कुंडलिनी योग के लिए दूरदर्शन फिल्म व सिनेमा मूवी देखना जरूरी है

दोस्तों, इंद्रियों के भ्रम को हम एक और उदाहरण से समझ सकते हैं। जब हम दूर रखे टेलीविजन की आवाज ब्लूटूथ इयरबड्स से सुनते हैं, तो हमें लगता है कि वह आवाज टेलीविजन में पैदा हो रही है, जबकि वह हमारे कानों में पैदा हो रही होती है। हम टेलीविजन के जिस दृष्य के प्रति जितना ज्यादा आसक्त होते हैं, वह दृष्य हमें उतना ही ज्यादा टेलीविजन के अंदर महसूस करते हैं। जब हम अनासक्त होकर देखने लगते हैं या ऊब जाते हैं, या कान थक जाते हैं, तो वह आवाज हमें अपने कानों के अंदर महसूस होती है। मतलब कानों में पैदा हो रही आवाजों ने और आंखों में बन रहे चित्रों ने मिलकर टेलीविजन में दिख रहे दृष्यों में स्थित पंचमहाभूतों का निर्माण कर दिया था। जब हम ऊब गए या थक गए तो टीवी के नजारों पर ज्यादा ध्यान नहीं गया, जिससे सिर्फ आवाजें और चित्र ही बचे रहे, जैसे मानो पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। जब कान में बन रही आवाजों और आँखों में बन रहे चित्रों से भी ऊब गए तो उन पर भी ध्यान नहीं जाने लगा। कान और आंख थके हुए थे, इसलिए उनकी थकान महसूस हो रही थी। या कह लो नींद आ गई या टीवी को बंद कर दिया। इससे तन्मात्राएं भी नहीं रहीं, और बस कान और आँखें ही रही। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। जागने के बाद इंद्रियां तरोताजा हो गईं पर उनमें वे आवाजें और दृष्य नहीं रहे। इंद्रियों में एकदम से काम शुरु करने की शक्ति नहीं रही, क्योंकि वे अभी भी अपनी क्षतिपूर्ति ही कर रही थीं। इंद्रियां शांत होने से प्राणवायु अच्छे से चलने लगी। जिस समय इंद्रियां टीवी देखने में व्यस्त थीं, उस समय सांसों से ध्यान हट कर टीवी पर लगा हुआ था। आपने देखा भी होगा कि जब हम टीवी पर मनोरंजक कार्यक्रम देख रहे होते हैं, उस समय सांसें अटक सी जाते हैं। अगर उस समय हम सांसों पर ध्यान देते हुए लंबी लंबी और नियमित सांस लेने की कोशिश करें तो टीवी देखने का मजा ही नहीं आता और उसे बंद करने का मन करता है। इससे अंतर्मुखी बनने के लिए सांसों और प्राणायाम का महत्त्व खुद ही सिद्ध हो जाता है। इससे यह संदेश भी मिलता है कि जब इंद्रियां थकी हुई हों, तो प्राणायाम कर लेना चाहिए। इससे इंद्रियों को भी सुकून मिलता है, और मन के क्रियाशील होने से जीवन में आनंद और प्रकाश भी बना रहता है। हां, तो इंद्रियां शांत होने से जो उनसे संवेदनाओं की अनुभूतियां हो रही थीं, वे प्राण में विलीन हो गईं। प्राण सांस ही है और उसमें वे अनुभूतियां ज्यादा समय तक नहीं रह सकतीं। प्राण एक प्रकार से संवेदनाओं को इंद्रियों से लेकर मन तक पहुंचाता है। यह उन अनुभूतियों को महसूस नहीं करता। इसे हम डाकिए की तरह समझ सकते हैं, जो चिट्ठियां इधर से उधर ले जाता है, पर खुद चिट्ठियां नहीं पढ़ता। प्राणों से मन हरकत में आ जाता है। उसमें इंद्रियों द्वारा महसूस की गई संवेदनाएं उमड़ने लगती हैं, हालांकि अब मन के रूप में, क्योंकि अब उन संवेदनाओं के निर्माण में सहायक टीवी के दृष्य तो नहीं रहे। यह एक प्रकार से याद आने की तरह ही है। फिर उन अनुभूतियों के साथ मन में अन्य विविध विचार भी उमड़ने लगते हैं। यह प्राणों का मन में विलीन होना है। फिर कुछ समय तक ऐसे विचारों की स्वप्निल दुनिया में खोने के बाद आदमी को होश आता है कि कुछ दुनियादारी के काम भी करने चाहिए। मतलब बुद्धि क्रियाशील हो जाती है। मन नष्ट नहीं होता पर बुद्धि के रूप में रूपांतरित होने लगता है या बुद्धि में विलीन होने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसी तरीके से काम करने लगेगी, जैसा उसका मन था। तभी तो कहते हैं कि अगर मन को अच्छा रखेंगे, तभी काम भी अच्छे होंगे। आजकल के बच्चे जो रातदिन भरपूर और भयानक हिंसा से भरी वीडियो गेमों को देखते और खेलते रहते हैं, वे आगे चलकर कैसे अच्छे काम कर पाएंगे। उन्हें यह पोस्ट जरूर पढ़ानी और समझानी चाहिए। अच्छी बुद्धि से वह कुछ दिनों तक अच्छी दुनियादारी निभाता है, और अच्छी तरक्की भी करता है। फिर वह थक सा जाता है, और दुनियादारी से ऊब सा भी जाता है। इससे उसकी बुद्धि शांत होने लगती है, जिससे उसकी आत्मा के अंदर अंधेरा सा बढ़ने लगता है। मतलब उसकी बुद्धि उसके अहंकार के रूप में रूपांतरित हो जाती है। फिर कोई कुंडलिनी योगी अगर चाहे तो इसके आगे आत्मा को प्राप्त कर सकता है। पर आम आदमी यहां से वापिस लौट आता है। थोड़े दिन अहंकार के अंधेरे में आराम से बिताने के बाद दुनियादारी में लौट आता है, और बुद्धि के सहयोग से पुनः अपनी पैठ जमाता है। फिर कुछ तरक्की करके सैकड़ों इच्छाएं पालकर मन की शरण में पहुंचता है। मतलब बुद्धि मन में विलीन हो जाती है। फिर मन के उकसावे में आकर मूवी देखने सिनेमा थिएटर चला जाता है। वह वैसी ही मूवी देखना पसंद करेगा जैसी उसकी बुद्धि और दुनियादारी थी, क्योंकि बुद्धि ही मन के रूप में बन कर सामने आई। सिनेमा हॉल घर से जितना दूर होता है, उतना ही मजा आता है, क्योंकि मन को प्राणों के रूप में रूपांतरित होने के लिए भी समय चाहिए होता है। सिनेमा जाने के रास्ते में उसकी बड़ी अच्छी, लंबी, नियमित और आनंददायी सांसें चलती हैं, क्योंकि मन की सिनेमा देखने की इच्छा खत्म हो रही होती है मतलब मन खत्म हो रहा होता है, और उसकी शक्ति प्राणों को मिल रही होती है। फिर भी मन की सूक्ष्म सोच प्राणों में भी कायम रहती है, क्योंकि कारण कभी नष्ट नहीं होता, पर कार्य के रूप में मौजूद रहता है। मूवी देखना शुरु करते ही उसकी सांसें थम सी जाती हैं, और वह अपनी आंखों और अपने कानों में मधुर संवेदनाओं का आनंद लेने लगता है। मतलब उसके प्राण इंद्रियों में रूपांतरित हो जाते हैं। जब तक पर्दे पर विज्ञापन चलते हैं, तब तक वह उन दृष्यों का गहराई से अवलोकन नहीं करता। मतलब उसे संवेदनाएं आंखों और कानों में ही महसूस हो रही होती हैं, कहीं बाहर से आती हुई प्रतीत नहीं होतीं। यह इंद्रियों की अभिव्यक्ति की अवस्था ही होती है। थोड़ी देर बाद जब मूवी शुरु होने के बाद उसे मूवी कुछ समझ में आने लगती है, तो उसे वे अनुभूतियां सिनेमा के पर्दे से मिलती हुई महसूस होती हैं। मतलब उसकी इंद्रियां तन्मात्राओं में विलीन हो जाती हैं। बाद में फिल्म में गहरे डूबने पर उसे पर्दे पर दिख रहे पहाड़, महल आदि असली लगने लगते हैं। मतलब तन्मात्राएं पंचमहाभूतों के रूप में प्रकट हो जाती हैं। मतलब उसकी सृष्टि की रचना पूर्ण हो गई।

अब फिल्म खत्म होती है। सारे दृष्य खत्म। मतलब उसके व्यक्तिगत सूक्ष्म ब्रह्मांड की प्रलय शुरु हो जाती है। पर्दे पर विज्ञापन आने लगते हैं। अब उसे उन विज्ञापनों में दिखाए गए पहाड़ और महल असली नहीं लगते, क्योंकि वह उन्हें ध्यान से नहीं देखता। उसे बस आंख से कुछ दिख रहा होता है और कान से सुनाई दे रहा होता है। आदमी को उन्हें थोड़ी देर देखना अच्छा लगता है। क्योंकि सभी को स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर क्रमवार आना और जाना जाना अच्छा लगता है। मतलब पंचमहाभूत तन्मात्राओं में विलीन हो गए। फिर आदमी थोड़ी देर बाद उन संवेदनाओं को अपनी इन्द्रियों में ही महसूस करने लगता है, बाहर नहीं। उससे भी ऊबकर और अपनी आंखों और अपने कानों की थकान को महसूस करते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकलता है। मतलब तन्मात्राएं इंद्रियों में विलीन हो गईं। वह थोड़ा चायपानी करके तरोताजा होता है। फिर उसकी सांसें अच्छी, गहरी और नियमित चलने लगती हैं। जब आंखों और कानों को मलने से उन पर ध्यान जाता है, तो उन्हें शक्ति देने के लिए सांस खुद ही चलने लगती है। हालांकि उससे वे तरोताजा ही हो सकती हैं, पुनः काम नहीं कर सकती। क्योंकि वे इतना ज्यादा काम करने के बाद अपनी क्षतिपूर्ति कर रही होती हैं। फिर सांसों की अतिरिक्त शक्ति मन को लगती है। मतलब इंद्रियां प्राण में विलीन हो गईं और प्राण मन में। फिर प्राण या सांस की शक्ति से मन भागने लगता है। मन को भगा कर सांस फिर उथली और अनियमित हो जाती है। मतलब प्राण मन में रूपांतरित हो गया। उस मन की चहलपहल से प्रेरित होकर वह शोपिंग माल में घुस जाता है। वहां विभिन्न चीजों की गुणवत्ता और उनका मोलभाव जांचते हुए उसकी बुद्धि क्रियाशील हो जाती है और मन सुस्त पड़ जाता है। मतलब मन बुद्धि में रूपांतरित हो गया। बुद्धि के भी थकने से जब उसकी आत्मा में अहंकार का अंधेरा काफी बढ़ने लगता है, तब वह परिवारसहित गाड़ी में बैठकर घर को चल देता है। मतलब बुद्धि अहंकार में रूपांतरित हो गई। उस अहंकार में उसके पूरे दिवस के क्रियाकलापों का खाका सूक्ष्म रूप में दर्ज हो जाता है। घर आकर वह तांत्रिक कुंडलिनी योग से आत्मा के अंधकार को कुंडलिनी ध्यान से रौशन कर देता है। मतलब अहंकार आत्मा में विलीन हो जाता है। बेशक पूर्ण आत्मा न सही, उसका कुछ अंश ही सही। अगले दिन फिर उसे न चाहते हुए भी आत्मा से क्रमवार नीचे गिरना पड़ता है, ताकि वह पुनः दुनियादारी को अच्छे से निभा सके। यह सिलसिला ऐसे ही चक्रवत चलता रहता है। यह सभी किस्म की अनुभूतियों, सभी किस्म के क्रियाकलापों, सभी किस्म की सांसारिकताओं, सभी किस्म के लोगों, सभी इंद्रियों और सभी किस्म के शरीरों के साथ ऐसा ही होता है। यह एक सामान्य सिद्धांत है। शास्त्रों में ऐसे अनेकों सिद्धांत बड़ी सूक्ष्मता व गहराई से वर्णित किए गए हैं, जहां तक मुझे लगता है आज भी आधुनिक मनोविज्ञान नहीं पहुंच सका है। उपरोक्त चलचित्र या दूरदर्शन वाला उदाहरण तो समझाने के लिए एक छोटा सा बिंदु है। आदमी जो कुछ भी करता है, उसे अपने स्वभाव अर्थात अहंकार के वशीभूत होकर ही करता है, बेशक उसे लगे कि वह स्वतंत्रता से करता है। यही अहंकार है, यही स्वभाव है, यही अवचेतन मन है, यही संस्कार है। यह सब शब्दों का खेल है। चीज एक ही है। जिसने अहंकार को नहीं जीता है, वह हमेशा उसी के वश में रहता है। पूर्ण स्वतंत्रता तो केवल योगी को ही प्राप्त होती है।

कुंडलिनी योग से मृत्यु, प्रलय, जन्म और सृष्टि का रहस्योद्घाटन

दोस्तों! आध्यात्मिक शास्त्र उच्च कोटि के ज्ञान से भरे पड़े हैं। अगर उनके साथ अनुभव का तड़का भी लग जाए तो बात कुछ और ही हो जाती है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम सभी दुनियादारी में उलझे हुए आदमी हैं। हमारा अनुभव इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता कि वह स्वतंत्र रूप से पारलौकिक तथ्यों को सिद्ध कर सके। हां, अगर हमारा अनुभव शास्त्रों के प्रामाणिक तथ्यों जैसा है, तब हमारा अनुभव प्रामाणिक माना जा सकता है। मैं भी अपने ऐसे ही एक छोटे से अनुभव को इस पोस्ट के अंत में साझा करूंगा।

शास्त्रों में प्रलय-काल की प्रकृति को साम्यावस्था की स्थिति के तौर पर बताया गया है। मतलब इसमें इसके तीनों गुण अपने-अपने एक समान स्तर पर बने रहते हैं। बदलते नहीं हैं।ऐसा जरूरी नहीं कि जितना सतोगुण है, उतना ही रजोगुण है और उतना ही तमोगुण है। बल्कि इसका यह मतलब है कि बेशक सब की भिन्न-भिन्न मात्रा है पर हरेक गुण अपनी विशिष्ट मात्रा पर एक समान बना रहता है। वह कम या ज्यादा नहीं होता। उदाहरण के तौर पर अगर सतोगुण का अनुपात 1 है तो एक ही रहेगा। तमोगुण का 5 है तो 5 ही रहेगा और रजोगुण का तीन है तो तीन ही रहेगा। अगर तीनों गुण एकदूसरे के बराबर हुआ करते तो विभिन्न सृष्टियों में विभिन्नता न हुआ करती, बल्कि सभी सृष्टियां बिल्कुल एक समान हुआ करतीं। इसी के साथ, सभी आदमी भी एक जैसे हुआ करते, उनमें भी कोई विभिन्नता न हुआ करती। और तो और, फिर तो सभी दिवंगत आत्माएं भी एकजैसी हुआ करतीं। पर ऐसा तो संभव नहीं है, क्योंकि सृष्टि में विभिन्नता हरेक स्तर पर दिखाई देती है। कुछ आत्माएं पवित्र होती हैं, जो हर तरह से भला करती हैं। पर कुछ आत्माएं पापपूर्ण भी होती हैं, जो नुकसान करने से जरा भी नहीं हिचकतीं। बेशक शरीर न होने के कारण दिवंगत आत्माएं जानबूझ कर भला या बुरा नहीं कर सकतीं, पर उनके सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र से खुद ही भला या बुरा होता है। शायद इसे ही शास्त्रों में प्रेत योनि कहा है। मतलब है तो यह दिवंगत और शरीररहित आत्मा ही, पर बहुत लंबे समय तक इसे शरीर न मिलने के कारण इसे मनुष्य योनि की तरह ही एक स्थायी योनि मान लिया गया हो। बेशक यह सूक्ष्म योनि है। उदाहरण के लिए, कई भयानक सड़क दुर्घटना के स्थानों पर बारबार दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इसके लिए वहां भटकी हुई या बिना गति लगी हुई या बिना स्थूल योनि को प्राप्त हुई बुरी प्रेतात्मा को जिम्मेदार मानकर वहां भगवान हनुमान आदि देवता के मंदिर या मूर्ति को प्रतिष्ठित किया जाता है। कहते हैं कि उससे दुर्घटनाओं का सिलसिला रुक जाता है। शायद देवता से पैदा सकारात्मक ऊर्जा बुरी प्रेतात्मा की नकारात्मक ऊर्जा को निष्प्रभावी कर देती है। शायद बहुत उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा को ही देव योनि कहा जाता हो।

दोबारा सृष्टि-निर्माण से कुछ नहीं बदलता। सिर्फ प्रकृति में पहले से विद्यमान गुणों में क्षोभ पैदा होता है। मतलब कभी सतोगुण अपने आधारभूत स्तर से एकदम से बढ़ जाता है, तो कभी तमोगुण तो कभी रजोगुण। इस तरह से हर-एक गुण का स्तर लगातार बदलता रहता है। जो आदमी ज्यादा क्रियाशील है, उसमें ज्यादा जल्दी से बदलता रहता है। जो कम क्रियाशील है, उसमें कम रफ्तार से बदलता रहता है। आप सोचेंगे कि मैं यहां प्रकृति से आदमी के ऊपर क्यों आ गया। वास्तव में प्रकृति का अनुमान आदमी से ही लगाया गया है। सीधे तौर पर तो कोई भी समष्टि मतलब सर्वव्यापक प्रकृति को अनुभव नहीं कर सकता है। पर व्यष्टि अर्थात सीमित प्रकृति के रूप में स्थित आदमी के जन्म-मरण को जरूर अनुभव किया जा सकता है। योगियों ने इसे अनुभव किया है, जिसके आधार पर ही भारतीय दर्शन और शास्त्र बने हैं।

मरने के बाद आदमी के तीनों गुण अपने-अपने औसत स्तर पर आ जाते हैं और फिर बदलते नहीं। गुणों में क्षोभ पैदा करने के लिए शरीर चाहिए। वह मरने के बाद होता नहीं। जीवित अवस्था में मन के सुंदर विचारों से सतोगुण बढ़ता है। मन की ज्यादा क्रियाशीलता से रजोगुण बढ़ता है, और अकेलेपन या अवसाद जैसी अवस्था में तमोगुण बढ़ता है। ये सारे गुण रहते तो मरने के बाद भी हैं, पर बदलते नहीं हैं। मतलब आदमी कभी नहीं मरता। हमें आदमी मरा हुआ इसलिए लगता है क्योंकि हम गुणों के तूफान में उलझे होते हैं। इससे हमें गुणों की सूक्ष्म अवस्था नजर नहीं आती। यह ऐसे ही है, जैसे चकाचौंध रोशनी के बाद सामान्य अंधेरा भी घुप्प अंधेरा लगता है। हां, जब कुंडलिनी योग से गुणों का तूफान कुछ शांत हो जाता है, तब दिवंगत आत्मा से साक्षात्कार की संभावना बढ़ जाती है। अब आप पूछेंगे कि मरने के बाद गुणों की वह आधारभूत अवस्था कैसे निर्धारित होती है। वास्तव में वह आदमी के पिछले सभी जन्मों के गुणों का औसत होती है। मतलब अगर कोई ज्यादा सतोगुण में रहा है तो आधारभूत सत्त्वगुण ज्यादा रहता है। क्योंकि सतोगुण पुण्य कर्म से बनता है, मतलब उसमें उसके सभी अच्छे कर्मों का लेखा जोखा भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान होता है। जिसके रजोगुण का औसत ज्यादा होगा, उसके कर्म उद्यमशीलता और व्यापार आदि के ज्यादा रहेंगे। ज्यादा तमोगुण का मतलब ज्यादा पाप कर्मों का संचय। मतलब कि गुणों के रूप में सभी कर्म अपनी आधारभूत अवस्था में रहते हैं। हो सकता है कि यह व्यवस्था इतनी निपुण हो कि औसत की बजाय हर एक कर्म अलग-अलग गुण के रूप में पृथक रूप में मौजूद हो। इसकी और शास्त्र यह इशारा करते हुए लिखते हैं कि हर-एक कर्म का फल उस कर्म के अनुसार मिलकर ही रहता है।

खैर मुझे जो पवित्र दिवंगत आत्मा का अनुभव हुआ था, उसमें तो मुझे गुणों की समान और औसत अवस्था ही महसूस हुई थी। मतलब कि आत्मा एक अंधेरे आकाश की तरह महसूस हो रही थी। पर उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व नजर आ रहा था, जिस आदमी की वह दिवंगत आत्मा थी। मतलब वह मुझे मरा हुआ ही नहीं लग रहा था, बल्कि जीवित से भी ज्यादा जीवित लग रहा था। वह व्यक्ति जीवित अवस्था से भी ज्यादा नजर आ रहा था। मतलब उस आत्मा में उसके पिछले जन्मों की छाप भी थी। मतलब वह प्रलय-काल की साम्य-अवस्था वाली प्रकृति ही थी, जिसमें कोई क्षोभ पैदा नहीं हो रहा था। इस आत्मा के अनुभव का वर्णन मैंने इस ब्लॉग की कुछ पुरानी पोस्टों में विस्तार से किया है। अब आप ही बताओ कि समुद्र के निश्चल जल में और उसी जल की लहरों में क्या अंतर है, कुछ भी नहीं? इसी तरह से शरीर-स्थित आत्मा में और दिवंगत आत्मा में भी कोई अंतर नहीं है। जब गुणों और कर्मों के संयोग से उस दिवंगत आत्मा को पुनः नया शरीर मिलता है, तो फिर से उसके गुणों में क्षोभ शुरु हो जाता है, जिसे हम पुनः नई सृष्टि का आरंभ कहते हैं।

मुझे लगता है कि किसी आत्मा के साक्षत्कार के लिए उस आत्मा की इच्छा भी होनी चाहिए मिलने की और उस मिलन को कुछ निर्णायक क्षणों तक झेलने के लिए और आत्मा से बात करने के लिए आदमी में पर्याप्त मानसिक शक्ति भी होनी चाहिए। यह एग्रेसिव तांत्रिक कुंडलिनी योग से ही संभव लगता है, साधारण से नहीं। साथ में, अपना शरीर न होने के कारण आत्मा तो कोई इच्छा जाहिर नहीं कर सकती। मतलब कि आत्मा में वह इच्छा उसकी शरीरयुक्त जीवित अवस्था में होनी चाहिए, खासकर उसके मरते समय। इसी को अंतिम इच्छा कहते हैं। इसीलिए इसको बहुत महत्त्व दिया जाता है। उसे पूरा किया जाता है और मरणासन्न व्यक्ति को उसे पूरा करने का वचन दिया जाता है, ताकि उसकी आत्मा उस इच्छा की वजह से भटके न। ये गुत्थियां धीरे-धीरे सुलझती हैं, एकदम से नहीं। मैं भी सपरिवार उन व्यक्ति से मिलने उनकी मरणासन्न अवस्था में थोड़ा देर से पहुंचा था। वे मुझसे बात करना चाहते थे, पर बोल नहीं पा रहे थे। सिर्फ छोटी सी चीख ही उनके मुंह से निकलती थी और वे फिर बेहोश से हो जाते थे। देख तो वे सकते ही नहीं थे। शायद वे कुछ सुन और समझ पा रहे थे, पर देख व बोल नहीं पा रहे थे। उसके दो तीन घंटे बाद ही उनकी आत्मा मुक्त गगन को प्रस्थान कर गई थी। अध्यात्म में बहुत कुछ है। यह तो आइसबर्ग का सिर्फ टिप मात्र है।

कुंडलिनीयोग डार्क मैटर को डार्क एनर्जी में बदलता है

दोस्तो, पिछली पोस्ट में बात हो रही थी कि डार्क एनर्जी मुक्त होने के लिए बाहर भागती है, और डार्क मैटर बंधन में पड़ने के लिए अंदर को सिमटता है। इसलिए योग करना चाहिए ताकि डार्क एनर्जी का अंश मन में ज्यादा बना रहे, और आदमी की मुक्ति की संभावना ज्यादा बनी रहे, अंधेरे को पूरी तरह से तो खत्म नहीं किया जा सकता। साथ में कुल मिलाकर यह निष्कर्ष भी निकलता है कि ब्रह्मांड के अनगिनत ब्लैकहोल धरती के अनगिनत जीवों की तरह हैं। जैसे हरेक जीव के अंदर एक भरापूरा सूक्ष्म ब्रह्मांड है, उसी तरह हरेक ब्लैकहोल के अंदर एक भरापूरा स्थूल ब्रह्मांड है। इस तरह एक ही अनंत आकाश में अनगिनत ब्रह्मांड हैं। जैसे विभिन्न जीवों के मस्तिष्क के भीतर अलग अलग आकार व प्रकार के सूक्ष्म ब्रह्मांड हैं, इसी तरह अलग अलग ब्लैकहोलों के अंदर अलग अलग आकार व प्रकार के स्थूल अर्थात भौतिक ब्रह्मांड हैं।
ब्लैकहोल अपने अंधेरे से ऊब कर बाहर के चमकीले पिंडों को खाने लगता है, ताकि उसके अंदर की चमक बढ़ सके। पर क्षणिक चमक के बाद वह पिंड उसके अंधेरे में प्रविष्ट होकर उस अंधेरे को बढ़ाते ही हैं। कभी लंबे समय तक ब्लैकहोल को कुछ खाने को न मिले, तो वह सूक्ष्मरूप हॉकिंस रेडिएशनस को धीरे धीरे छोड़ते हुए मूल आकाश में विलीन होकर मुक्त भी हो जाता है।

जीव या आदमी भी तो इसी तरह का व्यवहार करता है। वह अपने मन के अंधेरे को कम करने के लिए विभिन्न इंद्रियों के माध्यम से बाहर की दुनिया को ग्रहण करता है। आंखों से दृष्य रूप में, कानों से श्रव्य रूप में, जीभ से स्वाद रूप में, व जननेन्द्रिय से संभोग रूप में दुनिया को ग्रहण करता है। थोड़ी देर तो उसे आनंद के साथ प्रकाश महसूस होता है, पर वह दुनिया भी उसके अंतर्मन के घनघोर अंधेरे में विलीन होकर उसे बढ़ाने का ही काम करती है। शास्त्रों में भी तो यही बारबार कहा गया है कि आदमी जितना भी प्रयास भौतिक सुख प्राप्त करने के लिए करता है, वह उतना ही दुखी होता जाता है। फिर कभी वह दुनियादारी की मोहमाया से बचकर योगाभ्यास करता है। इससे उसके मन का कचरा बाहर निकलता रहता है, जिससे वह कभी काफी साफ होकर मुक्त भी हो ही जाता है।

हो सकता है कि हमारा ब्रह्मांड किसी दूसरे बहुत बड़े ब्रह्मांड के अंदर बहुत बड़े ब्लैकहोल के अंदर बना हो। हमारे ब्रह्मांड में भी जितने ब्लैकहोल हैं, उनमें भी उनके अपने आकार और निगले गए पदार्थों के अनुरूप अलग अलग आकार प्रकार के ब्रह्मांड हैं ही। उनके अंदर भी जो ब्लैकहोल हैं, उनमें भी अलग ब्रह्मांड हैं। इस तरह यह परंपरा बहुत सूक्ष्म आकार के ब्लैकहोल और सूक्ष्म ब्रह्मांड तक जा सकती है, या हो सकता है कि यह परंपरा कहीं खत्म ही न होती हो। पर ब्लैकहोल बनने के लिए तारे का निश्चित द्रव्यमान होना चाहिए। हो सकता है कि दूसरे ब्रह्मांड में वह सीमा और हो या छोटी हो। हमारे ब्रह्मांड की सीमा ब्लैकहोल की बाउंड्री है, इसके बाहर हम नहीं देख सकते क्योंकि उसके बाहर से जो प्रकाश की किरण आती है वह फ्रीली नहीं आती बल्कि ब्लैकहोल की ग्रेविटी के आकर्षण से आती है, इसलिए वह ऐसी अदृश्य तरंग के रूप मे हो सकती है जिसे अभी तक देखा न गया हो। या वह तरंग के रूप में न होकर इंडिविजुअल व वर्चुअल फोटोन कणों के रूप में हो। सबसे बड़ी वजह तो दूरी की लगती है। ब्रह्मांड की सीमा बहुत दूर है। वहां से हम तक आतेआते प्रकाश किरण इतनी क्षीण हो जाती होगी कि पकड़ में ही न आए। इसके विपरीत, ऐसा लगता है कि हम न तो ब्लैकहोल से बाहर जा सकते हैं और न ही इसके बाहर से कुछ प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि यह पहले से ही अनंत आकाश है और अनंत का कभी अंत नहीं होता है। इससे ऐसा भी लगता है कि ब्रह्मांड में पदार्थों की मात्रा सीमित व निर्धारित है। वही बारंबार चक्रवत प्रकट व अप्रकट होती रहती है। ऐसा भी हो सकता है कि जब ब्लैकहोल में ब्रह्मांड बनने लग जाए, तब वह अपनी ग्रेविटी छोड़ देता हो या कम कर देता हो, क्योंकि तब उसमें बिगबैंग से ब्रह्मांड बाहर की तरफ़ फैल रहा होता है। ग्रेविटी वैसी ही रहे, तब भी उसका प्रभाव नहीं दिखेगा, क्योंकि बिगबैंग का धक्का भी बाहर की तरफ लग रहा होगा। यह शायद तब होगा जब ब्लैक होल का डार्क मैटर डार्क एनर्जी में रूपांतरित हो जाएगा। यही डार्क एनर्जी बिगबैंग के बाद सभी पदार्थों और पिंडों को एकदूसरे से दूर धकेलती रहती है, जिससे ब्रह्मांड गुब्बारे की तरफ फूलता रहता है। आदमी में भी तो ऐसा ही घटित होता है। जब वह दुनियादारी से थक जाता है, तो सारी दुनिया को अपने मन के अंधेरे में समेट लेता है। कुछ समय के लिए वैसा ही रहता है। फिर किसी कारणवश योग की तरफ मुड़ता है। योग से उसके मन का अंधेरा कम हो जाता है, या हल्का पड़ जाता है। उसे मन में खाली खाली सा महसूस होता है। उससे प्रेरित होकर वह फिर से अपने मन की दुनिया को बढ़ाने में लग जाता है। ब्लैकहोल से शायद हॉकिंस रेडिएशन बाहर निकलने से या अन्य किसी निकासी से उसका डार्क मैटर हल्का होकर डार्क एनर्जी में बदल जाता है। फिर उसके अंदर बिगबैंग और ब्रह्मांड का विस्तार शुरु हो जाता है।

आदमी ब्लैकहोल से बहुत ज्यादा समानता रखता है। जो आदमी जितनी ज्यादा सूचनाओं से भरा होता है, उससे उसके मरने के बाद उतना ही बड़ा ब्लैकहोल बनता है। उससे फिर वे सूचनाएं प्रकट हो जाती हैं उसके पुनर्जन्म के रूप में। मुझे लगता है कि मरने के बाद उसके पुराने जीवन को समेट कर रखने वाला डार्क मैटर कुछ समय वैसा ही रहता है। फिर समय की चाल से वह डार्क एनर्जी में तब्दील हो जाता है। वह उसकी मानसिक दुनिया को बढ़ाना चाहती है, पर उसके लिए पहले किसी जीव के शरीर में जन्म लेना जरूरी होता है। इसे नए सूक्ष्म ब्रह्मांड का निर्माण कह सकते हैं। आगे जाकर वह किसी अन्य मनुष्य जीवन का निर्माण भी करता है, किसीको रोजगार देकर, या किसीको शिक्षा देकर। कोई अपने पुत्र के रूप में नए मनुष्य का निमार्ण करता है। मतलब वह आगे भी ब्लैकहोल बनाता है, कोई आदमी कम संख्या में बनाता है, तो कोई ज्यादा। वह पुत्र ब्लैकहोल सूचना के मामले में उससे छोटा ही कहा जाएगा। एक प्रकार से एक सूक्ष्म ब्रह्मांड अपने अंदर के ब्लैकहोल से पुत्र या अन्य आश्रित के रूप में एक नया ब्लैकहोल पैदा करता है। वह भी फिर उस परंपरा को आगे बढ़ाता है। मन में जो सूचनाएं दबी पड़ी हैं, वही ब्लैकहोल है। मतलब अवचेतन मन ही ब्लैकहोल है। वह कभी नहीं रजता। वह ब्लैकहोल की तरह सभी सूचनाओं को खाता रहता है। उसमें आदमी के अनगिनत जन्मों से लेकर अनगिनत सूचनाएं दबी होती हैं। और कहें तो ब्लैकहोल भी बिल्कुल स्थिर नहीं हैं, बल्कि अन्य आकाशीय पिंडों की तरह अंतरिक्ष में चलायमान प्रतीत होते हैं। मतलब उनके चलने से उनके अंदर समाया अनंत अंतरिक्ष भी चलता रहता है। पर इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि जब जीव चलते हैं, उस समय भी तो उनके अंदर समाया हुआ अनंत अंतरिक्ष चल रहा होता है।

कुंडलिनीयोग का संकल्पपुरुष ब्लैकहोल के अन्दर ब्रह्मांड की उत्पत्ति की पुष्टि करता है

अनंताकाश का गड्ढा भी तो वही अनंताकाश हुआ न। उसे दूसरा अनंताकाश कैसे कह सकते हैं। चादर में बना गड्ढा भी उसी चादर से बना है, उसे दूसरी चादर थोड़ी न कहेंगे। सीमित चादर तो सीमित गड्ढा ही बना सकती है। असीमित आकाश में असीमित गड्ढा क्यों नहीं बन सकता। जब छोटे, बड़े द्रव्यमान वाले पिंड आकाश में छोटे, बड़े गड्ढे बना सकते हैं, तो अनंत द्रव्यमान का पिंड अनंत आकाश में अनंत आकार वाला गड्ढा भी बना सकता है। क्योंकि तारे के सिकुड़ने से बनी सिंगुलरिटी का आकार अनंत छोटा है, इसलिए उसका द्रव्यमान भी अनंत ज्यादा है। इसीलिए उससे अंतरिक्ष में अनंत आकार का गड्ढा मतलब ब्लैकहोल बनता है। ब्लैकहोल इसीलिए तो गड्ढा है। मतलब बेशक मूल आकाश में ही है, पर खाली है, अर्थात उसकी सृष्टि से अछूता है। ॐ के आकार को अनंत छोटा कैसे मानेंगे। माना कि अनंत बड़ा आकार तो शून्य आकाश है। पर अनंत छोटा आकार भी तो शून्य आकाश ही है। दोनों के अभासिक अनुभव में अंतर हो सकता है, जैसे पहले वाला परम प्रकाश परमात्मा है, तो बाद वाला परम अंधकार जीवात्मा। मतलब एक मृत तारे से नए आकाश का निर्माण हो गया। इसीलिए तो ब्लैकहोल का आकाश खत्म नहीं होता, क्योंकि उसमें तारे के निरंतर सिकुड़ने से नया अनंत आकाश जो बन गया। पर एक से ज्यादा आकाश का होना असम्भव है, इसीलिए वह अलग अनंत आकाश नहीं बल्कि उसमें अनंत आकार का गड्ढा है। ओम शायद आकाश का नाम और रूप है। क्योंकि ध्वनि एक तरंग है, जो आकाश में हर जगह फैलती है प्रकाश तरंग की तरह। यह अलग बात है कि उसे हर जगह डिटेक्ट नहीं किया जा सकता। वैसे भी शब्द या आवाज को आकाश का गुण कहा गया है। फिर सिर्फ ओम ध्वनि को ही आकाश का रूप क्यों दिया गया है। शायद इसलिए क्योंकि यह सबसे साधारण और आधारभूत है। ओम शब्द तीन अक्षरों अ, उ और म से बना है, जिनका मतलब क्रमशः सृजन, पालन और विनाश है। आकाश भी यही करता है। यह पहले अपने अंदर दुनिया को बनाता है, कुछ समय तक उसको कायम रखता है, और फिर अपने में ही विलीन कर लेता है। मतलब ओम अनंत आकाश का ही नाम है। सटीकता से बोलें तो शायद अनंत गड्ढे का, क्योंकि यही सबसे मूलभूत विचार से बनता है। पर आकाश में गड्ढा, यह बात इतनी सरल नहीं है। कुछ तो रहस्य छिपा है इसमें। फिर तो अगर परमात्मा अनंत आकाश है, तो जीवात्मा उसमें अनंत श्याम गड्ढा। शून्य आकाश में गड्ढा भी कोई विशेष होगा, साधारण नहीं। हम तो आकाश में गढ्ढा नहीं बना सकते। हां एक तरीका है, भ्रम से गड्ढे जैसा दिखा दिया जाए। फिर तो अनंत आकाश भी रहेगा, और उसमें अनंत गढ्ढा भी, दोनों एकसाथ। जीवात्मा तो परमात्मा में ऐसा ही भ्रमपूर्ण है, असली नहीं, जैसा कि शास्त्रों में लिखा है। पर अगर भौतिक आकाश में भी ऐसा भ्रमपूर्ण गढ्ढा बनता है, तब तो सभी पदार्थ और यहां तक कि प्रकाश भी भ्रमित होकर उसमें गिर जाते हैं। जीवात्मा रूपी गड्ढे में भी तो बाहर की दुनिया गिरती रहती है, बेशक सूक्ष्म रूप में। विभिन्न इंद्रियां बाहर से विभिन्न सूचनाएं इकट्ठा करके जीवात्मा का प्रभाव बढ़ाती रहती हैं। बेशक ब्लैकहोल जीवात्मा की तरह भ्रम को महसूस नहीं करते। अंधेरे कुएं की तरफ हरकोई गिरता है, बेशक गिरने वाला महसूस करे या न। अब ये पता नहीं, उस गड्ढे को क्या चीज़ रेखांकित करती है। हो सकता है, आकाश की आभासी अर्थात वर्चुअल तरंग हो। जैसे चादर धागे की बनी है, इसी तरह आकाश भी आभासी धागों या तरंगों से भरा हुआ है। चादर के गड्ढे की खाली जगह में हवा भर जाती है, जो धागे जितनी घनी नहीं है, इसलिए चादर पर रखी गेंद उसके गड्ढे की तरफ़ लुढ़कती है। इसी तरह भारी पिंड के वजन से आकाश के आभासी तानेबाने में गड्ढा बन जाता है। उस गड्ढे की खाली जगह में बाहर के अटूट आकाश की तुलना में कम घना आभासी तानाबाना बुना होता है। इसीलिए आसपास के अन्य छोटे पिंड उस गड्ढे की तरफ़ लुढ़कते हैं, पर हमें ऐसा लगता है कि बड़ा पिंड छोटे पिंड को गुरुत्व बल से अपनी तरफ खींच रहा है। यह ऐसे ही है जैसे हवा उच्च दाब वाले क्षेत्र से निम्न दाब वाले क्षेत्र की तरफ़ बहती है। शून्य आकाश वही एकमात्र है, पर आभासी तरंगों के कारण उसमें आभासी गड्ढा बन जाता है। इसका मतलब है कि अंतरिक्ष में हर समय बनने वाली आभासी तरंगें व कण वस्तुओं पर दबाव डालते हैं। केसीमिर इफेक्ट के प्रयोग में यह सिद्ध भी किया गया है। संभवतः यह दबाव भी पिंडों को आकाश में बने गड्ढों की तरफ़ धकेलने में मदद करता है, जिसे गुरुत्वाकर्षण कहते हैं।
आदमी दरअसल विशेष किस्म का आकाश है। उसका शरीर तो केवल उस आभासी आकाश का निर्माण करने वाली मशीन है, ब्लैकहोल की तरह। आकाश में सदैव आभासी तरंगे बनती, मिटती रहती हैं, पर उन्हें कोई भी, परमात्मा भी अनुभव नहीं करता, ऐसे ही जैसे समुद्र अपनी तरंगों को महसूस नहीं करता। यह समुद्र और उसकी तरंग का उदाहरण शास्त्रों में अनेक स्थानों पर मिलता है। मस्तिष्क भी उसमें वैसी ही आभासी तरंगें बनाता है, पर उसे जीवात्मा अनुभव करता है, और भ्रम में पड़कर अपने पूर्ण परमात्माकाश रूप को भूलकर जीवात्माकाश बन जाता है। इसे ब्लैकहोल की तरह आकाश में अनंत गड्ढा मान लो।
ऐसा लगता है कि फिर ब्लैकहोल के आकाश में ब्रह्मांड नहीं बनेगा। क्योंकि वह आभासी तरंगों का जाल तो बाहरी मूल आकाश में है जिससे पदार्थ बनते हैं, वह ब्लैकहोल में नहीं है या कम है। पर ब्लैकहोल के आकाश में तारे का द्रव्यमान भी एनकोडिड है, शायद डार्क एनर्जी या डार्क मैटर के रूप में। वह नया ब्रह्माण्ड बनाता हो। या ब्लैकहोल के आकाश में दूसरे व हल्के किस्म की आभासी तरंगें पैदा हो जाती हों जो पदार्थ व ब्रह्माण्ड बनाती हों। फिर उसमें भी कभी ब्लैकहोल बनेगा। जो फिर से नया ब्रह्माण्ड बनाएगा। यह सिलसिला पता नहीं कहां रुकेगा। कुंडलिनी योग से तो सिलसिला जल्दी ही रुक जाता है। योगवासिष्ठ में संकल्पपुरुष शब्द कई जगह लिखा आता है। शायद यह आदमी के लिए कहा गया है कि वह ब्रह्मा के मन के संकल्प या स्वप्न का आदमी है, असली नहीं। इसी तरह आदमी जब किसी देवता, गुरु आदि का ध्यान करता है, तो वह उसका संकल्पपुरुष बन जाता है। पर क्या वह संकल्पपुरुष अपना पृथक अस्तित्व महसूस करता है हमारी तरह, यह विचारणीय है। कई सभ्यताओं में मान्यता है कि जबतक किसी पूर्वज को उसके वंशजों द्वारा याद किया जाता है और श्राद्ध आदि धार्मिक समारोहों के माध्यम से पूजा जाता है, वह तब तक स्वर्ग में निवास करता है। इस पर कोको नाम की बेहतरीन एनिमेशन फिल्म भी बनी है। इसका मतलब है कि हम ध्यान से नया अस्तित्व तो नहीं बना सकते, पर यदि पूर्वनिर्मित अस्तित्व का ध्यान करते हैं, तो उसे उससे पोषण प्राप्त होता है। फिर तो यह भी हो सकता है कि एक उच्च कोटि का योगी ब्रह्मा की तरह अपने मन से नए मनुष्य की रचना कर दे। शास्त्रों में ऐसी बहुत सी कथाएं आती हैं। एक ऋषि ने तो अपने विवाहोत्तर विहार के लिए मनोवांछित दुनियावी साजोसामान और प्राकृतिक नजारे अपनी योगशक्ति से पैदा कर दिए थे। यह तो ऐसे ही है जैसे ब्लैकहोल में बिल्कुल अपने पितृ ब्रह्मांड के जैसा एक अन्य ब्रह्मांड का निर्माण होता है। अगर शास्त्रों का संकल्पपुरुष संभव है, तब तो ब्लैकहोल के अंदर ब्रह्मांड की उत्पत्ति भी संभव है।
ब्लैकहोल इसीलिए तो गड्ढा है, क्योंकि वह मूल आकाश की आभासी तरंगों से रहित मतलब खाली है। मतलब बेशक मूल आकाश में ही है, पर खाली है, अर्थात उसकी सृष्टि से अछूता है।हालाँकि, मूल आकाश की आभासी तरंगें अभी भी अपने मूल स्थान पर हैं, लेकिन इसके ऊपर एक नया आकाश भी बन गया है, पर वह मूल आकाश की आभासी तरंगों के प्रभाव से रहित है। यह कैसे हो सकता है। सीधे शब्दों में कहें तो यह केवल एक और एक ही आकाश है, लेकिन इसके अनगिनत रूप एक ही समय में आभासी तरंगों की विविधता के रूप में मौजूद हैं। अद्भुत मामला है। मैं पिछली एक पोस्ट में भी बता रहा था कि एक ही अनन्त आकाश में एक ही स्थान पर अनगिनत ब्रह्माण्ड हो सकते हैं। संभवतः उन सभी की आभासी तरंगें एकदूसरे से अप्रभावित रहती हों। आत्मा के मामले में भी ऐसा ही होता है। एक ही अनंत अंतरिक्ष में असंख्य आत्माएं अर्थात अलग-अलग जीवों के अपनेअपने अनंत अंतरिक्ष हैं, जो विचारों के रूप में एक-दूसरे की आभासी और सूक्ष्म सृष्टिरचनाओं अर्थात ब्रह्मांडों को नोटिस नहीं कर पाते अर्थात उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते। जीवों के मामले में तो सभी जीवों की आभासी तरंगें एकसमान स्वभाव की हैं, फिर भी वे एकदूसरे की पहुंच से परे हैं, शायद स्थूल ब्रह्मांडों के मामले में भी ऐसा ही हो, मतलब वर्चुअल तरंगें एकसमान किस्म की हैं, पर एक ही स्थान पर एक ब्रह्मांड अन्य सभी ब्रह्मांडों से पूरी तरह अप्रभावित और कटा हुआ है। दिवंगत जीवात्मा में सबकुछ सूक्ष्म मतलब अनभिव्यक्त रूप में रहता है, इसलिए उसमें अंधेरा है। ब्लैकहोल में भी इसीलिए अंधेरा है। संभवतः यह अंधकारमय अनुभूति ही श्याम ऊर्जा अर्थात डार्क एनर्जी है, कोई भौतिक वस्तु नहीं। इसीलिए ऐसा प्रतीत होता है कि यही तथाकथित सबसे छोटी भौतिक इकाई अर्थात सिंगुलैरिटी अर्थात ओम है। डार्क मैटर कहना ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि इसका द्रव्यमान है, जिसमें गुरुत्व बल है। मुझे तो लगता है कि दोनों एक ही चीज़ है, कभी यह एनर्जी के रूप में व्यवहार करती है, तो कभी मैटर के रूप में, ऐसे ही जैसे आदमी के मन का अंधेरा कभी शांत, हल्का और आनंदप्रद सा प्रतीत होता है, तो कभी घना, भारी और दुखप्रद सा। पहले किस्म के अंधेरे से आदमी योग आदि की तरफ़ मुड़कर दुनिया से दूर भागने की कोशिश करता है, पर दूसरे किस्म के अंधेरे से दुनियादारी को अपनी तरफ आकृष्ट करता है। योग की यह विशेष खासियत है कि यह डार्क मैटर को हल्का करके डार्क एनर्जी में परिवर्तित करने की कोशिश करता है। यह ऐसे ही है, जेसे डार्क एनर्जी में धकेलने का गुण होता है, पर डार्क मैटर में आकर्षित करने का। इसका वर्णन हमें शास्त्रों में मिलता है जब कोई एक ऋषि से पूछता है कि प्रलय के बाद सृष्टि कैसी होती है, तो ऋषि कहते हैं कि इतना घनीभूत अंधेरा होता है कि अगर कोई चाहे तो उसे मुट्ठी में भर ले। यह डार्क मैटर की बात हो रही है, क्योंकि पदार्थ ही मुट्ठी में भरा जा सकता है, खाली आसमान नहीं। मुझे तो लगता है कि बेशक यह साधारण पदार्थ नहीं होता पर उसके जैसा सॉलिड महसूस होता है, वैसे ही जैसे क्वांटम कण दरअसल पदार्थ नहीं तरंगरूप होते हैं, पर पदार्थ के जैसा व्यवहार भी करते हैं।

चंद्रयान-3 प्रक्षेपण हेतु शुभकामनाएं

कुण्डलिनी जागरण बनाम सूक्ष्मशरीर-समाधि

दोस्तो, मैं पिछली कुछ पोस्टों में ब्लैकहोलसूक्ष्मशरीर जैसे अनुभव के बारे में बात कर रहा था। थोड़ा उसका और गहराई से अध्यात्मवैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं। मुझे लगता है कि जो चीज अनंत व शून्य अंतरिक्षरूपी आत्मा से अलग भौतिक रूप में है, चाहे कितने ही छोटे कण के रूप में है, उसे हम आत्मरूप से अनुभव नहीं कर सकते। आत्मा से आत्मा ही जुड़ सकती है, अन्य कुछ नहीं। वैसे तो आत्मा की आभासी लहर भी जुड़ सकती है, कण तो बिल्कुल नहीं। वैसे तो लहर भी नहीँ जुड़ती, केवल जुड़ी हुई दिखती है। वह असली नहीँ बल्कि आभासी होती है, जैसे बंद आँखों को खोलते हुए पलकों के बालों से आसमान में बुलबुले जैसे दिखाई देते हैं। दरअसल आसमान में कोई बुलबुले नहीँ होते। यह उदाहरण मैंने योगवासिष्ठ ग्रंथ से लिया है। कण द्वैत का प्रतीक है। वह आत्म-आकाश से अलग है, आकाश-पुष्प या आकाश-उद्यान की तरह, जैसा शास्त्र कहते हैं। आकाश में बिना किसी आधार के यकायक फूल नहीँ खिल सकता। अगर हम योग समाधि से कुण्डलिनी छवि को आत्मरूप में महसूस करें तो वह अपनी आत्मा से अभिन्न उसमें तरंग रूप से अनुभव होगी, किसी पृथक भौतिक वस्तु या कण के रूप में नहीं। जो मुझे सूक्ष्म शरीर आत्मरूप में अनुभव हुआ वह तरंगरूप नहीं था। मतलब वह वैसा नहीं था जैसी सभी भौतिक चीजें मन के विचारों के रूप में लहरदार होती हैं। मतलब उनकी सत्ता या चमक घटती-बढ़ती रहती है। वह सूक्ष्मशरीर तो एकसमान कज्जली चमक वाला अंधेरा था। फिर उसके बारे में मुझे पूरा ब्यौरा कैसे महसूस हो रहा था, उससे भी ज्यादा जितना भौतिक रूपों से मिलता है। इसका मतलब है कि उसमें सूक्ष्म तरंगें थीं, जिनका अहसास नहीं हो रहा था, पर उनमें दर्ज सभी सूचनाओं का पूरा अहसास हो रहा था। ये तरंगें क्वांटम फ्लैकचूएशन या हलचल के रूप में हो सकती हैं, जिन्हें शरीर के बिना ऊर्जा नहीं मिल रही थीं, जिससे वे स्थूल तरंगों के रूप में व्यक्त नहीं हो पा रही थीं। वे सूक्ष्म तरंगें भी स्थूल तरंगों की तरह ही थीं। इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे यदि पानी के तलाब में एक पत्थर फ़ेंकने की ऊर्जा से थोड़ी देर के लिए स्थूल तरंगें बनती हैं, तब पत्थर से मिली ऊर्जा खत्म होने के बाद भी बड़ी देर तक उसी पैटर्न की सूक्ष्म तरंगें बनती रहती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि तरंगें पेंडुलम की तरह व्यवहार करती हैं, मतलब अपनी ही अंतरंग ऊर्जा से उठती गिरती रहती हैं। फिर तो मरने के बाद आदमी के सूक्ष्मशरीर के कंपन लगातार घटते रहने चाहिए और अंततः वह कंपनरहित चिदाकाश अर्थात परमात्मा बन जाना चाहिए अर्थात आदमी खुद ही मुक्त हो जाना चाहिए। कई जगह शास्त्र भी इस ओर इशारा करते हैं कि ऐसा होता है, हालांकि ऐसा स्पष्ट नहीं कहा है, पर जिसको ज्ञान न हो या जिसने आसक्ति और द्वैत से भरा जीवन जिया हो, वह उस अँधेरे से घबराकर या उससे ऊब कर जल्दी ही अपने लिए नया शरीर चुन लेता है, और शरीर उसे अपने कंपन के अनुसार ही अच्छा या बुरा मिलता है। इसका यह मतलब भी है कि इसी तरह ब्लैकहोल की सूक्ष्म तरंगें भी समय के साथ शांत हो जाती हैं, और वह निश्चल समुद्र जैसे अनंत व शून्य अंतरिक्ष से पूरी तरह एक हो जाता है। हालांकि इसमें करोड़ों साल लग सकते हैं, क्योंकि वह पानी का नहीं बल्कि शून्य अंतरिक्ष का कंपन है। पर शास्त्र यह भी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि मोक्ष अपनेआप नहीं मिलता। करोड़ों-अरबों वर्षों तक जारी रहने वाले प्रलयकाल में भी कारण शरीर से आत्मा का बंधन बना रहता है। मुझे तो लगता है कि दोनों ही बातें सही हैं, समय और परिस्थिति के अनुसार, हालांकि दूसरी बात ज्यादातर मामलों में फिट बैठती होगी।

कुण्डलिनी चित्र का हम बारबार ध्यान करते हैं, इससे वह समाधि अर्थात कुण्डलिनी जागरण के रूप में आत्मा से एकाकार हो जाता है। मतलब किसी भी चीज के बारे में ध्यान करके उसको जगा कर हम उसके बारे में पूरी तरह से सबकुछ जान जाते हैं, जैसा कि शास्त्र कहते हैं। योगवासिष्ठ में कहा गया है कि वायु से योगसमाधि से जुड़ने पर वायु की सभी शक्तियाँ मिलती हैं, जैसे आसमान में उड़ना, अदृष्य होना आदि। इसी तरह अन्य पदार्थों जैसे अग्नि, जल आदि से जुड़ने से उन-उन पदार्थोँ का संपूर्ण व प्रत्यक्ष ज्ञान होने से उनकी सभी शक्तियां मिलती हैं। सम्भवतः इन्हें पंचभूत समाधि भी कहते हैं। अब इनका वैज्ञानिक विश्लेषण तो मैं इस समय नहीँ कर सकता। पर किसी के या अपने ही सूक्ष्म शरीर को जगाने के लिए हम किसका ध्यान करेंगे। सूक्ष्मशरीर का ही करेंगे। यह नहीं पता कैसे। सम्भवतः ऐसे ही जैसे भूत का किया जाता है। गीता में कहा गया है कि देव को पूजने वाले देवता बनते हैं, और भूत को पूजने वाले भूत। तो स्वाभाविक है कि सूक्ष्म शरीर का ध्यान करने वाला सूक्ष्मशरीर ही बनेगा। क्योंकि सूक्ष्मशरीर में अँधेरे का राज है, इसलिए अंधेरा व शक्ति पैदा करने वाले मांसमदिरासंभोग जैसे पंचमकारों के साथ तांत्रिक कुण्डलिनी योग से भूत या सूक्ष्मशरीर का आत्मरूप में अनुभव होता है, ऐसा मुझे लगता है। प्रेतात्माएं लोगों से सम्पर्क करके मदद लेना और देना चाहती हैं, पर इसके लिए आदमी में प्रेतात्मा की उच्च दबाव वाली ऊर्जा का आवेश झेलने की शक्ति होना जरूरी है, जो केवल समर्पित तांत्रिक कुण्डलिनी योग से ही संभव प्रतीत होता है। कुण्डलिनी चित्र यदि उस विशेष भूत या सूक्ष्मशरीर से संबंधित हो तो ध्यान ज्यादा जल्दी सफल और प्रभावशाली हो जाता है। पर ऐसा कैसे होता है, उसके लिए थोड़ा गहराई से विश्लेषण करना होगा।

मुझे एक नई अंतर्दृष्टि मिली है। उपरोक्त समाधि का अनुभव कुण्डलिनी जागरण की तरह नहीं था। मतलब उस अनुभव में मैं परमात्मा से एकाकार नहीं हुआ, बल्कि एक अन्य जीवात्मा से एकाकार हुआ। अगर मैं परमात्मा से एकाकार हुआ होता, तो कुण्डलिनी जागरण की तरह अनंत प्रकाश, आकाश व आनंद से कुछ क्षणों के लिए सम्पन्न हो जाता। साथ में मन-मस्तिष्क में सुहाने विचार, सागर में तरंगों की तरह उमड़ते, जैसा कि मैंने पिछली एक पोस्ट में लिखा है कि मस्तिष्क एक थिएटर मेन की तरफ काम करता है, जो मूड के अनुसार दृश्य प्रस्तुत कर देता है। हालांकि कुछ क्षणों के सूक्ष्मशरीर के अनुभव के बाद मस्तिष्क उससे संबंधित विचार बनाने लगा, जैसे उनकी मृत्यु से दुखी लोग आदि। हालांकि ये अनुभव सागर में तरंग की तरह महसूस नहीँ हो रहे थे, क्योंकि मुझे उस परमात्म-सागर का अनुभव नहीँ हो रहा था, जिसमें सभी कुछ तरंगों के रूप में है। विचारों के उठने के साथ ही शुद्ध अनुभव खत्म होने लगता है। विचार एक शोर जैसा या भ्रम जैसा पैदा करते हैं। योगी को ऐसे दिव्य अनुभव इसीलिए ज्यादा होते हैं, क्योंकि वे ज्यादा देर तक निर्विचार बने रह सकते हैं। होते सभी को हैं, पर वे विचारों के शोर के कारण इतने कम समय के लिए रहते हैं कि पहचान में ही नहीँ आते। जैसा ओशो महाराज कहते हैं कि सम्भोग के दौरान वीर्यपात के अनुभव के कुछ क्षणों के दौरान सभी को समाधि का अनुभव होता है, पर वह इतने कम समय के लिए रहता है कि उसका पता ही नहीं चलता। इसलिए वे ध्यानयोग के माध्यम से उस समय को बढ़ाने को कहते हैं। कहते हैं कि जानवरों को निकट भविष्य का अंदाजा लग जाता है, क्योंकि वे आदमी से ज्यादा निर्विचार होते हैं, हालांकि अलग अर्थात अज्ञान वाले तरीके से। मेरे इस उपरोक्त अनुभव को एकाकार भी नहीँ कह सकते, क्योंकि एकाकार तो परमात्मा के साथ ही हुआ जा सकता है। इसे ऐसे कह सकते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिए अपने आत्मरूप को छोड़कर सूक्ष्मशरीर बन गया। यह ऐसे था कि एक ही सूक्ष्मशरीर था, पर उसे एकसाथ अनुभव करने वाली दो आत्माएं थीं। असली या होस्ट आत्मा उन दिवंगत परिचित की थी। नकली या अतिथि या घुसपैठिया आत्मा मेरी थी। सूक्ष्मशरीर से ऐसे ही सम्पर्क किया जा सकता है। भला अँधेरे व शून्य आसमान को जानने का और क्या तरीका हो सकता है। उनकी समस्या या उनका प्रश्न जानने के लिए मैं उनके सूक्ष्मशरीर से जुड़ गया। उनकी बात कानों से नहीँ सुनाई दे रही थी, पर सीधी आत्मा में महसूस हो रही थी। न उनका शरीर, न मुख और न ही शब्द। फिर भी उनके बारे में सबकुछ जान पा रहा था और उनकी हरेक बात सुन पा रहा था। मैंने उनके सूक्ष्मशरीर में रहकर उन्हींको जवाब भी दिया, जिसे उन्होंने ध्यान से सुना, पर वैसे ही आत्म-भाषा में। फिर सम्भवतः जब मैं अपना जागृति से संबंधित अनुभव याद करने के लिए अपने सूक्ष्मशरीर में आने लगा, तब मेरे मस्तिष्क में विचारों का शोर बढ़ने लगा, जिससे सम्पर्क टूट गया। पर मुख्य बात मैंने बता दी थी। शायद मकानमालिक ने घुसपैठिये को किक मारके भगा दिया था। हाहाहा। हो सकता है बहुत से कारण रहे हो पर सबसे मुख्य वजह यह डर लगता है कि कहीं मैं उनके सूक्ष्मशरीर में हमेशा के लिए कैद न हो जाऊं, और मेरे सूक्ष्मशरीर को खाली जानकर उनकी आत्मा उसपर कब्जा न कर लें। भाई पहले अपना घर बचाना था, न कि किसी की मदद करनी थी। वैसे भी अधिकांश मामलों में कोई दूसरे के सूक्ष्मशरीर में ज्यादा देर नहीँ ठहर सकता, जैसे कोई अतिथि बनकर किसीके घर पर कब्जा नहीँ कर सकता। सम्भवतः परकायाप्रवेश सिद्धि इसीका उत्कृष्ट रूप हो, जिसमें सूक्ष्मशरीर के मालिक आत्मा को भगाकर अतिथि आत्मा स्थायी तौर पर बस जाती है। कहते हैं कि आदि शंकराचार्य इसमें पारंगत थे। शास्त्रों में एक कथा आती है, जिसमें राजकुमार पुरु ने अपने वृद्ध पिता और राजा ययाति को अपनी जवानी दान दे दी थी। यह तभी हो सकता है, जब उन्होंने अपने सूक्ष्मशरीर एकदूसरे के साथ बदल दिए हों। मैंने बचपन में एक तथाकथित सत्य घटना का वर्णन पढ़ा-सुना था, जिसके अनुसार एक अंग्रेज अधिकारी कहता है कि उसने एक वृद्ध योगी बाबा को झाड़ियों के बीच में से एक नौजवान की लाश घसीटते देखा। कुछ देर के बाद वह नौजवान जिन्दा होकर किश्ती में सवार होकर नदी पार कर रहा था। मतलब साफ है कि योगी ने अपने शरीर सूक्ष्म को अपने बूढ़े शरीर से बाहर निकालकर नौजवान के मृत शरीर में प्रविष्ट करा दिया था ताकि वह लम्बे समय तक और योग कर पाता। अब पता नहीँ यह सच है कि ढोंग है कि जब किसी के शरीर में बाहरी प्रेतात्मा का कब्जा हो जाता है, जिससे उस आदमी का मन व शरीर उसके कब्जे में आ जाता है। इसे तंत्र-मंत्र आदि से ठीक करवा दिया जाता है। कुछ तो बात जरूर है, जिसे आध्यात्मिक विज्ञान ही ज्यादा अच्छे से समझ सकता है, भौतिक विज्ञान नहीं।

कुण्डलिनी योग विज्ञान ब्लैक होल में भी झाँक सकता है

शिव की तरह शक्ति भी शाश्वत है

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि शक्ति कहाँ से आती है। शाक्त कहते हैं कि शिव की तरह शक्ति भी शाश्वत है। यह मानना ही पड़ेगा, क्योंकि अगर शक्ति नाशवान है, तब वह सृष्टि के प्रारम्भिक शून्य आकाश में कहाँ से आती है। अगर शिव को ही एकमात्र अविनाशी और मूल तत्त्व माना जाए तो एक नया स्पष्टीकरण है। सूक्ष्मशरीर रूपी क्वांटम फ्लकचूएशनस आत्मा में रिकॉर्ड हो जाती हैं। उन क्वांटम फ्लकचूएशनस के अनुसार ही आत्मा में अंधेरा होता है। मतलब क्वांटम फ्लकचूएशनस की किस्म और मात्रा के अनुसार ही आत्मा का अंधेरा भिन्नता रखता है। यह नियम व्यष्टि और समष्टि, दोनों ही मामलों में लागू होता है। इसे ही कारण शरीर कहते हैं। आत्मा का वही अंधेरा फिर सृष्टि के प्रारम्भ में अपने अनुसार पुनः  क्वांटम फ्लकचूएशन पैदा करता है। मतलब कारण शरीर या कारण ब्रह्माण्ड सूक्ष्मशरीर या सूक्ष्म ब्रह्माण्ड के रूप में आ जाता है। उससे फिर स्थूल शरीर या स्थूल ब्रह्माण्ड बन ही जाता है। पर प्रश्न फिर भी बचा ही रहता है। फौरी तौर पर तो यही उत्तर बनता है कि अँधेरे अंतरिक्ष के रूप में शक्ति अर्थात कारण शरीर तो रहता है, पर अनुभव के रूप में उसका अपना अस्तित्व नहीं होता, अनुभव के रूप में वह परमात्मा शिवरूप ही होता है। या कह लो कि शक्ति शून्य शिव से एकाकार हो जाती है।

सृष्टि के प्रारम्भ में शक्ति शिव से अलग होकर सृष्टि की रचना प्रारम्भ करती है

जैसे सरोवर का जल हमेशा हिलता रहता है वैसे ही अंतरिक्ष में हमेशा सूक्ष्म तरंगें उठती रहती हैं। दोनों में कभी हवा आदि से लहरें ज्यादा बढ़ जाती हैं। यही एनर्जी से कण का उदय है। अंतरिक्ष में ये तरंगें आकाशीय पिंडों के आपस में टकराने से बनती हैं। यह तो वैज्ञानिक भी बोलते हैं कि जब अंतरिक्ष में ज्यादा उथलपुथल मचती है, तो नए ग्रहों व सितारों आदि का ज्यादा निर्माण होता है। पर शुरुआत के शून्य अंतरिक्ष में यह उथलपुथल कैसे मचती है, यह खोज का विषय है।

ब्लैक होल में ब्रह्माण्ड के जन्म और मृत्यु का राज छिपा हो सकता है

तारा जब मरता है तो वह सिंगुलेरिटी तक कंम्प्रेस होकर ब्लैक होल बन जाता है। वह सिंगुलेरिटी अव्यक्त आकाश में विलीन हो जाती है, क्योंकि किसी चीज के छोटा होने की अंतिम सीमा शून्य आकाश में जाकर ही खत्म होती है। मतलब वह पहले स्बसे छोटा मूलकण बनता है। उसकी ग्रेविटी बहुत ज्यादा होती है। मतलब वह क्वांटम ग्रेविटी है। इसमें एक मूलकण से सृष्टि बनने का राज अर्थात बिग बैंग का राज छिपा हुआ है। जब एक मूलकण के अंदर पूरा तारा समा सकता है तो उससे पूरे तारे का उदय भी तो हो सकता है। वह पुनः-रचना व्हाइट होल के माध्यम से हो सकती है। तभी कहते हैं कि ब्लेक होल सृष्टि रचना की फैक्ट्री हो सकता है। हो सकता है कि सृष्टि के अंत में ग्रेविटी हावी होकर पूरे ब्रह्माण्ड या पूरी सृष्टि को ही ब्लैक होल बना कर खत्म कर दे। फिर पूरा अंतरिक्ष ही ब्लैक होल अर्थात अव्यक्त आकाश अर्थात अंधकारपूर्ण आकाश अर्थात मूल प्रकृति बन जाएगा। हालांकि उसमें पूरी सृष्टि उच्च दबाव में समाई होगी। अब ये नहीं पता कि वह किस रूप में उसमें होगी। जब उस परम ब्लैक होल का अंधकाररूप दबाव एक निश्चित मात्रा या समय सीमा को लांघेगा, तब प्रलय का अंत हो जाएगा और उसमें दबे अव्यक्त पदार्थ प्रकाशमान तरंगों के रूप में बाहर अर्थात परम व्यक्त अर्थात परम पुरुष की ओर प्रस्फुटित होने लगेंगे। इसे ही प्रकृति और पुरुष अर्थात यिन और यांग के बीच आकर्षण और सम्भोग कहा जाता है। इससे शिशु रूप में नई सृष्टि का पुनर्जन्म और विकास होगा। सम्भवतः इसीलिए शास्त्रों में अनेक स्थानों पर मन के विचारों मुख्यतः कुण्डलिनी छवि को भी पुत्र कह कर सम्बोधित किया जाता है। उदाहरण के लिए देव कार्तिकेय, सगर-पुत्र आदि। स्वाभाविक है कि सृष्टि पहले की तरह ही बनेगी क्योंकि पिछली सृष्टि के दबे पदार्थ ही उसे बना रहे हैं। नई सृष्टि बनने की प्रक्रिया और क्रम भी पुरानी की तरह ही होगा क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि जिस क्रम में कोई चीज टूट कर नष्ट होती है, वह लगभग उसी क्रम और प्रक्रिया में आगे से आगे जुड़ते हुए पुनः निर्मित होती है। यह भी हो सकता है कि बिग क्रन्च होने की बजाय बिग बैंग ही चलता रहे, जिससे अंत में सभी मूलकण भी एकदूसरे से दूर छिटक कर आकाश में विलीन हो जाएं। पर बनेगा तो तब भी ब्लैक होल जैसा ही। उसमें भी सब कुछ यहाँ तक कि प्रकाश भी टूट कर मूल अंतरिक्ष के अँधेरे में गायब हो जाएगा।

आदमी का सूक्ष्म शरीर भी एक ब्लैक होल ही है

आदमी भी तो ऐसे ही मरता है। सारे जीवन भर मानसिक ब्रह्माण्ड का निर्माण करता है। अंत में सब कुछ अँधेरनुमा ब्लैकहोल जैसे अव्यक्त में समा जाता है। आदमी के नए जन्म पर उसके नए मानसिक ब्रह्माण्ड का निर्माण इसी मानसिक या सूक्ष्म ब्लैकहोल से होता है। मतलब जैसी सूचना उस अँधेरे में दर्ज होती है, नया ब्रह्माण्ड भी वैसा ही बनता है। तभी तो कहते हैं कि आदमी का नया जन्म उसके पुराने जन्मों के अनुसार ही होता है।

ब्लैक होल में प्रकाश तो अनगिनत सितारों जितना समाया हो सकता है, पर वह दबा हुआ या अव्यक्त होता है। यह मृत्यु के बाद जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर अर्थात प्रेतात्मा की तरह है। उसमें अनेक जन्मों के जगत का प्रकाश समाहित होता है, पर वह दबा हुआ सा अर्थात अनभिव्यक्त सा होता है। ऐसा लगता है कि वह प्रकाश बाहर उमड़ने को बेताब है।

हरेक जीव एक ब्रह्माण्ड और ब्लैक होल के रूप में जन्म और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है

ब्लैक होल का अनुभवात्मक विवरण

मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि जीवात्मा का पुनर्जन्म एक मां के गर्भ में होता है। यह अनेक सम्भावनाओं में से एक है। जीवात्मा सूर्य-आदि मार्गों से भी जा सकती है, चंद्रादि मार्ग से भी, स्वर्ग भी जा सकती है और नर्क भी, किसी भी ग्रह या लोक-परलोक को जा सकती है, मुक्त भी हो सकती है, और बद्ध भी रह सकती है। इसका असली अनुभव तो ज्ञानी ऋषियों ने ही किया था, जिसका वर्णन उन्होंने वेद-शास्त्रों में किया है। हम तो उन्हींके अनुभवों की वैज्ञानिक विवेचना करने की कोशिश करते हैं। मेरा अनुभव तो यही है कि मैंने एकबार अपने मृत परिचित की जीवात्मा को अनुभव किया था। वह ब्लैक होल की तरह थी, मतलब उसमें उस आदमी का पूरा व्यक्तित्व समाया हुआ था, जो उसकी जीवित अवस्था से भी ज्यादा अनुभव हो रहा था, उसके पिछले सभी जन्मों के प्रभाव के साथ, पर फिर भी सबकुछ अंधेरनुमा ही था, हालांकि अंतहीन खुले आसमान की तरह। वैसे ही, जैसे ब्लैक होल में पूरा विश्व समाया होता है। ऐसा लग रहा था जैसे उनका जीवित अवस्था का प्रकाशमान जगत अर्थात उनका जीवनयात्रा की शुरुआत से लेकर अब तक का पूरा पिछला व्यक्तित्व किसी दबाव से दबा था, इससे वह अवस्था कज्जली या चमकीली काली थी, मतलब चेतना व सेल्फ अवेयरनेस अर्थात आत्मजागरूकता से भरा अंधेरा था वह, जड़ता या मूढ़ता से भरा नहीं, और शान्तियुक्त आनंद भी था उसमें, हालांकि प्रकाश की कमी से आनंद अधूरा था। ऐसा ही जैसे किसी को सुखचैन तो दो पर अँधेरी कोठरी में बंद रखो। शायद यह एक जानवर जैसा बंधन है जो एक अंधेरे कमरे में बंधा हुआ है, लेकिन अच्छी तरह से खिलाया और पानी पिलाया जाता है, इसलिए भगवान को पशुपति नाथ या जानवरों का स्वामी कहा जाता है। ऐसा लग रहा था कि वह दबा हुआ बैकग्राउंड प्रकाश पूरे जोर व विस्फोट से बाहर को फैलना चाहता हो अभिव्यक्ति के रूप में। सम्भवतः ब्लैक होल भी ऐसा ही होता है। इवेंट होरीजन के साथ देखने पर तो वह वैसा ही लगता है। इवेंट होरीज़ोन को आप आदमी के स्थूल शरीर जैसा या अभिव्यक्त रूप जैसा कह लो, और ब्लैक होल को इसके सूक्ष्म शरीर या दबे रूप जैसा। इवेंट होरीज़ोन में पूरा दृश्य जगत प्रकाशमान और स्थूल होता है, जबकि ब्लैक होल के अंदर वह सूक्ष्मता और अँधेरे में चला जाता है, रहता वहाँ भी पूरा ही है। विचित्र अवस्था होती है सूक्ष्म शरीर की। फिर वो जीवात्मा कई दिन बाद दिव्य जैसी अवस्था में टहलते हुए महसूस हुई। सम्भवतः वह स्वर्ग या मुक्ति की तरफ जा रही थी। मैंने इसका सविस्तार वर्णन एक पुरानी पोस्ट में किया है। मैं इस अनुभव के दौरान तांत्रिक कुण्डलिनी योग का गहन अभ्यास कर रहा था। सम्भवतः इसी ने मुझे उस दिव्य अनुभव के योग्य बनाया था। वह शुभचिंतक प्रेतात्मा थी। इसी तरह एकबार मुझे योगाभ्यास के बीच में ही कुछ अशुभ प्रेतात्माओं के सूक्ष्म शरीरों का अनुभव भी हुआ था। वे हिंसक व गुस्सैल व रक्तपिपासु जैसे लग रहे थे। दरअसल सूक्ष्म शरीर अपनी आत्मा के अंदर या आत्मा के रूप में महसूस होते हैं। वह एक अहसास होता है, जिसके लिए विचारों का घोड़ा दौड़ाने की जरूरत नहीं होती। आपको चीनी की मिठास क्या विचार बताते हैं। नहीं, वह एक अपना अंदरूनी अहसास होता है। उसके साथ पीछे से अच्छे विचार आए, वह अलग बात है। उसी तरह उन दुष्ट प्रेतों के अहसास के साथ कुछ हड्डीनुमा, लाल आँखों वाले व बड़े नुकीले दांतों व गुस्से वाले चित्र तो मन में बने, पर वे तो अहसास का पीछा करने वाले विचार होते हैं, अहसास नहीं। सूक्ष्म शरीर तो एक अहसास ही होता है, बिना किसी भौतिक रूपरंग का। मस्तिष्क एक थिएटर मेन की तरह होता है, जो अहसास या मूड के अनुसार चित्र बना लेता है। मैंने गुरु स्मरण से उस घटिया अहसास को शांत किया। वह अहसास 10-20 सेकंड जितना ही रहा होगा। उसके एक-दो दिन बाद एक बुरी घटना टलने की खुशखबरी मिली। इसी तरह मैंने बताया था कि किस तरह जीव का जन्म होता है। यह भी मैं शास्त्रों में लिखी बातों को वैज्ञानिक अमलीजामा पहना रहा था, कुछ अपना हल्का अनुभव भी है, हालांकि वह गहरा या निर्णायक अनुभव नहीं है। एक उपनिषद में तो एक जगह यहाँ तक कहा गया है कि जीवात्मा बादलों तक पहुंच कर बारिश के जल में घुलकर जमीन पर आ जाती है, फिर जड़ों से होकर अन्न के पौधे में घुस जाती है। जब कोई आदमी उस अन्न के दाने को खाता है, तो उसके शरीर से होकर उसके वीर्य में पहुंच जाती है। उससे उसकी पत्नि के गर्भ में प्रविष्ट होकर जन्म ले लेती है।

जो भौतिक विज्ञान की पहुंच से परे हो, वहाँ आध्यात्मिक योग-विज्ञान से ही पहुंचा जा सकता है

भौतिक वैज्ञानिक ब्लैक होल के अँधेरे में झाँकने में अस्मर्थ हैं। पर योग विज्ञान इशारा कर रहा है कि उसमें सभी पदार्थ अदृष्य आत्मा अर्थात अदृष्य आसमान के रूप में विद्यमान रहते हैं, जिन्हें आसमान रूप आत्मा के द्वारा सीधा अनुभव तो किया जा सकता है पर भौतिक इन्द्रियों के द्वारा नहीं। जीव का सूक्ष्म शरीर भी वैसा ही होता है।

ब्लैक होल ब्रह्माण्ड-शरीर अर्थात ब्रह्मा का सूक्ष्म शरीर व कारण शरीर है

एलियन हरेक भौतिक पदार्थ के रूप में उपस्थित रहकर हमारे सबसे निकट होते हुए भी सबसे दूर हैं

उपरोक्त तथ्यों से तो यही सिद्ध होता है। देहरहित सूक्ष्मशरीर व कारण शरीर के बीच मुझे कोई ज्यादा अंतर नहीं लगता। दोनों में ही क्वांटम फ्लकचूएशनस आत्मा में रिकॉर्ड हो जाती हैं। यही मामुली सा अंतर है कि सूक्ष्मशरीर थोड़े समय के लिए रहता है, क्योंकि उसको स्थूल रूप में प्रकट करने के लिए भौतिक सृष्टि का वजूद होता है, जबकि कारण शरीर लम्बे समय तक बना रहता है, क्योंकि उस समय सृष्टि की प्रलयावस्था होती है, और कहीं कुछ भी भौतिक रूप में नहीं होता। इसके अलावा, कारण शरीर पूरी तरह से शांत दिखाई देता है क्योंकि इसमें किसी भी क्वांटम लहर की उतार-चढ़ाव को आकर्षक भूतिया अभिव्यक्ति के रूप में लंबे समय तक अनुभव नहीं किया जाता है, जैसा कि कभी-कभी सूक्ष्म शरीर के मामले में होता है। इसका मतलब है कि आम जीव की तरह ब्रह्मा नाम के जीव का अस्तित्व भी है, जैसा शास्त्रों में कहा गया है। ब्रह्माण्ड ही उसका शरीर है। यह अलग बात है कि वह इससे बद्ध नहीं होता। प्रलय के समय ब्रह्मा की आत्मा में ब्रह्माण्ड रिकॉर्ड हो जाता है। सृष्टि के समय वह फिर अपने पुराने स्थूल रूप में प्रकट हो जाता है। पर शास्त्र कहते हैं कि ब्रह्मा प्रलय के समय अपनी मृत्यु के साथ मुक्त हो जाता है। फिर नई सृष्टि के लिए वो रेकॉर्डिंग कहाँ रहती है। मतलब साफ है कि वह जीवनमुक्त हो जाता है, विदेहमुक्त नहीं। मतलब उसका शरीर और जन्म-मृत्यु का चक्र बना रहता है, पर मुक्ति के अहसास के साथ। पर जीवनमुक्त तो वह पहले भी था। ऐसा शायद यह दर्शाने के लिए लिखा गया है कि जीव और ब्रह्मा की गति एक जैसी है। ब्रह्मा और जीव में कोई अंतर नहीं। जीवनमुक्त के बारे में जो कुछ भी सोच लो, वह सही ही होता है, क्योंकि वह किसी से प्रभावित ही नहीं होता। यह ऐसे ही है जैसे कुछ अंतरिक्ष वैज्ञानिक अंदेशा जता रहे हैं कि हमें एलियन इसलिए नहीं दिखते क्योंकि वे भौतिक पदार्थों के रूप में ढल गए हैं, और ऐसे बन गए हैं कि वे हर जगह हैं भी और नहीं भी। पूरा ब्रह्माण्ड भी ऐसा ही एक विशालकाय एलियन हो सकता है। सम्भवतः इस बात को जानकर ही सभी चीजों को देवता मानने की और उनको विभिन्न रूपों में पूजने की परम्परा शुरु हुई थी। ऐसे जीवनमुक्त लोग ही तो होते हैं। फिर शास्त्र कहते हैं कि कोई भी जीव तरक्की करते हुए ब्रह्मा बन सकता है। इसका मतलब मुझे यही लगता है कि ब्रह्मा की तरह पूर्ण जीवनमुक्त बन सकता है, न कि असली ब्रह्मा।

शिव अगर सरोवर है तो शक्ति उसमें हलचल पैदा करने वाला हवा का झोँका है

मान लेते हैं कि सरोवर में जल की हलचल की तरह अंतरिक्ष में क्वांटम फ्लकचूएशनस हमेशा विद्यमान रहती हैं, जिसे हम अव्यक्त कहते हैं। यह भी मान लेते हैं कि महाप्रलय के समय अंतरिक्ष एक पूर्ण शांत जल-सरोवर की तरह हो जाता है, जिसमें बिल्कुल भी हलचल नहीं रहती, मतलब क्वांटम फ्लकचूएशनस भी थम जाती हैं। इसे परम अव्यक्त भी कह सकते हैं और परम व्यक्त या परमात्मा भी। जैसे हवा के झोंके से जल की सतह पर बार-बार उसी किस्म की तरंगों के पैटर्न  उसी क्रम में बनते रहते हैं, उसी तरह अंतरिक्ष में भी उसी किस्म की सृष्टि उसी निश्चित क्रम में बारबार बनती रहती है। पर फिर भी अंत में प्रश्न यही बचता है कि प्रलय के अंत में जब सब कुछ शून्य होता है, तब वह ऊर्जा या शक्ति कहाँ से आती है, जो उस हलचल को बढ़ा देती है। शून्य में वो हवा का झोंका कहाँ से आता है, जो शुरुआती हलचल को पैदा करता है। बाद में तो यह भी मान सकते हैं कि हलचल से हलचल खुद ही आगे से आगे बढ़ती रहती है। अंतरिक्ष में चलने वाला वह हवा का झोंका ही वह शक्ति है, जिसे शाक्त सम्प्रदाय वाले लोग शिव की तरह शाश्वत और अविनाशी मानते हैं। शिव अगर निश्चल अंतरिक्ष है, तो शक्ति उसमें हलचल पैदा करने वाला हवा का झोंका है।

कुण्डलिनी योग से ही ब्रह्माण्ड एक देवता या विशालकाय एलियन बनता है

शून्य में विद्युत्चुंबकीय तरंग

दोस्तों, मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि विद्युत्चुंबकीय क्षेत्र या तरंग से मानसिक दुनिया बनती है। तो फिर यह क्यों न मान लिया जाए कि बाहर का भौतिक संसार भी इन्हीं तरंगों से बनता है। यही अंतर है कि मानसिक संसार में ये तरंगें अस्थिर होती हैं, और आँखों आदि इन्द्रियों के माध्यम से बाहर से लाई जा रही सूचनाओं के अनुसार लगातार बदलती रहती हैं, पर बाहर के स्थूल जगत में ये किसी बल से स्थिरता पाकर स्थायी मूलकणों की तरह व्यवहार करने लगती हैं, जिनसे दुनिया आगे से आगे बढ़ती जाती है। दिमाग़ में तो विद्युत्चुंबकीय तरंग मूलाधार से आ रही ऊर्जा से बनती है, पर बाहर शून्य अंतरिक्ष में यह ऊर्जा कहाँ से आती है, यह खोज का विषय है।

फील्ड से कण और कण से फील्ड का उदय

क्वांटम फील्ड थ्योरी सबसे आधुनिक और स्वीकृत है। इसके अनुसार हरेक कण और बल की एक सर्वव्यापी फील्ड मौजूद होती है। फील्ड मतलब प्रभाव क्षेत्र, कण की फील्ड मतलब कण का प्रभाव क्षेत्र। अंतरिक्ष शून्य नहीं बल्कि इन फील्डों से भरा होता है। फील्ड मतलब पोटेंशल, तरंग व कण बनाने की योग्यता। यह फील्ड एक सबसे हल्के स्तर की लहर होती है। मुझे लगता है यह ऐसे है कि जब एक कंकड़ एक जल-सरोवर में गिराया जाता है तो एक मुख्य लहर के साथ छोटी लहरों के झुंड के रूप में विक्षोभ पैदा होता है। मुख्य बड़ी तरंग कण के समान है और छोटी तरंगें उसके क्षेत्र या फील्ड के समान हैं। जिस क्षेत्र तक इन सूक्ष्म तरंगों का अनुभव होता है, वह कण के रूप में स्थित उस मुख्य तरंग का फील्ड का दायरा होता है। जब इलेक्ट्रोन की फील्ड में किसी पॉइंट को एनर्जी मिलती है तो वहां फील्डरूपी छोटी लहर का एम्प्लीचूड या आयाम बढ़ जाता है, और वहाँ एक कण का उदगम होता है। वह इलेक्ट्रोन है। ये आधारभूत फील्ड सबसे छोटे कण क्वार्क से भी सूक्ष्म होती हैं। इसी तरह इलेक्ट्रोन के चारों तरफ भी एक फील्ड बनती है। मतलब इलेक्ट्रोन रूपी बड़ी लहर के चारों तरफ भी एक सूक्ष्म लहरों का क्षेत्र बन जाता है। वह प्रोटोन से भी इसी इलेक्ट्रोमेग्नेटीक फील्ड से ही दूर से आकर्षित होकर उससे जुड़ जाता है। इस आकर्षण की फील्ड तरंगों से भी विशेष सूक्ष्म कण सम्भवतः फोटोन पैदा होता है, जो इस आकर्षण को क़ायम करता है। इस तरह फील्ड से कण और कण से फील्ड पैदा होकर बाहर की स्थूल संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।

अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त का उदय

मन भी तो क्वांटम फील्ड की तरह होता है। इसमें हरेक किस्म का संकल्प अदृष्य रूप अर्थात अदृष्य लहर के रूप में रहता है। इसे सांख्य दर्शन के अनुसार अव्यक्त कहते हैं। जब इसे मूलाधार से एनर्जी मिलती है, तब इस मानसिक क्वांटम फील्ड की लहरें बड़ी होने लगती हैं, जो स्थूलकण रूपी चित्रविचित्र संसार पैदा करती हैं। उससे और फील्ड पैदा होती है, जिससे और विचार पैदा होते हैं। इस तरह यह सिलसिला चलता रहता है और आदमी के विचार रुकने में ही नहीं आते। अव्यक्त से व्यक्त और व्यक्त से अव्यक्त पैदा होकर भीतरी मानसिक संसार रचना को आगे से आगे बढ़ाते रहते हैं।

क्वांटम भौतिक विज्ञान और आध्यात्मिक मनोविज्ञान के बीच समानता

प्रकृति या अव्यक्त ही वह हल्के स्तर की आधारभूत लहर है। अव्यक्त व्यक्त से ही बना है, अव्यक्त मतलब हल्के स्तर का व्यक्त। हालांकि उसके मूल में भी निश्चेष्ट या अवर्णनीय पुरुष ही है। अंत के पैराग्राफ में बताऊंगा कि निश्चेष्ट या गतिहीन पुरुष क्यों कुछ काम नहीं कर पाता। क्यों उसे मूक दर्शक की तरह माना जाता है, जो अपनी उपस्थिति मात्र से प्रकृति की मदद तो करता है, पर खुद कुछ नहीं करता। सारा काम प्रकृति ही करती है। पुरुष अर्थात शुद्ध आत्मा एक चुंबक की तरह है जिसकी तरफ खिंच कर ही प्रकृति से सब काम अनायास ही खुद ही होते रहते हैं। इसीलिए कहते हैं कि जो भगवान के सहारे है, उसका जीवन खुद ही अच्छे से कट जाता है। पर भगवान असली और अच्छी तरह से समझा हुआ होना चाहिए, जो कुण्डलिनी योग से ही संभव है। जैसे हमारा हरेक कर्म और विचार संस्कार रूप से पहले से ही सूक्ष्म रूप में हमारी अव्यक्त प्रकृति के रूप में मौजूद होता है, जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं, उसी तरह हरेक क्वांटम कण भी अपनी क्वांटम फील्ड के रूप में पहले से ही मौजूद होता है। व्यष्टि मूलाधार मतलब शारीरिक मूलाधार से मिल रही शक्ति से व्यष्टि अव्यक्त मतलब शरीरबद्ध अव्यक्त या व्यष्टि फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे विभिन्न लहरों के रूप में विचारों मतलब व्यष्टि मूलकणों का उदय होता है। इसी तरह समष्टि मूलाधार अर्थात ब्रह्माण्डव्याप्त मूलाधार अर्थात मूल प्रकृति से उत्पन्न शक्ति से समष्टि क्वांटम फील्ड में क्षोभ पैदा होता है, जिससे समष्टि मूलकण पैदा होते हैं। पर समष्टि जगत में ये शक्ति कहाँ से आती है? दार्शनिक तौर पर तो मूल प्रकृति को समष्टि मूलाधार मान सकते हैं, क्योंकि दोनों में मूल शब्द जुड़ा है, और दोनों ही सब सांसारिक रचनाओं के मूल आधार या नींव के पहले पत्थर हैं हैं, पर इसे वैज्ञानिक रूप से कैसे सिद्ध करेंगे? व्यष्टि के मूलाधार की तरह समष्टि मूलाधार में भी कोई सम्भोग क्रिया और उससे उत्पन्न सम्भोग-शक्ति होनी चाहिए। तो उसे पुरुष और प्रकृति के बीच सम्भोग क्यों न माना जाए, जिसका इशारा शास्त्रों में किया गया है।

संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया तांत्रिक कुण्डलिनी योग का भौतिक मार्ग ही है

दरअसल जीवों का जो अव्यक्तरूप सूक्ष्म शरीर है, वह मरने के बाद और भी सूक्ष्म हो जाता है, क्योंकि उस समय उसे स्थूल शरीर से बिल्कुल भी ऊर्जा नहीं मिल रही होती है। वह एक घने अँधेरे आत्माकाश की तरह हो जाता है, जिसका अंधेरा उसमें छिपे हुए अव्यक्त जगत के अनुसार होता है। वह अव्यक्त जगत भी व्यक्त जगत के अनुसार ही होता है। इसीलिए सब जीवों के सूक्ष्म शरीर उनके स्थूल स्वभाव के अनुसार अलग-अलग होते हैं। इस तरह से बहुत से जीवों के अव्यक्त आत्माकाश जब समष्टि अव्यक्ताकाश मतलब मूल प्रकृति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक निश्चित सीमा से ज्यादा अव्यक्त भाव अर्थात अंधकारमय आकाश बना देते हैं, तब वहाँ से एक शक्ति की लहर पुरुष की तरफ छलांग लगाती है। इसी से क्वांटम फील्ड में लहरों का एम्प्लीच्युड आदि बढ़ने से मूलकणों का उदय और सृष्टि का विस्तार शुरु होता है। यह ऐसे ही है जैसे कभी कोई आदमी अपनी सहन-सीमा से ज्यादा ही गम या अवसाद के अँधेरे में डूबने लग जाए, तो वह सम्भोग की सहायता से अपने मूलाधार के अँधेरे में डूबे अपने अव्यक्त मानसिक जगत को ऊपर चढ़ती हुई शक्ति के साथ सहस्रार की तरफ भेजने की कोशिश करता है, ताकि उसके विचारों का मानसिक संसार पुनः प्रकाशित होने लगे। शक्ति तो खुद एक वाहक या बल है, जो अव्यक्त जगत को व्यक्त बनाने में मदद करती है। शास्त्रों में भी यही कहा है कि जब जीवों के कर्म, फल देने को उन्मुख हो जाते हैं, अर्थात जब जीव अंधकार से ऊबने जैसे लगते हैं, तब वे प्रलय के बाद पुनः सृष्टि को प्रारम्भ करने की प्रेरणा देते हैं। यह सामूहिक अर्थात समष्टि सृष्टि और प्रलय है। व्यक्तिगत सृष्टि और प्रलय तो हरेक जीव के जन्म और मरण के साथ चली ही रहती है। सहज व प्राकृतिक मृत्यु के बाद कुछ समय तो जीव चैन की बंसी बजाता हुआ अव्यक्त में आराम करता है, फिर जल्दी ही उससे ऊब जाता है। इसलिए उस अव्यक्तरूप जीव को व्यक्त करने के लिए शक्ति पुरुष की तरफ बढ़ने की कोशिश करना चाहती है। देखा जाए तो शक्ति जाती कहीं नहीं है, क्योंकि पुरुष, प्रकृति और शक्ति तीनों व्यष्टि मूल प्रकृति में साथ-साथ ही रहते हैं। ऐसे ही जैसे अव्यक्त, व्यक्त और उनको बनाने वाली शक्ति मस्तिष्क में ही रहते हैं, पर अव्यक्त जगत मूलाधार से ऊपर चढ़ता हुआ महसूस होता है, क्योंकि पुरुष या मस्तिष्क की शक्ति को प्रेरित करने वाला विशेष सेकसुअल बल मूलाधार से ऊपर चढ़ता है। उसके लिए सम्भोग के माध्यम से एक आदमी और एक औरत का आपसी मिलन जरूरी होता है। संयोगवश उस मृत जीव की जीवात्मा किसी सम्भोगरत आदमी और औरत के जोड़े के मिश्रित मूलाधार में स्थित अव्यक्त जगत से मेल खाती है। दोनों का मिश्रित अव्यक्त जगत संभोग-शक्ति के माध्यम से ऊपर उठते हुए दोनों के हरेक चक्रोँ में दबी हुई भावनाओं व छिपे हुए विचारों को अपने साथ ले जाकर सहस्रार में आनंद के साथ व्यक्त हो जाता है, और एकदूसरे के सहस्रार चक्रोँ में आपस में मिश्रित ही बना रहता है। आदमी के सहस्रार से वह मिश्रित जगत आगे के चैनल से शक्ति के साथ नीचे उतरकर वीर्य में रूपांतरित होकर औरत के गर्भ में प्रविष्ट होकर एक बालक का निर्माण करता है। इसीलिए बालक में माता और पिता दोनों के गुण मिश्रित होते हैं। इसीलिए मांबाप के व्यवहार का बच्चों पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि तीनों की एनर्जी आपस में जुड़ी होती है। इसीलिए व्यवहार में देखा जाता है कि सम्भोग सुख के साथ प्रेम से रमण करने के आदी दम्पत्ति की संतानेँ बहुत तरक्की करती हैं, भौतिक रूप से भी और आध्यात्मिक रूप से भी। इसके विपरीत आपस में अजनबी जैसे रहने वाले दंपत्तियों के बच्चे अक्सर कुंठित से रहते हैं। यह अलग बात है कि कई अच्छी किस्मत वाले लोग इधरउधर से गुजारा कर लेते हैं। हाहा। अनुभवी तंत्रयोगी सम्भोग की, जगत को व्यक्त करने वाली कुण्डलिनी शक्ति को अपने सहस्रार में केवल एक ही ध्यानचित्र पर फोकस करते हैं, और उसे वीर्य रूपी बीज में नीचे न उतारकर लम्बे समय तक वहीं रोककर रखते हैं, जिससे वह मानसिक चित्र जागृत हो जाता है। इसे ही तांत्रिक कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।

पूरा ब्रह्माण्ड ही एक एलियन

इन उपरोक्त तथ्यों का मतलब है कि ब्रह्माण्ड भी एक विशालकाय जीव या मनुष्य की तरह व्यवहार करता है। इससे वैदिक उक्ति, “यत्पिंडे तत् ब्रह्मान्डे” यहाँ भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो जाती है। इसका मतलब है कि जो कुछ भी छोटी चीज जैसे शरीर में है, वही ब्रह्माण्ड में भी है, अन्य कुछ नहीं। पिंड यहाँ शरीर को ही कहा है, अन्य किसी चीज को नहीं, क्योंकि किसीकी मृत्यु के बाद जब उसे श्राद्ध आदि के द्वारा खाने-पीने की चीजें दी जाती हैं, उसे पिंडदान कहते हैं। क्योंकि अगर हरेक छोटी चीज के बारे में कहना होता तो अंडे, खंडे आदि दूसरे शब्द ज्यादा बेहतर होते, पिंडे नहीं। दूसरा, पंजाबी भाषा में वह स्थान जहाँ लोग सामूहिक रूप से एकसाथ रहते हैं, जिसे गाँव कहते हैं, वह पिंड कहलाता है। मूल प्रकृति ब्रह्माण्ड का मूलाधार है, और चेतन पुरुष या परमात्मा इसका सहस्रार या उसमें कुण्डलिनी जागरण है। चित्रविचित्र संसारों की रचना के रूप में ही इसका जीवनयापन या कर्मयोग या इसका कुण्डलिनी जागरण की तरफ बढ़ना है। ऐसा यह अद्वैत के साथ करता है। शास्त्रों में ऐसा ही लिखा है कि ब्रह्मा खुद कहते हैं कि वे अद्वैतभाव के साथ सृष्टि की रचना करते हैं, जिससे वे जन्ममरण के बंधन में नहीं पड़ते। इसलिए यही इसका कुण्डलिनी योग है। अद्वैत और कुण्डलिनी योग आपस में जुड़े हुए हैं। सृष्टि का संपूर्ण निर्माण ही इसका कुण्डलिनी जागरण है। जैसे कुण्डलिनी जागरण के बाद आदमी को लगता है कि उसने सबकुछ कर लिया, इसी तरह सबकुछ कर लेने के बाद ब्रह्मा को कुण्डलिनी जागरण होता है, यह इसका मतलब है। इसके बाद सृष्टि निर्माण से उपरत होकर इसका संन्यास लेना ही सृष्टि विस्तार का धीमा पड़ना और रुक जाना है। देहांत के बाद इसका परम तत्त्व में मिल जाना ही प्रलय है। शास्त्रों में इसीलिए देव ब्रह्मा की कल्पना की गई है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही जिसका शरीर है। आजकल विज्ञान भी इस अवधारणा पर विश्वास करने लग गया है। इसीलिए एक वैज्ञानिक थ्योरी यह भी सामने आ रही है कि हो सकता है कि पूरा ब्रह्माण्ड ही एक विशालकाय एलियन हो।

जिसे हम अंधेरनुमा शून्य या अव्यक्त कहते हैं, वह भी खाली नहीं बल्कि सीमित उतार-चढ़ाव वाली जगतरूपी तरंगों से भरा होता है

अगर चैतन्यमय आत्माकाश या परमात्मा में कोई बहुत ज्यादा स्थित हो जाए या लगातार आत्माकाश में ही स्थित रहने लगे तो वह कुछ काम भी नहीं कर सकता। वह पराश्रित व नादान सा रहता है संन्यासी की तरह। इसका मतलब है कि उस समय उसमें व्यक्त दुनिया अव्यक्त आकाश के रूप में नहीं रहती। मतलब वह शुद्ध आत्माकाश बन जाता है। मतलब उसके आत्माकाश में क्वांटम फील्ड नाम की बिल्कुल भी वाइब्रेशनस नहीं रहतीं। वह पूर्ण चिदाकाश बन जाता है। इसी वजह से स्थूल ब्रह्माण्ड में भी उस जगह आकाश खाली होता है, जहाँ वाइब्रेशन नहीं होतीं। अन्य स्थान ग्रहों-सितारों से भरे होते हैं। वर्चुअल पार्टिकल तो बनते रहते हैं थोड़ी-बहुत वाइब्रेशन से। मतलब थोड़ा-बहुत काम-वाम तो वे संन्यासी भी कर लेते हैं, पर कोई निर्णायक कार्य-अभियान या व्यापार-धंधा नहीं चला पाते। हाँ, एक बीच वाला हरफनमौला तरीका भी है कि तांत्रिक योग से आत्माकाश में लगातार कंपन बनाते भी रहो और मिटाते भी रहो, और सबकुछ करते हुए भी उससे अछूते बने रहो।

कुण्डलिनी योग से ही सृष्टि के मूलकण, मूल तरंग व प्लेन्क लेंथ जैसे क्वांटम तत्त्व बनते हैं

मन के अंदर और बाहर दोनों एकदूसरे के सापेक्ष और मिथ्या हैं

मन के बाहर किसी भी चीज या जगत का अस्तित्व सिद्ध नहीं किया जा सकता

दोस्तों मैं पिछली पोस्ट में बता रहा था कि कैसे जगत सत्य नहीं, बल्कि आत्माकाश के अंदर एक आभासी तरंग है। इसी तरह, स्थूल जगत का भी कोई अस्तित्व नहीं है, इसकी रचना भी मन ने की है। यह कोई आज की खोज नहीं है, जैसा कि कई जगह दिखावा हो रहा है। यह ऋषिमुनियों और अन्य अनेकों जागृत व्यक्तियों ने हजारों साल पहले अनुभव कर लिया था, जो उन्होंने आगे आने वाली हमारी जैसी पीढ़ियों के फायदे के लिए अध्यात्म शास्त्रों में लिखकर छोड़ा। विशेषकर योगवासिष्ठ ग्रंथ में इन तथ्यों का बड़ा सुंदर और वैज्ञानिक जैसा वर्णन है। कभी उसका इतना आकर्षण होता था कि उसको शांति से पढ़ने के लिए या उसे पढ़कर कई लोग घरबार छोड़कर ज्ञानप्राप्ति के लिए निर्जन आश्रम में चले जाते थे। यह पाठक को क्वांटम या पारलौकिक जैसे आयाम में स्थापित कर देता है। इसमें पूनरुक्तियां बहुत ज्यादा हैं, इसलिए बारबार एक ही चीज को विभिन्न आकर्षक तरीकों से दोहराकर यह माइंडवाश जैसा कर देता है। कट्टर भौतिकवादी कह सकते हैं कि जागृति से अनुभव हुए आत्माकाश के अंदर मानसिक सूक्ष्म जगत के बारे में तो यह बात सही है, पर बाहर के स्थूल भौतिक जगत के बारे में यह कैसे मान लें। पर वे उसी पल यह बात भूल जाते हैं कि मन के इलावा स्थूल जगत जैसी चीज का कोई अस्तित्व ही नहीं है, क्योंकि मन के इलावा आदमी कुछ नहीं जान सकता। सिर्फ उस जगत की एक कल्पना कर सकते हैं, पर वह काल्पनिक जगत भी तो सूक्ष्म ही है। फिर कुछ तर्क जिज्ञासु लोग यह कल्पना कर सकते हैं कि चेतन आकाश को ही मूल क्यों समझा जाए, जड़ आकाश को क्यों नहीं, क्योंकि दुःख अभाव आदि जड़ आकाश के टुकड़े हैं।

अचेतन आकाश भी चेतन आत्माकाश में जगत की तरह आभासी व मिथ्या है

इसका जवाब जागृत लोग इस तरह से देते हैं कि चिदाकाश-लहर की तरह ही अचेतन आकाश का अस्तित्व भी नहीं है। वह भ्रम से अपनी आत्मा के रूप में महसूस होता है। वह भ्रम जगत के प्रति आसक्ति से बढ़ता है, और अनासक्ति से घटता है। जैसे चेतन आकाश में जगत आभासी है, उसी तरह अचेतन आकाश भी। इसीलिए सांख्य दर्शन अचेतन आकाश को भी चेतन आकाश की तरह शाश्वत मानता है। हालांकि सर्वोच्च स्कूल ऑफ़ थॉट वेदांत दर्शन स्पष्ट करता है कि अचेतन आकाश चेतन आत्माकाश में वास्तविक नहीं आभासी है।

पूर्णता की अनुभूति भाव रूपी चेतन आकाश के अनुभव से ही होती है, अभाव रूपी अचेतन आकाश के अनुभव से नहीं

जरा गहराई से सोचें तो यह अनुभवसिद्ध भी है। किसीको अचेतन आत्माकाश के अनुभव से यह महसूस नहीं होता कि उसे सबकुछ महसूस हो गया या वह पूर्ण हो गया, उसे कुछ जानने, करने और भोगने के लिए कुछ शेष बचा ही नहीं। पर ऐसा चेतन आत्माकाश के अनुभव से महसूस होता है। इससे मतलब स्पष्ट हो जाता है कि असल में चेतनाकाश ही सत्य और अनंत है, आम अनुभव में आने वाला भौतिक जगत तो उसमें मामुली सी, व मिथ्या अर्थात आभासी तरंग की तरह है।

सृष्टि ब्रह्म की तरह अनिर्वचनीय व अनुभवरूप है

जगत कल्पनिक है, मतलब स्थूल भौतिक जगत काल्पनिक है, क्योंकि उस तक हमारी पहुंच ही नहीं है। मानसिक सूक्ष्म जगत काल्पनिक नहीं क्योंकि यह तो अनुभव होता है। हालांकि सूक्ष्म भी स्थूल के सापेक्ष ही है। जब स्थूल ही नहीं तो सूक्ष्म कैसे हो सकता है। मतलब कि स्थूल-सूक्ष्म आदि सभी विरोधी व द्वैतपूर्ण भाव काल्पनिक हैं। इसलिए जगत सिर्फ अनुभव रूप है, अनिर्वचनीय है। इसे ही गूंगे का गुड़ कहते हैं। हर कोई ब्रह्म में ही स्थित है, केवल स्तर का फर्क है। जागृत व्यक्ति ज्यादा स्तर पर, अन्य विभिन्न प्रकार के निचले स्तरों पर। पूर्ण कोई नहीं।

एक दार्शनिक थोट एक्सीपेरिमेंट

विज्ञान जो अपने को कट्टर प्रयोगात्मक, वास्तविक व वस्तुपरक मानता है, वह भी आजकल बहुत से दार्शनिक विचार-प्रयोग प्रस्तुत कर रहा है, जिन्हें भौतिक प्रयोगों से बिल्कुल भी सिद्ध नहीं किया जा सकता। फिर हम थोट एक्सपेरिमेंट करने से क्यों हिचकिचाएं, क्योंकि कुण्डलिनी का क्षेत्र भौतिक विज्ञान से ज्यादा दार्शनिक व अनुभवात्मक है। वह विचार-प्रयोग है, सृष्टि के सूक्ष्मतम मूलकण को कुण्डलिनी योग का अभ्यास मानना। वैसे शास्त्रों से यह बात प्रमाण-सिद्ध है। वेद-शास्त्रों को भी भौतिक प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण माना गया है, कई मामलों में तो भौतिक से भी ज्यादा, जैसे ईश्वर व जागृति के मामलों में।

इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ ही सूक्ष्मतम तरंग के क्रेस्ट या शिखा और ट्रफ या गर्त हैं

मूलकणरूपी स्टैंडिंग वेव वह हो सकती है, जब स्वाधिष्ठान चक्र और आज्ञा चक्र के जोड़े को या मूलाधार और सहस्रार बिंदु के जोड़े को एकसाथ अंगुली से दबाकर उनके बीच कभी इड़ा से शक्ति की तरंग दौड़ती है, कभी पिंगला से, और बीचबीच में सुषुम्ना से। मूलाधार यिन या पाताल या प्रकृति है,और आज्ञा या सहस्रार यांग या स्वर्ग या पुरुष है। बीच वाली सुषुम्ना नाड़ी ही मूल कण या दुनिया का असली रूप है, क्योंकि उससे ही कुण्डलिनी अर्थात मन अर्थात दुनिया का प्रदुर्भाव होता है।

अस्थायी मूलकण अल्प योगाभ्यास के रूप में है जबकि स्थायी मूलकण सम्पूर्ण योगाभ्यास के रूप में

जैसे आदमी में मूलाधार और सहस्रार के बीच में शक्ति का प्रवाह लगातार जारी रहता है, उसी तरह मूलकण में प्रकृति और पुरुष के बीच। इसीलिए तो तरंग लगातार चलती रहती है, कभी स्थिर नहीं होती। यह स्थिर या असली कण के जैसा है। आभासी कण उस प्रारम्भिक योगाभ्यास की तरह है, जिसमें इड़ा और पिंगला में शक्ति का प्रवाह थोड़ी-थोड़ी देर के लिए होता है, और कम प्रभावशाली होता है। इसीलिए ये अस्थायी कण थोड़े ही समय के लिए प्रकट होते रहते हैं, और आकाश में लीन होते रहते हैं।

पार्टिकल मूलाधार से सहस्रार की ओर चल रही तरंग के रूप में है, जबकि एंटीपार्टिकल सहस्रार से मूलाधार को वापिस लौट रही तरंग के रूप में है

सृष्टि के अंत में सभी कणों के एंटीपार्टिकल पैदा हो जाएंगे जो एकदूसरे को नष्ट करके प्रलय ले आएंगे

मूलाधार यहाँ प्रकृति का प्रतीक है, और सहस्रार पुरुष का। उपरोक्त अस्थायी आभासी कण प्लस और माइनस रूप के दो विपरीत कणों के रूप में पैदा होते रहते हैं। इसका मतलब है कि कभी न कभी स्थायी मूलकणरूपी तरंग भी खत्म होगी ही, बेशक सृष्टि के अंत में। फिर विपरीत मूलकण रूपी तरंग सहस्रार से मूलाधार मतलब पुरुष से प्रकृति की तरफ उल्टी दिशा में चलेगी। ऐसे में हरेक प्लस मूलकण के ठीक उलट माइनस मूलकण बनेंगे। इससे मूलकण और प्रतिमूलकण एकदूसरे से जुड़कर एकदूसरे को निगल जाएंगे, और सृष्टि का अंत हो जाएगा। इसीको प्रलय कहते हैं। फिर लम्बे समय तक कोई तरंग नहीं उठेगी। इसे ही नारायण का योगनिद्रा में जाना कहा गया है। मतलब निद्रा में तो है, पर भी अपने पूर्ण आत्मजागृत स्वरूप में स्थित है। विज्ञान कहता है कि पार्टिकल के बनते ही एंटीपार्टिकल भी बन जाता है, पर वह कहीं गायब हो जाता है। हो सकता है कि सृष्टि के अंत में वे एंटीपार्टिकल दुबारा वापस आ जाते हों।

इस समय एंटीपार्टिकल गुरुत्वाकर्षण के रूप में हैं

मैं यह इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई वैज्ञानिक किस्म के लोग भी ऐसा ही कह रहे हैं। ग्रेविटी अंतरिक्ष में गड्ढे की तरह है। तरंग का आधा भाग भी गड्ढे की तरह होता है। दोनों किसी बल के कारण मिल नहीं पाते। इसलिए कण से निर्मित ग्रेविटी कण को अपनी तरफ खिंचती तो है, पर पूरी तरह उससे मिल नहीं पाती। जब तरंग का ऊपर का आधा भाग ही दिखता है, तो वह कण की तरह ही दिखता है। जब ग्रेविटी का गड्ढा भी उसके साथ देखा जाता है, तो वह कण तरंग रूप में आ जाता है। इसका मतलब है कि प्रलय के समय गुरुत्वाकर्षण ही सारी सृष्टि को निगल जाएगा।

क्वांटम ग्रेविटी का अस्तित्व है

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि इलेक्ट्रोन, क्वार्क आदि मूलकणों की भी ग्रेविटी है। यह सूक्ष्म कण द्वारा निर्मित अंतरिक्ष के आभासी सूक्ष्म गड्ढे के जैसे एंटीपार्टिकल के रूप में है। इसे विज्ञान ढूंढ नहीं पा रहा है, पर क्वांटम ग्रेविटी के अस्तित्व को नकार भी नहीं पा रहा है।

मूल तरंग का पहला नोड प्रकृति है, और दूसरा नोड पुरुष है

ये चित्रोक्त बिंदू स्टैंडिंग वेव के दो नोड हैं। एक कोने पर ब्लू डॉट नेगेटिव या नॉर्थ पोल नोड है और दूसरे कोने पर रेड डॉट पॉजिटिव या साउथ पोल नोड है। दोनों तरफ को झूलती तरंग ही सृष्टि बनाने के लिए इच्छा या सोचविचार है। केंद्रीय रेखा ही ध्यान रूपी या भाव रूप सुषुम्ना है, जो सृष्टि बनाने का पक्का निश्चय है। इसीलिए कहते हैं कि ब्रह्मा ने ध्यान रूपी तप से सृष्टि को रचा। मतलब प्रकृति एक नोड है और पुरुष दूसरा नोड। वैसे भी सृष्टि की उत्पत्ति प्रकृति-पुरुष संयोग से मानी गई है। प्रकृति अंधेरा आसमान है, और पुरुष स्वयंप्रकाश आकाश है। दोनों शाश्वत हैं। प्रकृति नेगेटिव नोड है, और पुरुष पॉजिटिव नोड है। इन दोनों के बीच बनने वाली स्थिर तरंग ही सबसे छोटा मूलकण है। इस तरह के कण आकाश में पॉप आउट होते रहते हैं और उसीमें मर्ज होते रहते हैं। इनको किसी चीज से जब स्थिरता मिलती है तो ये आगे से आगे जुड़कर अनगिनत कण बनाते हैं। इससे सृष्टि का विस्तार होता है। इसका मतलब कि सृष्टि का प्रत्येक कण योग कर रहा है। पूरी सृष्टि योगमयी है।

मूलकण एक कुण्डलिनी योगी है, जो कुण्डलिनी ध्यान कर रहा है

सूक्ष्मतम तरंग की नोड से नोड के बीच की न्यूनतम दूरी प्लेँक लेंथ बनती है

वैज्ञानिकों को क्वार्क से छोटा कोई कण नहीं मिला है। यह भी हो सकता है कि क्वार्क से छोटी तरंगें भी हैं, जैसा कि स्ट्रिंग थ्योरी कहती है, पर वे क्वार्क के स्तर तक बढ़ कर ही अपने को कण रूप में दिखा पाती हैं। केवल कण के स्तर पर ही तरंगें पकड़ में आती हैं। हो सकता है कि सबसे छोटी तरंग प्लेंक लेंथ के बराबर है, जो सबसे छोटी लम्बाई संभव है। उस प्लेँक तरंग का एक नोड प्रकृति है, और दूसरा पुरुष। वैसे प्रकृति और पुरुष एक ही हैं, केवल आभासी अंतर है। इस तरह प्लेँक लेंथ भी वास्तविक नहीं आभासिक है। आकाश में तरंग भी तो आभासी ही हो सकती है, असली नहीं। प्रकृति मतलब मूलाधार से एक शक्ति की तरंग पुरुष मतलब सहस्रार की तरफ उठती है, मतलब देव ब्रह्मा योगरूपी तप के लिए ध्यान लगाते हैं। वह तरंग इड़ा और पिंगला के रूप में बाईं और दाईं तरफ बारी-बारी से झूलने लगती है, मतलब ब्रह्मा ध्यान में डूबने की कोशिश करते हैं। ध्यान थोड़ा स्थिर होने पर शक्ति की तरंग बीच वाली आभासी जैसी सुषुम्ना नाड़ी में बहने लगती है। इसीलिए कण भी आभासी या एज्यूम्ड ही है, असली तो तरंग ही है। इससे कुण्डलिनी चित्र मन में स्थिर हो जाता है, मतलब पहला और सबसे छोटा मूलकण बनता है। फिर तो आगे से आगे सृष्टि बढ़ती ही जाती है। आज भी तो सारी सृष्टि बाहर के खुले व खाली अंतरिक्ष की तरफ भाग रही है, मतलब वही मूल स्वभाव बरकरार है कि प्रकृति से पुरुष की तरफ जाने की होड़ लगी है। सृष्टि की हरेक वस्तु और जीव का एक ही मूल स्वभाव है, अचेतनता से चेतनता की ओर भागना।

मूलकण

यह युद्ध है यह युद्ध है~कविता

यह युद्ध है यह युद्ध है।
न कोई यहाँ पे गाँधी है
न कोई यहाँ पे बुद्ध है।
यह युद्ध है यह युद्ध है।

वीरपने की ऐसी होड़ कि
हिंसा-व्यूह का दिखे न तोड़।
कोई तोप चलाता है तो
कोई देता है बम फोड़।
रुधिर-सिक्त शापित डगरी पर
दया सब्र रूपी न मोड़।
लड़े सांड़ पर मसले घास
जिस पर देते उनको छोड़।
मान पलायन-कायरता न
युद्ध-नीति में इसका जोड़।
असली वीर विरल जगती में
हर इक न होता रणछोड़।
नीति-मार्ग अवरुद्ध है।
यह युद्ध है----

गलती को दुत्कारे फिर भी
नकल उसी की करते हैं।
हमलावर को अँगुली कर के
खुद भी हमला करते हैं।
चिंगारी वर्षों से दबी जो
उसको हवा लगाते हैं।
क्रोध का कारण और ही होता
और को मार भगाते हैं।
खून बहा कर नदियां भर-भर
भी हर योद्धा क्रुद्ध है।
यह युद्ध है---

बढ़त के दावे हर इक करता
आम आदमी है पर मरता।
लाभ उठाए और ही कोई
कीमत उसकी और ही भरता।
जीत का तमगा लाख दिखे पर
न स्वर्णिम न शुद्ध है।
यह युद्ध है----

धर्म का चोला हैं पहनाते
युद्ध को कोमलता से सजाते।
दिलों के महलों को ठुकराकर
पत्थर पर झंडा फहराते।
कैसा छद्म-युद्ध है यह
कैसा धर्म-युद्ध है।
यह युद्ध है---

ज्वाला में सब जलता है और
पानी में सब गलता है।
पेड़ हो चाहे या हो तिनका
नाश न इनका टलता है।
रणभूमि में एकबराबर
मूर्ख है या प्र-बुद्ध है।
यह युद्ध है----

राजा वीर बहुत होता था
रण को कंधे पर ढोता था।
जान बचाने की खातिर वो
गिरि-बंकर में न सोता था।
आज तो प्रजा-खोरों का दिल
राज-धर्म-विरुद्ध है।
यह युद्ध है---

आग बुझाने जाना था जब
आग लगाई क्यों तूने।
आग तपिश के स्वाद की खातिर
लेता जला तू कुछ धूने।
बात ही करनी थी जब आखिर
बात बिगाड़ी क्यों तूने।
सोच सुहाग उजड़ते क्योंकर
क्यों होते आँचल सूने।
परमाणु की शक्ति के संग
प्रलयंकर महा-युद्ध है।
यह युद्ध है--

खून-पसीने की जो कमाई
वो दिखती अब धरा-शायी।
मुक्ति मिलती जिस शक्ति से
क्यों पत्थर में थी वो गंवाई।
बुद्धि नहीं कुबुद्ध है।
यह युद्ध है---

कुंडलिनी ही दृश्यात्मक सृष्टि, सहस्रार में एनर्जी कँटीन्यूवम ही ईश्वर, और मूलाधार में सुषुप्त कुंडलिनी ही डार्क एनर्जी के रूप में हैं

विश्व की उत्पत्ति प्राण-मनस अर्थात टाइम-स्पेस के मिश्रण से होती है

फिर हठ प्रदीपिका के पूर्वोक्त व्याख्याकार कहते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति मनस शक्ति और प्राण शक्ति के मिश्रण से हुई। यह मुझे कुछ दार्शनिक जुगाली भी लगती है। भौतिक रूप में भी शायद यही हो, पर आध्यात्मिक रूप में तो ऐसा ही होता है। जब मस्तिष्क में प्राण शक्ति पहुंचती है, तब उसमें मनस शक्ति खुद ही मिश्रित हो जाती है, जिससे हमें जगत का अनुभव होता है। “यतपिण्डे तत्ब्रह्मांडे” के अनुसार बाहर भी तो यही हो रहा है। शून्य अंतरिक्ष के अंधेरे में सोई हुई शक्ति में किसी अज्ञात कारण से हलचल होती है। उसमें खुद ही मनस शक्ति मिश्रित हो जाती है, क्योंकि चेतनामयी ईश्वरीय मनस शक्ति हर जगह विद्यमान है। इससे मूलभूत कणों का निर्माण होता है। सम्भवतः ये मूल कण ही प्रजापति हैं, जो आगे से आगे बढ़ते हुए पूरी सृष्टि का निर्माण कर देते हैं। यह ऐसे ही है, जैसे मूलाधार के अंधेरे में सोई प्राण ऊर्जा के जागने से होता है। तभी कहते हैं कि यह सृष्टि मैथुनी है। फिर मनस शक्ति को देश या स्पेस और प्राण शक्ति को काल या टाइम बताते हैं। फिर कहते हैं कि टाइम और स्पेस के आपस में मिलने से मूल कणों की उत्पत्ति हो रही है, जैसा वैज्ञानिक भी कुछ हद तक मानते हैं।

डार्क एनर्जी ही सुषुप्त ऊर्जा है

दोस्तो, खाली स्पेस भी खाली नहीं होता, पर रहस्यमयी डार्क एनर्जी से भरा होता है। पर इसे किसी भी यन्त्र से नहीं पकड़ा जा सकता। यही सबसे बड़ी एनर्जी है। हम केवल इसे अपने अंदर महसूस ही कर सकते हैं। ब्रह्मांड इसमें बुलबुलों की तरह बनते और मिटते रहते हैं। सम्भवतः यही तो ईश्वर है। यह शून्य हमें इसलिए लगता है, क्योंकि हमें अनुभव नहीं होता। इसी तरह मूलाधार में सोई हुई ऊर्जा भी डार्क एनर्जी ही है। हम इसे अपनी शून्य आत्मा के रूप में महसूस करते हैं। हम हर समय अनन्त ऊर्जा से भरे हुए हैं, पर भ्रम से उसका प्रकाश महसूस नहीं कर पाते। उसे मूलाधार में इसलिए मानते हैं, क्योंकि मूलाधार मस्तिष्क से सबसे ज्यादा दूर है। मस्तिष्क के सहस्रार क्षेत्र में अगर चेतनता का महान प्रकाश रहता है, तो मूलाधार में अचेतनता का घुप्प अंधेरा ही माना जाएगा। मस्तिष्क से नीचे जाते समय चेतना का स्तर गिरता जाता है, जो मूलाधार पर न्यूनतम हो जाता है। यदि ऐसे समय कुंडलिनी का ध्यान करने की कोशिश की जाए, जब मस्तिष्क थका हो या तमोगुण रूपी अंधेरे से भरा हो, तो कुंडलिनी चित्र नीचे के चक्रों में बनता है। मुझे जो दस सेकंड का क्षणिक आत्मज्ञान का अनुभव हुआ था, उसमें रहस्यात्मक कुछ भी नहीं है। यह शुद्ध वैज्ञानिक ही है। संस्कृत की भाषा शैली ही ऐसी है कि उसमें सबकुछ आध्यात्मिक ही लगता है। उसे विज्ञान की भाषा मेंआप “एक्सपेरिएंस ऑफ डार्क एनेर्जी” या “अदृश्य ऊर्जा दर्शन” कह सकते हैं। इसी तरह सुषुम्ना में ऊपर चढ़ने वाली ऊर्जा भी डार्क एनेर्जी की तरह ही होती है। इसीलिए उसे केवल बहुत कम लोग ही और बहुत कम मौकों पर ही अनुभव कर पाते हैं, सब नहीं। हालाँकि यह पूरी तरह से डार्क एनेर्जी तो नहीं है, क्योंकि यह सूक्ष्म तरंगों या सूक्ष्म अणुओं की क्रियाशीलता से बनी होती है। असली डार्क एनेर्जी में तो शून्य के इलावा कुछ नहीं होता, फिर भी उसमें अनगिनत ब्रह्मांडों का प्रकाश समाया होता है। एक पुरानी पोस्ट में मैंने लिखा था कि एकबार कैसे मैंने अपनी दादी अम्मा की परलोकगत आत्मा या डार्क एनेर्जी को ड्रीम विजिटेशन में महसूस किया था। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई चमकीले कज्जल से भरा आसमान हो, जिसका प्रकाश किसीने बलपूर्वक ढका हो, और वह प्रकाश सभी पर्दे-दीवारें तोड़कर बाहर उमड़ना चाह रहा हो, यानि कि अभिव्यक्त होना चाह रहा हो।

यिन-यांग या प्रकृति-पुरुष से सृष्टि की उत्पत्ति

डार्क एनेर्जी में ही सृष्टि के प्रारंभ में सबसे छोटा औऱ सबसे कम देर टिकने वाला कण बना होगा। इसे ही काल या टाइम या विपरीत ध्रुव की उत्पत्ति कह सकते हैं। स्पेस या डार्क एनर्जी दूसरा ध्रुव है, जो पहले से था। टाइम के रूप में निर्मित वह सूक्ष्मतम कण एक महान विस्फोट के साथ स्पेस की तरफ तेजी से आगे बढ़ने लगता है। यही सृष्टि का प्रारंभ करने वाला बिग बैंग या महा विस्फोट है। वह कण तो एक सेकंड के करोड़वें भाग में विस्फोट से नष्ट हो गया, पर उस विस्फोट से पैदा होकर आगे बढ़ने वाली लहर में विभिन्न प्रकार के कण और उनसे विभिन्न पदार्थ बनते गए। आगे चलकर उन कणों की व उनसे बनने वाले पदार्थों की जीवन अवधि में इजाफा होता गया। वैसे भी कहते हैं कि दो विपरीत ध्रुवों के बनने से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई। इन्हें यिन-यांग कह सकते हैं। यही प्रकृति-पुरुष है। शरीर में भी ऐसा ही है। मूलाधार में डार्क एनेर्जी है, जो कुंडलिनी योग से जागृत हुई। जागृत होने का मतलब है कि कुंडलिनी योग के सिद्धासन में वह मूलाधार चक्र पर पैर की एड़ी के दबाव से बनी संवेदना के रूप में अनुभव की गई। इस संवेदना में ध्यान चित्र मिश्रित होने से यह कुंडलिनी बन गई। इस संवेदना की उत्पत्ति को हम समष्टि के सबसे छोटे मूल कण की उत्पत्ति का शारीरिक रूप भी कह सकते हैं। वह कुंडलिनी एनेर्जी जागृत होने के लिए सहस्रार की तरफ जाने का प्रयास करते हुए मस्तिष्क में रंगबिरंगी सृष्टि की रचना बढ़ाने लगी। मतलब कि दो विपरीत ध्रुव आपस में मिलने का प्रयास करने लगे। शक्ति शिव से जुड़ने के लिए बेताब होने लगी। समष्टि में वह मूल कण बिग बैंग के रूप में आगे बढ़ने लगा और उस डार्क एनेर्जी के छोर को छूने का प्रयास करने लगा, जहाँ से वह आया था। वह मूलकण नौटंकी करते हुए यह समझने लगा कि वह अधूरा है, और उसने डार्क एनेर्जी को प्राप्त करने के लिए आगे ही आगे बढ़ते जाना है। ऐसा करते हुए उससे सृष्टि की रचना खुद ही आगे बढ़ने लगी। यह ऐसे ही होता है जैसे आदमी का मन या कुंडलिनी उस अदृश्य अंतरिक्षीय ऊर्जा को प्राप्त करने की दौड़ में भरे-पूरे जगत का निर्माण कर लेता है। कुंडलिनी भी तो समग्र मन का सम्पूर्ण प्रतिनिधि ही है। मन कहो या कुंडलिनी कहो, बात एक ही है। बिग बैंग की तरंगों के साथ जो सृष्टि की लहर आगे बढ़ रही है, उसे हम सुषुम्ना नाड़ी में एनर्जी का प्रवाह भी कह सकते हैं। पर उस डार्क एनेर्जी का अंत तो उसे मिलेगा नहीं। इसका मतलब है कि यह सृष्टि अनन्त काल तक फैलती ही रहेगी। पर इसे अब हम शरीर से समझते हैं, क्योंकि लगता है कि विज्ञान इसका जवाब नहीं ढूंढ पाएगा। जब आदमी इस दुनिया में अपनी सभी जिम्मेदारियों को निभाकर अपनी कुंडलिनी को जागृत कर लेता है, तब वह दुनिया से थोड़ा उपरत सा हो जाता है। कुछ समय शांत रहकर वह दुनिया से बिल्कुल लगाव नहीं रखता। वह जैसा है, उसी में खुश रहकर अपनी दुनियादारी को आगे नहीं बढ़ाता। फिर बुढ़ापे आदि से उसका शरीर भी मृत्यु को प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है। इसी तरह जब इस सृष्टि का लक्ष्य पूरा हो जाएगा, तब उसके आगे फैलने की रप्तार मन्द पड़ जाएगी। फिर रुक जाएगी। अंत में सृष्टि की सभी चीजें एकसाथ अपनी-अपनी जगह पर विघटित हो जाएंगी। इसका मतलब है कि बिग बैंग रिवर्स होकर पुनः बिंदु में नहीं समाएगा। सृष्टि का लक्ष्य समय के रूप में निर्धारित होता होगा। निश्चित समय के बाद वह नष्ट हो जाती होगी, जिसे महाप्रलय कहते हैं। क्योंकि सृष्टि के पदार्थों ने आदमी की तरह असली जागृति तो प्राप्त नहीं करनी है, क्योंकि वे तो पहले से ही जागृत हैं। वे तो केवल सुषुप्ति का नाटक सा ही करते हैं। यह भी हो सकता है कि सृष्टि की आयु का निर्धारण समय से न होकर ग्रह-नक्षत्रों की संख्या और गुणवत्ता से होता हो। जब निश्चित संख्या में ग्रह आदि निर्मित हो जाएंगे, और उनमें अधिकांश मनुष्य आदि जीव अपनी इच्छाएं पूरी कर लेंगे, तभी सृष्टि की आयु पूरी होगी। ऐसा भी हो सकता है कि सृष्टि विघटित होने के लिए वापिस आए, बिग बैंग के शुरुआती बिंदु पर। क्योंकि आदमी का शरीर भी मरने से पहले बहुत कमजोर और दुबला-पतला हो लेता है। विज्ञान के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से भी ऐसा ही लगता है। जब बिग बैंग के धमाके की ऊर्जा खत्म हो जाएगी, तो गुरुत्वाकर्षण का बल हावी हो जाएगा, जिससे सृष्टि सिकुड़ने लगेगी औऱ सबसे छोटे मूल बिंदु में समाकर फिर से डार्क एनेर्जी में विलीन हो जाएगी। यह संभावना कुंडलिनी योग की दृष्टि से भी सबसे अधिक लगती है। मानसिक सृष्टि का प्रतिनिधित्व करने वाली कुंडलिनी ऊर्जा भी सहस्रार से वापिस मुड़ती है, और फ्रंट चैनल से नीचे उतरती हुई फिर से मूलाधार में पहुंच जाती है। वहाँ से फिर बैक चैनल से ऊपर चढ़ती है। इस तरह से हमारे शरीर में सृष्टि और प्रलय का क्रम लगातार चलता रहता है।

सांख्य दर्शन और वेदांत दर्शन में सृष्टि-प्रलय

सांख्य दर्शन में पुरुष और प्रकृति, दोनों को शाश्वत कहा गया है। पर वेदांत दर्शन में प्रकृति की उत्पत्ति पुरुष से बताई गई है, जैसा मैं भी कह रहा हूँ। यहां पुरुष मूल रूप में प्रकाशमान डार्क एनेर्जी है, और प्रकृति प्रकाश से रहित डार्क एनेर्जी है। मुझे लगता है कि सांख्य में शरीर के अंदर की सृष्टि और प्रलय का वर्णन हो रहा है। हमें अपने मन में ही डार्क एनेर्जी का अंधेरा हमेशा महसूस होता है, यहाँ तक कि कुंडलिनी जागरण के बाद भी। इसीलिए इसे भी शाश्वत कहा गया है। दूसरी ओर वेदांत में बाहर के संसार की सृष्टि और प्रलय की बात हो रही है। वहां तो प्रकृति या डार्क एनेर्जी और उससे पैदा होने वाले कणों का अस्तित्व ही नहीं है। ये तो केवल हमें अपने मन में महसूस होते हैं। वहाँ अगर इनकी उत्पत्ति होती है, तो सिर्फ नाटकीय या आभासिक ही। वहाँ तो सिर्फ प्रकाश से भरा हुआ एनेर्जी कँटीन्यूवम ही है। वैसे तो वेदांत भी मानसिक सृष्टि का ही वर्णन करता है, क्योंकि वे भी किसी भौतिक प्रयोगशाला का उपयोग नहीं करते, जो बाहर के जगत की उत्पत्ति को सिद्ध कर सके। पर वह उन महान योगियों के अनुभव को प्रमाण मानता है, जो हमेशा एनेर्जी कँटीन्यूवम से जुड़े रहते हैं।