कुंडलिनी शक्ति ही माता सीता है, और उसका बहिर्गमन ही दशानन रावण के द्वारा सीताहरण है

मित्रो, मैं पिछले ब्लॉग लेख में बता रहा था कि किस तरह रामायण कुंडलिनी योग के रूपकात्मक वर्णन की तरह प्रतीत होती है। इस लेख में हम इसको थोड़ा विस्तृत परिपेक्ष्य में देखेंगे।

शरीर में कुंडलिनी शक्ति ही माता सीता है, और उसका बहिर्गमन ही दशानन रावण के द्वारा सीताहरण है

राक्षस रावण के दस सिर दस दोषों के प्रतीक हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियों के दोष, और पांच कर्मेंद्रियों के दोष। उन दोषों ने कुंडलिनी शक्ति को बहिर्मुख किया हुआ था। इससे कुंडलिनी शक्ति शरीर से बाहर निकलकर संसार में भटकी हुई थी। भौतिक संसार में भटकते हुए वह उन दोषों के हित में काम कर रही थी, जिससे वे दोष और ज्यादा ताकतवर हुए जा रहे थे। विभिन्न सांसारिक इच्छाओं को पैदा करके वह काम दोष को बलवान बना रही थी। लड़ाई-झगड़े करा कर वह क्रोध दोष को बल दे रही थी। ज्यादा से ज्यादा पाने की इच्छा पैदा करके वह लालच को बढ़ा रही थी। सुंदर वस्तुओं के पीछे शरीर को भगा कर वह मोह दोष को बढ़ा रही थी। नशा वगैरह करवाकर वह मद को बढ़ा रही थी, और दूसरे की संपत्ति पर बुरी नजर डलवाकर मत्सर दोष को बढ़ा रही थी। इसी तरह से वह कर्मेन्द्रियोके पांच दोषों को भी बढ़ा रही थी। वह शक्ति ही माता सीता है। दस दोषों के द्वारा उस कुंडलिनी शक्ति को अपनी ताकत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने को ही दशानन रावण के द्वारा माता सीता को चुराने के रूप में लिखा गया है। 

सहस्रार चक्र में आत्मा और कुंडलिनी का मिलन ही राम और सीता के मिलन के रूप में दर्शाया गया है

कुंडलिनी शक्ति के द्वारा बाहरी भौतिक जगत में भी अनासक्ति के साथ विविध क्रियाकलाप करना ही माता सीता का रावण से दूर और उसके प्रति अनासक्त बने रहना है। तीव्र कुंडलिनी योग के माध्यम से कुंडलिनी शक्ति का शरीर में अंदर की तरफ लौटना और सहस्रार में प्रविष्ट होकर जीवात्मा से उसका मिलना ही माता सीता से भगवान राम का पुनर्मिलन है। सहस्रार में कुंडलिनी और जीवात्मा के मिलन से दसों इन्द्रियों के दोषों का नष्ट होना ही भगवान राम के द्वारा सीता की सहायता से दशानन रावण का वध करना है। भारतवर्ष शरीर है, लंका शरीर के बाहर का भौतिक जगत, और उनके बीच में समुद्र दोनों के बीच का विभाजनकारी क्षेत्र है। बाहर की दुनिया कभी भीतर प्रवेश नहीं कर सकती। हम दुनिया को महसूस नहीं करते हैं, लेकिन हम केवल अपने दिमाग के अंदर बाहरी दुनिया की अनुमानित छवि महसूस करते हैं। इसलिए दोनों क्षेत्रों के बीच महान महासागर को उनकी पूर्ण पृथकता दिखाने के लिए चित्रित किया गया है। राम का समुद्र में एक पुल के माध्यम से लंका पहुंचना प्रतीकात्मक है, क्योंकि हम किसी क्षेत्र तक पहुंचे बिना वहाँ से किसी चीज को वापस नहीं ला सकते हैं। उन्होंने और उनकी सेना ने नावों का नहीं, बल्कि एक पुल का इस्तेमाल किया। इसका मतलब है कि हमारा मस्तिष्क वास्तव में बाहरी दुनिया तक नहीं पहुंचता है, लेकिन मस्तिष्क में प्रवेश करने वाली रोशनी और ध्वनियों के रूप में पुल के माध्यम से जानकारी प्राप्त करता है।

सभी पुराण कुंडलिनी योग का मिथकीय व रूपात्मक वर्णन करते हैं

पुराने समय में अशिक्षा और पिछड़ेपन का बोलबाला होता था। कुंडलिनी योग अति सूक्ष्म व आध्यात्मिक विज्ञान से जुड़ा हुआ विषय था। उस समय स्थूल विज्ञान भी आम लोगों की समझ से परे होता था, कुंडलिनी योग जैसा सूक्ष्म व पारलौकिक विज्ञान उन्हें कैसे समझ आ सकता था। इसलिए कुंडलिनी योग का ज्ञान केवल सम्पन्न वर्ग के कुछ गिनेचुने लोगों को ही होता था। वे चाहते थे कि आम लोग भी उसे प्राप्त करते, क्योंकि आध्यात्मिक मुक्ति पर मानवमात्र का अधिकार है। पर वे उन्हें सीधे तौर पर कुंडलिनी योग को समझाने में सफल नहीं हुए। इसलिए उन्होंने कुंडलिनी योग को रूपात्मक व मिथकीय कथाओं के रूप में ढाला, ताकि लोग उन्हें रुचि लेकर पढ़ते, इससे धीरे-धीरे ही सही, कुंडलिनी योग की तरफ उनका झुकाव पैदा होता गया। उन कथाओं के संग्रह पुराण बन गए। उन पुराणों को पढ़ने से अनजाने में ही लोगों के अंदर कुंडलिनी का विकास होने लगा। इससे उन्हें आनन्द आने लगा, जिससे उन्हें पुराणों की लत लग गई। इतने प्राचीन ग्रँथों के प्रति तब से लेकर आज के आधुनिक युग तक जो लोगों का आकर्षण है, यह इसी कुंडलिनी-आनन्द के कारण प्रतीत होता है। पुराण पढ़ने व सुनने वाले लोगों के बीच में जिसका दिमाग तेज होता था, वह एकदम से कुंडलिनी योग को पकड़ कर अपनी कुंडलिनी को जागृत भी कर लेता था। इस तरह से पुराण प्राचीन काल से लेकर मानवता की अप्रतिम सेवा करते आ रहे हैं।

अध्यात्म में रूपकता का महत्त्व

रूपकों से आध्यात्मिक विषयों को भौतिकता, सरलता, रोचकता, सामाजिकता और वैज्ञानिकता मिलती है। इसके बिना अध्यात्म बहुत नीरस होता। कई लोग अनेक प्रकार के कुतर्कों से रूपकता का विरोध करते हैं। इसे रूढ़िवादिता, कपोल कल्पनाशीलता आदि माना जाता है। बेशक आजके विज्ञानवादी युग में ऐसा लगता हो, पर प्राचीन काल में रूपकों ने मानवमात्र को बहुत लाभ पहुंचाया है। यदि शिव के स्थान पर निराकार ब्रह्म कहा जाए तो कितना उबाऊ लगेगा। मस्तिष्क और सहस्रार शब्द में वो सरसता कहाँ है, जो उनकी जगह पर हिमालय पर्वत और कैलाश पर्वत लिखने से प्राप्त होती है। पर मैं यह बता दूं कि शिवपुराण में जो पर्वतों का उल्लेख है वह प्रतीकात्मक या रूपात्मक ही लगता है। ऐसा नहीं है कि केवल पर्वतों में ही कुंडलिनी जागरण होता हो। हाँ, पर्वत उसमें थोड़ी अधिक मदद जरूर करते हैं। वहां शान्ति होती है। पर वहाँ ऑक्सीजन की व अन्य सुविधाओं की कमी भी होती है। इससे अधिकांश प्राण ऐसे भौतिक कष्टों से निजात दिलाने में ही खर्च हो जाते हैं। इसलिए मैदान व पहाड़ का मिश्रण सबसे अच्छा है। मैदानों की सुविधाओं में खूब सारा प्राण इकठ्ठा कर लो, और उसे कुंडलिनी को देने के लिए थोड़े समय के लिए पर्वत पर चले जाओ। पुराने जमाने मे लोग ऐसा ही करते थे। इसी तरह कुंडलिनी शब्द भी उतना रोचक नहीं लगता, जितना उसकी जगह पर माता पार्वती या सीता लगता है। फिर भी आजकल के तथाकथित आधुनिक व बुद्धिप्रधान समाज की ग्राह्यता के लिए आध्यात्मिक रूपकता को रहस्योद्घाटित करते हुए यथार्थ भी लिखना पड़ता है। 

कुंडलिनी योग रामायण वर्णित प्रभु राम की अयोध्या गृह-भूमि द्वारा रूपात्मक व अलंकारपूर्ण कथा के रूप में प्रदर्शित

वैश्विक आतंकवाद और विस्तारवाद के विरुद्ध सबसे अधिक कड़ा रुख अपनाने वाले जांबाज भारतीय सेनानायक विपिन रावत, उनकी पत्नी और कुछ अन्य बड़े सैन्य अधिकारियों की एक दुखद विमान हादसे में असामयिक वीरगति के उपरांत उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि और उनकी आत्मा की शांति के लिए हार्दिक कामना।

मित्रो, मैं पिछले सप्ताह कोई कुंडलिनी लेख नहीं लिख पाया। वजह थी, व्यस्तपूर्ण जीवनचर्या। किसी आवश्यक कार्य से हाईवेज पर सैंकड़ों किलोमीटर की बाइक राइडिंग करनी पड़ी। यद्यपि बाइक लेटेस्ट, कम्फर्टेबल और स्पोर्ट्स टाइप थी, साथ में पर्यावरण-अनुकूल भी। अच्छा अनुभव मिला। बहुत कुछ नया सीखने को मिला। सफर के भी बहुत मजे लिए, और स्थायी घर के महत्त्व का पता भी चला। जब तक आदमी पर कोई काम करने की बाध्यता नहीं पड़ती, तब तक वह कठिन काम करने से परहेज करता रहता है। जब ‘डू ओर डाई’ वाली स्थिति आती है, तब वह करता भी है, और सीखता भी है। इस सप्ताह मैं कुंडलिनी योग और रामायण के बीच के संबंध पर चर्चा करूँगा।

गहराई से देखने पर रामायण कुंडलिनी योग के व्यावहारिक व प्रेरक वर्णन की तरह प्रतीत होती है

भगवान राम यहाँ जीवात्मा का प्रतीक है। परमात्मा और जीवात्मा में तत्त्वतः कोई भेद नहीं है। वह नवरात्रि के नौ दिनों में शक्ति साधना करता है। उससे उसकी कुंडलिनी सहस्रार में पहुंच जाती है। उससे वह प्रतिदिन शुद्ध होता रहता है। दसवें दिन वह अहंकार रूपी रावण राक्षस को अपनी योगाग्नि से जलाकर नष्ट कर देता है। दीवाली के दिन उसकी कुंडलिनी जागृत हो जाती है। इसको राम का वापिस अपने घर अयोध्या लौटना दिखाया गया है। अयोध्या आत्मा का वह परमधाम है, जिसे कोई नहीं जीत सकता, मतलब जिसके ऊपर कोई न हो। अयोध्या का शाब्दिक अर्थ भी यही होता है। राम दशरथ का पुत्र है। दशरथ मतलब वह रथ जिसे दस घोड़े खींचते हैं। इन्द्रियों को शास्त्रों में घोड़े कहा गया है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेंन्द्रियाँ, कुल दस इन्द्रियाँ इस शरीर को चलाती हैं। इसलिए दशरथ शरीर को ही कहा गया है। इसीसे आत्मा बद्ध जैसा होकर जीवात्मा या राम बन जाता है। वैसे तो राम परमात्मा है, पर उससे बद्ध जीवात्मा या साधारण राम को यही दशरथ-शरीर पैदा करता है, इसीलिए इसे जीवात्मा राम का पिता कहा गया है। वह जो 12 वर्ष तक वनवास करता है, वह कुंडलिनी योग साधना ही है। कुंडलिनी योग साधना से आदमी सबके बीच रहता हुआ भी सबसे दूर और सबसे अलग सा बना रहता है। इसे ही वनवास कहा गया है। वैसे भी, तंत्र शास्त्रों के अनुसार कुंडलिनी योग में परिपक्वता या पूर्णता प्राप्त करने में औसतन 12 साल लग जाते हैं। दशरथ की पत्नी जो केकयी है, वह शरीर में पैदा होने वाली परमार्थ बुद्धि है। वह बाहर से देखने पर तो मूर्ख और दुष्ट लगती है, पर असलियत में वह परम हित करने वाली होती है। वह काक या कौवे की तरह कांय कांय जैसे कठोर शब्द करने वाली लगती है, इसीलिए उसका नाम केकयी है। उसने कभी दशरथ रूपी शरीर को राक्षसों के साथ युद्ध में बचाया था, मतलब उसने सख्ती और प्रेम से दशरथ को राक्षसों के जैसी बुरी आदतों से रोक कर परमार्थ- भ्रष्ट होने से बचाया था। इसीलिए दशरथ को उस पर गहरा विश्वास था। परमार्थ की बुद्धि को बनाए रखने के लिए परमार्थ के मार्ग पर चलना पड़ता है। केकयी के कोपभवन में जाकर आत्महत्या की धमकी देने का यही अर्थ है कि अगर कम से कम उसकी तीन तथाकथित आध्यात्मिक बातें नहीं मानी गईं तो शरीर ऐशोआराम में डूब कर मनमर्जी का दुराचरण करेगा, जिससे वह नष्ट हो जाएगी। जो सन्मार्ग पर चलते हैं, उनकी वाणी में सरस्वती का वास होता है। उनके बोल झूठे नहीं होते। इसे ही यह कहा गया है, रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई। केकयी का मांगा जीवात्मा राम के लिए पहला वर है, राम को राज्य न देना। इसका मतलब है कि राम को भोगविलास व व्यर्थ की जिम्मेदारियों से दूर रखना। दूसरा वर है कि राम को 12 वर्ष का वनवास देना। वनवास कुंडलिनी योग साधना का ही पर्याय है। तीसरा वर है कि उसके पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाना। भरत मतलब भ्राता में रत, भाई राम की भक्ति में लीन। भरत शरीर का निर्लिप्त मन है। वह राज्य तो करता है, पर बुझे हुए मन से। वह भोगविलास में आसक्त नहीं होता। वह राम के जूतों को अपने सिंघासन पर रखे रखता है, खुद उसपर कभी नहीं बैठता। यह राजा राम का महान कर्मयोग ही है। वह सबकुछ करते हुए भी कुछ नहीं करता और कुंडलिनी योग साधना में ही तल्लीन रहता है। उसकी पत्नी सीता अर्थात उसकी शक्ति योगी राम के साथ रहती है, राजा राम के साथ नहीं। यही सीता का राम के साथ वन को जाना है। इसी तरह हनुमान और लक्ष्मण भी योगी राम के साथ रहते हैं, राजा राम या भरत के साथ नहीं। हनुमान यहां जंगली या अंधी शक्ति का प्रतीक है, जो राम के दिग्दर्शन में रहते हुए विभिन्न यौगिक क्रियाओं के माध्यम से कुंडलिनी योग में सहायक बनती है। लक्ष्मण मन के लाखों विचारों का प्रतीक है। लक्ष-मन मतलब लाखों विचार। ये भी अपनी संवेदनात्मक ऊर्जा कुंडलिनी को देते हैं। दरअसल रूपात्मक कथाओं में मन के विभिन्न हिस्सों को विभिन्न व्यक्तियों के रूप में दर्शाने की कला का बहुत महत्त्व होता है। वैसे भी, सारा संसार मन में ही तो बसता है। यदि कोई पूछे कि कुंडलिनी योगी राम किसका ध्यान करते हुए कुंडलिनी योग साधना करते थे, तो जवाब स्पष्ट है कि राम भगवान शिव का ध्यान करते थे। इसका प्रमाण रामेश्वरम तीर्थ है, जहाँ राम ने स्वयं शिवलिंग की स्थापना की है। यह अति प्रसिद्ध तीर्थ भारतवर्ष की चारधाम यात्रा के अंतर्गत आता है।

राम की दूसरी माता कौशल्या का नाम कुशल शब्द से पड़ा है। वह शरीर में वह बुद्धि है जो शरीर का कुशलक्षेम चाहती है। वह बाहर से तो अच्छी लगती है, क्योंकि वह शरीर को सभी सुख सुविधाएं देना चाहती है, पर वह परमार्थ बुद्धि केकयी को व अपना असली कल्याण चाहने वाले जीवात्मा राम को अच्छी नहीं लगती। केकयी राम के शरीर या दशरथ को भी अच्छी नहीं लगती क्योंकि शरीर को परमार्थ से क्या लेना देना, उसे तो बस ऐशोआराम चाहिए। पर जब वह मजबूत होती है, तब वह युक्ति से शरीर को भी वश में कर लेती है। यही केकयी के द्वारा दशरथ को वश में करना है। 

कुंडलिनी स्थायी घर से जुड़ी होती है

दशरथ रूपी शरीर को हम उसके स्थायी घर का राजा भी कह सकते हैं। यही अयोध्या का राजा दशरथ है। आदमी के अपने स्थायी घर को भी हम अयोध्या नगरी कह सकते हैं, क्योंकि हम इससे लड़ नहीं सकते। हम इसे नुकसान नहीं पहुंचा सकते। कोई भी प्राणी अपने स्थायी घर से युद्ध नहीं कर सकता। इसीलिए इसका नाम अयोध्या है। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि एक आदमी से उसके स्थायी घर में कोई नहीं लड़ सकता। तभी तो कहते हैं कि अपने घर में तो कुत्ता भी शेर होता है। कोई आदमी कितना ही बड़ा लड़ाका क्यों न हो, पर अपने स्थायी घर में हमेशा शांति चाहता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। कोई प्राणी नहीं चाहता कि उसे हर समय अपराध बोध सताता रहे, क्योंकि उसका स्थायी घर उसके मन से हमेशा जुड़ा होता है। क्योंकि आदमी का मन हमेशा उसके स्थायी घर से जुड़ा होता है, इसलिए कुंडलिनी भी स्थायी घर से जुड़ी होती है, क्योंकि कुंडलिनी मन का ही हिस्सा है, या यूं कहो कि मन का सर्वोच्च प्रतिनिधि है। इसीलिए हरेक आदमी अपने स्थायी घर में सदैव अपना सम्मान बना कर रखना चाहता है। मुसीबत के समय स्थायी घर ही याद आता है। आपने देखा होगा कि कैसे कोरोना लौकडाऊन को तोड़ते हुए लोग अपने-अपने स्थायी घरों को भागते थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, ये चार पुरुषार्थ बताए गए हैं। इनका आधार यह शरीर और उस शरीर का आधार उसका स्थायी घर ही है। कहा भी गया है कि शरीरमाद्यम खलु धर्मसाधनम। इसलिए बेशक जीवात्मा राम अपने कुंडलिनी जागरण के लिए इसे थोड़ा नजरअंदाज भी कर ले, पर कुंडलिनी जागरण के बाद उसे इसी शरीर में, शरीर के आधाररूप स्थायी घर और उसके माध्यम से भौतिकता में प्रविष्ट होना पड़ता है। बेशक वह कुंडलिनी जागरण के लिए अपना घर छोड़कर वन को चला जाए, पर अंततः उसे घर वापिस आना ही पड़ता है। देखा भी होगा आपने, आदमी घर से बाहर जहाँ मर्जी चला जाए, पर वह वास्तविक और स्थायी विकास अपने स्थायी घर में ही कर पाता है। नई जगह को घर बनाने में एक आदमी की कई पीढ़ियां लग जाती हैं। तभी तो एक प्रसिद्ध लघु कविता बनी है, “एक चिड़िया के बच्चे चार, घर से निकले पंख पसार; पूरव से वो पश्चिम भागे, उत्तर से वो दक्षिण भागे; घूम-घाम जग देखा सारा, अपना घर है सबसे प्यारा। घर की महिमा भी अपरम्पार है, और अयोध्या नगरी की भी। इसीलिए रिश्तों में घर और वर की बहुत ज्यादा अहमियत होती है। सबको पता है कि असली घर तो परमात्मा ही है, पर वहाँ के लिए रास्ता निवास-घर से होकर ही जाता है, ऐसा लगता है। सम्भवतः इसीलिए आदमी को मरणोपरांत भी उसके स्थायी घर पहुंचाया जाता है। अपने स्थायी घर गजनी को समृद्ध करने के लिए ही तो जेहादी आक्रांता महमूद गजनवी ने भारत को बेतहाशा लूटा था। बाहर जो कुछ भी विकास आदमी करता है, वह अपने स्थायी घर के लिए ही तो करता है। गजनवी को स्थायी घर के महत्त्व का पता था, नहीं तो क्या वह भारत में ही अपने रहने के लिए स्थायी घर न बना लेता? इसी तरह उपनिवेशवाद के दौरान अधिकांश अंग्रेजों ने भी भारत सहित अन्य उपनिवेशित देशों में अपने लिए स्थायी घर नहीं बनाए। विश्व के ज्यादातर आंदोलनों, संघर्षों  व युद्धों का एकमात्र मूल कारण होमलैंड या स्थायी घर ही प्रतीत होता है। इसका मतलब है कि आदमी कुंडलिनी के लिए ही ताउम्र संघर्ष करता रहता है, क्योंकि स्थायी घर भी उसमें विद्यमान कुंडलिनी की वजह से ही प्रिय लगता है। पेटभर खाना तो आदमी कहीं भी पा सकता है। पर घर घर ही होता है। अपनापन अपनापन ही होता है। कुंडलिनी से ही अपनापन है। इसका अर्थ है कि कुंडलिनी साधना करते हुए आदमी कहीं भी रहे, उसे अपने स्थायी घर जैसा ही आनन्द मिलता है, यहाँ तक कि उससे कहीं ज्यादा, यदि कुंडलिनी योग साधना निष्ठा व मेहनत से की जाए। इससे यह अर्थ भी निकलता है कि कुंडलिनी योग होम सिकनेस को कुछ हद तक दूर करके विश्व के अधिकांश संघर्षों और युद्धों पर विराम लगा सकता है, और दुनिया में असली व स्थायी शांति का माहौल बना सकता है, जिसकी आज सख्त जरूरत है। एक आम आदमी के द्वारा कुंडलिनी जागरण के बाद अपने स्थायी घर में जीतोड़ मेहनत करना ही राजा राम के द्वारा अयोध्या में बेहतरीन ढंग से राजकाज संभालना कहा गया है। यह अलग बात है कि कुंडलिनी जागरण के बाद व्यवहार में लाई गई भौतिकता आत्मज्ञान के साथ प्रयुक्त की जाती है, इसलिए ज्यादा हानिकारक नहीं होती। इसी दुनियादारी से कुंडलिनी जागरण स्थिरता और नित्यता को प्राप्त होता हुआ मुक्तिकारक आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। मेरे खयाल से खाली कुंडलिनी जागरण की झलक से कुछ नहीं होता, यदि उसे सही दिशा में आगे नहीं बढ़ाया जाता। मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि रामायण जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थीं, या रामायण काल्पनिक है। रामायण वास्तविक भी हो सकती है, रूपात्मक भी हो सकती है, और एकसाथ दोनों रूपों में भी हो सकती है। यह श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करता है। रामायण हमें हर प्रकार से शिक्षा ही देती है। मानो तो सारा संसार ही काल्पनिक है, न मानो तो कुछ भी काल्पनिक नहीं है, किसीके साथ कोई भेदभाव नहीं।

कुंडलिनी और ब्रह्ममुहूर्त के अन्तर्सम्बन्ध से भूतों का विनाश


सभी मित्रों को गुरु नानक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

कालरात्रि के चाँद गुरु नानक देव

मित्रो, इस वर्ष के गुरु नानक दिवस के उपलक्ष्य में अपने सिख भाई व पड़ौसी के यहाँ प्रभात-फेरी कथा में जाने का मौका मिला। बड़े प्यार और आदर से निमंत्रण दिया था, इसलिए कुंडलिनी की प्रेरणा से सुबह के चार बजे से पहले ही आंख खुल गई। जैसे ही तैयार होकर कथा में पत्नी के साथ पहुंचा, वैसे ही गुरुद्वारा साहिब से ग्रन्थ साहिब भी पहुंच गए। ऐसा लगा कि जैसे मुझे ही सेवादारी के लिए विशेष निमंत्रण मिला था। बहुत ही भावपूर्ण व रोमांचक दृश्य था। सुबह साढ़े चार बजे से लेकर साढ़े पांच बजे तक मधुर संगीत के साथ शब्द कीर्तन हुआ। अच्छा लगा। यह समय ब्रह्ममुहूर्त के समय के बीचोंबीच था, जो लगभग 4 बजे से 6 बजे तक रहता है। ऐसा लगा कि हम पूरी रातभर कीर्तन कर रहे हों। ऐसा ब्रह्ममुहूर्त की उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण ही लगता है। इसीलिए आध्यात्मिक साधना के लिए यही समय सर्वोपरि निश्चित किया गया है। ब्रह्ममुहूर्त में आध्यात्मिक साधना से कुंडलिनी चरम के करीब पहुंच जाती है। मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा। कथा-कीर्तन के अंत में हल्का जलपान भी हुआ। आदमी हर पल कुछ न कुछ सीखता है। सिख मतलब सीख। इससे सिद्ध हो जाता है कि यह धर्म अत्याधुनिक और वैज्ञानिक भी है, क्योंकि आजकल सीखने का ही तो युग है। इसी तरह से इसमें सेवादारी का भी बड़ा महत्त्व है। आजकल का उपभोक्तावाद, व्यावसायिक व प्रतिस्पर्धा का युग जनसेवा या पब्लिक सर्विस का ही तो युग है। आत्मसुरक्षा का भाव तो इस धर्म के मूल में है। यह भाव भी आजकल बहुत प्रासंगिक है, क्योंकि हर जगह झूठ-फरेब, और अत्याचार का बोलबाला दिखता है। ब्रह्ममुहूर्त के बारे में सुना तो बहुत था, पर खुद अच्छी तरह से अनुभव नहीं किया था। लोगों को जो इसकी शक्ति का पता नहीं चलता, उसका कारण यही है कि वे ढंग से साधना नहीं करते। शक्ति के पास बुद्धि नहीं होती। बुद्धि आत्मा या विवेक के पास होती है। यदि शक्ति के साथ विवेक-बुद्धि का दिशानिर्देशन है, तभी वह आत्मकल्याण करती है, नहीं तो उससे विध्वंस भी संभव है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान को देख सकते हैं। सूत्रों के अनुसार पाकिस्तानी सेना निर्दोष व निहत्थी जनता को मारती है। कई बार यह देश कम, और दुष्प्रचार करने वाली मशीन ज्यादा लगता है। बन्दर के हाथ उस्तरा लग जाए, तो अंजाम कुछ भी हो सकता है। शक्ति तो एक धक्का है। यदि मन में पहले से ही कचरा है, तो शक्ति से उसीको धक्का मिलेगा, जिससे वह और ज्यादा फैल जाएगा। इससे तो आदमी ब्रह्ममुहूर्त में जागने से भी तौबा करेगा। यदि मन में कुंडलिनी है, तो विकास का धक्का कुंडलिनी को ही मिलेगा। मेरा जन्म से ही एक हिंदु परिवार से सम्बन्ध रहा है। मेरे दादाजी एक प्रख्यात हिंदु पुरोहित थे। मैंने कई वर्षों तक उनके साथ एक शिष्य की तरह काम किया है। लगता है कि वे अनजाने में ही मेरे गुरु बन गए थे। मुझे तो हिंदु धर्म और सिख धर्म एकजैसे ही लगे। दोनों में धर्मध्वज, ग्रन्थ और गुरु का पूजन या सम्मान समान रूप से किया जाता है। दरअसल, भीतर से सभी धर्म एकसमान हैं, कुछ लोग बाहर-2 से भेद करते हैं। तंत्र के अनुसार, कुंडलिनी ही गुरु है, और गुरु ही कुंडलिनी है। हाँ, क्योंकि सिक्ख धर्म धर्मयौद्धाओं से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें पारम्परिक हिंदु धर्म की अपेक्षा थोड़ी ज्यादा संक्षिप्तता, व्यावहारिकता और कट्टरता होना स्वाभाविक ही है। पर वह भी कुछ विशेष धर्मों के सामने तो नगण्यतुल्य ही है। हालांकि सिक्ख धर्म बचाव पक्ष को लेकर बना है, आक्रामक पक्ष को लेकर नहीं। यदि कभी आक्रामक हुआ भी है, तो अपने और हिंदु धर्म के बचाव के लिए ही हुआ है, अन्यथा नहीं। मैं यहाँ किसी धर्मविशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। केवल मानवीय सत्य को स्पष्ट कर रहा हूँ। युक्तिपूर्ण विचार व लेखन से सत्य ज्यादा स्पष्ट हो जाता है। कुछ न कुछ कट्टरता तो सभी धर्मों में है। कुछ सकारात्मक कट्टरता तो धर्म के लिए जरूरी भी है, पर यदि वह मानवता और सामाजिकता के दायरे में रहे, तो ज्यादा बेहतर है, जिसके लिए सिक्ख धर्म अक्सर जाना और माना जाता है। मध्ययुग में जिस समय जेहादी आक्रांताओं के कारण भारतीय उपमहाद्वीप अंधेरे में था, उस समय ईश्वर की प्रेरणा से पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा की तरह गुरु नानकदेव का अभ्युदय हुआ था, जिसने भयजनित अंधेरे को सुहानी चांदनी में तब्दील कर दिया था।

भगवान शिव भूतों से भरी रात के बीच में पूर्ण चन्द्रमा की तरह प्रकाशमान रहते हैं

किसी धार्मिक क्रियाकलाप में प्रकाशमान भगवान के साथ उसका साया अंधेरा भी प्रकट हो सकता है। क्योंकि प्रकाश और अंधकार साथसाथ रहते हैं। अंधेरे को शिव का भूतगण समझकर सम्मानित करना चाहिए, क्योंकि वह शिव के साथ ही आया। चान्द के साथ रात तो होती ही है। उससे डरना नहीं चाहिए। इससे शक्तिशाली अद्वैत पैदा होता है, जो  कुंडलिनी जागरण में सहायक होता है। दरअसल धार्मिक विद्वेष के लिए यही भूत जिम्मेदार होते हैं, शिव नहीं। आपने भी देखा या सुना ही होगा कि अमुक आदमी बहुत ज्यादा धार्मिक बनने के बाद अजीब सा हो गया। कई बार आदमी गलत काम भी कर बैठता है। मेरा एक रिश्तेदार है। वह गाँव के ही अपने एक मित्र के साथ निरन्तर धार्मिक चर्चाएँ करता रहता था। उन दोनों को इकट्ठा देखकर गांव की महिलाएं उनका मजाक उड़ाते हुए आपस में बतियाने लगतीं कि देखो सखियो, अब श्रीमद्भागवत पुराण का कथा-प्रवचन शुरु होने वाला है। कुछ समय बाद मेरे रिश्तेदार के उस मित्र ने अचानक आत्महत्या कर ली, जिससे सभी अचम्भित हो गए, क्योंकि उसमें अवसाद के लक्षण नहीं दिखते थे। अति सर्वत्र वर्जयेत। हो सकता है कि सतही धार्मिकता ने एक पर्दे का काम किया, और उसके अवसाद को ढक कर रखा। उस अपूर्ण धार्मिकता ने उसके मुंह पर नकली मुस्कान पैदा कर दी। हो सकता है कि अगर वह अधूरी आध्यात्मिकता का चोला न पहनता, तो लोग उसके अंदरूनी अवसाद के लिए जिम्मेदार समस्या को जान जाते, और उसे उससे अवगत कराते और उसका हल भी सुझाते। उससे वह घातक कदम न उठाता। तभी तो कहा गया है कि लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। इसके विपरीत अगर उसने आध्यात्मिकता को पूर्णता के साथ अपनाया होता, तो उसका अवसाद तो मिट ही जाता, साथ में उसे कुंडलिनी जागरण भी प्राप्त हो जाता। धार्मिकता या आध्यात्मिकता की चरमावस्था व पूर्णता तांत्रिक कुंडलिनी योग में ही निहित है। तांत्रिक कुण्डलिनी योग सिर्फ एक नाम या प्रतीक या तरीका है एक मनोवैज्ञानिक तथ्य का। इस आध्यात्मिक व मनोवैज्ञानिक सिद्धांत को धरातल पर उतारने वाले अन्य नाम, प्रतीक या तरीके भी हो सकते हैं। हिंदु ही क्यों, अन्य धर्म भी हो सकते हैं। ऐसा है भी, पर उसे हम समझते नहीं, पहचानते नहीं। जब सभी धर्मों व जीवनव्यवहारों का वैज्ञानिक रूप से गम्भीर अध्ययन किया जाएगा, तभी पूरा पता चल पाएगा। इसलिए जब तक पता नहीं चलता, तब तक हिंदु धर्म के कुंडलिनी योग से काम चला लेना चाहिए। हमें पीने के लिए शुद्ध जल चाहिए, वह जहां मर्जी से आए, या उसका जो मर्जी नाम हो। अध्यात्म की कमी का कुछ हल तंत्र ने तो ढूंढा था। उसने भूतबलि को पंचमकार के एक अंग के रूप में स्वीकार किया। यह गौर करने वाली बात है कि सिक्ख धर्म मे पंचककार होते हैं। ये पाँच चीजें होती हैं, जिनके नाम क अक्षर से शुरु होते हैं, और जिन्हें एक सिक्ख को हमेशा साथ रखना पड़ता है। ये पाँच चीजें हैं, केश, कड़ा, कंघा, कच्छा और कटार। इससे ऐसा लगता है कि उस समय वामपंथी तंत्र का बोलबाला था, जिससे पंचमकार की जगह पँचककार प्रचलन में आया। भूतबलि, मतलब भूत के लिए बलि। इससे भूत संतुष्ट होकर शांत हो जाते हैं। एकबार मुझे कुछ समय के लिए ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में रहने का मौका मिला। वहाँ पर घर-घर में जब देवता बुलाया जाता है, तो उसे पशुबलि भी दी जाती है। पूछने पर वहाँ के स्थानीय लोगों ने बताया कि वह बलि देवता के लिए नहीं, बल्कि उसके साथ आए वजीर आदि अनुचरों के लिए होती है। देवता का आहार-विहार तो सात्विक होता है। तो वे अनुचर एकप्रकार से शिवगण या भूत ही हुए, और देवता शिव हुए। आजकल भी इसी तर्ज पर बहुत से चतुर लोग दफ्तर के बाबुओं को खुश करके बहुत से काम निकाल लेते हैं, अधिकारी बस देखते ही रह जाते हैं। दरअसल बलिभोग ऊर्जा के भंडार होते हैं। उसमें तमोगुण भी होता है। ऊर्जा और तमोगुण के शरीर में प्रविष्ट होने से जरूरत से ज्यादा बढ़ा हुआ सतोगुण संतुलित हो जाता है, और मन में एक अद्वैत सा छा जाता है। संतुलन जरूरी है। जरूरत से ज्यादा ऊर्जा और तमोगुण से भी काम खराब हो जाता है। अद्वैत भाव को धारण करने के लिए भी शरीर को काफी ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अद्वैत भाव पैदा होने से फिर से सतोगुण बढ़ने लगता है। तमोगुण की सहायता से सतोगुण को पैदा करना, वामपंथी शैवों व तांत्रिकों का सम्भवतः यही एक दिव्य फार्मूला है। मूलाधार चक्र तमोगुण का प्रतीक है, और सहस्रार चक्र सतोगुण का प्रतीक है। पहले तमोगुण से कुंडलिनी को मूलाधार पर आने दिया जाता है। फिर तांत्रिक कुंडलिनी योग से उसे सहस्रार तक सीधे ही उठाया जाता है। उससे एकदम से सतोगुण बढ़ जाता है, हालांकि संतुलन या अद्वैत के साथ। कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को मन में बना कर रखने के अनगनित लाभों में से गुण-संतुलन का लाभ भी एक है। क्योंकि कुंडलिनी पूरे शरीर में माला के मनके की तरह घूमते हुए तीनों गुणों का संतुलन बना कर रखती है। सारा खेल ऊर्जा या शक्ति का ही है। तभी तो कहते हैं कि शक्ति से ही शिव मिलता है। वैसे ऊर्जा और गुण-संतुलन या अद्वैत को प्राप्त करने के और भी बहुत से सात्विक तरीके हैं, जिनसे अध्यात्म शास्त्र भरे पड़े हैं। ऐसी ही एक आधुनिक पुस्तक है, “शरीरविज्ञान दर्शन~एक आधुनिक कुंडलिनी तंत्र”। भूत तब प्रबल होकर परेशान करते हैं, जब शिव का ध्यान या पूजन ढंग से नहीं किया जाता। जब इसके साथ अद्वैत भाव जुड़ जाता है, तब वे शांत होकर गायब हो जाते हैं। दरअसल वे गायब न होकर प्रकाशमान शिव में ही समा जाते हैं। भूत एक छलावा है। भूत एक साया है। भूत का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। भूत मन का भ्रम है, जो दुनिया की मोहमाया से पैदा होता है। इसका मतलब है कि भूत अद्वैतभाव रखना सिखाते हैं। इसलिए वे शिव के अनुचर ही हुए, क्योंकि वे सबको अपने स्वामी शिव की तरह अद्वैतरूप बनाना चाहते हैं। उन्हें अपने स्वामी शिव के सिवाय कुछ भी अच्छा नहीं लगता। शिवपुराण में इस रूपक को कथाओं के माध्यम से बड़ी मनोरंजकता से प्रस्तुत किया गया है। इन्हीं भूतों को बौद्ध धर्म में रैथफुल डाईटी कहते हैं, जो ज्ञानसाधना के दौरान साधक को परेशान करते हैं। इनको डरावनी आकृतियों के रूप में चित्रित किया जाता है। 

कुंडलिनी-शिव विवाह ही साधारण लौकिक विवाह का उद्गम स्थान है

मित्रो, आप सभी को छठ पर्व की शुभकामनाएं। मैं हाल ही के एक लेख में बता रहा था कि हिंदू त्यौहारों वाली आध्यात्मिक संस्कृति प्रकृति की पुजारी है, और वातावरणीय प्रदूषण के विरुद्ध है। सूत्रों के अनुसार अभी जब 2-3 दिन पहले छठी देवी की पूजा करने के लिए कुछ महिलाएं दिल्ली की यमुना नदी के पानी के बीच में सूर्य को अर्घ्य देने के लिए खड़ी हुईं, तो दुनिया को यमुना के वास्तविक प्रदूषण का पता चला। यमुना का पानी काला था, और उस पर इतनी ज्यादा सफेद झाग तैर रही थी कि वह ध्रुवीय समुद्र के बीच में तैर रहे बर्फ के पहाड़ लग रहे थे। बताने की जरूरत नहीं है कि अब यमुना की सफाई के प्रयास जोरों से शुरु हो गए हैं। पर इसको करवाने के लिए अनजाने में ही व्हिसल ब्लोवर का काम उन हिन्दू परंपरावादी महिलाओं से हो गया जो अपनी जान को जोखिम में डालकर प्रकृति को सम्मान देने और उसकी पूजा करने के लिए ज़हरीली नदी में उतरीं। कुछ तथाकथित अत्याधुनिक लोग तो उन्हें रूढ़िवादी और अंधविश्वासी कह सकते हैं, पर उन्होंने वह काम कर दिखाया जिसे बड़े-बड़े आधुनिकतावादी और तर्कवादी भी न करे। यह एक छोटा सा उदाहरण है। प्रकृति प्रेमी हिंदूवाद की इसी तरह हर जगह बेकद्री होती हुई दिखती है, इसीलिए प्रकृति विनाश की तरफ जाती हुई प्रतीत होती है। मैं यहाँ किसी धर्मविशेष का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, और न ही किसी विचारधारा का विरोध कर रहा हूँ, बल्कि जो सत्य घटना घटित हुई है, उसीका वर्णन और विश्लेषण कर रहा हूँ।

राजा हिमाचल मस्तिष्क का और उसका राज्य शरीर का प्रतीक है

शिवपुराण में आता है कि राजा हिमाचल ने विवाह महोत्सव के लिए अपने सभी संबंधी पर्वतों और नदियों को निमंत्रण दिया। विभिन्न प्रकार के अन्नों का भंडारण करवाया। चारों तरफ साज-सज्जा की गई। अपने राज्य के सभी लोगों के लिए खूब सुख-सुविधाएं वितरित कीं। उससे उसके पूरे राज्य के लोग प्रसन्न हो गए। प्रमुख ऋषियों को शिव के पास विवाह का निमंत्रण लेकर कैलाश मिलने भेजा। दरअसल राजा हिमाचल और उसका महल मस्तिष्क ही है। कैलाश सहस्रार चक्र है। धरती ही राजा हिमाचल का राज्य है। वह पूरा शरीर है। वैसे भी पर्वत को भूभृत कहते हैं। इसका मतलब है, धरती को पालने वाला। मस्तिष्क ही शरीर को पालता है। राजा हिमाचल सभी नदियों को अपने महल बुलाता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सभी नाड़ियों की ऊर्जा को अपनी तरफ आकर्षित करता है। वह सभी पर्वतों को भी न्यौता देता है, मतलब मस्तिष्क का मुख्य केंद्र अन्य छोटे-छोटे केंद्रों से संवेदना-शक्ति को इकट्ठा करके कुंडलिनी जागरण की सर्वोच्च संवेदना को अभिव्यक्त करता है। यही शिव विवाह है, और इसीको ही विभिन्न पर्वतों का शिवविवाह में सम्मिलित होना कहा गया है। पर्वतराज हिमाचल विभिन्न खाद्यान्नों का भंडारण करता है, मतलब मस्तिष्क शरीर की सारी ऊर्जा अपनी तरफ खींचता है। भोजन ही ऊर्जा है, ऊर्जा ही भोजन है। प्राण ऊर्जा की प्राप्ति के लिए ही भोजन किया जाता है। तभी तो कहते हैं कि अन्न ही प्राण है। राजा हिमाचल के पूरे राज्य की जनता धन-धान्य से युक्त होकर हर्षोल्लास से भर जाती है, मतलब मस्तिष्क में जब ऊर्जा की भरमार होती है, तब उससे ऐसे रसायन निकलते हैं, जो पूरे शरीर को लाभ पहुंचाते हैं। शरीर और ब्रह्मांड के बीच में इस तरह की समकक्षता पुस्तक ‘शरीरविज्ञान दर्शन’ में सर्वोत्तम रूप में दर्शाई गई है। शिवविवाह के दिन राज्य के सभी लोग विभिन्न भोगों की धाम खाते हैं, और विभिन्न विलासों का भरपूर आनन्द उठाते हैं। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण वाले दिन पूरे शरीर में रक्तसंचार बढ़ जाता है। ऋषियों को आम आदमी के जैसे साधारण विवाह को इतने विस्तार से लिखने की क्या जरूरत थी, क्योंकि वे ज्यादातर खुद ब्रह्मचारी या अविवाहित होते थे, और कई तो गृहस्थी से दूर रहकर वनों में तप करते थे। कुंडलिनी के तो माता-पिता हैं, पर शिव के कोई नहीं। वह तो स्वयंभू परमात्मा हैं, इसीलिए शम्भु कहे जाते हैं। इससे जाहिर होता है कि यह साधारण विवाह नहीँ है। कुंडलिनी जागरण को ही शिवविवाह के रूप में वर्णित किया गया है, ताकि गृहस्थी में बंधे हुए आमजन भी उसे समझ सके और उसे आसानी से प्राप्त कर सके।

हिमाचल राज्य का सर्वोच्च महल सहस्रार है, जहाँ पर शिव-शक्ति का वैवाहिक जोड़ा ही स्थायी रूप से निवास कर सकता है

उपरोक्तानुसार सप्तऋषियों को विवाह के निमंत्रण पत्र के साथ शिव के पास कैलाश भेजा। कैलाश सहस्रार चक्र है। वहाँ पर ही अद्वैतभाव रूपी शिव का निवासस्थान है। दरअसल प्राणोत्थान के बाद शरीर की ऊर्जा-नदी का प्रवाह सहस्रार की तरफ ही होता है। उससे स्वाभाविक है कि उस ऊर्जा के बल से सहस्रार क्षेत्र में अद्वैतभाव व आनन्द के साथ सुंदर चित्र प्रकट होते रहते हैं। यह भी स्वाभाविक ही है कि अधिकांशतः वे चित्र भी उन्हीं लोगों या वस्तुओं के बनते हैं, जिनके साथ अद्वैत भाव या आध्यात्मिक भाव जुड़ा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई व्यक्ति उसी क्षेत्र में जाना चाहता है, जो क्षेत्र उसके अनुकूल या उसके जैसा हो। ऋषि-मुनियों से अधिक अद्वैतरूप या आध्यात्मिक कौन हो सकता है। इसीलिए उन आध्यात्मिक वस्तुओं या व्यक्तियों को सप्तर्षिओं के रूप में दिखाया गया है। वैसे वह गुरु, मंदिर का पुजारी, मंदिर, गाय, गंगा आदि कोई भी आध्यात्मिक वस्तु हो सकती है। शिवजी के नजदीक तो ये चीजें जाती हैं, और उन्हें कुंडलिनी के साथ एकाकार होने के लिए प्रेरित भी करती हैं, पर खुद शिव से एकाकार नहीं हो पातीं। इसीको इनके द्वारा शिव को उन्हीं के विवाह के लिए निमंत्रण देने के रूप में दिखाया गया है। विवाह किससे, कुंडलिनी से। शिव के साथ एकाकार न हो पाने के कारण ही इन्हें निमंत्रण देकर वापिस आते हुए दिखाया गया है। कोई भी चित्र शिव से जुड़े बिना निरन्तर सहस्रार में नहीं बना रह सकता, उसे जल्दी ही मस्तिष्क के निम्नतर ऊर्जा स्तर वाले निचले साधारण क्षेत्रों में आना ही पड़ता है। कुंडलिनी ही शिव के साथ एकाकार होने या जागृत होने के फलस्वरूप शिव के साथ कैलाश में निरंतर बनी रह पाती है। मतलब कि कुंडलिनी जागरण के बाद आदमी को अपनी आत्मा के साथ जुड़ी हुई कुंडलिनी का अनुभव सहस्रार चक्र में निरंतर होता रहता है। यही कुंडलिनी जागरण की सर्वप्रमुख खूबी है, और यही आदमी को मोक्ष की ओर ले जाती है।

प्राण ही सहस्रार में शिव-शक्ति का विवाह रचाते हैं

फिर आता है कि शिव के विवाह समारोह के लिए विश्वकर्मा ने अद्भुत व दिव्य विवाह मंडप, भवन व प्रांगण आदि बनाए। जड़ मूर्तियां सजीव लग रही थीं, और सजीव वस्तुएं जड़ मूर्तियां लग रही थीं। जल में स्थल का और स्थल में जल का भान हो रहा था। दरअसल कुंडलिनी जागरण के आसपास प्राणों के सहस्रार में होने के कारण सब कुछ अद्भुत व दिव्य लगता है। अतीव आनन्द की स्थिति होती है। चारों ओर शांति महसूस होती है। अद्वैत भाव चरम के करीब होता है, और कुंडलिनी जागरण के दौरान तो चरम पर पहुंच जाता है। सभी कुछ एक जैसा लगता है। भेद दृष्टि खत्म सी हो जाती है। यह नशे के जैसी मूढ़ अवस्था नहीं होती, पर परम चेतनता और आनन्द से भरी होती है। इसी आध्यात्मिक भाव को यहाँ उपरोक्त रोचक कथानक के रूप में दर्शाया गया है। जल का थल लगना या थल का जल लगना, मतलब जल और थल के बीच में अभेद का अनुभव। जड़ का चेतन की तरह दिखना व चेतन का जड़ की तरह दिखना, मतलब जड़ और चेतन के बीच में समानता नजर आना। हर जगह झाड़-बुहार के पूरी तरह से साफ व निर्मल कर दी गई थी। इसका मतलब है कि सहस्रार में ही असली व पूर्ण निर्मलता का अनुभव होता है। बाहर से जितना मर्जी सफाई कर लो, यदि सहस्रार में प्राण नहीं हैं, तो सबकुछ मैला ही लगता है। इसी वजह से तो गाय के गोबर से पुते हुए आध्यात्मिक स्थान अति पवित्र महसूस होते हैं, क्योंकि आध्यात्मिकता के प्रभाव से सहस्रार चक्र प्राण से संपन्न होता है। जिन मूल्यवान भवनों में लड़ाई-झगड़ों का बोलबाला हो, वहां की चाकचौबंद सफाई भी रास नहीं आती, और वहाँ दम सा घुटता है। इसके विपरीत एक आध्यात्मिक साधु पुरुष की गोबर से लिपीपुती घासफूस की झौंपड़ी भी बड़ी आकर्षक व संजीदा लगती है।

कुंडलिनी ध्यान के लिए तप को ही शिव या इष्ट ध्यान के लिए तप कहा जाता है, मोटे तौर पर

कुंडलिनी एक लज्जा से भरी स्त्री की तरह अपने प्रियतम शिव से मिलने से शर्माती है, और असंख्य युगों और जन्मों तक अविवाहित रहकर ही उसकी अव्यवस्थित खोज में पागलों की तरह भटकती रहती है

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में शिवपुराण का हवाला देकर बता रहा था कि पार्वती शिव से मिलते हुए शरमा कर पीछे भी हट रही थी, पर साथ में आनन्द से मुस्कुरा भी रही थी। दरअसल कुंडलिनी या जीव के साथ भी ऐसा ही होता है। कुंडलिनी जैसे ही शिव से एक होने लगती है, वैसे ही वह घबराकर और शरमा कर पीछे हट जाती है। हालांकि उसे आनन्द भी बहुत आता है, और बाद में वह पछताती भी है कि वह क्यों पीछे हटी। यही क्षणिक कुंडलिनी जागरण है, जैसा शिवकृपा से व गुरुकृपा से संभवतः मुझे भी हुआ था। अब तो मुझे वह अनुभव याद भी नहीं। इतना सा लगता है कि वह हुआ था कुछ और मैं पूरी तरह से खुल जैसा गया था उस समय। बहुत संभव है कि इसी कुंडलिनी कथा को ही इस शिवकथा के रूप में लिखा हो। न भी लिखा हो, तब भी कोई बात नहीं, क्योंकि जैसा स्थूल जगत में होता है, वैसा ही सूक्ष्म जगत में भी होता है। कोई फर्क नहीं। यतपिण्डे तत्ब्रह्मांडे। शिव ने जब कामदेव को भस्म कर दिया, तब वे खुद भी अंतर्धान हो गए। इससे पार्वती विरह से अत्यंत व्याकुल हो गई। हर समय वह शिव की याद में खोई रहती थी। उसे कहीं पर भी आनन्द नहीं मिल पा रहा था। उसका जीवन नीरस सा हो गया था। उसकी यह दशा देखकर पर्वतराज हिमाचल भी दुखी हो गए। उन्होंने अपनी बेटी पार्वती को अपनी गोद में बिठाकर उसे प्यार से सांत्वना दी। एकदिन नारद मुनि पार्वती से मिलने आए और पार्वती को समझाया कि उसने अपना अहंकार नष्ट नहीं किया था, इसीलिए शिव अंतर्धान हुए। फिर उससे और कहा कि शिव उसकी भलाई के लिए उसका अहंकार खत्म करना चाहते हैं, इसीलिए उससे दूर हुए हैं। नारद ने पार्वती को अहंकार खत्म करने के लिए तपस्या करने को कहा। जब पार्वती ने तपस्या के लिए नारद से मंत्र मांगा, तो नारद ने उसे शिव पंचाक्षर मन्त्र दिया। यह “ॐ नमः शिवाय” ही है।

उपरोक्त रूपात्मक कथा का रहस्योद्घाटन

ऐसा घटनाक्रम बहुत से प्रेम प्रसंगों में दृष्टिगोचर होता है। एकबार जब मानसिक यौनसंबंध बन जाता है, उसके बाद एकदूसरे के प्रति बेहिसाब आकर्षण पैदा हो जाता है। पुरुष लगातार अपनी प्रेमिका की परीक्षा लेता है। वह उसे अपने प्रेम में दीवाना देखना चाहता है। वह उसे अपने प्रति पूरी तरह से निष्ठावान और समर्पित देखना चाहता है। कई संयमित मन वाले पुरुष तो यहाँ तक चाहते हैं कि स्त्री उसे स्वयं प्रोपोज़ करे औऱ यहाँ तक कि वह अपनी डोली लेकर भी खुद ही उसके घर आए। यह जोक नहीं, एक मनोवैज्ञानिक वास्तविकता है। यह कुंडलिनी से प्रेरित ही है। वे ऐसा न होने पर स्त्री को त्यागने से भी परहेज नहीं करते। शिव के जैसे उच्च आध्यात्मिक पुरुष तो स्त्री के अत्यंत निकट आ जाने पर भी अपने को संयमित करके अपने को गलत काम से बचा लेते हैं। वे स्त्री से बात भी नहीं करते और जीवन में अपना अलग रास्ता पकड़ लेते हैं। यह शिव के अंतर्धान होने की तरह ही है। इससे स्त्री, प्रेमी पुरुष की याद में बिन पानी मछली की तरह तड़पती है। पार्वती के साथ भी वैसा ही हुआ था। पुरुष भी उसकी याद को अपने मन में बसा कर अपने काम में लग जाता है। यह शिव के ध्यान की अवस्था में चले जाने की तरह ही है। अधिकांशतः पुरुष तो पहले से ही शिव की तरह अहंकार से रहित होता है। ज्यादातर मामलों में, रूप, गुण और संपत्ति का अहंकार तो स्त्री को ही ज्यादा होता है। इसी वजह से पुरुष उससे दूर चला जाता है, क्योंकि आग और पानी का मेल कहाँ। मैं यहाँ लैंगिक पक्षपात नहीँ कर रहा हूँ, बल्कि प्रकृति की अद्भुत सच्चाई बयान कर रहा हूँ। अपवाद तो हर जगह हैं, कहीं ज्यादा तो कहीं कम। कालांतर में जब दुनियादारी के थपेड़े खाकर स्त्री का अहंकार नष्ट होता है, तब फिर उस प्रेमी पुरुष से उसकी मुलाकात होती है। हालाँकि अधिकांश स्त्रियों ने अपनी अलग गृहस्थी बसा ली होती है। पार्वती के जैसी तो बिरली ही होती है जो ताउम्र शिव की प्रतीक्षा करती रहती हो। फिर भी स्त्री, अपने सच्चे प्रेमी पुरुष से भावनात्मक लाभ तो प्राप्त करती ही है, बहिन, मित्र आदि किसी भी सम्बन्ध से। उन दोनों की मिश्रित मानसिक शक्ति स्वयँ ही उनकी संतानों को प्राप्त हो जाती है। यही शिव पार्वती का लौकिक मिलन, और मानसिक शक्ति के रूप में भगवान कार्तिकेय का जन्म है।

हिमालय का गंगावतरण वाला स्थान ही सहस्रार है

पार्वती उसी गंगावतरण वाले स्थान पर तप करती है, जहाँ उसने शिव के साथ प्रेमालाप किया था। वह स्थान सहस्रार चक्र ही है। “प्रेम की गंगा” छंद भी लोकप्रसिद्ध है। दरअसल प्रणय प्रेम से पीठ में सुषुम्ना से होकर चढ़ने वाली ऊर्जा ही वह प्रेम की गंगा है। कुंडलिनी सहस्रार चक्र पर आरूढ़ हो गई, और अद्वैत के आनन्द का अनुभव करने लगी। इसको ऐसे लिखा गया है कि पार्वती सहस्रार में तप करने लगी। तप का मतलब सहस्रार में कुंडलिनी का ध्यान ही है। यही शिव का ध्यान भी है, क्योंकि सहस्रार में कुंडलिनी से मिलने शिव देरसवेर जरूर आते हैं, मतलब कुंडलिनी जागरण जरूर होता है। तप ध्यान के लिए ही किया जाता है। इसलिए तप को ध्यान योग या कुंडलिनी योग भी कह सकते हैं। यदि तप से ध्यान न लगे, तो वह तप नहीं, मात्र दिखावा है। हालाँकि तप कुंडलिनी के ध्यान के लिए होता है, पर इसे मोटे तौर पर शिव के ध्यान के लिए बताया जाता है, क्योंकि कुंडलिनी से अंततः शिव की ही तो प्राप्ति होती है। यह इस ब्लॉग के इस मुख्य बिंदु को फिर से प्रमाणित करता है कि कुंडलिनी ध्यान या कुंडलिनी योग ही सबकुछ है। अपनी बेटी को मनाने और तप से रोकने के लिए उसके पिता हिमाचल और माता मेनका अपने पुत्रों और प्रसिद्ध पर्वतों के साथ वहाँ पहुंचते हैं। वे उसके कष्ट से दुखी हो जाते हैं। वे उसे कहते हैं कि कामदेव को भस्म करने वाले वैरागी शिव उसे नहीं मिलने आने वाले। वैसे भी भगवान को किसी की परवाह नहीं। वह अपने आप में पूर्ण है। वह अपनेआप में ही मस्त रहता है। ऐसे परम मस्तमौला को मना कर अपने वश में करना आसान काम नहीं है। पर पार्वती जैसे हठी भक्त लोग उसे मना लेते हैं। पार्वती को भक्ति की शक्ति का पूरा पता था, इसलिए वह नहीं मानती और तप करती रहती है। दरअसल मस्तिष्क ही हिमाचल राजा है। उससे ऐसे रसायन निकलते हैं, जो तपस्या से हटाते हैं। यही हिमाचल के द्वारा पार्वती को समझाना है। यह कुंडलिनी से ध्यान हटाकर जीव को बाहरी दुनियादारी में उलझाकर रखना चाहता है। विभिन्न पर्वत शिखर मस्तिष्क की अखरोट जैसी आकृति के उभार हैं, जो शरीर के विभिन्न भागों को नियंत्रित करते हैं। ये सभी पर्वतराज हिमाचल के अंदर ही हैं। मस्तिष्क को अपनी सत्ता के खोने का डर बना रहता है। उसके तप की आग की तपिश से सारा ब्रह्मांड जलने लगता है। इससे परेशान होकर ब्रह्मा को साथ लेकर सभी देवता और पर्वत उसे मनाने और तप से रोकने के लिए उसके पास जाते हैं। दरअसल यह शरीर ही संपूर्ण ब्रह्मांड है। इसमें सभी देवताओं का वास है। तप के क्लेश से यह शरीर तो दुष्प्रभावित होगा ही। यह स्वाभाविक ही है। ब्रह्मा सुमेरु पर्वत पर रहते हैं। सुमेरु पर्वत मस्तिष्क को ही कहते हैं। जैसे ब्रह्मा से ही सृष्टि का विकास होता है, वैसे ही मस्तिष्क से शरीर का विकास होता है, अपनी कल्पनाशीलता से। वैसे तो मस्तिष्क में सभी देवताओं का निवास है, पर मस्तिष्क के सर्वप्रमुख अभिमानी देवता को ही ब्रह्मा कहते हैं। सभी देवता मस्तिष्क के साथ पूरे शरीर में व्याप्त रहते हैं, पर ब्रह्मा मस्तिष्क में ही रहता है। इसीलिए ब्रह्मा का निवास सुमेरु में बताया गया है। इसलिए तप से ये ही शरीरस्थ देवता और इस शरीर रूपी ब्रह्मांड में रहने वाले असंख्य कोशिका रूपी जीव ही भूखे-प्यासे रहकर व्याकुल होते हैं। वास्तव में कुंडलिनी के साथ शरीर के प्राण भी सहस्रार को चले जाते हैं। इससे शरीर शक्तिहीन सा होकर अपंग जैसा या लाचार जैसा या पराश्रित जैसा हो जाता है। इससे स्वाभाविक ही है कि शरीर तो भौतिक रूप से पिछड़ेगा ही। बाहर के स्थूल ब्रह्मांड में कुछ नहीं होता। अगर बाहर के स्थूल जीवों और देवताओं को कष्ट हुआ करता, तो आज तक कोई भी नहीँ बचा होता, क्योंकि ध्यान योग के रूप में प्रतिदिन लाखों लोग तप करते हैं। कई योगी तो वनों-पर्वतों में भी घोर तप करते हैं।

कुंडलिनी रहस्य पुरुष व स्त्री के बीच के शाश्वत प्रेम संबंध के रूप में ही उजागर होता है

सभी मित्रों को आने वाले दीपावली पर्व की शुभकामनाएं

शिवपार्वती विवाह, दुनिया का महानतम रहस्य

मित्रो, एक अन्य अर्थ भी है शिव पार्वती विवाह का। पार्वती प्रकृति है, जो मन के विचारों के रूप में है। वह परब्रह्म शिव को बांध देती है। यही शिव पार्वती से कहते हैं कि पार्वती, मैं सदा स्वतंत्र हूँ, पर तुमने मुझे परतंत्र बना दिया है, क्योंकि सबकुछ करने वाली महामाया प्रकृति तुम ही हो। पार्वती ने घोर तपस्या की, मतलब प्रकृति ने करोड़ों वर्षों तक जीवविकास किया। तब वह इस काबिल हुई कि परमात्मा को जीवात्मा बना सकी। इससे जीव की उत्पत्ति हुई। पार्वती शिव से कहती है कि वह उसके पिता हिमालय से उसका हाथ मांगे। इसका मतलब है कि प्रकृति नहीं चाहती कि हर जगह जीवात्मा की उत्पत्ति होए। अगर ऐसा होता तो पत्थर, मिट्टी, पानी, कीटाणु आदि में भी जीवात्मा होती और उन्हें भी दुःख दर्द हुआ करता, इससे सृष्टि में अव्यवस्था फैलती। इसलिए प्रकृति चाहती है कि जब जीव का शरीर अच्छी तरह से विकसित हो जाए, तब उसीमें जीवात्मा की उत्पत्ति होए। इसी विकसित शरीर को ही पर्वतराज हिमालय कहा गया है। पार्वती पहले हिमालय का निर्माण करती है, फिर उसकी पुत्री के रूप में पैदा होकर उसी पर रहने लगती है। मतलब कि प्रकृति पहले शरीर का निर्माण करती है, फिर उसीसे पैदा जैसी होकर उसीके अंदर बस जाती है। यह ऐसे ही है, जैसे आदमी पहले अपने लिए घर बनाता है, फिर उसके अंदर खुद रहने लगता है। फिर शिव कहते हैं कि वे निर्विकार और निरीह होकर भी भक्तों के लिए शरीर धारण करते हैं। वास्तव में ये दृश्य जगत शिव का ही शरीर है। इसी के पीछे भागकर दरअसल आदमी शिव के पीछे ही भागता है, मतलब उसीकी भक्ति करता है। पर आदमी को ऐसा नहीं लगता। कुंडलिनी भी परब्रह्म शिव का स्थूल रूप ही है, जिसके ध्यान से शिव का ही ध्यान होता है। सीधे रूप में तो परब्रह्म शिव को कोई नहीं जान-पहचान सकता।

वामपंथी तंत्र के पुरोधा भगवान शिव

शिवपुराण में शिव को अभक्ष्यभक्षी और भूतबलिप्रेमी कहा है। मतलब साफ है। यह पँचमकारी वाममार्गियों की इस मान्यता की पुष्टि करता है कि शिव माँस, मदिरा, भांग आदि का सेवन करते हैं, और मंदिरों में देवताओं को दी जाने वाली पशुबलि से प्रसन्न होते हैं। खैर, सच्चाई तो वे ही जानें। मैं तो संभावना को ही अभिव्यक्त कर रहा हूँ। वास्तव में भगवान ही सबको बचाने वाले हैं, और वही मारने वाले भी हैं। पर मारने वाले हमें भ्रम से ही प्रतीत होते हैं। उनके द्वारा मारने में भी उनके द्वारा बचाना ही छिपा होता है। हम पूरी तरह से भगवान का गुणगान तो कर सकते हैं, पर पूरी तरह उनकी नकल नहीँ कर सकते। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान कर्म और फल से प्रभावित नहीं होते, पर आदमी को बुरे कर्म का बुरा फल भोगना ही पड़ता है। हो सकता है कि इस्लाम की प्रारंभिक मान्यता भी यही हो, पर वह कालांतर में अतिवादी होकर अन्य धर्मों और संप्रदायों का दुश्मन बन गया हो। यहाँ तक कि एक मुस्लिम मौलवी कासिम ने भी भगवान शिव को इस्लाम के पहले दूत के रूप में संदर्भित किया है। इससे हाल की ही घटना याद आ रही है। सूत्रों के अनुसार, इस क्रिकेट विश्वकप में एक पाकिस्तानी खिलाड़ी बीच मैदान में सबके सामने नीचे बैठकर नमाज पढ़ने लग गया। पाकिस्तान को मैच जीतने से ज्यादा खुशी धर्मप्रचार से मिली।

कुंडलिनी ही एक सच्चे जीवरक्षक के रूप में

यह कहा जाता है कि विभिन्न जीवों में कुंडलिनी विभिन्न चक्रों पर रहती है। विकसित जीवों में यह ऊपर वाले चक्रों में रहती है, जबकि अविकसित जीवों में नीचे वाले चक्रों पर। मैंने इसका वर्णन एक पुरानी पोस्ट में भी किया है। इसका यह मतलब नहीं है कि सभी जीव कुंडलिनी योगी होते हैं और कुंडलिनी ध्यान करते हैं। इसका मतलब यह है कि जब हमारी चेतना का स्तर नीचा होता है, तब यदि अद्वैत का अदृश्य अवचेतन मन से ही सही, हल्का सा ध्यान या ख्याल किया जाए, तब कुंडलिनी आनंदमय शांति पैदा करती हुई नीचे वाले चक्रों पर आ जाती है। अदृश्य ध्यान का हल्का ख्याल मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि चेतनता की न्यूनावस्था में मस्तिष्क में ध्यान करने लायक़ ऊर्जा ही कहाँ होती है। अचेतनता के अंधकार के समय इस अचिंत्य ध्यान भावना से कुंडलिनी ज्यादातर नाभि चक्र पर अनुभव में आती है, और यदि चेतना का स्तर इससे भी अधिक गिरा हुआ हो, तो स्वाधिष्ठान चक्र पर आ जाती है। हालांकि कुछ क्षणों में ही कुंडलिनी मस्तिष्क के चक्रों में आ जाती है, क्योंकि कुंडलिनी का स्वभाव ही ऊपर उठना है। ऐसा करते हुए वह मूलाधार से ऊर्जा भी ऊपर ले आती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निम्न चेतनता की अवस्था में मस्तिष्क में पर्याप्त ऊर्जा का स्तर नहीं होता, जो कुंडलिनी को ऊपर वाले चक्रों में स्थापित कर सके। मालूम पड़ता है कि कुंडलिनी का निचले चक्रों पर आना मृत्यु के समय सहायक होता है। मृत्यु के समय चेतनता बहुत निम्न स्तर पर होती है। उससे मन में अंधेरा सा छाया रहता है। उस समय अद्वैत की सूक्ष्म भावना से कुंडलिनी निचले चक्रों पर आकर अच्छे मित्र की तरह साथ निभाते हुए आनंदमयी और शांत चेतना प्रदान करती है। वह मृत्यु जनित सभी दुखों और कष्टों को हरते हुए आदमी को मुक्ति प्रदान करती है।

कुंडलिनी शक्ति और शिव के मिलन से ही कार्तिकेय नामक ज्ञान पैदा हुआ, जिसने तारकासुर नामक अज्ञानान्धकार का संहार किया

सभी मित्रों को दशहरे की हार्दिक बधाई

मित्रो, शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव सती के विरह में व्याकुल होकर पर्वतराज हिमाचल (हिमालय का भाग) के उस शिखर पर तप करने बैठ गए, जहाँ गँगा नदी का अवतरण होता है। गंगा के कारण वह स्थान बहुत पवित्र होता है। वे अपने मन को सती से हटाकर योगसाधना से परमात्मा में लगाने लगे। जब पर्वतराज हिमाचल को अपने यहाँ उनके आने का पता चला तो वे अपने परिवार और गणों के साथ शिव से मिलने चले गए, और उनकी सेवा में उपस्थित हो गए। शिव ने उनसे कहा कि वे वहाँ एकांत में तपस्या करना चाहते हैं, इसलिए कोई उनसे मिलने न आए। पर्वतराज ने अपने राज्य में यह ऐलान कर दिया कि जो भी शिव से मिलने का प्रयास करेगा, उसे कठोर राजदण्ड दिया जाएगा। परंतु पार्वती उनकी सेवा करना चाहती थी, इसलिए वह अपने पिता हिमालय से शिव के पास जाने की जिद करने लगी। थकहार के हिमालय पार्वती को लेकर शिव के पास फिर पहुंच गए, और पार्वती की सेवा स्वीकार करने के लिए प्रार्थना करने लगे। शिव ने कहा कि वे ध्यान योग में रमे रहते हैं, वैसे में स्त्री का क्या काम। स्त्री तो स्वभाव से ही चंचल होती है, और बड़े से बड़े योगियों का ध्यान भंग कर देती हैं। फिर उन्होंने कहा कि वे हमेशा प्रकृति से परे अपने परमानन्द व शून्य स्वरूप में स्थित रहते हैं। इस पर पार्वती ने उनसे कहा कि वे प्रकृति से परे रह ही नहीं सकते। प्रकृति के बिना तो वे बोल भी नहीं सकते, फिर क्यों बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। अगर वे प्रकृति से परे हैं और उन्हें सबकुछ पहले से ही प्राप्त है, तब क्यों इस हिमालय शिखर पर तपस्या कर रहे हैं। जो प्रकृति से परे है, उसका प्रकृति कुछ नहीं बिगाड़ सकती, फिर क्यों उससे भयभीत हो रहे हैं। शिव को यह तर्क अच्छा लगा, और उन्होंने पार्वती को सखियों के साथ प्रतिदिन अपनी सेवा करने की अनुमति दे दी। शिव पार्वती के हावभाव से अनासक्त रहते थे। उनके मन में कभी कामभाव पैदा नहीं हुआ। हालाँकि उन्हें अपने ध्यान में पार्वती ही नजर आती थी। उन्हें लगने लगा कि उनकी पूर्व पत्नी सती ही पार्वती के रूप में उपस्थित हुई है। देवताओं व ऋषियों ने यह अच्छा अवसर जानकर कामदेव को शिव के मन में कामभाव पैदा करने के लिए भेजा। वे ऊर्ध्वरेता (ऐसा व्यक्ति जिसका वीर्य ऊपर की तरफ बहता हो) शंकर को च्युतरेता (ऐसा व्यक्ति जिसका वीर्य नीचे की ओर गिर कर बर्बाद हो जाता हो) बनाना चाहते थे। देवता व ऋषि दैत्य तारकासुर से परेशान थे। उसका वध शिव पार्वती के पुत्र के हाथों से होना था। इसीलिए वे शिव व पार्वती का विवाह कराना चाहते थे। शिव पहले तो पार्वती पर कामासक्त हो गए, और कामुकता के साथ उसके रूप-श्रृंगार का वर्णन करने लगे। फिर जैसे ही वे पार्वती के वस्त्रों के अंदर हाथ डालने लगे, और स्त्रीस्वभाव के कारण पार्वती शर्माती हुई दूर हटकर मुस्कुराने लगी, वैसे ही उन्हें अपनी ईश्वररूपता का विचार आया, और वे अपनी करनी पर पछताते हुए पीछे हट गए। फिर उनकी नजर पास में खड़े कामदेव पर गई। शिव की तीसरी आंख के क्रोधपूर्ण तेज से कामदेव खुद ही भस्म हो गया। शिव चाहते थे कि जब पार्वती का गर्व या अहंकार समाप्त हो जाएगा, वे तभी उसके साथ प्रेमसंबंध बनाएंगे। वैसा ही हुआ। जैसे ही पार्वती का अहंकार नष्ट हुआ, वैसे ही शिव ने उन्हें अपना लिया और उनके आपसी प्रेमसंबंध से कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिसने बड़े होकर राक्षस तारकासुर का वध किया। तारकासुर ने देवताओं को बंधक बनाया हुआ था। वह देवताओं से अपनी मर्जी से काम करवाता था। दरअसल उसने ब्रह्मा से यह वरदान मांगा हुआ था कि वह शिव के पुत्र के सिवाय और किसी के हाथों से न मरे। उसे पता था कि शिव तो प्रकृति से परे साक्षात परमात्मा हैं, वे भला किसलिए विवाह करेंगे।

शिव-पार्वती विवाह की उपरोक्त रूपात्मक कहानी का रहस्योद्घाटन

ईश्वर भी जीव से मिलने के लिए बेताब रहता है। अकेले रहकर वह ऊब जैसा जाता है। यदि ऐसा न होता तो जीवविकास न होता। जीव से मिलने के लिए वह जीव के शरीर के सहस्रार में बैठकर तप करने लगता है। वह न कुछ खाता है, न कुछ पीता है। बस चुपचाप अपने स्वरूप में ध्यानमग्न रहता है। यही शिव का वहाँ तपस्या करना है। जीव का शरीर ही हिमालय पर्वत है, और जीव का मन अर्थात कुंडलिनी ही सती या पार्वती है। वे अपनी तपस्या व योगसाधना के प्रभाव से ही अपनी प्रेमिका सती के इतना नजदीक रहकर भी उसके लिए व्याकुल नहीं होते। सुषुम्ना यहाँ गंगा नदी है, जो सहस्रार को ऊर्जा की भारी मात्रा देकर उसे ऊर्जावान अर्थात पवित्र करती रहती है। जीवात्मा यहाँ पर्वतराज हिमालय या हिमाचल भी है। ऐसे तो जीवात्मा का मिलन परमात्मा से बीच-बीच में होता रहता है, पर पूरा मिलन नहीं होता। इसीको इस रूप में लिखा है कि शिव ने अपने वहाँ किसी के आकर मिलने को मना कर दिया। मिलने का अर्थ यहां पूर्ण मिलन ही है। दो के बीच पूर्ण मिलन तभी संभव हो सकता है, जब दोनों एक जैसे स्वभाव के हों। यदि शिव आम आदमी से पूर्णमिलन करेंगे, तो स्वाभाविक है कि उनकी तपस्या भंग हो जाएगी, क्योंकि आम आदमी तो तपस्या नहीं करते, और अनेकों दोषों से भरे होते हैं। इसीलिए जीवात्मा अपने मन और अपनी इन्द्रियों को बाहर ही बाहर दुनियादारी में ही उलझा कर रखता है, उसे शिव से मिलने सहस्रार की तरफ नहीं जाने देता। ये मन, इन्द्रियाँ और प्राण ही राजा हिमाचल के नगरनिवासी हैं। यदि ये कभी गलती से सहस्रार की तरफ चले भी जाएं, तो उन्हें अंधेरा ही हाथ लगता है। यह अंधेरा ही पर्वतराज हिमाचल द्वारा उन्हें दिया जाने वाला कठोर दंड है। पर मन में जो कुंडलिनी चित्र होता है, वह बारम्बार शिव से मिलने के लिए सहस्रार जाना चाहता है। यही पार्वती है। मन का सर्वाधिक शक्तिशाली चित्र कुंडलिनी चित्र ही होता है। वही सहस्रार तक आसानी से जाता रह सकता है। इसीको पार्वती की जिद और हिमालय के द्वारा उसको शिव के पास ले जाने के रूप में बताया गया है। इसीका यह मतलब भी निकलता है कि पार्वती शिव को कहती है कि यदि वह प्रकृति से परे है, तो वह सहस्रार में बैठ कर किसकी आस लगा कर तपस्या कर रहा है। मतलब कि प्रकृति ने ही शिव को इस शरीर के सहस्रार चक्र में बैठने के लिए मजबूर किया है, ताकि उसका मिलन पार्वती रूपी कुंडलिनी से हो सके। केवल कुंडलिनी चित्र को ही सहस्रार में भेजकर आनन्द आता है, अन्य चित्रों को भेजकर नहीं। इसको इस रूपात्मक कथा में यह कहकर बताया गया है कि शिव ने पार्वती के द्वारा की जाने वाले अपनी प्रतिदिन की सेवा को स्वीकार कर लिया। पार्वती प्रतिदिन सखियों के साथ शिव की सेवा करने उस पवित्र शिखर पर जाती और प्रतिदिन घर को लौट आती। इसका मतलब है कि प्रतिदिन के कुंडलिनी योगाभ्यास के दौरान कुंडलिनी थोड़ी देर के लिए ही सहस्रार में रुकती, शेष समय अन्य चक्रों पर रहती। मूलाधार चक्र ही कुंडलिनी शक्ति का अपना घर है। पीठ में ऊपर चढ़ने वाली मुख्य प्राण ऊर्जा और साँसों की गति जो हमेशा कुंडलिनी के साथ रहती हैं, वे पार्वती की सखियां कही गई हैं। हर क्रिया की बराबर की प्रतिक्रिया होती है। कुंडलिनी के सहस्रार में होने से अद्वैत का अनुभव हो रहा है, मतलब कुंडलिनी शिव का ध्यान कर रही है। उसके बदले में शिव भी कुंडलिनी का उतना ही ध्यान कर रहे हैं। शिव को पार्वती में अपनी अर्धांगिनी सती नजर आती है। दरअसल जीव या कुंडलिनी शिव से ही अलग हुई है। कभी वह शिव से एकरूप होकर रहती थी। ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा कामदेव को शिव-पार्वती का मिलन कराने के लिए भेजने का अर्थ है, कुदरती तौर पर उच्च कोटि के योगसाधक का कामुकता या यौनतन्त्र की ओर आकर्षित होना। आप आए दिन देखते होंगे कि कैसे बड़े-बड़े आध्यात्मिक व्यक्तियों पर यौन शोषण के आरोप लगते रहते हैं। यहाँ तक विश्वामित्र जैसे प्रख्यात ब्रह्मऋषि भी इस यौनकामुकता से बच नहीं पाए थे, और भ्रष्ट हो गए थे। दरअसल यह कामुकता कुंडलिनी को इसी तरह से अंतिम मुक्तिगामी वेग (एस्केप विलोसिटी) को प्रदान करने के लिए पैदा होती है, जैसे एक अंतरिक्षयान को धरती के गुरुत्व बल से बाहर निकालने के लिए इसके रॉकेट इंजन से शक्ति पैदा होती है, ताकि वह भौतिकता से मुक्त होकर शिव से एकाकार हो सके। पर बहुत से योगी इस कामुकता को ढंग से संभाल नहीँ पाते, और लाभ की बजाय अपनी हानि कर बैठते हैं। उस यौनकामुकता का सहारा लेकर कुंडलिनी शिव के बहुत नजदीक तो चली गई, पर उनसे एकाकार नहीं हो सकी। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण नहीं हो सका। आज्ञा चक्र पर ध्यान से कुंडलिनी मानसपटल पर बनी रहती है, जिससे कामुकता वाला काम भी कामुकता से रहित और पवित्र हो जाता है। इसे ही शिव की तीसरी आंख से कामदेव का जल कर भस्म होना कहा गया है। तीसरी आंख आज्ञाचक्र पर ही स्थित होती है। मैं तो आज्ञा चक्र को ही तीसरी आंख मानता हूँ। तीसरी आँख या आज्ञा चक्र पर स्थित इसी कुंडलिनी शक्ति के प्रभाव से ही यौनयोग भौतिक कामुकता से अछूता रहता है, जबकि समान प्रकार की भौतिक गतिविधियों के बावजूद अश्लील पोर्न भड़काऊ कामुकता से भरा होता है। देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने पार्वती से तभी विवाह किया जब पहले पार्वती ने अपना अहंकार नष्ट कर लिया। यह मैं पिछली पोस्ट में भी बता रहा था कि जब योगसाधना से उत्पन्न सत्त्वगुण पर भी अहंकार समाप्त हो जाता है, तभी कुंडलिनी जागरण की संभावना बनती है। कुंडलिनी मन या जीव का प्रतीक है। जीव का अहंकार खत्म हो गया, मतलब कुंडलिनी-रूपी पार्वती का अहंकार खत्म हो गया। जीव के शरीर में सभी देवता बसे हैं। जीवात्मा के रूप में वे भी शरीर में बंधे हुए हैं। उदाहरण के लिए ब्रह्मांड में उन्मुक्त विचरण करने वाले सूर्य देवता छोटी-2 दो आंखों में, सर्वव्यापी वायुदेव छोटी सी नाक में, अनन्त आकाश में फैला जल देवता सीमित रक्त आदि में। इसी तरह ऋषि भी जीव को ज्ञान का उपदेश करके बंधे हुए हैं। ये देवता और ऋषि भी तभी पूर्ण रूप से मुक्त माने जाएंगे, जब जीव मुक्त होगा, मतलब कुंडलिनी जागरण के रूप में शिव-पार्वती का विवाह होगा। जीवमुक्ति के लिए यही देवताओं व ऋषियों की प्रार्थना है, जिसे शिव अन्ततः स्वीकार कर लेते हैं। तारकासुर राक्षस यहाँ अज्ञान के लिए दिया गया नाम है। तारक का अर्थ आंख की पुतली होता है, जो अज्ञान की तरह ही अंधियारे रँग वाली होती है। यह जीव के मन सहित उसके पूरे शरीर को बंधन में डालता है। तारक का मतलब आंख या रौशनी या ज्ञान भी है। इसको नष्ट करने वाला राक्षस ही तारकासुर हुआ। अज्ञान रूपी तारकासुर आदमी को अंधा कर देता है। उपरोक्तानुसार जीव के बंधन में पड़ने से देवता और ऋषि खुद ही बंधन में पड़ जाते हैं। उसका संहार केवल कुंडलिनी जागरण से पैदा होने वाला ज्ञान ही कर पाता है, जिसे इस कथा में शिव-पार्वती के पुत्र कार्तिकेय के रूप में वर्णित किया गया है।

कुंडलिनी प्राण ऊर्जा का क्रीड़ा विलास ही है


दोस्तो, मैंने पिछले हफ्ते तीन फिल्में देखीं। उससे मेरा मस्तिष्क काफी क्रियाशील रहा। सम्भवतः इसीसे कई बार हल्का सा सिरदर्द भी रहा। हालाँकि मन में भरपूर शांति बनी रही, और भरपूर आनंद भी बना रहा। यह कुंडलिनी योग से बने हुए अद्वैत भाव से ही हुआ। फ़िर भी मैंने योग को कुछ कम किया, क्योंकि थोड़ी थकान व सुस्ती लग रही थी। इससे सिरदर्द भी थोड़ा कम हुआ और शरीर का कम्पन भी कम हुआ। वैसे ज्यादा अच्छा तब रहता है जब आसनों की संख्या कम न की जाए, पर उन पर लगने वाले समय को कम किया जाए। योग को काम की तरह नहीं लेना चाहिए। इसे थकान नहीं समझना चाहिए। इसे भरपूर आराम की तरह लेना चाहिए। शरीर व मन को ढीला छोड़ देना चाहिए। वास्तव में योग थकान को कम करता है, थकान को बढ़ाता नहीं। हरेक आसन एक विशेष प्रकार से प्राण ऊर्जा को ऊपर चढ़ाता है, और घुमाता है। वैसे भी कम नींद लेने से, रात को देर तक ज्यादा जागने से, खान-पान के समय में परिवर्तन से, पंखे या ऐसी की ज्यादा हवा लेने से तनाव व सिरदर्द पैदा हो जाता है। मेरे बाएं मस्तिष्क में क्रियाशीलता ज्यादा रही, जिसके लिए इड़ा नाड़ी से ऊर्जा ऊपर चढ़ रही थी। हालाँकि उसके साथ साथ आज्ञा चक्र और मूलाधार का ध्यान करने से ऊर्जा सुषुम्ना में स्थानांतरित हो जाती थी, जिससे दायाँ मस्तिष्क भी क्रियाशील हो जाता था, और सहस्रार में कुंडलिनी चित्र प्रकट हो जाता था। थोड़ी देर बाद वह ऊर्जा फिर से इड़ा नाड़ी में प्रविष्ट हो जाती थी। उसे फिर से इसी तरह सुषुम्ना में ले जाना पड़ता था। यह क्रम बार-2 चलता था। दरअसल दुनियादारी से बायाँ मस्तिष्क और अध्यात्म से दायाँ मस्तिष्क क्रियाशील होता है। दोनों मस्तिष्कों के संतुलन के लिए भौतिकता और आध्यात्मिकता का संतुलन जरूरी है। मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे देवलोक की स्त्रियां नंदा और अलकनन्दा का जल बारी-2 से पीकर रति क्रीड़ा की तरफ आकर्षित होती हैं और महान तृप्ति का अनुभव करती हैं। दरअसल वे दुनियादारी में डूबी हुई होती हैं। इसलिए उनमें ज्यादा एनेर्जी नहीं बची होती। वे सीधे तौर पर गंगा नदी तक नहीं पहुंच सकती हैं। इसलिए वे नन्दा और अलकनन्दा नदियों से ही काम चलाती हैं। मेरे साथ भी लगभग ऐसा ही हुआ। काम के ज्यादा बोझ के कारण मेरे अंदर इतनी एनेर्जी नहीं बची थी कि मैं कुंडलिनी को सीधे ही सहस्रार तक उठा पाता। ऐसा जबरदस्ती करने से मेरे सिर में हल्का दर्द हो रहा था। इसलिए मैंने कुंडलिनी ऊर्जा को उसकी अपनी मर्जी से पीठ से ऊपर चढ़ने दिया। फिर मैंने देखा कि वह इड़ा नाड़ी से होकर बाएँ मस्तिष्क को एक थ्रिल संवेदना के साथ जाने लगी, और लगातार जाती रही। मैं बस बीच में हल्का ध्यान फ्रंट आज्ञा चक्र और दांत के पीछे टिकाई हुई सीधी जीभ पर देता था। उनके साथ मूलाधार पर तो बहुत ही कम बार ध्यान दे पाता था, क्योंकि इससे ऊर्जा सीधे ही सहस्रार व सुषुम्ना में जाती है। उससे वह पिंगला या सुषुम्ना नाड़ी में जाने की कोशिश तो करती, पर जा नहीं पा रही थी। मतलब कि ऊर्जा की कमी थी। बड़ी देर बाद वह थोड़ी देर के लिए ही पिंगला और दाएँ मस्तिष्क में जाती थी, और फिर से इड़ा में आ जाती थी। कुंडलिनी ज्यादातर समय आज्ञा चक्र पर रहती, और उससे ऊपर न जाती। सुषुम्ना और सहस्रार में सिर्फ क्षण भर के लिए ठहरती थी। बात साफ है कि जितनी अपने अंदर ऊर्जा हो, उसीके हिसाब से कुंडलिनी को घुमाना चाहिए। जोर जबरदस्ती नहीँ करनी चाहिए।

ऊर्ध्वरेता पुरुष को ब्रह्मचारी माना जाए या तांत्रिक

मुझे इस सप्ताह शिवपुराण में एक नई जानकारी भी मिली। एक श्लोक में ऊर्ध्वरेता शब्द लिखा मिला। ऊर्ध्वरेता मनुष्य को महान ज्ञानी या आत्मज्ञानी या महान आध्यात्मिक साधक के समकक्ष रखा गया था। ऊर्ध्व का मतलब ‘ऊपर की ओर’ है, और रेता का मतलब ‘वीर्य’ है। इसलिए ऊर्ध्वरेता का मतलब हुआ कि वह व्यक्ति जो अपने वीर्य को ऊपर की ओर चढ़ाता है। यह तो वही सेक्सुअल सबलीमेशन है, जो तंत्रयोग की आधारभूत क्रिया है। तंत्र के नाम पर आजकल इसका ही बोलबाला है, हालाँकि यह वृहद परिपेक्ष्य वाले तंत्र का एक सर्वप्रमुख सहयोगी कारक ही है। अपने आप में यही सबकुछ नहीं है। इसका हिंदी में अनुवाद करते हुए इसे ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारी लिखा गया है। जो ब्रह्मचारी है, वह ऊर्ध्वरेता कैसे बन पाएगा, क्योंकि ब्रह्मचारी में तो रेता का उत्पादन ही नहीं होता। रेता का उत्पादन तो सैक्सुअल स्टिमुलेशन से होता है, पर ब्रह्मचारी तो इससे सर्वथा दूर रहता है। यदि उसमें सामान्य शारीरिक क्रियाओं के तहत रेता का उत्पादन होता भी है, तो वह बहुत कम व अन-नोटिसड रहता है। जिस चीज को आदमी शरीर में नोटिस भी नहीं कर सकता, उसे वह ऊपर कैसे चढ़ाएगा। इससे एक और बात पता चलती है कि पुराणों में हर जगह तंत्र का उल्लेख है, और पौराणिक काल में तँत्रविज्ञान आम जनमानस में व्याप्त था। ब्रह्मचर्य भी तो एक तँत्रविज्ञान ही है। यदि ब्रह्मचारी योगसाधना की सहायता से वीर्य ऊर्जा को ऊपर न चढ़ाता रहे, तो वह उसे परेशान करेगी, और उसके मन व शरीर में विकार भी पैदा कर सकती है। यह अलग बात है कि वामपंथी तंत्र में इस ब्रह्मचर्य को अमर्यादित व प्रचण्ड रूप दिया जाता है। इससे हालाँकि आध्यात्मिक विकास बहुत तीव्रता से होता है, पर यदि यह सही ढंग से न किया जाए तो यह आध्यात्मिक पतन भी तीव्र गति से ही करता है। आजकल अधिकांशतः केवल इसी सैक्सुअल तंत्र को ही तंत्र माना जाता है।

महान लोगों के दोष भी आभूषणों की तरह शुभ होते हैं

इस दुनिया में कुछ भी सत्य नहीं है। सब कुछ एकदूसरे के सापेक्ष है। जो दोष आम लोगों में कुलक्षण कहे गए हैं, वही दोष भगवान शिव में सुलक्षण हैं। इसीलिए शिवपुराण में नारद मुनि पार्वती के माता-पिता को समझाते हुए कहते हैं कि ज्ञानियों और महान लोगों के दोष भी गुणों की तरह ही होते हैं। दरअसल नारद मुनि उन्हें बताते हैं कि उनकी पुत्री पार्वती का विवाह एक भूतिया, नंगे, जंगली और असामाजिक व्यक्ति से होगा। इससे वे चिंतित हो जाते हैं। फिर नारद उनकी चिंता को दूर करते हुए कहते हैं कि शिव भी ऐसे ही हैं, इसलिए पार्वती का विवाह शिव से करवाओ। पार्वती उनके मन की चंचलता को मिटा देगी। यह तंत्रयोग का ही तो वर्णन हो रहा है। फिर अधिकांश लोग कहते हैं कि तंत्र यहाँ से आया, वहाँ से आया; या तंत्र ऐसा है, तंत्र वैसा है। शिवपुराण एक पूर्ण समर्पित तंत्र-पुराण ही है। इसकी तंत्रविद्या आसानी से इसलिए पकड़ में नहीं आती, क्योंकि उसे उच्च कोटि की सामाजिकता व रूपकता के साथ लिखा गया है।

मान-अपमान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं

पिछले हफ्ते ही एक दुखद समाचार मिला कि अखाड़ा संघ के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने फंदे से झूलकर अपने प्राणों का अंत कर दिया। सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपने आखिरी लिखित व वीडियो दस्तावेज में अपने इस काम के लिए अपने शिष्य आनन्द गिरि को जिम्मेदार ठहराया। आनन्द गिरि को उन्होंने बचपन से लेकर पालपोस कर बड़ा किया था, और उनका उसके प्रति विशेष लगाव होता था। सूत्रों के अनुसार वह उन्हें पहले भी समाज में अपमानित करवा चुका था, और अब भी झूठी विडियो वायरल करने जा रहा था, जिसमें उसके गुरु नरेंद्र गिरि किसी स्त्री के साथ आपत्तिजनक अवस्था में दिखाए जाते। इसी अपमान के डर से उन्होंने यह कदम उठाया। वैसे अभी भी इसकी जाँच चल रही है, और अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। गीता में एक श्लोक आता है~जितात्मनः प्रशान्तस्यपरमात्मा समाहितः।शीतोष्णसुखदुःखेषुतथा मानापमानयोः॥६-७॥सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में जिसने स्वयं को जीता हुआ है, ऐसा पुरुष परमात्मा में सम्यक् प्रकार से स्थित है॥7॥फिर अपमान से भयभीत होने को हम किस प्रकार का अध्यात्म कहेंगे। मैं यहाँ किसी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। मैं केवल घटना के एक पक्ष के बारे में वर्णन कर रहा हूँ, क्योंकि उसीसे सम्बंधित विचार मेरे मन में उठ रहे हैं। हरेक घटना के अनेक पक्ष होते हैं। पर हरेक पक्ष के बारे में विचार रखना एक अकेले आदमी के लिए संभव नहीं है। किसीका यह कहना कि इस घटना का केवल एक ही पक्ष क्यों लिया गया, बेमानी है। दूसरे पक्ष जानने के लिए दूसरे लोगों के विचार जानने चाहिए। एक जगह सभी कुछ नहीं मिल सकता। वैसे भी सम्पूर्ण जानकारी सभी पक्षों को जानकर ही मिलती है। लिटल नॉलेज इज ए डेंजरस थिंग। अगर दूसरे पक्ष की बात संक्षेप में कहूँ तो वह यही है कि गुरु, ज्ञानी और भक्त का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। कुंडलिनी आदमी को बेहद संवेदनशील बना देती है। इसलिए कुंडलिनी योगी को परेशान नहीं करना चाहिए। उनसे प्रेम से ही बर्ताव करना चाहिए। सम्भवतः महिलाएं इसी कुंडलिनी सिद्धांत के कारण ज्यादा संवेदनशील होती हैं। मैं अगली पोस्ट में थोड़ा विस्तार से बताऊंगा कि ऐसा क्यों होता है। पहली बात, अपने प्रति सम्मान पर इतना लट्टू क्यों हुआ जाए कि उसके बाद अपमान झेल ही न सकें। अगर किसीके द्वारा लट्टू हुए बिना न रहा जाए, तो अपना सम्मान करवाया ही क्यों जाए। कुंडलिनी ही ऐसी परिस्थितियों में आदमी की सहायता व रक्षा करती है। कुंडलिनी के अतिरिक्त सृष्टि की हरेक वस्तु में स्वार्थ भरा है। कोई भी आदमी बिना स्वार्थ के मित्रता नहीं दिखाता। वृक्ष भी स्वार्थ के लिए ही फल देता है। गाय से दूध लेने के लिए उसे भी घास खिलाना पड़ता है। यहाँ तक कि नदी व पहाड़ आदि निर्जीव वस्तु से लाभ प्राप्त करने के बदले में उन्हें साफ-सुथरा रखना पड़ता है। पर कुंडलिनी तो बदले में किसी चीज की अपेक्षा नहीं रखती। वह बुरे समय में भी साथ देती है, और सांत्वना व सहानुभूति प्रदान करती है। कुंडलिनी अखण्ड ऊर्जा का एक बुलबुला है। उसका अखण्ड ऊर्जा से अलग अस्तित्व नहीं है। आसमान की तरह शून्य होने से उसे भला किस चीज की जरूरत हो सकती है। जो उसे जितना अधिक याद करता है, उसे उसका उतना ही ज्यादा साथ मिलता है। कुंडलिनी के अतिरिक्त हरेक वस्तु अस्थायी और अपवित्र है। कुंडलिनी के अतिरिक्त हरेक वस्तु भौतिक बाध्यताओं व सीमाओं से बंधी होती हैं। कुंडलिनी एक शुद्ध मानसिक चित्र है, शून्य ऊर्जा-आकाश का एक बुलबुला है। उसे भौतिक आयाम छू भी नहीं सकता। इसलिए अच्छी तरह से पालपोस कर रखी गई कुंडलिनी बुरे वक्त में बहुत काम आती है। जब भौतिक कार्यों व सम्बन्धों से तनाव बढ़ जाता है, तब पूरे शरीर की कार्यप्रणाली गड़बड़ा जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मस्तिष्क में ऊर्जा की कमी हो जाती है। उस समय अद्वैत की भावना करने से मन में कुंडलिनी प्रकट होने लगती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत से शरीर थोड़ा रिलेक्स हो जाता है, जिससे ऊर्जा की खपत घट जाती है। अतिरिक्त ऊर्जा से मन में कुंडलिनी प्रकट होने लगती है। उस कुंडलिनी को बनाए रखने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ने लगती है। उससे एकदम से शारीरिक कार्यप्रणाली दुरस्त हो जाती है, और उससे मन के क्रोध आदि दोष मिट जाते हैं। दरअसल ऐसा मस्तिष्क में ऊर्जा की भरपूर उपलब्धता पैदा होने से ही होता है। मैंने पिछली पोस्ट में भी शिवपुराण का हवाला देकर लिखा था कि सहस्रार चक्र पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा की आपूर्ति करता है। इसलिए जब मस्तिष्क में कुंडलिनी प्रकट हो जाए तो उसके साथ आज्ञा चक्र और मूलाधार चक्र का एकसाथ ध्यान करके उसे सेंट्रलाइज करने को कहा जाता है, ताकि वह सहस्रार में आ जाए। सहस्रार चक्र में इसीलिए एक हजार पंखुड़ियों को दर्शाया जाता है क्योंकि वह मस्तिष्क सहित पूरे शरीर में अनगिनत या हजारों स्थानों में ऊर्जा की आपूर्ति करता है। 

श्वास पर ध्यान से लाभ कुंडलिनी के माध्यम से ही मिलता है

एक दिन मैं थका हुआ महसूस कर रहा था। मैं सो भी नहीं पा रहा था, क्योंकि दिन में खाना खा लेने के बाद सोने से मुझे गैस्ट्रिक एसिड रिफलक्स होता है। पेट से मुंह को खटास जैसी आती है, जिससे दांत भी घिसते हैं। खाली बैठ कर साँसों पर ध्यान देने लगा, खासकर हँस शब्द के साथ। इससे थकान भी दूर हो गई और कुंडलिनी आनन्द भी प्रकट हो गया। साँस भरते समय साँस की आवाज पतले संगीत वाली थी, और बाहर जाती साँस की आवाज मोटे संगीत की थी। आप कह सकते हैं कि अंदर जाती साँस की आवाज की ट्रेबल या फ्रेकवेंसी ज्यादा थी, पर बाहर जाती साँस का ट्रेबल कम और बास ज्यादा था। म की आवाज ज्यादा ट्रेबल की और स की आवाज कम ट्रेबल की है। इसीलिए हँस के रूप में साँस पर ध्यान दिया जाता है। इसलिए हँ का ध्यान अंदर जाती साँस के साथ, व स का ध्यान बाहर जाती साँस के साथ किया जाता है। इससे बहुत लाभ मिलता है।

वैदिक दर्शन एक व्यावहारिक दर्शन है

व्यवहारिक दर्शन इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि यह शून्यवादी दर्शन नहीं है। वैदिक कर्मकांड इसका जीता जागता उदाहरण है। इसमें योग और ध्यान को दुनियादारी से प्राप्त किया जाता है, पलायनवाद से नहीं। मैं खुद इसी माहौल में पला-बढ़ा हूँ। यह अलग बात है कि जागरण रूपी अंतिम छलांग के लिए मैंने कुछ समय के लिए तंत्रयोग का सहारा भी लिया। पर यह भी सत्य है कि तंत्रयोग भी तभी सहायता करता है, यदि वैदिक कर्मकांड के प्रेमभरे माहौल में आदमी ने प्रारम्भिक आध्यात्मिक मुकाम हासिल कर लिया हो।

आध्यात्मिक रूप से हरेक पुरुष शिव और हरेक स्त्री पार्वती है

सती तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है। अगले जन्म में जब वह पार्वती बनती है, तब भी तपस्या से ही शिव को प्रसन्न करके उन्हें प्राप्त करती है। मुझे तो यह तँत्रसम्मत गृहस्थ जीवन का रूपक ही लगता है। पार्वती की तपस्या यहाँ पर गृहस्थ जीवन की शुरुआत में एक पत्नी का, त्याग और समर्पण से भरपूर जीवन ही है। इसीलिए देखने में आता है कि गृहस्थी की शुरूआती खटपट के बाद ही असली गृहस्थ जीवन शुरु होता है। किसीकी गृहस्थी कुछ महीनों में ही पटरी पर आ जाती है, किसी को कुछ साल लग जाते हैं। कईयों के बीच तो तब असली ट्यूनिंग बनती है, जब उनके बच्चे भी बड़े हो जाते हैं। यह पति-पत्नी, दोनों की उचित भागीदारी पर निर्भर करता है कि कितना समय लगेगा। कई स्त्री पर आसक्त रहने वाले पति पत्नी से बिल्कुल भी तप नहीं करवाते और न ही खुद करते हैं। वे हालाँकि शुरु में ही फुल्ली ट्यूनड लगते हैं, पर यह दिखावा ज्यादा होता है। इस जल्दबाजी में वे एकदूसरे को ढंग से व गहराई से नहीं जान पाते। इससे कुछ न कुछ तांत्रिक कमी तो बाद तक रह ही जाती है। शादी से पहले तो चाहता ही है कि उसकी होने वाली पत्नी गुणों में देवी पार्वती से कम न हो, पर शादी के बाद भी पुरुष चाहता है कि उसकी पत्नी उसकी तन-मन-धन से सेवा करती रही, उससे भरपूर प्रेम करे और पूरी तरह उसके प्रति समर्पित रहे। मतलब कि पति चाहता है कि उसकी पत्नी उसके लिए पहले घोर तप करे, तभी वह अपने आपको उसके हवाले करेगा। भगवान शिव भी तो सती से या पार्वती से यही चाहते हैं। इसीलिए पार्वती निरन्तर शिव का स्मरण करते हुए घोर तप करती है। उसीके बाद शिव उसे स्वीकार करते हैं। थोड़ा तप तो शिव भी करते हैं। वे लगातार पार्वती की याद में इधर-उधर भटकते रहते हैं। यही उनका तप है। दरअसल यह मानव जीवन का मनोविज्ञान ही है, जिसे पुराणों में देवी-देवताओं की कथाओं द्वारा समझाया गया है।

युद्ध की देवी काली

युद्ध आदि के समय और अन्य विकट परिस्थितियों में भगवती माता या काली की पूजा करने का विधान है। दरअसल ऊर्जा का स्रोत स्त्री ही है। युद्ध आदि के समय बहुत अधिक प्राण ऊर्जा की आवश्यकता होती है, आम समय की अपेक्षा दुगुने से भी ज्यादा। शरीर को चलायमान रखने के लिए अलग से ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, और मन को स्थिर रखने के लिए अलग से। अगर मुक्ति की आकांक्षा हो, तब तो और भी ज्यादा ऊर्जा चाहिए, क्योंकि उसके लिए साथ में नाड़ियों और अन्य चक्रों के साथ सहस्रार को भी जागृत रखना पड़ता है। काली को वीभत्स रूप इसलिए दिया गया है क्योंकि उससे प्राप्त ऊर्जा का इस्तेमाल युद्धादि में उपजे रक्तपात के लिए भी होता है। दूसरा मतलब यह भी है कि शक्ति खून की प्यासी भी हो सकती है।

कुंडलिनी विभिन्न देवताओं, शिव ब्रह्मरूप अखंड ऊर्जा, सहस्रार चक्र वटवृक्ष और मस्तिष्क कैलाश पर्वत के रूप में दर्शाए गए हैं

दोस्तो, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि ‘चक्र’ नाम कैसे पड़ा है। दरअसल चक्र का शाब्दिक अर्थ भी पहिया ही होता है। उदाहरण के लिए रथचक्र, जलचक्र आदि। यह भी बताया कि चक्र को ऊर्जा का केंद्र क्यों कहा गया है। चक्र के बारे में ऐसा तो हर जगह लिखा होता है, पर यह साबित नहीं किया होता है कि ऐसा क्यों कहा गया है। इससे रहस्यात्मकता की बू आती है। मैंने इसे वैज्ञानिक व अनुभवात्मक रूप से सिद्ध किया कि ऐसा क्यों कहा जाता है। इसीलिए इस वेबसाइट का नाम “कुंडलिनी रहस्योद्घाटन” है। यह भी मनोवैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के मिश्रण से कुंडलिनी कैसे बनती है। दरअसल प्राण ऊर्जा और मनस ऊर्जा के इसी मिश्रित रूप को ही कुंडलिनी कहते हैं। यह कुंडलिनी की सबसे छोटी परिभाषा है। इसे ही टाईम-स्पेस मिश्रण भी कहते हैं। प्राण ऊर्जा टाईम का प्रतिनिधित्व करती है, और मनस ऊर्जा स्पेस का प्रतिनिधित्व करती है। इस पोस्ट में मैं बताऊंगा कि सहस्रार चक्र को शिव के निवास स्थान या कैलाश के वटवृक्ष के रूप में कैसे निरूपित किया गया है।

दक्षयज्ञ से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं द्वारा कैलाश गमन

भगवान विष्णु दक्ष से नाराज शिव को मनाने के लिए देवताओं सहित कैलाश पर्वत पर गए। वह कैलाश पर्वत मनुष्यों के इलावा किन्नरों, अप्सराओं और योगसिद्ध महात्माओं से सेवित था। वह बहुत ऊंचा था। वह चारों ओर से मणिमय शिखरों से सुशोभित था। वह अनेक प्रकार की धातुओं से विचित्र जान पड़ता था। वह अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं से भरा था। वह अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों व झरनों से परिव्याप्त था। उसके शिखर पर सिद्धांगनाएँ अपने-अपने पतियों के साथ विहार करती थीं। वह अनेक प्रकार की कन्दराओं, शिखरों तथा अनेक प्रकार के वृक्षों की जातियों से सुशोभित था। उसकी कांति चांदी के समान श्वेतवर्ण की थी। वह पर्वत बड़े-बड़े व्याघ्र आदि जंतुओं से युक्त, भयानकता से रहित, सम्पूर्ण शोभा से सम्पन्न, दिव्य तथा अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न करने वाला था। वह पर्वत पवित्र गंगा नदी से घिरा हुआ और अत्यंत निर्मल था। उस कैलाश पर्वत के निकट शिव के मित्र कुबेर की अलका नाम की दिव्य नगरी थी। उसी पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक दिव्य वन था, जो दिव्य वृक्षों से शोभित था, और जहाँ पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। उस पर्वत के बाहर से नन्दा और अलकनन्दा नामक दिव्य व पावन सरिताएं बह रही थीं, जो दर्शन मात्र से ही पापों का नाश करती हैं। देव स्त्रियां प्रतिदिन अपने लोक से आकर उन नदियों का जल पीतीं हैं, और स्नान करके रति से आकृष्ट होकर पुरुषों के साथ विहार करती हैं। फिर उस अलकापुरी और सौगंधिक वन को पीछे छोड़कर, आगे की ओर जाते हुए उन देवताओं ने समीप में ही शंकर जी के वट वृक्ष को देखा। वह वटवृक्ष उस पर्वत के चारों ओर छाया फैलाए हुए था। उसकी शाखाएं तीन ओर फैली हुई थीं। उसका घेरा सौ योजन ऊंचा था। वह घौंसलों से रहित और ताप से वर्जित था। उसका दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। वह अत्यंत रमणीय, परम पावन, शिवजी का योग स्थल, दिव्य, योगियों के द्वारा सेवन या निवास योग्य, तथा अति उत्तम था। महायोगमयी व मुमुक्षु लोगों को शरण देने वाले उस वटवृक्ष के नीचे बैठे शिवजी को देवताओं ने देखा। शिवभक्ति में लीन, शांत तन-मन वाले, व महासिद्ध जो ब्रह्मा के पुत्र सनक आदि हैं, वे प्रसन्नता के साथ उन शिव की उपासना कर रहे थे। उनके मित्र कुबेर, जो गुह्यकों व राक्षसों के पति हैं, वे अपने परिवार व सेवकों के साथ उनकी विशेष रूप से सेवा कर रहे थे। वे परमेश्वर शिव तपस्वियों के मनपसंद सत्यरूप को धारण किए हुए थे। वे वात्सल्य भाव से विश्वभर के मित्र लग रहे थे, और भस्म आदि से सुसज्जित थे। वे कुशासन पर बैठे हुए थे, और नारद आदि के पूछने पर सभी श्रोता सज्जनों को ज्ञान का उपदेश दे रहे थे। वे अपना बायाँ चरण अपनी दाईं जांघ पर, और बायाँ हाथ बाएँ घुटने पर रखी कलाई में रुद्राक्ष की माला डाले हुए सत्य-सुंदर तर्क मुद्रा में विराजमान थे।  वे सर्वोच्च ज्ञान की बात बताते हैं कि मोक्ष की प्राप्ति कर्म से नहीं, अपितु ज्ञान से होती है। इसलिए अद्वैत ज्ञान के साथ कर्म करना चाहिए, मतलब कि कर्मयोग करना चाहिए। जो लोग उनमें, ब्रह्मा और विष्णु में भेद करते हैं, वे नरक को जाते हैं। मतलब कि भगवान शिव भेददृष्टि को नकारते हैं।

कैलाश पर्वत व मस्तिष्क की परस्पर समकक्षता

कैलाश पर्वत मस्तिष्क है। वहाँ पर आम लोग-बाग, अप्सराएं और नाच-गाना करने वाले कलाकार तो भोगविलास करते ही हैं, ऋषि-मुनि भी वहीँ पर ध्यान का आनंद प्राप्त करते हैं। यह मानव शरीर में सबसे ऊंचाई पर स्थित है। मणिमय शिखरों का मतलब इसकी अखरोट के जैसी आकृति से बने अनेकों रिज या उभार हैं, जो मन के चमकीले विचारों व संकल्पों से चमकते रहते हैं। अनेक प्रकार की धातुओं का मतलब इसके किस्म-किस्म की संरचनाओं व रँगों वाले भाग हैं, जैसे कि खोपड़ी की हड्डी, उसके नीचे व्हाईट मैटर, उसके नीचे ग्रे मैटर, तरलता-पूर्ण नरम आंखें, कान, नाक, दांत आदि। मस्तिष्क का अंदरूनी भाग भी किस्म-किस्म के आकारों व रंगों में बंटा है, जैसे कि पॉन्स, हिप्पोकैम्पस, पिनियल ग्लैंड आदि। अनेक प्रकार के वृक्षों व लताओं का मतलब विभिन्न प्रकार के बाल हैं, जैसे कि सिर के बाल, दाढ़ी के बाल, मूँछ के बाल, कान के बाल, नाक के बाल आदि। यहाँ तक कि मस्तिष्क के अंदर भी रेशेदार माँस होता है, जिसे नर्व फाइबर कहते हैं। इससे लगता है कि प्राचीन ऋषि-मुनि मानव शरीर की एनाटोमी का भी अच्छा ज्ञान रखते थे। इसका विशद वर्णन आयुर्वेद में है। अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों का मतलब बालों में पाए जाने वाले सूक्ष्म परजीवी ही हैं। अनेक प्रकार के झरनों का मतलब आँखों, कानों व मुंह आदि की ग्रन्थियों से निकलने वाला जैविक स्राव ही है। इसके शिखरों पर सिद्धांगनाओं के विहार करने का मतलब तंत्र योगिनियों के द्वारा तांत्रिक रोमांस करना ही है, जिससे वे महान आनन्द प्राप्त करती हैं। आनन्द का स्थान तो मस्तिष्क ही है। अनेक प्रकार की कन्दराएँ मस्तिष्क के आसपास अनेक प्रकार के छिद्र हैं, जैसे कि आँख, नाक, कान आदि। शिखरों व वृक्षों के बारे में तो ऊपर बता ही दिया है। उस पर्वत के चांदी की तरह होने का मतलब मस्तिष्क के चेतना से भरे चमकीले विचार ही हैं। व्याघ्र जैसे जंतुओं का मतलब जू, पिस्सू की तरह सूक्ष्म मांसाहारी परजीवी ही हैं, जो बालों की नमी में छिपे रह सकते हैं। ‘भयानकता से रहित’ मतलब उन जंतुओं से भय नहीँ लगता था। दिव्यता तो मस्तिष्क में है ही। सभी दिव्य भाव मस्तिष्क की क्रियाशीलता के साथ ही हैं। कुंडलिनी जागरण सबसे दिव्य है, इसीलिए उसमें मस्तिष्क की क्रियाशीलता चरम पर होती है। इसी तरह मस्तिष्क आश्चर्य का नमूना भी है। इसमें जीवन या चेतना की उत्पत्ति होती है। वैज्ञानिक आज तक इस पहेली को नहीं सुलझा सके हैं। गँगा नदी यहाँ सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है। क्योंकि वह सहस्रार को सिंचित करती है, जिससे पूरा मस्तिष्क जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसे पूरे पर्वत को घेरने वाली कहा है। यह पूरे मस्तिष्क को ऊर्जा से निर्मल कर देती है। शिव के मित्र कुबेर की नगरी अलकापुरी आज्ञा चक्र को कहा गया है। “अलका” शब्द संस्कृत के अलक्षित व हिंदी के अलख शब्दों से बना है। इस चक्र से अदृश्य कुंडलिनी के दर्शन होते हैं। इसीलिए इसे तीसरी आंख भी कहते हैं। दरअसल जब आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाया जाता है, तो सहस्रार पर कुंडलिनी प्रकट हो जाती है। क्योंकि शिवपुराण में शिव ही कुंडलिनी के रूप में हैं, इसीलिए आज्ञाचक्र के अभिमानी देवता कुबेर को शिव का मित्र बताया गया है। अगर यहाँ अखण्ड ऊर्जा को ही शिव माना गया है, तब भी कुबेर शिव के मित्र सिद्ध होते हैं, क्योंकि कुंडलिनी से ही अखण्ड ऊर्जा प्राप्त होती है।आज्ञाचक्र बुद्धि का प्रतीक है। इसलिए स्वाभाविक है कि आज्ञाचक्र धनसंपदा से जुड़ा है, क्योंकि बुद्धि से ही संपदा अर्जित होती है। इसीलिए इसके देवता कुबेर सृष्टि में सबसे धनी हैं। उस पर्वत के पास ही सौगंधिक नामक वन है। क्योंकि इसका वर्णन अलकापुरी के एकदम बाद हो रहा है, इसका मतलब है कि वह वन उसके निकट ही है। वह तो नाक ही है। उसके अंदर ही सुगंधिका अनुभव होता है, इसलिए माना गया है कि सुगंधि की उत्पत्ति उसीमें हो रही है। क्योंकि सुगंधि वृक्षों और पुष्पों से ही उत्पन्न होती है, इसलिए नाक को वन का रूप दिया गया है। उस वन को दिव्य इसलिए कहा है, क्योंकि वह आकार में इतना छोटा होकर भी दुनिया भर की सभी दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराता है। साधारण वन तो ऐसा नहीं कर सकता। उसमें स्थित रोमों को ही दिव्य वृक्ष माना जा सकता है। इन्हें दिव्य इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि आकार में इतना छोटा और कम संख्या में होने पर भी वे दुनिया भर की दिव्य सुगंधियों को उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। वे गंध-ग्राही कोशिकाओं को सुरक्षा देते हैं। हो सकता है कि पौराणिक युग में नासिका-रोम को ही सुगन्धि के लिए एकमात्र जिम्मेदार माना जाता हो। उस वन में पक्षियों आदि की अद्भुत ध्वनि हो रही थी। वह ध्वनि दरअसल श्वास-प्रश्वास की धीमी आवाज ही है। इसे मीठी आवाज तो नहीं कही जा सकती। इसीलिए इसे अद्भुत कहा है। उस पर्वत के बाहर नन्दा और अलकनन्दा नामक दो नदियां इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही हैं। मस्तिष्क के साथ रीढ़ की हड्डी जुड़ी होती है। रीढ़ की हड्डी को यदि नीचे के पर्वत कहेंगे, तो मस्तिष्क शीर्ष के पर्वत शिखर से बना है। उसमें सुषुम्ना बहती है। उसे गंगा कहा गया है। इड़ा नाड़ी रीढ़ की हड्डी के बाहर बाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी दुनियादारी का भौतिक, सीमित, तार्किक या लॉजिकल व जजमेंटल या नुक्ताचीनी वाला आनन्द लेता है। इसीलिए इसका नाम नन्दा है। दूसरी नाड़ी जो पिंगला है, वह मेरुदंड रूपी पर्वत के दाईं ओर बहती है। इसके माध्यम से आदमी आध्यात्मिक जैसा, शून्य या स्पेस या आकाश जैसा, अंधेरे जैसा, तर्कहीन या इलॉजिकल जैसा, असीमित जैसा, ननजजमेंटल जैसा आनन्द लेता है। इसका नाम अलकनन्दा है। जैसा ऊपर बताया, अलक शब्द अलख या अलक्षित का सूचक है। क्योंकि आकाश अनन्त होने से अलक्षित ही है, इसीलिए इसका नाम अलकनन्दा है, मतलब अलक्षित का आनन्द। दोनों नदियों के दर्शन से पाप नष्ट हो जाते हैं। अकेली नदी की बात नहीं हो रही, बल्कि दोनों नदियों की एकसाथ बात हो रही है। इसका मतलब है कि बाएं और दाएं मस्तिष्क के एकसाथ क्रियाशील होने से अद्वैत उत्पन्न होता है, जो निष्पापता रूप ही है। द्वैत ही सबसे बड़ा पाप है, और अद्वैत ही सबसे बड़ी निष्पापता। देव-स्त्रियों से मतलब यहाँ अच्छे व संस्कारवान घर की कुलीन स्त्रियां हैं। क्योंकि वे संपन्न होती हैं, इसलिए वे दुनियादारी के झमेले में ज्यादा नहीं फँसती। इससे वे अद्वैत के आनन्द में डूबी रहती हैं। इसी अद्वैत के आनन्द को उनके द्वारा दोनों नदियों के जल को पीने के रूप में दर्शाया गया है। वे सुंदर व सुडौल शरीर वाली होती हैं। नहाते समय कुंडलिनी ऊर्जा पीठ से ऊपर चढ़ती है, जैसा मैंने एक पिछली पोस्ट में बताया था। ऐसा ही उन देव स्त्रियों के साथ भी होता है। मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ने से उनका मूलाधार ऊर्जाहीन सा हो जाता है। मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही वे रति की ओर आकर्षित होती हैं, और पुरुषों के साथ विहार करती हैं। एक अन्य रूपक के अनुसार, देवस्त्रियाँ सुंदर व मानवीय विचारों की प्रतीक हैं। ऐसे विचार अद्वैत भाव के साथ होते हैं, मतलब इनके साथ इड़ा और पिंगला, दोनों नाड़ियाँ बहती हैं। जब ये दोनों नाड़ियाँ बहुत तेजी से बहती हैं, तभी दिव्य कामभाव जागृत होता है। ऐसा मूलाधार को ऊर्जा देने के लिए ही होता है, क्योंकि अद्वैत से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर चढ़ती रहती है। अद्वैत भाव से मस्तिष्क में अभौतिक कुंडलिनी चित्र का विकास होने लगता है। उसके लिए बहुत ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि इंद्रियों की पहुंच से बाहर होने के कारण, आम मानसिक चित्रों की तरह इसको मजबूत करने के लिए शारीरिक इंद्रियों का सहयोग नहीं मिलता। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए मूलाधार से ऊर्जा ऊपर चढ़ती है। उस स्थिति में की गई रति क्रीड़ा बहुत आनन्ददायक व आत्मा का विकास करने वाली होती है, मतलब कि इससे ऊर्जा सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर सहस्रार में पहुंच जाती है। इस अतिरिक्त ऊर्जा से कुंडलिनी के साथ मस्तिष्क का भी अच्छा विकास होता है। इसीलिए कहते हैं कि मानव जाति के त्वरित विकास के लिए कुंडलिनी बहुत जरूरी है। उपरोक्त कुण्डलिनीपरक रतिक्रिया को तांत्रिक रतिक्रीड़ा भी कह सकते हैं। जब आदमी दुनियादारी से दूर हो, और ऊर्जा की कम खपत के कारण उसकी ऊर्जा की संचित मात्रा पर्याप्त हो, और वह पहले से ही सुषुम्ना में बह रही हो, वह तो साधु वाली स्थिति होती है। उसमें रतिक्रीड़ा के प्रति ज्यादा मन नहीं करता। देवलोक से वे स्त्रियां आती हैं, मतलब मस्तिष्क से वे मानवीय विचार बाहर आते हैं, और अद्वैत भाव के साथ दुनियादारी के काम निभाने लगते हैं। इसे ही देवस्त्रियों द्वारा नन्दा और अलकनन्दा नदियों में स्नान करना कहा गया है। देवता व देवियाँ वैसे भी अद्वैत भाव के प्रतीक होते हैं। साधारण लोगों में यह ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रभाव कम होता है। इसलिए उनकी कामुक भावना क्षणिक सुखदायी ही होती है, जिसे कामवासना कहते हैं। उनमें द्वैत भाव होने के कारण उनके मन में कुंडलिनी नहीं होती। इसलिए ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता न होने से मूलाधार की ऊर्जा ऊपर नहीँ चढ़ती। इसीलिए इसमें मूलाधार की ऊर्जा का रक्षण नहीं बल्कि क्षरण होता है। मस्तिष्क में ही दिव्यता होती है।  सौगंधिक वन और अलकापुरी को लाँघ कर आगे बढ़ने पर वे सभी देवता एक वटवृक्ष के पास पहुंचते हैं, जिसकी शाखाएं पूरे पर्वत पर फैल कर छाया पहुंचाए हुए थीं। दरअसल कुंडलिनी को ही उन सभी देवताओं के रूप में दर्शाया गया है। मन में पूरी सृष्टि बसी हुई है। इसका मतलब है कि मन में सभी देवता बसे हुए हैं, क्योंकि देवता ही सृष्टि को चलाते हैं, और पूरी सृष्टि के रूप में भी हैं। एकमात्र कुंडलिनी चित्र या ध्यान चित्र के अंदर पूरा मन ऐसे ही समाया हुआ होता है, जैसे एक चीनी के दाने में चीनी की पूरी बोरी या गन्ने का पूरा खेत समाया होता है। किसी को अगर चीनी के दर्शन कराने हो, तो हम पूरी बोरी चीनी न उठाकर एक दाना चीनी का ले जाते हैं। इससे काम काफी आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से चीनी की बोरी को एक फुट ऊंचा उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से एक चीनी के दाने को हजारों फुट ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम चीनी की बोरी से होगा, वही काम चीनी के एक दाने से भी हो जाएगा। इसी तरह यदि शिव से मिलाने के लिए सहस्रार तक मन को ले जाना हो, तो हम मन की पूरी दुनिया को न ले जाकर केवल कुंडलिनी को ले जाते हैं। इससे शिव-मन या शिव-जीव के मिलाप का काम बेहद आसान हो जाता है। जितनी ऊर्जा से पूरे मन को मूलाधार से स्वाधिष्ठान चक्र तक भी ऊंचा नहीं उठाया जा सकता है, उतनी ही ऊर्जा से कुंडलिनी को सहस्रार तक ऊंचा उठाया जा सकता है। जो काम असंख्य चित्रों के ढेर को समेटे मन से होगा, वही काम उस ढेर में से छांटे गए एकमात्र कुंडलिनी चित्र से भी हो जाएगा। कुंडलिनी के स्थान पर बहुत सारे देवता इसलिए दिखाए गए हैं, ताकि इससे इस मनोवैज्ञानिक आख्यान को रोचकता व रहस्यात्मकता मिल सके। वटवृक्ष ही सहस्रार है, क्योंकि सहस्रार पूरे मस्तिष्क से नाड़ियों के माध्यम से जुड़ा है। उन नाड़ियों को सहस्रार चक्र रूपी वृक्ष की शाखाएं कह सकते हैं। उसकी शाखाएँ तीन ओर फैली हुई थीं, इसका मतलब है कि सहस्रार से बाएं मस्तिष्क, दाएँ मस्तिष्क और आगे व फिर नीचे फ्रंट चैनल, तीन दिशाओं में ऊर्जा प्रसारित होती है। पीछे व वहाँ के नीचे स्थित बैक चैनल से तो उसे ऊर्जा मिल रही है। यह चौथी दिशा में है, जिसे हम उस वृक्ष का तना या जड़ कह सकते हैं। ऊर्जा हमेशा जड़ से शाखाओं की तरफ ही बहती है। उसका ऊपरी विस्तार 100 योजन ऊँचा बताया गया है, जो लगभग एक हजार मील की दूरी है। यह बहुत ऊँचाई है, जो बाहरी अंतरिक्ष तक फैली है। दरअसल इसका मतलब है कि सहस्रार चक्र उस अखंड ऊर्जा से जुड़ा हुआ है, जो अनन्त आकाश में फैली हुई है। सहस्रार का शाब्दिक अर्थ भी एक हजार शाखाओं वाला है, सम्भवतः इसीलिए यह संख्या ली गई हो। वह घोंसलों से वर्जित है, मतलब वहाँ कोई सामान्य जीव नहीं पहुंच सकता। वह ताप से वर्जित है, मतलब अत्यंत शांत सहस्रार चक्र है। जिस द्वैत से ताप पैदा होता है, वह वहाँ था ही नहीं। वह अत्यंत रमणीय था। इसका मतलब है कि सभी स्थानों की रमणीयता सहस्रार के कारण ही होती है। रमणीय स्थानों पर ऊर्जा सहस्रार में घनीभूत हो जाती है, इसीलिए वे स्थान रमणीय लगते हैं। तभी तो आपने देखा होगा कि रमणीय स्थान पर घूमने के बाद शरीर में थकावट होने से कुछ समय काम करने को ज्यादा मन नहीं करता। यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर की अधिकांश ऊर्जा सहस्रार को चली गई होती है। रमणीय स्थान पर घूमने के बाद आदमी तरोताजा व निर्मल सा हो जाता है। ऐसा लगता है कि पापों का पुराना बोझ हट गया है।इसीलिए दुनियादारी में पर्यटन का इतना ज्यादा क्रेज होता है। विभिन्न तीर्थ स्थल भी इसी रमणीयता के आध्यात्मिक गुण का फायदा उठाते हैं। ऐसा सब सहस्रार चक्र के कारण ही होता है। इसीलिए इसे परम पावन कहा है। उस वृक्ष का दर्शन केवल पुण्यात्माओं को ही होता है। इसमें कोई आश्चर्य वाली बात नहीं। अनुभव से भी यह साफ विदित होता है कि हिंसा आदि कर्मों से कुंडलिनी चेतना नीचे गिरती है, और मानवता रूपी पुण्य कर्मों से ऊपर चढ़ती है। वह दिव्य था। सारी दिव्यता सहस्रार चक्र में ही तो होती है। दिव्य शब्द दिवा या प्रकाश से बना है। प्रकाश का मूल सहस्रार और उससे जुड़ी अखंड ऊर्जा ही है। वह योगमयी था तथा योगियों व शिव का प्रिय निवास स्थान था। शिव भी तो योगी ही हैं। ब्रह्म या एनेर्जी कँटीन्यूवम से जुड़ाव या योग सहस्रार में ही सम्भव होता है। जाहिर है कि मोक्ष की इच्छा रखने वाले मुमुक्षु लोग वहीँ जाएंगे, क्योंकि सहस्रार में ही सीमित चेतना से छुटकारा सम्भव है। उस वृक्ष के मूल में शिव बैठे थे। ब्रह्म या अखंड ऊर्जा या एनर्जी कँटीन्यूवम को भी यहाँ शिव ही कहा है। वे तपस्वियों को प्रिय लगने वाले वेष में थे। मतलब कि वे अद्वैत रूप अखण्ड ऊर्जा के रूप में थे, जो तपस्वियों को अच्छी लगती है। द्वैत में डूबे साधारण लोग कहाँ उसे पसंद करने लगे। ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार आदि ऋषि जो हमेशा ब्रह्मध्यान में लीन रहते हैं, उन्हें शिव की उपासना करते हुए इसलिए बताया गया है, क्योंकि शिव सृष्टि के सबसे बड़े तन्त्रयोगी भी हैं। आज्ञा चक्र व मूलाधार पर ध्यान केंद्रित करने से मस्तिष्क की ऊर्जा केन्द्रीभूत होकर सहस्रार में आ जाती है। इसे ही कुबेर द्वारा अपने गुह्यक सेवकों और परिवारजनों के साथ शिव की सेवा करना बताया गया है। गुह्यक यहाँ मूलाधार का प्रतीक हैं, क्योंकि मूलाधार और आज्ञाचक्र आपस में जुड़े होते हैं। गुह्यक भी मूलाधार की तरह ही डार्क तमोगुणी जैसे होते हैं। कुबेर के परिवारजन मस्तिष्क में चारों ओर बिखरी हुई मानसिक ऊर्जा के प्रतीक हैं। परिवारजन परिवार के मुखिया के ही वश में होते हैं। वात्सल्य भाव तो शिव में होगा ही। अनन्त चेतना के स्वामी शिव को हमारे जैसे सीमित चेतना वाले प्राणी बच्चे ही लगेंगे। वे भस्म लगाए हुए थे। भस्म वैराग्य, सार और निष्ठा का प्रतीक है। सारे विश्व का निचोड़ भस्म में निहित है। अखण्ड ऊर्जा में रमण करने वाले शिव को जगत नामक सीमित ऊर्जा कहाँ रास आएगी। अनेक लोग शिव से ही तंत्रयोग की प्रेरणा लेते हैं और कुंडलिनी जागरण प्राप्त करते हैं। इसे ही शिव के द्वारा ज्ञानोपदेश के रूप में दर्शाया गया है।

कुंडलिनी प्रेम, आदर, और समर्पण के भावों की भूखी है, जो योग या सामाजिक रिश्तों या दोनों से बढ़ाए जाने योग्य हैं

कुंडलिनी योग के सर्वोच्च महत्त्व को दर्शाती शिवपुराण की शिव-सती व दक्ष-यज्ञ की कथा

दोस्तो, इस हफ्ते मुझे एक नई अंतर्दृष्टि मिली है। शिवपुराण में एक प्रसिद्ध कथा आती है। प्रजापति दक्ष जो ब्रह्मा का पुत्र था, उसने शिवेच्छा और अपने पिता की संस्तुति से प्रेरित होकर अपनी पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से कराया था। एकबार किसी तीर्थस्थान पर ऋषियों और राजाओं की बैठक हो रही थी। उस सभा में भगवान शंकर भी बैठे थे। तभी वहाँ ब्रह्मा भी आए। सभी लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए और उन्हें नमन किया। परंतु भगवान शिव चुपचाप बैठे रहे। इससे दक्ष उनपर बड़ा गुस्सा हुआ, और उन्हें भला-बुरा कहने लगा। बात यहीं खत्म नहीं हुई। दक्ष के मन में क्रोध और बदले की आग बुझ ही नहीं रही थी। इसलिए उसने शिव को अपमानित करने के लिए एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उसमें उसने अपने जामाता शिव को छोड़कर अपने सभी संबंधियों, सृष्टि के सभी देवताओं और विशिष्ट लोगों को बुलाया। जब पार्वती ने अपनी बहनों को सज-धज कर कहीं जाते हुए देखा, तो अपनी सखी से उनसे पुछवाया कि वे कहाँ जा रही थीं। जब पार्वती को अपने पिता दक्ष के यज्ञ के बारे में पता चला तो वह अपने पति शिव के पास जाकर चलने के लिए कहने लगी। शिव ने बताया कि दक्ष उनसे शत्रुता रखते हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें जानबूझकर नहीं बुलाया। सती ने फिर कहा कि शास्त्रों के अनुसार पिता, गुरु और मित्र के यहाँ जाने के लिए किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती। तब शिव ने जवाब दिया कि उसकी बात ठीक है, पर दक्ष की बात और है, वह वहाँ उसका अपमान करेंगे और अपनों के द्वारा किया अपमान मृत्यु से बढ़कर होता है। पर सती नहीँ मानी और वहां चली गई। वहाँ अपने पति शिव का स्थान व भाग न देखकर वह बहुत क्रोधित हुई और अपने पिता दक्ष को फटकारने लगी। सती ने शिव को असली और सबसे बड़ा देवता बताया। दक्ष ने उससे कोई बात नहीं की और न ही औरों को करने दी। फिर जब सती चुप नहीं हुई, तब उसने सती को भूतों के साथ रहने वाले वेदविरुद्ध और गन्दे शिव की पत्नी कहा। फिर सती ने यह सोचकर कि वह शिव को क्या मुंह दिखाएगी और जब वे उसे दाक्षायणी या दक्ष-पुत्री कहेंगे तो वह क्या जवाब देगी, अपना शरीर योगविद्या से त्याग दिया और यज्ञ की अग्नि में प्रविष्ट कर गई। उसके दुख से 10000 शिवगणों ने गुस्से में अपने अस्त्र-शस्त्रों से अपने अंग भंग कर दिए और मृत्यु को प्राप्त हो गए। जब बाकि बचे गणों ने यज्ञ पर हमला किया तो ऋषियों द्वारा यज्ञ से पैदा किए ऋभु देवों से उनका युद्ध हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई जो दक्ष को फटकारने लगी। उसने सती को सबकी माँ, सूर्य-चन्द्र समेत सारी सृष्टि को पैदा करने वाली, शिव की परम प्यारी, शिव के आधे शरीर के रूप वाली, भुक्ति और मुक्ति देने वाली, सभी सुख प्रदान करने वाली, और परम आदरणीय बताया। उसने सती का आदर न करने पर दक्ष को बहुत फटकारा। ऋभुओं ने उस समय तो शिवगणों को भगा दिया पर बाद में शिव के भयानक दूसरे गणों ने आकर दक्ष यज्ञ का विध्वंस कर दिया था। वह सती अपने अगले जन्म में पार्वती नाम से फिर से शिव की पत्नी बनी।

कुंडलिनी शक्ति सती, कार्यकारी मन ब्रह्मा, और भूतिया जीवात्मा शिव के रूप में दर्शाया गया है

अब उपरोक्त कथा का गूढ़ रहस्य समझते हैं। दरअसल कुंडलिनी ही देवी सती है। शिव शून्य आकाश की तरह है। दोनों साथ रहकर ही अपनी सत्ता प्राप्त करते हैं। अलग रहकर तो न होने के सदृश ही हैं। मतलब कि दोनों साथ रहते हैं। सती से ही शिव को चमक प्राप्त होती है। शिव से सती को स्थिरता या सनातनता या अजरता-अमरता, और सर्वव्यापकता प्राप्त होती है। अब यहाँ कुछ दार्शनिक पेंच हैं, जिन्हें अक्सर नजरन्दाज किया जाता है। आदमी बड़े-2 धार्मिक कार्य करता है, पर कुंडलिनी योग को नजरंदाज करता है। ऐसे लोग प्रजापति दक्ष की तरह हैं, जिन्हें उसकी तरह नरक में जाना पड़ता है। इस कथा में कुंडलिनी योग का महत्त्व छिपा हुआ है। भाईसाहब, अब कुंडलिनी क्या है, यही यक्ष प्रश्न हरेक पोस्ट में खड़ा हो जाता है। मन में तो अनगिनत चित्र हैं। अब किसे कुंडलिनी माना जाए। तो इसका यही उत्तर बनता है कि तांत्रिक यौनयोग या पंचमकारों वाले योग के समय जो मन में सबसे मजबूती व सहजता से उभरे, वही चित्र कुंडलिनी है। क्योंकि कुंडलिनी तभी बनती है न जब मन का कोई चित्र मूलाधार स्थित यौन शक्ति से जुड़ता है। वही चित्र कुंडलिनी चित्र है, मन का कोई सामान्य चित्र नहीं। कुंडलिनी की दूसरी पहचान यह है कि उसके साथ आदमी के अंदर शून्यता, और व्यापकता भी हावी हो जाती है। यही शिव या आत्मा है, जिसे भूतों का साथी कहा गया है। भूत मृत्यु को भी कहते हैं। शून्यता और व्यापकता मृत्यु का प्रमुख गुण है। इसीसे शिव या आत्मा भूतों का साथी हुआ। कुंडलिनी की तीसरी पहचान है कि यह एक शुद्ध मानसिक चित्र होता है। मतलब कि वह भौतिक रूप में उपलब्ध नहीं होता। भौतिक रूप में मिलने से वह चित्र कुंडलिनी रहता ही नहीं, क्योंकि भौतिक वस्तुओं में हजारों दोष दिखाई देते हैं। दोषों वाली चीज मन में कहाँ चमकी रह पाएगी। इसीलिए किसी देवता के या गुरु के मानसिक चित्र को कुंडलिनी बनाया जाता है। विशेष आदर बुद्धि होने के कारण गुरु के भौतिक रूप में भी दोष नहीं दिखाई देता। कुंडलिनी की चौथी पहचान यह है कि मन में अद्वैतमयी भाव पैदा होने पर केवल अकेला कुंडलिनी चित्र मन में तेजी से चमकने लगता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अद्वैत भाव शून्य आकाश जैसा ही होता है। मतलब यह शिव भाव होता है। वहाँ सती तो हर हाल में पहुंचेगी ही, क्योंकि वह शिव के आधे शरीर के रूप में जो है। अगर फिर भी आपको कुंडलिनी का पता न चले, तो मैं कुछ नहीं कर सकता। हाहाहा। शिवपुराण में भी वही लिखा है जो मैं पिछली पोस्टों में बोल रहा था कि कुंडलिनी ही आध्यात्मिक मुक्ति के साथ भौतिक तरक्की व भोग-विलास भी प्रदान करती है। मन से ही सारा संसार है। जो यह कहा गया है कि उससे ही सारी सृष्टि की उत्पत्ति होती है, वह सब मन में ही तो होता है। सारी सृष्टि इस फुटबॉल के जितने आकार वाले सिर के अंदर पसरे मन में ही तो है, बाहर कुछ भी नहीं है। और भाई मन का सर्वप्रमुख प्रतिनिधि होने के कारण कुंडलिनी को मन भी कह सकते हैं। तो हुई न कुंडलिनी से ही सारी सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय। दक्ष यहाँ कर्म में लगे हुए गौण मन का प्रतीक है। वह जगत में प्रसिद्धि व पुण्य प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ कर्म करता है। वह अनेक प्रकार के देवताओं का पूजन करता है। उससे अद्वैत भाव से मन में कुंडलिनी का उद्भव होता है। वही उसकी सबसे प्रिय पुत्री सती है। शिव उससे शादी करने की इच्छा करते हैं, मतलब वे कुंडलिनी को जागरण के लिए प्रेरित करते हैं। यह भी आता है कि शिव-सती की जोड़ी सनातन है, वे केवल लीला के लिए ही अलग होते रहते हैं, और शादी करते रहते हैं। तभी तो सती अगले जन्म में पार्वती बनकर फिर से शिव की पत्नी बनी। इसका मतलब साफ है कि जीव ईश्वर से अलग होता है, और उसी में विलीन भी हो जाता है। दक्ष शिव की इच्छा का सम्मान करते हुए सती का विवाह शिव से कर देते हैं, मतलब कुंडलिनी जागरण हो जाता है, दक्ष अर्थात गौण मन जिसका पूरा आनंद उठाता है। ब्रह्मा भी सती का विवाह शिव से कराने के लिए दक्ष को मनाते हैं। इसका मतलब है कि जो ब्रह्मा के रूप में मुख्य या मूल मन है, वह अपने अंदर सृष्टि को बढ़ा कर ज्यादा से ज्यादा बड़ा होना चाहता है। उसे पता है कि ईश्वर में मिलकर वह सबसे बड़ा हो जाएगा। इसलिए वह काम-काज में व्यस्त रहने वाले मन अर्थात दक्ष को कुंडलिनी जागरण के लिए प्रेरित करता है। ब्रह्मा यहाँ मूल मन का प्रतीक है। फिर दक्ष सती को यज्ञ में नहीं बुलाता। इसका मतलब है कि कुंडलिनी जागरण के बाद कार्यकारी मन कुंडलिनी योग नहीं करता और दुनिया के कामों में व्यस्त हो जाता है। मतलब साफ है कि यदि कुंडलिनी जागरण के बाद कुंडलिनी योग न किया, तब भी पतन सम्भव है। फिर जिसकी कुंडलिनी जागृत ही नहीं हुई, उसे तो क्यों नहीं करना चाहिए। दक्ष ने शिव को नहीं बुलाया, मतलब उसने अद्वैत भाव को धारण नहीं किया। सती दक्ष से मिलने अकेले गई, मतलब कुंडलिनी मन में बारबार आती है यह देखने कि उसका सम्मान है कि नहीं। शिव उसके साथ तभी आएंगे जब उसे सम्मान दिया जाएगा अर्थात कुंडलिनी से अद्वैत भाव को धारण करके शिव को भी सम्मान दिया जाएगा, मतलब कुंडलिनी योग से उसपर गौर किया जाएगा। हालांकि मन से तो शिव कुंडलिनी के साथ है ही। दक्ष ने कुंडलिनी का सम्मान नहीं किया, मतलब उसने कुंडलिनी योग नहीं किया। सती ने आत्मदाह किया, मतलब कुंडलिनी नष्ट हो गई। उसके साथ शिवगणों ने भी आत्महनन किया, मतलब दक्ष रूपी गौण मन से शिव के बहुत से गुण गायब हो गए। गणों को सुंदर विचार भी कह सकते हैं। वे कुंडलिनी के साथ रहते हैं, और शिव की सहायता से उत्पन्न होते हैं। बाकि बचे गणों ने यज्ञ पर हमला किया, मतलब भगवान के कोप से सांसारिक विघ्न आए। यज्ञ से उत्पन्न ऋभुओं ने गणों को भगाया, मतलब अच्छे कर्मों के पुण्यों से दक्ष का बचाव हुआ। बाद में शिव के महान गणों से ऋभु देव भी नहीं बचा सके, मतलब मृत्यु के समय दक्ष के अच्छे कर्म उसके काम नहीं आए, और कुंडलिनी न होने से शिव ने भी उसका साथ नहीं दिया। शिवगण ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया, मतलब दक्ष को मुक्ति के बिना ही मरना पड़ा। फिर शिव ने उसे बकरे का सिर लगाया जिससे वह  बैं-बैं या बम-बम की आवाज करता हुआ शिव की स्तुति करने लगा। मतलब कुंडलिनी के आंशिक प्रभाव से दक्ष का पुनर्जन्म एक शिवभक्त के रूप में हुआ जिससे शिव की भक्ति करता हुआ वह मुक्त हो गया। बकरे में अहंकार नहीं होता। वह भक्ति का प्रतीक है, क्योंकि वह अपने मालिक के लिए बैं-बैं की प्रेम की रट लगा रखता है। इसका मतलब है कि जो कुंडलिनी योग से कुंडलिनी को सम्मान नहीं देता, वह अगले जन्म में भक्त बनता है। भक्ति उसकी योग की कमी को पूरा करती है। जब बुढ़ापे, बाल्यावस्था व बीमारी की अवस्था में आदमी तांत्रिक कुंडलिनी योग नहीं कर सकता, उस समय भक्ति ही उसका सहारा होती है। भक्ति से वह अपने मन को लगातार इष्ट में लगा कर रखता है। मुझे प्रेम और सम्मान में कोई अंतर प्रतीत नहीं होता। प्रेम और सम्मान वास्तव में पर्यायवाची शब्दों की तरह है। प्रेम से ही असली सम्मान होता है। बिना प्रेम का सम्मान तो दिखावा या जबरदस्ती का सम्मान है। तभी पहाड़ी भाषा में एक कहावत है, “मूंड मेक रौ डाल नी कराऊँदि”। इसका मतलब है कि किसी का सिर मोड़कर उससे प्रणाम नहीं कराई जा सकती। जहां ज्ञान खत्म होता है, वहाँ भक्ति शुरु होती है। भगवान वेदव्यास ने 17 पुराण रच दिए थे। सारी सृष्टि का और ईश्वर का ज्ञान उसमें भर दिया था। पर उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। इसलिए उन्होंने भक्तिमय पुराण श्रीमद्भागवत की रचना की। फिर उनकी कुंडलिनी स्थिर हुई, जिससे उन्हें परम संतुष्टि मिली। पर सीधे भक्ति करना भी मुश्किल है। असली भक्ति ज्ञान के बाद ही होती है। जो लोग बचपन से ही प्रेमी स्वभाव के होते हैं, वे पिछले जन्म के कुंडलिनी योगी प्रतीत होते हैं। कुंडलिनी योग को आसन प्राणायाम वाले योग तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए। यह प्राकृतिक कारणों से स्वयं भी हो सकता है। कुंडलिनी के प्रति आदर बुद्धि रखने में तो कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये। वह एक मानसिक चित्र है, आध्यात्मिक चित्र है। उसमें भौतिकता का कोई नामोनिशान नहीँ। अशुद्धि तो भौतिक पदार्थों में ही सम्भव है। अशुद्धि भौतिक ही होती है। यह शारीरिक अपशिष्टों, घृणा, क्रोध,वासना आदि से बनी होती है। आकाश या शून्य में कोई भौतिक वस्तु है ही नहीं। इसीलिए कुंडलिनी चाहे किसी भी रंग-रूप में क्यों न हो, हर हालत में आदरणीय है। इसीलिए आध्यात्मिक व्यक्ति को ही ज्यादातर मामलों में गुरु बनाया जाता है, क्योंकि उनमें आकाश की तरह अशुद्धि या दोष नहीं होते। दोष स्वार्थ से पैदा होते हैं। आकाश को किसी चीज की जरूरत नहीं क्योंकि वह अविनाशी है, इसलिए उसमें दोष नहीं हैं। दूरदर्शन के चरित्र भी इसीलिए प्रिय व आदरणीय लगते हैं, क्योंकि वे भी आकाश की तरह ही शुद्ध हैं। मन में बने चित्र से ज्यादा कुछ नहीं हैं। उनके भौतिक रूप से हमें कोई मतलब नहीं होता। भौतिक रूप के साथ बहुत जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं। तभी तो कई लोग इन चरित्रों के इतने दीवाने हो जाते हैं कि उनके लिए पता नहीं क्या-क्या कर बैठते हैं। यदि वैसे लोग उन्हें कुंडलिनी बना कर साधना करे, तो सफलता क्यों न मिले।

प्रेम, आदर और समर्पण ही मानवता की रीढ़ है

प्रेम, आदर और समर्पण में भावना की मात्रा का ही फर्क है, वैसे तीनों समान हैं। प्रेम तो हम बच्चों के साथ भी करते हैं। विशिष्ट लोगों के लिए प्रेम के साथ आदर जुड़ने से वह और घना हो जाता है। अति विशिष्ट और दिल के सबसे नजदीक लोगों के लिए उसमें समर्पण भी जुड़ जाता है। इससे प्रेम सर्वोच्च कोटि का बन जाता है। कुंडलिनी ऐसे ही सर्वोच्च कोटि के प्रेम या समर्पण की भूखी होती है। हम जो औरों से अपने प्रति समर्पण की आकांक्षा करते हैं, वह कुंडलिनी के लिए ही करते हैं। मुझे बाहुबली फिल्म में बाहुबली के प्रति लोगों का उच्च कोटि का समर्पण दिखा था। महामानव या सुपरहीरो वाली फिल्में इसीलिए अच्छी लगती हैं क्योंकि उनमें समर्पण की घटनाओं से कुंडलिनी को बल मिलता है। इसी तरह मेरे क्षणिक जागरण के समय वहाँ उपस्थित लोग मुझे अपने प्रति समर्पित से लगे। उनकी वह समर्पण की भावना मेरी कुंडलिनी को लगी और वह जागृत हो गई। यदि मैं तांत्रिक कुंडलिनी योग न कर रहा होता, तो वह समर्पण कुंडलिनी के प्रति तो होता और उससे कुंडलिनी चमकती भी पर जागृत न होती। स्त्री प्रेम और प्रणय प्रेम कुंडलिनी को बढ़ाता है, क्योंकि उसमें समर्पण होता है। अगर तो प्रणय प्रेम तांत्रिक किस्म का हो, तब तो और अधिक कुंडलिनी को भड़काता है। इसीलिए शास्त्रों में समर्पण और प्रणय प्रेम से भरी कथाओं की भरमार है। भक्ति भी तो समर्पण ही है। तभी कहते हैं कि जहां ज्ञान हार जाता है, वहाँ भक्ति जीत जाती है। इसी समर्पण के लिए ही हिंदु शास्त्रों में प्रेम और शिष्टाचार का बहुत ज्यादा महत्त्व है। इसीलिए कुंडलिनी संस्कृति एक आदर्श मानवतापूर्ण संस्कृति है, क्योंकि इसमें प्रेम, आदर और समर्पण की भरमार होती है, जो मानवता के सर्वप्रमुख गुण हैं। प्राचीन आर्यन संस्कृति ऐसी ही आदर्श संस्कृति थी। आजकल की पीढ़ी के लोग इन्हें मजाक में लेते हैं। तभी तो एक वीडियो गेम की रिकॉर्डिंग वाले अदने से यू टयूब चैनल को भी कुछ ही महीनों में हजारों-लाखों फ़ॉलोअर मिल जाते हैं, और ज्ञान-विज्ञान से भरे इस कुंडलिनी ब्लॉग को तीन सालों में पांच सौ भी नहीं मिले हैं। मैं आत्मप्रशंसा नहीं कर रहा हूँ, और न ही फॉलोवर्स बढ़ाने की मंशा रखता हूँ, पर आज के समाज की दयनीय दशा की तस्वीर साझा कर रहा हूँ। मैं तो कुछ भी नहीं हूँ। मैं तो बस एक मामूली सा टैन सैकण्ड मैन या दशक्षण व्यक्ति हूँ, मतलब मेरे सारे आध्यात्मिक अनुभव दस सेकंड के लगभग ही रहे हैं। हाहाहा।

तंत्र योग से समर्पण की कमी पूरी की जा सकती है

हिंदु शास्त्रों में जो मांसाहार और मद्य का निषेध है, वह इसी समर्पण की भावना को बचाने के लिए है। बेचारे पालतू पशु आदमी के प्रति पूरी तरह से समर्पित होते हैं, पर आदमी ही उनका गला घोंटता है। यह समर्पण भाव का गला घोंटना ही तो है। इस हिसाब से इससे बढ़िया तो जंगल या झील का शिकार है। उससे समर्पण के साथ धोखा तो नहीं होगा। यह एक दार्शनिक जुगाली है, इसे ज्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। इसी तरह मद्यपान भी समर्पण को घटाता है, क्योंकि इससे आदमी अनजाने में ही दुर्व्यवहार कर बैठता है। यहाँ पँचमकारी तँत्रविज्ञान काम कर सकता है। तंत्र विज्ञान समर्पण भाव से ज्यादा अपेक्षा नहीं रखता। वह तो बलपूर्वक कुंडलिनी को वश में करके उसे जागृत कर लेता है। यह तो कुंडलिनी को बलात्कार से वश में करने की तरह ही है। हालाँकि कुछ जरूरत तो पड़ती ही है, जैसे मुझे पड़ी थी, जैसा मैंने ऊपर बताया। यदि समर्पण को बिल्कुल नजरन्दाज करना हो, तो तांत्रिक योग बहुत शक्तिशाली होना चाहिये। वैसे जब तन्त्रयोगी का शरीर दुर्बल हो जाता है और उससे उच्च कोटि का तंत्रयोग नहीं हो पाता, तब तो अन्ततः उसे समर्पण या भक्ति के आश्रित होना ही पड़ता है। यही यहाँ ज्ञान पर भक्ति की जीत है। हालाँकि उसे भक्ति भाव बहुत शीघ्रता से प्राप्त हो जाता है, पर फिर उसे अपना खान-पान और आचार-विचार सुधारना पड़ता है।

पूर्ण समर्पण ही कुंडलिनी जागरण के रूप में कुंडलिनी योग की पराकाष्ठा है

कुंडलिनी योग की शुरूआत कुंडलिनी से बलपूर्वक प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बनाने से होती है। धीरे-धीरे वह प्रेम आसान हो जाता है। फिर समय के साथ उसके साथ आदर भी जुड़ जाता है, और वह और ज्यादा मजबूत हो जाता है। लगातार कुंडलिनी योग करते हुए बहुत समय बीतने पर कुंडलिनी के प्रति प्रेम और आदर के साथ समर्पण भी जुड़ जाता है। फिर अंत में कुंडलिनी के प्रति समर्पण इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि योगी कुंडलिनी के साथ एकाकार हो जाता है। इसे ही समाधि या कुंडलिनी जागरण कहते हैं। तंत्रयोग से बेशक कुंडलिनी जागरण एक झटके में मिल जाता हो, पर बाद में कुंडलिनी जागरण को स्थायी बनाने के लिए उसे योगसाधना के इसी क्रम से गुजरना पड़ता है। इसलिए कुंडलिनी जागरण हुआ हो या न हुआ हो, कुंडलिनी योग सभी को करते रहना चाहिए। जिन्हें नहीं हुआ हो, उन्हें जल्दी सफलता मिलती है, क्योंकि उन्हें उसका अहंकार नहीं होता और नए अनुभव को प्राप्त करने का शौक भी होता है। दुबारा से एक ही अनुभव को प्राप्त करने में इतनी रुचि नहीं होती, जितनी नए अनुभव को प्राप्त करने में होती है।