दोस्तों, कुंडलिनी के क्षेत्र में इस समय तंत्र से बड़ा कोई विज्ञान नहीं है। मेरे साथ तंत्र स्वयं ही स्वाभाविक व व्यवहारिक रूप से सिद्ध हो गया था। यद्यपि मैं तंत्र के बारे में कुछ नहीं जानता था। हो सकता है कि यह मेरे पूर्वजन्म का प्रभाव हो। आज इस छोटी सी पोस्ट में मैं कुंडलिनी के त्वरित जागरण के लिए यौनतंत्र के महत्त्व पर प्रकाश डालूँगा।
यौनाकर्षण से कुंडलिनी की स्पष्टता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, और वह जीवंत हो जाती है
गुरु-रूप की अकेली कुंडलिनी को भी योग-ध्यान के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है। यह तरीका यद्यपि धीमा होता है, परंतु सुरक्षित होता है। इसमें शान्ति और सात्विकता अधिक बनी रहती है। दूसरे तरीके में गुरु रूप की कुंडलिनी के साथ प्रेमिका रूप की कुंडलिनी का भी ध्यान किया जाता है। इसमें मुख्य कुंडलिनी गुरु रूप की होती है। प्रेमिका रूप की कुंडलिनी उसे यौनाकर्षण प्रदान करती है। जैसे पुरुष और स्त्री के भौतिक शरीर एक-दूसरे को यौनाकर्षण शक्ति से प्रफुल्लित करते रहते हैं, उसी तरह से योगी के मन में बने पुरुष और स्त्री के सूक्ष्म चित्र भी करते रहते हैं। यद्यपि यह तरीका अधिक शक्तिशाली और तीव्र फलदायी होता है, परंतु असुरक्षित होता है। इस तरीके से अशांति, बेचैनी और कमजोरी पैदा हो सकती है। इससे बचने के लिए पंचमकारों का प्रयोग करना पड़ सकता है। पंचमकार तो आम आदमी के लिए पाप स्वरूप ही हैं। इसलिए उनका फल भी भोगना पड़ता है। इसीलिए इस तरीके को सबकुछ या कुछ नहीं वाला तरीका कहते हैं। इससे या तो आदमी को सिद्धि मिलती है, या फिर उसका पतन होकर उसे नरक यातना भोगनी पड़ सकती है।
बुद्धिस्ट लोगों के वामपंथी तंत्र में यौनाकर्षण का सहारा लिया जाता है
बुद्धिस्ट तंत्र में दो डाईटी की अस्पष्ट सी मूर्तियां होती हैं। उनमें से एक मूर्ति को पुरुषरूप दिया जाता है, और दूसरी मूर्ति को स्त्रीरूप। पुरुष डाईटी में गुरु का या देवता का ध्यान किया जाता है। इसी तरह स्त्री डाईटी में प्रेमिका या देवी का ध्यान किया जाता है।
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