्ञानी तांत्रिक को मारने का प्रयास किया। इसीलिए तो उसने उसे मुक्ति का वर दिया और यह भी कहा कि भैरव के दर्शन के बिना मेरे दर्शन का कोई फल नहीं मिलेगा। यह प्रसंग सांकेतिक या मैटाफोरिक भी प्रतीत होता है। माता वैष्णो ने भैरव को असलियत में नहीं मारा था। वास्तव में मोक्ष प्राप्त करने के लिए शून्य बनना पड़ता है। अपना सब कुछ खोना पड़ता है। भैरव को भी मुक्ति के लिए ज़ीरो बनना पड़ा। इसी ज़ीरो को ही असम्प्रज्ञात समाधि भी कहते हैं, जिससे आत्मज्ञान होता है। इसी को भैरव का मरना कहा गया है। चूँकि भैरव के मन में वैष्णो के रूप की समाधि के लगने से ही वह आध्यात्मिक रूप से विकसित होकर असम्प्रज्ञात समाधि और आत्मज्ञान के स्तर को पार करता हुआ अपनी मुक्ति के उच्चतम स्तर तक पहुंचा, इसीलिए कथा-प्रसंग में कहा गया कि वैष्णो ने भैरव को मारा।

दूसरे प्रकार से ऐसा भी हो सकता है कि देवी माता की लघु संगति से उसे तांत्रिक प्रेरणा प्राप्त हुई हो। उससे उसने अपनी असली तांत्रिक प्रेमिका की सहायता से कुंडलिनी जागरण की प्राप्ति की हो, जिससे उसका अकस्मात रूपांतरण हो गया हो। इसीको उसका देवी माता के द्वारा मारा जाना कहा गया हो।

तीसरे प्रकार से देवी माता के द्वारा भैरव बाबा का मारा जाना इस सिद्धांत का मैटाफोर भी हो सकता है कि भौतिक समृद्धि के लिए यौन तंत्र का इस्तेमाल करने से भौतिक तरक्की तो प्राप्त होती है, पर मुक्ति नहीं मिलती, अर्थात मरना पड़ता है। 
फिर भी अच्छी मंशा के बावजूद भी बाबा भैरव ने तंत्र के नियमों के विरुद्ध तो काम किया ही था। तंत्र में कभी हमलावर रुख नहीं अपनाया जाता। एक नम्र व विरक्त साधु-संन्यासी या भोले-भाले बच्चे की तरह व्यवहार करना पड़ता है। स्वेच्छा से बने तांत्रिक साथी को देवी-देवता की तरह सम्मान देना पड़ता है, और यहाँ तक कि पूजना भी पड़ता है। दोनों को एक-दूसरे को बराबर मानना पड़ता है। तांत्रिक गुरु की मध्यस्थता भी जरूरी होती है।

विवाहपूर्व प्रेम संबंध वैष्णो-भैरव वाली उपरोक्त कथा का विकृत रूप प्रतीत होता है

विकृत रूप हमने इसलिए कहा क्योंकि अधिकांश मामलों में लड़के-लड़की के बीच का प्रेम संबंध कुंडलिनी जागरण के लिए नहीं होता। अर्थात वह प्रेमसंबंध तांत्रिक प्रकार का नहीं होता। वैसे तो तंत्र में किसी की बेटी या पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना वर्जित है। इसलिए विवाहपूर्व या विवाहेतर प्रेमसंबंध को तांत्रिक बनाए रखने के लिए शारीरिक संबंध से परहेज रखना जरूरी है। इससे यह लाभ भी होता है कि आदमी को अपने असली तांत्रिक प्रेमी अथवा पति/पत्नी से ही पूरी तरह संतुष्ट होकर गहन तांत्रिक साधना करने की प्रेरणा मिलती है। वैसे तो तांत्रिक प्रेम का मुख्य कार्य शारीरिक आकर्षण को पैदा करना है, ताकि प्रेमी का अविचल चित्र निरंतर मन में कुंडलिनी के रूप में बना रह सके। यह आकर्षण साधारण बोलचाल, रहन-सहन, हाव-भाव, हँसी-मजाक व सैर-सपाटे आदि से भी पैदा हो सकता है। वास्तव में इनसे पैदा होने वाला शारीरिक आकर्षण प्रत्यक्ष शारीरिक संबंध से पैदा होने वाले शारीरिक आकर्षण से भी कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होता है। साथ में, एक से अधिक साथी के साथ शारीरिक संबंध रखना सामुदायिक स्वास्थ्य व सामुदायिक संबंधों के लिए भी अच्छा नहीं है। इसलिए जहाँ तक संभव हो, इसे केवल एकल साथी तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।

वैष्णो कन्या अपने पति परमेश्वर के लिए तपस्या कर रही थीं

वैष्णो में सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती, इन तीनों देवियों की शक्ति का सम्मिलन था। वह परमेश्वर को पति रूप में पाना चाहती थीं। वास्तव में सभी मनुष्य ईश्वर से आए हैं, और उसी को पाना चाहते हैं। इसका मैटाफोरिक अर्थ यह निकलता है कि तंत्रसम्पन्न स्त्री उत्तम पति (ईश्वर-सदृश) की तलाश में रहती है। यदि उसे ऐसा पति न मिल पाए तो वह अपने साधारण पति को भी ईश्वर बना देती है।

विवाहपूर्व प्रेमसंबंध जानलेवा भी हो सकता है, जबकि साऊलमेट सबसे सुरक्षित होता है

मशहूर सिने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के साथ सम्भवतः ऐसा ही हुआ। सम्भवतः वे अपने प्रेमसंबंध में बहुत आसक्त व परवश हो गए थे। ऐसी हालत में यदि प्रेमिका सही मार्गदर्शन न करे, तो यह प्रेमी के लिए घातक भी सिद्ध हो सकता है। साऊलमेट (आत्मीय मित्र) इस स्थिति से बचाते हैं। साऊलमेट एक ऐसा प्रेमी/प्रेमिका है, जिसके प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण मौजूद होता है, यद्यपि उससे कभी भी मिलन नहीं हो पाता। इसका अर्थ है कि उस आकर्षण में अटैचमेंट नहीं होती। एक व्यक्ति को अपने साऊलमेट में अपना रूप या अपना प्रतिबिंब दिखता रहता है। साऊलमेटस एक दूसरे को एनलाईटनमेंट की तरफ ले जाते हैं।

कुण्डलिनी जागरण के लिए पंचमकारों (मदिरा, माँस, मैथुन, मत्स्य व मुद्रा) का प्रयोग

कुण्डलिनी के लिए पंचमकारों का प्रयोग एक विवादित विषय रहा है। हम न तो इसकी अनुशंसा करते हैं, और न ही इसका खंडन। हम केवल इसके आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक पहलू पर विचार कर रहे हैं।

पंचमकारों से अद्वैत भाव को विकसित करने का अवसर प्राप्त होता है

वैसे तो पंचमकारों से द्वैतभाव में ही वृद्धि होती है। मदिरा को ही लें। इससे आदमी अंधकार व प्रकाश में बंट जाता है। इसी तरह से, माँस से हिंसा/क्रोध व अहिंसा/शान्ति में विभक्त हो जाता है। मैथुन से वह रोमांच व अवसाद के बीच में झूलने लगता है। मुद्रा किसी विशेष आसन, चिन्ह आदि के साथ लम्बे समय तक बैठने को कहते हैं। इससे आदमी आलस या निकम्मेपन और मेहनत की स्थिति के बीच में बंट जाता है। यह निर्विवादित सत्य है कि द्वैत में ही अद्वैत पनप सकता है। समुद्र की गंभीरता उसकी लहरों के ही आश्रित है। यदि समुद्र में लहरें गगनचुंबी हिचकोले न मारा करतीं, तो कौन कहता कि आज समुद्र शांत या निश्चल है। इसलिए अद्वैत द्वैत के ही आश्रित है। यदि मूल भाव द्वैत ही नहीं होगा, तो उसको नकारने वाला “अ” अक्षर हम उसके साथ कैसे जोड़ पाएंगे। जो चीज है ही नहीं, उसे हम कैसे नकार सकते हैं। यदि द्वैत ही नहीं होता, तो हम उसे कैसे नकार पाते। इसलिए पंचमकारों से दो प्रकार के प्रभाव पैदा होते हैं। जो आदमी उनसे पैदा हुए द्वैत को पूर्णतः स्वीकार करके उसी में रम जाते हैं, वो अपनी कुण्डलिनी को भूल जाते हैं। जो लोग पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत को शुरु में स्वीकार करके उसे चालाकी से अद्वैत में रूपांतरित करते रहते हैं, वे कुण्डलिनी योगी बन कर अपनी कुण्डलिनी को मजबूत करते हैं। यह निर्विवादित व सबके द्वारा अनुभूत तथ्य है कि कुण्डलिनी और अद्वैत सदैव साथ रहते हैं। दोनों में से एक चीज को बढ़ाने पर दूसरी चीज खुद ही बढ़ जाती है।

वास्तव में अद्वैत केवल द्वैत के साथ ही रह सकता है, अकेले में नहीं। इसलिए “अद्वैत” का असली अर्थ “द्वैताद्वैत” है।

पंचमकारों का पूजन

सेवन से पहले पंचमकारों का विधिवत पूजन किया जाता है। यह बुद्धिस्ट तंत्र और हिंदु वाममार्गी आध्यात्मिक प्रणाली में आज भी आम प्रचलित है। पंचमकारों में कुण्डलिनी का ध्यान किया जाता है, और उन्हें बहुत सम्मान दिया जाता है। उनके सेवन के समय भी जितना हो सके, कुण्डलिनी व अद्वैत का ध्यान किया जाता है। जब तक शरीर पर पंचमकारों का प्रभाव रहे, तब तक कोशिश करनी चाहिए कि कुंडलिनी व अद्वैत का ध्यान बना रहे। इससे क्या होता है कि जब दैनिक जीवन में उन पंचमकारों का प्रभाव पैदा होता है या यूँ कहें कि जब उनका फल मिलता है, तब कुण्डलिनी स्वयं ही विवर्धित रूप में ध्यानपटल पर आ जाती है। यह ऐसे ही होता है, जैसे कि पैसा जमा करने पर वह ब्याज जुड़ने से बढ़ता रहता है।

पंचमकारों का प्रयोग न्यूनतम मात्रा के साथ अधिकतम कुण्डलिनी लाभ के लिए किया जा सकता है

आम बोलचाल की भाषा में पंचमकार पाप रूप ही हैं। इसलिए इनसे दुखदायी फल भी अवश्य मिलता है, क्योंकि कर्म का फल तो मिल कर ही रहता है। उस बुरे फल से अपने शरीर व मन को बचाने के लिए इनका न्यूनतम सेवन किया जा सकता है। इनको अधिकतम कुण्डलिनी या अद्वैत भाव से जोड़कर अधिकतम आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जो लोग पहले से ही पंचमकारों का प्रयोग गलत तरीके से करते हैं, वो अपना तरीका सुधार सकते हैं। जो लोग इसे शुरु करना चाहते हैं, हम उन्हें योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही ऐसा करने की सलाह देते हैं। 

एक पुस्तक जो पंचमकारों से उत्पन्न द्वैत भाव को जादुई तरीके से अद्वैतभाव में रूपांतरित कर देती है

वह पुस्तक है “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुण्डलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)”। इस पुस्तक को एमेजॉन की एक गुणवत्तापूर्ण समीक्षा में फाइव स्टार के साथ सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्कृष्ट व सबके द्वारा पढ़ा जाने योग्य आंकलित किया गया है। इसमें चिकित्सा विज्ञान के अनुसार हमारे अपने शरीर में संपूर्ण ब्रम्हांड को दर्शाया गया है। इसको पढ़ने से सारा द्वैतभाव अद्वैतभाव में रूपांतरित हो जाता है, और आनंद के साथ कुंडलिनी परिपुष्ट हो जाती है। योगसाधना से तो अतिरिक्त लाभ मिलता ही है। पंचमकारिक तंत्र को “सब कुछ” या “कुछ नहीं” साधना भी कहते हैं। इससे यदि कुंडलिनी जागरण मिल गया तो सब कुछ मिल गया, अगर नहीं मिला तो कुछ नहीं मिला और यहां तक कि नर्क भी जाना पड़ सकता है।

कुंडलिनी असफल प्रेम प्रसंग के विरुद्ध बेहतरीन सुरक्षाकवच है

दोस्तों, आजकल असफल प्रेम के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अविश्वास, भावनाओं की बेकद्री, रिश्तों में गलतफहमियां, स्वार्थ व धोखेबाजी आदि मानव स्वभाव की बुराइयां हैं। असफल प्रेम का सदमा आदमी के पूरे शरीर व मन को झकझोरने वाला होता है। इससे बचने के लिए कुंडलिनी योग एक सर्वोत्तम साधन है। इसलिए आजकल सभी को कुंडलिनी योग करना चाहिए, क्योंकि किसी न किसी रूप में सभी लोग प्रेम के सताए हुए हैं। 

प्रेमी का शरीर आदमी के चक्रों में बस जाता है

आदमी का अपने प्रेमी के साथ बहुत गहरा जुड़ाव पैदा हो जाता है। प्रेमी का आदमी के मन में लगातार स्मरण बना रहता है। भोजन करते समय स्मरण से प्रेमी का शरीर आदमी के आगे के तालु, विशुद्धि, अनाहत और मणिपुर चक्रों पर बस जाता है। भावनामय होने पर वह अनाहत चक्र पर मजबूत हो जाता है। यौन उत्तेजना होने पर वह मन से नीचे उतरकर स्वाधिष्ठान व मूलाधार चक्रों पर आ जाता है। वहाँ से वह मेरुदंड से ऊपर चढ़कर फिर से मस्तिष्क के सहस्रार चक्र में पहुंच जाता है। इससे आदमी के पीछे वाले चक्रों पर भी वह चित्र स्थापित हो जाता है। गहन चिंतन करते समय प्रेमी का चित्र आज्ञा चक्र में पहुंच जाता है। एक प्रकार से प्रेमी का चित्र कुंडलिनी बन जाता है, और कुंडलिनी योग अनजाने में ही चलता रहता है। यह प्रक्रिया बहुत धीमी और कुदरती होती है, इसलिए इसका आभास भी नहीं होता और प्रेमी का चित्र भी बहुत ज्यादा मजबूती से शरीर के सभी चक्रों पर जम जाता है।

कुंडलिनी योग से बनी हुई बनावटी कुंडलिनी प्रेमी के चित्र को रिप्लेस कर देती है

गुरु या देव रूप की कृत्रिम कुंडलिनी को प्रतिदिन के कुंडलिनी योग अभ्यास से चक्रों पर दृढ़ कर दिया जाता है। इससे प्रेमी के रूप वाली कुदरती कुंडलिनी चक्रों से हटने लगती है। इससे आदमी को असफल प्रेम के सदमे से राहत मिलती है। साथ में, कुंडलिनी योगी भविष्य के लिए भी असफल प्रेम के सदमे से सुरक्षित हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उसके चक्रों पर बनावटी कुंडलिनी पहले से ही डेरा डाले हुए होती है। इससे वहाँ पर प्रेम की कुदरती कुंडलिनी अपना डेरा नहीं जमा पाती। 

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कृत्रिम कुंडलिनी योग करते समय प्रेमी की छवि का भी कुंडलिनी के रूप में ध्यान किया जा सकता है। हालांकि, कुंडलिनी के कमजोर होने और कई सामाजिक समस्याओं से बचने के लिए प्रेमी के संबंध में उचित शारीरिक संयम रखा जाना चाहिए। जब प्रेमी की छवि का मन में पूर्ण प्रदर्शन हो जाता है तब वह संतुष्ट हो जाता है, जिससे प्रेमी के लिए वासना या लालसा स्वयं ही घट जाती है। इसके बाद, कुंडलिनी भी कमजोर हो जाती है। यह प्रक्रिया उस कुंडलिनी के जागरण या अन्य कुंडलिनी, मुख्य रूप से गुरु या देवता के मानसिक रूप के त्वरित विकास व जागरण के लिए अहम भूमिका प्रदान करती है।

असफल प्रेम से उत्पन्न सदमे के इलाज के लिए और उससे बचाव के लिए हिंदी में लिखित पुस्तक “शरीरविज्ञान दर्शन- एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र (एक योगी की प्रेमकथा)” सर्वोत्तम प्रतीत होती है।

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कुंडलिनी यदि पुरुषरूप है तो उसे स्त्रीरूप कुंडलिनी के यौनाकर्षण से बहुत बल मिलता है

दोस्तों, कुंडलिनी के क्षेत्र में इस समय तंत्र से बड़ा कोई विज्ञान नहीं है। मेरे साथ तंत्र स्वयं ही स्वाभाविक व व्यवहारिक रूप से सिद्ध हो गया था। यद्यपि मैं तंत्र के बारे में कुछ नहीं जानता था। हो सकता है कि यह मेरे पूर्वजन्म का प्रभाव हो। आज इस छोटी सी पोस्ट में मैं कुंडलिनी के त्वरित जागरण के लिए यौनतंत्र के महत्त्व पर प्रकाश डालूँगा। 

यौनाकर्षण से कुंडलिनी की स्पष्टता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, और वह जीवंत हो जाती है

गुरु-रूप की अकेली कुंडलिनी को भी योग-ध्यान के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है। यह तरीका यद्यपि धीमा होता है, परंतु सुरक्षित होता है। इसमें शान्ति और सात्विकता अधिक बनी रहती है। दूसरे तरीके में गुरु रूप की कुंडलिनी के साथ प्रेमिका रूप की कुंडलिनी का भी ध्यान किया जाता है। इसमें मुख्य कुंडलिनी गुरु रूप की होती है। प्रेमिका रूप की कुंडलिनी उसे यौनाकर्षण प्रदान करती है। जैसे पुरुष और स्त्री के भौतिक शरीर एक-दूसरे को यौनाकर्षण शक्ति से प्रफुल्लित करते रहते हैं, उसी तरह से योगी के मन में बने पुरुष और स्त्री के सूक्ष्म चित्र भी करते रहते हैं। यद्यपि यह तरीका अधिक शक्तिशाली और तीव्र फलदायी होता है, परंतु असुरक्षित होता है। इस तरीके से अशांति, बेचैनी और कमजोरी पैदा हो सकती है। इससे बचने के लिए पंचमकारों का प्रयोग करना पड़ सकता है। पंचमकार तो आम आदमी के लिए पाप स्वरूप ही हैं। इसलिए उनका फल भी भोगना पड़ता है। इसीलिए इस तरीके को सबकुछ या कुछ नहीं वाला तरीका कहते हैं। इससे या तो आदमी को सिद्धि मिलती है, या फिर उसका पतन होकर उसे नरक यातना भोगनी पड़ सकती है।

बुद्धिस्ट लोगों के वामपंथी तंत्र में यौनाकर्षण का सहारा लिया जाता है

बुद्धिस्ट तंत्र में दो डाईटी की अस्पष्ट सी मूर्तियां होती हैं। उनमें से एक मूर्ति को पुरुषरूप दिया जाता है, और दूसरी मूर्ति को स्त्रीरूप। पुरुष डाईटी में गुरु का या देवता का ध्यान किया जाता है। इसी तरह स्त्री डाईटी में प्रेमिका या देवी का ध्यान किया जाता है।

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